अध्याय नौ: भक्ति सेवा का इच्छा वृक्ष
तं श्रीमत्कृष्ण-चैतन्य-देवं वन्दे जगद्गुरुम् ।।ग्रस्यानुकम्पया श्वापि महाब्धि सन्तरेत्सुखम् ॥
१॥
मैं अखिल जगत् के गुरु श्रीकृष्ण चैतन्य महाप्रभु को सादर नमस्कार करता हूँ, जिनकी कृपा से एक कुत्ता भी महासागर को पार कर सकता है।
जय जय श्री-कृष्ण-चैतन्य गौरचन्द्र ।।जय जयाद्वैत जय जय नित्यानन्द ॥
२॥
उन श्रीकृष्ण चैतन्य की जय हो, जो गौरहरि कहलाते हैं। अद्वैताचार्य तथा नित्यानन्द प्रभु की जय हो! जय जय श्रीवासादि गौर-भक्त-गण ।।सर्वाभीष्ट-पूर्ति-हेतु याँहार स्मरण ॥
३॥
श्रीवास ठाकुर इत्यादि चैतन्य महाप्रभु के भक्तों की जय हो! मैं अपनी सारी इच्छाओं की पूर्ति के लिए उनके चरणकमलों का स्मरण करता हूँ।
श्री-रूप, सनातन, भट्ट रघुनाथ ।श्री-जीव, गोपाल-भट्ट, दास-रघुनाथ ॥
४॥
मैं छहों गोस्वामियों-रूप, सनातन, भट्ट रघुनाथ, श्री जीव, गोपाल भट्ट तथा दास रघुनाथ-का भी स्मरण करता हूँ।
एसब-प्रसादे लिखि चैतन्य-लीला-गुण ।।जानि वा ना जानि, करि आपन-शोधन ॥
५॥
। इन सारे वैष्णवों तथा गुरुओं की कृपा से ही मैं श्री चैतन्य महाप्रभु की लीलाओं और गुणों के बारे में लिखने का प्रयास कर रहा हूँ। चाहे जानकर हो अथवा अनजाने में, मैं आत्मशुद्धि के लिए ही यह पुस्तक लिख रहा हूँ।
माला-कारः स्वयं कृष्ण-प्रेमामर-तरुः स्वयम् ।। दाता भोक्ता तत्फलानां ग्रस्तं चैतन्यमाश्रये ॥
६॥
मैं पूर्ण पुरुषोत्तम भगवान् श्री चैतन्य महाप्रभु की शरण लेता हूँ, जो स्वयं कृष्ण-प्रेम रूपी वृक्ष हैं, इसके माली हैं और इसके फलों के प्रदाता तथा भोक्ता दोनों हैं।
प्रभु कहे, आमि ‘विश्वम्भर' नाम धरि ।। नाम सार्थक हय, यदि प्रेमे विश्व भरि ॥
७॥
चैतन्य महाप्रभु ने सोचा, मेरा नाम विश्वम्भर अर्थात् 'अखिल ब्रह्माण्ड का पालन करने वाला है। यह नाम तभी सार्थक बनेगा, यदि मैं अखिल ब्रह्माण्ड को भगवत्प्रेम से भर दूँ।
एत चिन्ति' लैला प्रभु मालाकार-धर्म ।।नवद्वीपे आरम्भिला फलोद्यान-कर्म ॥
८॥
इस प्रकार सोचते हुए उन्होंने माली का कार्य स्वीकार किया और नवद्वीप में एक उद्यान ( बगीचा ) लगाना प्रारम्भ कर दिया।
श्री-चैतन्य मालाकार पृथिवीते आनि' ।।भक्ति-कल्पतरु रोपिला सिञ्चि' इच्छा-पानि ॥
९॥
इस प्रकार महाप्रभु भक्ति-रूपी कल्पवृक्ष को इस पृथ्वी पर ले आये और स्वयं इसके माली बने। उन्होंने बीज बोया और उसे अपनी इच्छारूपी जल से सींचा।
जय श्री माधवपुरी कृष्ण-प्रेम-पूर ।भक्ति-कल्पतरुर तेहो प्रथम अङ्कर ॥
१०॥
कृष्ण-भक्ति के आगार श्री माधवेन्द्र पुरी की जय हो! वे भक्ति के कल्पवृक्ष हैं और उन्हीं में भक्ति का प्रथम बीज अंकुरित हुआ।
श्री-ईश्वरपुरी-रूपे अङ्कर पुष्ट हैल ।। आपने चैतन्य-माली स्कन्ध उपजिल ॥
११॥
इसके बाद भक्ति का बीज श्री ईश्वरपुरी के रूप में अंकुरित हुआ और फिर श्री चैतन्य महाप्रभु जो स्वयं माली थे, उस भक्ति रूपी वृक्ष को मुख्य तना बने।
निजाचिन्त्य-शक्त्ये माली हा स्कन्ध हय । सकल शाखार सेई स्कन्ध मूलाश्रय ॥
१२॥
। अपनी अचिन्त्य शक्तियों के कारण महाप्रभु एकसाथ माली, तना तथा शाखाएँ बने।
परमानन्द पुरी, आर केशव भारती ।। ब्रह्मानन्द पुरी, आर ब्रह्मानन्द भारती ॥
१३ ॥
विष्णु-पुरी, केशव-पुरी, पुरी कृष्णानन्द ।। श्री-नृसिंहतीर्थ, आर पुरी सुखानन्द ॥
१४॥
एइ नव मूल निकसिल वृक्ष-मूले । एइ नव मूले वृक्ष करिल निश्चले ॥
१५॥
श्री परमानन्द पुरी, केशव भारती, ब्रह्मानन्द पुरी, ब्रह्मानन्द भारती, श्री विष्णु पुरी, केशव पुरी, कृष्णानन्द पुरी, श्री नृसिंह तीर्थ तथा सुखानन्द पुरी-ये नौ संन्यासी वे जड़े हैं, जो उस वृक्ष के तने से फूटीं। इस तरह इन नौ जड़ों के बल पर वह वृक्ष दृढ़ता से खड़ा रहा।
मध्य-मूल परमानन्द पुरी महा-धीर।।अष्ट दिके अष्ट मूल वृक्ष कैल स्थिर ॥
१६॥
धीर गम्भीर परमानन्द पुरी मुख्य ( केन्द्रीय) जड़ बने और आठों दिशाओं में अन्य आठ जड़ों समेत श्री चैतन्य महाप्रभु रूपी वृक्ष सुस्थिर हो गया।
स्कन्धेर उपरे बहु शाखा उपजिल । उपरि उपरि शाखा असङ्ख्य हइल ॥
१७॥
। तने से अनेक शाखाएँ फूटीं और उनके भी ऊपर अनेक उपशाखाएँ निकलीं।
विश विश शाखा करि' एक एक मण्डल । महा-महा-शाखा छाइल ब्रह्माण्ड सकल ॥
१८॥
इस तरह चैतन्य रूपी वृक्ष की शाखाओं से एक गुच्छा या समाज बना और बड़ी-बड़ी शाखाएँ सारे ब्रह्माण्ड में छा गईं।
एकैक शाखाते उपशाखा शत शत ।।ग्रत उपजिल शाखा के गणिबे कत ॥
१९॥
हर शाखा से सैकड़ों उपशाखाएँ फूटीं। इस तरह कितनी शाखाएँ निकलीं, इसकी गिनती कोई नहीं कर सकता।
मुख्य मुख्य शाखा-गणेर नाम अगणन ।।आगे त' करिब, शुन वृक्षेर वर्णन ॥
२०॥
मैं इन असंख्य शाखाओं में से सर्वप्रमुख शाखाओं का नाम गिनाने का प्रयत्न करूंगा। कृपया चैतन्य-वृक्ष का वर्णन सुनें।
वृक्षेर उपरे शाखा हैल दुइ स्कन्ध ।।एक 'अद्वैत' नाम, आर 'नित्यानन्द' ॥
२१॥
वृक्ष के ऊपरी तने के दो भाग हो गये। एक तने का नाम श्री अद्वैत प्रभु था और दूसरे का श्री नित्यानन्द प्रभु।
सेइ दुइ-स्कन्धे बहु शाखा उपजिल ।तार उपशाखा-गणे जगत्छाइल ॥
२२॥
इन दोनों तनों से अनेक शाखाएँ एवं उपशाखाएँ उत्पन्न हुईं, जो सारे जगत् पर छा गईं।
बड़ शाखा, उपशाखा, तारे उपशाखा । ग्रत उपजिल तार के करिबे लेखा ॥
२३॥
ये शाखाएँ तथा उपशाखाएँ और उनकी भी उपशाखाएँ इतनी अधिक हो गईं कि उन सबके विषय में लिख पाना असम्भव है।
शिष्य, प्रशिष्य, आर उपशिष्य-गण ।। जगत्व्यापिल तार नाहिक गणन ॥
२४॥
इस तरह शिष्य, उनके शिष्य और उन सबके प्रशंसक सारे जगत् में फैल गये। इन सबको गिना पाना सम्भव नहीं है।
उडुम्बर-वृक्ष ग्रेन फले सर्व अङ्गे।।एइ मत भक्ति-वृक्षे सर्वत्र फल लागे ॥
२५ ॥
जिस प्रकार विशाल अंजीर वृक्ष में सर्वत्र फल लगते हैं, उसी तरह भक्ति-वृक्ष के प्रत्येक अंग में फल लगे।
मूल-स्कन्धेर शाखा आर उपशाखा-गणे ।लागिला ये प्रेम-फल,—अमृतके जिने ॥
२६॥
चूँकि श्रीकृष्ण चैतन्य महाप्रभु मूल तना थे, अतएव शाखाओं तथा उपशाखाओं में जो फल लगे, उनका स्वाद अमृत से भी बढ़कर था।
पाकिल ये प्रेम-फल अमृत-मधुर ।विलाय चैतन्य-माली, नाहि लय मूल ॥
२७॥
फल पकते गये और मीठे तथा अमृतमय हो गये। माली श्री चैतन्य महाप्रभु ने उन्हें कोई मूल्य माँगे बिना ही वितरित कर दिया।
त्रि-जगते व्रत आछे धन-रत्नमणि ।।एक-फलेर मूल्य करि' ताहा नाहि गणि ॥
२८ ॥
भक्ति के ऐसे एक अमृतमय फल के मूल्य की बराबरी तीनों लोक की सारी सम्पदा भी नहीं कर सकती।।
मागे वा ना मागे केह, पात्र वा अपात्र ।।इहार विचार नाहि जाने, देय मात्र ॥
२९ ॥
श्री चैतन्य महाप्रभु ने इसका विचार किये बिना ही भक्तिरूपी फल का वितरण किया कि कौन इसे माँगता है, कौन नहीं अथवा कौन उसको पाने का पात्र है और कौन कुपात्र।।
अञ्जलि अञ्जलि भरि' फेले चतुर्दिशे ।। दरिद्र कुड़ाञा खाय, मालाकार हासे ॥
३०॥
दिव्य माली श्री चैतन्य महाप्रभु ने अंजुली में भर-भरकर सभी दिशाओं में फल बाँट दिये और जब गरीब, भूखे लोगों ने यह फल खाया, तो माली परम आनन्दित होकर मुस्कुराते रहे।
मालाकार कहे,—शुन, वृक्ष-परिवार ।मूलशाखा-उपशाखा व्रतेक प्रकार ॥
३१॥
इस प्रकार श्री चैतन्य महाप्रभु ने भक्ति-वृक्ष की विभिन्न प्रकार की शाखाओं तथा उपशाखाओं को संबोधित किया है।
अलौकिक वृक्ष करे सर्वेन्द्रिय-कर्म ।स्थावर हइया धरे जङ्गमेर धर्म ॥
३२॥
चूँकि भक्ति-वृक्ष दिव्य होता है, अतएव इसका प्रत्येक अंग अन्य सारे अंगों का कार्य सम्पन्न कर सकता है। यद्यपि वृक्ष अचर माना जाता है, किन्तु ऐसा होते हुए भी यह वृक्ष जंगम ( चलने वाला) है।
ए वृक्षेर अङ्ग हय सब सचेतन ।बाड़िया व्यापिल सबे सकल भुवन ॥
३३॥
इस वृक्ष के सारे अंग आध्यात्मिक रूप से सचेतन हैं और वे ज्योंज्यों बढ़ते हैं त्यों-त्यों सारे जगत् में फैल जाते हैं।
एकला मालाकार आमि काहाँ काहाँ ग्राब ।।एकला वा कत फल पाड़िया विलाब ॥
३४॥
मैं ही अकेला माली हूँ। मैं कितने स्थानों में जा सकता हूँ? मैं कितने फल तोड़ और बाँट सकता हूँ? एकला उठा दिते हय परिश्रम ।केह पाय, केह ना पाय, रहे मने भ्रम ॥
३५॥
अकेले फलों को तोड़कर उन्हें वितरित करना निश्चित ही अत्यधिक परिश्रम का कार्य है, परन्तु इतने पर भी मुझे सन्देह है कि कुछ लोग उन्हें प्राप्त कर पाएँगे और कुछ नहीं।
अतएव आमि आज्ञा दिलँ सबकारे ।ग्राहाँ ताहाँ प्रेम-फल देह' झारे तारे ॥
३६॥
अतएव मैं इस ब्रह्माण्ड के हर व्यक्ति को आज्ञा देता हूँ कि वह इस कृष्णभावनामृत आन्दोलन को स्वीकार करे और इसे सर्वत्र वितरित करे।
एकला मालाकार आमि कत फल खाब ।। ना दिया वा एइ फल आर कि करिब ॥
३७॥
मैं अकेला माली हूँ। यदि मैं इन्हें वितरित न करूं तो मैं इनका क्या करूँगा? अकेले मैं कितने फल खा सकता हूँ? आत्म-इच्छामृते वृक्ष सिञ्चि निरन्तर ।ताहाते असङ्ख्य फल वृक्षेर उपर ॥
३८॥
पूर्ण पुरुषोत्तम भगवान् की दिव्य इच्छा से सारे वृक्ष पर पानी छिड़का गया है और इस तरह भगवत्प्रेम के असंख्य फल लगे हैं।
अतएव सबै फल देह' ग्रारे तारे ।खाइयो हउक् लोक अजर अमरे ॥
३९॥
इस कृष्णभावनामृत आन्दोलन का वितरण सारे विश्व में करो, जिससे सारे लोग इन फलों को खाकर अन्ततः वृद्धावस्था तथा मृत्यु से मुक्त हो सकें।
जगत्व्यापिया मोर हबे पुण्य ख्याति ।सुखी हइया लोक मोर गाहिबेक कीर्ति ॥
४०॥
यदि फलों को सारे विश्व में वितरित किया जाए, तो पुण्यात्मा के रूप में मेरी ख्याति सर्वत्र फैलेगी और सारे लोग अत्यन्त प्रसन्नतापूर्वक मेरे नाम की महिमा का गान करेंगे।
भारत-भूमिते हैल मनुष्य जन्म यार ।जन्म सार्थक करि' कर पर-उपकार ॥
४१॥
जिसने भारतभूमि ( भारतवर्ष ) में मनुष्य जन्म लिया है, उसे अपना जीवन सफल बनाना चाहिए और अन्य सारे लोगों के लाभ के लिए कार्य करना चाहिए।
एतावजन्म-साफल्यं देहिनामिह देहिषु ।। प्राणैरथैधिया वाचा श्रेय-आचरणं सदा ॥
४२ ॥
यह हर जीव का कर्तव्य है कि वह अपने जीवन, धन, बुद्धि, तथा वाणी से दूसरों के लाभ के लिए कल्याण-कार्य करे।'
प्राणिनामुपकाराय ग्रदेवेह परत्र च । कर्मणा मनसा वाचा तदेव मति-मान्भजेत् ॥
४३॥
बुद्धिमान मनुष्य को चाहिए कि वह अपने कार्यों, विचारों तथा शब्दों से ऐसे कर्म करे, जो सारे प्राणियों के लिए इस जन्म में तथा अगले जन्म में मंगलकारी हो सकें।'
माली मनुष्य आमार नाहि राज्य-धन ।।फल-फुल दिया करि' पुण्य उपार्जन ॥
४४॥
। मैं तो केवल माली हूँ। मेरे पास न तो साम्राज्य है, न बहुत सारा धन है। मेरे पास तो केवल कुछ फल और फूल हैं, जिनका उपयोग मैं अपने जीवन में पुण्य प्राप्त करने के लिए करना चाहता हूँ।
माली हा वृक्ष हइलाँ एइ त' इच्छाते ।सर्व-प्राणीर उपकार हय वृक्ष हैते ॥
४५॥
यद्यपि मैं माली का कार्य कर रहा हूँ, किन्तु मैं वृक्ष भी बनना चाहता हूँ, क्योंकि इस तरह मैं सबको लाभ पहुँचा सकता हूँ।
अहो एषां वरं जन्म सर्व-प्राण्युपजीविनाम् ।सु-जनस्येव येषां वै विमुखा ग्रान्ति नार्थिनः ॥
४६॥
जरा देखो तो! ये वृक्ष किस तरह हर जीव का पालन कर रहे हैं। इनका जन्म सफल है। इनका आचरण महापुरुषों जैसा है, क्योंकि जो कोई भी वृक्ष से कुछ माँगता है, वह कभी निराश होकर नहीं जाता।
एइ आज्ञा कैल ग्रदि चैतन्य-मालाकार।परम आनन्द पाइल वृक्ष-परिवार ॥
४७॥
वृक्ष के वंशज ( श्री चैतन्य महाप्रभु के भक्त ) महाप्रभु से यह प्रत्यक्ष आदेश पाकर अत्यन्त प्रसन्न थे।
ग्रेड ग्राहाँ ताहाँ दान करे प्रेम-फल ।। फलास्वादे मत्त लोक हइल सकल ॥
४८॥
भगवत्प्रेम का फल इतना स्वादिष्ट होता है कि भक्त इसको जहाँ कहीं भी बाँटता है, विश्वभर में कहीं भी, जो इस फल का आस्वादन करता है, वह तुरन्त मदमस्त हो उठता है।
महा-मादक प्रेम-फल पेट भरि' खाय ।मातिल सकल लोक-हासे, नाचे, गाय ॥
४९॥
श्री चैतन्य महाप्रभु द्वारा वितरित भगवत्प्रेम रूपी फल इतना मादक है कि जो भी पेट भर खाता है, वह तुरन्त ही उससे उन्मत्त हो उठता है और स्वतः ही कीर्तन करता, नाचता, हँसता और आनन्द लेता है।
केह गड़ागड़ि ग़ाय, केह त' हुङ्कार ।देखि' आनन्दित हुआ हासे मालाकार ॥
५०॥
जब महान् माली श्री चैतन्य महाप्रभु देखते हैं कि लोग कीर्तन करते हैं, नाचते और हँसते हैं और कुछ लोग भूमि पर लोटपोट होते हैं तथा कुछ हुंकार भरते हैं, तो वे परम आनन्दित होकर मुस्कुराते हैं।
एइ मालाकार खाय एइ प्रेम-फल ।।निरवधि मते रहे, विवश-विह्वल ॥
५१॥
यह महान् माली, श्री चैतन्य महाप्रभु, स्वयं इस फल को खाते हैं; फलस्वरूप वे निरन्तर उन्मत्त रहते हैं, मानों असहाय एवं मोहग्रस्त हों।
सर्व-लोके मत्त कैला आपन-समान । प्रेमे मत्त लोक विना नाहि देखि आन ॥
५२॥
महाप्रभु ने अपने संकीर्तन आन्दोलन से हर एक को अपनी तरह मत्त बना दिया। हमें ऐसा एक भी व्यक्ति नहीं मिलता, जो उनके संकीर्तन आन्दोलन द्वारा मदमस्त न हो उठा हो।"
ने ग्रे पूर्वे निन्दा कैल, बलि' मातोयाल ।सेहो फल खाय, नाचे, बले-भाल भाल ॥
५३॥
। जिन लोगों ने पहले श्री चैतन्य महाप्रभु को शराबी कहकर उनकी आलोचना की थी, उन्होंने भी फल खाया और वे, बहुत अच्छा! बहुत अच्छा! कहकर नाचने लगे।
एइ त कहिलॆ प्रेम-फल-वितरण ।।कल-दाता ने ने शाखा-गण ॥
५४॥
महाप्रभु द्वारा भगवत्प्रेम रूपी फल के वितरण का वर्णन करने के बाद अब मैं चैतन्य महाप्रभु रूपी वृक्ष की विभिन्न शाखाओं का वर्णन करना चाहूँगा।
श्री-रूप-रघुनाथ-पदे यार आश ।।चैतन्य-चरितामृत कहे कृष्णदास ॥
५५॥
श्री रूप और श्री रघुनाथ के चरणकमलों में प्रार्थना करते हुए और उनकी कृपा की सदैव आकांक्षा करते हुए, मैं कृष्णदास उनके चरणचिह्नों पर चलते हुए श्री चैतन्य-चरितामृत का वर्णन कर रहा हूँ।
