अध्याय चार: श्री चैतन्य महाप्रभु के प्रकट होने के गोपनीय कारण
श्री-चैतन्य-प्रसादेन तद्रूपस्य विनिर्णयम् । बालोऽपि कुरुते शास्त्रं दृष्ट्वा व्रज-विलासिनः ॥
१॥
भगवान् श्री चैतन्य महाप्रभु की कृपा से एक मूर्ख बालक भी शास्त्रों की दृष्टि के अनुसार व्रज-लीलाओं के भोक्ता भगवान् कृष्ण के वास्तविक आप का पूर्ण वर्णन कर सकता है।
जय जय श्री-चैतन्य जय नित्यानन्द ।जयाद्वैत-चन्द्र जय गौर-भक्त-वृन्द ॥
२॥
भगवान् श्री चैतन्य महाप्रभु की जय हो! श्री नित्यानन्द प्रभु की जय भी अद्वैत आचार्य की जय हो! श्री चैतन्य महाप्रभु के समस्त भक्तों जो जय हो! चतुर्थ श्लोकेर अर्थ कैल विवरण ।।पञ्चम श्लोकेर अर्थ शुने भक्त-गण ॥
३॥
मैंने चतुर्थ श्लोक के अर्थ का वर्णन किया है। अब, हे भक्तों! कृपा । करके पाँचवे श्लोक की व्याख्या सुनो।
मूल-श्लोकेर अर्थ करिते प्रकाश ।अर्थ लागाइते आगे कहिये आभास ॥
४॥
मूल श्लोक की व्याख्या करने के लिए मैं पहले इसका अर्थ बताऊँगा।
चतुर्थ श्लोकेर अर्थ एइ कैल सार ।।प्रेम-नाम प्रचारिते एइ अवतार ॥
५॥
मैंने चतुर्थ श्लोक का सार रूपी अर्थ दे दिया है-यह अवतार ( श्री चैतन्य महाप्रभु) पवित्र नाम के कीर्तन का प्रचार करने तथा भगवत्प्रेम के प्रसार के लिए होता है।
सत्य एइ हेतु, किन्तु एहो बहिरङ्ग ।। आर एक हेतु, शुन, आछे अन्तरङ्ग ॥
६॥
। यद्यपि यह सच है, किन्तु यह तो भगवान् के अवतार का बाह्य कारण है । कृपा करके भगवान् के आविर्भाव का एक अन्य कारण-गुह्य - ज-भी सुनें।
पूर्वे ग्रेन पृथिवीर भार हरिबारे ।।कृष्ण अवतीर्ण हैला शास्त्रेते प्रचारे ॥
७॥
शास्त्र यही घोषणा करते हैं कि इसके पूर्व भगवान् कृष्ण पृथ्वी का पर उतारने के लिए अवतरित हुए थे।
स्वयं-भगवानेर कर्म नहे भार-हरण । स्थिति-कर्ता विष्णु करेन जगत्पालन ॥
८॥
किन्तु यह भार उतारना पूर्ण पुरुषोत्तम भगवान् का कार्य नहीं है। पालनकर्ता भगवान् विष्णु ही ब्रह्माण्ड की रक्षा करते हैं।
किन्तु कृष्णेर येइ हय अवतार-काल ।भार-हरण-काल ताते हइल मिशाल ॥
९॥
किन्तु संसार का भार उतारने का काल कृष्ण के अवतार-काल के साथ मिश्रित हो गया।
पूर्ण भगवानवतरे ग्रेइ काले ।आर सब अवतार ताँते आसि' मिले ॥
१०॥
व पूर्ण पुरुषोत्तम भगवान् अवतरित होते हैं, तब भगवान् के अन्य अवतार उनमें आकर मिल जाते हैं।
नारायण, चतुयूंह, मत्स्याद्यवतार । ग्रुग-मन्वन्तरावतार, यत आछे आर ॥
११॥
सबे आसि' कृष्ण-अङ्गे हय अवतीर्ण । ऐछे अवतरे कृष्ण भगवान्पूर्ण ॥
१२॥
भगवान् नारायण, चार मूल विस्तार (वासुदेव, संकर्षण, प्रद्युम्न तथा अनिरुद्ध), मत्स्य तथा अन्य लीला अवतार, युगावतार तथा मन्वन्तर अवतार-तथा अन्य जितने सारे अवतार हैं-वे सभी कृष्ण के शरीर में अवतरित होते हैं। इस प्रकार पूर्ण भगवान्, साक्षात् श्रीकृष्ण प्रकट होते हैं।
अतएव विष्णु तखन कृष्णेर शरीरे ।विष्णु-द्वारे करे कृष्ण असुर-संहारे ॥
१३॥
अतएव उस समय भगवान् विष्णु भगवान् कृष्ण के शरीर में उपस्थित रहते हैं और भगवान् कृष्ण उनके माध्यम से असुरों का संहार करते हैं।
आनुषङ्ग-कर्म एइ असुर-मारण । ।लागि' अवतार, कहि से मूल कारण ॥
१४॥
इस प्रकार असुरों का संहार तो गौण कार्य होता है। अब मैं कृष्ण के अवतार का मुख्य कारण बतलाऊँगा।
प्रेम-रस-निर्वास करिते आस्वादन । राग-मार्ग भक्ति लोके करिते प्रचारण ॥
१५॥
रसिक-शेखर कृष्ण परम-करुण ।एइ दुइ हेतु हैते इच्छार उद्गम ॥
१६॥
अवतार लेने की भगवान् की इच्छा दो कारणों से उत्पन्न हुई थीगवत्प्रेम रस के माधुर्य का आस्वादन करना चाह रहे थे और वे संसार भक्ति का प्रसार रागानुगा ( स्वयंस्फूर्त ) अनुरक्ति के स्तर पर करना चाहते थे। इस तरह वे परम प्रफुल्लित ( रसिकशेखर) एवं परम तणामय नाम से विख्यात हैं।
ऐश्वर्य-ज्ञानेते सब जगत्मिश्रित ।।ऐश्वर्य-शिथिल-प्रेमे नाहि मोर प्रीत ॥
१७॥
( भगवान् कृष्ण ने सोचा :) सारा ब्रह्माण्ड मेरे ऐश्वर्य भाव से पूरित है, किन्तु उस ऐश्वर्य के भाव से दुर्बल हुआ प्रेम मुझे सन्तुष्ट नहीं करता।
आमारे ईश्वर माने, आपनाके हीन ।।तार प्रेमे वश आमि ना होइ अधीन ॥
१८॥
यदि कोई मुझे परमेश्वर समझता है और अपने आपको मेरे अधीन मानता है, तो मैं न तो उसके प्रेम के अधीन होता हूँ, न ही उसका प्रेम मुझे वश में कर सकता है।
आमाके त' ने ये भक्त भजे येइ भावे ।। तारे से से भावे भजि,-ए मोर स्वभावे ॥
१९॥
। मेरा भक्त जिस भी दिव्य रस में मेरी पूजा करता है, उसी भाव में मैं । के साथ आदान-प्रदान करता हूँ। यह मेरा सहज स्वभाव है।
ने ग्रथा मां प्रपद्यन्ते तांस्तथैव भजाम्यहम् ।।मम वर्मानुवर्तन्ते मनुष्याः पार्थ सर्वशः ॥
२० ॥
मेरे भक्तजन जिस किसी रूप में मेरी शरण में आते हैं, मैं उन्हें उसी के अनुसार पुरस्कृत करता हूँ। हे पृथापुत्र, सारे लोग सभी प्रकार से मेरे पथ का अनुसरण करते हैं।'
मोर पुत्र, मोर सखा, मोर प्राण-पति ।। एइ-भावे ग्रेइ मोरे करे शुद्ध-भक्ति ॥
२१॥
आपनाके बड़ माने, आमारे सम-हीन ।सेई भावे हई आमि ताहार अधीन ॥
२२ ॥
यदि कोई मुझे अपना पुत्र, अपना मित्र या अपना प्रेमी मानकर और अपने आपको महान् एवं मुझको अपने समान या अपने से निम्न मानकर मेरी शुद्ध प्रेमाभक्ति करता है, तो मैं उसके अधीन हो जाता हूँ।
मयि भक्तिर्हि भूतानाममृतत्वाय कल्पते । दिया ग़दासीन्मत्स्नेहो भवतीनां मदापनः ॥
२३॥
। जीवों द्वारा मेरे प्रति की गई भक्ति उनके सनातन जीवन को पुनरुज्जीवित करती है। हे व्रजबालाओं, मेरे प्रति तुम्हारा स्नेह तुम्हारा सौभाग्य है, क्योंकि इसी एकमात्र साधन से तुम लोगों ने मेरा अनुग्रह प्राप्त किया है।'
माता मोरे पुत्र-भावे करेन बन्धन ।। अतिहीन-ज्ञाने करे लालन पालन ॥
२४॥
मेरी माता कभी-कभी अपने पुत्र के रूप में मुझे बाँध देती है। वह -- अत्यन्त असहाय समझकर मेरा लालन-पालन करती है।
सखा शुद्ध-सख्ये करे, स्कन्धे आरोहण ।। तुमि कोन्बड़ लोक,—तुमि आमि सम ॥
२५ ॥
मेरे मित्र शुद्ध मैत्री के कारण मेरे कन्धों पर यह कहते हुए चढ़ जाते कि, 'तुम किस तरह के बड़े व्यक्ति हो? तुम और हम समान हैं।'
प्रिया ग्रदि मान करि' करये भर्सन । वेद-स्तुति हैते हरे सेइ मोर मन ॥
२६॥
यदि मेरी प्रियतमा रूठकर मेरी भत्र्सना करती है, तो वह वेदों की पावन स्तुतियों से बढ़कर मेरे मन का हरण कर लेती है।
एइ शुद्ध-भक्त लञा करिमु अवतार ।करिब विविध-विध अद्भुत विहार ॥
२७॥
वैकुण्ठाद्ये नाहि ग्रे ये लीलार प्रचार ।। से से लीला करिब, ग्राते मोर चमत्कार ॥
२८॥
मैं इन शुद्ध भक्तों को अपने साथ लेकर अवतरित हूँगा और अनेक प्रकार की ऐसी अद्भुत क्रीड़ाएँ करूंगा, जो वैकुण्ठ में भी अज्ञात हैं। मैं ऐसी ऐसी लीलाओं का प्रसार करूँगा, जो स्वयं मुझे भी आश्चर्यचकित करने वाली होंगी।
मो-विषये गोपी-गणेर उपपति-भावे ।ग्रोग-माया करिबेक आपन-प्रभावे ॥
२९॥
योगमाया के प्रभाव से गोपियों में यह भाव प्रेरित होगा कि मैं उनका उपपति हूँ।
आमिह ना जानि ताहा, ना जाने गोपी-गण ।। मुँहार रूप-गुणे मुँहार नित्य हरे मन ॥
३०॥
इसे न तो गोपियाँ जान सकेंगी, न मैं, क्योंकि हमारे मन सदैव एकसरे के सौन्दर्य तथा गुणों पर मोहित रहेंगे।
धर्म छाड़ि' रागे मुँहे करये मिलन ।।कभु मिले, कभु ना मिले, दैवेर घटन ॥
३१॥
। शुद्ध अनुरक्ति हमें नैतिक तथा धार्मिक कर्तव्यों की कीमत पर भी मिलाएगी। भाग्य कभी हमें पास ला देगा, तो कभी हमें विलग कर देगा।
एंड सब रस-निर्यास करिब आस्वाद ।एई द्वारे करिब सब भक्तेरे प्रसाद ॥
३२॥
मैं इन सारे रसों के सार का आस्वादन करूँगा और इस तरह सारे भक्तों पर अनुग्रह करूंगा।
व्रजेर निर्मल राग शुनि' भक्त-गण ।राग-मार्गे भजे ग्रेन छाड़ि' धर्म-कर्म ॥
३३॥
तब व्रजवासियों के शुद्ध प्रेम के विषय में सुनकर भक्तगण समस्त । भार्मिक अनुष्ठानों एवं सकाम कर्मों को त्याग कर रागानुग प्रेम के मार्ग में मेरी पूजा करेंगे।
अनुग्रहाय भक्तानां मानुषं देहमाश्रितः । भजते तादृशीः क्रीड़ा ग्राः श्रुत्वा तत्परो भवेत् ॥
३४॥
। कृष्ण अपने भक्तों पर अनुग्रह करने के लिए अपना सनातन नर रूप प्रकट करते हैं तथा अपनी लीलाएँ करते हैं। ऐसी लीलाएँ सुन लेने के बाद मनुष्य को उनकी सेवा में लग जाना चाहिए।
‘भवेत्' क्रिया विधिलिं, सेइ इहा कय । कर्तव्य अवश्य एई, अन्यथा प्रत्यवाय ॥
३५॥
यहाँ पर 'भवेत्' क्रिया अनिवार्यता के भाव में प्रयुक्त हुई है और यह हमें बतलाती है कि इसे अवश्य किया जाना चाहिए। इसकी अवहेलना का अर्थ होगा कर्तव्य का परित्याग।
एइ वाञ्छा ग्रैछे कृष्ण-प्राकट्य-कारण । असुर-संहार आनुषङ्ग प्रयोजन ॥
३६॥
एइ मत चैतन्य-कृष्ण पूर्ण भगवान् । ग्रुग-धर्म-प्रवर्तन नहे ताँर काम ॥
३७॥
जिस प्रकार ये इच्छाएँ श्रीकृष्ण के प्राकट्य की मूल कारण हैं और असुरों का वध मात्र प्रासंगिक आवश्यकता होती है, उसी प्रकार पूर्ण पुरुषोत्तम भगवान् श्रीकृष्ण चैतन्य द्वारा युगधर्म का प्रवर्तन प्रासंगिक है।
कोन कारणे ग्रबे हैल अवतारे मन ।।ग्रुग-धर्म-काल हैल से काले मिलन ॥
३८॥
जब भगवान् ने अन्य कारण से अवतरित होना चाहा, तो युगधर्म के बर्तन का भी समय आकर उपस्थित हुआ।
दुइ हेतु अवतरि' ला भक्त-गण । आपने आस्वादे प्रेम-नाम-सङ्कीर्तन ॥
३९॥
इस प्रकार भगवान् दो कारणों से अपने भक्तों के साथ अवतरित हुए और उन्होंने नाम संकीर्तन द्वारा प्रेमरूपी अमृत का आस्वादन किया।
सेइ द्वारे आचण्डाले कीर्तन सञ्चारे ।नाम-प्रेम-माला गाँथि' पराइल संसारे ॥
४०॥
। इस तरह उन्होंने अछूतों में भी कीर्तन का विस्तार किया। उन्होंने पवित्र नाम तथा प्रेम की माला गूंथकर सारे भौतिक संसार को पहना दी।
एइ-मते भक्त-भाव करि' अङ्गीकार ।।आपनि आचरि' भक्ति करिल प्रचार ॥
४१॥
इस प्रकार, भक्त का भाव धारण करके उन्होंने भक्ति का प्रचार किया और साथ में स्वयं उसका अभ्यास भी किया।
दास्य, सख्य, वात्सल्य, आर ये शृङ्गार ।।चारि प्रेम, चतुर्विध भक्त-इ आधार ॥
४२ ॥
बार प्रकार के भक्त भगवत्प्रेम के चार प्रकार के रसों के पात्र हैं। ये -दास्य, संख्य, वात्सल्य तथा श्रृंगार।
निज निज भाव सबे श्रेष्ठ करि' माने ।निज-भावे करे कृष्ण-सुख आस्वादने ॥
४३॥
। हर प्रकार का भक्त यह मानता है कि उसका भाव सर्वश्रेष्ठ है और इस प्रकार उस भाव में वह भगवान् कृष्ण के साथ परम सुख का आस्वादन परता है।
तटस्थ हइया मने विचार यदि करि । सब रस हैते शृङ्गारे अधिक माधुरी ॥
४४॥
। किन्तु यदि हम तटस्थ होकर इन भावों की तुलना करें, तो हम पायेंगे कि इनमें श्रृंगार रस ही अन्य सब मधुरताओं में सर्वश्रेष्ठ है।
ग्रथोत्तरमसौ स्वाद-विशेषोल्लासमय्यपि ।रतिर्वासनया स्वाद्वी भासते कापि कस्यचित् ॥
४५ ।। उल्लासमयी रति (प्रेम) विभिन्न स्वादों में, एक-दूसरे से बढ़कर, अनुभव की जाती है। किन्तु जिस रति का स्वाद क्रमशः उच्चतम होता है, वह माधुर्य-रस के रूप में प्रकट होती है।
अतएव मधुर रस कहि तार नाम । स्वकीया-परकीया-भावे द्वि-विध संस्थान ॥
४६॥
इसीलिए मैं इसे मधुर रस कहता हूँ। इसके भी दो विभाग हैं - कीया अर्थात् विवाहित तथा परकीया अर्थात् अविवाहित प्रेम।
परकीया-भावे अति रसेर उल्लास ।। व्रज विना इहार अन्यत्र नाहि वास ॥
४७॥
परकीया मधुर भाव में रस की अत्यधिक वृद्धि होती है। ऐसा प्रेम व्रज अतिरिक्त अन्यत्र कहीं नहीं मिलता।।
व्रज-वधू-गणेर एइ भाव निरवधि । तार मध्ये श्री-राधाय भावेर अवधि ॥
४८॥
यह भाव व्रजबालाओं में असीम है, किन्तु उनमें भी यह श्री राधा में अपनी पूर्णता को प्राप्त है।
प्रौढ़ निर्मल-भाव प्रेम सर्वोत्तम ।कृष्णेर माधुर्घ-रस-आस्वाद-कारण ॥
४९॥
उनका शुद्ध परिपक्व प्रेम अन्य सभी के प्रेम को पार कर जाता है। उनका प्रेम कृष्ण द्वारा माधुर्य रस की मधुरता का आस्वादन किये जाने का कारण है।
अतएव सेइ भाव अङ्गीकार करि' ।।साधिलेन निज वाञ्छा गौराङ्ग-श्री-हरि ॥
५०॥
इसलिए गौरांग महाप्रभु ने, जो साक्षात् श्री हरि हैं, राधा के भावों को स्वीकार किया और इस तरह अपनी निजी इच्छाओं की पूर्ति की।
सुरेशानां दुर्गं गतिरतिशयेनोपनिषदां मुनीनां सर्व-स्वं प्रणत-पटलीनां मधुरिमा ।। विनिर्यासः प्रेम्णो निखिल-पशु-पालाम्बुज-दृशांस चैतन्यः किं मे पुनरपि दृशोर्यास्यति पदम् ॥
५१॥
भगवान् चैतन्य देवताओं के आश्रय, उपनिषदों के लक्ष्य, समस्त मुनियों के सर्वस्व, अपने भक्तों के सुन्दर आश्रय एवं कमल-नयनी गोपियों के प्रेम के सार हैं। क्या वे फिर से मुझे दिख सकेंगे? अपारं कस्यापि प्रणयि-जन-वृन्दस्य कुतुकीरस-स्तोमं हृत्वा मधुरमुपभोक्तुं कमपि यः ।। रुचं स्वामावत्रे द्युतिमिह तदीयां प्रकटयन् ।स देवश्चैतन्याकृतिरतितरां नः कृपयतु ॥
५२॥
भगवान् कृष्ण ने अपनी असंख्य प्रेमिकाओं में से एक ( श्री राधा) ५ असीम अमृतमय प्रेम-रस का आस्वादन करना चाहा, अतएव उन्होंने तन्य महाप्रभु का स्वरूप धारण किया है। उन्होंने अपने कृष्ण-वर्ण को पाकर उनका ( श्री राधा का) तेजमय पीत ( गौर) वर्ण धारण कर उस म का आस्वादन किया है। वे भगवान् चैतन्य हमें अपना अनुग्रह प्रदान करे । भाव-ग्रहणेर हेतु कैल धर्म-स्थापन । तार मुख्य हेतु कहि, शुन सर्व-जन ॥
५३॥
उल्लासमय प्रेम स्वीकार करना मुख्य कारण है, जिसके लिए। प्रकट हुए और उन्होंने इस युग के लिए धर्म की पुनः स्थापना की। । मैं उस कारण की व्याख्या करूंगा। कृपया हर कोई सुने।।
मूल हेतु आगे श्लोकेर कैल आभास । एबे कहि सेइ श्लोकेर अर्थ प्रकाश ॥
५४॥
उस श्लोक के विषय में संकेत करने के बाद, जिसमें भगवान् के अवतार लेने के प्रमुख कारण का वर्णन हुआ है, अब मैं उसका पूर्ण अर्थ प्रकट करूंगा।
राधा कृष्ण-प्रणय-विकृतिह्णदिनी शक्तिरस्माद् ।एकात्मानावपि भुवि पुरा देह-भेदं गतौ तौ । चैतन्याख्यं प्रकटमधुना तद्वयं चैक्यमाप्तं ।राधा-भाव-द्युति-सुवलितं नौमि कृष्ण-स्वरूपम् ॥
५५॥
। श्री राधा और कृष्ण के प्रेम-व्यापार भगवान् की अन्तरंगा ह्लादिनी की दिव्य अभिव्यक्तियाँ हैं। यद्यपि राधा तथा कृष्ण अपने स्वरूपों है, किन्तु उन्होंने अपने आपको शाश्वत रूप से पृथक् कर लिया ये दोनों दिव्य स्वरूप पुनः श्रीकृष्ण चैतन्य के रूप में संयुक्त हुए नको नमस्कार करता हूँ, क्योंकि वे स्वयं कृष्ण होकर भी श्रीमती रानी के भाव तथा अंगकान्ति को लेकर प्रकट हुए हैं।
राधा-कृष्ण एक आत्मा, दुइ देह धरि' ।। अन्योन्ये विलसे रस आस्वादन करि' ॥
५६॥
राधा तथा कृष्ण एक ही हैं, किन्तु उन्होंने दो शरीर धारण कर रखे स प्रकार वे प्रेम-रस का आस्वादन करते हुए एक-दूसरे का उपभोग करते हैं।
सेइ दुइ एक एबे चैतन्य गोसाजि ।।रस आस्वादिते दोंहे हैला एक-ठाङि॥
५७॥
अब वे रसास्वादन हेतु श्री चैतन्य महाप्रभु के रूप में एक शरीर में कट हुए हैं।
इथि लागि' आगे करि तार विवरण ।ग्राहा हैते हय गौरेर महिमा-कथन ॥
५८॥
अतएव मैं सर्वप्रथम राधा तथा कृष्ण की स्थिति स्पष्ट करूंगा। उसी र्णन के द्वारा भगवान् चैतन्य की महिमा जानी जा सकेगी।
राधिका हयेन कृष्णेर प्रणय-विकार ।।स्वरूप-शक्ति--‘ह्लादिनी' नाम याँहार ॥
५९॥
श्रीमती राधिका कृष्णप्रेम की रूपान्तर हैं। वे ह्लादिनी नामक उनकी अन्तरंगा शक्ति हैं।
ह्लादिनी कराय कृष्णे आनन्दास्वादन ।ह्लादिनीर द्वारा करे भक्तेर पोषण ॥
६०॥
यह ह्लादिनी शक्ति कृष्ण को आनन्द देती है और उनके भक्तों का पोषण करती है।
सच्चिदानन्द, पूर्ण, कृष्णेर स्वरूप । एक-इ चिच्छक्ति ताँर धरे तिन रूप ॥
६१॥
भगवान् कृष्ण का शरीर शाश्वत ( सत्), ज्ञानमय ( चित्) तथा आनन्द से पूर्ण ( आनन्द) है। उनकी एक ही आध्यात्मिक शक्ति तीन रूपों में प्रकट होती है।
आनन्दांशे ह्लादिनी, सदंशे सन्धिनी ।।चिदंशे सम्वित्यारे ज्ञान करि' मानि ॥
६२॥
ह्लादिनी उनके आनन्द का पक्ष है, सन्धिनी उनके नित्य अस्तित्व का और सम्वित चित् अंश का पक्ष है, जिसे ज्ञान के रूप में भी स्वीकार किया जाता है।
ह्लादिनी सन्धिनी सम्वित्त्वय्येका सर्व-संस्थितौ ।।ह्लाद-ताप-करी मिश्रा त्वयि नो गुण-वर्जिते ॥
६३ ॥
हे प्रभु, आप सबके आश्रय हैं। ह्लादिनी, सन्धिनी तथा सम्वित्ये तीनों आप में एक ही आध्यात्मिक शक्ति के रूप में रहती हैं। किन्तु सुख, दुःख तथा इन दोनों के मिश्रण को उत्पन्न करने वाले भौतिक गुण आप में नहीं पाये जाते, क्योंकि आप में भौतिक गुण नहीं होते।
सन्धिनीर सार अंश—'शुद्ध-सत्त्व' नाम ।भगवानेर सत्ता हय ग्राहाते विश्राम ॥
६४॥
सन्धिनी शक्ति का सार अंश शुद्ध सत्त्व है। भगवान् कृष्ण का अस्तित्व इसी पर निर्भर है।
माता, पिता, स्थान, गृह, शय्यासन और ।।ए-सब कृष्णेर शुद्ध-सत्त्वेर विकार ॥
६५॥
कृष्ण के माता, पिता, धाम, गृह, शय्या, आसन इत्यादि सभी शुद्ध सत्त्व के रूपान्तर हैं।
सत्त्वं विशुद्धं वसुदेव-शब्दितं ग्रदीयते तत्र पुमानपावृतः । सत्त्वे च तस्मिन्भगवान्वासुदेवोह्यधोक्षजो मे मनसा विधीयते ॥
६६ ॥
शुद्ध सत्त्व की दशा, जिसमें पूर्ण पुरुषोत्तम भगवान् किसी भी आवरण के बिना प्रकट होते हैं, वसुदेव कहलाती है। उस शुद्ध अवस्था में, भौतिक इन्द्रियों से परे और वासुदेव कहलाने वाले भगवान् मेरे मन । में अनुभूत होते हैं।
कृष्णे भगवत्ता-ज्ञान संवितेर सार । ब्रह्म-ज्ञानादिक सब तार परिवार ॥
६७॥
सम्वित् शक्ति का सार यह ज्ञान है कि श्रीकृष्ण पूर्ण पुरुषोत्तम । भगवान् हैं। अन्य सारे ज्ञान, यथा ब्रह्मज्ञान, इसके अवयव हैं।
ह्लादिनीर सार 'प्रेम', प्रेम-सार 'भाव' ।भावेर परम-काष्ठा, नाम-महा-भाव' ॥
६८ ॥
ह्रादिनी शक्ति का सार भगवत्प्रेम है, भगवत्प्रेम का सार भाव है और भाष का चरम विकास महाभाव है।
महाभाव-स्वरूपा श्री-राधा-ठाकुराणी ।।सर्व-गुण-खनि कृष्ण-कान्ता-शिरोमणि ॥
६९॥
श्री राधा ठाकुराणी महाभाव की मूर्त रूप हैं। वे समस्त सद्गुणों की खान हैं और भगवान् कृष्ण की सारी प्रियतमाओं में शिरोमणि हैं।
तयोरप्युभयोर्मध्ये राधिका सर्वथाधिका ।।महाभाव-स्वरूपेयं गुणैरतिवरीयसी ॥
७० ॥
इन दो गोपियों ( राधारानी तथा चन्द्रावली) में श्रीमती राधारानी भी प्रकार से श्रेष्ठ हैं। वे महाभाव की मूर्तिमन्त स्वरूप हैं और सद्गुणों सर्वोपरि हैं।
कृष्ण-प्रेम-भावित याँर चित्तेन्द्रिय-काय ।कृष्ण-निज-शक्ति राधा क्रीड़ार सहाय ॥
७१॥
। उनका मन, इन्द्रियाँ तथा शरीर कृष्ण-प्रेम में रँगे हुए हैं। वे कृष्ण की 'निजी शक्ति हैं और वे उनकी लीलाओं में उनकी सहायता करती हैं।
आनन्द-चिन्मय-रस-प्रतिभाविताभिस्ताभिर्य एव निज-रूपतया कलाभिः । गोलोक एव निवसत्यखिलात्म-भूतोगोविन्दमादि-पुरुषं तमहं भजामि ॥
७२॥
। मैं उन आदि भगवान् गोविन्द की पूजा करता हूँ, जो अपने निजी धाम गोलोक में अपने ही आध्यात्मिक स्वरूप के सदृश एवं ह्लादिनी शक्ति के मूर्तिमन्त स्वरूप राधा के साथ निवास करते हैं। उनकी संगिनियाँ उनकी वे विश्वस्त सखियाँ हैं, जो उनके शारीरिक स्वरूप की विस्तार हैं। और नित्य आनन्दमय आध्यात्मिक रस से ओतप्रोत हैं।
कृष्णेरे कराय ग्रैछे रस आस्वादन ।क्रीड़ार सहाय ग्रैछे, शुन विवरण ॥
७३॥
अब कृपा करके सुनिये कि किस तरह कृष्ण की प्रियतमाएँ उन्हें रस फा आस्वादन कराने में तथा उनकी लीलाओं में सहायक बनती हैं।
कृष्ण-कान्ता-गण देखि त्रि-विध प्रकार । एक लक्ष्मी-गण, पुरे महिषी-गण आर ॥
७४॥
व्रजाङ्गना-रूप, आर कान्ता-गण-सार ।।श्री-राधिका हैते कान्ता-गणेर विस्तार ॥
७५ ॥
भगवान् कृष्ण की प्रिय प्रेमिकाएँ तीन प्रकार की हैं-लक्ष्मियाँ, रानियाँ तथा व्रज की गोपिकाएँ। गोपिकाएँ इन तीनों में सर्वोपरि है। सारी प्रेमिकाएँ राधिका की विस्तार हैं।
अवतारी कृष्ण त्रैछे करे अवतार ।अंशिनी राधा हैते तिन गणेर विस्तार ॥
७६ ॥
जिस प्रकार स्रोत-रूप भगवान् कृष्ण सारे अवतारों के कारण उसी प्रकार श्री राधा इन समस्त प्रेमिकाओं की कारण हैं।
वैभव-गण ग्रेन ताँर अङ्ग-विभूति ।।बिम्ब-प्रतिबिम्ब-रूप महिषीर तति ॥
७७॥
लक्ष्मियाँ श्रीमती राधिका की आंशिक अभिव्यक्तियाँ हैं और रानि उनके रूप की प्रतिबिम्ब हैं।
लक्ष्मी-गण ताँर वैभव-विलासांश-रूप । महिषी-गण वैभव-प्रकाश-स्वरूप ॥
७८ ॥
लक्ष्मियाँ उनकी पूर्ण अंश हैं और वे वैभवविलास रूपों को प्रदर्शित रानियाँ उनके वैभव प्रकाश की रूप हैं।
आकार स्वभाव-भेदे व्रज-देवी-गण ।काय-व्यूह-रूप ताँर रसेर कारण ॥
७९ ॥
व्रजदेवियों के विविध शारीरिक स्वरूप होते हैं। वे उनकी ( श्रीमती नी की) विस्तार हैं और रस का पोषण करने में सहायक हैं।
बहु कान्ता विना नहे रसेर उल्लास ।।लीलार सहाय लागि' बहुत प्रकाश ॥
८०॥
। अनेक प्रेमिकाओं के बिना रस में ऐसा उल्लास नहीं रहता। अतएव न की लीलाओं में सहायता करने के लिए श्रीमती राधारानी के विस्तार हैं।
तार मध्ये व्रजे नाना भाव-रस-भेदे ।। कृष्णके कराय रासादिक-लीलास्वादे ॥
८१॥
इन में व्रज की प्रेमिकाओं के कई समूह हैं, जिनके नाना प्रकार के भाव तथा रस हैं। वे कृष्ण को रासनृत्य तथा अन्य लीलाओं की सारी माधुरी का आस्वादन कराने में सहायक होती हैं।
गोविन्दानन्दिनी राधा, गोविन्द-मोहिनी ।।गोविन्द सर्वस्व, सर्व-कान्ता-शिरोमणि ॥
८२ ॥
। श्री राधा गोविन्द को आनन्द देने वाली हैं और वे गोविन्द को मोहने बाली भी हैं। वे गोविन्द की सर्वस्व हैं और उनकी समस्त प्रेयसियों में शिरोमणि हैं।
देवी कृष्ण-मयी प्रोक्ता राधिका पर-देवता ।सर्व-लक्ष्मी-मयी सर्व-कान्तिः सम्मोहिनी परा ॥
८३ ॥
दिव्य देवी श्रीमती राधारानी भगवान् श्रीकृष्ण की प्रत्यक्ष प्रतिस्प हैं। वे समस्त लक्ष्मियों में केन्द्रीय व्यक्तित्व हैं। वे सर्व-आकर्षक भगवान को आकर्षित करने के सारे आकर्षणों से युक्त हैं। वे भगवान् की आदि अन्तरंगा शक्ति हैं।
‘देवी' कहि द्योतमाना, परमा सुन्दरी ।।किम्वा, कृष्ण-पूजा-क्रीड़ार वसति नगरी ॥
८४॥
देवी का अर्थ है ज्योतिर्मयी तथा परम सुन्दरी। अथवा इसका अर्थ हो सकता है-“भगवान् कृष्ण की पूजा एवं उनकी प्रेम-क्रीड़ाओं की सुन्दर धाम।
कृष्ण-मयी—कृष्ण ग्रार भितरे बाहिरे । याँहा याँहा नेत्र पड़े ताँहा कृष्ण स्फुरे ॥
८५॥
कृष्णमयी का अर्थ है, जिसके भीतर तथा बाहर भगवान् कृष्ण वे जहाँ भी दृष्टिपात करती हैं, वहाँ कृष्ण को देखती हैं।
किम्वा, प्रेम-रस-मय कृष्णेर स्वरूप ।ताँर शक्ति ताँर सह हय एक-रूप ॥
८६॥
अथवा, कृष्णमयी' का अर्थ यह है कि वे भगवान् कृष्ण से अभिन्न हैं, क्योंकि वे प्रेम-रस की प्रतिमूर्ति हैं। भगवान् कृष्ण और उनकी शक्ति एक ही हैं।
कृष्ण-वाञ्छा-पूर्ति-रूप करे आराधने ।।अतएव 'राधिका' नाम पुराणे वाखाने ॥
८७॥
उनकी पूजा ( आराधना ) भगवान् कृष्ण की इच्छाएँ पूर्ण करना है। इसीलिए पुराणों में उन्हें राधिका कहा गया है।
अनयाराधितो नूनं भगवान्हरिरीश्वरः ।।ग्रन्नो विहाय गोविन्दः प्रीतो ग्रामनयद्रहः ॥
८८ ॥
उनके द्वारा भगवान् की सचमुच अच्छी पूजा की गई है, अतएव भगवान् गोविन्द ने प्रसन्न होकर हम सबको पीछे छोड़ दिया है और उन्हें एकान्त स्थान में ले गये हैं।
अतएव सर्व-पूज्या, परम-देवता ।।सर्व-पालिका, सर्व जगतेर माता ।। ८९॥
अतएव राधा परम देवता अर्थात् परम देवी, हैं और वे सबके लिए सनीय हैं। वे सबकी रक्षा करने वाली हैं और सम्पूर्ण ब्रह्माण्ड की माता हैं। ‘सर्व-लक्ष्मी'-शब्द पूर्वे करियाछि व्याख्यान ।सर्व-लक्ष्मी-गणेर तिंहो हन अधिष्ठान ।। ९० ॥
मैं सर्वलक्ष्मी का अर्थ पहले ही बतला चुका हूँ। राधा समस्त लक्ष्मियों की आदि स्रोत हैं।
किम्वा, ‘सर्व-लक्ष्मी' कृष्णेर षडू-विध ऐश्वर्य ।ताँर अधिष्ठात्री शक्ति–सर्व-शक्ति-वर्य ॥
९१॥
अथवा सर्वलक्ष्मी' शब्द यह बतलाता है कि वे श्रीकृष्ण के छह ऐश्वर्यों का पूर्णतया प्रतिनिधित्व करती हैं। अतएव वे भगवान् कृष्ण की सर्वोपरि शक्ति हैं।
सर्व-सौन्दर्य-कान्ति वैसये ग्राँहाते ।सर्व-लक्ष्मी-गणेर शोभा हेय याँहा हैते ॥
९२ ॥
सर्वकान्ति शब्द सूचित करता है कि उनके शरीर में समस्त सौन्दर्य तथा कान्ति का आश्रय है। सारी लक्ष्मियाँ उन्हीं से अपना सौन्दर्य प्राप्त करती हैं।
किम्वा ‘कान्ति'-शब्दे कृष्णेर सब इच्छा कहे ।कृष्णेर सकल वाञ्छा राधातेइ रहे ॥
९३॥
। कान्ति शब्द का यह भी अर्थ हो सकता है-भगवान् कृष्ण की सारी इच्छाएँ। भगवान् कृष्ण की सारी इच्छाएँ श्रीमती राधारानी में निहित हैं।
राधिका करेन कृष्णेर वाञ्छित पूरण ।।‘सर्व-कान्ति'-शब्देर एइ अर्थ विवरण ॥
९४॥
। श्रीमती राधिका भगवान् कृष्ण की सारी इच्छाएँ पूर्ण करती हैं। यही सर्वकान्ति शब्द का अर्थ है।
जगत्मोहन कृष्ण, ताँहार मोहिनी ।। अतएव समस्तेर परा ठाकुराणी ॥
९५ ॥
भगवान् कृष्ण जगत् को मोहित करते हैं, किन्तु श्री राधा उन्हें भी । मोहित करती हैं। अतएव वे सारी देवियों में सर्वश्रेष्ठ हैं।
राधा पूर्ण-शक्ति, कृष्ण–पूर्ण-शक्तिमान् । दुइ वस्तु भेद नाइ, शास्त्र-परमाण ॥
९६॥
श्री राधा पूर्ण शक्ति हैं और भगवान् कृष्ण पूर्ण शक्ति के स्वामी हैं। जैसाकि प्रामाणिक शास्त्रों का प्रमाण है, ये दोनों भिन्न नहीं हैं।
मृगमद, तार गन्ध-—भैछे अविच्छेद ।।अग्नि, ज्वालाते—प्रैछे कभु नाहि भेद ॥
९७॥
जिस तरह कस्तूरी तथा उसकी सुगन्ध एक-दूसरे से पृथक् नहीं होते। अथवा अग्नि और उसकी ऊष्मा अभिन्न हैं, उसी तरह वे ( राधा तथा कृष्ण) अभिन्न हैं।
राधा-कृष्ण ऐछे सदा एक-इ स्वरूप ।।लीला-रस आस्वादिते धरे दुइ-रूप ॥
९८॥
इस प्रकार राधा तथा कृष्ण एक हैं, फिर भी उन्होंने लीला-रस का आस्वादन करने के लिए दो रूप धारण कर रखे हैं।
प्रेम-भक्ति शिखाइते आपने अवतरि ।। राधा-भाव-कान्ति दुइ अङ्गीकार करि' ॥
९९॥
श्री-कृष्ण-चैतन्य-रूपे कैल अवतार ।एइ त' पञ्चम श्लोकेर अर्थ परचार ॥
१०० ॥
। प्रेमाभक्ति का प्रचार करने के लिए कृष्ण श्री राधा के भाव तथा घर्ण (कान्ति) को लेकर श्रीकृष्ण चैतन्य के रूप में प्रकट हुए। इस प्रकार मैंने पाँचवे श्लोक के अर्थ की व्याख्या की है।
षष्ठ श्लोकेर अर्थ करिते प्रकाश ।प्रथमे कहिये सेइ श्लोकेर आभास ॥
१०१॥
छठे श्लोक की व्याख्या करने के लिए सर्वप्रथम मैं इसके अर्थ का संकेत दूंगा।
अवतरि' प्रभु प्रचारिल सङ्कीर्तन ।एहो बाह्य हेतु, पूर्वे करियाछि सूचन ॥
१०२॥
। भगवान् संकीर्तन का प्रचार करने के लिए अवतरित हुए। यह बाह्य प्रयोजन है, जैसाकि मैं पहले ही इंगित कर चुका हूँ।
अवतारेर आर एक आछे मुख्य-बीज ।।रसिक-शेखर कृष्णेर सेइ कार्य निज ॥
१०३॥
भगवान् कृष्ण के अवतार का एक प्रमुख कारण है। यह प्रेमविनिमय के सर्वश्रेष्ठ भोक्ता के रूप में उनके अपने कार्यकलापों से उत्पन्न होता है।
अति गूढ़ हेतु सेइ त्रि-विध प्रकार।दामोदर-स्वरूप हैते ग्राहार प्रचार ॥
१०४॥
यह अत्यन्त गुह्य कारण तीन प्रकार का है। इसको स्वरूप दामोदर ने प्रकट किया है।
स्वरूप-गोसाजि—प्रभुर अति अन्तरङ्ग ।ताहाते जानेन प्रभुर ए-सब प्रसङ्ग ॥
१०५॥
स्वरूप गोसांई महाप्रभु के अत्यन्त अन्तरंग पार्षद हैं। अतएव वे इन प्रसंगों को भलीभाँति जानते हैं।
राधिकार भाव-मूर्ति प्रभुर अन्तर ।सेइ भावे सुख-दुःख उठे निरन्तर ॥
१०६॥
चैतन्य महाप्रभु का हृदय श्रीमती राधिका के भावों की मूर्ति है। इस प्रकार उसमें हर्ष तथा पीड़ा की भावनाएँ निरन्तर उठती रहती हैं।
शेष-लीलाय प्रभुर कृष्ण-विरह-उन्माद ।।भ्रम-मय चेष्टा, आर प्रलाप-मय वाद ॥
१०७॥
। अपनी लीलाओं के अन्तिम भाग में श्री चैतन्य महाप्रभु भगवान् कृष्ण के वियोग के उन्मादे से अभिभूत थे। वे भ्रान्तिपूर्ण कार्य बैठते थे और आन्तचित्त होकर प्रलाप करते थे।
राधिकार भाव ग्रैछे उद्धव-दर्शने ।।सेइ भावे मत्त प्रभु रहे रात्रि-दिने ॥
१०८ ॥
जिस प्रकार उद्धव को देखकर राधिका पागल सी हो गई थीं, उसी । तरह श्री चैतन्य महाप्रभु विरह के उन्माद से रात-दिन अभिभूत रहते थे।
रात्रे प्रलाप करे स्वरूपेर कण्ठ धरि'।आवेशे आपन भाव कहये उघाड़ि' ॥
१०९॥
रात में वे स्वरूप दामोदर के गले में अपनी बाँहें डालकर शोक में प्रलाप करते थे। वे आवेश में आकर अपने हृदय की बात कह देते थे।
ग्रबे ग्रेइ भाव उठे प्रभुर अन्तर ।। सेइ गीति-श्लोके सुख देन दामोदर ॥
११०॥
जब उनके हृदय में कोई विशेष भाव उठता था, तब स्वरूप दामोदर सी तरह का गीत गाकर या श्लोक सुनाकर उन्हें सन्तुष्ट करते थे।
एबे कार्य नाहि किछु ए-सब विचारे । आगे इहा विवरिब करिया विस्तारे ॥
१११॥
अभी इन लीलाओं का विश्लेषण करना आवश्यक नहीं है। मैं इन सबको आगे चलकर विस्तार से बतलाऊँगा।
पूर्वे व्रजे कृष्णेर त्रि-विध वयो-धर्म । कौमार, पौगण्ड, आर कैशोर अतिमर्म ॥
११२॥
। पूर्व में भगवान् कृष्ण ने व्रज में तीन अवस्थाओं-कौमार, पौगण तथा कैशोर-का प्रदर्शन किया। इनमें से उनकी किशोर अवस्था विशेष रूप से महत्त्वपूर्ण है।
वात्सल्य-आवेशे कैल कौमार सफल ।पौगण्ड सफल कैल ला सखावल ॥
११३॥
माता-पिता के स्नेह ने उनकी कौमार अवस्था ( बचपन ) को सफल बनाया। उनकी पौगण्ड अवस्था अपने मित्रों के साथ सफल बनी।
राधिकादि लञा कैल रासादि-विलास ।वाञ्छा भरि' आस्वादिल रसेर निर्यास ॥
११४॥
। युवावस्था ( किशोरावस्था ) में उन्होंने श्रीमती राधिका तथा अन्य गोपियों के साथ रासनृत्य आदि लीलाओं में अपनी इच्छापूर्ति करते हुए रस के सार का आस्वादन किया।
कैशोर-वयसे काम, जगत्सकल ।।रासादि-लीलाय तिन केरिल सफल ॥
११५॥
। अपनी किशोरावस्था में भगवान् कृष्ण ने अपनी तीनों अवस्थाओं वे सारे ब्रह्माण्ड को रासनृत्य जैसी माधुर्य-प्रेम की लीलाओं से सफल बनाया।
सोऽपि कैशोरक-वयो मानयन्मधुसूदनः ।रेमे स्त्री-रत्न-कूट-स्थः क्षपासु क्षपिताहितः ॥
११६॥
भगवान् मधुसूदन ने शरदकालीन रातों में रत्नसदृश गोपियों के मध्य लीलाओं में अपनी किशोरावस्था का आनन्द लिया। इस तरह उन्होंने जगत् के समस्त दुर्भाग्य को दूर किया।
वाचा सूचित-शर्वरी-रति-कला-प्रागल्भ्यया राधिकाव्रीड़ा-कुञ्चित-लोचनां विरचयन्नग्रे सखीनामसौ । तद्वक्षो-रुह-चित्र-केलि-मकरी-पाण्डित्य-पारं गतः कैशोरं सफली-करोति कलयन्कुञ्ज विहारं हरिः ॥
११७।। जब भगवान् कृष्ण ने श्रीमती राधारानी से विगत रात में उनके साथ रति-क्रीड़ा से सम्बन्धित शब्द उनकी सखियों के समक्ष कहे, तो लज्जा से उनकी आँखें बन्द हो गईं। उस समय उन्होंने उनके वक्षस्थल पर खिलवाड़ करते हुए मत्स्य के चित्र खींचने में चातुर्य की पराकाष्ठा का प्रदर्शन किया। इस तरह भगवान् हरि ने लताकुंज में राधा तथा उनकी सखियों के साथ लीलाएँ करके अपनी किशोरावस्था को सफल बनाया।
हरिरेष न चेदवातरिष्यन् मथुरायां मधुराक्षि राधिका च । अभविष्यदियं वृथा विसृष्टिर्मकराङ्कस्तु विशेषतस्तदात्र ॥
११८॥
। हे पौर्णमासी, यदि भगवान् हरि श्रीमती राधारानी सहित मथुरा में अवतरित न हुए होते, तो यह सारी सृष्टि और विशेषतया कामदेव, विफल हो गये होते।
एइ मत पूर्वे कृष्ण रसेर सदने । ग्रद्यपि करिल रस-निर्यास-चर्वण ॥
११९॥
तथापि नहिल तिन वाञ्छित पूरण ।।ताहा आस्वादिते ग्रदि करिल व्रतन ॥
१२०॥
यद्यपि समस्त रसों के आगार भगवान् कृष्ण ने इस तरह से पहले ही प्रेम-रस के सार का चर्वण किया था, तो भी वे तीन इच्छाओं को पूरी करने में असमर्थ थे, यद्यपि उन्होंने उनका आस्वादन करने का प्रयास किया था।
ताँहार प्रथम वाञ्छा करिये व्याख्यान । कृष्ण कहे,-'आमि हइ रसेर निदान ॥
१२१॥
सर्वप्रथम मैं उनकी पहली इच्छा की व्याख्या करूंगा। कृष्ण कहते हैं, “मैं सारे रसों का मूल कारण हूँ।
पूर्णानन्द-मय आमि चिन्मय पूर्ण-तत्त्व ।। राधिकार प्रेमे आमा कराय उन्मत्त ।। १२२ ।। मैं पूर्ण आध्यात्मिक सत्य हूँ और मैं पूर्ण आनन्द से युक्त हूँ, किन्तु श्रीमती राधारानी का प्रेम मुझे उन्मत्त कर देता है।
ना जानि राधार प्रेमे आछे कत बल ।ये बले आमारे करे सर्वदा विह्वल ॥
१२३॥
मैं राधा के प्रेम की उस शक्ति को नहीं जानता, जिससे वह मुझे बंदा विह्वल बनाती है।
राधिकार प्रेम–गुरु, आमि-शिष्य नट ।सदा आमा नाना नृत्ये नाचाय उद्भट ॥
१२४॥
राधिका का प्रेम मेरा गुरु है और मैं उसका नर्तक शिष्य हूँ। उसका प्रेम मुझे विविध प्रकार के अभिनवे नृत्य के लिए प्रेरित करता है।
कस्माद्वान्दे प्रिय-सखि हरेः पाद-मूलात्कुतोऽसौ ।कुण्डारण्ये किमिह कुरुते नृत्य-शिक्षा गुरुः कः ।। तं त्वन्मूर्तिः प्रति-तरु-लतं दिग्विदिक्षु स्फुरन्ती ।शैलूषीव भ्रमति परितो नर्तयन्ती स्व-पश्चात् ॥
१२५॥
हे प्यारी सखी वृन्दा, तुम कहाँ से आ रही हो? मैं श्री हरि के चरणों से आ रही हूँ। वे कहाँ हैं? वे राधाकुण्ड के तट पर स्थित वनप्रदेश में हैं। वे वहाँ क्या कर रहे हैं?वे नृत्य सीख रहे हैं। उनका गुरु कौन है?राधा, तुम्हारी मूर्ति उन्हें पीछे पीछे नचा रही है और स्वयं एक च। नर्तकी की तरह हर वृक्ष तथा हर लता में सभी दिशाओं में अपने आपको प्रकट कर रही है।
निज-प्रेमास्वादे मोर हय ये आह्लाद ।।ताहा ह'ते कोटि-गुण राधा-प्रेमास्वाद ॥
१२६॥
श्रीमती राधारानी के प्रति मेरे प्रेम के आस्वादन से मुझे जो भी मिलता है, उससे वह मेरी अपेक्षा करोड़ गुना अधिक प्रेम का न करती है।
आमि त्रैछे परस्पर विरुद्ध-धर्माश्रय ।राधा-प्रेम तैछे सदा विरुद्ध-धर्म-मय ॥
१२७॥
जिस प्रकार मैं समस्त परस्पर-विरोधी गुणों का आगार हूँ, उसी र राधा का प्रेम भी वैसे ही विरोधाभासों से सदैव पूर्ण रहता है।
राधा-प्रेमा विभु–ग्रार बाड़िते नाहि ठाजि ।तथापि से क्षणे क्षणे बाड़ये सदाइ ॥
१२८॥
राधा का प्रेम सर्वव्यापी है, उसमें विस्तार की कोई गुंजाईश नहीं है। भी वह निरन्तर बढ़ता रहता है।
ग्राहा वइ गुरु वस्तु नाहि सुनिश्चित ।तथापि गुरुर धर्म गौरव-वर्जित ॥
१२९॥
निश्चित रूप से उसके प्रेम से बढ़कर कुछ भी नहीं है। लेकिन उसका प्रेम गर्व से रहित है। यह उसकी महानता का सूचक है।
ग्राहा हैते सुनिर्मल द्वितीय नाहि आर।।तथापि सर्वदा वाम्य-वक्र-व्यवहार ॥
१३०॥
। उसके प्रेम से बढ़कर शुद्ध कुछ भी नहीं है। किन्तु उसका आचरण सदैव प्रतिकूल एवं वक्र रहता है।
विभुरपि कलयन्सदाभिवृद्धिगुरुरपि गौरव-चर्घया विहीनः । मुहुरुपचित-वक्रिमापि शुद्धोजयति मुर-द्विषि राधिकानुरागः ॥
१३१॥
मुर असुर के शत्रु कृष्ण के लिए राधा के प्रेम की जय हो! यद्यपि वह सर्वव्यापी है, किन्तु वह प्रतिक्षण बढ़ता जाता है। यद्यपि वह महत्त्वपूर्ण है, किन्तु वह गर्व से विहीन है। यद्यपि वह शुद्ध है, किन्तु सदैव कपट से भरा रहता है।
सेइ प्रेमार श्री-राधिका परम 'आश्रय' ।सेइ प्रेमार आमि हई केवल 'विषय' ॥
१३२॥
श्री राधिका उसी प्रेम की परम आश्रय हैं और मैं उसका एकमात्र विषय हूँ।
विषय-जातीय सुख आमार आस्वाद ।।आमा हैते कोटि-गुण आश्रयेर आह्लाद ॥
१३३॥
मैं उस आनन्द का आस्वादन करता हूँ, जो प्रेम के विषय के लिए सर्वथा उपयुक्त है। किन्तु उस प्रेम की आश्रय राधा का आनन्द करोड़ गुना अधिक है।
आश्रय-जातिय सुख पाइते मन धाय ।प्रत्ने आस्वादिते नारि, कि करि उपाय ॥
१३४॥
मेरा मन आश्रय द्वारा अनुभव किये जाने वाले आनन्द का आस्वादन करने के लिए दौड़ रहा है, किन्तु मैं सारे प्रयत्नों के बावजूद भी उसका आस्वादन नहीं कर सकता। मैं उसका आस्वादन कैसे करूँ? कभु यदि एइ प्रेमार हइये आश्रये ।तबे एइ प्रेमानन्देर अनुभव हय ॥
१३५॥
। यदि कभी मैं उस प्रेम का आश्रय बन पाऊँ, तभी मैं उस आनन्द का आस्वादन कर सकता हूँ।
एत चिन्ति' रहे कृष्ण परम-कौतुकी । हृदये बाड़ये प्रेम-लोभ धक्धकि ॥
१३६॥
इस प्रकार से सोचते हुए भगवान् कृष्ण उस प्रेम का आस्वादन करने के लिए उत्सुक थे। उस प्रेम का आस्वादन करने की उत्कट इच्छा उनके हृदय में अग्नि के समान प्रज्वलित होने लगी।
एइ एक, शुन आर लोभेर प्रकार । स्व-माधुर्घ देखि' कृष्ण करेन विचार ॥
१३७॥
यह एक इच्छा है। अब कृपया दूसरी इच्छा के बारे में सुनें। अपना खुद का सौन्दर्य देखकर भगवान् कृष्ण विचार करने लगे।
अद्भुत, अनन्त, पूर्ण मोर मधुरिमा । त्रि-जगते इहार केह नाहि पाय सीमा ॥
१३८॥
मेरी माधुरी अद्भुत, अनन्त एवं पूर्ण है। तीनों लोकों में कोई इसकी सीमा नहीं पा सकता।
एइ प्रेम-द्वारे नित्य राधिका एकलि ।।आमार माधुर्यामृत आस्वादे सकलि ॥
१३९॥
केवल राधिका अपने प्रेम-बल से मेरी माधुरी के सारे अमृत का आस्वादन करती है।
यद्यपि निर्मल राधार सत्प्रेम-दर्पण ।तथापि स्वच्छता तार बाढ़े क्षणे क्षण ॥
१४० ॥
यद्यपि राधा का प्रेम दर्पण की तरह स्वच्छ है, किन्तु इसकी स्वच्छता । प्रतिक्षण बढ़ती जाती है।
आमार माधुर्य नाहि बाढ़िते अवकाशे ।।ए-दर्पणेर आगे नव नवे रूपे भासे ॥
१४१॥
मेरे माधुर्य में विस्तार की सम्भावना नहीं है, किन्तु उस दर्पण के समक्ष यह नित्य-नवीन सौन्दर्य के साथ चमकता है।
मन्माधुर्य राधार प्रेम–दोंहे होड़ करि' ।।क्षणे क्षणे बाड़े दोहे, केह नाहि हारि ॥
१४२॥
मेरे माधुर्य एवं राधा के प्रेम-रूपी दर्पण के बीच निरन्तर स्पर्धा चलती रहती है। वे दोनों बढ़ते जाते हैं, किन्तु उनमें से कोई हारना नहीं जानता।
आमार माधुर्य नित्य नव नव हय ।स्व-स्व-प्रेम-अनुरूप भक्ते आस्वादय ॥
१४३॥
मेरा माधुर्य दिन-प्रतिदिन नवीन होता रहता है। भक्तगण अपने अपने प्रेम के अनुसार उसका आस्वादन करते हैं।
दर्पणाद्ये देखि' यदि आपने माधुरी ।।आस्वादिते हय लोभ, आस्वादिते नारि ॥
१४४॥
यदि मैं अपने माधुर्य को दर्पण में देखता हूँ, तो उसका आस्वादन करने को मन करता है, किन्तु फिर भी मैं ऐसा नहीं कर सकता।
विचार करिये प्रदि आस्वाद-उपाय ।राधिका-स्वरूप हइते तबे मन धाय ॥
१४५॥
यदि मैं उसका आस्वादन करने का उपाय सोचता हूँ, तो मैं राधिका के पद के लिए लालायित जान पड़ता हूँ।
अपरिकलित-पूर्वः कश्चमत्कार-कारी स्फुरति मम गरीयानेष माधुर्य-पूरः ।। अयमहमपि हन्त प्रेक्ष्य यं लुब्ध-चेताः।सरभसमुपभोक्तुं कामये राधिकेव ॥
१४६॥
वह कौन है, जो मुझसे भी अधिक माधुर्य की प्रचुरता को प्रकट कर रहा है, जिसका इसके पूर्व कभी अनुभव नहीं किया गया और जो सबको आश्चर्य में डाल रहा है? हाय! मेरा मन इस सौन्दर्य को देखकर मोहग्रस्त हो गया है और मैं स्वयं तीव्रता से श्रीमती राधारानी की भाँति इसका उपभोग करना चाहता हूँ।
कृष्ण-माधुर्मेर एक स्वाभाविक बल ।।कृष्ण-आदि नर-नारी करये चञ्चल ॥
१४७॥
कृष्ण के सौन्दर्य में एक स्वाभाविक शक्ति है-यह स्वयं कृष्ण समेत सारे नर-नारियों के हृदयों को पुलकित कर देता है।
श्रवणे, दर्शने आकर्षये सर्व-मन ।। आपना आस्वादिते कृष्ण करेन व्रतन ॥
१४८॥
उनकी मधुर वाणी तथा बाँसुरी को सुनकर या उनके सौन्दर्य को देखकर सबके मन आकृष्ट हो जाते हैं। यहाँ तक कि स्वयं भगवान् कृष्ण भी उस माधुर्य का आस्वादन करने के लिए प्रयत्नशील होते हैं।
ए माधुर्यामृत पान सदा ग्रेड करे । तृष्णा-शान्ति नहे, तृष्णा बाढ़े निरन्तरे ॥
१४९॥
जो व्यक्ति उस माधुरी के अमृत का निरन्तर पान करता है, उसकी तृष्णा ( प्यास) कभी नहीं बुझती। बल्कि वह निरन्तर बढ़ती जाती है।
अतृप्त हइया करे विधिर निन्दन । अविदग्ध विधि भाल ना जाने सृजन ॥
१५०॥
ऐसा व्यक्ति अतृप्त होने के कारण ब्रह्माजी की निन्दा यह कहकर करने लगता है कि उन्हें ठीक से सृजन कला नहीं आती, अपितु वे निपट अनुभवहीन हैं।
कोटि नेत्र नाहि दिल, सबे दिल दुई ।।ताहाते निमेष, कृष्ण कि देखिबे मुजि ॥
१५१॥
। (गोपियों ने कहा :) हे कृष्ण! जब आप दिन में वन में चले जाते हैं, और हम आपके सुन्दर धुंघराले बालों से घिरे मधुर मुखमंडल को नहीं खतीं, तो हमारे लिए आधा क्षण भी एक युग के समान बन जाता है। ब हम उस स्रष्टा को निरा मूर्ख मानती हैं, जिसने हमारी उन आँखों के पर पलकें बना दी हैं, जिनसे हम आपको देखती हैं।
अटति यद्भवानह्नि काननं । त्रुटिगायते त्वामपश्यताम् । कुटिल-कुन्तलं श्री-मुखं च ते ।जड़ उदीक्षतां पक्ष्म-कृशाम् ॥
१५२॥
उन्होंने कृष्ण का सौन्दर्य देखने के लिए करोड़ों आँखें क्यों नहीं दीं। उन्होंने केवल दो आँखें दी हैं और वे भी पलक झपकती रहती हैं। तो भला मैं कृष्ण के सुन्दर मुख को कैसे देख सकेंगी? गोप्यश्च कृष्णमुपलभ्य चिरादभीष्टंयत्प्रेक्षणे दृशिषु पक्ष्म-कृतं शपन्ति । दृग्भिहंदी-कृतमलं परिरभ्य सर्वास्तद्भावमापुरपि नित्य-ग्रुजां दुरापम् ॥
१५३ ॥
गोपियों ने दीर्घकालीन विछोह के बाद अपने प्रिय कृष्ण को कुरुक्षेत्र में देखा। उन्होंने अपने नेत्रों के माध्यम से अपने हृदयों में उन्हें प्राप्त किया और उनको आलिंगन किया। उन्हें इतना उत्कट हर्ष हुआ कि सिद्ध योगियों को भी ऐसा हर्ष प्राप्त नहीं हो सकता। गोपियाँ स्रष्टा को यह कहकर कोसने लगीं कि उसने पलकें क्यों बनाईं, जो उनके देखने में। बाधक बन रही हैं।
कृष्णावलोकन विना नेत्र फल नाहि आन ।ग्रेइ जन कृष्ण देखे, सेइ भाग्यवान् ॥
१५४॥
कृष्ण के दर्शन के अतिरिक्त नेत्रों के लिए कोई दूसरी पूर्णता नहीं है। जो भी उनका दर्शन पाता है, वह सचमुच परम भाग्यशाली है।
अक्षण्वतां फलमिदं न परं विदामः सख्यः पशूननुविवेशयतोर्वयस्यैः । वक्त्रं व्रजेश-सुतयोरनुवेणु-जुष्टं ग्रैर्वा निपीतमनुरक्त-कटाक्ष-मोक्षम् ॥
१५५॥
( गोपियों ने कहा :) हे सखियों, वे आँखें, जो महाराज नन्द के पुत्रों के सुन्दर मुखों का दर्शन करती हैं, निश्चय ही भाग्यशाली हैं। जैसे ही ये धोनों पुत्र ( श्रीकृष्ण और बलराम) अपने सखाओं के साथ गायों को अपने आगे रखकर वन में प्रवेश करते हैं, वे अपने होंठों पर अपनी सिरियाँ रख लेते हैं और वृन्दावन के निवासियों की ओर प्रेम-पूर्ण ष्टिपात करते हैं। जिनके पास आँखें हैं, हमारे विचार में उनके लिए इससे मकर कोई अन्य दर्शनीय वस्तु नहीं है।
गोप्यस्तपः किमचरन् ऋदमुष्य रूपंलावण्य-सारमसमोर्ध्वमनन्य-सिद्धम् । दृग्भिः पिबन्त्यनुसवाभिनवं दुरापम् ।एकान्त-धाम ग्रशसः श्रिय ऐश्वरस्य ॥
१५६ ॥
[ मथुरा की स्त्रियों ने कहा :न जाने गोपियों ने कौन सा तप किया है? वे अपनी आँखों से भगवान् कृष्ण के स्वरूप के अमृत का निरन्तर पान करती हैं, जो लावण्य का सार है तथा जिसके बराबर या जिससे बढ़कर और कुछ नहीं है। यह लावण्य सौन्दर्य, यश तथा ऐश्वर्य का एकमात्र आश्रय है। यह स्वयं में सम्पूर्ण, चिर नवीन तथा अतीव विरल है।
कृष्णेर माधुर्ये कृष्णे उपजय लोभ ।। सम्यकास्वादिते नारे, मने रहे क्षोभ ॥
१५८ ॥
भगवान् कृष्ण का सौन्दर्य स्वयं उन्हें ही आकृष्ट करता है। किन्तु इसका पूर्णतया आनन्द न ले सकने के कारण उनका मन खिन्न बना रहता है।
अपूर्व माधुरी कृष्णेर, अपूर्व तार बल । ग्राहार श्रवणे मन हय टलमल ॥
१५७॥
भगवान् कृष्ण की माधुरी अद्वितीय है और उनका बल भी अद्वितीय है। ऐसी सुन्दरता के श्रवण मात्र से मन चंचल हो उठता है।
एइ त' द्वितीय हेतुर कहिले विवरण ।। तृतीय हेतुर एबे शुनह लक्षण ॥
१५९॥
यह उनकी द्वितीय इच्छा का विवरण है। अब मैं तीसरी इच्छा का वर्णन करता हूँ। कृपया ध्यान से सुनें।
अत्यन्त-निगूढ़ एइ रसेर सिद्धान्त ।। स्वरूप-गोसाजि मात्र जानेन एकान्त ॥
१६० ॥
रस का यह निष्कर्ष अत्यन्त गूढ़ है। एकमात्र स्वरूप दामोदर ही इसके विषय में ठीक से जानते हैं।
ग्रेबा केह अन्य जाने, सेहो ताँहा हैते ।।चैतन्य-गोसाजिर तेह अत्यन्त मर्म ग्राते ॥
१६१॥
यदि कोई अन्य व्यक्ति इसे जानने का दावा करता है, तो उसने उनसे । ही सुना होगा, क्योंकि वे श्री चैतन्य महाप्रभु के अत्यन्त अन्तरंग पार्षद थे।
गोपी-गणेर प्रेमेर ‘रूढ़-भाव' नाम ।विशुद्ध निर्मल प्रेम, कभु नहे काम ॥
१६२॥
गोपियों का प्रेम 'रूढ़ भाव' कहलाता है। यह विशुद्ध एवं निष्कलंक है। यह कभी भी कामवासना नहीं होता।
प्रेमैव गोप-रामानां काम इत्यर्गमत्प्रथाम् । इत्युद्धवादयोऽप्येतं वाञ्छन्ति भगवत्प्रियाः ॥
१६३॥
गोपियों को शुद्ध प्रेम 'काम' के नाम से विख्यात हो गया है। श्री व जैसे भगवान् के भक्त उस प्रेम का आस्वादन करने की इच्छा करते है।
काम, प्रेम, दोंहाकार विभिन्न लक्षण । लौह आर हेम त्रैछे स्वरूपे विलक्षण ॥
१६४॥
काम तथा प्रेम के लक्षण अलग अलग होते हैं, जिस प्रकारे लोहे और सोने के स्वभाव भिन्न भिन्न होते हैं।
आत्मेन्द्रिय-प्रीति-वाञ्छा—तारे बलि'काम' ।।कृष्णेन्द्रिय-प्रीति-इच्छा धरे ‘प्रेम' नाम ॥
१६५॥
अपनी खुद की इन्द्रियों की तृप्ति करने की इच्छा 'काम' है, किन्तु कृष्ण की इन्द्रियों को तुष्ट करने की इच्छा 'प्रेम' है।
कामेर तात्पर्य—निज-सम्भोग केवल ।।कृष्ण-सुख-तात्पर्य-मात्र प्रेम त' प्रबल ॥
१६६॥
काम का लक्ष्य अपनी खुद की इन्द्रियों का भोग करना मात्र है। किन्तु प्रेम भगवान् कृष्ण के सुख ( भोग) का ध्यान रखता है और इसलिए यह अत्यन्त शक्तिशाली होता है।
लोक-धर्म, वेद-धर्म, देह-धर्म, कर्म ।। लज्जा, धैर्य, देह-सुख, आत्म-सुख-भर्म ॥
१६७॥
दुस्त्यज आर्य-पथ, निज परिजन ।। स्व-जने करये व्रत ताड़न-भर्सन ॥
१६८॥
सर्व-त्याग करि' करे कृष्णेर भजन ।कृष्ण-सुख-हेतु करे प्रेम-सेवन ॥
१६९॥
सामाजिक रीतियाँ, शास्त्रीय आदेश, शारीरिक आवश्यकताएँ, सकाम कर्म, लज्जा, धैर्य, शारीरिक सुख, इन्द्रियतृप्ति तथा वर्णाश्रम-धर्म का वह मार्ग, जिसे छोड़ पाना कठिन है-गोपियों ने अपने परिवार के साथ साथ इन सबको त्याग दिया है और अपने परिजनों के दण्ड तथा फटकार को सहा है। यह सब उन्होंने भगवान् कृष्ण की सेवा के लिये किया। वे उनके (कृष्ण के) आनन्द के लिए उनकी प्रेममयी सेवा करती हैं।
इहाके कहिये कृष्णे दृढ़ अनुराग ।स्वच्छ धौत-वस्त्रे ग्रैछे नाहि कोन दाग ॥
१७०॥
यह भगवान् कृष्ण के प्रति दृढ़ अनुराग कहलाता है। यह उसी तरह द्ध निष्कलंक है, जिस तरह दागरहित स्वच्छ वस्त्र।
अतएव काम-प्रेमे बहुत अन्तर ।। काम–अन्ध-तमः, प्रेम-निर्मल भास्कर ॥
१७१।।अतएव गोपी-गणेर नाहि काम-गन्ध ।।कृष्ण-सुख लागि मात्र, कृष्ण से सम्बन्ध ॥
१७२॥
इस प्रकार गोपियों के प्रेम में काम की रंचमात्र भी गन्ध नहीं है। कृष्ण के साथ उनका सम्बन्ध एकमात्र उनके ( कृष्ण के ) सुख के लिए है।
ग्रत्ते सुजात-चरणाम्बुरुहं स्तनेषुभीताः शनैः प्रिय दधीमहि कर्कशेषु । तेनाटवीमटसि तद्व्यथते न किं स्वित्कूर्पादिभिर्भमति धीर्भवदायुषां नः ॥
१७३॥
। हे प्रिय! आपके चरणकमल इतने कोमल हैं कि हम उन्हें अपने वक्षस्थलों पर डरती हुईं धीरे से रखती हैं कि कहीं आपके चरणों में चोट लग जाये। हमारे प्राण एकमात्र आप पर आश्रित हैं। इसलिए हमारे मन स आशंका से भरे रहते हैं कि आपके कोमल चरण जंगल के मार्ग पर लते हुए कहीं कंकड़ों से क्षत-विक्षत न हो जाएँ।
आत्म-सुख-दु:खे गोपीर नाहिक विचार ।।कृष्ण-सुख-हेतु चेष्टा मनो-व्यवहार ॥
१७४॥
गोपियाँ अपने खुद के सुख या दुःख की तनिक भी परवाह नहीं करतीं। उनकी सारी शारीरिक तथा मानसिक चेष्टाएँ भगवान् कृष्ण को आनन्द पहुँचाने की दिशा में लगी रहती हैं।
कृष्णा लागि' आर सब करे परित्याग ।कृष्ण-सुख-हेतु करे शुद्ध अनुराग ॥
१७५ ॥
उन्होंने कृष्ण के लिए अपना सब कुछ त्याग दिया। कृष्ण को सुख देने के लिए उनमें शुद्ध अनुराग है।
एवं मदर्थोज्झित-लोक-वेदस्वानां हि वो मय्यनुवृत्तयेऽबलाः । मया परोक्षं भजता तिरोहितंमासूयितुं मार्हथ तत्प्रियं प्रियाः ॥
१७६॥
मेरी प्रिय गोपियों, तुम सबने मेरे लिए सामाजिक रीतियों, शास्त्रीय आदेशों और अपने परिजनों का परित्याग किया है। मैं तुम्हारी एकाग्रता बढ़ाने के उद्देश्य से ही तुम लोगों के पीछे छिप गया था। चूँकि मैं तुम्हारे ही लाभ के लिए छिप गया था, अतएव तुम लोगों को मुझ पर अप्रसन्न नहीं होना चाहिए।
कृष्णेर प्रतिज्ञा एक आछे पूर्व हैते ।। ये ग्रैछे भजे, कृष्ण तारे भजे तैछे ॥
१७७।। भगवान् कृष्ण ने पहले से वचन दे रखा है कि वे अपने भक्तों से इसी प्रकार से आदान-प्रदान करेंगे, जिस प्रकार से वे उनकी पूजा करेंगे।
ने ग्रथा मां प्रपद्यन्ते तांस्तथैव भजाम्यहम् । मम वत्र्मानुवर्तन्ते मनुष्याः पार्थ सर्वशः ॥
१७८ ॥
हे पृथा-पुत्र, मेरे भक्त जिस किसी प्रकार से मेरी शरण में आते हैं, मैं उसी के अनुसार उन्हें पुरस्कार प्रदान करता हूँ। सारे व्यक्ति सभी तरह से मेरे मार्ग का अनुसरण करते हैं।
से प्रतिज्ञा भङ्ग हैल गोपीर भजने ।ताहाते प्रमाण कृष्ण-श्री-मुख-वचने ॥
१७९॥
गोपियों की पूजा से वह प्रतिज्ञा भंग हो चुकी है, जैसाकि स्वयं भगवान् कृष्ण स्वीकार करते हैं।
न पारयेऽहं निरवद्य-संयुजां स्व-साधु-कृत्यं विबुधायुषापि वः ।। ग्रा माभजन्दुर्जय-गेह-शृङ्खलाःसंवृश्च्ये तद्वः प्रतियातु साधुना ॥
१८० ।। । हे गोपियों, मैं तुम्हारी निष्कलंक सेवा का ऋण ब्रह्मा के जीवनकाल भी नहीं चुका सकता। मुझसे तुम लोगों का सम्बन्ध भत्र्सना से परे है। में लोगों ने उन सारे पारिवारिक बन्धनों को तोड़कर मेरी पूजा की है, नको तोड़ पाना कठिन होता है। अतएव तुम लोगों के यशस्वी कार्य तुम्हारे प्रेम का प्रतिदान है।
तबे ये देखिये गोपीर निज-देहे प्रीत । सेहो त' कृष्णेर लागि, जानिह निश्चित ॥
१८१॥
अब गोपियाँ जो भी स्नेह अपने शरीरों के प्रति दिखाती हैं, उसे एकमात्र भगवान् कृष्ण के निमित्त ही जानना चाहिए।
एई देह कैलँ आमि कृष्ण समर्पण । ताँर धन ताँर इहा सम्भोग-साधन ॥
१८२॥
( गोपियाँ सोचती हैं :) मैंने यह शरीर भगवान् कृष्ण को समर्पित कर दिया है। वे ही इसके स्वामी हैं और यह उन्हें आनन्द देता है।
ए-देह-दर्शन-स्पर्शे कृष्ण-सन्तोषण' । एइ लागि' करे देहेर मार्जन-भूषण ॥
१८३॥
इस शरीर को देखकर तथा इसका स्पर्श करके कृष्ण को आनन्द प्राप्त होता है। इसी कारण से वे अपने शरीर को स्वच्छ करती एवं सजती हैं। निजामपि य़ा गोप्यो ममेति समुपासते ।ताभ्यः परं न मे पार्थ निगूढ़-प्रेम-भाजनम् ॥
१८४॥
। हे अर्जुन, गोपियों से बढ़कर मेरे लिए प्रगाढ़ प्रेम का पात्र कोई सरा नहीं है। वे अपने शरीरों को स्वच्छ करती तथा सजाती हैं, क्योंकि में उन्हें मेरी समझती हैं।
आर एक अद्भुत गोपी-भावेर स्वभाव ।।बुद्धिर गोचर नहे ग्राहार प्रभाव ॥
१८५ ॥
गोपियों के भाव का एक दूसरा अद्भुत स्वभाव है। इसका प्रभाव बुद्धि की समझ से परे है।
गोपी-गण करे ग्रबे कृष्ण-दरशन ।।सुख-वाञ्छा नाहि, सुख हय कोटि-गुण ॥
१८६॥
जब गोपियाँ भगवान् कृष्ण का दर्शन करती हैं, तब उन्हें असीम आनन्द प्राप्त होता है, यद्यपि उन्हें ऐसे आनन्द की थोड़ी सी भी इच्छा नहीं होती।
गोपीका-दर्शने कृष्णेर ग्रे आनन्द हय ।। ताहा हैते कोटि-गुण गोपी आस्वादय ॥
१८७॥
गोपियों को देखकर कृष्ण को जितना आनन्द मिलता है, उससे करोड़ों गुना आनन्द गोपियों को मिलता है।
ताँ सबार नाहि निज-सुख-अनुरोध । तथापि बाढ़ये सुख, पड़िल विरोध ॥
१८८॥
। गोपियों को निजी सुख की कोई इच्छा नहीं है, फिर भी उनका आनन्द बढ़ता जाता है। यह निश्चित रूप से विरोधाभास है।
ए विरोधेर एक मात्र देखि समाधान ।। गोपिकार सुख कृष्ण-सुखे पर्युवसान ॥
१८९॥
इस विरोधाभास का मुझे केवल एक ही समाधान दृष्टिगत होता है कि गोपियों का सुख उनके प्रिय कृष्ण के सुख में निहित है।
गोपिका-दर्शने कृष्णेर बाढ़ प्रफुल्लता ।से माधुर्य बाढ़े ग्रार नाहिक समता ॥
१९०॥
जब भगवान् कृष्ण गोपियों को देखते हैं, तो उनकी प्रसन्नता बढ़ जाती है और उनकी अद्वितीय माधुरी भी बढ़ जाती है।
आमार दर्शने कृष्ण पाइल एत सुख ।एई सुखे गोपीर प्रफुल्ल अङ्ग-मुख ॥
१९१॥
( गोपियाँ सोचती हैं :) हमें देखकर कृष्ण को इतना सुख मिला है। इस विचार से उनके मुखों तथा शरीरों की पूर्णता तथा सुन्दरता बढ़ जाती है।
गोपी-शोभा देखि' कृष्णेर शोभा बाढ़े व्रत ।कृष्ण-शोभा देखि' गोपीर शोभा बाढ़े तत ॥
१९२॥
गोपियों की सुन्दरता देखकर भगवान् कृष्ण की सुन्दरता बढ़ जाती है। और गोपियाँ भगवान् कृष्ण की सुन्दरता को जितना अधिक देखती हैं, उतना ही अधिक उनका सौन्दर्य बढ़ जाता है।
एई-मत परस्पर पड़े हुड़ाहुड़ि ।।परस्पर बाढ़े, केह मुखे नाहि मुड़ि ॥
१९३॥
इस प्रकार उनके बीच होड़ लग जाती है, जिसमें कोई भी अपनी हार स्वीकार नहीं करता।
किन्तु कृष्णेर सुख हेय गोपी-रूप-गुणे ।ताँर सुखे सुख-वृद्धि हये गोपी-गणे ॥
१९४॥
किन्तु कृष्ण गोपियों के सौन्दर्य तथा उनके सद्गुणों से आनन्द प्राप्त करते हैं। और जब गोपियाँ उनके आनन्द को देखती हैं, तो उनकी प्रसन्नता बढ़ जाती है।
अतएव सेइ सुख कृष्ण-सुख पोखे ।एइ हेतु गोपी-प्रेमे नाहि काम-दोषे ॥
१९५॥
इस प्रकार हम देखते हैं कि गोपियों की प्रसन्नता से भगवान् कृष्ण की प्रसन्नता का पोषण होता है। इस कारण से गोपियों के प्रेम में कामदोष । नहीं पाया जाता।
उपेत्य पथि सुन्दरी-ततिभिरभिरभ्यर्चितं ।स्मिताङ्कर-करम्बितैर्नटदपाङ्ग-भङ्गी-शतैः ।। स्तन-स्तवक-सञ्चरन्नयन-चञ्चरीकाञ्चलंव्रजे विजयिनं भजे विपिन-देशतः केशवम् ॥
१९६॥
। मैं भगवान् केशव की पूजा करता हूँ। कृष्ण के व्रज के वन से औटते समय गोपियाँ अपने महलों की छतों पर चढ़ जाती हैं और सैकड़ों प्रकार की तिरछी चितवनों तथा मन्द मुस्कानों द्वारा मार्ग में उनसे मिलकर उनकी पूजा करती हैं। उनके दोनों नेत्र विशाल काले भौरे के समान गोपियों के स्तनों पर विचरण करते हैं। आर एक गोपी-प्रेमेर स्वाभाविक चिह्न ।।ग्रे प्रकारे हय प्रेम काम-गन्ध-हीन ॥
१९७॥
गोपियों के प्रेम का एक अन्य स्वाभाविक लक्षण भी है, जो यह दिखलाता है कि इसमें लेशमात्र भी कामवासना नहीं है।
गोपी-प्रेमे करे कृष्ण-माधुर्मेर पुष्टि ।माधुयें बाढ़ाय प्रेम हा महा-तुष्टि ॥
१९८॥
गोपियों का प्रेम भगवान् कृष्ण के माधुर्य का पोषण करता है। बदले में यह माधुर्य उनके प्रेम को वर्धित करता है, क्योंकि वे अत्यधिक तुष्ट हो जाती हैं।
प्रीति-विषयानन्दे तदाश्रयानन्द । ताँहा नाहि निज-सुख-वाञ्छार सम्बन्ध ॥
१९९॥
प्रेम के आश्रय का सुख उस प्रेम के विषय के सुख में है। यह खुद की तृप्ति की इच्छा का सम्बन्ध नहीं है।
निरुपाधि प्रेम याँहा, ताँहा एइ रीति ।। प्रीति-विषय-सुखे आश्रयेर प्रीति ॥
२०० ॥
निज-प्रेमानन्दे कृष्ण-सेवानन्द बाधे। से आनन्देर प्रति भक्तेर हय महा-क्रोधे ॥
२०१॥
। जहाँ भी स्वार्थरहित प्रेम होता है, वहाँ उसकी यही रीति है। जब प्रीति का विषय प्रसन्न होता है, तो प्रीति के आश्रय को आनन्द प्राप्त होता है। जब प्रेम का आनन्द भगवान् कृष्ण की सेवा में बाधक बनता है, तो भक्त ऐसे आनन्द पर क्रुद्ध हो उठता है।
अङ्ग-स्तम्भारम्भमुत्तुङ्गयन्तंप्रेमानन्दं दारुको नाभ्यनन्दत् । कंसारातेर्वीजने ग्रेन साक्षाद्अक्षोदीयानन्तरायो व्यधायि ॥
२०२॥
श्री दारुक ने अपने प्रेम के भाव का आस्वादन नहीं किया, क्योंकि इससे उसके अंग स्तंभित हो गये, जिसके कारण भगवान् कृष्ण पर उसका पंखा झलना बाधित हो गया।
गोविन्द-प्रेक्षणाक्षेपि-बाष्प-पूराभिवर्षणम् ।।उच्चैरनिन्ददानन्दमरविन्द-विलोचना ॥
२०३॥
। कमलनयनी राधारानी ने उस प्रेमानन्द की भर्त्सना की, जिसके कारण अश्रु बहने लगे और जिससे उन्हें गोविन्द का दर्शन पाने में बाधा पहुँची।
आर शुद्ध-भक्त कृष्ण-प्रेम-सेवा विने । स्व-सुखार्थ सालोक्यादि ना करे ग्रहणे ॥
२०४॥
यही नहीं, शुद्ध भक्त पाँच प्रकार की मुक्ति के माध्यम से अपने निजी सुख की कामना के लिए कृष्ण की प्रेममयी सेवा कभी नहीं छोड़ते।
मद्गुण-श्रुति-मात्रेण मयि सर्व-गुहाशये ।। मनो-गतिरविच्छिन्ना ग्रथा गङ्गाम्भसोऽम्बुधौ ॥
२०५॥
जिस प्रकार गंगा नदी का दैवी जल अबाध गति से बहकर समुद्र में मिलता है, उसी प्रकार मेरे भक्तों के मन मेरा गुणगान सुनते ही सबके हृदयों में वास करने वाले मुझ तक चले आते हैं।
लक्षणं भक्ति-योगस्य निर्गुणस्य ह्युदाहृतम् ।। अहैतुक्यव्यवहिता ग्रा भक्तिः पुरुषोत्तमे ॥
२०६॥
। पुरुषोत्तम भगवान् की दिव्य प्रेमाभक्ति के ये लक्षण हैं-यह निस्वार्थ होती है और यह किसी भी तरह रोकी नहीं जा सकती।
सालोक्य-सार्टि-सारूप्य-सामीप्यैकत्वमप्युत ।दीयमानं न गृह्णन्ति विना मत्सेवनं जनाः ॥
२०७॥
“मेरे भक्त मेरी सेवा के बदले में सालोक्य, सार्टि, सारूप्य, सामीप्य अथवा मेरे साथ तादात्म्यता की मुक्तियों को मेरे देने पर भी स्वीकार नहीं करते ।
मत्सेवया प्रतीतं ते सालोक्यादि-चतुष्टयम् ।।नेच्छन्ति सेवया पूर्णाः कुतोऽन्यत्काल-विप्लुतम् ॥
२०८ ॥
मेरे भक्त मेरी सेवा द्वारा अपनी इच्छाएँ पूरी करने के बाद, ऐसी ' से सहज प्राप्य चार प्रकार की मुक्तियों को स्वीकार नहीं करते। तो फिर वे काल के प्रवाह के साथ नष्ट होने वाले किसी आनन्द को स्वीकार यो करने लगे? काम-गन्ध-हीन स्वाभाविक गोपी-प्रेम ।।निर्मल, उज्वल, शुद्ध ग्रेन दग्ध हेम ॥
२०९॥
गोपियों के सहज प्रेम में काम की गंध नहीं आती। यह निर्दोष, उज्वल एवं पिघले सोने की भाँति शुद्ध है।
कृष्णेर सहाय, गुरु, बान्धव, प्रेयसी ।। गोपिका हयेन प्रिया शिष्या, सखी दासी ॥
२१०॥
गोपियाँ भगवान् कृष्ण की सहायिकाएँ, गुरु, मित्र, पलियाँ, प्रिय शिष्या, विश्वासपात्राएँ तथा दासियाँ हैं।
सहाया गुरवः शिष्या भुजिष्या बान्धवाः स्त्रियः । सत्यं वदामि ते पार्थ गोप्यः किं मे भवन्ति न ॥
२११॥
हे पार्थ, मैं तुमसे सत्य कहता हूँ। गोपियाँ मेरी सहायिकाएँ, गुरु, शिष्या, सेविकाएँ, मित्र तथा प्रेयसियाँ हैं। मैं नहीं जानता कि वे मेरे लिए क्या नहीं हैं? गोपिका जानेन कृष्णेर मनेर वाञ्छित ।। प्रेम-सेवा-परिपाटी, इष्ट-समीहित ॥
२१२॥
गोपियाँ कृष्ण की इच्छाओं को जानती हैं और वे यह भी जानती हैं। उनके आनन्द के लिए किस प्रकार प्रेममयी सेवा पूर्ण रूप से करनी दए। वे अपने प्रियतम की तुष्टि के लिए उनकी सेवा दक्षतापूर्वक करती हैं।
मन्माहात्म्यं मत्सपर्या मच्छुद्धां मन्मनो-गतम् ।जानन्ति गोपिकाः पार्थ नान्ये जानन्ति तत्त्वतः ॥
२१३॥
हे पार्थ, गोपियाँ मेरी महानता, मेरी प्रेममयी सेवा, मेरे सम्मान तथा । मेरी मनोभावना को जानती हैं। वस्तुतः अन्य कोई इन्हें जान नहीं सकता।
सेइ गोपी-गण-मध्ये उत्तमा राधिका ।।रूपे, गुणे, सौभाग्ये, प्रेमे सर्वाधिका ॥
२१४॥
गोपियों में श्रीमती राधिका सर्वोपरि हैं। वे सौन्दर्य, सद्गुण, सौभाग्य तथा प्रेम में सबसे बढ़कर हैं।
ग्रथा राधा प्रिया विष्णोस्तस्याः कुण्डं प्रियं तथा ।सर्व-गोपीषु सैवैका विष्णोरत्यन्त-वल्लभा ॥
२१५॥
जिस प्रकार राधा भगवान् कृष्ण को प्रिय हैं, उसी तरह उनका स्नान स्थल (राधाकुंड) भी उन्हें प्रिय है। अकेले वे ही समस्त गोपियों में से उनकी सबसे अधिक प्रिय हैं।
त्रैलोक्ये पृथिवी धन्या ग्रत्र वृन्दावनं पुरी ।।तत्रापि गोपिकाः पार्थ ग्नत्र राधाभिधा मम ॥
२१६॥
हे पार्थ, तीनों लोकों में यह पृथ्वी विशेष रूप से भाग्यशालिनी है,क्योंकि इसी पर वृन्दावन नगरी स्थित है। और वृन्दावन में भी गोपियाँ शेष रूप से महिमामण्डित हैं, क्योंकि मेरी आमती राधाराना ।
राधा-सह क्रीड़ा रस-वृद्धिर कारण ।आर सब गोपी-गण रसोपकरण ॥
२१७॥
अन्य सारी गोपियाँ राधारानी के साथ कृष्ण की लीलाओं के आनन्द को बढ़ाने वाली हैं। गोपियाँ उनके पारस्परिक सुख में उपकरण का कार्य करती हैं।
कृष्णेर वल्लभा राधा कृष्ण-प्राण-धन ।।ताँहा विनु सुख-हेतु नहे गोपी-गण ॥
२१८॥
राधा कृष्ण की प्राणप्रिया हैं और वे उनके जीवन की सम्पत्ति हैं। उनके बिना गोपियाँ कृष्ण को आनन्द नहीं दे सकतीं।
कंसारिरपि संसार-वासना-बद्ध-शृङ्खलाम् ।राधामाधाय हृदये तत्याज व्रज-सुन्दरीः ॥
२१९॥
कंस के शत्रु भगवान् कृष्ण ने रासनृत्य के समय अन्य सारी गोपियों को एक ओर छोड़ दिया और श्रीमती राधारानी को अपने हृदय में स्थापित किया, क्योंकि वे भगवान् की इच्छाएँ पूरी करने में उनकी सहायिका हैं।
सेइ राधार भाव लञा चैतन्यावतार । झुग-धर्म नाम-प्रेम कैल परचार ॥
२२०॥
भी चैतन्य महाप्रभु वही राधा-भाव लेकर प्रकट हुए। उन्होंने इस युग । अर्म-भगवन्नाम संकीर्तन तथा भगवान् के शुद्ध प्रेम-का प्रचार किया।
सेई भावे निज-वाञ्छा करिल पूरण ।अवतारेर एइ वाञ्छा मूल कारण ॥
२२१॥
श्रीमती राधारानी के भाव में उन्होंने अपनी इच्छाएँ भी पूरी कीं। यही उनके अवतार का मुख्य कारण है।
श्री-कृष्ण-चैतन्य गोसाजि व्रजेन्द्र-कुमार। रस-मय-मूर्ति कृष्ण साक्षात्शृङ्गार ॥
२२२॥
भगवान् श्रीकृष्ण चैतन्य साक्षात् रस-विग्रह कृष्ण ( व्रजेन्द्रकुमार ) हैं। वे साक्षात् श्रृंगार मूर्ति हैं।
सेइ रस आस्वादिते कैल अवतार ।आनुसङ्गे कैल सब रसेर प्रचार ॥
२२३॥
वे उस माधुर्य रस का आस्वादन करने और संयोगवश समस्त रसों का प्रचार करने के लिए अवतरित हुए।
विश्वेषामनुरञ्जनेन जनयन्नानन्दमिन्दीवरश्रेणी-श्यामल-कोमलैरुपनयन्नङ्गैरनङ्गोत्सवम् । स्वच्छन्दं व्रज-सुन्दरीभिरभितः प्रत्यङ्गमालिङ्गितःशृङ्गारः सखि मूर्तिमानिव मधौ मुग्धो हरिः क्रीड़ति ॥
२२४॥
। हे सखियों, जरा देखो न, किस तरह श्रीकृष्ण वसन्त ऋतु का आनन्द ले रहे हैं। उनके प्रत्येक अंग का आलिंगन गोपियों द्वारा हो रहा हैं, जिससे वे साक्षात् श्रृंगार मूर्ति प्रतीत हो रहे हैं। वे अपनी दिव्य लीलाओं समस्त गोपियों एवं सारी सृष्टि को सुख प्रदान करते हैं। उन्होंने अपने कोमल श्यामवर्ण नीलकमल सदृश भुजाओं एवं चरणों से कामदेव के लिए एक उत्सव की सृष्टि कर दी है।
श्री-कृष्ण-चैतन्य गोसाजि रसेर सदन ।।अशेष-विशेषे कैल रस आस्वादन ॥
२२५॥
भगवान् श्रीकृष्ण चैतन्य रस के धाम हैं। उन्होंने स्वयं रस की मधुरता का आस्वादन अनन्त विधियों से किया।
सेइ द्वारे प्रवर्ताइल कलि-युग-धर्म ।चैतन्येर दासे जाने एइ सब मर्म ॥
२२६॥
इस तरह उन्होंने कलियुग के लिए धर्म का प्रवर्तन किया। श्री चैत महाप्रभु के भक्त इन सारे सत्यों को जानते हैं।
षष्ठ-श्लोकेर एइ कहिल आभास ।।मूल श्लोकेर अर्थ शुन करिये प्रकाश ॥
२२९॥
। । मैंने छठे श्लोक का संकेत कर दिया है। अब मैं उस मूल श्लोक का अर्थ उद्घाटित कर रहा हूँ, कृपा करके सुनें।
अद्वैत आचार्य, नित्यानन्द, श्रीनिवास ।। गदाधर, दामोदर, मुरारि, हरिदास ॥
२२७॥
आर व्रत चैतन्य-कृष्णेर भक्त-गण ।। भक्ति-भावे शिरे धरि सबारे चरण ॥
२२८॥
मैं अद्वैत आचार्य, भगवान् नित्यानन्द, श्रीवास पंडित, गदाधर पंडित, स्वरूप दामोदर, मुरारि गुप्त, हरिदास ठाकुर तथा श्रीकृष्ण चैतन्य के अन्य सभी भक्तों को भक्तिपूर्वक नमस्कार करके उनके चरणकमलों को सिर पर धारण करता हूँ।
श्री-राधायाः प्रणय-महिमा कीदृशो वानयैवा स्वाद्यो ग्रेनाद्भुत-मधुरिमा कीदृशो वा मदीयः । सौख्यं चास्या मदनुभवतः कीदृशं वेति लोभात् ।तद्भावाढ्यः समजनि शची-गर्भ-सिन्धौ हरीन्दुः ॥
२३०॥
श्रीमती राधारानी के प्रेम की महिमा को, उनके अद्भुत गुण जिनका आस्वादन केवल राधारानी ही अपने प्रेम के माध्यम से करती है, उसको तथा उनके प्रेम की मधुरता का अनुभव करने पर वे जिस सुख का अनुभव करती हैं, उसको समझने की इच्छा से परम भगवान् श्रीहरि राधा के भावों में विभोर होकर श्रीमती शचीदेवी की कोख से उसी प्रकार प्रकट हुए, जिस प्रकार समुद्र से चन्द्रमा प्रकट होता है।
ए सब सिद्धान्त गूढ़,—कहिते ना ग्रुयाय ।।ना कहिले, केह इहार अन्त नाहि पाय ॥
२३१॥
इन सारे सिद्धान्तों को जनसामान्य के समक्ष प्रकट करना अनुचित है। किन्तु यदि इन्हें प्रकट नहीं किया जाता, तो इन्हें कोई भी नहीं समझ सकेगा।
अतएव कहि किछु करिआ निगूढ़ । बुझिबे रसिक भक्त, ना बुझिबे मूढ़ ॥
२३२॥
इसलिए मैं केवल उनका सार ही प्रकट करूँगा, जिससे रसिक भक्त तो उन्हें समझ लें, किन्तु जो मूर्ख हैं, वे समझ न सकें।
हृदये धरये ये चैतन्य-नित्यानन्द ।।ए-सब सिद्धान्ते सेई पाइबे आनन्द ॥
२३३॥
जिस किसी ने श्री चैतन्य महाप्रभु तथा श्री नित्यानन्द प्रभु को अपने उदय में धारण कर लिया है, वह इन सारे दिव्य सिद्धान्तों को सुनकर परम आनन्दित होगा।
ए सब सिद्धान्त हय आमेर पल्लव ।भक्त-गण-कोकिलेर सर्वदा वल्लभ ॥
२३४॥
ये सारे सिद्धान्त आम के वृक्ष की नवांकुरित शाखाओं के समान हैं। ये कोयल रूपी भक्तों के लिए सदैव प्रिय हैं।
अभक्त-उष्ट्रेर इथे ना हय प्रवेश ।। तबे चित्ते हय मोर आनन्द-विशेष ॥
२३५॥
ऊँट समान अभक्त इन विषयों में प्रवेश नहीं कर सकते। इसलिए मेरे मन में विशेष प्रसन्नता है।
ये लागि कहिते भय, से ग्रदि ना जाने ।।इहा वइ किबा सुख आछे त्रिभुवने ॥
२३६॥
मैं उनके डर से कहना नहीं चाहता, किन्तु यदि वे नहीं समझते तो तीनों लोकों में इससे बढ़कर प्रसन्नता की बात और क्या हो सकती है? अतएव भक्त-गणे करि नमस्कार ।। निःशङ्के कहिये, तार हौमत्कार ॥
२३७॥
अतएव भक्तों को नमस्कार करके मैं उनके संतोष के लिए बिना भी संकोच के कहूँगा।
कृष्णेर विचार एक आछये अन्तरे ।।पूर्णानन्द-पूर्ण-रस-रूप कहे मोरे ॥
२३८ ॥
एक बार भगवान् कृष्ण ने अपने मन में विचार किया, “सारे लोग हते हैं कि मैं आनन्द तथा समस्त रसों से पूर्ण हूँ।
आमा हइते आनन्दित हय त्रिभुवन ।।आमाके आनन्द दिबे-ऐछे कोन्जन ॥
२३९॥
सारा संसार मुझ से ही आनन्द प्राप्त करता है। क्या ऐसा भी कोई है, जो मुझे आनन्द दे सके? आमा हैते यार हय शत शत गुण ।। सेइ-जन आह्लादिते पारे मोर मन ॥
२४०॥
जिस व्यक्ति में मुझसे सैकड़ों गुना अधिक गुण हों, वही मेरे मन को आनन्दित कर सकता है।
आमा हैते गुणी बड़ जगते असम्भवे ।।एकलि राधाते ताहा करि अनुभव ॥
२४१॥
मुझसे अधिक गुणवान व्यक्ति को इस जगत् में खोज पाना असम्भव है। किन्तु एकमात्र राधा में मुझे उस व्यक्ति की उपस्थिति जान पड़ती है, जो मुझे आनन्द दे सके।
कोटि-काम जिनि' रूप यद्यपि आमार ।। असमोर्ध्व-माधुर्य—साम्य नाहि ग्रार ॥
२४२॥
मोर रूपे आप्यायित हय त्रिभुवन ।राधार दर्शने मोर जुड़ाय नयन ॥
२४३॥
। यद्यपि मेरा सौन्दर्य एक करोड़ कामदेवों को पराजित करने वाला । यद्यपि यह अतुलनीय और अद्वितीय है तथा तीनों जगतों को आनन्दित करने वाला है, किन्तु राधारानी के दर्शन से मेरे नेत्रों को आनन्द प्राप्त होता हैं।
मोर वंशी-गीते आकर्षये त्रिभुवन ।राधार वचने हरे आमार श्रवण ॥
२४४॥
मेरी दिव्य बाँसुरी की ध्वनि तीनों लोकों को आकर्षित करती है, किन्तु मेरे कान श्रीमती राधारानी के मधुर शब्दों से मुग्ध हो जाते हैं।
यद्यपि आमार गन्धे जगत्सुगन्ध ।मोर चित्त-प्राण हरे राधा-अङ्ग-गन्ध ॥
२४५ ॥
यद्यपि मेरा शरीर सम्पूर्ण सृष्टि को सुगन्ध प्रदान करता है, किन्तु राधारानी के अंगों की सुगन्धि मेरे मन तथा हृदय को मोहित कर देती है।
यद्यपि आमार रसे जगत्सरस ।राधार अधर-रस आमा करे वश ॥
२४६॥
यद्यपि सम्पूर्ण सृष्टि मेरे कारण विभिन्न रसों से पूरित है, किन्तु मैं । श्रीमती राधारानी के अधरों के अमृत-रस पर मुग्ध हूँ।
यद्यपि आमार स्पर्श कोटीन्दु-शीतल ।।राधिकार स्पर्शे आमा करे सुशीतल ॥
२४७॥
यद्यपि मेरा स्पर्श एक करोड़ चन्द्रमाओं से भी शीतल है, किन्तु मैं श्रीमती राधिका के स्पर्श से शीतल हो उठता हूँ।
एइ मत जगतेर सुखे आमि हेतु ।।राधिकार रूप-गुण आमार जीवातु ॥
२४८॥
। इस तरह यद्यपि मैं सम्पूर्ण जगत् के सुख का उद्गम हूँ, किन्तु श्री राधाका के सौन्दर्य एवं गुण मेरे जीवन और आत्मा हैं।
एइ मत अनुभव आमार प्रतीत ।।विचारि' देखिये यदि, सब विपरीत ॥
२४९॥
श्रीमती राधारानी के प्रति मेरी स्नेहिल भावनाओं को इस रूप में समझा जा सकता है, किन्तु जब मैं विचार करके देखता हूँ, तो मैं उन्हें विपरीत पाता हूँ।
राधार दर्शने मोर जुड़ाय नयने ।।आमार दर्शने राधा सुखे अगेयान ॥
२५०॥
। जब मैं श्रीमती राधारानी पर दृष्टि डालता हूँ, तो मेरी आँखें पूर्णतया तृप्त हो जाती हैं, किन्तु मुझे देखकर वह और भी अधिक तुष्ट होती है।
परस्पर वेणु-गीते हरये चेतन ।।मोर भ्रमे तमालेरे करे आलिङ्गन ॥
२५१॥
बाँसों की परस्पर रगड़ से वंशी के समान जो मर्मर स्वर निकलता है, वह राधारानी की चेतना को हर लेता है, क्योंकि वह इसे मेरी वंशी की ध्वनि समझती है। वह मेरे भ्रम में तमाल वृक्ष का आलिंगन करती है।
कृष्ण-आलिङ्गन पाइनु, जनम सफले ।कृष्ण-सुखे मग्न रहे वृक्ष करि' कोले ॥
२५२ ॥
वह सोचती है, 'मुझे कृष्ण का आलिंगन मिल रहा है, अतएव मेरा जीवन सार्थक हो गया है। इस प्रकार वह वृक्ष को अपनी भुजाओं में भरकर कृष्ण को प्रसन्न करने में मग्न रहती है।
अनुकूल-वाते यदि पाय मोर गन्ध ।उड़िया पड़िते चाहे, प्रेमे हय अन्ध ॥
२५३॥
। जब अनुकूल वायु मेरे शरीर की सुगन्ध को उस तक ले जाती है, प्रेमान्ध हो उठती है और उस वायु में उड़ना चाहती है।
ताम्बूल-चर्वित ग्रबे करे आस्वादने । आनन्द-समुद्रे डुबे, किछुइ ना जाने ॥
२५४॥
जब वह मेरे द्वारा चर्वित पान का आस्वादन करती है, तो वह आनन्द के समुद्र में डूब जाती है और सब कुछ भूल जाती है।
आमार सङ्गमे राधा पाय ग्रे आनन्द । शत-मुखे बलि, तबु ना पाई तार अन्त ॥
२५५॥
मैं सैकड़ों मुखों से उस दिव्य आनन्द को व्यक्त नहीं कर सकता, जिसे वह मेरी संगति से प्राप्त करती है।
लीला-अन्ते सुखे इँहार अङ्गेर माधुरी ।। ताहा देखि' सुखे आमि आपना पाशरि ॥
२५६॥
अपनी परस्पर-लीलाओं के अन्त में उसके वर्ण की कान्ति को देखकर मैं सुख में मग्न होकर अपनी खुद की पहचान भूल जाता हूँ।
दोंहार ने सम-रस, भरत-मुनि माने ।। आमार व्रजेर रस सेह नाहि जाने ॥
२५७॥
। भरत मुनि ने कहा है कि प्रेमी तथा प्रेमिका के रस समान होते हैं। किन्तु मेरे वृन्दावन के रस को वे भी नहीं जानते।
अन्येर सङ्गमे आमि व्रत सुख पाई। ताहा हैते राधा-सुख शत अधिकाइ ॥
२५८॥
मुझे राधारानी से मिलने पर जो सुख प्राप्त होता है, वह अन्यों से ने पर प्राप्त होने वाले सुख से सैकड़ों गुना अधिक होता है।
निर्भूतामृत-माधुरी-परिमल: कल्याणि बिम्बाधरो ।वक्त्रं पङ्कज-सौरभं कुहरित-श्लाघा-भिदस्ते गिरः । अङ्गं चन्दन-शीतलं तनुरियं सौन्दर्य-सर्वस्व-भाक्त्वामासाद्य ममेदमिन्द्रिय-कुलं राधे मुहुर्मोदते ॥
२५९ ॥
। हे कल्याणी राधारानी, तुम्हारा शरीर समस्त सौन्दर्य का स्रोत है। तुम्हारे लाल लाल अधर अमृत-माधुरी की अनुभूति से भी कोमल हैं, तुम्हारा मुख कमल के फूले की सुगन्धि से ओतप्रोत है, तुम्हारी मधुर वाणी कोयल की ध्वनि को परास्त करने वाली है और तुम्हारे अंग-प्रत्यंग चन्दन-लेप से भी शीतल हैं। मेरी सभी दिव्य इन्द्रियाँ सद्गुणों से अलंकृत तुम्हारा आस्वादन करके परम आह्लादित होती हैं।'
रूपे कंस-हरस्य लुब्ध-नयनां स्पर्शेऽतिहृष्यत्त्वचंवाण्यामुत्कलित-श्रुतिं परिमले संहृष्ट-नासा-पुटाम् ।। आरज्यद्रसनां किलाधर-पुटे न्यञ्चन्मुखाम्भोरुहां दम्भोगीर्ण-महा-धृतिं बहिरपि प्रोद्यद्विकाराकुलाम् ॥
२६०॥
उनकी आँखें कंस के शत्रु भगवान् कृष्ण के सौन्दर्य पर मुग्ध हैं। उनका शरीर कृष्ण के स्पर्श से आनन्द-पुलकित होता है। उनके कान सदैव उनकी मधुर ध्वनि की ओर आकृष्ट होते हैं। उनकी नाक उनकी सुगन्ध से मुग्ध होती है और उनकी जीभ उनके कोमल अधरों का अमृतपान करने के लिए लालायित रहती है। वे आत्मसंयम का बहाना करके अपने कमल सदृश मुख को लटकाये रहती हैं, किन्तु वे कृष्ण के प्रति उनके स्वयंस्फूर्त रागानुग प्रेम के बाह्य लक्षण को प्रकट होने से रोक नहीं सकतीं।'
ताते जानि, मोते आछे कोन एक रस ।। आमार मोहिनी राधा, तारे करे वश ॥
२६१॥
यह विचार करने पर मैं समझ सकता हूँ कि मुझमें कोई अज्ञात रस है, जो मुझे मोहित करने वाली श्रीमती राधारानी को सम्पूर्ण रूप से वश में करता है।
आमा हैते राधा पाय ग्रे जातीय सुख ।। ताहा आस्वादिते आमि सदाई उन्मुख ॥
२६२॥
मैं सदैव उस सुख का आस्वादन करने के लिए उत्सुक रहता हूँ, जो राधारानी मुझसे प्राप्त करती है।
नाना ग्रन करि आमि, नारि आस्वादिते । सेइ सुख-माधु-घ्राणे लोभ बाढ़ चित्ते ॥
२६३॥
- अनेक प्रयत्नों के बाद भी मैं उसका आस्वादन करने के लिए समर्थ नहीं हो सका। किन्तु जब मैं इसकी मधुरता को सँघता हूँ, तो उस सुख का आस्वादन करने की मेरी इच्छा बढ़ जाती है।
रस आस्वादिते आमि कैल अवतार । प्रेम-रस आस्वादिल विविध प्रकार ॥
२६४॥
पहले मैं रसों का आस्वादन करने के लिए संसार में प्रकट हुआ था और मैंने शुद्ध प्रेम के रसों का अनेक प्रकार से आस्वादन किया।
राग-मार्गे भक्त भक्ति करे ने प्रकारे । ताहा शिखाइल लीला-आचरण-द्वारे ॥
२६५॥
मैंने भक्तों को रागानुग प्रेम से प्रकट होने वाली भक्ति की शिक्षा । अपनी लीलाओं का प्रदर्शन करके प्रदान की।
एइ तिन तृष्णा मोर नहिल पूरण ।। विजातीय-भावे नहे ताहा आस्वादन ॥
२६६॥
किन्तु मेरी ये तीन इच्छाएँ पूरी नहीं हुईं, क्योंकि विपरीत पद में इनका आस्वादन नहीं किया जा सकता।
राधिकार भाव-कान्ति अङ्गीकार विने । सेइ तिन सुख कभु नहे आस्वादने ॥
२६७॥
यदि मैं श्री राधिका के प्रेम-भाव तथा कान्ति को स्वीकार नहीं करूँगा, तो ये तीन इच्छाएँ पूरी नहीं हो सकेगी।
राधा-भाव अङ्गीकरि' धरि' तार वर्ण ।।तिने-सुख आस्वादिते हब अवतीर्ण ॥
२६८॥
अतएव राधारानी के भावों को तथा उनके शारीरिक वर्ण को धारण करके इन तीनों इच्छाओं को पूरा करने के लिए मैं अवतरित हूँगा।
सर्व-भावे कैल कृष्ण एइ त निश्चय ।।हेन-काले आइल युगावतार-समय ॥
२६९॥
इस तरह भगवान् कृष्ण इस निर्णय पर पहुँचे। उसी समय युगावतार का समय भी आ गया।
सेइ-काले श्री-अद्वैत करेन आराधन ।ताँहार हुङ्कारे कैल कृष्णे आकर्षण ॥
२७० ॥
उस समय श्री अद्वैत निष्ठा से उनकी पूजा कर रहे थे। उन्होंने अपनी तेज पुकार से भगवान् को आकृष्ट किया।
पिता-माता, गुरु-गण, आगे अवतारि' । राधिकार भाव-वर्ण अङ्गीकार करि' ॥
२७१॥
नव-द्वीपे शची-गर्भ-शुद्ध-दुग्ध-सिन्धु । ताहाते प्रकट हैला कृष्ण पूर्ण इन्दु ॥
२७२॥
सर्वप्रथम भगवान् कृष्ण ने अपने माता-पिता एवं गुरुजनों को प्रकट होने दिया। स्वयं कृष्ण, राधिका का भाव एवं उनका वर्ण लेकर, नवद्वीप में क्षीर सागर के समान माता शची की कोख से पूर्ण चन्द्रमा के समान प्रकट हुए।
एइ त' करिहुँ षष्ठ श्लोकेर व्याख्यान ।श्री-रूप-गोसाजिर पाद-पद्म करि' ध्यान ॥
२७३ ॥
मैंने श्री रूप गोस्वामी के चरणकमलों का ध्यान करके छठे श्लोक की इस तरह व्याख्या की है।
एइ दुइ श्लोकेर आमि ग्रे करिल अर्थ । श्री-रूप-गोसाजिर श्लोक प्रमाण समर्थ ॥
२७४॥
मैं इन दो श्लोकों (प्रथम अध्याय के श्लोक ५ तथा ६) की व्याख्या की पुष्टि श्रील रूप गोस्वामी के श्लोक से कर सकता हूँ।
अपारं कस्यापि प्रणयि-जन-वृन्दस्य कुतुकीरस-स्तोमं हृत्वा मधुरमुपभोक्तुं कमपि यः । रुचं स्वामाव→ द्युतिमिह तदीयां प्रकटयन् । स देवश्चैतन्याकृतिरतितरां नः कृपयतु ॥
२७५ ॥
भगवान् कृष्ण प्रेमिकाओं के समूह में से एक ( श्री राधा ) के असीम प्रेम के अमृत रस का आस्वादन करना चाहते थे; अतएव उन्होंने चैतन्य महाप्रभु का स्वरूप धारण किया है। उन्होंने राधा के तेजोमय गौरवर्ण से ने श्यामवर्ण को छिपाते हुए उस प्रेम का आस्वादन किया है। वे चैतन्य भु हम सबको अपनी कृपा प्रदान करें।"
मङ्गलाचरणं कृष्ण-चैतन्य-तत्त्व-लक्षणम् । प्रयोजनं चावतारे श्लोक-षट्कैर्निरूपितम् ॥
२७६॥
इस प्रकार प्रथम छह श्लोकों में मंगलाचरण, श्री चैतन्य के तत्त्व का अनिवार्य लक्षण एवं उनके प्राकट्य के कारण को प्रस्तुत किया गया है।"
श्री-रूप-रघुनाथ-पदे यार आश । चैतन्य-चरितामृत कहे कृष्णदास ॥
२७७॥
मैं कृष्णदास श्री रूप तथा श्री रघुनाथ के चरणकमलों में प्रार्थना करते हुए और उनकी कृपा की आकांक्षा करते हुए तथा उनके पदया। पर चलकर श्री चैतन्य-चरितामृत का वर्णन कर रहा हूँ।"
