अध्याय 7
7.1 मन-बुद्धि और इन्द्रिय रूप सप्त होताओं का, यज्ञ तथा मन-इन्द्रिय संवाद का वर्णन---
ब्राह्मण ने कहा- सुभगे! इसी विषय में इस पुरातन इतिहास का भी उदाहरण दिया जाता है। सात होताओं के यज्ञ का जैसा विधान है, उसे सुनो। नासिका, नेत्र, जिह्वा, त्वचा और पाँचवाँ कान, मन और बुद्धि- ये सात होता अलग-अलग रहते हैं। यद्यपि ये सभी सूक्ष्म शरीर में ही निवास करते हैं तो भी एक दूसरे को नहीं देखते हैं। शोभने! इन सात होताओं को तुम स्वभाव से ही पहचानों।"
7.2 Tब्राह्मणी ने पूछा- भगवन! जब सभी सूक्ष्म शरीर में ही रहते हैं, तब एक दूसरे को देख क्यों नहीं पाते? प्रभो! उनके स्वभाव कैसे हैं? यह बताने की कृपा करें।"
7.3 ब्राह्मण ने कहा- प्रिये! (यहाँ देखने का अर्थ है, जानना) गुणों को न जानना ही गणुवान को न जानना कहलाता है और गुणों को जानना ही गुणवान को जानना है। ये नासिका आदि सात होता एक दूसरे के गुणों को कभी नहीं जान पाते हैं (इसीलिये कहा गया है कि ये एक दूसरे को नहीं देखते हैं)। जीभ, आँख, कान, त्वचा, मन और बुद्धि- ये गन्धों को नहीं समझ पाते, किंतु नासिका उसका अनुभव करती है। नासिका, कान, नेत्र, त्वचा, मन और बुद्धि- ये रसों का आस्वादन नहीं कर सकते। केवल जिह्वा उसका स्वाद ले सकती है। नासिका, जीभ, कान, त्वचा, मन और बुद्धि- ये रूप का ज्ञान नहीं प्राप्त कर सकते, किंतु नेत्र इनका अनुभव करते हैं। नासिका, जीभ, आँख, कान, बुद्धि और मन- ये स्पर्श का अनुभव नहीं कर सकते, किंतु त्वचा को उसका ज्ञान होता है। नासिका, जीभ, आँख, त्वचा, मन और बुद्धि- इन्हें शब्द का ज्ञान नहीं होता है, किंतु कान को होता है। नासिका, जीभ, आँख, त्वचा, कान और बुद्धि- ये संशय (संकल्प-विकल्प) नहीं कर सकते। यह काम मन का है।"
7.4 इसी प्रकार नासिका, जीभ, आँख, त्वचा, कान, और मन- वे किसी बात का निश्चय नहीं कर सकते। निश्चयात्मक ज्ञान तो केवल बुद्धि को होता है। भामिनि! इस विषय में इन्द्रियों और मन के संवाद रूप एक प्राचीन इतिहास का उदाहरण दिया जाता है। एक बार मन ने इन्द्रियों से कहा- 'मेरी सहायता के बिना नासिका सूँघ नहीं सकती, जीभ रस का स्वाद नहीं ले सकती, आँख रूप नहीं देख सकती, त्वचा स्पर्श का अनुभव नहीं कर सकती और कानों को शब्द नहीं सुनायी दे सकता। इसलिये मैं सब भूतों में श्रेष्ठ और सनातन हूँ। मेरे बिना समस्त इन्द्रियाँ बुझी लपटों वाली आग और सूने घर की भाँति सदा श्रीहीन जान पड़ती हैं।'"
7.5 संसार के सभी जीव इन्द्रियों के यत्न करते रहने पर भी मेरे बिना उसी प्रकार विषयों का अनुभव नहीं कर सकते, जिस प्रकार कि सूखे गीले काष्ठ कोई अनुभव नहीं कर सकते।' यह सुनकर इन्द्रियों ने कहा- 'महोदय! यदि आप भी हमारी सहायता लिये बिना ही विषयों का अनुभव कर सकते तो हम आपकी इस बात को सच मान लेतीं। हमारा लय हो जाने पर भी आप तृप्त रह सकें, जीवन धारण कर सकें और सब प्रकार के भोग भोग सकें तो आप जैसा कहते और मानते हैं, वह सब सत्य हो सकता है। अथवा हम सब इन्द्रियाँ जीन हो जायँ या विषयों में स्थित रहें, यदि आप अपने संकल्प मात्र से विषयों का यथार्थ अनुभव करने की शक्ति रखते हैं और आपको ऐसा करने में सदा ही सफलता प्राप्त होती है तो जरा नाक के द्वारा रूप का तो अनुभव कीजिये, आँख से रस का तो स्वाद लीजिये और कान के द्वारा गन्धों को तो ग्रहण कीजिये।"
7.6 इसी प्रकार अपनी शक्ति से जिह्वा के द्वारा स्पर्श का, त्वचा के द्वारा शब्द का और बुद्धि के द्वारा स्पर्श का तो अनुभव कीजिये। आप जैसे बलवान लोग नियमों के बन्धन में नहीं रहते, नियम तो दुर्बलों के लिये होते हैं। आप नये ढंग से नवीन भोगों का अनुभव कीजिये। हम लोगों की जूठन खाना आपको शोभा नहीं देता।"
7.7 जैसे शिष्य श्रुति के अर्थ को जानने के लिये उपदेश करने वाले गुरु के पास जाता है और उनसे श्रुति के अर्थ का ज्ञान प्राप्त करके फिर स्वयं उसका विचार और अनुसरण करता है, वैसे ही आप सोते और जागते समय हमारे ही दिखाये हुए भूत और भविष्य विषयों का उपभोग करते हैं।"
7.8 जो मनरहित मन्दबुद्धि प्राणी हैं, उनमें भी हमारे लिये ही कार्य किये जाने पर प्राण धारण देखा जाता है। बहुत से संकल्पों का मनन और स्वप्नों का आश्रय लेकर भोग भोगने की इच्छा से पीड़ित हुआ प्राणी विषयों की ओर ही दौड़ता है। विषय वासना से अनुविद्ध संकल्पजनित भोगों का उपभोग करके प्राणशक्ति के क्षीण होने पर मनुष्य बिना दरवाजे के घर में घुसे हुए मनुष्य की भाँति उसी तरह शान्त हो जाता है, जैसे समिधाओं के जल जाने पर प्रज्वलित अग्नि स्वयं ही बुझ जाती है।"
7.9 भले ही हम लोगों की अपने-अपने गुणों के प्रति आसक्ति हो और भले ही हम परस्पर एक दूसरे के गुणों को न जान सकें, किंतु यह बात सत्य है कि आप हमारी सहायता के बिना किसी भी विषय का अनुभव नहीं कर सकते। आपके बिना तो हमें केवल हर्ष से ही वंचित होना पड़ता है।'"
