← श्रीमद्भागवतम् स्कन्ध 9 की सूची
अध्याय सोलह: भगवान परशुराम विश्व के शासक वर्ग को नष्ट कर देते हैं
9.16श्रीशुक उबाचपित्रोपशिक्षितो रामस्तथेति कुरुनन्दन ।
संकत्सरंतीर्थयात्रां चरित्वाश्रममात्रजत् ॥
१॥
श्री-शुकः उवाच-- श्री शुकदेव गोस्वामी ने कहा; पित्रा--अपने पिता द्वारा; उपशिक्षित:--शिक्षा दिये जाने पर; राम:--परशुराम;तथा इति--एवमस्तु; कुरु-नन्दन--हे कुरुवंशी महाराज परीक्षित; संवत्सरम्--एक वर्ष तक; तीर्थ-यात्राम्--सारे तीर्थस्थलों कीयात्रा; चरित्वा--सम्पन्न करके; आश्रमम्--अपने आश्रम में; आब्रजत्--लौटा |
शुकदेव गोस्वामी ने कहा : हे महाराज परीक्षित, हे कुरुवंशी, जब भगवान् परशुराम को उनकेपिता ने यह आदेश दिया तो उन्होंने तुरन्त ही यह कहते हुए उसे स्वीकार किया, 'ऐसा ही होगा।
' वेएक वर्ष तक तीर्थस्थलों की यात्रा करते रहे।
तत्पश्चात् वे अपने पिता के आश्रम में लौट आये।
कदाचिद्रेणुका याता गड्भायां पद्ममालिनम् ।
गन्धर्वराजं क्रीडन्तमप्सरोभिरपश्यत ॥
२॥
कदाचित्--एक बार; रेणुका--परशुराम की माता एवं जमदग्नि की पत्नी; याता--गई; गड्भायाम्--गंगा नदी के तट पर; पद्ममालिनम्ू--कमल के फूल की माला से अलंकृत; गन्धर्व-राजम्--गन्धर्वों के राजा; क्रीडन्तम्--विहार करते; अप्सरोभि: --अप्सराओंके साथ; अपश्यत--देखा |
एक बार जब जमदग्नि की पत्नी रेणुका गंगा नदी के तट पर पानी भरने गई तो उन्होंने कमल-'फूल की माला से अलंकृत तथा अप्सराओं के साथ गंगा में विहार करते गन्धर्वों के राजा को देखा।
विलोकयन्ती क्रीडन्तमुदकार्थ नदीं गता ।
होमवेलां न सस्मार किज्ञिच्चित्ररथस्पृहा ॥
३॥
विलोकयन्ती--देखते हुए; क्रीडन्तम्ू--क्रीड़ा करते हुए; उदक-अर्थम्--कुछ जल लेने के लिए; नदीम्--नदी पर; गता--गई; होम-वेलाम्ू--होम करने की वेला में; न सस्मार--याद नहीं रही; किल्जित्-- थोड़ा; चित्ररथ--गन्धर्व राज चित्ररथ; स्पृहा--संसर्ग कीइच्छा की
वह गंगा नदी से जल लाने गई थी, किन्तु जब उसने गन्धर्वराज चित्ररथ को अप्सराओं के साथविहार करते देखा तो वह उसकी ओर उन्मुख सी हुई और यह भूल ही गई कि अग्निहोत्र का समयबीत रहा है।
कालात्ययं तं विलोक्य मुने: शापविशद्डिता ।
आगत्य कलशं तस्थौ पुरोधाय कृताझ्जलि: ॥
४॥
काल-अत्ययम्--समय बिताते; तम्--उसको; विलोक्य--देखकर; मुने:--जमदग्नि के; शाप-विशद्धिता--शाप के भय से;आगत्य--लौटकर; कलशम्ू--जल के पात्र को; तस्थौ--खड़ी हो गईं; पुरोधाय--मुनि के सामने रखकर; कृत-अद्धलि:--हाथजोड़कर।
तत्पश्चात् यह समझकर कि यज्ञ करने का समय बीत चुका है, रेणुका अपने पति द्वारा शापितहोने से भयभीत हो उठी।
अतएव जब वह लौटकर आई तो वह उनके समक्ष जलपात्र रखकर हाथजोड़कर खड़ी हो गई।
व्यभिचारं मुनिर्ज्ञात्वा पल्या: प्रकुपितोब्रवीतू ।
घ्नतैनां पुत्रका: पापामित्युक्तास्ते न चक्रिरे ॥
५॥
व्यभिचारम्--व्यभिचार; मुनि:--जमदग्नि मुनि ने; ज्ञात्वा--जानकर; पल्या: --अपनी पत्नी का; प्रकुपित:--क्रुद्ध होकर;अब्रवीत्--बोला; घ्तत--मार डालो; एनाम्--इसको; पुत्रका: --मेंरे बेटो; पापाम्--पापी स्त्री को; इति उक्ता:--ऐसा कहे जाने पर;ते--उन पुत्रों ने; न--नहीं; चक्रिरे--आज्ञा का पालन किया।
मुनि जमदग्नि अपनी पतली के मन के पाप को समझ गये।
अतएव वे अत्यन्त कुपित हुए औरअपने बेटों से बोले, 'पुत्रो, इस पापिनी स्त्री को मार डालो।
' लेकिन बेटों ने उनकी आज्ञा कापालन नहीं किया।
रामः सञ्जोदितः पित्रा भ्रातृन्मात्रा सहावधीत् ।
प्रभावज्ञो मुने: सम्यक्समाधेस्तपसश्च सः ॥
६॥
राम:--परशुराम ने; सझ्ोदित:ः--( अपनी माता तथा भाइयों को मारने के लिए ) प्रोत्साहित किये जाने पर; पित्रा--अपने पिता द्वारा;भ्रातृनू--सारे भाइयों को; मात्रा सह--माता समेत; अवधीत्--तुरन््त मारा डाला; प्रभाव-ज्ञ:--पराक्रम से अवगत; मुने: --मुनि के;सम्यक्--पूर्णतया; समाधे:--ध ध्यान से; तपस:--तपस्या से; च-- भी; सः--वह |
तब जमदग्नि ने अपने सबसे छोटे पुत्र परशुराम को अवज्ञाकारी भाइयों तथा मानसिक रूप सेपाप करने वाली उसकी माता को मार डालने की आज्ञा दी।
परशुराम ने तुरन्त ही अपनी माता तथाभाइयों का वध कर दिया क्योंकि उन्हें ध्यान तथा तपस्या द्वारा अर्जित अपने पिता के पराक्रम काज्ञान था।
वरेण च्छन्दयामास प्रीतः सत्यवतीसुतः ।
वत्रे हतानां रामोडपि जीवितं चास्मृतिं वधे ॥
७॥
वरेण च्छन्दयाम् आस--इच्छानुसार वर माँगने के लिए कहा; प्रीत:--उससे प्रसन्न होकर; सत्यवती-सुतः--सत्यवती-पुत्र जमदग्नि ने;वब्रे--कहा; हतानामू--मेरी मृत माता तथा भाई; राम:--परशुराम; अपि-- भी; जीवितम्---उन्हें जीवित कर दें; च-- भी;अस्मृतिम्ू--कोई स्मरण नहीं; वधे--मेरे द्वारा मारे हुओं का
सत्यवती-पुत्र जमदग्नि परशुराम से अत्यधिक प्रसन्न हुए और उनसे इच्छानुसार वर माँगने के लिएकहा।
परशुराम ने कहा, 'मेरी माता तथा मेरे भाइयों को फिर से जीवित हो जाने दें और उन्हें यहस्मरण न रहे कि मैंने उन्हें मारा था।
मैं आपसे इतना ही वर माँगता हूँ।
'उत्तस्थुस्ते कुशलिनो निद्रापाय इवाझ्जसा ।
पितुर्विद्वांस्तपोवीर्य रामश्नक्रे सुहृद्दधम् ॥
८ ॥
उत्तस्थु;--तुरन्त उठ खड़े हुए; ते--परशुराम की माता तथा भाई; कुशलिन: --कुशल पूर्वक; निद्रा-अपाये--गहरी नींद के अन्त में;इब--सहश; अज्भजसा--तुरन्त; पितु:--अपने पिता का; विद्वानू--अवगत; तपः--तपस्या; वीर्यमू--बल; राम: -- परशुराम ने; चक्रे --सम्पन्न किया; सुहत्-वधम्--अपने परिजनों का वध |
तत्पश्चात् जमदग्नि के वर से भगवान् परशुराम की माता तथा उनके सारे भाई तुरन्त जीवित हो उठे और वे सभी अत्यन्त प्रसन्न हुए मानो गहरी नींद से जगे हों।
परशुराम ने अपने पिता के आदेश परअपने परिजनों का वध कर दिया था क्योंकि वे अपने पिता के बल, तपस्या तथा दिद्वत्ता से परिचितथे।
येडर्जुनस्य सुता राजन्स्मरन्तः स्वपितुर्वधम् ।
रामवीर्यपराभूता लेभिरे शर्म न क्वचित् ॥
९॥
ये--जो; अर्जुनस्य--कार्त वीर्यार्जुन के; सुता:--पुत्र; राजनू--हे महाराज परीक्षित; स्मरन्तः--सदैव स्मरण करते हुए; स्व-पितुःवधम्--( परशुराम द्वारा ) अपने पिता के वध; राम-वीर्य-परा भूता: -- भगवान् परशुराम की श्रेष्ठ शक्ति द्वारा पराजित; लेभिरे--प्राप्तकिया; शर्म--सुख; न--नहीं; क्वचित्--कभी |
हे राजा परीक्षित, परशुराम की श्रेष्ठ शक्ति द्वारा पराजित कार्तवीर्यार्जुन के पुत्रों को कभी सुखनहीं मिल पाया क्योंकि उन्हें अपने पिता का वध सदैव याद आता रहा।
एकदाश्रमतो रामे सभ्रातरि वनं गते ।
वबैरं सिघाधयिषवो लब्धच्छिद्रा उपागमन् ॥
१०॥
एकदा--एक बार; आश्रमत:ः--जमदग्नि के आश्रम से; रामे--जब परशुराम; स- भ्रातरि-- अपने भाइयों के साथ; वनम्--वन में;गते--गये थे; बैरम्--पुरानी दुश्मनी; सिघाधयिषव:--पूरा करने के लिए; लब्ध-छिद्रा:--अवसर का लाभ उठाकर; उपागमन् --आश्रम के निकट आये।
एकबार जब परशुराम वसुमान तथा अन्य भाइयों के साथ आश्रम से जंगल गये हुए थे तोकार्तवीर्यार्जुन के पुत्र अवसर का लाभ उठा कर अपनी शत्रुता का बदला लेने के उद्देश्य से जमदग्नि के आश्रम में गये।
इृष्ठाग्न्यागार आसीनमावेशितधियं मुनिम् ।
भगवत्युत्तमएलोके जष्नुस्ते पापनिश्चया: ॥
११॥
इृष्ठा--देखकर; अग्नि-आगारे--उस स्थान पर जहाँ अग्नियज्ञ सम्पन्न किया जाता था; आसीनमू--बैठे हुए; आवेशित--पूर्णतया मग्न;धियम्--बुद्धि से; मुनिमू--मुनि जमदग्नि को; भगवति-- भगवान में; उत्तम-श्लोके --उत्तम एलोकों से प्रशंसित; जघ्नु;--मार डाला;ते--कार्तवीर्यार्जुन के पुत्रों ने; पाप-निश्चया: --महान् पापकृत्य करने के लिए कृतसंकल्प |
कार्तवीर्यार्जुन के पुत्र पापकृत्य करने के लिए कृतसंकल्प थे।
अतएवं जब उन्होंने जमदग्नि कोअग्नि के निकट यज्ञ करते एवं उत्तमएलोक भगवान् का ध्यान करते देखा तो उन्होंने इस अवसर कालाभ उठाकर उसे मार डाला।
याच्यमाना: कृपणया राममात्रातिदारुणा: ।
प्रसह्य शिर उत्कृत्य निन्युस्ते क्षत्रबन्धव: ॥
१२॥
याच्यमाना:--अपने पति के जीवन की याचना करती हुई; कृपणया--बेचारी असुरक्षित स्त्री द्वारा; राम-मात्रा-- भगवान् परशुराम कीमाता द्वारा; अति-दारुणा: -- अत्यन्त क्रूर; प्रसहा--बलपूर्वक; शिर:--जमदग्नि का सिर; उत्कृत्य--विलग करके; निन्यु:--ले गये;ते--कार्तवीर्यार्जुन के पुत्र; क्षत्र-बन्धव:--क्षत्रिय नहीं अपितु क्षत्रियों में सबसे नीच।
परशुराम की माता तथा जमदग्नि की पत्नी रेणुका ने अपने पति के जीवन की भीख माँगी,किन्तु कार्तवीर्यार्जुन के पुत्र क्षत्रिय गुणों से रहित होने के कारण इतने क्रूर निकले कि उसकी याचनाके बावजूद उन्होंने उसका सिर काट लिया और उसे अपने साथ लेते गये।
रेणुका दुःखशोकार्ता निध्नन्त्यात्मानमात्मना ।
राम रामेति तातेति विचुक्रोशोच्चयकै: सती ॥
१३॥
रेणुका--जमदग्नि-पत्नी रेणुका; दुःख-शोक-अर्ता--( अपने पति की मृत्यु के ) शोक से अत्यन्त दुखी; निध्नन्ती--पीटते हुए;आत्मानम्--अपने शरीर को; आत्मना--स्वयं; राम--हे परशुराम; राम--हे परशुराम; इति--इस प्रकार; तात--हे पुत्र; इति--इसप्रकार; विचुक्रोश--रोने लगी; उच्चकैः --जोर जोर से; सती--वह सती स्त्री |
अपने पति की मृत्यु के कारण शोक से विलाप करती सती रेणुका अपने ही हाथों से अपने शरीरको पीट रही थी और जोर जोर से चिल्ला रही थी, 'हे राम, मेरे पुत्र राम।
तदुपश्रुत्य दूरस्था हा रामेत्यार्तवत्स्वनम् ।
त्वरया श्रममासाद्य दहशुः पितरं हतम् ॥
१४॥
तत्--वह क्रन्दन; उपश्रुत्य--सुनकर; दूर-स्था:--दूरी पर स्थित; हा राम--हे राम, हे राम; इति--इस प्रकार; आर्त-वत्--अत्यन्तदुखी; स्वनम्--शब्द; त्वरया--तेजी से; आश्रमम्--जमदग्नि के आश्रम में; आसाद्य--आकर; दहशु:--देखा; पितरमू--अपने पिताको; हतम्--मारा हुआ
यद्यपि परशुराम सहित जमदग्नि के सारे पुत्र घर से बहुत दूरी पर थे, किन्तु ज्योंही उन्होंने रेणुकाकी 'हे राम! हे पुत्र!' की तेज पुकार सुनी, वे तुरन्त आश्रम लौट आये जहाँ उन्होंने अपने पिता कोमरा हुआ पाया।
ते दुःखरोषामर्षा्तिशोकवेगविमोहिता: ।
हा तात साधो धर्मिष्ठ त्यक्त्वास्मान्स्वर्गती भवान् ॥
१५॥
ते--वे, जमदग्नि के सरे पुत्र; दुःख--दुख; रोष--क्रोध; अमर्ष---अपमान; आर्ति--सन्ताप; शोक--तथा शोक का; वेग--वेग केसाथ; विमोहिता: --मोह ग्रस्त; हा तात--पिता; साधो--साधु; धर्मिष्ठ-- अत्यन्त धर्मात्मा; त्यक्त्वा--छोड़कर; अस्मान्ू--हमको; स्वः-गतः--स्वर्ग चले गये; भवान्ू--आप |
शोक, क्रोध, अपमान, सन््ताप तथा शोक से ग्रस्त जमदग्नि के सारे पुत्र चिल्ला पड़े, 'हे साधुएवं धर्मात्मा पिता, आप हमें छोड़कर स्वर्ग लोक को चले गये हैं।
विलप्यैवं पितुर्देहे निधाय भ्रातृषु स्वयम् ।
प्रगृह्य परशुं राम: क्षत्रान्ताय मनो दधे ॥
१६॥
विलप्य--विलाप करते हुए; एवम्--इस प्रकार; पितु:--अपने पिता के; देहम्ू--शरीर को; निधाय--सौंपकर; भ्रातृषु-- भाइयों को;स्वयम्--खुद; प्रगृह्य--लेकर; परशुम्--फरसा; राम: -- भगवान् परशुराम; क्षत्र-अन्ताय--सररे क्षत्रियों का अन्त करने के लिए;मनः--मन; दधे--निश्चय कर लिया।
इस प्रकार विलाप करते हुए परशुराम ने अपने पिता का शव अपने भाइयों को सौंप दिया औरस्वयं पृथ्वी तल से सारे क्षत्रियों का अन्त करने का निश्चय करते हुए अपना फरसा ग्रहण किया।
गत्वा माहिष्मतीं रामो ब्रह्मप्नविहतथ्रियम् ।
तेषां स शीर्षभी राजन्मध्ये चक्रे महागिरिम् ॥
१७॥
गत्वा--जाकर; माहिष्मतीम्--माहिष्मती में; राम: --परशुराम; ब्रह्म-घ्न--ब्राह्मण का वध करने वाले; विहत-भ्रियम्--सारे ऐश्वर्य सेविहीन, विनष्ट; तेषामू--उन सबों का ( कार्तवीर्यार्जुन के पुत्रों तथा अन्य क्षत्रियों का ); सः--परशुराम ने; शीर्षभि: --शरीर से छिन्नसिरों से; राजन्--हे महाराज परीक्षित; मध्ये--माहिष्मती के बीचोंबीच; चक्रे --बना दिया; महा-गिरिमू--विशाल पर्वत |
हे राजन, तब परशुराम उस माहिष्मती नगरी में गये जो एक ब्राह्मण के पापपूर्ण वध के कारणपहले ही विनष्ट हो चुकी थी।
उन्होंने उस नगरी के बीचोंबीच कार्तवीर्यार्जुन के पुत्रों के शरीरों से छिन्नकिये गये सिरों का एक पर्वत बना दिया।
तद्गक्तेन नदीं घोरामब्रह्मण्यभयावहाम् ।
हेतुं कृत्वा पितृवरधं क्षत्रेडमड़लकारिणि ॥
१८॥
त्रिःसप्तकृत्वः पृथिवीं कृत्वा निःक्षत्रियां प्रभु: ।
समन्तपञ्ञके चक्रे शोणितोदान्ह्दान्नव ॥
१९॥
तत्-रक्तेन--कार्तवीर्यार्जुन के पुत्रों के रक्त से; नदीम्ू--नदी को; घोराम्ू-- भयानक; अब्रह्मण्य-भय-आवहाम्--उन राजाओं को भयदिखाती हुईं जिन्हें ब्राह्मण संस्कृति के लिए कोई सम्मान नहीं है; हेतुमू--कारण; कृत्वा--स्वीकार करके; पितृ-वधम्--पिता काबध; क्षत्रे--जब सम्पूर्ण राज वर्ग; अमड्रल-कारिणि--अत्यन्त अशुभ ढंग से कार्य कर रहा था; त्रिः-सप्त-कृत्वः:--इक्कीस बार;पृथिवीम्--पृथ्वी को; कृत्वा--करके; निःक्षत्रियाम्ू-- क्षत्रियविहीन; प्रभु:-- भगवान् परशुराम; समन्त-पञ्ञके --समन्त पञ्ञक नामकस्थान पर; चक्रे--बनाया; शोणित-उदान्ू--जल के बजाय रक्त से पूरित; हृदान्ू--झीलें; नव--नौ |
इन पुत्रों के रक्त से भगवान् परशुराम ने एक वीभत्स नदी तैयार कर दी जिससे उन राजाओं कोबड़ा खतरा उत्पन्न हो गया जिनमें ब्राह्मण संस्कृति के प्रति आदरभाव नहीं था।
चूँकि सरकार केअधिकारी लोग अर्थात् क्षत्रिय पापकर्म कर रहे थे अतएवं परशुराम ने अपने पिता की हत्या काबदला लेने के बहाने सरे क्षत्रियों का इक्कीस बार पृथ्वी से सफाया कर दिया।
निस्सन्देह, उन्होंनेसमन्तपशञ्जञक नामक स्थान पर उन सबों के रक्त से नौ झीलें उत्पन्न कर दीं।
पितुः कायेन सन्धाय शिर आदाय बर्द्िषि ।
सर्वदेवमयं देवमात्मानमयजन्मखै: ॥
२०॥
पितु:--पिता के; कायेन--शरीर के साथ; सन्धाय--जोड़कर; शिर:--सिर को; आदाय--रखकर; बर्हिषि--कुशा के ऊपर; सर्व-देव-मयम्--समस्त देवताओं के स्वामी, सर्वव्यापी भगवान्; देवम्-- भगवान् वासुदेव को; आत्मानम्--जो सर्वत्र परमात्मा रूप मेंविद्यमान हैं; अबजत्--पूजा की; मखै:--य्ञों के द्वारा
तत्पश्चात् परशुराम ने अपने पिता के सिर को मृत शरीर से जोड़ दिया और पूरे शरीर एवं सिर कोकुशों के ऊपर रख दिया।
वे यज्ञों के द्वारा भगवान् वासुदेव की पूजा करने लगे जो समस्त देवताओंतथा हर जीव के सर्वव्यापी परमात्मा हैं।
ददौ प्राची दिशं होत्रे ब्रह्मणे दक्षिणां दिशम् ।
अध्वर्यवे प्रतीचीं वे उदगात्रे उत्तरां दिशम् ॥
२१॥
अन्येभ्योवान्तरदिश: कश्यपाय च मध्यतः ।
आर्यावर्तमुपद्रष्टे सदस्येभ्यस्ततः परम् ॥
२२॥
ददौ--दान में दिया; प्राचीम्--पूर्वी; दिशम्--दिशा; होत्रे--होता को; ब्रह्मणे --ब्रह्मा को; दक्षिणाम्--दक्षिणी; दिशम्--दिशा;अध्वर्यवे--अध्वर्यु को; प्रतीचीम्--पश्चिमी दिशा; बै--निस्सन्देह; उद््गात्रे--उद््गाता को; उत्तराम्--उत्तरी; दिशम्ू--दिशा;अन्येभ्य: --अन्यों को; अवान्तर-दिश:--विभिन्न कोने ( उत्तर पूर्व, दक्षिण पूर्व, उत्तर पश्चिम तथा दक्षिण पश्चिम ); कश्यपाय--कश्यप मुनि को; च--भी; मध्यतः--बीच का भाग; आर्यावर्तम्ू--आर्यावर्त नाम से विख्यात; उपद्रष्टे--उपद्रष्टा को, मंत्र को सुनकरउस पर निगरानी रखने वाले पुरोहित को; सदस्येभ्य:--सदस्य या सहयोगी पुरोहितों को; ततः परमू--जो भी शेष था।
यज्ञ-समाप्ति पर परशुराम ने पूर्वी दिशा होता को, दक्षिणी दिशा ब्रह्मा को, पश्चिमी दिशा अध्वर्युको, उत्तरी दिशा उदगाता को एवं चारों कोने--उत्तर पूर्व, दक्षिण पूर्व, उत्तर पश्चिम तथा दक्षिणपश्चिम--अन्य पुरोहितों को दान में दे दिये।
उन्होंने मध्य भाग कश्यप को तथा आर्यावर्त उपद्रष्टा कोदे दिया।
शेष भाग सदस्यों अर्थात् सहयोगी पुरोहितों में बाँट दिया।
ततश्वावभूथस्नानविधूताशेषकिल्बिष: ।
सरस्वत्यां महानद्यां रेजे व्यब्ध्र इवांशुमान् ॥
२३॥
ततः--तत्पश्चात्; च-- भी; अवभूथ-स्नान--यज्ञ सम्पन्न करने के बाद स्नान करके ; विधूत-- धो डाला; अशेष-- असीम;किल्बिष:--पापकर्मों के फल; सरस्वत्याम्ू--सरस्वती नदी के तट पर; महा-नद्याम्ू-- भारत की महान् नदी; रेजे--परशुराम प्रकटहुए; व्यब्ध्र:--निरभ्र, बादलों से रहित; इव अंशुमान्--सूर्यप्रकाश
तत्पश्चात् भगवान् परशुराम ने यज्ञ-अनुष्ठान पूरा करके अवभूथ स्नान किया।
महान् नदी सरस्वतीके तट पर खड़े समस्त पापों से विमुक्त परशुराम जी बादलरहित आकाश में सूर्य के समान लग रहेथे।
स्वदेहं जमदग्निस्तु लब्ध्वा संज्ञानलक्षणम् ।
ऋषीणां मण्डले सो भूत्सप्तमो रामपूजित: ॥
२४॥
स्व-देहम्-- अपना शरीर; जमदग्नि:--मुनि जमदग्नि; तु--लेकिन; लब्ध्वा--फिर से पाकर; संज्ञान-लक्षणम्--जीवन, ज्ञान तथास्मृति के सारे लक्षणों से युक्त; ऋषीणाम्--ऋषियों के; मण्डले--सात नक्षत्रों के समूह में; सः--वह, जमदग्नि; अभूत्--बन गया;सप्तम:--सातवाँ; राम-पूजित:--परशुराम द्वारा पूजित होकर
इस प्रकार परशुराम द्वारा पूजा किये जाने पर जमदग्नि को अपनी पूर्ण स्मृति सहित पुनः जीवनप्राप्त हो गया और वे सात नक्षत्रों के समूह में सातवें ऋषि बन गये।
जामदग्न्योडषपि भगवात्राम: कमललोचन: ।
आगामिन्यन्तरे राजन्वर्तयिष्यति वै बृहत् ॥
२५॥
जामदग्न्य:--जमदग्नि का पुत्र; अपि-- भी; भगवान्-- भगवान्; राम:-- परशुराम; कमल-लोचन:-- कमल की पँखड़ियों जैसे नेत्रवाला; आगामिनि--आगमन; अन्तरे--मन्वन्तर में; राजन्ू--हे राजा परीक्षित; वर्तयिष्यति--स्थापित करेगा; वै--निस्सन्देह; बृहत्--वैदिक ज्ञान
हे परीक्षित, अगले मन्वन्तर में जमदग्निपुत्र कमलनेत्र भगवान् परशुराम वैदिक ज्ञान के महान्संस्थापक होंगे।
दूसरे शब्दों में, वे सप्तर्षियों में से एक होंगे।
आस्तेड्द्यापि महेन्द्रादौ न्यस्तदण्ड: प्रशान्तधीः ।
उपगीयमानचरित:ः सिद्धगन्धर्वचारणैः ॥
२६॥
आस्ते--विद्यमान है; अद्य अपि--अब भी; महेन्द्र-अद्रौ--महेन्द्र नामक पहाड़ी प्रदेश में; न््यस्त-दण्ड:--क्षत्रिय के हथियार ( बाण,धनुष तथा फरसा ) त्याग कर; प्रशान्त--ब्राह्मण के समान पूरी तरह तुष्ट; धी:--बुद्धि; उपगीयमान-चरित:--अपने उच्चा चरित्र तथाकार्यों के लिए पूजित एवं बन्दित; सिद्ध-गन्धर्व-चारणै:--सिद्धो गन्धर्वों तथा चारणों के द्वारा
आज भी भगवान् परशुराम महेन्द्र नामक पहाड़ी प्रदेश में बुद्धिमान ब्राह्मण के रूप में रह रहे हैं।
पूर्ण तुष्ट एवं क्षत्रिय के सारे हथियारों को त्याग कर वे अपने उच्च चरित्र तथा कार्यो के लिए सदैवसिद्धों, गन्धर्वों एवं चारणों के द्वारा पूजित, वन्दित एवं प्रशंसित हैं।
एवं भृगुषु विश्वात्मा भगवान्हरिरीश्वर: ।
अवतीर्य परं भारं भुवोहन्बहुशो नृपान् ॥
२७॥
एवम्--इस तरह; भृगुषु-- भूगुवंश में; विश्व-आत्मा--परमात्मा; भगवान्-- भगवान् ; हरि: -- हरि; ईश्वर: --परम नियन्ता; अवतीर्य --अवतार लेकर; परम्ू--महान; भारम्-- भार को; भुव:--पृथ्वी के; अहन्--मारा; बहुशः--अनेक बार; नृपानू--राजाओं को
इस तरह परमात्मा भगवान् हरि तथा ईश्वर ने भूगुबंश में अवतार लिया और अवाजिछत राजाओंको अनेक बार मारकर उनके भार से पृथ्वी को उबारा।
गाधेरभून्महातेजा: समिद्ध इब पावक: ।
तपसा क्षात्रमुत्सूज्य यो लेभे ब्रह्मवर्चसम् ॥
२८ ॥
गाधे: --महाराज गाधि से; अभूत्--उत्पन्न हुआ; महा-तेजा:--अत्यन्त तेजस्वी; समिद्धः--प्रज्वलित; इब--सहृश; पावक: --अग्नि;तपसा--तपस्या से; क्षात्रमू--क्षत्रिय पद; उत्सृज्य--त्याग कर; य:--जो ( विश्वामित्र ); लेभे--प्राप्त किया; ब्रह्म-वर्चसम्--ब्राह्मणका गुण
महाराज गाधि का पुत्र विश्वामित्र अग्नि की लपटों के समान शक्तिशाली था; उसने तपस्या द्वाराक्षत्रिय पद से तेजस्वी ब्राह्मण का पद प्राप्त किया।
विश्वामित्रस्य चैवासन्पुत्रा एकशतं नृप ।
मध्यमस्तु मधुच्छन्दा मधुच्छन्दस एवं ते ॥
२९॥
विश्वामित्रस्थ--विश्वामित्र के; च--भी; एव--निस्सन्देह; आसनू-- थे; पुत्रा:--पुत्र; एक-शतम्--एक सौ एक, १०१; नृप--हे राजापरीक्षित; मध्यम: --बीच का; तु--निस्सन्देह; मधुच्छन्दा: --मधुच्छन्दा नामक; मधुच्छन्दस: --मधुच्छन्दा; एव--निस्सन्देह; ते--वेसभी
हे राजा परीक्षित, विश्वामित्र के १०१ पुत्र थे जिनमें से बीच के पुत्र का नाम मधुच्छन्दा था।
उसके कारण अन्य सारे पुत्र मधुच्छन्दा नाम से विख्यात हुए।
पुत्र कृत्वा शुनःशेफं देवरातं च भार्गवम् ।
आजीगर्त सुतानाह ज्येष्ठ एष प्रकल्प्यताम् ॥
३०॥
पुत्रमू--पुत्र; कृत्वा--स्वीकार करके; शुनःशेफम्--शुनःशेफ को; देवरातम्-देवरात, जिसके प्राणों की रक्षा देवताओं ने की थी;च--भी; भार्गवम्-- भूगुवंशी; आजीगर्तम्--अजीगर्त का पुत्र; सुतानू--अपने पुत्रों को; आह--आदेश दिया; ज्येष्ट:--सबसे बड़ा;एषः:--शुनःशेफ; प्रकल्प्यताम्ू--इसी रूप में स्वीकार किया।
विश्वामित्र ने अजीगर्त के पुत्र शुन:शेफ को अपने पुत्र रूप में स्वीकार कर लिया जो भृगुवंश मेंउत्पन्न हुआ था और देवरात नाम से भी विख्यात था।
विश्वामित्र ने अपने अन्य पुत्रों को आज्ञा दी कि वे शुनःशेफ को अपना सबसे बड़ा भाई मान लें।
यो वै हरिश्चन्द्रमखे विक्रीत: पुरुष: पशु: ।
स्तुत्वा देवान्प्रजेशादीन्मुमुचे पाशबन्धनात् ॥
३१॥
यः--जो ( शुनःशेफ ); वै--निस्सन्देह; हरिश्रन्द्र-मखे--राजा हरिश्न्द्र द्वारा सम्पन्न यज्ञ में; विक्रीत:--बेचा गया; पुरुष:--व्यक्ति;पशु:--बलिपकशु; स्तुत्वा--स्तुति करके; देवान्ू--देवताओं को; प्रजा-ईश-आदीनू--ब्रह्मा इत्यादि; मुमुचे--छोड़ दिया गया; पाश-बन्धनात्ू-पशु की भाँति रस्सी के बन्धन से ।
शुनःशेफ के पिता ने शुनःशेफ को राजा हरिश्वन्द्र के यज्ञ में बलिपशु के रूप में बलि दिये जानेके लिए बेच दिया।
जब शुनःशेफ को यज्ञशाला में लाया गया तो उसने देवताओं से प्रार्थना की किवे उसे छुड़ा दें और वह उनकी कृपा से छुड़ा दिया गया।
यो रातो देवयजने देवैर्गाधिषु तापसः ।
देवरात इति ख्यातः शुनःशेफस्तु भार्गव: ॥
३२॥
यः--जो; रात:--रक्षित; देव-यजने--देवताओं के पूजा स्थल में; देवै:--उन्हीं देवताओं द्वारा; गाधिषु--गाधि कुल में; तापस: --आध्यात्मिक जीवन में बढ़ा-चढ़ा; देव-रातः--देवताओं द्वारा रक्षित; इति--इस प्रकार; ख्यात:--प्रसिद्ध; शुनः:शेफः तु--तथाशुनःशेफ; भार्गव: -- भूगुवंश में |
यद्यपि शुनःशेफ भार्गव कुल में उत्पन्न हुआ था, किन्तु आध्यात्मिक जीवन में बढ़ा-चढ़ा होने केकारण यज्ञ में सम्बधित देवताओं ने उसकी रक्षा की।
फलतः वह देवरात नाम से गाधि के वंशज केरूप में भी विख्यात हुआ।
ये मधुच्छन्दसो ज्येष्ठा: कुशलं मेनिरे न तत् ।
अश्पत्तान्मुनि: क्रुद्धो म्लेच्छा भवत दुर्जना: ॥
३३॥
ये--जो; मधुच्छन्दस:--विश्वामित्र के पुत्र जो मधुछन्दा कहलाये; ज्येष्ठा:--सबसे बड़ा; कुशलम्--अच्छे स्वभाव का; मेनिरे--स्वीकार करके; न--नहीं; तत्--वह; अशपत्--शाप दे दिया; तानू--उन सबों को; मुनि:--विश्वामित्र मुनि ने; क्रुद्ध:--कुपित;म्लेच्छा:--वैदिक सिद्धान्तों का उल्लंघन करने वाले; भवत--तुम सभी हो जाओ; दुर्जना:--बुरे पुत्र
जब विश्वामित्र ने शुन-शेफ को सबसे बड़ा पुत्र स्वीकार करने के लिए कहा तो विश्वामित्र केपचास ज्येष्ठ मधुच्छन्दा पुत्र इसके लिए राजी नहीं हुए।
फलत:ः विश्वामित्र क्रुद्ध हो गये और उन्होंने उनसबों को शाप दे दिया, 'निकम्मे पुत्रो! तुम सारे म्लेच्छ बन जाओ क्योंकि तुम वैदिक संस्कृति केनियमों के विरुद्ध हो।
'स होवाच मधुच्छन्दा: सार्थ पञ्ञाशता ततः ।
यन्नो भवान्सझ्जानीते तस्मिस्तिष्ठामहे वयम् ॥
३४॥
सः--विश्वामित्र के बीच के पुत्र ने; ह--निस्सन्देह; उबाच--कहा; मधुच्छन्दा: --मधुच्छन्दा; सार्थम्ू--साथ; पञ्ञाशता-- अन्य पचासपुत्र, जो मधुच्छन्दा कहलाते थे; ततः--तब, जब पहले पचास पुत्रों को शाप मिल गया; यत्--जो; न:--हमको; भवान्--हे पिता;सज्ञानीते--आप जैसा चाहें; तस्मिन्--उसमें; तिष्ठामहे--रहेंगे; वयम्--हम सब
जब बड़े पचास मधुच्छन्दाओं को शाप मिल गया तो मधुच्छन्दा समेत छोटे पचास पुत्र अपनेपिता के पास गये और उनके प्रस्ताव को यह कहकर स्वीकार किया, 'हे पिता, आप जैसा चाहेंगेहम उसी को मानेंगे।
'ज्येष्ठ मन्त्रहशं चक्रुस्त्वामन्वज्ञो वयं सम हि ।
विश्वामित्र: सुतानाह वीरवन्तो भविष्यथ ।
ये मान॑ मेउनुगृहन्तो वीरवन्तमकर्त माम् ॥
३५॥
ज्येष्ठम्--बड़ा, ज्येष्ठ; मन्त्र-दहशम्--मंत्रद्रष्टा; चक्कुः--स्वीकार कर लिया; त्वामू--तुमको; अन्वज्ञ:--पालन करने के लिए राजी होगये हैं; वयम्--हम; स्म--निस्सन्देह; हि--निश्चय ही; विश्वामित्र:--विश्वामित्र मुनि ने; सुतान्ू--आज्ञाकारी पुत्रों से; आह--कहा;वीर-बन्तः--पुत्रों के पिता; भविष्यथ-- भविष्य में बनो; ये--जो; मानम्--मान, सम्मान; मे--मेरा; अनुगृहन्त:--स्वीकार किया;वीर-वन्तम्--अच्छे पुत्रों के पिता; अकर्त--तुमने बनाया है; माम्--मुझको
इस तरह छोटे मधुच्छान्दाओं ने शुनःशेफ को अपना बड़ा भाई मान लिया और उससे कहा 'हमआपके आदेशों का पालन करेंगे।
' तब विश्वामित्र ने अपने इन आज्ञाकारी पुत्रों से कहा 'चूँकि तुमलोगों ने शुनःशेफ को अपना बड़ा भाई मान लिया है अतएव मैं सन्तुष्ट हूँ।
तुम लोगों ने मेरे आदेशको स्वीकार करके मुझे योग्य पुत्रों का पिता बना दिया है अतएव मैं तुम सबों को आशीर्वाद देता हूँकि तुम भी पुत्रों के पिता बनो।
'एष व: कुशिका वीरो देवरातस्तमन्वित ।
अन्ये चाष्टकहारीतजयक्रतुमदादय: ॥
३६॥
एष:--यह ( शुनःशेफ ); वः--तुम्हारी तरह; कुशिका:--हे कुशिको; वीर:-- मेरा पुत्र; देवरात:--देवरात; तम्--उसकी; अन्बित--आज्ञा पालन करो; अन्ये--अन्य; च--भी; अष्टक--अष्टक; हारीत--हारीत; जय--जय; क्रतुमत्--क्रतुमान; आदय: --इत्यादिविश्वामित्र ने कहा 'हे कुशिको, यह देवरात मेरा पुत्र है और तुममें से एक है।
उसकी आज्ञा कापालन करो।
' हे परीक्षित, विश्वामित्र के अन्य अनेक पुत्र थे--अष्टक, हारीत, जय तथा क्रतुमानइत्यादि।
एवं कौशिकगोत्रं तु विश्वामित्रै: पृथग्विधम् ।
प्रवरान्तरमापन्नं तद्द्धि चैवं प्रकल्पितम् ॥
३७॥
एवम्--इस प्रकार ( कुछ शापित होकर और कुछ आशीर्वाद पाकर ); कौशिक-गोत्रमू--कौशिक का वंश; तु--निस्सन्देह;विश्वामित्रै:--विश्वामित्र के पुत्रों द्वारा; पृथक्-विधम्--विभिन्न प्रकार से; प्रवर-अन्तरम्--एक दूसरे में अन्तर; आपतन्नम्--प्राप्त किया;तत्--वह; हि--निस्सन्देह; च--भी; एवम्--इस प्रकार; प्रकल्पितम्--निश्चित किया।
विश्वामित्र ने कुछ पुत्रों को शाप दिया और अन्यों को आशीर्वाद दिया और एक पुत्र को गोद भीलिया।
इस तरह कौशिक वंश में काफी विविधता थी, किन्तु सारे पुत्रों में देवरात ही ज्येष्ठ माना गया।
