अध्याय तीन: श्री चैतन्य महाप्रभु के प्रकट होने के बाहरी कारण
श्री-चैतन्य-प्रभुं वन्दे मृत्पादाश्रय-वीर्यतः ।।सङ्गह्वात्याकर-व्रातादज्ञः सिद्धान्त-सन्मणीन् ॥
१॥
मैं श्री चैतन्य महाप्रभु को सादर नमस्कार करता हूँ। उनके अरणकमलों की शरण के प्रभाव से मूर्ख से मूर्ख व्यक्ति भी प्रामाणिक शास्त्रों की खानों में से सैद्धान्तिक सत्य के मूल्यवान रत्नों को एकत्र कर सकता है।
जय जय श्री-चैतन्य जय नित्यानन्द । जयाद्वैत-चन्द्र जय गौर-भक्त-वृन्द ॥
२॥
श्री चैतन्य महाप्रभु की जय हो! श्री नित्यानन्द प्रभु की जय हो! अद्वैतचन्द्र प्रभु की जय हो और श्री चैतन्य महाप्रभु के समस्त भक्तों की जय हो! तृतीय श्लोकेर अर्थ कैल विवरण ।।चतुर्थ श्लोकेर अर्थ शुन भक्त-गण ॥
३॥
मैं तीसरे श्लोक का तात्पर्य बता चुका हूँ। हे भक्तजन, अब कृपा करके ध्यानपूर्वक चौथे श्लोक का अर्थ सुनें।
अनर्पित-चरी चिरात्करुणयावतीर्णः कलौ समर्पयितुमुन्नतोज्वल-रसां स्व-भक्ति-श्रियम् । हरिः पुरट-सुन्दर-द्युति-कदम्ब-सन्दीपितः । सदा हृदय-कन्दरे स्फुरतु वः शची-नन्दनः ॥
४॥
वे भगवान्, जो श्रीमती शचीदेवी के पुत्र के रूप में विख्यात हैं, आपके हृदय की गहराई में दिव्य स्थान ग्रहण करें। वे पिघले सोने की देदीप्यमान द्युति से युक्त होकर इस कलियुग में अपनी अहैतुकी कृपा से भक्ति का सर्वोच्च रस-माधुर्य रस-प्रदान करने के लिए अवतरित हुए हैं, जिसे इसके पूर्व अन्य किसी अवतार ने प्रदान नहीं किया है।
पूर्ण भगवान्कृष्ण व्रजेन्द्र कुमार।गोलोके व्रजेर सह नित्य विहार ॥
५॥
वजराज के पुत्र श्रीकृष्ण परम भगवान् हैं। वे अपने सनातन धाम गोलोक में, जिसमें व्रजधाम भी सम्मिलित है, अपनी दिव्य लीलाओं का आनन्द लेते हैं।
ब्रह्मार एक दिने तिंहो एक-बार । अवतीर्ण हल्ला करेन प्रकट विहार ॥
६ ॥
वे ब्रह्मा के एक दिन में एक ही बार इस जगत् में अपनी दिव्य लीलाएँ प्रकट करने के लिए अवतरित होते हैं।
सत्य, त्रेता, द्वापर, कलि, चारि-युग जानि । सेइ चारि-युगे दिव्य एक-झुग मानि ॥
७॥
हम जानते हैं कि युग चार हैं, यथा सत्य, त्रेता, द्वापर तथा कलियुग। ये चारों मिलकर एक दिव्य युग की रचना करते हैं।
एकात्तर चतुर्युगे एक मन्वन्तर ।।चौद्द मन्वन्तर ब्रह्मार दिवस भितर ॥
८॥
एकहत्तर दिव्य युग मिलकर एक मन्वन्तर बनाते हैं। ब्रह्मा के एक दिन में चौदह मन्वन्तर होते हैं।
‘वैवस्वत'-नाम एइ सप्तम मन्वन्तर ।साताइश चतुर्युग ताहार अन्तर ॥
९॥
। वर्तमान मनु सातवें मनु हैं और ये वैवस्वत (विवस्वान के पुत्र ) हलाते हैं। अब तक उनकी आयु के सत्ताइस दिव्य युग ( २७ x ,२०,००० सौर वर्ष) बीत चुके हैं।
अष्टाविंश चतुर्युगे द्वापरेर शेषे ।व्रजेर सहिते हय कृष्णेर प्रकाशे ॥
१०॥
। । अट्ठाइसवें दिव्य युग के द्वापर युग के अन्त में भगवान् कृष्ण अपने पत व्रजधाम के सम्पूर्ण साज-सामान के साथ पृथ्वी पर प्रकट होते हैं।
दास्य, सख्य, वात्सल्य, शृङ्गार-चारि रस । चारि भावेर भक्त व्रत कृष्ण तार वश ॥
११॥
ऐसे दिव्य प्रेम में निमग्न होकर भगवान् श्रीकृष्ण अपने समर्पित सेवकों, मित्रों, माता-पिता तथा प्रेमिकाओं के साथ व्रज में आनन्द का आस्वादन करते हैं। भगवन कृष्ण उनके वश में रहते है।
दास-सखा-पिता-माता-कान्ता-गण लजा । व्रजे क्रीड़ा करे कृष्ण प्रेमाविष्ट हबा ॥
१२॥
दास्य (सेवक भाव), सख्य मैत्री), वात्सल्य ( माता-पिता का स्नेह) तथा श्रृंगार ( दाम्पत्य प्रेम)-ये चार दिव्य रस हैं। जो भक्त इन चारों रसों का आस्वादन करते हैं।
यथेष्ट विहरि कृष्ण करे अन्तर्धान । अन्तर्धान करि' मने करे अनुमान ॥
१३॥
जब तक इच्छा होती है, भगवान् कृष्ण अपनी दिव्य लीलाओं का आस्वादन करते हैं और पुनः अन्तर्धान हो जाते हैं। किन्तु अन्तर्धान होने के बाद वे इस प्रकार सोचते हैं : चिर-काल नाहि करि प्रेम-भक्ति दान ।। भक्ति विना जगतेर नाहि अवस्थान ॥
१४॥
“दीर्घ काल से मैंने अपनी अनन्य प्रेमाभक्ति का दान विश्व के निवासियों को नहीं दिया। ऐसी प्रेममयी अनुरक्ति के बिना भौतिक जगत् का अस्तित्व व्यर्थ है।
सकल जगते मोरे करे विधि-भक्ति । विधि-भक्त्ये व्रज-भाव पाइते नाहि शक्ति ॥
१५॥
। संसार में शास्त्रों के निर्देशानुसार सर्वत्र मेरी पूजा की जाती है। किन्तु विधि-विधानों का पालन करने मात्र से व्रजभूमि के भक्तों के भावों को प्राप्त नहीं किया जा सकता।
ऐश्वर्य-ज्ञानेते सब जगत्मिश्रित ।। ऐश्वर्य-शिथिल-प्रेमे नाहि मोर प्रीत ॥
१६॥
मेरे ऐश्वर्य को जानते हुए सारा संसार मुझे भय एवं सम्मान की दृष्टि देखता है। किन्तु ऐसे सम्मान से शिथिल हुई भक्ति मुझे आकृष्ट नहीं करती।
ऐश्वर्य-ज्ञाने विधि-भजन करिया ।वैकुण्ठके ग्राय चतुर्विध मुक्ति पाजा ॥
१७॥
भय तथा सम्मान में ऐसी वैधी भक्ति करके मनुष्य वैकुंठ जा सकता है और चार प्रकार की मुक्ति प्राप्त कर सकता है।
सार्टि, सारूप्य, आर सामीप्य, सालोक्य ।सायुज्य ना लय भक्त ग्राते ब्रह्म-ऐक्य ॥
१८॥
ये मुक्तियाँ हैं-सार्टि ( भगवान् तुल्य ऐश्वर्य की प्राप्ति), सारूप्य गवान् जैसा ही रूप प्राप्त करना), सामीप्य ( भगवान् का निजी पार्षद ना) तथा सालोक्य (वैकुण्ठ ग्रह पर निवास करना)। किन्तु भक्तगण राज्य मुक्ति को कभी स्वीकार नहीं करते, क्योंकि यह ब्रह्म से तादात्म्य हैं।
युग-धर्म प्रवर्तामु नाम-सङ्कीर्तन ।चारि भाव-भक्ति दिया नाचामु भुवन ॥
१९॥
मैं युगधर्म नाम-संकीर्तन का अर्थात् पवित्र नाम के सामूहिक कीर्तन का प्रवर्तन स्वयं करूंगा। मैं संसार को प्रेमाभक्ति के चार रसों की अनुभूति कराकर प्रेम-विभोर होकर नृत्य करने के लिए प्रवृत्त करूंगा।"
आपनि करिमु भक्त-भाव अङ्गीकारे । आपनि आचरि' भक्ति शिखाइमु सबारे ॥
२०॥
मैं भक्त की भूमिका स्वीकार करूँगा और स्वयं भक्ति का अभ्यास करके उसकी शिक्षा दूंगा।
आपने ना कैले धर्म शिखान ना ग्राय ।एइ त' सिद्धान्त गीता-भागवते गाय ॥
२१॥
जब तक कोई स्वयं भक्ति का अभ्यास नहीं करता, तब तक वह दूसरोंको इसकी शिक्षा नहीं दे सकता। इस निष्कर्ष की पुष्टि वस्तुतः पूरी तथा भागवत में हुई है।
ग्रदा ग्रदा हि धर्मस्य ग्लानिर्भवति भारत ।अभ्युत्थानमधर्मस्य तदात्मानं सृजाम्यहम् ॥
२२॥
हे भरतवंशी, जब जब और जहाँ जहाँ धर्म का ह्रास होता है और अर्म में वृद्धि होती है, तब तब मैं स्वयं अवतरित होता हूँ।'
परित्राणाय साधूनां विनाशाय च दुष्कृताम् ।।धर्म-संस्थापनार्थाय सम्भवामि युगे युगे ॥
२३॥
। पवित्रात्माओं का उद्धार करने तथा दुष्टों का विनाश करने के साथ साथ धर्म की पुनःस्थापना करने के लिए मैं प्रत्येक युग में प्रकट होता हूँ।
उत्सीदेयुरिमे लोका न कुर्घा कर्म चेदहम् ।।सङ्करस्य च कर्ता स्यामुपहन्यामिमाः प्रजाः ॥
२४॥
यदि मैं धर्म के सही सिद्धान्तों का प्रदर्शन न करता, तो ये सारे जगत् विनष्ट हो जाते और मैं अवांछित जनसंख्या का कारण बनता तथा इन सारे जीवों को विनष्ट कर देता।'
यद् ग्रदाचरति श्रेष्ठस्तत्तदेवेतरो जनः ।। स ग्रत्प्रमाणं कुरुते लोकस्तदनुवर्तते ॥
२५ ॥
महान् पुरुष जो भी आचरण करता है, सामान्य जन उसका नुगमन करते हैं। वह आदर्श कार्यों से जो भी मानदण्ड स्थापित करता उसका ही अनुसरण सारा जगत् करता है।'
मुग-धर्म-प्रवर्तन हय अंश हैते ।। आमा विना अन्ये नारे व्रज-प्रेम दिते ॥
२६ ॥
मेरे पूर्ण अंश प्रत्येक युग के लिए धर्म के सिद्धान्तों की स्थापना कर कते हैं। किन्तु मेरे अतिरिक्त अन्य कोई वह प्रेमाभक्ति प्रदान नहीं कर कता, जो व्रज के निवासियों द्वारा सम्पन्न की गई थी।
सन्त्ववतारा बहवःपङ्कज-नाभस्य सर्वतो-भद्राः । कृष्णादन्यः को वालतास्वपि प्रेम-दो भवति ॥
२७॥
हो सकता है कि भगवान् के सर्व-कल्याणकारी अनेक अवतार हों, किन्तु श्रीकृष्ण के अतिरिक्त ऐसा कौन है, जो शरणागतों को भगवत्प्रेम प्रदान कर सके?' ताहाते आपन भक्त-गण करि' सङ्गे।।पृथिवीते अवतरि' करिमु नाना रङ्गे ॥
२८॥
अतएव मैं अपने भक्तों के संग पृथ्वी पर प्रकट होकर विविध रंगमयी लीलाएँ संपादन करूंगा।
एत भावि' कलि-काले प्रथम सन्ध्याय ।।अवतीर्ण हैला कृष्ण आपनि नदीयाय ॥
२९॥
। इस प्रकार से सोचते हुए स्वयं भगवान् श्रीकृष्ण कलियुग के प्रारम्भ ( प्रथम संध्या में ) नदिया में अवतरित हुए।
चैतन्य-सिंहेर नवद्वीपे अवतार । सिंह-ग्रीव, सिंह-वीर्य, सिंहेर हुङ्कार ॥
३०॥
इस प्रकार सिंहरूप भगवान् चैतन्य नवद्वीप में प्रकट हुए हैं। उनके कंधे सिंह जैसे हैं, उनकी शक्ति सिंह जैसी है और उनका उच्च स्वर सिंह जैसा है।
सेड़ सिंह वसुजीवेर हृदय-कन्दरे । कल्मष-द्विरद नाशे याँहार हुङ्कारे ॥
३१॥
वह सिंह प्रत्येक जीव के हृदय के भीतर आसीन हो। इस प्रकार वे अपनी गर्जना से मनुष्य के हाथी जैसे पापों को दूर करें।
प्रथम लीलाय ताँर 'विश्वम्भर' नाम । भक्ति-रसे भरिल, धरिल भूत-ग्राम ॥
३२॥
अपनी प्रारम्भिक लीलाओं में वे विश्वम्भर नाम से जाने जाते हैं, क्योंकि वे संसार को भक्तिरूपी अमृत से आप्लावित कर देते हैं और इस तरह जीवों का उद्धार करते हैं।
डुभृधातुर अर्थ-पोषण, धारण । पुषिल, धरिल प्रेम दिया त्रिभुवन ॥
३३॥
डुभृञ्” क्रिया-धातु ( जो विश्वम्भर शब्द की मूल है) पोषण तथा पालन की सूचक है। वे ( चैतन्य महाप्रभु) भगवत्प्रेम का वितरण करके लोकों का पालन-पोषण करते हैं।
शेष-लीलाये धरे नाम' श्री-कृष्ण-चैतन्य' ।श्रीकृष्ण जानाये सब विश्व कैल धन्य ॥
३४॥
अपनी अन्तिम लीलाओं में वे भगवान् श्रीकृष्ण चैतन्य के नाम से यात हैं। वे भगवान् श्रीकृष्ण के नाम तथा महिमा के बारे में शिक्षा ' जर सारे संसार को आशीर्वाद प्रदान करते हैं।
ताँर झुगावतार जानि' गर्ग महाशय । कृष्णेर नाम-करणे करियाछे निर्णय ॥
३५॥
उनको ( चैतन्य को) कलियुग के लिए अवतार जानकर ही गर्गमुनि ने कृष्ण के नामकरण संस्कार के समय उनके आविर्भाव की । भविष्यवाणी की थी।
आसन्वर्णास्त्रयो ह्यस्य गृहृतोऽनु-युगं तनूः । शुक्लो रक्तस्तथा पीत इदानीं कृष्णतां गतः ॥
३६॥
जब यह बालक (कृष्ण) विभिन्न युगों में प्रकट होता है, तो उसके अन्य तीन रंग होते हैं-श्वेत, लाल तथा पीत। इस समय यह दिव्य श्याम (कृष्ण) रंग में प्रकट हुआ है।
शुक्ल, रक्त, पीत-वर्ण-एइ तिन द्युति ।। सत्य-त्रेता-कलि-काले धरेन श्री-पति ॥
३७॥
श्वेत, लाल तथा पीत-ये तीन शारीरिक कान्तियाँ हैं, जिन्हें लक्ष्मीदेवी के पति भगवान् क्रमशः सत्य, त्रेता तथा कलियुग में धारण करते हैं।
इदानीं द्वापरे तिंहो हैला कृष्ण-वर्ण ।एइ सब शास्त्रागम-पुराणेर मर्म ॥
३८॥
अब द्वापर युग में भगवान् श्याम रंग लेकर अवतरित हुए थे। इस दर्भ में पुराणों तथा अन्य वैदिक ग्रंथों के कथनों का यही सार है।
द्वापरे भगवान्श्यामः पीत-वासा निजायुधः ।।श्री-वत्सादिभिरकैश्च लक्षणैरुपलक्षितः ॥
३९॥
द्वापर युग में भगवान् कृष्ण वर्ण में प्रकट होते हैं। वे पीत वस्त्र पारण करते हैं, वे अपने आयुध ( हथियार) लिए रहते हैं तथा कौस्तुभ मणि एवं श्रीवत्स चिह्न से अलंकृत रहते हैं। उनके लक्षणों का ऐसा वर्णन किया गया है।
कलि-युगे युग-धर्म-नामेर प्रचार ।। तथि लागि' पीत-वर्ण चैतन्यावतार ॥
४० ॥
कलियुग की धार्मिक विधि यह है कि भगवान् के पवित्र नाम की । महिमाओं का प्रसार किया जाये। केवल इसी उद्देश्य से भगवान् पीत रंग लेकर श्री चैतन्य रूप में अवतरित हुए हैं।
तप्त-हेम-सम-कान्ति, प्रकाण्ड शरीर ।। नव-मेघ जिनि कण्ठ-ध्वनि ग्रे गम्भीर ॥
४१॥
उनके विस्तृत शरीर की कान्ति पिघले सोने के समान है। उनकी गम्भीर वाणी नये उमड़े बादलों की गर्जना को परास्त करने वाली है।
दैर्ध्व-विस्तारे येइ आपनार हात ।। चारि हस्त हय ‘महा-पुरुष' विख्यात ।। ४२।। जो व्यक्ति अपने हाथ से चार हाथ ऊँचा और इतना ही चौड़ा होता यह महापुरुष कहलाता है।
'न्यग्रोध-परिमण्डल' हय ताँर नाम ।न्यग्रोध-परिमण्डल-तनु चैतन्य गुण-धाम ॥
४३॥
ऐसा व्यक्ति न्यग्रोध परिमण्डल कहलाता है। समस्त सद्गुणों के मूर्तिमन्त स्वरूप श्री चैतन्य महाप्रभु का शरीर न्यग्रोध परिमण्डल है।
आजानुलम्बित-भुज कमल-लोचन ।।तिलफुल-जिनि-नासा, सुधांशु-वदन ॥
४४॥
उनकी भुजाएँ इतनी लम्बी हैं कि वे उनके घुटनों तक पहुँचती हैं, उनकी आँखें कमल के फूलों के सदृश हैं, उनकी नासिका तिल के फूल और उनका मुखमंडल चन्द्रमा के समान सुन्दर है।
शान्त, दान्त, कृष्ण-भक्ति-निष्ठा-परायण ।भक्त-वत्सल, सुशील, सर्व-भूते सम ॥
४५ ॥
है शान्त, संयमित तथा भगवान् श्रीकृष्ण की दिव्य सेवा में निष्ठा गई। वे अपने भक्तों के प्रति स्नेहिल हैं, सुशील हैं और सारे जीवों समभाव रखने वाले हैं।
चन्दनेर अङ्गद-बाला, चन्दन-भूषण ।।नृत्य-काले परि' करेन कृष्ण-सङ्कीर्तन ॥
४६॥
वे चन्दन के बने कंगनों और बाजूबन्दों से विभूषित हैं और वे चन्दन नेप से मंडित हैं। वे श्रीकृष्ण-संकीर्तन में नृत्य करने के उद्देश्य से ही भाभूषण धारण करते हैं।
एई सब गुण ला मुनि वैशम्पायन ।सहस्र-नामे कैल ताँर नाम-गणन ॥
४७॥
श्री चैतन्य के इन सारे गुणों को लिपिबद्ध करते हुए मुनि वैशम्पायन । पह श्लोक महाभारत (दानधर्म, विष्णुसहस्रनाम स्तोत्र) से लिया गया है। ने विष्णुसहस्रनाम में उनका नाम सम्मिलित कर लिया है।
दुई लीला चैतन्येर–आदि आर शेष ।।दुइ लीलाय चारि चारि नाम विशेष ॥
४८॥
श्री चैतन्य की लीला के दो विभाग हैं-आदि लीला तथा शेष लीला। इन दोनों लीलाओं में उनके चार-चार नाम हैं।
सुवर्ण-वर्णो हेमाङ्गो वराङ्गश्चन्दनाङ्गदी ।।सन्यास-कृच्छमः शान्तो निष्ठा-शान्ति-परायणः ॥
४९॥
अपनी आदि लीला में वे सुनहरे अंग वाले गृहस्थ के रूप में प्रकट होते हैं। उनके अंग-प्रत्यंग सुन्दर तथा उनका चन्दन-लेपित शरीर पिघले सोने जैसा लगता है। शेष लीला में वे संन्यास ग्रहण करते हैं और वे समभाव वाले तथा शान्त रहते हैं। वे शान्ति तथा भक्ति के सर्वोच्च धामहैं, क्योंकि वे निर्विशेषवादी अभक्तों को चुप करा देते हैं।
व्यक्त करि' भागवते कहे बार बार ।। कलि-युगे धर्म-नाम-सङ्कीर्तन सार ॥
५०॥
श्रीमद्भागवत में यह बारम्बार स्पष्ट रूप से कहा गया है कि कलियुग में धर्म का सार कृष्ण के पवित्र नाम का कीर्तन करना है।
इति द्वापर उर्वीश स्तुवन्ति जगदीश्वरम् ।। नाना-तन्त्र-विधानेन कलावपि यथा शृणु ॥
५१॥
हे राजन्, इस प्रकार द्वापर युग में लोगों ने ब्रह्माण्ड के स्वामी की । पूजा की। वे कलियुग में भी पूर्ण पुरुषोत्तम भगवान् की पूजा शास्त्रोक्त विधियों से करते हैं। कृपा करके इसे मुझसे सुनें।
कृष्ण-वर्णं त्विषाकृष्णं साङ्गोपाङ्गास्त्र-पार्षदम् । यज्ञैः सङ्कीर्तन-प्रायैर्यजन्ति हि सु-मेधसः ॥
५२॥
कलियुग में बुद्धिमान व्यक्ति ईश्वर के उन अवतार की पूजा करने लिए सामूहिक कीर्तन करते हैं, जो कृष्ण-नाम का निरन्तर गान करते पयपि उनका शरीर श्यामवर्ण का नहीं है, किन्तु वे स्वयं कृष्ण हैं। के साथ उनके पार्षद, सेवक, आयुध तथा विश्वस्त संगी रहते हैं।
शुन, भाइ, एइ सब चैतन्य-महिमा । एइ श्लोके कहे ताँर महिमार सीमा ॥
५३॥
प्रिय भाइयों, कृपया चैतन्य महाप्रभु की इन सारी महिमाओं को सुनो। यह श्लोक स्पष्टतया उनके कार्यकलापों तथा लक्षणों का सार प्रस्तुत करता है।
'कृष्ण' एइ दुइ वर्ण सदा ग्राँर मुखे । अथवा, कृष्णके तिंहो वर्णे निज सुखे ॥
५४॥
‘कृष्' तथा 'ण' ये दो अक्षर सदैव उनके मुख में रहते हैं; अथवा, वे अत्यन्त हर्ष के साथ कृष्ण को निरन्तर वर्णन करते हैं।
कृष्ण-वर्ण-शब्देर अर्थ दुइ त प्रमाण ।।कृष्ण विनु ताँर मुखे नाहि आइसे आन ॥
५५॥
कृष्णवर्ण शब्द के ये ही दो अर्थ हैं। वस्तुतः कृष्ण के अतिरिक्त अन्य कुछ भी उनके मुख से नहीं निकलता।
केह ताँरै बले ग्रदि कृष्ण-वरण ।आर विशेषणे तार करे निवारण ॥
५६॥
यदि कोई उन्हें श्याम रंग (वर्ण) वाला कहने का प्रयास करता है, तो अगला विशेषण ( त्विषा अकृष्णम्) तुरन्त ही उसका निवारण करता है।
देह-कान्त्ये हय तेंहो अकृष्ण-वरण ।अकृष्ण-वरणे कहे पीत-वरेण ॥
५७॥
उनके शरीर की कान्ति निश्चित रूप से श्याम (कृष्ण) नहीं है। वे वाम नहीं हैं, इससे यह सूचित होता है कि उनका रंग पीला है।
कलौ ग्रं विद्वांसः स्फुटमभियजन्ते द्युति-भराद् ।अकृष्णाङ्गं कृष्णं मख-विधिभिरुत्कीर्तन-मयैः । उपास्यं च प्राहुर्घमखिल-चतुर्थाश्रम-जुषां।स देवश्चैतन्याकृतिरतितरां नः कृपयतु ॥
५८॥
कलियुग में पवित्र नाम के संकीर्तन-यज्ञ द्वारा विद्वान लोग उन भगवान् कृष्ण की पूजा करते हैं, जो श्रीमती राधारानी की भावनाओं के तीव्र वेग के कारण अब अकृष्ण हैं। वे उन परमहंसों के एकमात्र आराध्य देव हैं, जिन्होंने चतुर्थ आश्रम ( संन्यास) की सर्वोच्च अवस्था प्राप्त का ली है। ऐसे पूर्ण पुरुषोत्तम चैतन्य महाप्रभु हम पर अपनी अहैतुकी कृष्ण प्रदर्शित करें।
प्रत्यक्ष ताँहार तप्त-काञ्चनेर द्युति ।। याँहार छटाय नाशे अज्ञान-तमस्तति ॥
५९॥
उनके पिघले सोने जैसे चमकीले रंग को प्रत्यक्ष देखा जा सकता है, जो अज्ञान के अंधकार को दूर करता है।
जीवेर कल्मष-तमो नाश करिबारे ।। अङ्ग-उपाङ्ग-नाम नाना अस्त्र धरे ॥
६०॥
जीवों का पापमय जीवन अज्ञान से उत्पन्न होता है। उस अज्ञान को नष्ट करने के लिए वे अनेक अस्त्र अपने साथ लाये हैं यथा उनके 'शरूपी पार्षद, उनके भक्त तथा उनका पवित्र नाम।
भक्तिर विरोधी कर्म-धर्म वा अधर्म । ताहारऽकल्मष' नाम, सेइ महा-तमः ॥
६१॥
। सबसे बड़े अज्ञानरूप वे धार्मिक या अधार्मिक कार्यकलाप हैं, जो भक्ति के विरोधी होते हैं। वे कल्मष अर्थात् पाप कहलाते हैं।
बाहु तुलि' हरि बलि' प्रेम-दृष्ट्ये चाय ।करिया कल्मष नाश प्रेमेते भासाय ॥
६२॥
अपनी भुजाएँ उठाकर, पवित्र नाम का कीर्तन करते हुए और सबको न प्रेम से देखते हुए वे समस्त पापों को दूर कर देते हैं और भगवान् प्रेम से सबको आप्लावित कर देते हैं।
स्मितालोकः शोकं हरति जगतां यस्य परितोगिरां तु प्रारम्भः कुशल-पटली पल्लवयति । पदालम्भः कं वा प्रणयति न हि प्रेम-निवहं।स देवश्चैतन्याकृतिरतितरां नः कृपयतु ॥
६३॥
श्री चैतन्य के रूप में पूर्ण पुरुषोत्तम भगवान् हम पर अपनी अहैतुकी कृपा की वृष्टि करें। उनकी स्मितहास्य युक्त दृष्टि तुरन्त ही संसार के सारे शोकों को दूर कर देती है और उनकी वाणी शुभ भक्ति-लताओं को पल्लवित कर जीवन प्रदान करती है। उनके चरणकमलों की शरण लेने से तुरन्त ही दिव्य भगवत्प्रेम का उदय होता है।
श्री-अङ्ग, श्री-मुख ग्रेड करे दरशन ।। तार पाप-क्षय हेय, पाय प्रेम-धन ॥
६४॥
जो कोई भी उनके सुन्दर शरीर या सुन्दर मुख का दर्शन करता है, वह सारे पापों से मुक्त हो जाता है और भगवत्प्रेम रूपी सम्पत्ति को प्राप्त करता है।
अन्य अवतारे सब सैन्य-शस्त्र सङ्गे।। चैतन्य-कृष्णेर सैन्य अङ्ग-उपाङ्गे ॥
६५ ।। अन्य अवतारों में भगवान् सेना तथा अस्त्रों समेत अवतरित हुए, किन्तु इस अवतार में उनकी सेना उनके पूर्ण अंश तथा पार्षद हैं।
सदोपास्यः श्रीमान्धृत-मनुज-कायैः प्रणयितांवहद्भिर्गीर्वाणैर्गिरिश-परमेष्ठि-प्रभृतिभिः । स्व-भक्तेभ्यः शुद्धां निज-भजन-मुद्रामुपदिशन्स चैतन्यः किं मे पुनरपि दृशोर्यास्यति पदम् ॥
६६॥
भगवान् श्री चैतन्य महाप्रभु शिवजी तथा ब्रह्माजी समेत समस्त देवताओं के परम आराध्य देव हैं। ये देवता सामान्य मनुष्यों के वेश में उनके प्रति प्रेम प्रदर्शन करते हुए आये। वे अपने भक्तों को अपनी शुद्ध भक्ति का उपदेश देते हैं। क्या वे पुनः मेरे दृष्टिपथ पर विराजमान होंगे? आङ्गोपाङ्ग अस्त्र करे स्व-कार्य-साधन । ‘अङ्ग'-शब्देर अर्थ आर शुन दियो मन ॥
६७॥
उनके पूर्ण अंश तथा पार्षद अपना निजी विशेष कर्तव्य मानकर उनके अस्त्रों का कार्य करते हैं। कृपया मुझसे अङ्ग शब्द का दूसरा अर्थ सुनो।
‘अङ्ग'-शब्दे अंश कहे शास्त्र-परमाण। अङ्गेर अवयव उपाङ्ग'-व्याख्यान ॥
६८ ॥
प्रामाणिक शास्त्रों के प्रमाण के अनुसार शारीरिक अंग' भी अंश लाता है और अंग के अंश को उपांग कहते हैं।
नारायणस्त्वं न हि सर्व-देहिनाम्आत्मास्यधीशाखिल-लोक-साक्षी । नारायणोऽङ्गं नर-भू-जलायनात् ।तच्चापि सत्यं न तवैव माया ॥
६९ ॥
हे प्रभुओं के प्रभु! आप सारी सृष्टि के दृष्टा हैं। आप हर एक के परम प्रिय प्राण हैं। तो इसलिए क्या आप मेरे पिता नारायण नहीं हैं?'नारायण' मका सूचक है, जिसका निवास नर (गर्भोदकशायी विष्णु) से उत्पन्न जल में है और वे नारायण आपके पूर्ण अंश हैं। आपके सारे पूर्ण अंश दिव्य हैं। वे परम पूर्ण हैं और माया द्वारा सृजित नहीं हैं।
जल-शायी अन्तर्यामी ग्रेइ नारायण ।सेहो तोमार अंश, तुमि मूल नारायण ॥
७० ॥
हर एक के हृदय में विद्यमान रहने वाले नारायण तथा जल ( कारण, गर्भ तथा क्षीर) में रहने वाले नारायण आपके ही पूर्ण अंश हैं। अतएव आप मूल नारायण हैं।
‘अङ्ग'-शब्दे अंश कहे, सेहो सत्य हय ।।माया-कार्ड्स नहे---सब चिदानन्द-मय ॥
७१॥
‘अंग' शब्द निश्चय ही पूर्ण अंश का सूचक है। ऐसे प्राकट्यों को कभी भी भौतिक प्रकृति की उपज नहीं मानना चाहिए, क्योंकि वे सभी दिव्य, ज्ञान एवं आनन्द से पूर्ण हैं।
अद्वैत, नित्यानन्द–चैतन्येर दुइ अङ्ग ।।अङ्गेर अवयव-गण कहिये उपाङ्ग ॥
७२॥
श्री अद्वैत प्रभु और श्री नित्यानन्द प्रभु दोनों ही चैतन्य महाप्रभु के पूर्ण अंश हैं। इस प्रकार वे उनके शरीर के अंग हैं। इन दोनों अंगों के अंश उपांग कहलाते हैं।
अङ्गोपाङ्ग तीक्ष्ण अस्त्र प्रभुर सहिते ।।सेइ सब अस्त्र हय पाषण्ड दलिते ॥
७३॥
इस तरह भगवान् अपने अंगों तथा उपांगों रूपी तीक्ष्ण अस्त्रों से सुसज्जित हैं। ये सारे अस्त्र श्रद्धाविहीन नास्तिकों का दलन करने में सक्षम हैं।
नित्यानन्द गोसाञि साक्षात् हलधर । अद्वैत आचार्य गोसाञि साक्षातीश्वर ॥
७४॥
श्री नित्यानन्द गोसांई साक्षात् हलधर ( भगवान् बलराम) हैं और अति आचार्य साक्षात् ईश्वर हैं।
श्रीवासादि पारिषद सैन्य सङ्गे ला । दुइ सेनापति बुले कीर्तन करिया ॥
७५॥
ये दोनों सेनापति, श्रीवास ठाकुर जैसे अपने सैनिकों के साथ, पवित्र भगवन्नाम का कीर्तन करते हुए सर्वत्र विचरण करते हैं।
पाषण्ड-दलन-वाना नित्यानन्द राय ।। आचार्य-हुङ्कारे पाप-पाषण्डी पलाय ॥
७६ ॥
नित्यानन्द प्रभु के स्वरूप से ही सूचित होता है कि वे पाषण्डियों के दलनकर्ता हैं। अद्वैत आचार्य की ऊंची गर्जना से सारे पाप तथा सारे पाषण्डी भाग खड़े होते हैं।
सङ्कीर्तन-प्रवर्तक श्रीकृष्ण-चैतन्य । सङ्कीर्तन-यज्ञे ताँरै भजे, सेइ धन्य । ७७॥
भगवान् श्रीकृष्ण चैतन्य संकीर्तन ( भगवन्नाम के सामूहिक कीर्तन)के प्रवर्तक हैं। जो संकीर्तन के माध्यम से उनकी पूजा करता है, वह । भाग्यवान है।
सेइ त' सुमेधा, आर कुबुद्धि संसार ।सर्व-व्रज्ञ हैते कृष्ण-नाम-व्रज्ञ सार ॥
७८॥
ऐसा व्यक्ति सचमुच बुद्धिमान है, जबकि अन्य अल्पज्ञानी व्यक्तियों जन्म-मृत्यु के चक्र को भोगना पड़ता है। समस्त यज्ञों में भगवान् के नाम का कीर्तन सर्वश्रेष्ठ यज्ञ है।
कोटि अश्वमेध एक कृष्ण नाम सम ।येइ कहे, से पाषण्डी, दण्डे तारे ग्रम ॥
७९ ॥
जो व्यक्ति यह कहता है कि एक करोड़ अश्वमेध यज्ञ भगवान् कृष्ण के पवित्र नाम के कीर्तन के तुल्य है, वह निश्चित रूप से नास्तिक है। उसे यमराज अवश्य दण्डित करते हैं।
भागवत-सन्दर्भ-ग्रन्थेर मङ्गलाचरणे ।। ए-श्लोक जीव-गोसाञि करियाछेन व्याख्याने ॥
८० ॥
भागवत-सन्दर्भ के मंगलाचरण में श्रील जीव गोस्वामी ने इसकी पाख्या में निम्नलिखित श्लोक दिया है।
अन्तः कृष्णं बहिर्गीरं दर्शिताङ्गादि-वैभवम् ।।कलौ सङ्कीर्तनाद्यैः स्म कृष्ण-चैतन्यमाश्रिताः ॥
८१॥
मैं भगवान् श्रीकृष्ण चैतन्य महाप्रभु का आश्रय ग्रहण करता हूँ, जो बाहर से गौर वर्ण के हैं, किन्तु भीतर से स्वयं कृष्ण हैं। इस कलियुग में घे भगवान् के पवित्र नाम का संकीर्तन करके अपने विस्तारों अर्थात् अपने अंगों तथा उपांगों का प्रदर्शन करते हैं।
उप-पुराणेह शुनि श्री कृष्ण-वचन ।कृपा करि व्यास प्रति करियाछेन कथन ॥
८२॥
उपपुराणों में हम श्रीकृष्ण को व्यासदेव पर यह कहकर अपनी कृपा प्रदर्शित करते सुनते हैं।
अहमेव क्वचिद्बह्मन्सन्यासाश्रममाश्रितः । हरि-भक्तिं ग्राहयामि कलौ पाप-हतान्नरान् ॥
८३॥
हे विद्वान ब्राह्मण, कभी-कभी मैं कलियुग के पतित लोगों को भगवद्भक्ति के लिए प्रेरित करने हेतु संन्यास आश्रम ग्रहण करता हूँ।
भागवत, भारत-शास्त्र, आगम, पुराण । चैतन्य-कृष्ण-अवतारे प्रकट प्रमाण ॥
८४॥
श्रीमद्भागवत, महाभारत, पुराण तथा अन्य वैदिक साहित्य यह सिद्ध भरने के लिए प्रमाण देते हैं कि श्रीकृष्ण चैतन्य महाप्रभु कृष्ण के अवतार है।
प्रत्यक्षं देखह नाना प्रकट प्रभाव । अलौकिक कर्म, अलौकिक अनुभाव ॥
८५॥
कोई भी व्यक्ति भगवान् चैतन्य के प्रकट प्रभाव को उनके असाधारण कार्यों तथा असामान्य कृष्ण-भावानुभूति से भी प्रत्यक्ष देख सकता है।
त्वां शील-रूप-चरितैः परम-प्रकृष्टैः ।सत्त्वेन सात्त्विकतया प्रबलैश्च शास्त्रैः ।। प्रख्यात-दैव-परमार्थ-विदां मतैश्च । नैवासुर-प्रकृतयः प्रभवन्ति बोद्भुम् ॥
८७॥
प्रभु, जो लोग आसुरी वृत्तियों से प्रभावित हैं, वे आपकी अनुभूति कर सकते। यद्यपि आप अपने महान् कार्यो, रूपों, चरित्र तथा मान्य शक्ति के कारण स्पष्ट रूप से सर्वश्रेष्ठ हैं, जिनकी पुष्टि सभी क शास्त्रों और दिव्य प्रकृति वाले विख्यात अध्यात्मवादियों द्वारा होती है।
देखिया ना देखे व्रत अभक्तेर गण । उलूके ना देखे ग्रेन सूर्येर किरण ॥
८६॥
किन्तु श्रद्धाविहीन अभक्त लोग स्पष्ट दिखाई देने वाली वस्तु को भी । नहीं देखते, जिस तरह उल्लू सूर्य की किरणों को नहीं देखते।
आपना लुकाइते कृष्ण नाना ग्रन करे । तथापि ताँहार भक्त जानये ताँहारे ॥
८८॥
के भगवान् श्रीकृष्ण अपने आपको छिपाने का प्रयत्न अनेक प्रकार से रते हैं, फिर भी उनके भक्त उन्हें यथार्थ रूप में जान ही लेते हैं।
उल्लङ्घित-त्रिविध-सीम-समातिशायिसम्भावनं तव परिव्रढ़िम-स्वभावम् । माया-बलेन भवतापि निगुह्यमानंपश्यन्ति केचिदनिशं त्वदनन्य-भावाः ॥
८९॥
हे प्रभु, भौतिक प्रकृति के भीतर हर वस्तु काल, देश तथा विचार में सीमित है। फिर भी आपके गुण अद्वितीय तथा असीम होने से ऐसी सीमाओं से सदैव परे होते हैं। कभी-कभी आप इन गुणों को अपनी ही शक्ति से ढक लेते हैं, फिर भी आपके अनन्य भक्त हर परिस्थिति में आपका दर्शन पाने में समर्थ हैं।
असुर-स्वभावे कृष्णे कभु नाहि जाने ।लुकाइते नारे कृष्ण भक्त-जन-स्थाने ॥
९० ॥
। जो आसुरी स्वभाव के हैं, वे कभी भी कृष्ण को नहीं जान सकते, किन्तु कृष्ण अपने शुद्ध भक्तों से अपने आपको छिपा नहीं पाते।
द्वौ भूत-सर्गी लोकेऽस्मिन्दैव आसुर एव च ।विष्णु-भक्तः स्मृतो दैव आसुरस्तद्विपर्ययः ॥
९१ ॥
इस भौतिक संसार में दो प्रकार के लोग होते हैं। एक तो वे जो आसुरी हैं और दूसरे वे जो दैवी हैं। भगवान् विष्णु के भक्त दैवी हैं, किन्तु जो इनके सर्वथा विपरीत हैं, वे असुर कहलाते हैं।
आचार्य गोसाजि प्रभुर भक्त-अवतार ।कृष्ण-अवतार-हेतु याँहार हुङ्कार ॥
९२॥
अद्वैत आचार्य गोस्वामी भक्त के रूप में भगवान् के अवतार हैं। मकी ऊँची गर्जना से ही कृष्ण अवतरित हुए थे।
कृष्ण यदि पृथिवीते करेन अवतार ।प्रथमे करेन गुरु-वर्गेर सञ्चार ॥
९३॥
जब भी श्रीकृष्ण इस धरा पर अवतरित होना चाहते हैं, तब सर्वप्रथम में अपने पूज्य गुरुवर्गों को अवतरित कराते हैं।
पिता माता गुरु आदि ग्रत मान्य-गण ।प्रथमे करेन सबार पृथिवीते जनम ॥
९४॥
इस प्रकार सर्वप्रथम पृथ्वी पर आदरणीय लोगों यथा उनके पिता, माता तथा गुरु का जन्म होता है।
माधव-ईश्वर-पुरी, शची, जगन्नाथ ।। अद्वैत आचार्य प्रकट हैली सेइ साथ ॥
९५ ।। माधवेन्द्र पुरी, ईश्वर पुरी, श्रीमती शचीमाता तथा श्रील जगन्नाथ मिश्र-ये सभी श्री अद्वैत आचार्य के साथ साथ प्रकट हुए।
प्रकटिया देखे आचार्य सकल संसार । कृष्ण-भक्ति गन्ध-हीन विषय-व्यवहार ॥
९६॥
अद्वैत आचार्य ने प्रकट होने के बाद देखा कि संसार श्रीकृष्ण की। भक्ति से विहीन है, क्योंकि लोग भौतिक व्यापारों में व्यस्त थे।
केह पापे, केह पुण्ये करे विषय-भोग ।।भक्ति-गन्ध नाहि, ग्राते ग्राय भव-रोग ॥
९७॥
। प्रत्येक व्यक्ति, चाहे पापवश हो या पुण्यवश, भौतिक भोग में लगा आ था। कोई भी भगवान् की दिव्य सेवा में रुचि नहीं रखता था, जिससे जन्म-मरण के चक्र से छुटकारा प्राप्त हो सकता है।
लोक-गति देखि' आचार्य करुण-हृदय ।। विचार करेन, लोकेर कैछे हित हय ॥
९८॥
संसार के कार्यकलापों को देखकर आचार्य को दया आई और वे विचार करने लगे कि वे जनता का हित किस तरह करें।
आपनि श्री कृष्ण यदि करेन अवतार ।।आपने आचरि' भक्ति करेन प्रचार ॥
९९॥
नुवाद (अद्वैत आचार्य ने सोचा :) यदि श्रीकृष्ण अवतार के रूप में प्रकट हों, तो वे स्वयं अपने व्यक्तिगत उदाहरण द्वारा भक्ति का प्रचार कर सकते है ।
नाम विनु कलि-काले धर्म नाहि आर।।कलि-काले कैछे हबे कृष्ण अवतार ॥
१०० ॥
इस कलियुग में भगवान् के पवित्र नाम के कीर्तन के अतिरिक्त अन्य कोई धर्म नहीं है, लेकिन इस युग में भगवान् किस तरह अवतार लेंगे? शुद्ध-भावे करिब कृष्णेर आराधन ।। निरन्तर सदैन्ये करिब निवेदन ॥
१०१॥
मैं शुद्ध मन से कृष्ण की पूजा करूंगा। मैं उनसे निरन्तर विनीत भाव से निवेदन करूंगा।
आनिया कृष्णेरे करों कीर्तन सञ्चार ।तबे से 'अद्वैत' नाम सफल आमार ॥
१०२॥
मेरा 'अद्वैत' नाम तभी सार्थक होगा, जब मैं कृष्ण को पवित्र नामकीर्तन आन्दोलन का प्रवर्तन करने के लिए प्रेरित कर सकेंगा।
कृष्ण वश करिबेन कोनाराधने ।विचारिते एक श्लोक आइल ताँर मने ॥
१०३ ॥
जब वे पूजा द्वारा कृष्ण को वश में करने के विषय में सोच रहे थे, तब उनके मन में निम्नलिखित श्लोक आया।
तुलसी-दल-मात्रेण जलस्य चुलुकेन वा ।।विक्रीणीते स्वमात्मानं भक्तेभ्यो भक्त-वत्सलः ॥
१०४॥
अपने भक्तों के प्रति अत्यन्त वत्सल श्रीकृष्ण अपने आपको उस भक्त के हाथ बेच देते हैं, जो उन्हें केवल तुलसीदल तथा एक अंजलिभर जल अर्पित करता है।
एई श्लोकार्थ आचार्य करेन विचारण । कृष्णके तुलसी-जल देय येइ जन ॥
१०५॥
तार ऋण शोधिते कृष्ण करेन चिन्तन-। ‘जल-तुलसीर सम किछु घरे नाहि धन' ॥
१०६॥
। अद्वैत आचार्य ने इस श्लोक के अर्थ पर इस प्रकार विचार किया : को कृष्ण को तुलसीदल तथा जल अर्पित करता है, उसके ऋण को काने की कोई विधि ने पाकर भगवान् कृष्ण सोचते हैं, ‘मेरे पास ऐसी कोई सम्पत्ति नहीं जो तुलसीदल तथा जल की समता कर सके।'
तबे आत्मा वेचि' करे ऋणेर शोधन ।एत भावि' आचार्य करेन आराधन ॥
१०७॥
इस प्रकार भगवान् अपने आपको भक्त के हाथ अर्पित करके अपना vण चुकाते हैं। इस तरह विचार करके आचार्य ने भगवान् की आराधना प्रारम्भ कर दी।
गङ्गा-जल, तुलसी-मञ्जरी अनुक्षण ।। कृष्ण-पाद-पद्म भावि' करे समर्पण ॥
१०८॥
श्रीकृष्ण के चरणकमलों का चिन्तन करते हुए उन्होंने गंगाजल में तुलसी मंजरियाँ मिलाकर निरन्तर अर्पित कीं।
कृष्णेर आह्वान करे करिया हुङ्कार ।। ए-मते कृष्णेरे कराइल अवतार ॥
१०९॥
उन्होंने जोर-जोर से श्रीकृष्ण से विनती की और इस तरह कृष्ण का तरित होना सम्भव हुआ।
चैतन्येर अवतारे एइ मुख्य हेतु ।।भक्तेर इच्छाय अवतरे धर्म-सेतु ॥
११०॥
अतएव श्री चैतन्य के अवतार का मुख्य कारण अद्वैत आचार्य की ड विनती है। धर्म के संरक्षक भगवान् अपने भक्त की इच्छा से प्रकट होते है । त्वं भक्ति-स्रोग-परिभावित-हृत्सरोजआस्से श्रुतेक्षित-पथो ननु नाथ पुंसाम् । ग्रद् ग्रद्धिया त उरुगाय विभावयन्तितत्तद्वपुः प्रणयसे सदनुग्रहाये ॥
१११॥
हे प्रभु, आप अपने शुद्ध भक्तों की दृष्टि तथा श्रुति में सदैव वास आप उनके कमल सदृश हृदयों में भी निवास करते हैं, जो भक्ति द्वारा निर्मल हो चुके होते हैं। हे भगवान्, आप उत्कृष्ट स्तुतियों से महिमान्वित होते हैं। आपके भक्त आपके जिन सनातन रूपों में आपका स्वागत करते हैं, उन रूपों में प्रकट होकर आप उन पर विशेष अनुग्रह करते हैं।
एइ श्लोकेर अर्थ कहि सक्षेपेर सार। भक्तेर इच्छाय कृष्णेर सर्व अवतार ॥
११२॥
इस श्लोक का भावार्थ यह है कि भगवान् अपने शुद्ध भक्तों की इच्छा से अपने असंख्य शाश्वत रूपों में प्रकट होते हैं। चतुर्थ श्लोकेर अर्थ हैल सुनिश्चिते । अवतीर्ण हैला गौर प्रेम प्रकाशिते ॥
११३॥
इस प्रकार मैंने चौथे श्लोक का अर्थ निश्चित कर दिया है। गौरांग महाप्रभु ईश्वर के अनन्य प्रेम का प्रचार करने के लिए अवतार के रूप में । प्रकट हुए।
श्री-रूप-रघुनाथ-पदे यार आश ।चैतन्य-चरितामृत कहे कृष्णदास ॥
११४॥
श्री रूप तथा श्री रघुनाथ के चरणकमलों में प्रार्थना करते हुए, सदैव उनकी कृपा की आकांक्षा से, मैं कृष्णदास उनके चरणचिह्नों का अनुसरण करते हुए श्री चैतन्य-चरितामृत का वर्णन कर रहा हूँ।
