24. सांख्य का दर्शन
श्रीभगवानुवाचअथ ते सम्प्रवक्ष्यामि साड्ख्य॑ पूर्वर्विनिश्चितम् ।यद्विज्ञाय पुमान्सद्यो जह्ाद्वैकल्पिकं भ्रमम् ॥
१॥
श्री-भगवान् उबाच-- भगवान् ने कहा; अथ--अब; ते--तुमसे; सम्प्रवक्ष्यामि--कहूँगा; साड्ख्यम्--सृष्टि के तत्त्वों के विकासका ज्ञान; पूर्व:--पूर्ववर्ती विद्वानों द्वारा; विनिश्चितम्--सुनिश्चित किया गया; यत्--जिसे; विज्णाय--जान कर; पुमान्--मनुष्य;सद्यः--तुरन्त; जह्यात्-त्याग सकता है; वैकल्पिकम्--मिथ्या द्वैत पर आधारित; भ्रमम्-- भ्रम, मोह को
भगवान् श्रीकृष्ण ने कहा : अब मैं तुमसे सांख्य विज्ञान का वर्णन करूँगा जिसे प्राचीनविद्वानों ने पूर्णतया स्थापित किया है। इस विज्ञान को समझ लेने से मनुष्य तुरन्त भौतिक द्वैत केभ्रम को त्याग सकता है।
आसीज्ज्ञानमथो अर्थ एकमेवाविकल्पितम् ।यदा विवेकनिपुणा आदौ कृतयुगेउयुगे ॥
२॥
आसीतू--था; ज्ञानम्ू-द्रष्ठा अथ उ--इस प्रकार; अर्थ:--दृश्य; एकम्--एक; एव--केवल; अविकल्पितम्-- अपूथक्;यदा--जब; विवेक--विवेक में; निपुणा:--दक्ष पुरुष; आदौ-- प्रारम्भ में; कृत-युगे--सात्विक युग में; अयुगे--तथा इसकेपूर्व संहार के समय |
प्रारम्भ में कृत युग के दौरान सारे लोग आध्यात्मिक विवेक में अत्यन्त निपुण होते थे औरइससे भी पूर्व, संहार के समय एकमात्र द्रष्टा का अस्तित्व था, जो दृश्य पदार्थ से अभिन्न था।
तनन््मायाफलरूपेण केवलं निर्विकल्पितम् ।वाड्मनोगोचरं सत्यं द्विधा समभवद्गुहत् ॥
३॥
तत्--उस ( परम ); माया-- प्रकृति का; फल--तथा इसकी अभिव्यक्तियों का भोक्ता; रूपेण--दो रूपों में; केवलम्--एक;निर्विकल्पितम्-- अभिन्न; वाक्--वाणी; मन:--तथा मन तक; अगोचरम्--दुर्गम; सत्यम्--सच; द्विधा--दो; समभवत्--होगया; बृहत्--परब्रहा |
द्वैत से मुक्त रहते हुए तथा सामान्य वाणी एवं मन के लिए दुर्गम होने के कारण, उस एकपरब्रह्म ने अपने को दो कोटियों में विभक्त कर लिया। ये हैं-- भौतिक प्रकृति तथा जीव जो उसप्रकृति के स्वरूपों को भोगने का प्रयास करते हैं।
तयोरेकतरो ह्ार्थ: प्रकृति: सोभयात्मिका ।ज्ञान त्वन्यतमो भाव: पुरुष: सोडउभिधीयते ॥
४॥
तयो:--दोनों से; एकतरः --एक; हि--निस्सन्देह; अर्थ: --जीव; प्रकृति:--प्रकृति; सा--वह; उभय-आत्मिका--सूक्ष्म कारणोंतथा उनके प्रकट उत्पादों से युक्त; ज्ञानमू--चेतना ( से युक्त हैं, जो ); तु--तथा; अन्यतम:--दूसरा वाला; भाव:--जीव;पुरुष:--जीवात्मा; सः--वह; अभिधीयते--कहलाता है |
इन दो प्रकार के स्वरूपों में से एक तो भौतिक प्रकृति है, जिसमें दोनों सूक्ष्म कारणविद्यमान हैं और जो पदार्थ को व्यक्त करती है। दूसरा है जीव की चेतना जिसे भोक्ता कहते हैं।
तमो रज:ः सत्त्वमिति प्रकृतेरभवन्गुणा: ।मया प्रक्षोभ्यमाणाया: पुरुषानुमतेन च ॥
५॥
तमः--तमो; रज:--रजो; सत्त्वम्--सतो; इति--इस प्रकार; प्रकृतेः--प्रकृति से; अभवन्--प्रकट हुए; गुणा: --गुण; मया--मेरे द्वारा; प्रक्षोी भ्यमाणाया:--विश्षुब्ध किया गया; पुरुष--जीव की; अनुमतेन--इच्छापूर्ति के लिए; च--तथा ।
जब भौतिक प्रकृति मेरी चितवन से विश्षुब्ध की गई, तो बद्धजीवों की शेष इच्छाओं कीपूर्ति के लिए तीन गुण--सतो, रजो तथा तमोगुण--प्रकट हुए।
तेभ्यः समभवत्सूत्रं महान्सूत्रेण संयुतः ।ततो विकुर्वतो जातो योहड्डारो विमोहनः ॥
६॥
तेभ्य:--उन गुणों से; समभवत्--उत्पन्न हुआ; सूत्रमू--पहला प्रकृति का रूपान्तर जिसमें कर्म की शक्ति थी; महान्--ज्ञान-शक्ति से युक्त आदि प्रकृति; सूत्रेण--इस सूत्र तत्त्व से; संयुत:--एकसाथ जुड़ा; तत:ः--महत् से; विकुर्बतः--रूपान्तरित करतेहुए; जातः--उत्पन्न किया गया; यः--जो; अहलड्ढार:--मिथ्या अहंकार; विमोहन:--मोह का कारण।
इन गुणों से महत् तत्त्व के साथ साथ आदि सूत्र उत्पन्न हुआ। महत तत्त्व के रूपान्तर सेमिथ्या अहंकार उत्पन्न हुआ जो जीवों के मोह का कारण है।
वैकारिकस्तैजसश्व तामसश्रैत्यहं त्रिवृत् ।तन्मात्रेन्द्रयमनसां कारणं चिदचिन्मयः ॥
७॥
वैकारिक:ः--सतोगुण में; तैजस:ः--रजोगुण में; च--तथा; तामस:--तमोगुण में; च-- भी; इति--इस प्रकार; अहम्ू--मिथ्याअहंकार; त्रि-वृत्--तीन श्रेणियों में; तत्-मात्र--इन्द्रिय-विषयों के सूक्ष्म रूपों के; इन्द्रिय--इन्द्रियों के; मनसाम्--तथा मन के;कारणमू्--कारण; चित्-अचित्--आत्मा तथा पदार्थ दोनों; मयः--से युक्त
मिथ्या अहंकार जो भौतिक अनुभूति ( तन्मात्रा ), इन्द्रियों तथा मन का कारण है आत्मा तथापदार्थ दोनों को घेर लेता है और सतो, रजो तथा तमो--इन तीन गुणों को प्रकट होता है।
अर्थस्तन्मात्रिकाज्जज्ने तामसादिन्द्रियाणि च ।तैजसाद्वेवता आसन्नेकादश च बवैकृतात् ॥
८॥
अर्थ:--स्थूल तत्त्व; तत्-मात्रिकात्--तन्मात्राओं अर्थात् सूक्ष्म अनुभूतियों से; जज्ञे--उत्पन्न हो गया; तामसात्ू--तमोगुणीअहंकार से; इन्द्रियाणि--इन्द्रियाँ; च--तथा; तैजसात्--रजोगुणी अहंकार से; देवता:--देवतागण; आसनू--उत्पन्न हुए;एकादश- ग्यारह; च--तथा; बैकृतात्ू--सतोगुणी अहंकार से |
तमोगुणी अहंकार से सूक्ष्म शारीरिक अनुभूतियाँ ( तन्मात्राएँ ) उत्पन्न हुईं जिनसे सूक्ष्म तत्त्वउत्पन्न हुए। रजोगुणी अहंकार से इन्द्रियाँ उत्पन्न हुईं तथा सतोगुणी अहंकार से ग्यारह देवता उत्पन्नहुए।
मया सश्जोदिता भावा:ः सर्वे संहत्यकारिण: ।अप्ड्मुत्पादयामासुर्ममायतनमुत्तमम् ॥
९॥
मया--मेरे द्वारा; सझोदिता: --प्रेरित; भावा:--तत्त्व; सर्वे--सभी; संहत्य--संमेल से; कारिण:--कर्म करते हुए; अण्डम्--ब्रह्माण्ड; उत्पादयाम् आसु:--उत्पन्न किया; मम--मेरा; आयतनम्--आवास; उत्तमम्--उत्तम |
मेरे द्वारा प्रेरित ये सारे तत्त्व सुसम्बद्ध रूप में काम करने के लिए परस्पर जुड़ गये तथाउन्होंने ब्रह्माण्ड को जन्म दिया जो मेरा सर्वोत्तम आवास है।
तस्मिन्नहं समभवमण्डे सलिलसंस्थितौ ।मम नाभ्यामभूत्पदां विश्वाख्यं तत्र चात्मभू: ॥
१०॥
तस्मिन्ू--उसमें; अहम्--मैं; समभवम्--प्रकट हुआ; अण्डे--ब्रह्माण्ड में; सलिल--कारणार्णव के जल में; संस्थितौ--स्थित;मम--मेरी; नाभ्यामू--नाभि से; अभूत्--उत्पन्न हुआ; पद्ममू--कमल; विश्व-आख्यम्--विश्व नामक; तत्र--वहाँ; च--तथा;आत्म-भू: --स्वयं भू ब्रह्मा
मैं उस अंडे के भीतर प्रकट हुआ जो कारणार्णव जल में तैर रहा था और मेरी नाभि सेविश्व-कमल निकला जो स्वयंभू ब्रह्मा का जन्मस्थान है।
सोसृजत्तपसा युक्तो रजसा मदनुग्रहात् ।लोकान्सपालान्विश्वात्मा भूर्भुवः स्वरिति त्रिधा ॥
११॥
सः--उसने, ब्रह्म ने; असृजत्--उत्पन्न किया; तपसा--अपनी तपस्या से; युक्त:--युक्त; रजसा--रजोगुणी शक्ति से; मत्--मेरी; अनुग्रहात्--कृपा से; लोकान्ू--विभिन्न लोकों को; स-पालान्--अधिष्ठाता देवताओं सहित; विश्व--विश्व का; आत्मा--आत्मा; भूः भुवः स्व: इति-- भूर, भुवर तथा स्वर नामक; त्रिधा--तीन विभाग।
रजोगुण से युक्त ब्रह्माण्ड की आत्मा ब्रह्माजी ने मेरी दया से महान् तपस्या की और इस तरहभूर, भुवर तथा स्वर नामक तीन लोकों तथा उनके अधिष्ठाता देवताओं की रचना की।
देवानामोक आसीस्स्वर्भूतानां च भुवः पदम् ।मर्त्यादीनां च भूलोंक: सिद्धानां त्रितयात्परम् ॥
१२॥
देवानामू--देवताओं का; ओक:ः--घर; आसीत् --बना; स्व:--स्वर्ग; भूतानाम्ू-- भूतप्रेतों का; च--तथा; भुवः-- भुवर;पदम्--स्थान; मर्त्य-आदीनाम्ू--सामान्य मर्त्य लोगों तथा अन्य प्राणियों का; च--तथा; भू: लोक:--भूर नामक लोक;सिद्धानाम्--मुक्ति चाहने वालों का ( स्थान ); त्रितवातू--ये तीनों विभाग; परम्ू--परे |
स्वर्ग की स्थापना देवताओं के निवास रूप में, भुवर्लोक की भूतप्रेतों के निवास रूप में तथापृथ्वी-लोक की स्थापना मनुष्यों तथा अन्य मर्त्य प्राणियों के स्थान के रूप में की गई। वे योगीजो मोक्ष के लिए उद्योगशील रहते हैं, इन तीनों विभागों से परे भेज दिये जाते हैं।
अधोड्सुराणां नागानां भूमेरोकोसूजत्प्रभु: ।त्रिलोक्यां गतय: सर्वा: कर्मणां त्रिगुणात्मनाम् ॥
१३॥
अधः--नीचे; असुराणाम्--असुरों का; नागानाम्--स्वर्गिक सर्पों का; भूमेः--पृथ्वी से; ओक:--निवासस्थान; असृजतू --रचा; प्रभुः--ब्रह्मा ने; त्रि-लोक्याम्--तीनों लोकों का; गतयः--गन्तव्य; सर्वा:--सारे; कर्मणाम्--सकाम कर्मों का; त्रि-गुण-आत्मनाम्ू--तीनों गुणों में सम्मिलित |
ब्रह्मा ने पृथ्वी के अधोभाग को असुरों तथा नागों के लिए बनाया। इस तरह प्रकृति के तीनोंगुणों के अन्तर्गत सम्पन्न होने वाले विभिन्न प्रकार के कर्मों के लिए संगत फलों के रूप में तीनों लोकों के गन्तव्य व्यवस्थित किये गये।योगस्य तपसश्चैव न्यासस्य गतयोमला: ।महर्जनस्तपः सत्यं भक्तियोगस्य मद्गति: ॥
१४॥
योगस्य--योग का; तपस:-महान् तपस्या का; च--तथा; एव--निश्चय ही $ न्यासस्य--संन्यास आश्रम का; गतय:-गन्तव्य;अमला:--स्वच्छ; मह:--महर्; जन:--जनसू; तपः--तपस; सत्यम्ू--सत्य; भक्ति-योगस्य-- भक्ति का; मत्--मेरा; गति: --गन्तव्य।
योग, महान् तप तथा संन्यास जीवन से महलोंक, जनोलोक, तपोलोक तथा सत्यलोक केशुद्ध गन्तव्य प्राप्त किये जाते हैं। किन्तु भक्तियोग से मेरा दिव्य धाम प्राप्त होता है।
मया कालात्मना धात्रा कर्मयुक्तमिदं जगत् ।गुणप्रवाह एतस्मित्रुन्मजति निमजति ॥
१५॥
मया--मेरे द्वारा; काल-आत्मना--काल-श क्ति से युक्त; धात्रा--स्त्रष्टा; कर्म-युक्तम्ू--सकाम कर्म से पूर्ण; इदम्--यह;जगतू--संसार; गुण-प्रवाहे--गुणों की प्रबल धार में; एतस्मिन्--इस; उनन््मजजति--ऊपर उठता है; निमज्जति--डूबता है।
काल-शक्ति के रूप में कर्म करते हुए मुझ परम स्त्रष्टा द्वारा इस जगत में सकाम कर्म के सारेफलों को व्यवस्थित किया गया है। इस तरह प्राणी प्रकृति के गुणों के प्रबल प्रवाह की सतह परकभी ऊपर उठता है, तो कभी फिर से डूब जाता है।
अणुर्बृहत्कृशः स्थूलो यो यो भाव: प्रसिध्यति ।सर्वोष्प्युभयसंयुक्तः प्रकृत्या पुरुषेण च ॥
१६॥
अणु:--लघु; बृहत्ू--विशाल; कृशः--दुबला; स्थूल:--मोटा; यः य:--जो जो; भाव: --अभिव्यक्ति; प्रसिध्यति--स्थापितकी जाती है; सर्व:--सभी; अपि--निस्सन्देह; उभय--दोनों से; संयुक्त:--जुड़ा हुआ; प्रकृत्या--प्रकृति द्वारा; पुरुषेण-- भोक्ताआत्मा द्वारा; च--तथा।
इस जगत में जो भी स्वरूप विद्यमान दिखते हैं--चाहे वे छोटे हों या बड़े, दुबले हों यामोटे--उनमें भौतिक प्रकृति तथा इसका भोक्ता आत्मा दोनों रहते हैं।
यस्तु यस्यादिरन्तश्व स वै मध्यं च तस्य सन् ।विकारो व्यवहारार्थो यथा तैजसपार्थिवा: ॥
१७॥
यः--जो ( कारण ); तु--तथा; यस्य--जिस ( फल ) का; आदि:--प्रारम्भ; अन्त:--अन्त; च--तथा; सः-- वह; बै--निस्सन्देह; मध्यम्ू--बीच का; च--तथा; तस्य--उस वस्तु का; सन्ू--होने से ( असली ); विकार:--रूपान्तर; व्यवहार-अर्थ:--सामान्य प्रयोजनों के लिए; यथा--जिस तरह; तैजस--स्वर्ण से बनी वस्तुएँ ( जो स्वयं अग्नि से प्राप्त है ); पार्थिव:--पृथ्वी से उत्पन्न वस्तुएँ।स्वर्ण तथा मिट्टी मूलतः अवयव रूप में विद्यमान हैं।
स्वर्ण से सोने के गहने यथा कंगन तथाबालियाँ और मिट्टी से बर्तन तथा तश्तरियाँ बनाई जा सकती हैं। स्वर्ण तथा मिट्टी जो कि मूलअवयव हैं, वे उनसे बनने वाले पदार्थों से पहले से विद्यमान रहते हैं और जब अन्त में इन पदार्थों को नष्ट किया जाता है, तो वे मूल अवयव--स्वर्ण तथा मिट्टी--बने रहते हैं। इस तरह प्रारम्भतथा अन्त में अवयव वर्तमान तो रहते ही हैं, वे बीच में भी कंगन, बाली, पात्र अथवा तश्तरी केरूप में उपस्थित रहते हैं, जिन्हें हम ये नाम सुविधा के लिए देते हैं। इसलिए हम यह समझ सकतेहैं कि चूँकि अवयवरूपी कारण पदार्थ की सृष्टि के पूर्व तथा पदार्थ के विनाश के बाद विद्यमानरहता है, वही अवयवरूपी कारण व्यक्त अवस्था में भी उपस्थित रहेगा और इस पदार्थ को उसकेअसली रूप में पुष्ट करेगा।
यदुपादाय पूर्वस्तु भावो विकुरुतेउपरम् ।आदिरन्तो यदा यस्य तत्सत्यमभिधीयते ॥
१८ ॥
यत्--जो ( रूप ); उपादाय--अवयव कारण को मान कर; पूर्व:--पहले वाला कारण ( यथा महत् तत्त्व ); तु--तथा; भाव:--वस्तु; विकुरुते--विकार के रूप में उत्पन्न करता है; अपरम्--दूसरी वस्तु ( यथा अहंकार ); आदि:--प्रारम्भ; अन्त:ः--अन्त;यदा--जब; यस्य--जिसका ( कार्य का ); तत्ू--उस ( कारण ); सत्यमू--असली; अभिधीयते--कहा जाता है।
किसी आवश्यक अवयवब से बनी हुई भौतिक वस्तु रूपान्तर द्वारा अन्य भौतिक वस्तु उत्पन्नकरती है। इस तरह एक उत्पन्न वस्तु अन्य उत्पन्न वस्तु का कारण एवं आधार बनती है। इस तरहकोई विशेष वस्तु इस हेतु असली कहलाती है क्योंकि यह उस दूसरी वस्तु के मूल स्वभाव सेयुक्त होती है, जो इसकी आदि तथा अन्तिम अवस्था होती है।
प्रकृतिर्यस्योपादानमाधार: पुरुष: पर: ।सतोभिव्यज्भकः कालो ब्रह्म तत्त्रितयं त्वहम् ॥
१९॥
प्रकृतिः--भौतिक प्रकृति; यस्य--जिसका ( ब्रह्माण्ड का उत्पन्न स्वरूप ); उपादानम्ू--अवयव कारण; आधार: --नींव;पुरुष: -- भगवान्; पर:--परम; सतः-- असली ( स्वभाव ); अभिव्यञ्ञक:--श्षुब्ध करने वाला; काल:--समय; ब्रह्म--परब्रहा;तत्--यह; त्रितयम्--तीन का समूह; तु--लेकिन; अहम्-मैं |
भौतिक ब्रह्माण्ड को असली माना जा सकता है क्योंकि इसका आदि अवयव तथा इसकीअन्तिम अवस्था प्रकृति है। महाविष्णु प्रकृति के विश्राम स्थल हैं, जो काल की शक्ति से प्रकटहोते हैं। इस तरह प्रकृति, सर्वशक्तिमान विष्णु तथा काल मुझ परब्रह्म से भिन्न नहीं हैं।
सर्ग: प्रवर्तते तावत्पौर्वापर्येण नित्यश: ।महान्गुणविसर्गार्थ: स्थित्यन्तो यावदीक्षणम् ॥
२०॥
सर्ग:--सृष्टि; प्रवर्तती--विद्यमान रहती है; तावत्--तब तक; पौर्ब-अपर्येण--माता-पिता तथा सन्तानों के रूप में; नित्यश:ः--निरन्तर; महान्--दानी; गुण-विसर्ग--गुणों के विविध रूप का; अर्थ:--प्रयोजन; स्थिति-अन्तः--इसके अस्तित्व के अन्ततक; यावत्--जब तक; ईक्षणम्-- भगवान् का दृष्टिपात
जब तक भगवान् प्रकृति पर दृष्टिपात करते रहते हैं तब तक भौतिक जगत विद्यमान रहताजाता है और सृजन के महान् तथा विविध प्रवाह को प्रसव द्वारा सतत प्रकट करता रहता है।
विराण्मयासाद्यमानो लोककल्पविकल्पक: ।पञ्ञत्वाय विशेषाय कल्पते भुवनैः सह ॥
२१॥
विराटू--विश्वरूप; मया--मेरे द्वारा; आसाद्यमान:--व्याप्त; लोक--लोकों का; कल्प--बारम्बार सृष्टि, पालन तथा संहार का;विकल्पकः--विविधता प्रकट करते हुए; पञ्चत्वाय--पाँच तत्त्वों की सृष्टि का तात्विक प्राकट्य; विशेषाय--किस्मों में;कल्पते--प्रदर्शित करने में सक्षम है; भुवनैः--विभिन्न लोकों के; सह--साथ।
मैं विश्वरूप का आधार हूँ जो लोकों के बारम्बार सृजन, पालन तथा संहार के माध्यम सेअनन्त विविधता को प्रदर्शित करता है। मेरे विश्वरूप में सारे लोक अपनी सुप्त अवस्था में रहते हैंऔर मेरा यह विश्वरूप पाँच तत्त्वों के समन््वयकारी संयोग से नाना प्रकार के जगतों को प्रकटकरता है।
अन्ने प्रलीयते मर्त्यमन्नं धानासु लीयते ।धाना भूमौ प्रलीयन्ते भूमिर्गन्धे प्रलीयते ॥
२२॥
अप्सु प्रलीयते गन्ध आपश्च स्वगुणे रसे ।लीयते ज्योतिषि रसो ज्योती रूपे प्रलीयते ॥
२३॥
रूपं वायौ स च स्पर्शे लीयते सोपि चाम्बरे ।अम्बरं शब्दतन्मात्र इन्द्रियाणि स्वयोनिषु ॥
२४॥
योनिर्वेकारिके सौम्य लीयते मनसी श्वरे ।शब्दो भूतादिमप्येति भूतादिर्महति प्रभु; ॥
२५॥
स लीयते महान्स्वेषु गुणेसु गुणवत्तम: ।तेडव्यक्ते सम्प्रलीयन्ते तत्काले लीयतेडव्यये ॥
२६॥
कालो मायामये जीवे जीव आत्मनि मय्यजे ।आत्मा केवल आत्मस्थो विकल्पापायलक्षण: ॥
२७॥
अन्ने-- भोजन में; प्रलीयते--लीन हो जाता है; मर्त्यम्--मर्त्य शरीर; अन्नमू-- भोजन; धानासु--बीजों के भीतर; लीयते--लीनहो जाता है; धाना:--बीज; भूमौ--पृथ्वी में; प्रलीयन्ते--लीन हो जाते हैं; भूमि:--पृथ्वी; गन्धे--गन्ध में; प्रलीयते--लीन होजाती है; अप्सु--जल में; प्रलीयते--लीन हो जाती है; गन्ध:--गन्ध; आप:ः--जल; च--तथा; स्व-गुणे--अपने गुण में;रसे--स्वाद में; लीयते--लीन हो जाता है; ज्योतिषि-- अग्नि में; रस:--स्वाद; ज्योति:-- अग्नि; रूपे-- स्वरूप में; प्रलीयते--लीन हो जाती; रूपम्--स्वरूप; वायौ--वायु में; सः--वह; च--तथा; स्पर्शे--स्पर्श में; लीयते--लीन हो जाता है; सः--वह;अपि--भी; च--तथा; अम्बरे--आकाश में; अम्बरम्--आकाश; शब्द--ध्वनि में; ततू-मात्रे--संगत सूक्ष्म अनुभूति में;इन्द्रियाणि--इन्द्रियाँ; स्व-योनिषु--अपने स्त्रोतों, देवताओं में; योनि:--देवता; वैकारिके --सतोगुणी अहंकार में; सौम्य--हेउद्धव; लीयते--लीन हो जाता है; मनसि--मन में; ईश्वेर--नियन्ता रूप; शब्द:--शब्द; भूत-आदिम्-- आदि अहंकार में;अप्येति--लीन हो जाता है; भूत-आदिः--मिथ्या अहंकार; महति--समग्र प्रकृति में; प्रभु: --शक्तिमान; सः--वह; लीयते--लीन हो जाता है; महान्--समग्र प्रकृति; स्वेषु--अपने ही; गुणेषु--तीन गुणों में; गुण-बत्-तम:--इन गुणों का परम धाम होनेसे; ते--वे; अव्यक्ते--प्रकृति के अव्यक्त रूप में; सम्प्रलीयन्ते--पूर्णतया लीन हो जाते हैं; तत्ू-- उस; काले--समय में;लीयते--विलीन हो जाता है; अव्यये--अव्यय; काल:--समय; माया-मये--दिव्य ज्ञान से पूर्ण; जीवे--समस्त जीवों को गतिदेने वाले परमेश्वर में; जीव: --वह प्रभु; आत्मनि--परमात्मा में; मयि--मुझमें; अजे--अजन्मा; आत्मा--आत्मा; केवल: --अकेले; आत्म-स्थ: --स्वयं में स्थित; विकल्प--सृष्टि; अपाय--तथा संहार द्वारा; लक्षण:--गुणों से युक्त ;संहार के समय जीव का मर्त्य शरीर भोजन में लीन हो जाता है।
भोजन अन्न में लीन होता हैऔर अन्न पुनः पृथ्वी में लीन हो जाते हैं। पृथ्वी अपने सूक्ष्म अनुभूति गंध में लीन हो जाती है।गंध जल में और जल अपने गुण स्वाद में लीन हो जाता है। स्वाद अग्नि में और अग्नि रूप मेंलीन हो जाती है। रूप स्पर्श में और स्पर्श आकाश में लीन हो जाता है। आकाश अन्ततः ध्वनिअनुभूति में लीन होता है। सारी इन्द्रियाँ अपने उद्गम रूप अधिष्ठाता देवों में लीन हो जाती हैं। हेसौम्य उद्धव, ये इन्द्रियाँ नियामक मन में लीन होती हैं, जो सात्विक अहंकार में लीन हो जाता है।शब्द तमोगुणी अहंकार में एकाकार हो जाते हैं और सर्वशक्तिमान तथा समस्त शारीरिक तत्त्वोंमें प्रथम जाना जाने वाला अहंकार समग्र प्रकृति में लीन हो जाता है। तीन गुणों की धात्री समग्रप्रकृति गुणों में लीन हो जाती है। तब ये गुण प्रकृति के अव्यक्त रूप में लीन होते हैं और यहअव्यक्त रूप काल में लीन हो जाता है। काल परमेश्वर में लीन हो जाता है, जो सर्वज्ञ महापुरुषके रूप में, समस्त जीवों के आदि प्रेरक के रूप में रहते हैं। समस्त जीवन का उद्गम मुझअजन्मा परमात्मा में जो अपने भीतर स्थित रह कर अकेला रहता है, लीन हो जाता है। उन्हीं सेसमस्त सृजन तथा संहार प्रकट होते हैं।
एवमन्वीक्षमाणस्य कथं वैकल्पिको भ्रम: ।मनसो हृदि तिष्ठेत व्योम्नीवार्कोदये तमः ॥
२८ ॥
एवम्--इस तरह से; अन्वीक्षमाणस्य-- ध्यान से देखने वाले का; कथम्--कैसे; बैकल्पिक:--द्वैत पर आधारित; भ्रम:--मोह;मनसः--उसके मन का; हृदि--हृदय में; तिष्ठेत--बना रह सकता है; व्योमग्नि--आकाश में; इब--जिस तरह; अर्क--सूर्य के;उदये--उदय होने पर; तम:ः--अंधकार।
जिस तरह उदय होता सूर्य आकाश के अंधकार को हटा देता है, उसी तरह विश्व-संहार कायह विज्ञान गम्भीरजनों के मन से भ्रामक द्वैत को हटा देता है। यदि किसी तरह हृदय के भीतरभ्रम प्रवेश कर भी जाता है, तो वह वहाँ ठहर नहीं सकता।
एप साड्ख्यविधि: प्रोक्त: संशयग्रन्थिभेदन: ।प्रतिलोमानुलोमा भ्यां परावरह॒श मया ॥
२९॥
एष:--यह; साड्ख्य-विधि:--सांख्य ( वैशलेषिक दर्शन ) की विधि; प्रोक्त:--कहे गये; संशय--सन्देहों की; ग्रन्थि--गाँठ;भेदन:--तोड़ने वाला; प्रतिलोम-अनुलोमा भ्याम्--सीधे और उल्टे दोनों ही क्रमों में; पर-- आध्यात्मिकजगत; अवर--तथाभौतिक जगत की निकृष्ट स्थिति; हशा--देखने वाले के द्वारा; मया--मेरे द्वारा |
इस तरह हर भौतिक तथा आध्यात्मिक वस्तु के पूर्ण द्रष्टा मैंने यह सांख्य ज्ञान कहा है, जोसृष्टि तथा संहार के वैज्ञानिक विश्लेषण द्वारा संशय को नष्ट करता है।
