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अध्याय सोलह: भगवान का वृन्दावन जाने का प्रयास

गौड़ोद्यानं गौर-मेघः सिञ्चन्स्वालोकनामृतैः । भवाग्नि-दग्ध-जनता-वीरुधः समजीवयत् ॥

१॥

श्री चैतन्य महाप्रभु रूपी बादल ने अपनी दृष्टिरूपी अमृत से गौड़देश के उद्यान को सींचा और उन लोगों को जीवन प्रदान किया, जो लताओं तथा वृक्षों की भाँति भौतिक अस्तित्व की दावाग्नि से जल रहे थे।

जय जय गौरचन्द्र जय नित्यानन्द । जयाद्वैत-चन्द्र जय गौर-भक्त-वृन्द ॥

२॥

श्री चैतन्य महाप्रभु की जय हो! श्री नित्यानन्द प्रभु की जय हो! अद्वैतचन्द्र की जय हो तथा महाप्रभु के समस्त भक्तों की जय हो! प्रभुर हइल इच्छा ग्राइते वृन्दावन ।। शुनिया प्रतापरुद्र हइला विमन ॥

३॥

जब श्री चैतन्य महाप्रभु ने वृन्दावन जाने का निश्चय किया, तो महाराज प्रतापरुद्र यह समाचार सुनकर अत्यन्त खिन्न हो उठे।

सार्वभौम, रामानन्द, आनि' दुई जन । मुँहाके कहेन राजा विनय-वचन ॥

४॥

अतएव राजा ने सार्वभौम भट्टाचार्य तथा रामानन्द राय को बुलवा भेजा और उनसे विनीत शब्द कहे।

नीलाद्रि छाड़ि' प्रभुर मन अन्यत्र ग्राइते । तोमरा करह यत्न ताँहारे राखिते ॥

५॥

महाराज प्रतापरुद्र ने कहा, कृपा करके श्री चैतन्य महाप्रभु को जगन्नाथ पुरी में ही रखने का प्रयास करें, क्योंकि अब वे अन्यत्र जाने की सोच रहे हैं।

ताँहा विना एइ राज्य मोरे नाहि भाय ।। गोसाजि राखिते करह नाना उपाय ॥

६॥

श्री चैतन्य महाप्रभु के बिना मेरा यह राज्य मुझे अच्छा नहीं लग रहा। अतएव ऐसा उपाय करें कि महाप्रभु यहीं रुके रहें।

रामानन्द, सार्वभौम, दुइ-जना-स्थाने ।तबे मुक्ति करे प्रभु ‘ग्राब वृन्दावने' ॥

७॥

इसके बाद श्री चैतन्य महाप्रभु ने रामानन्द राय तथा सार्वभौम से परामर्श किया और कहा, मैं वृन्दावन जाऊँगा।

मुँहे कहे,—रथ-यात्रा कर दरशन ।कार्तिक आइले, तबे करिह गमन ॥

८॥

रामानन्द राय तथा सार्वभौम भट्टाचार्य ने महाप्रभु से प्रार्थना की कि वे सर्वप्रथम रथयात्रा उत्सव मना लें, तब कार्तिक मास आने पर वृन्दावन जाएँ।

कार्तिक आइले कहे--एबे महा-शीत ।।दोल-यात्रा देखि’ ग्राओ—एइ भाल रीत ॥

९॥

किन्तु जब कार्तिक मास आया तो दोनों ने महाप्रभु से कहा, अब बहुत जाड़ा पड़ रहा है। अच्छा हो यदि आप दोल-यात्रा उत्सव देखकर जायें। यह अत्युत्तम रहेगा।

आजि-कालि करि' उठाय विविध उपाय ।। ग्राइते सम्मति ना देय विच्छेदेर भय ॥

१०॥

इस तरह उन दोनों ने महाप्रभु को अप्रत्यक्ष रूप से वृन्दावन जाने की अनुमति न देने के लिए अनेक अवरोध उपस्थित किये। वे ऐसा इसलिए कर रहे थे, क्योंकि वे उनके विछोह से भयभीत थे।

यद्यपि स्वतन्त्र प्रभु नहे निवारण । भक्त-इच्छा विना प्रभु ना करे गमन ॥

११॥

यद्यपि श्री चैतन्य महाप्रभु पूर्णतया स्वतन्त्र हैं और उन्हें रोक पाने में कोई समर्थ नहीं है, किन्तु तो भी वे अपने भक्तों की अनुमति के बिना नहीं गये।

तृतीय वत्सरे सब गौड़ेर भक्त-गण । नीलाचले चलिते सबार हैल मन ॥

१२॥

तीसरे वर्ष भी बंगाल के सारे भक्त पुनः जगन्नाथ पुरी जाना चाहते थे।

सबे मेलि' गेला अद्वैत आचार्येर पाशे ।।प्रभु देखिते आचार्य चलिला उल्लासे ॥

१३॥

सारे बंगाली भक्त अद्वैत आचार्य के पास आये और अद्वैत आचार्य अत्यन्त उल्लासपूर्वक श्री चैतन्य महाप्रभु का दर्शन करने जगन्नाथ पुरी के लिए रवाना हो गये।

यद्यपि प्रभुर आज्ञा गौड़ेते रहिते ।। नित्यानन्द-प्रभुके प्रेम-भक्ति प्रकाशिते ॥

१४॥

तथापि चलिला महाप्रभुरे देखिते ।।नित्यानन्देर प्रेम-चेष्टा के पारे बुझिते ॥

१५ ॥

यद्यपि महाप्रभु ने नित्यानन्द प्रभु को बंगाल में रहकर भगवत्प्रेम का विस्तार करने के लिए कहा था, लेकिन नित्यानन्द प्रभु महाप्रभु का दर्शन करने के लिए रवाना हो गये। भला नित्यानन्द प्रभु के प्रेमभाव को कौन समझ सकता है? आचार्यरत्न, विद्यानिधि, श्रीवास, रामाइ । वासुदेव, मुरारि, गोविन्दादि तिन भाइ ॥

१६॥

राघव पण्डित निज-झालि साजाज्ञा ।कुलीन-ग्राम-वासी चले पट्ट-डोरी ला ॥

१७॥

आचार्यरत्न, विद्यानिधि, श्रीवास, रामाइ, वासुदेव, मुरारि, गोविन्द तथा उसके दो भाई एवं राघव पण्डित समेत नवद्वीप के सारे भक्तजन चल पड़े। राघव पण्डित अपने साथ विभिनन प्रकार के भोजन के झोले लेकर चल पड़े। कुलीनग्राम के निवासी भी रेशमी रस्सियाँ लेकर चल पड़े।

खण्ड-वासी नरहरि, श्री-रघुनन्दन । सर्व-भक्त चले, तार के करे गणन ॥

१८॥

खण्डग्राम के निवासी नरहरि तथा श्री रघुनन्दन एवं अन्य अनेक भक्त भी रवाना हो गये। भला उनकी गिनती कौन कर सकता है? शिवानन्द-सेन करे घाटि समाधान ।सबारे पालन करि' सुखे ला ग्रान ॥

१९॥

शिवानन्द सेन पर सारी टोली का भार था। उन्होंने कर वसूले जाने वाले स्थानों पर कर चुकाये जाने की व्यवस्था की। उन्होंने सारे भक्तों की निगरानी का जिम्मा ले रखा था और उनके साथ वे सुखपूर्वक यात्रा कर रहे थे।

सबार सर्व-कार्य करेन, देन वासा-स्थान ।शिवानन्द जाने उड़िया-पथेर सन्धान ॥

२० ॥

शिवानन्द सेन भक्तों की सभी आवश्यकताओं को पूरी करते। विशेषरूप से उन्होंने उनके रहने के लिए कमरों की व्यवस्था की और वे उड़ीसा के सभी मार्ग जानते थे।

से वत्सर प्रभु देखिते सब ठाकुराणी ।।चलिला आचार्य-सङ्गे अच्युत-जननी ॥

२१॥

उस वर्ष भक्तों की पत्नियाँ ( ठाकुरानियाँ) भी श्री चैतन्य महाप्रभु का दर्शन करने गईं। अच्युतानन्द की माता सीतादेवी अद्वैत आचार्य के साथ गईं।

श्रीवास पण्डित-सङ्गे चलिला मालिनी ।शिवानन्द-सङ्गे चले ताँहार गृहिणी ॥

२२॥

श्रीवास पण्डित अपनी पत्नी मालिनी को ले गये और शिवानन्द सेन की पत्नी भी अपने पति के साथ गई।

शिवानन्देर बालक, नाम-चैतन्य-दसि ।।तेहो चलियाछे प्रभुरे देखिते उल्लास ॥

२३ ॥

शिवानन्द सेन का पुत्र चैतन्य दास भी परम प्रसन्नतापूर्वक महाप्रभु के दर्शन की इच्छा से उन सबके साथ जा रहा था।

आचार्यरत्न-सङ्गे चले ताहार गृहिणी ।।ताँहार प्रेमेर कथा कहिते ना जानि ॥

२४॥

चन्द्रशेखर ( आचार्यरत्न) की पत्नी भी गईं। महाप्रभु के प्रति चन्द्रशेखर के प्रेम की महानता का वर्णन मेरे बूते की बात नहीं है।

सब ठाकुराणी महाप्रभुके भिक्षा दिते ।प्रभुर नाना प्रिय द्रव्य निल घर हैते ॥

२५ ॥

महान् भक्तों की सारी पत्नियाँ महाप्रभु को तरह-तरह का भोजन भेंटकरने के लिए अपने-अपने घरों से महाप्रभु की मनपसन्द वस्तुएँ ले आई थीं।

शिवानन्द-सेन करे सब समाधान ।।घाटियाल प्रबोधि' देन सबारे वासा-स्थान ॥

२६॥

जैसा कहा जा चुका है, शिवानन्द सेन ने टोली की सभी आवश्यकताओं का प्रबन्ध किया। विशेषतया वे कर वसूल करने वाले व्यक्तियों को शान्त करते और हर एक के लिए विश्राम-स्थल हूँढते थे।

भक्ष्य दिया करेन सबार सर्वत्र पालने ।परम आनन्दे ग्रान प्रभुर दरशने ॥

२७॥

शिवानन्द सेन सभी भक्तों को भोजन देते थे और रास्ते-भर उनकी देख-रेख करते थे। इस तरह वे परम प्रसन्नतापूर्वक श्री चैतन्य महाप्रभु का दर्शन करने जगन्नाथ पुरी गये।

रेमुणाय आसिया कैल गोपीनाथ दरशन ।आचार्य करिल ताहाँ कीर्तन, नर्तन ॥

२८॥

जब वे सब रेमुणा पहुँचे, तो सारे लोग भी गोपीनाथ का दर्शन करने गये। वहाँ मन्दिर में अद्वैत आचार्य ने नृत्य किया और गाया।

नित्यानन्देर परिचय सब सेवक सने ।बहुत सम्मान आसि' कैल सेवक-गणे ॥

२९॥

मन्दिर के सारे पुजारी श्री नित्यानन्द प्रभु से पहले से परिचित थे; अतएव वे सब आये और उन्होंने प्रभु का बहुत सम्मान किया।

सेइ रात्रि सब महान्त ताहानि रहिला ।बार क्षीर आनि' आगे सेवक धरिला ॥

३० ॥

उस रात सारे बड़े-बड़े भक्त मन्दिर में रहे और पुरोहितों ने दूध की खीर के बारह पात्र लाकर नित्यानन्द प्रभु के सामने रख दिये।

क्षीर बाँटि' सबारे दिल प्रभु-नित्यानन्द ।क्षीर-प्रसाद पाञा सबार बाड़िल आनन्द ॥

३१॥

नित्यानन्द प्रभु ने इस खीर को प्रसाद रूप में हर एक को बाँट दिया। इस तरह हर एक का दिव्य आनन्द बढ़ गया।

माधव-पुरीर कथा, गोपाल-स्थापन ।।ताँहारे गोपाल ग्रैछे मागिल चन्दन ॥

३२॥

तब सबने माधवेन्द्र पुरी द्वारा गोपाल-अर्चाविग्रह की स्थापना की कहानी की चर्चा की और इसकी भी चर्चा की कि किस तरह गोपाल ने उनसे चन्दन माँगा था।

ताँर लागि' गोपीनाथ क्षीर चुरि कैल ।।महाप्रभुर मुखे आगे ए कथा शुनिल ॥

३३ ॥

गोपीनाथ ने ही माधवेन्द्र पुरी के लिए खीर चुराई थी। इस घटना का वर्णन स्वयं श्री चैतन्य महाप्रभु पहले कर चुके थे।

सेइ कथा सबार मध्ये कहे नित्यानन्द ।।शुनिया वैष्णव-मने बाड़िल आनन्द ॥

३४॥

यही कथा भगवान् नित्यानन्द ने सारे भक्तों को फिर से सुनाई। इस कथा को फिर से सुनकर भक्तों का दिव्य आनन्द बढ़ गया।

एइ-मत चलि' चलि' कटक आइला । साक्षि-गोपाल देखि सबे से दिन रहिला ॥

३५॥

इस तरह चलते चलते भक्तगण कटके शहर पहुँचे, जहाँ पर वे एक दिन रहे और उन्होंने साक्षि-गोपाल का मन्दिर देखा।

साक्षि-गोपालेर कथा कहे नित्यानन्द ।।शुनिया वैष्णव-मने बाड़िल आनन्द ॥

३६॥

जब नित्यानन्द प्रभु ने साक्षि-गोपाल के सारे कार्यकलाप कह सुनाये, तो सारे वैष्णवों के मनों में दिव्य आनन्द उमड़ आया।

प्रभुके मिलिते सबार उत्कण्ठा अन्तरे ।।शीघ्र करि' आइला सबे श्री-नीलाचले ॥

३७॥

टोली के सारे लोग महाप्रभु को देखने के लिए मन में बड़े उत्सुक थे, अतएव वे जल्दी-जल्दी जगन्नाथ पुरी की ओर चले।

आठारनालाके आइला गोसाजि शुनिया । दुइ-माला पाठाइला गोविन्द-हाते दिया ॥

३८॥

जब वे सब आठारनाला नामक पुल पर आ गये, तो श्री चैतन्य महाप्रभु ने उनके आने का समाचार सुनकर गोविन्द के हाथों दो फूलमालाएँ भेजीं।

दुई माला गोविन्द दुइजने पराइल ।। अद्वैत, अवधूत-गोसाञि बड़ सुख पाइल ॥

३९॥

गोविन्द ने वे दोनों मालाएँ अद्वैत आचार्य तथा नित्यानन्द प्रभु को भेंट कीं। इससे वे दोनों अत्यन्त सुखी हुए।

ताहाजि आरम्भ कैल कृष्ण-सङ्कीर्तन ।नाचिते नाचिते चलि' आइला दुइ-जन ॥

४० ॥

उन्होंने वे उसी स्थान पर भगवान् कृष्ण के पवित्र नाम का कीर्तन प्रारम्भ कर दिया और अद्वैत आचार्य तथा नित्यानन्द प्रभु दोनों ही नाचतेनाचते जगन्नाथ पुरी पहुँचे।

पुनः माला दिया स्वरूपादि निज-गण । आगु बाड़ि' पाठाइल शचीर नन्दन ॥

४१॥

तब दूसरी बार श्री चैतन्य महाप्रभु ने स्वरूप दामोदर तथा अपने अन्य निजी संगियों के हाथों मालाएँ भेजीं। शचीमाता के पुत्र द्वारा भेजे जाने से वे सभी आगे बढ़े।

नरेन्द्र आसिया ताहाँ सबारे मिलिला । महाप्रभुर दत्त माला सबारे पराइला ॥

४२॥

जब बंगाल से आने वाले भक्त नरेन्द्र सरोवर पहुँचे, तो स्वरूप दामोदर तथा अन्य लोग उनसे मिले और उन्हें श्री चैतन्य महाप्रभु द्वारा भेजी गई मालाएँ भेंट कीं।

सिंह-द्वार-निकटे आइला शुनि' गौरराय । आपने आसिया प्रभु मिलिला सबाय ॥

४३॥

जब भक्तगण सिंह-द्वार के पास पहुँच गये, तो श्री चैतन्य महाप्रभु ने यह समाचार सुना और वे स्वयं उनसे मिलने गये।

सबा लञा कैल जगन्नाथ-दरशन । सबा लञा आईला पुनः आपन-भवन ॥

४४॥

| फिर श्री चैतन्य महाप्रभु तथा उनके सारे भक्तों ने भगवान जगन्नाथ का दर्शन किया। अन्त में वे उन सबको अपने साथ लेकर अपने निवासस्थान लौट गये।

वाणीनाथ, काशी-मिश्र प्रसाद आनिल ।स्वहस्ते सबारे प्रभु प्रसाद खाओयाइल ॥

४५ ॥

तब वाणीनाथ राय तथा काशी मिश्र बड़ी मात्रा में प्रसाद ले आये और श्री चैतन्य महाप्रभु ने उस प्रसाद को अपने हाथों से सबको बाँटा तथा खिलाया।

पूर्व वत्सरे ग्राँर ग्रेइ वासा-स्थान ।ताहाँ सबा पाठात्रा कराइल विश्राम ॥

४६॥

पिछले वर्ष हर एक को विशेष निवासस्थान मिला था; उसे वही स्थान पुनः दिया गया। इस तरह वे सभी आराम करने चले गये।

एइ-मत भक्त-गण रहिला चारि मास ।प्रभुर सहित करे कीर्तन-विलास ॥

४७॥

सारे भक्त लगातार चार मास तक वहीं रहे और श्री चैतन्य महाप्रभु के साथ हरे कृष्ण महामन्त्र के कीर्तन का आनन्द लेते रहे।

पूर्ववत् रथ-यात्रा-काल ग्राबे आइल ।सबा ला गुण्डिचा-मन्दिर प्रक्षालिल ॥

४८॥

जब रथयात्रा का समय आया, तो सबने पिछले वर्ष की तरह गुण्डिचा मन्दिर की सफाई की।

कुलीन-ग्रामी पट्ट-डोरी जगन्नाथे दिले ।पूर्ववत् रथ-अग्रे नर्तन करिल ॥

४९॥

कुलीन ग्राम के निवासियों ने रेशमी डोरियाँ जगन्नाथजी को भेंट कीं और पहले की तरह वे सब भगवान् के रथ के आगे नाचे।

बहु नृत्य करि' पुनः चलिल उद्याने ।वापी-तीरे ताहाँ ग्राइ' करिल विश्रामे ॥

५०॥

काफी नाचने के बाद सभी निकटवर्ती बगीचे में गये और उन्होंने सरोवर के तट पर विश्राम किया।

राढ़ी एक विप्र, तेहो—नित्यानन्द दास । महा-भाग्यवान्तेंहो, नाम–कृष्णदास ॥

५१॥

कृष्णदास नामक एक ब्राह्मण, जो राढ़देश का रहने वाला था और नित्यानन्द प्रभु का सेवक था, महा भाग्यशाली व्यक्ति था।

घट भरि' प्रभुर तेहो अभिषेक कैल ।। ताँर अभिषेके प्रभु महा-तृप्त हैल ॥

५२॥

कृष्ण दास ने एक बड़े पात्र में जल भरकर महाप्रभु के ऊपर डालकर स्नान कराया। इससे महाप्रभु अत्यन्त सन्तुष्ट हो गये।

बलगण्डि-भोगेर बहु प्रसाद आइल ।सबा सङ्गे महाप्रभु प्रसाद खाइल ॥

५३॥

तभी बलगण्डि में भगवान् का अर्पित काफी प्रसाद आया, जिसे श्री चैतन्य महाप्रभु तथा उनके सभी भक्तों ने ग्रहण किया।

पूर्ववत् रथ-यात्रा कैल दरशन ।हेरा-पञ्चमी-ग्रात्रा देखे लञा भक्त-गण ॥

५४॥

पिछले वर्ष की तरह महाप्रभु ने सारे भक्तों सहित रथयात्रा उत्सव तथा हेरापंचमी उत्सव भी देखा।

आचार्य-गोसाञि प्रभुर कैल निमन्त्रण ।तार मध्ये कैल ग्रैछे झड़-वरिषण ॥

५५॥

तब अद्वैत आचार्य ने श्री चैतन्य महाप्रभु को निमन्त्रण दिया, किन्तु तभी तेज वर्षा के साथ भीषण तूफान आ गया।

विस्तारि' वर्णियाछेन दास-वृन्दावन ।श्रीवास प्रभुरे तबे कैल निमन्त्रण ॥

५६॥

इन सारी घटनाओं का विस्तृत वर्णन श्रील वृन्दावन दास ठाकुर ने किया है। तब एक दिन श्रीवास ठाकुर ने महाप्रभु को निमन्त्रण दिया।

प्रभुर प्रिय-व्यञ्जन सब रान्धेन मालिनी ।‘भक्त्ये दासी'-अभिमान, ‘स्नेहेते जननी' ॥

५७ ॥

श्रीवास ठाकुर की पत्नी मालिनी देवी ने महाप्रभु की प्रिय तरकारियाँ पकाईं। वे भक्तिवश अपने आपको श्री चैतन्य महाप्रभु की दासी मानती थीं, किन्तु स्नेह में वे माता तुल्य थीं।

आचार्यरत्न-आदि ग्रत मुख्य भक्त-गण ।मध्ये मध्ये प्रभुरे करेन निमन्त्रण ॥

५८॥

चन्द्रशेखर ( आचार्यरत्न ) आदि प्रमुख भक्त बारी-बारी से श्री चैतन्य महाप्रभु को निमन्त्रित देते रहे।

चातुर्मास्य-अन्ते पुनः नित्यानन्दे ला ।।किबा झुक्ति करे नित्य निभृते वसिया ॥

५९॥

चातुर्मास्य बीत जाने पर चैतन्य महाप्रभु नित्य ही एकान्त स्थान में नित्यानन्द से फिर परामर्श करने लगे। किन्तु कोई यह नहीं जान सका कि वे क्या परामर्श करते थे।

आचार्य-गोसाञि प्रभुके कहे ठारे-ठोरे ।आचार्य तर्जा पड़े, केह बुझिते ना पारे ॥

६०॥

तब श्रील अद्वैत आचार्य ने इशारों से चैतन्य महाप्रभु से कुछ कहा और कुछ पद्य पढ़े, जिन्हें कोई समझ नहीं सका।

ताँर मुख देखि' हासे शचीर नन्दन ।अङ्गीकार जानि' आचार्य करेन नर्तन ॥

६१॥

अद्वैत आचार्य का मुँह देखकर श्री चैतन्य महाप्रभु हँसने लगे। यह जानकर कि महाप्रभु ने प्रस्ताव स्वीकार कर लिया है, अद्वैत आचार्य नाचने लगे।

किबा प्रार्थना, किबा आज्ञा केह ना बुझिल ।आलिङ्गन करि' प्रभु ताँरै विदाय दिल ।। ६२॥

यह कोई नहीं जान सका कि अद्वैत आचार्य ने किस चीज के लिए प्रार्थना की अथवा महाप्रभु ने क्या आदेश दिया। आचार्य का आलिंगन करने के बाद श्री चैतन्य महाप्रभु ने उन्हें विदा किया।

नित्यानन्दे कहे प्रभु,शुनह, श्रीपाद ।।एई आमि मागि, तुमि करह प्रसाद ॥

६३॥

तब श्री चैतन्य महाप्रभु ने नित्यानन्द प्रभु से कहा, हे श्रीपाद, कृपया मेरी सुनो। मैं तुम से कुछ अनुरोध करना चाहता हूँ। उसे स्वीकार करो।

प्रति-वर्ष नीलाचले तुमि ना आसिबा ।गौड़े रहि' मोर इच्छा सफल करिबा ॥

६४॥

प्रतिवर्ष जगन्नाथ पुरी न आओ, अपितु बंगाल में ही रहकर मेरी इच्छा पूरी करो।

ताहाँ सिद्धि करे--हेन अन्ये ना देखिये ।। आमार ‘दुष्कर' कर्म, तोमा हैते हये ॥

६५॥

श्री चैतन्य महाप्रभु ने कहा, तुम वह कार्य कर सकते हो, जिसे मैं भी नहीं कर सकता। तुम्हारे अतिरिक्त मुझे गौड़देश में कोई ऐसा व्यक्ति नहीं मिल सकता, जो मेरे उद्देश्य को वहाँ पूरा कर सके।

नित्यानन्द कहे,—आमि ‘देह' तुमि 'प्राण' । ‘देह' ‘प्राण' भिन्न नहे,--एइ ते प्रमाण ॥

६६॥

नित्यानन्द प्रभु ने उत्तर दिया, हे प्रभु, आप प्राण हैं और मैं शरीर हूँ। प्राण तथा शरीर में कोई अन्तर नहीं है। अपितु प्राण शरीर से बढ़कर है।

अचिन्त्य-शक्त्ये कर तुमि ताहार घटन।। ये कराह, सेइ करि, नाहिक नियम ॥

६७॥

आप अपनी अचिन्त्य शक्ति से जो चाहें सो कर सकते हैं और आप मुझसे जो भी कराते हैं, उसे मैं बिना किसी प्रतिबन्ध के करता हूँ।

ताँरै विदाय दिल प्रभु करि' आलिङ्गन ।। एइ-मत विदाय दिल सब भक्तगण ॥

६८॥

इस तरह श्री चैतन्य महाप्रभु ने नित्यानन्द प्रभु का आलिंगन किया और उन्हें विदा किया। तब उन्होंने अन्य सारे भक्तों को विदा किया।

कुलीन-ग्रामी पूर्ववत्कैल निवेदन ।प्रभु, आज्ञा करे,—आमार कर्तव्य साधन ॥

६९ ॥

पिछले वर्ष की तरह कुलीनग्राम के एक निवासी ने महाप्रभु से विनती की, हे प्रभु, कृपा करके बतायें कि मेरा क्या कर्तव्य है और मैं इसे कैसे पूरा करूं? प्रभु कहे,–वैष्णव-सेवा, नाम-सङ्कीर्तन ।दुइ कर, शीघ्र पाबे श्री कृष्ण-चरण ॥

७० ॥

महाप्रभु ने उत्तर दिया,तुम्हें भगवान् कृष्ण के दासों की सेवा में लगना चाहिए और सदैव कृष्ण के पवित्र नाम का कीर्तन करना चाहिए। यदि तुम ये दोनों काम करोगे, तो तुम्हें शीघ्र ही श्रीकृष्ण के चरणकमलों में शरण प्राप्त हो सकेगी।

तेंहो कहे,---के वैष्णव, कि ताँर लक्षण? ।तबे हासि' कहे प्रभु जानि' ताँर मन ।। ७१।। उस कुलीनग्राम के निवासी ने कहा, कृपा करके बतलायें कि वास्तव में वैष्णव कौन है और उसके लक्षण क्या हैं? उसके मन की बात जानकर श्री चैतन्य महाप्रभु मुस्काने लगे और उन्होंने यह उत्तर दिया।

कृष्ण-नाम निरन्तर याँहार वदने ।सेइ वैष्णव-श्रेष्ठ, भज ताँहार चरणे ।। ७२ ॥

जो व्यक्ति सदैव भगवान् के पवित्र नाम का कीर्तन करता रहता है, उसे उत्तम श्रेणी का वैष्णव समझना चाहिए और तुम्हारा कर्तव्य है कि तुम उसके चरणकमलों की सेवा करो।

वर्षान्तरे पुनः ताँरा ऐछे प्रश्न कैल । वैष्णवेर तारतम्य प्रभु शिखाइल ॥

७३॥

अगले वर्ष भी कुलीनग्राम के निवासियों ने महाप्रभु से फिर वहीप्रश्न पूछा। इस प्रश्न को सुनकर श्री चैतन्य महाप्रभु ने पुनः विभिन्न प्रकार के वैष्णवों के विषय में शिक्षा दी।

याँहार दर्शने मुखे आइसे कृष्ण नाम ।ताँहारे जानिह तुमि 'वैष्णव-प्रधान' ॥

७४॥

श्री चैतन्य महाप्रभु ने कहा, उत्तम कोटि का वैष्णव वह है, जिसकी उपस्थिति मात्र से अन्य लोग कृष्ण के पवित्र नाम का कीर्तन करने लगते हैं।

क्रम करि' कहे प्रभु ‘वैष्णव'-लक्षण ।'वष्णव', 'वष्णवतर', आर' वैष्णवतम' ॥

७५ ॥

इस तरह श्री चैतन्य महाप्रभु ने विभिन्न प्रकार के वैष्णवों-वैष्णव, वैष्णवतर तथा वैष्णवतम-की शिक्षा दी। इस तरह उन्होंने कुलीनग्राम के निवासियों को एक के बाद एक करके वैष्णव के सारे लक्षण अच्छी तरह समझा दिये।

एइ-मत सब वैष्णव गौड़े चलिला । विद्यानिधि से वत्सर नीलाद्रि रहिला ॥

७६ ॥

अन्ततोगत्वा सारे वैष्णवजन बंगाल लौट गये, किन्तु उस वर्ष पुण्डरीक विद्यानिधि जगन्नाथ पुरी में ही रहे।

स्वरूप-सहित ताँर हय सख्य-प्रीति ।दुइ-जनाय कृष्ण-कथाये एकत्र-इ स्थिति ॥

७७॥

स्वरूप दामोदर गोस्वामी तथा पुण्डरीक विद्यानिधि में घनिष्ठ मित्रता थी और जहाँ तक कृष्ण विषयक कथाओं पर चर्चा करने की बात थी, वे दोनों ही समान स्तर के थे।

गदाधर-पण्डिते तेंहो पुनः मन्त्र दिल ।।ओड़न-षष्ठीर दिने यात्रा ये देखिल ॥

७८ ॥

पुण्डरीक विद्यानिधि ने गदाधर पण्डित को दुबारा दीक्षित किया और ओडनषष्ठी के दिन उन्होंने उत्सव देखा।

जगन्नाथ परेन तथा 'माया' वसन ।। देखिया सघृण हैल विद्यानिधिर मन ॥

७९॥

जब पुण्डरीक विद्यानिधि ने देखा कि जगन्नाथजी को मांड़युक्त वस्त्र ओढ़ाया जाता है, तो उनका मन कुछ-कुछ घृणा से भर गया। इस तरह उनका मन दूषित हो गया।

सेइ राये जगन्नाथ-बलाइ आसिया । दुइ–भाइ चड़ा'न ताँरै हासिया हासिया ॥

८० ॥

उस रात को भगवान जगन्नाथ तथा बलराम दोनों भाई पुण्डरीक विद्यानिधि के घर आये और हँस-हँसकर उन्हें चपत लगाने लगे।

गाल फुलिल, आचार्य अन्तरे उल्लास ।विस्तारि' वर्णियाछेन वृन्दावन-दास ।। ८१॥

यद्यपि चपत लगने से उनके गाल सूज गये थे, किन्तु पुण्डरीक विद्यानिधि भीतर से अत्यन्त प्रसन्न थे। इस घटना का विस्तृत वर्णन ठाकुर वृन्दावन दास ने किया है।

एइ-मत प्रत्यब्द आइसे गौड़ेर भक्त-गण ।प्रभु-सङ्गे रहि' करे यात्रा-दरशन ॥

८२॥

प्रतिवर्ष बंगाल के भक्तगण आते और रथयात्रा का दर्शन करने के लिए श्री चैतन्य महाप्रभु के साथ ठहरते थे।

तार मध्ये ये ये वर्षे आछये विशेष ।विस्तारिया आगे ताहा कहिब नि:शेष ॥

८३॥

उन वर्षों में जो कुछ उल्लेखनीय घटनाएँ घटीं, उनका वर्णन बाद में किया जायेगा।

एइ-मत महाप्रभुर चारि वत्सर गेल ।।दक्षिण ग्राञा आसिते दुइ वत्सः लागिल ॥

८४॥

इस तरह श्री चैतन्य महाप्रभु ने चार वर्ष बिताये। प्रथम दो वर्ष उन्होंने दक्षिण भारत के भ्रमण में लगा दिये।

आर दुई वत्सर चाहे वृन्दावन ग्राइते ।।रामानन्द-हठे प्रभु ना पारे चलिते ॥

८५ ॥

अन्य दो वर्षों तक श्री चैतन्य महाप्रभु वृन्दावन जाना चाहते रहे, किन्तु वे रामानन्द राय की चालों के कारण जगन्नाथ पुरी छोड़ नहीं पाये।

पञ्चम वत्सरे गौड़ेर भक्त-गण आइला ।। रथ देखि' ना रहिला, गौड़ेरे चलिला ।। ८६ ।। पाँचवें वर्ष बंगाल के भक्तगण रथयात्रा देखने आये, किन्तु देखने के बाद वे रुके नहीं, अपितु बंगाल लौट गये।

तबे प्रभु सार्वभौम-रामानन्द-स्थाने ।।आलिङ्गन करि' कहे मधुर वचने ॥

८७॥

तब श्री चैतन्य महाप्रभु ने सार्वभौम भट्टाचार्य तथा रामानन्द राय के समक्ष एक प्रस्ताव रखा। उन्होंने उन दोनों का आलिंगन करते हुए मधुर वचन कहे।

बहुत उत्कण्ठा मोर ग्राइते वृन्दावन ।।तोमार हठे दुइ वत्सर ना कैलें गमन ॥

८८॥

चैतन्य महाप्रभु ने कहा, वृन्दावन जाने की मेरी इच्छा अत्यन्त बलवती हो उठी है। तुम्हारी चालों के कारण मैं विगत दो वर्षों से वहाँ जा नहीं पाया।

अवश्य चलिब, हे करह सम्मति ।।तोमा-मुँहा विना मोर नाहि अन्य गति ॥

८९॥

अब मैं अवश्य जाऊँगा। अब तो तुम लोग अनुमति दोगे न? तुम दोनों के अतिरिक्त मेरे पास कोई अन्य आश्रय नहीं है।

गौड़-देशे हय मोर 'दुइ समाश्रय' ।जननी' ‘जाह्नवी',——एई दुई दयामये ॥

९०॥

बंगाल में मेरे दो आश्रय हैं-मेरी माता तथा गंगा नदी। ये दोनों अत्यन्त दयालु हैं ।

गौड़-देश दिया झाब ताँ-सबा देखियो । तुमि मुँहे आज्ञा देह' परसन्न हञा ॥

९१॥

मैं बंगाल होता हुआ वृन्दावन जाऊँगा और अपनी माता तथा गंगा नदी दोनों को देबूंगा। क्या अब तुम दोनों मुझे अनुमति दोगे? शुनिया प्रभुर वाणी मने विचारय ।। प्रभु-सने अति हठ कभु भाल नय ॥

९२॥

जब सार्वभौम भट्टाचार्य तथा रामानन्द राय ने ये शब्द सुने, तो वे विचार करने लगे कि यह अच्छी बात नहीं है कि उन्होंने महाप्रभु के साथ इतनी चालें चली थीं।

मुँहे कहे,—एबे वर्षा, चलिते नारिबा ।। विजया-दशमी आइले अवश्य चलिबा ॥

९३॥

उन दोनों ने कहा, वर्षा ऋतु होने के कारण आपके लिए यात्रा करनी कठिन हो जायेगी। वृन्दावन प्रस्थान करने के लिए विजयादशमी तक प्रतीक्षा करना ठीक रहेगा।

आनन्दे महाप्रभु वर्षा कैल समाधान । विजया-दशमी-दिने करिल पयान ॥

९४॥

इस तरह अनुमति प्राप्त करके श्री चैतन्य महाप्रभु अत्यधिक प्रसन्न हुए। उन्होंने वर्षा ऋतु बीत जाने तक प्रतीक्षा की और जब विजयादशमी आई तो वे वृन्दावन के लिए चल पड़े।

जगन्नाथेर प्रसाद प्रभु ग्रत पाछिल ।। कड़ार, चन्दन, डोर, सब सङ्गे लैल ॥

९५॥

महाप्रभु ने जगन्नाथजी का प्रसाद एकत्र किया। उन्होंने अपने साथ भगवान् का कड़ार अंजन, चन्दन तथा डोरियाँ भी प्रसाद रूप में ले लीं।

जगन्नाथे आज्ञा मागि' प्रभाते चलिला ।। उड़िया-भक्त-गण सङ्गे पाछे चलि' आइला ॥

९६॥

भोर के समय भगवान जगन्नाथ से आज्ञा लेकर श्री चैतन्य महाप्रभु चल पड़े और उड़ीसा के सारे भक्त भी उनके पीछे पीछे जाने लगे।

उड़िया-भक्त-गणे प्रभु मृत्ले निवारिला । निज-गण-सङ्गे प्रभु 'भवानीपुर' आइला ॥

९७ ॥

चैतन्य महाप्रभु बड़े यत्न से उड़ीसा के भक्तों को अपने साथ चलने से मना कर पाये। फिर वे अपने निजी संगियों के साथ सबसे पहले भवानीपुर गये।

रामानन्द आइला पाछे दोलाय चड़िया । वाणीनाथ बहु प्रसाद दिल पाठाञी ।। ९८॥

जब भगवान् चैतन्य भवानीपुर पहुँच गये, तो उनके पीछे पीछे रामानन्द राय अपनी पालकी पर चढ़कर आये और वाणीनाथ राय ने महाप्रभु के लिए प्रचुर मात्रा में प्रसाद भेजा था।

प्रसाद भोजन करि' तथाय रहिला ।प्रातः-काले चलि' प्रभु' भुवनेश्वर' आइला ॥

९९ ॥

प्रसाद ग्रहण करने के बाद श्री चैतन्य महाप्रभु वहाँ रात-भर रहे। प्रातः होते ही वे चल पड़े और अन्त में भुवनेश्वर आ पहुँचे।

‘कटके' आसिया कैल ‘गोपाल' दरशन । स्वप्नेश्वर-विप्र कैल प्रभुर निमन्त्रण ॥

१०० ॥

कटक नगर पहुँचकर उन्होंने गोपाल मन्दिर के दर्शन किये। वहाँ पर स्वप्नेश्वर नाम के ब्राह्मण ने उन्हें भोजन करने के लिए निमन्त्रण दिया।

रामानन्द-राय सब-गणे निमन्त्रिल ।बाहिर उद्याने आसि' प्रभु वासा कैल ॥

१०१॥

रामानन्द राय ने अन्य सभी जनों को भोजन करने के लिए निमन्त्रित किया और श्री चैतन्य महाप्रभु ने मन्दिर के बाहर बगीचे में अपना विश्राम स्थान बनाया।

भिक्षा करि' बकुल-तले करिला विश्राम ।प्रतापरुद्र-ठाञि राय करिल पयान ॥

१०२॥

जब श्री चैतन्य महाप्रभु बकुल वृक्ष के नीचे विश्राम कर रहे थे, तो रामानन्द राय तुरन्त महाराज प्रतापरुद्र के पास गये।

शुनि' आनन्दित राजा अति-शीघ्र आइला । प्रभु देखि' दण्डवत्भूमेते पड़िला ॥

१०३ ॥

राजा यह समाचार पाकर अत्यन्त प्रसन्न हुए। और शीघ्रता से वहाँ | आये। महाप्रभु को देखकर उन्होंने दण्डवत् प्रणाम किया।

पुनः उठे, पुनः पड़े प्रणय-विह्वल ।।स्तुति करे, पुलकाङ्ग, पड़े अश्रु-जल ॥

१०४॥

प्रेम से विह्वल होकर राजा बारम्बार उठते और गिरते रहे। जब वे प्रार्थना कर रहे थे, तो उनका सारा शरीर काँपने लगा और उनकी आँखों से आँसू बह चले।

ताँर भक्ति देखि' प्रभुर तुष्ट हैल मन ।। उथि' महाप्रभु ताँरै कैला आलिङ्गन ॥

१०५॥

श्री चैतन्य महाप्रभु राजा की भक्ति देखकर अत्यन्त प्रसन्न हुए, अतएव उन्होंने उठकर उनका आलिंगन किया।

पुनः स्तुति करि' राजा करये प्रणाम ।।प्रभु-कृपा-अश्रुते ताँर देह हैल स्नान ॥

१०६॥

जब महाप्रभु ने राजा का आलिंगन किया, तो राजा ने बारम्बार प्रार्थना की और उन्हें नमस्कार किया। इस तरह महाप्रभु की कृपा से राजा की आँखों में आँसू आ गये, जिससे महाप्रभु का शरीर नहा उठा।

सुस्थ करि, रामानन्द राजारे बसाइला ।काय-मनो-वाक्ये प्रभु ताँरै कृपा कैला ॥

१०७॥

अन्त में रामानन्द राय ने राजा को सान्त्वना दी और उन्हें बैठाया। महाप्रभु ने भी अपने शरीर, मन तथा वाणी से राजा पर कृपा की।

ऐछे ताँहारे कृपा कैल गौरराय ।।प्रतापरुद्र-सन्त्राता नाम हैल ग्राय ॥

१०८॥

श्री चैतन्य महाप्रभु ने राजा पर इतनी कृपा प्रदर्शित की कि उस दिन से महाप्रभु का नाम 'प्रतापरुद्र-संत्राता' अर्थात् ‘महाराज प्रतापरुद्र के उद्धारक' पड़ गया।

राज-पात्र-गण कैल प्रभुर वन्दन ।राजारे विदाय दिला शचीर नन्दन ॥

१०९॥

सारे सरकारी अधिकारियों ने भी महाप्रभु को नमस्कार किया और तब शची-पुत्र महाप्रभु ने राजा तथा उनके व्यक्तियों को विदा किया।

बाहिरे आसि' राजा आज्ञा-पत्र लेखाइल।निज-राज्ये व्रत 'विषयी', ताहारे पाठाइल ॥

११०॥

तब राजा बाहर गये और उन्होंने आदेश पत्र लिखाकर अपने राज्यभर के सरकारी नौकरों को भिजवाया।

‘ग्रामे-ग्रामे' नूतन आवास करिबा ।पाँच-सात नव्य-गृहे सामग्रग्ने भरिबा ॥

१११॥

उनको आदेश था, प्रत्येक गाँव में नये आवास स्थान बनाये जाएँ और पाँच-सात नये घरों में सभी तरह का भोजन संग्रह कर लिया जाए।

आपनि प्रभुके लजा ताहाँ उत्तरिबा ।रात्रि-दिबा वेत्र-हस्ते सेवाय रहिबा ॥

११२॥

तुम लोग स्वयं महाप्रभु को इन नवनिर्मित घरों में ले जाना। तुम लोग रात-दिन अपने हाथों में बेंत (लाठी ) लिए उनकी सेवा में लगे रहना।

दुइ महा-पात्र, हरिचन्दन', 'मर्दराज' ।ताँरे आज्ञा दिल राजा-करिह सर्व काय ।। ११३॥

राजा ने हरिचन्दन तथा मर्दराज नामक दो सम्मानित अधिकारियों को आदेश दिया कि इन आदेशों के पालन करने के लिए जो भी आवश्यक हो, करें।

एक नव्य-नौका आनि' राखह नदी-तीरे ।। ग्राहाँ स्नान करि' प्रभु या 'न नदी-पारे ॥

११४॥

ताहाँ स्तम्भ रोपण कर 'महा-तीर्थ' करि' ।।नित्य स्नान करिब ताहाँ, ताहाँ ग्रेन मरि ॥

११५॥

राजा ने उन्हें यह भी आदेश दिया कि नदी के तटों पर एक नयी नाव रखें और जहाँ-जहाँ श्री चैतन्य महाप्रभु स्नान करें या नदी के उस पार जाएँ, वहाँ-वहाँ वे स्मृति-स्तम्भ स्थापित कर दें और उस स्थान को तीर्थस्थल बना दें। राजा ने कहा, मैं वहीं-वहीं स्नान किया करूँगा और मुझे मरने भी वहीं देना।

चतुद्वारे करह उत्तम नव्य वास । रामानन्द, ग्राह तुमि महाप्रभु-पाश ॥

११६॥

राजा ने आगे आदेश दिया, चतुर्द्वार पर एक नया वासस्थान तैयार कराना । हे रामानन्द, अब आप महाप्रभु के पास लौट सकते हैं।

सन्ध्याते चलिबे प्रभु, नृपति शुनिल ।हस्ती-उपर ताम्बु-गृहे स्त्री-गणे चड़ाइल ॥

११७॥

जब राजा ने सुना कि महाप्रभु उस दिन संध्या-समय चले जायेंगे, तो उसने तुरन्त ही कुछ ऐसे हाथी लाये जाने का प्रबन्ध कर दिया जिनकी पीठ पर छोटे-छोटे तम्बू लगे हों। फिर महल की सारी स्त्रियाँ उन हाथियों पर बैठ गईं।

प्रभुर चलिबार पथे रहे सारि हुआ ।सन्ध्याते चलिला प्रभु निज-गण लञा ॥

११८॥

ये सारी स्त्रियाँ उस मार्ग में पंक्ति बाँधकर प्रतीक्षा-रत रहीं, जिससे होकर महाप्रभु जाने वाले थे। उस शाम को महाप्रभु अपने भक्तों सहित वहाँ से चल पड़े।

‘चित्रोत्पला-नदी' आसि' घाटे कैल स्नाने ।महिषी-सकल देखि' करये प्रणाम ॥

११९॥

जब श्री चैतन्य महाप्रभु चित्रोत्पला नदी में स्नान करने गये, तो सारी रानियों तथा स्त्रियों ने उन्हें सादर नमस्कार किया।

प्रभुर दरशने सबे हैल प्रेममय ।'कृष्ण' 'कृष्ण' कहे, नेत्र अश्रु वरिषये ॥

१२०॥

महाप्रभु को देखकर वे सारी स्त्रियाँ भगवत्प्रेम से अभिभूत हो उठीं और आँखों से अश्रु गिराते हुए कृष्ण! कृष्ण! कीर्तन करने लगीं।

एमन कृपालु नाहि शुनि त्रिभुवने । कृष्ण-प्रेमा हय ग्राँर दूर दरशने ॥

१२१॥

तीनों लोकों में श्री चैतन्य महाप्रभु के समान दयामय कोई नहीं है। उनका दूर से दर्शन करने मात्र से मनुष्य भगवत्प्रेम से अभिभूत हो जाता है। नौकाते चड़िया प्रभु हैल नदी पार ।ज्योत्स्नावती रात्र्ये चलि' आइला चतुर ॥

१२२॥

तब महाप्रभु ने एक नई नाव में चढ़कर नदी को पार किया। वे चाँदनी रात में चलकर चतुर नामक नगर में जा पहुँचे।

राये तथा रहि' प्राते स्नान-कृत्य कैल।हेन-काले जगन्नाथेर महा-प्रसाद आइल ॥

१२३॥

महाप्रभु ने रात वहीं बिताई और प्रात:काल उठकर स्नान किया। उसी समय जगन्नाथजी का प्रसाद आ गया।

राजार आज्ञाय पड़िछा पाठाय दिने-दिने । बहुत प्रसाद पाठाय दिया बहु-जने ॥

१२४॥

राजा की आज्ञा के अनुसार मन्दिर का निरीक्षक प्रतिदिन काफी मात्रा में प्रसाद भेज देता था, जिसे कई लोग उठाकर लाते थे।

स्वगण-सहिते प्रभु प्रसाद अङ्गीकरि' । उठिया चलिला प्रभु बलि' ‘हरि' ‘हरि' ॥

१२५॥

प्रसाद ग्रहण करने के बाद श्री चैतन्य महाप्रभु उठ खड़े हुए और हरि! हरि! कीर्तन करते हुए चल पड़े।

रामानन्द, मर्दराज, श्री-हरिचन्दन । सङ्गे सेवा करि' चले एइ तिन जन ॥

१२६॥

रामानन्द राय, मर्दराज तथा श्री हरिचन्दन सदैव श्री चैतन्य महाप्रभु के साथ-साथ रहते और उनकी सेवा करते थे।

प्रभु-सङ्गे पुरी-गोसाजि, स्वरूप-दामोदर । जगदानन्द, मुकुन्द, गोविन्द, काशीश्वर ॥

१२७॥

हरिदास-ठाकुर, आर पण्डित-वक्रेश्वर । गोपीनाथाचार्य, आर पण्डित-दामोदर ॥

१२८॥

रामाई, नन्दाइ, आर बहु भक्त-गण ।। प्रधान कहिलँ, सबार के करे गणन ।। १२९ ॥

महाप्रभु के साथ साथ परमानन्द पुरी गोस्वामी, स्वरूप दामोदर, जगदानन्द, मुकुन्द, गोविन्द, काशीश्वर, हरिदास ठाकुर, वक्रेश्वर पण्डित, गोपीनाथ आचार्य, दामोदर पण्डित, रामाइ, नन्दाइ तथा अन्य अनेक भक्त थे। इनमें से मुख्य भक्तों के नाम मैंने गिनाये हैं। पूरी संख्या बता पाना किसी के लिए भी सम्भव नहीं है।

गदाधर-पण्डित ग्रबे सङ्क्ते चलिला ।‘क्षेत्र-सन्यास ना छाड़िह'- प्रभु निषेधिला ॥

१३०॥

जब गदाधर पण्डित महाप्रभु के साथ जाने को उद्यत हुए, तो उन्हें मना कर दिया गया और कहा गया कि वे क्षेत्र-संन्यास-व्रत का परित्याग ने करे।

पण्डित कहे, ग्राहाँ तुमि, सेइ नीलाचल ।क्षेत्र-सन्यास मोर ग्राउक रसातल ॥

१३१॥

जब गदाधर पण्डित से लौट जाने के लिए कहा गया तो वे महाप्रभु से बोले, आप जहाँ भी रहते हैं, वही जगन्नाथ पुरी है। मेरा तथाकथित क्षेत्र-संन्यास नरक में जाए।

प्रभु कहे, इँहा कर गोपीनाथ सेवन ।। पण्डित कहे,कोटि-सेवा त्वत्पाद-दर्शन ।। १३२ ।। जब श्री चैतन्य महाप्रभु ने गदाधर पण्डित से जगन्नाथ पुरी में रुक जाने तथा गोपीनाथ की सेवा करने के लिए कहा, तो गदाधर पण्डित ने उत्तर दिया, आपके चरणकमलों के दर्शन मात्र से गोपीनाथ की करोड़ बार सेवा हो जाती है।

प्रभु कहे,–सेवा छाड़िबे, आमाय लागे दोष । इँहा रहि' सेवा कर,–आमार सन्तोष ॥

१३३॥

तब श्री चैतन्य महाप्रभु ने कहा, यदि आप उनकी सेवा करना बन्द कर दोगे, तो यह मेरा दोष होगा। अतः अच्छा यही होगा कि आप यहाँ रहकर सेवा-कार्य करो। इससे मुझे सन्तोष मिलेगा।

पण्डित कहे,सब दोष आमार उपर । तोमा-सङ्गे ना ग्राइब, ग्राइब एकेश्वर ॥

१३४॥

पण्डित ने उत्तर दिया, चिन्ता न करें। सारे दोष मेरे सिर पर होंगे। लीजिये, मैं आपके साथ नहीं, अपितु अकेले जाऊँगा।

आइ'के देखिते ग्राइबे, ना ग्राइब तोमा लागि' । ‘प्रतिज्ञा'-'सेवा'-त्याग-दोष, तार आमि भागी' ॥

१३५॥

मैं शचीमाता को मिलने जाऊँगा, किन्तु आपके कारण नहीं जाऊँगा। मैं गोपीनाथ की सेवा करने के अपने व्रत को भंग करने के लिए स्वयं जिम्मेदार होऊँगा।

एत बलि' पण्डित-गोसाजि पृथक्कलिला ।।कटके आसि' प्रभु ताँरै सङ्गे आनाइला ॥

१३६॥

इस तरह गदाधर पण्डित गोस्वामी अकेले यात्रा पर निकले, किन्तु जब वे सभी लोग कटक पहुँचे तो श्री चैतन्य महाप्रभु ने उन्हें बुला लिया और वे महाप्रभु के साथ हो गए।

पण्डितेर गौराङ्ग-प्रेम बुझन ना ग्राय ।।‘प्रतिज्ञा', 'श्री-कृष्ण-सेवा' छाड़िल तृण-प्राय ॥

१३७॥

गदाधर पण्डित तथा श्री चैतन्य महाप्रभु के बीच के प्रेम की घनिष्ठता को कोई नहीं समझ सकता। गदाधर पण्डित ने अपनी प्रतिज्ञा तथा गोपीनाथ की सेवा का उसी तरह परित्याग कर दिया, जिस तरह कोई तिनके के टुकड़े को त्याग देता है।

ताँहार चरित्रे प्रभु अन्तरे सन्तोष । ताँहार हाते धरि' कहे करि' प्रणय-रोष ॥

१३८॥

गदाधर पण्डित का आचरण श्री चैतन्य महाप्रभु के हृदय को अत्यन्त मोहक लगा। फिर भी महाप्रभु ने उनका हाथ पकड़कर प्रेममय क्रोध प्रदर्शित करते हुए कहा।

प्रतिज्ञा', 'सेवा' छाड़िबे,—ए तोमार ‘उद्देश' ।से सिद्ध हइल—छाड़ि' आइला दूर देश ॥

१३९॥

| तुमने गोपीनाथ की सेवा छोड़ी है और पुरी में रहने की अपनी प्रतिज्ञा भंग की है। चूंकि तुम इतनी दूर निकल आये हो, अतएव वह सब अब पूर्ण हो गया।

आभार सङ्गे रहिते चाह,वाञ्छ निज-सुख ।तोमार दुइ धर्म ग्राय,—आमार हय ‘दुःख' ॥

१४० ।। मेरे साथ जाने की तुम्हारी इच्छा तुम्हारे द्वारा इन्द्रियतृप्ति कीअभिलाषा मात्र है। इस तरह तुम दो धार्मिक सिद्धान्तों को तोड़ रहे हो, जिसके कारण मैं अत्यन्त दुःखी हूँ।

मोर सुख चाह यदि, नीलाचले चल ।आमार शपथ, यदि आर किछु बल ॥

१४१॥

यदि तुम मेरी प्रसन्नता चाहते हो, तो तुम नीलाचल लौट जाओ। यदि इस विषय में तुम कुछ अधिक कहोगे तो तुम मेरी निन्दा ही करोगे।

एत बलि' महाप्रभु नौकाते चड़िला ।मूर्च्छित हा पण्डित तथाई पड़िला ॥

१४२॥

यह कह कर श्री चैतन्य महाप्रभु नाव में चढ़ गये और गदाधर पण्डित तुरन्त ही मूर्च्छित होकर जमीन पर गिर पड़े।

पण्डिते ला ग्राइते सार्वभौमे आज्ञा दिला ।। भट्टाचार्य कहे,—उठ, ऐछे प्रभुर लीला ॥

१४३ ॥

श्री चैतन्य महाप्रभु ने सार्वभौम भट्टाचार्य को आदेश दिया कि वे अपने साथ गदाधर पण्डित को लेते जाएँ। अतएव भट्टाचार्य ने गदाधर पण्डित से कहा, उठो! श्री चैतन्य महाप्रभु की लीलाएँ ऐसी ही हैं।

तुमि जान, कृष्ण निज-प्रतिज्ञा छाड़िला । भक्त कृपा-वशे भीष्मेर प्रतिज्ञा राखिला ॥

१४४॥

तुम जानते हो कि भगवान् कृष्ण ने भीष्म पितामह की प्रतिज्ञा रखने के लिए स्वयं अपनी प्रतिज्ञा का उल्लंघन किया।

स्व-निगममपहाय मत्प्रतिज्ञाम् | ऋतमधिकर्तुमवप्लुतो रथ-स्थः । धृत-रथ-चरणोऽभ्ययाच्चलद्गुर्हरिरिव हन्तुमिभं गतोत्तरीयः ॥

१४५ ॥

मेरी प्रतिज्ञा को सत्य बनाने के लिए भगवान् कृष्ण ने कुरुक्षेत्र में अस्त्र ग्रहण न करने की अपनी खुद की प्रतिज्ञा तोड़ दी। उनका उत्तरीय वस्त्र नीचे गिर रहा था, तभी वे अपने रथ से कूद पड़े, रथ का पहिया उठा लिया और मुझे मारने के लिए दौड़ते हुए आये। वे मुझ पर उसी तरह झपटे, जिस तरह सिंह हाथी को मारने के लिए झपटता है। उन्होंने सारी पृथ्वी को हिला दिया।'

एइ-मत प्रभु तोमार विच्छेद सहिया ।तोमार प्रतिज्ञा रक्षा कैल ग्रल करिया ।। १४६ ।। इसी तरह तुम्हारा वियोग सहते हुए श्री चैतन्य महाप्रभु ने बड़े यत्न से तुम्हारे व्रत की रक्षा की है।

एइ-मत कहि' ताँरे प्रबोध करिला ।। दुइ-जने शोकाकुल नीलाचले आइला ॥

१४७॥

इस तरह से सार्वभौम भट्टाचार्य ने गदाधर पण्डित में प्राण संचार किया। फिर दोनों अत्यन्त शोकाकुल होकर जगन्नाथ पुरी अर्थात् नीलाचल वापस चले आये।

प्रभु लागि' धर्म-कर्म छाड़े भक्त-गण । भक्त-धर्म-हानि प्रभुर ना हय सहन ॥

१४८॥

श्री चैतन्य महाप्रभु के निमित्त सारे भक्त अपने सभी तरह के कार्य छोड़ देते थे। फिर भी महाप्रभु नहीं चाहते थे कि भक्तगण अपने वचनबद्ध कर्तव्यों को छोड़ दें।

‘प्रेमेर विवर्त' इहा शुने ग्रेइ जन ।। अचिरे मिलिये ताँरै चैतन्य-चरण ॥

१४९॥

ये सब प्रेम के विरोधाभास हैं। जो कोई भी इन घटनाओं को सुनता है, उसे शीघ्र ही श्री चैतन्य महाप्रभु के चरणकमलों की शरण प्राप्त हो जाती है।

दुइ राज-पात्र येइ प्रभु-सङ्गे ग्राय ।‘ग्राजपुर' आसि' प्रभु तारे दिलेन विदाय ॥

१५०॥

जब श्री चैतन्य महाप्रभु तथा उनकी टोली याजपुर पहुँची, तो महाप्रभु ने उन दोनों सरकारी अधिकारियों को लौट जाने के लिए कहा, जो उनके साथ आये थे।

प्रभु विदाय दिल, राय याय ताँर सने । कृष्ण-कथा रामानन्द-सने रात्रि-दिने ॥

१५१॥

श्री चैतन्य महाप्रभु ने अधिकारियों को विदा कर दिया, किन्तु रामानन्द राय उनके साथ बने रहे। महाप्रभु रामानन्द राय से दिन-रात श्रीकृष्ण के विषय में बातें करते।।

प्रति-ग्रामे राज-आज्ञाय राज-भृत्य-गण । नव्य गृहे नाना-द्रव्ये करये सेवन ॥

१५२॥

राजा के आदेशानुसार सरकारी अधिकारियों ने गाँव-गाँव में नये घर बनवा दिये और हर एक में अन्न का संग्रह कर दिया। इस तरह उन्होंने महाप्रभु की सेवा की।

एइ-मत चलि' प्रभु ‘रेमुणा' आइला ।तथा हैते रामानन्द-राये विदाय दिला ॥

१५३॥

अन्त में श्री चैतन्य महाप्रभु रेमुणा पहुँचे, जहाँ से उन्होंने श्री रामानन्द राय को भी विदा किया।

भूमेते पड़िला राय नाहिक चेतन ।।राये कोले करि' प्रभु करये क्रन्दन ॥

१५४॥

जब रामानन्द राय बेहोश होकर भूमि पर गिर गये, तो श्री चैतन्य महाप्रभु उन्हें अपनी गोद में लेकर विलाप करने लगे।

रायेर विदाय-भाव ना याय सहन । कहिते ना पारि एइ ताहार वर्णन ॥

१५५॥

रामानन्द राय से वियोग के कारण महाप्रभु की भावनाओं का वर्णन कर पाना अत्यन्त कठिन है। यह प्रायः असह्य है, अतएव मैं इसके आगे वर्णन नहीं कर सकता।

तबे ‘ओढू-देश-सीमा' प्रभु चलि' आइला ।। तथा राज-अधिकारी प्रभुरे मिलिला ॥

१५६॥

जब श्री चैतन्य महाप्रभु अन्त में उड़ीसा राज्य की सीमा पर आ पहुँचे, तो एक सरकारी अधिकारी उनसे मिलने आया।

दिन दुइ-चारि तेंहो करिल सेवन ।आगे चलिबारे सेइ कहे विवरण ॥

१५७॥

वह सरकारी अधिकारी दो-चार दिन तक उनकी सेवा करता रहा। उसने महाप्रभु को आगे की विस्तृत जानकारी भी दी।

मद्यप झवन-राजार आगे अधिकार । ताँर भये पथे केह नारे चलिबार ॥

१५८॥

उसने महाप्रभु को बतलाया कि आगे का भूभाग एक शराबी मुस्लिम गवर्नर द्वारा शासित है। उस राजा के भय से लोग मार्ग पर स्वतन्त्र होकर चल नहीं सकते।

पिछलदा पर्यन्त सब ताँर अधिकार ।। ताँर भये नदी केह हैते नारे पार ॥

१५९॥

मुस्लिम सरकार की सीमा पिछलदा तक है। मुसलमानों के भय से कोई भी व्यक्ति नदी पार नहीं करता था।

दिन कत रह–सन्धि करि ताँर सने । तबे सुखे नौकाते कराइब गमने ॥

१६०॥

महाराज प्रतापरुद्र के सरकारी अधिकारी ने श्री चैतन्य महाप्रभु को यह भी बतलाया कि उन्हें कुछ दिन तक उड़ीसा की सीमा में रुकना चाहिए, जिससे मुस्लिम गवर्नर से शान्तिपूर्ण समझौता किया जा सके। इस तरह महाप्रभु नाव से नदी को शान्तिपूर्वक पार कर सकेंगे।

सेइ काले से यवनेर एक अनुचर । 'उड़िया-कटके' आइल करि' वेशान्तर ॥

१६१॥

उसी समय मुस्लिम गवर्नर का एक सेवक वेश बदलकर उड़ीसा के खेमे ( शिविर ) में आया।

प्रभुर सेइ अदभुत चरित्र देखियो । हिन्दु-चर कहे सेइ ग्रवन-पाश गिया ॥

१६२॥

‘एक सन्यासी आइल जगन्नाथ हइते ।। अनेक सिद्ध-पुरुष हय ताँहार सहिते ॥

१६३॥

उस मुस्लिम जासूस ने श्री चैतन्य महाप्रभु के अद्भुत गुण देखे और उसने मुस्लिम गवर्नर के पास लौटने पर बतलाया, एक संन्यासी अनेक सिद्ध पुरुषों के साथ जगन्नाथ पुरी से आया है।

निरन्तर करे सबे कृष्ण-सङ्कीर्तन । सबे हासे, नाचे, गाय, करये क्रन्दन ॥

१६४॥

ये सारे सन्त महात्मा निरन्तर हरे कृष्ण महामन्त्र का कीर्तन करते हैं। और सभी हँसते, नाचते, गाते तथा रोते हैं।

लक्ष लक्ष लोक आइसे ताहा देखिबारे । ताँरै देखि' पुनरपि ग्राइते नारे घरे ॥

१६५॥

उन्हें देखने के लिए लाखों की संख्या में लोग आते हैं और एक बार देख लेने के बाद वे अपने घर वापस जाने का नाम नहीं लेते।

सेइ सब लोक हय बाउलेर प्राय ।।'कृष्ण' कहि' नाचे, कान्दे, गड़ागड़ि ग्राय ॥

१६६॥

ये सारे लोग पागल जैसे हो जाते हैं। वे केवल कृष्ण के पवित्र नाम का कीर्तन करते हैं तथा नाचते हैं। कभी-कभी वे रोते भी हैं और भूमि पर लोटते हैं।

कहिबार कथा नहे देखिले से जानि ।। ताँहार प्रभावे ताँरे 'ईश्वर' करि' मानि' ॥

१६७॥

वस्तुतः इन बातों का वर्णन भी नहीं किया जा सकता। केवल देखकर ही उन्हें समझा जा सकता है। उसके प्रभाव को देखकर मैं उन्हें भगवान् मानता हूँ।

एत कहि' सेइ चर ‘हरि' 'कृष्ण' गाय ।।हासे, कान्दे, नाचे, गाय बाउलेर प्राय ॥

१६८॥

यह कहने के बाद वह सन्देशवाहक हरि तथा कृष्ण के नाम का कीर्तन करने लगा। वह हँसने, रोने, नाचने तथा उन्मत्त की तरह गाने भी लगा।

एत शुनि' ग्रवनेर मन फिरि' गेल ।आपन-'विश्वास' उड़िया स्थाने पाठाइल ॥

१६९॥

यह सुनकर मुस्लिम गवर्नर का मन फिर गया। तब उसने अपने निजी सचिव को उड़ीसा शासन के प्रतिनिधि के पास भेजा।

'विश्वास' आसिया प्रभुर चरण वन्दिल ।‘कृष्ण' 'कृष्ण' कहि' प्रेमे विह्वल हइल ॥

१७० ॥

वह मुस्लिम सचिव श्री चैतन्य महाप्रभु को देखने आया। जब उसने महाप्रभु के चरणकमलों पर अपना सादर नमस्कार निवेदन किया और कृष्ण, कृष्ण के पवित्र नाम का उच्चारण किया, तो वह भी प्रेमभाव में विह्वल हो गया।

धैर्य हा उड़ियाके कहे नमस्करि' ।‘तोमा-स्थाने पाठाइला म्लेच्छ अधिकारी ॥

१७१॥

शान्त होने पर मुस्लिम सचिव ने अभिवादन करने के बाद उड़ीसा सरकार के प्रतिनिधि को सूचित किया, मुस्लिम गवर्नर ने मुझे यहाँ भेजा है।

तुमि यदि आज्ञा देह' एथाके आसिया । ग्रवन अधिकारी ग्राय प्रभुके मिलिया ॥

१७२॥

यदि आप सहमत हों, तो मुस्लिम गवर्नर श्री चैतन्य महाप्रभु से मिलने यहाँ पर आयें और फिर लौट जाएँ।

बहुत उत्कण्ठा ताँर, कर्नाछे विनय ।तोमा-सने एइ सन्धि, नाहि झुद्ध-भय' ॥

१७३ ॥

मुस्लिम गवर्नर अत्यन्त उत्सुक हैं और उन्होंने आदरपूर्वक निवेदन किया है। यह शान्ति का प्रस्ताव है। आप डरें नहीं कि हम युद्ध करेंगे।

शुनि' महा-पात्र कहे हा विस्मय ।‘मद्यप ग्रवनेर चित्त ऐछे के करय! ॥

१७४॥

| यह प्रस्ताव सुनकर उड़ीसा सरकार का प्रतिनिधि महापात्र अत्यन्त विस्मित हुआ। उसने सोचा, यह मुस्लिम गवर्नर तो शराबी है। उसके मन को किसने बदल दिया है? आपने महाप्रभु ताँर मन फिराइल ।। दर्शन-स्मरणे याँर जगत्तारिल' ॥

१७५ ॥

अवश्य ही स्वयं श्री चैतन्य महाप्रभु ने इस मुसलमान के मन को बदला होगा। उनकी उपस्थिति एवं उनके स्मरण मात्र से सारे संसार का उद्धार हो जाता है।

एत बलि' विश्वासेरे कहिल वचन ।भाग्य ताँर—आसि' करुक प्रभु दरशन ।। १७६॥

यह सोचकर महापात्र ने मुस्लिम सचिव को तुरन्त बतलाया, यह तो तुम्हारे गवर्नर का बड़ा भाग्य है। उससे कहो कि वे आकर चैतन्य महाप्रभु का दर्शन करें।

प्रतीत करिये—-यदि निरस्त्र हा ।। आसिबेक पाँच-सात भृत्य सङ्गे लञा? ॥

१७७॥

किन्तु मैं स्पष्ट कर देना चाहता हूँ कि उन्हें यहाँ बिना हथियार के आना चाहिए। हाँ, वे अपने साथ पाँच-सात सेवक ला सकते हैं।

विश्वास' याञा ताँहारे सकल कहिल ।।हिन्दु-वेश धरि' सेइ ग्रवन आइल ॥

१७८॥

वह सचिव लौटकर मुस्लिम गवर्नर के पास गया और उसे यह समाचार दिया। तब वह मुस्लिम गवर्नर हिन्दू-वेश धारण करके श्री चैतन्य महाप्रभु को देखने आया।

दूर हैते प्रभु देखि' भूमेते पड़िया ।।दण्डवत्करे अश्रु-पुलकित हो ॥

१७९॥

दूर से ही श्री चैतन्य महाप्रभु को देखकर मुस्लिम गवर्नर ने भूमि परगिरकर नमस्कार किया। उसकी आँखों में आँसू आ गये और भावाविष्ट होने के कारण वह पुलकित हो उठा।

महा-पात्र आनिल ताँरे करिया सम्मान ।।ग्रोड़-हाते प्रभु-आगे लय कृष्ण-नाम ॥

१८०॥

इस तरह महापात्र मुस्लिम गवर्नर को आदरपूर्वक श्री चैतन्य महाप्रभु के समक्ष ले गया। तब वह गवर्नर हाथ जोड़कर महाप्रभु के समक्ष खड़ा हो गया और कृष्ण के पवित्र नाम का कीर्तन करने लगा।

अधम ग्रवन-कुले केन जन्म हैल ।।विधि मोरे हिन्दु-कुले केन ना जन्माइल ॥

१८१॥

तब गवर्नर ने विनीत भाव से पूछा, “मेरा जन्म मुस्लिम परिवार में क्यों हुआ? यह अधम जन्म माना जाता है। विधाता ने मुझे हिन्दू परिवार में क्यों नहीं जन्म लेने दिया? ‘हिन्दु' हैले पाइताम तोमार चरण-सन्निधान ।व्यर्थ मोर एइ देह, ग्राउक पराण ॥

१८२॥

यदि मेरा जन्म हिन्दू परिवार में हुआ होता, तो मेरे लिए आपके चरणकमलों के निकट रहना आसान हुआ होता। चूंकि अब मेरा शरीर व्यर्थ है, अतएव मुझे तुरन्त मर जाना चाहिए।

एत शुनि' महा-पात्र आविष्ट हा ।प्रभुके करेन स्तुति चरणे धरिया ॥

१८३॥

गवर्नर की विनीत बात सुनकर महापात्र को हर्षातिरेक हो आया। उसने श्री चैतन्य महाप्रभु के चरणकमल पकड़ लिए और निम्नलिखित स्तुति करनी प्रारम्भ की।

‘चण्डाल–पवित्र ग्राँर श्री-नाम-श्रवणे ।।हेन-तोमार एई जीव पाइल दरशने ॥

१८४॥

आपका पवित्र नाम सुनने मात्र से अधम चण्डाल भी पवित्र हो । जाता है। इस बद्धजीव को आपका दर्शन अब जाकर मिला है।

इँहार ये एई गति, इथे कि विस्मय? ।। तोमार दर्शन-प्रभाव एइ-मत हय' ॥

१८५॥

इसमें आश्चर्य की क्या बात यदि इस मुस्लिम गवर्नर को ऐसी गति प्राप्त हुई। आपके दर्शन मात्र से यह सब सम्भव है।

ग्रन्नामधेय-श्रवणानुकीर्तनाद्ग्रत्प्रङ्खणाद् यत्स्मरणादपि क्वचित् ।। श्वादोऽपि सद्यः सवनाय कल्पते ।कुतः पुनस्ते भगवन्नु दर्शनात् ॥

१८६॥

उन व्यक्तियों की आध्यात्मिक उन्नति के बारे में तो कुछ कहना ही। नहीं, जो भगवान् का प्रत्यक्ष साक्षात्कार करते हैं। यदि चण्डाल-परिवार में उत्पन्न व्यक्ति भी एक बार भगवान् के पवित्र नाम का उच्चारण करता है, या उनका कीर्तन करता है, उनकी लीलाओं का श्रवण करता है, उन्हें नमस्कार करता है या उनका स्मरण भी करता है, तो वह तुरन्त वैदिक यज्ञ करने का अधिकारी बन जाता है।

तबे महाप्रभु ताँरे कृपा-दृष्टि करि' ।आश्वासिया कहे, तुमि कह 'कृष्ण' ‘हरि' ॥

१८७॥

तब श्री चैतन्य महाप्रभु ने उस मुस्लिम गवर्नर पर अपनी कृपादृष्टि डाली। उसे आश्वासन देते हुए उन्होंने उससे कृष्ण तथा हरि के पवित्र नामों का कीर्तन करने के लिए कहा।

सेइ कहे,–'मोरे यदि कैला अङ्गीकार ।।एक आज्ञा देह, सेवा करि ये तोमार ॥

१८८ ॥

तब मुस्लिम गवर्नर ने कहा, चूंकि आपने मुझे कृपा करके अपनाया है, अतः आप कृपया कोई आदेश दें, जिससे मैं आपकी सेवा कर सकें।

गो-ब्राह्मण-वैष्णवे हिंसा कर्माछि अपार ।।सेइ पाप हइते मोर हउक निस्तार ॥

१८९॥

तब उस मुस्लिम गर्वनर ने उन असंख्य पापकर्मों के फलों से अपनी मुक्ति के लिए प्रार्थना की, जिसे उसने इसके पूर्व ब्राह्मणों तथा वैष्णवों के प्रति ईष्र्यालु रहकर तथा गौवों की हत्या करके अर्जित किया था।

तबे मुकुन्द दत्त कहे,–'शुन, महाशय । गङ्गा-तीर ग्राइते महाप्रभुर मन हय ॥

१९०॥

तब मुकुन्द दत्त ने मुस्लिम गवर्नर से कहा, हे महोदय, कृपया सुनें। श्री चैतन्य महाप्रभु गंगा नदी के तट तक जाना चाहते हैं।

ताहाँ ग्राइते कर तुमि सहाय-प्रकार ।एइ बड़ आज्ञा, एई बड़ उपकार' ॥

१९१॥

आप उनकी सहायता करें, जिससे वे वहाँ जा सकें। आपके लिए यही पहला बड़ा आदेश है और यदि आप इसे पूरा कर दें, तो आप द्वारा यह महान् सेवा होगी।

तबे सेइ महाप्रभुर चरण वन्दिया । सबार चरण वन्दि' चले हृष्ट हा ॥

१९२ ॥

इसके बाद मुस्लिम गवर्नर ने श्री चैतन्य महाप्रभु के साथ ही साथउनके सारे भक्तों के चरणकमलों की वन्दना की और फिर चला गया। वह अत्यधिक सन्तुष्ट था।

महा-पात्र ताँर सने कैले कोलाकुलि।अनेक सामग्री दिया करिल मितालि ॥

१९३॥

गवर्नर के विदा होने के पूर्व महापात्र ने उसका आलिगंन किया और उसे अनेक वस्तुएँ भेंट में दीं। इस तरह उसने उसके साथ मित्रता स्थापित कर ली।

प्रातः-काले सेइ बहु नौका साजा ।।प्रभुके आनिते दिल विश्वास पाठा ॥

१९४॥

अगले दिन प्रात:काल उस गवर्नर ने अपने सचिव को अनेक अच्छी तरह सजी हुई नावों के साथ महाप्रभु को नदी के उस पार ले जाने के लिए। भेजा।

महा-पात्र चलि' आइला महाप्रभुर सने ।।म्लेच्छ आसि' कैल प्रभुर चरण वन्दने ॥

१९५॥

महापात्र ने श्री चैतन्य महाप्रभु के साथ नदी पार की और जब वे दूसरे किनारे पर पहुँच गये तो मुस्लिम गवर्नर ने स्वयं महाप्रभु की अगवानी की और उनके चरणकमलों की पूजा की।

एक नवीन नौका, तार मध्ये घर ।।स्व-गणे चड़ाइला प्रभु ताहार उपर ॥

१९६॥

नावों में से एक नाव नई बनवाई हुई थी, जिसके बीच एक कमरा बना था। उन्होंने श्री चैतन्य महाप्रभु तथा उनके संगियों को उसी नाव में बैठा दिया।

महा-पात्रे महाप्रभु करिला विदाय ।।कान्दिते कान्दिते सेइ तीरे रहि' चाय ॥

१९७।। अन्त में श्री चैतन्य महाप्रभु ने महापात्र को भी विदा किया। महापात्र नदी के तट पर खड़े होकर नाव की ओर देख-देखकर रोने लगा।

जल-दस्यु-भये सेइ ग्रवन चलिल ।दश नौका भरि' बहु सैन्य सङ्गे निल ॥

१९८॥

तब स्वयं मुस्लिम गवर्नर श्री चैतन्य महाप्रभु के साथ चल पड़ा। गवर्नर ने समुद्री डाकुओं के कारण साथ में दस नावें ले लीं, जिनमें अनेक सैनिक सवार थे।

‘मन्त्रेश्वर'-दुष्ट-नदे पार कराइल ।।‘पिछल्दा' पर्यन्त सेइ ग्रवन आइल ॥

१९९॥

मुस्लिम गवर्नर श्री चैतन्य महाप्रभु के साथ मन्त्रेश्वर के आगे तक गया। यह स्थान डाकुओं के कारण अत्यन्त खतरनाक था। वह महाप्रभु को पिछल्दा नामक स्थान ले गया, जो मन्त्रेश्वर के निकट ही था।

ताँरे विदाय दिल प्रभु सेइ ग्राम हैते । से-काले ताँर प्रेम-चेष्टा ना पारि वर्णिते ॥

२०० ॥

अन्त में श्री चैतन्य महाप्रभु ने गवर्नर को भी विदा दी। गवर्नर द्वारा प्रदर्शित प्रेमभाव का वर्णन नहीं किया जा सकता है।

अलौकिक लीला करे श्री कृष्ण-चैतन्य । ग्रेइ इहा शुने ताँर जन्म, देह धन्य । २०१॥

श्री चैतन्य महाप्रभु की लीलाएँ अलौकिक हैं। जो भी इन कार्यकलापों को सुनता है, वह धन्य हो जाता है और उसका जीवन पूर्ण हो जाता है।

सेइ नौका चड़ि' प्रभु आइला 'पानिहाटि' ।।नाविकेरे पराइल निज-कृपा-साटी ॥

२०२॥

महाप्रभु अन्ततः पानिहाटि पहुँचे और उन्होंने नाव चलाने वाले को कृपा-कृत्य के रूप में अपना वस्त्र दे दिया।

‘प्रभु आइला' बलि' लोके हैल कोलाहले ।मनुष्य भरिल सब, किबा जल, स्थल । २०३ ॥

पानिहाटि गंगा-तट पर आया हुआ था। श्री चैतन्य महाप्रभु के आगमन का समाचार सुनकर सभी तरह के लोग स्थल पर तथा जल में एकत्र हो गये।

राघव-पण्डित आसि' प्रभु ला गेला ।।पथे ग्राइते लोक-भिड़े कष्टे-सृष्ट्ये आइला ॥

२०४॥

आखिरकार श्री चैतन्य महाप्रभु को राघव पण्डित अपने साथ ले गये। रास्ते-भर काफी भीड़ इकट्ठी हो गई थी, जिससे महाप्रभु बड़ी कठिनाई से राघव पण्डित के घर पहुँच पाये।

एक-दिन प्रभु तथा करिया निवास ।।प्राते कुमारहट्टे आइला,—ग्राहाँ श्रीनिवास ॥

२०५॥

महाप्रभु श्री राघव पण्डित के घर केवल एक दिन ठहरे। अगले दिन प्रातःकाल वे कुमारहट्ट गये, जहाँ श्रीवास ठाकुर रहते थे।

ताहाँ हैते आगे गेला शिवानन्द-घर । वासुदेव-गृहे पाछे आइला ईश्वर ॥

२०६॥

श्रीवास ठाकुर के घर से चलकर महाप्रभु शिवानन्द सेन के घर गये और बाद में वासुदेव दत्त के घर गये।

वाचस्पति-गृहे' प्रभु प्रेमते रहिला । लोक-भिड़ भये ग्रैछे 'कुलिया' आइला ॥

२०७।। महाप्रभु कुछ समय तक विद्यावाचस्पति के घर पर रहे, किन्तु वहाँ पर काफी भीड़ थी अतएव वे कुलिया चले गये।।

माधव-दास-गृहे तथा शचीर नन्दन । लक्ष-कोटि लोक तथा पाइल दरशन ॥

२०८॥

जब महाप्रभु माधवदास के घर पर ठहरे, तो लाखों-करोड़ों लोग उनका दर्शन करने आये।

सात दिन रहि' तथा लोक निस्तारिला । सब अपराधि-गणे प्रकारे तारिला ॥

२०९॥

महाप्रभु वहाँ सात दिनों तक रुके रहे और उन्होंने सभी तरह के अपराधियों तथा पापियों का उद्धार किया।

‘शान्तिपुराचार्य'-गृहे ऐछे आइला । शची-माता मिलि' ताँर दुःख खण्डाइला ॥

२१०॥

कुलिया छोड़ने के बाद श्री चैतन्य महाप्रभु शान्तिपुर में अद्वैत आचार्य के घर गये। यहीं पर उनकी माता शचीमाता उनसे मिलीं और उनका महान् दुःख दूर हुआ।

तबे ‘रामकेलि'-ग्रामे प्रभु त्रैछे गेला ।।'नाटशाला' हैते प्रभु पुनः फिरि' आइला ॥

२११॥

इसके बाद महाप्रभु रामकेलि गाँव तथा कानाइ नाटशाला नामक स्थान गये। वहाँ से वे शान्तिपुर लौट आये।

शान्तिपुरे पुनः कैल दश-दिन वास ।।विस्तारि' वर्णियाछेन वृन्दावन-दास ॥

२१२॥

श्री चैतन्य महाप्रभु शान्तिपुर में दस दिनों तक रुके। इसका विस्तृत वर्णन वृन्दावन दास ठाकुर ने किया है।

अतएव इहाँ तार ना कैहुँ विस्तार ।।पुनरुक्ति हय, ग्रन्थ बाड़ये अपार ॥

२१३॥

मैं इन घटनाओं का वर्णन नहीं करूंगा, क्योंकि वृन्दावन दास ठाकुरद्वारा ये पहले ही वर्णित हो चुकी हैं। उसी बात को दुहराने की आवश्यकता नहीं है, क्योंकि इसे दोहराने से इस ग्रंथ का आकार बढ़कर असीम हो जायेगा।

तार मध्ये मिलिला ग्रैछे रूप-सनातन । नृसिंहानन्द कैल ग्रैछे पथेर साजन ॥

२१४॥

सूत्र-मध्ये सेइ लीला आमि त' वर्णिलँ।।अतएव पुनः ताहा इहाँ ना लिखिलें ॥

२१५ ॥

इन वर्णनों से पता चलता है कि श्री चैतन्य महाप्रभु किस तरह रूप तथा सनातन बन्धुओं से मिले और किस तरह नृसिंहानन्द ने मार्ग सजाया। मैं पहले ही इस पुस्तक के संक्षिप्त विवरण में इनका वर्णन कर चुका हूँ, अतएव मैं उनको फिर से नहीं दुहराऊँगा।

पुनरपि प्रभु यदि ‘शान्तिपुर' आईला । रघुनाथ-दास आसि' प्रभुरे मिलिला ॥

२१६॥

जब श्री चैतन्य महाप्रभु शान्तिपुर लौटे, तब रघुनाथ दास उनसे मिलने आये।

‘हिरण्य’, ‘गोवर्धन',—दुइ सहोदर ।।सप्तग्रामे बार-लक्ष मुद्रार ईश्वर ॥

२१७॥

सप्तग्राम के निवासी हिरण्य तथा गोवर्धन नामक दो भाइयों की वार्षिक आय बारह लाख रुपये थी।

महैश्वर्य-मुक्त हे वदान्य, ब्रह्मण्य ।। सदाचारी, सत्कुलीन, धार्मिकाग्रगण्य ॥

२१८॥

हिरण्य तथा गोवर्धन मजुमदार दोनों ही अत्यन्त ऐश्वर्यवान तथा वदान्य थे। वे सदाचारी और ब्राह्मण संस्कृति को समर्पित थे। वे सम्माननीय कुलीन परिवार के थे और धार्मिकों में उनका प्रमुख स्थान था।

नदीया-वासी, ब्राह्मणेर उपजीव्य-प्राय । अर्थ, भूमि, ग्राम दिया करेन सहाय ॥

२१९॥

नदिया के रहने वाले प्रायः सारे ब्राह्मण हिरण्य तथा गोवर्धन के दान पर आश्रित थे, क्योंकि वे उन्हें धन, भूमि तथा गाँव देते थे।

नीलाम्बर चक्रवर्ती–आराध्य देंहार । चक्रवर्ती करे मुँहाय 'भ्रातृ'-व्यवहार ॥

२२०॥

श्री चैतन्य महाप्रभु के नाना नीलाम्बर चक्रवर्ती इन दोनों के द्वारा पूजित थे, किन्तु नीलाम्बर चक्रवर्ती उनके साथ अपने भाइयों जैसा व्यवहार करते थे।

मिश्र-पुरन्दरेर पूर्वे कर्याछेन सेवने । अतएव प्रभु भाल जाने दुइ-जने ॥

२२१॥

पहले ये दोनों भाई श्री चैतन्य महाप्रभु के पिता मिश्र पुरन्दर की काफी सेवा कर चुके थे। इसीलिए महाप्रभु इन्हें भलीभाँति जानते थे।

सेइ गोवर्धनेर पुत्र---रघुनाथ दास । बाल्यकाल हैते तेंहो विषये उदास ॥

२२२॥

रघुनाथ दास गोवर्धन मजुमदार के पुत्र थे। वे बचपन से ही भौतिक भोगों की ओर अनासक्त रहते थे।

सन्यास करि' प्रभु ग्रबे शान्तिपुर आइला ।तबे आसि' रघुनाथ प्रभुरे मिलिला ॥

२२३ ॥

जब श्री चैतन्य महाप्रभु संन्यास ग्रहण करने के बाद शान्तिपुर वापस आये, तब रघुनाथ दास उनसे मिले थे।

प्रभुर चरणे पड़े प्रेमाविष्ट हा ।। प्रभु पाद-स्पर्श कैल करुणा करिया ॥

२२४॥

जब रघुनाथ दास श्री चैतन्य महाप्रभु से भेंट करने गये, तो वे प्रेमवश महाप्रभु के चरणकमलों पर गिर पड़े। महाप्रभु ने उन पर कृपा दिखाते हुए उन्हें अपने चरणों से छू दिया।

ताँर पिता सदा करे आचार्य-सेवन । अतएव आचार्य ताँरै हैला परसन्न ॥

२२५॥

रघुनाथ दास के पिता गोवर्धन सदैव ही अद्वैत आचार्य की अत्यधिक सेवा करते थे। फलतः अद्वैत आचार्य भी इस परिवार से अत्यन्त प्रसन्न थे।

आचार्य-प्रसादे पाइल प्रभुर उच्छिष्ट-पाते ।।प्रभुर चरण देखे दिन पाँच-सात ॥

२२६॥

जब रघुनाथ दास वहाँ रहते, तो अद्वैत आचार्य उन्हें महाप्रभु द्वारा छोड़ा गया भोजन दिया करते थे। इस तरह रघुनाथ दास पाँच-सात दिनों तक महाप्रभु के चरणकमलों की सेवा में लगे रहे।

प्रभु ताँरे विदाय दिया गेला नीलाचल । तेहो घरे आसि' हैला प्रेमेते पागल ॥

२२७॥

रघुनाथ दास को विदा करके श्री चैतन्य महाप्रभु जगन्नाथ पुरी लौट आये। घर लौटकर रघुनाथ दास प्रेम के भावावेश में पागल हो उठे।

बार बार पलाय तेहो नीलाद्रि ग्राइते ।। पिता ताँरै बान्धि' राखे अनि' पथ हैते ॥

२२८॥

रघुनाथ दास जगन्नाथ पुरी जाने के लिए घर से बारम्बार भागते रहते थे, किन्तु उनके पिता उन्हें बाँध रखते और वापस लाते रहते।

पञ्च पाइक तौरै राखे रात्रि-दिने । चारि सेवक, दुइ ब्राह्मण रहे ताँर सने ॥

२२९॥

उनके पिता ने उनकी रात-दिन रखवाली करने के लिए पाँच चौकीदार नियुक्त कर रखे थे। उनकी सुख-सुविधा देखने के लिए चार नौकर और उनके लिए भोजन बनाने के लिए दो ब्राह्मण नियुक्त कर रखे थे।

एकादश जन ताँरे राखे निरन्तर ।नीलाचले ग्राइते ना पाय, दुःखित अन्तर ॥

२३०॥

इस तरह ग्यारह व्यक्ति रघुनाथ दास को निरन्तर वश में रखते थे। इस तरह वे जगन्नाथ पुरी नहीं जा सके, फलत: वे अत्यन्त दुःखी रहते थे।

एबे यदि महाप्रभु 'शान्तिपुर' आइला । शुनिया पितारे रघुनाथ निवेदिला ॥

२३१॥

जब रघुनाथ दास को पता चला कि श्री चैतन्य महाप्रभु शान्तिपुर पधारे हैं, तो उन्होंने अपने पिता से निवेदन किया।

आज्ञा देह', माजा देखि प्रभुर चरण । अन्यथा, ना रहे मोर शरीरे जीवन ॥

२३२॥

रघुनाथ दास ने अपने पिता से पूछा, कृपा करके मुझे महाप्रभु के चरणकमलों का दर्शन करने की अनुमति दें। यदि आप ऐसा नहीं करेंगे, तो मेरे प्राण इस शरीर के भीतर नहीं रह पायेंगे।

शुनि' ताँर पिता बहु लोक-द्रव्य दिया । पाठाइल बलि’ ‘शीघ्र आसिह फिरिया' ॥

२३३॥

यह विनती सुनकर रघुनाथ दास के पिता सहमत हो गये। अनेक नौकर तथा सामग्री देकर पिता ने अपने पुत्र को श्री चैतन्य महाप्रभु का दर्शन करने के लिए यह कहकर भेजा कि वह शीघ्र ही लौट आये।

सात दिन शान्तिपुरे प्रभु-सङ्गे रहे।रात्रि-दिवसे एइ मनः-कथा कहे ॥

२३४॥

रघुनाथ दास शान्तिपुर में सात दिन तक श्री चैतन्य महाप्रभु के संग में रहे। उस अवधि में रात-दिन उनके मन में निम्नलिखित विचार घुमड़ते रहे।

‘रक्षकेर हाते मुजि केमने छुटिब! ।।केमने प्रभुर सङ्गे नीलाचले ग्राब?' ॥

२३५॥

रघुनाथ दास ने सोचा, मैं इन रखवालों के चंगुल से किस तरह छूट सर्केगा? मैं किस तरह श्री चैतन्य महाप्रभु के साथ नीलाचल जा सर्केगा? सर्वज्ञ गौराङ्ग-प्रभु जानि' ताँर मन ।शिक्षा-रूपे कहे ताँरै आश्वास-वचन ।। २३६ ॥

चूँकि श्री चैतन्य महाप्रभु सर्वज्ञ थे, अतएव वे रघुनाथ दास के मन की बात समझ गये। इसलिए महाप्रभु ने उन्हें ढाढ़स बँधाते हुए इस प्रकार उपदेश दिया।

स्थिर हा घरे ग्राओ, ना हओ बातुल ।।क्रमे क्रमे पाय लोक भव-सिन्धु-कूल ॥

२३७॥

धैर्य धरो और घर वापस जाओ। पागल मत बनो। तुम क्रमशः भवसागर को पार कर सकोगे।

मर्कट-वैराग्य ना कर लोक देखाञा ।ग्रथा-स्रोग्य विषय भुञ्ज' अनासक्त हा ॥

२३८॥

तुम दिखावटी भक्त मत बनो और मिथ्या वैरागी मत बनो। अभी तुम उपयुक्त ढंग से भौतिक जगत् को भोग करो, किन्तु इसमें आसक्त मत होना।

अन्तरे निष्ठा कर, बाह्ये लोक-व्यवहार । अचिरात्कृष्ण तोमाय करिबे उद्धार ॥

२३९॥

श्री चैतन्य महाप्रभु ने कहा, तुम्हें चाहिए कि अन्तर से श्रद्धावान बने रहो, किन्तु बाहर से सामान्य व्यक्ति जैसा व्यवहार करो। इस तरह कृष्ण जल्द ही प्रसन्न होंगे और तुम्हें माया के पाश से छुड़ा लेंगे।

वृन्दावन देखि' ग्रबे आसिब नीलाचले ।। तबे तुमि आमा-पाश आसिह कोन छले ॥

२४० ॥

जब मैं वृन्दावन की मुलाकात लेने के बाद लौट आऊँ, तब तुम मुझसे नीलाचल, जगन्नाथ पुरी में मिल सकते हो। तब तक तुम निकल भागने की कोई दूसरी युक्ति सोच सकते हो।

से छल से-काले कृष्ण स्फुराबे तोमारे । कृष्ण-कृपा याँरे, तारे के राखिते पारे ॥

२४१॥

उस समय तुम्हें कौन-से उपायों को काम में लाना पड़ेगा, यह तो कृष्ण ही बतलायेंगे। यदि किसी पर कृष्ण की कृपा हो, तो उसे कोई रोक नहीं सकता।

एत कहि' महाप्रभु ताँरै विदाय दिल ।। घरे आसि' महाप्रभुर शिक्षा आचरिल ॥

२४२॥

इस तरह श्री चैतन्य महाप्रभु ने रघुनाथ दास को विदा किया। वे अपने घर लौट गये और महाप्रभु द्वारा बताई गई विधि के अनुसार कार्य करने लगे।

बाह्य वैराग्य, बातुलता सकल छाड़िया ।। यथा-स्रोग्य कार्य करे अनासक्त हञा ॥

२४३॥

घर आने पर रघुनाथ दास ने सारा पागलपन तथा बाह्य छद्म वैराग्य छोड़ दिया और वे गृहस्थी के कार्यों में बिना आसक्ति के रहने लगे।

देखि' ताँर पिता-माता बड़ सुख पाइल। ताँहार आवरण किछु शिथिल हइल ॥

२४४॥

जब रघुनाथ दास के माता-पिता ने देखा कि उनका पुत्र गृहस्थ की तरह रह रहा है, तो वे अत्यन्त सुखी हुए। फलस्वरूप उन्होंने चौकसी में ढील कर दी।

इहाँ प्रभु एकत्र करि' सब भक्त-गण । अद्वैत-नित्यानन्दादि यत भक्त-जन ॥

२४५॥

सबा आलिङ्गन करि' कहेन गोसात्रि ।। सबे आज्ञा देह'–आमि नीलाचले ग्राइ ॥

२४६ ।। तभी शान्तिपुर में श्री चैतन्य महाप्रभु ने अपने सारे भक्तों-अद्वैत आचार्य, श्री नित्यानन्द प्रभु आदि को एकत्र किया और उन सबका आलिंगन करने के बाद उनसे जगन्नाथ पुरी जाने की अनुमति माँगी।

सबार सहित इहाँ आमार हइल मिलन ।। ए वर्ष ‘नीलाद्रि' केह ना करिह गमन ॥

२४७॥

चूँकि श्री चैतन्य महाप्रभु शान्तिपुर में सबसे मिल चुके थे, अतः उन्होंने सारे भक्तों से विनती की कि वे इस वर्ष जगन्नाथ पुरी न आयें।।

ताहाँ हैते अवश्य आमि वृन्दावन' याब ।। सबे आज्ञा देह', तबे निर्विघ्ने आसिब ॥

२४८ ॥

श्री चैतन्य महाप्रभु ने कहा, मैं जगन्नाथ पुरी से वृन्दावन अवश्य जाऊँगा। यदि आप सभी लोग मुझे अनुमति दें, तो मैं बिना किसी कठिनाई के यहाँ फिर आ जाऊँगा।

मातार चरणे धरि' बहु विनय करिल । वृन्दावन ग्राइते ताँर आज्ञा लइल ॥

२४९॥

महाप्रभु ने अपनी माता के चरण पकड़कर उनसे विनयपूर्वक अनुमति माँगी। उन्होंने महाप्रभु को वृन्दावन जाने की अनुमति दे दी।

तबे नवद्वीपे तारे दिल पाठाजा । नीलाद्रि चलिला सङ्गे भक्त--गण लञा ॥

२५०॥

श्रीमती शचीदेवी को नवद्वीप वापस भेज दिया गया और महाप्रभु अपने भक्तों सहित नीलाद्रि अर्थात् जगन्नाथ पुरी के लिए रवाना हो गये।

सेइ सब लोक पथे करेन सेवन ।सुखे नीलाचल आइला शचीर नन्दन ॥

२५१॥

श्री चैतन्य महाप्रभु के साथ जाने वाले भक्तों ने नीलाचल जगन्नाथ पुरी के रास्ते-भर उनकी सभी प्रकार से सेवा की। इस तरह महाप्रभु परम प्रसन्नतापूर्वक लौट आये।

प्रभु आसि' जगन्नाथ दरशन कैल ।।‘महाप्रभु आइला'---ग्रामे कोलाहल हैल ॥

२५२ ॥

जगन्नाथ पुरी आकर श्री चैतन्य महाप्रभु ने भगवान् के मन्दिर का दर्शन किया। फिर तो सारे नगर में यह समाचार फैल गया कि महाप्रभु लौट आये हैं।

आनन्दित भक्त-गण आसिया मिलिला ।।प्रेम-आलिङ्गन प्रभु सबारे करिला ॥

२५३ ॥

तब सारे भक्तों ने आकर परम सुखपूर्वक महाप्रभु से भेंट की। महाप्रभु ने भी उन सबका एक-एक करके प्रेमपूर्वक आलिंगन किया।

काशी-मिश्र, रामानन्द, प्रद्युम्न, सार्वभौम ।। वाणीनाथ, शिखि-आदि ग्रत भक्तगण ॥

२५४॥

काशी मिश्र, रामानन्द राय, प्रद्युम्न, सार्वभौम भट्टाचार्य, वाणीनाथ राय, शिखि माहिति तथा अन्य सारे भक्त भी महाप्रभु से मिले।

गदाधर-पण्डित आसि' प्रभुरे मिलिला ।। सबार अग्रेते प्रभु कहिते लागिला ॥

२५५ ॥

गदाधर पण्डित भी आये और महाप्रभु से मिले। तब महाप्रभु सभी भक्तों के समक्ष इस प्रकार बोले।

'वृन्दावन ग्राब आमि गौड़-देश दिया।निज-मातार, गङ्गार चरण देखिया ॥

२५६॥

मैंने अपनी माता तथा गंगा नदी का दर्शन करने के लिए ही बंगाल से होते हुए वृन्दावन जाने का संकल्प किया था।

एत मते करि' कैलँ गौड़ेरे गमन ।।सहस्त्रेक सङ्गे हैल निज-भक्त-गण ॥

२५७॥

इस तरह मैं बंगाल गया, लेकिन हजारों भक्त मेरे साथ चल पड़े।

लक्ष लक्ष लोक आइसे कौतुक देखिते ।। लोकेर सङ्घट्टे पथ ना पारि चलिते ॥

२५८॥

लाखों लोग उत्सुकतावश मुझे देखने आये और ऐसी भीड़ हुई कि रास्ते में मुक्त होकर चलना भी कठिन हो गया।

यथा रहि, तथा घर-प्राचीर हय चूर्ण ।।ग्रथा नेत्र पड़े तथा लोक देखि पूर्ण ॥

२५९॥

भीड़ इतनी बढ़ गई कि मैं जिस घर में रुका था, वह घर तथा उसकी चाहारदीवारी टूट-फूट गई और मैं जिधर देखता उधर विशाल जनसमूह ही दिखाई पड़ता था।

कष्टे-सृष्ट्ये करि' गेलाङ रामकेलि-ग्राम ।।आमार ठाजि आइला 'रूप' 'सनातन' नाम ॥

२६० ॥

मैं बड़ी मुश्किल से रामकेलि गाँव गया, जहाँ मुझे रूप तथा सनातन दो भाई मिले।

दुइ भाइ–भक्त-राज, कृष्ण-कृपा-पात्र । व्यवहारे–राज-मन्त्री हय राज-पात्रे ॥

२६१॥

ये दोनों भाई महान् भक्त तथा कृष्ण-कृपा के समुचित पात्र हैं। किन्तु सामान्य तौर पर वे हैं सरकारी अधिकारी-राजा के मन्त्री।

विद्या-भक्ति-बुद्धि-बले परम प्रवीण ।तबु आपनाके माने तृण हैते हीन ॥

२६२॥

श्रील रूप तथा सनातन शिक्षा, भक्ति, बुद्धि तथा बल में अत्यन्त अनुभवी हैं, फिर भी वे अपने आपको सड़क के तिनके से भी नीच मानते हैं।

ताँर दैन्य देखि' शुनि' पाषाण विदरे ।। आमि तुष्ट हा तबे कहिलॆ दोंहारे ॥

२६३ ॥

उत्तम हबा हीन करि' मानह आपनारे । अचिरे करिबे कृष्ण तोमार उद्धारे ॥

२६४॥

निस्सन्देह, इन दोनों भाइयों के दैन्य से पत्थर भी पिघल सकता था। उनके आचरण से तुष्ट होकर मैंने उनसे कहा, 'यद्यपि तुम दोनों उच्च कोटि के हो, किन्तु अपने आपको निम्न मानते हो; इसीलिए कृष्ण शीघ्र ही तुम दोनों का उद्धार करेंगे।'

एत कहि' आमि बे विदाय ताँरे दिल ।। गमन-काले सनातन ‘प्रहेली' कहिल ॥

२६५॥

याँर सङ्गे हय एइ लोक लक्ष कोटि । वृन्दावन ग्राइबार एइ नहे परिपाटी ॥

२६६॥

उनसे ऐसा कहकर मैंने उनसे विदा ली। जब मैं विदा हो रहा था, तो सनातन ने मुझसे कहा, 'जब हजारो लोगों की भीड़ किसी का अनुसरण कर रही हो, तब इस प्रकार से वृन्दावन जाना उचित नहीं है।'

तबु आमि शुनिलँ मात्र, ना कैलँ अवधान । प्राते चलि' आइलाङ' कानाइर नाटशाला'-ग्राम ॥

२६७॥

यद्यपि मैंने यह सुना, किन्तु उस पर ध्यान नहीं दिया, और प्रातःकाल मैं कानाइ नाटशाला गया।

रात्रि-काले मने आमि विचार करिल ।। सनातन मोरे किबा 'प्रहेली' कहिल ॥

२६८॥

किन्तु रात में मैंने सनातन के कहे हुए पर विचार किया।

भालत' कहिल,—-मोर एत लोक सङ्गे । लोक देखि' कहिबे मोरे–‘एइ एक ढङ्गे' ॥

२६९॥

मैं इस निर्णय पर पहुँचा कि सनातन ने बहुत ठीक कहा था। मेरे साथ बहुत बड़ी भीड़ थी, अतएव इतने सारे लोगों को देखकर लोग निश्चय ही मेरी निन्दा करेंगे कि 'यह एक और धूर्त है।'

‘दुर्लभ' 'दुर्गम' सेइ 'निर्जन' वृन्दावन । एकाकी ग्राइब, किबा सङ्गे एक-जन ॥

२७० ॥

तब मैं सोचने लगा कि वृन्दावन तो एकान्त स्थान है। यह दुर्गम और दुर्लभ है। इसलिए मैंने अकेले या फिर बहुत हुआ तो अपने साथ केवल एक व्यक्ति लेकर जाने का निश्चय किया है।

माधवेन्द्र-पुरी तथा गेला ‘एकेश्वरे'। दुग्ध-दान-च्छले कृष्ण साक्षादिल तौरै ॥

२७१॥

माधवेन्द्र पुरी अकेले ही वृन्दावन गये थे और कृष्ण ने दूध देने के बहाने उन्हें दर्शन दिया था।

बादियार बाजि पाति' चलिलाङतथारे ।बहु-सङ्गे वृन्दावन गमन ना करे ॥

२७२॥

तब मैं समझ पाया कि मैं खेल दिखाने वाले जादूगर की तरह वृन्दावन जा रहा हूँ और यह निश्चय ही ठीक नहीं है। किसी को भी इतने सारे लोगों के साथ वृन्दावन नहीं जाना चाहिए।

एका ग्राइब, किबा सङ्गे भृत्य एक-जन । तबे से शोभय वृन्दावनेर गमन ॥

२७३ ॥

इसीलिए मैंने अकेले या अधिक से अधिक एक नौकर के साथ वृन्दावन जाने का निश्चय किया है। इस तरह मेरी वृन्दावन यात्रा बहुत सुन्दर होगी।

वृन्दावन ग्राब काहाँ 'एकाकी' हा! ।। सैन्य सङ्गे चलियाछि ढाक बाजा! ॥

२७४॥

मैंने सोचा, मैं वृन्दावन अकेले न जाकर सैनिकों को साथ लिए और ढोल बजाते जा रहा हूँ।

धिक्, धिकापनाके बलि' हइलाङ अस्थिर ।निवृत्त हा पुनः आइलाङगङ्गा-तीर ॥

२७५ ॥

इसलिए मैंने अपने आपको धिक्कारा और अत्यन्त उत्तेजित होकर मैं गंगा-तीर लौट आया।

भक्त-गणे राखिया आइनु निज निज स्थाने ।। आमा-सङ्गे आइला सबे पाँच-छय जने ॥

२७६ ॥

तब मैंने सारे भक्तों को वहाँ छोड़ दिया और अपने साथ केवल पाँच-छ: व्यक्तियों को रखा।

निर्विघ्ने एबे कैछे ग्राइब वृन्दावने ।। सबे मेलि' युक्ति देह' हा परसन्ने ॥

२७७॥

अब मैं चाहता हूँ कि तुम सब लोग मुझ पर प्रसन्न होओ और मुझे अच्छी सलाह दो। मुझे बताओ कि मैं किस तरह निर्विघ्न होकर वृन्दावन जा सकता हूँ।

गदाधरे छाड़ि' गेनु, इँहो दुःख पाइल । सेइ हेतु वृन्दावन ग्राइते नारिल ॥

२७८ ॥

मैंने यहाँ गदाधर पण्डित को छोड़ दिया, तो वह अत्यन्त दुःखी हुआ। इसलिए मैं वृन्दावन नहीं जा सका।

तबे गदाधर-पण्डित प्रेमाविष्ट हबा । प्रभु-पद धरि' कहे विनय करिया ॥

२७९ ॥

श्री चैतन्य महाप्रभु के शब्दों से उत्साहित होकर गदाधर पण्डित प्रेमभाव में डूब गये। उन्होंने तुरन्त ही महाप्रभु के चरण पकड़ लिए और विनीत भाव से कहा।

तुमि ग्राहाँ-याहाँ रह, ताहाँ 'वृन्दावन' ।।ताहाँ यमुना, गङ्गा, सर्व-तीर्थ-गण ॥

२८०॥

गदाधर पण्डित ने कहा, आप जहाँ कहीं भी ठहरते हैं, वहीं वृन्दावन है और वहीं यमुना, गंगा नदियाँ तथा अन्य तीर्थस्थल हैं।

तबु वृन्दावन ग्राह' लोक शिखाइते ।। सेइत करिबे, तोमार येइ लय चित्ते ॥

२८१॥

यद्यपि आप जहाँ भी ठहरते हैं वहीं वृन्दावन है, तो भी आप लोगों को शिक्षा देने के लिए वृन्दावन जाते हैं। अन्यथा, जो आप को अच्छा लगे, वही करते हैं।

एई आगे आइला, प्रभु, वर्षार चारि मास ।। एइ चारि मास कर नीलाचले वास ॥

२८२ ॥

इस अवसर को पाकर गदाधर पण्डित ने कहा, अब तो चातुर्मास्य प्रारम्भ हो चुका है। अतएव आपको अगले चार मास जगन्नाथ पुरी में ही बिताने चाहिए।

पाछे सेइ आचरिबा, ग्रेइ तोमार मन । आपन-इच्छाय चल, रह,–के करे वारण ॥

२८३ ॥

यहाँ चार महीने रहने के बाद आप जैसा चाहें कर सकते हैं। वास्तव में आपको जाने या रहने से कोई रोक नहीं सकता।

शुनि' सब भक्त कहे प्रभुर चरणे । सबाकार इच्छा पण्डित कैल निवेदने ॥

२८४॥

यह कथन सुनकर श्री चैतन्य महाप्रभु के चरणकमलों पर उपस्थित भक्तों ने कहा कि गदाधर पण्डित ने उनकी इच्छा को सही ढंग से प्रस्तुत की है।

सबार इच्छाय प्रभु चारि मास रहिला ।। शुनिया प्रतापरुद्र आनन्दित हैला ॥

२८५॥

सारे भक्तों के अनुरोध पर श्री चैतन्य महाप्रभु जगन्नाथ पुरी में चार मास तक रुके रहने के लिए राजी हो गये। यह सुनकर राजा प्रतापरुद्र अत्यधिक प्रसन्न हुए।

सेइ दिन गदाधर कैल निमन्त्रण । ताहाँ भिक्षा कैल प्रभु लञा भक्त-गण ॥

२८६॥

उस दिन गदाधर पण्डित ने श्री चैतन्य महाप्रभु को निमन्त्रण दिया और महाप्रभु ने अन्य भक्तों सहित उनके यहाँ भोजन ग्रहण किया।

भिक्षाते पण्डितेर स्नेह, प्रभुर आस्वादन । मनुष्येर शक्त्ये दुइ ना ग्राय वर्णन ॥

२८७॥

सम्भवतः कोई भी साधारण व्यक्ति गदाधर पण्डित द्वारा परोसे गये स्नेहपूर्ण भोजन एवं महाप्रभु द्वारा इस भोजन के आस्वादन का वर्णन नहीं कर सकता।

एइ मत गौर-लीला—अनन्त, अपार । सङ्क्षेपे कहिये, कहा ना ग्राय विस्तार ॥

२८८॥

इस तरह श्री चैतन्य महाप्रभु अपनी लीलाएँ करते हैं, जो अनन्त तथा अपार हैं। किसी न किसी प्रकार इनका संक्षिप्त वर्णन किया गया है। इनका विस्तृत वर्णन कर पाना सम्भव नहीं है।

सहस्र-वदने कहे आपने 'अनन्त' ।। तबु एक लीलार तेहो नाहि पाय अन्त ॥

२८९॥

यद्यपि अनन्तदेव अपने सहस्र मुखों से भगवान् की लीलाओं का सदैव वर्णन करते रहते हैं, किन्तु वे किसी एक लीला का भी पार नहीं पा सकते।

श्री-रूप-रघुनाथ पदे ग्रार आश ।चैतन्य-चरितामृत कहे कृष्णदास ॥

२९०॥

श्री रूप तथा रघुनाथ के चरणकमलों पर प्रार्थना करते हुए तथा उनकी कृपा की कामना करते हुए मैं कृष्णदास उनके चरणचिह्नों का अनुसरण करते हुए श्री चैतन्य-चरितामृत कह रहा हूँ।

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