अध्याय 8 - भगवत्प्राप्ति
अर्जुन उवाच
किं तद्ब्रह्म किमध्यात्मं किं कर्म पुरुषोत्तम |
अधिभूतं च किं प्रोक्तमधिदैवं किमुच्यते || १ ||
अर्जुनः उवाच – अर्जुन ने कहा; किम् – क्या; तत् – वह; ब्रह्म – ब्रह्म; किम् – क्या; अध्यात्मम् – आत्मा; किम् – क्या; कर्म – सकाम कर्म; पुरुष-उत्तम – हे परमपुरुष; अधि-भूतम् – भौतिक जगत्; च – तथा; किम् – क्या; प्रोक्तम् – कहलाता है; अधि-दैवम् – देवतागण; किम् – क्या; उच्यते – कहलाता है |
अर्जुन ने कहा – हे भगवान्! हे पुरुषोत्तम! ब्रह्म क्या है? आत्मा क्या है? सकाम कर्म क्या है? यह भौतिक जगत क्या है? तथा देवता क्या हैं? कृपा करके यह सब मुझे बताइये |
*
अधियज्ञः कथं कोSत्र देहेSस्मिन्मधुसूदन |
प्रयाणकाले च कथं ज्ञेयोSसि नियतात्मभिः || २ ||
अधियज्ञः – यज्ञ का स्वामी; कथम् – किस तरह; कः – कौन; अत्र – यहाँ; देहे – शरीर में; अस्मिन् – इस; मधुसूदन – हे मधुसूदन; प्रयाण-काले – मृत्यु के समय; च – तथा; कथम् – कैसे; ज्ञेयः असि – जाने जा सकते हो; नियत-आत्मभिः – आत्मसंयमी के द्वारा |
हे मधुसूदन! यज्ञ का स्वामी कौन है और वह शरीर में कैसे रहता है? और मृत्यु के समय भक्ति में लगे रहने वाले आपको कैसे जान पाते हैं?
*
श्रीभगवानुवाच
अक्षरं ब्रह्म परमं स्वभावोSध्यात्ममुच्यते |
भूतभावोद्भवकरो विसर्गः कर्मसंज्ञितः || ३ ||
श्रीभगवान् उवाच – भगवान् ने कहा; अक्षरम् – अविनाशी; ब्रह्म – ब्रह्म; परमम् – दिव्य; स्वभावः – सनातन प्रकृति; अध्यात्मम् – आत्मा; उच्यते – कहलाता है; भूत-भाव-उद्भव-करः – जीवों के भौतिक शरीर को उत्पन्न करने वाला; विसर्गः – सकाम कर्म; संज्ञितः – कहलाता है |
भगवान् ने कहा – अविनाशी और दिव्य जीव ब्रह्म कहलाता है और उसका नित्य स्वभाव अध्यात्म या आत्म कहलाता है | जीवों के भौतिक शरीर से सम्बन्धित गतिविधि कर्म या सकाम कर्म कहलाती है |
*
अधिभूतं क्षरो भावः पुरुषश्र्चाधिदैवतम् |
अधियज्ञोSहमेवात्र देहे देहभृतां वर || ४ ||
अधिभूतम् – भौतिक जगत्; क्षरः – निरन्तर परिवर्तनशील; भावः – प्रकृति; पुरुषः – सूर्य, चन्द्र जैसे समस्त देवताओं सहित विराट रूप; च – तथा; अधिदैवतम् – अधिदैव नामक; अधियज्ञः – परमात्मा; अहम् – मैं (कृष्ण); एव – निश्चय ही; अन्न – इस; देहे – शरीर में; देह-भृताम् – देहधारियों में; वर – हे श्रेष्ठ |
हे देहधारियों में श्रेष्ठ! निरन्तर परिवर्तनशील यह भौतिक प्रकृति अधिभूत (भौतिक अभिव्यक्ति) कहलाती है | भगवान् का विराट रूप, जिसमें सूर्य तथा चन्द्र जैसे समस्त देवता सम्मिलित हैं, अधिदैव कहलाता है | तथा प्रत्येक देहधारी के हृदय में परमात्मा स्वरूप स्थित मैं परमेश्र्वर (यज्ञ का स्वामी) कहलाता हूँ |
*
अन्तकाले च मामेव स्मरन्मुक्त्वा कलेवरम् |
यः प्रयाति स मद्भावं याति नास्त्यत्र संशयः || ५ ||
अन्त-काले – मृत्यु के समय; च – भी; माम् – मुझको; एव – निश्चय ही; स्मरन् – स्मरण करते हुए; मुक्त्वा – त्याग कर; कलेवरम् – शरीर को; यः – जो; प्रयाति – जाता है; सः – वह; मत्-भावम् – मेरे स्वभाव को; याति – प्राप्त करता है; न – नहीं; अस्ति – है; अत्र – यहाँ; संशयः – सन्देह |
और जीवन के अन्त में जो केवल मेरा स्मरण करते हुए शरीर का त्याग करता है, वह तुरन्त मेरे स्वभाव को प्राप्त करता है | इसमें रंचमात्र भी सन्देह नहीं है |
*
यं यं वापि स्मरन्भावं त्यजत्यन्ते कलेवरम् |
तं तमेवैति कौन्तेय सदा तद्भावभावितः || ६ ||
यम् यम् – जिस; वा अपि – किसी भी; स्मरन् – स्मरण करते हुए; भावम् – स्वभाव को; त्यजति – परित्याग करता है; अन्ते – अन्त में; कलेवरम् – शरीर को; तम् तम् – वैसा ही; एव – निश्चय ही; एति – प्राप्त करता है; कौन्तेय – हे कुन्तीपुत्र; सदा – सदैव; तत् – उस; भाव – भाव; भावितः – स्मरण करता हुआ |
हे कुन्तीपुत्र! शरीर त्यागते समय मनुष्य जिस-जिस भाव का स्मरण करता है, वह उस उस भाव को निश्चित रूप से प्राप्त होता है |
*
तस्मात्सर्वेषु कालेषु मामनुस्मर युध्य च |
मय्यर्पितमनोबुद्धिर्मामेवैष्यस्यसंशयः || ७ ||
तस्मात् – अतएव; सर्वेषु – समस्त; कालेषु – कालों में; माम् – मुझको; अनुस्मर – स्मरण करते रहो; युध्य – युद्ध करो; च – भी; मयि – मुझमें; अर्पित – शरणागत होकर; मनः – मन; बुद्धिः – बुद्धि; माम् – मुझको; एव – निश्चय ही; एष्यसि – प्राप्त करोगे; असंशयः – निस्सन्देह ही |
अतएव, हे अर्जुन! तुम्हें सदैव कृष्ण रूप में मेरा चिन्तन करना चाहिए और साथ ही युद्ध करने के कर्तव्य को भी पूरा करना चाहिए | अपने कर्मों को मुझे समर्पित करके तथा अपने मन एवं बुद्धि को मुझमें स्थिर करके तुम निश्चित रूप से मुझे प्राप्त कर सकोगे |
*
अभ्यासयोगयुक्तेन चेतसा नान्यगामिना |
परमं पुरुषं दिव्यं याति पार्थानुचिन्तयन् || ८ ||
अभ्यास-योग – अभ्यास से; युक्तेन – ध्यान में लगे रहकर; चेतसा – मन तथा बुद्धि से; न अन्य गामिना – बिना विचलित हुए; परमम् – परं; पुरुषम् – भगवान् को; दिव्यम् – दिव्य; याति – प्राप्त करता है; पार्थ – हे पृथापुत्र; अनुचिन्तयन् – निरन्तर चिन्तन करता हुआ |
हे पार्थ! जो व्यक्ति मेरा स्मरण करने में अपना मन निरन्तर लगाये रखकर अविचलित भाव से भगवान् के रूप में मेरा ध्यान करता है, वह मुझको अवश्य ही प्राप्त होता है |
*
कविं पुराणमनुशासितार-
मणोरणीयांसमनुस्मरेद्यः |
सर्वस्य धातारमचिन्त्यरूप-
मादित्यवर्णं तमसः परस्तात् || ९ ||
कविम् – सर्वज्ञ; पुराणम् – प्राचीनतम, पुरातन; अनुशासितारम् – नियन्ता; अणोः – अणु की तुलना में; अणीयांसम् – लघुतर; अनुस्मरेत् – सदैव सोचता है; यः – जो; सर्वस्य – हर वस्तु का; धातारम् – पालक; अचिन्त्य – अकल्पनीय; रूपम् – जिसका स्वरूप; आदित्य-वर्णम् – सूर्य के समान प्रकाशमान; तमसः – अंधकार से; परस्तात् – दिव्य, परे |
मनुष्य को चाहिए कि परमपुरुष का ध्यान सर्वज्ञ, पुरातन, नियन्ता, लघुतम से भी लघुतर, प्रत्येक के पालनकर्ता, समस्त भौतिकबुद्धि से परे, अचिन्त्य तथा नित्य पुरुष के रूप में करे | वे सूर्य की भाँति तेजवान हैं और इस भौतिक प्रकृति से परे, दिव्य रूप हैं |
*
प्रयाणकाले मनसाचलेन
भक्तया युक्तो योगबलेन चैव |
भ्रुवोर्मध्ये प्राणमावेश्य सम्य-
क्स तं परं पुरुषमुपैति दिव्यम् || १० ||
प्रयाण-काले – मृत्यु के समय; मनसा – मन से; अचलेन – अचल, दृढ़; भक्त्या – भक्ति से; युक्तः – लगा हुआ; योग-बलेन – योग शक्ति के द्वारा; च – भी; एव – निश्चय ही; भ्रुवोः – दोनों भौहों के; मध्ये – मध्य में; प्राणम् – प्राण को; आवेश्य – स्थापित करे; सम्यक् – पूर्णतया; सः – वह; तम् – उस; परम् – दिव्य; पुरुषम् – भगवान् को; उपैति – प्राप्त करता है; दिव्यम् – दिव्य भगवद्धाम को |
मृत्यु के समय जो व्यक्ति अपने प्राण को भौहों के मध्य स्थिर कर लेता है और योगशक्ति के द्वारा अविचलित मन से पूर्णभक्ति के साथ परमेश्र्वर के स्मरण में अपने को लगाता है, वह निश्चित रूप से भगवान् को प्राप्त होता है |
*
यदक्षरं वेदविदो वदन्ति
विशन्ति यद्यतयो वीतरागाः |
यदिच्छन्तो ब्रह्मचर्यं चरन्ति
तत्ते पदं सङ्ग्रहेण प्रवक्ष्ये || ११ ||
यत् – जिस; अक्षरम् – अक्षर ॐ को; वेद-विदः – वेदों के ज्ञाता; वदन्ति – कहते हैं; विशन्ति – प्रवेश करते हैं; यत् – जिसमें; यतयः – बड़े-बड़े मुनि; वीत-रागाः – संन्यास-आश्रम में रहने वाले संन्यासी; यत् – जो; इच्छन्तः – इच्छा करने वाले; ब्रह्मचर्यम् – ब्रह्मचर्य का; चरन्ति – अभ्यास करते हैं; तत् – उस; ते – तुमको; पदम् – पद को; सङग्रहेण – संक्षेप में; प्रवक्ष्ये – मैं बतलाउँगा |
जो वेदों के ज्ञाता हैं, जो ओंकार का उच्चारण करते हैं और जो संन्यास आश्रम के बड़े-बड़े मुनि हैं, वे ब्रह्म में प्रवेश करते हैं | ऐसी सिद्धि की इच्छा करने वाले ब्रह्मचर्यव्रत का अभ्यास करते हैं | अब मैं तुम्हें वह विधि बताऊँगा, जिससे कोई भी व्यक्ति मुक्ति-लाभ कर सकता है |
*
सर्वद्वाराणि संयम्य मनो हृदि निरुध्य च |
मूध्न्र्याधायात्मनः प्राणमास्थितो योगधारणाम् || १२ ||
सर्व-द्वाराणि – शरीर के समस्त द्वारों को; संयम्य – वश में करके; मनः – मन को; हृदि – हृदय में; निरुध्य – बन्द कर; च – भी; आधाय – स्थिर करके; आत्मनः – अपने; प्राणम् – प्राणावायु को; आस्थितः – स्थित; योग-धारणाम् – योग की स्थिति |
समस्त ऐन्द्रिय क्रियाओं से विरक्ति को योग की स्थिति (योगधारणा) कहा जाता है | इन्द्रियों के समस्त द्वारों को बन्द करके तथा मन को हृदय में और प्राणवायु को सिर पर केन्द्रित करके मनुष्य अपने को योग में स्थापित करता है |
*
इत्येकाक्षरं ब्रह्म व्याहरन्मामनुस्मरन् ।
यः प्रयाति त्यजन्देह स याति परमां गतिम् ॥ १३॥
इति--इस तरह; एक-अक्षरम्--एक अक्षर; ब्रह्म--परब्रह्म का;
व्याहरन्ू--उच्चारण करते हुए; माम्--मुझको ( कृष्ण को ) ; अनुस्मरन्ू-- स्मरण करते
हुए; यः--जो; प्रयाति--जाता है; त्यजन्--छोड़ते हुए; देहम्--इस शरीर को; सः--
वह; याति--प्राप्त करता है; परमाम्--परम; गतिम्ू--गन्तव्य, लक्ष्य |.
इस योगाभ्यास में स्थित होकर तथा अक्षरों के परम
संयोग यानी ओंकार का उच्चारण करते हुए यदि कोई
भगवान् का चिन्तन करता है और अपने शरीर का त्याग
करता है, तो वह निश्चित रूप से आध्यात्मिक लोकों को जाता
है।
*
अनन्यचेताः सततं यो मां स्मरति नित्यशः |
तस्याहं सुलभः पार्थ नित्ययुक्तस्य योगिनः || १४ ||
अनन्य-चेताः – अविचलित मन से; सततम् – सदैव; यः – जो; माम् – मुझ (कृष्ण) को; स्मरति – स्मरण करता है; नित्यशः – नियमित रूप से; तस्य – उस; अहम् – मैं हूँ; सु-लभः – सुलभ, सरलता से प्राप्य; पार्थ – हे पृथापुत्र; नित्य – नियमित रूप से; युक्तस्य – लगे हुए; योगिनः – भक्त के लिए |
हे अर्जुन! जो अनन्य भाव से निरन्तर मेरा स्मरण करता है उसके लिए मैं सुलभ हूँ, क्योंकि वह मेरी भक्ति में प्रवृत्त रहता है |
*
मामुपेत्य पुनर्जन्म दु:खालयमशाश्र्वतम् |
नाप्नुवन्ति महात्मानः संसिद्धिं परमां गताः || १५ ||
माम् – मुझको; उपेत्य – प्राप्त करके; पुनः – फिर; जन्म – जन्म; दुःख-आलयम् – दुखों के स्थान को; अशाश्र्वतम् – क्षणिक; न – कभी नहीं; आप्नुवन्ति – प्राप्त करते हैं; महा-आत्मानः – महान पुरुष; संसिद्धिम् – सिद्धि को; परमाम् – परं; गताः – प्राप्त हुए |
मुझे प्राप्त करके महापुरुष, जो भक्तियोगी हैं, कभी भी दुखों से पूर्ण इस अनित्य जगत् में नहीं लौटते, क्योंकि उन्हें परम सिद्धि प्राप्त हो चुकी होती है |
*
आब्रह्मभुवनाल्लोकाः पुनरावर्तिनोSर्जुन |
मामुपेत्य तु कौन्तेय पुनर्जन्म न विद्यते || १६ ||
आ-ब्रह्म-भुवनात् – ब्रह्मलोक तक; लोकाः – सारे लोक; पुनः – फिर; आवर्तिनः – लौटने वाले; अर्जुन – हे अर्जुन; माम् – मुझको; उपेत्य – पाकर; तु – लेकिन; कौन्तेय – हे कुन्तीपुत्र; पुनःजन्म – पुनर्जन्म; न – कभी नहीं; विद्यते – होता है |
इस जगत् में सर्वोच्च लोक से लेकर निम्नतम सारे लोक दुखों के घर हैं, जहाँ जन्म तथा मरण का चक्कर लगा रहता है | किन्तु हे कुन्तीपुत्र! जो मेरे धाम को प्राप्त कर लेता है, वह फिर कभी जन्म नहीं लेता |
*
सहस्त्रयुगपर्यन्तमहर्यद्ब्रह्मणो विदु: |
रात्रिं युगसहस्त्रान्तां तेSहोरात्रविदो जनाः || १७ ||
सहस्र – एक हजार; युग – युग; पर्यन्तम् – सहित; अहः – दिन; यत् – जो; ब्रह्मणः – ब्रह्मा का; विदुः – वे जानते हैं; रात्रिम् – रात्रि; युग – युग; सहस्त्रान्ताम् – इसी प्रकार एक हजार बाद समाप्त होने वाली; ते – वे; अहः-रात्र – दिन-रात; विदः – जानते हैं; जनाः – लोग |
मानवीय गणना के अनुसार एक हजार युग मिलकर ब्रह्मा का दिन बनता है और इतनी ही बड़ी ब्रह्मा की रात्रि भी होती है |
*
अव्यक्ताद्वयक्तयः सर्वाः प्रभवन्त्यहरागमे |
रात्र्यागमे प्रलीयन्ते तत्रैवाव्यक्तसंज्ञके || १८ ||
अव्यक्तात् – अव्यक्त से; व्यक्तयः – जीव; सर्वाः – सारे; प्रभवन्ति – प्रकट होते हैं; अहः-आगमे – दिन होने पर; रात्रि-आगमे – रात्रि आने पर; प्रलीयन्ते – विनष्ट हो जाते हैं; तत्र – उसमें; एव – निश्चय ही; अव्यक्त – अप्रकट; संज्ञके – नामक, कहे जाने वाले |
ब्रह्मा के दिन के शुभारम्भ में सारे जीव अव्यक्त अवस्था से व्यक्त होते हैं और फिर जब रात्रि आती है तो वे पुनः अव्यक्त में विलीन हो जाते हैं |
*
भूतग्रामः स एवायं भूत्वा भूत्वा प्रलीयते |
रात्र्यागमेSवशः पार्थ प्रभवत्यहरागमे || १९ ||
भूत-ग्रामः – समस्त जीवों का समूह; सः – वही; एव – निश्चय ही; अयम् – यह; भूत्वा भूत्वा – बारम्बार जन्म लेकर; प्रलीयते – विनष्ट हो जाता है; रात्रि – रात्रि के; आगमे – आने पर; अवशः – स्वतः; पार्थ – हे पृथापुत्र; प्रभवति – प्रकट होता है; अहः – दिन; आगमे – आने पर |
जब-जब ब्रह्मा का दिन आता है तो सारे जीव प्रकट होते हैं और ब्रह्मा की रात्रि होते ही वे असहायवत् विलीन हो जाते हैं |
*
8परस्तस्मात्तु भावोSन्योSव्यक्तोSव्यक्तात्सनातनः |
यः स सर्वेषु भूतेषु नश्यत्सु न विनश्यति || २० ||
परः – परम; तस्मात् – उस; तु – लेकिन; भावः – प्रकृति; अन्यः – दूसरी; अव्यक्तः – अव्यक्त; अव्यक्तात् – अव्यक्त से; सनातनः – शाश्र्वत; यः सः – वह जो;सर्वेषु – समस्त; भूतेषु – जीवों के; नश्यत्सु – नाश होने पर; न – कभी नहीं; विनश्यति – विनष्ट होती है |
इसके अतिरिक्त एक अन्य अव्यय प्रकृति है, जो शाश्र्वत है और इस व्यक्त तथा अव्यक्त पदार्थ से परे है | यह परा (श्रेष्ठ) और कभी न नाश होने वाली है | जब इस संसार का सब कुछ लय हो जाता है, तब भी उसका नाश नहीं होता |
*
अव्यक्तोSक्षर इत्युक्तस्तमाहु: परमां गतिम् |
यं प्राप्य न निवर्तन्ते तद्धाम परमं मम || २१ ||
अव्यक्तः – अप्रकट; अक्षरः – अविनाशी; इति – इस प्रकार; उक्तः – कहा गया; तम् – उसको; आहुः – कहा जाता है; परमाम् – परम; गतिम् – गन्तव्य; यम् – जिसको; प्राप्य – प्राप्त करके; न – कभी नहीं; निवर्तन्ते – वापस आते हैं; तत् – निवास; परमम् – परं; मम – मेरा |
जिसे वेदान्ती अप्रकट और अविनाशी बताते हैं, जो परम गन्तव्य है, जिसे प्राप्त कर लेने पर कोई वापस नहीं आता, वही मेरा परमधाम है |
*
पुरुषः स परः पार्थ भक्तया लभ्यस्त्वनन्यया |
यस्यान्तःस्थानि भूतानि येन सर्वमिदं ततम् || २२ ||
पुरुषः – परमपुरुष; सः – वह; परः – परं, जिनसे बढ़कर कोई नहीं है; पार्थ – हे पृथापुत्र; भक्त्या – भक्ति के द्वारा; लभ्यः – प्राप्त किया जा सकता है; तु – लेकिन; अनन्यया – अनन्य, अविचल; यस्य – जिसके; अन्तः-स्थानि – भीतर; भूतानि – यह सारा जगत; येन – जिनके द्वारा; सर्वम् – समस्त; इदम् – जो कुछ हम देख सकते हैं; ततम् – व्याप्त है |
भगवान्, जो सबसे महान हैं. अनन्य भक्ति द्वारा ही प्राप्त किये जा सकते हैं | यद्यपि वे अपने धाम में विराजमान हैं, तो भी वे सर्वव्यापी हैं और उनमें सब कुछ स्थित है |
*
यत्र काले त्वनावृत्तिमावृत्तिं चैव योगिनः |
प्रयाता यान्ति तं कालं वक्ष्यामि भरतर्षभ || २३ ||
यत्र – जिस; काले – समय में; तु – तथा; अनावृत्तिम् – वापस न आना; आवृत्तिम् – वापसी; च – भी; एव – निश्चय ही; योगिनः – विभिन्न प्रकार के योगी; प्रयाताः – प्रयाण करने वाले; यान्ति प्राप्त करते हैं; तम् – उस; कालम् – काल को; वक्ष्यामि – कहूँगा; भरत-ऋषभ – हे भारतों में श्रेष्ठ!
हे भरतश्रेष्ठ! अब मैं उन विभिन्न कालों को बताऊँगा, जिनमें इस संसार से प्रयाण करने के बाद योगी पुनः आता है अथवा नहीं आता |
*
अग्निज्र्योतिरः श्रुक्लः षण्मासा उत्तरायणम् |
तत्र प्रयाता गच्छन्ति ब्रह्म ब्रह्मविदो जनाः || २४ ||
अग्निः – अग्नि; ज्योतिः – प्रकाश; अहः – दिन; शुक्लः – शुक्लपक्ष; षट्-मासाः – छह महीने; उत्तर-अयणम् – जब सूर्य उत्तर दिशा की ओर रहता है; तत्र – वहाँ; प्रयाताः – मरने वाला; गच्छन्ति – जाते हैं; ब्रह्म – ब्रह्म को; ब्रह्म-विदः – ब्रह्मज्ञानी; जनाः – लोग |
जो परब्रह्म के ज्ञाता हैं, वे अग्निदेव के प्रभाव में, प्रकाश में, दिन के शुभक्षण में, शुक्लपक्ष में या जब सूर्य उत्तरायण में रहता है, उन छह मासों में इस संसार से शरीर त्याग करने पर उस परब्रह्म को प्राप्त करते हैं |
*
धूमो रात्रिस्तथा कृष्णः षण्मासा दक्षिणायनम् |
तत्र चान्द्रमसं ज्योतिर्योगी प्राप्य निवर्तते || २५ ||
धूमः – धुआँ; रात्रिः – रात; तथा – और; कृष्णः – कृष्णपक्ष; षट्-मासाः – छह मॉस की अवधि; दक्षिण-अयणम् – जब सूर्य दक्षिण दिशा में रहता है; तत्र – वहाँ; चान्द्र-मसम् – चन्द्रलोक को; ज्योतिः – प्रकाश; योगी – योगी; प्राप्य – प्राप्त करके; निवर्तते – वापस आता है |
जो योगी धुएँ, रात्रि, कृष्णपक्ष में या सूर्य के दक्षिणायन रहने के छह महीनों में दिवंगत होता है, वह चन्द्रलोक को जाता है, किन्तु वहाँ से पुनः (पृथ्वी पर) चला आता है |
*
श्रुक्लकृष्णे गती ह्येते जगतः शाश्र्वते मते |
एकया यात्यनावृत्तिमन्ययावर्तते पुनः || २६ ||
शुक्ल – प्रकाश; कृष्णे – तथा अंधकार; गती – जाने के मार्ग; हि – निश्चय ही; एते – ये दोनों; जगतः – भौतिक जगत् का; शाश्र्वते – वेदों में; मते – मत से; एकया – एक के द्वारा; याति – जाता है; अनावृत्तिम् – न लौटने के लिए; अन्यया – अन्य के द्वारा; आवर्तते – आ जाता है; पुनः – फिर से |
वैदिक मतानुसार इस संसार से प्रयाण करने के दो मार्ग हैं – एक प्रकाश का तथा दूसरा अंधकार का | जब मनुष्य प्रकाश के मार्ग से जाता है तो वह वापस नहीं आता, किन्तु अंधकार के मार्ग से जाने वाला पुनः लौटकर आता है |
*
नैते सृती पार्थ जानन्योगी मुह्यति कश्र्चन |
तस्मात्सर्वेषु कालेषु योगयुक्तो भवार्जुन || २७ ||
न – कभी नहीं; एते – इन दोनों; सृती – विभिन्न मार्गों को; पार्थ – हे पृथापुत्र; जानन् – जानते हुए भी; योगी – भगवद्भक्त; मुह्यति – मोहग्रस्त होता है; कश्चन – कोई; तस्मात् – अतः; सर्वेषु कालेषु – सदैव; योग-युक्तः – कृष्णभावनामृत में तत्पर; भव – होवो; अर्जुन – हे अर्जुन |
भावार्थ
हे अर्जुन! यद्यपि भक्तगण इन दोनों मार्गों को जानते हैं, किन्तु वे मोहग्रस्त नहीं होते | अतः तुम भक्ति में सदैव स्थिर रहो |
*
वेदेषु यज्ञेषु तपःसु चैव दानेषु यत्पुण्यफलं प्रदिष्टम् |
अत्येति तत्सर्वमिदं विदित्वा योगी परं स्थानमुपैति चाद्यम् || २८ ||
वेदेषु – वेदाध्ययन में; यज्ञेषु – यज्ञ सम्पन्न करने में; तपःसु – विभिन्न प्रकार की तपस्याएँ करने में; च – भी; एव – निश्चय ही; दानेषु – दान देने में; यत् – जो; पुण्य-फलम् – पुण्यकर्म का फल; प्रदिष्टम् – सूचित; अत्येति – लाँघ जाता है; तत् सर्वम् – वे सब; इदम् – यह; विदित्वा – जानकर; योगी – योगी; परम् – परम; स्थानम् – धाम को; उपैति – प्राप्त करता है; च – भी; आद्यम् – मूल, आदि |
जो व्यक्ति भक्तिमार्ग स्वीकार करता है, वह वेदाध्ययन, तपस्या, दान, दार्शनिक तथा सकाम कर्म करने से प्राप्त होने वाले फलों से वंचित नहीं होता | वह मात्र भक्ति सम्पन्न करके इन समस्त फलों की प्राप्ति करता है और अन्त में परम नित्यधाम को प्राप्त होता है |
*
