अध्याय 7 - भगवद्ज्ञान
श्रीभगवानुवाच
मय्यासक्तमनाः पार्थ योगं युञ्जन्मदाश्रयः |
असंशयं समग्रं मां यथा ज्ञास्यसि तच्छृणु || १ ||
श्रीभगवान् उवाच – भगवान् कृष्ण ने कहा; मयि – मुझमें; आसक्त-मनाः – आसक्त मन वाला; पार्थ – पृथापुत्र; योगम् – आत्म-साक्षात्कार; युञ्जन् – अभ्यास करते हुए; मत्-आश्रयः – मेरी चेतना (कृष्णचेतना) में; असंशयम् – निस्सन्देह; समग्रम् – पूर्णतया; माम् – मुझको; यथा – जिस तरह; ज्ञास्यसि – जान सकते हो; तत् – वह; शृणु – सुनो |
श्रीभगवान् ने कहा – हे पृथापुत्र! अब सुनो कि तुम किस तरह मेरी भावना से पूर्ण होकर और मन को मुझमें आसक्त करके योगाभ्यास करते हुए मुझे पूर्णतया संशयरहित जान सकते हो |
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ज्ञानं तेSहं सविज्ञानमिदं वक्ष्याम्यशेषतः |
यज्ज्ञात्वा नेह भूयोSन्यज्ज्ञातव्यमवशिष्यते || २ ||
ज्ञानम् – प्रत्यक्ष ज्ञान; ते – तुमसे; अहम् – मैं; स – सहित; विज्ञानम् –
दिव्यज्ञान; इदम् – यह; वक्ष्यामि – कहूँगा; अशेषतः – पूर्णरूप से; यत् –
जिसे; ज्ञात्वा – जानकर; न – नहीं; इह – इस संसार में; भूयः – आगे;
अन्यत् – अन्य कुछ; ज्ञातव्यम् – जानने योग्य; अवशिष्यते – शेष रहता है |
अब मैं तुमसे पूर्णरूप से व्यावहारिक तथा दिव्यज्ञान कहूँगा | इसे जान लेने पर तुम्हें जानने के लिए और कुछ भी शेष नहीं रहेगा |
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मनुष्याणां सहस्त्रेषु कश्र्चिद्यतति सिद्धये |
यततामपि सिद्धानां कश्र्चिन्मां वेत्ति तत्त्वतः || ३ ||
मनुष्याणाम् – मनुष्यों में से; सहस्त्रेषु – हजारों; कश्र्चित् – कोई एक; यतति – प्रयत्न करता है; सिद्धये – सिद्धि के लिए; यतताम् – इस प्रकार प्रयत्न करने वाले; अपि – निस्सन्देह; सिद्धानाम् – सिद्ध लोगों में से; कश्र्चित् – कोई एक; माम् – मुझको; वेत्ति – जानता है; तत्त्वतः – वास्तव में |
कई हजार मनुष्यों में से कोई एक सिद्धि के लिए प्रयत्नशील होता है और इस तरह सिद्धि प्राप्त करने वालों में से विरला ही कोई मुझे वास्तव में जान पाता है |
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भूमिरापोSनलो वायु: खं मनो बुद्धिरेव च |
अहङ्कार इतीयं मे भिन्ना प्रकृतिरष्टधा || ४ ||
भूमिः – पृथ्वी; आपः – जल; अनलः – अग्नि; वायुः – वायु; खम् – आकाश; मनः – मन; बुद्धिः – बुद्धि; एव – निश्चय ही; च – तथा; अहंकार – अहंकार; इति – इस प्रकार; इयम् – ये सब; मे – मेरी; भिन्ना – पृथक्; प्रकृतिः – शक्तियाँ; अष्टधा – आठ प्रकार की |
पृथ्वी, जल, अग्नि, वायु, आकाश, मन, बुद्धि तथा अहंकार – ये आठ प्रकार से विभक्त मेरी भिन्ना (अपर) प्रकृतियाँ हैं |
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अपरेयमितस्त्वन्यां प्रकृतिं विद्धि मे पराम् |
जीवभूतां महाबाहो ययेदं धार्यते जगत् || ५ ||
अपरा – निकृष्ट, जड़; इयम् – यह; इतः – इसके अतिरिक्त; तु – लेकिन; अन्यास् – अन्य; प्रकृतिम् – प्रकृति को; विद्धि – जानने का प्रयत्न करो; मे – मेरी; पराम् – उत्कृष्ट, चेतन; जीव-भूताम् – जीवों वाली; महा-बाहो – हे बलिष्ट भुजाओं वाले; यया – जिसके द्वारा; इदम् – यह; धार्यते – प्रयुक्त किया जाता है, दोहन होता है; जगत् – संसार |
हे महाबाहु अर्जुन! इनके अतिरिक्त मेरी एक अन्य परा शक्ति है जो उन जीवों से यक्त है, जो इस भौतिक अपरा प्रकृति के साधनों का विदोहन कर रहे हैं |
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एतद्योनीनि भूतानि सर्वाणीत्युपधारय |
अहं कृत्स्नस्य जगतः प्रभवः प्रलयस्तथा || ६ ||
एतत् – ये दोनों शक्तियाँ; योनीनि – जिनके जन्म के स्त्रोत, योनियाँ; भूतानि – प्रत्येक सृष्ट पदार्थ; सर्वाणि – सारे; इति – इस प्रकार; उपधारय – जानो; अहम् – मैं; कृत्स्नस्य – सम्पूर्ण; जगतः – जगत का; प्रभवः – उत्पत्ति का करण; प्रलयः – प्रलय, संहार; तथा – और |
सारे प्राणियों का उद्गम इन दोनों शक्तियों में है | इस जगत् में जो कुछ भी भौतिक तथा आध्यात्मिक है, उसकी उत्पत्ति तथा प्रलय मुझे ही जानो |
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मत्तः परतरं नान्यत्किञ्चिदस्ति धनञ्जय |
मयि सर्वमिदं प्रोतं सूत्रे मणिगणा इव || ७ ||
मत्तः – मुझसे परे; पर-तरम् – श्रेष्ठ; न – नहीं; अन्यत् किञ्चित् – अन्य कुछ भी; अस्ति – है; धनञ्जय – हे धन के विजेता; मयि – मुझमें; सर्वम् – सब कुछ; इदम् – यह जो हम देखते हैं; प्रोतम् – गुँथा हुआ; सूत्रे – धागों में; मणि-गणाः – मोतियों के दाने; इव – सदृश |
हे धनञ्जय! मुझसे श्रेष्ठ कोई सत्य नहीं है | जिस प्रकार मोती धागे में गुँथे रहते हैं, उसी प्रकार सब कुछ मुझ पर ही आश्रित है |
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7रसोSहमप्सु कौन्तेय प्रभास्मि शशिसुर्ययो: |
प्रणवः सर्ववेदेषु शब्दः खे पौरुषं नृषु || ८ ||
रसः – स्वाद; अहम् – मैं; अप्सु – जल में; कौन्तेय – हे कुन्तीपुत्र; प्रभाः – प्रकाश; अस्मि – हूँ; शशि-सुर्ययोः – चन्द्रमा तथा सूर्य का; प्रणवः – ओंकार के अ, उ, म-ये तीन अक्षर; सर्व – समस्त; वेदेषु – वेदों में; शब्दः – शब्द, ध्वनि; खे – आकाश में; पौरुषम् – शक्ति, सामर्थ्य; नृषु – मनुष्यों में |
हे कुन्तीपुत्र! मैं जल का स्वाद हूँ, सूर्य तथा चन्द्रमा का प्रकाश हूँ, वैदिक मन्त्रों में ओंकार हूँ, आकाश में ध्वनि हूँ तथा मनुष्य में सामर्थ्य हूँ |
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पुण्यो गन्धः पृथिव्यां च तेजश्र्चास्मि विभावसौ |
जीवनं सर्वभूतेषु तपश्र्चास्मि तपस्विषु || ९ ||
पुण्यः – मूल, आद्य; गन्धः – सुगंध; पृथिव्याम् – पृथ्वी में; च – भी; तेजः – प्रकाश; च – भी; अस्मि – हूँ; विभावसौ – अग्नि में; जीवनम् – प्राण; सर्व – समस्त; भूतेषु – जीवों में; तपः – तपस्या; च – भी; अस्मि – हूँ; तपस्विषु – तपस्वियों में |
मैं पृथ्वी की आद्य सुगंध और अग्नि की ऊष्मा हूँ | मैं समस्त जीवों का जीवन तथा तपस्वियों का तप हूँ |
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बीजं मां सर्वभूतानां विद्धि पार्थ सनातनम् |
बुद्धिर्बुद्धिमतामस्मि तेजस्तेजस्विनामहम् || १० ||
बीजम् – बीज; माम् – मुझको; सर्व-भूतानाम् - समस्त जीवों का; विद्धि – जानने का प्रयास करो; पार्थ – हे पृथापुत्र; सनातनम् – आदि, शाश्र्वत; बुद्धिः – बुद्धि; बुद्धि-मताम् – बुद्धिमानों की; अस्मि – हूँ; तेजः – तेज; तेजस्विनाम् – तेजस्वियों का; अहम् – मैं |
हे पृथापुत्र! यह जान लो कि मैं ही समस्त जीवों का आदि बीज हूँ, बुद्धिमानों की बुद्धि तथा समस्त तेजस्वी पुरुषों का तेज हूँ |
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बलं बलवतां चाहं कामरागविवर्जितम् |
धर्माविरुद्धो भूतेषु कामोSस्मि भरतर्षभ || ११ ||
बलम् – शक्ति; बल-वताम् – बलवानों का; च – तथा; अहम् – मैं हूँ; काम – विषयभोग; राग – तथा आसक्ति से; विवर्जितम् – रहित; धर्म-अविरुद्धः – जो धर्म के विरुद्ध नहीं है; भूतेषु – समस्त जीवों में; कामः – विषयी जीवन; अस्मि – हूँ; भरत-ऋषभ – हे भरतवंशियों में श्रेष्ठ !
मैं बलवानों का कामनाओं तथा इच्छा से रहित बल हूँ | हे भरतश्रेष्ठ (अर्जुन)! मैं वह काम हूँ, जो धर्म के विरुद्ध नहीं है |
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ये चैव सात्त्विका भावा राजसास्तामसाश्र्च ये |
मत्त एवेति तान्विद्धि न त्वहं तेषु ते मयि || १२ ||
ये – जो; च – तथा; एव – निश्चय ही; सात्त्विकाः – सतोगुणी; भावाः – भाव; राजसाः – रजोगुणी; तामसाः – तमोगुणी; च – भी; ये – जो; मत्तः – मुझसे; एव – निश्चय ही; इति – इस प्रकार; तान् – उनको; विद्धि – जानो; न – नहीं; तु – लेकिन; अहम् – मैं; तेषु – उनमें; ते – वे; मयि – मुझमें |
तुम जान लो कि मेरी शक्ति द्वारा सारे गुण प्रकट होते हैं, चाहे वे सतोगुण हों, रजोगुण हों या तमोगुण हों | एक प्रकार से मैं सब कुछ हूँ, किन्तु हूँ स्वतन्त्र | मैं प्रकृति के गुणों के अधीन नहीं हूँ, अपितु वे मेरे अधीन हैं |
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त्रिभिर्गुणमयैर्भावैरेभिः सर्वमिदं जगत् |
मोहितं नाभिजानाति मामेभ्यः परमव्ययम् || १३ ||
त्रिभिः – तीन; गुण-मयैः – गुणों से युक्त; भावैः – भावों के द्वारा; एभिः – इन; सर्वम् – सम्पूर्ण; इदम् – यह; जगत् – ब्रह्माण्ड; मोहितम् – मोहग्रस्त; न अभिजानाति – नहीं जानता; माम् – मुझको; एभ्यः – इनसे; परम् – परम; अव्ययम् – अव्यय, सनातन |
तीन गुणों (सतो, रजो तथा तमो) के द्वारा मोहग्रस्त यह सारा संसार मुझ गुणातीत तथा अविनाशी को नहीं जानता |
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दैवी ह्येषा गुणमयी मम माया दुरत्यया |
मामेव ये प्रपद्यन्ते मायामेतां तरन्ति ते || १४ ||
दैवी – दिव्य; हि – निश्चय ही; एषा – यह; गुण-मयी – तीनों गुणों से युक्त; मम – मेरी; माया – शक्ति; दुरत्यया – पार कर पाना कठिन, दुस्तर; माम् – मुझे; एव – निश्चय ही; ये – जो; प्रपद्यन्ते – शरण ग्रहण करते हैं; मायाम् एताम् – इस माया के; तरन्ति – पार कर जाते हैं; ते – वे |
प्रकृति के तीन गुणों वाली इस मेरी दैवी शक्ति को पार कर पाना कठिन है | किन्तु जो मेरे शरणागत हो जाते हैं, वे सरलता से इसे पार कर जाते हैं |
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न मां दुष्कृतिनो मूढाः प्रपद्यन्ते नराधमाः |
माययापहृतज्ञाना आसुरं भावमाश्रिताः || १५ ||
न – नहीं; माम् – मेरी; दुष्कृतिनः – दुष्ट; मूढाः – मूर्ख; प्रपद्यन्ते – शरण ग्रहण करते हैं; नर-अधमाः – मनुष्यों में अधम; मायया – माया के द्वारा; अपहृत – चुराये गये; ज्ञानाः – ज्ञान वाले; आसुरम् – आसुरी; भावम् – प्रकृति या स्वभाव को; आश्रिताः – स्वीकार किये हुए |
जो निपट मुर्ख है, जो मनुष्यों में अधम हैं, जिनका ज्ञान माया द्वारा हर लिया गया है तथा जो असुरों की नास्तिक प्रकृति को धारण करने वाले हैं, ऐसे दुष्ट मेरी शरण ग्रहण नहीं करते |
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चतुर्विधा भजन्ते मां जनाः सुकृतिनोSर्जुन |
आर्तो जिज्ञासुरर्थार्थी ज्ञानी च भरतर्षभ || १६ |
चतुः विधाः – चार प्रकार के; भजन्ते – सेवा करते हैं; माम् – मेरी; जनाः – व्यक्ति; सु-कृतिनः – पुण्यात्मा; अर्जुन – हे अर्जुन; आर्तः – विपदाग्रस्त, पीड़ित; जिज्ञासुः – ज्ञान के जिज्ञासु; अर्थ-अर्थी – लाभ की इच्छा रखने वाले; ज्ञानी – वस्तुओं को सही रूप में जानने वाले, तत्त्वज्ञ; च – भी; भरत-ऋषभ – हे भरतश्रेष्ठ |
हे भरतश्रेष्ठ! चार प्रकार के पुण्यात्मा मेरी सेवा करते हैं – आर्त, जिज्ञासु, अर्थार्थी तथा ज्ञानी |
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तेषां ज्ञानी नित्ययुक्त एकभक्तिर्विशिष्यते |
प्रियो हि ज्ञानिनोSत्यर्थमहं स च मम प्रियः || १७ ||
तेषाम् – उनमें से; ज्ञानी – ज्ञानवान; नित्य-युक्तः – सदैव तत्पर; एक – एकमात्र; भक्तिः – भक्ति में; विशिष्यते – विशिष्ट है; प्रियः – अतिशय प्रिय; हि – निश्चय ही; ज्ञानिनः – ज्ञानवान का; अत्यर्थम् – अत्यधिक; अहम् – मैं हूँ; सः – वह; च – भी; प्रियः – प्रिय |
इनमें से जो परमज्ञानी है और शुद्धभक्ति में लगा रहता है वह सर्वश्रेष्ठ है, क्योंकि मैं उसे अत्यन्त प्रिय हूँ और वह मुझे प्रिय है |
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उदाराः सर्व एवैते ज्ञानी त्वात्मैव मे मतम् |
आस्थितः स हि युक्तात्मा मामेवानुत्तमां गतिम् || १८ ||
उदाराः – विशाल हृदय वाले; सर्वे – सभी; एव – निश्चय ही; एते – ये; ज्ञानी – ज्ञानवाला; तु – लेकिन; आत्मा एव – मेरे सामान ही; मे – मेरे; मतम् – मत में; आस्थितः – स्थित; सः – वह; हि – निश्चय ही; युक्त-आत्मा – भक्ति में तत्पर; माम् – मुझ; एव – निश्चय ही; अनुत्तमाम् – परम, सर्वोच्च; गतिम् – लक्ष्य को |
निस्सन्देह ये सब उदारचेता व्यक्ति हैं, किन्तु जो मेरे ज्ञान को प्राप्त है, उसे मैं अपने ही समान मानता हूँ | वह मेरी दिव्यसेवा में तत्पर रहकर मुझ सर्वोच्च उद्देश्य को निश्चित रूप से प्राप्त करता है |
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बहूनां जन्मनामन्ते ज्ञानवान्मां प्रपद्यते |
वासुदेवः सर्वमिति स महात्मा सुदुर्लभः || १९ ||
बहूनाम् – अनेक; जन्मनाम् – जन्म तथा मृत्यु के चक्र के; अन्ते – अन्त में; ज्ञान-वान् – ज्ञानी; माम् – मेरी; प्रपद्यते – शरण ग्रहण करता है; वासुदेवः – भगवान् कृष्ण; सर्वम् – सब कुछ; इति – इस प्रकार; सः – ऐसा; महा-आत्मा – महात्मा; सु-दुर्लभः – अत्यन्त दुर्लभ है |
अनेक जन्म-जन्मान्तर के बाद जिसे सचमुच ज्ञान होता है, वह मुझको समस्त कारणों का कारण जानकर मेरी शरण में आता है | ऐसा महात्मा अत्यन्त दुर्लभ होता है |
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कामैस्तैस्तैर्ह्रतज्ञानाः प्रपद्यन्तेSन्यदेवताः |
तं तं नियममास्थाय प्रकृत्या नियताः स्वया || २० ||
कामैः – इच्छाओं द्वारा; तैः तैः – उन उन; हृत – विहीन; ज्ञानाः – ज्ञान से; प्रपद्यन्ते – शरण लेते हैं; अन्य – अन्य; देवताः – देवताओं की; तम् तम् – उस उस; नियमम् – विधान का; आस्थाय – पालन करते हुए; प्रकृत्या – स्वभाव से; नियताः – वश में हुए; स्वया – अपने आप |
जिनकी बुद्धि भौतिक इच्छाओं द्वारा मारी गई है, वे देवताओं की शरण में जाते हैं और वे अपने-अपने स्वभाव के अनुसार पूजा विशेष विधि-विधानों का पालन करते हैं |
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7यो यो यां यां तनुं भक्तः श्रद्धयार्चितुमिच्छति |
तस्य तस्याचलां श्रद्धां तामेव विदधाम्यहम् || २१ ||
यः यः – जो जो; याम् याम् – जिस जिस; तनुम् – देवता के रूप को; भक्तः – भक्त; श्रद्धया – श्रद्धा से; अर्चितुम् – पूजा करने के लिए; इच्छति – इच्छा करता है; तस्य तस्य – उस उसकी; अचलाम् – स्थिर; श्रद्धाम् – श्रद्धा को; ताम् – उस; एव – निश्चय ही; विदधामि – देता हूँ; अहम् – मैं |
मैं प्रत्येक जीव के हृदय में परमात्मा स्वरूप स्थित हूँ | जैसे ही कोई किसी देवता की पूजा करने की इच्छा करता है, मैं उसकी श्रद्धा को स्थिर करता हूँ, जिससे वह उसी विशेष देवता की भक्ति कर सके |
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स तया श्रद्धया युक्तस्तस्याराधनमीहते |
लभते च ततः कामान्मयैव विहितान्हितान् || २२ ||
सः – वह; तया – उस; श्रद्धया – श्रद्धा से; युक्तः – युक्त; तस्य – उस देवता की; आराधनम् – पूजा के लिए; ईहते – आकांशा करता है; लभते – प्राप्त करता है; च – तथा; ततः – उससे; कामान् – इच्छाओं को; मया – मेरे द्वारा; एव – ही; विहितान् – व्यवस्थित; हि – निश्चय ही; तान् – उन |
ऐसी श्रद्धा से समन्वित वह देवता विशेष की पूजा करने का यत्न करता है और अपनी इच्छा की पूर्ति करता है | किन्तु वास्तविकता तो यह है कि ये सारे लाभ केवल मेरे द्वारा प्रदत्त हैं |
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अन्तवत्तुफलंतेषांतद्भवत्यल्पमेधसाम् |
देवान्देवयजोमद्भक्तायान्तिमामपि || २३ ||
अन्त-वत् – नाशवान; तु – लेकिन; फलम् – फल; तेषाम् – उनका; भवति – होता है; अल्प-मेधसाम् – अल्पज्ञों का; देवान् – देवताओं के पास; देव-यजः – देवताओं को पूजने वाले; यान्ति – जाते हैं; मत् – मेरे; भक्ताः – भक्तगण; यान्ति – जाते हैं; माम् – मेरे पास; अपि – भी |
अल्पबुद्धि वाले व्यक्ति देवताओं की पूजा करते हैं और उन्हें प्राप्त होने वाले फल सीमित तथा क्षणिक होते हैं | देवताओं की पूजा करने वाले देवलोक को जाते हैं, किन्तु मेरे भक्त अन्ततः मेरे परमधाम को प्राप्त होते हैं |
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अव्यक्तं व्यक्तिमापन्नं मन्यन्ते मामबुद्धयः |
परं भावमजानन्तो ममाव्ययमनुत्तमम् || २४ ||
अव्यक्तम् – अप्रकट; व्यक्तिम् – स्वरूप को; आपन्नम् – प्राप्त हुआ; मन्यन्ते – सोचते हैं; माम् – मुझको; अबुद्धयः – अल्पज्ञानी व्यक्ति; परम् – परम; भावम् – सत्ता; अजानन्तः – बिना जाने; मम – मेरा; अव्ययम् – अनश्र्वर; अनुत्तमम् – सर्वश्रेष्ठ |
बुद्धिहीन मनुष्य मुझको ठीक से न जानने के कारण सोचते हैं कि मैं (भगवान् कृष्ण) पहले निराकार था और अब मैंने इस स्वरूप को धारण किया है | वे अपने अल्पज्ञान के कारण मेरी अविनाशी तथा सर्वोच्च प्रकृति को नहीं जान पाते |
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नाहं प्रकाशः सर्वस्य योगमायासमावृतः |
मूढोSयं नाभिजानाति लोको मामजमव्ययम् || २५ ||
न – न तो; अहम् – मैं; प्रकाशः – प्रकट; सर्वस्य – सबों के लिए; योग-माया – अन्तरंगा शक्ति से; समावृत – आच्छादित; मूढः – मुर्ख; अयम् – यह; न – नहीं; अभिजानाति – समझ सकता है; लोकः – लोग; माम् – मुझको; अजम् – अजन्मा को; अव्ययम् – अविनाशी को |
मैं मूर्खों तथा अल्पज्ञों के लिए कभी भी प्रकट नहीं हूँ | उनके लिए तो मैं अपनी अन्तरंगा शक्ति द्वारा आच्छादित रहता हूँ, अतः वे यह नहीं जान पाते कि मैं अजन्मा तथा अविनाशी हूँ |
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वेदाहं समतीतानि वर्तमानानि चार्जुन |
भविष्याणि च भूतानि मां तु वेद न कश्र्चन || २६ ||
वेद – जानता हूँ; अहम् – मैं; समतीतानि – भूतकाल को; वर्तमानानि – वर्तमान को; च – तथा; अर्जुन – हे अर्जुन; भविष्याणि – भविष्य को; च – भी; भूतानि – सारे जीवों को; माम् – मुझको; तु – लेकिन; वेद – जानता है; न – नहीं; कश्र्चन – कोई |
हे अर्जुन! श्रीभगवान् होने के नाते मैं जो कुछ भूतकाल में घटित हो चुका है, जो वर्तमान में घटित हो रहा है और जो आगे होने वाला है, वह सब कुछ जानता हूँ | मैं समस्त जीवों को भी जानता हूँ, किन्तु मुझे कोई नहीं जानता |
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येषां त्वन्तगतं पापं जनानां पुण्यकर्मणाम् |
ते द्वन्द्वमोहनिर्मुक्ता भजन्ते मां दृढव्रताः || २८ ||
येषाम् – जिन; तु – लेकिन; अन्त-गतम् – पूर्णतया विनष्ट; पापम् – पाप; जनानाम् – मनुष्यों का; पुण्य – पवित्र; कर्मणाम् – जिनके पूर्व कर्म; ते – वे; द्वन्द्व – द्वैत के; मोह – मोह से; निर्मुक्ताह – मुक्त; भजन्ते – भक्ति में तत्पर होते हैं; माम् – मुझको; दृढ-व्रताः – संकल्पपूर्वक |
जिन मनुष्यों ने पूर्वजन्मों में तथा इस जन्म में पुण्यकर्म किये हैं और जिनके पापकर्मों का पूर्णतया उच्छेदन हो चुका होता है, वे मोह के द्वन्द्वों से मुक्त हो जाते हैं और वे संकल्पपूर्वक मेरी सेवा में तत्पर होते हैं |
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येषां त्वन्तगतं पापं जनानां पुण्यकर्मणाम् |
ते द्वन्द्वमोहनिर्मुक्ता भजन्ते मां दृढव्रताः || २८ ||
येषाम् – जिन; तु – लेकिन; अन्त-गतम् – पूर्णतया विनष्ट; पापम् – पाप; जनानाम् – मनुष्यों का; पुण्य – पवित्र; कर्मणाम् – जिनके पूर्व कर्म; ते – वे; द्वन्द्व – द्वैत के; मोह – मोह से; निर्मुक्ताह – मुक्त; भजन्ते – भक्ति में तत्पर होते हैं; माम् – मुझको; दृढ-व्रताः – संकल्पपूर्वक |
जिन मनुष्यों ने पूर्वजन्मों में तथा इस जन्म में पुण्यकर्म किये हैं और जिनके पापकर्मों का पूर्णतया उच्छेदन हो चुका होता है, वे मोह के द्वन्द्वों से मुक्त हो जाते हैं और वे संकल्पपूर्वक मेरी सेवा में तत्पर होते हैं |
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जरामरणमोक्षाय मामाश्रित्य यतन्ति ये |
ते ब्रह्म तद्विदु: कृत्स्नमध्यात्मं कर्म चाखिलम् || २९ ||
जरा – वृद्धावस्था से; मरण – तथा मृत्यु से; मोक्षाय – मुक्ति के लिए; माम् – मुझको, मेरे; आश्रित्य – आश्रय बनकर, शरण लेकर; यतन्ति – प्रयत्न करते हैं; ये – जो; ते – ऐसे व्यक्ति; ब्रह्म – ब्रह्म; तत् – वास्तव में उस; विदुः – वे जानते हैं; कृत्स्नम् – सब कुछ; अध्यात्मम् – दिव्य; कर्म – कर्म; च – भी; आखिलम् – पूर्णतया |
जो जरा तथा मृत्यु से मुक्ति पाने के लिए यत्नशील रहते हैं, वे बुद्धिमान व्यक्ति मेरी भक्ति की शरण ग्रहण करते हैं | वे वास्तव में ब्रह्म हैं क्योंकि वे दिव्य कर्मों के विषय में पूरी तरह से जानते हैं |
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साधिभूताधिदैवं मां साधियज्ञं च ये विदु : |
प्रयाणकालेSपि च मां ते विदुर्युक्तचेतसः || ३० ||
स-अधिभूत – तथा भातिक जगत् चलाने वाले सिद्धान्त; अधिदैवम् – समस्त देवताओं को नियन्त्रित करने वाले; माम् – मुझको; स-अधियज्ञम् – तथा समस्त यज्ञों को नियन्त्रित करने वाले; च – भी; ये – जो; विदुः – जानते हैं; प्रयाण – मृत्यु के; काले – समय में; अपि – भी; च – तथा; माम् – मुझको; ते – वे; विदुः – जानते हैं; युक्त-चेतसः – जिनके मन मुझमें लगे हैं |
जो मुझ परमेश्र्वर को मेरी पूर्ण चेतना में रहकर मुझे जगत् का, देवताओं का तथा समस्त यज्ञविधियों का नियामक जानते हैं, वे अपनी मृत्यु के समय भी मुझ भगवान् को जान और समझ सकते हैं |
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