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अध्याय दस: परम भगवान, रामचन्द्र की लीलाएँ

9.10श्रीशुक उवाचखट्वाड्जाद्दीर्घबाहुश्न रघुस्तस्मात्पृथुअवा: ।

अजस्ततो महाराजस्तस्माहशरथोभवत्‌ ॥

१॥

श्री-शुकः उबाच-- श्रीशुकदेव गोस्वामी ने कहा; खट्वाड्रातू--महाराज खट्वांग से; दीर्घबाहु:--दीर्घबाहु नामक पुत्र; च--तथा;रघुः तस्मात्‌--उससे रघु उत्पन्न हुआ; पृथु- श्रवा:--साधु तथा विख्यात; अज:--अज नामक पुत्र; ततः--उससे; महा-राज:--महाराज;तस्मात्‌ू--अज से; दशरथ: --दशरथ नामक; अभवत्‌--उत्पन्न हुआ

शुकदेव गोस्वामी ने कहा : महाराज खट्वांग का पुत्र दीर्घबाहु हुआ और उसके पुत्र विख्यातमहाराज रघु हुए।

महाराज रघु से अज उत्पन्न हुए और अज से महापुरुष महाराज दशरथ हुए।

तस्यापि भगवानेष साक्षाद्रह्ममयो हरिः ।

अंशांशेन चतुर्धागात्पुत्रत्वं प्रार्थित: सुरैः ।

रामलक्ष्मणभरतशत्रुघ्ना इति संज्ञया ॥

२॥

तस्य--महाराज दशरथ के; अपि-- भी; भगवान्‌-- भगवान्‌; एष: --वे सभी; साक्षात्‌- प्रत्यक्ष; ब्रह्मटमय: --परब्रह्म या परम सत्य;हरिः--भगवान्‌; अंश-अंशेन--पूर्ण अंश के अंश से; चतुर्धा--चार प्रकार के विस्तार; अगातू--स्वीकार किया; पुत्रत्वम्‌--पृत्र बनना; प्रार्थित:--प्रार्थना किये जाने पर; सुरैः--देवताओं के द्वारा; राम-- भगवान्‌ रामचन्द्र; लक्ष्मण--लक्ष्मण; भरत-- भरत;शत्रुघ्ना:--तथा शत्रुघ्न; इति--इस प्रकार; संज्ञ़या--विभिन्न नामों से

देवताओं द्वारा प्रार्थना करने पर भगवान्‌ परम सत्य अपने अंश तथा अंशों के भी अंश के साथसाक्षात्‌ प्रकट हुए।

उनके पवित्र नाम थे राम, लक्ष्मण, भरत तथा शत्रुघ्न।

ये विख्यात अवतारमहाराज दशरथ के पुत्रों के रूप में चार स्वरूपों में प्रकट हुए।

तस्यानुचरितं राजन्रृषिभिस्तत्त्वदर्शिभि: ।

श्रुतं हि वर्णितं भूरि त्वया सीतापतेर्मुहु: ॥

३॥

तस्य--भगवान्‌ रामचन्द्र तथा उनके भाइयों का; अनुचरितमू--दिव्य कार्यकलाप; राजन्‌--हे राजा ( महाराज परीक्षित ); ऋषिभि: --ऋषियों द्वारा; तत्त्व-दर्शिभि:--परम सत्य को जानने वाले; श्रुतम्‌--सुना गया; हि--निस्सन्देह; वर्णितम्‌ू--सुन्दर ढंग से वर्णित;भूरि--अनेक; त्वया--तुम्हारे द्वारा; सीता-पतेः--सीता के पति भगवान्‌ रामचन्द्र के; मुहुः--बारम्बार।

हे राजा परीक्षित, भगवान्‌ रामचन्द्र के दिव्य कार्यकलापों का वर्णन उन साधु पुरुषों द्वारा कियागया है जिन्होंने सत्य का दर्शन किया है।

चूँकि आप सीतापति रामचन्द्र के विषय में बारम्बार सुनचुके हैं अतएव मैं इन कार्यकलापों का वर्णन संक्षेप में ही करूँगा।

कृपया सुनें।

गुर्वर्थ त्यक्तराज्यो व्यचरदनुवनं पदापद्भ्यां प्रियाया:पाणिस्पर्शाक्षमा भ्यां मृजितपथरुजो यो हरीन्द्रानुजा भ्याम्‌ ।

वैरूप्याच्छूर्पणख्या: प्रियविरहरुषारोपित भ्रूविजुम्भअस्ताब्धिर्बद्धसेतु: खलद॒वदहन: कोसलेन्द्रोडवतान्न: ॥

४॥

गुरु-अर्थे--अपने पिता के बचनों का पालन करने हेतु; त्यक्त-राज्य:--राजा का पद छोड़कर; व्यचरत्‌--घूमते रहे; अनुवनम्‌--एकजंगल से दूसरे जंगल में; पद्म-पद्भ्यामू--अपने चरणकमलों से; प्रियाया:--अपनी प्रिय पत्नी सीतादेवी के साथ; पाणि-स्पर्श-अक्षमाभ्याम्‌ू--जो इतने कोमल थे कि सीता की हथेलियों के स्पर्श को भी सहन नहीं कर सकते थे; मृजित-पथ-रूज: --मार्ग परचलने से जिनकी थकावट घट जाती थी; यः--जो भगवान्‌; हरीन्द्र-अनुजा भ्यामू--वानर-राज हनुमान तथा अपने छोटे भाई लक्ष्मणको साथ लिए; वैरूप्यातू--कुरूप करने के कारण; शूर्पणख्या:--शूर्पणखा नामक राक्षसी का; प्रिय-विरह--अपनी पत्नी के वियोगसे दुखी होकर; रुषा आरोपित-भ्रू-विजृम्भ--क्रोध में उठी अपनी भूकुटी के हिलने से; त्रस्त--डरा हुआ; अब्धि:--समुद्र; बद्ध-सेतु:--समुद्र के ऊपर पुल बाँधने वाला; खल-दव-दहन: --दावाग्नि की तरह रावण जैसे ईर्ष्वालु पुरुषों का वध करने वाले; कोसल-इन्द्र:--अयोध्या के राजा; अवतात्‌--रक्षा करने के लिए प्रसन्न हों; न:--हमारी |

अपने पिता के बचनों को अक्षत रखने के लिए भगवान्‌ रामचन्द्र ने तुरन्त ही राजपद छोड़ दियाऔर अपनी पतली सीतादेवी के साथ एक जंगल से दूसरे जंगल में अपने उन चरणकमलों से घूमते रहेजो इतने कोमल थे कि वे सीता की हथेलियों का स्पर्श भी सहन नहीं कर सकते थे।

भगवान्‌ केसाथ उनके अनुज लक्ष्मण तथा वानरों के राजा हनुमान ( या एक अन्य वानर सुग्रीव ) भी थे।

ये दोनोंजंगल में घूमते हुए राम-लक्ष्मण की थकान मिटाने में सहायक बने।

शूर्पणखा की नाक तथा कानकाटकर उसे कुरूप बनाकर भगवान्‌ सीतादेवी से बिछुड़ गये।

अतएव वे अपनी भौहें तानकर क्रुद्धहुए और सागर को डराया जिसने भगवान्‌ को अपने ऊपर से होकर पुल बनाने की अनुमति दे दी।

तत्पश्चात्‌ भगवान्‌ रावण को मारने के लिए दावानल की भाँति उसके राज्य में प्रविष्ट हुए।

ऐसेभगवान्‌ रामचन्द्र हम सबों की रक्षा करें।

विश्वामित्राध्वरे येन मारीचाद्या निशाचरा: ।

पश्यतो लक्ष्मणस्यैव हता नैर#तपुड़वा: ॥

५॥

विश्वामित्र-अध्वरे--ऋषि विश्वामित्र की यज्ञशाला में; येन--जिसके ( रामचन्द्रजी ) द्वारा; मारीच-आद्या:--मारीच इत्यादि; निशा-चराः--अज्ञान के अंधकार में रात में घूमने वाले असभ्य व्यक्ति; पश्यत: लक्ष्मणस्य--लक्ष्मण द्वारा देखे जाकर; एब--निस्सन्देह;हता:--मारे गये; नैऋत-पुड्रवा:--राक्षसों के बड़े-बड़े सरदार।

अयोध्यानरेश भगवान्‌ रामचन्द्र ने विश्वामित्र द्वारा सम्पन्न किये गए यज्ञ के क्षेत्र में अनेक राक्षसोंतथा असभ्य पुरुषों का वध किया जो तमोगुण से प्रभावित होकर रात में विचरण करते थे।

ऐसेरामचन्द्र जिन्होंने लक्ष्मण की उपस्थिति में इन असुरों का वध किया हमारी रक्षा करने की कृपा करें।

यो लोकवीरसमितौ धनुरैशमुग्रंसीतास्वयंवरगृहे त्रिशतोपनीतम्‌ ।

आदाय बालगजलील इेश्षुयष्टिंसज्यीकृतं नृप विकृष्य बभञ्जञ मध्ये ॥

६॥

जित्वानुरूपगुणशीलवयोड्ररूपांसीताभिधां थियमुरस्यभिलब्धमानाम्‌ ।

मार्गे ब्रजन्भूगुपतेवर्यनयत्प्ररूढं दर्प महीमकृत यस्त्रिराजबीजाम्‌ ॥

७॥

यः--जो रामचन्द्र; लोक-वीर-समितौ--समाज में या इस संसार के अनेक वीरों के मध्य; धनु:--धनुष; ऐशम्‌--शिवजी का;उमग्रमू--अत्यन्त कठिन; सीता-स्वयंवर-गृहे--उस सभाभवन में जहाँ सीतादेवी अपना पति चुनने के लिए खड़ी थीं; त्रिशत-उपनीतम्‌ू--तीन सौ आदमियों द्वारा उठाकर लाया गया धनुष; आदाय--लेकर; बाल-गज-लीलः--गन्ने के जंगल में हाथी के बच्चेकी भाँति कार्य करते हुए; इब--सदृश; इक्षु-यष्टिमू--गन्ने का खण्ड; सज्यी-कृतम्‌-- धनुष की डोरी चढ़ा दी; नृप--हे राजा;विकृष्य--झुकाकर; बभञ्ज--तोड़ डाला; मध्ये--बीच से; जित्वा--जीतकर; अनुरूप--अपने पद तथा सौन्दर्य के अनुकूल; गुण--गुण; शील--आचरण; वय: --उप्र; अड्र--शरीर; रूपाम्‌--सौन्दर्य; सीता-अभिधाम्‌--सीता नामक; श्रियम्‌--लक्ष्मी को; उरसि--वक्षस्थल पर; अभिलब्धमानाम्‌--सदैव रहती हैं; मार्ग--पथ पर; ब्रजन्‌ू--जाते हुए; भूगुपतेः -- भूगुपति का; व्यनयत्‌--विनष्ट किया;प्ररूढम्‌-- अत्यन्त गहरा; दर्पम्‌--घमंड; महीम्‌--पृथ्वी को; अकृत--विनष्ट; य:ः--जिसने; त्रि:--( सात गुणित ) तीन बार; अराज--राज्यविहीन; बीजाम्‌--बीज |

हे राजनू, भगवान्‌ रामचन्द्र की लीलाएँ हाथी के बच्चे के समान अत्यन्त अद्भुत थीं।

उससभाभवन में जिसमें सीतादेवी को अपने पति का चुनाव करना था, उन्होंने इस संसार के वीरों केबीच भगवान्‌ शिव के धनुष को तोड़ दिया।

यह धनुष इतना भारी था कि इसे तीन सौ व्यक्ति उठाकरलाए थे लेकिन भगवान्‌ रामचन्द्र ने इसे मोड़कर डोरी चढ़ाई और बीच से उसे वैसे ही तोड़ डालाजिस तरह हाथी का बच्चा गन्ने को तोड़ देता है।

इस तरह भगवान्‌ ने सीतादेवी का पाणिग्रहण कियाजो उन्हीं के समान दिव्य रूप, सौन्दर्य, आचरण, आयु तथा स्वभाव से युक्त थीं।

निस्सन्देह, वेभगवान्‌ के वक्षस्थल पर सतत विद्यमान लक्ष्मी थीं।

प्रतियोगियों की सभा में से उसे जीतकर उस केमायके से लौटते हुए भगवान्‌ रामचन्द्र को परशुराम मिले।

यद्यपि परशुराम अत्यन्त घमंडी थे क्योंकिउन्होंने इस पृथ्वी को इक्कीस बार राजाओं से विहीन बनाया था, किन्तु वे क्षत्रियवंशी राजा भगवान्‌राम से पराजित हो गये।

यः सत्यपाशपरिवीतपितुर्निदेशंस्त्रेणस्य चापि शिरसा जगूहे सभार्य: ।

राज्यं श्रियं प्रणयिनः सुहृदो निवासंत्यक्त्वा ययौ वनमसूनिव मुक्तसड्ु: ॥

८॥

यः--जो रामचन्द्र; सत्य-पाश-परिवीत-पितु:--अपने पिता का जो अपनी पत्नी को दिये गये वचन से बँधे थे; निदेशम्‌-- आदेश;स्त्रैणस्य--स्त्री-अनुरक्त; च-- भी; अपि--निस्सन्देह; शिरसा--सिर पर; जगूहे--स्वीकार किया; स-भार्य:--अपनी पत्नी सहित;राज्यमू--राज्य; अयमू--ऐश्वर्य; प्रणयिन:--सम्बन्धीजन; सुहृद:ः --मित्रगण; निवासम्‌ू--निवास; त्यक्त्वा--त्यागकर; ययौ--चलेगये; बनम्‌--वन को; असून्‌-- प्राण; इब--सहश; मुक्त-सड़ः--मुक्त जीव |

अपनी पत्नी के वचनों से बँधे पिता का आदेश पालन करते हुए भगवान्‌ रामचन्द्र ने उसी तरह अपना राज्य, ऐश्वर्य, मित्र, शुभचिन्तक, निवास तथा अन्य सर्वस्व त्याग दिया जिस तरह मुक्तात्माअपना जीवन त्याग देता है।

तब वे सीता सहित जंगल में चले गये।

रक्ष:स्वसुर्व्यकृत रूपमशुद्धबुद्धे -स्तस्या: खरत्रिशिरदूषणमुख्यबन्धून्‌ ।

जघ्ने चतुर्दशसहस्त्रमपारणीय-कोदण्डपाणिरटमान उबास कृच्छुम्‌ ॥

९॥

रक्ष:-स्वसु:--राक्षस ( रावण ) की बहन, शूर्पणखा के ; व्यकृत--( राम द्वारा ) कुरूप किये जाने पर; रूपम्‌--स्वरूप, मुख; अशुद्ध-बुद्धेः--क्योंकि कामवासना के कारण उसकी बुद्धि दूषित हो चुकी थी; तस्या:--उसके; खर-बत्रिशिर-दूषण-मुख्य-बन्धूनू--खर,त्रिशिर, दूषण इत्यादि अनेक दोस्तों को; जघ्ने--( भगवान्‌ राम ने ) मारा; चतुर्दश-सहस्त्रमू--चौदह हजार; अपारणीय--अकल्पनीय;'कोदण्ड-- धुनष-बाण; पाणि:--अपने हाथ में; अटमान:--जंगल में घूमते हुए; उबास--वहाँ निवास किया; कृच्छुमू--बड़ी कठिनाईसे

जंगल में घूमते हुए, वहाँ पर अनेक कठिनाइयों को झेलते तथा अपने हाथ में महान्‌ धनुष-बाणलिए भगवान्‌ रामचन्द्र ने कामवासना से दूषित रावण की बहन के नाक-कान काटकर उसे कुरूपकर दिया।

उन्होंने उसके चौदह हजार मित्रों को भी मार डाला जिनमें खर, त्रिशिर तथा दूषण मुख्यथे।

सीताकथाश्रवणदीपितहच्छयेनसृष्ठटे विलोक्य नृपते दशकन्धरेण ।

जघ्ने द्धुतैणवपुषा श्रमतो पकृष्टोमारीचमाशु विशिखेन यथा कमुग्र: ॥

१०॥

सीता-कथा--सीता के विषय में बातें; श्रवण--सुनकर; दीपित--उत्तेजित; हत्‌ू-शयेन--रावण के मन की कामवासना द्वारा;सृष्टम्‌--उत्पन्न; विलोक्य--देखकर; नृपते--हे राजा परीक्षित; दश-कन्धरेण--दस सिरों वाले रावण द्वारा; जघ्ने-- भगवान्‌ राम नेमारा; अद्भुत-एण-वपुषा--सोने के मृग द्वारा; आश्रमत:--अपने आश्रम से; अपकृष्ट: --दूर भटकाकर; मारीचम्‌--असुर मारीच कोजिसने सोने के मृग का रूप धारण किया था; आशु--तुरन्त; विशिखेन--तीक्ष्ण बाण से; यथा--जिस तरह; कम्‌--दक्ष को; उग्र: --शिवजी ने

हे परीक्षित, जब दस शिरों वाले रावण ने सीता के सुन्दर एवं आकर्षक स्वरूप के विषय में सुनातो उसका मन कामवासनाओं से उत्तेजित हो उठा और वह उनको हरने गया।

रावण ने भगवान्‌रामचन्द्र को उनके आश्रम से दूर ले जाने के लिए सोने के मृग का रूप धारण किये मारीच को भेजाऔर जब भगवान्‌ ने उस अद्भुत मृग को देखा तो उन्होंने अपना आश्रम छोड़कर उसका पीछा करनाशुरू कर दिया।

अन्त में उसे तीक्ष्ण बाण से उसी तरह मार डाला जिस तरह शिवजी ने दक्ष को माराथा।

रक्षोधमेन वृकवद्विपिनेसमक्षंवैदेहराजदुहितर्यपयापितायाम्‌ ।

भ्रात्रा वने कृपणवत्प्रियया वियुक्तःस्त्रीसड्रिनां गतिमिति प्रथयंश्चचार ॥

११॥

रक्ष:-अधमेन--अत्यन्त दुष्ट राक्षस रावण द्वारा; वृक-वत्‌--बाघ के समान; विपिने--जंगल में; असमक्षम्‌-- असुरक्षित; वैदेह-राज-दुहितरि--विदेह राजा की पुत्री सीतादेवी की इस दशा के द्वारा; अपयापितायाम्‌--अपहरण करके; क्रात्रा--अपने भाई के साथ;बने--जंगल में; कृपण-वत्‌--अत्यन्त सताये दीन व्यक्ति की तरह; प्रियया--अपनी प्रियतमा के द्वारा; वियुक्त:--विलग हुआ; स्त्री-सड्डिनाम्‌-स्त्रियों में अनुरक्त पुरुषों का; गतिम्‌--गन्तव्य; इति--इस प्रकार; प्रथयन्‌--उदाहरण प्रस्तुत करते हुए; चचार--घूमनेलगा

जब रामचन्द्रजी जंगल में प्रविष्ट हुए और लक्ष्मण भी वहाँ नहीं थे तो दुष्ट राक्षत रावण ने विदेहराजा की पुत्री सीतादेवी का उसी तरह अपहरण कर लिया जिस तरह गडरिये की अनुपस्थिति में बाघकिसी असुरक्षित भेड़ को पकड़ लेता है।

तब श्रीरामचन्द्रजी अपने भाई लक्ष्मण के साथ जंगल मेंइस तरह घूमने लगे मानो कोई अत्यन्त दीन व्यक्ति अपनी पत्नी के वियोग में घूम रहा हो।

इस तरहउन्होंने अपने व्यक्तिगत उदाहरण से एक स्त्री-अनुरक्त पुरुष जैसी दशा प्रदर्शित की।

दश्ध्वात्मकृत्यहतकृत्यमहन्कबन्धंसख्यं विधाय कपिभिर्दयितागतिं तै: ।

बुद्ध्वाथ वालिनि हते प्लवगेन्द्रसैन्ये -वेलामगात्स मनुजोजभवार्चिताडूप्रि: ॥

१२॥

दग्ध्वा--जलाकर; आत्म-कृत्य-हत-कृत्यम्‌--अपने आत्मीय जटायु का दाहसंस्कार करने के बाद जो भगवान्‌ के निमित्त मरा;अहनू--मारा; कबन्धम्‌--कबन्ध नामक असुर को; सख्यम्‌--दोस्ती, मैत्री; विधाय--करके ; कपिभि:--वानर प्रधानों से; दयिता-गतिम्‌--सीता के उद्धार का प्रबन्ध; तैः--उनके द्वारा; बुद्ध्वा--जान करके; अथ--तत्पश्चात्‌; वालिनि हते--वालि का वध हो जानेपर; प्लवग-इन्द्र-सैन्यै:--वानर सैनिकों की सहायता से; वेलाम्‌--समुद्र तट पर; अगातू--गये; सः--वह, रामचन्द्रजी; मनु-ज:--मनुष्य रूप में; अज--ब्रह्मा द्वारा; भव--तथा शिवजी द्वारा; अर्चित-अड्पघ्रि:--जिनके चरणकमल पूजित हैं।

भगवान्‌ रामचन्द्रजी ने, जिनके चरणकमल ब्रह्माजी तथा शिवजी द्वारा पूजित हैं, मनुष्य का रूपधारण किया था।

अतएव उन्होंने जटायु का दाहसंस्कार किया, जिसे रावण ने मारा था।

तत्पश्चात्‌भगवान्‌ ने कबन्ध नामक असुर को मारा और वानरराजों से मैत्री स्थापित करके बालि का वध कियातथा सीतादेवी के उद्धार की व्यवस्था करके वे समुद्र के तट पर गये।

यद्वोषविभ्रमविवृत्तकटाक्षपात-सम्धभ्रान्तननक्रमकरो भयगीर्णघोषः ।

सिन्धु: शिरस्यईणं परिगृह्य रूपीपादारविन्दमुपगम्य बभाष एततू ॥

१३॥

यत्‌-रोष--जिसका क्रोध; विभ्रम--प्रेरित; विवृत्त--बदल गया; कटाक्ष-पात--दृष्टिपात से; सम्भ्रान्त--विश्लुब्ध; नक्र--घड़ियाल;मकरः--तथा मगर; भय-गीर्ण-घोष: --जिसकी गम्भीर गर्जना भय से दब गयी; सिन्धु;--सागर; शिरसि--सिर पर; अर्हणम्‌--भगवान्‌ की पूजा की सारी सामग्री; परिगृह्य--ले जाकर; रूपी--रूप धारण करके; पाद-अरविन्दम्‌-- भगवान्‌ के चरणकमलों में;उपगम्य--पहुँच कर; बभाष--कहा; एतत्‌--यह ( निम्नलिखित )।

समुद्र तट पर पहुँच कर भगवान्‌ रामचन्द्र ने तीन दिन तक उपवास किया और वे साक्षात्‌ समुद्रके आने की प्रतीक्षा करते रहे।

जब समुद्र नहीं आया तो भगवान्‌ ने अपनी क्रोध लीला प्रकट की और समुद्र पर दृष्टिपात करते ही समुद्र के सारे प्राणी, जिनमें घड़ियाल तथा मगर सम्मिलित थे, भयके मारे उद्विग्न हो उठे ।

तब शरीर धारण करके डरता हुआ समुद्र पूजा की सारी सामग्री लेकर भगवान्‌के पास पहुँचा।

उसने भगवान्‌ के चरणकमलों पर गिरते हुए इस प्रकार कहा।

न त्वां वयं जडधियो नु विदाम भूमन्‌कूटस्थमादिपुरुषं जगतामधीशम्‌ ।

यत्सत्त्वतः सुरगणा रजस: प्रजेशामन्योश्व भूतपतयः स भवान्गुणेश: ॥

१४॥

न--नहीं; त्वाम्‌ू--तुमको, भगवान्‌ को; वयम्‌--हम; जड-धिय:--मन्द बुद्धि वाले; नु--निस्सन्देह; विदाम:--जानते हैं; भूमन्‌--हेश्रेष्ठ; कूट-स्थम्‌--हृदय के भीतर; आदि-पुरुषम्‌--आदि भगवान्‌ को; जगताम्‌--जगतों के; अधीशम्‌--सर्वोच्च स्वामी को; यत्‌--आपके निर्देशानुसार; सत्त्वतः--सत्त्वगुण से; सुर-गणा:--ऐसे देवता; रजस:--रजोगुण से; प्रजा-ईशा: --प्रजापति; मन्यो: --तमोगुण से प्रभावित; च--तथा; भूत-पतय:--भूतों के शासक; सः--ऐसा पुरुष; भवान्‌--आप; गुण-ईशः--तीनों गुणों केस्वामी |

हे सर्वव्यापी परम पुरुष, हम लोग मन्द बुद्धि होने के कारण यह नहीं जान पाये कि आप कौनहैं, किन्तु अब हम जान पाये हैं कि आप सारे ब्रह्माण्ड के स्वामी, अक्षर तथा आदि परम पुरुष हैं।

देवता लोग सतोगुण से, प्रजापति रजोगुण से तथा भूतों के ईश तमोगुण द्वारा अन्धे हो जाते हैं, किन्तुआप इन समस्त गुणों के स्वामी हैं।

काम प्रयाहि जहि विश्रवसोवमेहंतऔ्रैलोक्यरावणमवाप्नुहि वीर पत्नीम्‌ ।

बध्नीहि सेतुमिह ते यशसो वितत्यैगायन्ति दिग्विजयिनो यमुपेत्य भूपा: ॥

१५॥

काममू्‌--इच्छानुसार; प्रयाहि--मेंरे जल के ऊपर से होकर चले जायें; जहि--विजय प्राप्त करें; विश्रवसः --विश्रवा मुनि का;अवमेहम्‌-- मूत्र जैसा प्रदूषण; त्रैलोक्य--तीनों जगतों के लिए; रावणम्‌--रावण जैसा व्यक्ति, जो रोदन का कारण है; अवाप्नुहि--फिर से प्राप्त करें; वीर--हे वीर पुरुष; पत्नीमू--अपनी पत्नी को; बध्नीहि--तैयार करो, बाँधो; सेतुमू-पुल; इह--यहाँ ( इस जलमें ); ते--आपका; यशस:--यश; वितत्यै--विस्तार करने के लिए; गायन्ति--महिमा का गान करेंगे; दिकू-विजयिन: --सारीदिशाओं को जीतने वाले बड़े-बड़े योद्धा; यमू--जिसके ( पुल के ); उपेत्य--निकट आकर; भूपा:--बड़े-बड़े राजा |

हे प्रभु, आप इच्छानुसार मेरे जल का उपयोग कर सकते हैं।

निस्सन्देह, आप इसे पार करके उसरावण की पुरी में जा सकते हैं जो उपद्रवी है और तीनों जगतों को रुलाने वाला है।

वह विश्रवा कापुत्र है, किन्तु मूत्र के समान तिरस्कृत है।

कृपया जाकर उसका वध करें और अपनी पत्नी सीतादेवीको फिर से प्राप्त करें।

हे महान्‌ वीर, यद्यपि मेरे जल के कारण आपको लंका जाने में कोई बाधानहीं होगी लेकिन आप इसके ऊपर पुल बनाकर अपने दिव्य यश का विस्तार करें।

आपके इसअद्भुत असामान्य कार्य को देखकर भविष्य में सारे महान्‌ योद्धा तथा राजा आपकी महिमा का गानकरेंगे।

बद्ध्वोदधौ रघुपतिर्विविधाद्रिकूटै:सेतुं कपीन्द्रकरकम्पितभूरुहा डरैः ।

सुग्रीवनीलहनुमत्प्रमुखैरनीकै -ल॑ड्डां विभीषणद॒शाविशदग्रदग्धाम्‌ ॥

१६॥

बद्ध्वा--बाँधने के बाद; उदधौ--समुद्र के जल में; रघु-पति:ः-- भगवान्‌ रामचन्द्र ने; विविध--अनेक प्रकार की; अद्वि-कूटैः --पर्वतों की चोटियों से; सेतुमू--पुल; कपि-इन्द्र--शक्तिशाली बन्दरों के; कर-कम्पित--हाथों से हिलाये गये; भूरूह-अड्डैः--वृक्षों से;सुग्रीव--सुग्रीव; नील--नील; हनुमत्‌--हनुमान; प्रमुखैः --इत्यादि; अनीकै: --ऐसे सैनिकों सहित; लड्ढाम्‌ू--रावण के राज्य लंकामें; विभीषण-दहृशा--रावण के भाई विभीषण के निर्देश से; आविशत्‌--प्रवेश किया; अग्र-दग्धाम्‌--पहले ही ( वानर सैनिक हनुमानद्वारा ) जलाए गए

शुकदेव गोस्वामी ने कहा : जल में उन पर्वत थ्रृंगों को फेंककर जिनके सारे वृश्च बन्दरों द्वाराहाथ से हिलाये गये थे, समुद्र के ऊपर पुल बना चुकने के बाद भगवान्‌ रामचन्द्र सीतादेवी को रावणके चंगुल से छुड़ाने के लिए लंका गये।

रावण के भाई विभीषण की सहायता से भगवान्‌ सुग्रीव, नील, हनुमान इत्यादि वानर सैनिकों के साथ रावण के राज्य लंका में प्रविष्ट हुए जिसे हनुमान नेपहले ही भस्म कर दिया था।

सा वानरेन्द्रबलरुद्धविहारकोष्ठ-श्रीद्वारगोपुरसदोवलभीविटड्ला ।

निर्भज्यमानधिषणध्वजहेमकुम्भ-श्रुद्राटका गजकुलै्ईदिनीव घूर्णा ॥

१७॥

सा--वह लंका नगरी; वानर-इन्द्र--वानरों के बड़े-बड़े सेनापतियों के; बल--बल से; रुद्ध--घिरी हुई; विहार--क्रीड़ा स्थल;कोष्ठ--कोठार, अन्न के गोदामों; श्री--खजाने; द्वार--महलों के दरवाजे; गोपुर--नगरी के फाटक; सदः--सभाभवन; वबलभी--बड़े-बड़े महलों के अग्रभाग, छज्जे; विटड्टा--कबूतरखाने; निर्भज्यमान--तोड़े जाने वाले; धिषण--चबूतरे; ध्वज--झंडे, पताकाएँ;हेम-कुम्भ--सोने के गुम्बद; श्रुड्ाटका--तथा चौराहे; गज-कुलैः--हाथी के झुंडों से; हंदिनी--नदी; इब--सहश; घूर्णा--श्षुब्ध,मथी हुई।

लंका में प्रवेश करने के बाद सुग्रीव, नील, हनुमान आदि वानर सेनापतियों के नेतृत्व में वानरसैनिकों ने सारे विहारस्थलों, अन्न के गोदामों, खजानों, महलों के द्वारों, नगर के फाटकों,सभाभवनों, महल के छज्जों और यहाँ तक कि कबूतरघरों में अधिकार कर लिया।

जब नगरी के सारे चौराहे, चबूतरे, झंडे तथा गुम्बदों पर रखे सुनहरे गमले ध्वस्त कर दिये गये तो समूची लंका नगरीउस नदी के सहृश प्रतीत हो रही थी जिसे हाथियों के झुंड ने मथ दिया हो।

रक्षःपतिस्तदवलोक्य निकुम्भकुम्भ-धूम्राक्षदुर्मुखसुरान्‍्तकनरान्तकादीन्‌ ।

पुत्र प्रहस्तमतिकायविकम्पनादीन्‌सर्वानुगान्समहिनोदथ कुम्भकर्णम्‌ ॥

१८॥

रक्ष:-पति:--राक्षसों का स्वामी, रावण; तत्‌--ऐसे उपद्रब को; अवलोक्य--देखकर; निकुम्भ--निकुम्भ; कुम्भ--कुम्भ; धूप्राक्ष--धृश्षाक्ष; दुर्मुख--दुर्मुख; सुरान्तक --सुरान्‍्तक; नरान्‍न्तक--नरान्तक; आदीन्‌--इत्यादि को; पुत्रमू--अपने बेटे इन्द्रजित को;प्रहस्तम्‌--प्रहस्त को; अतिकाय--अतिकाय; विकम्पन--विकम्पन; आदीन्‌--आदि को; सर्व-अनुगान्‌--अपने सारे अनुयायियोंको; समहिनोत्‌--आज्ञा दी ( शत्रुओं से लड़ने के लिए ); अथ--अन्ततः; कुम्भकर्णम्‌--अपने सबसे प्रसिद्ध भाई कुम्भकर्ण को ।

जब राक्षसपति रावण ने वानर सैनिकों द्वारा किये जा रहे उपद्रवों को देखा तो उसने निकुम्भ,कुम्भ, धृश्राक्ष, दुर्मुख, सुरान्‍्तक, नरान्तक तथा अन्य राक्षसों एवं अपने पुत्र इन्द्रजित को भीबुलवाया।

तत्पश्चात्‌ उसने प्रहस्त, अतिकाय, विकम्पन को और अन्त में कुम्भकर्ण को बुलवाया।

इसके बाद उसने अपने सारे अनुयायियों को शत्रुओं से लड़ने के लिए प्रोत्साहित किया।

तां यातुधानपृतनामसिशूलचाप-प्रास्ट्टिशक्तिशरतोमरखड्गदुर्गाम्‌ ।

सुग्रीवलक्ष्मणमरुत्सुतगन्धमाद-नीलाडूदर्क्षषनसादिभिरन्वितोगात्‌ ॥

१९॥

तामू--उन सब; यातुधान-पृतनाम्‌--राक्षसों के सैनिकों को; असि--तलवार से; शूल-- भाला से; चाप--बाण से; प्रास-ऋष्टि--प्रासतथा ऋष्टि नामक हथियारों से; शक्ति-शर--शक्तिबाण; तोमर--तोमर नामक हथियार; खड़्ग--तलवार की तरह के हथियार से;दुर्गाम्‌-दुर्जेय; सुग्रीव--सुग्रीव द्वारा; लक्ष्मण--रामचन्द्र के भाई लक्ष्मण द्वारा; मरुत्‌-सुत--हनुमान द्वारा; गन्‍न्धमाद--गन्धमादनामक वानर द्वारा; नील--नील द्वारा; अड्भद--अंगद; ऋक्ष--ऋक्ष; पनस--पनस; आदिभि: --इत्यादि के द्वारा; अन्वित:--घिरकर;अगात्‌--समक्ष ( लड़ने ) आया।

लक्ष्मण तथा सुग्रीव, हनुमान, गन्धमाद, नील, अंगद, जाम्बवन्त तथा पनस नामक वानर सैनिकोंसे घिरे हुए भगवान्‌ रामचन्द्र ने उन राक्षस सैनिकों पर आक्रमण कर दिया जो विविध अजेय हथियारोंसे, यथा तलवारों, भालों, बाणों, प्रासों, ऋष्टियों, शक्तिबाणों, खड़्गों तथा तोमरों से सज्जित थे।

तेडनीकपा रघुपतेरभिपत्य सर्वेइन्द्दं वरूथमिभपत्तिरथाश्रयोथे: ।

जल्नुर्द्रमैगिरिगदेषुभिरड्रदाद्याःसीताभिमर्षहतमड्रलरावणेशान्‌ ॥

२०॥

ते--वे सब; अनीक-पा:--सैनिकों के सेनापति; रघुपते:-- भगवान्‌ रामचन्द्र के; अभिपत्य--शत्रु का पीछा करते; सर्वे--सभी;इन्द्रमू--लड़ते हुए; वरूथम्‌--रावण के सैनिकों को; इभ--हाथी; पत्ति--पैदल सैना; रथ--रथ; अश्व--घोड़े; योधै:--योद्धाओं से;जध्नु:--उन्हें मार डाला; द्वमैः--बड़े-बड़े वृक्षों को फेंककर; गिरि--पर्वत की चोटियों; गदा--गदा; इषुभि:--बाणों से; अड्भद-आद्या:--अंगद इत्यादि भगवान्‌ रामचन्द्र के सारे सैनिक; सीता--सीता देवी का; अभिमर्ष--क्रोध से; हत-- ध्वस्त; मडल--जिसकाकल्याण; रावण-ईशान्‌--रावण के अनुयायियों को |

अंगद तथा रामचन्द्र के अन्य सेनापतियों ने शत्रुओं के हाथियों, पैदल सैनिकों, घोड़ों तथा रथोंका सामना किया और उन पर बड़े-बड़े वृक्ष, पर्वत-श्रृंग, गदा तथा बाण फेंके।

इस तरह श्रीरामचन्द्रजी के सैनिकों ने रावण के सैनिकों को जिनका सौभाग्य पहले ही लुट चुका था, मार डालाक्योंकि सीतादेवी के क्रोध से रावण पहले ही ध्वस्त हो चुका था।

रक्ष:पतिः स्वबलनष्टिमवेक्ष्य रुष्टआरुह्य यानकमथाभिससार रामम्‌ ।

स्वःस्यन्दने द्युमति मातलिनोपनीतेविश्राजमानमहनन्निशितै:ः श्षुरप्रै: ॥

२१॥

रक्ष:-पति:--राक्षसों का नायक, रावण; स्व-बल-नष्टिमू--अपने सैनिकों का विनाश; अवेक्ष्य--देखकर; रुष्ट: --क्रुद्ध हुआ;आरुह्म--सवार होकर; यानकम्‌--अपने सुन्दर विमान में, जो पुष्पों से अलंकृत था; अथ--तत्पश्चात्‌; अभिससार--आगे बढ़ा;राममू--राम की ओर; स्वः-स्यन्दने--इन्द्र के दिव्य रथ में; द्युमति--चमकता हुआ; मातलिना--इन्द्र के सारथी मातलि द्वारा;उपनीते--लाया जाकर; विश्राजमानम्‌--रामचन्द्र, मानों तेज से दीप्त हों; अहनत्‌ू--रावण ने प्रहार किया; निशितैः--अत्यन्त तीक्षण;क्षुरप्रै:--तीरों से

तत्पश्चात्‌ जब राक्षसराज रावण ने देखा कि उसके सारे सैनिक मारे जा चुके हैं तो वह अत्यन्तक्रुद्ध हुआ।

अतएवं वह अपने विमान में सवार हुआ जो फूलों से सजाया हुआ था और रामचन्द्रजीकी ओर बढ़ा जो इन्द्र के सारथी मातलि द्वारा लाये गये तेजस्वी रथ पर आसीन थे।

तब रावण नेभगवान्‌ रामचन्द्र पर तीक्ष्ण बाणों की वर्षा की।

रामस्तमाह पुरुषादपुरीष यन्नःकान्तासमक्षमसतापहता श्ववत्ते ।

त्यक्तत्रपस्थ फलमद्य जुगुप्सितस्ययच्छामि काल इव कर्तुरलड्ख्यवीर्य: ॥

२२॥

राम:-- भगवान्‌ रामचन्द्र ने; तम्‌ू--उससे ( रावण से ); आह--कहा; पुरुष-अद-पुरीष--तुम मनुष्यों के भक्षकों ( राक्षसों ) के मलहो; यत्‌-- क्योंकि; न:--मेरी; कान्ता--पली; असमक्षम्‌--मेरी अनुपस्थिति के कारण असहाय; असता--महान्‌ पापी तुम्हारे द्वारा;अपहता--अपहरण की गई; श्र-वत्‌--कुत्ते के समान, जो मालिक की अनुपस्थिति में रसोई से भोजन लेकर भाग जाता है; ते--तुम्हारा; त्यक्त-त्रपस्य--निर्लज्ज; फलम्‌ अद्य--आज तुमको मजा चखा दूँगा; जुगुप्सितस्थ--अत्यन्त नीच का; यच्छामि--तुम्हें दण्डदूँगा; काल: इब--मृत्यु के समान; कर्तु:--सारे पापों के कर्ता तुमको; अलड्घ्य-वीर्य:--किन्तु मैं सर्वशक्तिमान होने के कारण कभीअपने प्रयास में विफल नहीं होता ।

भगवान्‌ रामचन्द्र ने रावण से कहा : तुम मानवभक्षियों में अत्यन्त गहित हो।

निस्सन्देह, तुमउनकी विष्ठा तुल्य हो।

तुम कुत्ते के समान हो क्योंकि वह घर के मालिक के न होने पर रसोई से खानेकी वस्तु चुरा लेता है।

तुमने मेरी अनुपस्थिति में मेरी पत्ती सीतादेवी का अपहरण किया है।

इसलिएजिस तरह यमराज पापी व्यक्तियों को दण्ड देता है उसी तरह मैं भी तुम्हें दण्ड दूँगा।

तुम अत्यन्त नीच,पापी तथा निर्लज्ज हो।

अतएवं आज मैं तुम्हें दण्ड दूँगा क्योंकि मेरा वार कभी खाली नहीं जाता।

एवं क्षिपन्धनुषि सन्धितमुत्ससर्जबाणं स वज्ञमिव तद्धृदयं बिभेद ।

सोउसृग्वमन्दशमुखैर्न्यपतद्विमाना-द््वाहेति जल्पति जने सुकृतीव रिक्त: ॥

२३॥

एवम्‌--इस तरह; क्षिपनू--डाँटते हुए, धिक्कारते हुए; धनुषि-- धनुष पर; सन्धितम्‌ू--तीर चढ़ाकर; उत्ससर्ज--उसकी ओर छोड़ा;बाणम्‌--बाण; सः--वह तीर; वज़म्‌ इब--वज् की भाँति; तत्‌ू-हृदयम्‌--रावण के हृदय को; बिभेद--बेध डाला; सः--वह,रावण; असृक्‌--रक्त; वमन्‌--कै करता; दश-मुखैः--दसों मुँहों से; न्‍्यपतत्‌--गिर पड़ा; विमानात्‌ू--अपने विमान से; हाहा--हाय-हाय, क्या हुआ; इति--इस प्रकार; जल्पति--दहाड़ते हुए; जने--सारे लोगों के सामने; सुकृती इब--पुण्यात्मा की तरह; रिक्त:--पुण्यों के चुक जाने पर।

इस प्रकार रावण को धिक्कारने के बाद भगवान्‌ रामचन्द्र ने अपने धनुष पर बाण रखा और रावणको निशाना बनाकर बाण छोड़ा जो रावण के हृदय में वज्ञ के समान बेध गया।

इसे देखकर रावणके अनुयायियों ने चिल्लाते हुए तुमुल ध्वनि की 'हाय! हाय!'क्या हो गया?

' क्योंकि रावणअपने दसों मुखों से रक्त वमन करता हुआ अपने विमान से उसी तरह नीचे गिर पड़ा जिस प्रकार कोईपुण्यात्मा अपने पुण्यों के चुक जाने पर स्वर्ग से पृथ्वी पर आ गिरता है।

ततो निष्क्रम्य लड्ढाया यातुधान्य: सहस्त्रशः ।

मन्दोदर्या सम॑ तत्र प्ररूदन्त्य उपाद्रवन्‌ ॥

२४॥

ततः--तत्पश्चात्‌; निष्क्रम्य--बाहर निकल कर; लड्ढाया:--लंका से; यातुधान्य:--राक्षसों की पत्नियाँ; सहस््रश:--हजारों की संख्यामें; मन्दोदर्या--रावण की पत्नी मन्दोदरी इत्यादि के; समम्‌--साथ; तत्र--वहाँ; प्ररुदन्त्यः--विलाप करती; उपाद्रवनू--( अपने मृतपतियों के ) पास आईं।

तत्पश्चात्‌ वे सारी स्त्रियाँ जिनके पति युद्ध में मारे जा चुके थे, रावण की पत्नी मन्दोदरी के साथलंका से बाहर आईं।

वे निरन्तर विलाप करती हुई रावण तथा अन्य राक्षसों के शवों के निकटपहुँचीं।

स्वान्स्वान्बन्धून्परिष्वज्य लक्ष्मणेषुभिरदितान्‌ ।

रुरुदु: सुस्वरं दीना घ्नन्त्य आत्मानमात्मना ॥

२५॥

स्वान्‌ स्वानू--अपने-अपने पतियों के; बन्धून्‌ू--मित्रों को; परिष्वज्य--आलिंगन करती हुई; लक्ष्मण-इषुभि:--लक्ष्मण के बाणों से;अर्दितानू--मारे गये; रुरुदु:--वे सभी पत्नियाँ करूण विलाप करने लगीं; सु-स्वरम्‌--मीठे स्वर में; दीना:--अत्यन्त दयनीय;घ्नन्त्य:--पीटती हुई; आत्मानम्‌--अपनी छाती; आत्मना--अपने आप से |

लक्ष्मण के बाणों द्वारा मारे गये अपने-अपने पतियों के शोक में अपनी छाती पीटती हुई स्त्रियोंने अपने-अपने पतियों का आलिंगन किया और फिर वे कारुणिक स्वर में रोदन करने लगीं जो हरएक को द्रवित करने वाला था।

हा हताः सम वयं नाथ लोकरावण रावण ।

क॑ यायाच्छरणं लड्ढा त्वद्धिहीना परादिता ॥

२६॥

हा--हाय; हताः स्म--मारी गईं; वयम्‌ू--हम सभी; नाथ--हे रक्षक; लोक-रावण--हे पति, जिसने इतने लोगों को रुलाया;रावण--हे रावण, जो अन्यों को रुला सकता है; कम्‌--किसकी; यायात्‌--जायेगा; शरणम्‌--शरण में; लड्जा--लंका का राज्य;त्वत्‌ू-विहीना--तुम्हारे न होने पर; पर-अर्दिता--शत्रुओं द्वारा पराजित |

हे नाथ! हे स्वामी! तुम अन्यों की मुसीबत की प्रतिमूर्ति थे; अतएव तुम रावण कहलाते थे।

किन्तुअब जब तुम पराजित हो चुके हो, हम भी पराजित हैं क्योंकि तुम्हारे बिना इस लंका के राज्य कोशत्रु ने जीत लिया है।

बताओ न अब लड्ढा किसकी शरण में जायेगी ?

नवै वेद महाभाग भवान्कामवशं गत: ।

तेजोनुभावं सीताया येन नीतो दशामिमाम्‌ ॥

२७॥

न--नहीं; वै--निस्सन्देह; वेद--जान पाया; महा-भाग--हे भाग्यशाली; भवान्‌ू--आप; काम-वशम्‌--काम के वशीभूत; गतः--होकर; तेज:--प्रभाव से; अनुभावम्‌--ऐसे प्रभाव के फलस्वरूप; सीताया:--सीतादेवी के; येन--जिसके द्वारा; नीत:--ले जायागया; दशाम्‌--स्थिति को; इमामू--इस प्रकार की ( विनाश की )।

है परम सौभाग्यवान, तुम कामवासना के वशीभूत हो गये थे; अतएवं तुम सीतादेवी के प्रभाव ( तेज ) को नहीं समझ सके।

तुम भगवान्‌ रामचन्द्र द्वारा मारे जाकर सीताजी के शाप से इस दशा कोप्राप्त हुए हो।

कृतैषा विधवा लड्ढा बयं च कुलनन्दन ।

देहः कृतोउचन्न॑ गृश्नाणामात्मा नरकहेतवे ॥

२८ ॥

कृता--तुम्हारे द्वारा की गई; एघा--इस समस्त; विधवा--संरक्षकविहीन; लड्जा--लंका-राज्य; वयम्‌ च--हमें भी; कुल-नन्दन--हेराक्षसों के आनन्द; देह:--शरीर; कृत:--तुम्हारे द्वारा बनाई गई; अन्नम्‌--खाद्य पदार्थ; गृध्नाणामू--गीधों का; आत्मा--तथा तुम्हारीआत्मा; नरक-हेतवे--नरक जाने के लिए

हे राक्षसकुल के हर्ष, तुम्हारे ही कारण अब लंका-राज्य तथा हम सबों का भी कोई संरक्षक नहींरहा।

तुमने अपने कृत्यों के ही कारण अपने शरीर को गीधों का आहार और अपनी आत्मा को नरक जाने का पात्र बना दिया है।

श्रीशुक उवाचस्वानां विभीषणश्चक्रे कोसलेन्द्रानुमोदितः ।

पितृमेधविधानेन यदुक्तं साम्परायिकम्‌ ॥

२९॥

श्री-शुकः उवाच-- श्री शुकदेव गोस्वामी ने कहा; स्वानाम्‌--स्वजनों का; विभीषण: --रावण के भाई तथा रामचन्द्र-भक्त विभीषणने; चक्रे--सम्पन्न किया; कोसल-इन्द्र-अनुमोदित: -- कोसल के राजा भगवान्‌ रामचबन्द्र द्वारा अनुमोदित; पितृ-मेध-विधानेन--पिताया किसी परिजन की मृत्यु के बाद पुत्र द्वारा सम्पन्न होने वाले अन्त्येष्टि कर्म द्वारा; यत्‌ उक्तम्‌--निर्धारित; साम्परायिकम्‌--नरक जानेसे बचाने के लिए व्यक्ति मृत्यु के बाद किए जाने वाले कर्म।

श्री शुकदेव गोस्वामी ने कहा : रावण के पवित्र भाई तथा रामचन्द्र के भक्त विभीषण कोकोसल के राजा भगवान्‌ रामचन्द्र से अनुमति प्राप्त हो गई तो उसने अपने परिवार के सदस्यों कोनरक जाने से बचाने के लिए आवश्यक अन्त्येष्टि कर्म सम्पन्न किये।

ततो दरदर्श भगवानशोकवनिकाश्रमे ।

क्षामां स्वविरहव्याधि शिंशपामूलमाश्रिताम्‌ू ॥

३०॥

ततः--तत्पश्चात्‌; ददर्श--देखा; भगवान्‌-- भगवान्‌ ने; अशोक-वनिक-आश्रमे--अशोक वृक्षों के बन में एक छोटी सी झोपड़ी में;क्षामाम्‌--अत्यन्त दुबली-पतली; स्व-विरह-व्याधिमू-- अपने ( भगवान्‌ रामचन्द्र के ) वियोग रोग से पीड़ित; शिंशपा--शिंशपा( शीशम ) वृक्ष की; मूलमू--जड़ का; आश्रिताम्‌--सहारा लिए

तत्पश्चात्‌ भगवान्‌ रामचन्द्र ने सीतादेवी को अशोकवन में शिंशपा नामक वृक्ष के नीचे एक छोटीसी कुटिया में बैठी पाया।

वे राम के वियोग के कारण दुखी होने से अत्यन्त दुबली-पतली हो गईथीं।

रामः प्रियतमां भार्या दीनां वीक्ष्यान्वकम्पत ।

आत्मसन्दर्शनाह्नादविकसन्मुखपड्डूजाम्‌ ॥

३१॥

राम:--रामचन्द्र; प्रिय-तमाम्‌ू--अपनी अत्यन्त प्रिय; भार्यामू--पत्नी को; दीनामू--दीन अवस्था में; वीक्ष्य--देखकर; अन्वकम्पत--अत्यन्त दयालु हो उठे; आत्म-सन्दर्शन--अपने प्रिय को देखने पर; आहाद--आनन्दमय जीवन का भाव; विकसत्‌--प्रकट करते हुए;मुख--मुँह; पड्डजामू--कमल सहश |

अपनी पतली को उस दशा में देखकर भगवान्‌ रामचन्द्र अत्यधिक दयाद््र हो उठे ।

जब वे पत्नी केसमक्ष आये तो वे भी अपने प्रियतम को देखकर अत्यन्त प्रसन्न हुई और उनके कमल सहृश मुख सेआह्ाद झलकने लगा।

आरोप्यारुरुहे यान॑ भ्रातृभ्यां हनुमद्युत: ।

विभीषणाय भगवान्दत्त्वा रक्षोगणेशताम्‌ ।

लड्ढ्रामायुश्च कल्पान्तं ययौ चीर्णब्रतः पुरीम्‌ ॥

३२॥

आरोप्य--चढ़ाकर; आरुरुहे-- स्वयं चढ़ गये; यानम्‌ू--विमान में; भ्रातृ भ्यामू-- अपने भाई लक्ष्मण तथा सेनापति सुग्रीव समेत;हनुमत्‌-युतः--हनुमान समेत; विभीषणाय--रावण के भाई विभीषण को; भगवानू-- भगवान्‌ ने; दत्त्वा--सौंप दिया; रक्ष:-गण-ईशतामू--लंका के राक्षसों पर शासन करने का अधिकार; लड्ढाम्‌--लंका-राज्य; आयु: च--तथा जीवन ( आयु ); कल्प-अन्तम्‌ू--एक कल्प के अन्त तक, अनेकानेक वर्षों के लिए; ययौ--घर चले गये; चीर्ण-ब्रत:--वनवास की अवधि पूरी करके; पुरीम्‌--अयोध्या पुरी को

भगवान्‌ रामचन्द्र ने विभीषण को लंका के राक्षसों पर एक कल्प तक राज्य करने का अधिकारसौंपकर सीतादेवी को पुष्प से सज्जित विमान ( पुष्पक विमान ) में बैठाया और फिर वे स्वयं उसमेंबैठ गये।

अपने वनवास की अवधि समाप्त होने पर, हनुमान, सुग्रीव तथा अपने भाई लक्ष्मणसमेत,भगवान्‌ अयोध्या लौट आये।

अवकीर्यमाण: सुकुसुमैलॉकपालार्पितैः पथि ।

उपगीयमानचरितः शतधुृत्यादिभिर्मुदा ॥

३३॥

अवकीर्यमाण:--बिखेरे गये; सु-कुसुमैः--सुगंधित सुन्दर फूलों से; लोक-पाल-अर्पिति:--राजाओं द्वारा भेंट किये गये; पथ्चि--मार्गपर; उपगीयमान-चरित:ः--अपने असामान्य कार्यो के लिए अभिवन्दित; शतधृति-आदिभि:--ब्रह्मा तथा अन्य देवताओं के द्वारा;मुदा--अत्यन्त प्रसन्नतापूर्वक |

जब भगवान्‌ रामचन्द्र अपनी राजधानी अयोध्या लौटे तो मार्ग पर लोकपालों ने उनके स्वागतार्थउनके शरीर पर सुन्दर सुगन्धित फूलों की वर्षा की और ब्रह्मा तथा अन्य देवताओं जैसे महापुरुषों नेपरम प्रसन्न होकर भगवान्‌ के कार्यों का गुणगान किया।

गोमूत्रयावकं श्रुत्वा भ्रातरं वल्‍्कलाम्बरम्‌ ।

महाकारुणिकोतप्यज्जटिलं स्थण्डिलेशयम्‌ ॥

३४॥

गो-मूत्र-यावकम्‌--गाय के मूत्र में पकाये जौ को खाकर; श्रुत्वा--सुनकर; भ्रातरम्‌--अपने भाई भरत को; वल्कल-अम्बरम्‌-पेड़ोंकी छाल से आच्छादित; महा-कारुणिक: --अत्यन्त दयालु रामचन्द्रजी ने; अतप्यत्‌--अत्यधिक शोक व्यक्त किया; जटिलमू--सिरपर जटा बढ़ाये; स्थण्डिले-शयम्‌--कुशासन पर लेटते हुए

अयोध्या पहुँचकर भगवान्‌ रामचन्द्र ने सुना कि उनकी अनुपस्थिति में उनका भाई भरत गोमूत्र मेंपकाये जौ को खाता था, अपने शरीर को वृक्षों की छाल से ढकता था, सिर पर जटा बढ़ाये, कुशोंकी चटाई पर सोता था।

अत्यन्त कृपालु भगवान्‌ ने इस पर अत्यधिक सनन्‍्ताप व्यक्त किया।

भरतः प्राप्तमाकर्ण्य पौरामात्यपुरोहितैः ।

पादुके शिरसि न्यस्य राम॑ प्रत्युद्यतो ग्रजम्‌ ।

नन्दिग्रामात्स्वशिबिरादगीतवादित्रनिःस्वनै: ॥

३५॥

ब्रह्मघोषेण च मुहुः पठद्धिब्रह्मवादिभि: ।

स्वर्णकक्षपताकाभिहैमैश्रित्रध्वजै रथे: ॥

३६॥

सदश्वे रुक्मसन्नाहैर्भटै: पुरटवर्मभि: ।

श्रेणीभिर्वारमुख्याभिर्भृत्यै श्रेव पदानुगै: ॥

३७॥

पारमेष्ठब्ान्युपादाय पण्यान्युच्यावचानि च ।

पादयोर्न्यपतत्प्रेम्णा प्रक्लिन्नहदयेक्षण: ॥

३८ ॥

भरतः--भरत ने; प्राप्तम्‌ू--घर वापसी; आकर्ण्य--सुनकर; पौर--सारे नागरिक; अमात्य--सररे मंत्री; पुरोहितैः--सारे पुरोहितों केसाथ; पादुके--दो खड़ाऊँ; शिरसि--सिर पर; न्यस्य--रखकर; रामम्‌--रामचन्द्र को; प्रत्युद्यत:--अगवानी के लिए; अग्रजम्‌ू--अपने बड़े भाई; नन्दिग्रामात्‌--नन्दिग्राम से; स्व-शिबिरात्‌-- अपने खेमे से; गीत-वादित्र--गायन-बाजन; निःस्वनैः --ऐसी ध्वनियों सेयुक्त; ब्रह्म-घोषेण--वैदिक मंत्रों के उच्चारण की ध्वनि से; च--तथा; मुहुः--सदैव; पठद्द्धि:--वेदों से पाठ करते हुए; ब्रह्म-वादिभिः- श्रेष्ठ ब्राह्मणों द्वारा; स्वर्ण-कक्ष-पताकाभि:--सुनहरे किनारे वाली झंडियों से अलंकृत; हैमैः--सुनहरे; चित्र-ध्वजै: --चित्रित पताकाओं से; रथैः --रथों से; सत्‌-अश्वै:ः--सुन्दर घोड़ों से; रुक्‍्म--सुनहरे; सन्नाहैः--जिरहबख्तर या कवच से; भटै:--सैनिकों से; पुरट-वर्मभि: --सुनहरे कवच से ढका; श्रेणीभि: --जुलूस से; वार-मुख्याभि:--सुन्दर-सुसज्जित वेश्याओं के साथ;भृत्यैः--नौकरों के साथ; च-- भी; एव--निस्सन्देह; पद-अनुगैः--पैदल सेना से; पारमेष्ठयानि--शाही स्वागत के उपयुक्त अन्य साज-सामान; उपादाय--लेकर; पण्यानि--बहुमूल्य रल; उच्च-अवचानि--विभिन्न मूल्यों वाले; च-- भी; पादयो: -- भगवान्‌ केचरणकमलों पर; न्यपतत्‌--गिर पड़े; प्रेम्णा--प्रेम से; प्रक्लिन्न--आर्द्र; हृदय--हृदय; ईक्षण:--आँखें |

जब भरतजी को पता चला कि भगवान्‌ रामचन्द्र अपनी राजधानी अयोध्या लौट रहे हैं तो तुरन्तही वे भगवान्‌ की खड़ाऊँ अपने सिर पर रखे और नन्दिग्राम स्थित अपने खेमे से बाहर आ गये।

भरतजी के साथ मंत्री, पुरोहित, अन्य भद्र नागरिक, मधुर गायन करते पेशेवर गबैये तथा वैदिक मंत्रोंका उच्चस्वर से पाठ करने वाले विद्वान ब्राह्मण थे।

उनके पीछे जुलूस में रथ थे जिनमें सुन्दर घोड़ेजुते थे जिनकी लगामें सुनहरी रस्सियों की थीं।

ये रथ सुनहरी किनारी वाली पताकाओं तथा अन्यविविध आकार-प्रकार की पताकाओं से सजाये गये थे।

सैनिक सुनहरे कबचों से लैस थे, नौकरपान-सुपारी लिए थे और साथ में अनेक विख्यात सुन्दर वेश्याएँ थीं।

अनेक नौकर पैदल चल रह थेऔर वे छाता, चामर, बहुमूल्य रत्न तथा उपयुक्त विविध राजसी सामान लिए हुए थे।

इस तरहप्रेमानन्द से आर्द्र हृदय एवं अश्रुओं से पूरित नेत्रोंवाले भरतजी भगवान्‌ रामचन्द्र के निकट पहुँचे औरअत्यन्त भावविभोर होकर उनके चरणकमलों पर गिर गये।

पादुके न्यस्य पुरतः प्राज्ललिबंष्पलोचन: ।

तमाश्लिष्य चिरं दोर्भ्या स्नापयन्नेत्रजैर्जलै: ॥

३९॥

रामो लक्ष्मणसीताभ्यां विप्रेभ्यो येहसत्तमा: ।

तेभ्य: स्वयं नमश्नक्रे प्रजाभिश्चव नमस्कृतः ॥

४०॥

पादुके--दोनों खड़ाओं को; न्यस्य--रखकर; पुरत:--भगवान्‌ रामचन्द्र के सामने; प्राज्ललि:--हाथ जोड़े; बाष्प-लोचन: --अश्रुपूरितआँखों से; तम्‌-- भरत को; आश्लिष्य--आलिंगन करके ; चिरम्‌--देर तक; दोर्भ्याम्‌ू--अपनी दोनों भुजाओं से; स्नापयन्‌ू--नहलातेहुए; नेत्र-जैः--नेत्रों से निकलते हुए; जलैः --जल से; राम:--रामचन्द्र; लक्ष्मण-सीताभ्याम्‌--लक्ष्मण तथा सीता समेत; विप्रेभ्य:--विद्वान ब्राह्मणों को; ये--तथा अन्य जो; अ्ई-सत्तमा: --पूजनीय; तेभ्य:--उनको; स्वयम्‌-- स्वयं; नम:-चक्रे --नमस्कार किया;प्रजाभि: --नागरिकों द्वारा; च--तथा; नमः-कृत:ः--नमस्कार किया गया।

भगवान्‌ रामचन्द्र के समक्ष खड़ाओं को रखकर भरतजी आँखों में आँसू भरकर और दोनों हाथजोड़कर खड़े रहे।

भगवान्‌ रामचन्द्र अपनी दोनों भुजाओं में भरत को भरकर दीर्घकाल तकआलिंगन करते रहे और उन्होंने उन्हें अपने आँसुओं से नहला दिया।

तत्पश्चात्‌ सीतादेवी तथा लक्ष्मणके साथ रामचन्द्र ने विद्वान ब्राह्मणों तथा परिवार के गुरुजनों को नमस्कार किया।

समस्तअयोध्यावासियों ने भगवान्‌ को सादर नमस्कार किया।

धुन्वन्त उत्तरासझन्पतिं वीक्ष्य चिरागतम्‌ ।

उत्तरा: कोसला माल्यै: किरन्तो ननृतुर्मुदा ॥

४१॥

धुन्बन्त:--हिलाते हुए; उत्तर-आसझ़न्‌-- अपने उत्तरीय वस्त्रों को; पतिमू-- भगवान्‌ को; वीक्ष्य--देखकर; चिर-आगतम्‌--वनवाससे अनेक वर्षो बाद लौटे; उत्तराः कोसला:--अयोध्या के नागरिक; माल्यै: किरन्त:ः--मालाएँ अर्पित करते हुए; ननृतुः--नाचने लगे;मुदा--प्रसन्नता के मारे |

अयोध्या के नागरिकों ने अपने राजा को दीर्घकाल के बाद लौटे देखकर उन्हें फूल की मालाएँअर्पित कीं, अपने उत्तरीय वस्त्र ( दुपट्टे ) हिलाए और वे परम प्रसन्न होकर खूब नाचे।

पादुके भरतोगृह्नाच्यामरव्यजनोत्तमे ।

विभीषण: ससुग्रीव: श्वेतच्छत्रं मरुत्सुत: ॥

४२॥

धनुर्निषज्ञज्छत्रुघ्न: सीता तीर्थकमण्डलुम्‌ ।

अबिभ्रदड़दः खड्गं हैम॑ चर्मर्क्षराण्नूप ॥

४३॥

पादुके--दोनों खड़ाऊँ; भरतः--भरत; अगृह्नात्‌ू--लिये थे; चामर--चँवर; व्यजन--पंखा; उत्तमे--अत्यन्त ऐश्वर्यशाली;विभीषण: --रावण का भाई; स-सुग्रीव:--सुग्रीव के साथ; श्रेत-छत्रमू--सफेद छाता; मरुत्‌-सुतः--वायुपुत्र हनुमान; धनु:--धनुष;निषड्ञन्‌ू--दो तरकसों सहित; शत्रुघ्न:--रामचन्द्र के भाई; सीता--सीतादेवी; तीर्थ-कमण्डलुम्‌--तीर्थस्थानों के जल से भरा पात्र;अबिश्रतू--लिये हुए; अड्डदः--अंगद नामक वानर सेनापति; खड्गम्‌--तलवार; हैमम्‌--स्वर्णिम; चर्म--ढाल; ऋक्ष-राट्‌--ऋशक्षराजजाम्बवान्‌; नृप--हे राजा |

है राजा, भरतजी भगवान्‌ राम की खड़ाऊँ लिये थे, सुग्रीव तथा विभीषण चँवर तथा सुन्दर पंखाश़लिये थे, हनुमान सफेद छाता लिये हुए थे, शत्रुघ्न धनुष तथा दो तरकस लिए थे तथा सीतादेवीतीर्थस्थानों के जल से भरा पात्र लिए थीं।

अंगद तलवार लिए थे और ऋशक्षराज जाम्बवान सुनहरीढाल लिए थे।

पुष्पकस्थो नुतः स्त्रीभि: स्तूयमानश्व वन्दिभि: ।

विरेजे भगवात्राजन्ग्रहै श्रन्द्र इबोदित: ॥

४४॥

पुष्पक-स्थ: --पुष्पक विमान में आसीन; नुत:--पूजित; स्त्रीभि:--स्त्रियों द्वारा; स्तूयमान: --स्तुति किये गये; च--तथा; वन्दिभि:--बन्दीजनों के द्वारा; विरिजे--शोभायमान हुए; भगवान्‌-- भगवान्‌ रामचन्द्र; राजन्‌ू--हे राजा परीक्षित; ग्रहैः--ग्रहों के मध्य; चन्द्र:--चन्द्रमा; इब--सहृश; उदितः --उदित हुआ।

हे राजा परीक्षित, अपने पुष्पक विमान पर बैठे भगवान्‌ रामचन्द्र स्त्रियों द्वारा स्तुति किये जाने परतथा बन्दीजनों द्वारा गुणगान किये जाने पर ऐसे प्रतीत हो रहे थे मानों तारों तथा ग्रहों के बीच चन्द्रमाहो।

भ्रात्राभिनन्दितः सोथ सोत्सवां प्राविशत्पुरीम्‌ ।

प्रविश्य राजभवन गुरुपत्ली: स्वमातरम्‌ ॥

४५॥

गुरून्वयस्यावरजान्पूजितः प्रत्यपूजयत्‌ ।

बैदेही लक्ष्मणश्चेव यथावत्समुपेयतु: ॥

४६॥

भ्रात्रा--अपने भाई ( भरत ) द्वारा; अभिनन्दित:--स्वागत किये जाकर; सः--उसने, रामचन्द्र ने; अथ--तत्पश्चात्‌; स-उत्सवाम्‌--उत्सव के मध्य में; प्राविशत्‌-- प्रवेश किया; पुरीम्‌--अयोध्या नगरी में; प्रविश्य--प्रवेश करके; राज-भवनम्‌--राजमहल में; गुरु -पत्नी:--कैकयी तथा अन्य विमाताओं; स्व-मातरमू--अपनी निजी माता ( कौशल्या ) को; गुरूनू--गुरुओं को ( श्री वसिष्ठ तथाअन्य ); वयस्य--हम उप्र वाले मित्रों को; अवर-जान्‌ू--तथा अपने से छोटों को; पूजित:--उनके द्वारा पूजित होकर; प्रत्यपूजबत्‌--बदले में नमस्कार किया; वैदेही--सीतादेवी; लक्ष्मण:--लक्ष्मण; च एब--तथा; यथा-वत्‌--उपयुक्त ढंग से; समुपेयतु:--स्वागतकिये जाकर महल में घुसे |

तत्पश्चात्‌ अपने भाई भरत द्वारा स्वागत किये जाकर भगवान्‌ रामचन्द्र एक उत्सव के बीचअयोध्या नगरी में प्रविष्ट हुए।

जब वे महल में घुसे तो उन्होंने कैकेयी तथा महाराज दशरथ की अन्यपतली एवं अपनी माता कौशल्या--इन सभी माताओं को नमस्कार किया।

उन्होंने अपने गुरुओं को,यथा वसिष्ठ को भी प्रणाम किया।

उनके हमउप्र मित्रों तथा उनसे कम आयु वाले मित्रों ने उनकी पूजाकी तो उन्होंने भी उनका अभिवादन किया।

लक्ष्मण तथा सीतादेवी ने भी वैसा ही किया।

इस प्रकार वे सभी महल में प्रविष्ट हुए।

पुत्रान्स्वमातरस्तास्तु प्राणांस्तन्व इवोत्थिता: ।

आरोप्याड्लेउभिषिद्ञन्त्यो बाष्पौधेर्विजहु: शुच्ः ॥

४७॥

पुत्रानू--पुत्रों को; स्व-मातर:--अपनी माताएँ; ताः--वे, कौशल्या तथा कैकेयी; तु--लेकिन; प्राणान्‌-- प्राण; तन्‍्वः--शरीर; इब--सहश; उत्थिता:--उठकर; आरोप्य--लेकर; अ्डे--गोद में; अभिषिज्ञन्त्य:--अपने पुत्रों के शरीरों को तर करते हुए; बाष्प--आँसुओंसे; ओघै:--लगातार गिराते; विजहुः--बन्द कर दिया; शुचः --अपने पुत्रों के वियोग से जनित शोक ।

अपने पुत्रों को देखकर राम, लक्ष्मण भरत तथा शत्रुघ्न की माताएँ तुरन्त उठ खड़ी हुईं मानोनिश्चेष्ट शरीर में चेतना आ गई हो।

माताओं ने अपने पुत्रों को अपनी गोदों में भर लिया और उन्हेंआँसुओं से नहलाकर अपने दीर्घकालीन विछोह के सनन्‍्ताप से छुटकारा पा लिया।

जटा निर्मुच्य विधिवत्कुलवृद्धैः सम॑ गुरु: ।

अभ्यषिज्जद्यथेवेन्द्रं चतु:सिन्धुजलादिभि: ॥

४८ ॥

जटा:--सिर पर बढ़ी जटा; निर्मुच्य--मुँड़वाकर, साफ करवा कर; विधि-वत्‌--विधि-विधान के अनुसार; कुल-वृद्धैः--परिवार केगुरुजनों के; समम्‌--साथ; गुरु:--गुरु वसिष्ठ ने; अभ्यषिज्ञत्‌-- भगवान्‌ रामचन्द्र का अभिषेक किया; यथा--जिस तरह; एब--सहश; इन्द्रमू-इन्द्र को; चतु:-सिन्धु-जल--चारों समुद्रों का जल; आदिभि:--स्नान की अन्य सामग्रियों से।

कुलगुरु वसिष्ठ ने भगवान्‌ रामचन्द्र के सिर की जटाएँ मुँड़वा दीं।

तत्पश्चात्‌ कुल के गुरुजनों केसहयोग से उन्होंने चारों समुद्रों के जल तथा अन्य सामग्रियों के द्वारा भगवान्‌ रामचन्द्र का अभिषेकउसी तरह सम्पन्न किया जिस तरह राजा इन्द्र का हुआ था।

एवं कृतशिरःस्नान: सुवासा: स्त्रग्व्यलड्डू तः ।

स्वलड्डू तैः सुवासोभिर्ध्नातृभिर्भार्यया बभौ ॥

४९॥

एवम्‌--इस तरह; कृत-शिरः-स्नान:--सिर धोकर पूरी तरह स्नान कर चुकने के बाद; सु-वासा:--अच्छे वस्त्र पहने; स्त्रग्वि-अलड्डू त:--माला से अलंकृत होकर; सु-अलड्डू तैः--भलीभाँति सजकर; सु-वासोभि:--सुन्दर वस्त्रों से अलंकृत; भ्रातृभि:--अपनेभाइयों सहित; भार्यया--अपनी पत्नी सीता समेत; बभौ-- भगवान्‌ अत्यन्त तेजोमय बन गये।

भलीभाँति स्नान करके तथा अपना सिर घुटा करके भगवान्‌ रामचन्द्र ने अपने आपको सुन्दरवस्त्रों से सज्ित और एक माला तथा आभूषणों से अलंकृत किया।

इस प्रकार वे अपने ही समानवस्त्र तथा आभूषण धारण किये अपने भाइयों तथा पत्नी के साथ अत्यन्त तेजोमय लग रहे थे।

अग्रहीदासन क्षात्रा प्रणिपत्य प्रसादितः ।

प्रजा: स्वधर्मनिरता वर्णा श्रमगुणान्विता: ।

जुगोप पितृवद्रामो मेनिरे पितरं च तम्‌ ॥

५०॥

अग्रहीत्‌ू--स्वीकार किया; आसनम्‌--राजसिंहासन; भ्रात्रा--अपने भाई ( भरत ) द्वारा; प्रणिपत्य--पूर्णतया उनकी शरण में जाकर;प्रसादित:--प्रसन्न होकर; प्रजा:--तथा प्रजा; स्व-धर्म-निरता:--अपने-अपने वृत्तिपरक कार्यों में संलग्न; वर्णाभ्रम--वर्ण तथाआश्रम के अनुसार; गुण-अन्विता:--गुणों से पूरित; जुगोप-- भगवान्‌ ने उनकी रक्षा की; पितृ-बत्‌--पिता की भाँति; राम:--रामचन्द्र ने; मेनिरे--उन्होंने माना; पितरम्‌ू--पिता के तुल्य; च--भी; तमू--उनको, रामचन्द्रजी को |

तब भरत की पूर्ण शरणागति से प्रसन्न होकर भगवान्‌ रामचन्द्र ने राजसिंहासन स्वीकार किया।

वे प्रजा की रक्षा पिता की भाँति करने लगे और प्रजा ने भी वर्ण तथा आश्रम के अनुसार अपने-अपने वृत्तिपरक कार्यों में लगकर उन्हें पितृतुल्य स्वीकार किया।

त्रेतायां वर्तमानायां काल: कृतसमोभवत्‌ ।

रामे राजनि धर्मज्ञे सर्वभूतसुखावहे ॥

५१॥

त्रेतायाम्‌ू-त्रेतायुग में; वर्तमानायाम्‌--यद्यपि उस काल में स्थित; काल:--समय; कृत--सत्ययुग; सम: --समान; अभवत्‌--हुआ;रामे--रामचन्द्र की उपस्थिति के कारण; राजनि--राजा के रूप में; धर्म-ज्ञे--धार्मिक; सर्व-भूत--सारे जीवों को; सुख-आवहे--पूर्णसुख देते हुए

भगवान्‌ रामचन्द्र त्रेतायुग में राजा बने थे, किन्तु उनकी सरकार अच्छी होने से वह युग सत्ययुगजैसा था।

प्रत्येक व्यक्ति धार्मिक एवं पूर्ण सुखी था।

वनानि नद्यो गिरयो वर्षाणि द्वीपसिन्धवः ।

सर्वे कामदुघा आसन्प्रजानां भरतर्षभ ॥

५२॥

वनानि--सारे वन; नद्यः--नदियाँ; गिरय:--पर्वत; वर्षाणि--राज्य या पृथ्वी के विभिन्न भाग; द्वीप--द्वीप; सिन्धव:--सागर; सर्वे--ये सारे; काम-दुघा:--अपने-अपने ऐ श्वर्यों से पूरित; आसनू-- थे; प्रजानामू--सारे जीवों का; भरत-ऋषभ--हे भरतवंश में श्रेष्ठमहाराज परीक्षित।

हे भरतश्रेष्ठ महाराज परीक्षित, भगवान्‌ रामचन्द्र के राज में सारे वन, नदियाँ, पर्वत, राज्य, सातोंद्वीप तथा सातों समुद्र सारे जीवों को जीवन की आवश्यक वस्तुएँ प्रदान करने के लिए अनुकूल थे।

नाधिव्याधिजराग्लानिदु:ःखशोकभयक्लमा: ।

मृत्युश्चानिच्छतां नासीद्रामे राजन्यधोक्षजे ॥

५३॥

न--नहीं; आधि--आध्यात्मिक, अधिभौतिक तथा अधिदेविक कष्ट ( अर्थात्‌ शरीर तथा मन के, अन्य जीवों द्वारा पहुँचाये गये तथाप्रकृति द्वारा प्रदत्त कष्ट ); व्याधि--रोग; जरा--बुढ़ापा; ग्लानि--विछोह; दुःख--कष्ट; शोक--पश्चाताप; भय--डर; क्लमा:--थकावट; मृत्यु:--मरण; च-- भी; अनिच्छताम्‌--न चाहने वालों का; न आसीतू--नहीं था; रामे--भगवान्‌ रामचन्द्र के शासन में;राजनि--राजा होने के कारण; अधोक्षजे-- भगवान्‌, जो इस जगत से परे है

जब भगवान्‌ रामचन्द्र इस जगत के राजा थे तो सारे शारीरिक तथा मानसिक कष्ट, रोग, बुढ़ापा,विछोह, पश्चाताप, दुख, डर तथा थकावट का नामोनिशान न था।

यहाँ तक कि न चाहने वालों केलिए मृत्यु भी नहीं थी।

एकपलीकब्रतधरो राजर्षिचरित: शुचि: ।

स्वधर्म गृहमेधीयं शिक्षयन्स्वयमाचरत्‌ ॥

५४॥

एक-पली-ब्रत-धर:--दूसरी पत्नी स्वीकार न करने का अथवा किसी अन्य स्त्री से कोई सम्बन्ध न रखने का व्रत लेकर; राज-ऋषि--साधु-राजा की तरह; चरित:--जिसका चरित्र; शुच्चि:--शुद्ध; स्व-धर्मम्‌--अपने वृत्तिपरक कार्य को; गृह-मेधीयम्‌--गृहस्थ जीवनबिताने वाले पुरुषों को; शिक्षयन्‌ू--शिक्षा देते हुए ( अपने आचरण से ); स्वयम्‌--स्वयं; आचरत्‌--अपना कर्तव्य निभाया।

भगवान्‌ रामचन्द्र ने एक पत्नी रखने का तथा किसी अन्य स्त्री से सम्बन्ध न रखने का ब्रत लेरखा था।

वे एक साधु राजा थे और उनका चरित्र उत्तम था; क्रोध उन्हें छू तक नहीं गया था।

उन्होंने हरएक को, विशेष रूप से गृहस्थों को वर्णाश्रम धर्म के रूप में सदाचरण का पाठ पढ़ाया।

इस तरह उन्होंनेअपने निजी कार्यकलापों से सामान्य जनता को शिक्षा दी।

प्रेम्णानुवृत्त्या शीलेन प्रश्रयावनता सती ।

भिया हिया च भावज्ञा भर्तु: सीताहरन्मन: ॥

५५॥

प्रेम्णा अनुवृत्त्या--प्रेम तथा अ्रद्धापूर्वक पति की सेवा करने के कारण; शीलेन--ऐसे उत्तम आचरण के द्वारा; प्रश्रम-अवनता--सदैवपति के प्रति विनीत एवं उसे संतुष्ट करने के लिए तैयार; सती--सती साध्वी; भिया-- भयभीत होने के कारण; हिया--लज्जा से;च--भी; भाव-ज्ञा--( पति के ) भाव को समझकर; भर्तु:--अपने पति के; सीता--सीतादेवी ने; अहरत्‌ू--मोहित कर लिया;मनः--मन कोसीतादेवी अत्यन्त विनीत, आज्ञाकारिणी, लजालु तथा सती थीं और सदा अपने पति के भावको समझने वाली थीं।

इस प्रकार अपने चरित्र एवं प्रेम तथा सेवा से वे भगवान्‌ के मन को पूरी तरहमोह सकीं।

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