अध्याय पांच: भगवान नित्यानंद बलराम की महिमा
वन्देऽनन्ताद्भुतैश्वर्यं श्री-नित्यानन्दमीश्वरम् ।। ग्रस्येच्छया तत्स्वरूपमज्ञेनापि निरूप्यते ॥
१॥
मैं उन पूर्ण पुरुषोत्तम भगवान् श्री नित्यानन्द प्रभु को नमस्कार करता हैं, जिनका ऐश्वर्य अद्भुत तथा असीम है। उनकी इच्छा होने पर एक मूर्ख भी उनके स्वरूप को समझ सकता है।
जय जय श्री-चैतन्य जय नित्यानन्द ।। जयाद्वैत-चन्द्र जय गौर-भक्त-वृन्द ॥
२ ॥
श्री चैतन्य महाप्रभु की जय हो! श्री नित्यानन्द प्रभु की जय हो! श्री अद्वैत आचार्य की जय हो! और श्री चैतन्य महाप्रभु के सारे भक्तों की जय हो! एइ षट्श्लोके कहिल कृष्ण-चैतन्य-महिमा ।। पञ्च-श्लोके कहि नित्यानन्द-तत्त्व-सीमा ॥
३ ॥
मैंने श्रीकृष्ण चैतन्य की महिमा का वर्णन छह श्लोकों में किया है। अब मैं पाँच श्लोकों में भगवान् श्री नित्यानन्द की महिमा का वर्णन करूंगा।
सर्व-अवतारी कृष्ण स्वयं भगवान् । ताँहार द्वितीय देह श्री-बलराम ॥
४॥
पूर्ण पुरुषोत्तम भगवान् कृष्ण समस्त अवतारों के स्रोत हैं। भगवान् बलराम उनके द्वितीय शरीर हैं।
एक स्वरूप दोहे, भिन्न-मात्र काय । आद्य काय-व्यूह, कृष्ण-लीलार सहाय ॥
५॥
वे दोनों एक ही रूप हैं। केवल उनके शरीर में अन्तर है। भगवान् बलराम कृष्ण के प्रथम शारीरिक विस्तार (कायव्यूह ) हैं और कृष्ण की दिव्य लीलाओं में सहायक होते हैं।
सेइ कृष्ण नवद्वीप श्री-चैतन्य-चन्द्र ।सेइ बलराम–सङ्गे श्री-नित्यानन्द ॥
६॥
वे मूल भगवान् कृष्ण नवद्वीप में श्री चैतन्य महाप्रभु के रूप में प्रकट हुए और श्री बलराम उनके साथ श्री नित्यानन्द प्रभु के रूप में प्रकट हुए।
सङ्कर्षणः कारण-तोय-शायीगर्भोद-शायी च पयोब्धि-शायी । शेषश्च यस्यांश-कलाः स नित्यानन्दाख्य-रामः शरणं ममास्तु ॥
७॥
वे श्री नित्यानन्द राम मेरे निरन्तर स्मरण के लक्ष्य बनें, जिनके पूर्णाश तथा पूर्णांश के अंश संकर्षण, शेषनाग तथा वे विष्णु हैं, जो क्रमशः कारण-सागर, गर्भ-सागर तथा क्षीर-सागर में शयन करते हैं।
श्री-बलराम गोसाजि मूल-सङ्कर्षण ।।पञ्च-रूप धरि' करेन कृष्णेर सेवन ॥
८॥
। भगवान् बलराम मूल संकर्षण हैं। वे भगवान् कृष्ण की सेवा करने के लिए पाँच अन्य रूप धारण करते हैं।
आपने करेन कृष्ण-लीलार सहाय ।सृष्टि-लीला-कार्य करे धरि' चारि काय ॥
९॥
वे स्वयं भगवान् कृष्ण की लीलाओं में सहायता करते हैं और चार अन्य रूपों में सृजन-कार्य भी करते हैं।
सृष्ट्यादिक सेवा, ताँर आज्ञार पालन ।।‘शेष'-रूपे करे कृष्णोर विविध सेवन ॥
१० ॥
वे सृष्टि-कार्य में भगवान् कृष्ण के आदेशों का पालन करते हैं और भगवान् शेष के रूप में वे कृष्ण की अनेक प्रकार से सेवा करते हैं।
सर्व-रूपे आस्वादये कृष्ण-सेवानन्द ।।सेइ बलराम–गौर-सङ्गे नित्यानन्द ॥
११॥
वे अपने समस्त रूपों में कृष्ण की सेवा करने के दिव्य आनन्द का स्वादन करते हैं। वे बलराम ही भगवान् गौरसुन्दर के सहचर नित्यानन्द प्रभु हैं।
सप्तम श्लोकेर अर्थ करि चारि-श्लोके ।।ग्राते नित्यानन्द-तत्त्व जाने सर्व-लोके ॥
१२॥
मैंने इस सातवें श्लोक की व्याख्या लगातार चार श्लोकों में की है। न श्लोकों से सारा संसार नित्यानन्द प्रभु के विषय में सत्य को जान सकता है।
मायातीते व्यापि-वैकुण्ठ-लोके पूर्णेश्वर्ये श्री-चतुयूंह-मध्ये ।। रूपं ग्रस्योद्भाति सङ्कर्षणाख्यंतं श्री-नित्यानन्द-रामं प्रपद्ये ॥
१३॥
मैं उन श्री नित्यानन्द राम के चरणकमलों की शरण ग्रहण करता है. जो चतुयूंह के मध्य संकर्षण नाम से विख्यात हैं ( चतुयूंह में वासुदेव, संकर्षण, प्रद्युम्न तथा अनिरुद्ध सम्मिलित हैं)। वे समस्त ऐश्वर्यों से युक्त हैं और इस भौतिक जगत् से बहुत दूर वैकुण्ठ-लोक में निवास करते हैं।
प्रकृतिर पार ‘परव्योम'-नामे धाम ।। कृष्ण-विग्रह ग्रैछे विभूत्यादि-गुणवान् ॥
१४॥
भौतिक प्रकृति से परे परव्योम अर्थात् आध्यात्मिक आकाश है। यह साक्षात् कृष्ण की ही तरह समस्त दिव्य गुणों-यथा छह ऐश्वर्यो-से युक्त है।
सर्वग, अनन्त, विभु–वैकुण्ठादि धाम ।।कृष्ण, कृष्ण-अवतारेर ताहात्रि विश्राम ॥
१५ ॥
वह वैकुण्ठ धाम सर्वव्यापी, अनन्त एवं परम पूर्ण है। वह भगवान् कृष्ण तथा उनके अवतारों का आवास है।
ताहार उपरि-भागे 'कृष्ण-लोक'-ख्याति ।द्वारका-मथुरा-गोकुल–त्रि-विधत्वे स्थिति ॥
१६॥
उस आध्यात्मिक आकाश के सर्वोच्च भाग में कृष्यालोक नामक आध्यात्मिक लोक है। इसके तीन विभाग हैं-द्वारका, मथुरा तथा गोकुल।
सर्वोपरि श्री-गोकुल-व्रजलोक-धाम ।। श्री-गोलोक, श्वेतद्वीप, वृन्दावन नाम ॥
१७॥
इनमें से सर्वोच्च श्री गोकुल है, जो व्रज, गोलोक, श्वेतद्वीप तथा वृन्दावन भी कहलाता है।
सर्वग, अनन्त, विभु, कृष्ण-तनु-सम ।। उपर्युधो व्यापियाछे, नाहिक नियम ॥
१८ ॥
भगवान् कृष्ण के दिव्य शरीर के ही समान गोकुल सर्वव्यापी, अनन्त तथा सर्वोपरि है। यह किसी प्रतिबन्ध के बिना ऊपर तथा नीचे तक विस्तृत है।
ब्रह्माण्डे प्रकाश तार कृष्णेर इच्छाय । एक स्वरूप तार, नाहि दुई काय ॥
१९॥
वह धाम भगवान् कृr की इच्छा से भौतिक जगत् के भीतर प्रकट होता है। यह मूल गोकुल से भिन्न है। ये दो भिन्न-भिन्न स्थान नहीं हैं।
चिन्तामणि-भूमि, कल्प-वृक्ष-मय वन । चर्म-चक्षे देखे तारे प्रपञ्चेर सम ॥
२०॥
वहाँ की भूमि चिन्तामणि की बनी हुई है और वन कल्पवृक्षों से पूर्ण हैं। भौतिक आँखें इसे सामान्य स्थान के रूप में देखती हैं।
प्रेम-नेत्रे देखे तार स्वरूप-प्रकाश ।। गोप-गोपी-सङ्गे याँहा कृष्णेर विलास ॥
२१॥
किन्तु भगवत्प्रेम से पूरित नेत्रों से मनुष्य इस स्थान के वास्तविक वरूप को देख सकता है, जहाँ भगवान् कृष्ण ग्वालबालों और गोपियों के साथ अपनी लीलाएँ करते हैं।
चिन्तामणि-प्रकर-सद्मसु कल्प-वृक्ष लक्षावृतेषु सुरभीरभिपालयन्तम् । लक्ष्मी-सहस्र-शत-सम्भ्रम-सेव्यमानंगोविन्दमादि-पुरुषं तमहं भजामि ॥
२२॥
मैं उन आदि पुरुष भगवान् गोविन्द की पूजा करता हूँ, जो समस्त इच्छाओं को पूर्ण करने वाली गौओं का चिन्तामणियों से निर्मित और करोड़ों कल्पवृक्षों से घिरे अपने धाम में पालन करते हैं। उनकी सेवा में सदैव सैकड़ों-हजारों लक्ष्मियाँ अत्यन्त आदर एवं स्नेह के साथ तत्पर रहती हैं।
मथुरा-द्वारकाय निज-रूप प्रकाशिया ।। नाना-रूपे विलसये चतुयूंह हैजा ॥
२३॥
भगवान् कृष्ण अपने निजी रूप को मथुरा तथा द्वारका में प्रकाशित करते हैं। वे चतुयूंह रूपों में अपना विस्तार करके नाना प्रकार से लीलाओं का आनन्द लेते हैं।
वासुदेव-सङ्कर्षण-प्रद्युम्नानिरुद्ध ।।सर्व-चतुयूंह-अंशी, तुरीय, विशुद्ध ॥
२४॥
वासुदेव, संकर्षण, प्रद्युम्न तथा अनिरुद्ध-ये चार मूल चतुयूंह रूप हैं, जिनसे अन्य सारे चतुयूंह रूप प्रकट होते हैं। वे सभी शुद्ध रूप से दिव्य हैं।
एइ तिन लोके कृष्ण केवल-लीला-मय । निज-गण लञा खेले अनन्त समय ॥
२५॥
केवल इन्हीं तीन स्थानों में (द्वारका, मथुरा तथा गोकुल में ) लीलामय भगवान् कृष्ण अपने निजी संगियों के साथ अनन्त लीलाएँ करते हैं।
पर-व्योम-मध्ये करि' स्वरूप प्रकाश ।नारायण-रूपे करेन विविध विलास ॥
२६॥
परव्योम के वैकुण्ठ-लोकों में भगवान् नारायण रूप में प्रकट होते हैं और नाना प्रकार से लीलाएँ करते हैं।
स्वरूप-विग्रह कृष्णेर केवल द्वि-भुज । नारायण-रूपे सेइ तनु चतुर्भुज ॥
२७॥
शङ्ख-चक्र-गदा-पद्म, महैश्वर्य-मय ।।श्री-भू-नीला-शक्ति याँर चरण सेवय ॥
२८॥
। कृष्ण के निजी रूप में केवल दो भुजाएँ होती हैं, किन्तु उनके नारायण रूप में चार भुजाएँ रहती हैं। भगवान् नारायण शंख, चक्र, गदा और पद्म धारण करते हैं और वे परम ऐश्वर्यमय हैं। श्री, भू तथा नीला नामक शक्तियाँ उनके चरणकमलों की सेवा करती हैं।
यद्यपि केवल ताँर क्रीड़ा-मात्र धर्म ।।तथापि जीवेरे कृपाय करे एक कर्म ॥
२९॥
'। यद्यपि उनकी लीलाएँ उनके एकमात्र विशेष कार्य हैं, किन्तु वे अपनी अहेतुकी कृपा से पतितात्माओं के लिए एक कार्य करते हैं।
सालोक्य-सामीप्य-सार्टि-सारूप्य-प्रकार ।चारि मुक्ति दिया करे जीवेर निस्तार ॥
३० ॥
वे पतितात्माओं को चार प्रकार की मुक्ति-सालोक्य, सामीप्य, सार्टि तथा सारूप्य-प्रदान करके उनका उद्धार करते हैं।
ब्रह्म-सायुज्य-मुक्तेर ताहा नाहि गति ।वैकुण्ठ-बाहिरे हय ता'-सबार स्थिति ॥
३१॥
जिन्हें ब्रह्म-सायुज्य मुक्ति प्राप्त होती है, वे वैकुण्ठ-लोक में प्रविष्ट नहीं हो सकते। उनका निवास वैकुण्ठ-लोक के बाहर होता है।
वैकुण्ठ-बाहिरे एक ज्योतिर्मय मण्डल ।।कृष्णेर अङ्गेर प्रभा, परम उज्वल ॥
३२॥
वैकुण्ठ-लोक के बाहर दीप्तियुक्त तेज का वायुमण्डल है, जो भगवान् कृष्ण के शरीर की परम उज्वल किरणों से बना होता है।
‘सिद्ध-लोक' नाम तार प्रकृतिर पार ।चित्स्वरूप, ताँहा नाहि चिच्छक्ति विकार ॥
३३॥
यह भाग सिद्धलोक कहलाता है और भौतिक प्रकृति के परे होता है। पद आध्यात्मिक होता है, किन्तु इसमें आध्यात्मिक विविधता नहीं रहती।
सूर्य-मण्डल नेने बाहिरे निर्विशेष ।।भितरे सूर्येर रथ-आदि सविशेष ॥
३४॥
यह सूर्य के चारों ओर पाये जाने वाले समरूप तेज के समान है। किन्तु सूर्य के भीतर रथ, घोड़े तथा सूर्यदेव के अन्य ऐश्वर्य रहते हैं।
कामाद्वेषाद्भयात्स्नेहा ग्रथा भक्त्येश्वरे मनः ।। आवेश्य तदघं हित्वा बहवस्तद्गतिं गताः ॥
३५॥
जिस तरह भगवान् की भक्ति से भगवद्धाम प्राप्त किया जा सकता है, उसी तरह कइयों ने अपने पापमय कर्मों को त्यागकर तथा काम, क्रोध, भय या स्नेह के द्वारा अपने मन को भगवान् में लगाकर उसी गति को प्राप्त किया है।
ग्रदरीणां प्रियाणां च प्राप्यमेकमिवोदितम् ।तद्ब्रह्म-कृष्णयौरैक्यात्किरणार्कोपमा-जुषोः ॥
३६॥
जहाँ यह कहा गया है कि भगवान् के शत्रु तथा भक्त एक ही गति प्राप्त करते हैं, वहाँ इसका आशय यह है कि ब्रह्म तथा भगवान् कृष्ण अन्ततः एक ही हैं। इसे सूर्य तथा सूर्य-प्रकाश के दृष्टान्त से समझा जा सकता है, जिसमें ब्रह्म सूर्य-प्रकाश के समान है और स्वयं कृष्ण सूर्य के समान हैं।
तैछे पर-व्योमे नाना चिच्छक्ति-विलास ।निर्विशेष ज्योतिर्बिम्ब बाहिरे प्रकाश ॥
३७॥
। इस तरह परव्योम में आध्यात्मिक शक्ति के अन्तर्गत अनेक प्रकार की । लीलाएँ होती हैं। वैकुण्ठ-लोकों के बाहर प्रकाश का निर्विशेष प्रतिबिम्ब प्रकट होता है।
निर्विशेष-ब्रह्म सेइ केवल ज्योतिर्मय ।सायुज्येर अधिकारी ताँहा पाय लय ॥
३८॥
उस निर्विशेष ब्रह्मतेज में केवल भगवान् की तेजोमय किरणें होती हैं। जो लोग सायुज्य मुक्ति के लिए उपयुक्त होते हैं, वे उस तेज में समा जाते हैं।
सिद्ध-लोकस्तु तमसः पारे यत्र वसन्ति हि।सिद्धा ब्रह्म-सुखे मग्ना दैत्याश्च हरिणा हताः ॥
३९॥
तमो क्षेत्र ( भौतिक ब्रह्माण्ड) के परे सिद्धलोक का क्षेत्र स्थित है। वहाँ पर सिद्धगण ब्रह्मानन्द में मग्न होकर निवास करते हैं। भगवान् के रा मारे गये असुर भी उसी क्षेत्र को प्राप्त करते हैं।
सेइ पर-व्योमे नारायणेर चारि पाशे ।द्वारका-चतुयूँहेर द्वितीय प्रकाशे ॥
४०॥
उस परव्योम में नारायण के चारों ओर द्वारका के चतुयूंह के द्वितीय विस्तार रहते हैं।
वासुदेव-सङ्कर्षण-प्रद्युम्नानिरुद्ध ।‘द्वितीय चतुर्व्यह' एई—तुरीय, विशुद्ध ॥
४१॥
। इस द्वितीय चतुयूंह में वासुदेव, संकर्षण, प्रद्युम्न तथा अनिरुद्ध आते है। वे नितान्त दिव्य हैं।
ताँहा ने रामेर रूप-महा-सङ्कर्षण ।चिच्छक्ति-आश्रय तिंहो, कारणेर कारण ॥
४२॥
वहाँ पर (परव्योम में) बलराम के साकार स्वरूप, जो महासंकर्षण कहलाते हैं, आध्यात्मिक शक्ति के आश्रय हैं। वे मूल कारण हैं, अर्थात् समस्त कारणों के कारण हैं।
चिच्छक्ति-विलास एक–‘शुद्ध-सत्त्व' नाम ।शुद्ध-सत्त्व-मय व्रत वैकुण्ठादि-धाम ॥
४३॥
। आध्यात्मिक शक्ति की एक लीला विशुद्ध सत्त्व के रूप में वर्णित है। इसमें सारे वैकुण्ठ-धाम सम्मिलित हैं।
षडू-विधैश्वर्य ताँहा सकल चिन्मय ।। सङ्कर्षणेर विभूति सब, जानिह निश्चय ॥
४४॥
सारे छहों ऐश्वर्य आध्यात्मिक हैं। इसे निश्चित रूप से जानिए कि ये सब संकर्षण के ऐश्वर्य की ही अभिव्यक्तियाँ हैं।
‘जीव'-नाम तटस्थाख्य एक शक्ति हय । महा-सङ्कर्षण—सब जीवेर आश्रय ॥
४५ ॥
एक तटस्था शक्ति है, जो जीव कहलाती है। महासंकर्षण समस्त जीवों के आश्रय हैं।
ग्राँहा हैते विश्वोत्पत्ति, ग्राँहाते प्रलय । सेइ पुरुषेर सङ्कर्षण समाश्रय ॥
४६॥
संकर्षण पुरुष के मूल आश्रय हैं, जिनसे यह जगत् उत्पन्न होता है और जनमें यह विलीन हो जाता है।
सर्वाश्रय, सर्वाद्भुत, ऐश्वर्य अपार ।'अनन्त' कहते नारे महिमा याँहार ॥
४७॥
वे (संकर्षण) सबके आश्रय हैं। वे हर प्रकार से अद्भुत हैं और उनको ऐश्वर्य अपार है, यहाँ तक कि अनन्त भी उनकी महिमा का वर्णन नहीं कर सकते।
तुरीय, विशुद्ध-सत्त्व, ‘सङ्कर्षण' नाम ।।तिंहो याँर अंश, सेइ नित्यानन्द-राम ॥
४८॥
वे दिव्य शुद्ध सत्त्व संकर्षण नित्यानन्द बलराम के अंश विस्तार हैं।
अष्टम श्लोकेर कैल सङ्क्षेपे विवरण ।नवम श्लोकेर अर्थ शुन दिया मन ॥
४९॥
मैंने आठवें श्लोक का संक्षिप्त विवेचन किया है। अब कृपा करके ध्यानपूर्वक नवें श्लोक की व्याख्या सुनें।
माया-भर्ताजाण्ड-सङ्घाश्रयाङ्गः शेते साक्षात्कारणाम्भोधि-मध्ये । ग्रस्यैकांशः श्री-पुमानादि-देवस् ।तं श्री-नित्यानन्द-रामं प्रपद्ये ॥
५०॥
मैं श्री नित्यानन्द राम के चरणों में पूर्ण दण्डवत् प्रणाम अर्पित करता हैं, जिनके अंशरूप कारण-सागर में लेटे हुए कारणोदकशायी विष्णु आदि पुरुष हैं, माया के पति हैं और समस्त ब्रह्माण्डों के आश्रय हैं।
वैकुण्ठ-बाहिरे येइ ज्योतिर्मय धाम ।ताहार बाहिरे 'कारणार्णव' नाम ॥
५१॥
वैकुण्ठ ग्रहों के बाहर निर्विशेष ब्रह्मतेज है और इस तेज से परे करणार्णव या कारण सागर है।
वैकुण्ठ बेड़िया एक आछे जल-निधि ।।अनन्त, अपार—तार नाहिक अवधि ॥
५२॥
वैकुण्ठ के चारों ओर अपार जलराशि है, जो अनन्त, अगाध और। असीम है।
वैकुण्ठेर पृथिव्यादि सकल चिन्मय ।मायिक भूतेर तथि जन्म नाहि हय ॥
५३॥
वैकुण्ठ में पृथ्वी, जल, अग्नि, वायु तथा आकाश-सभी आध्यात्मिक हैं। वहाँ भौतिक तत्त्व नहीं पाये जाते।
चिन्मय-जल सेइ परम कारण ।ग्रार एक कणा गङ्गा पतित-पावन ॥
५४॥
अतएव परम कारण स्वरूप कारण सागर का जल आध्यात्मिक है। पत्र गंगा नदी, जो उसकी एक बूंद मात्र है, पतितात्माओं को शुद्ध नाती है।
सेइ त' कारणार्णवे सेइ सङ्कर्षण ।।आपनार एक अंशे करेन शयन ॥
५५॥
उस सागर में भगवान् संकर्षण के एक पूर्ण अंश शयन करते हैं।
महत्स्रष्टा पुरुष, तिंहो जगत्कारण ।।आद्य-अवतार करे मायाय ईक्षण ॥
५६॥
वे समग्र भौतिक शक्ति के सृजनकर्ता प्रथम पुरुष के नाम से जाने जाते हैं। वे समस्त ब्रह्माण्डों के कारण एवं प्रथम पुरुष अवतार माया के ऊपर दृष्टिपात करते हैं।
माया-शक्ति रहे कारणाब्धिर बाहिरे । कारण-समुद्र माया परशिते नारे ॥
५७॥
मायाशक्ति कारण सागर के बाहर निवास करती है। माया इसके जन को स्पर्श नहीं कर सकती।
सेइ त' मायार दुइ-विध अवस्थिति ।। जगतेर उपादान ‘प्रधान', प्रकृति ॥
५८ ॥
माया का अस्तित्व दो प्रकार का होता है। एक प्रधान या प्रकृति कहलाता है। यह भौतिक जगत् के अवयवों ( उपादानों ) की पूर्ति करता है।
जगत्कारण नहे प्रकृति जड़-रूपा ।शक्ति सञ्चारिया तारे कृष्ण करे कृपा ॥
५९॥
चूंकि प्रकृति जड़ तथा निष्क्रिय है, अतएव यह वास्तव में भौतिक जगत् की कारण नहीं हो सकती। लेकिन भगवान् कृष्ण जड़ निष्क्रिय भौतिक प्रकृति में अपनी शक्ति संचारित करके अपनी कृपा प्रदर्शित करते हैं।
कृष्ण-शक्त्ये प्रकृति हय गौण कारण ।। अग्नि-शक्त्ये लौह प्रैछे करये जारण ॥
६०॥
इस तरह भगवान् कृष्ण की शक्ति के द्वारा प्रकृति गौण कारण बन जाती है, जिस तरह लोहा अग्नि की शक्ति से लाल हो जाता है।
अतएव कृष्ण मूल-जगत्कारण । प्रकृति कारण ग्रैछे अजा-गल-स्तन ॥
६१॥
अतएव भगवान् कृष्ण इस जगत् के प्राकट्य के मूल कारण हैं।प्रकृति तो बकरी के गले से लटकने वाले उन स्तनों की भाँति है, जिनसे नहीं निकलता।
माया-अंशे कहि तारे निमित्त-कारण ।सेह नहे, ग्राते कर्ता-हेतु–नारायण ॥
६२॥
भौतिक प्रकृति का माया अंश विश्व के प्राकट्य का तात्कालिक कारण है। किन्तु यह वास्तविक कारण नहीं हो सकता, क्योंकि मूल कारण तो भगवान् नारायण हैं।
घटेर निमित्त-हेतु ग्रैछे कुम्भकार । तैछे जगतेर कर्ता–पुरुषावतार ॥
६३॥
जिस प्रकार मिट्टी के पात्र का मूल कारण कुम्हार है, उसी तरह तिक जगत् के स्रष्टा प्रथम पुरुषावतार (कारणार्णवशायी विष्णु) हैं।
कृष्ण-—कर्ता, माया ताँर करेन सहाय ।घटेर कारण—चक्र-दण्डादि उपाय ॥
६४॥
भगवान् कृष्ण स्रष्टा हैं और माया उपकरण के रूप में उनकी सहायता के लिए है, ठीक वैसे ही जैसे कुम्हार का चाक तथा अन्य उपकरण पात्र के साधन-रूप कारण होते हैं।
दूर हैते पुरुष करे मायाते अवधान ।जीव-रूप वीर्य ताते करेन आधान ॥
६५ ॥
प्रथम पुरुष दूर से माया पर दृष्टिपात करते हैं और इस प्रकार वे जीव रूपी वीर्य से गर्भाधान कराते हैं।
एक अङ्गाभासे करे मायाते मिलन ।। माया हैते जन्मे तबे ब्रह्माण्डेर गण ॥
६६॥
उसके शरीर की प्रतिफलित किरणें माया से मिलती हैं, जिसके फलस्वरूप माया अनेक ब्रह्माण्डों को जन्म देती है।
अगण्य, अनन्त व्रत अण्ड-सन्निवेश । तत-रूपे पुरुष करे सबाते प्रकाश ॥
६७ ॥
पुरुष असंख्य ब्रह्माण्डों में से प्रत्येक में प्रवेश करते हैं। वे अपने आपको उतने ही पृथक् रूपों में प्रकट करते हैं, जितने कि ब्रह्माण्ड हैं।
पुरुष-नासाते यबे बाहिराय श्वास ।निश्वास सहिते हय ब्रह्माण्ड-प्रकाश ॥
६८ ॥
जब पुरुष श्वास छोड़ते हैं, तो प्रत्येक उच्छ्वास के साथ ब्रह्माण्ड प्रकट होते हैं।
पुनरपि श्वास ग्रबे प्रवेशे अन्तरे ।श्वास-सह ब्रह्माण्ड पैशे पुरुष-शरीरे ॥
६९॥
तत्पश्चात् जब वे श्वास लेते हैं, तब सारे ब्रह्माण्ड पुनः उसके शरीर में प्रवेश कर जाते हैं।
गवाक्षेर रन्ध्र ग्रेन त्रसरेणु चले ।।पुरुषेर लोम-कूपे ब्रह्माण्डेर जाले ॥
७० ॥
जिस प्रकार धूल के छोटे-छोटे कण खिड़की के छेदों से निकल जाते हैं, उसी तरह ब्रह्माण्डों के समूह पुरुष के रोम-छिद्रों से होकर निकल जाते हैं।
यस्यैक-निश्वसित-कालमथावलम्ब्यजीवन्ति लोम-विलजी जगदण्ड-नाथाः । विष्णुर्महान्स इह ग्रस्य कला-विशेषोगोविन्दमादि-पुरुषं तमहं भजामि ॥
७१॥
ब्रह्मागण तथा भौतिक लोकों के अन्य स्वामी महाविष्णु के रोमछिद्रों से उत्पन्न होते हैं और उनके एक उच्छवास-काल तक जीवित रहते हैं। मैं उन आदि भगवान् गोविन्द की पूजा करता हूँ, महाविष्ण। जिनके पूर्ण अंश के अंश हैं।
क्वाहं तमो-महदहं-ख-चराग्नि-वार्मूसंवेष्टिताण्ड-घट-सप्त-वितस्ति-कायः । क्वेद्दग्विधाविगणिताण्ड-पराणु-चर्यावाताध्व-रोम-विवरस्य च ते महित्वम् ॥
७२॥
मैं अपने हाथ के सात बित्ताओं के माप वाला क्षुद्र प्राणी कहाँ हूँ? में भौतिक प्रकृति, समग्र भौतिक शक्ति, मिथ्या अहंकार, आकाश, वायु, जल तथा पृथ्वी से निर्मित इस ब्रह्माण्ड से घिरा हुआ हूँ। और आपकी महिमा क्या है? आपके शरीर के रोमकूपों से असंख्य ब्रह्माण्ड उसी तरह निकल रहे हैं, जिस प्रकार खिड़की के छेद से धूल के कण निकलते हैं।
अंशेर अंश ग्रेइ, 'कला' तार नाम । गोविन्देर प्रतिमूर्ति श्री-बलराम ॥
७३॥
सम्पूर्ण के अंश का अंश 'कला' कहलाता है। श्री बलराम तो भगवान् गोविन्द के प्रतिरूप हैं।
ताँर एक स्वरूप—श्री-महा-सङ्कर्षण । ताँर अंश 'पुरुष' हय कलाते गणन ॥
७४॥
बलराम के निजी विस्तार महासंकर्षण कहलाते हैं और उनके अंश 'पुरुष' कला ( अर्थात् पूर्ण अंश के अंश) कहलाते हैं।
याँहाके त' कला कहि, तिंहो महा-विष्णु । महा-पुरुषावतारी तेंहो सर्व-जिष्णु ॥
७५ ॥
मैं कहता हूँ कि यह कला महाविष्णु हैं। वे महापुरुष हैं, जो अन्य पुरुषों के स्रोत हैं और जो सर्वव्यापी हैं।
गर्भोद-क्षीरोद-शायी दोंहे 'पुरुष' नाम ।।सेइ दुइ, याँर अंश, विष्णु, विश्व-धाम ॥
७६॥
गर्भोदकशायी तथा क्षीरोदकशायी दोनों पुरुष कहलाते हैं। वे प्रथम पुरुष और समस्त ब्रह्माण्डों के धाम कारणोदकशायी विष्णु के पूर्ण अंश हैं।
विष्णोस्तु त्रीणि रूपाणि पुरुषाख्यान्यथो विदुः ।। एकं तु महतः स्रष्ट द्वितीयं त्वण्ड-संस्थितम् ।। तृतीयं सर्व-भूत-स्थं तानि ज्ञात्वा विमुच्यते ॥
७७ ॥
विष्णु के तीन रूप हैं, जो पुरुष कहलाते हैं। पहला रूप महाविष्णु है, जो सम्पूर्ण भौतिक शक्ति ( महत्) के स्रष्टा हैं, दूसरा रूप । गर्भोदकशायी है, जो प्रत्येक ब्रह्माण्ड में स्थित रहते हैं और तीसरा रूप क्षीरोदकशायी है, जो हर जीव के हृदय में निवास करते हैं। जो व्यक्ति इन। तीनों को जानता है, वह माया के चंगुल से मुक्त हो जाता है।
यद्यपि कहिये ताँरे कृष्णेर 'कला' करि । मत्स्य-कूर्माद्यवतारेर तिंहो अवतारी ॥
७८॥
यद्यपि कारणोदकशायी विष्णु को भगवान् कृष्ण की 'कला' कहा जाता है, किन्तु वे मत्स्य, कूर्म तथा अन्य अवतारों के उद्गम हैं।
एते चांश-कलाः पुंसः कृष्णस्तु भगवान्स्वयम् ।। इन्द्रारि-व्याकुलं लोकं मृड़यन्ति मुगे युगे ॥
७९॥
भगवान् के ये सारे अवतार या तो पुरुषावतारों के पूर्ण अंश हैं या पूर्णाशों अंश हैं। किन्तु कृष्ण तो स्वयं पूर्ण पुरुषोत्तम भगवान् हैं। जब संसार इन्द्र के शत्रुओं से व्याकुल हो जाता है, तब वे प्रत्येक युग में अपने विभिन्न स्वरूपों के द्वारा संसार की रक्षा करते हैं।
सेइ पुरुष सृष्टि-स्थिति-प्रलयेर कर्ता । नाना अवतार करे, जगतेर भर्ता ॥
८०॥
वे पुरुष ( कारणोदकशायी विष्णु) सृजन, पालन और संहार करने वाले हैं। वे नाना अवतारों में अपने आपको प्रकट करते हैं, क्योंकि वे जगत् के पालनहार हैं।
सृष्ट्यादि-निमित्ते येइ अंशेर अवधान ।सेइ त' अंशेरे कहि 'अवतार' नाम ॥
८१॥
सृजन, पालन तथा संहार के निमित्त प्रकट होने वाले भगवान् के अंश, जो महापुरुष के नाम से जाने जाते हैं, अवतार कहलाते हैं।
आद्यावतार, महा-पुरुष, भगवान् । सर्व-अवतार-बीज, सर्वाश्रय-धाम ॥
८२।। वे महापुरुष भगवान् से अभिन्न हैं। वे मूल अवतार, अन्य सबके बीज तथा हर वस्तु के आश्रय हैं।
आद्योऽवतारः पुरुषः परस्यकालः स्वभावः सदसन्मनश्च । द्रव्यं विकारो गुण इन्द्रियाणिविराट्स्वराट्स्थास्नु चरिष्णु भूम्नः ॥
८३॥
पुरुष ( महाविष्णु) पूर्ण पुरुषोत्तम भगवान् के प्रमुख अवतार हैं। फाल, स्वभाव, प्रकृति ( कार्य-कारण के रूप में), मन, भौतिक तत्त्व, मिथ्या अहंकार, प्रकृति के गुण, इन्द्रियाँ, विराट् रूप, पूर्ण स्वतन्त्रता तथा चर और अचर प्राणी अन्ततः उनके ऐश्वर्य रूप में प्रकट होते हैं।
जगृहे पौरुषं रूपं भगवान्महदादिभिः ।।सम्भूतं षोड़श-कलमादौ लोक-सिसृक्षया ॥
८४॥
सृष्टि के प्रारम्भ में भगवान् ने भौतिक सृष्टि के समस्त अवयवों (उपादानों ) के साथ पुरुष अवतार के रूप में अपना विस्तार किया। सर्वप्रथम उन्होंने सृष्टि के लिए उपयुक्त सोलह प्रधान शक्तियों का सृजन किया। ऐसा उन्होंने भौतिक ब्रह्माण्डों को प्रकट करने के उद्देश्य से किया।
यद्यपि सर्वाश्रय तिंहो, ताँहाते संसार । अन्तरात्मा-रूपे तिंहो जगताधार ॥
८५॥
यद्यपि भगवान् हर वस्तु के आश्रय हैं और सारे ब्रह्माण्ड उन्हीं पर आश्रित हैं, किन्तु वे परमात्मा रूप में प्रत्येक वस्तु के आधार भी हैं।
प्रकृति-सहिते ताँर उभय सम्बन्ध । तथापि प्रकृति-सह नाहि स्पर्श-गन्ध ॥
८६॥
इस तरह यद्यपि वे भौतिक शक्ति से दो प्रकार से जुड़े हुए हैं, तो भी उसके साथ उनका रंचमात्र भी सम्बन्ध नहीं है।
एतदीशनमीशस्य प्रकृति-स्थोऽपि तद्गुणैः ।।न ग्रुज्यते सदात्म-स्थैर्यथा बुद्धिस्तदाश्रया ॥
८७॥
यह भगवान् का ऐश्वर्य है कि वे भौतिक प्रकृति के भीतर रहते हुए भी प्रकृति के गुणों से कभी प्रभावित नहीं होते। इसी प्रकार जिन लोगों उनकी शरण ग्रहण की है तथा जिन्होंने अपनी बुद्धि को उनमें स्थिर कर रखा है, वे प्रकृति के गुणों से प्रभावित नहीं होते।
एइ मत गीतातेह पुनः पुनः कय ।। सर्वदा ईश्वर-तत्त्व अचिन्त्य-शक्ति हय ॥
८८॥
इस प्रकार भगवद्गीता भी बारम्बार कहती है कि परम सत्य में सदैव अचिन्त्य शक्ति होती है।
आमि त' जगते वसि, जगतामाते । ना आमि जगते वसि, ना आमा जगते ॥
८९॥
। ( भगवान् कृष्ण ने कहा :) मैं भौतिक जगत् में स्थित हूँ और यह जगत् मुझ पर आश्रित है। तथापि इसके साथ ही मैं न तो भौतिक जगत में स्थित हूँ, न वह सचमुच ही मुझ पर आश्रित है।
अचिन्त्य ऐश्वर्य एइ जानिह आमार ।। एइ त’ गीतार अर्थ कैल परचार ॥
९०॥
हे अर्जुन, तुम इसे मेरा अचिन्त्य ऐश्वर्य समझो। भगवद्गीता में भगवान् कृष्ण ने इसी अर्थ का प्रचार किया है।
सेइ त' पुरुष याँर 'अंश' धरे नाम । चैतन्येर सङ्गे सेइ नित्यानन्द-राम ॥
९१॥
वे महापुरुष (कारणोदकशायी विष्णु) चैतन्य महाप्रभु के प्रिय संगी भगवान् नित्यानन्द बलराम के पूर्ण अंश हैं।
एइ त' नवम श्लोकेर अर्थ-विवरण ।।दशम श्लोकेर अर्थ शुन दिया मन ॥
१२॥
इस तरह मैंने नवें श्लोक की व्याख्या कर दी है और अब मैं दसवें श्लोक की व्याख्या करूंगा। कृपया ध्यानपूर्वक सुनें।
ग्रस्यांशांशः श्रील-गर्भोद-शायी ग्रन्नाभ्यब्जं लोक-सङ्घात-नालम् । लोक-स्रष्टुः सूतिका-धाम धातुस्तं श्री-नित्यानन्द-रामं प्रपद्ये ॥
९३॥
मैं उन श्री नित्यानन्द राम के चरणों में नमस्कार करता हूँ, जिनके पूर्णाश के अंश गर्भोदकशायी विष्णु हैं। इन गर्भोदकशायी विष्णु की नाभि से कमल उत्पन्न होता है, जो ब्रह्माण्ड के शिल्पी ब्रह्मा का जन्मस्थान है। इस कमल की नाल असंख्य लोकों का विश्राम-स्थल है।
सेइ त' पुरुष अनन्त-ब्रह्माण्ड सृजिया । सब अण्डे प्रवेशिला बहु-मूर्ति हा ॥
९४॥
करोड़ों ब्रह्माण्डों की रचना करने के बाद प्रथम पुरुष श्री गर्भोदकशायी के रूप में हर एक ब्रह्माण्ड में भिन्न रूप से प्रविष्ट हो गये।
भितरे प्रवेशि' देखे सब अन्धकार ।। रहिते नाहिक स्थान करिल विचार ॥
९५॥
ब्रह्माण्ड में प्रवेश करने पर उन्होंने केवल अंधकार देखा, जहाँ रहने योग्य कोई स्थान न था। तब वे इस प्रकार विचार करने लगे।
निजाङ्ग-स्वेद-जल करिल सृजन ।।सेइ जले कैल अर्ध-ब्रह्माण्ड भरण ॥
९६॥
तब उन्होंने अपने शरीर के पसीने से जल उत्पन्न किया और उस जल से आधा ब्रह्माण्ड भर दिया।
ब्रह्माण्ड-प्रमाण पञ्चाशत्कोटि-योजन ।।आयाम, विस्तार, दुइ हय एक सम ॥
९७॥
ब्रह्माण्ड की माप पचास करोड़ योजन है। इसकी लम्बाई तथा चौड़ाई एकसमान है।
जले भरि' अर्ध ताँहा कैल निज-वास ।।आर अर्धे कैल चौद्द-भुवन प्रकाश ॥
९८॥
जब आधा ब्रह्माण्ड जल से भर गया, तो उन्होंने उसी में अपना निवासस्थान बनाया और शेष आधे में चौदह भुवन प्रकट किये।
ताँहाइ प्रकट कैल वैकुण्ठ निज-धाम ।शेष-शयन-जले करिल विश्राम ॥
९९ ॥
वहाँ उन्होंने अपने धाम के रूप में वैकुण्ठ को प्रकट किया और भगवान् शेष की शय्या पर वे जल में विश्राम करने लगे।
अनन्त-शय्याते ताँहा करिल शयन ।। सहस्र मस्तक ताँर सहस्र वदन ।। १००॥
सहस्र-चरण-हस्त, सहस्र-नयन ।।सर्व-अवतार-बीज, जगत्कारण ॥
१०१॥
वे वहाँ अनन्त को अपनी शय्या बनाकर लेट गये। भगवान् अनन्त हजारों सिर, हजारों मुख, हजारों नेत्र और हजारों हाथ-पाँव वाले दिव्य सर्प हैं। वे सभी अवतारों के बीज हैं और भौतिक जगत् के कारण हैं।
ताँर नाभि-पद्म हैते उठिल एक पद्म ।।सेइ पद्मे हैल ब्रह्मार जन्म-सद्म ॥
१०२॥
उनकी नाभि से एक कमल-पुष्प उत्पन्न हुआ, जो ब्रह्माजी का जन्मस्थान बन गया।
सेइ पद्म-नाले हैल चौद-भुवन ।। तेहो ब्रह्मा हा सृष्टि करिल सृजन ॥
१०३॥
। उसे कमल की नाल के भीतर चौदह भुवन थे। इस प्रकार भगवान् ने ब्रह्मा के रूप में सारी सृष्टि का सृजन किया।
विष्णु-रूप हा करे जगत्पालने । गुणातीत-विष्णु स्पर्श नाहि माया-गुणे ।। १०४॥
और भगवान् विष्णु के रूप में वे सारे जगत् का पालन करते हैं। समस्त भौतिक गुणों से परे होने के कारण भगवान् विष्णु का भौतिक गुणों से किसी तरह को स्पर्श नहीं होता।
रुद्र-रूप धरि' करे जगत्संहार ।सृष्टि-स्थिति-प्रलय इच्छाय याँहार ॥
१०५ ॥
वे रुद्र का रूप धारण करके सृष्टि का संहार करते हैं। इस तरह सृजन, पालन तथा संहार उनकी इच्छा से होता है।
हिरण्य-गर्भ, अन्तर्यामी, जगत्कारण ।सॉर अंश करि' करे विराट-कल्पन ॥
१०६॥
वे परमात्मा, हिरण्यगर्भ अर्थात् भौतिक जगत् के कारण हैं। विराट् रूप उनका अंश माना जाता है।
हेन नारायण,—याँर अंशेर अंश ।सेइ प्रभु नित्यानन्द सर्व-अवतंस ॥
१०७॥
वे भगवान् नारायण, भगवान् नित्यानन्द बलराम के पूर्णाश के अंश मात्र हैं। भगवान् नित्यानन्द समस्त अवतारों के स्रोत हैं।
दशम श्लोकेर अर्थ कैल विवरण ।।एकादश श्लोकेर अर्थ शुन दिया मन ॥
१०८ ॥
इस तरह मैंने दसवें श्लोक का अर्थ बतला दिया है। अब कृपया पूरे । मनोयोग से ग्यारहवें श्लोक का अर्थ सुनें।
ग्रस्यांशांशांशः परात्माखिलानांपोष्टा विष्णुर्भाति दुग्धाब्धि-शायी । क्षौणी-भर्ता ग्रत्कला सोऽप्यनन्तस्।। तं श्री-नित्यानन्द-रामं प्रपद्ये ॥
१०९॥
मैं उन श्री नित्यानन्द राम के चरणकमलों में सादर नमस्कार करता हूँ, जिनके गौण अंश क्षीरोदकशायी विष्णु हैं। वे क्षीरोदकशायी विष्णु ही समस्त जीवों के परमात्मा और समस्त ब्रह्माण्डों के पालक हैं। शेषनाग उनके अंशांश हैं।
नारायणेर नाभि-नाल-मध्येते धरणी ।धरणीर मध्ये सप्त समुद्र ग्रे गणि ॥
११०॥
सारे भौतिक लोक उस कमलनाल के भीतर स्थित हैं, जो भगवान् नारायण की नाभि कमल से निकला है। इन लोकों के मध्य सात समुद्र है।
ताँहा क्षीरोदधि-मध्ये 'श्वेतद्वीप' नाम । पालयिता विष्णु, ताँर सेइ निज धाम ॥
१११॥
वहाँ क्षीर सागर के मध्य में श्वेतद्वीप है, जो पालनकर्ता विष्णु का धाम है।
सकल जीवेर तिंहो हये अन्तर्यामी ।। जगत्पालक तिंहो जगतेर स्वामी ॥
११२॥
वे सारे जीवों के परमात्मा हैं। वे इस भौतिक जगत् का पालन करते हैं और वे इसके स्वामी हैं।
युग-मन्वन्तरे धरि' नाना अवतार ।धर्म संस्थापन करे, अधर्म संहार ॥
११३॥
वास्तविक धर्म के सिद्धान्तों को स्थापित करने और अधर्म के सिद्धान्तों का विनाश करने के लिए भगवान् विभिन्न युगों और मन्वन्तरों में विविध अवतारों में प्रकट होते हैं।
देव-गणे ना पाय ग्राँहार दरशन । क्षीरोदक-तीरे ग्राइ' करेन स्तवन ।।११४॥
उनका दर्शन न पाकर देवतागण क्षीर सागर के तट पर जाते हैं और उनकी स्तुति करते हैं।
तबे अवतरि' करे जगत्पालन ।।अनन्त वैभव ताँर नाहिक गणन ॥
११५॥
तब वे भौतिक संसार का पालन करने के लिए अवतरित होते हैं। उनके अनन्त ऐश्वर्य की गणना नहीं की जा सकती।
सेइ विष्णु हय याँर अंशांशेर अंश ।सेइ प्रभु नित्यानन्द सर्व-अवतंस ॥
११६॥
ये भगवान् विष्णु नित्यानन्द प्रभु के पूर्णाश के अंश के भी अंश हैं, योंकि भगवान् नित्यानन्द समस्त अवतारों के उद्गम हैं।
सेइ विष्णु ‘शेष'-रूपे धरेन धरणी ।। काँहा आछे मही, शिरे, हेन नाहि जानि ॥
११७॥
वही भगवान् विष्णु भगवान् शेष के रूप में सारे लोकों को अपने शिरों पर धारण करते हैं, यद्यपि वे यह नहीं जानते कि वे कहाँ हैं, क्योंकि अपने सिरों पर उन्हें उनके अस्तित्व का आभास नहीं हो पाता।।
सहस्र विस्तीर्ण झाँर फणार मण्डल । सूर्य जिनि' मणि-गण करे झल-मल ॥
११८॥
उनके हजारों फैले हुए फन सूर्य को भी मात देने वाली चमचमाती मणियों से सज्जित रहते हैं।
पञ्चाशत्कोटि-योजन पृथिवी-विस्तार ।याँर एक-फणे रहे सर्षप-आकार ॥
११९॥
यह ब्रह्माण्ड जिसका व्यास पचास करोड़ योजन है, उनके एक फन पर इस तरह टिका है, मानो सरसों का बीज हो।
सेइ त' 'अनन्त' ‘शेष'–भक्त-अवतार । ईश्वरेर सेवा विना नाहि जाने आर ॥
१२०॥
वे अनन्त शेष ईश्वर के भक्त अवतार हैं। वे भगवान् कृष्ण की सेवा के अतिरिक्त कुछ भी नहीं जानते।
सहस्र-वदने करे कृष्ण-गुण गान ।निरवधि गुण गा'न, अन्त नाहि पा'न ॥
१२१॥
अपने एक हजारों मुखों से वे भगवान् कृष्ण का महिमा-गान करते हैं, किन्तु इस प्रकार सदैव गुणगान करते रहने पर भी वे भगवान् के गुणों का कभी पार नहीं पाते।
सनकादि भागवत शुने ग्राँर मुखे ।। भगवानेर गुण कहे, भासे प्रेम-सुखे ॥
१२२॥
चारों कुमार उनके मुख से श्रीमद्भागवत सुनते हैं और भगवत्प्रेम के दिव्य आनन्द में मग्न होकर उसे दुहरात चलत है।
छत्र, पादुका, शय्या, उपाधान, वसन । आराम, आवास, यज्ञ-सूत्र, सिंहासन ॥
१२३ ॥
वे निम्नलिखित सभी रूपों को धारण करके भगवान् कृष्ण की सेवा करते हैं-छाता, पादुका, शय्या, तकिया, वस्त्र, आरामकुर्सी, निवासस्थान, यज्ञोपवीत तथा सिंहासन।
एत मूर्ति-भेद करि' कृष्ण-सेवा करे ।कृष्णेर शेषता पाजा ‘शेष' नाम धरे ॥
१२४॥
उन्होंने कृष्ण की दासता की चरम सीमा प्राप्त कर ली है, अतएव वे भगवान् शेष कहलाते हैं। वे कृष्ण की सेवा के लिए नाना रूप धारण करते हैं और इस तरह उनकी सेवा करते हैं।
सेइ त' अनन्त, याँर कहि एक कला ।हेन प्रभु नित्यानन्द, के जाने ताँर खेला ॥
१२५ ।। भगवान् अनन्त जिस पुरुष की कला हैं अर्थात् पूर्णाश के अंश हैं, वे नित्यानन्द प्रभु हैं। अतएव नित्यानन्द प्रभु की लीलाओं को भला कौन जान सकता है? ए-सब प्रमाणे जानि नित्यानन्द-तत्त्व-सीमा ।।ताँहाके 'अनन्त' कहि, कि ताँर महिमा ॥
१२६॥
इन सब प्रमाणों से हम नित्यानन्द प्रभु के तत्त्व की सीमा को जान सकते हैं। किन्तु उन्हें अनन्त कहने में कौन-सी महिमा है? अथवा भक्तेर वाक्य मानि सत्य करि' ।सकल सम्भवे ताँते, स्नाते अवतारी ॥
१२७॥
। किन्तु मैं इसे सत्य स्वीकार करता हूँ, क्योंकि यह भक्तों का वचन है। वे (नित्यानन्द प्रभु) समस्त अवतारों के उद्गम हैं, अतएव उनके लिए सब कुछ सम्भव है।
अवतार-अवतारी-अभेद, ये जाने ।पूर्वे ट्रैछे कृष्णके केहो काहो करि' माने ॥
१२८॥
वे जानते हैं कि अवतार तथा समस्त अवतारों के उद्गम में कोई भेद नहीं होता। पहले भगवान् कृष्ण विभिन्न लोगों द्वारा विभिन्न सिद्धांतों के सन्दर्भ में समझे जाते थे।
केहो कहे, कृष्ण साक्षात्नर-नारायण ।। केहो कहे, कृष्ण हय साक्षात्वामन ॥
१२९॥
कुछ लोग कहते थे कि कृष्ण साक्षात् भगवान् नर-नारायण थे और कुछ उन्हें वामनदेव का अवतार कहते थे।
केहो कहे, कृष्ण क्षीरोद-शायी अवतार ।असम्भव नहे, सत्य वचन सबार ॥
१३०॥
कुछ लोग भगवान् कृष्ण को भगवान् क्षीरोदकशायी का अवतार कहते थे। ये सारे नाम सत्य हैं; कुछ भी असम्भव नहीं है।
कृष्ण ग्रबे अवतरे सर्वांश-आश्रय ।सर्वांश आसि' तबे कृष्णेते मिलय ॥
१३१॥
जब पूर्ण पुरुषोत्तम भगवान् कृष्ण अवतरित होते हैं, तब वे समस्त पूर्ण अंशों के आश्रय होते हैं। इस तरह उस समय उनके सारे पूर्ण अंश उनके साथ मिल जाते हैं।
ग्रेइ ग्रेइ रूपे जाने, सेइ ताहा कहे ।।सकल सम्भवे कृष्णे, किछु मिथ्या नहे ॥
१३२॥
जो जिस रूप में भगवान् को जानता है, वह उसी रूप में उनका वर्णन करता है। इसमें कुछ गलत नहीं है, क्योंकि कृष्ण के लिए सब कुछ सम्भव है।
अतएव श्री-कृष्णा-चैतन्य गोसाजि ।। सर्व अवतार-लीला करि' सबारे देखाई ॥
१३३॥
इसलिए भगवान् श्री चैतन्य महाप्रभु ने सबके सामने सभी विभिन्न तारों की सभी लीलाएँ प्रदर्शित की हैं।
एइ-रूपे नित्यानन्द 'अनन्त'-प्रकाश ।। सेइ-भावे कहे मुजि चैतन्येर दास ॥
१३४॥
इस तरह भगवान् नित्यानन्द के अनन्त अवतार हैं। दिव्य भाव में वे । अपने आपको चैतन्य महाप्रभु का दास कहते हैं।
कभु गुरु, कभु सखा, कभु भृत्य-लीला ।।पूर्वे ग्रेन तिन-भावे व्रजे कैल खेला ॥
१३५॥
वे भगवान् श्री चैतन्य महाप्रभु की सेवा कभी उनके गुरु के रूप में तो कभी मित्र के रूप में और कभी दास के रूप में करते हैं, जिस प्रकार भगवान् बलराम ने व्रज में इन तीन विभिन्न भावों में भगवान् कृष्ण के साथ क्रीड़ाएँ कीं।
वृष हा कृष्ण-सने माथा-माथि रण । कभु कृष्ण करे ताँर पाद-संवाहन ॥
१३६ ॥
भगवान् बलराम कृष्ण के सिर से अपना सिर भिड़ाकर वृष की तरह लड़ते हैं। और कभी-कभी भगवान् कृष्ण बलरामजी के चरण दबाते हैं।
आपनाके भृत्य करि' कृष्णे प्रभु जाने ।कृष्णेर कलार कला आपनाके माने ॥
१३७॥
वे अपने आपको दास मानते हैं और कृष्ण को अपना स्वामी मानते हैं। इस प्रकार वे अपने आपको कृष्ण के अंश का भी अंश मानते हैं।
वृषायमाणौ नर्दन्तौ ग्रुयुधाते परस्परम् ।अनुकृत्य रुतैर्जन्तूंश्चेरतुः प्राकृतौ ग्रथा ॥
१३८॥
। सामान्य बालकों की तरह एक-दूसरे से लड़ते समय वे वृषों की तरह गर्जन कर रहे थे और तरह-तरह के पशुओं की आवाजे निकालते थे।
क्वचित्क्रीड़ा-परिश्रान्तं गोपोत्सङ्गोपबर्हणम् ।।स्वयं विश्रामयत्यानँ पाद-संवाहनादिभिः ॥
१३९॥
कभी-कभी जब कृष्ण के ज्येष्ठ भ्राता भगवान् बलराम खेलने के बाद थक जाते और अपना सिर किसी ग्वालबाल की गोद में रख देते, तो स्वयं भगवान् कृष्ण उनके पाँव दबाकर उनकी सेवा करते।
केयं वा कुत आयाता दैवी वा नातासुरी ।प्रायो मायास्तु मे भर्तुर्नान्या मेऽपि विमोहिनी ॥
१४० ॥
। । यह योगशक्ति कौन है और यह कहाँ से आई है? वह दैवी है या आसुरी ? यह मेरे प्रभु भगवान् कृष्ण की मायाशक्ति होगी, क्योंकि उसके अतिरिक्त मुझे और कौन मोहित कर सकता है? यस्याङ्घि-पङ्कज-रजोऽखिल-लोक-पालैर्मौलि-उत्तमैधृतम्उपासित तीर्थ-तीर्थम् । ब्रह्मा भवोऽहमपि ग्रस्य कलाः कलायाःश्रीशोद्वहेम चिरमस्य नृपासनं क्व ॥
१४१॥
भगवान् कृष्ण के लिए सिंहासन का क्या महत्त्व है? विभिन्न लोकों के स्वामी उनके चरणकमलों की धूल को अपने मुकुटधारी शिरों पर धारण करते हैं। यह धूल तीर्थस्थलों को पवित्र बनाती है। यहाँ तक कि ब्रह्माजी, शिवजी, लक्ष्मी और मैं, जो कि उनके पूर्णाश के अंश हैं, अपने अपने सिरों पर उस धूल को सदैव धारण करते हैं।
एकले ईश्वर कृष्ण, आर सब भृत्य । ग्रारे ग्रैछे नाचाय, से तैछे करे नृत्य ॥
१४२॥
एकमात्र भगवान् कृष्ण ही परम नियन्ता हैं और अन्य सभी उनके। सेवक हैं। वे जैसा चाहते हैं, वैसे उन्हें नचाते हैं।
एइ मत चैतन्य-गोसाञि एकले ईश्वर ।आर सब पारिषद, केह वा किङ्कर ॥
१४३॥
इसी प्रकार भगवान् श्री चैतन्य महाप्रभु ही एकमात्र नियन्ता हैं। अन्य सभी उनके पार्षद या सेवक हैं।
गुरु-वर्ग,—नित्यानन्द, अद्वैत आचार्य । श्रीवासादि, आर व्रत लघु, सम, आर्य ॥
१४४॥
सबे पारिषद, सबे लीलार सहाय ।। सबा ला निज-कार्य साधे गौर-राय ॥
१४५॥
उनके गुरुजन यथा भगवान् नित्यानन्द, अद्वैत आचार्य तथा श्रीवास ठाकुर एवं उनके अन्य भक्त-चाहे वे छोटे हों, समवयस्क हों या वरिष्ठ हों-सभी उनके पार्षद हैं, जो उनकी लीलाओं में सहायक होते हैं। गौरांग महाप्रभु उनकी सहायता से अपने लक्ष्यों की पूर्ति करते हैं।
अद्वैत आचार्य, नित्यानन्द, दुइ अङ्ग । दुइ-जन लञा प्रभुर व्रत किछु रङ्ग ॥
१४६॥
श्री अद्वैत आचार्य तथा श्रील नित्यानन्द प्रभु, जो भगवान् के पूर्ण अंश हैं, उनके प्रधान पार्षद हैं। इन दोनों के साथ महाप्रभु विभिन्न प्रकार से अपनी लीलाएँ करते हैं।
अद्वैत-आचार्य-गोसाञि साक्षातीश्वर ।प्रभु गुरु करि' माने, तिंहो त' किङ्कर ॥
१४७॥
अद्वैत आचार्य साक्षात् भगवान् हैं। यद्यपि श्री चैतन्य महाप्रभु उन्हें अपने गुरु के रूप में स्वीकार करते हैं, किन्तु अद्वैत आचार्य भगवान् के दास हैं।
आचार्य-गोसाजिर तत्त्व ना ग्राय कथन ।।कृष्ण अवतार में हो तारिल भुवन ॥
१४८॥
मैं अद्वैत आचार्य के तत्त्व का वर्णन नहीं कर सकता। उन्होंने कृष्ण का अवतरण कराकर सारे विश्व का उद्धार किया है।
नित्यानन्द-स्वरूप पूर्वे हइया लक्ष्मण ।लघु-भ्राता हैया करे रामेर सेवन ॥
१४९॥
। भगवान् नित्यानन्द स्वरूप पूर्वजन्म में लक्ष्मण के रूप में प्रकट हुए थे और उन्होंने भगवान् रामचन्द्र की सेवा उनके छोटे भाई के रूप में की थी।
रामेर चरित्र सबे, दुःखेर कारण । स्वतन्त्र लीलाय दुःख सहेन लक्ष्मण ॥
१५० ॥
भगवान् राम के कार्यकलाप दुःखों से भरे थे, किन्तु लक्ष्मण ने स्वेच्छा से उस दुःख को सहन किया।
निषेध करिते नारे, झाते छोट भाइ ।मौन धरि' रहे लक्ष्मण मने दुःख पाइ' ॥
१५१॥
छोटे भाई के रूप में वे भगवान् राम को उनके संकल्प से रोक नहीं। सके, अतएव वे मौन रहे, भले ही मन ही मन वे दुःखी थे।
कृष्ण-अवतारे ज्येष्ठ हैला सेवार कारण ।।कृष्णके कराइल नाना सुख आस्वादन ॥
१५२॥
जब भगवान् कृष्ण प्रकट हुए, तो वे ( बलराम) उनकी मन भर के सेवा करने एवं सभी प्रकार के सुखों का भोग कराने के लिए उनके बड़े भाई बने।"
राम-लक्ष्मण-कृष्ण-रामेर अंश-विशेष ।अवतार-काले दोहे दोंहाते प्रवेश ॥
१५३ ॥
। श्री राम तथा श्री लक्ष्मण, जो क्रमशः भगवान् कृष्ण तथा बलराम के पूर्ण अंश हैं, कृष्ण तथा बलराम के आविर्भाव के समय उनमें प्रविष्ट हो गये।
सेइ अंश लञा ज्येष्ठ-कनिष्ठाभिमान ।।अंशांशि-रूपे शास्त्रे करये व्याख्यान ॥
१५४॥
| कृष्ण तथा बलराम छोटे और बड़े भाई के रूप में प्रकट होते हैं, किन्तु शास्त्रों में उन्हें आदि भगवान् तथा उनके अंश बतलाया गया है।
रामादि-मूर्तिषु कला-नियमेन तिष्ठन्नानावतारमकरोद्भुवनेषु किन्तु । कृष्णः स्वयं समभवत्परमः पुमान् ग्रोगोविन्दमादि-पुरुषं तमहं भजामि ॥
१५५॥
मैं उन आदि भगवान् गोविन्द की पूजा करता हूँ, जो अपने विविध पूर्ण अंशों से विविध रूपों तथा भगवान् राम आदि अवतारों के रूप में प्रकट होते हैं, किन्तु जो भगवान् कृष्ण के अपने परम मूल रूप में स्वयं प्रकट होते हैं।
श्री-चैतन्य—सेइ कृष्ण, नित्यानन्द–राम । नित्यानन्द पूर्ण करे चैतन्येर काम ॥
१५६॥
भगवान् चैतन्य ही भगवान् कृष्ण हैं और श्री नित्यानन्द भगवान् बलराम हैं। भगवान् नित्यानन्द श्री चैतन्य महाप्रभु की सारी इच्छाओं को पूर्ण करते हैं।
नित्यानन्द-महिमा-सिन्धु अनन्त, अपार ।एक कणा स्पर्श मात्र,—से कृपा ताँहार ॥
१५७॥
भगवान् नित्यानन्द की महिमाओं का सागर अनन्त और अगाध है। केवल उनकी कृपा से ही मैं इसकी एक बूंद का स्पर्श कर सकता हूँ।
आर एक शुन ताँर कृपार महिमा ।अधम जीवेरे चढ़ाइल ऊर्ध्व-सीमा ॥
१५८॥
कृपया उनकी कृपा की दूसरी महिमा सुनें। उन्होंने एक पतित जीव को सर्वोच्च सीमा तक ऊपर उठाया है।
वेद-गुह्य कथा एई अयोग्य कहिते ।। तथापि कहिये ताँर कृपा प्रकाशिते ॥
१५९॥
इसे प्रकट करना उचित नहीं होगा, क्योंकि इसे वेदों के समान ही गुप्त रखना चाहिए; फिर भी मैं इसे कह रहा हूँ, जिससे उनकी कृपा सबको ज्ञात हो जाये।
उल्लास-उपरि लेखों तोमार प्रसाद । नित्यानन्द प्रभु, मोर क्षम अपराध ॥
१६० ॥
हे नित्यानन्द प्रभु! मैं अत्यन्त उल्लास के साथ आपकी कृपा के बारे में लिख रहा हूँ। कृपया मेरे इस अपराध के लिए आप मुझे क्षमा कर दें।
अवधूत गोसाजिर एक भृत्य प्रेम-धाम ।। मीनकेतन रामदास हय ताँर नाम ॥
१६१॥
नित्यानन्द प्रभु के एक सेवक थे, जिनका नाम श्री मीनकेतन रामदास 7, जो प्रेम के आगार थे।
आमार आलये अहो-रात्र-सङ्कीर्तन ।ताहाते आइला तेंहो पा निमन्त्रण ॥
१६२॥
मेरे घर में अखण्ड संकीर्तन था, अतएव आमन्त्रित किये जाने पर वे L पर आये।
महा-प्रेम-मय तिंहो वसिला अङ्गने ।सकल वैष्णव ताँर वन्दिला चरणे ॥
१६३॥
भावजन्य प्रेम में निमग्न होकर वे मेरे आँगन में बैठ गये और सारे वैष्णव उनके चरणों में सिर झुकाकर प्रणाम करने लगे।
नमस्कार करिते, कार उपरेते चड़े । प्रेमे का रे वंशी मारे, काहाके चापड़े ॥
१६४॥
भगवत्प्रेम के आनन्द में वे कभी नमस्कार करने वाले के कंधे पर चढ़ जाते, कभी अन्यों को अपनी बाँसुरी से मारते या उन्हें मुख पर धीरे से चपत लगा देते।
ये नयन देखिते अश्रु हय मने ग्रार।सेइ नेत्रे अविच्छिन्न वहे अश्रु-धार ॥
१६५॥
जब कोई मीनकेतन रामदास की आँखें देखता, तो उसके नेत्रों से भी स्वतः अश्रु बहने लगते, क्योंकि मीनकेतन रामदास के नेत्रों से अश्रु की धारा निरन्तर बहती रहती थी।
कभु कोन अङ्गे देखि पुलक-कदम्ब ।।एक अङ्गे जाडूय ताँर, आर अङ्गे कम्प ॥
१६६॥
। कभी उनके शरीर के कुछ भागों में कदम्ब फूलों के समान आनन्द का उभार दृष्टिगत होता और कभी शरीर का एक अंग जड़ हो जाता, कि दूसरा अंग काँपने लगता था।
नित्यानन्द बलि' ग्रबे करेन हुङ्कार ।।ताहा देखि' लोकेर हय महा-चमत्कार ॥
१६७।। जब भी वे नित्यानन्द का नाम लेकर जोर से चीत्कार करते, तो उनके आसपास के लोग अत्यधिक विस्मित हो जाते थे।"
गुणार्णव मिश्र नामे एक विप्र आर्य ।श्री-मूर्ति-निकटे तेंहो करे सेवा-कार्य ॥
१६८ ॥
श्री गुणार्णव मिश्र नामक एक सम्माननीय ब्राह्मण अर्चाविग्रह की सेवा करता था।
अङ्गने आसिया तेंहो ना कैल सम्भाष । ताहा देखि' क्रुद्ध हा बले रामदास ॥
१६९॥
जब मीनकेतन आँगन में बैठे थे, तो इस ब्राह्मण ने उनका सम्मान नहीं किया। यह देखकर, श्री रामदास क्रुद्ध हुए और बोले।
‘एइ त' द्वितीय सूत रोमहरषण ।।बलदेव देखि' ग्रे ना कैल प्रत्युद्गम' ॥
१७० ॥
यहाँ मैं दूसरा रोमहर्षण सूत देख रहा हूँ, जो भगवान् बलराम को देखकर सम्मान प्रदर्शित करने के लिए उठ खड़ा नहीं हुआ।
एत बलि' नाचे गाय, करये सन्तोष ।।कृष्ण-कार्य करे विप्र–ना करिल रोष ॥
१७१॥
यह कहकर वे जी-भरकर नाचने-गाने लगे, किन्तु वह ब्राह्मण क्रुद्ध नहीं हुआ, क्योंकि तब वह भगवान् कृष्ण की सेवा में लगा था।
उत्सवान्ते गेला तिंहो करिया प्रसाद ।।मोर भ्राता-सने ताँर किछु हैल वाद ॥
१७२॥
उत्सव समाप्त होने पर मीनकेतन रामदास हर एक को आशीर्वाद देकर चले गये। उस समय मेरे भाई के साथ उनका कुछ विवाद उठ खड़ा हुआ।
चैतन्य-प्रभुते ताँर सुदृढ़ विश्वास ।।नित्यानन्द-प्रति ताँर विश्वास-आभास ॥
१७३॥
मेरे भाई की भगवान् श्री चैतन्य महाप्रभु में अटूट श्रद्धा थी, किन्तु भगवान् नित्यानन्द में थोड़ी सी ही श्रद्धा थी।
इहा जानि' रामदासेर दुःख हइल मने ।तबे त' भ्रातारे आमि करिनु भत्र्सने ॥
१७४॥
यह जानकर रामदास मन ही मन खिन्न हुए। तब मैंने अपने भाई की भर्त्सना की।
दुइ भाइ एक-तनु- समान-प्रकाश ।नित्यानन्द ना मान, तोमार हबे सर्व-नाश ॥
१७५॥
मैंने उससे कहा, ये दोनों भाई एक शरीर जैसे हैं; वे दोनों एकरूप हैं। यदि तुम भगवान् नित्यानन्द में श्रद्धा नहीं रखते, तो तुम्हारा पतन होगा।
एकेते विश्वास, अन्ये ना कर सम्मान ।अर्ध-कुकुटी-न्याय तोमार प्रमाण ॥
१७६ ॥
यदि एक में तुम्हारा विश्वास है, किन्तु दूसरे के प्रति अनादर है, तो तुम्हारा तर्क अर्ध कुक्कुटी न्याय के समान है, जिसमें आधी मुर्गी का तर्क स्वीकार किया जाता है।
किंवा, दोंहा ना मानिन्ना हओ त' पाषण्ड ।एके मानि' आरे ना मानि,—एई-मत भण्ड ॥
१७७॥
एक भाई को मानना और दूसरे का अनादर करना और इस तरह दम्भी बनना, उससे तो यह बेहतर होगा कि दोनो भाईयों को न मानकर नास्तिक बनना। क्रुद्ध हैया वंशी भाङ्गि' चले रामदास ।।तत्काले आमार भ्रातार हैल सर्व-नाश ॥
१७८॥
अतः श्री रामदास ने क्रोध में अपनी वंशी तोड़ डाली और वहाँ से चले गये और उसी समय मेरे भाई का सर्वनाश हो गया।
एइ त कहिल ताँर सेवक-प्रभाव ।।आर एक कहि ताँर दयार स्वभाव ॥
१७९॥
इस तरह मैंने भगवान् नित्यानन्द के सेवकों की शक्ति का वर्णन किया है। अब मैं उनकी कृपा की दूसरी विशेषता का वर्णन करूंगा।
भाइके भर्तिसनु मुञि, ला एइ गुण ।।सेइ रात्रे प्रभु मोरे दिला दरशन ॥
१८०॥
उस रात भगवान् नित्यानन्द ने मुझे स्वप्न में दर्शन दिये, क्योंकि अपने भाई की भर्त्सना करके मैंने अच्छा कार्य किया था।
नैहाटि-निकटे 'झामटपुर' नामे ग्राम ।। ताँहा स्वप्ने देखा दिला नित्यानन्द-राम ॥
१८१।। नैहाटी के निकटवर्ती झामटपुर गाँव में नित्यानन्द प्रभु ने मुझे स्वप्न में दर्शन दिया।
दण्डवत् हैया आमि पड़िनु पायेते ।। निज-पाद-पद्म प्रभु दिला मोर माथे ॥
१८२॥
उन्हें नमस्कार करके मैं उनके चरणों पर गिर पड़ा, तब उन्होंने मेरे सिर पर अपने चरणकमल रख दिये।
‘उठ', 'उठ' बलि' मोरे बले बार बार । उठि' ताँर रूप देखि' हैनु चमत्कार ॥
१८३॥
उन्होंने मुझसे बारम्बार कहा-उठो, उठो! उठने पर मैं उनका सौन्दर्य देखकर अत्यधिक विस्मित हुआ।
श्याम-चिक्कण कान्ति, प्रकाण्ड शरीर । साक्षात्कन्दर्प, ग्रैछे महा-मल्ल-वीर ॥
१८४॥
उनका रंग चिकना श्यामल वर्ण का था। वे अपने लम्बे, बलिष्ठ, वीर-जैसे शारीरिक आकार के कारण साक्षात् कामदेव जैसे लग रहे थे।
सुवलित हस्त, पद, कमल-नयान । पट्ट-वस्त्र शिरे, पट्ट-वस्त्र परिधान ॥
१८५॥
। उनके हाथ, बाँहें तथा पाँव अत्यन्त सुन्दर थे और उनकी आँखें कमल के फूलों जैसी थीं। वे रेशमी वस्त्र पहने थे और उनके सिर पर रेशमी पगड़ी थी।
सुवर्ण-कुण्डल कर्णे, स्वर्णाङ्गद-वाला ।। पायेते नृपुर बाजे, कण्ठे पुष्पमाला ॥
१८६॥
वे कानों में सोने के कुण्डल पहने हुए थे और उनके बाजूबन्द तथा कंगन सोने के थे। वे अपने पाँवों में रुनझुन करती पायल तथा अपने गले में फूलों की माला धारण किये हुए थे।
चन्दन-लेपित-अङ्ग, तिलक सुठाम । मत्त-गज जिनि' मद-मन्थर पयान ॥
१८७॥
उनका शरीर चन्दन से लेपित था और वे तिलक से सुशोभित हो रहे थे। उनकी चाल मदमत्त हाथी को लजाने वाली थी।
कोटि-चन्द्र जिनि' मुख उज्वल-वरण । दाड़िम्ब-बीज-सम दन्त ताम्बूल-चर्वण ॥
१८८॥
उनका मुखमण्डल करोड़ों चन्द्रमाओं से भी अधिक सुन्दर था और पान खाने के कारण उनके दाँत अनार के दानों जैसे लग रहे थे।
प्रेमे मत्त अङ्ग डाहिने-वामे दोले ।। ‘कृष्ण' ‘कृष्ण' बलिया गम्भीर बोल बले ॥
१८९॥
उनका शरीर इधर-उधर, दाएँ-बाएँ हिल रहा था, क्योंकि वे प्रेम में मग्न थे। वे गम्भीर वाणी से कृष्ण, कृष्ण उच्चारण कर रहे थे।
राङ्गा-ग्रष्टि हस्ते दोले ग्रेन मत्त सिंह ।। चारि-पाशे वेड़ि आछे चरणेते भृङ्ग ॥
१९०॥
उनके हाथ में उनकी लाल छड़ी हिल रही थी, जिससे वे मदमत्त सिंह की तरह लग रहे थे। उनके चरणों के चारों ओर भौंरे मँडरा रहे थे।
पारिषद-गणे देखि' सब गोप-वेशे ।'कृष्ण' 'कृष्ण' कहे सबे सप्रेम आवेशे ॥
१९१॥
उनके भक्त ग्वालबालों की तरह वस्त्र धारण किये हुए थे और उनके घरणों को अनेक भौरों की तरह घेरे हुए थे। वे प्रेमावेश में मग्न होकर कृष्ण, कृष्ण उच्चारण कर रहे थे।
शिङ्गा वांशी बाजाय केह, केह नाचे गाय ।।सेवक ग्रोगाये ताम्बूल, चामर ढुलाय ॥
१९२॥
उनमें से कुछ सिंगा तथा वंशी बजा रहे थे और शेष नृत्य-गान कर रहे थे। कुछ पान अर्पित कर रहे थे और कुछ उन्हें चामर डुला रहे थे।
नित्यानन्द-स्वरूपेर देखिया वैभव । किबा रूप, गुण, लीला—अलौकिक सब ॥
१९३॥
इस प्रकार मैंने श्री नित्यानन्द स्वरूप में ऐसा ऐश्वर्य देखा। उनके अद्भुत रूप, गुण और लीलाएँ, सब अलौकिक हैं।
आनन्दे विह्वल आमि, किछु नाहि जानि । तबे हासि' प्रभु मोरे कहिलेन वाणी ॥
१९४॥
मैं दिव्य आनन्द से विभोर था और कुछ भी नहीं जान पा रहा था। तभी प्रभु नित्यानन्द हँसे और मुझसे इस प्रकार बोले।
आरे आरे कृष्णदास, ना करह भय । वृन्दावने ग्राह, ताँहा सर्व लभ्य हय ॥
१९५॥
अरे कृष्णदास! तुम डरो नहीं। वृन्दावन जाओ, क्योंकि वहाँ तुम्हें सब कुछ प्राप्त होगा।
एत बलि' प्रेरिला मोरे हातसानि दिया। अन्तर्धान कैल प्रभु निज-गण लञा ॥
१९६॥
यह कहकर उन्होंने अपना हाथ हिलाकर मुझे वृन्दावन की ओर निर्देशित किया। फिर वे अपने संगियों समेत अन्तर्धान हो गये।
मूच्छित हइया मुञि पड़िनु भूमिते ।स्वप्न भङ्ग हैल, देखि, हाछे प्रभाते ॥
१९७॥
मैं मूर्छित होकर भूमि पर गिर पड़ा, मेरा स्वप्न टूट गया और जब मुझे होश आया, तो मैंने देखा कि प्रात:काल हो चुका था।
कि देखिनु कि शुनिनु, करिये विचार ।।प्रभु-आज्ञा हैल वृन्दावन ग्राइबार ॥
१९८॥
मैंने जो कुछ देखा और सुना था उस पर विचार किया और इस निष्कर्ष पर पहुँचा कि भगवान् ने मुझे तुरन्त ही वृन्दावन जाने का आदेश दिया है।
सेइ क्षणे वृन्दावने करिनु गमन ।।प्रभुर कृपाते सुखे आइनु वृन्दावन ॥
१९९॥
मैं उसी क्षण वृन्दावन के लिए चल पड़ा और उनकी कृपा से मैं बड़ी प्रसन्नतापूर्वक वृन्दावन पहुँच गया।
जय जय नित्यानन्द, नित्यानन्द-राम ।। याँहार कृपाते पाइनु वृन्दावन-धाम ॥
२००॥
भगवान् नित्यानन्द बलराम की जय हो, जिनकी कृपा से मुझे वृन्दावन के दिव्य धाम में शरण प्राप्त हुई।
जय जय नित्यानन्द, जय कृपा-मय ।।ग्राँहा हैते पाइनु रूप-सनातनाश्रय ॥
२०१॥
। कृपालु प्रभु नित्यानन्द की जय हो, जय हो, जिनकी कृपा से मैंने श्री रूप तथा श्री सनातन के चरणकमलों में शरण प्राप्त की! याँहा हैते पाइनु रघुनाथ-महाशय ।।याँहा हैते पाइनु श्री-स्वरूप-आश्रय ॥
२०२॥
उनकी कृपा से मुझे श्री रघुनाथदास गोस्वामी जैसे महापुरुष की शरण प्राप्त हुई है और उन्हीं की कृपा से मैंने श्री स्वरूप दामोदर का आश्रय प्राप्त किया है।
सनातन-कृपाय पाइनु भक्तिर सिद्धान्त ।।श्री-रूप-कृपाय पाइनु भक्ति-रस-प्रान्त ॥
२०३॥
सनातन गोस्वामी की कृपा से मैंने भक्ति के अन्तिम निष्कर्ष प्राप्त किये हैं और श्री रूप गोस्वामी की कृपा से मैंने भक्ति के सर्वोच्च अमृत का आस्वादन किया है।
जय जय नित्यानन्द-चरणारविन्द ।।याँहा हैते पाइनु श्री-राधा-गोविन्द ॥
२०४॥
भगवान् नित्यानन्द प्रभु के चरणारविन्दों की जय हो, क्योंकि मैंने उनकी कृपा से श्री राधा-गोविन्द को प्राप्त किया है।
जगाई माधाइ हैते मुञि से पापिष्ठ ।पुरीषेर कीट हैते मुञि से लघिष्ठ ॥
२०५॥
मैं जगाइ तथा माधाइ से भी अधिक पापी हूँ और मल के कीट से भी तुच्छ हूँ।
मोर नाम शुने ग्रेइ तार पुण्य क्षय ।।मोर नाम लय येइ तार पाप हय । २०६॥
जो भी मेरा नाम सुनता है, उसके पुण्यकर्मों के फल नष्ट हो जाते हैं और जो मेरा नाम लेता है, वह पापी बन जाता है।
एमन निघृण मोरे केबा कृपा करे।एक नित्यानन्द विनु जगत्भितरे ॥
२०७॥
इस जगत् में नित्यानन्द के बिना मुझ जैसे घृणास्पद मनुष्य पर कौन अपनी दया प्रदर्शित कर सकता था? प्रेमे मत्त नित्यानन्द कृपा-अवतार । उत्तम, अधम, किछु ना करे विचार ॥
२०८ ॥
चूँकि वे प्रेमावेश में मत्त रहते हैं और कृपा के अवतार हैं, अतएव वे अच्छे-बुरे में भेदभाव नहीं करते।
ये आगे पड़ये, तारे करये निस्तार।अतएव निस्तारिला मो-हेन दुराचार ॥
२०९॥
जो उनके समक्ष भूमि पर गिरते हैं, वे उनका उद्धार कर देते हैं। अतएव उन्होंने मुझ जैसे पापी तथा पतित व्यक्ति का उद्धार कर दिया है।
मो-पापिष्ठे आनिलेन श्री-वृन्दावन ।मो-हेन अधमे दिला श्री-रूप-चरण ॥
२१०॥
यद्यपि मैं पापी हूँ और अत्यन्त अधम हूँ, फिर भी उन्होंने मुझे श्री रूप गोस्वामी के चरणकमलों का आश्रय प्रदान किया है।
श्री-मदन-गोपाल-श्री-गोविन्द-दरशन ।।कहिबार स्रोग्य नहे ए-सब कथन ॥
२११॥
मैं भगवान् मदनगोपाल तथा भगवान् गोविन्द के दर्शन के विषय में । ये सारे गोपनीय शब्द कहने के योग्य नहीं हूँ।
वृन्दावन-पुरन्दर श्री-मदन-गोपाल ।रास-विलासी साक्षात्व्रजेन्द्रकुमार ॥
२१२॥
वृन्दावन के प्रमुख अर्चाविग्रह भगवान् मदन गोपाल रासनृत्य के भोक्ता हैं और व्रजराज के साक्षात् पुत्र हैं।
श्री-राधा-ललिता-सङ्गे रास-विलास ।मन्मथ-मन्मथ-रूपे याँहार प्रकाश ॥
२१३॥
वे श्रीमती राधारानी, श्री ललिता तथा अन्यों के साथ रासनृत्य का आनन्द लेते हैं। वे कामदेवों के भी कामदेव के रूप में अपने आपको प्रकट करते हैं।
तासामाविरभूच्छौरिः स्मयमान-मुखाम्बुजः ।। पीताम्बर-धरः स्रग्वी साक्षान्मन्मथ-मन्मथः ॥
२१४॥
। पीताम्बर धारण किये तथा फूलों की माला से अलंकृत, गोपियों के मध्य स्मितहास्य से युक्त कमलमुख वाले भगवान् कृष्ण कामदेव के हृदय को भी मोहने वाले लग रहे थे।
स्व-माधुर्ये लोकेर मन करे आकर्षण ।। दुइ पाशे राधा ललिता करेन सेवन ॥
२१५॥
। उनके दोनों ओर राधा तथा ललिता सेवा करती हैं। इस तरह वे अपनी माधुरी से सबके हृदयों को आकृष्ट करते हैं।
नित्यानन्द-दया मोरे ताँरै देखाइले ।।श्री-राधा-मदन-मोहने प्रभु करि' दिल ॥
२१६॥
प्रभु नित्यानन्द की कृपा ने मुझे श्री मदनमोहन का दर्शन कराया और श्री मदनमोहन को मेरे प्रभु तथा स्वामी के रूप में मुझे प्रदान किया।
मो-अधमे दिल श्री-गोविन्द दरशन ।कहिबार कथा नहे अकथ्य-कथन ॥
२१७॥
उन्होंने मुझ जैसे अधम को भगवान् गोविन्द का दर्शन कराया। न तो शब्द इसका वर्णन कर सकते हैं, न ही इसे प्रकट करना उपयुक्त होगा।
वृन्दावने स्रोग-पीठे कल्प-तरु-वने । रत्न-मण्डप, ताहे रत्न-सिंहासने ॥
२१८॥
श्री गोविन्द वसियाछेन व्रजेन्द्र-नन्दन ।।माधुर्य प्रकाशि' करेन जगत्मोहन ॥
२१९॥
कल्पतरुओं के वन के मध्य वृन्दावन के प्रमुख मन्दिर में रत्नों से बनी वेदी पर व्रजराज के पुत्र भगवान् गोविन्द रत्नों के सिंहासन पर बैठे हुए हैं और अपनी पूर्ण महिमा तथा माधुरी को प्रकाशित करते हुए सम्पूर्ण जगत् को मोहित कर रहे हैं।
वाम-पार्थे श्री-राधिका सखी-गण-सङ्गे ।रासादिक-लीला प्रभु करे कत रङ्गे ॥
२२०॥
उनकी बाँई ओर श्रीमती राधारानी तथा उनकी निजी सखियाँ हैं। भगवान् गोविन्द उनके साथ रासलीला तथा अन्य अनेक लीलाओं का आनन्द लेते हैं।
याँर ध्यान निज-लोके करे पद्मासन ।अष्टादशाक्षर-मन्त्रे करे उपासन ॥
२२१॥
चौदह लोकों के सारे लोग उनका ध्यान करते हैं और वैकुण्ठ-लोक के सारे निवासी उनके गुणों एवं लीलाओं का गायन करते हैं।
चौद्द-भुवने ग्राँर सबे करे ध्यान । वैकुण्ठादि-पुरे ग्राँर लीला-गुण गान ॥
२२२ ॥
अपने लोक में कमल आसन पर बैठे हुए ब्रह्माजी सदैव उनका ध्यान करते हैं और अष्टदशाक्षर (अठारह अक्षरों वाले ) मन्त्र से उनकी पूजा करते हैं।
याँर माधुरीते करे लक्ष्मी आकर्षण ।। रूप-गोसाजि करियाछेन से-रूप वर्णन ॥
२२३॥
उनकी माधुरी से लक्ष्मीजी आकर्षित हो जाती हैं, जिसका वर्णन श्रील रूप गोस्वामी ने इस प्रकार किया है ।
स्मेरां भङ्गी-त्रय-परिचितां साचि-विस्तीर्ण-दृष्टिं वंशी-न्यस्ताधर-किशलयामुज्वलां चन्द्रकेण । गोविन्दाख्यां हरि-तनुमितः केशि-तीर्थोपकण्ठे। मा प्रेक्षिष्ठास्तव यदि सखे बन्धु-सङ्गेऽस्ति रङ्गः ॥
२२४॥
हे मित्र, यदि तुम अपने संसारी मित्रों के प्रति वास्तव में आसक्त हो, तो यमुना-तट पर केशीघाट में खड़े भगवान् गोविन्द के स्मितहास्य युक्त मुखमण्डल की ओर मत देखना। वे नेत्रों से कटाक्षपात करते हुए अपने होठों पर बाँसुरी धारण करते हैं, जो नव पल्लव के समान प्रतीत होती है। उनका त्रिभंगिमायुक्त दिव्य शरीर चाँदनी में अत्यन्त उज्वल प्रतीत होता है।
साक्षात्व्रजेन्द्र-सुत इथे नाहि आन ।ग्रेबा अज्ञे करे ताँरै प्रतिमा-हेन ज्ञान ।। २२५॥
निस्सन्देह, वे साक्षात् ब्रजराज के पुत्र हैं। जो मूर्ख है, वही उन्हें मूर्ति मानता है।
सेइ अपराधे तार नाहिक निस्तार ।। घोर नरकेते पड़े, कि बलिब आर ॥
२२६ ।। उस अपराध के कारण वह कभी मुक्त नहीं हो सकता। वस्तुतः वह घोर नरक में जा पड़ेगा। इससे अधिक मैं क्या कहूँ? हेन ग्रे गोविन्द प्रभु, पाइनु याँहा हैते ।। ताँहार चरण-कृपा के पारे वर्णिते ॥
२२७॥
अतएव ऐसा कौन है, जो उनके (नित्यानन्द के) उन चरणकमलों को कृपा का वर्णन कर सके, जिनसे मैंने इन भगवान् गोविन्द की शरण प्त की है? वृन्दावने वैसे व्रत वैष्णव-मण्डल ।। कृष्ण-नाम-परायण, परम-मङ्गल ॥
२२८॥
वृन्दावन में रहने वाले सारे वैष्णवजन कृष्ण के परम मंगलमय नाम के कीर्तन में मग्न रहते हैं।
याँर प्राण-धन—नित्यानन्द-श्री-चैतन्य । राधा-कृष्ण-भक्ति विने नाहि जाने अन्य ॥
२२९॥
भगवान् चैतन्य तथा नित्यानन्द उन वैष्णवों के प्राणधन हैं, जो श्री श्री राधा-कृष्ण की भक्ति के अतिरिक्त कुछ भी नहीं जानते।
से वैष्णवेर पद-रेणु, तार पद-छाया । अधमेरे दिल प्रभु-नित्यानन्द-दया ॥
२३०॥
इस पतितात्मा को भगवान् नित्यानन्द की कृपा से ही वैष्णवों के चरणकमलों की धूल और छाया प्राप्त हो सकी है।
‘ताँहा सर्व लभ्य हय'- प्रभुर वचन । सेइ सूत्र-एइ तार कैल विवरण ॥
२३१॥
भगवान् नित्यानन्द ने कहा, 'वृन्दावन में सभी वस्तुएँ सुलभ हैं।' मैंने उनके संक्षिप्त कथन की यहाँ विस्तृत व्याख्या की है।
से सब पाइनु आमि वृन्दावने आय ।। सेइ सब लभ्य एइ प्रभुर कृपाय ॥
२३२॥
मैंने वृन्दावन आकर यह सब प्राप्त किया है और यह नित्यानन्द प्रभु की कृपा से सम्भव हो सका है।
आपनार कथा लिखि निर्लज्ज हइया । नित्यानन्द-गुणे लेखाय उन्मत्त करिया ॥
२३३॥
मैंने बिना किसी संकोच के अपनी निजी कहानी लिख दी है। भगवान् नित्यानन्द के गुण मुझे उन्मत्त बनाकर ये सब बातें लिखने के लिए बाध्य कर देते हैं।
नित्यानन्द-प्रभुर गुण-महिमा अपार ।।‘सहस्र-वदने' शेष नाहि पाय ग्राँर ।। २३४॥
भगवान् नित्यानन्द के दिव्य गुणों की महिमाएँ अगाध हैं; यहाँ तक कि भगवान् शेष भी अपने हजारों मुखों से उनकी सीमा को नहीं पा सकते।
श्री-रूप-रघुनाथ-पदे यार आश ।चैतन्य-चरितामृत कहे कृष्णदास ॥
२३५ ॥
। श्री रूप तथा श्री रघुनाथ के चरणकमलों में प्रार्थना करते हुए, सदैव उनकी दया की कामना करते हुए मैं, कृष्णदास, उनके पदचिह्नों का अनुसरण करते हुए श्री चैतन्य-चरितामृत का वर्णन कर रहा हूँ।
