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अध्याय छह: देवताओं और दानवों ने युद्धविराम की घोषणा की

8.6श्रीशुक उबाच एवं स्तुतः सुरगणैर्भगवान्हरिरी श्वर: |

तेषामाविरभूद्राजन्सहस्त्राको दयद्युति: ॥

१॥

श्री-शुकः उबाच-- श्री शुकदेव गोस्वामी ने कहा; एवम्‌--इस प्रकार; स्तुतः--स्तुति किये जाने पर; सुर-गणैः--देवताओंद्वारा; भगवान्‌ू-- भगवान्‌; हरि: --समस्त अशुभों को मिटाने वाले; ईश्वरः-- परम नियन्ता; तेषाम्‌-ब्रह्माजी तथा सारे देवताओंके समक्ष; आविरभूत्‌--प्रकट हुए; राजन्‌ू--हे राजा परीक्षित; सहस्त्र--एक हजार; अर्क--सूर्य; उदय--उगते हुए; द्युति:--उनका तेज |

श्री शुकदेव गोस्वामी ने कहा : हे राजा परीक्षित! देवताओं तथा ब्रह्मा जी द्वारा इस प्रकार स्तुतियों से पूजित भगवान्‌ हरि उन सब के समक्ष प्रकट हो गये |

उनका शारीरिक तेज एकसाथ हजारों सूर्यों के उदय होने के समान था |

तेनैव सहसा सर्वे देवा: प्रतिहतेक्षणा: |

नापश्यन्खं दिश: क्षौणीमात्मानं च कुतो विभुम्‌ ॥

२॥

तेन एबव--इसके कारण; सहसा--एकाएक; सर्वे--सभी; देवा:--देवतागण; प्रतिहत-ईक्षणा: --उनकी दृष्टि चकाचौंध हो गई;न--नहीं; अपश्यन्‌--देख सके ; खम्‌--आकाश को; दिश:--दिशाओं को; क्षौणीम्‌--पृथ्वी को; आत्मानम्‌ च--तथा अपनेआपको भी; कुतः--तथा देखने का प्रश्न ही कहाँ है; विभुम्‌--परमे श्वर को |

भगवान्‌ के तेज से सारे देवताओं की दृष्टि चौंधिया गई |

वे न तो आकाश, दिशाएँ, पृथ्वीदेख सके, न ही अपने आपको देख सके |

अपने समक्ष उपस्थित भगवान्‌ को देखना तो दूर रहा |

विरिज्ञो भगवान्दष्ठा सह शर्वेण तां तनुम्‌ |

स्वच्छां मरकतश्यामां कञ्जगर्भारुणेक्षणाम्‌ |

तप्तहेमावदातेन लसत्कौशेयवाससा ॥

३॥

प्रसन्नचारुसर्वाड़ीं सुमुखीं सुन्दरभ्रुवम्‌ |

महामणिकिरीटेन केयूराभ्यां च भूषिताम्‌ ॥

४॥

कर्णाभरणनिर्भातकपोलश्रीमुखाम्बुजाम्‌ |

काञझ्जीकलापवलयहारनूपुरशोभिताम्‌ ॥

५॥

कौस्तुभाभरणां लक्ष्मीं बिभ्रतीं वनमालिनीम्‌ |

सुदर्शनादिभि: स्वास्त्रै्मूर्तिमद्विरुपासिताम्‌ ॥

६॥

तुष्टाव देवप्रवर: सशर्व: पुरुषं परम्‌ |

सर्वामरगणै: साकं सर्वाड्भिरवनिं गते; ॥

७॥

विरिज्ञः--ब्रह्माजी; भगवान्‌-- भगवान्‌ ( ब्रह्म को उनके शक्तिशाली पद के कारण भगवान्‌ कहकर सम्बोधित किया गया );इृष्ठा--देखकर; सह--सहित; शर्वेण--शिवजी; ताम्‌--भगवान्‌ के; तनुम्‌--दिव्य रूप को; स्वच्छाम्‌--स्वच्छ भौतिक कल्मषके बिना; मरकत-श्यामाम्‌--नीले मणि के प्रकाश के समान शारीरिक कान्ति से युक्त; कञ्ज-गर्भ-अरुण-ईक्षणाम्‌--कमल के'फूल के गर्भ सहश गुलाबी आँखों वाले; तप्त-हेम-अवदातेन--पिघले सोने जैसी कान्ति से युक्त; लसत्‌ू--चमकता; कौशेय-वाससा--पीला रेशमी वस्त्र धारण किये; प्रसन्न-चारु-सर्व-अड्डीम्‌--जिसके शरीर के सारे अंग अत्यन्त शोभनीय और सुन्दर;सु-मुखीम्‌--मुस्काते मुखमंडल से युक्त; सुन्दर-भ्रुवम्‌--जिसकी भौंहें अत्यन्त सुन्दर थीं; महा-मणि-किरीटेन--बहुमूल्यमणियों से जटितमुकुट वाले; केयूराभ्याम्‌ च भूषितामू--सभी तरह के आभूषणों से सज्जित; कर्ण-आभरण-निर्भात--कानोंकी मणियों की किरणों से प्रकाशित; कपोल--कपोल; श्री-मुख-अम्बुजाम्‌--जिसका सुन्दर कमल मुख; काझ्जी-कलाप-वबलय--आभूषण यथा कमर की करधनी तथा हाथ के बाजूबंद; हार-नूपुर--वक्षस्थल पर हार तथा पाँवों में पायल पहने;शोभिताम्‌--सुशोभित; कौस्तुभ-आभरणाम्‌--जिनका वक्षस्थल कौस्तुभ मणि से अलंकृत था; लक्ष्मीम्‌--लक्ष्मी; बिभ्रतीम्‌--चलायमान; वन-मालिनीम्‌--फूलों की मालाएँ पहने; सुदर्शन-आदिभि: --सुदर्शन चक्र आदि धारण किये; स्व-अस्त्रै: --अपनेहथियारों से; मूर्तिमद्धिः--अपने आदि रूप में; उपासिताम्‌--पूजित होकर; तुष्टाव--संतुष्ट; देव-प्रवर:--देवताओं में प्रमुख; स-शर्व:--शिवजी के सहित; पुरुषम्‌ परम्‌--परम पुरुष को; सर्व-अमर-गणै: --सभी देवताओं के साथ-साथ; साकम्‌--सहित;सर्व-अड्डैः--शरीर के सारे भागों से; अवनिम्‌--भूमि पर; गतैः--गिरकर प्रणाम किया

शिवजी सहित ब्रह्माजी ने भगवान्‌ के निर्मल शारीरिक सौन्दर्य को देखा जिनका श्यामल शरीर मरकत मणि के समान है, जिनकी आँखें कमल के फूल के भीतरी भाग जैसी लाल-लालहैं, जो पिघले सोने जैसे पीले वस्त्र धारण किये हैं और जिनका समूचा शरीर आकर्षक ढंग सेसज्जित है |

उन्होंने उनके सुन्दर मुस्काते कमल जैसे मुखमण्डल को देखा जिसके ऊपर बहुमूल्यरत्नों से जड़ित मुकुट था |

भगवान्‌ की भौहें आकर्षक हैं और उनकी गालों पर कान के कुण्डलशोभित रहते हैं |

ब्रह्म जी तथा शिव जी ने भगवान्‌ की कमर में पेटी, उनकी बाहों में बाजूबंद,वक्षस्थल पर हार और पाँवों में पायल देखे |

भगवान्‌ फूल की मालाओं से अलंकृत थे, उनकीगर्दन में कौस्तुभ मणि अलंकृत थी और उनके साथ लक्ष्मीजी थीं तथा वे चक्र, गदा इत्यादिनिजी आयुध लिए हुए थे |

जब ब्रह्मा जी ने शिवजी तथा अन्य देवताओं के साथ भगवान्‌ केस्वरूप को इस तरह देखा तो सब ने भूमि पर गिरकर उन्हें प्रणाम किया |

श्रीब्रह्मोवाचअजातजन्मस्थितिसंयमाया-गुणाय निर्वाणसुखार्णवाय |

अणोरणिम्नेउपरिगण्यधाम्नेमहानुभावाय नमो नमस्ते ॥

८॥

श्री-ब्रह्म उवाच--ब्रह्माजी ने कहा; अजात-जन्म-स्थिति-संयमाय-- भगवान्‌ को, जो कभी उत्पन्न नहीं होता, किन्तु जिनकाविविध अवतारों में प्राकट्य कभी बन्द नहीं होता; अगुणाय--प्रकृति के तीनों गुणों से कभी भी प्रभावित नहीं होने वाले;निर्वाण-सुख-अर्णवाय-- भौतिक सृष्टि से परे शाश्वत आनन्द के सागर को; अणो: अणिम्ने--अणु से भी छोटा; अपरिगण्य-धाम्ने--जिनके शारीरिक स्वरूप की अनुभूति भौतिक चिन्तन से नहीं की जाती; महा-अनुभावाय--जिनका अस्तित्व अचिन्त्यहै; नमः--नमस्कार; नमः--फिर से नमस्कार; ते--तुमको |

ब्रह्माजी ने कहा : यद्यपि आप अजन्मा हैं, किन्तु अवतार के रूप में आपका प्राकट्य तथाअन्तर्धान सदैव चलता रहता है |

आप सदैव भौतिक गुणों से मुक्त रहते हैं और सागर के समानदिव्य आनन्द के आश्रय हैं |

अपने दिव्य स्वरूप में नित्य रहते हुए आप अत्यन्त सूक्ष्म से भी सूक्ष्महैं |

अतएव हम आपको जिनका अस्तित्व अचिन्त्य है |

सादर नमस्कार करते हैं |

रूप॑ तवैतत्पुरुषर्ष भेज्यंश्रेयोडर्थिभिवैदिकतान्त्रिकेण |

योगेन धातः सह नस्त्रिलोकान्‌पश्याम्यमुष्मिन्नु ह विश्वमूर्तों ॥

९॥

रूपम्‌--रूप; तब--तुम्हारा; एतत्‌ू--यह; पुरुष-ऋषभ-हे पुरुषों में श्रेष्ठ; इज्यम्‌--पूज्य; श्रेयः --चरम कल्याण; अर्धिभि: --कामना करने वाले व्यक्तियों द्वारा; वैदिक--वैदिक आदेशों के अनुसार; तान्त्रिकेण--नारद पश्नरात्र जैसे तंत्रों के अनुयायियोंद्वारा अनुभव किया गया; योगेन--योगाभ्यास द्वारा; धातः--हे परम नियन्ता; सह--साथ; नः--हम ( देवताओं ) को; त्रि-लोकान्‌--तीनों लोकों को नियंत्रित करने वाले; पश्यामि- प्रत्यक्ष देखता हूँ; अमुष्मिन्‌ू--आप में; उ--ओह; ह-- पूर्णतयाप्रकट; विश्व-मूर्तों--विश्व रूप आप में |

हे पुरुषश्रेष्, हे परम नियन्ता! जो लोग सचमुच परम सौभाग्य की कामना करते हैं, वेवैदिक तंत्रों के अनुसार आपके इसी रूप की पूजा करते हैं |

हे प्रभु! हम आपकमें तीनों लोकों कोदेख सकते हैं |

त्वय्यग्र आसीत्त्वयि मध्य आसीत्‌त्वय्यन्त आसीदिदमात्मतन्त्रे |

त्वमादिरन्तो जगतोस्य मध्यघटस्य मृत्स्नेव पर: परस्मात्‌ ॥

१०॥

त्वयि--तुम ( भगवान्‌ ) में; अग्रे--प्रारम्भ में; आसीत्‌-- था; त्वयि--तुममें; मध्ये--मध्य में; आसीतू-- था; त्वयि--तुममें;अन्ते--अन्त में; आसीत्‌-- था; इृदम्‌--यह सारा दृश्य जगत; आत्म-तन्‍्त्रे--पूर्णतया आपके नियंत्रण में; त्वमू--तुम; आदि:--आदि; अन्तः--अन्त; जगत: --दृश्य जगत के; अस्य--इस; मध्यम्‌--मध्य; घटस्य--मिट्टी के पात्र का; मृत्स्ना इब--मिट्टी केसमान; परः--दिव्य; परस्मात्‌-- प्रमुख होने के कारण |

सदैव पूर्ण स्वतंत्र रहने वाले मेरे प्रभु! यह सारा दृश्य जगत आपसे उत्पन्न होता है, आप परटिका रहता है और आपमें तल्‍लीन हो जाता है |

आप ही प्रत्येक वस्तु के आदि, मध्य तथा अन्तहैं जिस तरह पृथ्वी मिट्टी के पात्र का कारण है; वह उस पात्र को आधार प्रदान करती है और जबपात्र टूट जाता है, तो अन्ततः उसे अपने में मिला लेती है |

त्वं माययात्मा श्रयया स्वयेदंनिर्माय विश्व॑ं तदनुप्रविष्ट: |

पश्यन्ति युक्ता मनसा मनीषिणोगुणव्यवायेप्यगुणं विपश्चित: ॥

११॥

त्वमू--आप; मायया--अपनी नित्य शक्ति द्वारा; आत्म-आश्रयया--जिसका अस्तित्व आपकी शरण के अधीन है; स्वया--आपसे उद्भूत; इृदम्‌ू-यह; निर्माय--उत्पन्न करने के लिए; विश्वम्‌--सारे ब्रह्माण्ड को; तत्‌--उसमें; अनुप्रविष्ट: --आप प्रवेशकरते हैं; पश्यन्ति--वे देखते हैं; युक्ता:--आपके सम्पर्क में रहने वाले व्यक्ति; मनसा--मन से; मनीषिण:--उच्च चेतना वालेलोग; गुण--भौतिक गुणों के; व्यवाये--रूपान्तर में; अपि--यद्यपि; अगुणम्‌-- भौतिक तत्त्वों से अछूता; विपश्चित: --शास्त्रके सत्य से भलीभाँति अभिज्ञ लोग |

हे परब्रह्म! आप अपने में स्वतंत्र हैं और दूसरों से सहायता नहीं लेते |

आप अपनी शक्ति सेइस हृश्य जगत का सृजन करके इसमें प्रवेश कर जाते हैं |

जो लोग कृष्णभावनामृत में बढ़े-चढ़ेहैं, जो प्रामाणिक शास्त्रों से भलीभाँति परिचित हैं और जो भक्तियोग के अभ्यास से सारेभौतिक कल्मष से शुद्ध हो जाते हैं, वे यह शुद्ध मन से देख सकते हैं कि आप भौतिक गुणों केरूपान्तरों के भीतर रहते हुए भी इन गुणों से अछूते रहते हैं |

यथाग्निमेधस्यमृतं च गोषुभुव्यन्नमम्बूद्यमने च वृत्तिम्‌ |

योगैर्मनुष्या अधियन्ति हि त्वां गुणेषु बुद्धया कवयो वदन्ति ॥

१२॥

यथा--जिस तरह; अग्निम्‌--अग्नि; एधसि--क्राष्ठ में; अमृतम्‌--अमृत तुल्य दुग्ध; च--तथा; गोषु--गायों में; भुवि-- भूमिपर; अन्नम्‌ू--अनाज; अम्बु--जल; उद्यमने--उद्यम में; च-- भी; वृत्तिमू--जीविका; योगै: -- भक्तियोग के अभ्यास से;मनुष्या:--लोग; अधियन्ति--प्राप्त करते हैं; हि--निस्सन्देह; त्वाम्‌--तुमको; गुणेषु--गुणों में; बुद्धया--बुद्धि से; कबय:--महापुरुष; वदन्ति--कहते हैं |

जिस प्रकार काठ से अग्नि, गाय के थन से दूध, भूमि से अन्न तथा जल और औद्योगिकउद्यम से जीविका के लिए समृद्धि प्राप्त की जा सकती है उसी तरह इस भौतिक जगत में मनुष्यभक्तियोग के अभ्यास द्वारा आपकी कृपा प्राप्त कर सकता है या बुद्धि से आपके पास पहुँचसकता है |

जो पुण्यात्मा हैं, वे इसकी पुष्टि करते हैं |

त॑ं त्वां बयं नाथ समुज्जिहानंसरोजनाभातिचिरेप्सितार्थम्‌ |

इृष्ठा गता निर्वृतमद्य सर्वेगजा दवार्ता इवब गाड़ुमम्भ: ॥

१३॥

तमू--हे भगवान्‌; त्वामू--आपको; वयम्‌--हम सभी; नाथ--हे स्वामी; समुज्जिहानम्‌-- अपनी समस्त महिमा के साथ अबहमारे समक्ष प्रकट होने वाले; सरोज-नाभ--कमल फूल के समान नाभि वाले भगवान्‌ अथवा जिनकी नाभि से कमल निकलताहै; अति-चिर--दीर्घकाल तक; ईप्सित--चाहते हुए; अर्थम्‌--जीवन के चरम लक्ष्य के लिए; हृट्ला--देखकर; गता:--अपनीइृष्टि के अन्तर्गत; निर्वृतम्‌--दिव्य सुख; अद्य--आज; सर्वे--हम सभी; गजा:--हाथी; दव-अर्ता:--जंगल की अग्नि सेपीड़ित; इब--सहश; गाड़म्‌ अम्भ:--गंगा के जल से

जंगल की अग्नि से पीड़ित हाथी गंगाजल प्राप्त होने पर अत्यन्त प्रसन्न होते हैं |

इसी प्रकार,हे प्रभु! कमलनाभ प्रभु! चूँकि आप हमारे समक्ष अब प्रकट हुए हैं अतएवं हम दिव्य सुख काअनुभव कर रहे हैं |

हमें आपके दर्शन की दीर्घकाल से आकांक्षा थी अतएव आपका दर्शन पाकर हमने अपने जीवन के चरम लक्ष्य को पा लिया है |

स त्वं विधत्स्वाखिललोकपालाबय॑ं यदर्थास्तव पादमूलम्‌ |

समागतास्ते बहिरन्तरात्मन्‌कि वान्यविज्ञाप्यमशेषसाक्षिण: ॥

१४॥

सः--वह; त्वमू--आप; विधत्स्व--कृपया जो आवश्यक हो करें; अखिल-लोक-पाला:--देवता, इस ब्रह्माण्ड के विभिन्नविभागों के निर्देशक; वयम्‌--हम सभी; यत्‌--जो; अर्था:-- प्रयोजन; तब-- आपके ; पाद-मूलम्‌--चरणकमलों पर;समागताः--हम आये हैं; ते--आपको; बहिः-अन्त:-आत्मन्‌--हे सबके परमात्मा, हे बाह्य तथा अन्तर के सतत साक्षी; किमू--क्या; वा--अथवा; अन्य-विज्ञाप्यमू--आपको सूचित करते हैं; अशेष-साक्षिण:--हर वस्तु के साक्षी तथा ज्ञाता |

है भगवान्‌! हम विविध देवता, इस ब्रह्माण्ड के निर्देशक आपके चरणकमलों के निकटआये हैं |

जिस प्रयोजन से हम आये हैं कृपया उसे पूरा करें |

आप भीतर तथा बाहर से हर वस्तुके साक्षी हैं |

आपसे कुछ भी अज्ञात नहीं है, अतएबं आपको किसी बात के लिए पुनः सूचितकरना व्यर्थ है |

अहं गिरित्रश्च सुरादयो येदक्षादयोग्नेरिव केतवस्ते |

किं वा विदामेश पृथग्विभाताविधत्स्व शं नो द्विजदेवमन्त्रम्‌ू ॥

१५॥

अहम्‌-मैं ( ब्रह्मा ); गिरित्र:--शिवजी; च-- भी; सुर-आदय:--तथा सारे देवता; ये--जैसे भी हम हैं; दक्ष-आदय:--महाराजदक्ष इत्यादि; अग्ने:-- अग्नि के; इब--सहश; केतव:--चिनगारियाँ; ते--तुम्हारा; किमू-- क्या; वा--अथवा; विदाम--हमसमझ सकते हैं; ईश-हे प्रभु; पृथक्‌ू-विभाताः:--आपफसे स्वतंत्र होकर; विधत्स्व--हमें प्रदान करें; शम्‌--सौ भाग्य; न:--हमारा; द्विज-देव-मन्त्रमू-ब्राह्मणों तथा देवताओं के लिए उपयुक्त मोक्ष का साधन |

मैं ( ब्रह्म ) शिवजी तथा सारे देवताओं के साथ-साथ, दक्ष जैसे प्रजापति भी चिनगारियाँमात्र हैं, जो मूल अग्नि स्वरूप आपके द्वारा प्रकाशित हैं |

चूँकि हम आपके कण हैं अतएव हमअपनी कुशलता के विषय में समझ ही कया सकते हैं? हे परमेश्वर! हमें मोक्ष का वह साधनप्रदान करें जो ब्राह्मणों तथा देवताओं के लिए उपयुक्त हो |

श्रीशुक उबाचएवं विरिज्ञादिभिरीडितस्तद्‌विज्ञाय तेषां हृदयं यथेव |

जगाद जीमूतगभीरया गिराबद्धाञ्जलीन्संवृतसर्वकारकान्‌ ॥

१६॥

श्री-शुकः उवाच-- श्री शुकदेव गोस्वामी ने कहा; एवम्‌--इस प्रकार; विरिज्ञन-आदिभि: --ब्रह्मा इत्यादि सारे देवताओं द्वारा;ईंडित:--पूजित; तत्‌ विज्ञाय--आशा को जानकर; तेषामू--उन सब का; हृदयम्‌--हदय; यथा--जिस तरह; एब--निस्सन्देह;जगाद--उत्तर दिया; जीमूत-गभीरया--बादलों की गरज के समान; गिरा--शब्दों से; बद्ध-अद्लीन्‌--हाथ जोड़कर खड़ेदेवताओं को; संवृत--संयमित; सर्व--सभी; कारकान्‌--इन्द्रियों को |

श्री शुकदेव गोस्वामी ने आगे कहा : जब ब्रह्मा समेत सारे देवताओं ने भगवान्‌ की स्तुतिकी तो वे उनके वहाँ आने का प्रयोजन समझ गये |

अतएवं भगवान्‌ ने बादल की गर्जना केसमान गम्भीर वाणी में उन देवताओं को उत्तर दिया जो हाथ जोड़कर सावधानी से वहाँ खड़े थे |

एक एवेश्वरस्तस्मिन्सुरकार्ये सुरेश्वरः |

विहर्तुकामस्तानाह समुद्रोन्मथनादिभि: ॥

१७॥

एकः--अकेला; एव--निस्सन्देह; ईश्वर: -- भगवान्‌; तस्मिन्‌--उस; सुर-कार्ये--देवताओं के कार्यों में; सुर-ई श्वरः --देवताओंके ईश्वर, भगवान्‌; विहर्तु--लीलाओं का आनन्द भोगने के लिए; काम:--इच्छा करते हुए; तानू--देवताओं से; आह--कहा;समुद्र-उन्मथन-आदिभि:--समुद्र-मन्थन के कार्यो से

यद्यपि देवताओं के स्वामी भगवान्‌ देवताओं के कार्यकलापों को स्वयं सम्पन्न करने मेंसमर्थ थे फिर भी उन्होंने समुद्र-मन्‍न्थन की लीला का आनन्द उठाना चाहा |

अतएव बे इस प्रकारबोले |

श्रीभगवानुवाचहन्त ब्रह्मन्नहो शम्भो हे देवा मम भाषितम्‌ |

श्रुणुतावहिता: सर्वे श्रेयो वः स्याद्यथा सुरा: ॥

१८॥

श्री-भगवान्‌ उबाच-- भगवान्‌ ने कहा; हन्त--उनको सम्बोधित करते हुए; ब्रह्मनू अहो--हे ब्रह्माजी; शम्भो--हे शिवजी; हे --है; देवा:--देवतागण; मम--मेरा; भाषितम्‌--कथन; श्रूणुत--सुनो; अवहिता:--ध्यानपूर्वक; सर्वे--तुम सभी; श्रेय: --कल्याण; वः--तुम सबका; स्यात्‌--हो; यथा--जिस तरह; सुरा:--देवताओं के लिए |

भगवान्‌ ने कहा! हे ब्रह्मा, शिव तथा अन्य देवताओ! तुम सभी ध्यानपूर्वक मेरी बात सुनोक्योंकि मैं जो कुछ कहूँगा उससे तुम सब का कल्याण होगा |

यात दानवदैतेयैस्तावत्सन्धिर्विधीयताम्‌ |

कालेनानुगृहीतैस्तैर्यावद्दो भव आत्मन:ः ॥

१९॥

यात--सम्पन्न करो; दानव--दानवों के साथ; दैतेयैः--तथा असुरों के साथ; तावत्‌ू--तब तक; सन्धि:--सन्धि; विधीयताम्‌ू--सम्पन्न करो; कालेन--अनुकूल समय के द्वारा ( या काव्येन--शुक्राचार्य द्वारा ); अनुगृहीतैः-- आशीष प्राप्त करते हुए; तैः--उन सब से; यावत्‌--जब तक; वः--तुम्हारा; भव: --सौ भाग्य; आत्मन: --तुम सब का |

जब तक तुम उन्नति नहीं कर रहे ही, तुम सब को दानवों तथा असुरों के साथ सन्धि करलेनी चाहिए क्योंकि सम्प्रति समय उनके अनुकूल है |

अरयोपि हि सन्धेया: सति कार्यार्थगौरवे |

अहिमूषिकवद्देवा हार्थस्य पदवीं गतैः ॥

२०॥

अरयः--शत्रुगण; अपि--यद्यपि; हि--निस्सन्देह; सन्धेया: --सन्धि के योग्य; सति--ऐसा होकर; कार्य-अर्थ-गौरवे--महत्त्वपूर्ण कर्तव्य के मामले में; अहि--सर्प; मूषिक--चूहा; वत्‌--सहृश; देवा: --हे देवताओ; हि--निस्सन्देह; अर्थस्य--हितका; पदवीम्‌--पद; गतैः--ऐसा होकर |

हे देवताओ! अपना हित इतना महत्वपूर्ण होता है कि मनुष्य को अपने शत्रुओं से सन्धि भीकरनी पड़ सकती है |

अपने हित ( लाभ ) के लिए मनुष्य को सर्प तथा चूहे के तर्क के अनुसारकार्य करना चाहिए |

अमृतोत्पादने यत्न: क्रियतामविलम्बितम्‌ |

यस्य पीतस्य वै जन्तुर्मृत्युग्रस्तोमरो भवेत्‌ ॥

२१॥

अमृत-उत्पादने--अमृत उत्पन्न करने में; यतत:--यत्ल; क्रियतामू--करो; अविलम्बितम्‌--देर किये बिना, तुरन्त; यस्य--जिसअमृत के; पीतस्थ--पीने वाले का; बै--निस्सन्देह; जन्तु:--जीव; मृत्यु-ग्रस्त:--यद्यपि आसतन्न मृत्यु संकट में; अमर: -- अमर;भवेत्‌--हो सकता है |

तुरन्त ही अमृत उत्पन्न करने का प्रयत्न करो जिसे पीकर मरणासत्न व्यक्ति अमर हो जाये |

क्षिप्त्वा क्षीरोदधौ सर्वा वीरुत्तूणलतौषधी: |

मन्थानं मन्दरं कृत्वा नेत्र कृत्वा तु वासुकिमू ॥

२२॥

सहायेन मया देवा निर्मन्थध्वमतन्द्रिता: |

क्लेशभाजो भविष्यन्ति दैत्या यूयं फलग्रहा: ॥

२३॥

क्षिप्वा--डालकर; क्षीर-उदधौ -- क्षीरसागर में; सर्वा:--सभी प्रकार की; वीरुतू--लताएँ; तृण--घास; लता--वनस्पतियाँ;औषधी:--तथा दवाएँ; मन्थानम्‌--मथानी; मन्दरम्‌ू--मन्दर पर्वत को; कृत्वा--बनाकर; नेत्रमू--मथने की डोरी; कृत्वा--बनाकर; तु--लेकिन; वासुकिम्‌--वासुक्ति सर्प को; सहायेन--सहायक के साथ; मया--मेरे द्वारा; देवा:--सारे देवता;निर्मन्‍्थध्वम्‌-- मथते रहो; अतन्द्रिता:--सावधानी से, एकाग्र मन से; क्लेश-भाज:--कष्टों को बँटाने वाले; भविष्यन्ति--होंगे;दैत्या:--दैत्य; यूयम्‌--तुम सब; फल-ग्रहाः--वास्तविक फल का लाभ उठाने वाले)

हे देवताओ! क्षीरसागर में सभी प्रकार की वनस्पतियाँ, तृण, लताएँ तथा औषधियाँ डालदो |

तब मेरी सहायता से मन्दर पर्वत को मथानी तथा वासुकि को मथने की रस्सी बनाकरअविचल चित्त से क्षीरसागर का मन्थन करो |

इत तरह से दैत्यगण श्रम कार्य में लग जायेंगे,किन्तु तुम देवताओं को वास्तविक फल--समुद्र से उत्पन्न अमृत--प्राप्त होगा |

यूयं तदनुमोदध्व॑ यदिच्छन्त्यसुरा: सुरा: |

न संरम्भेण सिध्यन्ति सर्वार्था: सान्त्ववा यथा ॥

२४॥

यूयम्‌--तुम सभी; तत्‌--वह; अनुमोदध्वम्‌--स्वीकार करो; यत्‌--जो भी; इच्छन्ति--वे चाहते हैं; असुरा:--असुरगण;सुराः--हे देवताओ; न--नहीं; संरम्भेण--क्रुद्ध होने पर; सिध्यन्ति--सफल होते हैं; सर्व-अर्था:--सारी वांछनाएँ; सान्तवया--शान्तिपूर्वक सम्पन्न करने से; यथा--जिस तरह |

हे देवताओ! धैर्य तथा शान्ति से हर कार्य सम्पन्न किया जा सकता है, किन्तु यदि कोई क्रोधसे क्षुब्ध रहे तो लक्ष्य की प्राप्ति नहीं हो पाती |

अतएव असुरगण जो भी माँगें उनके प्रस्ताव को स्वीकार कर लो |

न भेतव्यं कालकूटाद्विषाजलधिसम्भवात्‌ |

लोभः कार्यो न वो जातु रोष: कामस्तु वस्तुषु ॥

२५॥

न--नहीं; भेतव्यम्‌ू--डरना चाहिए; कालकूटात्‌--कालकूट से; विषात्‌--विष से; जलधि--क्षीरसागर से; सम्भवात्‌--प्रकटहुए; लोभ: --लालच; कार्य:--कार्य; न--नहीं; व: --तुमको; जातु--किसी समय; रोष: --क्रो ध; काम:--विषयवासना;तु--तथा; वस्तुषु--वस्तुओं में

क्षीससागर से कालकूट नामक विष उत्पन्न होगा, किन्तु तुम्हें उससे डरना नहीं है और जबसमुद्र के मन्थन से विविध उत्पाद प्राप्त हों तो तुम्हें उनको प्राप्त करने के लिए न तो लालचकरना होगा, न ही उत्सुक होना होगा, और न ही क्रुद्ध होना होगा |

श्रीशुक उबाचइति देवान्समादिश्य भगवान्पुरुषोत्तम: |

तेषामन्तर्दथे राजन्स्वच्छन्दगतिरीश्वर: ॥

२६॥

श्री-शुकः उवाच-- श्री शुकदेव गोस्वामी ने कहा; इति--इस प्रकार; देवान्‌--सारे देवताओं को; समादिश्य--उपदेश देकर;भगवानू-- भगवान्‌; पुरुष-उत्तम: -- पुरुषों में श्रेष्ठ; तेषाम्‌--उन सब से; अन्तर्दधे--अन्तर्धान हो गये; राजन्‌--हे राजा;स्वच्छन्द--मुक्त; गति:--गति वाले; ईश्वर: -- भगवान्‌ |

शुकदेव गोस्वामी ने आगे कहा : हे राजा परीक्षित! देवताओं को इस प्रकार से सलाह देकरसमस्त जीवों में श्रेष्ठ, स्वच्छन्द रहने वाले भगवान्‌ उनके समक्ष से अन्तर्धान हो गये |

अथ तस्मै भगवते नमस्कृत्य पितामहः |

भवश्च जम्मतुः स्वं स्वं धामोपेयुर्बलिं सुरा: ॥

२७॥

अथ--इसके बाद; तस्मै--उस; भगवते-- भगवान्‌ को; नमस्कृत्य-- नमस्कार करके; पिता-महः--ब्रह्मा जी; भव: च--तथाशिवजी; जम्मतु:--लौट गये; स्वम्‌ स्वम्‌-- अपने-अपने; धाम--घरों को; उपेयु;--पास गये; बलिम्‌--राजा बलि के; सुरा:--अन्य सारे देवता

तब भगवान्‌ को सादर नमस्कार करने के बाद ब्रह्म जी तथा शिवजी अपने-अपने धामों कोलौट गये |

फिर सारे देवता महाराज बलि के पास गये |

इृष्ठारीनप्यसंयत्ताज्जातक्षोभान्स्वनायकान्‌ |

न्यषेधदवैत्यराट्श्लोक्य: सन्धिविग्रहकालवित्‌ ॥

२८॥

इृष्ठा--देखकर; अरीन्‌--शत्रुओं को; अपि--यद्यपि; असंयत्तान्‌ू--लड़ने के किसी प्रयास बिना; जात-क्षोभान्‌ू--विश्लुब्ध हुए;स्व-नायकानू-- अपने सेनानायकों को; न्यषेधत्‌--रोका; दैत्य-राट्--दैत्यों के सम्राट, महाराज बलि; एलोक्य:--अत्यन्तसम्मानित तथा प्रमुख; सन्धि--समझौता कराने के लिए; विग्रह--तथा लड़ने के लिए; काल--समय; वित्‌-- पूर्णतयाअवगत |

दैत्यों में सर्वाधिक विख्यात महाराज बलि भलीभाँति जानते थे कि कब सन्धि करनी चाहिएऔर कब युद्ध करना चाहिए |

इस तरह से यद्यपि उनके सेनानायक विश्लुब्ध थे और देवताओं कावध कर देना चाहते थे, किन्तु जब महाराज बलि ने देखा कि सारे देवता उनके पास आक्रमकप्रवृत्ति त्याग कर आ रहे हैं, तो उन्होंने अपने सेनानायकों को मना कर दिया कि वे देवताओं कोमारें नहीं |

ते वैरोचनिमासीन गुप्तं चासुरयूथपैः |

श्रिया परमया जुष्टे जिताशेषमुपागमन्‌ ॥

२९॥

ते--सभी देवता; वैरोचनिम्‌--विरोचन के पुत्र बलिराज को; आसीनमू्‌--बैठा हुआ; गुप्तम्‌--सुरक्षित; च--तथा; असुर-यूथ-पै:--असुरों के सेनानायकों द्वारा; भ्रिया--ऐश्वर्य से; परमया--परम; जुष्टम्‌--वर प्राप्त; जित-अशेषम्‌--समस्त जगतों कास्वामी; उपागमन्‌--के पास पहुँचे |

देवगण विरोचन के पुत्र बलि महाराज के पास गये और उनके निकट बैठ गये |

उस समय बलि महाराज की रक्षा असुरों के सेनानायकों द्वारा की जा रही थी और बे अत्यन्त ऐश्वर्यशालीथे |

उन्होंने सारे ब्रह्माण्डों को जीत लिया था |

महेन्द्र: एलक्ष्णया वाचा सान्त्वयित्वा महामति: |

अभ्यभाषत तत्सर्व शिक्षितं पुरुषोत्तमात्‌ ॥

३०॥

महा-इन्द्र:-स्वर्ग का राजा इन्द्र; शलक्ष्णया--अत्यन्त विनीत; वाचा--वचनों से; सान्त्वयित्वा--बलि महाराज को अत्यधिकप्रसन्न करते हुए; महा-मतिः--अत्यन्त बुद्धिमान्‌ मनुष्य; अभ्यभाषत--सम्बोधित किया; तत्‌ू--वह; सर्वम्‌--सब कुछ;शिक्षितम्‌--जो कुछ सीखा था; पुरुष-उत्तमात्‌-- भगवान्‌ विष्णु से |

अत्यन्त बुद्धिमान्‌ एवं देवताओं के राजा इन्द्र ने बलि महाराज को विनीत शब्दों से प्रसन्न करलेने के बाद उन सारे प्रस्तावों को अत्यन्त विनयपूर्वक प्रस्तुत किया जिन्हें भगवान्‌ विष्णु ने उसेसिखलाया था |

तत्त्वरोचत दैत्यस्य तत्रान्ये येउसुराधिपा: |

शम्बरोरिष्टनेमिश्व ये च त्रिपुरवासिन: ॥

३१॥

तत्‌--वे सारे शब्द; तु--लेकिन; अरोचत--अत्यन्त रुचिकर थे; दैत्यस्थ--बलि महाराज के लिए; तत्र--तथा; अन्ये-- अन्य;ये--जो; असुर-अधिपा: -- असुरों के प्रधान; शम्बर:--शम्बर; अरिष्टनेमि:--अरिष्टनेमि; च-- भी; ये-- अन्य जो; च--तथा;त्रिपुर-वासिन: --त्रिपुर के सारे निवासी |

राजा इन्द्र द्वारा रखे गये प्रस्तावों को बलि महाराज ने, उनके सहायकों ने, जिनमें शम्बर तथाअरिष्टनेमि प्रमुख थे एवं त्रिपुर के अन्य सारे निवासियों ने तुरन्त ही मान लिया |

ईश्वर-भावनाभावित दल सदैव सुखी तथा विजयी होता है |

ततो देवासुरा: कृत्वा संविदं कृतसौहदा: |

उद्यमं परम चक्कुरमृतार्थ परन्तप ॥

३२॥

ततः--तत्पश्चात्‌; देव-असुरा:--देवता तथा असुर दोनों; कृत्वा--सम्पन्न करके; संविदम्‌--संकेत करते हुए; कृत-सौहदा: --उनके बीच सन्धि प्रस्ताव; उद्यमम्‌--उद्यम; परमम्‌--परम; चक्कु:--उन्होंने किया; अमृत-अर्थे--अमृत के हेतु; परन्तप--हेशत्रुओं को दण्ड देने वाले महाराज परीक्षित |

हे शत्रुओं को दण्ड देने वाले महाराज परीक्षित! तब देवताओं तथा असुरों ने परस्पर सन्धिकर ली और उन्होंने इन्द्र द्वारा प्रस्तावित अमृत उत्पन्न करने की योजना को बड़े ही उद्यमपूर्वककार्यान्वित करने की व्यवस्था की |

ततस्ते मन्दरगिरिमोजसोत्पाट्य दुर्मदा: |

नदन्त उदधि निन्यु: शक्ता: परिघबाहवः ॥

३३॥

ततः--तत्पश्चात्‌; ते--सारे देवता तथा असुर; मन्दर-गिरिम्‌--मन्दर पर्वत को; ओजसा--बलपूर्वक; उत्पाट्य--उखाड़कर;दुर्मदा:--अत्यन्त शक्तिशाली तथा दक्ष; नदन्‍त--जोर-जोर से चिल्लाते; उदधिम्‌--समुद्र की तरफ; निन्युः--लाया; शक्ता:--अत्यन्त शक्तिशाली; परिघ-बाहव:--लम्बी-लम्बी बलशाली भुजाओं वाले |

तत्पश्चात्‌ देवताओं तथा अत्यन्त शक्तिशाली एवं लम्बी-लम्बी बलशाली भुजाओं वालेअसुरों ने अत्यन्त बलपूर्वक मन्दर पर्वत को उखाड़ा और जोरों से चिल्लाते हुए वे उसे क्षीरसागरकी ओर ले चले |

दूरभारोद्वहश्रान्ता: शक्रवैरोचनादय: |

अपारयन्तस्तं बोढुं विवशा विजहु: पथ्चि ॥

३४॥

दूर--दूर तक; भार-उद्दद-- भारी बोझा ले जाने से; श्रान्ताः--थके हुए; शक्र--इनन्‍्द्र; वरोचन-आदय: --तथा महाराज बलिइत्यादि; अपारयन्त:--असमर्थ; तम्‌ू--पर्वत को; वोढुम्‌--उठापाने; विवशा:--अशक्त; विजहु:--छोड़ दिया; पथि--रास्ते में |

विशाल पर्वत को दूर तक ले जाने के कारण राजा इन्द्र, महाराज बलि तथा अन्य सारे देवताएवं असुर थक गये |

पर्वत को ले जाने में असमर्थ होने के कारण उन्होंने उसे रास्ते में छोड़ दिया |

निपतन्स गिरिस्तत्र बहूनमरदानवान्‌ |

चूर्णयामास महता भारेण कनकाचलः ॥

३५॥

निपतन्‌--गिरते हुए; सः--उस; गिरि:--पर्वत ने; तत्र--वहाँ; बहूनू-- अनेक; अमर-दानवानू--देवताओं तथा दानवों को;चूर्णयाम्‌ आस--चूर्ण कर डाला; महता-- भारी; भारेण--बोझ से; कनक-अचलः --सोने का पर्वत जिसे मन्दर कहते हैं |

यह पर्वत जो मन्दर के नाम से विख्यात था, अत्यन्त भारी था तथा सोने का बना था, वहींगिर पड़ा और इस ने अनेक देवताओं तथा असुरों को कुचल डाला |

तांस्तथा भग्नमनसो भग्नबाहूरुकन्धरान्‌ |

विज्ञाय भगवांस्तत्र बभूव गरुडध्वज: ॥

३६॥

तानू--सारे देवता तथा असुर; तथा--तत्पश्चात्‌; भग्न-मनस:--हताश होकर; भग्न-बाहु--दूटी बाँहों वाले; ऊरु--जाँचें;कन्धरानू--तथा कंधे; विज्ञाय--जानते हुए; भगवान्‌-- भगवान्‌ विष्णु; तत्र--वहाँ; बभूव--प्रकट हुए; गरुड-ध्वज:--गरुड़पर सवार

देवता तथा असुर हताश तथा विश्लुब्ध थे और उनकी भुजाएँ, जाँघें तथा कंधे टूट गये थे |

अतएव गरुड़ की पीठ पर सवार सर्वज्ञ भगवान्‌ वहाँ पर प्रकट हुए |

गिरिपातविनिष्पिष्टान्विलोक्यामरदानवान्‌ |

ईक्षया जीवयामास निर्जरान्निर्त्रणान्यथा ॥

३७॥

गिरि-पात--मन्दर पर्वत के गिरने; विनिष्पिष्टानू--कुचले हुए; विलोक्य--देखकर; अमर--देवताओं; दानवानू--तथा दानवोंको; ईक्षया--अपनी चितवन मात्र से; जीवयाम्‌ आस--जीवित कर दिया; निर्जरान्‌ू--बिना किसी शोक के; निर्त्रणानू--बिनाघाव के; यथा--मानो |

यह देखकर कि अधिकांश दानव तथा देवता पर्वत के गिरने से कुचले गये हैं, भगवान्‌ नेउन सब पर अपनी दृष्टि दौड़ाई और उन्हें जीवित कर दिया |

इस प्रकार वे शोक से रहित हो गयेऔर उनके शरीरों के घाव भी जाते रहे |

गिरिं चारोप्य गरुडे हस्तेनेकेन लीलया |

आरुह्म प्रययावब्धि सुरासुरगणैर्वृत: ॥

३८॥

गिरिमू--पर्वत को; च-- भी; आरोप्य--रखकर; गरुडे--गरुड़ की पीठ पर; हस्तेन--हाथ से; एकेन--एक; लीलया-- अपनीलीला के रूप में, आसानी से; आरुह्म--चढ़कर; प्रययौ--चले गये; अब्धिम्‌-- क्षीरसागर; सुर-असुर-गणै: --देवताओं तथाअसुरों द्वारा; वृत:--घिरे हुए

फिर भगवान्‌ ने पर्वत को अत्यन्त सरलतापूर्वक एक हाथ से उठाकर गरुड़ की पीठ पर रखदिया |

तब वे स्वयं गरुड़ पर सवार हुए और देवताओं तथा असुरों से घिरे हुए क्षीरसागर चलेगये |

अवरसोष्य गिरिं स्कन्धात्सुपर्ण: पततां वर: |

ययौ जलान्त उत्सृज्य हरिणा स विसर्जित: ॥

३९॥

अवरोप्य--उतार कर; गिरिम्‌--पर्वत को; स्कन्धात्‌--अपने कंधे से; सुपर्ण:--गरुड़; पतताम्‌--सारे पक्षियों में; बर:--सबसेमहान्‌ या शक्तिमान; ययौ--गया; जल-अन्ते--जहाँ जल है; उत्सृज्य--रखकर; हरिणा-- भगवान्‌ द्वारा; सः--वह ( गरुड़ );विसर्जितः --उस स्थान से चला गया |

तत्पश्चात्‌ पक्षीराज गरुड़ ने अपने कन्धे से मन्दर पर्वत को उतारा और वे उसे जल के निकटले गये |

तब भगवान्‌ ने उससे उस स्थान से चले जाने को कहा और वह चला गया |

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