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अध्याय 13 - प्रकृति, पुरुष तथा चेतना

अर्जुन उवाच

प्रकृतिं पुरुष चैव क्षेत्र क्षेत्रज्ञमेव च ।

एतद्ठेदितुमिच्छामि ज्ञानं ज्ञेयं च केशव ॥ १॥

श्रीभगवानुवाच

इदं शरीरं कौन्तेय क्षेत्रमित्यभिधीयते ।

एतद्यो वेत्ति त॑ प्राहुः क्षेत्रज्ञ इति तद्विदः ॥ २॥

अर्जुन: उवाच--अर्जुन ने कहा; प्रकृतिम्‌ू-- प्रकृति; पुरुषम्‌-- भोक्ता; च-- भी; एव--

निश्चय ही। क्षेत्रम्‌ू--क्षेत्र, खेत; क्षेत्र-ज्ञमू--खेत को जानने वाला; एव--निश्चय ही;

च--भी; एतत्‌--यह सारा; वेदितुमू--जानने के लिए; इच्छामि--इच्छुक हूँ; ज्ञानम्‌ू--

ज्ञान; ज्ञेयमू--ज्ञान का लक्ष्य; च--भी; केशव--हे कृष्ण; श्री-भगवान्‌ उवाच--

भगवान्‌ ने कहा; इृदम्‌ू--यह; शरीरम्‌--शरीर; कौन्तेय--हे कुन्तीपुत्र; क्षेत्रमू--खेत;

इति--इस प्रकार; अभिधीयते--कहलाता है; एतत्‌--यह; यः--जो; वेत्ति--जानता

है; तम्‌ू--उसको; प्राहु:--कहा जाता है; क्षेत्र-ज्ञः--खेत को जानने वाला; इति--इस

प्रकार; ततू-विद:--इसे जानने वालों के द्वारा |

अर्जुन ने कहा-हे कृष्ण! मैं प्रकृति एवं पुरुष ( भोक्ता ),

क्षेत्र एवं क्षेत्रज्ञ तथा ज्ञान एवं ज्ञेय के विषय में जानने का

इच्छुक हूँ।

श्री भगवान्‌ ने कहा-हे कुन्तीपुत्र! यह शरीर क्षेत्र

कहलाता है और इस क्षेत्र को जानने वाला क्षेत्रज्ञ है।

*

षेत्रज्ञं चापि मां विद्ध्धि सर्वक्षेत्रेषु भारत ।

क्षेत्रक्षेत्रज्ञयोज्ञान यत्तज्ज़ानं मतं मम ॥ ३॥

क्षेत्र-ज्ञम्‌--क्षेत्र का ज्ञाता; च-- भी; अपि--निश्चय ही; माम्‌ू--मुझको; विद्धि--

जानो; सर्व--समस्त; क्षेत्रषु--शरीर रूपी क्षेत्रों में; भारत--हे भरत के पुत्र; क्षेत्र--

कर्म-क्षेत्र ( शरीर ) ; क्षेत्र-ज्ञयो:--तथा क्षेत्र के ज्ञाता का; ज्ञानममू--ज्ञान; यतू--जो;

तत्‌--वह; ज्ञानम्‌ू--ज्ञान; मतमू-- अभिमत; मम--मेरा ।.

हे भरतवंशी! तुम्हें ज्ञात होना चाहिए कि मैं भी समस्त

शरीरों में ज्ञाता भी हूँ और इस शरीर तथा इसके ज्ञाता को

जान लेना ज्ञान कहलाता है। ऐसा मेरा मत है।

*

तक््षेत्रं यच्च याहक्न यद्विकारि यतश्न यत्‌ ।

सच यो यत्प्रभावश्न तत्समासेन मे श्रूणु ॥ ४॥

तत्‌--वह; क्षेत्रमू-कर्म क्षेत्र; यत्‌-- जो; च-- भी; याहक्‌ -- जैसा है; च-- भी; यत्‌--

जो; विकारि--परिवर्तन; यत: -- जिससे; च-- भी; यत्‌ू--जो; सः--वह; च-- भी;

यः--जो; यत्‌--जो; प्रभाव: -- प्रभाव; च-- भी; तत्‌--उस; समासेन--संक्षेप में;

मे--मुझसे; श्रुणु--समझो, सुनो.

अब तुम मुझसे यह सब संक्षेप में सुनो कि कर्मक्षेत्र क्या

है, यह किस प्रकार बना है, इसमें कया परिवर्तन होते हैं, यह

कहाँ से उत्पन्न होता है, इस कर्मक्षेत्र को जानने वाला कौन है

और उसके क्‍या प्रभाव हैं।

*

1ऋषिभिर्बहुधा गीत॑ छन्दोभिरविविधे: पृथक्‌ ।

ब्रह्मसूत्रपदैश्वेव हेतुमद्धिर्विनिश्चिते: ॥ ५॥

ऋषिभि: --बुद्धिमान ऋषियों द्वारा; बहुधा--अनेक प्रकार से; गीतम्‌--वर्णित;

छन्दोभि:--वैदिक मन्त्रों द्वारा; विविधै:--नाना प्रकार के; पृथक्‌ --भिन्न-भिन्न; ब्रह्म-

सूत्र--वेदान्त के; पदैः--नीतिवचनों द्वारा; च-- भी; एव--निश्चित रूप से; हेतु-

मद्ध्धि:--कार्य-कारण से; विनिश्चितैः--निश्चित |.

विभिन्न वैदिक ग्रंथों में विभिन्न ऋषियों ने कार्यकलापों

के क्षेत्र तथा उन कार्यकलापों के ज्ञाता के ज्ञान का वर्णन

किया है। इसे विशेष रूप से वेदान्त सूत्र में कार्य-कारण के

समस्त तर्क समेत प्रस्तुत किया गया है।

*

महाभूतान्यहड्डारो बुद्धिरव्यक्तमेव च ।

इन्द्रियाणि दशैकं॑ च पञ्ञ चेन्द्रियगोचरा: ॥ ६॥

इच्छा द्वेष: सुखं दुःखं सड्भातश्चेतना धृति: ।

एतक््षेत्रे समासेन सविकारमुदाहतम्‌ ॥ ७॥

महा-भूतानि--स्थूल तत्त्व; अहड्ढार:--मिथ्या अभिमान; बुदर्द्धिः--बुद्ध्धि; अव्यक्तम्‌--

अप्रकट; एव--निश्चय ही; च-- भी; इन्द्रियाणि--इन्द्रियाँ; दश-एकम्‌-- ग्यारह; च--

भी; पदञ्ञ-- पाँच; च-- भी ; इन्द्रिय-गो-चरा: --इन्द्रियों के विषय; इच्छा--इच्छा;

द्वेष:--घृणा; सुखम्‌--सुख; दुःखम्‌--दुःख; सझ्लतः--समूह; चेतना--जीवन के

लक्षण; धृति:--धैर्य; एतत्‌--यह सारा; क्षेत्रमू--कर्मों का क्षेत्र; समासेन--संक्षेप में;

स-विकारम्‌--अन्तःक्रियाओं सहित; उदाहतम्‌--उदाहरणस्वरूप कहा गया।

पंच महाभूत, अहंकार, बुद्ध्धि, अव्यक्त (तीनों गुणों की

अप्रकट अवस्था ), दसों इन्द्रियाँ तथा मन, पाँच इन्द्रियविषय,

इच्छा, द्वेष, सुख, दुख, संघात, जीवन के लक्षण तथा धैर्य--

इन सब को संक्षेप में कर्म का क्षेत्र तथा उसकी अन्तःक्रियाएँ

( विकार ) कहा जाता है।

*

अमानित्वमदम्भित्वमहिंसा क्षान्तिराजवम्‌ ।

आचार्योपासनं शौच स्थेर्यमात्मविनिग्रह: ॥ ८॥

इन्द्रियार्थषु वैराग्यमनहड्डार एव च ।

जन्ममृत्युजराव्याधिदु:खदोषानुदर्शनम्‌ ॥ ९॥

असक्तिरनभिष्वड्: पुत्रदारगृहादिषु ।

नित्यं च समचित्तत्वमिष्टानिष्टोपपत्तिषु ॥ १०॥

मयि चानन्ययोगेन भक्तिरव्यभिचारिणी ।

विविक्तदेशसेवित्वमरतिर्जनसंसदि ॥ ११॥

अध्यात्मज्ञाननित्यत्वं तत्त्वज्ञानार्थदर्शनम्‌ ।

एतज्ज्ञानमिति प्रोक्तमज्ञानं यदतोउन्यथा ॥ १२॥

अमानित्वमू--विनप्रता; अदम्भित्वम्‌--दम्भविहीनता; अहिंसा-- अहिंसा; क्षान्ति:ः--

सहनशीलता, सहिष्णुता; आर्जवम्‌--सरलता; आचार्य-उपासनम्‌--प्रामाणिक गुरु के

पास जाना; शौचम्‌-- पवित्रता; स्थैर्यमू--हढ़ता; आत्म-विनिग्रह:--आत्म संयम;

इन्द्रिय-अर्थेषु--इन्द्रियों के मामले में; वैराग्यम्‌--वैराग्य; अनहड्डार:--मिथ्या

अभिमान से रहित; एब--निश्चय ही; च--भी; जन्म--जन्म; मृत्यु--मृत्यु; जरा--

बुढ़ापा; व्याधि--तथा रोग का; दुःख--दुःख का; दोष--बुराई; अनुदर्शनम्‌--देखते

हुए; असक्ति:--बिना आसक्ति के; अनभिष्वड़:--बिना संगति के; पुत्र--पुत्र; दार--

स्त्री; गृह-आदिषु--घर आदि में.; नित्यमू--निरन्तर; च-- भी; सम-चित्तत्वम्‌--

समभाव; इष्ट--इच्छित; अनिष्ट--अवांछित; उपपत्तिषु--प्राप्त करके; मयि--मुझ में;

च--भी; अनन्य-योगेन--- अनन्य भक्ति से; भक्ति:-- भक्ति; अव्यभिचारिणी--बिना

व्यवधान के; विविक्त--एकान्त; देश--स्थानों की; सेवित्वम्‌--आकांक्षा करते हुए;

अरति:--अनासक्त भाव से; जन-संसदि--सामान्य लोगों को; अध्यात्म-- आत्मा

सम्बन्धी; ज्ञान--ज्ञान में; नित्यत्वम्‌--शा श्वतता; तत्त्व-ज्ञान--सत्य के ज्ञान के; अर्थ--

हेतु; दर्शनम्‌--दर्शनशास्त्र; एतत्‌--यह सारा; ज्ञानमू--ज्ञान; इति--इस प्रकार;

प्रोक्तमू--घोषित; अज्ञानमू--अज्ञान; यत्‌ू--जो; अत:--इससे; अन्यथा-- अन्य, इतर.

विनप्रता, दम्भहीनता, अहिंसा, सहिष्णुता, सरलता,

प्रामाणिक गुरु के पास जाना, पवित्रता, स्थिरता, आत्मसंयम,

इन्द्रियतृप्ति के विषयों का परित्याग, अहंकार का अभाव,

जन्म, मृत्यु, वृद्धावस्था तथा रोग के दोषों की अनुभूति,

वैराग्य, सन्तान, स्त्री, घर तथा अन्य वस्तुओं की ममता से

मुक्ति, अच्छी तथा बुरी घटनाओं के प्रति समभाव, मेरे प्रति

निरन्तर अनन्य भक्ति, एकान्त स्थान में रहने की इच्छा, जन

समूह से विलगाव, आत्म-साक्षात्कार की महत्ता को

स्वीकारना, तथा परम सत्य की दार्शनिक खोज--इन सबको

मैं ज्ञान घोषित करता हूँ और इनके अतिरिक्त जो भी है, वह

सब अज्ञान है।

*

ज्ञेयं यत्तत्प्रवक्ष्यामि यज्ज्ञात्वामृतमश्नुते ।

अनादिमत्परं ब्रह्म न सत्तन्नासदुच्यते ॥ १३॥

ज्ञेयमू--जानने योग्य; यत्‌--जो; तत्‌--वह; प्रवक्ष्यामि-- अब मैं बतलाऊँगा; यत्‌--

जिसे; ज्ञात्वा--जानकर; अमृतम्‌-- अमृत का; अश्नुते--आस्वादन करता है;

अनादि--आदि रहित; मत्‌-परम्‌ू--मेरे अधीन; ब्रह्म-- आत्मा; न--न तो; सत्‌--

कारण; तत्‌--वह; न--न तो; असत्‌--कार्य,प्रभाव; उच्यते--कहा जाता है।

अब मैं तुम्हें ज्ञेय के विषय में बतलाऊँगा, जिसे जानकर

तुम नित्य ब्रहा का आस्वादन कर सकोगे। यह ब्रह्म या

आत्मा, जो अनादि है और मेरे अधीन है, इस भौतिक जगत्‌

के कार्य-कारण से परे स्थित है।

*

सर्वतः पाणिपादं तत्सर्वतोउक्षचिशिरोमुखम्‌ ।

सर्वतः श्रुतिमल्लोके सर्वमावृत्य तिष्ठति ॥ १४॥

सर्वतः--सर्वत्र; पाणि--हाथ; पादम्‌--पैर; तत्‌--वह; सर्वतः--सर्वत्र; अक्षि

आँखें; शिर:--सिर; मुखम्‌-- मुँह; सर्वतः--सर्वत्र; श्रुति-मत्‌--कानों से युक्त;

लोके--संसार में; सर्वम्‌--हर वस्तु; आवृत्य--व्याप्त करके; तिष्ठति-- अवस्थित है |.

उनके हाथ, पाँव, आखें, सिर तथा मुँह तथा उनके कान

सर्वत्र हैं। इस प्रकार परमात्मा सभी वस्तुओं में व्याप्त होकर

अवस्थित है।

*

सर्वेन्द्रिगगुणाभासं सर्वेन्द्रियविवर्जितम्‌ ।

असक्तं सर्वभूच्चैव निर्गुणं गुणभोक्तू च ॥ १५॥

सर्व--समस्त; इन्द्रिय--इन्द्रियों का; गुण--गुणों का; आभासम्‌--मूल स्त्रोत; सर्व--

समस्त; इन्द्रिय--इन्द्रियों से; विवर्जितमू--विहीन; असक्तम्‌--अनासक्त; सर्व-भृत्‌--

प्रत्येक का पालनकर्ता; च-- भी; एव--निश्चय ही; निर्गुणम्‌--गुणविहीन; गुण-

भोक्तृू-गुणों का स्वामी; च--भी |.

परमात्मा समस्त इन्द्रियों के मूल स्त्रोत हैं, फिर भी वे

इन्द्रियों से रहित हैं। वे समस्त जीवों के पालनकर्ता होकर भी

अनासक्त हैं। वे प्रकृति के गुणों से परे हैं, फिर भी वे भौतिक

प्रकृति के समस्त गुणों के स्वामी हैं।

*

बहिरन्तश्व भूतानामचरं चरमेव च ।

सूक्ष्मत्वात्तदविज्ञेयं दूरस्थं चान्तिके च ततू ॥ १६॥

बहिः--बाहर; अन्त:-- भीतर; च-- भी; भूतानाम्‌--जीवों का; अचरम्‌--जड़;

चरम्‌--जंगम; एव-- भी; च--तथा; सूक्ष्मत्वात्‌ू--सूक्ष्म होने के कारण; तत्‌--वह;

अविज्ञेयम्‌--अज्ञेय; दूर-स्थम्‌--दूर स्थित; च-- भी; अन्तिके --पास; च--तथा;

तत्‌--वह

परमसत्य जड़ तथा जंगम समस्त जीवों के बाहर तथा

भीतर स्थित हैं। सूक्ष्म होने के कारण वे भौतिक इन्द्रियों के

द्वारा जानने या देखने से परे हैं। यद्यपि वे अत्यन्त दूर रहते हैं,

किन्तु हम सबों के निकट भी हैं।

*

अविभक्त च भूतेषु विभक्तमिव च स्थितम्‌ ।

भूतभर्त च तज्ज्ञेयं ग्रसिष्णु प्रभविष्णु च ॥ १७॥

अविभक्तम्‌ू--बिना विभाजन के; च-- भी; भूतेषु--समस्त जीवों में; विभक्तम्‌--बँटा

हुआ; इब--मानो; च-- भी; स्थितम्‌ू--स्थित; भूत-भर्तू--समस्त जीवों का पालक;

च--भी; तत्‌ू--वह; ज्ञेयम्‌-- जानने योग्य; ग्रसिष्णु--निगलते हुए, संहार करने वाला;

प्रभविष्णु--विकास करते हुए; च--भी

यद्यपि परमात्मा समस्त जीवों के मध्य विभाजित प्रतीत

होता है, लेकिन वह कभी भी विभाजित नहीं है। वह एक

रूप में स्थित है। यद्यपि वह प्रत्येक जीव का पालनकर्ता है,

लेकिन यह समझना चाहिए कि वह सबों का संहारकर्ता है

और सबों को जन्म देता है।

*

ज्योतिषामपि तज्योतिस्तमस: परमुच्यते ।

ज्ञान॑ ज्ञेयं ज्ञानगम्यं हृदि सर्वस्य विष्ठितम्‌ ॥ १८॥

ज्योतिषाम्‌--समस्त प्रकाशमान वस्तुओं में; अपि-- भी; तत्‌--वह; ज्योति:-- प्रकाश

का स्त्रोत; तमस:--अन्धकार; परम्‌--परे; उच्यते--कहलाता है; ज्ञानम्‌--ज्ञान;

ज्ञेयमू--जानने योग्य; ज्ञान-गम्यम्‌--ज्ञान द्वारा पहुँचने योग्य; हदि--हृदय में;

सर्वस्य--सब; विष्ठितम्‌--स्थित |.

वे समस्त प्रकाशमान वस्तुओं के प्रकाशस्त्रोत हैं। वे

भौतिक अंधकार से परे हैं और अगोचर हैं। वे ज्ञान हैं, ज्ञेय हैं

और ज्ञान के लक्ष्य हैं। वे सबके हृदय में स्थित हैं।

*

इति क्षेत्रं तथा ज्ञानं ज्ञेयं चोक्ते समासतः ।

मद्धक्त एतद्विज्ञाय मद्भावायोपपद्यते ॥ १९॥

इति--इस प्रकार; क्षेत्रमू--कर्म का क्षेत्र ( शरीर ) ; तथा-- भी; ज्ञानम्‌ू--ज्ञान;

ज्ञेयमू--जानने योग्य; च-- भी; उक्तम्‌--कहा गया; समासतः--संक्षेप में; मत्‌ू-

भक्त:--मेरा भक्त; एतत्‌--यह सब; विज्ञाय--जान कर; मत्‌-भावाय--मेरे स्वभाव

को; उपपद्यते--प्राप्त करता है|.

इस प्रकार मैंने कर्म क्षेत्र ( शरीर ), ज्ञान तथा ज्ञेय का

संक्षेप में वर्णन किया है। इसे केवल मेरे भक्त ही पूरी तरह

समझ सकते हैं और इस तरह मेरे स्वभाव को प्राप्त होते हैं।

*

प्रकृति पुरुष चैव विद्धयनादी उभावपषि ।

विकारांश्व गुणांश्वेव विद्धि प्रकृतिसम्भवान्‌ ॥ २०॥

प्रकृतिमू-- भौतिक प्रकृति को; पुरुषम्‌--जीव को; च-- भी; एब--निश्चय ही;

विद्धि--जानो; अनादी--आदिरहित; उभौ--दोनों; अपि-- भी; विकारान्‌--विकारों

को; च--भी; गुणान्‌-- प्रकृति के तीन गुण; च-- भी; एव--निश्चय ही; विद्धि--

जानो; प्रकृति--भौतिक प्रकृति से; सम्भवान्‌--उत्पन्न |.

प्रकृति तथा जीवों को अनादि समझना चाहिए। उनके

विकार तथा गुण प्रकृतिजन्य हैं।

*

कार्यकारणकर्त॑त्वे हेतु: प्रकृतिरुच्यते ।

पुरुष: सुखदु:खानां भोक्तृत्वे हेतुरुच्यते ॥ २१॥

कार्य--कार्य; कारण--तथा कारण का; कर्तृत्वे--सृजन के मामले में; हेतु:--

कारण; प्रकृति:--प्रकृति; उच्चते--कही जाती है; पुरुष: --जीवात्मा; सुख--सुख;

दुःखानाम्‌--तथा दुःख का; भोक्तृत्वे-- भोग में; हेतु:--कारण; उच्यते--कहा जाता

है।.

प्रकृति समस्त भौतिक कारणों तथा कार्यो ( परिणामों )

की हेतु कही जाती है, और जीव ( पुरुष ) इस संसार में

विविध सुख-दुख के भोग का कारण कहा जाता है।

*

पुरुष: प्रकृतिस्थो हि भुड़े प्रकृतिजान्गुणान्‌ ।

कारणं गुणसक्लेस्य सदसद्योनिजन्मसु ॥ २२॥

पुरुष:--जीव; प्रकृति-स्थ:--भौतिक शक्ति में स्थित होकर; हि--निश्चय ही; भुड्ढे --

भोगता है; प्रकृति-जान्‌--प्रकृति से उत्पन्न; गुणान्‌ू--गुणों को; कारणम्‌--कारण;

गुण-सड्ढगः--प्रकृति के गुणों की संगति; अस्य--जीव की; सत्‌-असत्‌--अच्छी तथा

बुरी; योनि--जीवन की योनियाँ, जन्मसु; जन्मसु--जन्मों में |

इस प्रकार जीव प्रकृति के तीनों गुणों का भोग करता

हुआ प्रकृति में ही जीवन बिताता है। यह उस प्रकृति के साथ

उसकी संगति के कारण है। इस तरह उसे उत्तम तथा अधम

योनियाँ मिलती रहती हैं।

*

उपद्रष्टानुमन्ता च भर्ता भोक्ता महे श्वरः ।

परमात्मेति चाप्युक्तो देहेउस्मिन्पुरुष: पर: ॥ २३॥

उपद्रष्टा--साक्षी; अनुमन्ता-- अनुमति देने वाला; च--भी; भर्ता--स्वामी; भोक्ता--

परम भोक्ता; महा-ई श्वरः -- परमे श्वर; परम-आत्मा-- परमात्मा; इति-- भी; च-- तथा;

अपि--निस्सन्देह; उक्त:--कहा गया है; देहे--शरीर में; अस्मिन्‌--इस; पुरुष: --

भोक्ता; पर:--दिव्य |.

तो भी इस शरीर में एक अन्य दिव्य भोक्ता है, जो ईश्वर

है, परम स्वामी है और साक्षी तथा अनुमति देने वाले के रूप

में विद्यमान है और जो परमात्मा कहलाता है।

*

य एवं वेत्ति पुरुष प्रकृतिं च गुणै:ः सह ।

सर्वथा वर्तमानोडपि न स भूयोउभिजायते ॥ २४॥

यः--जो; एवम्‌--इस प्रकार; वेत्ति--जानता है; पुरुषम्‌--जीव को; प्रकृतिम्‌--

प्रकृति को; च--तथा; गुणैः--प्रकृति के गुणों के; सह--साथ; सर्वधा--सभी तरह

से; वर्तमान:--स्थित होकर; अपि--के बावजूद; न--कभी नहीं; सः--वह; भूय:--

फिर से; अभिजायते--जन्म लेता है।.

जो व्यक्ति प्रकृति, जीव तथा प्रकृति के गुणों की

अन्तःक्रिया से सम्बन्धित इस विचारधारा को समझ लेता है,

उसे मुक्ति की प्राप्ति सुनिश्चित है। उसकी वर्तमान स्थिति चाहे

जैसी हो, यहाँ पर उसका पुनर्जन्म नहीं होगा।

*

ध्यानेनात्मनि पश्यन्ति केचिदात्मानमात्मना ।

अन्ये साड्ख्येन योगेन कर्मयोगेन चापरे ॥ २५॥

ध्यानेन--ध्यान के द्वारा; आत्मनि--अपने भीतर; पश्यन्ति--देखते हैं; केचित्‌--कुछ

लोग; आत्मानम्‌--परमात्मा को; आत्मना--मन से; अन्ये--अन्य लोग; साइड्ख्येन--

दार्शनिक विवेचना द्वारा; योगेन--योग पद्धति के द्वारा; कर्म-योगेन--निष्काम कर्म के

द्वारा; च-- भी; अपरे-- अन्य |.

कुछ लोग परमात्मा को ध्यान के द्वारा अपने भीतर देखते

हैं, तो दूसरे लोग ज्ञान के अनुशीलन द्वारा और कुछ ऐसे हैं जो

निष्काम कर्मयोग द्वारा देखते हैं।

*

अन्ये त्वेवमजानन्तः श्रुत्वान्येभ्य उपासते ।

तेपि चातितरन्त्येव मृत्युं श्रुतिपरायणा: ॥ २६॥

अन्ये--अन्य लोग; तु--लेकिन; एवम्‌--इस प्रकार; अजानन्त:--आध्यात्मिक ज्ञान से

रहित; श्रुत्वा--सुनकर; अन्येभ्य:--अन्यों से; उपासते--पूजा करना प्रारम्भ कर देते हैं;

ते--वे; अपि-- भी; च--तथा; अतितरन्ति--पार कर जाते हैं; एव--निश्चय ही;

मृत्युमू--मृत्यु का मार्ग; श्रुति-परायणा:-- श्रवण विधि के प्रति रुचि रखने वाले

ऐसे भी लोग हैं जो यद्यपि आध्यात्मिक ज्ञान से अवगत

नहीं होते पर अन्यों से परम पुरुष के विषय में सुनकर उनकी

पूजा करने लगते हैं। ये लोग भी प्रामाणिक पुरुषों से श्रवण

करने की मनोवृत्ति होने के कारण जन्म तथा मृत्यु के पथ को

पार कर जाते हैं।

*

यावत्सज्ञायते किश्ञित्सत्त्वं स्थावरजड्रमम्‌ ।

क्षेत्रक्षेत्रज़्संयोगात्तद्विद्वि भरतर्षभ ॥ २७॥

यावत्‌--जो भी; सझ्ञायते--उत्पन्न होता है; किल्लित्‌--कुछ भी; सत्त्वम्‌ू-- अस्तित्व;

स्थावर--अचर; जड्डमम्‌--चर; क्षेत्र--शरीर का क्षेत्र-ज्ञ--तथा शरीर के ज्ञाता के;

संयोगात्‌--संयोग ( जुड़ने ) से; तत्‌ विद्धि--तुम उसे जानो; भरत-ऋषभ-हे

भरतवंशियों में श्रेष्ठ |

है भरतवंशियों में श्रेष्ठ) यह जान लो कि चर तथा अचर

जो भी तुम्हें अस्तित्व में दीख रहा है, वह कर्मक्षेत्र तथा क्षेत्र

के ज्ञाता का संयोग मात्र है।

*

सम॑ सर्वेषु भूतेषु तिष्ठन्तं परमेश्वरम्‌ ।

विनश्यत्स्वविनश्यन्तं य: पश्यति स पश्यति ॥ २८॥

समम्‌--समभाव से; सर्वेषु--समस्त; भूतेषु--जीवों में; तिष्ठन्‌-तम्‌--वास करते हुए;

'परम-ईश्वरम्‌--परमात्मा को; विनश्यत्सु--नाशवान; अविनश्यन्तम्‌--नाशरहित; य: --

जो; पश्यति--देखता है; सः--वही; पश्यति--वास्तव में देखता है

जो परमात्मा को समस्त शरीरों में आत्मा के साथ देखता

है और जो यह समझता है कि इस नश्वर शरीर के भीतर न तो

आत्मा, न ही परमात्मा कभी भी विनष्ट होता है, वही वास्तव

में देखता है।

*

सम॑ पश्यन्हि सर्वत्र समवस्थितमी श्वरम्‌ ।

न हिनस्त्यात्मनात्मानं ततो याति परां गतिम्‌ू ॥ २९॥

समम्‌--समान रूप से; पश्यन्‌ू--देखते हुए; हि--निश्चय ही; सर्वत्र--सभी जगह;

समवस्थितम्‌--समान रूप से स्थित; ईश्वरम्‌--परमात्मा को; न--नहीं; हिनस्ति--नीचे

गिराता है; आत्मना--मन से; आत्मानम्‌--आत्मा को; तत:--तब; याति--पहुँचता है;

पराम्‌--दिव्य; गतिमू--गन्तव्य को |.

जो व्यक्ति परमात्मा को सर्वत्र तथा प्रत्येक जीव में समान

रूप से वर्तमान देखता है, वह अपने मन के द्वारा अपने

आपको भ्रष्ट नहीं करता। इस प्रकार वह दिव्य गन्तव्य को

प्राप्त करता है।

*

प्रकृत्यैव च कर्माणि क्रियमाणानि सर्वशः ।

यः पश्यति तथात्मानमकर्तारं स पश्यति ॥ ३०॥

प्रकृत्या--प्रकृति द्वारा; एव--निश्चय ही; च-- भी; कर्माणि--कार्य; क्रियमाणानि--

सम्पन्न किये गये; सर्वश:--सभी प्रकार से; य:--जो; पश्यति--देखता है; तथा-- भी;

आत्मानम्‌--अपने आपको; अकर्तारम्‌--अकर्ता; सः--वह; पश्यति--अच्छी तरह

देखता है।.

जो यह देखता है कि सारे कार्य शरीर द्वारा सम्पन्न किये

जाते हैं, जिसकी उत्पत्ति प्रकृति से हुई है, और जो देखता है

कि आत्मा कुछ भी नहीं करता, वही यथार्थ में देखता है।

*

यदा भूतपृथग्भावमेकस्थमनुपश्यति ।

तत एव च विस्तारं ब्रह्म सम्पद्यते तदा ॥ ३१॥

यदा--जब; भूत--जीव के; पृथक्‌-भावम्‌--पृथक्‌ स्वरूपों को; एक-स्थम्‌--एक

स्थान पर; अनुपश्यति--किसी अधिकारी के माध्यम से देखने का प्रयास करता है;

ततः एब--तत्पश्चात्‌; च-- भी; विस्तारम्‌--विस्तार को; ब्रह्म--परब्रह्म; सम्पद्यते --

प्राप्त करता है तदा--उस समय।.

जब विवेकवान्‌ व्यक्ति विभिन्न भौतिक शरीरों के कारण

विभिन्न स्वरूपों को देखना बन्द कर देता है, और यह देखता

है कि किस प्रकार से जीव सर्वत्र फैले हुए हैं, तो वह ब्रह्म-

बोध को प्राप्त होता है।

*

अन॒दित्वान्निर्गुणत्वात्परमात्मायमव्यय: ।

शरीरस्थोपि कौन्तेय न करोति न लिप्यते ॥ ३२॥

अनादित्वातू--नित्यता के कारण; निर्गुणत्वात्‌-दिव्य होने से; परम-- भौतिक प्रकृति

से परे; आत्मा--आत्मा; अयम्‌--यह; अव्यय:--अविनाशी; शरीर-स्थ:--शरीर में

वास करने वाला; अपि--यद्यपि; कौन्तेय--हे कुन्तीपुत्र; न करोति--कुछ नहीं करता;

न लिप्यते--न ही लिप्त होता है,

शाश्वत दृष्टिसम्पन्न लोग यह देख सकते हैं कि अविनाशी

आत्मा दिव्य, शाश्वत तथा गुणों से अतीत है। हे अर्जुन!

भौतिक शरीर के साथ सम्पर्क होते हुए भी आत्मा न तो कुछ

करता है और न लिप्त होता है।

*

यथा सर्वगतं सौक्ष्म्यादाकाशं नोपलिप्यते ।

सर्वत्रावस्थितो देहे तथात्मा नोपलिप्यते ॥ ३३॥

यथा--जिस प्रकार; सर्व-गतम्‌--सर्वव्यापी; सौक्ष्म्यात्‌--सूक्ष्म होने के कारण;

आकाशम्‌--आकाश; न--कभी नहीं; उपलिप्यते--लिप्त होता है; सर्वत्र--सभी

जगह; अवस्थित:--स्थित; देहे--शरीर में; तथा--उसी प्रकार; आत्मा-- आत्मा, स्व;

न--कभी नहीं; उपलिप्यते--लिप्त होता है |.

यद्यपि आकाश सर्वव्यापी है, किन्तु अपनी सूक्ष्म प्रकृति

के कारण, किसी वस्तु से लिप्त नहीं होता। इसी तरह ब्रह्मदृष्टि

में स्थित आत्मा, शरीर में स्थित रहते हुए भी, शरीर से लिप्त

नहीं होता।

*

यथा प्रकाशयत्येक: कृत्स्नं लोकमिमं रवि: ।

क्षेत्र क्षेत्री तथा कृत्स्नं प्रकाशयति भारत ॥ ३४॥

यथा--जिस तरह; प्रकाशयति--प्रकाशित करता है; एक:--एक; कृत्स्तम्‌--सम्पूर्ण;

लोकमू--ब्रह्माण्ड को; इमम्‌--इस; रवि:--सूर्य ; क्षेत्रमू--इस शरीर को; क्षेत्री--

आत्मा; तथा--उसी तरह; कृत्स्नम्‌--समस्त; प्रकाशयति-- प्रकाशित करता है;

भारत--हे भरतपुत्र |.

हे भरतपुत्र! जिस प्रकार सूर्य अकेले इस सारे ब्रह्माण्ड को

प्रकाशित करता है, उसी प्रकार शरीर के भीतर स्थित एक

आत्मा सारे शरीर को चेतना से प्रकाशित करता है।

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क्षेत्रक्षेत्रज्योरेवमन्तरं ज्ञानचक्षुषा ।

भूतप्रकृतिमोक्ष॑ च ये विदुर्यान्ति ते परम्‌ ॥ ३५॥

क्षेत्र--शरीर।; क्षेत्र-ज्ञयो: --तथा शरीर के स्वामी के; एवम्‌--इस प्रकार; अन्तरम्‌--

अन्तर को; ज्ञान-चक्षुषा--ज्ञान की दृष्टि से; भूत--जीव का; प्रकृति--प्रकृति से;

मोक्षम्‌-मोक्ष को; च-- भी; ये-- जो; विदुः--जानते हैं; यान्ति--प्राप्त होते हैं; ते--

वे; परम्‌--परब्रह्म को.

जो लोग ज्ञान के चक्षुओं से शरीर तथा शरीर के ज्ञाता के

अन्तर को देखते हैं और भव-बन्धन से मुक्ति की विधि को

भी जानते हैं, उन्हें परमलक्ष्य प्राप्त होता है।

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