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अध्याय तीन: भगवान श्री चैतन्य महाप्रभु का अद्वैत आचार्य के घर पर रहना

न्यासं विधायोत्प्रणयोऽथ गौरोवृन्दावनं गन्तु-मना भ्रमाद् ग्रः ।। राढ़े भ्रमन्शान्ति-पुरीमयित्वाललास भक्तैरिह तं नतोऽस्मि ॥

१॥

संन्यास ग्रहण करने के बाद चैतन्य महाप्रभु कृष्ण के प्रति उत्कट प्रेमवश वृन्दावन जाना चाहते थे, किन्तु लौकिक रूप से भ्रमवश वे राढ़देश में घूमते रहे। बाद में वे शान्तिपुर पहुँचे और वहाँ भक्तों के साथ आनन्दपूर्वक रहे। मैं उन श्री चैतन्य महाप्रभु को सादर नमस्कार करता हूँ।

जय जय श्री-चैतन्य जय नित्यानन्द । जयाद्वैतचन्द्र जय गौर-भक्त-वृन्द ॥

२॥

श्री चैतन्य महाप्रभु की जय हो! श्री नित्यानन्द प्रभु की जय हो! श्री अद्वैत प्रभु की जय हो! श्रीवास आदि श्री चैतन्य महाप्रभु के समस्त भक्तों की जय हो! चब्बिश वत्सर-शेष ग्रेइ माघ-मास ।।तार शुक्ल-पक्षे प्रभु करिला सन्यास ॥

३॥

चौबीसवें वर्ष के अन्त में माघ मास के शुक्लपक्ष में श्री चैतन्य महाप्रभु ने संन्यास आश्रम स्वीकार किया।

सन्यास करि' प्रेमावेशे चलिला वृन्दावन ।राढ़-देशे तिन दिन करिला भ्रमण ॥

४॥

। संन्यास ग्रहण करने के बाद श्री चैतन्य महाप्रभु कृष्ण के प्रगाढ़ प्रेमवश वृन्दावन के लिए चल पड़े। किन्तु भूल से वे लगातार तीन दिनों तक समाधि में राढ़ देश नामक भूखण्ड में भ्रमण करते रहे।

एइ श्लोक पड़ि' प्रभु भावेर आवेशे ।।भ्रमिते पवित्र कैल सब राढ़-देशे ॥

५॥

राढ़देश नामक भूभाग में भ्रमण करते समय श्री चैतन्य महाप्रभु ने भावावेश में निम्नलिखित श्लोक सुनाया।

तां स आस्थाय परात्म-निष्ठाम्अध्यासितां पूर्वतमैर्महद्भिः । अहं तरिष्यामि दुरन्त-पारंतमो मुकुन्दाघ्रि-निषेवयैव ॥

६॥

। [ जैसाकि अवन्ती देश के एक ब्राह्मण ने कहा : 'भगवान् कृष्ण के चरणकमलों की सेवा में दृढ़तापूर्वक स्थिर होकर मैं अज्ञान के दुर्लंघ्य सागर को पार कर जाऊँगा। इसकी पुष्टि उन पूर्ववर्ती आचार्यों द्वारा की गई है, जो परमात्मा, पूर्ण पुरूषोत्तम भगवान् की दृढ़ भक्ति में स्थिर थे।

प्रभु कहे—साधु एइ भिक्षुर वचन । मुकुन्द सेवन-व्रत कैल निर्धारण ॥

७॥

श्री चैतन्य महाप्रभु ने इस श्लोक के तात्पर्य का अनुमोदन भिक्षुक भक्त द्वारा भगवान् मुकुन्द की सेवा में लगने के संकल्प के कारण किया। उन्होंने इस श्लोक को अपनी सहमति दे दी, जिससे सूचित होता है कि यह श्लोक अत्युत्तम है।

परात्म-निष्ठा-मात्र वेष-धारण ।।मुकुन्द-सेवाय हय संसार-तारण ॥

८ ॥

संन्यास स्वीकार करने का वास्तविक प्रयोजन मुकुन्द की सेवा में अपने आप को समर्पित करना है। मुकुन्द की सेवा करने से मनुष्य अवश्य ही भव-बन्धन से मुक्त हो सकता है।

सेइ वेष कैल, एबे वृन्दावन गिया ।। कृष्ण-निषेवण करि निभूते वसिया ॥

९॥

संन्यास स्वीकार करने के बाद श्री चैतन्य महाप्रभु ने वृन्दावन जाने और वहाँ एकान्त में पूर्ण मनोयोग से केवल मुकुन्द की सेवा में लग जाने का निश्चय किया।

एत बलि' चले प्रभु, प्रेमोन्मादेर चिह्न । दिक्विदिक्ज्ञान नाहि, किबी रात्रि-दिन ॥

१०॥

जब श्री चैतन्य महाप्रभु वृन्दावन के रास्ते में थे, तब उनमें प्रेमोन्माद के सारे लक्षण प्रकट होने लगे। उन्हें इसका ज्ञान नहीं रहा कि वे किस दिशा में जा रहे हैं अथवा यह दिन है या रात।।

नित्यानन्द, आचार्यरत्न, मुकुन्द, तिन जन । प्रभु-पाछे-पाछे तिने करेन गमन ॥

११॥

जब श्री चैतन्य महाप्रभु वृन्दावन की ओर जा रहे थे, तब नित्यानन्द प्रभु, चन्द्रशेखर तथा मुकुन्द प्रभु उनके पीछे-पीछे चल रहे थे।

ग्रेइ ग्रेइ प्रभु देखे, सेइ सेइ लोक ।। प्रेमावेशे ‘हरि' बले, खण्डे दुःख-शोक ॥

१२॥

जब श्री चैतन्य महाप्रभु राढ़देश से होकर जा रहे थे, तो जो भी उन्हें देखता वह भावावेश में हरि! हरि! कह उठता। ज्योंही वे महाप्रभु के साथ कीर्तन करते, त्योंही उनके सारे सांसारिक दुःख विनष्ट हो जाते।

गोप-बालक सब प्रभुके देखियो । ‘हरि' ‘हरि' बलि' डाके उच्च करिया ॥

१३ ॥

श्री चैतन्य महाप्रभु को जाते देखकर सारे ग्वालबाल उनके साथ चलने लगे और उच्च-स्वर से हरि! हरि! पुकारने लगे।

शुनि' ता-सबार निकट गेला गौरहरि ।‘बल' 'बल' बले सबार शिरे हस्त धरि' ॥

१४॥

जब श्री चैतन्य महाप्रभु ने सभी ग्वालबालों को हरि! हरि! उच्चारण करते सुना, तो वे अत्यधिक प्रसन्न हुए। वे उनके पास गये, उनके सिर पर हाथ रखा और उनसे बोले, इसी तरह कीर्तन करते रहो।

ता'-सबार स्तुति करे,—तोमरा भाग्यवान् ।कृतार्थ करिले मोरे शुना हरि-नाम ॥

१५॥

। इस तरह श्री चैतन्य महाप्रभु ने उन सबको यह कहते हुए आशीर्वाद दिया कि वे सभी भाग्यवान हैं। उन्होंने इस तरह उनकी प्रशंसा की और चूंकि उन लोगों ने पवित्र हरिनाम कीर्तन किया था, इसलिए महाप्रभु ने अपने आपको कृतार्थ समझा।

गुप्ते ता-सबा आनि' ठाकुर नित्यानन्द । शिखाइला सबकारे करिया प्रबन्ध ॥

१६॥

सारे बालकों को एकान्त में बुलाकर और एक तर्कपूर्ण कहानी बतलाते हुए नित्यानन्द प्रभु ने उन सबको इस प्रकार सूचना दी।

वृन्दावन-पथ प्रभु पुछेन तोमारे। गङ्गा-तीर-पथ तबे देखाइह ताँरै ॥

१७॥

यदि श्री चैतन्य महाप्रभु तुम लोगों से वृन्दावन का रास्ता पूछे, तो उन्हें गंगा नदी के किनारे का रास्ता दिखला देना।

तबे प्रभु पुछिलेन,'शुन, शिशु-गण ।। कह देखि, कोन्पथे ग्राब वृन्दावन' ॥

१८॥

शिशु सब गङ्गा-तीर-पथ देखाइल ।। सेइ पथे आवेशे प्रभु गमन करिल ॥

१९॥

जब श्री चैतन्य महाप्रभु ने ग्वालबालों से वृन्दावन का रास्ता पूछा, तो उन बालकों ने गंगा के किनारे वाला रास्ता बतला दिया और महाप्रभु भावावेश में उसी रास्ते चल पड़े।

"text":"आचार्य रत्न कहे नित्यानंद गोसांई। शीघ्र यहा तुमि अद्वैताचार्य ठानी ।।२०॥

जैसे ही भगवान गंगा के किनारे आगे बढ़े, श्री नित्यानंद प्रभु ने आचार्यरत्न [चंद्रशेखर आचार्य से तुरंत अद्वैत आचार्य के घर जाने का अनुरोध किया।"

प्रभु लये ग्राब आमि ताँहार मन्दिरे ।सावधाने रहेन ग्रेन नौका लञा तीरे ॥

२१॥

श्री नित्यानन्द गोस्वामी ने उनसे कहा, मैं श्री चैतन्य महाप्रभु को शान्तिपुर में गंगा के तट पर ले जाऊँगा। आप अद्वैत आचार्य से कहें कि वे सावधान होकर एक नाव लेकर किनारे पर रहें।

तबे नवद्वीपे तुमि करिह गमन ।। शची-सह लजा आइस सब भक्त-गण ॥

२२॥

नित्यानन्द प्रभु ने आगे कहा, उसके बाद मैं अद्वैत आचार्य के घर जाऊँगा और आप नवद्वीप जाकर माता शची तथा अन्य सभी भक्तों को लेकर लौट आना।

ताँरे पाठाइया नित्यानन्द महाशय ।।महाप्रभुर आगे आसि' दिल परिचय ॥

२३ ॥

आचार्यरत्न को अद्वैत आचार्य के घर भेजकर श्री नित्यानन्द प्रभु श्री चैतन्य महाप्रभु के सामने आये और अपने आने की सूचना दी।

प्रभु कहे,–श्रीपाद, तोमार कोथाके गमन ।।श्रीपाद कहे, तोमार सङ्गे ग्राब वृन्दावन ॥

२४॥

श्री चैतन्य महाप्रभु भावावेश में थे और उन्होंने पूछा कि नित्यानन्द प्रभु कहाँ जा रहे थे? नित्यानन्द प्रभु ने उत्तर दिया कि वे महाप्रभु के साथ वृन्दावन जा रहे थे।

प्रभु कहे,—कत दूरे आछे वृन्दावन ।।तेंहो कहेन,—कर एइ यमुना दरशन ॥

२५॥

जब श्री चैतन्य महाप्रभु ने नित्यानन्द प्रभु से पूछा कि अब वृन्दावन कितनी दूर है, तो नित्यानन्द प्रभु ने उत्तर दिया देखिये! यह रही यमुना नदी।

एत बलि' आनिल ताँरै गङ्गा-सन्निधाने ।।आवेशे प्रभुर हैल गङ्गारे ग्नमुना-ज्ञाने ॥

२६॥

यह कहकर नित्यानन्द प्रभु उन्हें गंगा नदी के पास ले गये और श्री चैतन्य महाप्रभु ने भावावेश के कारण गंगा नदी को ही यमुना नदी के रूप में स्वीकार कर लिया।

अहो भाग्य, ग्नमुनारे पाइलँ दरशन ।एत बलि' यमुनार करेन स्तवन ॥

२७॥

महाप्रभु ने कहा, ओह, कितना सौभाग्य है! आज मुझे यमुना नदी के दर्शन हुए हैं। इस तरह गंगा को ही यमुना नदी मानकर उन्होंने उसकी स्तुति करनी प्रारम्भ की।

चिदानन्द-भानोः सदा नन्द-सूनोःपर-प्रेम-पात्री द्रव-ब्रह्म-गात्री ।। अघानां लवित्री जगत्क्षेम-धात्री ।पवित्री-क्रियान्नो वपुर्मित्र-पुत्री ॥

२८॥

हे यमुना नदी, तुम वह आनन्दमय दिव्य जल हो, जो नन्द महाराज के पुत्र को प्रेम प्रदान करता है। तुम वैकुण्ठ लोक के जल के ही समान हो, क्योंकि तुम हमारे पूरे जीवन में किये गये सारे अपराधों एवं पापफलों को नष्ट करने वाली हो। तुम संसार के लिए सभी मंगल वस्तुओं की जननी हो। हे सूर्यदेव की पुत्री, कृपया तुम अपने पुण्यकर्मों से हम सबको शुद्ध कर दो।

एत बलि' नमस्करि' कैल गङ्गा-स्नान ।।एक कौपीन, नाहि द्वितीय परिधान ॥

२९॥

। इस मन्त्र का उच्चारण करने के बाद श्री चैतन्य महाप्रभु ने नमस्कार करके गंगा नदी में स्नान किया। उस समय उनके पास एक ही कौपीन था, कोई दूसरा वस्त्र नहीं था।

हेन काले आचार्य-गोसाजि नौकाते चड़िा ।आइल नूतन कौपीन-बहिर्वास लञा ॥

३०॥

जब श्री चैतन्य महाप्रभु वहाँ दूसरे वस्त्र के बिना खड़े थे, तब अद्वैत आचार्य अपने साथ नया कौपीन तथा बाह्य वस्त्र लेकर नाव से वहाँ आये।

आगे आचार्य आसि' रहिला नमस्कार करि' ।। आचार्य देखि' बले प्रभु मने संशय करि' ॥

३१॥

। अद्वैत आचार्य आकर महाप्रभु के समक्ष प्रस्तुत हुए और उन्हें नमस्कार किया। उन्हें देखकर महाप्रभु को सारी परिस्थिति के विषय में सन्देह होने लगा।

तुमि त' आचार्य-गोसाञि, एथा केने आइला ।।आमि वृन्दावने, तुमि के-मते जानिला ।। ३२॥

। भावावेश में ही महाप्रभु ने अद्वैत आचार्य से पूछा, आप यहाँ क्यों आये? आपको कैसे पता चला कि मैं वृन्दावन में हूँ? आचार्य कहे—तुमि ग्राहाँ, सेइ वृन्दावन ।। मोर भाग्ये गङ्गा-तीरे तोमार आगमन ॥

३३॥

अद्वैत आचार्य ने श्री चैतन्य महाप्रभु से यह कहकर सारी स्थिति स्पष्ट कर दी, आप जहाँ हैं, वहीं वृन्दावन है। यह तो मेरा परम सौभाग्य है कि आप गंगा नदी के तट पर आये हैं।

प्रभु कहे,—नित्यानन्द आमारे वञ्चिला ।। गङ्गाके आनिया मोरे यमुना कहिला ॥

३४॥

तब श्री चैतन्य महाप्रभु ने कहा, नित्यानन्द ने मुझे धोखा दिया है। वह मुझे गंगा के तट पर ले आये और मुझसे यह बतलाया है कि यह यमुना है। आचार्य कहे, मिथ्या नहे श्रीपाद-वचन ।। यमुनाते स्नान तुमि करिला एखन ॥

३५॥

जब श्री चैतन्य महाप्रभु ने नित्यानन्द पर धोखा देने का आरोप लगाया, तो श्रील अद्वैत आचार्य ने कहा, नित्यानन्द प्रभु ने आपसे जो कुछ कहा है, वह झूठ नहीं है। आपने सचमुच अभी यमुना नदी में स्नान किया है।

गङ्गाय ग्नमुना वहे हा एक-धार । पश्चिमे यमुना वहे, पूर्वे गङ्गा-धार ॥

३६॥

फिर अद्वैत आचार्य ने समझाया कि उस स्थान पर गंगा तथा यमुना दोनों साथ-साथ बहती हैं। पश्चिम की ओर यमुना है और पूर्व की ओर गंगा हैं। पश्चिम-धारे प्रमुना वहे, ताहाँ कैले स्नान ।।आर्द्र कौपीन छाड़ि' शुष्क कर परिधान ॥

३७॥

फिर अद्वैत आचार्य ने प्रार्थना की कि यमुना नदी में स्नान करने के कारण चैतन्य महाप्रभु का कौपीन गीला हो गया है, अतएव उन्हें अपना कौपीन बदलकर सूखा वस्त्र पहन लेना चाहिए।

प्रेमावेशे तिन दिन आछ उपवास ।।आजि मोर घरे भिक्षा, चल मोर वास ॥

३८॥

अद्वैत आचार्य ने कहा, कृष्ण-प्रेम के भावावेश में आप तीन दिन से अनवरत उपवास करते आ रहे हैं, अतएव मैं आपको अपने घर पर भिक्षा ग्रहण करने के लिये आमन्त्रित करता हूँ। आप मेरे साथ मेरे घर चलें ।

एक-मुष्टि अन्न मुजि करियाछों पाक ।शुखारुखा व्यञ्जन कैलें, सूप आर शाक ॥

३९॥

अद्वैत आचार्य ने आगे कहा, मैंने अपने घर में मुट्ठी-भर चावल पकाया है। तरकारियाँ भी अत्यन्त सादी हैं। कोई भी विलासप्रिय व्यंजन नहीं है--केवल थोड़ा सूप है और कुछ शाक है।

एत बलि' नौकाय चड़ा निल निज-घर ।पाद-प्रक्षालन कैल आनन्द-अन्तर ॥

४०॥

यह कहकर श्री अद्वैत आचार्य उन्हें नाव में बैठाकर अपने घर ले आये। वहाँ पर अद्वैत आचार्य ने महाप्रभु के चरण प्रक्षालन किये और इस तरह भीतर-भीतर परम आनन्दित हुए।

प्रथमे पाक करियाछेन आचार्याणी ।विष्णु-समर्पण कैल आचार्य आपनि ॥

४१॥

। सर्वप्रथम अद्वैत आचार्य की पत्नी ने सारे पकवान बनाये। तत्पश्चात् स्वयं श्रील अद्वैत आचार्य ने हर वस्तु भगवान् विष्णु को अर्पित की।

तिन ठाजि भोग बाड़ाइल सम करि' । ।कृष्णेर भोग बाड़ाइल धातु-पात्रोपरि ॥

४२ ।। सारे पकाये गये भोग के तीन बराबर भाग किये गये। एक भाग भगवान् कृष्ण को अर्पित करने के लिए धातु की थाली पर परोसा गया।

बत्तिशा-आठिया-कलार आङ्गटिया पाते । दुइ ठात्रि भोग बाड़ाइल भाल मते ॥

४३॥

। तीन भागों में से एक भाग धातु की थाली पर रखा गया था और शेष दो भाग केले के पत्तों पर। ये पत्तियाँ बीच से विभाजित नहीं थीं और ऐसे केले के वृक्ष से ली गई थी, जिसमें कम-से-कम बत्तीस केले के गुच्छे । लगे थे। इन दोनों पत्तों में निम्नलिखित व्यंजन सुन्दर ढंग से भरकर रखे गये थे।

मध्ये पीत-घृत-सिक्त शाल्यन्नेर स्तूप ।। चारि-दिके व्यञ्जन-डोङ्गा, आर मुद्ग-सूप ।। ४४॥

। प्रवीणता से पके चावल का ढेर अत्यन्त सुन्दर दाने वाला था और बीच में गाय के दूध से बनाया गया पीले रंग का घी था। चावल के ढेर के चारों ओर केले के पेड़ों की छाल से बने पात्र थे, जिनमें तरह तरह की तरकारियाँ तथा मूंग की दाल थी।

साईक, वास्तुक-शाक विविध प्रकार ।। पटोल, कुष्माण्ड-बड़ि, मानकचु आर ॥

४५॥

पकी तरकारियों में पटोला, सीताफल, मानकचु था तथा अदरक के कड़ों और विभिन्न प्रकार की पालक से बना सलाद था।

चइ-मरिच-सुख्त दिया सब फल-भूले ।। अमृत-निन्दक पञ्च-विध तिक्त-झाले ॥

४६॥

सभी प्रकार की तरकारियों के साथ सुख्त, करेला मिला था, जो अमृत के स्वाद को मात करने वाला था। कड़वे तथा चरपरे सुख्ख पाँच प्रकार के थे।

कोमल निम्ब-पत्र सह भाजा वार्ताकी । पटोल-फुल-बड़ि-भाजा, कुष्माण्ड़-मानचाकि ॥

४७॥

। विविध तरकारियों में नीम की ताजा मुलायम पत्तियों को बैंगन के साथ तला गया था। पटोल फल को फुलबड़ी ( दाल से बनाया गया एक व्यंजन जिसे पहले मसला जाता है और फिर सुखाया जाता है) के साथ तला गया था। कुष्माण्ड-मानचाकि नामक व्यंजन भी था।

नारिकेल-शस्य, छाना, शर्करा मधुर ।। मोचा-घण्ट, दुग्ध-कुष्माण्ड, सकल प्रचुर ॥

४८॥

। नारियल के गूदे, दही तथा मिश्री से बना व्यंजन अत्यन्त मीठा था। दूध में पकाये गये सीताफल और केले के फूलों की सब्जी प्रचुर मात्रा में थी।

मधुराम्ल-बड़ा, अम्लादि पाँच-छय ।।सकल व्यञ्जन कैल लोके व्रत हय ॥

४९॥

मीठी तथा खट्टी चटनी में तैयार की गई छोटी टिक्कियाँ और पाँचछ: तरह के खट्टे व्यंजन थे। सारी तरकारियाँ इतनी बनाई गई थीं कि वहाँ पर उपस्थित सारे लोग प्रसाद-रूप में ग्रहण कर सकें।

मुद्ग-बड़ा, कला-बड़ा, माष-बड़ा, मिष्ट ।क्षीर-पुली, नारिकेल, व्रत पिठा इष्ट ॥

५०॥

। मूंग की दाल के नर्म बड़े, पके केले से बने नर्म बड़े, उड़द की दाल से बने नर्म बड़े, तरह तरह की मिठाइयाँ, क्षीरपुली (चावल के बड़े खीर के साथ), नारियल से बना व्यंजन तथा सभी प्रकार के बड़े थे।

बत्तिशा-आठिया कलार डोङ्गा बड़ बड़।। चले हाले नाहि,--डोङ्गा अति बड़ दड़ ॥

५१॥

सारी तरकारियाँ केले के ऐसे वृक्षों के पत्तों से बने दोनों में परोसी गई थीं, जिनमें कम-से-कम केले के बत्तीस गुच्छे लगे थे। ये दोने काफी मजबूत और बड़े थे और इधर-उधर हिलने-डुलने वाले नहीं थे, न ही तिरछे होने वाले थे।

पञ्चाश पञ्चाश डोङ्गा व्यञ्जने पूरिजा ।तिन भोगेर आशे पाशे राखिल धरिजा ॥

५२॥

भोजन करने के तीनों स्थानों के चारों ओर तरह तरह की तरकारियों से भरे एक सौ दोने थे।

सघृत-पायस नव-मृत्कुण्डिका भरि ।।तिन पात्रे घनावर्त-दुग्ध राखेत धरिजा ॥

५३॥

सभी तरकारियों के चारों ओर घी से मिश्रित खीर रखी थी। इसे नये मिट्टी के बर्तनों में रखा गया था। अच्छी तरह से गाड़े उबले दूध से भरे मिट्टी के बर्तन तीनों स्थानों पर रखे गये थे।

दुग्ध-चिड़ा-कला आर दुग्ध-लक्लकी ।।ग्रतेक करिल' ताहा कहिते ना शकि ॥

५४॥

। अन्य व्यंजनों के अतिरिक्त दूध में बना तथा केले से मिला चिवड़ा तथा दूध में पकाया सफेद सीताफल था। वहाँ पर उपस्थित सभी व्यंजनों का वर्णन कर पाना सम्भव नहीं है।

दुइ पाशे धरिल सब मृत्कुण्डिका भरि' । चाँपाकला-दधि-सन्देश कहिते ना पारि ॥

५५॥

दो स्थानों पर दही, सन्देश ( दही से बनी एक मिठाई) तथा केले से बना एक अन्य व्यंजन मिट्टी के पात्रों में भरकर रखा हुआ था। मैं उन सबका वर्णन कर पाने में असमर्थ हूँ।

अन्न-व्यञ्जन-उपरि दिल तुलसी-मञ्जरी ।। तिन जल-पात्रे सुवासित जल भरि' ॥

५६॥

पके चावल एवं सारी तरकारियों के ढेर के ऊपर तुलसी की मंजरिय थीं। सुगन्धित गुलाब-जल से भरे पात्र भी रखे गये थे।

तिन शुभ्र-पीठ, तार उपरि वसन । एइ-रूपे साक्षात्कृष्णे कराइल भोजन ॥

५७॥

तीनों आसनों पर मुलायम कपड़े बिछे थे। इस तरह भगवान् कृष्ण को सारी भोज्य सामग्री अर्पित की गई और उन्होंने इसे बड़े ही मन से ग्रहण किया।

आरतिर काले दुइ प्रभु बोलाइल ।। प्रभु-सङ्गे सबे आसि' आरति देखिल ॥

५८ ॥

भोग अर्पित करने के बाद भोग-आरती सम्पन्न करने की प्रथा है। अद्वैत प्रभु ने दोनों भाइयों-चैतन्य महाप्रभु तथा नित्यानन्द प्रभु को आरती देखने के लिए बुलाया। दोनों प्रभु तथा वहाँ उपस्थित सारे लोग आरती समारोह देखने गये।

आरति करिया कृष्णे करा'ल शयन । आचार्य आसि' प्रभुरे तबे कैला निवेदन ॥

५९॥

मन्दिर में अर्चाविग्रहों की आरती हो चुकने के बाद कृष्ण को शयन कराया गया। तब अद्वैत आचार्य श्री चैतन्य महाप्रभु से कुछ निवेदन करने के लिए आगे आये।

गृहेर भितरे प्रभु करुन गमन । दुई भाइ आइला तबे करिते भोजन ॥

६०॥

श्री अद्वैत प्रभु ने कहा, हे प्रभु, कृपया इस कमरे में चलें। तब श्री चैतन्य महाप्रभु तथा नित्यानन्द प्रभु दोनों भाई प्रसाद ग्रहण करने के लिए आगे आये।

मुकुन्द, हरिदास,—दुइ प्रभु बोलाइल ।।योड़-हाते दुइ-जन कहिते लागिल ॥

६१॥

जब श्री चैतन्य महाप्रभु तथा नित्यानन्द प्रभु प्रसाद लेने गये, तो उन्होंने मुकुन्द तथा हरिदास को अपने साथ चलने के लिए बुलाया। किन्तु मुकुन्द तथा हरिदास दोनों ने हाथ जोड़कर इस प्रकार कहा।

मुकुन्द कहे–मोर किछु कृत्य नाहि सरे ।।पाछे मुञि प्रसाद पामु, तुमि ग्राह घरे ॥

६२॥

। बुलाये जाने पर मुकुन्द ने निवेदन किया, हे प्रभु, मुझे कुछ काम करना शेष है। मैं बाद में प्रसाद ग्रहण करूँगा, अतएव आप दोनों प्रभु अब कमरे के भीतर जाएँ।

हरिदास कहे—मुबि पापिष्ठ अधम ।। बाहिरे एक मुष्टि पाछे करिमु भोजन ॥

६३॥

हरिदास ठाकुर ने कहा, मैं अत्यन्त पापी और अधम हूँ। मैं बाहर ही प्रतीक्षा करते हुए बाद में एक मुट्ठी प्रसाद खाऊँगा।

दुइ प्रभु लजा आचार्य गेला भितर घरे ।।प्रसाद देखिया प्रभुर आनन्द अन्तरे ॥

६४॥

। अद्वैत आचार्य अपने साथ नित्यानन्द प्रभु तथा चैतन्य महाप्रभु को कमरे के भीतर ले गये, जहाँ दोनों प्रभुओं ने प्रसाद की व्यवस्था देखी। विशेषकर श्री चैतन्य महाप्रभु अत्यधिक प्रसन्न हुए।

ऐछे अन्न ग्रे कृष्णके कराय भोजन ।जन्मे जन्मे शिरे धरों ताँहार चरण ॥

६५॥

श्री चैतन्य महाप्रभु ने कृष्ण को अर्पित किये जाने वाले भोजन के पकाने की सारी विधियों का अनुमोदन किया। वे इतने प्रसन्न हुए कि उन्होंने कहा, मैं हृदय से कहता हूँ कि जो कोई कृष्ण को इतना अच्छा भोजन अर्पित कर सकता है, उसके चरणकमलों को मैं जन्म-जन्मांतर अपने मस्तक पर धारण करने को प्रस्तुत हूँ।

प्रभु जाने तिन भोग–कृष्णेर नैवेद्य । आचार्येर मनः-कथा नहे प्रभुर वेद्य ॥

६६॥

जब श्री चैतन्य महाप्रभु कमरे में प्रविष्ट हुए, तो उन्होंने भोजन के तीन भाग देखे और यह समझा कि ये तीनों कृष्ण के लिए हैं। किन्तु वे अद्वैत आचार्य के मनोभावों को नहीं समझ पाये।

प्रभु बले-वैस तिने करिये भोजन ।। आचार्य कहे—आमि करिब परिवेशन ॥

६७॥

श्री चैतन्य महाप्रभु ने कहा, चलो, इन तीनों स्थानों में बैठकर हम प्रसाद ग्रहण करें। किन्तु अद्वैत आचार्य ने कहा, मैं प्रसाद का वितरण करूंगा।

कोन् स्थाने वसिब, आर आन दुइ पात ।। अल्प करि' आनि' ताहे देह व्यञ्जन भात ॥

६८॥

। श्री चैतन्य महाप्रभु ने सोचा कि तीनों थालियाँ वितरण करने के लिए हैं, अतएव उन्होंने यह कहते हुए और दो केले के पत्ते माँगे, हमें थोड़ी। तरकारी तथा चावल दें।

आचार्य कहे वैस दोहे पिंड़िर उपरे । एत बलि' हाते धरि' वसाइल मुँहारे ॥

६९॥

अद्वैत आचार्य ने कहा, कृपया इन आसनों पर बैठे। उन्होंने उन दोनों के हाथ पकड़कर उन्हें बैठाया।

प्रभु कहे—सन्यासीर भक्ष्य नहे उपकरण । इहा खाइले कैछे हय इन्द्रिय वारण ॥

७० ॥

श्री चैतन्य महाप्रभु ने कहा, संन्यासी के लिए इतनी तरह के व्यंजन ग्रहण करना उचित नहीं है। यदि वह ऐसा करता है, तो फिर वह अपनी । इन्द्रियों को किस तरह वश में रख सकता है? आचार्य कहे—छाड़ तुमि आपनीर चुरि ।। आमि सब जानि तोमार सन्यासेर भारि-भूरि ॥

७१ ॥

जब श्री चैतन्य महाप्रभु ने पहले से परोसे हुए उस भोजन को ग्रहण नहीं किया, तो अद्वैत आचार्य ने कहा कृपया अपना छल त्यागिये। मैं जानता हूँ कि आप कौन हैं और मैं आपके द्वारा संन्यास लेने के रहस्य को भी जानता हूँ।

भोजन करह, छाड़ वचन-चातुरी ।। प्रभु कहे—एत अन्न खाइते ना पारि ॥

७२॥

अद्वैत आचार्य ने श्री चैतन्य महाप्रभु से प्रार्थना की कि वे वाक्चातुरी त्यागकर भोजन करें। इस पर महाप्रभु ने उत्तर दिया, मैं सचमुच इतना भोजन नहीं खा सकता।

आचार्य बले--अकपटे करह आहार ।यदि खाइते ना पार पाते रहिबेक आर ॥

७३॥

तब अद्वैत आचार्य ने महाप्रभु से अनुरोध किया कि वे बहाना छोड़कर प्रसाद ग्रहण करें। यदि वे पूरा नहीं खा सकते, तो शेष भाग थाली पर पड़ा राने दें।

प्रभु बले–एत अन्न नारिब खाइते ।।सन्यासीर धर्म नहे उच्छिष्ट राखिते ॥

७४॥

। श्री चैतन्य महाप्रभु ने कहा, मैं इतना भोजन नहीं खा सकेंगा और यह संन्यासी का धर्म नहीं है कि वह जूठन छोड़े।

आचार्य बले- नीलाचले खाओ चौयान्न-बार । एक-बारे अन्न खाओ शत शत भार ॥

७५ ॥

। इस सन्दर्भ में श्री अद्वैत आचार्य ने चैतन्य महाप्रभु द्वारा जगन्नाथ पुरी में भोजन करने का उदाहरण दिया। भगवान जगन्नाथ और श्री चैतन्य महाप्रभु अभिन्न हैं। अद्वैत आचार्य ने बतलाया कि जगन्नाथ पुरी में श्री चैतन्य महाप्रभु प्रतिदिन चौवन बार खाते हैं और हर बार वे भोग के सैकड़ों पात्र ग्रहण करते हैं।

तिन जनार भक्ष्य-पिण्ड-तोमार एक ग्रास ।तार लेखाय एइ अन्न नहे पञ्च-ग्रास ॥

७६ ॥

। श्री अद्वैत आचार्य ने कहा, तीन जन जितना खाते हैं वह आपके एक ग्रास के बराबर भी नहीं है। इस गणना के अनुसार ये खाद्य पदार्थ आपके पाँच ग्रास भी नहीं होंगे।

मोर भाग्ये, मोर घरे, तोमार आगमन ।।छाड़ह चातुरी, प्रभु, करह भोजन ॥

७७॥

अद्वैत आचार्य ने आगे कहा, यह मेरा परम सौभाग्य है कि आप मेरे पर पधारे हैं। कृपया बातें मत बनाइये। बातें छोड़कर भोजन करना प्रारम्भ कीजिये।

एत बलि' जल दिल दुइ गोसाजिर हाते ।।हासिया लागिला पँहे भोजन करते ॥

७८ ॥

। यह कहकर अद्वैत आचार्य ने दोनों प्रभुओं को हाथ धोने के लिए जल दिया। तत्पश्चात् दोनों प्रभु बैठ गये और हँसते हुए प्रसाद ग्रहण करने लगे।

नित्यानन्द कहे-कैर्ले तिन उपवास ।। आजि पारणा करिते छिल बड़ आश ॥

७९॥

। नित्यानन्द प्रभु ने कहा, मैं लगातार तीन दिनों से उपवास करता रहा हूँ। मुझे आशा थी कि आज मेरा उपवास टूटेगा। ।

आजि उपवास हैल आचार्य-निमन्त्रणे ।। अर्ध-पेट ना भरिबे एई ग्रासेक अन्ने ॥

८०॥

। जहाँ श्री चैतन्य महाप्रभु सोच रहे थे कि भोजन की मात्रा अत्यधिक है, वहीं नित्यानन्द प्रभु ने सोचा कि वह तो एक ग्रास भी नहीं है। वे तीन दिन से उपवास कर रहे थे और उन्हें पूरी आशा थी कि आज वे अपना उपवास भंग करेंगे। उन्होंने कहा, यद्यपि अद्वैत आचार्य ने मुझे आज खाने के लिए बुलाया है, किन्तु आज भी मेरा उपवास है। इतने थो भोजन से तो मेरा आधा पेट भी नहीं भरेगा।

आचार्य कहे—तुमि हओ तैर्थिक सन्यासी ।।कभु फल-मूल खाओ, कभु उपवासी ॥

८१॥

अद्वैत आचार्य ने उत्तर दिया, आप तो तीर्थों की यात्रा करने वाले संन्यासी ठहरे। कभी आप फल खाते हैं, तो कभी कन्दमूल और कभी केवल उपवास करते हैं।

दरिद्र-ब्राह्मण-घरे ग्ने पाइला मुष्ट्येक अन्न ।इहाते सन्तुष्ट हओ, छाड़ लोभ-मन ॥

८२॥

मैं तो दरिद्र ब्राह्मण हूँ और आप मेरे घर पधारे हैं। आपको जो और बहुत भोजन मिला है, इतने से सन्तुष्ट हों और अपनी लोभी मनोवृत्ति को छोड़ दें।

नित्यानन्द बले—ग्रबे कैले निमन्त्रण ।।तत दिते चाह, व्रत करिये भोजन ॥

८३ ।। नित्यानन्द प्रभु ने उत्तर दिया, मैं जो भी होऊँ, आपने मुझे बुलाया है, अतएव आपको चाहिए कि मैं जितना खाना चाहूँ उतना दो।

शुनि' नित्यानन्देर कथा ठाकुर अद्वैत ।।कहेन ताँहारे किछु पाइया पिरीत ॥

८४॥

ठाकुर अद्वैत आचार्य को नित्यानन्द की विनोद-पूर्ण बातें सुनने के बाद अवसर मिला कि वे परिहास करें, अतः वे इस प्रकार बोले।।

भ्रष्ट अवधूत तुमि, उदर भरिते । ।सन्यास लइयाछ, बुझि, ब्राह्मण दण्डिते ॥

८५॥

अद्वैत आचार्य ने कहा, आप भ्रष्ट परमहंस हो और आपने मात्र पेड भरने के लिए संन्यास ग्रहण किया है। मैं समझ गया हूँ कि आपका पेशा है ब्राह्मणों को कष्ट पहुँचाना।

तुमि खेते पार दश-विश मानेर अन्न ।आमि ताहा काँहा पाब दरिद्र ब्राह्मण ॥

८६॥

नित्यानन्द प्रभु पर लांछन लगाते हुए अद्वैत आचार्य ने कहा, आप तो दस-बीस मन चावल खा सकते हो। मैं तो ठहरा निर्धन ब्राह्मण। भला मैं इतना चावल कैसे ला सकता हूँ? ने पाजाछ मुष्ट्येक अन्न, ताहा खाजा उठ ।।पागलामि ना करिह, ना छड़ाइओ झुठ ॥

८७॥

जो कुछ आपको दिया है, भले ही वह मुट्ठी-भर चावल क्यों न हो, कृपया उसे खाओ और उठ जाओ। अपना पागलपन मत दिखलाओ और ।। जूठन इधर-उधर मत बिखराओ।

एइ मत हास्य-रसे करेन भोजन ।।अर्ध-अर्ध खात्रा प्रभु छाडेन व्यञ्जन ॥

८८॥

इस तरह नित्यानन्द प्रभु तथा चैतन्य महाप्रभु ने भोजन ग्रहण किया। और अद्वैत आचार्य से परिहास किया। श्री चैतन्य महाप्रभु को जितनी तरकारियाँ परोसी गयी थीं, उन्होंने उनमें से हर एक को आधा-आधा खाकर छोड़ दिया।

सेइ व्यञ्जन आचार्य पुनः करेन पूरण ।।एइ मत पुनः पुनः परिवेशे व्यञ्जन ।। ८९॥

जब पात्र की आधी तरकारी समाप्त हो जाती, तो अद्वैत आचार्य फिर में उसे पूरा भर देते। इस तरह ज्योंही महाप्रभु आधा व्यंजन समाप्त करते कि अद्वैत आचार्य पुनः पुनः उसे पूरा भर देते।।

दोना व्यञ्जने भरि' करेन प्रार्थन ।प्रभु बलेन-आर कत करिब भोजन ॥

९०॥

। दोने को तरकारी से भरकर अद्वैत आचार्य ने उनसे प्रार्थना की कि वे और खायें। किन्तु चैतन्य महाप्रभु ने कहा, मैं और कितना खा सकता हूँ ।

आचार्य कहे ये दियाछि, ताहा ना छाड़िबा ।।एखन ये दिये, तारे अर्धेक खाइबा ॥

९१॥

अद्वैत आचार्य ने कहा, कृपा करके मेरे द्वारा परोसे हुए अन्न को न छोड़ें। अब मैं जो भी दे रहा हूँ, उसका आप आधा खाकर छोड़ सकते है।

नाना ग्रन-दैन्ये प्रभुरे कराइल भोजन ।।आचार इच्छा प्रभु करिल पूरण ॥

१२॥

। इस तरह विविध प्रकार से अनुनय-विनय करके अद्वैत आचार्य ने श्री चैतन्य महाप्रभु एवं नित्यानन्द प्रभु को भोजन कराया। इस प्रकार श्री चैतन्य महाप्रभु ने अद्वैत आचार्य की सारी इच्छाएँ पूरी कीं।।

नित्यानन्द कहे-आमार पेट ना भरिल ।।ला ग्राह, तोर अन्न किछु ना खाइल ॥

९३॥

नित्यानन्द प्रभु ने पुनः परिहास में कहा, मेरा पेट अब भी भरा नहीं है। अपना भोजन ले जाइये। मैंने इसमें से कुछ भी नहीं खाया है।

एत बलि' एक-ग्रास भात हाते लञा । उझालि' फेलिल आगे प्लेन क्रुद्ध हञा ॥

९४॥

। यह कहकर नित्यानन्द प्रभु ने एक मुट्ठी चावल लिया और उसे फर्श पर उनके आगे फेंक दिया, मानों वे क्रुद्ध हों।

भात दुइ-चारि लागे आचार अङ्गे।। भात अङ्गे लजा आचार्य नाचे बहु-रङ्गे ॥

९५॥

जब इस फेंके हुए चावलों के दो-चार दाने अद्वैत आचार्य के शरीर गे, तो वे उसी तरह चावल लगे शरीर से तरह-तरह से नाचने लगे।

अवधूतेर झुठा लागिल मोर अङ्गे।। परम पवित्र मोरे कैल एइ ढङ्गे ॥

९६॥

जब नित्यानन्द प्रभु द्वारा फेंके गये चावलों का अद्वैत आचार्य के शरीर से स्पर्श हुआ, तो आचार्य ने परमहंस नित्यानन्द द्वारा फेंके गये उस ।। उच्छिष्ट के स्पर्श से अपने आपको परम पवित्र बना समझा। अतः वे नाचने लगे।

तोरे निमन्त्रण करि' पाइनु तार फल ।तोर जाति-कुल नाहि, सहजे पागल ॥

९७॥

अद्वैत आचार्य ने हँसी-हँसी में कहा, हे प्रिय नित्यानन्द, मैंने आपको आमन्त्रित किया और उसका फल भी मुझे मिल चुका है। आपकी कोई जाति या कुल निश्चित नहीं है। आप स्वभाव से पागल हो।

आपनार सम मोरे करिबार तरे ।।झुठा दिले, विप्र बलि' भय ना करिले ॥

९८॥

आपने मुझे भी अपने समान पागल बनाने के लिए ही मेरे ऊपर फेंका है। आपको इसका भी डर नहीं हुआ कि मैं एक ब्राह्मण हूँ।

नित्यानन्द बले,—एइ कृष्णेर प्रसाद ।।इहाके 'झुठा' कहिले, तुमि कैले अपराध ॥

९९॥

नित्यानन्द प्रभु ने उत्तर दिया, यह भगवान् कृष्ण का उच्छिष्ट है। यदि आप इसे सामान्य जूठन समझते है, तो आपने अपराध किया है।

शतेक सन्यासी यदि कराह भोजन ।।तबे एइ अपराध हइबे खण्डन ॥

१०० ॥

श्रील नित्यानन्द प्रभु ने आगे कहा, यदि आप एक सौ संन्यासियों को अपने घर बुलाकर उन्हें भरपेट भोजन कराएंगे, तो आपका अपराध पण्डित हो सकेगा।

आचार्य कहे-—ना करिब सन्यासि-निमन्त्रण।सन्यासी नाशिल मोर सब स्मृति-धर्म ॥

१०१॥

। अद्वैत आचार्य ने उत्तर दिया, अब मैं कभी किसी संन्यासी को नहीं बुलाऊँगा, क्योंकि एक संन्यासी ने ही मेरे सारे ब्राह्मण स्मृति-नियमों को कलुषित कर दिया है।

एत बलि' दुइ जने कराइल आचमन ।। उत्तम शय्याते लइया कराइल शयन ॥

१०२॥

इसके बाद अद्वैत आचार्य ने दोनों प्रभुओं के हाथ और मुँह धुलवाये। फिर उन्हें उत्तम शय्या पर ले जाकर विश्राम कराने के लिए लिटा दिया।

लवङ्ग एलाची-बीज–उत्तम रस-वास । तुलसी-मञ्जरी सह दिल मुख-वास ॥

१०३॥

। श्री अद्वैत आचार्य ने दोनों जनों को लौंग तथा इलायची के साथ तुलसी-मंजरी का सेवन करवाया। इस तरह उनके मुखों में सुगन्ध आने लगी।

सुगन्धि चन्दने लिप्त कैल कलेवर ।। सुगन्धि पुष्प-माला आनि' दिल हृदय-उपर ॥

१०४॥

। श्री अद्वैत आचार्य ने दोनों प्रभुओं के शरीरों पर चन्दन का लेप किया और फिर उनके वक्षस्थलों पर अत्यन्त सुगन्धित फूलों की मालाएँ पहनाईं।

आचार्य करिते चाहे पाद-संवाहन ।।सङ्कुचित हा प्रभु बलेन वचन ॥

१०५॥

जब महाप्रभु शय्या पर लेट गये, तो अद्वैत आचार्य उनके पाँव दबाना चाहते थे, किन्तु महाप्रभु को संकोच हो रहा था, अतएव वे अद्वैत आचार्य से इस प्रकार बोले।

बहुत नाचाइले तुमि, छाड़ नाचान ।। मुकुन्द-हरिदास लइया करह भोजन ॥

१०६ ॥

श्री चैतन्य महाप्रभु ने कहा, अद्वैत आचार्य, आपने मुझे बहुत नाच नचाया। अब आप ऐसा करना छोड़ दीजिये। मुकुन्द और हरिदास के साथ जाकर भोजन करें।

तबे त' आचार्य सङ्गे ला दुइ जने ।। करिल इच्छाय भोजन, ग्रे आछिल मने ॥

१०७॥

तत्पश्चात् अद्वैत आचार्य ने मुकुन्द तथा हरिदास के साथ प्रसाद ग्रहण किया और उन तीनों ने भरपेट इच्छानुसार भोजन किया।

शान्तिपुरेर लोक शुनि' प्रभुर आगमन । देखिते आइला लोक प्रभुर चरण ।। १०८॥

जब शान्तिपुर के लोगों ने सुना कि श्री चैतन्य महाप्रभु वहाँ ठहरे हैं, ती वे तुरन्त ही उनके चरणकमलों का दर्शन करने आये।

‘हरि' ‘हरि' बले लोक आनन्दित हजा ।।चमत्कार पाइल प्रभुर सौन्दर्य देखिञा ॥

१०९॥

। सारे लोग अत्यन्त हर्षित होकर उच्च स्वर से भगवान् के पवित्र नाम- हरि! हरि! का उच्चारण करने लगे। वस्तुतः वे महाप्रभु का मौन्दर्य देखकर वे पूर्णतया आश्चर्यचकित हो गये।

गौर-देह-कान्ति सूर्य जिनिया उज्वल ।अरुण-वस्त्र-कान्ति ताहे करे झल-मल ॥

११०॥

। उन्होंने श्री चैतन्य महाप्रभु के अत्यन्त गौर वर्ण शरीर तथा उनकी 1 rवल कान्ति को देखा, जो सूर्य के तेज को भी परास्त करने वाली थी।इससे भी बढ़कर उनके केसरिया वस्त्रों का सौन्दर्य था, जो उनके शरीर पर झलमल कर रहे थे।

आइसे ग्राय लोक हर्षे, नाहि समाधान ।।लोकेर सङ्कट्टे दिन हैल अवसान ॥

१११॥

। लोग बड़े ही हर्ष के साथ आते और जाते थे। इसकी कोई गिनती न थी कि सूर्यास्त तक वहाँ कितने लोग एकत्र हुए थे।

सन्ध्याते आचार्य आरम्भिल सङ्कीर्तन ।।आचार्यु नाचेन, प्रभु करेन दर्शन ॥

११२॥

शाम होते ही अद्वैत आचार्य ने सामूहिक कीर्तन प्रारम्भ किया। वे स्वयं भी नृत्य करने लगे और महाप्रभु उनका नृत्य देखने लगे।

नित्यानन्द गोसाजि बुले आचार्य धरिजा । हरिदास पाछे नाचे हरषित हुआ ॥

११३॥

जब अद्वैत आचार्य नाचने लगे, तो नित्यानन्द प्रभु उनके पीछे पीछे नाचने लगे। हरिदास ठाकुर भी अत्यन्त हर्षित होकर उनके पीछे नाचने लगे।

कि कहिब रे सखि आजुक आनन्द ओर ।। चिर-दिने माधव मन्दिरे मोर ॥

११४॥

अद्वैत आचार्य ने कहा, हे सखियों! मैं क्या कहूँ? आज मुझे सर्वोच्च दिव्य आनन्द प्राप्त हुआ है। अनेकानेक दिनों के बाद भगवान् कृष्ण मेरे पर पधारे हैं।

एइ पद गाओयाझ्या हर्षे करेन नर्तन ।। स्वेद-कम्प-पुलकाश्रु-हुङ्कार-गर्जन ॥

११५॥

अद्वैत आचार्य संकीर्तन टोली का नेतृत्व कर रहे थे और उन्होंने इस श्लोक को बड़े हर्ष से गाया। उनके शरीर में भावमय स्वेद, कँपकँपी, रोमांच, अश्रु तथा कभी-कभी गर्जन और हुंकार का प्राकट्य हो रहा था।

फिरि' फिरि' कभु प्रभुर धरेन चरण । चरणे धरिया प्रभुरे बलेन वचन ॥

११६॥

नाचते हुए अद्वैत आचार्य चक्राकार घूमने लगते और श्री चैतन्य महाप्रभु के चरणकमल पकड़ लेते। फिर वे उनसे इस प्रकार बोलते।।

अनेक दिन तुमि मोरे बेड़ाइले भाण्डिया । घरेते पाञाछि, एबे राखिब बान्धिया ॥

११७॥

श्री अद्वैत आचार्य कहने लगे, आप बहुत दिनों तक बहकाकर मुमसे बचते रहे। अब आप मेरे घर आये हैं और मैं आपको बाँधकर रखूँगा ।

एत बलि' आचार्य आनन्दे करेन नर्तन ।।प्रहरेक-रात्रि आचार्य कैल सङ्कीर्तन ॥

११८॥

इस तरह कहते हुए उस रात को अद्वैत आचार्य ने बड़े ही आनन्द के साथ तीन घंटे तक संकीर्तन किया और सारे समय नाचते रहे।

प्रेमेर उत्कण्ठा,—प्रभुर नाहि कृष्ण-सङ्ग ।विरहे बाड़िल प्रेम-ज्वालार तरङ्ग ॥

११९॥

जब अद्वैत आचार्य इस प्रकार नृत्य कर रहे थे, तब चैतन्य महाप्रभु को कृष्ण के भावोल्लासमय प्रेम की अनुभूति हुई और उनके विरह के कारण प्रेम की लहरें और ज्वालाएँ तीव्रतर हो उठीं।

व्याकुल हा प्रभु भूमिते पड़िला ।। गोसाञि देखिया आचार्य नृत्य सम्बरिला ॥

१२०॥

। भावोल्लास से व्याकुल होकर श्री चैतन्य महाप्रभु सहसा भूमि पर गिर पड़े। यह देखकर अद्वैत आचार्य ने नृत्य करना बन्द कर दिया।

प्रभुर अन्तर मुकुन्द जाने भाल-मते ।। भावेर सदृश पद लागला गाइते ॥

१२१॥

जब मुकुन्द ने श्री चैतन्य महाप्रभु के भावोल्लास को देखा, तो वे महाप्रभु की मनोदशा को समझते हुए उनके भाव को पुष्ट करने वाले अनेक पद गाने लगे।

आचार्य उठाइल प्रभुके करिते नर्तन ।।पद शुनि' प्रभुर अङ्ग ना ग्राय धारण ॥

१२२॥

अद्वैत आचार्य ने श्री चैतन्य महाप्रभु को उठाया जिससे वे नृत्य कर सकें, किन्तु मुकुन्द द्वारा गाये जाने वाले पदों को सुनकर महाप्रभु को उनके शारीरिक लक्षणों के कारण पकड़े नहीं रखे जा सके।

अश्रु, कम्प, पुलक, स्वेद, गद्गद वचन ।।क्षणे उठे, क्षणे पड़े, क्षणेक रोदन ॥

१२३॥

उनके नेत्रों से अश्रु गिरने लगे और उनका सारा शरीर काँपने लगा। उन्हें रोमांच हो आया, उनका शरीर स्वेदमय हो गया और उनकी वाणी ।अवरुद्ध हो गई। कभी वे उठ खड़े होते और कभी गिर पड़ते, तो कभी रोदन करने लगते।

हा हा प्राण-प्रिय-सखि, कि ना हैल मोरे ।कानु-प्रेम-विषे मोर तनु-मन जरे ॥

१२४॥

मुकुन्द गाने लगे, हे प्राण प्रिय सखि! मेरे साथ क्या-क्या नहीं बीता! कृष्ण के प्रेमरूपी विष के प्रभाव से मेरा शरीर तथा मन दोनों अत्यन्त पीड़ित हैं।

रात्रि-दिने पोड़े मन सोयास्ति ना पाँ।।ग्राहाँ गेले कानु पाँ, ताहाँ उड़ि' याँ ॥

१२५॥

मेरी भावना इस प्रकार है : मेरा मन दिन-रात जलता है और मुझे तनिक भी आराम नहीं मिलता। यदि कोई ऐसा स्थान हो, जहाँ मैं श्रीकृष्ण से मिलने जा सकें, तो मैं तुरन्त वहाँ उड़कर चली जाऊँ।

एइ पद गाय मुकुन्द मधुर सुस्वरे ।शुनिया प्रभुर चित्त अन्तरे विदरे ॥

१२६॥

मुकुन्द ने इस पद को अत्यन्त मधुर स्वर में गाया, किन्तु ज्योंही भी चैतन्य महाप्रभु ने यह पद सुना, उनका हृदय विदीर्ण हो गया।

निर्वेद, विषाद, हर्ष, चापल्य, गर्व, दैन्य ।। प्रभुर सहित युद्ध करे भाव-सैन्य ॥

१२७॥

दिव्य भावों के सारे लक्षण यथा निराशा, खिन्नता, हर्ष, चपलता, गर्व तथा दीनता महाप्रभु के हृदय में सैनिकों की तरह लड़ने लगे।

जर-जर हैल प्रभु भावेर प्रहारे ।भूमिते पड़िल, श्वास नाहिक शरीरे ॥

१२८॥

श्री चैतन्य महाप्रभु का सारा शरीर विविध भाव-लक्षणों के प्रहार से जर्जर होने लगा। फलस्वरूप वे तुरन्त ही भूमि पर गिर गये और उनकी साँस रुक-सी गई।

देखिया चिन्तित हैला व्रत भक्त-गण ।।आचम्बिते उठे प्रभु करिया गर्जन ॥

१२९॥

महाप्रभु की यह दशा देखकर सारे भक्त अत्यन्त चिन्तित हो उठे। तभी महाप्रभु सहसा उठ खड़े हुए और गर्जना करने लगे।

बल्’ ‘बल्’ बले, नाचे, आनन्दे विह्वल ।बुझन ना ग्राय भाव-तरङ्ग प्रबल ॥

१३० ।। । महाप्रभु ने उठकर कहा, बोलते रहो! बोलते रहो! इस तरह। आनन्द-विभोर होकर नाचने लगे। कोई भी उनके इस भाव की प्रबल तरंगों को जान नहीं सका।

नित्यानन्द सङ्गे बुले प्रभुके धरिजा ।। आचार्य, हरिदास बुले पाछे त' नाचिञा ॥

१३१॥

नित्यानन्द प्रभु श्री चैतन्य महाप्रभु के साथ-साथ चलने लगे, जिससे वे गिरे नहीं और अद्वैत आचार्य तथा हरिदास ठाकुर नाचते हुए उनके पीछे-पीछे चलने लगे।

एइ मत प्रहरेक नाचे प्रभु रङ्गे।।कभु हर्ष, कभु विषाद, भावेर तरङ्गे ॥

१३२॥

इस तरह महाप्रभु कम-से-कम तीन घंटे नृत्य करते रहे। कभी-कभी नमें हर्ष, विषाद तथा अन्य भावों की अनेक तरंगे दृष्टिगोचर होती थीं।

तिन दिन उपवासे करिया भोजन ।।उद्दण्ड-नृत्येते प्रभुर हैल परिश्रम ॥

१३३।। महाप्रभु तीन दिनों से उपवास कर रहे थे और उसके बाद उन्होंने पर्याप्त भोजन किया था। अतएव जब वे नाचे और ऊँचा कूदे, तो उन्हें थोड़ी थकान हो आई।।

तबु त' ना जाने श्रम प्रेमाविष्ट हो । नित्यानन्द महाप्रभुके राखिल धरिञा ॥

१३४॥

किन्तु भगवत् प्रेम में पूर्णतः मग्न होने के कारण महाप्रभु थकान का अनुभव नहीं कर रहे थे। फिर भी नित्यानन्द प्रभु ने उन्हें पकड़ लिया और उन्हें नाचने से रोका।

आचार्य-गोसाजि तबे राखिल कीर्तन । नाना सेवा करि' प्रभुके कराइल शयन ॥

१३५॥

। यद्यपि महाप्रभु थके हुए थे, किन्तु नित्यानन्द प्रभु ने उन्हें पकड़कर शान्त किया। उस समय अद्वैत आचार्य ने कीर्तन समाप्त कर दिया और रह तरह की सेवाएँ करके महाप्रभु को विश्राम हेतु शयन करवाया।

एइ-मत दश-दिन भोजन-कीर्तन । एक-रूपे करि' करे प्रभुर सेवन ॥

१३६॥

अद्वैत आचार्य ने इस प्रकार लगातार दस दिनों तक शाम के समय भोज और कीर्तन का आयोजन किया। वे बिना किसी परिवर्तन के महाप्रभु की इस तरह सेवा करते रहे।

प्रभाते आचार्यरत्न दोलाय चड़ाना । भक्त-गण-सङ्गे आइला शचीमाता लञा ।। १३७॥

प्रातःकाल चन्द्रशेखर शचीमाता को उनके घर से पालकी में बैठाकर अनेक भक्तों समेत ले आये।

नदीया-नगरेर लोक-स्त्री-बालक-वृद्ध ।। सब लोक आइला, हैल सङ्घट्ट समृद्ध ॥

१३८ ॥

इस प्रकार नदिया नगर के सारे लोग-जिसमें स्त्रियाँ, बालक तथा वृद्ध सम्मिलित थे-वहाँ आये। इस तरह वहाँ विशाल भीड़ एकत्र हो गई।

प्रात:-कृत्य करि' करे नाम-सङ्कीर्तन । शचीमाता लबा आइला अद्वैत-भवन ॥

१३९॥

प्रात:काल शौच आदि दैनिक कृत्यों से निवृत्त होने के बाद महाप्रभु हरे कृष्ण महामन्त्र का कीर्तन कर रहे थे, तभी शचीमाता साथ लोग अद्वैत आचार्य के घर पहुँचे।

शची-आगे पड़िला प्रभु दण्डवत् हा ।। कान्दिते लागिला शची कोले उठाइञा ॥

१४०॥

। ज्योंही शचीमाता वहाँ पहुँचीं, तो चैतन्य महाप्रभु उनके चरणों में दण्ड के समान गिर पड़े। शचीमाता महाप्रभु को गोद में लेकर रोने लगीं।

दोंहार दर्शने मुँहे हइला विह्वल ।।केश ना देखिया शची हइला विकल ॥

१४१॥

एक-दूसरे को देखकर दोनों विह्वल हो उठे। महाप्रभु के शिर को केशविहीन देखकर शचीमाता अत्यन्त विक्षुब्ध हो उठीं।।

अङ्ग मुछे, मुख चुम्बे, करे निरीक्षण ।।देखिते ना पाय,—अश्रु भरिल नयन ॥

१४२॥

। स्नेहवश वे महाप्रभु के शरीर पर हाथ फेरने लगीं। कभी वे मुख चूमती और ध्यान से उन्हें देखने का प्रयत्न करतीं, किन्तु अश्रुपूरित नेत्र के कारण वे देख न सकीं।

कान्दिया कहेन शची, बाछारे निमात्रि ।। विश्वरूप-सम ना करिह निठुराइ ॥

१४३॥

यह समझकर कि चैतन्य महाप्रभु ने संन्यास ग्रहण कर लिया शचीमाता ने रोते हुए महाप्रभु से कहा, मेरे दुलारे निमाइ! तुम अपने विश्वरूप की तरह निष्ठुर न बनो।

सन्यासी हइया पुनः ना दिल दरशन ।। तुमि तैछे कैले मोर हेइबे मरण ॥

१४४॥

शचीमाता ने कहा, विश्वरूप ने संन्यास लेने के बाद फिर मुझे कभी दर्शन नहीं दिया। यदि तुम उसी की तरह करोगे, तो तुम समझ ली। निश्चित रूप से मेरी मृत्यु हो जायेगी।

कान्दिया बलेन प्रभु–शुन, मोर आइ ।।तोमार शरीर एइ, मोर किछु नाइ ॥

१४५ ॥

महाप्रभु ने उत्तर दिया, हे माता! कृपया सुनिये। यह शरीर आपका है।। मेरा अपना कुछ भी नहीं है।

तोमार पालित देह, जन्म तोमा हैते ।। कोटि जन्मे तोमार ऋण ना पारि शोधिते ॥

१४६॥

। यह शरीर आपके द्वारा पाला-पोसा गया है और यह आपसे ही उत्पन्न है मैं करोड़ों जन्मों में भी यह ऋण नहीं चुका सकता।

जानि' वा ना जानि' कैल यद्यपि सन्यास ।। तथापि तोमारे कभु नहिब उदास ॥

१४७॥

भाने या अनजाने मैंने यह संन्यास स्वीकार किया है। फिर भी मैं आपसे विमुख नहीं होऊँगा।

तुमि ग्राहाँ कह, आमि ताहाङि रहिब ।। तुमि ग्रेइ आज्ञा कर, सेइ त' करिब ॥

१४८॥

अनुन्नाद हे माता, आप मुझे जहाँ भी रहने के लिए कहेंगी, मैं वहीं रहूँगा और आप जो भी आज्ञा देंगी, उसका मैं पालन करूंगा।

एत बलि' पुनः पुनः करे नमस्कार ।। तुष्ट हन्ना आइ कोले करे बार बार ॥

१४९॥

यह कहकर महाप्रभु ने अपनी माता को बारम्बार प्रणाम किया। शचीमाता ने भी उनसे प्रसन्न होकर उन्हें बारम्बार अपनी गोद में लिया।

तबे आइ लजा आचार्य गेला अभ्यन्तर । भक्त-गण मिलिते प्रभु हइला सत्वर ॥

१५०॥

तत्पश्चात् अद्वैत आचार्य शचीमाता को घर के भीतर ले गये। महाप्रभु तुरन्त ही सारे भक्तों से मिलने के लिए तैयार हो गये।

एके एके मिलिल प्रभु सब भक्त-गण ।। सबार मुख देखि' करे दृढ़ आलिङ्गन ॥

१५१॥

महाप्रभु एक-एक करके सारे भक्तों से मिले और हर एक के मुख को देखकर उन्होंने उसका दृढ़तापूर्वक आलिंगन किया।

केश ना देखिया भक्त यद्यपि पाय दुःख ।।सौन्दर्य देखिते तबु पाय महा-सुख ॥

१५२॥

। यद्यपि भक्तगण महाप्रभु के बालों को न देखकर दुःखी थे, फिर भी उनके सौन्दर्य को देखकर परम सुख प्राप्त कर रहे थे।

श्रीवास, रामाई, विद्यानिधि, गदाधर ।। गङ्गादास, वक्रेश्वर, मुरारि, शुक्लाम्बर ॥

१५३॥

बुद्धिमन्त खाँ, नन्दन, श्रीधर, विजय ।। वासुदेव, दामोदर, मुकुन्द, सञ्जय ॥

१५४॥

कत नाम लइब ग्रत नवद्वीप-वासी ।।सबारे मिलिला प्रभु कृपा-दृष्ट्ये हासि' ॥

१५५॥

श्रीवास, रामाइ, विद्यानिधि, गदाधर, गंगादास, वक्रेश्वर, मुरारि, शुक्लाम्बर, बुद्धिमन्त खां, नन्दन, श्रीधर, विजय, वासुदेव, दामोदर, मुकुन्द, संजय तथा अन्य जितने भी नाम मैं गिना सकें-सभी नवद्वीप के निवासी वहाँ आये और महाप्रभु सब पर कृपा दृष्टि डालते हुए तथा । मुस्कुराते हुए उनसे मिले।

आनन्दे नाचये सबे बलि’ ‘हरि' ‘हरि' ।।आचार्य-मन्दिर हैल श्री-वैकुण्ठ-पुरी ॥

१५६॥

हर कोई पवित्र हरिनाम का कीर्तन करते हुए नाच रहा था। इस तरह अद्वैत आचार्य का निवास स्थान श्री वैकुण्ठपुरी में बदल गया था।

ग्रत लोक आइल महाप्रभुके देखिते ।।नाना-ग्राम हैते, आर नवद्वीप हैते ॥

१५७॥

नवद्वीप के अतिरिक्त आसपास के अन्य विभिन्न गाँवों के भी लोग श्री चैतन्य महाप्रभु के दर्शन हेतु आये।

सबाकारे वासा दिल–भक्ष्य, अन्न-पान ।।बहु-दिन आचार्य-गोसाञि कैल समाधान ॥

१५८ ॥

। अद्वैत आचार्य ने महाप्रभु का दर्शन करने के लिए निकट के गाँवों से आये हर व्यक्ति को, विशेषतया नवद्वीप के निवासियों को कई दिनों तक रहने के लिए स्थान और सभी प्रकार की खाद्य सामग्री प्रदान की। उन्होंने हर बात का अच्छी तरह प्रबन्ध किया।

आचार्य-गोसाजिर भाण्डार---अक्षय, अव्यय ।। ग्रत द्रव्य व्यय करे तत द्रव्य हय ॥

१५९॥

अद्वैत आचार्य का भण्डार अक्षय तथा अटूट था। वे जितनी भी सामग्री का उपयोग करते, उतनी ही सामग्री फिर से प्रकट हो आती।।

सेइ दिन हैते शची करेन रन्धन ।।भक्त-गण लञा प्रभु करेन भोजन ॥

१६० ॥

जिस दिन से शचीमाता अद्वैत आचार्य के घर आईं, वे ही भोजन पकाती थीं और श्री चैतन्य महाप्रभु सारे भक्तों के साथ भोजन करते थे।

दिने आचार प्रीति प्रभुर दर्शन ।।रात्रे लोक देखे प्रभुर नर्तन-कीर्तन ॥

१६१॥

दिन में जितने सारे लोग वहाँ आते थे, वे श्री चैतन्य महाप्रभु का दर्शन करते थे और अद्वैत आचार्य के प्रेमपूर्ण व्यवहार को देखते थे। रात्रि में उन्हें महाप्रभु का नृत्य देखने और उनका कीर्तन सुनने का अवसर प्राप्त होता था।

कीर्तन करिते प्रभुर सर्व-भावोदय ।। स्तम्भ, कम्प, पुलकाश्रु, गद्गद, प्रलय ॥

१६२॥

कीर्तन करते समय महाप्रभु में सभी प्रकार के दिव्य लक्षण प्रकट हो जाते थे। वे स्तम्भित एवं कम्पित लगते, उन्हें रोमांच हो जाता और उनकी वाणी अवरुद्ध हो जाती। आंसुओं के साथ प्रलय प्रकट हो जाती।

क्षणे क्षणे पड़े प्रभु आछाड़ खाजा ।। देखि' शचीमाता कहे रोदन करिया ॥

१६३॥

महाप्रभु रह-रहकर पछाड़ खाकर भूमि पर गिर पड़ते थे। यह देखकर उनकी माता शची रोने लगतीं।।

चूर्ण हैल, हेन वासों निमाजि-कलेवर ।।हा-हा करि' विष्णु-पाशे मागे एइ वर ॥

१६४॥

श्रीमती शचीमाता ने सोचा कि इस तरह भूमि पर गिरने से निमाइ का शरीर चूर-चूर हो रहा होगा, अतएव वे चित्कार कर उठीं, हाय और फिर भगवान् विष्णु से वर माँगने लगीं।

बाल्यकाल हैते तोमार ये कैलँ सेवन ।।तार एइ फल मोरे देह नारायण ॥

१६५ ॥

हे प्रभु, मैंने अपने बचपन से लेकर आज तक आपकी जो भी सेवा की है, उसके बदले में कृपा करके मुझे यह वर दें।

ने काले निमात्रि पड़े धरणी-उपरे ।।व्यथा ग्रेन नाहि लागे निमाजि-शरीरे ।। १६६ ॥

। जब-जब निमाइ धरती पर गिरे, तब-तब उसे पीड़ा का अनुभव न हो।

एइ-मत शचीदेवी वात्सल्ये विह्वल ।।हर्ष-भय-दैन्य-भावे हइल विकल ॥

१६७॥

इस तरह श्री चैतन्य महाप्रभु के प्रति वात्सल्य-प्रेम से अभिभूत होने पर शचीमाता हर्ष, भय तथा दीनता से विह्वल और साथ ही शारीरिक भाव-लक्षणों से युक्त हो गई।

श्रीवासादि ग्रत प्रभुर विप्र भक्त-गण ।।प्रभुके भिक्षा दिते हैल सबाकार मन ॥

१६८॥

चूँकि अद्वैत आचार्य श्री चैतन्य महाप्रभु को भिक्षा तथा भोजन देते थे, अतएव श्रीवास ठाकुर आदि अन्य भक्त भी उन्हें भिक्षा देने और भोजन के लिए आमन्त्रित करना चाह रहे थे।

शुनि' शची सबकारे करिल मिनति ।।निमाजिर दरशन आर मुञि पाब कति ॥

१६९॥

। महाप्रभु के अन्य भक्तों द्वारा ऐसे प्रस्तावों को सुनकर शचीमाता ने भक्तों से कहा, अब मुझे निमाइ के दर्शन पाने के कितने अवसर हाथ लगेंगे? तोमा-सब-सने हबे अन्यत्र मिलन ।।मुञि अभागिनीर मात्र एइ दरशन ॥

१७० ॥

। शचीमाता ने निवेदन किया, जहाँ तक आप लोगों की बात है, आप निमाइ अर्थात् श्री चैतन्य महाप्रभु से अन्यत्र भी अनेक बार मिल सकते हो, किन्तु मेरे लिए उससे दोबारा मिलने की क्या सम्भावना है? मुझे तो घर पर रहना होगा। संन्यासी कभी अपने घर वापस नहीं आता।

ग्रावताचार्य-गृहे निमाजिर अवस्था । मुजि भिक्षा दिमु, सबकारे मागों दान ॥

१७१॥

शचीमाता ने सभी भक्तों से यह दान माँगा, जब तक श्री चैतन्य महाप्रभु अद्वैत आचार्य के घर में रहें, केवल वे ही उन्हें भोजन प्रदान करेंगी।

शुनि' भक्त-गण कहे करि' नमस्कार ।। मातार ये इच्छा सेइ सम्मत सबार ॥

१७२॥

शचीमाता का यह निवेदन सुनकर सारे भक्तों ने उन्हें नमस्कार करते हुए कहा, “हम सभी लोग शचीमाता की इच्छा से सहमत हैं।

मातार व्यग्रता देखि प्रभुर व्यग्र मन । भक्त-गण एकत्र करि' बलिला वचन ॥

१७३ ॥

जब श्री चैतन्य महाप्रभु ने अपनी माता की महान् उत्सुकता देखी, तो वे कुछ विचलित हुए। अतएव उन्होंने वहाँ उपस्थित सारे भक्तों को एकत्र किया और उनसे बोले।

तोमा-सबार आज्ञा विना चलिलाम वृन्दावन ।।याइते नारिल, विघ्न कैल निवर्तन ॥

१७४।। । श्री चैतन्य महाप्रभु ने उन सबको बतलाया, मैं आप लोगों की आज्ञा लिये बिना वृन्दावन जाना चाह रहा था। किन्तु कुछ बाधा उत्पन्न हुई और मुझे लौटना पड़ा।

यद्यपि सहसा आमि करियाछि सन्यास ।। तथापि तोमा-सबा हैते नहिब उदास ॥

१७५ ॥

हे मित्रों, यद्यपि मैंने अचानक ही यह संन्यास ग्रहण कर लिया है, किन्तु मैं जानता हूँ कि तब भी मैं आप लोगों से कभी उदासीन नहीं होऊँगा।

तोमा-सब ना छाड़िब, ग्रावतामि जीब' ।मातारे तावतामि छाड़िते नारिब ॥

१७६ ॥

मेरे प्रिय मित्रों, जब तक मैं जीवित रहूँगा, आप लोगों को कभी नहीं छोडूंगा। न ही मैं अपनी माता को छोड़ पाऊँगा।

सन्यासीर धर्म नहे---सन्यास करिना ।निज जन्म-स्थाने रहे कुटुम्ब ला ॥

१७७॥

संन्यास स्वीकार करने के बाद संन्यासी का यह धर्म नहीं होता कि वह अपने जन्मस्थान में रहे और अपने कुटुम्बियों से घिरा रहे।

केह ग्रेन एइ बलि' ना करे निन्दन ।।सेइ झुक्ति कह, झाते रहे दुइ धर्म ॥

१७८ ॥

अतएव कुछ ऐसा प्रबन्ध करो, जिससे मैं आप लोगों को न छोड़ें और लोग मुझ पर संन्यास लेने के बाद सम्बन्धियों के साथ रहने का। लांछन भी न लगा सकें।

शुनिया प्रभुर एइ मधुर वचन ।।शची-पाश आचार्यादि करिल गमन ॥

१७९॥

महाप्रभु के वचन सुनकर अद्वैत आचार्य आदि सारे भक्त शचीमाता के पास गये।

प्रभुर निवेदन ताँरे सकल कहिल ।।शुनि' शची जगन्माता कहिते लागिल ॥

१८०॥

जब उन्होंने श्री चैतन्य महाप्रभु के वचन कहे, तो अखिल विश्व की माता शची कहने लगीं।

तेहो झदि इहाँ रहे, तळे पो छ । । ताँर निन्दा हय यदि, सेह मोर दु:ख ।। १८१ ।। शचीमाता ने कहा, यह मेरे लिए परम सुख की बात होगी यदि निमाइ ( श्री चैतन्य महाप्रभु) यहाँ रहता है। किन्तु यदि कोई उसकी निन्दा करे तो यह मेरे लिए अत्यन्त दुःख की बात होगी।

ताते एइ युक्ति भाल, मोर मने लय ।। नीलाचले रहे ग्रदि, दुई कार्य हर !! १८२ ।। । शचीमाता ने कहा, यह अच्छा विचार है। मेरे विचार से यदि निमाइ जगन्नाथ पुरी में रहे, तो वह हममें से किसी को छोड़ेगा भी नहीं और उसी के साथ-साथ वह संन्यासी के रूप में अलग भी रह सकता है। इस तरह दोनों उद्देश्य पूरे हो जायेंगे।

नीलाचले नवद्वीपे ग्रेन दुइ घर ।। लोक-गतागति-वार्ता पाब निरन्तर ॥

१८३॥

चूँकि जगन्नाथ पुरी और नवद्वीप का निकट सम्बन्ध है-मानों एक ही घर के दो कमरे हों-इसलिए नवद्वीप के लोग सामान्यतः जगन्नाथ पुरी जाते रहते हैं और जगन्नाथ पुरी के लोग नवद्वीप आते रहते हैं। इस आनेजाने से चैतन्य महाप्रभु के समाचार मिलने में सुविधा होगी। इस तरह मुझे उसके समाचार मिलते रहेंगे।

तुमि सब करिते पार गमनागमन ।। गङ्गा-स्नाने कभु हबे ताँर आगमन ॥

१८४॥

तुम सारे भक्त आ-जा सकोगे और कभी-कभी वह भी गंगा-स्नान करने के लिए आ सकता है।

आपनार दुःख-सुख ताहाँ नाहि गणि ।।ताँर ग्रेइ सुख, ताहा निज-सुख मानि ॥

१८५॥

मुझे अपने सुख या दुःख की चिन्ता नहीं है, चिन्ता केवल उसके सुख की है। मैं उसके सुख को ही अपना सुख मानती हूँ।

शुनि' भक्त-गण ताँरै करिल स्तवन ।वेद-आज्ञा ग्रैछे, माता, तोमार वचन ॥

१८६॥

शचीमाता के वचन सुनकर सारे भक्तों ने उनकी स्तुति की और उन्हें विश्वास दिलाया कि उनका आदेश वेदों के आदेश के समान है, जिसका अतिक्रमण नहीं किया जा सकता।

भक्त-गण प्रभु-आगे आसिया कहिल ।।शुनिया प्रभुर मने आनन्द हइल ॥

१८७॥

सारे भक्तों ने चैतन्य महाप्रभु को शचीमाता के निर्णय की सूचना दी। यह सुनकर महाप्रभु अत्यन्त प्रसन्न हुए।

नवद्वीप-वासी आदि ग्रत भक्त-गण ।सबारे सम्मान करि' बलिला वचन ।। १८८॥

श्री चैतन्य महाप्रभु ने नवद्वीप तथा अन्य नगरों से आये सभी भक्तों का सम्मान किया और उनसे इस प्रकार कहा : तुमि-सब लोक—मोर परम बान्धव ।।एइ भिक्षा मागों,--मोरे देह तुमि सब ॥

१८९॥

। मेरे प्रिय मित्रों, आप सभी मेरे घनिष्ठ मित्र हो। अब मैं आप सबसे एक भिक्षा माँगता हूँ। कृपा करके मुझे यह भिक्षा दें।

घरे यात्रा कर सदा कृष्ण-सङ्कीर्तन ।। कृष्ण-नाम, कृष्ण-कथा, कृष्ण आराधन ॥

१९०॥

श्री चैतन्य महाप्रभु ने उन सबसे प्रार्थना की कि वे घर लौट जाएँ और वहाँ सामूहिक नाम-कीर्तन प्रारम्भ कर दें। उन्होंने यह भी प्रार्थना की कि वे कृष्ण की पूजा करें, उनके पवित्र नाम का कीर्तन करें तथा उनकी पवित्र लीलाओं की चर्चा करें।

आज्ञा देह नीलाचले करिये गमन । मध्ये मध्ये आसि' तोमाय दिब दरशन ॥

१९१॥

भक्तों को इस प्रकार उपदेश देने के बाद श्री चैतन्य महाप्रभु ने जगन्नाथ पुरी जाने की अनुमति चाही। उन्होंने आश्वासन दिया कि वे बीच बीच में वहाँ आते रहेंगे और उनसे बार-बार मिलते रहेंगे।

एत बलि' सबाकारे ईषत् हासिजा ।।विदाय करिल प्रभु सम्मान करिजा ॥

१९२॥

इस तरह श्री चैतन्य महाप्रभु ने सभी भक्तों का सम्मान करते हुए और सौम्यता से मुस्कुराते हुए सबको विदा किया।

सबा विदाय दिया प्रभु चलिते कैल मन ।हरिदास कान्दि' कहे करुण वचन ॥

१९३॥

सभी भक्तों से घर लौट जाने की विनती करने के बाद महाप्रभु ने जगन्नाथ पुरी जाने का निश्चय किया। उस समय हरिदास ठाकुर क्रन्दन करते हुए करुण वचन बोले।

नीलाचले ग्राबे तुमि, मोर कोन्गति ।नीलाचले ग्राइते मोर नाहिक शकति ॥

१९४॥

। हरिदास ठाकुर ने कहा, यह तो ठीक है कि आप नीलाचल ( जगन्नाथ पुरी) जा रहे हैं, किन्तु मेरी क्या गति होगी? मैं तो नीलाचल जाने में असमर्थ हैं।

मुजि अधम तोमार ना पाब दरशन ।। केमते धरिब एइ पापिष्ठ जीवन ॥

१९५॥

अत्यन्त नीच व्यक्ति होने के कारण मैं आपके दर्शन नहीं पा सर्केगा। मैं अपने पापमय जीवन को किस तरह धारण किये रहूँगा? प्रभु कहे,---कर तुमि दैन्य सम्वरण ।। तोमार दैन्येते मोर व्याकुल हय मन ॥

१९६॥

महाप्रभु ने हरिदास ठाकुर से कहा, कृपया आप अपनी दीनता को नियंत्रित कीजिये। आपकी दीनता देखकर मेरा मन अत्यधिक व्याकुल हो। रहा है।

तोमा लागि' जगन्नाथे करिब निवेदन । तोमा-ला याब आमि श्री-पुरुषोत्तम ॥

१९७॥

। श्री चैतन्य महाप्रभु ने हरिदास ठाकुर को आश्वस्त किया कि वे भगवान् जगन्नाथ के समक्ष निवेदन करेंगे और निश्चय ही उन्हें जगन्नाथ पुरी ले चलेंगे।

तबे त' आचार्य कहे विनय करिजा ।। दिन दुइ-चारि रह कृपा त' करिजा ॥

१९८॥

इसके बाद अद्वैत आचार्य ने श्री चैतन्य महाप्रभु से अनुनय-विनय की कि वे दो-चार दिन और रहने की कृपा करें।

आचार्गेर वाक्य प्रभु ना करे लड्न ।।रहिला अद्वैत-गृहे, ना कैल गमन ।। १९९॥

श्री चैतन्य महाप्रभु कभी भी अद्वैत आचार्य की प्रार्थना का उल्लंघन नहीं करते थे; अतएव वे उनके घर पर रुके रहे और उन्होंने जगन्नाथ पुरी के लिए तुरन्त प्रस्थान नहीं किया।

आनन्दित हैल आचार्य, शची, भक्त, सब ।।प्रति-दिन करे आचार्य महा-महोत्सव ॥

२००॥

महाप्रभु के निर्णय से अद्वैत आचार्य, शचीमाता तथा सारे भक्त अत्यन्त प्रसन्न हुए। अद्वैत आचार्य प्रतिदिन महान् उत्सवों का आयोजन करते रहे।

दिने कृष्ण-कथा-रस भक्त-गण-सङ्गे।।रात्रे महा-महोत्सव सङ्कीर्तन-रङ्गे ॥

२०१॥

दिन के समय सारे भक्त कृष्ण-कथाओं की चर्चा करते और रात में अद्वैत आचार्य के घर सामूहिक कीर्तन महोत्सव मनाया जाता।

आनन्दित हा शची करेन रन्धन ।। सुखे भोजन करे प्रभु ला भक्त-गण ॥

२०२॥

माता शची बड़े आनन्द से भोजन पकातीं और भक्तों सहित श्री चैतन्य महाप्रभु बड़े ही आनन्द के साथ प्रसाद ग्रहण करते।

आचार श्रद्धा-भक्ति-गृह-सम्पद-धने ।। सकल सफल हैल प्रभुर आराधने । २०३॥

इस तरह अद्वैत आचार्य के सारे ऐश्वर्य-उनकी श्रद्धा, भक्ति, घर, धन और अन्य सब कुछ-श्री चैतन्य महाप्रभु की सेवा में भलीभाँति उपयोग किये गये।

शचीर आनन्द बाड़े देखि' पुत्र-मुख । भोजन कराञी पूर्ण कैल निज-सुख ॥

२०४॥

शचीमाता का आनन्द निरन्तर अपने पुत्र का मुख देखकर तथा भोजन । कराकर बढ़ता रहा तथा अतन्तः पूर्णता को प्राप्त हुआ।

एइ-मत अद्वैत-गृहे भक्त-गण मिले ।।वञ्चिला कतक-दिन महा-कुतूहले ॥

२०५॥

इस तरह सारे भक्त अद्वैत आचार्य के घर पर मिले और उन्होंने महोत्सवमय वातावरण में एक साथ कुछ दिन बिताये।

आर दिन प्रभु कहे सब भक्त-गणे ।।निज-निज-गृहे सबे करह गमने ॥

२०६॥

अगले दिन चैतन्य महाप्रभु ने सभी भक्तों से अपने-अपने घर लौट जाने की विनती की।

घरे गिया कर सबे कृष्ण-सङ्कीर्तन ।।पुनरपि आमा-सङ्गे हइबे मिलन ॥

२०७।। । श्री चैतन्य महाप्रभु ने सबसे अपने-अपने घरों में भगवन्नाम का सामूहिक संकीर्तन करने के लिए भी कहा और उन्होंने विश्वास दिलाया कि वे उनसे दोबारा अवश्य मिल सकेंगे।

कभु वा तोमरा करिबे नीलाद्रि गमन ।। कभु वा आसिब आमि करिते गङ्गा-स्नान ॥

२०८॥

श्री चैतन्य महाप्रभु ने उनसे कहा, 'कभी तुम लोग जगन्नाथ पुरी आओगे और कभी मैं गंगा स्नान करने आऊँगा।'

नित्यानन्द-गोसाजि, पण्डित जगदानन्द ।। दामोदर पण्डित, आर दत्त मुकुन्द ॥

२०९॥

एइ चारि-जन आचार्य दिल प्रभु सने । जननी प्रबोध करि' वन्दिल चरणे ॥

२१०॥

। श्री अद्वैत आचार्य ने महाप्रभु के साथ जाने के लिए चार जनों को भेजा। इनके नाम थे-नित्यानन्द गोसांई, जगदानन्द पण्डित, दामोदर पंडित तथा मुकुन्द दत्त। अपनी माता को सान्त्वना देने के बाद महाप्रभु ने उनके चरणकमलों में प्रार्थना की।

तौरे प्रदक्षिण करि' करिल गमन ।।एथा आचार घरे उठिल क्रन्दन ॥

२११॥

सभी प्रबंध होने के बाद चैतन्य महाप्रभु ने अपनी माता की प्रदक्षिणा की और तत्पश्चात् वे जगन्नाथ पुरी के लिए चल पड़े। इधर अद्वैत आचार्य के घर में उच्च स्वर से रोदन प्रारम्भ हो गया।

निरपेक्ष हा प्रभु शीघ्र चलिला ।।कान्दिते कान्दिते आचार्य पश्चात्चलिला ॥

२१२॥

श्री चैतन्य महाप्रभु अप्रभावित थे। वे तेजी से चल दिये और अद्वैत । आचार्य रोते हुए उनके पीछे चल रहे थे।

कत दूर गिया प्रभु करि' ग्रोड़ हात ।। आचार्ये प्रबोधि' कहे किछु मिष्ट बात ॥

२१३॥

जब अद्वैत आचार्य चैतन्य महाप्रभु के पीछे-पीछे कुछ दूर तक गये, तो महाप्रभु ने हाथ जोड़कर उनसे याचना की। वे निम्नलिखित मधुर शब्द बोले।

जननी प्रबोधि' कर भक्त समाधान ।। तुमि व्यग्र हैले कारो ना रहिबे प्राण ॥

२१४॥

श्री चैतन्य महाप्रभु ने कहा, कृपया सारे भक्तों को तथा मेरी माता को सान्त्वना दीजिये। यदि आप ही व्यग्र हो जायेंगे, तो फिर कोई जीवित नहीं रह सकेगा।

एत बलि' प्रभु ताँरे करि' आलिङ्गन ।निवृत्ति करिया कैल स्वच्छन्द गमन ॥

२१५॥

यह कहकर श्री चैतन्य महाप्रभु ने अद्वैत आचार्य का आलिंगन किया और उन्हें और आगे चलने से मना किया। फिर निश्चिंत होकर वे जगन्नाथ पुरी के लिए चल पड़े।

गङ्गा-तीरे-तीरे प्रभु चारि-जन-साथे ।।नीलाद्रि चलिला प्रभु छत्रभोग-पथे ॥

२१६॥

महाप्रभु चारों व्यक्तियों के साथ गंगा नदी के किनारे-किनारे छत्रभोग के मार्ग से नीलाद्रि अर्थात् जगन्नाथ पुरी की ओर चलने लगे।

चैतन्य-मङ्गले' प्रभुर नीलाद्रि-गमन ।। विस्तारि वणियाछेन दास-वृन्दावन ॥

२१७॥

वृन्दावन दास ठाकुर ने अपनी पुस्तक चैतन्य-मंगल (चैतन्य भागवत ) में जगन्नाथ पुरी तक महाप्रभु के गमन का विस्तार से वर्णन किया है।

अद्वैत-गृहे प्रभुर विलास शुने ग्रेइ जन ।।अचिरे मिलये ताँरै कृष्ण-प्रेम-धन ।। २१८॥

जो व्यक्ति अद्वैत आचार्य के घर में सम्पन्न महाप्रभु के कार्यकलापों को सुनता है, उसे निश्चय ही तुरन्त कृष्ण-प्रेम रूपी धन प्राप्त होता है।

श्री-रूप-रघुनाथ-पदे यार आश ।। चैतन्य-चरितामृत कहे कृष्णदास ॥

२१९॥

श्री रूप और श्री रघुनाथ के चरणकमलों की वन्दना करते हुए और सदा उनकी कृपा की कामना करते हुए मैं, कृष्णदास, उनके चरणचिह्नों पर चलकर श्री चैतन्य-चरितामृत का वर्णन कर रहा हूँ।"

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