← श्रीमद्भागवतम् स्कन्ध 9 की सूची
अध्याय अठारह: राजा ययाति को अपनी युवावस्था प्राप्त हुई
9.18श्रीशुक उबाचयतिर्ययाति: संयातिरायतिर्वियति: कृति: ।
षडिमेनहुषस्यासन्निन्द्रियणीव देहिन: ॥
१॥
श्री-शुकः उवाच-- श्री शुकदेव गोस्वामी ने कहा; यति:--यति; ययातिः --ययाति; संयाति:--संयाति; आयति:--आयति;वियति:--वियति; कृति: --कृति; षट्ू--छः ; इमे--ये सभी; नहुषस्थ--राजा नहुष के; आसन्ू-- थे; इन्द्रियाणि--छ: इन्द्रियों; इब--सहश; देहिन:--देहधारी का
शुकदेव गोस्वामी ने कहा : हे राजा परीक्षित, जिस तरह देहधारी आत्मा के छह इन्द्रियाँ होती हैंउसी तरह राजा नहुष के छह पुत्र थे जिनके नाम थे यति, ययाति, संयाति, आयति, वियति तथाकृति।
राज्यं नैच्छद्यति: पित्रा दत्तं तत्परिणामवित् ।
यत्र प्रविष्ट: पुरुष आत्मानं नावबुध्यते ॥
२॥
राज्यम्ू--राज्य; न ऐच्छत्--स्वीकार नहीं किया; यतिः ---्येष्ठ पुत्र, यति ने; पित्रा--अपने पिता द्वारा; दत्तमू--दिया गया; ततू-'परिणाम-वित्--राजा के शक्तिशाली होने का फल जानते हुए; यत्र--जहाँ; प्रविष्ट:--घुसकर; पुरुष: --व्यक्ति; आत्मानमू--आत्म-साक्षात्कार; न--नहीं; अवबुध्यते--गम्भीरतापूर्वक ग्रहण करके समझेगा।
जब कोई मनुष्य राजा या सरकार के अध्यक्ष के पद को ग्रहण करता है तो वह आत्म-साक्षात्कार का अर्थ नहीं समझ पाता।
यह जानकर, नहुष के सबसे बड़े पुत्र यति ने शासन सँभालनास्वीकार नहीं किया यद्यपि उसके पिता ने राज्य को उसे ही सौंपा था।
पितरि भ्रंशिते स्थानादिन्द्राण्या धर्षणादिद्वजै: ।
प्रापितेउजगरत्वं वै ययातिरभवन्नूप: ॥
३॥
पितरि--पिता के; भ्रंशिते--पतित किए जाने पर; स्थानात्--स्वर्गलोक से; इन्द्राण्या:--इन्द्र की पत्ती शच्ी का; धर्षणात्ू--अपमानकरने से; द्विजैः--ब्राह्मणों से ( शिकायत करने पर उनके द्वारा ); प्रापिते--नीचे गिराये जाने पर; अजगरत्वमू--अजगर का जीवन;बै--निस्सन्देह; ययाति:ः--ययाति नामक पुत्र; अभवत्--हुआ; नृप:--राजा
चूँकि ययाति के पिता नहुष ने इन्द्र की पत्ली शची को छेड़ा था, अतएवं शची के अगस्त्य तथाअन्य ब्राह्मणों से शिकायत करने पर इन ब्राह्मणों ने नहुष को शाप दिया कि वह स्वर्ग से गिरकरअजगर बन जाय |
फलतः ययाति राजा बना।
चतसृष्वादिशद्धिक्षु भ्रातृन््भ्राता यवीयस: ।
कृतदारो जुगोपोर्वी काव्यस्य वृषपर्वण: ॥
४॥
चतसृषु--चारों; आदिशत्--शासन करने की अनुमति दी; दिक्षु--दिशाओं में; भ्रातृनू--चारों भाइयों को; भ्राता--ययाति;यवीयस:--तरूण; कृत-दार:--विवाह किया; जुगोप--शासन किया; ऊर्वीम्--संसार पर; काव्यस्य--शुक्राचार्य की लड़की;वृषपर्वण:--वृषपर्वा की पुत्री
राजा ययाति के चार छोटे भाई थे जिन्हें उसने चारों दिशाओं में शासन चलाने की अनुमति दे दीथी।
ययाति ने शुक्राचार्य की बेटी देवयानी से एवं वृषपर्वा की पुत्री शर्मिष्ठा से विवाह किया और वह सारी पृथ्वी पर शासन करने लगा।
श्रीराजोबाचब्रह्मर्षि्भगवान्काव्य: क्षत्रबन्धुश्न नाहुष: ।
राजन्यविप्रयो: कस्माद्विवाह: प्रतिलोमक: ॥
५॥
श्री-राजा उबाच--महाराज परीक्षित ने जिज्ञासा की; ब्रह्मू-ऋषि:--ब्राह्मणों में श्रेष्ठ; भगवान्ू--अत्यन्त शक्तिशाली; काव्य: --शुक्राचार्य ; क्षत्र-बन्धु:-- क्षत्रिय जाति से सम्बन्धित; च--भी; नाहुष:--राजा ययाति; राजन्य-विप्रयो:--ब्राह्मण तथा क्षत्रिय का;'कस्मात्ू-कैसे; विवाह:--विवाह; प्रतिलोमक:--प्रथा के विपरीत |
महाराज परीक्षित ने कहा : शुक्राचार्य अत्यन्त शक्तिशाली ब्राह्मण थे और महाराज ययाति क्षत्रियथे।
अतएव मैं यह जानने का इच्छुक हूँ कि ब्राह्मण तथा क्षत्रिय के बीच यह प्रतिलोम विवाह कैसेसम्पन्न हुआ ?
श्रीशुक उबाचएकदा दानवेन्द्रस्थ शर्मिष्ठा नाम कन्यका ।
सखीसहस्त्रसंयुक्ता गुरुपुत्या च भामिनी ॥
६॥
देवयान्या पुरोद्याने पुष्पितद्गमसड्डू ले ।
व्यचरत्कलगीतालिनलिनीपुलिनेउबला ॥
७॥
श्री-शुकः उवाच-- श्री शुकदेव गोस्वामी ने कहा; एकदा--एकबार; दानव-इन्द्रस्य--वृषपर्वा की; शर्मिष्ठा--शर्मिष्ठा;।
नाम--नामक;कन्यका--कन्या; सखी-सहस्त्र-संयुक्ता-- अपनी हजारों सखियों के साथ-साथ; गुरू-पुत्रया--गुरु शुक्राचार्य की पुत्री सहित; च--भी; भामिनी -- सरलता से चिढ़ने वाली; देवयान्या--देवयानी सहित; पुर-उद्याने--महल के बगीचे में; पुष्पित--फूलों से युक्त; द्रम--सुन्दर वृक्ष; सह्लू ले--सँटे हुए; व्यचरत्ू--टहल रही थी; कल-गीत--मधुर ध्वनि से; अलि--भौंरा; नलिनी--कमलिनियों से युक्त;पुलिने--ऐसे बगीचे में; अबला--निर्दोष
शुकदेव गोस्वामी ने कहा : एकबार वृषपर्वा की पुत्री शर्मिष्ठा, जो अबोध, किन्तु स्वभाव सेक्रोधी थी, शुक्राचार्य की पुत्री देवयानी तथा उसकी सैकड़ों सखियों के साथ राजमहल के बगीचे मेंघूम रही थी।
यह बगीचा कमलिनियों तथा फूल-फल के वृक्षों से पूर्ण था और उसमें मधुर गीत गातेपक्षी तथा भौरें निवास कर रहे थे।
ता जलाशयमासाद्य कन्या: 'कमललोचना: ।
तीरे न्यस्य दुकूलानि विजह्ठु: सिद्धतीर्मिथ: ॥
८॥
ताः--वे; जल-आशयम्--झील पर; आसाद्य--पहुँच कर; कन्या:--सारी लड़कियाँ; कमल-लोचना:--कमल की पंखुड़ियों जैसेनेत्रों वाली; तीरि--किनारे पर; न्यस्य--रख कर; दुकूलानि---अपने-अपने वस्त्र; विजहु:--खेलने लगीं; सिज्ञती:--जल फेंककर;मिथः--परस्पर।
जब तरुणी, कमलनयनी लड़कियाँ जलाशय के तीर पर आईं तो उन्होंने स्नान का आनन्द लेनाचाहा।
फलतः किनारे पर अपने वस्त्र रखकर वे एक दूसरे पर जल उछाल कर जल-क्रीड़ा करनेलगीं।
वीक्ष्य ब्रजन्तं गिरिशं सह देव्या वृषस्थितम् ।
सहसोत्तीर्य वासांसि पर्यधुर्रीडिता: स्त्रियः ॥
९॥
वीक्ष्य--देखकर; ब्रजन्तम्--जाते हुए; गिरिशम्--शिवजी को; सह--साथ; देव्या--पार्वती के; वृष-स्थितम्--बैल के ऊपरआसीन; सहसा--एकाएक; उत्तीर्य--जल से निकल कर; वासांसि--वस्त्र; पर्यधु; --शरीर पर पहन लिया; ब्रीडिता:--लज्जित होकर;स्त्रियः--युवतियों ने |
जलक़ीड़ा करते हुए लड़कियों ने सहसा शिवजी को ऊपर से जाते देखा जो अपने बैल की पीठपर अपनी पली पार्वती समेत आसीन थे।
नंगी होने के कारण लज्जित वे लड़कियाँ तुरन्त जल सेबाहर निकल आईं और उन्होंने अपने वस्त्रों से अपने-अपने शरीर ढक लिये।
शर्मिष्ठाजानती वासो गुरुपुत्या: समव्ययत् ।
स्वीयं मत्वा प्रकुपिता देवयानीदमब्रवीत् ॥
१०॥
शर्मिष्ठा--वृषपर्वा की पुत्री ने; अजानती--अनजाने; वास:--वस्त्र; गुरु-पुत्रया:--अपने गुरु की पुत्री देवयानी का; समव्ययत्--पहनलिया; स्वीयम्--अपना; मत्वा--मानकर; प्रकुपिता--क्ुद्ध; देवयानी--शुक्राचार्य की पुत्री ने; इदम्--यह; अब्नरवीत्--कहा |
शर्मिष्ठा ने अनजाने ही देवयानी का वस्त्र पहन लिया जिससे देवयानी को क्रोध आ गया और वह इस प्रकार बोली।
अहो निरीक्ष्यतामस्या दास्या: कर्म हासाम्प्रतम् ।
अस्मद्धार्य धृतवती शुनीव हविरध्वरे ॥
११॥
अहो--ेरे; निरीक्ष्यताम्--देखो तो; अस्या: --इसका ( शर्मिष्ठा का ); दास्याः--हमारी दासी की तरह; कर्म--कार्य; हि--निस्सन्देह;असाम्प्रतम्-बिना किसी शिष्टाचार के; अस्मत्-धार्यम्--मेरे वस्त्र को; धृतवती--उसने पहन लिया; शुनी इब--कुत्ते की तरह;हविः--घी; अध्वरे--यज्ञ में डालने के निमित्त ।
आरे जरा देखो न इस दासी शर्मिष्ठा की करतूतों को, इसने सारे शिष्टाचार को ताक पर रखकरमेरे वस्त्र धारण कर लिये हैं मानो यज्ञ के निमित्त रखे घी को कोई कुत्ता छीन ले।
यैरिदं तपसा सूष्टं मुखं पुंसः परस्य ये ।
धार्यते यैरिह ज्योति: शिवः पन्था: प्रदर्शित: ॥
१२॥
यान्वन्दन्त्युपतिष्ठन्ते लोकनाथा: सुरेश्वरा: ।
भगवानपि विश्वात्मा पावन: श्रीनिकेतनः ॥
१३॥
वबयं तत्रापि भूगवः शिष्योस्या नः पितासुरः ।
अस्मद्धार्य धृतवती शूद्रो वेदमिवासती ॥
१४॥
यैः--जिन व्यक्तियों के द्वारा; इदमू--यह सारा विश्व; तपसा--तपस्या से; सृष्टम्--उत्पन्न हुआ था; मुखम्--मुँह; पुंस:--परम पुरुषका; परस्य--दिव्य; ये--जो ( हैं ); धार्यते--सदैव उत्पन्न होता है; यैः--जिन व्यक्तियों के द्वारा; हह--यहाँ; ज्योति:--ब्रह्मज्योति;शिव:--शुभ; पन्था:--मार्ग; प्रदर्शित:--दिखलाया गया; यान्--जिनको; वन्दन्ति--वन्दना करते हैं; उपतिष्ठन्ते--सम्मान करते तथाअनुगमन करते हैं; लोक-नाथा:--विभिन्न लोकों के निर्देशक; सुर-ई श्वरा:--देवतागण; भगवान्-- भगवान्; अपि-- भी; विश्व-आत्मा--परमात्मा; पावन:--पवित्र करने वाला; श्री-निकेतन:--लक्ष्मी के पति; वयम्--हम ( हैं ); तत्र अपि--अन्य ब्राह्मणों से भीबड़े; भूगव:-- भूगवंशी; शिष्य: --शिष्य; अस्या:--उसका; नः--हमारा; पिता--पिता; असुरः --असुर; अस्मत्-धार्यम्--हमारेपहनने के निमित्त; धृतवती--पहन लिया है; शूद्र:--अब्राह्मण सेवक; वेदम्ू--वेद; इब--सहृश; असती--जो सती न हो, कुलटा |
हम उन योग्य ब्राह्मणों में से हैं जिन्हें भगवान् का मुख माना गया है।
ब्राह्मणों ने अपनी तपस्या सेसमग्र विश्व को उत्पन्न किया है और वे परम सत्य को अपने अन्तःकरण में सदैव धारण करते हैं।
उन्होंने सौभाग्य के पथ का निर्देशन किया है जो कि वैदिक सभ्यता का पथ है।
वे इस जगत मेंएकमात्र पूजनीय हैं अतएवं उनकी स्तुति की जाती है और विभिन्न लोकों के नायक बड़े से बड़ेदेवता भी उनकी पूजा करते हैं--यहाँ तक कि सब को पवित्र करने वाले, लक्ष्मी देवी के पति,परमात्मा द्वारा भी वे पूजित हैं और हम तो इसलिए भी अधिक पूज्य हैं क्योंकि हम भृगुवंशी हैं।
यद्यपि इस स्त्री का पिता असुर होकर हमारा शिष्य है तो भी इसने मेरे वस्त्र को उसी तरह धारण कर लिया है जिस तरह कोई शूद्र वैदिक ज्ञान का भार सँभाले।
एवं क्षिपन्तीं शर्मिष्ठा गुरुपुत्नीमभाषत ।
रुषा श्रसन्त्युरड्रीव धर्षिता दृष्टदच्छदा ॥
१५॥
एवम्--इस प्रकार; क्षिपन्तीमू--अपमानित की गई; शर्मिष्ठा--वृषपर्वा की पुत्री ने; गुरु-पुत्रीमू--गुरु शुक्राचार्य की पुत्री से;अभाषत--कहा; रुषा-क्ुद्ध हाने से; श्रसन््ती--गहरी साँस लेती; उरड्री इब--सर्पिणी की तरह; धर्षिता--कुचली हुई, अपमानित;दष्ट-दत्-छदा--अपने दाँतों से अपने होठ चबाती |
शुकदेव गोस्वामी ने कहा : शर्मिष्ठा को जब इस तरह कठोर शब्दों से डाँटा गया तो वहअत्यधिक क्रुद्ध हो उठी।
सर्पिणी की तरह गहरी साँस छोड़ती और अपने निचले होठ को अपने दाँतोंसे चबाती वह शुक्राचार्य की पुत्री से इस तरह बोली।
आत्मवृत्तमविज्ञाय कत्थसे बहु भिक्षुकि ।
कि न प्रतीक्षसे उस्माकं गृहान्बलिभुजो यथा ॥
१६॥
आत्म-वृत्तम्--अपनी स्थिति; अविज्ञाय--न समझकर; कत्थसे--तुम पागलों की तरह बातें कर रही हो; बहु--अधिक; भिक्षुकि--भिखारिन; किमू--क्या; न--नहीं; प्रतीक्षसे-- प्रतीक्षा करती हो; अस्माकम्--हमारे; गृहान्--घर पर; बलिभुज:--कौवे; यथा--जिस तरह |
अरे भिखारिन, जब तुम्हें अपनी स्थिति का पता नहीं है तो व्यर्थ ही क्यों इतना बोल रही हो ?
क्या तुम लोग अपनी जीविका के लिए हम पर आश्नित रहकर कौवों की भाँति हमारे घर पर प्रतीक्षानहीं करते हो ?
एवंविधे: सुपरुषै: क्षिप्त्वाचार्यसुतां सतीम् ।
शर्मिष्ठा प्राक्षिपत्कूपे वासश्चादाय मन्युना ॥
१७॥
एवम्ू-विधे:--इस प्रकार से; सु-परुषै:--अत्यन्त अप्रिय बचनों द्वारा; क्षिप्वा--अपमानित होकर; आचार्य-सुताम्--शुक्राचार्य कीपुत्री को; सतीम्--देवयानी को; शर्मिष्ठा --शर्मिष्ठा ने; प्राक्षिपत्--फेंक दिया; कूपे--कुएँ में; वास:--वस्त्र; च--तथा; आदाय--लेकर; मन्युना--क्रोध में आकर।
ऐसे अप्रिय वचनों का उपयोग करते हुए शर्मिष्ठा ने शुक्राचार्य की पुत्री देवयानी को फटकारा।
उसने क्रोध में आकर देवयानी के वस्त्र छीन लिए और उसे एक कुएँ में धकेल दिया।
तस्यां गतायां स्वगृहं ययातिर्मृगयां चरन् ।
प्राप्तो यहच्छया कूपे जलार्थी तां ददर्श ह ॥
१८॥
तस्याम्--उसके; गतायाम्--चले जाने पर; स्व-गृहम्-- अपने घर; ययाति:--राजा ययाति; मृगयाम्--शिकार करने; चरन्--घूमतेहुए; प्राप्त:--आया; यहच्छया--संयोगवश; कूपे--कुएँ में; जल-अर्थी--जल पीने की इच्छा से; तामू--उसको ( देवयानी को );ददर्श--देखा; ह--निस्सन्देह |
देवयानी को कुएँ में धकेल कर शर्मिष्ठा अपने घर चली गई।
तभी शिकार के लिए निकला राजाययाति उस कुएँ पर पानी पीने के लिए आया और संयोगवश देवयानी को देखा।
दत्त्वा स्वमुत्तरं वासस्तस्यै राजा विवाससे ।
गृहीत्वा पाणिना 'पाणिमुज्जहार दयापरः: ॥
१९॥
दत्त्वा--देकर; स्वम्-- अपना; उत्तरमू--उत्तरीय, ऊपरी; वास:--वस्त्र; तस्यै--उस ( देवयानी ) को; राजा--राजा; विवाससे--नग्नहोने के कारण; गृहीत्वा--पकड कर; पाणिना--हाथ से; पाणिम्--उसके हाथ को; उजहार--उद्धार किया; दया-पर:--अत्यन्तदयालु।
देवयानी को कुएँ में नग्न देखकर राजा ययाति ने तुरन्त ही अपना ऊपरी वस्त्र उसे दे दिया।
उसपर अत्यन्त दयालु होकर उसने अपने हाथ से उसका हाथ पकड़ कर उसे बाहर निकाला।
त॑ वीरमाहौशनसी प्रेमनिर्भरया गिरा ।
राजंस्त्वया गृहीतो मे पाणि: परपुरञ्ञय ॥
२०॥
हस्तग्राहोपरो मा भूदगृहीतायास्त्वया हि मे ।
एप ईशकूतो वीर सम्बन्धो नौ न पौरुष: ॥
२१॥
तम्--उस; वीरम्--वीर ययाति से; आह--कहा; औशनसी--उशना कवि या शुक्राचार्य की पुत्री ने; प्रेम-निर्भरया--प्रेम तथा दया सेसिक्त; गिरा--वाणी से; राजन्--हे राजा; त्वया--तुम्हारे द्वारा; गृहीत:--अंगीकृत; मे--मेरा; पाणि: --हा थ; पर-पुरञझ्य--अन्यों केराज्यों का विजेता; हस्त-ग्राह:--मेरा हाथ थामने वाला; अपर:--दूसरा; मा--मत; भूत्ू--होये; गृहीताया: --स्वीकृत; त्वया --तुम्हारे द्वारा; हि--निस्सन्देह; मे--मेरा; एब:--यह; ईश-कृत:--दैव द्वारा नियोजित; वीर--हे वीर; सम्बन्ध: --सम्बन्ध; नौ--हमारा; न--नहीं; पौरुष: --मानवनिर्मित |
देवयानी प्रेमसिक्त शब्दों में राजा ययाति से बोली ' हे परम वीर! हे राजा! हे शत्रुओं के नगरों केविजेता! आपने मेरा हाथ थामकर मुझे अपनी विवाहिता पत्नी के रूप में स्वीकार किया है।
अब मुझेकोई दूसरा नहीं छूने पाये क्योंकि हमारा यह पति-पत्नी का सम्बन्ध भाग्य द्वारा सम्भव हो सका है,किसी व्यक्ति द्वारा नहीं।
दिदं कूपमग्नाया भवतो दर्शनं मम ।
न ब्राह्मणो मे भविता हस्तग्राहो महाभुज ।
कचस्य बाईस्पत्यस्य शापाद्यमशपं पुरा ॥
२२॥
यत्--चूँकि; इृदम्--इस; कूप-मग्नाया:--कुएँ में गिरी; भवत:--आपकी; दर्शनम्ू--भेंट; मम--मुझसे; न--नहीं; ब्राह्मण:--योग्यब्राह्मण; मे--मेरा; भविता--हो सकोगे; हस्त-ग्राह:--पति; महा-भुज--हे शक्तिशाली भुजावाले; कचस्य--कच का;बाईस्पत्यस्थ--विद्वान ब्राह्मण एवं देवों के पुरोहित बृहस्पति के पुत्र के; शापात्ू-शाप से; यमू--जिसको; अशपम्--मैंने शाप दिया;पुरा--भूतकाल मेंकुएँ में गिर जाने के कारण मैं आपसे मिली।
निस्सन्देह, यह विधि का विधान था।
जब मैंनेप्रकाण्ड विद्वान बृहस्पति के पुत्र कच को शाप दिया तो उसने मुझे यह शाप दिया कि तुझे ब्राह्मणपति नहीं प्राप्त हो सकेगा।
अतएव हे महाभुज! मेरे किसी ब्राह्मण की पत्नी बनने की कोई सम्भावनानहीं है।
ययातिरनभिप्रेतं दैवोपहतमात्मन: ।
मनस्तु तदगतं बुद्ध्वा प्रतिजग्राह तद्ब्र: ॥
२३॥
ययाति:--राजा ययाति; अनभिप्रेतम्--न चाहते हुए; दैव-उपहतम्--विधाता द्वारा की गई व्यवस्था को; आत्मन:--निजी हित;मनः--मन; तु--फिर भी; तत्-गतम्--उससे आकृष्ट होकर; बुद्ध्वा--ऐसी बुद्धि द्वारा; प्रतिजग्राह--स्वीकार कर लिया; ततू-वचः--देवयानी के शब्द।
शुकदेव गोस्वामी ने आगे कहा : चूँकि शास्त्रों द्वारा ऐसे विवाह की अनुमति नहीं है अतएव राजाययाति को यह अच्छा नहीं लगा, किन्तु विधाता द्वारा व्यवस्थित होने तथा देवयानी के सौन्दर्य केप्रति आकृष्ट होने से उसने उसकी प्रार्थना स्वीकार कर ली।
गते राजनि सा धीरे तत्र सम रूदती पितुः ।
न्यवेदयत्ततः सर्वमुक्त शर्मिष्ठया कृतम् ॥
२४॥
गते राजनि--राजा के चले जाने के बाद; सा--उस ( देवयानी ) ने; धीरे--विद्वान; तत्र स्म--अपने घर लौटकर; रुदती--रोती हुई;पितु:--अपने पिता के समक्ष; न्यवेदयत्--कह सुनाया; ततः--तत्पश्चात्; सर्वम्--सारा; उक्तम्--कहा गया; शर्मिष्ठया --शर्मिष्ठाद्वारा; कृतम्--किया गया
तत्पश्चात् जब विद्वान राजा अपने महल को वापस चला गया तो देवयानी रोती हुई घर लौटी औरउसने अपने पिता शुक्राचार्य को शर्मिष्ठा के कारण घटी सारी घटना कह सुनाई।
उसने बतलाया किवह किस तरह कुएँ में धकेली गयी थी किन्तु एक राजा द्वारा बचा ली गई।
दुर्मना भगवान्काव्य: पौरोहित्यं विगर्हयन् ।
स्तुवन्वृत्ति च कापोतीं दुहित्रा स ययौ पुरात् ॥
२५॥
दुर्मना:--अत्यन्त अप्रसन्न होकर; भगवान्--अत्यन्त शक्तिशाली; काव्य:--शुक्राचार्य ने; पौरोहित्यम्-पुरोहिती कर्म को;विगर्हयन्-धिक्कारते हुए; स्तुवन्-- प्रशंसा करते हुए; वृत्तिमू--पेशे को; च--तथा; कापोतीम्-खेत से अन्न बीनने के; दुहित्रा--अपनी पुत्री समेत; सः--वह ( शुक्राचार्य ); ययौ--गया; पुरात्ू--अपने आवास से |
जब शुक्राचार्य ने देवयानी के साथ घटी घटना सुनी तो वे मन में अत्यन्त दुखी हुए।
पुरोहितीवृत्ति को धिक्कारते एवं उज्छवृत्ति ( खेत से अन्न बीनने ) की प्रशंसा करते हुए उन्होंने पुत्री सहितअपना घर छोड़ दिया।
वृषपर्वा तमाज्ञाय प्रत्यनीकविवक्षितम् ।
गुरुं प्रसादयन्मूर्धश्न पादयो: पतित: पश्चि ॥
२६॥
वृषपर्वा--असुरों का राजा; तम् आज्ञाय--शुक्राचार्य का मन्तव्य समझकर; प्रत्यगीक--कोई शाप; विवक्षितम्--कहने की इच्छाकरते हुए; गुरुम्-गुरु शुक्राचार्य को; प्रसादयत्--तुरन्त प्रसन्न कर लिया; मूर्ध्ना--अपने सिर से; पादयो:--चरणों पर; पतित:--गिरपड़ा; पथि--मार्ग पर।
राजा वृषपर्वा समझ गया कि शुक्राचार्य उसे प्रताड़ित करने या शाप देने आ रहे हैं।
फलस्वरूप,इसके पूर्व कि शुक्राचार्य उसके महल में आयें, वृषपर्वा बाहर आ गया और मार्ग में ही अपने गुरु केचरणों पर गिर पड़ा तथा उनके रोष को रोकते हुए उन्हें प्रसन्न कर लिया।
क्षणार्धमन्युर्भगवान्शिष्य॑ व्याचष्ट भार्गव: ।
कामोउस्या: क्रियतां राजन्नैनां त्यक्तुमिहोत्सहे ॥
२७॥
क्षण-अर्ध--कुछ ही क्षण; मन्यु:--क्रोध; भगवान्--अत्यन्त शक्तिशाली; शिष्यम्-- अपने शिष्य वृषपर्वा से; व्याचष्ट--कहा;भार्गव:--भूृगुवंशी शुक्राचार्य से; काम: --इच्छा; अस्या: --इस देवयानी की; क्रियताम्--पूरी करो; राजन्--हे राजा; न--नहीं;एनामू--इस लड़की को; त्यक्तुमू--त्यागने के लिए; इह--इस संसार में; उत्सहे--समर्थ हूँ ।
शक्तिशाली शुक्राचार्य कुछ क्षणों तक क्रुद्ध रहे, किन्तु प्रसन्न हो जाने पर उन्होंने वृषपर्वा सेकहाः हे राजन, देवयानी की इच्छा पूरी कीजिये क्योंकि वह मेरी पुत्री है और मैं इस संसार में न तोउसे छोड़ सकता हूँ न उसकी उपेक्षा कर सकता हूँ।
तथेत्यवस्थिते प्राह देवयानी मनोगतम् ।
पित्रा दत्ता यतो यास्ये सानुगा यातु मामनु ॥
२८॥
तथा इति--जब राजा वृषपर्वा ने शुक्राचार्य के प्रस्ताव को मान लिया; अवस्थिते--जब इस तरह मामला तय हो गया; प्राह--कहा;देवयानी--शुक्राचार्य की पुत्री ने; मनोगतम्--अपनी इच्छा; पित्रा--पिता द्वारा; दत्ता--दिया गया; यत:--चाहे जिस किसी को;यास्ये--मैं जाऊँगी; स-अनुगा-- अपनी सखियों सहित; यातु--जाऊँ; माम् अनु--मेरी दासी के रूप में |
शुक्राचार्य के निवेदन को सुनकर वृषपर्वा देवयानी की मनोकामना पूरी करने के लिए राजी होगया और वह उसके वबचनों की प्रतीक्षा करने लगा।
तब देवयानी ने अपनी इच्छा इस प्रकार व्यक्तकी, 'जब भी मैं अपने पिता की आज्ञा से विवाह करूँ तो मेरी सखी शर्मिष्ठा अपनी सखियों समेतमेरी दासी के रूप में मेरे साथ चले।
पित्रा दत्ता देवयान्य शर्मिष्ठा सानुगा तदा ।
स्वानां तत्सड्डटं वीक्ष्य तदर्थस्य च गौरवम् ।
देवयानीं पर्यचरत्सत्रीसहस्त्रेण दासवत् ॥
२९॥
पित्रा--पिता द्वारा; दत्ता--दी गई; देवयान्यै--देवयानी को; शर्मिष्ठा--वृषपर्वा की पुत्री; स-अनुगा--अपनी सखियों सहित; तदा--उस समय; स्वानाम्--अपनी; तत्--वह; सड्डूटम्--कठिन परिस्थिति को; वीक्ष्य--देखकर; तत्--उससे; अर्थस्य--लाभ का; च--भी; गौरवम्ू--महानता; देवयानीम्ू--देवयानी को; पर्यचरत्--सेवा की; स्त्री-सहस्त्रेण--अन्य हजारों स्त्रियों सहित; दास-वत्--दासीके समान।
वृषपर्वा ने बुद्धिमानी के साथ सोचा कि शुक्राचार्य की अप्रसन्नता से संकट आ सकता है औरउनकी प्रसन्नता से भौतिक लाभ प्राप्त हो सकता है।
अतएव उसने शुक्राचार्य का आदेश शिरोधार्यकिया और दास की तरह उनकी सेवा की।
उसने अपनी पुत्री शर्मिष्ठा को देवयानी को सौंप दिया औरशर्मिष्ठा ने अपनी अन्य हजारों सखियों सहित दासी की तरह उसकी सेवा की।
नाहुषाय सुतां दत्त्वा सह शर्मिष्ठयोशना ।
तमाह राजज्छर्मिष्ठामाधास्तल्पे न कहिंचित् ॥
३०॥
नाहुषाय--नहुष के पुत्र ययाति को; सुताम्--पुत्री; दत्त्ता--विवाह में देकर; सह--साथ; शर्मिष्ठया--वृषपर्वा की पुत्री तथा देवयानीकी दासी शर्मिष्ठा के; उशना--शुक्राचार्य ने; तमू--उस ( राजा से )) आह--कहा; राजनू्--हे राजा; शर्मिष्ठाम्--वृषपर्वा की पुत्रीशर्मिष्ठा को; आधा: --अनुमति दें; तल्पे--अपने बिस्तर में; न--नहीं; कह्िंचित्ू--कभी भी |
जब शुक्राचार्य ने देववानी का विवाह ययाति से कर दिया तो उसने शर्मिष्ठा को भी उसके साथजाने दिया लेकिन राजा को चेतावनी दी 'हे राजन, इस शर्मिष्ठा को कभी अपनी सेज में अपने साथशयन करने की अनुमति मत देना।
विलोक्यौशनसीं राजज्छर्मिष्ठा सुप्रजां क्वचित् ।
तमेव वत्रे रहसि सख्या: पतिमृतो सती ॥
३१॥
विलोक्य--देखकर; औशनसीम्-शुक्राचार्य की पुत्री देवयानी को; राजन्--हे राजा परीक्षित; शर्मिष्ठा--वृषपर्वा की पुत्री ने; सु-प्रजाम्ू--सुन्दर सन््तान वाली; क्वचित्--किसी समय; तम्--उस ( राजा ययाति ) से; एव--निस्सन्देह; वब्रे--प्रार्थना की; रहसि--एकान्त में; सख्या:--अपनी सखी के; पतिम्--पति को; ऋतौ--उपयुक्त समय पर; सती--उस स्थिति में रहकर।
हे राजा परीक्षित, देवयानी के सुन्दर पुत्र को देखकर एक बार शर्मिष्ठा संभोग के लिए उचितअवसर पर राजा ययाति के पास पहुँची।
उसने एकान्त में अपनी सखी देवयानी के पति राजा ययातिसे प्रार्थना की कि उसे भी पुत्रवती बनायें।
राजपुत्र्यार्थितो उपत्ये धर्म चावेक्ष्य धर्मवित् ।
स्मरज्छुक्रवच: काले दिष्टमेवाभ्यपद्मयत ॥
३२॥
राज-पुत्रया--शर्मिष्ठा से जो एक राजा की पुत्री थी; अर्थित:--अनुरोध किए जाने पर; अपत्ये--पुत्र लाभ के लिए; धर्मम्--धर्म को;च--भी; अवेक्ष्य--विचार करके; धर्म-वित्-- धर्म का ज्ञाता; स्मरन्ू--स्मरण करते हुए; शुक्र-वच: --शुक्राचार्य की चेतावनी;काले--समय पर; दिष्टमू--संयोगवश; एब--निस्सन्देह; अभ्यपद्यत--( शर्मिष्ठा की इच्छा पूरी करने के लिए )
स्वीकार कर लियाजब राजकुमारी शर्मिष्ठा ने राजा ययाति से पुत्र के लिए याचना की तो अपने धर्म से अवगत राजाउसकी इच्छा पूरी करने के लिए राजी हो गया।
यद्यपि उसे शुक्राचार्य की चेतावनी स्मरण थी, किन्तुइस मिलन को परमेश्वर की इच्छा मानकर उसने शर्मिष्ठा के साथ संभोग किया।
यदुं च तुर्वसुं चैव देवयानी व्यजायत ।
ब्रुह्मूं चानुं च पूरुं च शर्मिष्ठा वार्षपर्वणी ॥
३३॥
यदुम्--यदु को; च--तथा; तुर्वसुम्-तुर्वसु को; च एबव--तथा; देवयानी--देवयानी ने; व्यजायत--जन्म दिया; बद्ुह्मुम्--द्रु्मु को;च--तथा; अनुम्ू-- अनु को; च--भी; पूरुम्-पुरु को; च--भी; शर्मिष्ठा--शर्मिष्ठा ने; वार्षपर्वणी--वृषपर्वा की पुत्री |
देवयानी ने यदु तथा तुर्वसु को जन्म दिया और शर्मिष्ठा ने द्रह्मयु, अनु तथा पुरु को जन्म दिया।
गर्भसम्भवमासूर्या भर्तुर्विज्ञाय मानिनी ।
देवयानी पितुर्गेह ययौ क्रोधविमूर्छिता ॥
३४॥
गर्भ-सम्भवम्--गर्भ-धारण; आसुर्या:--शर्मिष्ठा का; भर्तु:--अपने पति से सम्भव बनाया गया; विज्ञाय--जानकर ( ब्राह्मणज्योतिषियों से ); मानिनी--अत्यन्त गर्वीली; देवयानी--शुक्राचार्य की पुत्री; पितु:--अपने पिता के; गेहम्--घर को; ययौ--गई;क्रोध-विमूछिता--क्रोध से मूर्छित।
जब गर्वीली देवयानी बाहरी स्त्रोतों से जान गई कि शर्मिष्ठा उसके पति से गर्भवती हुई है तो वहक्रोध से मूछित हो उठी और वह अपने पिता के घर ( मायके ) चली गई।
प्रियामनुगतः कामी वचोभिरुपमन्त्रयन् ।
न प्रसादयितुं शेके पादसंवाहनादिभि: ॥
३५॥
प्रियामू--अपनी प्रियतमा के; अनुगत: --पीछे -पीछे जाकर; कामी --अत्यन्त विषयी; वचोभि:--शब्दों से; उपमन्त्रयन्ू--खुश करने;न--नहीं; प्रसादयितुम््--प्रसन्न करने के लिए; शेके--समर्थ था; पाद-संवाहन-आदिभि:--उसके पाँव दबाकर के भी |
चूँकि राजा ययाति अत्यन्त विषयी था अतएवं वह अपनी पतली के पीछे-पीछे हो लिया।
उसनेउसे पकड़ कर मीठे शब्द कहे तथा उसके पाँव दबाकर उसे प्रसन्न करने का प्रयास किया, किन्तु वहउसे किसी भी तरह मना न पाया।
शुक्रस्तमाह कुपितः स्त्रीकामानृतपूरुष ।
त्वां जरा विशतां मन्द विरूपकरणी नृणाम् ॥
३६॥
शुक्र:--शुक्राचार्य; तमू--उस ( राजा ययाति ) से; आह--बोला; कुपित:--उस पर क्रुद्ध होकर; स्त्री-काम--स्त्रियों से विषय-भोगकी इच्छा करने वाले; अनृत-पूरुष--हे झूठे व्यक्ति; त्वामू--तुमको; जरा--वृद्धावस्था, अशक्तता; विशताम्-- प्रवेश करे; मन्द-- ओरेमूर्ख; विरूप-करणी--कुरूप बनाने वाली; नृणाम्--मनुष्यों के शरीरों को |
शुक्राचार्य अत्यन्त क्रुद्ध थे।
उन्होंने कहा, 'आरे झूठे! मूर्ख! स्त्रीकामी! तुमने बहुत बड़ी गलतीकी है।
अतएव मैं शाप देता हूँ कि तुम पर बुढ़ापा तथा अशक्तता का आक्रमण हो जिससे तुम कुरूपबन जाओ।
रीययातिरुवाचअतृप्तोस्म्यद्य कामानां ब्रह्मन्दुहितरि सम ते ।
व्यत्यस्यतां यथाकामं वयसा योउभिधास्यति ॥
३७॥
श्री-ययाति: उवाच--राजा ययाति ने कहा; अतृप्त:--असंतुष्ट; अस्मि--मैं हूँ; अद्य--आज तक; कामानाम्--अपनी विषयवासनाओंको तृप्त करने के लिए; ब्रह्मनू--हे विद्वान ब्राह्मण; दुहितरि--पुत्री के सम्बन्ध में; स्म-- भूतकाल में; ते--तुम्हारी; व्यत्यस्थताम्--आदान-प्रदान करो; यथा-कामम्--जब तक तुम विषयी हो; वयसा--युवावस्था ( जवानी ) से; यः अभिधास्यति--जो तुम्हारीवृद्धावस्था से अपनी युवावस्था को बदलने के लिए इच्छुक हो।
राजा ययाति ने कहा : 'हे विद्वान पूज्य ब्राह्मण, अभी भी तुम्हारी पुत्री के साथ मेरी कामेच्छाएँपूरी नहीं हुईं।
तब शुक्राचार्य ने उत्तर दिया, 'चाहो तो तुम अपने बुढ़ापे को किसी ऐसे व्यक्ति सेबदल लो जो तुम्हें अपनी युवावस्था देने को तैयार हो।
इति लब्धव्यवस्थान: पुत्र ज्येष्ठगवोचत ।
यदो तात प्रतीच्छेमां जरां देहि निजं वयः ॥
३८॥
इति--इस प्रकार; लब्ध-व्यवस्थान: --अपना बुढ़ापा बदलने का अवसर पाकर; पुत्रम्ू--अपने बेटे से; ज्येष्टमू--सबसे बड़े;अवोचत--प्रार्थना की; यदो--हे यदु; तात--तुम मेरे प्रिय पुत्र हो; प्रतीच्छ--बदल लो; इमाम्--इस; जराम्ू--बुढ़ापे को, अशक्तताको; देहि--तथा दे दो; निजम्ू--अपनी; वयः--जवानी
जब ययाति को शुक्राचार्य से यह वर प्राप्त हो गया तो उसने अपने सबसे बड़े पुत्र से अनुरोधकिया, 'हे पुत्र यदु, तुम मेरी वृद्धावस्था तथा अशक्तता के बदले में मुझे अपनी जवानी दे दो।
'मातामहकृतां वत्स न तृप्तो विषयेष्वहम् ।
वयसा भवदीयेन रंस्थे कतिपया: समा: ॥
३९॥
मातामह-कृताम्--तुम्हारे नाना शुक्राचार्य द्वारा प्रदत्त; वत्स--मेरे बेटे; न--नहीं; तृप्त: --सन्तुष्ट; विषयेषु--विषयी जीवन में,इन्द्रियतृप्ति में; अहम्--मैं; वयसा--उप्र से; भवदीयेन--तुम्हारी; रंस्थे--विषयभोग का आनन्द लूँगा; कतिपया:--कुछ; समा: --वर्ष,'हे पुत्र मैं अपनी विषयेच्छाओं से अभी भी तुष्ट नहीं हो पाया।
किन्तु यदि तुम मुझ पर दयाकरो तो अपने नाना द्वारा प्रदत्त बुढ़ापे को ले सकते हो तथा अपनी जवानी मुझे दे सकते हो जिससे मैंकुछ वर्ष और जीवन का भोग कर लूँ।
श्रीयदुरुवाचनोत्सहे जरसा स्थातुमन्तरा प्राप्तया तव ।
अविदित्वा सुख ग्राम्यं वैतृष्ण्यं नैति पूरुष: ॥
४०॥
श्री-यदुः उवाच--ययाति के उ्येष्ठ पुत्र यदु ने उत्तर दिया; न उत्सहे--मैं उत्सुक नहीं हूँ; जरसा--आपके बुढ़ापे तथा अशक्तता से;स्थातुमू--रहने के लिए; अन्तरा--जवानी में; प्राप्तया--स्वीकार किया हुआ; तबव--आपका; अविदित्वा--बिना अनुभव किये;सुखम्--सुख; ग्राम्यम्-- भौतिक या शारीरिक; वैतृष्ण्यम्-- भौतिक सुख से विरक्ति; न--नहीं; एति--प्राप्त करता है; पूरुष:--व्यक्ति
यदु ने उत्तर दिया: हे पिताजी, यद्यपि आप भी तरुण पुरुष थे, किन्तु आपने वृद्धावस्था प्राप्त करली है।
किन्तु मुझे आपका बुढ़ापा तथा जर्जरता तनिक भी मान्य नहीं है क्योंकि भौतिक सुख काभोग किये बिना कोई विरक्ति प्राप्त नहीं कर सकता।
तुर्वसुश्चोदितः पित्रा द्रह्मुश्नानुश्न भारत ।
प्रत्याचख्युरधर्मज्ञा ह्मानित्ये नित्यबुद्धयः ॥
४१॥
तुर्वसु:--तुर्वसु, दूसरा पुत्र; चोदित:--निवेदन किये जाने पर; पित्रा--पिता द्वारा ( बुढ़ापे और अशक्तता को जवानी से बदलने केलिए ); ब्रह्मु:--ह्ुह्मु एक और पुत्र; च--तथा; अनुः--एक और पुत्र अनु ने; च-- भी; भारत--हे राजा परीक्षित; प्रत्याचख्यु:--माननेसे मना कर दिया; अधर्म-ज्ञा:--धर्म के सिद्धान्तों को न जानने वाले; हि--निस्सन्देह; अ-नित्ये--नाशवान जवानी; नित्य-बुद्धय: --नित्य मानकर।
हे महाराज परीक्षित, ययाति ने इसी तरह अन्य पुत्रों सेतुर्वसु, द्रुह्मु तथा अनु से वृद्धावस्था केबदले अपनी जवानी देने के लिए निवेदन किया लेकिन वे सभी अधर्मज्ञ थे इसलिए उन्होंने सोचा किउनकी नाशवान जवानी शाश्वत है अतएव उन्होंने अपने पिता के आदेश को मानने से मना कर दिया।
अपृच्छत्तनयं पूरुं बयसोनं गुणाधिकम् ।
न त्वमग्रजदद्वत्स मां प्रत्याख्यातुमहसि ॥
४२॥
अपृच्छत्ू--निवेदन किया; तनयम्--पुत्र; पूरुमू--पूरु से; बबसा--आयु से; ऊनम्--यद्यपि कम; गुण-अधिकम्--किन्तु गुणों मेंअन्यों से बढ़कर; न--नहीं; त्वमू-तुम; अग्रज-वत्--अपने बड़े भाइयों के समान; वत्स-हे पुत्र; माम्--मुझको; प्रत्याख्यातुम्--मना करना; अहसि--चाहिए।
तत्पश्चात् राजा ययाति ने पूरु से, जो अपने इन तीनों भाइयों से उम्र में छोटा था किन्तु अधिकयोग्य था, इस तरह निवेदन किया, 'हे पुत्र, तुम अपने बड़े भाइयों की तरह अवज्ञाकारी मत बनोक्योंकि यह तुम्हारा कर्तव्य नहीं है।
'श्रीपूररुवाचको नु लोके मनुष्येन्द्र पितुरात्मकृत: पुमान् ।
प्रतिकर्तु क्षमो यस्य प्रसादाद्विन्दते परम् ॥
४३ ॥
श्री-पूर:ः उवाच--पूरु ने कहा; कः--क्या; नु--निस्सन्देह; लोके --इस संसार में; मनुष्य-इन्द्र--मनुष्यों में श्रेष्ठ, हे महाराज; पितु:--पिता; आत्म-कृतः --इस शरीर को देने वाले; पुमान्--व्यक्ति; प्रतिकर्तुमु--चुकता करने के लिए; क्षम:--समर्थ है; यस्थय--जिसकी;प्रसादातू--कृपा से; विन्दते-- भोगता है; परम्-- श्रेष्ठ जीवन
पूरु ने उत्तर दिया, 'हे महाराज, ऐसा कौन होगा जो अपने पिता के ऋण से उऋण हो सके ?
पिता की ही कृपा से मनुष्य को मनुष्य-जीवन प्राप्त होता है जिससे वह भगवान् का संगी बनने मेंसक्षम हो सकता है।
उत्तमश्रिन्तितं कुर्याव्प्रोक्तकारी तु मध्यम: ।
अधमो श्रद्धया कुर्यादकर्तोच्चरितं पितु: ॥
४४॥
उत्तम:--सर्व श्रेष्ठ; चिन्तितम्ू--पिता के विचार को मानते हुए; कुर्यात्--तदनुसार कर्म करता है; प्रोक्त-कारी --जो अपने पिता केआदेशानुसार कार्य करता है; तु--निस्सन्देह; मध्यम:--बीच की कोटि के; अधम:--निम्न श्रेणी के; अश्रद्धया-- श्रद्धाविहीन;कुर्यातू-करता है; अकर्ता--न करने की इच्छा से युक्त; उच्चरितम्--मल के समान; पितु:--पिता के
जो पुत्र अपने पिता की इच्छा को जानकर उसी के अनुसार कर्म करता है वह प्रथम श्रेणी का( उत्तम ) होता है; जो अपने पिता की आज्ञा पाकर कार्य करता है वह द्वितीय श्रेणी का ( मध्यम )होता है और जो पुत्र अपने पिता के आदेश का पालन अनादरपूर्वक करता है वह तृतीय श्रेणीका( अधम ) होता है।
किन्तु जो पुत्र अपने पिता की आज्ञा का उल्लंघन करता है वह अपने पिता के मलके समान है।
'इति प्रमुद्तः पूरु: प्रत्यगृह्माज्जरां पितु: ।
सोपि तद्बयसा कामान्यथावज्नुजुषे नूप ॥
४५॥
इति--इस तरह; प्रमुदित:--अत्यन्त हर्षित; पूर:--पूरु ने; प्रत्यगृह्ञात्--स्वीकार कर लिया; जराम्--वृद्धावस्था को; पितु:--पिताकी; सः--उस पिता ने; अपि-- भी; तत्ू-वयसा--अपने पुत्र की जवानी से; कामान्--सारी इच्छाओं को; यथा-वत्--आवश्यकतानुसार; जुजुषे--तुष्य किया; नूप--हे महाराज परीक्षित।
शुकदेव गोस्वामी ने कहा: हे महाराज परीक्षित, इस तरह पूरु अपने पिता ययाति की वृद्धावस्थाको ग्रहण करके अत्यन्त हर्षित था।
पिता ने अपने पुत्र की जवानी ग्रहण कर ली और फिरइच्छानुसार इस भौतिक जगत का भोग किया।
सप्तद्वीपपति: संयक्पितृवत्पालयन्प्रजा: ।
यथोपजोषं विषयाझ्ञुजुषेउव्याहतेन्द्रिय: ॥
४६॥
सप्त-द्वीप-पति:--सात द्वीपों वाले समस्त विश्व का स्वामी; संयक्--पूरी तरह; पितृ-वत्--पिता के समान; पालयन्--शासन करतेहुए; प्रजा: --प्रजा; यथा-उपजोषम्--जी भरकर; विषयान्-- भौतिक सुख को; जुजुषे-- भोगा; अव्याहत--किसी व्यवधान के बिना;इन्द्रियः--अपनी इन्द्रियों को |
तत्पश्चात् राजा ययाति सात द्वीपों वाले विश्व का शासक बन गया और प्रजा पर पिता के समानशासन करने लगा।
चूँकि उसने अपने पुत्र की जवानी ले ली थी अतएवं उसकी इन्द्रियाँ अक्षत थींऔर उसने जी भरकर भौतिक सुख का भोग किया।
देवयान्यप्यनुदिनं मनोवाग्देहवस्तुभि: ।
प्रेयस: परमां प्रीतिमुवाह प्रेयसी रह: ॥
४७॥
देवयानी--महाराज ययाति की पत्नी, शुक्राचार्य की बेटी ने; अपि-- भी; अनुदिनम्ू--दिन प्रति दिन, चौबीसों घंटे; मनः-वाक्--अपने मन तथा वाणी; देह--शरीर; वस्तुभि:--सारी आवश्यक वस्तुओं से; प्रेयस:-- अपने प्रिय पति का; परमाम्--दिव्य; प्रीतिम्--आनन्द; उवाह--सम्पन्न किया; प्रेयसी --अपने पति की अत्यन्त प्यारी; रह:--एकान्त में, बिना किसी उत्पात के |
महाराज ययाति की प्रेयसी देवयानी अपने मन, वचन, शरीर तथा विविध सामग्री से सदैवएकान्त में अपने पति को यथासम्भव दिव्य परमानन्द प्रदान करती रही।
अयजद्चन्नपुरुषं क्रतुभिर्भूरिदक्षिणै: ।
सर्वदेवमयं देवं सर्ववेदमयं हरिम् ॥
४८ ॥
अयजत्--पूजा की; यज्ञ-पुरुषम्--यज्ञपुरुष या भगवान् की; क्रतुभि: --विविध यज्ञों द्वारा; भूरि-दक्षिणै:--ब्राह्मणों को प्रभूतदक्षिणा देकर; सर्व-देव-मयम्--सारे देवताओं के आगार; देवम्--परमे श्वर को; सर्व-वेद-मयम्--सारे वैदिक ज्ञान के परम लक्ष्य;हरिम्-- भगवान् हरि को |
राजा ययाति ने विविध यज्ञ सम्पन्न किये और उनमें उन्होंने समस्त देवताओं के आगार एवं समस्तवैदिक ज्ञान के लक्ष्य भगवान् हरि को तुष्ट करने के लिए ब्राह्मणों को प्रचुर दक्षिणाएँ दीं।
यस्मिन्निदं विरचितं व्योम्नीव जलदावलिः ।
नानेव भाति नाभाति स्वप्ममायामनोरथ: ॥
४९॥
यस्मिनू--जिसमें; इृदम्--यह पूरा विशाल जगत; विरचितम्--उत्पन्न; व्योग्नि-- आकाश में; इब--सहृ॒श; जलद-आवलि:--बादल;नाना इव-मानों विभिन्न प्रकार के; भाति--प्रकट होता है; न आभाति-- प्रकट नहीं होता है; स्वप्न-माया--मोह जो स्वप्न की तरहहै; मनः-रथ:ः--मन रूपी रथ द्वारा चलने वाला।
भगवान् वासुदेव, जिन्होंने विराट जगत की सृष्टि की है, अपने को सर्वव्यापक रूप में प्रकटकरते हैं जिस तरह आकाश बादलों को धारण करता है।
जब इस सृष्टि का संहार हो जाता है तबसारी वस्तुएँ भगवान् विष्णु में प्रवेश करती हैं और सारे भेद-प्रभेद समाप्त हो जाते हैं।
तमेव हृदि विन्यस्य वासुदेवं गुहाशयम् ।
नारायणमणीयांसं निराशीरयजत्प्रभुम्ू ॥
५०॥
तम् एब--उसको ही; हृदि--हृदय में; विन्यस्थ--रखकर; वासुदेवम्-- भगवान् वासुदेव को; गुह-आशयम्--सबके हृदय में विद्यमानरहने वाले; नारायणम्--नारायण या नारायण के अंश को; अणीयांसम्--सर्वत्र उपस्थित रहकर भी आँखों से अहृश्य; निराशी:--बिना किसी भौतिक इच्छा के ययाति ने; अयजत्--पूजा की; प्रभुम्--परमे श्वर की
महाराज ययाति ने उन भगवान् की निष्काम भाव से पूजा की जो हर एक के हृदय में नारायणरूप में स्थित हैं और सर्वत्र विद्यमान रहकर भी आँखों से अदृश्य रहते हैं।
एवं वर्षसहस्त्राणि मन:षष्टैर्मन:सुखम् ।
विदधानोपि नातृप्यत्सार्वभौम: कदिन्द्रिय: ॥
५१॥
एवम्--इस तरह से; वर्ष-सहस्त्राणि--एक हजार वर्षों तक; मनः-षष्ठे:--पाँच ज्ञानेन्द्रियों तथा मन के द्वारा; मनः-सुखम्--मन द्वाराउत्पन्न क्षणक सुख; विद्धान:--सम्पन्न करते हुए; अपि--यद्यपि; न अतृप्यत्--संतुष्ट नहीं हुए; सार्ब-भौम: --सारे जगत का राजाहोकर भी; कत्ू-इन्द्रियः -- अशुद्ध इन्द्रियों के कारण
यद्यपि महाराज ययाति सारे विश्व के राजा थे और उन्होंने एक हजार वर्षो तक अपने मन तथापाँच इन्द्रियों को भौतिक सम्पत्ति को भोगने में लगाया, किन्तु वे सन्तुष्ट नहीं हो सके।
