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अध्याय दस: चैतन्य वृक्ष का तना, शाखाएँ और उप शाखाएँ

श्री-चैतन्य-पदाम्भोज-मधुपेभ्यो नमो नमः ।।कथञ्चिदाश्रयाद् येषां श्वापि तद्गन्ध-भाग्भवेत् ॥

१॥

मैं भ्रमरों के समान उन भक्तों के चरणकमलों में बारम्बार नमस्कार करता हूँ, जो चैतन्य महाप्रभु के चरणकमलों के मधु का निरन्तर आस्वादन करते हैं। यदि कुत्ते जैसा अभक्त भी किसी प्रकार ऐसे भक्तों की शरण में पहुँच जाता है, तो उसे भी कमल के फूल की सुगन्धि का आनन्द प्राप्त होता है।

जय जय श्री कृष्ण-चैतन्य-नित्यानन्द ।जयाद्वैतचन्द्र जय गौर-भक्त-वृन्द ॥

२॥

। श्री चैतन्य महाप्रभु तथा नित्यानन्द प्रभु की जय हो! श्री अद्वैत प्रभु की जय हो और श्रीवास समेत चैतन्य महाप्रभु के भक्तों की जय हो! एइ मालीर---एइ वृक्षेर अकथ्य कथन । एबे शुन मुख्य-शाखार नाम-विवरण ॥

३॥

माली तथा वृक्ष के रूप में श्री चैतन्य महाप्रभु का वर्णन अकल्पनीय है। अब इस वृक्ष की शाखाओं के विषय में ध्यान से सुनिये।

चैतन्य-गोसाजिर व्रत पारिषद-चय ।।गुरु-लघु-भाव ताँर ना हय निश्चय ॥

४॥

श्री चैतन्य महाप्रभु के अनेक पार्षद थे, किन्तु इनमें से किसी को भी ऊँचा या नीचा नहीं समझना चाहिए। इसका निर्धारण नहीं किया जा सकता।

ग्रत व्रत महान्त कैला ताँ-सबार गणन ।।केह करिबारे नारे ज्येष्ठ-लघु-क्रम ॥

५॥

श्री चैतन्य महाप्रभु के सम्प्रदाय के सारे महापुरुषों की गणना इन भक्तों में होती है, किन्तु इनमें कौन छोटा है और कौन बड़ा-इसका अन्तर नहीं हो सकता।

अतएव ताँ-सबारे करि' नमस्कार ।नाम-मात्र करि, दोष ना लबे आमार ॥

६॥

मैं उन सबको आदर स्वरूप नमस्कार करता हूँ। मेरी उनसे विनती है। कि वे मेरे अपराधों पर ध्यान न दें।

वन्दे श्री-कृष्ण-चैतन्य-प्रेमामर-तरोः प्रियान् ।।शाखा-रूपान्भक्त-गणान्कृष्ण-प्रेम-फल-प्रदान् ॥

७॥

मैं भगवत्प्रेम के शाश्वत् वृक्ष-रूपी श्री चैतन्य महाप्रभु के समस्त प्रिय भक्तों को नमस्कार करता हूँ। मैं इस वृक्ष की समस्त शाखाओं-रूपी महाप्रभु के उन भक्तों को नमस्कार करता हूँ, जो कृष्ण-प्रेम रूपी फल का वितरण करते हैं।

श्रीवास पण्डित, आर श्री-राम पण्डित ।।दुइ भाई-दुई शाखा, जगते विदित ॥

८॥

श्रीवास पण्डित तथा श्रीराम पण्डित-इन दोनों भाइयों से दो शाखाएँ प्रारम्भ हुईं, जो संसार में सर्वविदित हैं।

श्रीपति, श्रीनिधि ताँर दुइ सहोदर ।।चारि भाइर दास-दासी, गृह-परिकर ॥

९॥

उनके अन्य दो भाइयों के नाम श्रीपति तथा श्रीनिधि थे। उन चारों भाइयों, उनके नौकरों तथा नौकरानियों को एक बृहद् शाखा माना जाता है।

दुइ शाखार उपशाखाय ताँ-सबार गणन ।ग्राँर गृहे महाप्रभुर सदा सङ्कीर्तन ॥

१० ॥

इन दोनों शाखाओं से निकलने वाली उपशाखाओं की कोई गिनती नहीं है। श्री चैतन्य महाप्रभु नित्य ही श्रीवास पण्डित के घर में संकीर्तन किया करते थे।

चारि भाइ सवंशे करे चैतन्येर सेवा ।।गौरचन्द्र विना नाहि जाने देवी-देवा ॥

११॥

ये चारों भाई तथा उनके पारिवारिक सदस्य श्री चैतन्य महाप्रभु की सेवा में पूरी तरह लगे रहते थे। वे अन्य किसी देवता या देवी को नहीं जानते थे।

'आचार्यरत्न' नाम धरे बड़ एक शाखा ।ताँर परिकर, ताँर शाखा-उपशाखा ॥

१२॥

‘आचार्यरत्न' एक अन्य बड़ी शाखा थे और उनके पार्षद उपशाखाएँ थे।

आचार्यरत्नेर नाम 'श्री-चन्द्रशेखर'—।याँर घरे देवी-भावे नाचिला ईश्वर ॥

१३॥

आचार्यरत्न को श्री चन्द्रशेखर आचार्य भी कहते थे। उनके घर में एक नाटक में चैतन्य महाप्रभु ने लक्ष्मी का अभिनय किया था।

पुण्डरीक विद्यानिधि—बड़-शाखा जानि ।।याँर नाम लञा प्रभु कान्दिला आपनि ॥

१४॥

तृतीय बड़ी शाखा पुण्डरीक विद्यानिधि थे, जो श्री चैतन्य महाप्रभु को इतने प्रिय थे कि कभी-कभी उनकी अनुपस्थिति में महाप्रभु स्वयं रो पड़ते थे।

बड़ शाखा,—गदाधर पण्डित-गोसाजि । तेहो लक्ष्मी-रूपा, ताँर सम केह नाइ ॥

१५॥

चौथी शाखा गदाधर पण्डित को श्रीकृष्ण की हादिनी शक्ति के अवतार के रूप में वर्णित किया जाता है। अतएव उनकी बराबरी कोई नहीं कर सकता।

ताँर शिष्य-उपशिष्य, ताँर उपशाखा । एइमत सब शाखा-उपशाखार लेखा ॥

१६॥

उनके शिष्य तथा प्रशिष्य उनकी उपशाखाएँ हैं। उन सबका वर्णन कर पाना कठिन होगा।

वक्रेश्वर पण्डित–प्रभुर बड़ प्रिय भृत्य ।।एक-भावे चब्बिश प्रहर झाँर नृत्य ॥

१७॥

वृक्ष की पाँचवीं शाखा वक्रेश्वर पण्डित श्री चैतन्य महाप्रभु के अत्यन्त प्रिय सेवक थे। वे बहत्तर घंटे तक लगातार भावविभोर होकर नृत्य कर सकते थे।

आपने महाप्रभु गाय याँर नृत्य-काले ।प्रभुर चरण धरि' वक्रेश्वर बले ॥

१८॥

जब वक्रेश्वर पण्डित नाच रहे थे, तब स्वयं श्री चैतन्य महाप्रभु ने गाना गाया। फलतः वक्रेश्वर पण्डित महाप्रभु के चरणकमलों पर गिर पड़े और इस प्रकार बोले।

दश-सहस्र गन्धर्व मोरे देह' चन्द्रमुख ।तारा गाय, मुजि नाचों—तबे मोर सुख ॥

१९॥

हे चन्द्रमुख! कृपया मुझे आप दस हजार गन्धर्व दें। जब मैं नाचूं और वे गाएँ, तब मैं परम प्रसन्न होऊँगा।

प्रभु बले-तुमि मोर पक्ष एक शाखा ।।आकाशे उड़िताम यदि पाँ आर पाखा ॥

२०॥

महाप्रभु ने उत्तर दिया, मेरे पास तुम्हारे समान केवल एक ही पंख है, किन्तु यदि मेरे पास दूसरा पंख होता तो मैं निश्चय ही आकाश में उड़ता! पण्डित जगदानन्द प्रभुर प्राण-रूप ।लोके ख्यात हो सत्यभामार स्वरूपे ॥

२१॥

चैतन्य महाप्रभु की छठी शाखा पण्डित जगदानन्द थे, जो महाप्रभु के प्राणस्वरूप माने जाते थे। वे सत्यभामा ( भगवान् कृष्ण की पटरानियों में से एक ) के अवतार माने जाते हैं।

प्रीत्ये करिते चाहे प्रभुर लालन-पालन ।वैराग्य-लोक-भये प्रभु ना माने कखन ॥

२२॥

। जगदानन्द पण्डित ( सत्यभामा के अवतार रूप में) सदैव चैतन्य महाप्रभु की सुविधाओं का ध्यान रखते थे, किन्तु संन्यासी होने के कारण महाप्रभु उनके द्वारा प्रदत्त सुविधाओं को स्वीकार नहीं करते थे।

दुइ-जने खमटि लागाय कोन्दल ।ताँर प्रीत्येर कथा आगे कहिब सकल ॥

२३॥

कभी-कभी वे दोनों छोटी-छोटी बातों पर झगड़ते हुए प्रतीत होते थे, किन्तु ये झगड़े उनके प्रेम पर आधारित होते थे, जिनके बारे में मैं आगे बतलाऊँगा।

राघव-पण्डित–प्रभुर आद्य-अनुचर ।ताँर एक शाखा मुख्य–मकरध्वज कर ॥

२४॥

श्री चैतन्य महाप्रभु के मूल अनुयायी राघव पण्डित सातवीं शाखा कहे जाते हैं। उनसे एक अन्य उपशाखा निकली, जिसमें मकरध्वज कर मुख्य थे।

ताँहार भगिनी दमयन्ती प्रभुर प्रिय दासी । प्रभुर भोग-सामग्री ग्रे करे बार-मासि ॥

२५॥

राघव पण्डित की बहिन दमयन्ती महाप्रभु की प्रिय सेविका थी। वह सदैव विभिन्न भोग-सामग्री एकत्र करके महाप्रभु के लिए भोजन बनाती थी।

से सब सामग्री व्रत झालिते भरिया । राघव लइया ग्रा'न गुपत करिया ॥

२६॥

जब चैतन्य महाप्रभु पुरी में थे, तो उनके लिए दमयन्ती जो भोजन तैयार करती, उसे उसका भाई राघव दूसरों की नजर से बचाकर एक थैली में ले जाया करता था।

बार-मास ताहा प्रभु करेन अङ्गीकार ।। ‘राघवेर झालि' बलि' प्रसिद्धि ग्राहार ॥

२७॥

महाप्रभु बारहों महीने यह भोजन स्वीकार करते। ये थैलियाँ अब भी 'राघवेर झालि' अर्थात् 'राघव पण्डित की थैलियाँ' के नाम से विख्यात है।

से-सब सामग्री आगे करिब विस्तार ।ग्राहार श्रवणे भक्तेर बहे अश्रुधार ॥

२८॥

मैं श्री राघव पण्डित की थैली की सामग्री के बारे में इस ग्रंथ में आगे वर्णन करूंगा। इस वृत्तान्त को सुनकर भक्तगण प्रायः रो उठते हैं और उनकी आँखों से अश्रु झरने लगते हैं।

प्रभुर अत्यन्त प्रिय–पण्डित गङ्गादास ।याँहार स्मरणे हय सर्व-बन्ध-नाश ॥

२९ ॥

पण्डित गंगादास श्री चैतन्य वृक्ष की आठवीं प्रिय शाखा थे। जो व्यक्ति उनके कार्यों का स्मरण करता है, वह सारे बन्धनों से मुक्त हो जाता। है।

चैतन्य-पार्षद--श्री-आचार्य पुरन्दर ।।पिता करि' याँरै बले गौराङ्ग-सुन्दर ॥

३०॥

श्री आचार्य पुरन्दर नवीं शाखा थे, जो श्री चैतन्य महाप्रभु के नित्य पार्षद थे। महाप्रभु उन्हें अपने पिता के रूप में मानते थे।

दामोदर-पण्डित शाखा प्रेमेते प्रचण्ड ।प्रभुर उपरे स्नेहो कैल वाक्य-दण्ड ॥

३१॥

चैतन्य वृक्ष की दसवीं शाखा, दामोदर पण्डित, भगवान् चैतन्य के प्रेम में इतना आगे बढ़े हुए थे कि एक बार उन्होंने महाप्रभु को बिना किसी झिझक के कड़े शब्द कहकर प्रताड़ित किया।

दण्ड-कथा कहिब आगे विस्तार करिया ।।दण्डे तुष्ट प्रभु तौरै पाठाइला नदीया ॥

३२॥

इस दण्ड-वृत्तान्त का वर्णन मैं चैतन्य-चरितामृत में आगे करूंगा। महाप्रभु इस दण्ड से इतने तुष्ट हुए कि उन्होंने दामोदर पण्डित को नवद्वीप भेज दिया।

ताँहार अनुज शाखा–शङ्कर-पण्डित ।‘प्रभु-पादोपाधान' याँर नाम विदित ॥

३३॥

दामोदर पण्डित के छोटे भाई ग्यारहवीं शाखा थे, जिनका नाम शंकर पण्डित था। उन्हें महाप्रभु की पादुकाओं के रूप में माना जाता था।

सदाशिव-पण्डित याँर प्रभु-पदे आश ।प्रथमेइ नित्यानन्देर याँर घरे वास ॥

३४॥

बारहवीं शाखा, सदाशिव पण्डित, सदैव महाप्रभु के चरणकमलों की सेवा करने के लिए उत्सुक रहते थे। यह उनका अच्छा सौभाग्य था कि जब नित्यानन्द प्रभु नवद्वीप आये, तो वे उन्हीं के घर रूके।

श्री-नृसिंह-उपासक—प्रद्युम्न ब्रह्मचारी ।।प्रभु ताँर नाम कैला 'नृसिंहानन्द' करि' ॥

३५॥

तेरहवीं शाखा प्रद्युम्न ब्रह्मचारी थे। चूँकि वे भगवान् नृसिंहदेव के उपासक थे, इसलिए श्री चैतन्य महाप्रभु ने उनका नाम बदलकर नृसिंहानन्द ब्रह्मचारी कर दिया था।

नारायण-पण्डित एक बड़इ उदार ।चैतन्य-चरण विनु नाहि जाने आर ॥

३६॥

चौदहवीं शाखा नारायण पण्डित थे, जो एक महान् एवं उदार भक्त थे और चैतन्य महाप्रभु के चरणकमलों के अतिरिक्त अन्य कोई आश्रय नहीं जानते थे।

श्रीमान्पण्डित शाखा-प्रभुर निज भृत्य ।देउटि धरेन, ग्रबे प्रभु करेन नृत्य ॥

३७॥

पन्द्रहवीं शाखा श्रीमान् पण्डित थे, जो श्री चैतन्य महाप्रभु के नित्य सेवक थे। जब महाप्रभु नृत्य करते थे, तब वे मशाल लिए रहते थे।

शुक्लाम्बर-ब्रह्मचारी बड़ भाग्यवान् ।ग्राँर अन्न मागि' काड़ि' खाइला भगवान् ॥

३८॥

सोलहवीं शाखा, शुक्लाम्बर ब्रह्मचारी अत्यन्त भाग्यशाली थे, क्योंकि चैतन्य महाप्रभु परिहास करते हुए या गम्भीर होकर उनसे भोजन माँगते थे और कभी-कभी उनसे बलपूर्वक छीनकर खा लेते थे।

नन्दन-आचार्य-शाखा जगते विदित ।। लुकाइया दुइ प्रभुर ग्राँर घरे स्थित ॥

३९॥

चैतन्य वृक्ष की सत्रहवीं शाखा, नन्दन आचार्य जगतविदित हैं, क्योंकि दोनों प्रभु (चैतन्य महाप्रभु तथा नित्यानन्द प्रभु) कभी-कभी उनके घर में छिप जाया करते थे।

श्री-मुकुन्द-दत्त शाखा–प्रभुर समाध्यायी ।याँहार कीर्तने नाचे चैतन्य गोसाजि ॥

४०॥

श्री चैतन्य महाप्रभु के सहपाठी श्री मुकुन्द दत्त चैतन्य वृक्ष की एक अन्य शाखा थे। जब वे गाते थे, तब श्री चैतन्य महाप्रभु नाचा करते थे।

वासुदेव दत्त-प्रभुर भृत्य महाशय ।।सहस्र-मुखे याँर गुण कहिले ना हय ॥

४१ ॥

श्री चैतन्य वृक्ष की उन्नीसवीं शाखा, वासुदेव दत्त, एक महापुरुष एवं महाप्रभु के सर्वाधिक अन्तरंग भक्त थे। उनके गुणों का वर्णन हजारों मुखों से भी नहीं किया जा सकता।

जगते व्रतेक जीव, तार पाप ला ।नरक भुञ्जिते चाहे जीव छाड़ाइया ॥

४२॥

श्रील वासुदेव दत्त ठाकुर चाहते थे कि सारे संसार के लोगों के पापकर्मों का भोग वे ही करें, जिससे चैतन्य महाप्रभु उन लोगों का उद्धार कर सकें।

हरिदास-ठाकुर शाखार अद्भुत चरित ।। तिन लक्ष नाम तेहो लयेन अपतित ॥

४३॥

चैतन्य वृक्ष की बीसवीं शाखा हरिदास ठाकुर थे। उनका चरित्र अद्भुत था। वे निर्बाध रूप से प्रतिदिन ३ लाख बार कृष्ण-नाम का जप करते थे।

ताँहार अनन्त गुणकहि दिमात्र ।आचार्य गोसाञि ग्राँरै भुञ्जाय श्राद्ध-पात्र ॥

४४॥

। हरिदास ठाकुर के दिव्य गुणों का कोई अन्त न था। यहाँ मैं उनके गुणों के मात्र एक अंश का ही उल्लेख कर रहा हूँ। वे इतने महान् थे कि अद्वैत गोस्वामी ने जब अपने पिता का श्राद्ध-संस्कार किया, तो उन्हें ही पहली थाली भेंट की।

प्रह्लादे-समान ताँर गुणेर तरङ्ग ।।ग्रवन-ताड़नेओ ग्राँर नाहिक भू-भङ्ग ॥

४५ ॥

उनके उत्तम गुणों की तरंगें प्रह्लाद महाराज की जैसी थीं। जब मुसलमान शासक ने उन्हें दण्ड दिया, तो उन्होंने अपनी भौंह तक नहीं उठाई।

तेहो सिद्धि पाइले ताँर देह ला कोले ।।नाचिल चैतन्य-प्रभु महा-कुतूहले ॥

४६॥

हरिदास ठाकुर के दिवंगत होने पर स्वयं महाप्रभु उनके शरीर को अपनी गोद में लेकर बड़े ही भावावेश में नाचने लगे थे।

ताँर लीला वर्णियाछेन वृन्दावन-दास ।।ग्रेवा अवशिष्ट, आगे करिब प्रकाश ॥

४७॥

श्रील वृन्दावन दास ठाकुर ने चैतन्य भागवत में हरिदास ठाकुर की लीलाओं का विशद वर्णन किया है। जो कुछ शेष रह गया है, उसे मैं इसी पुस्तक में आगे बतलाने का प्रयास करूंगा।

ताँर उपशाखा--प्रेत कुलीन-ग्रामी जन ।।सत्यराज-आदि ताँर कृपार भाजन ॥

४८ ॥

श्री हरिदास ठाकुर की एक उपशाखा में कुलीन ग्राम के निवासी थे। इनमें से सत्यराज खान या सत्यराज वसु सर्वाधिक प्रसिद्ध थे, जिन्हें हरिदास ठाकुर की पूरी पूरी कृपा प्राप्त थी।

श्री-मुरारि गुप्त शाखा प्रेमेर भाण्डार ।प्रभुर हृदय द्रवे शुनि' दैन्य ग्राँर ॥

४९॥

श्री चैतन्य वृक्ष की इक्कीसवीं शाखा, मुरारि गुप्त, भगवत्प्रेम के भंडार थे। उनकी अत्यधिक दीनता तथा विनयशीलता से महाप्रभु का हृदय द्रवित हो उठता था।

प्रतिग्रह नाहि करे, ना लय कार धन ।।आत्म-वृत्ति करि' करे कुटुम्ब भरण ॥

५०॥

श्रील मुरारि गुप्त ने न तो कभी अपने मित्रों से कोई दान लिया, न ही किसी से कोई धन लिया। वे वैद्य का कार्य करके अपने परिवार का भरण-पोषण करते थे।

चिकित्सा करेन ग्नारे हेइया सदय ।। देह-रोग भाव-रोग, दुइ तार क्षये ॥

५१॥

जब मुरारि गुप्त अपने रोगियों का उपचार करते, तो उनकी कृपा से रोगियों के शारीरिक तथा आध्यात्मिक दोनों तरह के रोग कम हो जाते थे।

श्रीमान्सेन प्रभुर सेवक प्रधान । चैतन्य-चरण विनु नाहि जाने आन ॥

५२॥

श्री चैतन्य वृक्ष की बाईसवीं शाखा, श्रीमान सेन, श्री चैतन्य महाप्रभु के अत्यन्त आज्ञाकारी सेवक थे। वे श्री चैतन्य महाप्रभु के चरणकमलों के अतिरिक्त और कुछ नहीं जानते थे।

श्री-गदाधर दास शाखा सर्वोपरि ।। काजी-गणेर मुखे येह बोलाइल हरि ॥

५३॥

तेईसवीं शाखा, श्री गदाधर दास, सर्वोपरि समझे जाते थे, क्योंकि उन्होंने सारे मुसलमान काजियों को हरिनाम कीर्तन करने के लिए प्रेरित किया था।

शिवानन्द सेन----प्रभुर भृत्य अन्तरङ्ग । प्रभु-स्थाने याइते सबे लयेन यॉर सङ्ग ॥

५४॥

वृक्ष की चौबीसवीं शाखा, चैतन्य महाप्रभु के अत्यन्त विश्वासपात्र सेवक शिवानन्द सेन थे। जो कोई महाप्रभु का दर्शन करने जगन्नाथ पुरी जाता, वह श्री शिवानन्द सेन के यहाँ आश्रय और मार्गदर्शन पाता।

प्रतिवर्षे प्रभु-गण सङ्क्ते लाइया ।नीलाचले चलेन पथे पालन करिया ॥

५५॥

। वे प्रतिवर्ष भगवान् चैतन्य का दर्शन करने के लिए भक्तों की टोली को बंगाल से जगन्नाथ पुरी ले जाया करते थे। यात्रा पर जाते समय वे सारी टोली का खर्च वहन किया करते थे।

भक्ते कृपा करेन प्रभु ए-तिन स्वरूपे ।‘साक्षात्,' 'आवेश' आर 'आविर्भाव'-रूपे ॥

५६॥

श्री चैतन्य महाप्रभु अपने भक्तों पर तीन रूपों में अहैतुकी कृपा प्रदान करते हैं-अपने प्रत्यक्ष प्राकट्य ( साक्षात् ) द्वारा, किसी शक्ति प्रदत्त व्यक्ति के भीतर अपने पराक्रम (आवेश) द्वारा तथा अपने आविर्भाव द्वारा।

‘साक्षाते' सकल भक्त देखे निर्विशेष । नकुल ब्रह्मचारि-देहे प्रभुर' आवेश' ॥

५७॥

प्रत्येक भक्त की उपस्थिति में श्री चैतन्य महाप्रभु का प्रकट होना साक्षात् कहलाता है। नकुल ब्रह्मचारी में विशेष शक्ति के लक्षण रूप में उनका प्राकट्य, आवेश का उदाहरण है।

‘प्रद्युम्न ब्रह्मचारी' ताँर आगे नाम छिल ।। ‘नृसिंहानन्द' नाम प्रभु पाछे त' राखिल ॥

५८॥

श्री चैतन्य महाप्रभु ने प्रद्युम्न ब्रह्मचारी का नाम बदलकर नृसिंहानन्द बह्मचारी रख दिया।

ताँहाते हइल चैतन्येर आविर्भाव' ।।अलौकिक ऐछे प्रभुर अनेक स्वभाव ॥

५९॥

उसके शरीर में आविर्भाव के लक्षण थे। ऐसा प्राकट्य अलौकिक होता है, किन्तु श्री चैतन्य महाप्रभु ने अपने विभिन्न स्वरूपों से ऐसी अनेक लीलाएँ प्रदर्शित कीं।

आस्वादिल ए सब रस सेन शिवानन्द । विस्तारि' कहिब आगे एसब आनन्द ॥

६० ॥

श्रील शिवानन्द सेन को साक्षात्, आवेश तथा आविर्भाव तीनों लक्षणों का अनुभव था। इस दिव्य आनन्दपूर्ण विषय का विस्तृत वर्णन मैं बाद में स्पष्ट रूप से करूंगा।

शिवानन्देर उपशाखा, ताँर परिकर ।पुत्र-भृत्यादि करि' चैतन्य-किङ्कर ॥

६१॥

शिवानन्द सेन के पुत्र, नौकर तथा परिवार के सदस्य एक उपशाखा हैं। ये सभी श्री चैतन्य महाप्रभु के निष्ठावान सेवक थे।

चैतन्य-दास, रामदास, आर कर्णपूर ।।तिन पुत्र शिवानन्देर प्रभुर भक्त-शूर ॥

६२ । शिवानन्द सेन के तीनों पुत्र-चैतन्य दास, राम दास तथा कर्णपूरश्री चैतन्य महाप्रभु के शूरवीर भक्त थे।

श्री-वल्लभसेन, आर सेन श्रीकान्त ।शिवानन्द-सम्बन्धे प्रभुर भक्त एकान्त ॥

६३॥

श्रीवल्लभ सेन तथा श्रीकान्त सेन भी शिवानन्द सेन की उपशाखाएँ थे, क्योंकि ये न केवल उनके भांजे थे, अपितु श्री चैतन्य महाप्रभु के अनन्य भक्त भी थे।

प्रभु-प्रिय गोविन्दानन्द महाभागवत ।।प्रभुर कीर्तनीया आदि श्री गोविन्द दत्त ॥

६४॥

वृक्ष की पच्चीसवीं और छब्बीसवीं शाखाएँ, गोविन्दानन्द तथा गोविन्द दत्त, श्री चैतन्य महाप्रभु के संग कीर्तन किया करते थे। गोविन्द दत्त चैतन्य महाप्रभु की टोली के प्रधान गायक थे।

श्री-विजय-दास-नाम प्रभुर आखरिया ।।प्रभुरे अनेक पुँथि दियाछे लिखिया ॥

६५॥

सत्ताइसवीं शाखा, श्री विजय दास, महाप्रभु के अन्य प्रमुख गायक थे, जिन्होंने महाप्रभु को अनेक हस्तलिखित पुस्तकें भेंट कीं।

‘रत्नबाहु' बलि' प्रभु थुइल ताँर नाम ।अकिञ्चन प्रभुर प्रिय कृष्णदास-नाम ॥

६६॥

श्री चैतन्य महाप्रभु ने विजयदास का नाम रत्नबाहु रख दिया, क्योंकि उन्होंने महाप्रभु के लिए अनेक पाण्डुलिपियों की हस्तलिपियाँ उतारी थीं। अठ्ठाइसवीं शाखा कृष्णदास थे, जो महाप्रभु को अत्यन्त प्रिय थे। उनका नाम अकिंचन कृष्णदास था।

खोला-वेचा श्रीधर प्रभुर प्रिय-दास ।याँहा-सने प्रभु करे नित्य परिहास ॥

६७॥

उन्तीसवीं शाखा श्रीधर थे, जो केले की छाल के व्यापारी थे। वे महाप्रभु के अत्यन्त प्रिय सेवक थे। कई बार महाप्रभु ने उनके साथ परिहास किया था।

प्रभु याँर नित्य लय थोड़-मोचा-फल । याँर फुटा-लौहपात्रे प्रभु पिला जल ॥

६८ ॥

श्री चैतन्य महाप्रभु रोज मजाक में श्रीधर से फल, फूल तथा गूदा छीन लिया करते थे और उनके टूटे हुए लोहे के पात्र से जल पीते थे।

प्रभुर अतिप्रिय दास भगवान्पण्डित ।। याँर देहे कृष्ण पूर्वे हैला अधिष्ठित ॥

६९॥

तीसवीं शाखा भगवान् पण्डित थे। वे महाप्रभु के अत्यन्त प्रिय सेवक थे, किन्तु पूर्वजन्म में भी वे भगवान् कृष्ण के महान् भक्त थे और भगवान् को सदैव अपने हृदय में रखते थे।

जगदीश पण्डित, आर हिरण्य महाशय ।।यारे कृपा कैल बाल्ये प्रभु दयामय ॥

७० ॥

इकतीसवीं शाखा जगदीश पण्डित थे और बत्तीसवीं शाखा हिरण्य महाशय थे, जिन पर महाप्रभु ने अपने बाल्यकाल में अहैतुकी कृपा प्रदर्शित की थी।

एइ दुइ-घरे प्रभु एकादशी दिने ।विष्णुर नैवेद्य मागि' खाइल आपने ॥

७१॥

श्री चैतन्य महाप्रभु ने एकादशी के दिन इन दोनों के घरों से भोजन की भिक्षा माँगी और स्वयं इसे खाया।

प्रभुर पडूया दुइ, पुरुषोत्तम, सञ्जय ।। व्याकरणे दुइ शिष्य दुइ महाशय ॥

७२॥

तैतीसवीं तथा चौतीसवीं शाखाएँ पुरुषोत्तम तथा संजय नामक चैतन्य महाप्रभु के दो शिष्य थे, जो व्याकरण में सिद्धहस्त थे। वे महापुरुष थे।

वनमाली पण्डित शाखा विख्यात जगते । सोणार मुषल हल देखिल प्रभुर हाते ॥

७३॥

वृक्ष की पैंतीसवीं शाखा वनमाली पण्डित थे, जो इस जगत् में अत्यन्त विख्यात थे। उन्होंने महाप्रभु के हाथ में सोने की गदा (मूसल ) तथा हल देखा।

श्री-चैतन्येर अति प्रिय बुद्धिमन्त खान् ।। आजन्म आज्ञाकारी तेहो सेवक-प्रधान ॥

७४॥

छत्तीसवीं शाखा बुद्धिमन्त खान थे, जो श्री चैतन्य महाप्रभु को अत्यन्त प्रिय थे। वे महाप्रभु की आज्ञा का पालन करने के लिए सदैव प्रस्तुत रहते थे, अतएव वे महाप्रभु के प्रधान सेवक माने जाते थे।

गरुड़ पण्डित लय श्रीनाम-मङ्गल ।।नाम-बले विष याँरै ना करिल बल ॥

७५ ॥

वृक्ष की सैंतीसवीं शाखा, गरुड़ पण्डित, सदैव भगवान् का नामकीर्तन करने में व्यस्त रहते थे। इस कीर्तन के बल पर उन्हें विष का प्रभाव छु तक नहीं पाता था।

गोपीनाथ सिंह–एक चैतन्येर दास ।।अक्रूर बलि' प्रभु याँरै कैला परिहास ॥

७६ ॥

वृक्ष की अड़तीसवीं शाखा, गोपीनाथ सिंह, श्री चैतन्य महाप्रभु के निष्ठावान दास थे। महाप्रभु मजाक में उन्हें अक्रूर कहकर पुकारते थे।

भागवती देवानन्द वक्रेश्वर-कृपाते ।। भागवतेर भक्ति-अर्थ पाइल प्रभु हैते ॥

७७॥

देवानन्द पण्डित श्रीमद्भागवत के पेशेवर वाचक थे, किन्तु वक्रेश्वर पण्डित तथा महाप्रभु की कृपा से वे भागवत की भक्तिमयी व्याख्या समझ पाये।

खण्डवासी मुकुन्द-दास, श्री-रघुनन्दन ।। नरहरि-दास, चिरञ्जीव, सुलोचन ॥

७८ ॥

एइ सब महाशाखा चैतन्य-कृपाधाम ।प्रेम-फल-फुल करे ग्राहाँ ताहाँ दान ॥

७९ ॥

श्रीखण्डवासी मुकुन्द तथा उनके पुत्र श्री रघुनन्दन उस वृक्ष की उन्तालीसवीं शाखा थे, नरहरि चालीसवीं, चिरंजीव एकतालीसवीं और सुलोचन बयालीसवीं शाखा थे। ये सभी श्री चैतन्य महाप्रभु-रूपी कृपाधाम-वृक्ष की बड़ी-बड़ी शाखाएँ थे। इन्होंने भगवत्प्रेम रूपी फलों, फूलों को सर्वत्र वितरित किया।

कुलीनग्राम-वासी सत्यराज, रामानन्द ।।यदुनाथ, पुरुषोत्तम, शङ्कर, विद्यानन्द ॥

८० ॥

सत्यराज, रामानन्द, यदुनाथ, पुरुषोत्तम, शंकर, तथा विद्यानन्द ये सभी बीसवीं शाखा से सम्बन्धित थे। वे कुलीन ग्राम के निवासी थे।

वाणीनाथ वसु आदि व्रत ग्रामी जन ।।सबेइ चैतन्य-भृत्य,—चैतन्य-प्राणधन ॥

८१॥

वाणीनाथ वसु की अगुवाई में कुलीन ग्राम के सारे निवासी चैतन्य महाप्रभु के सेवक थे और चैतन्य महाप्रभु ही उनके एकमात्र प्राण तथा धन थे।

प्रभु कहे, कुलीनग्रामेर ग्रे हय कुकुर ।।सेइ मोर प्रिय, अन्य जन रहु दूर ॥

८२॥

महाप्रभु ने कहा, औरों की बात जाने दें, कुलीन ग्राम का कुत्ता भी मेरा प्रिय मित्र है।

कुलीनग्रामीर भाग्य कहने ना ग्राय ।।शूकर चराय डोम, सेह कृष्ण गाय ॥

८३॥

कुलीन ग्राम के सौभाग्य के विषय में कोई कुछ वर्णन नहीं कर सकता। वह इतना दिव्य है कि झाडू देने वाले भी सुअर चराते समय हरे कृष्ण महामन्त्र का कीर्तन करते हैं।

अनुपम-वल्लभ, श्री-रूप, सनातन ।एइ तिन शाखा वृक्षेर पश्चिमे सर्वोत्तम ॥

८४॥

वृक्ष के पश्चिम की ओर की तैंतालीसवीं, चवालीसवीं तथा पैंतालीसवीं शाखाएँ श्री सनातन, श्री रूप तथा अनुपम थे। ये सबमें श्रेष्ठ थे।

ताँर मध्ये रूप-सनातने बड़ शाखा । अनुपम, जीव, राजेन्द्रादि उपशाखा ॥

८५ ॥

इन शाखाओं में रूप तथा सनातन प्रमुख थे। अनुपम, जीव गोस्वामी तथा राजेन्द्र आदि उनकी उपशाखाएँ थे।

मालीर इच्छाय शाखा बहुत बाड़िल ।बाड़िया पश्चिम देश सब आच्छादिल ॥

८६॥

महान् माली की इच्छा से, श्रील रूप गोस्वामी तथा सनातन गोस्वामी की शाखाएँ कई गुना बढ़कर समूचे पश्चिमी देशों में फैल गईं और उन्होंने सारे प्रदेश को आच्छादित कर दिया।

आ-सिन्धुनदी-तीर आर हिमालय ।।वृन्दावन-मथुरादि व्रत तीर्थ हय ॥

८७॥

ये दो शाखाएँ सिन्धु नदी तथा हिमालय पर्वत की घाटियों की सीमाओं तक बढ़कर सारे भारत में फैल गईं, जिसमें वृन्दावन, मथुरा तथा हरिद्वार जैसे सारे तीर्थस्थल सम्मिलित हैं।

दुइ शाखार प्रेम-फले सकल भासिल ।प्रेम-फलास्वादे लोक उन्मत्त हइल ।। ८८॥

। इन दोनों शाखाओं में जो भगवत्प्रेम रूपी फल लगे, वे बड़ी संख्या में वितरित किये गये। इन फलों को चखकर हर व्यक्ति उनके लिए उन्मत्त हो उठा।

पश्चिमेर लोक सब मूढ़ अनाचार ।ताहाँ प्रचारिल दोहे भक्ति-सदाचार ॥

८९॥

भारत की पश्चिमी भाग के लोग न तो बुद्धिमान थे न शिष्ट, किन्तु श्रील रूप गोस्वामी तथा सनातन गोस्वामी के प्रभाव से वे भक्ति तथा सदाचार में प्रशिक्षित हो सके।

शास्त्र-दृष्ट्ये कैल लुप्त-तीर्थेर उद्धार । वृन्दावने कैल श्रीमूर्ति-सेवार प्रचार ॥

९०॥

प्रामाणिक शास्त्रों के निर्देशों के अनुसार दोनों गोस्वामियों ने लुप्त । तीर्थस्थलों का पुनरुद्धार किया और वृन्दावन में अर्चाविग्रहों की पूजा का सूत्रपात किया।

महाप्रभुर प्रिय भृत्य रघुनाथ-दास ।।सर्व त्यजि' कैल प्रभुर पद-तले वास ॥

९१॥

छियालिसवीं शाखा श्रील रघुनाथ दास गोस्वामी थे, जो श्री चैतन्य महाप्रभु के अत्यन्त प्रिय सेवक थे। उन्होंने महाप्रभु के पूर्ण शरणागत होने और उनके चरणों में निवास करने के लिए अपनी सारी भौतिक संपत्ति का परित्याग कर दिया।

प्रभु समर्पिल ताँरे स्वरूपेर हाते ।प्रभुर गुप्त-सेवा कैल स्वरूपेर साथे ॥

९२ ॥

जब रघुनाथ दास गोस्वामी जगन्नाथ पुरी में श्री चैतन्य महाप्रभु के पास पहुँचे, तो महाप्रभु ने उन्हें अपने सचिव स्वरूप दामोदर के हाथों सौंप दिया। इस तरह वे दोनों मिलकर महाप्रभु की गुह्य सेवा करने लगे।

षोड़श वत्सर कैल अन्तरङ्ग-सेवन । स्वरूपेर अन्तर्धाने आइला वृन्दावन ॥

९३॥

उन्होंने जगन्नाथ पुरी में रहकर सोलह वर्षों तक महाप्रभु की गुह्य सेवा की और महाप्रभु तथा स्वरूप दामोदर दोनों के तिरोधान के बाद वे जगन्नाथ पुरी छोड़कर वृन्दावन चले गये।

वृन्दावने दुइ भाइर चरण देखियो ।गोवर्धने त्यजिब देह भृगुपात करिया ॥

१४॥

श्री रघुनाथ दास गोस्वामी की इच्छा हुई कि वे वृन्दावन जाकर रूप तथा सनातन के चरणकमलों का दर्शन करें और फिर गोवर्धन पर्वत से कूदकर अपना प्राण त्याग दें।

एइ त निश्चय करि' आइल वृन्दावने ।आसि' रूप-सनातनेर वन्दिल चरणे ॥

९५॥

इस प्रकार श्रील रघुनाथ दास गोस्वामी वृन्दावन आये और श्रील रूप गोस्वामी तथा सनातन गोस्वामी से मिले तथा उन्हें प्रणाम किया।

तबे दुइ भाइ ताँरै मरिते ना दिल ।निज तृतीय भाइ करि' निकटे राखिल ॥

९६ ॥

किन्तु इन दोनों भाइयों ने उन्हें मरने की अनुमति नहीं दी। इन्होंने उन्हें अपने तीसरे भाई के रूप में स्वीकार करके अपने साथ रख लिया।

महाप्रभुर लीला ग्रत बाहिर-अन्तर ।।दुइ भाइ ताँर मुखे शुने निरन्तर ॥

९७॥

चूंकि रघुनाथ दास गोस्वामी स्वरूप दामोदर के सहायक थे, अतएव वे महाप्रभु की लीलाओं के बाहरी तथा भीतरी तथ्यों से बहुत कुछ परिचित थे। इस तरह रूप तथा सनातन दोनों भाई उनसे इनके विषय में सुना करते थे।

अन्न-जल त्याग कैल अन्य-कथन ।पल दुइ-तिन माठा करेन भक्षण ॥

९८॥

। रघुनाथ दास गोस्वामी ने धीरे-धीरे अन्न खाना त्याग दिया और वे मड़े की कुछ बूंदे पीने लगे।

सहस्र दण्डवत्करे, लय लक्ष नाम ।दुइ सहस्र वैष्णवेरे नित्य परणाम ॥

१९॥

वे नित्यप्रति भगवान् को हजार बार नमस्कार करते, भगवान् के एक लाख नाम जपते और दो हजार वैष्णवों को प्रणाम करते।

रात्रि-दिने राधा-कृष्णेर मानस सेवन । प्रहरेक महाप्रभुर चरित्र-कथने ॥

१०० ॥

वे अपने मन में दिन-रात राधा-कृष्ण की सेवा करते और तीन घण्टे प्रतिदिन श्री चैतन्य महाप्रभु के चरित्र के विषय में चर्चा करते।

तिन सन्ध्या राधा-कुण्डे अपतित स्नान ।। व्रज-वासी वैष्णवे करे आलिङ्गन मान ॥

१०१॥

श्री रघुनाथ दास गोस्वामी नित्य राधाकुण्ड में तीन बार स्नान करते थे। ज्योंही उन्हें वृन्दावन में रहने वाला कोई वैष्णव मिलता, वे उसका आलिंगन करते और उसका आदर करते थे।

सार्ध सप्त-प्रहर करे भक्तिर साधने ।चारि दण्ड निद्रा, सेह नहे कोन-दिने ॥

१०२॥

वे दिन के साढ़े बाइस घण्टे से अधिक भक्ति में बिताते और मुश्किल से दो घंटे से कम सोते। किसी-किसी दिन तो यह भी सम्भव नहीं हो पाता था।

ताँहार साधन-रीति शुनिते चमत्कार ।।सेइ रूप-रघुनाथ प्रभु ने आमार ॥

१०३॥

जब मैं उनके द्वारा सम्पन्न भक्ति के विषय में सुनता हूँ, तो आश्चर्यचकित रह जाता हूँ। मैं श्रील रूप गोस्वामी तथा रघुनाथ दास गोस्वामी को अपने मार्गदर्शक स्वीकार करता हूँ।

इँहा-सबार भैछे हैल प्रभुर मिलन ।आगे विस्तारिया ताहा करिब वर्णन ॥

१०४॥

मैं इसका आगे विस्तृत वर्णन करूँगा कि ये सारे भक्त श्री चैतन्य महाप्रभु से किस तरह मिले।

श्री-गोपाल भट्ट एक शाखा सर्वोत्तम ।।रूप-सनातन-सङ्गे ग्राँर प्रेम-आलापन ॥

१०५॥

श्री गोपाल भट्ट गोस्वामी उस वृक्ष की सैंतालीसवीं महान् एवं श्रेष्ठ शाखा थे। वे रूप गोस्वामी तथा सनातन गोस्वामी के साथ सदैव भगवत्प्रेम विषयक वार्ता में व्यस्त रहते थे।

शङ्करारण्य आचार्य-वृक्षेर एक शाखा । मुकुन्द, काशीनाथ, रुद्र–उपशाखा लेखा ॥

१०६॥

आचार्य शंकरारण्य मूल वृक्ष की अड़तालीसवीं शाखा माने गये हैं। उनसे मुकुन्द, काशीनाथ तथा रुद्र नामक उपशाखाएँ फूटीं।

श्रीनाथ पण्डित–प्रभुर कृपार भाजन । ग्राँर कृष्ण-सेवा देखि' वश त्रि-भुवने ॥

१०७॥

उञ्चासवीं शाखा, श्रीनाथ पण्डित श्री चैतन्य महाप्रभु के अत्यन्त कृपापात्र थे। तीनों लोक के सारे निवासी यह देखकर चकित थे कि वे भगवान् कृष्ण की किस तरह सेवा करते हैं।

जगन्नाथ आचार्य प्रभुर प्रिय दास ।।प्रभुर आज्ञाते तेंहो कैल गङ्गा-वास ॥

१०८॥

चैतन्य-वृक्ष की पचासवीं शाखा, जगन्नाथ आचार्य, महाप्रभु के अत्यन्त प्रिय दास थे और महाप्रभु की आज्ञा से उन्होंने गंगा नदी के तट पर रहने का निश्चय किया।

कृष्णदास वैद्य, आर पण्डित-शेखर ।कविचन्द्र, आर कीर्तनीया षष्ठीवर ॥

१०९॥

चैतन्य-वृक्ष की इक्कावनवीं शाखा कृष्णदास वैद्य, बावनवीं शाखा पण्डित शेखर, तिरपनवीं शाखा कविचन्द्र थे, और चौवनवीं शाखा षष्ठीवर हुए, जो बहुत बड़े संकीर्तनिया थे।

श्रीनाथ मिश्र, शुभानन्द, श्रीराम, ईशान ।।श्रीनिधि, श्रीगोपीकान्त, मिश्र भगवान् ॥

११०॥

श्रीनाथ मिश्र पचपनवीं शाखा थे, शुभानन्द छप्पनवीं, श्रीराम सत्तावनवीं, ईशान अठ्ठावनवीं, श्रीनिधि उनसठवीं, श्री गोपीकान्त साठवीं तथा मिश्र भगवान इकसठवीं शाखा थे।

पुरुषोत्तम, श्री-गालीम, जगन्नाथ-दास ।। श्री चन्द्रशेखर वैद्य, द्विज हरिदास ॥

११२॥

। मूल वृक्ष की अड़सठवीं शाखा श्री पुरुषोत्तम थे, श्रीगालीम उनहत्तरवीं, जगन्नाथ दास सत्तरवीं, श्री चन्दरशेखर वैद्य इकहत्तरवीं और जि हरिदास बहत्तरवीं शाखा थे।

सुबुद्धि मिश्र, हृदयानन्द, कमल-नयन । महेश पण्डित, श्रीकर, श्री-मधुसूदन ॥

१११॥

सुबुद्धि मिश्र बासठवीं शाखा थे, हृदयानन्द तिरसठवीं, कमलनयन चौसठवीं, महेश पण्डित पैंसठवीं, श्रीकर छियासठवीं तथा श्री मधुसूदन सतसठवीं शाखा थे।

रामदास, कविचन्द्र, श्री-गोपालदास ।।भागवताचार्य, ठाकुर सारङ्गदास ॥

११३॥

। मृल वृक्ष की तिहत्तरवीं शाखा राम दास थे, चौहत्तरवीं शाखा विधन्द्र, पचहत्तरवीं शाखा श्री गोपाल दास, छिहत्तरवीं शाखा भागवताचार्य और सतहत्तरवीं शाखा ठाकुर सारंग दास थे।

जगन्नाथ तीर्थ, विप्र श्री-जानकीनाथ । गोपाल आचार्य, आर विप्र वाणीनाथ ।। ११४॥

मूल वृक्ष की अठहत्तरवीं शाखा जगन्नाथ तीर्थ थे, उन्यासीवीं शाखा जानकीनाथ ब्राह्मण, अस्सीवीं शाखा गोपाल आचार्य तथा इक्यासीवीं शाखा वाणीनाथ ब्राह्मण थे।

गोविन्द, माधव, वासुदेव तिन भाई ।।याँ-सबार कीर्तने नाचे चैतन्य-निताई ॥

११५ ॥

गोविन्द, माधव तथा वासुदेव नामक तीनों भाई वृक्ष की बयासीवीं, तिरासीवी और चौरासीवीं शाखाएँ थे। श्री चैतन्य महाप्रभु तथा नित्यानन्द प्रभु इनके कीर्तन में नृत्य करते थे।

रामदास अभिराम सख्य-प्रेमराशि ।। षोलसाङ्गेर काष्ठ तुलि' ये करिल वाँशी ॥

११६॥

रामदास अभिराम सदैव सख्य भाव में मग्न रहते थे। उन्होंने १६ गाँठ वाले बाँस की बाँसुरी बनाई थी।

प्रभुर आज्ञाय नित्यानन्द गौड़े चलिला ।ताँर सङ्गे तिन-जन प्रभु-आज्ञाय आइली ॥

११७॥

श्री चैतन्य महाप्रभु की आज्ञा से जब नित्यानन्द प्रभु प्रचार हेतु बंगाल वापस गये, तब उनके साथ-साथ तीन भक्त भी गये।

रामदास, माधव, आर वासुदेव घोष ।।प्रभु-सङ्गे रहे गोविन्द पाइया सन्तोष ॥

११८॥

ये तीनों भक्त थे रामदास, माधव घोष तथा वासुदेव घोष। किन्तु गोविन्द घोष श्री चैतन्य महाप्रभु के साथ जगन्नाथ पुरी में रह गये। इस तरह उन्हें परम सन्तोष हुआ।

भागवताचार्य, चिरञ्जीव श्री-रघुनन्दन ।माधवाचार्य, कमलाकान्त, श्री-यदुनन्दन ॥

११९॥

भागवताचार्य, चिरंजीव, श्री रघुनन्दन, माधवाचार्य, कमलाकान्त तथा श्री यदुनन्दन-ये सभी चैतन्य-वृक्ष की शाखाओं में से थे।

महा-कृपा-पात्र प्रभुर जगाइ, माधाइ ।‘पतित-पावन' नामेर साक्षी दुई भाइ ।। १२० ॥

वृक्ष की नवासीवीं तथा नब्बेवीं शाखाएँ, जगाइ तथा माधाइ, श्री चैतन्य महाप्रभु के सर्वाधिक कृपापात्र थे। ये दोनों भाई इसके साक्षी थे, जिन्होंने यह प्रमाणित किया कि महाप्रभु का पतितपावन, पतितों के उद्धारकर्ता नाम सार्थक है।

गौड़-देश-भक्तेर कैल संक्षेप कथन । अनन्त चैतन्य-भक्त ना याय गणन ॥

१२१॥

मैंने महाप्रभु के बंगाल के भक्तों का संक्षिप्त विवरण प्रस्तुत किया है। वास्तव में उनके भक्तों की संख्या अनगिनत है।

नीलाचले एइ सब भक्त प्रभु-सङ्गे।।दुइ स्थाने प्रभु-सेवा कैल नाना-रङ्गे ॥

१२२॥

मैंने इन सारे भक्तों का विशेष रूप से वर्णन इसीलिए किया है, क्योंकि वे महाप्रभु के साथ-साथ बंगाल तथा उड़ीसा में रहे और उन्होंने अनेक प्रकार से उनकी सेवाएँ कीं।।

केवल नीलाचले प्रभुर ग्रे ये भक्त-गण ।सङ्क्षेपे करिये किछु से सब कथन ॥

१२३॥

अब मैं श्री चैतन्य महाप्रभु के जगन्नाथ पुरी के कुछ भक्तों का संक्षेप में वर्णन करूंगा।

नीलाचले प्रभु-सङ्गे ग्रत भक्त-गण ।। सबार अध्यक्ष प्रभुर मर्म दुइ-जने ॥

१२४॥

परमानन्द-पुरी, आर स्वरूप-दामोदर ।। गदाधर, जगदानन्द, शङ्कर, वक्रेश्वर ॥

१२५॥

दामोदर पण्डित, ठाकुर हरिदास ।।रघुनाथ वैद्य, आर रघुनाथ-दास ॥

१२६॥

। महाप्रभु के साथ-साथ जो भक्तगण जगन्नाथ पुरी में रहे, उनमें से दो-परमानन्द पुरी तथा स्वरूप दामोदर-महाप्रभु के हृदय और प्राण समान थे। अन्य भक्तों में गदाधर, जगदानन्द, शंकर, वक्रेश्वर, दामोदर पण्डित, ठाकुर हरिदास, रघुनाथ वैद्य तथा रघुनाथ दास उल्लेखनीय हैं।

इत्यादिक पूर्व-सङ्गी बड़ भक्तगण ।नीलाचले रहि' करे प्रभुर सेवन ॥

१२७॥

ये सारे भक्त प्रारम्भ से ही महाप्रभु के पार्षद थे और जब चैतन्य महाप्रभु जगन्नाथ पुरी में रहने लगे, तो वे निष्ठापूर्वक उनकी सेवा करने के लिए वहीं रह गये।

आर व्रत भक्त-गण गौड़-देश-वासी ।प्रत्यब्दे प्रभुरे देखे नीलाचले आसि' ॥

१२८॥

बंगाल में रहने वाले सारे भक्त महाप्रभु का दर्शन करने प्रति वर्ष जगन्नाथ पुरी आया करते थे।

नीलाचले प्रभु-सह प्रथम मिलन । सेई भक्त-गणेर एबे करिये गणन ॥

१२९॥

अब मैं बंगाल के उन भक्तों के नाम गिनाऊँगा, जो सबसे पहले महाप्रभु से मिलने जगन्नाथ पुरी आये।

बड़-शाखा एक, सार्वभौम भट्टाचार्य ।। ताँर भग्नी–पति श्री-गोपीनाथाचा ॥

१३०॥

। महाप्रभु-रूपी वृक्ष की सबसे बड़ी शाखाओं में से एक थे सार्वभौम चार्य और उनके बहनोई श्री गोपीनाथाचार्य।

काशी-मिश्र, प्रद्युम्न-मिश्र, राय भवानन्द ।याँहार मिलने प्रभु पाइला आनन्द ॥

१३१॥

जगन्नाथ पुरी के भक्तों की सूची में (जो परमानन्द पुरी, स्वरूप दामोदर, सार्वभौम भट्टाचार्य तथा गोपीनाथ आचार्य से प्रारम्भ होती है) काशी मिश्र, प्रद्युम्न मिश्र, तथा भवानन्द राय के नाम पाँचवें, छठे तथा सातवें स्थान पर थे। भगवान् चैतन्य को इनसे मिलकर अति आनन्द होता था।

आलिङ्गन करि' ताँरै बलिल वचन ।।तुमि पाण्डु, पञ्च-पाण्डव- तोमार नन्दन ॥

१३२॥

। महाप्रभु ने भवानन्द राय का आलिंगन करते हुए बतलाया, तुम पहले पाण्डु रूप में और तुम्हारे पाँचों पुत्र पाँचों पाण्डवों के रूप में प्रकट हुए थे।

रामानन्द राय, पट्टनायक गोपीनाथ ।कलानिधि, सुधानिधि, नायक वाणीनाथ ॥

१३३॥

भवानन्द राय के पाँच पुत्र थे-रामानन्द राय, पट्टनायक गोपीनाथ, कलानिधि, सुधानिधि और नायक वाणीनाथ।

एइ पञ्च पुत्र तोमार मोर प्रियपात्र ।। रामानन्द सह मोर देह-भेद मात्र ॥

१३४॥

श्री चैतन्य महाप्रभु ने भवानन्द राय से कहा, तुम्हारे पाँचों पुत्र मेरे प्रिय भक्त हैं। रामानन्द राय और हम दोनों एक हैं, भले ही हमारे शरीर - अलग हैं।

प्रतापरुद्र राजा, आर ओढू कृष्णानन्द । परमानन्द महापात्र, ओढू शिवानन्द ॥

१३५ ।। भगवानाचार्य, ब्रह्मानन्दाख्य भारती ।। श्री-शिखि माहिति, आर मुरारि माहिति ॥

१३६।। जब चैतन्य महाप्रभु जगन्नाथ पुरी में रह रहे थे, तब उड़ीसा के राजा प्रतापरुद्र, उड़िया-भक्त कृष्णानन्द तथा शिवानन्द, परमानन्द महापात्र, भगवान् आचार्य, ब्रह्मानन्द भारती, श्री शिखि माहिति तथा मुरारि माहिति निरन्तर उनका साथ देते थे।

माधवी-देवी–शिखि-माहितिर भगिनी ।।श्री-राधार दासी-मध्ये ग्राँर नाम गणि ॥

१३७॥

माधवीदेवी प्रमुख भक्तों में सत्रहवीं थीं और शिखि माहिति की छोटी बहन थीं। उन्हें पूर्व जन्म में श्रीमती राधारानी की दासी के रूप में माना जाता है।

ईश्वर-पुरीर शिष्य–ब्रह्मचारी कोशीश्वर ।।श्री गोविन्द नाम ताँर प्रिय अनुचर ॥

१३८॥

ब्रह्मचारी काशीश्वर ईश्वर पुरी के शिष्य थे और उनके ही प्रिय शिष्यों में से दूसरे श्री गोविन्द थे।

ताँर सिद्धि-काले दोहे ताँर आज्ञा पाळा ।। नीलाचले प्रभु-स्थाने मिलिल आसिया ॥

१३९ ॥

। नीलाचल (जगन्नाथ पुरी) के प्रमुख भक्तों की सूची में काशीश्वर अठारहवें तथा गोविन्द उन्नीसवें थे। ईश्वर पुरी के तिरोधान के समय दी गई आज्ञा के अनुसार वे दोनों श्री चैतन्य महाप्रभु का दर्शन करने जगन्नाथ पुरी आये थे।

गुरुर सम्बन्धे मान्य कैल मुँहाकारे ।ताँर आज्ञा मानि' सेवा दिलेन दोंहारे ॥

१४० ॥

काशीश्वर तथा गोविन्द दोनों श्री चैतन्य महाप्रभु के गुरुभाई थे। अतएव ज्योंही वे दोनों वहाँ पहुँचे, तो महाप्रभु ने उनका यथोचित सत्कार किया। चूंकि ईश्वर पुरी ने उन्हें आदेश दिया था कि वे चैतन्य महाप्रभु की निजी सेवा करें, अतएव महाप्रभु ने उनकी सेवा स्वीकार कर ली।

अङ्ग-सेवा गोविन्देरे दिलेन ईश्वर ।।जगन्नाथ देखिते चलेन आगे काशीश्वर ॥

१४१॥

गोविन्द श्री चैतन्य महाप्रभु के शरीर की देखभाल करते और जब महाप्रभु मन्दिर में जगन्नाथजी का दर्शन करने जाते, तो काशीश्वर महाप्रभु के आगे-आगे चलते थे।

अपरश ग्राय गोसाजि मनुष्य-गहने ।मनुष्य ठेलि' पथ करे काशी बलवाने ॥

१४२॥

जब श्री चैतन्य महाप्रभु जगन्नाथ मन्दिर जाते, तो काशीश्वर अत्यन्त बलिष्ठ होने के कारण अपने हाथों से भीड़ को एक ओर करते, जिससे महाप्रभु किसी को स्पर्श किये बिना जा सकें।

रामाइ-नन्दाई–दोंहे प्रभुर किङ्कर ।।गोविन्देर सङ्गे सेवा करे निरन्तर ॥

१४३॥

रामाइ तथा नन्दाइ जगन्नाथ पुरी के महत्त्वपूर्ण भक्तों में बीसवें तथा इक्कीसवें थे। महाप्रभु की सेवा करने में गोविन्द की वे चौबीसों घण्टे सहायता करते थे।

बाइश घड़ा जल दिने भरेन रामाइ ।गोविन्द-आज्ञाय सेवा करेन नन्दाइ ॥

१४४॥

रामाइ प्रतिदिन बाईस बड़े जल पात्रों में पानी भरते थे और नन्दाई स्वयं गोविन्द की सहायता करते थे।

कृष्णदास नाम शुद्ध कुलीन ब्राह्मण ।।ग्रारे सङ्गे लैया कैला दक्षिण गमन ॥

१४५ ॥

बाईसवें भक्त कृष्णदास एक विशुद्ध तथा प्रतिष्ठित ब्राह्मण-कुल में उत्पन्न हुए थे। जब महाप्रभु दक्षिण भारत की यात्रा कर रहे थे, तो उन्होंने कृष्णदास को अपने साथ ले लिया था।

बलभद्र भट्टाचार्य–भक्ति अधिकारी ।। मथुरा-गमने प्रभुर ग्रॅहो ब्रह्मचारी ॥

१४६॥

बलभद्र भट्टाचार्य तेईसवें प्रमुख पार्षद थे, जो प्रामाणिक भक्त थे। और जिन्होंने महाप्रभु की मथुरा की यात्रा के समय उनके ब्रह्मचारी का कार्य किया था।

बड़ हरिदास, आर छोट हरिदास । दुइ कीर्तनीया रहे महाप्रभुर पाश ॥

१४७॥

नीलाचल में चौबीसवें और पचीसवें भक्त, बड़ हरिदास तथा छोट हरिदास, अच्छे गायक थे, जो सदैव महाप्रभु के साथ रहते थे।

रामभद्राचार्य, आर ओढू सिंहेश्वर ।। तपन आचार्य, आर रघु, नीलाम्बर ॥

१४८॥

जगन्नाथ पुरी में चैतन्य महाप्रभु के साथ रहने वाले भक्तों में रामभद्राचार्य छब्बीसवें, उड़िया सिंहेश्वर सत्ताइसवें, तपन आचार्य अठ्ठाइसवें, रघुनाथ भट्टाचार्य उन्तीसवें तथा नीलाम्बर तीसवें भक्त थे।

सिङ्गाभट्ट, कामाभट्ट, दन्तुर शिवानन्द ।। गौड़े पूर्व भृत्य प्रभुर प्रिय कमलानन्द ॥

१४९॥

सिंगाभट्ट, कामाभट्ट, शिवानन्द तथा कमलानन्द क्रमशः इकतीसवें बत्तीसवें, तैंतीसवें और चौंतीसवें भक्त थे। ये सभी पहले बंगाल में महाप्रभु की सेवा करते थे, किन्तु बाद में बंगाल छोड़कर महाप्रभु के साथ रहने जगन्नाथ पुरी चले गये।

अच्युतानन्द–अद्वैत-आचार्य-तनय । नीलाचले रहे प्रभुर चरण आश्रय ॥

१५० ॥

पैंतीसवें भक्त अच्युतानन्द थे, जो अद्वैत आचार्य के पुत्र थे। वे भी। जगन्नाथ पुरी में महाप्रभु के चरणकमलों की शरण में रहे।

निर्लोम गङ्गादास, आर विष्णुदास । एइ सबेर प्रभु-सङ्गे नीलाचले वास ॥

१५१॥

जगन्नाथ पुरी में श्री चैतन्य महाप्रभु के सेवकों के रूप में रहने वाले भक्तों में निर्लोम गंगादास तथा विष्णुदास छत्तीसवें तथा सैंतीसवें भक्त थे।

वाराणसी-मध्ये प्रभुर भक्त तिन जन ।। चन्द्रशेखर वैद्य, आर मिश्र तपन ॥

१५२॥

रघुनाथ भट्टाचार्य–मिश्रेर नन्दन ।। प्रभु ग्रबे काशी आइला देखि' वृन्दावन ॥

१५३॥

चन्द्रशेखर-गृहे कैल दुइ मास वास ।तपन-मिश्रेर घरे भिक्षा दुइ मास ॥

१५४॥

वाराणसी के प्रमुख भक्तों में वैद्य चन्द्रशेखर, तपन मिश्र तथा तपन मिश्र के पुत्र रघुनाथ भट्टाचार्य थे। जब भगवान् चैतन्य वृन्दावन से होकर वाराणसी आये, तब वे दो मास तक चन्द्रशेखर वैद्य के घर रहे और तपन मिश्र के घर प्रसाद ग्रहण करते रहे।

रघुनाथ बाल्ये कैल प्रभुर सेवन । उच्छिष्ट-मार्जन और पाद-संवाहन ॥

१५५॥

जब श्री चैतन्य महाप्रभु तपन मिश्र के घर ठहरे हुए थे, तब रघुनाथ भट्ट, जो उस समय बालक थे, झूठे बर्तन माँजते थे और उनके पाँव दबाते थे।

बड़ हैले नीलाचले गेला प्रभुर स्थाने । अष्ट-मास रहिल भिक्षा देन कोन दिने ॥

१५६ ॥

जब रघुनाथ बड़े हो गये, तब वे श्री चैतन्य महाप्रभु के दर्शन करने जगन्नाथ पुरी गये और वहाँ आठ मास तक रहे। कभी-कभी वे महाप्रभु को प्रसाद अर्पण करते थे।

प्रभुर आज्ञा पात्रा वृन्दावनेरे आइला । आसिया श्री-रूप-गोसाजिर निकटे रहिला ॥

१५७॥

। बाद में महाप्रभु की आज्ञा से रघुनाथ वृन्दावन चले गये और वहाँ श्रील रूप गोस्वामी की शरण में रहे।

ताँर स्थाने रूप-गोसाजि शुनेन भागवत । प्रभुरे कृपाय तेंहो कृष्ण-प्रेमे मत्त ॥

१५८॥

जब वे श्रील रूप गोस्वामी के साथ ठहरे थे, तो उनका एक ही काम था-श्रीमद्भागवत बाँचकर उन्हें सुनाना। इसके फलस्वरूप उन्हें कृष्णप्रेम की पूर्णता प्राप्त हुई, जिसके कारण वे सदैव उन्मत्त रहा करते थे।

ऐइ-मत सङ्ख्यातीत चैतन्य-भक्त-गण । दिंमात्र लिखि, सम्यक्ना ग्राय कथन ॥

१५९॥

इस तरह मैं महाप्रभु के असंख्य भक्तों के एक अंश की ही सूची दे रहा हूँ। सबका वर्णन कर पाना सम्भव नहीं है।

एकैक-शाखाते लागे कोटि कोटि डाल ।। तार शिष्य-उपशिष्य, तार उपड़ाल ॥

१६०॥

वृक्ष की प्रत्येक शाखा से शिष्यों तथा प्रशिष्यों की करोड़ों उपशाखाएँ निकली हैं।

सकल भरिया आछे प्रेम-फुल-फले ।। भासाइल त्रि-जगत्कृष्ण-प्रेम-जले ॥

१६१॥

वृक्ष की प्रत्येक शाखा तथा उपशाखा अनेक फलों और फूलों से परिपूर्ण है। वे कृष्ण-प्रेम के जल से विश्व को आप्लावित करती हैं।

एक एक शाखार शक्ति अनन्त महिमा । ‘सहस्र वदने' ग्रार दिते नारे सीमा ॥

१६२॥

श्री चैतन्य महाप्रभु के भक्तों की प्रत्येक शाखा की अनन्त आध्यात्मिक शक्ति और अनन्त महिमा है। यदि किसी के हजार मुख भी हों, तो भी उनके कार्यकलापों की सीमाओं का वर्णन कर पाना सम्भव नहीं होगा।

सङ्क्षेपे कहिल महाप्रभुर भक्त-गण । समग्र बलिते नारे 'सहस्र-वदन' ॥

१६३॥

मैंने श्री चैतन्य महाप्रभु के विभिन्न स्थानों के भक्तों का संक्षिप्त वर्णन किया है। हजार मुखों वाले शेष भगवान् भी उन सबकी सूची नहीं बना सकते।

श्री-रूप-रघुनाथ-पदे यार आश । चैतन्य-चरितामृत कहे कृष्णदास ॥

१६४॥

। श्री रूप और श्री रघुनाथ के चरणकमलों में प्रार्थना करते हुए और सदैव उनकी कृपा की आकांक्षा रखते हुए मैं, कृष्णदास उनके चरणचिह्नों पर चलते हुए श्री चैतन्य-चरितामृत का वर्णन कर रहा हूँ।

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