अध्याय चार: श्री माधवेंद्र पुरी की भक्ति सेवा
यस्मै दातुं चोरयन्क्षीर-भाण्डेगोपीनाथः क्षीर-चोराभिधोऽभूत् ।। श्री-गोपालः प्रादुरासीद्वशः सन् ।ग्रत्प्रेम्णा तं माधवेन्द्रं नतोऽस्मि ॥
१॥
मैं उन माधवेन्द्र पुरी को सादर नमस्कार करता हूँ, जिन्हें श्री गोपीनाथ ने खीर का एक पात्र चुराकर दिया और तत्पश्चात् स्वयं क्षीर-चोरा कहलाये। माधवेन्द्र पुरी के प्रेम से प्रसन्न होकर गोवर्धन-स्थित श्री गोपाल-विग्रह ने जनसमूह को दर्शन दिया।
जय जय गौरचन्द्र जय नित्यानन्द ।।जयाद्वैतचन्द्र जय गौर-भक्त-वृन्द ॥
२॥
श्री चैतन्य महाप्रभु की जय हो! श्री नित्यानन्द प्रभु की जय हो! श्री अद्वैत प्रभु की जय हो! तथा श्री चैतन्य महाप्रभु के समस्त भक्तों की जय हो! नीलाद्रि-गमन, जगन्नाथ-दरशन । सार्वभौम भट्टाचार्य-प्रभुर मिलन ॥
३॥
ए सब लीला प्रभुर दास वृन्दावन । विस्तारि' करियाछेन उत्तम वर्णन ॥
४॥
महाप्रभु जगन्नाथ पुरी गये और भगवान् जगन्नाथ के मन्दिर के दर्शन किये। वे सार्वभौम भट्टाचार्य से भी मिले। इन सब लीलाओं का अत्यन्त विस्तृत वर्णन वृन्दावन दास ठाकुर द्वारा अपने ग्रन्थ चैतन्य-भागवत में किया गया है।
सहजे विचित्र मधुर चैतन्य-विहार ।। वृन्दावन-दास-मुखे अमृतेर धार ॥
५॥
श्री चैतन्य महाप्रभु की सभी लीलाएँ स्वभावतः अत्यन्त अद्भुत और मधुर हैं और जब उनका वर्णन वृन्दावन दास ठाकुर द्वारा किया जाता है, तब वे अमृत की धारा के समान बन जाती हैं।
अतएव ताहा वर्णिले हय पुनरुक्ति ।दम्भ करि' वणि यदि तैछे नाहि शक्ति ॥
६॥
इसलिए मेरा सविनय निवेदन है कि चूंकि इन लीलाओं का सुन्दर वर्णन वृन्दावन दास ठाकुर द्वारा पहले ही हो चुका है, अतएव उन लीलाओं की पुनरावृत्ति दंभ की परिचायक होगी, अतएव ऐसा करना अच्छा नहीं होगा। मुझमें ऐसी शक्ति नहीं है।
चैतन्य-मङ्गले ग्राहा करिल वर्णन ।।सूत्र-रूपे सेइ लीला करिये सूचन ॥
७॥
अतएव चैतन्य मंगल ( अब चैतन्य भागवत नाम से विख्यात ) में वृन्दावन दास ठाकुर जिन लीलाओं का पहले से विस्तृत वर्णन कर चुके हैं, उन्हें मैं सूत्र-रूप में प्रस्तुत कर रहा हूँ।
ताँर सूत्रे आछे, तेह ना कैल वर्णन ।। ग्रथा-कथञ्चित्करि' से लीला कथन ॥
८॥
उन्होंने कुछ लीलाओं का विस्तृत वर्णन नहीं किया है, प्रत्युत सारमात्र दिया है, अतएव मैं इस पुस्तक में उनका वर्णन करने का प्रयास करूंगा।
अतएव ताँर पाये करि नमस्कार ।ताँर पाय अपराध ना हउक् आमार ॥
९॥
अतएव मैं वृन्दावन दास ठाकुर के चरणकमलों में अपना सादर नमस्कार अर्पित करता हूँ। मुझे आशा है कि मेरे इस कार्य से उनके चरणकमलों के प्रति अपराध नहीं होगा।
एइ-मत महाप्रभु चलिला नीलाचले ।चारि भक्त सङ्गे कृष्ण-कीर्तन-कुतूहले ॥
१०॥
। श्री चैतन्य महाप्रभु अपने चार भक्तों सहित जगन्नाथ पुरी की ओर चल पड़े और वे बड़े उत्साह से भगवान् के पवित्र नाम-हरे कृष्ण मंत्र-का कीर्तन कर रहे थे।
भिक्षा लागि' एक-दिन एक ग्राम गिया । आपने बहुत अन्न आनिल मागिया ॥
११॥
। श्री चैतन्य महाप्रभु प्रतिदिन स्वयं एक गाँव में जाते और प्रसाद तैयार करने के लिए चावल तथा अन्य अनाज पर्याप्त मात्रा में माँग लाते।।
पथे बड़े बड़े दानी विघ्न नाहि करे ।। ता' सबारे कृपा करि' आइला रेमुणारे ॥
१२॥
रास्ते में अनेक नदियाँ पड़ीं और हर नदी पर कर एकत्र करने वाला व्यक्ति था। किन्तु उसने महाप्रभु को रोका नहीं। महाप्रभु ने भी उन सब पर कृपा की। अन्त में वे रेमुणा गाँव पहुँचे।
रेमुणाते गोपीनाथ परम-मोहन ।भक्ति करि' कैल प्रभु ताँर दरशन ॥
१३॥
रेमुणा के मन्दिर में गोपीनाथ का विग्रह अत्यन्त आकर्षक था। चैतन्य महाप्रभु ने इस मन्दिर में दर्शन किये और अत्यन्त भक्तिपूर्वक नमस्कार किया।
ताँर पाद-पद्म निकट प्रणाम करिते ।।ताँर पुष्प-चूड़ा पड़िल प्रभुर माथाते ॥
१४॥
जब श्री चैतन्य महाप्रभु गोपीनाथ विग्रह के चरणकमलों में प्रणाम कर रहे थे, तो गोपीनाथ के सिर का पुष्य-मुकुट महाप्रभु के मस्तक पर गिर गया।
चूड़ा पाञा महाप्रभुर आनन्दित मन ।।बहु नृत्य-गीत कैल ला भक्त-गण ॥
१५ ॥
जब अर्चाविग्रह का पुष्प-मुकुट उनके मस्तक पर आ गिरा, तो श्री चैतन्य महाप्रभु अत्यन्त प्रसन्न हुए और उन्होंने अपने भक्तों के साथ विभिन्न प्रकार से कीर्तन तथा नर्तन किया।
प्रभुर प्रभाव देखि' प्रेम-रूप-गुण ।।विस्मित हइला गोपीनाथेर दास-गण ॥
१६॥
श्री चैतन्य महाप्रभु के प्रगाढ़ प्रेम, उनके अत्युत्तम सौन्दर्य तथा उनके दिव्य गुणों को देखकर अर्चाविग्रह के सभी सेवक आश्चर्यचकित रह गये।
नाना-रूपे प्रीत्ये कैल प्रभुर सेवन ।।सेइ रात्रि ताहाँ प्रभु करिला वञ्चन ॥
१७॥
श्री चैतन्य महाप्रभु के प्रति प्रेमवश उन सेवकों ने नाना प्रकार से महाप्रभु की सेवा की और उस रात महाप्रभु गोपीनाथ के मन्दिर में रुक गये।
महाप्रसाद-क्षीर-लोभे रहिला प्रभु तथा ।। पूर्वे ईश्वर-पुरी ताँरे कहियाछेन कथा ॥
१८॥
। महाप्रभु वहाँ इसीलिए रुके थे, क्योंकि वे गोपीनाथ-विग्रह का खीरप्रसाद पाने के लिए अत्यन्त उत्सुक थे। उन्होंने अपने गुरु ईश्वर पुरी से यहाँ घटित एक कथा सुन रखी थी।
‘क्षीर-चोरा गोपीनाथ' प्रसिद्ध ताँर नाम ।। भक्त-गणे कहे प्रभु सेइ त आख्यान ॥
१९॥
यह विग्रह दूर-दूर तक क्षीरचोरा-गोपीनाथ के नाम से विख्यात था। और चैतन्य महाप्रभु ने अपने भक्तों को वह कथा सुनाई कि यह विग्रह इतना प्रसिद्ध कैसे हुआ।
पूर्वे माधव-पुरीर लागि' क्षीर कैल चुरि ।। अतएव नाम हैल' क्षीर-चोरा हरि' ॥
२०॥
पूर्वकाल में इस विग्रह ने माधवेन्द्र पुरी के लिए क्षीर का पात्र चुराया था, अतएव वे क्षीर चुराने वाले भगवान् के नाम से प्रसिद्ध हुए।
पूर्वे श्री-माधव-पुरी आइला वृन्दावन ।। भ्रमिते भ्रमिते गेला गिरि गोवर्धन ॥
२१॥
एक बार श्री माधवेन्द्र पुरी वृन्दावन गये और वहाँ घूमते-घूमते वे गोवर्धन पर्वत पहुँचे।
प्रेमे मत्त,नाहि ताँर रात्रि-दिन-ज्ञान ।। क्षणे उठे, क्षणे पड़े, नाहि स्थानास्थान ॥
२२ ।।। माधवेन्द्र पुरी भगवत्प्रेम में उन्मत्त रहते थे और उन्हें इसका ज्ञान भी नहीं रहता था कि दिन है या रात। कभी वे उठ बैठते और कभी भूमि पर गिर पड़ते। उन्हें उचित अथवा अनुचित स्थान में भेद नहीं रहता था।
शैल परिक्रमा करि' गोविन्द-कुण्डे आसि' ।। स्नान करि, वृक्ष-तले आछे सन्ध्याय वसि ॥
२३॥
गोवर्धन पर्वत की परिक्रमा करने के बाद श्री माधवेन्द्र पुरी गोविन्द कुण्ड गये और वहाँ स्नान किया। फिर संध्या विश्राम के लिए एक वृक्ष के नीचे बैठ गये।।
गोपाल-बालक एक दुग्ध-भाण्ड लञा ।। आसि' आगे धरि' किछु बलिल हासियों ॥
२४॥
जब वे वृक्ष के नीचे बैठे थे, तभी एक अज्ञात ग्वालबाल दूध का पात्र लेकर आया और माधवेन्द्र पुरी के सामने पात्र रखकर हँसते हुए उनसे इस प्रकार बोला।
पुरी, एइ दुग्ध लञा कर तुमि पान ।। मागि' केने नाहि खाओ, किबी कर ध्यान ॥
२५॥
। हे माधवेन्द्र पुरी, कृपया मेरे द्वारा लाया हुआ दूध पीजिये। आप खाने के लिए कुछ भोजन क्यों नहीं माँग लाते ? आप किस तरह का ध्यान कर रहे हैं? बालकेर सौन्दर्ये पुरीर हुइल सन्तोष ।ताहार मधुर-वाक्ये गेल भोक-शोष ॥
२६॥
उस बालक के सौन्दर्य को देखकर माधवेन्द्र पुरी अत्यधिक सन्तुष्ट हुए। उसके मीठे वचन सुनकर वे अपनी सारी भूख तथा प्यास भूल गये।
पुरी कहे,--के तुमि, काहाँ तोमार वास ।।के-मते जानिले, आमि करि उपवास ॥
२७॥
माधवेन्द्र पुरी ने कहा, तुम कौन हो? तुम कहाँ रहते हो? तुम कैसे जान पाये कि मैं उपवास कर रहा हूँ? बालक कहे,—गोप आमि, एइ ग्रामे वसि । आमार ग्रामेते केह ना रहे उपवासी ॥
२८॥
बालक ने उत्तर दिया, महाशय, मैं ग्वालबाल हूँ और इसी गाँव में रहता हूँ। मेरे गाँव में कोई भूखा नहीं रहता।
केह अन्न मागि' खाय, केह दुग्धाहार ।। अयाचक-जने आमि दिये त' आहार ॥
२९॥
। इस गाँव में कोई भी व्यक्ति दूसरे से माँगकर भोजन कर सकता है। कुछ लोग केवल दूध पीकर रहते हैं। किन्तु यदि कोई व्यक्ति किसी से भोजन नहीं माँगता, तो मैं उसको खाने की सारी वस्तुएँ देता हूँ। ।
जल निते स्त्री-गण तोमारे देखि' गेल ।स्त्री-सब दुग्ध दिया आमारे पाठाइल ॥
३०॥
पानी लेने आई हुई स्त्रियों ने आपको यहाँ देखा, तो उन्होंने यह दूध देकर मुझे आपके पास भेजा है।
गो-दोहन करिते चाहि, शीघ्र आमि ग्राब ।।आर-बार आसि आमि एइ भाण्ड लइब ॥
३१॥
। बालक ने आगे कहा, मुझे शीघ्र ही गाएँ दुहने जाना है, किन्तु मैं लौटकर यह दूध का पात्र आपसे ले जाऊँगा।
एत बलि' गेला बालक ना देखिये आर ।।माधव-पुरीर चित्ते हइल चमत्कार ॥
३२॥
यह कहकर वह बालक वहाँ से चला गया। वह बालक अचानक अन्तर्धान हो गया, तो माधवेन्द्र पुरी का मन आश्चर्यचकित हो गया।
दुग्ध पान करि' भाण्ड धुजा राखिल ।। बाट देखे, से बालक पुनः ना आइल ॥
३३॥
। दूध पीने के बाद श्री माधवेन्द्र पुरी ने पात्र को धोया और एक तरफ रख दिया। फिर वे उस बालक की राह देखते रहे, किन्तु वह बालक नहीं लौटा।
वसि' नाम लय पुरी, निद्रा नाहि हय ।। शेष-रात्रे तन्द्रा हैल,—बाह्य-वृत्ति-लय ॥
३४॥
माधवेन्द्र पुरी सो नहीं सके। वे बैठे रहे और हरे कृष्ण महामन्त्र का जप करते रहे। रात्रि समाप्त होने पर उन्हें थोड़ी झपकी आ गई और उनके सारे बाह्य कार्य रुक गये।
स्वप्ने देखे, सेइ बालक सम्मुखे आसिजा ।एक कुल्ले ला गेल हातेते धरिला ॥
३५॥
। माधवेन्द्र पुरी ने स्वप्न में उसी बालक को देखा। वह बालक उनके सामने आया और उनका हाथ पकड़कर उन्हें जंगल में एक कुंज तक ले गया।
कुञ्ज देखा कहे,—आमि एइ कुल्ले रइ ।।शीत-वृष्टि-वाताग्निते महा-दुःख पाइ ॥
३६॥
बालक ने माधवेन्द्र पुरी को वह कुंज दिखाया और कहा, “मैं इसी कुंज में रहता हूँ, अतएव मुझे कड़ाके की ठण्ड, बरसती वर्षा, वायु तथा झुलसती गर्मी के कारण अत्यन्त कष्ट हो रहा है।
ग्रामेर लोक आनि' आमा काढ़' कुञ्ज हैते । पर्वत-उपरि लञा राख भाल-मते ॥
३७॥
कृपा करके गाँव के लोगों को लाकर मुझे इस झाड़ी से निकालिये और उनसे कहकर मुझे पर्वत की चोटी पर भली प्रकार स्थापित कर दीजिये।
एक मठ करि' ताहाँ करह स्थापने ।। बहु शीतल जले कर श्री-अङ्ग मार्जन ॥
३८ ॥
बालक ने आगे कहा, “कृपया उस पर्वत की चोटी पर एक मन्दिर बनवाइये और मुझे उस मन्दिर में स्थापित कर दीजिये। इसके बाद मुझे पर्याप्त शीतल जल से स्नान कराईये, जिससे मेरा शरीर स्वच्छ हो जाये।
बह-दिन तोमार पथ करि निरीक्षण । कबे आसि' माधव आमा करिबे सेवन ॥
३९॥
मैं बहुत दिनों से तुम्हारी बाट देखता रहा हूँ और सोचता रहा हूँ कि, ‘कब माधवेन्द्र पुरी यहाँ आकर मेरी सेवा करेगा?' तोमार प्रेम-वशे करि' सेवा अङ्गीकार ।।दर्शन दिया निस्तारिब सकल संसार ॥
४०॥
मैंने तुम्हारे प्रेमभाव के कारण ही तुम्हारी सेवा स्वीकार की है। इस प्रकार मैं प्रकट होऊँगा और मेरा दर्शन करने से सारे पतित लोगों का उद्धार हो जायेगा।
'श्री-गोपाल' नाम मोर,—गोवर्धन-धारी ।वज्रर स्थापित, आमि इहाँ अधिकारी ॥
४१॥
मेरा नाम गोपाल है। मैं गोवर्धन पर्वत को धारण करने वाला हूँ। मेरी स्थापना वज्र द्वारा की गई थी और मैं यहाँ का अधिकारी हूँ।
शैल-उपरि हैते आमा कुल्ले लुकाजा ।। म्लेच्छ-भये सेवक मोर गेल पलाजा ॥
४२॥
यह कहकर बालक अन्तर्धान हो गया। तब माधवेन्द्र पुरी जाग गये और अपने स्वप्न के बारे में विचार करने लगे।
सेइ हैते रहि आमि एड कुञ्ज-स्थाने ।। भाल हैल आइला आमा काढ़ सावधाने ॥
४३॥
पुजारी के जाने के बाद से मैं इसी कुंज में रह रहा हूँ। यह अच्छा हुआ कि तुम आ गये। अब सावधानी से मुझे बाहर निकाल लो।
एत बलि' से-बालक अन्तर्धान कैल ।। जागिया माधव-पुरी विचार करिल ॥
४४॥
जब मुसलमानों का आक्रमण हुआ, तो मेरी सेवा करने वाले पुजारी ने मुझे जंगल कि इस कुंज में छिपा दिया। फिर वह आक्रमण के भय से भाग खड़ा हुआ।
श्री-कृष्णके देखिनु मुजि नारिनु चिनिते ।। एत बलि' प्रेमावेशे पड़िला भूमिते ॥
४५ ॥
। माधवेन्द्र पुरी पश्चात्ताप करने लगे, मैंने साक्षात् भगवान् कृष्ण को देखे, किन्तु मैं उन्हें पहचान न सका! यह कहकर वे प्रेमावेश में भूमि पर गिर पड़े।
क्षणेक रोदन करि, मन कैल धीर ।। आज्ञा-पालन लागि' हइला सुस्थिर ॥
४६॥
माधवेन्द्र पुरी कुछ समय तक रोते रहे, किन्तु उसके बाद उन्होंने गोपाल की आज्ञा का पालन करने पर अपना चित्त स्थिर किया। इस तरह वे शान्त हुए।
प्रातः-स्नान करि' पुरी ग्राम-मध्ये गेला ।।सब लोक एकत्र करि' कहिते लागिला ॥
४७॥
प्रात:काल स्नान करने के बाद माधवेन्द्र पुरी गाँव में गये और सारे लोगों को एकत्र किया। फिर वे इस प्रकार कहने लगे।
ग्रामेर ईश्वर तोमार---गोवर्धन-धारी ।।कुल्ले आछे, चल, ताँरै बाहिर ग्रे करि ॥
४८॥
। इस गाँव के स्वामी, गोवर्धनधारी, कुंज में पड़े हुए हैं। आइये, चलकर उन्हें उस स्थान से बाहर निकाल लें।
अत्यन्त निविड़ कुञ्ज,–नारि प्रवेशिते ।कुठारि कोदालि लह द्वार करिते ॥
४९॥
झाड़ियाँ इतनी घनी हैं कि हमें जंगल में प्रवेश नहीं कर पायेंगे। अतएव रास्ता बनाने के लिए कुल्हाड़े तथा कुदाल ले लो।
शुनि' लोक ताँर सङ्गे चलिला हरिषे ।कुञ्ज काटि' द्वार करि' करिला प्रवेशे ॥
५०॥
। यह सुनकर सारे लोग अत्यन्त हर्षित हो माधवेन्द्र पुरी के साथ चल पड़े। उनके निर्देशानुसार उन्होंने झाड़ियाँ काटकर रास्ता बनाया और जंगल में प्रवेश किया।
ठाकुर देखिल माटी-तृणे आच्छादित ।।देखि' सब लोक हैल आनन्दे विस्मित ॥
५१॥
जब उन्होंने अर्चाविग्रह को धूल तथा घास से ढका देखा, तो सब आश्चर्य तथा हर्ष से भर गये।
आवरण दूर करि' करिल विदिते ।महा-भारी ठाकुर केह नारे चालाइते ॥
५२॥
। जब अर्चाविग्रह के शरीर को साफ कर दिया गया, तो उनमें से कुछ लोगों ने कहा, यह विग्रह बहुत भारी है। इसे अकेला एक व्यक्ति हिला नहीं सकता।
महा-महा-बलिष्ठ लोक एकत्र करि ।पर्वत-उपरि गेल पुरी ठाकुर लञा ॥
५३॥
चूंकि विग्रह बहुत भारी था, अतएव कुछ बलवान लोग उसे पर्वत की चोटी पर ले जाने के लिए एकत्र हुए। माधवेन्द्र पुरी भी वहाँ गये।
पाथरेर सिंहासने ठाकुर वसाइल ।बड़ एक पाथर पृष्ठे अवलम्ब दिल ॥
५४॥
। एक बड़े पत्थर को सिंहासन बनाया गया और उस पर अर्चाविग्रह को प्रतिष्ठित कर दिया गया। एक दूसरा बड़ा पत्थर विग्रह के सहारे के लिए पीछे लगा दिया गया।
ग्रामेर ब्राह्मण सब नव घट लञा ।।गोविन्द-कुण्डेर जल आनिल छानिळा ॥
५५॥
गाँव के सारे ब्राह्मण पुरोहित जल के नौ घड़े लेकर एकत्र हुए और गोविन्द-कुण्ड से पानी लाया गया तथा उसे छाना गया।
नव शत-घट जल कैल उपनीत ।।नाना वाद्य-भेरी बाजे, स्त्री-गण गाय गीत ॥
५६॥
अर्चाविग्रह की प्रतिष्ठा करते समय गोविन्द-कुण्ड से ९०० घड़े जल लाया गया। बिगुल तथा ढोल बजने लगे और स्त्रियाँ गीत गाने लगीं।।
केह गाय, केह नाचे, महोत्सव हैल ।। दधि, दुग्ध, घृत आइल ग्रामे ग्रत छिल ॥
५७॥
। प्रतिष्ठा-उत्सव के समय कुछ लोग गा रहे थे तो कुछ नाच रहे थे। गाँव का सारा दूध, दही तथा घी उत्सव के लिए लाया गया।
भोग-सामग्री आइल सन्देशादि ग्रत ।।नाना उपहार, ताहा कहिते पारि कत ॥
५८॥
वहाँ पर नाना प्रकार के व्यंजन तथा मिठाइयाँ और अन्य उपहार लाये गये। मैं उन सबका वर्णन कर पाने में असमर्थ हूँ।
तुलसी आदि, पुष्प, वस्त्र आइल अनेक ।आपने माधव-पुरी कैल अभिषेक ॥
५९॥
गाँव वाले प्रचुर मात्रा में तुलसीदल, फूल तथा विविध प्रकार के । वस्त्र ले आये। तब श्री माधवेन्द्र पुरी ने स्वयं अभिषेक (स्नान कराने का उत्सव ) प्रारम्भ किया।
अमङ्गला दूर करि' कराइल स्नान ।। बहु तैल दिया कैल श्री-अङ्ग चिक्कण ॥
६०॥
जब मंत्रोच्चारण से सारा अमंगल दूर हो गया, तब अर्चाविग्रह का अभिषेक प्रारम्भ हुआ। सर्वप्रथम विग्रह पर प्रचुर तेल मला गया, जिससे उनका शरीर चिकना हो उठा।
पञ्च-गव्य, पञ्चामृते स्नान करा ।। महा-स्नान कराइल शत घट दिञा ॥
६१॥
प्रथम स्नान के बाद पंचगव्य से तथा फिर पंचामृत से स्नान कराया गया। फिर एक सौ घड़ों में लाये गये घी तथा जल से महास्नान कराया गया।
पुन: तैल दिया कैल श्री-अङ्ग चिक्कण ।।शङ्ख-गन्धोदके कैल स्नान समाधान ॥
६२॥
महास्नान के बाद पुनः विग्रह को सुगन्धित तेल से मलकर उनके शरीर को चिकना किया गया। तत्पश्चात् एक शंख में सुगन्धित जल भरकर अन्तिम अभिषेक सम्पन्न किया गया।
श्री-अङ्ग मार्जन करि' वस्त्र पराइल ।चन्दन, तुलसी, पुष्पमाला अङ्गे दिल ॥
६३॥
विग्रह का शरीर स्वच्छ करने के बाद उन्हें सुन्दर नये वस्त्र पहनाये गये। फिर विग्रह पर चन्दन, तुलसी-माला तथा अन्य सुगन्धित फूलों की मालाएँ पहनाई गईं।
धूप, दीप, करि' नाना भोग लागाइल ।।दधि-दुग्ध-सन्देशादि ग्रत किछु आइल ॥
६४॥
अभिषेक सम्पन्न हो जाने के बाद अर्चाविग्रह को धूप तथा दीप अर्पित किये गये और विभिन्न प्रकार का भोग अर्पित किया गया। भोग में दही, दूध तथा अनेक मिठाइयाँ सम्मिलित थीं।
सुवासित जल नव-पात्रे समर्पिल ।। आचमन दिया से ताम्बूल निवेदिल ॥
६५॥
सर्वप्रथम अर्चाविग्रह को तरह-तरह का भोग अर्पित किया गया, फिर नये पात्रों में सुवासित पीने का जल और तब आचमन के लिए जल दिया गया। अन्त में मसालेदार पान का भोग लगाया गया।
आरात्रिक करि' कैल बहुत स्तवन ।। दण्डवत्करि' कैल आत्म-समर्पण ॥
६६॥
तांबूल तथा पान देने के बाद भोग आरती सम्पन्न की गई। अन्त में हर एक ने विविध प्रार्थनाएँ कीं तथा विग्रह को पूर्ण आत्मसमर्पण के भाव में दण्डवत् प्रणाम किया।
ग्रामेर व्रतेक तण्डुल, दालि गोधूम-चूर्ण । सकल आनिया दिल पर्वत हैल पूर्ण ॥
६७॥
ज्योंही गाँववालों को पता चला कि अर्चाविग्रह की प्रतिष्ठा होने जा रही है, वे अपने यहाँ से सारा चावल, दाल तथा गेहूँ का आटा ले आये। यह सामग्री इतनी मात्रा में थी कि पर्वत की चोटी उससे पूरी तरह भर गई।
कुम्भकार घरे छिल ने मृद्भाजन ।। सब आनाइल प्राते, चड़िल रन्धन ॥
६८॥
जब गाँव वाले चावल, दाल तथा आटा ले आये, तो गाँव के कुम्हार भोजन पकाने के सभी प्रकार के बर्तन ले आये और प्रात:काल से भोजन पकाना प्रारम्भ हुआ।
दश-विप्र अन्न रान्धि' करे एक स्तूप ।। जना-पाँच रान्धे व्यञ्जनादि नाना सूप ॥
६९॥
दस ब्राह्मणों ने अन्न पकाया और पाँच ब्राह्मणों ने सूखी तथा रसदार सब्जियाँ पकाईं।"
वन्य शाक-फल-मूले विविध व्यञ्जन ।। केह बड़ा-बड़ि-कड़ि करे विप्र-गण ॥
७० ॥
सारी तरकारियाँ जंगल से एकत्र किये गये शाक, जड़ों तथा फलों से बनाई गईं। किसी ने दाल पीसकर बड़े तथा बड़ियाँ बनाईं। इस तरह ब्राह्मणों ने सभी तरह के व्यंजन बनाए।
जना पाँच-सात रुटि करे राशि-राशि । अन्न-व्यञ्जन सब रहे घृते भासि ॥
७१ ॥
पके चावलों का पलाश के पत्तों में ढेर लगा दिया गया। ये पत्ते भूमि पर बिछे नये वस्त्र के ऊपर फैले थे।
नव-वस्त्र पाति' ताहे पलाशेर पात ।। रान्धि' रान्धि' तार उपर राशि कैल भात ॥
७२॥
पके चावल के ढेर के पास ही रोटियों का ढेर था और सारी तरकारियों तथा रसदार व्यंजनों को विभिन्न पात्रों में भरकर उनके चारों ओर रख दिया गया था।
तार पाशे रुटि-शशिर पर्वत हइल ।। सूप-आदि-व्यञ्जन-भाण्ड चौदिके धरिल ।। ७३ ॥
पाँच-सात व्यक्तियों ने बहुत सी रोटियाँ बनाईं और उन्हें पर्याप्त घी से चुपड़ दिया। सारी सब्जियाँ, दाल तथा भात भी घी से सिक्त थे।
तार पाशे दधि, दुग्ध, माठा, शिखरिणी । पायस, मथनी, सर पाशे धरि आनि' ॥
७४॥
तरकारियों के पास दही, दूध, मट्ठा, शिखरिणी, खीर, मक्खन तथा दही की मलाई भरे पात्र रख दिये गये।
ग्रद्यपि गोपाल सब अन्न-व्यञ्जन खाइल । ताँर हस्त-स्पर्शे पुनः तेमनि हइल ॥
७७॥
। यद्यपि श्री गोपाल ने भोग लगाई गई सारी सामग्री खा ली थी, फिर भी उनके दिव्य हाथ के स्पर्श से हर वस्तु पूर्ववत् बनी रही।
हेन-मते अन्न-कूट करिल साजने । पुरी-गोसाजि गोपालेरे कैल समर्पण ॥
७५ ॥
इस प्रकार अन्नकूट उत्सव मनाया गया और श्री माधवेन्द्र पुरी गोस्वामी ने स्वयं गोपाल को हर वस्तु का भोग लगाया।
अनेक घट भरि' दिल सुवासित जल ।। बहु-दिनेर क्षुधाय गोपाल खाइल सकल ॥
७६ ॥
पीने के लिए अनेक घड़ों में सुगंधित जल भरा गया और भगवान् श्री गोपाल ने, जो इतने दिनों से भूखे थे, अर्पित की गई प्रत्येक वस्तु खाई।
इहा अनुभव कैल माधव गोसाजि ।।ताँर ठाजि गोपालेर लुकान किछु नाइ ॥
७८ ॥
माधवेन्द्र पुरी ने दिव्य अनुभव से जान लिया कि किस तरह गोपाल द्वारा सब कुछ खा लिया गया और फिर भी भोजन ज्यों का त्यों बना रहा। भगवान् के भक्तों से कुछ छिपा नहीं रहता।।
एक-दिनेर उद्योगे ऐछे महोत्सव कैल ।। गोपाल-प्रभावे हय, अन्ये ना जानिल ॥
७९॥
यह अद्भुत महोत्सव तथा श्री गोपालजी की प्रतिष्ठा, दोनों की व्यवस्था एक ही दिन में हो गई थी। निस्सन्देह, यह सब गोपाल की शक्ति से ही सम्भव हो सका। इसे भक्तों के अतिरिक्त कोई दूसरा नहीं समझ सकता।
आचमन दिया दिल विड़क-सञ्चय ।। आरति करिल लोके, करे जय जय ॥
८०॥
श्री माधवेन्द्र पुरी ने गोपाल को आचमन के लिए जल दिया और चबाने के लिए पान दिये। उसके बाद जब आरती की गई, तो सारे लोगों ने गोपाल की जय जयकार की।
शय्या कराइल, नूतन खाटे आनाञी ।। नव वस्त्र आनि' तार उपरे पातिया ॥
८१ ॥
भगवान् के विश्राम का प्रबन्ध करने के उद्देश्य से श्रील माधवेन्द्र पुरी एक नई चारपाई ले आये और उसके ऊपर एक नई चादर बिछाकर शय्या प्रस्तुत कर दी गयी।
तृण-टाटि दिया चारि-दिक् आवरिल । उपरेते एक टाटि दिया आच्छादिल ॥
८२॥
चारपाई को चारों ओर से चटाई से ढककर एक अस्थायी मन्दिर बना दिया गया। इस तरह एक शय्या थी और उसे ढकने के लिए चटाईयाँ थीं।
पुरी-गोसाजि आज्ञा दिल सकल ब्राह्मणे ।आ-बाल-वृद्ध ग्रामेर लोक कराह भोजने ॥
८३॥
भगवान् को शयन कराने के उपरान्त माधवेन्द्र पुरी ने प्रसाद बनाने वाले सारे ब्राह्मणों को एकत्र किया और उनसे कहा, अब बच्चे से लेकर वृद्ध तक हर एक को भरपेट भोजन कराइये।
सबे वसि' क्रमे क्रमे भोजन करिल ।।ब्राह्मण-ब्राह्मणी-गणे आगे खाओयाइल ॥
८४॥
वहाँ पर एकत्र सारे लोग प्रसाद ग्रहण करने के लिए बैठ गये और एक-एक करके सबने प्रसाद ग्रहण किया। सबसे पहले सभी ब्राह्मणों तथा उनकी पत्नियों को भोजन कराया गया।
अन्य ग्रामेर लोक व्रत देखिते आइल ।।गोपाल देखिया सब प्रसाद खाइल ॥
८५॥
गोवर्धन गाँव के लोगों ने ही नहीं अपितु अन्य गाँवों से आये हुए लोगों ने भी प्रसाद ग्रहण किया। उन्होंने गोपाल विग्रह का दर्शन भी किया और उन्हें प्रसाद भी मिला।
देखिया पुरीर प्रभाव लोके चमत्कार ।।पूर्व अन्नकूट ग्रेन हैल साक्षात्कार ॥
८६॥
माधवेन्द्र पुरी का प्रभाव देखकर वहाँ एकत्र सारे लोग आश्चर्यचकित हो गये। उन्होंने देखा कि कृष्ण के समय जो अन्नकूट उत्सव मनाया गया था, वही अब श्री माधवेन्द्र पुरी की कृपा से पुनः मनाया जा रहा था।
सकल ब्राह्मणे पुरी वैष्णव करिल ।।सेइ सेइ सेवा-मध्ये सबा नियोजिल ॥
८७॥
इस अवसर पर उपस्थित सारे ब्राह्मणों को श्रील माधवेन्द्र पुरी ने वैष्णव सम्प्रदाय में दीक्षा दी और उन्हें विभिन्न सेवा-कार्यों में लगा दिया।
पुनः दिन-शेषे प्रभुर कराइल उत्थान ।।किछु भोग लागाइल कराइल जल-पान ॥
८८ ॥
विश्राम के बाद विग्रह को संध्या-समय जगाना चाहिए और तुरन्त ही उन्हें कुछ भोजन तथा जल का भोग लगाना चाहिए।
गोपाल प्रकट हैल,-देशे शब्द हैल । आश-पाश ग्रामेर लोक देखिते आइल ॥
८९ ।। । जब देश-भर में यह प्रचार हो गया कि भगवान् गोपाल गोवर्धन पर्वत के ऊपर प्रकट हो चुके हैं, तो आसपास के सभी गाँव वाले विग्रह का दर्शन करने आये।
एकेक दिन एकेक ग्रामे लइल मागिना । अन्न-कूट करे सबे हरषित हा ॥
९०॥
हर एक गाँव वालों ने एक-एक करके माधवेन्द्र पुरी से प्रार्थना की। कि अन्नकूट उत्सव मनाने के लिए उन्हें एक दिन नियत कर दिया जाये। इस तरह कुछ समय तक दिन-प्रतिदिन अन्नकूट उत्सव मनाया जाता रहा।
रात्रि-काले ठाकुरेरे कराड्या शयन ।। पुरी-गोसाञि कैल किछु गव्य भोजन ॥
९१ ।। श्री माधवेन्द्र पुरी ने दिन-भर कुछ नहीं खाया, किन्तु रात में विग्रह को शयन कराने के बाद उन्होंने दूध से बना प्रसाद खाया।
प्रातः-काले पुनः तैछे करिल सेवन ।। अन्न ला एक-ग्रामेर आइल लोक-गण ॥
९२॥
। पुनः अगली सुबह अर्चाविग्रह की सेवा प्रारम्भ हुई और एक गाँव के लोग विविध प्रकार के खाद्य-द्रव्य लेकर आ गये।
अन्न, घृत, दधि, दुग्ध,—ग्रामे ग्रत छिल ।। गोपालेर आगे लोक आनियो धरिल ॥
१३॥
गाँव के सारे निवासी गाँव-भर का सारा अन्न, घी, दही तथा दूध गोपाल-अर्चाविग्रह को भोग लगाने के लिए लाये।
पूर्व-दिन-प्राय विप्र करिल रन्धन । तैछे अन्न-कूट गोपाल करिल भोजन ॥
९४॥
दूसरे दिन पहले की तरह अन्नकूट उत्सव मनाया गया। सारे ब्राह्मणों ने भोजन पकाया और गोपाल ने उसे ग्रहण किया।
व्रज-वासी लोकेर कृष्णे सहज पिरीति ।। गोपालेर सहज-प्रीति व्रज-वासि-प्रति ॥
९५ ॥
कृष्णभावनामृत सम्पन्न करने के लिए आदर्श स्थान व्रजभूमि या वृन्दावन है, जहाँ लोग स्वभावतः कृष्ण से प्रेम करते हैं और कृष्ण भी उनसे प्रेम करते हैं।
महा-प्रसाद खाइल आसिया सब लोक ।। गोपाल देखिया सबार खण्डे दुःख-शोक ॥
९६॥
विभिन्न गाँवों से अनेक लोग गोपाल-विग्रह का दर्शन करने आये और उन सबने पेट भरकर महाप्रसाद ग्रहण किया। जब उन लोगों ने गोपाल के सर्वोत्कृष्ट रूप को देखा, तो उनका सारा शोक तथा दुःख नष्ट हो गया।
आश-पाश व्रज-भूमेर व्रत ग्राम सब ।। एक एक दिन सबे करे महोत्सव ॥
९७॥
व्रजभूमि ( वृन्दावन ) के आसपास के सारे गाँव के लोग गोपाल के प्राकट्य की जानकारी मिलने पर इनका दर्शन करने आये। उन सबने दिन प्रतिदिन अन्नकूट उत्सव मनाया।
गोपाल-प्रकट शुनि' नाना देश हैते ।। नाना द्रव्य लञा लोक लागिल आसिते ॥
९८॥
इस तरह न केवल पड़ोसी गाँव अपितु अन्य प्रान्त भी गोपाल के प्रादुर्भाव के विषय में जान गये। फलतः सभी जगहों से लोग नाना प्रकार के उपहार लेकर आये।
मथुरार लोक सब बड़ बड़ धनी ।।भक्ति करि' नाना द्रव्य भेट देय आनि' ॥
९९॥
मथुरा के बड़े-बड़े धनी लोग भी नाना प्रकार के उपहार लेकर आये और उन्होंने भक्तिपूर्वक उन्हें अर्चाविग्रह को अर्पित किया।
स्वर्ण, रौप्य, वस्त्र, गन्ध, भक्ष्य-उपहार ।।असङ्ख्य आइसे, नित्य बाड़िल भाण्डार ॥
१०० ॥
इस तरह सोना, चाँदी, वस्त्र, सुगन्धित द्रव्य तथा खाद्य पदार्थों के असंख्य उपहार आये और गोपाल का भण्डार प्रतिदिन बढ़ता गया।
एक महा-धनी क्षत्रिय कराइल मन्दिर ।।केह पाक-भाण्डार कैल, केह त' प्राचीर ॥
१०१॥
। धनी क्षत्रिय राज पुरुष ने मन्दिर बनवा दिया, किसी ने भोजन पकाने के बर्तन दे दिये और किसी ने चार दीवारियाँ बनवा दीं।
एक एक व्रज-वासी एक एक गाभी दिल ।सहस्र सहस्र गाभी गोपालेर हैल ॥
१०२॥
व्रजभूमि में रहने वाले हर परिवार ने एक एक गाय दी। इस तरह हजारों गाएँ गोपाल की सम्पत्ति बन गईं।
गौड़ हइते आइला दुइ वैरागी ब्राह्मण ।पुरी-गोसाजि राखिल तारे करिया ग्रतन ॥
१०३॥
अन्त में बंगाल से दो संन्यासी ब्राह्मण वहाँ आये। माधवेन्द्र पुरी को वे बहुत अच्छे लगे और उन्हें वृन्दावन में रखकर सभी सुविधाएँ प्रदान कीं।
सेइ दुइ शिष्य करि' सेवा समर्पिल । ।राज-सेवा हय,—पुरीर आनन्द बाड़िल ॥
१०४॥
। तब माधवेन्द्र पुरी ने उन दोनों को दीक्षा दी और भगवान् की दैनिक सेवा का कार्यभार सौंप दिया। यह सेवा लगातार होती रही और अर्चाविग्रह की पूजा अत्यन्त सुन्दर ढंग से होने लगी थी। इससे माधवेन्द्र पुरी अति आनन्दित हुए।
एइ-मत वत्सर दुइ करिल सेवन ।। एक-दिन पुरी-गोसाजि देखिल स्वपन ॥
१०५॥
इस प्रकार दो वर्षों तक मन्दिर में अर्चाविग्रह की पूजा अत्यन्त ऐश्वर्य के साथ चलती रही। तब एक दिन माधवेन्द्र पुरी ने एक सपना देखा।
गोपाल कहे, पुरी आमार ताप नाहि ग्राय ।। मलयज-चन्दन लेप', तबे से जुड़ाय ॥
१०६ ।। सपने में माधवेन्द्र पुरी ने देखा कि गोपाल कह रहे हैं, “मेरे शरीर का ताप अभी भी कम नहीं हुआ है। तुम मलय-प्रदेश से चन्दन लाओ और मुझे शीतल बनाने के लिए मेरे शरीर पर इसका लेप करो।।
मलयज आन, यात्रा नीलाचल हैते ।।अन्ये हैते नहे, तुमि चलह त्वरिते ॥
१०७॥
तुम जगन्नाथ पुरी से चन्दन लाओ। कृपया तुरन्त जाओ। चूँकि यह काम कोई और नहीं कर सकता, इसलिए तुम ही करो।
स्वप्न देखि' पुरी-गोसाजिर हैल प्रेमावेश ।।प्रभु-आज्ञा पालिबारे गेला पूर्व-देश ॥
१०८॥
इस स्वप्न को देखकर माधवेन्द्र पुरी गोस्वामी भगवत्प्रेम के भाव के कारण अत्यन्त प्रसन्न हुए और भगवान् के आदेश का पालन करने के उद्देश्य से वे बंगाल जाने के लिए पूर्व की ओर चल पड़े।
सेवार निर्बन्ध---लोक करिल स्थापन ।आज्ञा मागि' गौड़-देशे करिल गमन ॥
१०९॥
। चलने के पूर्व माधवेन्द्र पुरी ने नियमित सेवा-पूजा के लिए सारी व्यवस्था कर दी और उन्होंने विभिन्न लोगों को विविध कार्यों में लगा । दिया। फिर गोपाल की आज्ञा लेकर करके वे बंगाल के लिए चल पड़े।
शान्तिपुर आइला अद्वैताचार घरे ।पुरीर प्रेम देखि' आचार्य आनन्द अन्तरे ॥
११०॥
। जब माधवेन्द्र पुरी शान्तिपुर में अद्वैत आचार्य के घर पहुँचे, तो माधवेन्द्र पुरी में ऊर्मिपूर्ण भगवत्प्रेम को देखकर आचार्य अत्यन्त हर्षित हुए।
ताँर ठाजि मन्त्र लैल ग्रतन करिजा ।चलिला दक्षिणे पुरी ताँरै दीक्षा दिना ॥
१११॥
। अद्वैत आचार्य ने माधवेन्द्र पुरी से दीक्षा देने की प्रार्थना की। उन्हें दीक्षा देने के बाद माधवेन्द्र पुरी दक्षिण भारत के लिए चल पड़े।
रेमुणाते कैल गोपीनाथ दरशन ।।ताँर रूप देखिञा हैल विह्वल-मन ॥
११२॥
दक्षिण भारत जाते समय माधवेन्द्र पुरी रेमुणा गये, जहाँ गोपीनाथ स्थित हैं। विग्रह की सुन्दरता देखकर माधवेन्द्र पुरी भावविभोर हो गये।
नृत्य-गीत करि' जग-मोहने वसिला ।।‘क्या क्या भोग लागे?' ब्राह्मणे पुछिला ॥
११३॥
। मन्दिर के बरामदे में, जहाँ से लोग सामान्यतया अर्चाविग्रह का दर्शन करते थे, माधवेन्द्र पुरी ने कीर्तन और नृत्य किया। फिर वे वहाँ बैठ गये और उन्होंने एक ब्राह्मण से पूछा कि अर्चाविग्रह को किस किस वस्तु का भोग लगाया जाता है? सेवार सौष्ठव देखि' आनन्दित मने ।।उत्तम भोग लागे—एथा बुझि अनुमाने ॥
११४ प्रबन्ध की उत्कृष्टता से माधवेन्द्र पुरी ने अनुमान लगाया कि वहाँ अवश्य उत्तम भोजन ही अर्पित किया जाता होगा।
प्रैछे इहा भोग लागे, सकल-इ पुछिब ।।तैछे भियाने भोग गोपाले लागाइब ॥
११५॥
। माधवेन्द्र पुरी ने सोचा, मैं पुजारी से पूढुंगा कि गोपीनाथ को किस प्रकार का भोजन अर्पित किया जाता है, जिससे हम भी अपने रसोई-घर में उनकी व्यवस्था करके वैसा ही भोजन श्री गोपाल को अर्पित कर सकें।
एइ लागि' पुछिलेन ब्राह्मणेर स्थाने ।।ब्राह्मण कहिल सब भोग-विवरणे ॥
११६॥
जब ब्राह्मण पुजारी से इस विषय में पूछा गया, तब उसने विस्तारपूर्वक बतलाया कि गोपीनाथ के अर्चाविग्रह को कौन-कौन से भोग अर्पित किये जाते हैं।
सन्ध्याय भोग लागे क्षीर—'अमृत-केलि' नाम । द्वादश मृत्पात्रे भरि' अमृत-समान ॥
११७॥
ब्राह्मण पुजारी ने कहा, संध्या-समय अर्चाविग्रह को मिट्टी के बारह पात्रों में खीर का भोग लगाया जाता है। चूंकि इसका स्वाद अमृत जैसा होता है, अतएव यह अमृत-केलि कहलाता है।
‘गोपीनाथेर क्षीर' बलि' प्रसिद्ध नाम ग्रार ।। पृथिवीते ऐछे भोग काहाँ नाहि आर ॥
११८॥
यह खीर सारे जगत् में गोपीनाथ-क्षीर के नाम से विख्यात है। ऐसी खीर दुनिया में अन्यत्र कहीं भी अर्पित नहीं की जाती है।
हेन-काले सेइ भोग ठाकुरे लागिल ।। शुनि' पुरी-गोसाञि किछु मने विचारिल ॥
११९॥
जब माधवेन्द्र पुरी ब्राह्मण पुजारी से बातें कर रहे थे, तब खीर का भोग अर्चाविग्रह के समक्ष लगाया गया था। यह सुनकर माधवेन्द्र पुरी ने इस प्रकार विचार किया।
अयाचित क्षीर प्रसाद अल्प यदि पाइ ।स्वाद जानि' तैछे क्षीर गोपाले लागाइ ॥
१२०॥
यदि मुझे बिना माँगे थोड़ी-सी खीर मिल जाय, तो मैं उसे चख लें और ऐसी ही खीर अपने भगवान् गोपाल के लिए तैयार करूं। ।
एइ इच्छाये लज्जा पाजा विष्णु-स्मरण कैल ।।हेन-काले भोग सरि' आरति बाजिल ॥
१२१॥
। जब माधवेन्द्र पुरी को खीर चखने की इच्छा हुई तो उन्हें बहुत लज्जा आ गई, अतएव वे तुरन्त ही भगवान् विष्णु का चिन्तन करने लगे। जब वे इस प्रकार भगवान् विष्णु का चिन्तन कर रहे थे, तब भोग का अर्पण समाप्त हो गया और आरती शुरू हो गई।
आरति देखिया पुरी कैल नमस्कार ।।बाहिरे आइला, कारे किछु ना कहिल आर ॥
१२२॥
आरती समाप्त होने के बाद माधवेन्द्र पुरी ने अर्चाविग्रह को नमस्कार किया और फिर मन्दिर से बाहर चले गये। उन्होंने किसी से और कुछ भी नहीं कहा।
अयाचित-वृत्ति पुरी–विरक्त, उदास ।।अयाचित पाइले खा'न, नहे उपवास ॥
१२३॥
श्री माधवेन्द्र पुरी भिक्षा माँगने से बचते थे। वे पूर्णतया विरक्त और भौतिक वस्तुओं के प्रति उदासीन थे। बिना मांगे यदि कोई खाने के लिए कुछ दे देता तो खा लेते, अन्यथा वे उपवास करते थे।
प्रेमामृते तृप्त, क्षुधा-तृष्णा नाहि बाधे।।क्षीर-इच्छा हैल, ताहे माने अपराधे ॥
१२४॥
माधवेन्द्र पुरी जैसी परमहंस सदैव भगवान् की प्रेमाभक्ति से सन्तुष्ट रहता है। भौतिक भूख-प्यास उनके कार्यकलापों में बाधक नहीं बन सकते। जब उन्हें अर्चाविग्रह को अर्पित थोड़ी खीर खाने की इच्छा हुई, तो उन्होंने सोचा कि उनसे अपराध हुआ है, क्योंकि वे अर्चाविग्रह को भोग लगाई जा रही वस्तु को खाना चाह रहे थे।
ग्रामेर शून्य-हाटे वसि' करेन कीर्तन ।एथा पूजारी कराइल ठाकुरे शयन ॥
१२५ ॥
माधवेन्द्र पुरी मन्दिर से बाहर चले गये और गाँव के खाली बाजार में बैठ गये। वे वहाँ बैठकर कीर्तन करने लगे। इसी बीच मन्दिर के पुजारी ने अर्चाविग्रह को शयन करा दिया।
निज कृत्य करि' पूजारी करिल शयन ।स्वपने ठाकुर आसि' बलिला वचन ॥
१२६॥
पुजारी अपना दैनिक कार्य समाप्त करके आराम करने लगा। सपने में उसने देखा कि गोपीनाथ अर्चाविग्रह आकर उससे बातें कर रहे हैं। अर्चाविग्रह इस प्रकार बोले।
उठह, पूजारी, कर द्वार विमोचन । क्षीर एक राखियाछि सन्यासि-कारण ॥
१२७॥
हे पूजारी, कृपया उठो और मन्दिर का द्वार खोलो। मैंने खीर का एक पात्र संन्यासी माधवेन्द्र पुरी के लिए रख लिया है।
धड़ार अञ्चले ढाका एक क्षीर हय ।। तोमरा ना जानिला ताहा आमार मायाय ॥
१२८॥
यह खीर का पात्र मेरे कपड़े के पर्दे के पीछे है। तुम मेरी माया के कारण उस पात्र को नहीं देख पाये।
माधव-पुरी सन्यासी आछे हाटेते वसि ।। ताहाके त' एइ क्षीर शीघ्र देह लञा ॥
१२९॥
माधवेन्द्र पुरी नामक एक संन्यासी निर्जन बाजार में बैठा है। तुम खीर के इस पात्र को मेरे पीछे से उठा लो और जाकर उसे दे दो।
स्वप्न देखि' पूजारी उठि' करिला विचार ।। स्नान करि' कपाट खुलि, मुक्त कैल द्वार ॥
१३०॥
स्वप्न पूरा होने पर पुजारी तुरन्त शय्या से उठ खड़ा हुआ और उसने अर्चाविग्रह के कक्ष में प्रवेश करने के पूर्व स्नान करना उचित समझा। फिर उसने मन्दिर का द्वार खोला।।
धड़ार आँचल-तले पाइल सेइ क्षीर ।। स्थान लेपि' क्षीर लञा हइल बाहिर ॥
१३१॥
। अर्चाविग्रह के निर्देशानुसार पुजारी ने खीर का पात्र कपड़े के पर्दे के पीछे पाया। उसने वह पात्र हटाया और उस स्थान को साफ किया जहाँ वह रखा था। इसके बाद वह मन्दिर से बाहर चला गया।
द्वार दिया ग्रामे गेला सेइ क्षीर लञा ।। हाटे हाटे बुले माधव-पुरीके चाहिजा ॥
१३२॥
वह मन्दिर का द्वार बन्द करके खीर का पात्र लेकर गाँव में चला गया। उसने माधवेन्द्र पुरी की खोज में प्रत्येक हाट में जाकर पुकारा।
क्षीर लह एई, ग्रार नाम 'माधव-पुरी' । तोमा लागि' गोपीनाथ क्षीर कैल चुरि ॥
१३३॥
वह पुजारी खीर का पात्र उठाकर पुकारने लगा, जिसका नाम माधवेन्द्र पुरी हो वह आकर यह पात्र ले जाये! गोपीनाथ ने तुम्हारे लिए इस खीर के पात्र की चोरी की है! क्षीर लञा सुखे तुमि करह भक्षणे ।। तोमा-सम भाग्यतान् नाहि त्रिभुवने ॥
१३४॥
यह निमन्त्रण सुनकर माधवेन्द्र पुरी सामने आये और उन्होंने अपना परिचय दिया। तब पुजारी ने उन्हें वह खीर-पात्र दिया और दण्डवत् प्रणाम किया।
एत शुनि' पुरी-गोसाजि परिचय दिल ।क्षीर दिया पूजारी ताँरै दण्डवत् हैल ॥
१३५॥
पुजारी ने आगे कहा, क्या माधवेन्द्र पुरी नामक संन्यासी आकर यह खीर-पात्र लेंगे और अत्यन्त सुखपूर्वक प्रसाद ग्रहण करेंगे? आप तो तीनों लोकों में परम भाग्यशाली व्यक्ति हो! क्षीरेर वृत्तान्त तारे कहिल पूजारी । शुनि' प्रेमाविष्ट हैल श्री-माधव-पुरी ॥
१३६ ॥
जब माधवेन्द्र पुरी को खीर-पात्र की कथा विस्तार से बतलाई गई, तो वे कृष्ण-प्रेम के आनन्द में मग्न हो गये।
प्रेम देखि' सेवक कहे हइया विस्मित ।कृष्ण ये इँहार वश,—हय ग्रथोचित ॥
१३७॥
श्रील माधवेन्द्र पुरी में प्रेम-भाव के लक्षण देखकर पुजारी आश्चर्यचकित हो गया। उसकी समझ में आ गया कि कृष्ण उनके प्रति इतने कृतज्ञ क्यों हो गये थे और उसने देखा कि कृष्ण का यह कार्य उपयुक्त था।
एत बलि' नमस्करि' करिला गमन ।आवेशे करिला पुरी से क्षीर भक्षण ॥
१३८ ॥
माधवेन्द्र पुरी को नमस्कार करके वह पुजारी मन्दिर लौट गया। तब भावावेश में माधवेन्द्र पुरी ने कृष्ण द्वारा प्रदत्त खीर ग्रहण की।
पात्र प्रक्षालन करि' खण्ड खण्ड कैले ।बहिर्वासे बान्धि' सेइ ठिकारि राखिल ॥
१३९॥
इसके बाद माधवेन्द्र पुरी ने उस पात्र को धोया और तोड़कर उसे खण्ड-खण्ड कर दिया। फिर उन्होंने उन खण्डों को बाह्य वस्त्र में बाँधकर ठीक से रख लिया।
प्रति-दिन एक-खानि करेन भक्षण ।। खाइले प्रेमावेश हय,—अद्भुत कथन ॥
१४० ॥
माधवेन्द्र पुरी प्रतिदिन उस मिट्टी के पात्र का एक खण्ड खाते और खाते ही वे भावावेश में आ जाते। ये सब अद्भुत कथाएँ हैं।
‘ठाकुर मोरे क्षीर दिल–लोक सब शुनि' । दिने लोक-भिड़ हबे मोर प्रतिष्ठा जानि' ॥
१४१॥
उस पात्र को खण्ड-खण्ड करके अपने वस्त्र में बाँध लेने के बाद माधवेन्द्र पुरी सोचने लगे, भगवान् ने मुझे खीर का पात्र दिया है और कल प्रातःकाल जब लोग इसके बारे में सुनेंगे, तो बहुत बड़ी भीड़ लग जायेगी।
सेइ भये रात्रि-शेषे चलिला श्री-पुरी ।। सेइ-खाने गोपीनाथे दण्डवत्करि' ॥
१४२॥
यह सोचकर श्री माधवेन्द्र पुरी ने उसी स्थान पर गोपीनाथजी को दंडवत् प्रणाम किया और प्रातः होने के पूर्व ही रेमुणा से चले गये।
चलि' चलि' आइला पुरी श्री-नीलाचल ।जगन्नाथ देखि' हैला प्रेमेते विह्वल ॥
१४३॥
माधवेन्द्र पुरी चलते चलते जगन्नाथ पुरी पहुँचे, जो नीलाचल के नाम से भी विख्यात है। वहाँ उन्होंने भगवान् जगन्नाथजी के दर्शन किये और प्रेमानन्दवश विह्वल हो गये।
प्रेमावेशे उठे, पड़े, हासे, नाचे, गाय।।जगन्नाथ-दरशने महा-सुख पाय ॥
१४४॥
श्रील माधवेन्द्र पुरी भगवत्प्रेम से भावाभिभूत होकर कभी उठ खड़े होते और कभी भूमि पर गिर पड़ते। कभी वे हँसते, नाचते और गाते । इस प्रकार जगन्नाथ-विग्रह के दर्शन करके उन्होंने दिव्य आनन्द का अनुभव किया।
‘माधव-पुरी श्रीपाद आइल',—लोके हैल ख्याति ।सब लोक आसि' ताँरे करे बहु भक्ति ॥
१४५ ।। जब माधवेन्द्र पुरी जगन्नाथ पुरी आये, तो लोग उनकी दिव्य ख्याति से परिचित थे। अतएव लोगों की भीड़ आने लगी और भक्तिवश उनका तरह-तरह से सम्मान करने लगी।
प्रतिष्ठार स्वभाव एइ जगते विदित ।ये ना वाञ्छे, तार हय विधाता-निर्मित ॥
१४६ ॥
मनुष्य भले ही न चाहता हो, फिर भी विधाता द्वारा नियत प्रतिष्ठा उसे मिल ही जाती है। निस्सन्देह, भक्त की दिव्य प्रतिष्ठा समग्र विश्व में फैल जाती है।
प्रतिष्ठार भये पुरी गेला पलाञा ।कृष्ण-प्रेमे प्रतिष्ठा चले सङ्गे गड़ाञा ॥
१४७॥
अपनी प्रतिष्ठा के भय से माधवेन्द्र पुरी रेमुणा छोड़कर चले गये। किन्तु भगवत्प्रेम द्वारा प्रदत्त प्रतिष्ठा इतनी उत्कृष्ट है कि वह भक्त के साथसाथ जाती है, मानो उसका पीछा कर रही हो।
यद्यपि उद्वेग हैल पलाइते मन ।। ठाकुरेर चन्दन-साधन हइल बन्धन ॥
१४८॥
माधवेन्द्र पुरी जगन्नाथ पुरी छोड़ना चाह रहे थे, क्योंकि लोग उनका महान् भक्त के रूप में आदर कर रहे थे, किन्तु इससे गोपाल-विग्रह के लिए चन्दन की लकड़ी एकत्र करने में बाधा उत्पन्न होने का भय था।
जगन्नाथेर सेवक व्रत, व्रतेक महान्त । सबाके कहिल पुरी गोपाल-वृत्तान्त ॥
१४९॥
। श्री माधवेन्द्र पुरी ने वहाँ पर जगन्नाथजी के सभी सेवकों तथा महान् भक्तों से श्री गोपाल के प्राकट्य की कथा बतलाई।
गोपाल चन्दन मागे,——शुनि' भक्त-गण ।। आनन्दे चन्दन लागि' करिल ग्रतन ॥
१५०॥
जब जगन्नाथ पुरी के सारे भक्तों ने सुना कि गोपाल-विग्रह चन्दन चाहते हैं, तो सभी हर्षित होकर चन्दन एकत्र करने का प्रयास करने लगे।
राज-पात्र-सने झार ग्रार परिचय ।।तारे मागि' कर्पूर-चन्दन करिला सञ्चय ॥
१५१॥
जो लोग राज अधिकारियों से परिचित थे, वे उनसे मिले और कपूर तथा चन्दन माँग-माँगकर एकत्र किया।
एक विप्र, एक सेवक, चन्दन वहिते । पुरी-गोसाजिर सङ्गे दिल सम्बल-सहिते ॥
१५२॥
इस चन्दन को ले जाने के लिए माधवेन्द्र पुरी को एक ब्राह्मण तथा एक सेवक दिया गया। उन्हें आवश्यक मार्ग-व्यय भी दिया गया।
घाटी-दानी छाड़ाइते राज-पात्र द्वारे ।। राज-लेखा करि' दिल पुरी-गोसाजिर करे ॥
१५३॥
रास्ते के चुंगी वसूलने वालों से बचने के लिए माधवेन्द्र पुरी को सरकारी अफसरों से छूट के आवश्यक कागजात दिलाए गये। ये कागजात उनके हाथ में दिये गये।
चलिल माधव-पुरी चन्दन ला । कत-दिने रेमुणोते उत्तरिल गिया ।। १५४॥
इस तरह माधवेन्द्र पुरी चन्दन सहित वृन्दावन के लिए चल पड़े और कुछ दिनों के बाद वे पुनः रेमुणा गाँव तथा वहाँ के गोपीनाथ मन्दिर में पहुँचे गोपीनाथ-चरणे कैल बहु नमस्कार ।। प्रेमावेशे नृत्य-गीत करिला अपार ॥
१५५॥
। जब माधवेन्द्र पुरी गोपीनाथ के मन्दिर पहुँचे, तो उन्होंने भगवान् के चरणकमलों पर अनेक बार नमस्कार किया। वे प्रेमभाव में सतत नृत्य और गान करने लगे।
पुरी देखि' सेवक सब सम्मान करिल ।। क्षीर-प्रसाद दिया ताँरे भिक्षा कराइल ॥
१५६॥
जब गोपीनाथ के पुजारी ने माधवेन्द्र पुरी को फिर से आये देखे, तो उसने उन्हें सादर नमस्कार किया और उन्हें खीर प्रसाद खिलाया।
सेइ रात्रे देवालये करिल शयन ।शेष-रात्रि हैले पुरी देखिल स्वपन ॥
१५७॥
उस रात माधवेन्द्र पुरी ने मन्दिर में विश्राम किया, किन्तु रात्रि के अन्त में उन्हें दोबारा स्वप्न दिखलाई पड़ा।
गोपाल आसिया कहे,—शुन हे माधव । कर्पूर-चन्दन आमि पाइलाम सब ॥
१५८॥
। माधवेन्द्र पुरी ने सपने में देखा कि गोपाल उनके सामने आकर कह रहे हैं, “हे माधवेन्द्र पुरी, मुझे पहले ही सारी चन्दन तथा कपूर प्राप्त हो चुका है। कर्पूर-सहित घषि' ए-सब चन्दन । गोपीनाथेर अङ्गे नित्य करह लेपन ॥
१५९॥
तुम सारे चन्दन को कपूर के साथ घिसकर तब तक गोपीनाथ के विग्रह पर इसका प्रतिदिन लेप करते रहो, जब तक यह समाप्त न हो जाये।
गोपीनाथ आमार से एक-इ अङ्ग हय ।।इँहाके चन्दन दिले हबे मोर ताप-क्षय ॥
१६०॥
मेरे शरीर तथा गोपीनाथ के शरीर में कोई अन्तर नहीं है। वे अभिन्न हैं। अतएव यदि तुम गोपीनाथ के शरीर पर चन्दन-लेप करते हो, तो वह मेरे शरीर पर लेप के समान ही है। इस प्रकार मेरे शरीर का ताप कम हो जायेगा।
द्विधा ना भाविह, ना करिह किछु मने ।।विश्वास करि' चन्दन देह आमार वचने ॥
१६१॥
मेरे आदेशानुसार कार्य करने में तुम तनिक भी सन्देह मत करो। मुझ पर विश्वास रखकर जो आवश्यक हो वह करो।
एत बलि' गोपाल गेल, गोसाञि जागिला ।गोपीनाथेर सेवक-गणे डाकिया आनिला ॥
१६२॥
इतना आदेश देकर गोपाल अन्तर्धान हो गये और श्रील माधवेन्द्र पुरी जाग गये। उन्होंने तुरन्त गोपीनाथ के सभी सेवकों को बुलाया और वे वहाँ उपस्थित हो गये।
भुर आज्ञा हैल,—एइ कर्पूर-चन्दन ।गोपीनाथेर अङ्गे नित्य करह लेपन ॥
१६३॥
माधवेन्द्र पुरी ने कहा, गोपीनाथ के विग्रह पर इस कपूर तथा चन्दन का लेप करो, जिसे मैं वृन्दावन स्थित गोपाल के लिए लाया हूँ। इसे नियमित रूप से प्रतिदिन करो।
इँहाके चन्दन दिले, गोपाल हइबे शीतल ।।स्वतन्त्र ईश्वर ताँर आज्ञा से प्रबल ॥
१६४॥
। यदि गोपीनाथ के शरीर पर चन्दन का लेप किया जाये, तो गोपाल शीतल हो जायेंगे। आखिर पूर्ण पुरुषोत्तम भगवान् पूर्णतया स्वतन्त्र हैं; उनका आदेश सर्व-शक्तिमान है।
ग्रीष्म-काले गोपीनाथ परिबे चन्दन ।शुनि' आनन्दित हैल सेवकेर मन ॥
१६५ ॥
गोपीनाथ के सेवक यह सुनकर अत्यन्त प्रसन्न हुए कि गर्मियों में यह सारा चन्दन गोपीनाथ के शरीर पर लेप करने के लिए प्रयोग होगा।
पुरी कहे,—एइ दुइ घषिबे चन्दन ।आर जना-दुइ देह, दिब ग्रे वेतन ॥
१६६ ॥
माधवेन्द्र पुरी ने कहा, ये दो सेवक नियमित रूप से चन्दन घिसेंगे और तुम सहायता के लिए अन्य दो व्यक्ति और ले लो। उनका वेतन मैं दूंगा।
एइ मत चन्दन देय प्रत्यह घषिया । पराय सेवक सब आनन्द करिया ॥
१६७॥
इस तरह प्रतिदिन गोपीनाथजी को चन्दन घिसकर लेप किया जाता रहा। इससे गोपीनाथ के सेवक अत्यन्त प्रसन्न थे।
प्रत्यह चन्दन पराय, यावत् हैल अन्त ।तथाय रहिल पुरी तावत्पर्य्यन्त ॥
१६८॥
इस प्रकार पूरा चन्दन समाप्त होने तक गोपीनाथ के विग्रह पर चन्दन का लेप होता रहा और माधवेन्द्र पुरी तब तक वहीं रहे।
ग्रीष्म-काल-अन्ते पुनः नीलाचले गेला ।।नीलाचले चातुर्मास्य आनन्दे रहिला ॥
१६९ ॥
गर्मी के अन्त में माधवेन्द्र पुरी जगन्नाथ पुरी लौट आये, जहाँ उन्होंने बड़े ही आनन्द से चातुर्मास्य बिताया।
श्री-मुखे माधव-पुरीर अमृत-चरित ।। भक्त-गणे शुनाना प्रभु करे आस्वादित ॥
१७० ॥
इस तरह श्री चैतन्य महाप्रभु ने स्वयं माधवेन्द्र पुरी के अमृतमय गुणों की प्रसंशा की और जब वे यह सब भक्तों को सुना रहे थे, तो उन्होंने स्वयं भी इसका आस्वादन किया।
प्रभु कहे,—नित्यानन्द, करह विचार । पुरी-सम भाग्यवान् जगते नाहि आर ॥
१७१॥
श्री चैतन्य महाप्रभु ने नित्यानन्द से यह निर्णय करने के लिए कहा कि क्या इस जगत् में माधवेन्द्र पुरी के समान और कोई भाग्यशाली है! दुग्ध-दान-छले कृष्ण याँरै देखा दिल । तिन-बारे स्वप्ने आसि' याँरै आज्ञा कैल ॥
१७२॥
श्री चैतन्य महाप्रभु ने कहा, माधवेन्द्र पुरी इतने भाग्यशाली थे कि साक्षात् भगवान् कृष्ण उनके समक्ष दूध देने के बहाने प्रकट हुए। भगवान् ने माधवेन्द्र पुरी को स्वप्न में तीन बार आदेश दिया।
याँर प्रेमे वश हा प्रकट हइला । सेवा अङ्गीकार करि' जगत् तारिला ॥
१७३॥
माधवेन्द्र पुरी के प्रेम के वशीभूत होकर स्वयं भगवान् कृष्ण गोपाल विग्रह के रूप में प्रकट हुए और उनकी सेवा स्वीकार करके भगवान् ने सारे जगत् का उद्धार किया।
झाँर लागि' गोपीनाथ क्षीर कैल चुरि । अतएव नाम हैल' क्षीर-चोरा' करि' ॥
१७४॥
माधवेन्द्र पुरी के ही कारण भगवान् गोपीनाथ ने खीर-पात्र चुराया। इस तरह वे ' क्षीर-चोरा' के नाम से प्रसिद्ध हुए।"
कर्पूर-चन्दन याँर अङ्गे चड़ाइल ।।आनन्दे पुरी-गोसाजिर प्रेम उथलिल ॥
१७५ ॥
माधवेन्द्र पुरी ने गोपीनाथ के श्रीविग्रह पर चन्दन का लेप किया और इस प्रकार वे भगवत्प्रेम से विह्वल हो गये।
म्लेच्छ-देशे कर्पूर-चन्दन आनिते जञ्जाल ।।पुरी दुःख पाबे इहा जानिया गोपाल ॥
१७६॥
मुसलमानों द्वारा शासित भारतीय प्रान्तों में चन्दन तथा कपूर लेकर यात्रा करना अत्यन्त असुविधाजनक था। इसके कारण माधवेन्द्र पुरी कष्ट में पड़ सकते थे। यह गोपाल-विग्रह को ज्ञात हो गया।
महा-दया-मय प्रभु-भकत-वत्सल ।।चन्दन परि' भक्त-श्रम करिल सफल ॥
१७७॥
भगवान् अत्यधिक दयालु हैं और अपने भक्तों से अनुरक्त रहते हैं; अतएव जब गोपीनाथ को चन्दन का लेप लगाया गया, तो माधवेन्द्र पुरी का श्रम सार्थक हो गया।
पुरीर प्रेम-पराकाष्ठा करह विचार ।। अलौकिक प्रेम चित्ते लागे चमत्कार ॥
१७८॥
श्री चैतन्य महाप्रभु ने नित्यानन्द प्रभु को माधवेन्द्र पुरी के उत्कट प्रेम के आदर्श पर अपना निर्णय देने के लिए कहा। चैतन्य महाप्रभु ने कहा, उनके सारे प्रेम-व्यवहार असाधारण हैं। निस्सन्देह, उनके कार्यकलापों को सुनकर हर कोई आश्चर्यचकित रह जाता है।
परम विरक्त, मौनी, सर्वत्र उदासीन ।ग्राम्य-वार्ता-भये द्वितीय-सङ्ग-हीन ॥
१७९॥
चैतन्य महाप्रभु ने आगे बतलाया, श्री माधवेन्द्र पुरी अकेले रहा करते थे। वे पूर्ण विरक्त थे और सदैव मौन रहते थे। वे किसी भी भौतिक वस्तु में रुचि नहीं रखते थे और संसारी बातें करने के भय से अकेले रहते थे।
हेन-जन गोपालेर आज्ञामृत पाजा ।।सहस्त्र क्रोश आसि' बुले चन्दन मागिळा ॥
१८०॥
गोपालजी का दिव्य आदेश पाकर इस महापुरुष ने माँगकर चन्दन एकत्र करने हेतु हजारों मील की यात्रा की।
भोके रहे, तबु अन्न मागिजा ना खाय ।हेन-जन चन्दन-भार वहि' लञा ग्राय ॥
१८१॥
माधवेन्द्र पुरी ने भूखे रहने पर भी किसी से खाने के लिए भोजन नहीं माँगा। इस विरक्त पुरुष ने श्री गोपाल के निमित्त चन्दन का भार वहन किया।
मणेक चन्दन, तोला-विशेक कर्पूर ।गोपाले पराइब'–एइ आनन्द प्रचुर ॥
१८२॥
अपनी निजी सुख-सुविधा की चिन्ता न करके माधवेन्द्र पुरी एक मन चन्दन ( लगभग ८२ पौंड) तथा बीस तोला (लगभग ८ औंस ) कपूर गोपाल के विग्रह को लेप करने के लिए उठा लाये। यही दिव्य आनन्द उनके लिए पर्याप्त था।
उत्कलेर दानी राखे चन्दन देखिञा ।ताहाँ एड़ाइल राज-पत्र देखाजा ॥
१८३॥
चूंकि उड़ीसा प्रान्त से बाहर चन्दन ले जाने पर प्रतिबन्ध था, अतएव चुंगी अधिकारी ने पूरा चन्दन अपने पास रख लिया, किन्तु माधवेन्द्र पुरी ने उसे सरकार द्वारा दिया गया विमोचन-प्रपत्र दिखलाया, जिससे वे कठिनाइयों से बच गये।
म्लेच्छ-देश दूर पथ, जगाति अपार ।के-मते चन्दन निब- नाहि ए विचार ॥
१८४॥
। माधवेन्द्र पुरी वृन्दावन की लम्बी यात्रा के दौरान मुस्लिमों के द्वारा शासित एवं अनगिनत पहरेदारों से भरे हुए प्रान्तों से गुजरते हुए तनिक भी चिन्तित नहीं हुए।
सङ्गे एक वट नाहि घाटी-दान दिते ।तथापि उत्साह बड़ चन्दन लञा ग्राइते ॥
१८५ ॥
। यद्यपि माधवेन्द्र पुरी के पास एक छदाम भी नहीं था, किन्तु वे चुंगी अफसरों के पास से निकलने के लिए तनिक भी भयभीत नहीं थे। उनका एकमात्र आनन्द गोपाल के लिए वृन्दावन तक चन्दन का बोझ उठाकर ले चलने में था।
प्रगाढ़-प्रेमेर एइ स्वभाव-आचार । निज-दुःख-विघ्नादिर ना करे विचार ॥
१८६॥
। उत्कट भगवत्प्रेम का यही स्वाभाविक परिणाम होता है। भक्त निजी असुविधाओं या विघ्नों पर विचार नहीं करता। वह सभी परिस्थितियों में भगवान् की सेवा करना चाहता है।
एइ तार गाढ़ प्रेमा लोके देखाइते । गोपाल ताँरे आज्ञा दिल चन्दन आनिते ॥
१८७॥
श्री गोपाल यह दिखलाना चाहते थे कि माधवेन्द्र पुरी कृष्ण से । कितना प्रगाढ़ प्रेम करते थे; अतएव उन्होंने नीलाचल से चन्दन तथा कपूर लाने के लिए उनसे कहा।
बहु परिश्रमे चन्दन रेमुणा आनिल ।आनन्द बाड़िल मने, दुःख ना गणिल ॥
१८८॥
अत्यन्त कष्ट उठाकर तथा अत्यधिक परिश्रम करके माधवेन्द्र पुरी चन्दन को रेमुणा ले आये। फिर भी वे अत्यन्त प्रसन्न थे; उन्होंने कठिनाइयों की तनिक भी चिन्ता नहीं की।
परीक्षा करिते गोपाल कैल आज्ञा दान ।परीक्षा करिया शेषे हैल दयावान् ॥
१८९॥
पूर्ण पुरुषोत्तम भगवान् गोपाल ने माधवेन्द्र पुरी के उत्कट प्रेम की परीक्षा करने के लिए उन्हें नीलाचल से चन्दन लाने का आदेश दिया और जब माधवेन्द्र पुरी इस परीक्षा में खरे उतरे, तो भगवान् उन पर अत्यन्त कृपालु हुए।
एइ भक्ति, भक्त-प्रिय-कृष्ण-व्यवहार । बुझितेओ आमा-सबार नाहि अधिकार ॥
१९०॥
भक्त तथा भक्त के प्रिय श्रीकृष्ण के मध्य प्रेमाभक्ति के ऐसे व्यवहार का प्रदर्शन दिव्य है। साधारण व्यक्ति के लिए इसे समझ पाना सम्भव नहीं है। सामान्य व्यक्तियों में इतनी क्षमता ही नहीं होती।
एत बलि' पड़े प्रभु ताँर कृत श्लोक । येइ श्लोक-चन्द्रे जगत्कछे आलोक ॥
१९१॥
। यह कहकर श्री चैतन्य महाप्रभु ने माधवेन्द्र पुरी का प्रसिद्ध श्लोक पढ़ा। यह श्लोक चन्द्रमा के समान है। इसने सारे जगत् को प्रकाशमान किया है।
घषिते घषिते प्रैछे मलयज-सार । गन्ध बाड़े, तैछे एइ श्लोकेर विचार ॥
१९२॥
जिस प्रकार निरन्तर घिसने से मलय चन्दन की सुगन्ध बढ़ती है, उसी तरह इस श्लोक पर मनन करने से इसकी महत्ता समझ में आती है।
रत्न-गण-मध्ये प्रैछे कौस्तुभ-मणि ।। रस-काव्य-मध्ये तैछे एइ श्लोक गणि ॥
१९३॥
जिस प्रकार रत्नों में कौस्तुभ-मणि को अत्यन्त मूल्यवान माना जाता है, उसी तरह भक्ति के रस से सम्बन्धित काव्य में इस श्लोक को सर्वोत्तम माना जाता है।
एइ श्लोक कहियाछेन राधा-ठाकुराणी ।।ताँर कृपाय स्फुरियाछे माधवेन्द्र-वाणी ॥
१९४॥
वास्तव में इस श्लोक को श्रीमती राधारानी ने स्वयं कहा था और की कृपा से ही यह माधवेन्द्र पुरी के शब्दों में प्रकट हुआ।
किबा गौरचन्द्र इहा करे आस्वादन ।इहा आस्वादिते आर नाहि चौठ-जन ॥
१९५॥
केवल श्री चैतन्य महाप्रभु ने इस श्लोक के काव्यत्व का आस्वादन किया है। इसे समझ पाने में कोई चौथा व्यक्ति समर्थ नहीं है।
शेष-काले एइ श्लोक पठिते पठिते । सिद्धि-प्राप्ति हैल पुरीर श्लोकेर सहिते ॥
१९६॥
पृथ्वी पर जीवन के अन्तिम काल में माधवेन्द्र पुरी इस श्लोक को बारम्बार पढ़ते रहते थे। इस प्रकार इस श्लोक का उच्चारण करते करते उन्होंने जीवन का चरम लक्ष्य प्राप्त किया।
अयि दीन-दयार्द्र नाथ हे।मथुरा-नाथ कदावलोक्यसे । हृदयं त्वदलोक-कातरं । दयित भ्राम्यति किं करोम्यहम् ॥
१९७॥
हे नाथ! हे परम कृपालु स्वामी! हे मथुरापति! मुझे फिर आपके दर्शन कब होंगे? आपका दर्शन न कर पाने के कारण मेरा विक्षुब्ध हृदय अस्थिर हो चुका है। हे प्रिय, अब मैं क्या करूं? एई श्लोक पड़िते प्रभु हइला मूच्छिते । प्रेमेते विवश हा पड़िल भूमिते ॥
१९८॥
यह श्लोक पढ़ते ही श्री चैतन्य महाप्रभु अचेत होकर भूमि पर गिर पड़े। वे विह्वल थे, अतएव अपने वश में नहीं थे।
आस्ते-व्यस्ते कोले करि' निल नित्यानन्द ।क्रन्दन करिया तबे उठे गौरचन्द्र ॥
१९९॥
जब श्री चैतन्य महाप्रभु भावावेश में भूमि पर गिर पड़े, तो नित्यानन्द प्रभु ने तुरन्त उन्हें अपनी गोद में उठा लिया। तब श्री चैतन्य महाप्रभु क्रंदन करते हुए फिर से उठ बैठे।
प्रेमोन्माद हैल, उठि' इति-उति धाय ।हुङ्कार करये, हासे, कान्दे, नाचे, गाय ॥
२००॥
प्रेमोन्माद प्रकट करते हुए महाप्रभु हुंकार करते हुए इधर-उधर दौड़ने लगे। कभी वे हँसते, कभी रोते, कभी नाचते और कभी गाते थे।"
‘अयि दीन, 'अयि दीन' बले बार-बार ।कण्ठे ना निःसरे वाणी, नेत्रे अश्रु-धार ॥
२०१॥
श्री चैतन्य महाप्रभु पूरा श्लोक नहीं सुना पाये। उन्होंने बारम्बार इतना ही कहा, अयि दीन! अयि दीन! इस तरह वे बोल नहीं सके और उनकी आँखों से अश्रु की धारा बहने लगी।
कम्प, स्वेद, पुलकाश्रु, स्तम्भ, वैवर्त्य ।।निर्वेद, विषाद, जाय, गर्व, हर्ष, दैन्य ॥
२०२॥
कँपकँपी, पसीना, हर्ष के अश्रु, स्तम्भ, शरीर का रंग फीका पड़ना, निराशा, खिन्नता, स्मृति-ह्रास, गर्व, हर्ष तथा दीनता-ये सारे लक्षण श्री चैतन्य महाप्रभु के शरीर में दिख रहे थे।
एइ श्लोके उघाड़िला प्रेमेर कपाट । गोपीनाथ-सेवक देखे प्रभुर प्रेम-नाट ॥
२०३॥
इस श्लोक ने प्रेमभाव के द्वार खोल दिये और गोपीनाथ के सारे सेवकों ने महाप्रभु को भावावेश में नृत्य करते देखा।
लोकेर सङ्घट्ट देखि' प्रभुर बाह्य हैल ।। ठाकुरेर भोग सरि' आरति बाजिल ॥
२०४॥
जब श्री चैतन्य महाप्रभु के चारों ओर अनेक लोगों की भीड़ लग गई, तो वे बाह्य चेतना में आये। उसी बीच अर्चाविग्रह को भोग का समर्पण समाप्त हुआ और सुमधुर ध्वनि के साथ आरती सम्पन्न हुई।
ठाकुरे शयन कराञा पूजारी हैल बाहिर ।। प्रभुर आगे आनि' दिल प्रसाद बार क्षीर ॥
२०५॥
अर्चाविग्रहों को शयन कराने के बाद पुजारी मन्दिर के बाहर आ गया और उसने खीर के सारे बारहों पात्र श्री चैतन्य महाप्रभु को दे दिये।
क्षीर देखि' महाप्रभुर आनन्द बाड़िल । भक्त-गणे खाओयाइते पञ्च क्षीर लैल ॥
२०६॥
जब गोपीनाथ महाप्रसाद के सारे खीर-पात्र श्री चैतन्य महाप्रभु के समक्ष रखे गये, तो वे अत्यन्त प्रसन्न हुए। भक्तों को खिलाने के लिए उन्होंने पाँच पात्र स्वीकार किये।
सात क्षीर पूजारीके बाहुड़िया दिल । पञ्च-क्षीर पञ्च-जने वाँटिया खाइल ॥
२०७॥
शेष सात पात्र आगे बढ़ाकर पुजारी को दे दिये गये। फिर महाप्रभु द्वारा लिये गये पाँच पात्रों की खीर पाँच भक्तों में बाँटी गई और उन सबने प्रसाद ग्रहण किया।
गोपीनाथ-रूपे ग्रदि करियाछेन भोजन ।।भक्ति देखाइते कैल प्रसाद भक्षण ॥
२०८॥
गोपीनाथ विग्रह से अभिन्न श्री चैतन्य महाप्रभु पहले ही खीर-पात्रों का आस्वादन कर चुके थे। फिर भी भक्ति प्रकट करने के लिए उन्होंने भक्त के रूप में पुनः खीर खाई।
नाम-सङ्कीर्तने सेइ रात्रि गोइला ।मङ्गल-आरति देखि' प्रभाते चलिला ॥
२०९॥
वह रात्रि महाप्रभु ने उस मन्दिर में संकीर्तन करने में व्यतीत की। प्रात:काल मंगल-आरती देखकर वे वहाँ से चल पड़े।
गोपाल-गोपीनाथ-पुरी-गोसाजिर गुण ।भक्त-सङ्गे श्री-मुखे प्रभु कैला आस्वादन ॥
२१०॥
इस तरह स्वयं चैतन्य महाप्रभु ने गोपालजी, गोपीनाथ तथा श्री माधवेन्द्र पुरी के दिव्य गुणों का आस्वादन अपने श्री मुख से किया।
एइ त' आख्याने कहिली दोंहार महिमा ।।प्रभुर भक्त-वात्सल्य, आर भक्त-प्रेम-सीमा ॥
२११॥
। इस तरह मैंने श्री चैतन्य महाप्रभु की अपने भक्तों के प्रति वात्सल्य की दिव्य महिमा तथा भगवत्प्रेम के भाव की पराकाष्ठा-दोनों का वर्णन किया है।
श्रद्धा-युक्त हल्ला इहा शुने येइ जन ।श्री-कृष्ण-चरणे सेइ पाय प्रेम-धन ॥
२१२॥
जो कोई श्रद्धा तथा भक्ति से इस कथा को सुनता है, उसे श्रीकृष्ण के चरणकमलों के प्रति भगवत्प्रेम का धन प्राप्त होता है।
श्री-रूप-रघुनाथ-पदे ग्रार आश ।।चैतन्य-चरितामृत कहे कृष्णदास ॥
२१३। श्री रूप तथा श्री रघुनाथ के चरणकमलों की वन्दना करते हुए और उनकी कृपा की कामना करते हुए, मैं कृष्णदास उनके चरणचिह्नों पर चलकर श्री चैतन्य-चरितामृत का वर्णन कर रहा हूँ।
