अध्याय 6 - ध्यानयोग
श्रीभगवानुवाच
अनाश्रितः कर्मफलं कार्यं कर्म करोति यः |
स संन्यासी च योगी च न निरग्निर्न चाक्रियः || १ ||
श्रीभगवान् उवाच – भगवान् ने कहा; अनाश्रितः – शरण ग्रहण किये बिना; कर्म-फलम् – कर्मफल की; कार्यम् – कर्तव्य; कर्म- कर्म; करोति – करता है; यः – जो; सः – वह; संन्यासी – संन्यासी; च – भी; योगी – योगी; च – भी; न – नहीं; निः – रहित; अग्निः – अग्नि; न – न तो; च – भी; अक्रियः – क्रियाहीन |
श्रीभगवान् ने कहा – जो पुरुष अपने कर्मफल के प्रति अनासक्त है और जो अपने कर्तव्य का पालन करता है, वही संन्यासी और असली योगी है | वह नहीं, जो न तो अग्नि जलाता है और न कर्म करता है |
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यं सन्न्यासमिति प्राहुर्योगं तं विद्धि पाण्डव |
न ह्यसन्न्यस्तसङ्कल्पो योगी भवति कश्र्चन || २ ||
यम् –जिसको; संन्यासम् – संन्यास; इति – इस प्रकार; प्राहुः – कहते हैं; योगम् – परब्रह्म के साथ युक्त होना; तम् – उसे; विद्धि – जानो; पाण्डव – हे पाण्डुपुत्र; न – कभी नहीं; हि – निश्चय हि; असंन्यस्त – बिना त्यागे; सङ्कल्पः – आत्मतृप्ति की इच्छा; योगी – योगी; भवति – होता है; कश्र्चन – कोई |
हे पाण्डुपुत्र! जिसे संन्यास कहते हैं उसे ही तुम योग अर्थात् परब्रह्म से युक्त होना जानो क्योंकि इन्द्रियतृप्ति के लिए इच्छा को त्यागे बिना कोई कभी योगी नहीं हो सकता |
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आरूरूक्षोर्मुनेर्योगं कर्म कारणमुच्यते |
योगारुढस्य तस्यैव शमः कारणमुच्यते || ३ ||
आरुरुक्षोः – जिसने अभी योग प्रारम्भ किया है; मुनेः – मुनि की; योगम् – अष्टांगयोग पद्धति; कर्म – कर्म; कारणम् – साधन; उच्यते – कहलाता है; योग – अष्टांगयोग; आरुढस्य – प्राप्त होने वाले का; तस्य – उसका; एव – निश्चय हि; शमः – सम्पूर्ण भौतिक कार्यकलापों का त्याग; कारणाम् – कारण; उच्यते – कहा जाता है |
अष्टांगयोग के नवसाधक के लिए कर्म साधन कहलाता है और योगसिद्ध पुरुष के लिए समस्त भौतिक कार्यकलापों का परित्याग ही साधन कहा जाता है |
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यदा हि नेन्द्रियार्थेषु न कर्मस्वनुषज्जते |
सर्वसङ्कल्पसन्न्यासी योगारूढस्तदोच्यते || ४ ||
यदा – जब; हि – निश्चय ही; न – नहीं; इन्द्रिय-अर्थेषु – इन्द्रियतृप्ति में; न – कभी नहीं; कर्मसु – सकाम कर्म में; अनुषज्जते – निरत रहता है; सर्व-सङ्कल्प – समस्त भौतिक इच्छाओं का; संन्यासी – त्याग करने वाला; योग-आरूढः – योग में स्थित; तदा – उस समय; उच्यते – कहलाता है |
जब कोई पुरुष समस्त भौतिक इच्छाओं का त्यागा करके न तो इन्द्रियतृप्ति के लिए कार्य करता है और न सकामकर्मों में प्रवृत्त होता है तो वह योगारूढ कहलाता है |
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उद्धरेदात्मनात्मानं नात्मानमवसादयेत् |
आत्मैव ह्यात्मनो बन्धुरात्मैव रिपुरात्मनः || ५ ||
उद्धरेत् – उद्धार करे; आत्मना – मन से; आत्मानम् – बद्धजीव को; न – कभी नहीं; आत्मानम् – बद्धजीव को; अवसदायेत् – पतन होने दे; आत्मा – मन; एव – निश्चय ही; हि – निस्सन्देह; आत्मनः – बद्धजीव का; बन्धुः – मित्र; आत्मा – मन; एव – निश्चय ही; रिपुः – शत्रु; आत्मनः – बद्धजीव का |
मनुष्य को चाहिए कि अपने मन की सहायता से अपना उद्धार करे और अपने को नीचे ण गिरने दे | यह मन बद्धजीव का मित्र भी है और शत्रु भी |
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बन्धुरात्मात्मनस्तस्य येनात्मैवात्मना जितः |
अनात्मस्तु शत्रुत्वे वर्तेतात्मैव शत्रुवत् || ६ ||
बन्धुः – मित्र; आत्मा – मन; आत्मनः – जीव का; तस्य – उसका; येन – जिससे; आत्मा- मन; एव – निश्चय ही; आत्मना – जीवात्मा के द्वारा; जितः – विजित; अनात्मनः – जो मन को वश में नहीं कर पाया उसका; तू – लेकिन; शत्रुत्वे – शत्रुता के करण; वर्तेत – बना रहता है; आत्मा एव – वाही मन; शत्रु-वत् – शत्रु की भाँति |
जिसने मन को जीत लिया है उसके लिए मन सर्वश्रेष्ठ मित्र है, किन्तु जो ऐसा नहीं कर पाया इसके लिए मन सबसे बड़ा शत्रु बना रहेगा |
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जितात्मनः प्रशान्तस्य परमात्मा समाहितः |
शीतोष्णसुखदु:खेषु तथा मानापमानयो: || ७ ||
जित-आत्मनः – जिसने मन को जीत लिया है; प्रशान्तस्य – मन को वश में करके शान्ति प्राप्त करने वाले का; परम-आत्मा – परमात्मा; समाहितः – पूर्णरूप से प्राप्त; शीत – सर्दी; उष्ण – गर्मी में; सुख – सुख; दुःखेषु – तथा दुख में; तथा – भी; मान – सम्मान; अपमानयोः – तथा अपमान में |
जिसने मन को जीत लिया है, उसने पहले ही परमात्मा को प्राप्त कर लिया है, क्योंकि उसने शान्ति प्राप्त कर ली है | ऐसे पुरुष के लिए सुख-दुख, सर्दी-गर्मी एवं मान-अपमान एक से हैं |
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ज्ञानविज्ञानतृप्तात्मा कूटस्थो विजितेन्द्रियः |
युक्त इत्युच्यते योगी समलोष्ट्राश्मकाञ्चनः || ८ ||
ज्ञान – अर्जित ज्ञान; विज्ञान – अनुभूत ज्ञान से; तृप्त – सन्तुष्ट; आत्मा – जीव; कूट-स्थः – आध्यात्मिक रूप से स्थित; विजित-इन्द्रियः – इन्द्रियों के वश में करके; युक्तः – आत्म-साक्षात्कार के लिए सक्षम; इति – इस प्रकार; उच्यते – कहा जाता है; योगी – योग का साधक; सम – समदर्शी; लोष्ट्र – कंकड़; अश्म – पत्थर; काञ्चनः – स्वर्ण |
वह व्यक्ति आत्म-साक्षात्कार को प्राप्त तथा योगी कहलाता है जो अपने अर्जित ज्ञान तथा अनुभूति से पूर्णतया सन्तुष्ट रहता है | ऐसा व्यक्ति अध्यात्म को प्राप्त तथा जितेन्द्रिय कहलाता है | वह सभी वस्तुओं को – चाहे वे कंकड़ हों, पत्थर हों या कि सोना – एकसमान देखता है |
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सुहृन्मित्रार्युदासीनमध्यस्थद्वेष्यबन्धुषु |
साधुष्वपि च पापेषु समबुद्धिर्विशिष्यते || ९ ||
सु-हृत् – स्वभाव से; मित्र – स्नेहपूर्ण हितेच्छु; अरि – शत्रु; उदासीन – शत्रुओं में तटस्थ; मध्य-स्थ – शत्रुओं में पंच; द्वेष – ईर्ष्यालु; बन्धुषु – सम्बन्धियों या शुभेच्छुकों; साधुषु – साधुओं में; अपि – भी; च – तथा; पापेषु – पापियों में; सम-बुद्धिः – सामान बुद्धि वाला; विशिष्यते – आगे बढ़ा हुआ होता है |
जब मनुष्य निष्कपट हितैषियों, प्रिय मित्रों, तटस्थों, मध्यस्थों, ईर्ष्यालुओं, शत्रुओं तथा मित्रों, पुण्यात्माओं एवं पापियों को समान भाव से देखता है, तो वह और भी उन्नत माना जाता है |
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योगी युञ्जीत सततमात्मनं रहसि स्थितः |
एकाकी यतचित्तात्मा निराशीरपरिग्रहः || १० ||
योगी – योगी; युञ्जित – कृष्णचेतना में केन्द्रित करे; सततम् – निरन्तर; आत्मानम् – स्वयं को (मन, शरीर तथा आत्मा से); रहसि – एकान्त स्थान में; स्थितः – स्थित होकर; एकाकी – अकेले; यात-चित्त-आत्मा – मन में सदैव सचेत; निराशीः – किसी अन्य वस्तु से आकृष्ट हुए बिना; अपरिग्रहः – स्वामित्व की भावना से रहित, संग्रहभाव से मुक्त |
योगी को चाहिए कि वह सदैव अपने शरीर, मन तथा आत्मा को परमेश्र्वर में लगाए, एकान्त स्थान में रहे और बड़ी सावधानी के साथ अपने मन को वश में करे | उसे समस्त आकांक्षाओं तथा संग्रहभाव से मुक्त होना चाहिए |
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चौ देशे प्रतिष्ठाप्य स्थिरमासनमात्मनः |
नात्युच्छ्रितं नातिनीचं चैलाजिनकुशोत्तरम् || ११ ||
तत्रैकाग्रं मनः कृत्वा यतचित्तेन्द्रियक्रियः |
उपविश्यासने युञ्ज्याद्योगमात्मविश्रुद्धये || १२ ||
शुचौ – पवित्र; देशे – भूमि में; प्रतिष्ठाप्य – स्थापित करके; स्थिरम् – दृढ़; आसनम् – आसन; आत्मनः – स्वयं का; न – नहीं; अति – अत्यधिक; उच्छ्रितम् – ऊँचा; न – न तो; अति – अधिक; नीचम् – निम्न, नीचा; चिल-अजिन – मुलायम वस्त्र तथा मृगछाला; कुश – तथा कुशा का; उत्तरम् – आवरण; तत्र – उस पर; एक-अग्रम् – एकाग्र; मनः – मन; कृत्वा – करके; यत-चित्त – मन को वश में करते हुए; इन्द्रिय – इन्द्रियाँ; क्रियः – तथा क्रियाएँ; उपविश्य – बैठकर; आसने – आसन पर; युञ्ज्यात् – अभ्यास करे; योगम् – योग; आत्म – हृदय की; विशुद्धये – शुद्धि के लिए |
योगाभ्यास के लिए योगी एकान्त स्थान में जाकर भूमि पर कुशा बिछा दे और फिर उसे मृगछाला से ढके तथा ऊपर से मुलायम वस्त्र बिछा दे | आसन न तो बहुत ऊँचा हो, ण बहुत नीचा | यह पवित्र स्थान में स्थित हो | योगी को चाहिए कि इस पर दृढ़तापूर्वक बैठ जाय और मन, इन्द्रियों तथा कर्मों को वश में करते हुए तथा मन को एक बिन्दु पर स्थित करके हृदय को शुद्ध करने के लिए योगाभ्यास करे |
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समं कायशिरोग्रीवं धार्यन्नचलं स्थिरः |
सम्प्रेक्ष्य नासिकाग्रं स्वं दिशश्र्चानवलोकयन् || १३ ||
प्रशान्तात्मा विगतभीर्ब्रह्मचारिव्रते स्थितः |
मनः संयम्य मच्चितो युक्त आसीत मत्परः || १४ ||
समम् – सीधा; काय – शरीर; शिरः – सिर; ग्रीवम् – तथा गर्दन को; धारयन् – रखते हुए; अचलम् – अचल; स्थिरः – शान्त; सम्प्रेक्ष्य – देखकर; नासिका – नाक के; अग्रम् – अग्रभाग को; स्वम् – अपनी; दिशः – सभी दिशाओं में; च – भी; अनवलोकयन् – ण देखते हुए; प्रशांत – अविचलित; आत्मा – मन; विगत-भीः – भय से रहित; ब्रह्मचारी-व्रते – ब्रह्मचर्य व्रत में; स्थितः – स्थित; मनः – मन को; संयम्य – पूर्णतया दमित करके; मत् – मुझ (कृष्ण) में; चित्तः – मन को केन्द्रित करते हुए; युक्तः – वास्तविक योगी; आसीत – बैठे; मत् – मुझमें; परः – चरम लक्ष्य |
योगाभ्यास करने वाले को चाहिए कि वह अपने शरीर, गर्दन तथा सर को सीधा रखे और नाक के अगले सिरे पर दृष्टि लगाए | इस प्रकार वह अविचलित तथा दमित मन से, भयरहित, विषयीजीवन से पूर्णतया मुक्त होकर अपने हृदय में मेरा चिन्तन करे और मुझे हि अपना चरमलक्ष्य बनाए |
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युञ्जन्नेवं सदात्मानं योगी नियतमानसः |
शान्तिं निर्वाणपरमां मत्संस्थामधिगच्छति || १५ ||
युञ्जन् – अभ्यास करते हुए; एवम् – इस प्रकार से; सदा – निरन्तर; आत्मानम् – शरीर, मन तथा आत्मा ; योगी – योग का साधक; नियत-मानसः – संयमित मन से युक्त; शान्तिम् – शान्ति को; निर्वाण-परमाम् – भौतिक अस्तित्व का अन्त; मत्-संस्थाम् – चिन्मयव्योम (भवद्धाम) को; अधिगच्छति – प्राप्त करता है |
इस प्रकार शरीर, मन तथा कर्म में निरन्तर संयम का अब्यास करते हुए संयमित मन वाले योगी को इस भौतिक अस्तित्व की समाप्ति पर भगवद्धाम की प्राप्ति होती है |
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नात्यश्र्नतस्तु योगोSस्ति न चैकान्तमनश्र्नतः |
न चातिस्वप्नशीलस्य जाग्रतो नैव चार्जुन || १६ ||
न – कभी नहीं; अति – अधिक; अश्नतः – खाने वाले का; तु – लेकिन; योगः – भगवान् से जुड़ना; अस्ति – है; न – न तो; च – भी; एकान्तम् – बिलकुल, नितान्त; अनश्नतः – भोजन न करने वाले का; न – न तो; च – भी; अति – अत्यधिक; स्वप्न-शीलस्य – सोने वाले का; जाग्रतः – अथवा रात भर जागते रहने वाले का; न – नहीं; एव – ही; च – तथा; अर्जुन – हे अर्जुन |
हे अर्जुन! जो अधिक खाता है या बहुत कम खाता है, जो अधिक सोता है अथवा जो पर्याप्त नहीं सोता उसके योगी बनने की कोई सम्भावना नहीं है |
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युक्ताहारविहारस्य युक्तचेष्टस्य कर्मसु |
युक्तस्वप्नावबोधस्य योगो भवति दु:खहा || १७ ||
युक्त – नियमित; आहार – भोजन; विहारस्य – आमोद-प्रमोद का; युक्त – नियमित; चेष्टस्य – जीवन निर्वाह के लिए कर्म करने वाले का; कर्मसु – कर्म करने में; युक्त – नियमित; स्वप्न-अवबोधस्य – नींद तथा जागरण का; योगः – योगाभ्यास; भवति – होता है; दुःख-हा – कष्टों को नष्ट करने वाला |
जो खाने, सोने, आमोद-प्रमोद तथा काम करने की आदतों में नियमित रहता है, वह योगाभ्यास द्वारा समस्त भौतिक क्लेशों को नष्ट कर सकता है |
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यदा विनियतं चित्तमात्मन्येवावतिष्ठते |
निस्पृहः सर्वकामेभ्यो युक्त इत्युच्यते तदा || १८ ||
यदा – जब; विनियतम् – विशेष रूप से अनुशासित; चित्तम् – मन तथा उसके कार्य; आत्मनि – अध्यात्म में; एव – निश्चय हि; अवतिष्ठते – स्थित हो जाता है; निस्पृहः – आकांक्षारहित; सर्व – सभी प्रकार की; कामेभ्यः – भौतिक इन्द्रियतृप्ति से; युक्तः – योग में स्थित; इति – इस प्रकार; उच्यते – कहलाता है; तदा – उस समय |
जब योगी योगाभ्यास द्वारा अपने मानसिक कार्यकलापों को वश में कर लेता है और अध्यात्म में स्थित हो जाता है अर्थात् समस्त भौतिक इच्छाओं से रहित हो जाता है, तब वह योग में सुस्थिर कहा जाता है |
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यथा दीपो निवातस्थो नेङ्गते सोपमा स्मृता |
योगिनो यतचित्तस्य युञ्जतो योगमात्मनः || १९ ||
यथा – जिस तरह; दीप – दीपक; निवात-स्थः – वायुरहित स्थान में; न – नहीं; इङगते – हिलता डुलता; सा – यह; उपमा – तुलना; स्मृता – मानी जाती है; योगिनः – योगी की; यत-चित्तस्य – जिसका मन वश में है; युञ्जतः – निरन्तर संलग्न; योगम् – ध्यान में; आत्मनः – अध्यात्म में |
जिस प्रकार वायुरहित स्थान में दीपक हिलता-डुलता नहीं, उसी तरह जिस योगी का मन वश में होता है, वह आत्मतत्त्व के ध्यान में सदैव स्थिर रहता है |
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यत्रोपरमते चित्तं निरुद्धं योग सेवया |
यत्र चैवत्मनात्मानं पश्यन्नात्मनि तुष्यति || २० ||
सुख मात्यन्तिकं यत्तद्बुद्धिग्राह्यमतीन्द्रियम् |
वेत्ति यत्र न चैवायं स्थितश्र्चलति तत्त्वतः || २१ ||
यं लब्ध्वा चापरं लाभं मन्यते नाधिकं ततः |
यास्मन्स्थितो न दु:खेन गुरुणापि विचाल्यते || २२ ||
तं विद्याद्दु:खसंयोगवियोगं योगसंज्ञितम् || २३ ||
यत्र – जिस अवस्था में; उपरमते – दिव्यसुख की अनुभूति के करण बन्द हो जाती है; चित्तम् – मानसिक गतिविधियाँ; निरुद्धम् – पदार्थ से निवृत्त; योग-सेवया – योग के अभ्यास द्वारा; यत्र – जिसमें; च – भी; एव – निश्चय हि; आत्मना – विशुद्ध मन से; आत्मानम् – आत्मा की; पश्यन् – स्थिति का अनुभव करते हुए; आत्मनि – अपने में; आत्मानम् – आत्मा की; पश्यन् – स्थिति का अनुभव करते हुए; आत्मनि – अपने में; तुष्यति – तुष्ट हो जाता है; सुखम् – सुख; आत्यन्तिकम् – परम; यत् – जो; तत् – वह; बुद्धिः – बुद्धि से; ग्राह्यम् – ग्रहणीय; अतीन्द्रियम् – दिव्य; वेत्ति – जानता है; यत्र – जिसमें; न – कभी नहीं; च – भी; एव – निश्चय हि; अयम् – यह; स्थितः – स्थित; चलति – हटता है; तत्त्वतः – सत्य से; यम् – जिसको; लब्ध्वा – प्राप्त करके; च – तथा; अपरम् – अन्य कोई; लाभम् – लाभ; मन्यते – मानता है; न – कभी नहीं; अधिकम् – अधिक; ततः – उससे; यस्मिन् – जिसमें; स्थितः – स्थित होकर; न – कभी नहीं; दुःखेन – दुखों से; गुरुणा अपि – अत्यन्त कठिन होने पर भी; विचाल्यते – चलायमान होता है; तम् – उसको; गुरुणा अपि – अत्यन्त कठिन होने पर भी; विचाल्यते – चलायमान होता है; तम् – उसको; विद्यात् – जानो; दुःख-संयोग – भौतिक संसर्ग से उत्पन्न दुख; वियोगम् – उन्मूलन को; योग-संज्ञितम् – योग में समाधि कहलाने वाला |
सिद्धि की अवस्था में, जिसे समाधि कहते हैं, मनुष्य का मन योगाभ्यास के द्वारा भौतिक मानसिक क्रियाओं से पूर्णतया संयमित हो जाता है | इस सिद्धि की विशेषता यह है कि मनुष्य शुद्ध मन से अपने को देख सकता है और अपने आपमें आनन्द उठा सकता है | उस आनन्दमयी स्थिति में वह दिव्या इन्द्रियों द्वारा असीम दिव्यासुख में स्थित रहता है | इस प्रकार स्थापित मनुष्य कभी सत्य से विपथ नहीं होता और इस सुख की प्राप्ति हो जाने पर वह इससे बड़ा कोई दूसरा लाभ नहीं मानता | ऐसी स्थिति को पाकर मनुष्य बड़ीसे बड़ी कठिनाई में भी विचलित नहीं होता | यह निस्सन्देह भौतिक संसर्ग से उत्पन्न होने वाले समस्त दुःखों से वास्तविक मुक्ति है |
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स निश्र्चयेन योक्तव्यो योगोSनिर्विणचेतसा |
सङ्कल्पप्रभवान्कामांस्त्यक्त्वा सर्वानशेषतः |
मनसैवेन्द्रियग्रामं विनियम्य समन्ततः || २४ ||
सः – उस; निश्र्चयेन – दृढ विश्र्वास के साथ; योक्तव्यः – अवश्य अभ्यास करे; योगः – योगपद्धति; अनिर्विण्ण-चेतसा – विचलित हुए बिना; सङ्कल्प – मनोधर्म से; प्रभवान् – उत्पन्न; कामान् – भौतिक इच्छाओं को; त्यक्त्वा – त्यागकर; सर्वान् – समस्त; अशेषतः – पूर्णतया; मनसा – मन से; एव – निश्चय ही; इन्द्रिय-ग्रामम् – इन्द्रियों के समूह को; विनियम्य – वश में करके; समन्ततः – सभी ओर से |
मनुष्य को चाहिए कि संकल्प तथा श्रद्धा के साथ योगाभ्यास में लगे और पथ से विचलित न हो | उसे चाहिए कि मनोधर्म से उत्पन्न समस्त इच्छाओं को निरपवाद रूप से त्याग दे और इस प्रकार मन के द्वारा सभी ओर से इन्द्रियों को वश में करे |
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शनैः – धीरे-धीरे; शनैः – एकएक करके, क्रम से; उपरमेत् – निवृत्त रहे; बुद्धया – बुद्धि से; धृति-गृहीतया – विश्र्वासपूर्वक; आत्म-संस्थम् – समाधि में स्थित; मनः – मन; कृत्वा – करके; न – नहीं; किञ्चित् – अन्य कुछ; अपि – भी; चिन्तयेत् – सोचे |
धीरे-धीरे, क्रमशः पूर्ण विश्र्वासपूर्वक बुद्धि के द्वारा समाधि में स्थित होना चाहिए और इस प्रकार मन को आत्मा में ही स्थित करना चाहिए तथा अन्य कुछ भी नहीं सोचना चाहिए |
समुचित विश्र्वास तथा बुद्धि के द्वारा मनुष्य को धीरे-धीरे सारे इन्द्रियकर्म करने बन्द कर देना चाहिए | यह प्रत्याहार कहलाता है | मन को विश्र्वास, ध्यान तथा इन्द्रिय-निवृत्ति द्वारा वश में करते हुए समाधि में स्थिर करना चाहिए | उस समय देहात्मबुद्धि में अनुरक्त होने की कोई सम्भावना नहीं रह जाती | दुसरे शब्दों में, जब तक इस शरीर का अस्तित्व है तब तक मनुष्य पदार्थ में लगा रहता है, किन्तु उसे इन्द्रियतृप्ति के विषय में नहीं सोचना चाहिए | उसे परमात्मा के आनन्द के अतिरिक्त किसी अन्य आनन्द का चिन्तन नहीं करना चाहिए | कृष्णभावनामृत का अभ्यास करने से यह अवस्था सहज ही प्राप्त की जा सकती है |
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यतो यतो निश्र्चलति मनश्र्चञ्चलमस्थिरम् |
ततस्ततो नियम्यैतदात्मन्येव वशं नयेत् || २६ ||
यतः यतः – जहाँ जहाँ भी; निश्र्चलति – विचलित होता है; मनः – मन;
चञ्चलम् – चलायमान; अस्थिरम् – अस्थिर; ततः ततः – वहाँ वहाँ से;
नियम्य – वश में करके; एतत् – इस; आत्मनि – अपने; एव – निश्चय
ही; वशम् – वश में; नयेत् – ले आए |
मन अपनी चंचलता तथा अस्थिरता के कारण जहाँ कहीं भी विचरण करता हो,मनुष्य को चाहिए कि उसे वहाँ से खींचे और अपने वश में लाए |
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प्रशान्तमनसं ह्येनं योगिनं सुखमुत्तमम् |
उपैति शान्तरजसं ब्रह्मभूतमकल्मषम् || २७ ||
प्रशान्त – कृष्ण के चरणकमलों में स्थित; मनसम् – जिसका मन; हि – निश्चय ही; एनम् – यह; योगिनम् – योगी; सुखम् – सुख; उत्तमम् – सर्वोच्च; उपैति – प्राप्त करता है; शान्त-रजसम् – जिसकी कामेच्छा शान्त हो चुकी है; ब्रह्म-भूतम् – परमात्मा के साथ अपनी पहचान द्वारा मुक्ति; अकल्मषम् – समस्त पूर्व पापकर्मों से मुक्त |
जिस योगी का मन मुझ में स्थिर रहता है, वह निश्चय ही दिव्यसुख की सर्वोच्च सिद्धि प्राप्त करता है | वह रजोगुण से परे हो जाता है, वह परमात्मा के साथ अपनी गुणात्मक एकता को समझता है और इस प्रकार अपने समस्त विगत कर्मों के फल से निवृत्त हो जाता है |
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युञ्जन्नेवं सदात्मानं योगी विगतकल्मषः |
सुखेन ब्रह्मसंस्पर्शमत्यन्तं सुखमश्र्नुते || २८ ||
युञ्जन् – योगाभ्यास में प्रवृत्त होना; एवम् – इस प्रकार; सदा – सदैव; आत्मानम् – स्व, आत्मा को; योगी – योगी जो परमात्मा के सम्पर्क में रहता है; विगत – मुक्त; कल्मषः – सारे भौतिक दूषण से; सुखेन – दिव्यसुख से; ब्रह्म-संस्पर्शम् – ब्रह्म के सान्निध्य में रहकर; अत्यन्तम् – सर्वोच्च; सुखम् – सुख को; अश्नुते – प्राप्त करता है |
इस प्रकार योगाभ्यास में निरन्तर लगा रहकर आत्मसंयमी योगी समस्त भौतिक कल्मष से मुक्त हो जाता है और भगवान् की दिव्य प्रेमाभक्ति में परमसुख प्राप्त करता है |
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सर्वभूतस्थमात्मनं सर्वभूतानि चात्मनि |
ईक्षते योगयुक्तात्मा सर्वत्र समदर्शनः || २९ ||
सर्व-भूत-स्थम् – सभी जीवों में स्थित; आत्मानम् – परमात्मा को; सर्व – सभी; भूतानि – जीवों को; च – भी; आत्मनि – आत्मा में; ईक्षते – देखता है; योग-युक्त-आत्मा – कृष्णचेतना में लगा व्यक्ति; सर्वत्र – सभी जगह; सैम-दर्शनः – समभाव से देखने वाला |
वास्तविक योगी समस्त जीवों में मुझको तथा मुझमें समस्त जीवों को देखता है | निस्सन्देह स्वरूपसिद्ध व्यक्ति मुझ परमेश्र्वर को सर्वत्र देखता है |
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यो मां पश्यति सर्वत्र सर्वं च मयि पश्यति |
तस्याहं न प्रणश्यामि स च मे न प्रणश्यति || ३० ||
यः – जो; माम् – मुझको; पश्यति – देकहता है; सर्वत्र – सभी जगह; सर्वम् – प्रत्येक वस्तु को; च – तथा; मयि – मुझमें; पश्यति – देखता है; तस्य – उसके लिए; अहम् – मैं; न – नहीं; प्रणश्यामि – अदृश्य होता हूँ; सः – वह; च – भी; मे – मेरे लिए; न – नहीं; प्रणश्यति – अदृश्य होता है |
जो मुझे सर्वत्र देखता है और सब कुछ मुझमें देखता है उसके लिए न तो मैं कभी अदृश्य होता हूँ और न वह मेरे लिए अदृश्य होता है |
*
सर्वभूतस्थितं यो मां भजत्येकत्वमास्थितः |
सर्वथा वर्तमानोSपि स योगी मयि वर्तते || ३१ ||
सर्व-भूत-स्थितम् – प्रत्येक जीव के हृदय में स्थित; यः – जो; माम् – मुझको; भजति – भक्तिपूर्वक सेवा करता है; एकत्वम् – तादात्म्य में; आस्थितः – स्थित; सर्वथा – सभी प्रकार से; वर्तमानः – उपस्थित होकर; अपि – भी; सः – वह; योगी – योगी; मयि – मुझमें; वर्तते – रहता है |
जो योगी मुझे तथा परमात्मा को अभिन्न जानते हुए परमात्मा की भक्तिपूर्वक सेवा करता है, वह हर प्रकार से मुझमें सदैव स्थित रहता है |
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आत्मौपम्येन सर्वत्र समं पश्यति योSर्जुन |
सुखं वा यदि वा दु:खं स योगी परमो मतः || ३२ ||
आत्म – अपनी; औपम्येन – तुलना से; सर्वत्र – सभी जगह; समम् – समान रूप से; पश्यति – देखता है; यः – जो; अर्जुन – हे अर्जुन; सुखम् – सुख; वा – अथवा; यदि – यदि; वा – अथवा; दुःखम् – दुख; सः – वह; योगी – योगी; परमः – परम पूर्ण; मतः – माना जाता है |
हे अर्जुन! वह पूर्णयोगी है जो अपनी तुलना से समस्त प्राणियों की उनके सुखों तथा दुखों में वास्तविक समानता का दर्शन करता है |
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अर्जुन उवाच
योSयं योगस्त्वया प्रोक्तः साम्येन मधुसूदन |
एतस्याहं न पश्यामि चञ्चलत्वात्स्थितिं स्थिराम् || ३३ ||
अर्जुनः उवाच – अर्जुन ने कहा; यः-अयम् – यह पद्धति; योगः – योग; त्वया – तुम्हारे द्वारा; प्रोक्तः – कही गई; साम्येन – समान्यतया; मधुसूदन – हे मधु असुर के संहर्ता; एतस्य – इसकी; अहम् – मैं; न – नहीं; पश्यामि – देखता हूँ; चञ्चलत्वात् – चंचल होने के करण; स्थितम् – स्थिति को; स्थिराम् – स्थायी |
अर्जुन ने कहा – हे मधुसूदन! आपने जिस योगपद्धति का संक्षेप में वर्णन किया है, वह मेरे लिए अव्यावहारिक तथा असहनीय है, क्योंकि मन चंचल तथा अस्थिर है |
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चञ्चलं हि मनः कृष्ण प्रमाथि बलवद्दृढम् |
तस्याहं निग्रहं मन्ये वायोरिव सुदुष्करम् || ३४ ||
चञ्चलम् – चंचल; हि – निश्चय ही; मनः – मन; कृष्ण – हे कृष्ण; प्रमाथि – विचलित करने वाला, क्षुब्ध करने वाला; बल-वत् – बलवान्; दृढम् – दुराग्रही, हठीला; तस्य – उसका; अहम् – मैं; निग्रहम् – वश में करना; मन्ये – सोचता हूँ; वायोः – वायु की; इव – तरह; सु-दुष्करम् – कठिन |
हे कृष्ण! चूँकि मन चंचल (अस्थिर), उच्छृंखल, हठीला तथा अत्यन्त बलवान है, अतः मुझे इसे वश में करना वायु को वश में करने से भी अधिक कठिन लगता है |
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श्रीभगवानुवाच
असंशयं महाबाहो मनो दुर्निग्रहं चलम् |
अभ्यासेन तु कौन्तेय वैराग्येण च गृह्यते || ३५ ||
श्रीभगवान् उवाच – भगवान् ने कहा; असंशयम् – निस्सन्देह; महाबाहो – हे बलिष्ठ भुजाओं वाले; मनः – मन को; दुर्निग्रहम् – दमन करना कठिन है; चलम् – चलायमान, चंचल; अभ्यासेन – अभ्यास द्वारा; तु – लेकिन; कौन्तेय – हे कुन्तीपुत्र; वैराग्येण – वैराग्य द्वारा; च – भी; गृह्यते – इस तरह वश में किया जा सकता है |
भगवान् श्रीकृष्ण ने कहा – हे महाबाहो कुन्तीपुत्र! निस्सन्देह चंचल मन को वश में करना अत्यन्त कठिन है; किन्तु उपयुक्त अभ्यास द्वारा तथा विरक्ति द्वारा ऐसा सम्भव है |
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असंयतात्मना योगो दुष्प्राप इति मे मतिः |
वश्यात्मना तु यतता शक्योSवाप्तुमुपायतः || ३६ ||
असंयत – उच्छृंखल; आत्मना – मन के द्वारा; योगः – आत्म-साक्षात्कार; दुष्प्रापः – प्राप्त करना कठिन; इति – इस प्रकार; मे – मेरा; मतिः – मत; वश्य – वशीभूत; आत्मना – मन से; तु – लेकिन; यतता – प्रयत्न करते हुए; शक्यः – व्यावहारिक; अवाप्तुम् – प्राप्त करना; उपायतः – उपयुक्त साधनों द्वारा |
जिसका मन उच्छृंखल है, उसके लिए आत्म-साक्षात्कार कठिन कार्य होता है, किन्तु जिसका मन संयमित है और जो समुचित उपाय करता है उसकी सफलता ध्रुव है | ऐसा मेरा मत है |
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अर्जुन उवाच
अयतिः श्रद्धयोपेतो योगच्चलितमानसः |
अप्राप्य योगसंसिद्धिं कां कृष्ण गच्छति || ३७ ||
अर्जुनः उवाच – अर्जुन ने कहा; अयतिः – असफल योगी; श्रद्धया – श्रद्धा से; उपेतः – लगा हुआ, संलग्न; योगात् – योग से; चलित – विचलित; मानसः – मन वाला; अप्राप्य – प्राप्त न करके; योग-संसिद्धिम् – योग की सर्वोच्च सिद्धि को; काम् – किस; गतिम् – लक्ष्य को; कृष्ण – हे कृष्ण; गच्छति – प्राप्त करता है |
अर्जुन ने कहा: हे कृष्ण! उस असफल योगी की गति क्या है जो प्रारम्भ में श्रद्धापूर्वक आत्म-साक्षात्कार की विधि ग्रहण करता है, किन्तु बाद में भौतिकता के करण उससे विचलित हो जाता है और योगसिद्धि को प्राप्त नहीं कर पाता ?
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कच्चिन्नोभयविभ्रष्टश्छिन्नाभ्रमिव नश्यति |
अप्रतिष्ठो महाबाहो विमूढो ब्रह्मणः पथि || ३८ ||
कच्चित् – क्या; न – नहीं; उभय – दोनों; विभ्रष्टः – विचलित; छिन्न – छिन्न-भिन्न; अभ्रम् – बादल; इव – सदृश; नश्यति – नष्ट जो जाता है; अप्रतिष्ठः – बिना किसी पद के; महा-बाहो – हे बलिष्ठ भुजाओं वाले कृष्ण; विमुढः – मोहग्रस्त; ब्रह्मणः – ब्रह्म-प्राप्ति के; पथि – मार्ग में |
हे महाबाहु कृष्ण! क्या ब्रह्म-प्राप्ति के मार्ग से भ्रष्ट ऐसा व्यक्ति आध्यात्मिक तथा भौतिक दोनों ही सफलताओं से च्युत नहीं होता और छिन्नभिन्न बादल की भाँति विनष्ट नहीं हो जाता जिसके फलस्वरूप उसके लिए किसी लोक में कोई स्थान नहीं रहता?
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एतन्मे संशयं कृष्ण छेत्तुमर्हस्यशेषतः |
त्वदन्यः संशयस्यास्य छेत्ता न ह्युपपद्यते || ३९ ||
एतत् – यह है; मे – मेरा; संशयम् – सन्देह; कृष्ण – हे कृष्ण; छेत्तुम् – दूर करने के लिए; अर्हसि – आपसे प्रार्थना है; अशेषतः – पूर्णतया; त्वत् – आपकी अपेक्षा; अन्यः – दूसरा; संशयस्य – सन्देह का; अस्य – इस; छेत्ता – दूर करने वाला; न – नहीं; हि – निश्चय ही; उपपद्यते – पाया जाना सम्भव है |
हे कृष्ण! यही मेरा सन्देह है, और मैं आपसे इसे पूर्णतया दूर करने की प्रार्थना कर रहा हूँ | आपके अतिरिक्त अन्य कोई ऐसा नहीं है, जो इस सन्देह को नष्ट कर सके |
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श्रीभगवानुवाच
पार्थ नैवेह नामुत्र विनाशस्तस्य विद्यते |
न हि कल्याणकृत्कश्र्चिद्दुर्गतिं तात गच्छति || ४० ||
श्रीभगवान् उवाच – भगवान् ने कहा; पार्थ – हे पृथापुत्र; न एव – कभी ऐसा नहीं है; इह – इस संसार में; न – कभी नहीं; अमुत्र - अगले जन्म में; विनाशः – नाश; तस्य – उसका; विद्यते – होता है; न – कभी नहीं; हि – निश्चय ही; कल्याण-कृत् – शुभ कार्यों में लगा हुआ; कश्र्चित – कोई भी; दुर्गतिम् – पतन को; तात – हे मेरे मित्र; गच्छति – जाता है |
भगवान् ने कहा – हे पृथापुत्र! कल्याण-कार्यों में निरत योगी का न तो इस लोक में और न परलोक में ही विनाश होता है | हे मित्र! भलाई करने वाला कभी बुरे से पराजित नहीं होता |
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प्राप्य पुण्यकृतां लोकानुषित्वा शाश्र्वती: समाः |
श्रुचीनां श्रीमतां ग्रेहे योगभ्रष्टोSभिजायते || ४१ ||
प्राप्य – प्राप्त करके; पुण्य-कृताम् – पुण्य कर्म करने वालों के; लोकान् – लोकों में; उषित्वा – निवास करके; शाश्र्वतीः – अनेक; समाः – वर्ष; शुचीनाम् – पवित्रात्माओं के; श्री-मताम् – सम्पन्न लोगों के; ग्रेहे – घर में; योग-भ्रष्टः – आत्म-साक्षात्कार के पथ से च्युत व्यक्ति; अभिजायते – जन्म लेता है |
असफल योगी पवित्रात्माओं के लोकों में अनेकानेक वर्षों तक भोग करने के बाद या तो सदाचारी पुरुषों के परिवार में या धनवानों के कुल में जन्म लेता है |
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अथवा योगिनामेव कुले भवति धीमताम् |
एतद्धि दुर्लभतरं लोके जन्म यदीदृशम् || ४२ ||
अथवा – या; योगिनाम् – विद्वान योगियों के; एव – निश्चय ही; कुले – परिवार में; भवति – जन्म लेता है; धि-मताम् – परम बुद्धिमानों के; एतत् – यह; हि – निश्चय ही; दुर्लभ-तरम् – अत्यन्त दुर्लभ; लोके – इस संसार में; जन्म – जन्म; यत् – जो; ईदृशम् – इस प्रकार का |
अथवा (यदि दीर्घकाल तक योग करने के बाद असफल रहे तो) वह ऐसे योगियों के कुल में जन्म लेता है जो अति बुद्धिमान हैं | निश्चय ही इस संसार में ऐसा जन्म दुर्लभ है |
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तत्र तं बुद्धिसंयोगं लभते पौर्वदेहिकम् |
यतते च ततो भूयः संसिद्धौ कुरुनन्दन || ४३ ||
तत्र – वहाँ; तम् – उस; बुद्धि-संयोगम् – चेतना की जागृति को; लभते – प्राप्त होता है; पौर्व-देहिकम् – पूर्व देह से; यतते – प्रयास करता है; च – भी; ततः – तत्पश्चात्; भूयः – पुनः; संसिद्धौ – सिद्धि के लिए; कुरुनन्दन – हे कुरुपुत्र |
हे कुरुनन्दन! ऐसा जन्म पाकर वह अपने पूर्वजन्म की दैवी चेतना को पुनः प्राप्त करता है और पूर्ण सफलता प्राप्त करने के उद्देश्य से वह आगे उन्नति करने का प्रयास करता है |
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पूर्वाभ्यासेन तेनैव ह्रियते ह्यवशोSपि सः |
जिज्ञासुरपि योगस्य शब्दब्रह्मातिवर्तते || ४४ ||
पूर्व – पिछला; अभ्यासेन – अभ्यास से; तेन – उससे; एव – ही; ह्रियते – आकर्षित होता है; हि – निश्चय ही; अवशः – स्वतः; अपि – भी; सः – वह; जिज्ञासुः – उत्सुक; अपि – भी; योगस्य – योग के विषय में; शब्द-ब्रह्म – शास्त्रों के अनुष्ठान; अतिवर्तते – परे चला जाता है, उल्लंघन करता है |
अपने पूर्वजन्म की दैवी चेतना से वह न चाहते हुए भी स्वतः योग के नियमों की ओर आकर्षित होता है | ऐसा जिज्ञासु योगी शास्त्रों के अनुष्ठानों से परे स्थित होता है |
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प्रयत्नाद्यतमानस्तु योगी संशुद्धकिल्बिष: ।
अनेकजन्मसंसिद्धस्ततो याति परां गतिम् ॥ ४५॥
प्रयत्तातू--कठिन अभ्यास से; यतमान:--प्रयास करते हुए; तु--तथा; योगी--ऐसा
योगी; संशुद्ध--शुद्ध होकर; किल्बिष:--जिसके सारे पाप; अनेक--अनेकानेक;
जन्म--जन्मों के बाद; संसिद्धः--सिद्धिि प्राप्त करके; ततः--तत्पश्चात्; याति--प्राप्त
करता है; पराम्--सर्वोच्च; गतिम्--गन्तव्य को
और जब योगी समस्त कल्मष से शुद्ध होकर सच्ची निष्ठा
से आगे प्रगति करने का प्रयास करता है, तो अन्ततोगत्वा
अनेकानेक जन्मों के अभ्यास के पश्चात् सिद्धि-लाभ करके
वह परम गन्तव्य को प्राप्त करता है
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तपस्विभ्योSधिको योगी ज्ञानिभ्योSपि मतोSधिकः |
कर्मिभ्यश्र्चाधिको योगी तस्माद्योगी भवार्जुन || ४६ ||
तपस्विभ्यः – तपस्वियों से; अधिकः – श्रेष्ठ बढ़कर; योगी – योगी; ज्ञानिभ्यः – ज्ञानियों से; अपि – भी; मतः – माना जाता है; अधिक – बढ़कर; कर्मिभ्यः – सकाम कर्मियों की अपेक्षा; च – भी; अधिकः – श्रेष्ठ; योगी – योगी; तस्मात् – अतः; योगी – योगी; भव – बनो, होओ; अर्जुन – हे अर्जुन |
योगी पुरुष तपस्वी से, ज्ञानी से तथा सकामकर्मी से बढ़कर होता है | अतः हे अर्जुन! तुम सभी प्रकार से योगी बनो |
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योगिनामपि सर्वेषां मद्गतेनान्तरात्मना |
श्रद्धावान्भजते यो मां स मे युक्ततमो मतः || ४७ ||
योगिनाम् – योगियों में से; अपि – भी; सर्वेषाम् – समस्त प्रकार के; मत्-गतेन – मेरे परायण, सदैव मेरे विषय में सोचते हुए; अन्तः-आत्मना – अपने भीतर; श्रद्धावान् – पूर्ण श्रद्धा सहित; भजते – दिव्य प्रेमाभक्ति करता है; यः – जो; माम् – मेरी (परमेश्र्वर की); सः – वह; मे – मेरे द्वारा; युक्त-तमः – परम योगी; मतः – माना जाता है |
और समस्त योगियों में से जो योगी अत्यन्त श्रद्धापूर्वक मेरे परायण है, अपने अन्तःकरण में मेरे विषय में सोचता है और मेरी दिव्य प्रेमाभक्ति करता है वह योग में मुझसे परम अन्तरंग रूप में युक्त रहता है और सबों में सर्वोच्च है | यही मेरा मत है |
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