अध्याय 14 - प्रकृति के तीन गुण
अश्रीथगवानुवाच
पर भूय: प्रवक्ष्यामि ज्ञानानां ज्ञानमुत्तमम् ।
यज्ज्ञात्वा मुनयः सर्वे परां सिद्धिमितो गता: ॥ १॥
श्री-भगवान् उवाच-- भगवान् ने कहा; परम्--दिव्य; भूय:--फिर; प्रवक्ष्यामि--
कहूँगा; ज्ञानानामू--समस्त ज्ञान का; ज्ञानमू--ज्ञान; उत्तमम्--सर्व श्रेष्ठ; यत्--जिसे;
ज्ञात्वा--जानकर; मुनयः--मुनि लोग; सर्वे--समस्त; पराम्--दिव्य; सिद्धिम्--सिद्धि
को; इत:ः--इस संसार से; गता:--प्राप्त किया ।.
भगवान् ने कहा--अब मैं तुमसे समस्त ज्ञानों में सर्वश्रेष्ठ
इस परम ज्ञान को पुनः कहूँगा, जिसे जान लेने पर समस्त
मुनियों ने परम सिद्धि प्राप्त की है।
*
इदं ज्ञानमुपाभ्रित्य मम साधर्म्यमागता: ।
सर्गेडपि नोपजायन्ते प्रलये न व्यथन्ति च ॥ २॥
इदम्--इस; ज्ञानमू--ज्ञान को; उपाशभ्रित्य-- आश्रय बनाकर; मम--मेरा; साधर्म्यम्--
समान प्रकृति को; आगता: --प्राप्त करके; सर्गे अपि--सृष्टि में भी; न--कभी नहीं;
उपजायन्ते--उत्पन्न होते हैं; प्रलये--प्रलय में; न--न तो; व्यथन्ति--विचलित होते हैं;
च--भी |,
इस ज्ञान में स्थिर होकर मनुष्य मेरी जैसी दिव्य प्रकृति
( स्वभाव ) को प्राप्त कर सकता है। इस प्रकार स्थित हो जाने
पर वह न तो सृष्टि के समय उत्पन्न होता है और न प्रलय के
समय विचलित होता है।
*
मम योनिर्महद्ब्रह्म तस्मिन्गर्भ दधाम्यहम् ।
सम्भव: सर्वभूतानां ततो भवति भारत ॥ ३॥
मम--मेरा; योनि:--जन्म-स्त्रोत; महत्--सम्पूर्ण भौतिक जगत्; ब्रह्म--परम;
तस्मिनू--उसमें; गर्भभ्--गर्भ; दधामि-- उत्पन्न करता हूँ; अहम्--मैं; सम्भव: --
सम्भावना; सर्व-भूतानाम्--समस्त जीवों का; ततः--तत्पश्चात्; भवति--होता है;
भारत--हे भरत पुत्र |.
है भरतपुत्र! ब्रह्म नामक समग्र भौतिक वस्तु जन्म का
स्रोत है और मैं इसी ब्रह्म को गर्भस्थ करता हूँ, जिससे समस्त
जीवों का जन्म सम्भव होता है।
*
सर्वयोनिषु कौन्तेय मूर्तय: सम्भवन्ति या: ।
तासां ब्रह्म महद्योनिरहं बीजप्रदः पिता ॥ ४॥
सर्व-योनिषु--समस्त योनियों में; कौन्तेय--हे कुन्तीपुत्र; मूर्तयः--स्वरूप;
सम्भवन्ति-- प्रकट होते हैं; या:--जो; तासाम्--उन सबों का; ब्रह्म--परम; महत्
योनि:--जन्म स्त्रोत; अहम्--मैं; बीज-प्रदः--बीजप्रदाता; पिता--पिता |.
हे कुन्तीपुत्र! तुम यह समझ लो कि समस्त प्रकार की
जीव-योनियाँ इस भौतिक प्रकृति में जन्म द्वारा सम्भव हैं और
मैं उनका बीज-प्रदाता पिता हूँ।
*
सत्त्वं रजस्तम इति गुणा: प्रकृतिसम्भवा: ।
निबध्नन्ति महाबाहो देहे देहिनमव्ययम् ॥ ५॥
सत्त्वमू--सतोगुण; रज:--रजोगुण; तम:--तमोगुण; इति--इस प्रकार; गुणा:--गुण;
प्रकृति-- भौतिक प्रकृति से; सम्भवा:--उत्पन्न; निबध्नन्ति--बाँधते हैं; महा-बाहो--हे
बलिष्ठ भुजाओं वाले; देहे--इस शरीर में; देहिनम्--जीव को; अव्ययम्--नित्य,
अविनाशी |.
भौतिक प्रकृति तीन गुणों से युक्त है। ये हैं--सतो, रजो
तथा तमोगुण। हे महाबाहु अर्जुन! जब शाश्वत जीव प्रकृति के
संसर्ग में आता है, तो वह इन गुणों से बँध जाता है।
*
तत्र सत्त्व॑ निर्मलत्वात्प्रकाशकमनामयम् ।
सुखसड्डिन बध्नाति ज्ञानसड़ेन चानघ ॥ ६॥
तत्र--वहाँ; सत्त्वम्--सतोगुण; निर्मलत्वात्-- भौतिक जगत् में शुद्धतम होने के
कारण; प्रकाशकम्--प्रकाशित करता हुआ; अनामयम्--किसी पापकर्म के बिना;
सुख--सुख की; सड्जेन--संगति के द्वारा; बध्नाति--बाँधता है; ज्ञान--ज्ञान की;
सड्लेन--संगति से; च-- भी; अनघ--हे पापरहित।.
है निष्पाप! सतोगुण अन्य गुणों की अपेक्षा अधिक शुद्ध
होने के कारण प्रकाश प्रदान करने वाला और मनुष्यों को
सारे पाप कर्मो से मुक्त करने वाला है। जो लोग इस गुण में
स्थित होते हैं, वे सुख तथा ज्ञान के भाव से बँध जाते हैं।
*
रजो रागात्मकं विद्धि तृष्णासड्रसमुद्धवम् ।
तन्निबध्नाति कौन्तेय कर्मसड्रेन देहिनम् ॥ ७॥
रज:--रजोगुण; राग-आत्मकम्--आकांक्षा या काम से उत्पन्न; विद्धि--जानो;
तृष्णा--लोभ से; सड़--संगति से; समुद्धवम्--उत्पन्न; तत्--वह; निबध्नाति--
बाँधता है; कौन्तेय--हे कुन्तीपुत्र; कर्म-सड्रेन--सकाम कर्म की संगति से; देहिनम्--
देहधारी को।.
हे कुन्तीपुत्र! रजोगुण की उत्पत्ति असीम आकांक्षाओं
तथा तृष्णाओं से होती है और इसी के कारण से यह देहधारी
जीव सकाम कर्मों से बँध जाता है।
*
तमस्त्वज्ञानजं विद्ध्धि मोहनं सर्वदेहिनाम् ।
प्रमादालस्यनिद्राभिस्तन्निबध्नाति भारत ॥ ८॥
तम:--तमोगुण; तु--लेकिन; अज्ञान-जम्--अज्ञान से उत्पन्न; विद्धि--जानो;
मोहनम्--मोह; सर्व-देहिनाम्--समस्त देहधारी जीवों का; प्रमाद--पागलपन;
आलस्य--आलस; निद्राभिः--तथा नींद द्वारा; तत्--वह; निबध्नाति--बाँधता है;
भारत--हे भरतपुत्र |.
हे भरतपुत्र! तुम जान लो कि अज्ञान से उत्पन्न तमोगुण
समस्त देहधारी जीवों का मोह है। इस गुण के प्रतिफल
पागलपन ( प्रमाद ), आलस तथा नींद हैं, जो बद्धजीव को
बाँधते हैं।
*
सत्त्वं सुखे सञ्ञयति रज: कर्मणि भारत ।
ज्ञानमावृत्य तु तमः प्रमादे सद्भयत्युत ॥ ९॥
सत्त्वमू--सतोगुण; सुखे--सुख में; सञ्यति--बाँधता है; रज:--रजोगुण; कर्मणि--
सकाम कर्म में; भारत--हे भरतपुत्र; ज्ञानमू--ज्ञान को; आवृत्य--ढक कर; तु--
लेकिन; तम:--तमोगुण; प्रमादे--पागलपन में; सञ्लयति--बाँधता है; उत--ऐसा कहा
जाता है।
हे भरतपुत्र! सतोगुण मनुष्य को सुख से बाँधता है,
रजोगुण सकाम कर्म से बाँधता है और तमोगुण मनुष्य के
ज्ञान को ढक कर उसे पागलपन से बाँधता है।
*
रजस्तमश्वाभिभूय सत्त्वं भवति भारत ।
रजः सत्त्वं तमश्लेव तमः सत्त्वं रजस्तथा ॥ १०॥
रज:--रजोगुण; तम:ः --तमोगुण को; च-- भी; अभिभूय--पार करके; सत्त्वम्--
सतोगुण; भवति--प्रधान बनता है; भारत--हे भरतपुत्र; रज:--रजोगुण; सत्त्वम्--
सतोगुण को; तम:ः--तमोगुण; च-- भी; एब--उसी तरह; तम:--तमोगुण; सत्त्वम्--
सतोगुण को; रज:--रजोगुण; तथा--इस प्रकार |
है भरतपुत्र! कभी-कभी सतोगुण रजोगुण तथा तमोगुण
को परास्त करके प्रधान बन जाता है तो कभी रजोगुण सतो
तथा तमोगुणों को परास्त कर देता है और कभी ऐसा होता है
कि तमोगुण सतो तथा रजोगुणों को परास्त कर देता है। इस
प्रकार श्रेष्ठता के लिए निरन्तर स्पर्धा चलती रहती है।
*
सर्वद्वारेषु देहेउस्मिन्प्रकाश उपजायते ।
ज्ञानं यदा तदा विद्याद्विवृद्धं सत्त्वमित्युत ॥ ११॥
सर्व-द्वारेषु--सारे दरवाजों में; देहे अस्मिन्--इस शरीर में; प्रकाश:--प्रकाशित करने
का गुण; उपजायते--उत्पन्न होता है; ज्ञानम्ू--ज्ञान; यदा--जब; तदा--उस समय;
विद्यात्ू--जानो; विवृद्धम्--बढ़ा हुआ; सत्त्वम्--सतोगुण; इति उत--ऐसा कहा गया
है।
सतोगुण की अभिव्यक्ति को तभी अनुभव किया जा
सकता है, जब शरीर के सरे द्वार ज्ञान के प्रकाश से प्रकाशित
होते हैं।
*
लोभ: प्रवृत्तिरारम्भ: कर्मणामशम: स्पूहा ।
रजस्येतानि जायन्ते विवृद्धे भरतर्षभ ॥ १२॥
लोभ:--लोभ; प्रवृत्तिः--कार्य; आरम्भ:--उद्यम; कर्मणाम्--कर्मो में; अशमः--
अनियन्त्रित; स्पृहा--इच्छा; रजसि--रजोगुण में; एतानि--ये सब; जायन्ते--प्रकट
होते हैं; विवृद्धे-- अधिकता होने पर; भरत-ऋषभ--हे भरतवंशियों में प्रमुख ॥
है भरतवंशियों में प्रमुख! जब रजोगुण में वृद्धि हो जाती
है, तो अत्यधिक आसक्ति, सकाम कर्म, गहन उद्यम तथा
अनियन्त्रित इच्छा एवं लालसा के लक्षण प्रकट होते हैं।
*
अप्रकाशो5प्रवृत्तिश्चव प्रमादो मोह एव च ।
तमस्येतानि जायन्ते विवृद्धे कुरूनन्दन ॥ १३॥
अप्रकाश: --अँधेरा; अप्रवृत्तिः--निष्क्रियता; च--तथा; प्रमाद: --पागलपन; मोह: --
मोह; एब--निश्चय ही; च-- भी; तमसि--तमोगुण; एतानि--ये; जायन्ते--प्रकट होते
हैं; विवृद्धे--बढ़ जाने पर; कुरु-नन्दन--हे कुरुपुत्र |
जब तमोगुण में वृद्धि हो जाती है, तो हे कुरुपुत्र! अँधेरा,
जड़ता, प्रमत्तता तथा मोह का प्राकट्य होता है।
*
यदा सच्ते प्रवृद्धे तु प्रलयं याति देहभूत् ।
तदोत्तमविदां लोकानमलान्प्रतिपद्यते ॥ १४॥
यदा--जब; सत्त्वे--सतोगुण में; प्रवृद्धे--बढ़ जाने पर; तु--लेकिन; प्रलयम्--संहार,
विनाश को; याति--जाता है; देह-भृत्--देहधारी; तदा--उस समय; उत्तम-विदाम्--
ऋषियों के; लोकान्ू--लोकों को; अमलानू--शुद्ध; प्रतिपद्यते--प्राप्त करता है |.
जब कोई सतोगुण में मरता है, तो उसे महर्षियों के
विशुद्ध उच्चतर लोकों की प्राप्ति होती है।
*
रजसि प्रलयं गत्वा कर्मसड्रिषु जायते ।
तथा प्रलीनस्तमसि मूढयोनिषु जायते ॥ १५॥
रजसि--रजोगुण में; प्रलयम्--प्रलय को; गत्वा--प्राप्त करके; कर्म-सड्डिषु--सकाम
कर्मियों की संगति में; जायते--जन्म लेता है; तथा--उसी प्रकार; प्रलीन:--विलीन
होकर; तमसि--अज्ञान में; मूढ-योनिषु--पशुयोनि में; जायते--जन्म लेता है।
जब कोई रजोगुण में मरता है, तो वह सकाम कर्मियों के
बीच में जन्म ग्रहण करता है और जब कोई तमोगुण में मरता
है, तो वह पशुयोनि में जन्म धारण करता है।
*
कर्मणः सुकृतस्याहुः सात्त्विकं निर्मल फलम् ।
रजसस्तु फलं दुःखमज्ञानं तमस: फलम् ॥ १६॥
कर्मण:--कर्म का; सु-कृतस्य--पुण्य; आहु:--कहा गया है; सात्त्विकम्--सात्त्विक;
निर्मलम्-विशुद्ध; फलम्--फल; रजस:--रजोगुण का; तु--लेकिन; फलम्--फल;
दुःखम्--दुःख; अज्ञानम्-व्यर्थ; तमस:--तमोगुण का; फलम्--फल।.
पुण्यकर्म का फल शुद्ध होता है और सात्त्विक कहलाता
है। लेकिन रजोगुण में सम्पन्न कर्म का फल दुख होता है और
तमोगुण में किये गये कर्म मूर्खता में प्रतिफलित होते हैं।
*
सत्त्वात्सज्ञायते ज्ञानं रजसो लोभ एवच ।
प्रमादमोहौ तमसो भवतोउ5ज्ञानमेव च ॥ १७॥
सत्त्वातू-सतोगुण से; सज्ञायते--उत्पन्न होता है; ज्ञाममू--ज्ञान; रजस:--रजोगुण से;
लोभ:ः--लालच; एव--निश्चय ही; च-- भी; प्रमाद--पागलपन; मोहौ--तथा मोह;
तमसः--तमोगुण से; भवतः--होता है; अज्ञानमू--अज्ञान; एव--निश्चय ही; च--
भी
सतोगुण से वास्तविक ज्ञान उत्पन्न होता है, रजोगुण से
लोभ उत्पन्न होता है और तमोगुण से अज्ञान, प्रमाद और मोह
उत्पन्न होते हैं।
*
ऊर्ध्व॑ गच्छन्ति सत्त्वस्था मध्ये तिष्ठन्ति राजसा: ।
जघन्यगुणवृत्तिस्था अधो गच्छन्ति तामसा: ॥ १८॥
ऊर्ध्वम्--ऊपर; गच्छन्ति--जाते हैं; सत्त्व-स्था:--जो सतोगुण में स्थित हैं; मध्ये--
मध्य में; तिष्ठन्ति--निवास करते हैं; राजसा:--रजोगुणी; जघन्य--गर्हित; गुण--गुण;
वृत्ति-स्था:--जिनकी वृत्तियाँ या व्यवसाय; अध:--नीचे, निम्न; गच्छन्ति--जाते हैं;
तामसा:--तमोगुणी लोग,
सतोगुणी व्यक्ति क्रमशः उच्च लोकों को ऊपर जाते हैं,
रजोगुणी इसी पृथ्वीलोक में रह जाते हैं, और जो अत्यन्त
गर्हित तमोगुण में स्थित हैं, वे नीचे नरक लोकों को जाते हैं
*
नान्य॑ं गुणेभ्य: कर्तारें यदा द्रष्टानुपश्यति ।
गुणेभ्यश्व परं वेत्ति मद्भावं सोडधिगच्छति ॥ १९॥
न--नहीं; अन्यम्-दूसरा; गुणेभ्य:--गुणों के अतिरिक्त; कर्तारम्--कर्ता; यदा--
जब; द्रष्टा--देखने वाला; अनुपश्यति--ठीक से देखता है; गुणेभ्य:--गुणों से; च--
तथा; परम्--दिव्य; वेत्ति--जानता है; मत्-भावम्--मेरे दिव्य स्वभाव को; सः--वह;
अधिगच्छति-प्राप्त होता है ५
जब कोई यह अच्छी तरह जान लेता है कि समस्त कार्यो
में प्रकृति के तीनों गुणों के अतिरिक्त अन्य कोई कर्ता नहीं है
और जब वह परमेश्वर को जान लेता है, जो इन तीनों गुणों से
परे है, तो वह मेरे दिव्य स्वभाव को प्राप्त होता है।
*
गुणानेतानतीत्य त्रीन्देही देहसमुद्धवान् ।
जन्ममृत्युजरादु:खैर्विमुक्तो डमृतमएनुते ॥ २०॥
गुणान्-गुणों को; एतान्ू--इन सब; अतीत्य--लाँघ कर; त्रीन्ू-- तीन; देही--
देहधारी; देह--शरीर; समुद्धवान्--उत्पन्न; जन्म--जन्म; मृत्यु-- मृत्यु; जरा--बुढ़ापे
का; दुःखै:--दुःखों से; विमुक्त:--मुक्त; अमृतम्-- अमृत; अश्नुते--भोगता है।
जब देहधारी जीव भौतिक शरीर से सम्बद्ध इन तीनों
गुणों को लाँघने में समर्थ होता है, तो वह जन्म, मृत्यु, बुढ़ापा
तथा उनके कष्टों से मुक्त हो सकता है और इसी जीवन में
अमृत का भोग कर सकता है।
*
अर्जुन उवाच
कैलिड्रैस्त्रीन्गयुणानेतानतीतो भवति प्रभो ।
किमाचार: कथं चैतांस्त्रीन्गुणानतिवर्तते ॥ २१॥
अर्जुन: उवाच--अर्जुन ने कहा; कैः--किन; लिड्डैः--लक्षणों से; त्रीन्ू--तीनों;
गुणान्ू--गुणों को; एतान्ू--ये सब; अतीतः--लाँघा हुआ; भवति--है; प्रभो--हे
प्रभु; किमू--क्या; आचार: --आचरण; कथम्--कैसे; च-- भी; एतानू--वे; त्रीन्--
तीनों; गुणान्ू--गुणों को; अतिवर्तते--लाँघता है।.
अर्जुन ने पूछा-हे भगवान्! जो इन तीनों गुणों से परे है,
वह किन लक्षणों के द्वारा जाना जाता है? उसका आचरण
कैसा होता है? और वह प्रकृति के गुणों को किस प्रकार
लाँघता है ?
*
रीभगवानुवाच
प्रकाशं च् प्रवृत्ति च मोहमेव च पाण्डव ।
न द्वेष्टि सम्प्रवृत्तानि न निवृत्तानि काइक्षति ॥ २२॥
उदासीनवदासीनो गुणैयों न विचाल्यते ।
गुणा वर्तन्त इत्येवं योडवतिष्ठति नेड़ते ॥ २३॥
समदुःखसुख: स्वस्थ: समलोष्टाश्मकाञ्जन: ।
तुल्यप्रियाप्रियो धीरस्तुल्यनिन्दात्मसंस्तुतिः ॥ २४॥
मानापमानयोस्तुल्यस्तुल्यो मित्रारिपक्षयो: ।
सर्वारम्भपरित्यागी गुणातीत: स उच्यते ॥ २५॥
श्री-भगवान् उवाच-- भगवान् ने कहा; प्रकाशम्-- प्रकाश; च--तथा; प्रवृत्तिम्--
आसक्ति; च--तथा; मोहम्ू--मोह; एव च-- भी; पाण्डब--हे पाएडुपुत्र; न द्वेष्टि--
घृणा नहीं करता; सम्प्रवृत्तानि--यद्यपि विकसित होने पर; न निवृत्तानि--न ही विकास
के रुकने पर; काड्क्षति--चाहता है; उदासीन-वत्--निरपेक्ष की भाँति; आसीन:--
स्थित; गुणैः--गुणों के द्वारा; यः--जो; न--कभी नहीं; विचाल्यते--विचलित होता
है; गुणा:--गुण; वर्तन्ते--कार्यशील होते हैं; इति एवम्--इस प्रकार जानते हुए;
यः--जो; अवतिष्ठति--रहा आता है; न--कभी नहीं; इड्गते--हिलता डुलता है;
सम--समान; दुःख--दुःख; सुख: --तथा सुख में; स्व-स्थ:--अपने में स्थित; सम--
समान रूप से; लोष्ट--मिट्टी का ढेला; अश्म--पत्थर; काञझ्जन:--सोना; तुल्य--
समभाव; प्रिय--प्रिय; अप्रिय:--तथा अप्रिय को; धीर:--धीर; तुल्य--समान;
निन्दा--बुराई; आत्म-संस्तुतिः--तथा अपनी प्रशंसा में; मान--सम्मान; अपमानयो: --
तथा अपमान में; तुल्य:--समान; तुल्य:--समान; मित्र--मित्र; अरि--तथा शत्रु के;
पक्षयो:--पक्षों या दलों को; सर्व--सबों का; आरम्भ--प्रयत्न, उद्यम; परित्यागी--
त्याग करने वाला; गुण-अतीत:--प्रकृति के गुणों से परे; सः--वह; उच्यते--कहा
जाता है।.
भगवान् ने कहा- हे पाण्डुपुत्र! जो प्रकाश, आसक्ति तथा
मोह के उपस्थित होने पर न तो उनसे घृणा करता है और न
लुप्त हो जाने पर उनकी इच्छा करता है, जो भौतिक गुणों की
इन समस्त प्रतिक्रियाओं से निश्चल तथा अविचलित रहता है
और यह जानकर कि केवल गुण ही क्रियाशील हैं, उदासीन
तथा दिव्य बना रहता है, जो अपने आपमें स्थित है और सुख
तथा दुख को एकसमान मानता है, जो मिट्टी के ढेले, पत्थर
एवं स्वर्ण के टुकड़े को समान दृष्टि से देखता है, जो अनुकूल
तथा प्रतिकूल के प्रति समान बना रहता है, जो धीर है और
प्रशंसा तथा बुराई, मान तथा अपमान में समान भाव से रहता
है, जो शत्रु तथा मित्र के साथ समान व्यवहार करता है और
जिसने सारे भौतिक कार्यो का परित्याग कर दिया है, ऐसे
व्यक्ति को प्रकृति के गुणों से अतीत कहते हैं।
*
मां च यो5व्यभिचारेण भक्तियोगेन सेवते ।
स गुणान्समतीत्यैतान्ब्रह्मभूयाय कल्पते ॥ २६॥
मामू-मेरी; च-- भी; यः--जो व्यक्ति; अव्यभिचारेण--बिना विचलित हुए; भक्ति-
योगेन--भक्ति से; सेवते--सेवा करता है; सः--वह; गुणान्-- प्रकृति के गुणों को;
समतीत्य--लाँघ कर; एतानू--इन सब; ब्रह्म-भूयाय--ब्रह्म पद तक ऊपर उठा हुआ;
कल्पते--हो जाता है|.
जो समस्त परिस्थितियों में अविचलित भाव से पूर्ण भक्ति
में प्रवृत्त होता है, वह तुरन्त ही प्रकृति के गुणों को लाँघ जाता
है और इस प्रकार ब्रह्म के स्तर तक पहुँच जाता है।
*
ब्रह्मणो हि प्रतिष्ठाहममृतस्याव्ययस्य च ।
शाश्वतस्य च धर्मस्य सुखस्यैकान्तिकस्य च ॥ २७॥
ब्रह्मण: --निराकार ब्रह्मज्योति का; हि--निश्चय ही; प्रतिष्ठा--आश्रय; अहम्--मैं हूँ;
अमृतस्य--अमर्त्य का; अव्ययस्य--अविनाशी का; च--भी; शा श्वतस्य--शा श्वत का;
च--तथा; धर्मस्य--स्वाभाविक स्थिति ( स्वरूप ) का; सुखस्य--सुख का;
ऐकान्तिकस्य--चरम, अन्तिम; च-- भी |
और मैं ही उस निराकार ब्रह्म का आश्रय हूँ, जो अमर्त्य,
अविनाशी तथा शाश्वत है और चरम सुख का स्वाभाविक पद
है।
*
