श्री रमेश बाबा जी बरसाना

पद्मश्री श्री रमेश बाबा महाराज, जिन्हें ब्रज के भक्तजन आदर से "रमेश पुरी महाराज" भी कहते हैं, का जन्म तीर्थराज प्रयाग में हुआ और वहीं उन्होंने अपनी प्रारंभिक शिक्षा प्राप्त की। परंतु उनके भीतर जल रहा आध्यात्मिक प्रकाश उन्हें बार-बार घर-बार त्यागकर ब्रज की ओर खींचता रहा, और अंततः वे स्थायी रूप से बरसाना में आ बसे।

गहवरवन की गुफा में तीस वर्षों की साधना

लगभग साठ वर्ष पूर्व, ब्रज के इस विरक्त संत ने बरसाना की उसी प्रसिद्ध गुफा में बैठकर लगभग तीस वर्षों तक श्रीराधारानी की अनवरत आराधना की, जिस गुफा के पीछे मान्यता है कि श्रीराधारानी कान्हा से रूठकर छिप गई थीं। यह दीर्घकालीन, एकांत साधना रमेश बाबा जी के जीवन की आधारशिला रही, जिसने उन्हें ब्रज के सबसे आदरणीय विरक्त संतों में स्थान दिलाया।

राधारानी मंदिर में चालीस वर्षों की सेवा

लगभग चालीस वर्ष पूर्व रमेश बाबा राधारानी मंदिर में मृदंग बजाया करते थे। राधा नाम के प्रचार-प्रसार में उनका योगदान अत्यंत महत्वपूर्ण रहा, और आज भी ब्रज रसिकों द्वारा उन्हें "ब्रज के विरक्त संत" की उपाधि से सम्मानित किया जाता है।

ब्रज के पर्यावरण के रक्षक

रमेश बाबा जी को "पर्यावरण का संत" भी कहा जाता है, क्योंकि उन्होंने कई दशकों तक ब्रज के वन-उपवनों और कृष्ण-लीला से जुड़ी प्राचीन पहाड़ियों को बचाने के लिए निरंतर जन-आंदोलन चलाया। उनका यह कार्य केवल भौतिक संरक्षण तक सीमित नहीं रहा — उन्होंने ब्रज के पौराणिक स्वरूप को बचाने के प्रति एक गहरी आध्यात्मिक प्रतिबद्धता के साथ काम किया। उनके इसी असाधारण योगदान को मान्यता देते हुए भारत सरकार ने उन्हें पद्मश्री से सम्मानित किया।

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