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अध्याय 6

6.1 दस होताओं से सम्पन्न होने वाले यज्ञ का वर्णन तथा मन और वाणी की श्रेष्ठता का प्रतिपादन---

ब्राह्मण कहते हैं- प्रिये! इस विषय में विद्वान पुरुष इस प्राचीन इतिहास का उदाहरण दिया करते हैं। दस होता मिलकर जिस प्रकार यज्ञ का अनुष्ठान करते हैं, वह सुनो। भामिनि! कान, त्वचा, नेत्र, जिह्वा (वाक् और रसना), नासिका, हाथ, पैर, उपस्थ और गुदा- ये दस होता है। शब्द, स्पर्श, रूप, रस, गन्ध, वाणी, क्रिया, गति, वीर्य, मूत्र का त्याग और मल त्याग- ये दस विषय ही दस हविष्य हैं।"

6.2 भामिनि! दिशा, वायु, सूर्य, चन्द्रमा, पृथ्वी, अग्नि, विष्णु, इन्द्र, प्रजापति और मित्र- ये दस देवता अग्नि हैं। भाविनि! दस इन्द्रियरूपी होता दस देवतारूपी अग्नि में दस विषयरूपी हविष्य एवं समिधाओं का हवन करते हैं (इस प्रकार मेरे अन्तर में निरन्तर यज्ञ हो रहा है, फिर मैं अकर्मण्य कैसे हूँ?)। इस यज्ञ में चित्त ही स्त्रुवा पवित्र एवं उत्तम ज्ञान ही धन है। यह सम्पूर्ण जगत पहले भली-भाँति विभक्त था, ऐसा सुना गया हैं। जानने में आने वाला यह सारा जगत चित्तरूप ही है, वह ज्ञान की अर्थात प्रकाश की अपेक्षा रखता है तथा वीर्यजनित शरीर समुदाय में रहने वाला शरीरधारी जीव उसको जानने वाला है। वह शरीर का अभिमानी जीव गार्हपत्य अग्नि है। उससे जो दूसरा पावक प्रकट होता है, वह मन है। मन आहवनीय अग्नि है। उसी में पूर्वोक्त हविष्य की आहुति दी जाती है। उससे वाचस्पति (वेदवाणी) का प्राकट्य होता है। उसे मन देखता है। मन के अनन्तर रूप का प्रादुर्भाव होता है, जो नील, पीत आदि वर्णों से रहित होता है। वह रूप मन की ओर दौड़ता है।"

6.3 ब्राह्मणी बोली- प्रियतम! किस कारण से वाक की उत्पत्ति पहले हुई और क्यों मन पीछे हुआ? जबकि मन से सोचे-विचारे वचन को ही व्यहार में लाया जाता है। किस विज्ञान के प्रभाव से मति चित्त के आश्रित होती है? वह ऊँचे उठायी जाने पर विषयों की ओर क्यों नहीं जाती? कौन उसके मार्ग में बाधा डालता है?"

6.4 ब्राह्मण ने कहा- प्रिये! अपान पति रूप होकर उस मति को अपान भाव की ओर ले जाता है। वह अपान भाव की प्राप्ति मन की गति बतायी गयी है, इसलिये मन उसकी अपेक्षा रखता है। परंतु तुम मुझ से वाणी और मन के विषय में ही प्रश्न करती हो, इसलिये मैं तुम्हें उन्हीं दोनों का संवाद बताऊँगा। मन और वाणी दोनों ने जीवात्मा के पास जाकर पूछा- ‘प्रभो! हम दोनों में कौन श्रेष्ठ है? यह बताओ और हमारे संदेह का निवारण करो’। तब भगवान आत्मदेव ने कहा- ‘मन ही श्रेष्ठ है।’ यह सुनकर सरस्वती बोलीं- ‘मैं ही तुम्हारे लिये कामधेनु बनकर सब कुछ देती हूँ।’ इस प्रकार वाणी ने स्वयं ही अपनी श्रेष्ठता बतायी। ब्राह्मण देवता कहते हैं- प्रिये! स्थावर और जंगम ये दोनों मेरे मन हैं। स्थावर अर्थात बाह्य इन्द्रियों से गृहित होने वाला जो यह जगत है, वह मेरे समीप है और जंगम अर्थात इन्द्रियातीत जो स्वर्ग आदि है, वह तुम्हारे अधिकार में है।"

6.5 जो मंत्र, वर्ण अथवा स्वर उस अलौकिक विषय को प्रकाशित करता है, उसका अनुसरण करने वाला मन भी यद्यपि जंगम नाम धारण करता है तथापि वाणी स्वरूपा तुम्हारे द्वारा ही मन का उस अतीन्द्रिय जगत मे प्रवेश होता है। इसलिये तुम मन से भी श्रेष्ठ एवं गौरवशालिनी हो। क्योंकि शोभामयी सरस्वती! तुमने स्वयं ही पास आकर समाधान अर्थात अपने पक्ष की पुष्टि की है। इससे मैं उच्छ्वास लेकर कुछ कहूँगा। महाभागे! प्राण और अपान के बीच में देवी सरस्वती सदा विद्यमान रहती हैं। वह प्राण की सहायता के बिना जब निम्नतम दशा को प्राप्त होने लगी, तब दौड़ी हुई प्रजापति के पास गयी और बोली- ‘भगवन! प्रसन्न होइये’। तब वाणी को पुष्ट-सा करता हुआ पुन: प्राण प्रकट हुआ। इसलिये उच्छ्वास लेते समय वाणी कभी कोई शब्द नहीं बोलती है।"

6.6 वाणी दो प्रकार की होती है- एक घोष युक्त (स्पष्ट सुनायी देने वाली) और दूसरी घोष रहित, जो सदा सभी अवस्थाओं में विद्यमान रहती है। इन दोनों में घोषयुक्त वाणी की अपेक्षा घोष रहित ही श्रेष्ठतम है। (क्योंकि घोषयुक्त वाणी को प्राणशक्ति की अपेक्षा रहती है और घोषरहित उसकी अपेक्षा के बिना भी स्वभावत: उच्चरित होती रहती है)। शुचिस्मिते! घोषयुक्त (वैदिक) वाणी भी उत्तम गुणों से सुशोभित होती है। वह दूध देने वाली गाय की भाँति मनुष्यों के लिये सदा उत्तम रस झरती एवं मनोवांछित पदार्थ उत्पन्न करती है और ब्रह्म का प्रतिपादन करने वाली उपनिषद वाणी (शाश्वत ब्रह्म) का बोध करने वाली है। इस प्रकार वाणीरूपी गौ दिव्य और अदिव्य प्रभाव से युक्त है। दोनों ही सूक्ष्म हैं और अभीष्ट पदार्थ का प्रस्रव करने वाली हैं। इन दोनों में क्या अन्तर है, इसको स्वयं देखो।"

6.7 ब्राह्मणी ने पूछा- नाथ! जब वाक्य उत्पन्न नहीं हुए थे, उस समय कुछ कहने की इच्छा से प्रेरित की हुई सरस्वती देवी ने पहले क्या कहा था?"

6.8 ब्राह्मण ने कहा- प्रिये! वह वाक् प्राण के द्वारा शरीर में प्रकट होती है, फिर प्राण से अपान भाव को प्राप्त होती है। तत्पश्चात उदान स्वरूप होकर शरीर को छोड़कर व्यान रूप से सम्पूर्ण आकाश को व्याप्त कर लेती है। तदनन्तर समान वायु में प्रतिष्ठित होती है। इस प्रकार वाणी ने पहले अपनी उत्पत्ति का प्रकार बताया था।[1 इसलिये स्थावर होने के कारण मन श्रेष्ठ है और जंगम होने के कारण वाग्देवी श्रेष्ठ हैं।"

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