श्री विनोद बिहारी दास बाबा जी का पूर्व नाम विनय कुमार था। उनका जन्म सन् 1947 में एक ब्राह्मण परिवार में हुआ। उनके पिता का नाम श्री दाम जी और माता का नाम लावण्या देवी था। तीन भाइयों में वे मध्य संतान थे, परंतु बाल्यावस्था में ही उनके माता-पिता का देहांत हो गया और घर उजड़ गया — नन्हा विनय अनाथ होकर जीवन के कठिन मार्ग पर अकेला रह गया।
अनाथ बालपन से वैराग्य की ओर
माता-पिता की असामयिक मृत्यु के बाद बालक विनय के जीवन में एक ऐसी शून्यता आई जिसने उसे अत्यंत प्रारंभिक अवस्था में ही संसार की नश्वरता का बोध करा दिया। यही अनुभव आगे चलकर उनके भीतर गहरे वैराग्य और त्याग की भावना का आधार बना, और वे बरसाना की पावन भूमि की ओर आकर्षित हुए, जहाँ उन्होंने अपना शेष जीवन समर्पित कर दिया।
बरसाना के विरक्त संत
श्री विनोद बिहारी दास बाबा जी बरसाना के उन विरक्त संतों में गिने जाते हैं जिनके जीवन से यह सीखने को मिलता है कि त्याग, करुणा और हरिनाम — इन तीनों का संगम ही सच्ची भक्ति का मार्ग है। उनके जीवन से जुड़े अनेक रहस्यमय और अलौकिक प्रसंग भक्तों के बीच श्रद्धापूर्वक सुनाए जाते हैं, जो उनकी गहन आध्यात्मिक साधना की गवाही देते हैं।
त्याग, करुणा और हरिनाम का संदेश
बाबा जी अपने प्रवचनों में अक्सर यह भाव व्यक्त करते हैं: "जो हृदय हरिनाम में बसता है, वही ब्रज की धूल में बसता है। और जो ब्रज की धूल में बसता है, वही राधा नाम में रमता है।" यह सरल किन्तु गहन शिक्षा उनके संपूर्ण जीवन-दर्शन का सार प्रस्तुत करती है — एक ऐसा दर्शन जो व्यक्तिगत क्षति और अनाथत्व की पीड़ा से होकर पूर्ण समर्पण और ब्रज-भक्ति की मधुरता तक पहुँचा।
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