19.आध्यात्मिक ज्ञान की पूर्णता
श्रीभगवानुवाचयो विद्याश्रुतसम्पन्न: आत्मवान्नानुमानिक: ।मयामात्रमिदं ज्ञात्वा ज्ञानं च मयि सन्न्यसेत् ॥
१॥
श्री-भगवान् उवाच-- भगवान् ने कहा; य:--जो; विद्या--अनुभूत ज्ञान से; श्रुत--तथा प्रारम्भिक शास्त्रीय ज्ञान से; सम्पन्न:--युक्त; आत्म-वान्--स्वरूपसिद्ध; न--नहीं; आनुमानिक: --निर्विशेष चिन्तन में संलग्न; माया--मोह; मात्रमू--एकमात्र;इदम्--यह ब्रह्माण्ड; ज्ञात्वा--जान कर; ज्ञानम्--ऐसा ज्ञान तथा उसे प्राप्त करने के साधन; च-- भी; मयि-- मुझमें;सन्न्यसेत्--आत्मसमर्पण करे, शरण ग्रहण करे।
भगवान् ने कहा : जिस स्वरूपसिद्ध व्यक्ति ने प्रकाश पाने तक शास्त्रीय ज्ञान का अनुशीलनकिया है और जो भौतिक ब्रह्माण्ड को मात्र मोह समझ कर, निर्विशेष चिन्तन से मुक्त होता है,उसे चाहिए कि वह उस ज्ञान को तथा उसे प्राप्त करने वाले साधनों को मुझे समर्पित कर दे।
ज्ञानिनस्त्वहमेवेष्ट: स्वार्थों हेतुश्न सम्मतः ।स्वर्गश्नैवापवर्गश्व नान्योर्थों महते प्रियः ॥
२॥
ज्ञानिन:--विद्वान स्वरूपसिद्ध दार्शनिक का; तु--निस्सन्देह; अहम्--मैं; एब--एकमात्र; इष्ट:--पूजा की वस्तु; स्व-अर्थ: --वांछित जीवन-लक्ष्य; हेतु:--जीवन-लक्ष्य प्राप्त करने के लिए साधन; च--भी; सम्मत:--नश्विति मत; स्वर्ग:--स्वर्ग जाने केसारे सुख का कारण; च--भी; एव--निस्सन्देह; अपवर्ग:--सारे दुख से मुक्ति; च-- भी; न--नहीं; अन्य: --कोई दूसरा;अर्थ: --उद्देश्य; मत्--मुझको; ऋते--रहित; प्रिय: --प्रिय वस्तु
विद्वान स्वरूपसिद्ध दार्शनिकों के लिए मैं एकमात्र पूजा का लक्ष्य, इच्छित जीवन-लक्ष्य,उस लक्ष्य को प्राप्त करने का साधन तथा समस्त ज्ञान का निश्चित मत हूँ। चूँकि मैं उनके सुखका तथा दुख से विमुक्ति का कारण हूँ, अतः ऐसे विद्वान व्यक्ति एकमात्र मुझे ही जीवन काप्रभावशाली उद्देश्य या प्रिय लक्ष्य बनाते हैं।
ज्ञानविज्ञानसंसिद्धाः पद श्रेष्ठ विदुर्मम ।ज्ञानी प्रियतमोतो मे ज्ञानेनासौ बिभर्ति माम् ॥
३॥
ज्ञान--शाल्त्रीय ज्ञान; विज्ञान--तथा अनुभूत आध्यात्मिक ज्ञान में; संसिद्धा:--परम पूर्ण; पदम्--चरणकमल; श्रेष्ठम्-- श्रेष्ठवस्तु; विदु:--जानते हैं; मम--मेरा; ज्ञानी--विद्वान योगी; प्रिय-तम:--सर्वाधिकप्रिय; अतः --इस तरह; मे--मुझको;ज्ञानेन--आध्यात्मिक ज्ञान द्वारा; असौ--वह विद्वान पुरुष; बिभर्ति-- धारण करता है ( सुख में ); मामू--मुझको |
जिन्होंने दार्शनिक तथा अनुभूत ज्ञान द्वारा पूर्ण सिद्धि प्राप्त कर ली है, वे मेरे चरणकमलोंको परम दिव्य वस्तु मानते हैं। इस प्रकार का विद्वान योगी मुझे अत्यन्त प्रिय होता है और इसपूर्ण ज्ञान से वह मुझे सुख में धारण किये रखता है।
तपस्तीर्थ जपो दान पवित्राणीतराणि च ।नालं कुर्वन्ति तां सिद्धि या ज्ञाककललया कृता ॥
४॥
तपः--तपस्या; तीर्थम्--तीर्थस्थान जाकर; जपः--मौन प्रार्थना करके; दानम्--दान; पवित्राणि--पुण्य कार्य; इतराणि--अन्य; च-- भी; न--नहीं; अलम्--उसी स्तर तक; कुर्वन्ति--प्रदान करते हैं; तामू--यह; सिद्द्विमू--सिद्धि; या--जो; ज्ञान--आध्यात्मिक ज्ञान; कलया--एक अंश; कृता--पुरस्कृत किया जाता है।
जो सिद्धि आध्यात्मिक ज्ञान के एक अंशमात्र से उत्पन्न होती है, वह तपस्या करने,तीर्थस्थानों में जाने, मौन प्रार्थना करने, दान देने अथवा अन्य पुण्यकर्मो में लगने से प्राप्त नहींकी जा सकती।
तस्माज्ज्ञानेन सहितं ज्ञात्वा स्वात्मानमुद्धव ।ज्ञानविज्ञानसम्पन्नो भज मां भक्तिभावतः ॥
५॥
तस्मात्--इसलिए; ज्ञानेन--ज्ञान; सहितम्--सहित; ज्ञात्वा--जान कर; स्व-आत्मानम्--अपने आप को; उद्धव--हे उद्धव;ज्ञान--वैदिक ज्ञान; विज्ञान--तथा स्पष्ट अनुभूति से; सम्पन्न:--युक्त; भज--पूजा करो; माम्--मेरी; भक्ति-- प्रेमाभक्ति के;भावतः--भाव में |
इसलिए हे उद्धव, तुम ज्ञान के द्वारा अपने वास्तविक आत्मा को जानो। तत्पश्चात् अपनेवैदिक ज्ञान की स्पष्ट अनुभूति से आगे बढ़ते हुए प्रेमाभक्ति भाव से मेरी पूजा करो।
ज्ञानविज्ञानयज्ञेन मामिष्टात्मानमात्मनि ।सर्वयज्ञपतिं मां वै संसिद्धि मुन॒योगमन् ॥
६॥
ज्ञान--वैदिक ज्ञान; विज्ञान--तथा आध्यात्मिक प्रबुद्धता का; यज्ञेन--यज्ञ द्वारा; मामू--मुझको; इष्टा--पूज कर; आत्मानम्--प्रत्येक व्यक्ति के हृदय के भीतर परमेश्वर को; आत्मनि--अपने भीतर; सर्व--समस्त; यज्ञ--यज्ञों के; पतिम्ू-- स्वामी; माम्--मुझ को; बै--निश्चय ही; संसिद्धिमू--परम सिद्धि; मुन॒यः--मुनिगण; अगमन्--प्राप्त किया।
पुराकाल में बड़े बड़े मुनि वैदिक ज्ञान तथा आध्यात्मिक प्रबुद्धता रूपी यज्ञ के द्वारा यहजानते हुए अपने अन्तःकरण में मेरी पूजा करते थे कि मैं ही समस्त यज्ञों का परमेश्वर तथा प्रत्येकहृदय में परमात्मा हूँ। इस तरह मेरे पास आने से इन मुनियों ने परम सिद्धि प्राप्त की।
त्वय्युद्धवा श्रयति यस्त्रिविधो विकारोमायान्तरापतति नाह्पवर्गयोर्यत् ।जन्मादयोस्य यदमी तव तस्य किं स्यु-राह्मन्तयोर्यद्सतोस्ति तदेव मध्ये ॥
७॥
त्वयि--तुममें; उद्धव--हे उद्धव; आश्रयति--प्रवेश करके रहता जाता है; यः--जो; त्रि-विध: --गुणों के अनुसार तीन विभाग;विकार:--( शरीर तथा मन जिनसे प्रभावित होते हैं ऐसे ) निरन्तर रूपान्तर; माया--मोह; अन्तरा--वर्तमान समय में;आपतति--सहसा प्रकट होता है; न--नहीं; आदि--प्रारम्भ में; अपवर्गयो:ः--न तो अन्त में; यत्--चूँकि; जन्म--जन्म;आदय: --इत्यादि ( वृद्धि, जन्म, पालन, जरा, मृत्यु); अस्य--शरीर का; यत्--जब; अमी --ये; तव--तुम्हारे सम्बन्ध में;तस्य--आध्यात्मिक प्रकृति के सम्बन्ध में; किमू--क्या सम्बन्ध; स्यु:--हो सकते हैं; आदि--प्रारम्भ में; अन्तयो: --तथा अन्तमें; यत्--चूँकि; असत:ः--जिसका अस्तित्व नहीं है उसका; अस्ति--अस्तित्व है; तत्ू--वह; एब--निस्सन्देह; मध्ये--मध्य में,सम्प्रति।
हे उद्धव, प्रकृति के तीन गुणों से निर्मित भौतिक शरीर तथा मन तुमसे लिपटे रहते हैं,किन्तु, वास्तव में, वे माया हैं क्योंकि वे वर्तमान काल में ही प्रकट होते हैं। इनका कोई आदि याअन्त नहीं है। इसलिए यह कैसे सम्भव हो सकता है कि शरीर की विभिन्न अवस्थाएँ--यथाजन्म, वृद्धि, प्रजनन, पालन, जरा तथा मृत्यु--तुम्हारी नित्य आत्मा से कोई सम्बन्ध रखते हों?इन अवस्थाओं का सम्बन्ध एकमात्र भौतिक देह से है, जिसका न तो इसके पूर्व अस्तित्व थाऔर न रहेगा। शरीर केवल वर्तमान काल में ही रहता श्रीउद्धव उवाच ज्ञानं विशुद्धं विपुलं यथेत-द्वैराग्यविज्ञानयुतं पुराणम् ।आख्याहि विश्वेश्वर विश्वमूर्तेत्वद्धक्तियोगं च महद्विमृग्यम् ॥
८ ॥
श्री-उद्धवः उबाच-- श्री उद्धव ने कहा; ज्ञानम्ू--ज्ञान; विशुद्धम्--दिव्य; विपुलम्--विस्तृत; यथा--जिस तरह; एतत्--यह;वैराग्य--विरक्ति; विज्ञान--तथा सत्य की प्रत्यक्ष अनुभूति; युतम्--से युक्त; पुराणम्--महान् दार्शनिकों के मध्य परम्परागत;आख्याहि--कृपा करके बतलायें; विश्व-ईश्वर--हे ब्रह्माण्ड के स्वामी; विश्व-मूर्ते--हे ब्रह्माण्ड के रूप; त्वत्--तुम्हारे प्रति;भक्ति-योगमू-प्रेमाभक्ति; च-- भी; महत्--महान् आत्माओं द्वारा; विमृग्यम्ू--खोजे जाते।
श्री उद्धव ने कहा : हे ब्रह्माण्ड के स्वामी, हे ब्रह्माण्ड स्वरूप, कृपा करके मुझे ज्ञान की वहविधि बतलाइये जो स्वत: विरक्ति तथा सत्य की प्रत्यक्ष अनुभूति लाने वाली है, जो दिव्य है औरमहान् आध्यात्मिक दार्शनिकों में परम्परा से चली आ रही है। महापुरुषों द्वारा खोजा जाने वालायह ज्ञान आपके प्रति प्रेमाभक्ति को बताने वाला है।
तापत्रयेणाभिहतस्य घोरेसन्तप्यमानस्य भवाध्वनीश ।'पश्यामि नान्यच्छरणं तवाडूप्रि-इन्द्दातपत्रादमृताभिवर्षात् ॥
९॥
ताप--कष्टों द्वारा; त्रयेण--तीन; अभिहतस्य---अभिभूत हुए का; घोरे--घोर; सन्तप्यमानस्थ--सताये हुए का; भव--संसारका; अध्वनि--मार्ग में; ईश--हे ईश्वर; पश्यामि--देखता हूँ; न--कोई नहीं; अन्यत्--दूसरी; शरणम्--शरण; तव--तुम्हारा;अड्प्रि--चरणकमल; द्वन्द्द--दो का; आतपत्रात्ू--छाते की अपेक्षा; अमृत--अमृत की; अभिवर्षात्--वर्षा |
हे प्रभु, जो व्यक्ति जन्म तथा मृत्यु के घोर मार्ग में सताया जा रहा है और तीनों तापों सेनिरन्तर अभिभूत रहता है, उसके लिए मुझे आपके दो चरणकमलों के अतिरिक्त अन्य कोईसम्भव आश्रय नहीं दिख रहा। ये उस सुखदायक छाते के तुल्य हैं, जो स्वादिष्ट अमृत की वर्षाकरता है।
दष्टे जनं सम्पतितं बिलेस्मिन्कालाहिना क्षुद्रसुखोरुतर्षम् ।समुद्धैनं कृपयापवर््यै-वचोभिरासिज्ञ महानुभाव ॥
१०॥
दष्टमू--काटा हुआ; जनम्--मनुष्य; सम्पतितमू--पतित; बिले--अंधेरे छेद में; अस्मिन्ू--इस; काल--समय का; अहिना--सर्प द्वारा; क्षुद्र--नगण्य; सुख--सुख; उरुू--तथा भीषण; तर्षम्--लालसा; समुद्धर--कृपया ऊपर उठा लें; एनम्ू--यहव्यक्ति; कृपया--आपकी अहैतुकी कृपा से; आपवर्ग्यं:--मोक्ष के लिए जागृत; वचोभि:--आपके शब्दों से; आसिज्ञ--सींचिये; महा-अनुभाव-ह
हे प्रभुहे सर्वशक्तिमान प्रभु, कृपा कीजिये और इस निराश जीव को, जो अंधेरे भवकूप में गिरगया है जहाँ कालरूपी सर्प ने उसे डस लिया है, ऊपर उठाइये। ऐसी गर्हित अवस्था होते हुए भी यह बेचारा जीव अत्यन्त क्षुद्र भौतिक सुख भोगने की उत्कट इच्छा से युक्त है। हे प्रभु, आपअपने उस उपदेशामृत को छिड़क कर मेरी रक्षा कीजिये, जो आध्यात्मिक मुक्ति के लिए जागृतकरने वाला है।
श्रीभगवानुवाचइत्थमेतत्पुरा राजा भीष्म॑ धर्मभूतां वरम् ।अजातशत्रुः पप्रच्छ सर्वेषां नोउनुश्रण्वताम् ॥
११॥
श्री-भगवान् उवाच-- भगवान् ने कहा; इत्थम्--इस प्रकार; एतत्--यह; पुरा--प्राचीन काल में; राजा--राजा; भीष्मम्-- भीष्मसे; धर्म--धार्मिक सिद्धान्त के; भूतामू--धारण करने वालों; वरम्-- श्रेष्ठ; अजात-शत्रु:--जिसके कोई शत्रु नहीं माना जाता,राजा युधिष्टिर, ने; पप्रच्छ--पूछा; सर्वेषामू--सबों के; नः--हम; अनुश्रृण्वताम्-ध्यानपूर्वक सुनते समय |
भगवान् ने कहा : हे उद्धव, जिस तरह तुम मुझसे पूछ रहे हो, उसी तरह भूतकाल में राजायुथिष्ठटिर ने जिन्हें अजातशत्रु कहा जाता है, धर्म के महानतम धारणकर्ता भीष्मदेव से पूछा थाऔर हम सभी ध्यानपूर्वक सुन रहे थे।
निवृत्ते भारते युद्धे सुहृन्निधनविहलः ।श्रुत्वा धर्मान्बहून्पश्चान्मोक्षधर्मानपूच्छत ॥
१२॥
निवृत्ते--समाप्त होने पर; भारते--भारत के वंशजों ( कुरुओं तथा पाण्डवों के ); युद्धे--युद्ध में; सुहृत्-- अपने प्रियशुभचिन्तकों के; निधन--विनाश से; विह्ल:--अभिभूत; श्रुत्वा--सुन कर; धर्मानू--धार्मिक नियम; बहूनू--अनेक;पश्चात्-अन्त में; मोक्ष--मोक्ष सम्बन्धी; धर्मान्--धार्मिक सिद्धान्त; अपृच्छत--पूछा |
जब कुरुक्षेत्र का महान् युद्ध समाप्त हो गया, तो राजा युधिष्ठिर अपने प्रिय हितैषियों कीमृत्यु से विहल थे। इस तरह अनेक धार्मिक सिद्धान्तों के विषय में उपदेश सुन कर, अन्त मेंउन्होंने मोक्ष-मार्ग के विषय में जिज्ञासा की थी।
तानहं तेउभिधास्थामि देवव्नरतमखाच्छुतान् ।ज्ञानवैराग्यविज्ञानश्रद्धाभक्त्युपबृंहितान्ू ॥
१३॥
तानू--उनको; अहम्--मैं; ते-- तुमसे; अभिधास्यामि--कहूँगा; देव-ब्रत-- भीष्मदेव के; मुखात्--मुख से; श्रुतान्--सुने हुए;ज्ञान--वैदिक ज्ञान; वैराग्य--विरक्ति; विज्ञान--आत्म-अनुभूति; श्रद्धा-- श्रद्धा; भक्ति--तथा भक्ति; उप-बृंहितान्--से युक्त |
अब मैं तुमसे भीष्मदेव के मुख से सुने वैदिक ज्ञान, विरक्ति, आत्म-अनुभूति, श्रद्धा तथाभक्ति के उन धार्मिक सिद्धान्तों का वर्णन करूँगा।
नवैकादश पज्ञ त्रीन्भावान्भूतेषु येन वै ।ईक्षेताथाइकमप्येषु तज्ज्ञानं मम निश्चितम् ॥
१४॥
नव--नौ; एकादश- ग्यारह; पश्च--पाँच; त्रीन्ू--तीन; भावान्--तत्त्वों को; भूतेषु--सारे जीवों ( ब्रह्मा से लेकर अचर जीवों )में; येन--जिस ज्ञान से; बै--निश्चय ही; ईक्षेत--देखे; अथ--इस प्रकार; एकम्--एक तत्त्व; अपि--निस्सन्देह; एघु--इनअट्ठाईस तत्त्वों में; तत्--वह; ज्ञानमू--ज्ञान; मम--मेरे द्वारा; निश्चितम्--निर्धारित किया गया ।
मैं स्वयं उस ज्ञान को निश्चित करता हूँ जिससे मनुष्य सारे जीवों में नौ, ग्यारह, पाँच तथातीन तत्त्वों का संमेल देखता है और अन्त में इन अट्ठाईस तत्त्वों के भीतर केवल एक तत्त्व देखताहै।
एतदेव हि विज्ञानं न तथेकेन येन यत् ।स्थित्युत्पत्त्यप्ययान्पश्येद्धावानां त्रिगुणात्मनाम् ॥
१५॥
एतत्--यह; एव--निस्सन्देह; हि--वास्तव में; विज्ञानम्-- अनुभूत ज्ञान; न--नहीं; तथा--उसी तरह से; एकेन--एक( भगवान् ) द्वारा; येन--जिसके द्वारा; यत्ू--जो ( ब्रह्माण्ड ); स्थिति--पालन; उत्पत्ति--सृजन; अप्ययान्--तथा संहार;पश्येतू-देखे; भावानामू--सभी भौतिक तत्त्वों के; त्रि-गुण--प्रकृति के तीन गुणों के; आत्मनाम्--से बना
जब कोई व्यक्ति एक ही कारण से उत्पन्न २८ पृथक् पृथक् भौतिक तत्त्वों को न देख कर,एक कारण रूप भगवान् को देखता है, उस समय मनुष्य का प्रत्यक्ष अनुभव विज्ञान कहलाताहै।
जब सारी अवस्थाओं का प्रलय हो जाता है, तो भी जो अकेला बचता है, वही एक शाश्वत है।श्रुति: प्रत्यक्षमैतिहामनुमानं चतुष्टयम् ।प्रमाणेष्वनवस्थानाद्विकल्पात्स विरज्यते ॥
१७॥
श्रुतिः:--वैदिक ज्ञान; प्रत्यक्षमू--सीधा अनुभव; ऐतिहाम्ू--परम्परागत विद्या; अनुमानम्--तार्किक अनुमान; चतुष्टयम्--चार;प्रमानेषु--सभी प्रकार के प्रमाणों में से; अनवस्थानात्-- अस्थिरता के कारण; विकल्पात्-- भौतिक विविधता से; सः--वहपुरुष; विरज्यते--विरक्त हो जाता है|
वैदिक ज्ञान, प्रत्यक्ष अनुभव, परम्परागत विद्या ( ऐतिहा ) तथा तार्किक अनुमान--इन चारप्रकार के प्रमाणों से मनुष्य भौतिक जगत की अस्थिर दशा को समझ कर, इस जगत के द्वैत सेविरक्त हो जाता है।
कर्मणां परिणामित्वादाविरिज्च्यादमड्रलम् ।विपश्चिन्नश्वरं पश्येददृष्टमपि दृष्टबत् ॥
१८ ॥
कर्मणाम्-- भौतिक कार्यों का; परिणामित्वात्-विकार ग्रस्त होने के कारण; आ--तक; विरिज्च्यातू--ब्रह्मलोक से;अमड्डलम्--अशुभ दुख; विपश्चित्-बुद्धिमान व्यक्ति; नश्वरम्--क्षणिक; पश्येत्--देखे; अदृष्टमू--जसिका अभी तक अनुभवनहीं किया जा सका; अपि--निस्सन्देह; दृष्ट-बत्--पहले अनुभव हुए के समान।
बुद्धिमान पुरुष यह समझे कि कोई भी भौतिक कर्म निरन्तर परिवर्तित होता रहता है, यहाँतक कि ब्रह्मलोक में भी केवल दुख ही दुख है। निस्सन्देह, बुद्धिमान व्यक्ति यह समझ सकता हैकि जिस तरह सारी दृश्य वस्तुएँ क्षणिक हैं, उसी तरह ब्रह्माण्ड के भीतर सारी वस्तुओं का आदिऔर अन्त है।
भक्तियोग: प्रैवोक्त: प्रीयमाणाय तेडनघ ।पुनश्च कथयिष्यामि मद्धक्ते: कारणं परं ॥
१९॥
भक्ति-योग:-- भगवद्भक्ति; पुरा--पूर्व काल में; एब--निस्सन्देह; उक्त:--बतलाया गया; प्रीयमाणाय--जिसने प्रेम उत्पन्न करलिया है; ते--तुम तक; अनघ--हे निष्पाप उद्धव; पुन:--फिर; च-- भी; कथयिष्यामि--बतलाऊँगा; मत्--मुझ तक;भक्तेः-- भक्ति का; कारणम्--असली कारण; परम्ू--परम |
हे निष्पाप उद्धव, चूँकि तुम मुझे चाहते हो इसलिए मैं पहले ही तुम्हें भक्ति की विधि बतलाचुका हूँ। अब मैं तुमसे पुनः अपनी प्रेमाभक्ति पाने की श्रेष्ठ विधि बतलाऊँगा।
श्रद्धामृतकथायां मे शश्वन्मदनुकीर्तनम् ।परिनिष्ठा च पूजायां स्तुतिभिः स्तवनं मम ॥
२०॥
आदरः परिचर्यायां सर्वाड्रैरभिवन्दनम् ।मद्धक्तपूजाभ्यधिका सर्वभूतेषु मन््मति: ॥
२१॥
म्दर्थष्वड्रचेष्टा च वचसा मद्गुणेरणम् ।मय्यर्पणं च मनसः सर्वकामविवर्जनम् ॥
२२॥
मद्दर्थेर्थपरित्यागो भोगस्य च सुखस्य च ।इष्टे दत्त हुतं जप्तं मरदर्थ यद्व्रतं तप: ॥
२३॥
एवं धर्मर्मनुष्याणामुद्धवात्मनिवेदिनाम् ।मयि सजझ्जायते भक्ति: कोउन्यो<र्थो स्थावशिष्यते ॥
२४॥
श्रद्धा-- श्रद्धा; अमृत-- अमृत में; कथायाम्ू--कथाओं के; मे--मेंरे विषयक; शश्वत्--सदैव; मत्--मेरे; अनुकीर्तनम्ू--महिमाका गायन; परिनिष्ठा--आसक्ति में स्थिर; च-- भी; पूजायाम्-पूजा करने में; स्तुतिभि:--सुन्दर स्तुतियों से; स्तवनम्--प्रार्थनाओं से; मम--मेरे विषय में; आदर: --सम्मान; परिचर्यायाम्-मेरी भक्ति के लिए; सर्व-अड्डैः--शरीर के सारे अंगों से,साष्टांग; अभिवन्दनम्--नमस्कार करना; मत्--मेरा; भक्त--भक्तों की; पूजा--पूजा; अभ्यधिका--मुझसे बढ़कर; सर्व-भूतेषु--सारे जीवों में; मत्ू--मेरी; मतिः--चेतना; मत्-अर्थेषु--मेरी सेवा करने के निमित्त; अड्भ-चेष्टा--सामान्य शारीरिककर्म; च-- भी; वचसा--शब्दों से; मत्-गुण--मेरा दिव्य गुण; ईरणम्--घोषित करना; मयि--मुझमें; अर्पणम्--अर्पणकरना; च-- भी; मनस: --मन का; सर्व-काम--समस्त भौतिक इच्छाओं का; विवर्जनम्--बहिष्कार; मत्ू-अर्थ--मेरे लए;अर्थ--सम्पत्ति का; परित्याग:--छोड़ा जाना; भोगस्य--इन्द्रियतृप्ति का; च-- भी; सुखस्य-- भौतिक सुख का; च-- भी;इष्टम्--वांछित कर्म; दत्तमू--दान; हुतम्--यज्ञ की आहुति; जप्तम्--भगवन्नाम का कीर्तन; मत्-अर्थम्--मुझे पाने के लिए;यतू--जो; ब्रतम्--व्रत, यथा एकादशी; तपः--तपस्या; एवम्--इस प्रकार; धर्म:--ऐसे धार्मिक सिद्धान्तों से; मनुष्यानामू--मनुष्यों के; उद्धव--हे उद्धव; आत्म-निवेदिनामू--शरणागतों के; मयि--मुझमें; सज्जायते--उत्पन्न होता है; भक्ति: --प्रेमा भक्ति;कः--कौन; अन्य:--दूसरा; अर्थ:--उद्देश्य; अस्य--मेरे भक्त का; अवशिष्यते--बच रहता है।
मेरी लीलाओं की आनन्दमयी कथाओं में हढ़ विश्वास, मेरी महिमा का निरन्तर कीर्तन, मेरीनियमित पूजा में गहन आसक्ति, सुन्दर स्तुतियों से मेरी प्रशंसा करना, मेरी भक्ति का समादर,साष्टांग नमस्कार, मेरे भक्तों की उत्तम पूजा, सारे जीवों में मेरी चेतना का ज्ञान, सामान्यशारीरिक कार्यों को मेरी भक्ति में अर्पण, मेरे गुणों का वर्णन करने के लिए वाणी का प्रयोग,मुझे अपना मन अर्पित करना, समस्त भौतिक इच्छाओं का बहिष्कार, मेरी भक्ति के लिएसम्पत्ति का परित्याग, भौतिक इन्द्रियतृप्ति तथा सुख का परित्याग तथा मुझे पाने के उद्देश्य सेदान, यज्ञ, कीर्तन, ब्रत, तपस्या इत्यादि वांछित कार्यों को सम्पन्न करना--ये वास्तविक धार्मिकसिद्धान्त हैं, जिनसे मेरे शरणागत हुए लोग स्वतः मेरे प्रति प्रेम उत्पन्न कर लेते हैं। तो फिर मेरेभक्त के लिए कौन-सा अन्य उद्देश्य या लक्ष्य शेष रह जाता है ? यदात्मन्यर्पितं चित्तं शान्तं सत्त्वोपबृंहितम् ।धर्म ज्ञानं स वैराग्यमैश्वर्य चाभिपद्यते ॥
२५॥
यदा--जब; आत्मनि-- भगवान् में; अर्पितम्--स्थिर; चित्तम्--चेतना; शान्तम्-शान्त; सत्त्व--सतोगुण द्वारा; उपबृंहितम्--संपुष्ट; धर्मम्--धधार्मिकता; ज्ञाममू--ज्ञान; सः--सहित; वैराग्यम्--वैराग्य; ऐश्वर्यमू--ऐश्वर्य; च-- भी; अभिपद्यते--प्राप्त करताहै
जब सतोगुण से संतुष्ट शान्त चेतना भगवान् पर स्थिर कर दी जाती है, तो मनुष्य कोधार्मिकता, ज्ञान, वैराग्य तथा ऐश्वर्य प्राप्त होता है।
यदर्पितं तद्दिकल्पे इन्द्रियेः परिधावति ।रजस्वलं चासब्निष्ठं चित्तं विद्धि विपर्ययम् ॥
२६॥
यतू--जब; अर्पितम्ू--स्थिर; ततू--यह ( चेतना ); विकल्पे--भौतिक विविधता में ( शरीर, घर, परिवार आदि ); इन्द्रियै:--इन्द्रियों से; परिधावति--चारों ओर दौ लगाते; रज:-वलम्--रजोगुण से परिपुष्ट; च-- भी; असत्--जिसमें स्थायी सच्चाई नहींहै उसे; निष्ठमू--समर्पित; चित्तमू--चेतना; विद्धि--जानो; विपर्ययम्--( पूर्व वर्णित के ) विरुद्ध |
जब मनुष्य की चेतना भौतिक देह, घर तथा इन्द्रियतृप्ति की ऐसी ही अन्य वस्तुओं पर टिकजाती है, तो वह इन्द्रियों की सहायता से भौतिक वस्तुओं के पीछे दौ लगाते-लगाते अपनाजीवन व्यतीत करता है। इस तरह रजोगुण से बलपूर्वक प्रभावित चेतना नश्वर वस्तुओं के प्रतिसमर्पित हो जाती है, जिससे अधर्म, अज्ञान, आसक्ति तथा नीचता ( कृपणता ) उत्पन्न होते हैं।
धर्मो मद्धक्तिकृद्ोक्तो ज्ञानं चैकात्म्यदर्शनम् ।गुणेस्वसड्ो वैराग्यमैश्वर्य चाणिमादय: ॥
२७॥
धर्म:--धर्म; मत्--मेरी; भक्ति-- भक्ति; कृतू--उत्पन्न करते हुए; प्रोक्त:--घोषित की जाती है; ज्ञानमू--ज्ञान; च--भी;ऐकात्म्य--परमात्मा की उपस्थिति; दर्शनम्--देखना; गुणेषु--इन्द्रियतृप्ति की वस्तुओं में; असड्भ:--निर्लिप्त; वैराग्यम्ू--वैराग्य; ऐश्वर्यमू--ऐश्वर्य; च-- भी; अणिमा--अणिमा नामक योग-सिद्धि; आदयः-अन्द् सो फोर्थ,
वास्तविक धार्मिक सिद्धान्त वे हैं, जो मनुष्य को मेरी भक्ति तक ले जाते हैं। असली ज्ञानवह जानकारी है, जो मेरी सर्वव्यापकता को प्रकट करती है। इन्द्रियतृप्ति की वस्तुओं में पूर्णअरूचि ही वैराग्य है और अणिमा सिद्धि जैसी आठ सिद्ध्रियाँ ही ऐश्वर्य हैं।
श्रीउद्धव उवाच यमः कतिविध: प्रोक्तो नियमो वारिकर्षण ।कः शमः को दमः कृष्ण का तितिक्षा धृति: प्रभो ॥
२८॥
कि दानं कि तपः शौर्य किम्सत्यमृतमुच्यते ।कस्त्याग: कि धन चेष्ट को यज्ञ: का च दक्षिणा ॥
२९॥
पुंसः किं स्विद्वलं श्रीमन््भगो लाभश्व केशव ।का विद्या ही: परा का श्री: कि सुखं दुःखमेव च ॥
३०॥
कः पण्डितः कश्च मूर्ख: कः पन्था उत्पथश्व कः ।कः स्वर्गो नरकः कः स्वित्को बन्धुरुत कि गृहम् ॥
३१॥
कक आढ्द्: को दरिद्रो वा कृपण: कः क ईश्वर: ।एतान्प्रश्नान्मम ब्रूहि विपरीतांश्व सत्पते ॥
३२॥
श्री-उद्धवः उबाच-- श्री उद्धव ने कहा; यम:--अनुशासनात्मक नियम; कति-विध:--कितने भिन्न प्रकार के; प्रोक्त:--विद्यमानकहे जाते हैं; नियम: --नियमित नैत्यिक कार्य; वा--अथवा; अरि-कर्षण--हे शत्रु के दमनकर्ता, कृष्ण; कः--क्या है;शमः--मानसिक सन्तुलन; कः--क्या है; दमः--आत्मसंयम; कृष्ण--हे कृष्ण; का--क्या है; तितिक्षा--सहिष्णुता; धृति:--हढ़ता, धैर्य; प्रभो--हे प्रभु; किम्--क्या है; दानम्--दान; किम्ू-- क्या है; तपः--तपस्या; शौर्यम्--शूरता; किमू--क्या है;सत्यम्ू--सच्चाई; ऋतम्--सत्य; उच्यते--कहलाता है; कः--क्या है; त्याग: --वैराग्य; किमू--क्या है; धनमू--सम्पत्ति; च--भी; इष्टम्--इच्छित; कः--क्या है; यज्ञ:--यज्ञ; का--क्या है; च--भी; दक्षिणा-- धार्मिक पारिश्रमिक, दक्षिणा; पुंसः--पुरुष का; किम्ू--क्या है; स्वितू--निस्सन्देह; बलम्ू--बल; श्री-मन्--हे भाग्यवान् कृष्ण; भग:--ऐश्वर्य; लाभ:--लाभ;च--भी; केशव--हे केशव; का--क्या है; विद्या--शिक्षा; हीः--दीनता, नप्नता; परा--परम; का--क्या है; श्री:--सौन्दर्य;किम्--क्या है; सुखम्--सुख; दुःखम्--दुख; एव--निस्सन्देह; च-- भी; कः--कौन है; पण्डित:--विद्वान; क:--कौन है;च--भी; मूर्ख: --मूर्ख; कः--क्या है; पन््था:--असली मार्ग; उत्पथ:--झूठा मार्ग, कुमार्ग; च-- भी; कः--क्या है; कः--क्याहै; स्वर्ग:--स्वर्ग; नरक:--नरक; कः--क्या है; स्वित्--निस्सन्देह; कः--कौन है; बन्धु:--मित्र; उत--तथा; किम्--क्या है;गृहम्--घर; कः --कौन है; आढ्य:-- धनी; क:--कौन है; दरिद्र: --गरीब, निर्धन; वा--अथवा; कृपण:--कंजूस; कः --कौन है; क:ः--कौन है; ईश्वर:--नियन्ता; एतानू--इन; प्रश्नान्-- प्रश्नों को; मम--मुझसे; ब्रूहि--कृपया कहें; विपरीतान्--विरोधी गुण; च-- भी; सत्-पते--हे भक्तों के स्वामी |
श्री उद्धव ने कहा : हे कृष्ण, हे शत्रुओं को दण्ड देने वाले, कृपा करके मुझसे यह बतायेंकि कितने प्रकार के अनुशासनात्मक नियम ( यम ) तथा नियमित दैनिक कार्य ( नियम ) हैं।यही नहीं, हे प्रभु, मुझे यह भी बतायें कि मानसिक संतुलन क्या है, आत्मसंयम क्या है औरसहिष्णुता तथा हृढ़ता का असली अर्थ क्या है? दान, तपस्या तथा शौर्य क्या हैं औरवास्तविकता तथा सच्चाई का किस तरह वर्णन किया जाता है ? त्याग क्या है और सम्पत्ति क्याहै? इच्छित कया है, यज्ञ क्या है और दक्षिणा क्या है? हे केशव, हे भाग्यवान्, मैं किस तरहकिसी व्यक्ति के बल, ऐश्वर्य तथा लाभ को समझूँ? सर्वोत्तम शिक्षा क्या है? वास्तविक नप्रताक्या है और असली सौन्दर्य क्या है ? सुख और दुख क्या हैं ? कौन विद्वान है और कौन मूर्ख है?जीवन के असली तथा मिथ्या मार्ग क्या हैं और स्वर्ग तथा नरक क्या हैं ? असली मित्र कौन हैऔर असली घर क्या है ? कौन धनी है और कौन निर्धन है ? कौन कंजूस है और कौन वास्तविक नियन्ता है? हे भक्तों के स्वामी, कृपा करके मुझे इन बातों के साथ साथ इनकी विपरीत बातें भीबतलायें।
श्रीभगवानुवाचअहिंसा सत्यमस्तेयमसड़ो हीरसझ्ञयः ।आस्तिक्यं ब्रह्मचर्य च मौन स्थेर्य क्षमाभयम् ॥
३३॥
शौच जपस्तपो होम: श्रद्धातिथ्यं म्द्चनम् ।तीर्थाटनं परार्थेहा तुप्टिराचार्यसेबनम् ॥
३४॥
एते यमा: सनियमा उभयोर्द्धादश स्मृता: ।पुंसामुपासितास्तात यथाकामं दुहन्ति हि ॥
३५॥
श्री-भगवान् उवाच-- भगवान् ने कहा; अहिंसा--अहिंसा; सत्यम्ू--सत्य; अस्तेयमू-अन्यों की सम्पत्ति के लिए न तोललचाना, न चोरी करना; असड्ृः--विरक्ति; ही:--दीनता; असजञ्ञयः--अपरिग्रह; आस्तिक्यम्-- धर्म में विश्वास; ब्रह्मचर्यम्--ब्रह्मचर्य; च-- भी; मौनम्ू--मौन; स्थैर्यम्--स्थिरता; क्षमा-- क्षमा करना; अभयम्--निर्भीकता; शौचम्-- भीतरी तथा बाहरीस्वच्छता; जपः--भगवज्नाम का कीर्तन; तपः--तपस्या; होम: --यज्ञ; श्रद्धा-- श्रद्धा; आतिथ्यम्-- अतिथि-सत्कार; मत्-अर्चनम्--मेरी पूजा; तीर्थ-अटनमू्--ती ्थयात्रा करना; पर-अर्थ-ईह--परमे श्वर के लिए कर्म करना तथा इच्छा करना; तुष्टिः --सन्तोष; आचार्य-सेवनम्--गुरु-सेवा; एते--ये; यमा: -- अनुशासनात्मक नियम; स-नियमा:--गौण कार्यो के साथ; उभयो:--दोनों का; द्वादश--बारह; स्मृता:--जाने जाते हैं; पुंसाम्ू--मनुष्यों द्वारा; उपासिताः--भक्तिपूर्वक अनुशीलन किया गया;तात-हे उद्धव; यथा-कामम्-- अपनी इच्छानुसार; दुहन्ति--पूर्ति करते हैं; हि--निस्सन्देह |
भगवान् ने कहा : अहिंसा, सत्य, दूसरों की सम्पत्ति से लालायित न होना या चोरी न करना,बैराग्य, दीनता, अपरिग्रह, धर्म में विश्वास, ब्रह्मचर्य, मौन, स्थिरता, क्षमा तथा अभय--ये बारहमूल अनुशासनात्मक यम ( नियम ) हैं। आन्तरिक तथा बाह्य स्वच्छता, भगवतन्नाम कीर्तन, यज्ञ,श्रद्धा, आतिथ्य, मेरी पूजा, तीर्थाटन, केवल परम लक्ष्य के लिए कार्य करना तथा इच्छा करना,सनन््तोष तथा गुरु-सेवा--ये बारह नियमित कार्य ( नियम ) हैं। ये चौबीसों कार्य उन लोगों कोइच्छित वर देने वाले हैं, जो उनका भक्तिपूर्वक अनुशीलन करते हैं।
शमो मन्निष्ठता बुद्धेर्दम इन्द्रियसंयम: ।तितिक्षा दुःखसम्मर्षो जिलह्ोपस्थजयो धृतिः ॥
३६॥
दण्डन्यास: पर दानं कामत्यागस्तपः स्मृतम् ।स्वभावविजय: शौर्य सत्यं च समदर्शनम् ॥
३७॥
अन्यच्च सुनृता वाणी कविभिः परिकीर्तिता ।कर्मस्वसड्रम: शौचं त्याग: सन्न्यास उच्चते ॥
३८॥
धर्म इष्टे धनं नृणां यज्ञोह॑ भगवत्तम: ।दक्षिणा ज्ञानसन्देश: प्राणायाम: परं बलम् ॥
३९॥
शमः--मानसिक सनन््तुलन; मत्--मुझमें; निष्ठता--निष्ठा; बुद्धेः --बुद्धि की; दमः--आत्मसंयम; इन्द्रिय--इन्द्रियों का;संयम:--पूर्ण अनुशासन; तितिक्षा--सहिष्णुता; दुःख--दुख; सम्मर्ष:--सहन करना; जिह्मा--जी भ; उपस्थ--जननेन्द्रिय;जय: --जीतना; धृति:--स्थिरता; दण्ड--आक्रामकता, छेड़छाड़; न्यास: --त्यागना; परमू--परम; दानमू--दान; काम--विषय-वासना; त्याग:--त्यागना; तपः--तपस्या; स्मृतम्--माना जाता है; स्वभाव-- भोग करने की सहज प्रवृत्ति; विजय:--जीत; शौर्यम्--वीरता; सत्यम्ू--सत्य; च-- भी; सम-दर्शनम्--पर मे श्वर का सर्वत्र दर्शन होना; अन्यत्--अगला तत्त्व( सच्चाई ); च--तथा; सु-नृता--मधुर; वाणी --वाणी; कविभि: --मुनियों द्वारा; परिकीर्तिता--घोषित; कर्मसु--सकाम कर्मोंमें; असड्रम:--विरक्ति; शौचम्--स्वच्छता; त्याग: --त्याग; सन्न्यास:--संन्यास आश्रम; उच्यते--कहलाता है; धर्म: --धार्मिकता; इष्टम्-इष्ट; धनमू--सम्पत्ति; नृणाम्--मनुष्यों के लिए; यज्ञ:--यज्ञ; अहम्--मैं हूँ; भगवत्-तम:-- भगवान्;दक्षिणा--दक्षिणा; ज्ञान-सन्देश:--सम्यक ज्ञान का उपदेश; प्राणायाम:-- ध्वास रोकने की योग-पद्धति; परमू--परम; बलम्--शक्ति
मुझमें बुद्धि लगाना मानसिक सन्तुलन ( शम ) है और इन्द्रियों का पूर्ण संयम आत्मसंयम(दम ) है। सहिष्णुता का अर्थ है धैर्यपूर्वक दुख सहना। स्थिरता तब आती है जब मनुष्य जीभतथा जननेन्द्रियों पर विजय पा लेता है। सबसे बड़ा दान है अन्यों के प्रति सभी प्रकार कीछेड़छाड़ त्यागना। काम ( विषय-वासना ) का परित्याग ही असली तपस्या है। असली शौर्यभौतिक जीवन का भोग करने की सहज प्रवृत्ति को जीतना है तथा भगवान् का सर्वत्र दर्शनकरना ही सच्चाई ( सत्य ) है। सत्यता का अर्थ है मधुर ढंग से सत्य बोलना जैसा कि महर्षियों नेघोषित किया है। स्वच्छता का अर्थ है सकाम कर्मों से विरक्ति जबकि त्याग ही संन्यास है।मनुष्यों की असली इष्ट सम्पत्ति धार्मिकता है और मैं, भगवान् ही यज्ञ हूँ। आध्यात्मिक उपदेशप्राप्त करने के उद्देश्य से गुरु-भक्ति ही दक्षिणा है और सबसे बड़ी शक्ति है श्वास रोकने कीप्राणायाम विधि।
भगो म ऐश्वरो भावो लाभो मद्धक्तिरुत्तम: ।विद्यात्मनि भिदाबाधो जुगुप्सा हीरकर्मसु ।श्रीर्गुणा नैरपेक्ष्याद्या: सुखं दुःखसुखात्यय: ॥
४०॥
दुःखं कामसुखापेक्षा पण्डितो बन्धमोक्षवित् ।मूर्खो देहाद्यहंबुद्द्धिः पन्था मन्निगम: स्मृतः ॥
४१॥
उत्पथश्रित्तविक्षेप: स्वर्ग: सत्त्तगुणोदय: ।नरकस्तमजउत्नाहो बन्धुर्गुरुरहं सखे ॥
४२॥
गृहं शरीर मानुष्यं गुणाढ्यों ह्याढ्य उच्यते ।दरिद्रो यस्त्वसन्तुष्ट: कृपणो योउजितेन्द्रिय: ॥
४३॥
गुणेष्वसक्तधीरीशो गुणसड़ विपर्यय: ।एत उद्धव ते प्रशना: सर्वे साधु निरूपिता: ॥
४४॥
कि वर्णितेन बहुना लक्षणं गुणदोषयो: ।गुणदोषदशिर्दोषो गुणस्तृभयवर्जित: ॥
४५॥
भगः--ऐकश्वर्य; मे--मेरा; ऐश्वर: --ई श्वरी; भाव: --स्वभाव; लाभ: --लाभ; मत्-भक्ति: --मेरी भक्ति; उत्तम:--सर्व श्रेष्ठ;विद्या--शिक्षा; आत्मनि--आत्मा में; भिदा--द्वैत; बाध:--निरस्त करना; जुगुप्सा--घृणा; ही:--विनयशीलता; अकर्मसु--पापपूर्ण कार्यों में; श्री:-- सौन्दर्य; गुणा:--सद्गुण; नैरपेक्ष्य-- भौतिक वस्तुओं से विराग; आद्या: --इत्यादि; सुखम्--सुख;दुःख--दुख; सुख-- भौतिक सुख; अत्यय: --पार करना; दुःखम्--दुख; काम--विषय-वासना का; सुख--सुख पर;अपेक्षा--ध्यान करना; पण्डित:--चतुर व्यक्ति; बन्ध--बन्धन से; मोक्ष--मोक्ष; वित्ू--जानने वाला; मूर्ख: --मूर्ख; देह--देहसहित; आदि--इत्यादि ( मन ); अहम्-बुद्धिः--जो अपनी पहचान करता है; पन्था:--असली मार्ग; मत्--मुझ तक; निगम: --जाने वाला; स्मृतः:--समझना चाहिए; उत्पथ:--गलत रास्ता; चित्त--चेतना की; विक्षेप:--मोहग्रस्तता; स्वर्ग:--स्वर्ग; सत्त्व-गुण--सतोगुण का; उदय: --प्राधान्य; नरक:--नरक; तम:--तमोगुणी की; उन्नाह: --प्रधानता; बन्धु;--असली मित्र; गुरु:--गुरु; अहम्-मैं हूँ; सखे--हे मित्र उद्धव; गृहमू--घर; शरीरम्--शरीर; मानुष्यम्--मनुष्य का; गुण-- सदगुणों सहित;आढ्य:--समृद्ध; हि--निस्सन्देह; आढ्य:-- धनी व्यक्ति; उच्यते--कहलाता है; दरिद्र:--निर्धन व्यक्ति; यः--जो; तु--निस्सन्देह; असन्तुष्ट:--असंतुष्ट; कृपण:--कंजूस; यः--जो; अजित--नहीं जीती हैं; इन्द्रियः--इन्द्रियाँ; गुणेषु-- भौतिकइन्द्रियतृप्ति में; असक्त--आसक्त नहीं; धीः--जिसके बुद्धि; ईशः--नियामक; गुण--इन्द्रियतृप्ति; सड़४--आसक्त;विपर्ययः--विपरीत, चाकर; एते--ये; उद्धव--हे उद्धव; ते--तुम्हारे; प्रश्ना:--प्रश्न; सर्वे--सभी; साधु--उचित ढंग से;निरूपिता: --व्याख्या किये गये; किम्--क्या लाभ; वर्णितेन--वर्णन करने का; बहुना--विस्तार से; लक्षणम्--लक्षण;गुण--सदगुणों के; दोषयो:--तथा दुर्गुणों के; गुण-दोष--अच्छे तथा बुरे गुण; हशि:--देखना; दोष:--दोष; गुण:--असलीसदगुण; तु--निस्सन्देह; उभय--दोनों से; वर्जित:--पृथक् |
वास्तविक ऐश्वर्य भगवान् के रूप में मेरा निजी स्वभाव है, जिसके माध्यम से मैं छ: असीमऐश्वर्यों को प्रकट करता हूँ। जीवन का सबसे बड़ा लाभ मेरी भक्ति है और असली शिक्षा( विद्या ) आत्मा के भीतर के झूठे द्वैतभाव को समाप्त करना है। असली उदारता अनुचित कार्योसे घृणा करना है। विरक्ति जैसे सदगुण का होना सौन्दर्य है। भौतिक सुख तथा दुख को लाँघनाअसली सुख है और असली दुख तो यौन-सुख की खोज में अपने को फँसाना है। बुद्धिमान वहीहै, जो बन्धन से छूटने की विधि जानता है और मूर्ख वह है, जो अपनी पहचान अपने शरीर तथामन से करता है। जीवन में असली मार्ग वह है, जो मुझ तक ले जाने वाला है और कुमार्गइन्द्रियतृप्ति है, जिससे चेतना मोहग्रस्त हो जाती है। वास्तविक स्वर्ग सतोगुण की प्रधानता है औरअज्ञान की प्रधानता ही नरक है। मैं समस्त ब्रह्माण्ड के गुरु रूप में हर एक का असली मित्र हूँ।मनुष्य का घर उसका शरीर है। हे प्रिय मित्र उद्धव, जो सदगुणों से युक्त है, वही धनी कहा जाताहै और जो जीवन से असंतुष्ट रहता है, वही निर्धन है। कृपण वह है, जो अपनी इन्द्रियों को वशमें नहीं रख सकता और असली नियंत्रक वह है, जो इन्द्रियतृप्ति में आसक्त नहीं होता। इसकेविपरीत जो व्यक्ति इन्द्रियतृष्ति में आसक्त रहता है, वह दास होता है। इस प्रकार हे उद्धव, मैंनेतुम्हारे द्वारा पूछे गये सारे विषयों की व्याख्या कर दी है। इन सदगुणों तथा दुर्गुणों की अधिकविशद व्याख्या की आवश्यकता नहीं है क्योंकि निरन्तर गुण तथा दोषों को देखना स्वयं में एकदुर्गुण है। सर्वोत्कृष्ट गुण तो भौतिक गुण और दोष को लाँघ जाना है।
