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अध्याय सत्रह: भगवान वृन्दावन की यात्रा करते हैं

गच्छन्वृन्दावनं गौरो व्याघ्रभैण-खगान्वने । प्रेमोन्मत्तान्सहोन्नृत्यान्विदधे कृष्ण-जल्पिनः ॥

१॥

वृन्दावन जाते हुए श्री चैतन्य महाप्रभु झारखंड के जंगलों से होकर गुजरे और उन्होंने सारे बाघों, हाथियों, हिरनों तथा पक्षियों को हरे कृष्ण महामन्त्र का कीर्तन और नृत्य करने के लिए प्रेरित किया। इस तरह ये सारे पशु प्रेमभाव से उन्मत्त हो उठे।

जय जय गौरचन्द्र जय नित्यानन्द । जयाद्वैत-चन्द्र जय गौर-भक्त-वृन्द ॥

२ ॥

श्री चैतन्य महाप्रभु की जय हो! श्री नित्यानन्द प्रभु की जय हो! अद्वैतचन्द्र की जय हो! महाप्रभु के सारे भक्तों की जय हो! शरत्काल हैल, प्रभुर चलिते हैल मति ।रामानन्द-स्वरूप-सङ्गे निभृते युकति ॥

३॥

जब शरद ऋतु आई, तो श्री चैतन्य महाप्रभु ने वृन्दावन जाने का निश्चय किया। उन्होंने एकान्त में रामानन्द राय तथा स्वरूप दामोदर गोस्वामी से परामर्श किया।

मोर सहाय कर यदि, तुमि-दुइ जन ।।तबे आमि यात्रा देखि श्री-वृन्दावन ॥

४॥

महाप्रभु ने रामानन्द राय तथा स्वरूप दामोदर गोस्वामी से अनुरोध किया कि वे उन्हें वृन्दावन जाने में सहायता करें।

रात्र्ये उठि' वन-पथे पलाञा ग्राब। एकाकी ग्राइब, काहों सङ्गे ना लइब ॥

५॥

श्री चैतन्य महाप्रभु ने कहा, मैं भोर के समय यात्रा आरम्भ करूंगा और जंगल के मार्ग में अलक्षित होकर अकेले जाऊँगा। मैं अपने साथ किसी को भी नहीं लूंगा।

केह ग्रदि सङ्ग लइते पाछे उठि' धाय ।।सबारे राखिबा, ग्रेन केह नाहि ग्राय ॥

६॥

यदि कोई मेरे पीछे आना भी चाहे, तो उसे आप लोग रोक लें। मैं नहीं चाहता कि कोई भी मेरे साथ जाये।

प्रसन्न हा आज्ञा दिबा, ना मानिबा'दुःख' ।।तोमा-सबार 'सुखे' पथे हबे मोर 'सुख' ।।७।। तुम लोग कृपया प्रसन्नतापूर्वक मुझे आज्ञा दो और दुःखी मत हो। यदि तुम लोग सुखी होंगे, तो मैं वृन्दावन को प्रस्थान करते हुए सुखी हूँगा।

दुइ-जन कहे,---‘तुमि ईश्वर स्वतन्त्र' ।।येइ इच्छा, सेइ करिबा, नह'परतन्त्र' ॥

८॥

यह सुनकर रामानन्द राय तथा स्वरूप दामोदर गोस्वामी ने कहा, “हे प्रभु, आप पूर्णतया स्वतन्त्र हैं। चूँकि आप किसी पर आश्रित नहीं हैं, अतएव आपकी जो इच्छा होगी आप वही करेंगे।

किन्तु आमा-मुँहार शुन एक निवेदने ।‘तोमार सुखे आमार सुख'–कहिला आपने ॥

९॥

हे प्रभु, कृपया हमारी एक विनती सुनें। आपने पहले ही कहा है कि हमारे सुख से आपको सुख मिलेगा। यह आपको अपना कथन है।

आमा-बँहार मने तबे बड़‘सुख' हय ।एक निवेदन यदि धर, दयामय ॥

१०॥

यदि आप हमारी केवल एक विनती मान लें, तो हम अत्यधिक सुखी होंगे।

‘उत्तम ब्राह्मण' एक सङ्गे अवश्य चाहि ।।भिक्षा करि' भिक्षा दिबे, ग्राबे पात्र वहि ॥

११॥

हमारे प्रभु! आप अपने साथ एक उत्तम ब्राह्मण अवश्य ले लें। वह आपके लिए भिक्षा लायेगा, पकायेगा, आपको प्रसाद देगा और आपकी यात्रा के समय आपका जलपात्र उठायेगा।

वन-पथे ग्राइते नाहि 'भोज्यान्न'-ब्राह्मण ।आज्ञा कर, सङ्गे चलुक विप्र एक-जन' ॥

१२॥

जब आप जंगल से होकर यात्रा करेंगे, तो आपको ऐसा कोई ब्राह्मण नहीं मिल सकेगा, जिसके यहाँ आप भोजन कर सकें। अतएव आप कृपया आज्ञा दें, जिससे आपके साथ कम-से-कम एक शुद्ध ब्राह्मण जा सके।

प्रभु कहे,—निज-सङ्गी काँहो ना लइब ।। एक-जने निले, आनेर मने दुःख हेइब ॥

१३॥

श्री चैतन्य महाप्रभु ने कहा, मैं अपने साथ अपने किसी भी संगी को नहीं ले जाऊँगा, क्योंकि यदि मैं किसी को भी चुनँगा, तो अन्य सभी लोग दुःखी होंगे।

नूतन सङ्गी हइबेक,—स्निग्ध याँर मन ।।ऐछे व्रबे पाइ, तबे लइ 'एक' जन ॥

१४॥

ऐसा व्यक्ति नया ही होना चाहिए। उसे शान्तचित्त होना चाहिए। यदि मुझे ऐसा व्यक्ति मिल सके, तो मैं उसे अपने साथ लेने के लिए तैयार हूँ। स्वरूप कहे,—एइ बलभद्र-भट्टाचार्य ।।तोमाते सु-स्निग्ध बड़, पण्डित, साधु, आर्य ॥

१५॥

तब स्वरूप दामोदर ने कहा, 'यह बलभद्र भट्टाचार्य है। इसे आपके प्रति अत्यधिक अनुराग है। यह सच्चरित्र, विद्वान तथा आध्यात्मिक चेतना में उन्नत है।'

प्रथमेड़ तोमा-सङ्गे आइला गौड़ हैते ।।इँहार इच्छा आछे ‘सर्व-तीर्थ' करिते ॥

१६॥

प्रारम्भ में वह बंगाल से आपके साथ आया था। उसकी इच्छा है कि वह समस्त तीर्थस्थानों का दर्शन करे।

इँहार सङ्गे आछे विप्र एक 'भृत्य' ।। इँहो पथे करिबेन सेवा-भिक्षा-कृत्य ॥

१७॥

इसके अतिरिक्त आप दूसरा ब्राह्मण भी ले जाएँ, जो रास्ते में सेवक का काम कर सके और आपकी भोजन-व्यवस्था कर सके।

इँहारे सङ्गे लह व्रदि, सबार हय 'सुख' ।। वन-पथे ग्राइते तोमार नहिबे कोन 'दुःख' ॥

१८॥

यदि आप उसे भी साथ ले सकें, तो हम अत्यन्त सुखी होंगे। यदि आपके साथ जंगल के मार्ग में दो लोग रहेंगे, तो निश्चित रूप से आपको कोई भी कठिनाई या असुविधा नहीं होगी।

सेइ विप्र वहि' निबे वस्त्राम्बु-भाजन ।। भट्टाचार्य भिक्षा दिबे करि' भिक्षाटन ॥

१९ ॥

दूसरा ब्राह्मण आपके वस्त्र तथा जलपात्र लिए रहेगा और बलभद्र भट्टाचार्य भिक्षा माँगकर आपके लिए भोजन पकायेगा।

ताँहार वचन प्रभु अङ्गीकार कैल।। बलभद्र-भट्टाचार्ये सङ्गे करि' निल ॥

२०॥

इस तरह श्री चैतन्य महाप्रभु ने स्वरूप दामोदर पण्डित की बात मान ली और बलभद्र भट्टाचार्य को अपने साथ ले जाना स्वीकार कर लिया।

पूर्व-रात्र्ये जगन्नाथ देखि' ‘आज्ञा' लञा ।। शेष-रात्रे उठि' प्रभु चलिला लुकाञा ॥

२१॥

पिछली रात्रि श्री चैतन्य महाप्रभु ने भगवान जगन्नाथ का दर्शन किया था और उनसे आज्ञा ले ली थी। अब रात्रि समाप्त होने के पूर्व महाप्रभु जगे और तुरन्त चल पड़े। उनको किसीने देखा नहीं।

प्रातः-काले भक्त-गण प्रभु ना देखियो । अन्वेषण करि' फिरे व्याकुल ही ॥

२२॥

चूँकि महाप्रभु जा चुके थे, अतः जब प्रात:काल भक्तों ने उन्हें नहीं देखा, तो वे अत्यन्त व्याकुल होकर उनकी खोज करने लगे।

स्वरूप-गोसाजि सबाय कैल निवारण ।। निवृत्त हआ रहे सबै जानि' प्रभुर मन ॥

२३ ॥

जब सारे भक्त महाप्रभु की खोज कर रहे थे, तब स्वरूप दामोदर ने उन्हें रोका। तब सारे लोग श्री चैतन्य महाप्रभु के मन की बात जानकर चुप हो गये।

प्रसिद्ध पथ छाड़ि' प्रभु उपपथे चलिला ।। 'कटक' डाहिने करि' वने प्रवेशिला ॥

२४॥

महाप्रभु जाने-पहचाने सार्वजनिक मार्ग पर न चलकर उपमार्ग से होकर गये। इस तरह उन्होंने कटक शहर को अपनी दाईं ओर छोड़ते हुए जंगल में प्रवेश किया।

निर्जन-वने चले प्रभु कृष्ण-नाम लञा ।हस्ति-व्याघ्र पथ छाड़े प्रभुरे देखिया ॥

२५॥

जब महाप्रभु सुनसान जंगल से होकर कृष्ण-नाम का कीर्तन करते हुए जा रहे थे, तो बाघों तथा हाथियों ने उन्हें देखकर रास्ता छोड़ दिया।

पाले-पाले व्याघ्र, हस्ती, गण्डार, शूकर-गण । तार मध्ये आवेशे प्रभु करिला गमन ॥

२६॥

जब महाप्रभु भावावेश में जंगल से होकर जा रहे थे, तो झुंड के झुंड बाघ, हाथी, गैंडे तथा सुअर आये। महाप्रभु इन सबके बीच से होकर चलते गये।

देखि' भट्टाचार्येर मने हय महा-भय ।। प्रभुर प्रतापे तारा एक पाश हय ॥

२७॥

बलभद्र भट्टाचार्य उन्हें देखकर अत्यन्त डरा हुआ था, किन्तु श्री चैतन्य महाप्रभु के प्रताप से सारे पशु एक ओर खड़े रहे।

एक-दिन पथे व्याघ्र करियाछे शयन ।। आवेशे तार गाये प्रभुर लागिल चरण ॥

२८ ॥

एक दिन एक बाघ रास्ते में लेटा हुआ था और श्री चैतन्य महाप्रभु भावावेश में रास्ते पर चले जा रहे थे, तो उनका पाँव उस बाघ से छू गया।

प्रभु कहे,—कह 'कृष्ण', व्याघ्र उठिल ।।‘कृष्ण' 'कृष्ण' कहि' व्याघ्र नाचिते लागिल ॥

२९॥

महाप्रभु ने कहा, कृष्ण-नाम का कीर्तन करो! इस पर वह बाघ तुरन्त उठ खड़ा हुआ और कृष्ण! कृष्ण! कहकर नृत्य करने लगा।

आर दिने महाप्रभु करे नदी स्नान ।मत्त-हस्ति-यूथ आइल करिते जल-पाने ॥

३०॥

अन्य दिन जब श्री चैतन्य महाप्रभु नदी में स्नान कर रहे थे, तब मत्त हाथियों का एक झुंड पानी पीने के लिए वहाँ आया।

प्रभु जल-कृत्य करे, आगे हस्ती आइला ।।‘कृष्ण कह' बलि' प्रभु जल फेलि' मारिला ॥

३१॥

जब महाप्रभु स्नान कर रहे थे और गायत्री मन्त्र जप रहे थे, तब वे हाथी उनके सामने आये। महाप्रभु ने तुरन्त उन हाथियों पर पानी उछालकर उनसे कृष्ण-नाम का उच्चारण करने के लिए कहा।

सेइ जल-बिन्दु-कणा लागे ग्रार गाय ।।सेइ 'कृष्ण' 'कृष्ण' कहे, प्रेमे नाचे, गाय ॥

३२॥

जिन हाथियों के शरीर पर महाप्रभु द्वारा उछाला पानी पड़ा, वे कृष्ण! कृष्ण! कहने लगे और प्रेम में नाचने और गाने लगे।

केह भूमे पड़े, केह करये चित्कार।देखि' भट्टाचार्येर मने हय चमत्कार ॥

३३ ॥

कुछ हाथी भूमि पर गिर पड़े और कुछ प्रेमवश चिंघाड़ने लगे। यह देखकर बलभद्र भट्टाचार्य एकदम आश्चर्यचकित हो गया।

पथे ग्राइते करे प्रभु उच्च सङ्कीर्तन ।।मधुर कण्ठ-ध्वनि शुनि' आइसे मृगी-गण ॥

३४॥

कभी-कभी जंगल से गुजरते हुए श्री चैतन्य महाप्रभु उच्च स्वर से कीर्तन करने लगते। उनकी मधुर वाणी सुनकर सारी हिरणियाँ उनके निकट आ जातीं।

डाहिने-वामे ध्वनि शुनि' ग्राय प्रभु-सङ्गे।। प्रभु तार अङ्ग मुछे, श्लोक पड़े रङ्गे ॥

३५॥

उनका उच्च स्वर सुनकर हिरणियाँ उनके दाएँ-बाएँ चलती जातीं। महाप्रभु उन्हें अत्यन्त उत्सुकता से श्लोक सुनाते हुए उनकी पीठ थपथपाते।

धन्याः स्म मूढ़-मतयोऽपि हरिण्य एता ।ग्रा नन्द-नन्दनमुपात्त-विचित्र-वेशम् ।। आकर्य वेणु-रणितं सह-कृष्ण-साराःपूजां दधुर्विरचितां प्रणयावलोकैः ॥

३६॥

वे मूर्ख हिरण धन्य हैं, क्योंकि वे सुन्दर वेशधारी और बाँसुरी बजा रहे नन्द महाराज के पुत्र के समीप आये। निस्सन्देह, हिरण तथा हिरणियाँ प्रेम की चितवनों से भगवान् की पूजा करते हैं।

हेन-काले व्याघ्र तथा आइल पाँच-सात ।। व्याघ्र-मृगी मिलि' चले महाप्रभुर साथ ॥

३७॥

जब श्री चैतन्य महाप्रभु जंगल से होकर जा रहे थे, तो पाँच-सात बाघ आये और वे हिरणों के साथ मिलकर महाप्रभु के पीछे-पीछे चलने लगे।

देखि' महाप्रभुर 'वृन्दावन'-स्मृति हैल ।। वृन्दावन-गुण-वर्णन श्लोक पड़िल ॥

३८ ॥

बाघों तथा हिरणों को अपने पीछे आते देखकर श्री चैतन्य महाप्रभु को सहसा वृन्दावन का स्मरण हो आया। अतः वे वृन्दावन के दिव्य गुणों का वर्णन करने वाला श्लोक सुनाने लगे।

यत्र नैसर्ग-दुर्वैराः सहासन्नृ-मृगादयः ।। मित्राणीवाजितावास-द्रुत-रुतर्षणादिकम् ॥

३९॥

वृन्दावन भगवान् का दिव्य धाम है। वहाँ न भूख है, न क्रोध, न । ही प्यास है। यद्यपि मनुष्यों तथा हिंसक पशुओं में सहज वैर होता है, किन्तु वे वहाँ दिव्य भाव में मैत्रीपूर्वक रहते हैं।

‘कृष्ण कृष्ण कह' करि' प्रभु ग्रबे बलिल । 'कृष्ण' कहि' व्याघ्र-मृग नाचिते लागिल ॥

४०॥

जब श्री चैतन्य महाप्रभु ने कहा, कृष्ण! कृष्ण!' बोलो तो बाघ तथा हिरन कृष्ण! का नाम लेने लगे और नृत्य करने लगे।

नाचे, कुन्दे व्याघ्र-गण मृगी-गण-सड़े। बलभद्र-भट्टाचार्य देखे अपूर्व-रङ्गे ॥

४१॥

जब सारे बाघ तथा हिरन नाचने और कूदने लगे, तो बलभद्र भट्टाचार्य उन्हें देखकर आश्चर्यचकित रह गया। व्याघ्र-मृग अन्योन्ये करे आलिङ्गन ।मुखे मुख दिया करे अन्योन्ये चुम्बन ॥

४२॥

बाघ तथा हिरन एक-दूसरे का आलिंगन करने लगे और एक-दूसरे का मुख स्पर्श करके चूमने लगे।

कौतुक देखिया प्रभु हासिते लागिला ।ता-सबाके ताहाँ छाड़ि' आगे चलि' गेला ॥

४३॥

जब श्री चैतन्य महाप्रभु ने यह कौतुक देखा, तो वे मन्दहास करने लगे। अन्त में उन पशुओं को छोड़कर महाप्रभु अपने रास्ते पर चल दिये।

मयूरादि पक्षि-गण प्रभुरे देखियो ।सङ्गे चले, 'कृष्ण' बलि' नाचे मत्त हा ॥

४४॥

मोर इत्यादि पक्षियों ने श्री चैतन्य महाप्रभु को देखा, तो उन्होंने भी कीर्तन करते और नाचते हुए महाप्रभु का पीछा करना शुरू कर दिया। वे मष कृष्ण के पावन नाम से मतवाले हो गये थे।

‘हरि-बोल' बलि' प्रभु करे उच्च-ध्वनि ।वृक्ष-लता प्रफुल्लित, सेइ ध्वनि शुनि, ॥

४५॥

जब महाप्रभु उच्चस्वर से हरिबोल का उच्चारण करते, तो सारे वृक्ष तथा लताएँ उनकी ध्वनि सुनकर प्रफुल्लित हो जातीं।

‘झारिखण्डे' स्थावर-जङ्गम आछे व्रत ।। कृष्ण-नाम दिया कैल प्रेमेते उन्मत्त ॥

४६॥

इस तरह झारखण्ड के वन के सारे चर-अचर जीव महाप्रभु द्वारा ध्वनित कृष्ण का पवित्र नाम सुनकर मतवाले हो रहे थे।

येइ ग्राम दिया ग्नान, ग्राहाँ करेन स्थिति ।। से-सब ग्रामेर लोकेर हय ‘प्रेम-भक्ति' ॥

४७॥

। महाप्रभु जिन-जिन गाँवों से होकर गये और जिन-जिन स्थानों में यात्रा के दौरान रुके, वहाँ के सारे लोग पवित्र हो गये और उनमें भगवत्प्रेम जागृत हो गया।

केह यदि ताँर मुखे शुने कृष्ण-नाम ।। ताँर मुखे आन शुने ताँर मुखे आन ॥

४८॥

सबे 'कृष्ण' ‘हरि' बलि' नाचे, कान्दे, हासे । परम्पराय ‘वैष्णव' हुइल सर्व देशे ॥

४९॥

यदि किसी ने श्री चैतन्य महाप्रभु के मुख से पवित्र नाम का कीर्तन सुना और अन्य किसी ने इस व्यक्ति से यह कीर्तन सुना और पुन: तीसरे व्यक्ति से और किसी ने सुना, तो इस तरह की गुरु-शिष्य परम्परा के माध्यम से सारे देशों के लोग वैष्णव बन गये। इस प्रकार हर व्यक्ति कृष्ण तथा हरि के नाम का कीर्तन करता, नाचता, रोता और हँसता।

यद्यपि प्रभु लोक-सङ्घटेर त्रासे ।।प्रेम 'गुप्त' करेन, बाहिरे ना प्रकाशे ॥

५०॥

महाप्रभु ने हमेशा अपने प्रेमभाव का प्रदर्शन नहीं किया। वे लोगों की भीड़ से भयभीत थे, अतः उन्होंने अपने प्रेम को गुप्त रखा।

तथापि ताँर दर्शन-श्रवण-प्रभावे ।।सकल देशेर लोक हइल ‘वैष्णवे' ॥

५१॥

यद्यपि श्री चैतन्य महाप्रभु ने अपने सहज प्रेमभाव को प्रकट नहीं किया, फिर भी हर व्यक्ति उन्हें देखकर और सुनकर शुद्ध भक्त बन गया।

गौड़, बङ्ग, उत्कल, दक्षिण-देशे गिया । लोकेर निस्तार कैल आपने भ्रमिया ॥

५२॥

इस तरह श्री चैतन्य महाप्रभु ने बंगाल, पूर्वी बंगाल, उड़ीसा तथा दक्षिणी देशों की यात्रा की और कृष्णभावना का प्रसार करके सभी प्रकार के लोगों का उद्धार किया।

मथुरा ग्राइबार छले आसेन झारिखण्ड ।।भिल्ल-प्राय लोक ताहाँ परम-पाषण्ड ॥

५३॥

जब मथुरा जाते हुए महाप्रभु झारिखण्ड आये, तो उन्होंने देखा कि वहाँ के लोग लगभग असभ्य थे और भगवद्भावना से विहीन थे।

नाम-प्रेम दिया कैल सबार निस्तार ।।चैतन्येर गूढ़-लीला बुझिते शक्ति कार ॥

५४॥

श्री चैतन्य महाप्रभु ने इन भीलों को भी पवित्र नाम का कीर्तन करने और दिव्य प्रेम-पद तक ऊपर उठने का अवसर प्रदान किया। इस तरह उन्होंने उन सबका उद्धार किया। भला महाप्रभु की दिव्य लीलाओं को समझ पाने की शक्ति किसमें है? वन देखि' भ्रम हय--एइ 'वृन्दावन' ।।शैल देखि' मने हय——एइ गोवर्धन' ॥

५५॥

जब श्री चैतन्य महाप्रभु झारिखण्ड जंगल से होकर जा रहे थे, तब उन्होंने उसे वृन्दावन ही समझ लिया। जब वे पहाड़ियों से होकर गुजर रहे। थे, तो उन्हें वे गोवर्धन पर्वत समझ बैठे।

याहाँ नदी देखे ताहाँ मानये-'कालिन्दी' ।।महा-प्रेमावेशे नाचे प्रभु पड़े कान्दि' ॥

५६।।। इसी तरह जब भी श्री चैतन्य महाप्रभु कोई नदी देखते, तो वे उसे तुरन्त यमुना नदी मान बैठते। इस तरह जंगल में वे परम प्रेमावेश से पूर्ण हो जाते और नाचते तथा रोते-रोते गिर पड़ते थे।

पथे ग्राइते भट्टाचार्य शाक-मूल-फल ।।ग्राहाँ ग्रेड पायेन ताहाँ लयेन सकल ॥

५७।। मार्ग में बलभद्र भट्टाचार्य सभी तरह के शाक, कन्द तथा फल जहाँ कहीं उपलब्ध होते, एकत्र कर लेते।

ग्रे-ग्रामे रहेन प्रभु, तथाय ब्राह्मण ।।पाँच-सात जन आसि' करे निमन्त्रण ॥

५८॥

जब भी श्री चैतन्य महाप्रभु किसी गाँव में जाते, तो पाँच-सात ब्राह्मण आकर महाप्रभु को निमन्त्रण दे जाते। केह अन्न आनि' देय भट्टाचार्य-स्थाने ।केह दुग्ध, दधि, केह घृत, खण्ड आने ॥

५९॥

कुछ लोग अन्न लाकर बलभद्र भट्टाचार्य को दे जाते। अन्य लोग दूध तथा दही ले आते, तो कोई घी तथा शक्कर ले आता।

ग्राहाँ विप्र नाहि ताहाँ ‘शूद्र-महाजन'। आसि' सबे भट्टाचार्ये करे निमन्त्रण ॥

६०॥

कुछ गाँवों में ब्राह्मण नहीं थे, फिर भी अब्राह्मण कुलों में जन्मे भक्त आते और बलभद्र भट्टाचार्य को आमन्त्रित कर जाते।

भट्टाचार्य पाक करे वन्य-व्यञ्जन ।। वन्य-व्यञ्जने प्रभुर आनन्दित मन ॥

६१॥

बलभद्र भट्टाचार्य जंगल से एकत्र किये गये सभी तरह के साग-- सब्जी को पकाता और श्री चैतन्य महाप्रभु इन व्यंजनों को परम प्रसन्न होकर ग्रहण करते थे।

दुइ-चारि दिनेर अन्न राखेन संहति ।। याहाँ शून्य वन, लोकेर नाहिक वसति ।। ६२ ।। ताहाँ सेइ अन्न भट्टाचार्य करे पाक । फल-मूले व्यञ्जन करे, वन्य नाना शाक ॥

६३ ॥

बलभद्र भट्टाचार्य दो-चार दिन चल सकने के लिए अन्न का संग्रह कर लेता था। निर्जन स्थान पर वह इसी अन्न को पकाता और जंगल से एकत्र किये हुए साग-सब्जी तथा फल-मूल को खाने के लिए तैयार करता।

परम सन्तोष प्रभुर वन्य-भोजने । महा-सुख पान, ग्रे दिन रहेन निर्जने ॥

६४।। महाप्रभु इस जंगली साग-सब्जी को खाकर परम सुखी होते और इससे भी अधिक सुखी तब होते जब वे किसी निर्जन स्थान में ठहरते।

भट्टाचार्य सेवा करे, स्नेहे ग्रैछे 'दास' ।।ताँर विप्र वहे जल-पात्र-बहिर्वास ।। ६५ ।। बलभद्र भट्टाचार्य महाप्रभु से इतना स्नेह करता कि वह दास की तरह सेवा करता रहता। उसका सहायक ब्राह्मण जलपात्र तथा वस्त्र लिये रहता।

निर्झरेते उष्णोदके स्नान तिन--बार ।।दुइ-सन्ध्या अग्नि-ताप काष्ठेर अपार ।। ६६ ॥

महाप्रभु झरने के गरम जल से तीन बार स्नान करते थे। वे प्रात: और सायंकाल प्रचुर लकड़ियों से उत्पन्न अग्नि से अपने आपको गरमाते थे।

निरन्तर प्रेमावेशे निर्जने गमन ।।सुख अनुभवि' प्रभु कहेन वचन ॥

६७ ॥

इस एकान्त जंगल में यात्रा करते हुए और परम सुख का अनुभव करते हुए श्री चैतन्य महाप्रभु ने ये वचन कहे।

शुन, भट्टाचार्य,–आमि गेलाङ बहु-देश ।।वन-पथे दुःखेर काहाँ नाहि पाइ लेश ॥

६८ ॥

हे भट्टाचार्य, मैंने जंगल से होकर बहुत दूर की यात्रा की है, किन्तु मुझे तनिक भी कष्ट नहीं हुआ है।

कृष्ण कृपालु, आमाय बहुत कृपा कैला ।वन-पथे आनि' आमाय बड़ सुख दिला ॥

६९॥

कृष्ण मुझ पर विशेष कृपालु हैं। उन्होंने जंगल से होकर जाने वाले इस पथ पर लाकर मुझ पर कृपा दिखलाई है। इस तरह उन्होंने मुझे अत्यधिक आनन्द प्रदान किया है।

पूर्वे वृन्दावन ग्राइते करिलाङविचार ।माता, गङ्गा, भक्त-गणे देखिब एक-बार ॥

७० ॥

इसके पूर्व मैंने वृन्दावन जाने और रास्ते में एक बार फिर से अपनी माता, गंगा नदी तथा अन्य भक्तों को देखने का निश्चय किया था।

भक्त-गण-सङ्गे अवश्य करिब मिलन ।भक्त-गणे सङ्गे ला याब 'वृन्दावन' ॥

७१॥

मैंने सोचा था कि एक बार फिर सभी भक्तों को देखूगा और उनसे मिलूंगा तथा उन्हें अपने साथ वृन्दावन ले जाऊँगा।

एत भावि' गौड़-देशे करिलॅ गमन ।।माता, गङ्गा भक्ते देखि' सुखी हैल मन ॥

७२॥

इस तरह मैं बंगाल गया और वहाँ अपनी माता, गंगा नदी तथा भक्तों को देखकर अत्यन्त सुखी हुआ।

भक्त-गणे लञा तबे चलिलाङरङ्गे।।लक्ष-कोटि लोक ताहाँ हैल आमा-सङ्गे ॥

७३॥

किन्तु जब मैं वृन्दावन को चलने लगा, तो हजारों, लाखों लोग एकत्रित हो गये और मेरे साथ चलने लगे।

सनातन-मुखे कृष्ण आमा शिखाइला ।ताहा विघ्न करि' वन-पथे ला आइला ॥

७४॥

इस तरह मैं एक बड़ी भीड़ के साथ वृन्दावन जा रहा था, किन्तु सनातन के मुख से कृष्ण ने मुझे एक शिक्षा दी। इस तरह कुछ अवरोध डालकर उन्होंने मुझे इस जंगल से होकर जाने वाले वृन्दावन के मार्ग पर ला दिया।

कृपार समुद्र, दीन-हीने दयामय ।। कृष्ण-कृपा विना कोन 'सुख' नाहि हय ॥

७५ ॥

कृष्ण कृपा के सागर हैं। वे दीन तथा पतितों पर विशेष रूप से दयालु हैं। उनकी कृपा के बिना सुख की कोई सम्भावना नहीं है।

भट्टाचार्ये आलिङ्गिया ताँहारे कहिल ।। ‘तोमार प्रसादे आमि एत सुख पाइल' ॥

७६ ॥

तब श्री चैतन्य महाप्रभु ने बलभद्र भट्टाचार्य का आलिंगन किया और उससे कहा, तुम्हारी कृपा से ही मैं अब इतना सुखी हूँ।

तेंहो कहेन,---तुमि 'कृष्ण', तुमि 'दयामय' ।अधम जीव मुञि, मोरे हइला सदय ॥

७७ ॥

बलभद्र भट्टाचार्य ने उत्तर दिया, हे प्रभु, आप साक्षात् कृष्ण हैं, इसीलिए आप इतने दयालु हैं। मैं तो पतित जीव हूँ, किन्तु आपने मुझ पर अतीव कृपा की है।

मुजि छारे, मोरे तुमि सङ्गे ला आइला ।कृपा करि' मोर हाते 'प्रभु' भिक्षा कैली ॥

७८ ॥

हे महोदय, मैं अत्यन्त पतित हैं, फिर भी आप मुझे अपने साथ ले। आये। आपने महती कृपा करके मेरे द्वारा बनाया हुआ भोजन स्वीकार किया है।

अधम-काकेरे कैला गरुड़-समान ।।‘स्वतन्त्र ईश्वर' तुमिस्वयं भगवान् ॥

७९ ॥

यद्यपि मैं अधम कौवे से अधिक अच्छा नहीं हूँ, किन्तु आपने मुझे अपना वाहन गरुड़ बनाया है। आप स्वतन्त्र पूर्ण पुरुषोत्तम परमेश्वर हैंआदि भगवान् हैं।

मूकं करोति वाचालं पङ्गं लङ्घयते गिरिम् ।।ग्रत्कृपा तमहं वन्दे परमानन्द-माधवम् ॥

८० ॥

पूर्ण पुरुषोत्तम भगवान् सच्चिदानन्द विग्रह-दिव्य आनन्द, ज्ञान तथा शाश्वतता के मूर्तिमान रूप हैं। मैं उन्हें सादर नमस्कार करता हूँ, जिनकी कृपा से गूंगा वक्ता बन जाता है और लंगड़ा पर्वत को लाँघ जाता है। ऐसी है भगवान् की कृपा।

एइ-मत बलभद्र करेन स्तवन ।।प्रेम-सेवा करि' तुष्ट कैल प्रभुर मन ॥

८१॥

इस तरह बलभद्र भट्टाचार्य ने महाप्रभु की स्तुति की। उसने प्रेममयी सेवा करके महाप्रभु के मन को तुष्ट किया।

एइ-मत नाना-सुखे प्रभु आइला 'काशी' । मध्याह्न-स्नान कैल मणिकर्णिकाय आसि' ॥

८२॥

अन्त में महाप्रभु प्रसन्न मन से काशी नामक तीर्थस्थान में आ पहुँचे। वहाँ उन्होंने मणिकर्णिका नामक घाट में स्नान किया।

सेइ-काले तपन-मिश्र करे गङ्गा-स्नान ।।प्रभु देखि' हैल ताँर किछु विस्मय ज्ञान ॥

८३॥

उस समय तपन मिश्र गंगा में स्नान कर रहे थे। वे महाप्रभु को वहाँ देखकर विस्मित हुए।

‘पूर्वे शुनियाछि प्रभु कय़छेन सन्यास' ।निश्चय करिया हैल हृदये उल्लास ॥

८४॥

तब तपन मिश्र सोचने लगे, मैंने सुना है कि श्री चैतन्य महाप्रभु ने संन्यास ग्रहण कर लिया है। यह सोचकर तपन मिश्र मन ही मन अत्यन्त प्रफुल्लित हुए।

प्रभुर चरण धरि' करेन रोदन ।।प्रभु तारे उठाजा कैल आलिङ्गन ॥

८५॥

फिर उन्होंने श्री चैतन्य महाप्रभु के चरणकमल पकड़ लिये और रुदन करने लगे। महाप्रभु ने उन्हें उठाकर उनका आलिंगन किया।

प्रभु ला गेला विश्वेश्वर-दरशने ।तबे आसि' देखे बिन्दु-माधव-चरणे ॥

८६॥

तब तपन मिश्र श्री चैतन्य महाप्रभु को विश्वेश्वर मन्दिर में दर्शन करने ले गये। वहाँ से आते हुए दोनों ने बिन्दु माधव के चरणकमलों का दर्शन किया।

घरे लजा आइला प्रभुके आनन्दित हा ।सेवा करि' नृत्य करे वस्त्र उड़ाना ॥

८७॥

तपन मिश्र खुशी-खुशी श्री चैतन्य महाप्रभु को अपने घर ले आये और उनकी सेवा करने लगे। वे अपने वस्त्र लहराकर नृत्य करने लगे।

प्रभुर चरणोदक सवंशे कैल पान ।।भट्टाचार पूजा कैल करिया सम्मान ॥

८८ ॥

उन्होंने श्री चैतन्य महाप्रभु के चरणकमलों को धोया और बाद में उस चरणोदक को उन्होंने स्वयं तथा पूरे परिवार ने पिया। उन्होंने बलभद्र । भट्टाचार्य की भी पूजा की और सम्मान किया।

प्रभुरे निमन्त्रण करि' घरे भिक्षा दिल ।बलभद्र-भट्टाचार्ये पाक कराइल ॥

८९॥

तपन मिश्र ने श्री चैतन्य महाप्रभु को अपने घर में भोजन करने के लिए आमन्त्रित किया और बलभद्र भट्टाचार्य को भोजन बनाने का काम सौंप दिया।

भिक्षा करि' महाप्रभु करिला शयन ।।मिश्र-पुत्र रघु करे पाद-सम्वाहन ॥

९०॥

भोजन के बाद जब श्री चैतन्य महाप्रभु विश्राम करने लगे, तब तपन मिश्र के पुत्र रघु ने उनके पाँव दबाये।

प्रभुर 'शेषान्न' मिश्र सवंशे खाइले ।‘प्रभु आइला' शुनि' चन्द्रशेखर आइल ॥

९१॥

श्री चैतन्य महाप्रभु द्वारा छोड़े गये भोजन को तपन मिश्र के सारे परिवार ने ग्रहण किया। जब महाप्रभु के आने का समाचार फैल गया, तो चन्द्रशेखर भी उन्हें मिलने आये।

मिश्रेर सखा तेहो प्रभुर पूर्व दास ।। वैद्य-जाति, लिखन-वृत्ति, वाराणसी-वास ॥

९२॥

चन्द्रशेखर तपन मिश्र के मित्र थे और श्री चैतन्य महाप्रभु अपने दास के रूप में उन्हें बहुत पहले से जानते थे। वे जाति के वैद्य थे, किन्तु मुनीम का पेशा करते थे। उस समय वे वाराणसी में रह रहे थे।

आसि' प्रभु-पदे पड़ि' करेन रोदन ।।प्रभु उठि' ताँरै कृपाय कैल आलिङ्गन ॥

९३॥

चन्द्रशेखर वहाँ आकर श्री चैतन्य महाप्रभु के चरणकमलों पर गिरकर रोने लगे। महाप्रभु ने खड़े होकर अपनी अहैतुकी कृपावश उनका आलिंगन किया।

चन्द्रशेखर कहे,“प्रभु, बड़ कृपा कैला ।आपने आसिया भृत्ये दरशन दिला ॥

९४॥

चन्द्रशेखर ने कहा, हे प्रभु, आपने मुझ पर अपनी अहैतुकी कृपा प्रदर्शित की है, क्योंकि मैं आपका पुराना सेवक हूँ। निस्सन्देह, आप मुझे दर्शन देने के लिए यहाँ पधारे हैं।

आपन-प्रारब्धे वसि' वाराणसी-स्थाने ।‘माया', 'ब्रह्म' शब्द विना नाहि शुनि काणे ॥

९५ ॥

मैं अपने विगत कर्मों के कारण वाराणसी में रह रहा हूँ, किन्तु यहाँ पर मैं 'माया' तथा 'ब्रह्म' शब्दों के अतिरिक्त और कुछ नहीं सुनता।

घडू-दर्शन-व्याख्या विना कथा नाहि एथा ।। मिश्र कृपा करि' मोरे शुनान कृष्ण-कथा ॥

९६ ॥

चन्द्रशेखर ने आगे कहा, वाराणसी में छः दर्शनों की व्याख्या के अतिरिक्त कोई दूसरी बात नहीं होती। इतने पर भी तपन मिश्र मुझ पर बहुत कृपालु हैं, क्योंकि वे कृष्ण सम्बन्धी कथाएँ सुनाते हैं।

निरन्तर बँहे चिन्ति तोमार चरण ।। ‘सर्वज्ञ ईश्वर' तुमि दिला दरशन ॥

९७॥

हे प्रभु, हम दोनों निरन्तर आपके चरणकमलों का चिन्तन करते हैं। यद्यपि आप सर्वज्ञ पूर्ण पुरूषोत्तम भगवान् हैं, तथापि आपने हमें अपना दर्शन दिया है।

शुनि, ‘महाप्रभु' ग्राबेन श्री-वृन्दावने ।। दिन कत रहि' तार' भृत्य दुइ-जने ॥

९८॥

हे प्रभु, मैंने सुना है कि आप वृन्दावन जा रहे हैं। कृपया वाराणसी में कुछ दिन रहकर आप हमारा उद्धार कर दें, क्योंकि हम दोनों आपके सेवक हैं।

मिश्र कहे,'प्रभु, यावत्काशीते रहिबा ।। मोर निमन्त्रण विना अन्य ना मानिबा' ॥

९९ ॥

तब तपन मिश्र ने कहा, हे प्रभु, आप जब तक वारणसी में रहें, आप कृपया मेरे अतिरिक्त अन्य किसी का निमन्त्रण स्वीकार न करें।

एइ-मत महाप्रभु दुइ भृत्येर वशे । इच्छा नाहि, तबु तथा रहिला दिन-दशे ॥

१००॥

अपने इन दो सेवकों की प्रार्थनाओं से वश होकर महाप्रभु वाराणसी में दस दिनों तक रहे, यद्यपि उनकी कोई ऐसी योजना नहीं थी।

महाराष्ट्रीय विप्र आइसे प्रभु देखिबारे ।।प्रभुर रूप-प्रेम देखि' हय चमत्कारे ॥

१०१॥

वाराणसी में महाराष्ट्र का रहने वाला एक ब्राह्मण था, जो नित्य ही श्री चैतन्य महाप्रभु का दर्शन करने आता था। वह ब्राह्मण महाप्रभु के । सौन्दर्य तथा कृष्ण-प्रेम को देखकर अतीव चकित था।

विप्र सब निमन्त्रय, प्रभु नाहि माने ।।प्रभु कहे,–'आजि मोर हाछे निमन्त्रणे' ॥

१०२॥

जब वाराणसी के ब्राह्मण महाप्रभु को भोजन पर निमन्त्रित करते, तो वे उनका निमन्त्रण स्वीकार नहीं करते थे। वे यह उत्तर देते, मैं पहले से अन्यत्र निमन्त्रित हूँ।

एइ-मत प्रति-दिन करेन वञ्चन ।।सन्यासीर सङ्ग-भये ना मानेन निमन्त्रण ॥

१०३ ॥

श्री चैतन्य महाप्रभु प्रतिदिन लोगों के निमन्त्रण अस्वीकार करते रहते थे, क्योंकि वे मायावादी संन्यासियों की संगति से डरते थे।

प्रकाशानन्द श्रीपाद सभाते वसिया ।। ‘वेदान्त' पड़ान बहु शिष्य-गण ला ॥

१०४॥

वहाँ प्रकाशानन्द सरस्वती नामक एक महान् मायावादी संन्यासी थे, जो अपने अनुयायियों की एक बहुत बड़ी सभा को वेदान्त-दर्शन पढ़ाया करते थे।

एक विप्र देखि' आइला प्रभुर व्यवहार ।। प्रकाशानन्द-आगे कहे चरित्र ताँहार ॥

१०५॥

एक ब्राह्मण जिसने श्री चैतन्य महाप्रभु के विचित्र व्यवहार को देखा था, वह प्रकाशानन्द सरस्वती के पास आया और उसने महाप्रभु के गुणों का बखान किया।

एक सन्यासी आइला जगन्नाथ हैते । ताँहार महिमा-प्रताप ना पारि वर्णिते ।। १०६॥

उस ब्राह्मण ने प्रकाशानन्द सरस्वती से कहा, जगन्नाथ पुरी से एक मंन्यासी आया है, जिसके अद्भुत प्रभाव तथा यश का वर्णन करने में मैं असमर्थ हूँ।

सकल देखिये ताँते अद्भुत-कथन ।।प्रकाण्ड-शरीर, शुद्ध-काञ्चन-वरण ॥

१०७॥

उस संन्यासी की हर वस्तु निराली है। उसका शरीर सुगठित तथा अत्यलंकृत है और उसका रंग विशुद्ध सोने के समान है।

आजानु-लम्बित भुज, कमल-नयन ।ग्रत किछु ईश्वरेर सर्व सल्लक्षण ॥

१०८॥

उसकी भुजाएँ घुटने तक लम्बी हैं और उसकी आँखें कमल की पंखुड़ियों जैसी हैं। उसके शरीर में पूर्ण पुरुषोत्तम भगवान् के सारे लक्षण है।

ताहा देखि' ज्ञान हय–‘एइ नारायण ।। येइ ताँरै देखे, करे कृष्ण-सङ्कीर्तन ॥

१०९॥

जो भी उसके ये लक्षण देखता है, वह उसे साक्षात् नारायण मानने लगता है। जो भी उसे देखता है, वह तुरन्त कृष्ण-नाम का कीर्तन करने लगता है।

महा-भागवत'-लक्षण शुनि भागवते । से-सब लक्षण प्रकट देखिये ताँहाते ॥

११०॥

हमने श्रीमद्भागवत में महाभागवत के जो-जो लक्षण सुने हैं, वे सभी लक्षण श्री चैतन्य महाप्रभु के शरीर में प्रकट हैं।

‘निरन्तर कृष्ण-नाम' जिह्वा ताँर गाय ।दुइ-नेत्रे अश्रु वहे गङ्गा-धारा-प्राय ॥

१११॥

उसकी जीभ निरन्तर कृष्ण के पवित्र नाम का कीर्तन करती है और उसकी आँखों से आँसू गंगा की धारा की तरह निरन्तर बहते रहते हैं।

क्षणे नाचे, हासे, गाय, करये क्रन्दन ।।क्षणे हुहुङ्कार करे,—सिंहेर गर्जन ॥

११२॥

कभी वह नाचता है, हँसता है, गाता है, रोता है और कभी सिंह की तरह गर्जना करता है।

जगत्मङ्गल ताँर ‘कृष्ण-चैतन्य'-नाम ।।नाम, रूप, गुण ताँर, सब–अनुपम ॥

११३॥

उसका नाम कृष्ण चैतन्य है, जो सारे जगत् के लिए शुभ है। उसका । सब कुछ-नाम, रूप तथा गुण सभी अद्वितीय हैं।

देखिले से जानि ताँर 'ईश्वरेर रीति' ।अलौकिक कथा शुनि' के करे प्रतीति? ॥

११४॥

उसे देखने से ही जान पड़ता है कि उसमें पूर्ण पुरुषोत्तम भगवान् के सारे गुण विद्यमान हैं। ऐसे गुण निश्चित रूप से असामान्य हैं। भला इन पर कौन विश्वास करेगा? शुनिया प्रकाशानन्द बहुत हासिला ।।विप्रे उपहास करि' कहते लागिला ॥

११५॥

यह विवरण सुनकर प्रकाशानन्द सरस्वती खूब हँसे। उस ब्राह्मण का उपहास करते हुए वे इस तरह बोले।

शुनियाछि गौड़-देशेर सन्यासी-'भावुक' ।केशव-भारती-शिष्य, लोक-प्रतारक ॥

११६॥

प्रकाशानन्द सरस्वती ने कहा, हाँ, मैंने भी उसके विषय में सुना है। वह बंगाल से आया हुआ संन्यासी है और अत्यन्त भावुक है। मैंने यह भी सुना है कि वह भारती सम्प्रदाय का है, क्योंकि वह केशव भारती का शष्य है। किन्तु वह केवल ढोंगी है।

‘चैतन्य'-नाम ताँर, भावुक-गण ला ।। देशे देशे ग्रामे ग्रामे बुले नाचा ॥

११७॥

प्रकाशानन्द सरस्वती ने आगे कहा: मैं जानता हूँ कि उसका नाम चैतन्य है और उसके साथ अनेक भावुक लोग रहते हैं। उसके अनुयायी उसके साथ नाचते हैं और एक देश से दूसरे देश तथा एक गाँव से दूसरे गाँव में जाते रहते हैं।

ग्रेड ताँरै देखे, सेइ ईश्वर करि' कहे ।। ऐछे मोहन-विद्या ये देखे से मोहे ॥

११८॥

जो भी उसे देखता है, वह उसे पूर्ण पुरूषोत्तम भगवान् के रूप में स्वीकार कर लेता है। चूंकि वह अपनी योगशक्ति से लोगों को सम्मोहित करता है, अतः जो भी उसे देखता है, वह मोहित हो जाता है।

सार्वभौम भट्टाचार्य-पण्डित प्रबल । शुनि' चैतन्येर सङ्गे हइल पागल ॥

११९॥

सार्वभौम भट्टाचार्य बहुत बड़े विद्वान थे, किन्तु मैंने सुना है कि वे भी इस चैतन्य की संगति से पागल हो गये हैं।

‘सन्यासी' नाम-मात्र, महा-इन्द्रजाली! ।। “काशीपुरे' ना विकाबे ताँर भावकालि ॥

१२०॥

यह चैतन्य केवल नाम का संन्यासी है। वास्तव में यह एक बहुत बड़ा जादूगर है। जो भी हो, काशी में उसकी भावुकता की माँग अधिक नहीं होगी।

वेदान्त' श्रवण कर, ना ग्राइह ताँर पाश । उच्छृङ्खल-लोक-सङ्गे दुइ-लोक-नाश ॥

१२१॥

तुम चैतन्य को मिलने मत जाना। तुम वेदान्त सुनते रहो। यदि तुम ऐसे उच्छृखल लोगों का संग करोगे, तो तुम्हारा यह लोक तथा परलोक दोनों नष्ट हो जायेंगे।

एत शुनि' सेइ विप्र महा-दुःख पाइला ।। 'कृष्ण' 'कृष्ण' कहि' तथा हैते उठि' गेला ॥

१२२॥

जब उस ब्राह्मण ने प्रकाशानन्द सरस्वती को श्री चैतन्य महाप्रभु के विषय में इस तरह कहते सुना, तो वह अत्यन्त दुःखी हुआ। वह कृष्ण कृष्ण कहता हुआ वहाँ से तुरन्त चला गया।

प्रभुर दरशने शुद्ध हजाछे ताँर मन ।। प्रभु-आगे दुःखी हञा कहे विवरण ॥

१२३॥

उस ब्राह्मण ने कहा, ज्योंही मैंने उसके सामने आपके नाम का उच्चारण किया, त्योंही उसने इस बात की पुष्टि की कि वह आपके नाम को जानता है।

शुनि' महाप्रभु तबे ईषत् हासिला ।। पुनरपि सेइ विप्र प्रभुरे पुछिला ॥

१२४॥

यह सुनकर श्री चैतन्य महाप्रभु थोड़ा मुस्कुराये। तब वह ब्राह्मण महाप्रभु से पुनः बोला।

तार आगे धबे आमि तोमार नाम लइल ।। सेह तोमार नाम जाने,—आपने कहिले ।। १२५ ॥

उस ब्राह्मण का चित्त भगवान् श्री चैतन्य महाप्रभु का दर्शन करने के कारण पहले से शुद्ध हो चुका था। अतः वह श्री चैतन्य महाप्रभु के पास गया और प्रकाशानन्द सरस्वती के सामने जो कुछ हुआ था, उन्हें कह सुनाया।

तोमार ‘दोष' कहिते करे नामेर उच्चार ।। 'चैतन्य' 'चैतन्य' करि' कहे तिन-बार ।। १२६।। आपके दोषों को गिनाते हुए उसने तीन बार 'चैतन्य' ‘चैतन्य' ‘चैतन्य' उच्चारण करके आपके नाम का उच्चारण किया।

तिन-बारे ‘कृष्ण-नाम' ना आइल तार मुखे ।।‘अवज्ञा'ते नाम लय, शुनि' पाइ दुःखे ॥

१२७॥

यद्यपि उसने आपका नाम तीन बार लिया, किन्तु 'कृष्ण' का नाम एक बार भी नहीं लिया। चूंकि उसने तिरस्कार करके आपका नाम लिया, अतएव मुझे बहुत दुःख हुआ।

इहार कारण मोरे कह कृपा करि' । तोमा देखि' मुख मोर बले 'कृष्ण' हरि ॥

१२८॥

आखिर प्रकाशानन्द ने 'कृष्ण' तथा 'हरि' के नाम क्यों नहीं लिए? उसने 'चैतन्य' नाम का तीन बार उच्चारण किया। मैं तो आपको देखकर ही 'कृष्ण' तथा 'हरि' नामों का उच्चारण करने के लिए प्रेरित हो जाता हैं।

प्रभु कहे,_मायावादी कृष्णे अपराधी ।। ‘ब्रह्म', 'आत्मा,' 'चैतन्य' कहे निरवधि ॥

१२९ ।। श्री चैतन्य महाप्रभु ने उत्तर दिया, मायावादी निर्विशेषवादी लोग भगवान् कृष्ण के सबसे बड़े अपराधी हैं। इसीलिए वे मात्र ‘ब्रह्म, ‘आत्मा' तथा 'चैतन्य' शब्दों का उच्चारण करते हैं।

अतएव तार मुखे ना आइसे कृष्ण-नाम ।। ‘कृष्ण-नाम', 'कृष्ण-स्वरूप'–दुइत 'समान' ॥

१३०॥

कृष्ण' को पवित्र नाम उनके मुखों पर नहीं आता, क्योंकि वे भगवान् कृष्ण, जो अपने नाम से अभिन्न हैं, उनके प्रति अपराधी हैं।

'नाम', 'विग्रह', 'स्वरूप'––तिन एक-रूप । तिने 'भेद' नाहि,तिन 'चिदानन्द-रूप' ॥

१३१॥

भगवान् का पवित्र नाम, उनका विग्रह और उनका स्वरूप-ये तीनों एक हैं। इनमें कोई अन्तर नहीं है। चूंकि ये सभी परम पूर्ण हैं, अतः ये चिदानन्द स्वरूप अर्थात् दिव्य रूप से आनन्दमय हैं।

देह-देहीर, नाम-नामीर कृष्णे नाहि भेद' ।। जीवेर धर्म–नाम-देह-स्वरूपे 'विभेद' ॥

१३२॥

कृष्ण के शरीर तथा स्वयं कृष्ण में या उनके नाम तथा स्वयं उनमें कोई अन्तर नहीं है। किन्तु जहाँ तक बद्धजीव का सवाल है, उसका नाम उसके शरीर से, उसके मूल स्वरूप आदि से भिन्न होता है।

नाम चिन्तामणिः कृष्णश्चैतन्य-रस-विग्रहः । पूर्णः शुद्धो नित्य-मुक्तोऽभिन्नत्वान्नाम-नामिनोः ॥

१३३॥

कृष्ण का पवित्र नाम दिव्य रूप से आनन्दमय है। यह सभी प्रकार के आध्यात्मिक वर देने वाला है, क्योंकि यह समस्त आनन्द के आगार, स्वयं कृष्ण है। कृष्ण का नाम पूर्ण है और यह सभी दिव्य रसों का स्वरूप है। यह किसी भी स्थिति में भौतिक नाम नहीं है और यह स्वयं कृष्ण से किसी तरह कम शक्तिशाली नहीं है। चूंकि कृष्ण का नाम भौतिक गुणों से कलुषित नहीं होता, अतएव इसका माया में लिप्त होने का प्रश्न ही नहीं उठता। कृष्ण का नाम सदैव मुक्त तथा आध्यात्मिक है, यह कभी भी भौतिक प्रकृति के नियमों द्वारा बद्ध नहीं होता। ऐसा इसीलिए है, क्योंकि कृष्ण-नाम तथा स्वयं कृष्ण अभिन्न हैं।

अतएव कृष्णेर 'नाम', 'देह', ‘विलास' ।।प्राकृतेन्द्रिय-ग्राह्य नहे, हय स्व-प्रकाश ॥

१३४॥

भगवान् कृष्ण का पवित्र नाम, उनका शरीर तथा उनकी लीलाएँ इन कुंठित भौतिक इन्द्रियों द्वारा नहीं जाने जा सकते। वे स्वतन्त्र रूप से प्रकट होते हैं।

कृष्ण-नाम, कृष्ण-गुण, कृष्ण-लीला-वृन्द । कृष्णेर स्वरूप-सम-सब चिदानन्द ॥

१३५॥

कृष्ण का पवित्र नाम, उनके दिव्य गुण तथा उनकी दिव्य लीलाएँ स्वयं भगवान् कृष्ण के समान हैं। वे सभी आध्यात्मिक तथा आनन्दमय हैं।

अत: श्रीकृष्ण-नामादि न भवेद्ग्राह्यमिन्द्रियैः ।। सेवोन्मुखे हि जिह्वादौ स्वयमेव स्फुरत्यदः ॥

१३६ ।। इसलिए भौतिक इन्द्रियाँ कृष्ण के नाम, रूप, गुण तथा लीलाओं को समझ नहीं पातीं। जब बद्धजीवों में कृष्णभावना जाग्रत होती है और वह अपनी जीभ से भगवान् के पवित्र नाम का कीर्तन करता है तथा भगवान् के शेष बचे भोजन का आस्वादन करता है, तब उसकी जीभ शुद्ध हो जाती है और वह क्रमशः समझने लगता है कि कृष्ण कौन हैं।

ब्रह्मानन्द हैते पूर्णानन्द लीला-रस ।।ब्रह्म-ज्ञानी आकर्षिया करे आत्म-वश ॥

१३७॥

भगवान् कृष्ण की लीलाओं के रस आनन्द से पूर्ण हैं। वे ज्ञानी को ब्रह्म-साक्षात्कार के आनन्द से आकर्षित कर उसे जीत लेते हैं।

स्व-सुख-निभृत-चेतास्तद्व्युदस्तान्य-भावोऽप्यजित-रुचिर-लीलाकृष्ट-सारस्तदीयम् । व्यतनुत कृपया यस्तत्त्व-दीपं पुराणंतमखिल-वृजिन-घ्नं व्यास-सूनुं नतोऽस्मि ॥

१३८॥

मैं अपने गुरु व्यास-पुत्र शुकदेव गोस्वामी को सादर नमस्कार करता हूँ। वे ही इस ब्रह्माण्ड के अन्तर्गत सारी अशुभ वस्तुओं को परास्त करते हैं। यद्यपि वे प्रारम्भ में ब्रह्म-साक्षात्कार के सुख में निमग्न थे और अन्य समस्त प्रकार की चेतना का परित्याग करके एकान्त वास कर रहे थे, किन्तु वे श्रीकृष्ण की अत्यन्त रागमयी लीलाओं के प्रति आकृष्ट हो गये। अतएव उन्होंने कृपापूर्वक श्रीमद्भागवत नामक सर्वोच्च पुराण का प्रवचन किया, जो परम सत्य का उज्ज्वल प्रकाश है और जो भगवान् कृष्ण की लीलाओं का वर्णन करता है।'

ब्रह्मानन्द हैते पूर्णानन्द कृष्ण-गुण ।।अतएव आकर्षये आत्मारामेर मन ॥

१३९॥

श्रीकृष्ण के दिव्य गुण पूर्णतया आनन्दमय तथा आस्वाद्य हैं। फलस्वरूप भगवान् कृष्ण के गुण आत्म-साक्षात्कार प्राप्त व्यक्तियों के मन को भी आत्म-साक्षात्कार के आनन्द से आकर्षित कर लेते हैं।

आत्मारामाश्च मुनयो निर्ग्रन्था अप्युरुक्रमे ।।कुर्वन्त्यहैतुकीं भक्तिमित्थम्भूत-गुणो हरिः ॥

१४०॥

जो आत्माराम अर्थात् स्वयं-सन्तुष्ट हैं और बाहरी भौतिक इच्छाओं से आकृष्ट नहीं होते, वे भी श्रीकृष्ण की प्रेमाभक्ति के प्रति आकर्षित होते हैं, जिनके गुण दिव्य हैं और कार्यकलाप अद्भुत हैं। भगवान् हरि कृष्ण कहलाते हैं, क्योंकि उनका स्वरूप अत्यन्त दिव्य और आकर्षक है।'

एइ सब रहु—कृष्ण-चरण-सम्बन्धे । आत्मारामेर मन हरे तुलसीर गन्धे ॥

१४१॥

भगवान् कृष्ण की लीलाओं के अतिरिक्त, जब उनके चरणकमलों पर तुलसी-दल चढ़ाया जाता है, तब उसकी सुगन्ध से आत्म-साक्षात्कार प्राप्त व्यक्तियों ( आत्माराम) के भी मन आकृष्ट हो जाते हैं।

तस्यारविन्द-नयनस्य पदारविन्द ।। किञ्जल्क-मिश्र-तुलसी-मकरन्द-वायुः ।। अन्तर्गतः स्व-विवरेण चकार तेषां ।सक्षोभमक्षर-जुषामपि चित्त-तन्वोः ॥

१४२॥

जब भगवान् के चरणकमलों से तुलसी तथा केशर की सुगन्ध ले जाने वाली वायु ने उन मुनियों ( कुमारों) की नासिकाओं से होकर हृदय में प्रवेश किया, तो निर्विशेष ब्रह्म में आसक्त रहते हुए भी उन्होंने अपने तन तथा मन में परिवर्तन का अनुभव किया।'

अतएव कृष्ण-नाम' ना आइसे तार मुखे ।। मायावादि-गण य़ाते महा बहिर्मुखे ॥

१४३॥

चूंकि मायावादी महान् अपराधी तथा नास्तिक हैं, इसीलिए कृष्ण का पवित्र नाम उनके मुखों से नहीं निकलता।

भावकालि वेचिते आमि आइलाङकाशीपुरे ।। ग्राहक नाहि, ना विकाय, लञा याब घरे ॥

१४४॥

मैं इस काशी नगरी में अपने प्रेम-भावों को बेचने आया हूँ, किन्तु मझे कोई ग्राहक नहीं मिल पा रहा है। यदि वे नहीं बिक सकते तो उन्हें में घर वापस लेता जाऊँगा।

भारी बोझा ला आइलाङ, केमने ला ग्राब? । अल्प-स्वल्प-मूल्य पाइले, एथाइ वेचिब ॥

१४५ ॥

मैं इस शहर में बेचने के लिए भारी बोझ लेकर आया हूँ। इसे फिर वापस ले जाना कठिन कार्य है, अतः यदि मुझे असली मूल्य का कुछ अंश भी मिल सका, तो मैं इस काशी नगरी में इसे बेच दूंगा।

एत बलि' सेइ विप्रे आत्मसाथ करि' ।।प्राते उठि मथुरा चलिला गौरहरि ॥

१४६॥

यह कहकर श्री चैतन्य महाप्रभु ने उस ब्राह्मण को अपने भक्त के रूप में स्वीकार कर लिया। अगले दिन वे जल्दी उठकर मथुरा के लिए चल पड़े।

सेइ तिन सङ्गे चले, प्रभु निषेधिल ।।दूर हैते तिन-जने घरे पाठाइल ॥

१४७॥

जब श्री चैतन्य महाप्रभु मथुरा के लिए चल पड़े, तो तीनों भक्त उनके साथ चलने लगे। किन्तु महाप्रभु ने दूर से ही उन्हें साथ चलने से मना किया और उन्हें घर लौट जाने के लिए आदेश दिया।

प्रभुर विरहे तिने एकत्र मिलिया ।। प्रभु-गुण गान करे प्रेमे मत्त हा ॥

१४८॥

महाप्रभु के विरह में तीनों जन एकत्र होकर उनके पवित्र गुणों का महिमागान करते और इस तरह प्रेमभाव में निमग्न रहते।

‘प्रयागे' आसिया प्रभु कैल वेणी-स्नान ।। ‘माधव' देखिया प्रेमे कैल नृत्य-गान ॥

१४९॥

इसके बाद श्री चैतन्य महाप्रभु प्रयाग गये जहाँ उन्होंने गंगा और यमुना नदी के संगम में स्नान किया। फिर वे वेणी माधव के मन्दिर गये और वहाँ प्रेमावेश में उन्होंने कीर्तन और नृत्य किया।

यमुना देखिया प्रेमे पड़े झाँप दिया । आस्ते-व्यस्ते भट्टाचार्य उठाय धरिया ॥

१५०॥

ज्योंही श्री चैतन्य महाप्रभु ने यमुना नदी देखी, वे उसमें कूद पड़े। बलभद्र भट्टाचार्य ने शीघ्र ही उन्हें पकड़ लिया और सावधानी से ऊपर वीध लिया।

एइ-मत तिन-दिन प्रयागे रहिला ।।कृष्ण-नाम-प्रेम दिया लोक निस्तारिला ॥

१५१॥

महाप्रभु प्रयाग में तीन दिन रहे। उन्होंने कृष्ण का पवित्र नाम तथा प्रेम प्रदान किया। इस तरह उन्होंने अनेक लोगों का उद्धार किया।

‘मथुरा' चलिते पथे ग्रथा रहि' ग्राय ।।कृष्ण-नाम-प्रेम दिया लोकेरे नाचाय ॥

१५२॥

मथुरा जाते हुए जहाँ भी महाप्रभु रुकते, वे कृष्ण-नाम तथा कृष्णप्रेम प्रदान करते। इस तरह वे लोगों को नचाते।

पूर्वे ब्रेन ‘दक्षिण' ग्राइते लोक निस्तारिला ।।‘पश्चिम'-देशे तैछे सब 'वैष्णव' करिला ॥

१५३॥

जब उन्होंने दक्षिण भारत का भ्रमण किया था, तब उन्होंने अनेक लोगों का उद्धार किया था और जब वे पश्चिमी प्रदेश में गये, तब उन्होंने उसी तरह से अनेक लोगों को वैष्णव बनाया।

पथे ग्राहाँ ग्राहाँ हय ग्रमुना-दर्शन ।ताहाँ झाँप दिया पड़े प्रेमे अचेतन ॥

१५४॥

मथुरा जाते हुए महाप्रभु को कई बार यमुना नदी मिली और वे यमुना नदी को देखते ही उसमें तुरन्त कूद पड़ते तथा जल के भीतर कृष्ण-प्रेम में अचेत हो जाते।

मथुरा-निकटे आइला–मथुरा देखियो ।दण्डवत् हा पड़े प्रेमाविष्ट हा ॥

१५५ ॥

जब मथुरा के निकट पहुँचकर उन्होंने शहर देखा, तो उन्होंने भूमि पर गिरकर अत्यन्त प्रेमाविष्ट होकर दण्डवत् प्रणाम किया।

मथुरा आसिया कैला 'विश्रान्ति-तीर्थे' स्नान ।। ‘जन्म-स्थाने' ‘केशव' देखि करिला प्रणाम ।। १५६ ॥

मथुरा नगरी में प्रवेश करने पर श्री चैतन्य महाप्रभु ने विश्राम घाट में स्नान किया। फिर वे कृष्ण की जन्मभूमि का दर्शन करने गये और उन्होंने केशवजी का दर्शन किया। महाप्रभु ने उन्हें सादर नमस्कार किया।

प्रेमानन्दे नाचे, गाय, सघन हुङ्कार ।।प्रभुर प्रेमावेश देखि' लोके चमत्कार ॥

१५७॥

जब श्री चैतन्य महाप्रभु नाचने, गाने तथा जोर-जोर से हुंकार भरने लगे, तो सारे लोग उनके प्रेमावेश को देखकर चकित रह गये।

एक-विप्र पड़े प्रभुर चरण धरिया ।प्रभु-सङ्गे नृत्य करे प्रेमाविष्ट हञा ॥

१५८॥

एक ब्राह्मण आकर महाप्रभु के चरणकमलों पर गिर पड़ा और फिर प्रेमाविष्ट होकर उनके साथ साथ नृत्य करने लगा।

मुँहे प्रेमे नृत्य करि' करे कोलाकुलि ।।हरि कृष्ण कह देंहे बले बाहु तुलि' ॥

१५९॥

वे दोनों भावाविष्ट होकर नाचने तथा एक-दूसरे को आलिंगन करने लगे। वे हाथ उठाकर कहने लगे, हरि तथा कृष्ण के नामों का कीर्तन करो! लोक ‘हरि' ‘हरि' बले, कोलाहल हैल ।। ‘केशव'-सेवक प्रभुके माला पराइल ॥

१६०॥

तब सारे लोग हरि! हरि! उच्चारण करने लगे और वहाँ बहुत कोलाहल होने लगा। भगवान् केशव की सेवा में लगे पुजारी ने महाप्रभु को लाकर एक माला भेंट की।

लोके कहे प्रभु देखि' हा विस्मय ।।ऐछे हेन प्रेम ‘लौकिक' कभु नय ॥

१६१॥

जब लोगों ने श्री चैतन्य महाप्रभु को नृत्य करते तथा कीर्तन करते देखा, तो वे आश्चर्यचकित रह गये और सबने कहा, ऐसा दिव्य प्रेम होना कोई सामान्य बात नहीं है।

ग्राँहार दर्शने लोके प्रेमे मत्त हुआ। हासे, कान्दे, नाचे, गाय, कृष्ण-नाम लञा ॥

१६२॥

लोगों ने कहा, श्री चैतन्य महाप्रभु के दर्शन मात्र से हर व्यक्ति कृष्ण-प्रेम में मतवाला हो रहा है। हर कोई हँस रहा है, रो रहा है, नाच रहा है, कीर्तन कर रहा है और कृष्ण का पवित्र नाम ले रहा है।

सर्वथा-निश्चित-इँहो कृष्ण-अवतार ।मथुरा आइला लोकेर करिते निस्तार ॥

१६३॥

निश्चय ही श्री चैतन्य महाप्रभु सभी तरह से भगवान् कृष्ण के अवतार हैं। अब वे हर एक का उद्धार करने मथुरा आये हैं।

तबे महाप्रभु सेइ ब्राह्मणे ला ।।ताँहारे पुछिला किछु निभृते वसिया ॥

१६४॥

इसके बाद श्री चैतन्य महाप्रभु उस ब्राह्मण को एक ओर ले गये। फिर एकान्त स्थान में बैठकर उससे पूछने लगे।

'आर्य, सरल, तुमि-वृद्ध ब्राह्मण ।।काहाँ हैते पाइले तुमि एइ प्रेम-धन?' ॥

१६५॥

श्री चैतन्य महाप्रभु ने कहा, आप वृद्ध ब्राह्मण हैं, निष्ठावान हैं तथा आध्यात्मिक जीवन में उन्नत हैं। आपको भावमय कृष्ण-प्रेम का यह दिव्य वैभव कहाँ से मिला? विप्र कहे,–'श्रीपाद श्री-माधवेन्द्र-पुरी ।।भ्रमिते भ्रमिते आइला मथुरा-नगरी ॥

१६६ ।। उस ब्राह्मण ने कहा, श्रीपाद माधवेन्द्र पुरी अपने भ्रमण के समय मथुरा नगरी में आये थे।

कृपा करि' तेंहो मोर निलये आइला । मोरे शिष्य करि' मोर हाते ‘भिक्षा' कैला ॥

१६७ ॥

मथुरा में रहते हुए श्रीपाद माधवेन्द्र पुरी मेरे घर पधारे थे और उन्होंने मुझे शिष्य बनाया था। उन्होंने मेरे घर में भोजन भी किया था।

गोपाल प्रकट करि' सेवा कैल'महाशय' ।। अद्यापिह ताँहार सेवा 'गोवर्धने' हय ॥

१६८॥

गोपाल अर्चाविग्रह की स्थापना करने के बाद श्रील माधवेन्द्र पुरी ने उनकी सेवा की। आज भी गोवर्धन पर्वत पर उसी अर्चाविग्रह की पूजा की जाती है।

शुनि' प्रभु कैल ताँर चरण वन्दन । भय पात्रा प्रभु-पाय पड़िला ब्राह्मण ॥

१६९॥

ज्योंही महाप्रभु ने उस ब्राह्मण के साथ माधवेन्द्र पुरी के सम्बन्ध के बारे में सुना, त्योंही उन्होंने उस ब्राह्मण के चरणकमलों पर अपना नमस्कार निवेदित किया। वह ब्राह्मण भी डरकर तुरन्त ही महाप्रभु के चरणों पर गिर पड़ा।

प्रभु कहे,–तुमि 'गुरु', आमि ‘शिष्य'-प्राय ।'गुरु' हा 'शिष्ये' नमस्कार ना नुयाय ॥

१७० ॥

श्री चैतन्य महाप्रभु ने कहा, आप मेरे गुरु-पद पर आसीन हैं और मैं आपका शिष्य हूँ। चूंकि आप मेरे गुरु हैं, अतः यह उचित नहीं होगा कि आप मुझे नमस्कार करें।

शुनिया विस्मित विप्र कहे भय पात्रा ।।ऐछे बात् कह केने सन्यासी हा ॥

१७१॥

यह सुनकर ब्राह्मण डर गया। तब उसने कहा, 'आप ऐसा क्यों कह रहे हैं? आप तो संन्यासी हैं।'

किन्तु तोमार प्रेम देखि' मने अनुमानि ।। माधवेन्द्र-पुरीर 'सम्बन्ध' धर—जानि ॥

१७२ ॥

आपके उत्कट प्रेम को देखकर मैं अनुमान लगा सकता हूँ कि आपका माधवेन्द्र पुरी के साथ कुछ न कुछ सम्बन्ध होना चाहिए। ऐसा समझता हूँ।

कृष्ण-प्रेमा ताँहा, याँहा ताँहार ‘सम्बन्ध' । ताहाँ विना एइ प्रेमार काहाँ नाहि गन्ध ॥

१७३ ॥

इस तरह का उत्कट प्रेम तभी अनुभव किया जा सकता है, जब fa,मी का माधवेन्द्र पुरी से सम्बन्ध हो। उनके बिना, ऐसे दिव्य उत्कट प्रेम की सुगन्ध भी सम्भव नहीं है।

तबे भट्टाचार्य तारे 'सम्बन्ध' कहिल । शुनि' आनन्दित विप्र नाचिते लागिल ॥

१७४॥

तब बलभद्र भट्टाचार्य ने माधवेन्द्र पुरी तथा श्री चैतन्य महाप्रभु का सम्बन्ध कह सुनाया। यह सुनकर ब्राह्मण अत्यन्त प्रसन्न हुआ और नाचने लगा।

तबे विप्र प्रभुरे लजा आइला निज-घरे ।।आपन-इच्छाय प्रभुर नाना सेवा करे ॥

१७५। तब वह ब्राह्मण श्री चैतन्य महाप्रभु को अपने घर ले गया और अपनी इच्छा से महाप्रभु की अनेक प्रकार से सेवा करने लगा।

भिक्षा लागि' भट्टाचार्ये कराइला रन्धन ।।तबे महाप्रभु हासि' बलिला वचन ।। १७६॥

उसने बलभद्र भट्टाचार्य से कहा कि महाप्रभु का भोजन पकायें। उस समय महाप्रभु ने हँसते हुए ये वचन कहे।

पुरी-गोसाजि तोमार घरे कर्याछेन भिक्षा ।। मोरे तुमि भिक्षा देह,--एइ मोर 'शिक्षा' ॥

१७७॥

श्री चैतन्य महाप्रभु ने कहा, माधवेन्द्र पुरी आपके स्थान पर पहले ही भोजन कर चुके हैं। अतः आप भोजन बनाकर मुझे दे सकते हैं। यह मेरा आदेश है।

यद् यदाचरति श्रेष्ठस्तत्तदेवेतरो जनः ।। से ग्रत्प्रमाणं कुरुते लोकस्तदनुवर्तते ॥

१७८ ॥

महापुरुष जो भी कर्म करता है, सामान्यजन उसका अनुसरण करते हैं। और वह अपने आदर्श कार्यों से जो भी मानदण्ड स्थापित करता है, सारा जगत् उसका अनुगमन करता है।

यद्यपि 'सनोड़िया' हय सेइत ब्राह्मण ।। सनोड़िया-घरे सन्यासी ना करे भोजन ॥

१७९।।। वह ब्राह्मण सनोड़िया जाति का ब्राह्मण था और संन्यासी ऐसे ब्राह्मण के घर भोजन नहीं करता।

तथापि पुरी देखि' ताँर 'वैष्णव'-आचार ।‘शिष्य' करि' ताँर भिक्षा कैल अङ्गीकार ॥

१८०॥

यद्यपि वह ब्राह्मण सनोड़िया जाति का था, किन्तु श्रील माधवेन्द्र पुरी ने देखा कि उसका आचरण वैष्णव जैसा है, इसलिए उन्होंने उसेअपना शिष्य बना लिया। माधवेन्द्र पुरी ने उसका पकाया भोजन भी ग्रहण किया था।

महाप्रभु ताँरे यदि भिक्षा मागिल ।।दैन्य करि' सेइ विप्र कहिते लागिल ॥

१८१॥

इसलिए श्री चैतन्य महाप्रभु ने स्वेच्छा से उस ब्राह्मण से भोजन माँगा और वह ब्राह्मण स्वाभाविक दैन्य का अनुभव करते हुए इस प्रकार बोला।

तोमारे 'भिक्षा' दिब—बड़ भाग्य से आमार ।।तुमि-—ईश्वर, नाहि तोमार विधि-व्यवहार ॥

१८२॥

आपको भोजन देने में मेरा महान् सौभाग्य है। आप परम भगवान् हैं और दिव्य पद पर होने के कारण आप पर किसी प्रकार का प्रतिबन्ध नहीं है।

'मूर्ख'-लोक करिबेक तोमार निन्दन ।सहिते ना पारिमु सेइ ‘दुष्टे'र वचन ॥

१८३॥

मूर्ख लोग आपकी निन्दा करेंगे, किन्तु मैं ऐसे दुष्ट लोगों के वचन सहन नहीं कर सकेंगा।

प्रभु कहे,—श्रुति, स्मृति, व्रत ऋषि-गण ।। सबे 'एक'-मत नहे, भिन्न भिन्न धर्म ॥

१८४॥

श्री चैतन्य महाप्रभु ने उत्तर दिया, वेद, पुराण तथा ऋषिगण सदैव आपस में सहमत नहीं होते। फलतः धर्म के भिन्न भिन्न सिद्धान्त पाये जाते।

धर्म-स्थापन-हेतु साधुर व्यवहार ।। पुरी-गोसाजिर ने आचरण, सेइ धर्म सार ॥

१८५॥

भक्त के आचरण से धर्म के वास्तविक प्रयोजन की स्थापना होती है। माधवेन्द्र पुरी गोस्वामी का आचरण ऐसे धर्मों का सार है।

तर्कोऽप्रतिष्ठः श्रुतयो विभिन्नानासावृषिग्रस्य मतं न भिन्नम् ।। धर्मस्य तत्त्वं निहितं गुहायांमहाजनो येन गतः स पन्थाः ॥

१८६॥

श्री चैतन्य महाप्रभु ने आगे कहा, शुष्क तर्क में निर्णय का अभाव होता है। जिस महापुरुष का मत अन्यों से भिन्न नहीं होता, उसे महान् ऋषि नहीं माना जाता। केवल विभिन्न वेदों के अध्ययन से कोई सही मार्ग पर नहीं आ सकता, जिससे धार्मिक सिद्धान्तों को समझा जाता है। धार्मिक सिद्धान्तों को ठोस सत्य शुद्ध स्वरूपसिद्ध व्यक्ति के हृदय में छिपा रहता है। फलस्वरूप, जैसाकि सारे शास्त्र पुष्टि करते हैं, मनुष्य को महाजनों द्वारा बतलाये गये प्रगतिशील पथ पर ही चलना चाहिए।

तबे सेइ विप्र प्रभुके भिक्षा कराइल ।।मधु-पुरीर लोक सब प्रभुके देखिते आइल ॥

१८७॥

इस वार्ता के बाद ब्राह्मण श्री चैतन्य ने महाप्रभु को भोजन कराया। फिर मथुरा के सारे निवासी महाप्रभु का दर्शन करने आये।

लक्ष-सङ्ख्य लोक आइसे, नाहिक गणन ।बाहिर हा प्रभु दिल दरशन ॥

१८८ ॥

लोग लाखों की संख्या में आये, जिनकी गणना कोई नहीं कर सकता था। अतः श्री चैतन्य महाप्रभु लोगों को दर्शन देने के लिए घर से बाहर आये।

बाहु तुलि' बले प्रभु ‘हरि-बोल'-ध्वनि ।प्रेमे मत्त नाचे लोक करि' हरि-ध्वनि ॥

१८९॥

जब लोग एकत्र हो गये, तो श्री चैतन्य महाप्रभु ने अपने हाथ उठाकर जोर से कहा, हरि बोल! लोगों ने महाप्रभु के साथ नामोच्चारण किया और प्रेमाविष्ट हो गये। वे उन्मत्त की तरह नाचने तथा हरि! की दिव्य यानि का उच्चारण करने लगे।

यमुनार ‘चब्बिश घाटे' प्रभु कैल स्नान ।। इ विप्र प्रभुके देखाय तीर्थ-स्थान ॥

१९०॥

श्री चैतन्य महाप्रभु ने यमुना नदी के किनारे के चौबीस घाटों में स्नान किया और उसे ब्राह्मण ने उन्हें सारे तीर्थस्थान दिखलाये।

स्वयम्भु, विश्राम, दीर्घ-विष्णु, भूतेश्वर ।।महाविद्या, गोकर्णादि देखिला विस्तर ॥

१९१॥

श्री चैतन्य महाप्रभु ने यमुना नदी के तट पर स्थित सारे तीर्थस्थानों को देखा, जिनमें स्वयम्भु, विश्रामघाट, दीर्घ विष्णु, भूतेश्वर, महाविद्या तथा गोकर्ण सम्मिलित हैं।

‘वन' देखिबारे यदि प्रभुर मन हैल ।। सेइत ब्राह्मणे प्रभु सङ्गेते लइल ॥

१९२॥

जब श्री चैतन्य महाप्रभु को वृन्दावन के विविध वनों को देखने की इच्छा हुई, तो उन्होंने उसी ब्राह्मण को अपने साथ ले लिया।

मधु-वन, ताल, कुमुद, बहुला-वन गेला ।। ताहाँ ताहाँ स्नान करि' प्रेमाविष्ट हैला ॥

१९३॥

श्री चैतन्य महाप्रभु ने विभिन्न वन देखे, जिनमें मधुवन, तालवन, कुमुदवन तथा बहुलावन सम्मिलित हैं। वे जहाँ जहाँ गये, उन्होंने अत्यन्त प्रेमपूर्वक स्नान किया।

पथे गाभी-घटा चरे प्रभुरे देखियो ।प्रभुके बेड़य आसि' हुङ्कार करिया ॥

१९४॥

जब श्री चैतन्य महाप्रभु वृन्दावन से होकर जा रहे थे, तब चरती हुई गौवों के झुंड ने उन्हें जाते हुए देखा। वे तुरन्त उन्हें घेरकर उच्च स्वर से भाने लगीं।

गाभी देखि' स्तब्ध प्रभु प्रेमेर तरङ्गे।। वात्सल्ये गोभी प्रभुर चाटे सब-अङ्गे ॥

१९५॥

ग्वाले बड़ी कठिनाई से अपनी गौएं संभाल पाये। फिर जब महाप्रभु ने कीर्तन किया, तो उनकी मधुर ध्वनि सुनकर सारे हिरन उनके पास आ गये।

सुस्थ हञा प्रभु करे अङ्ग-कण्डूयन ।। प्रभु-सङ्गे चले, नाहि छाड़े धेनु-गण ॥

१९६॥

स्वस्थचित्त होकर श्री चैतन्य महाप्रभु गौओं को सहलाने लगे और गौएं भी उनका साथ न छोड़ पाने के कारण उन्हीं के साथ-साथ चलने लगीं।

कष्टे-सृष्ट्ये धेनु सब राखिल गोयाल ।। प्रभु-कण्ठ-ध्वनि शुनि' आइसे मृगी-पाल ।।१९७॥

झुंड को पास आते देखकर महाप्रभु प्रेमवश स्तब्ध रह गये। तब गौएं बड़े ही वात्सल्य से उनके शरीर को चाटने लगीं।

मृग-मृगी मुख देखि' प्रभु-अङ्ग चाटे ।। भय नाहि करे, सड़े स्नाय वाटे-वाटे ॥

१९८॥

जब हिरनों तथा हिरनियों ने आकर महाप्रभु का मुख देखा, तो वे उनका शरीर चाटने लगे। उनसे तनिक भी भयभीत हुए बिना वे उनके साथ-साथ रास्ते में चलने लगे।

शुक, पिक, भृङ्ग प्रभुरे देखि' ‘पञ्चम' गाय । शिखि-गण नृत्य करि' प्रभु-आगे ग्राय ॥

१९९॥

भौंरे तथा तोता और कोयल जैसे पक्षी पंचम स्वर में गाने लगे तथा मोर महाप्रभु के आगे नाचने लगे।

प्रभु देखि' वृन्दावनेर वृक्ष-लता-गणे ।। ङ्कर पुलक, मधु-अश्रु वरिषणे ॥

२००॥

श्री चैतन्य महाप्रभु को देखकर वृन्दावन के वृक्ष तथा लताएँ सब प्रफुल्लित हो उठे। उनकी टहनियाँ खड़ी हो गई और वे मधु के रूप में प्रेम के आँसू बहाने लगे।

फुल-फल भरि' डाल पड़े प्रभु-पाय ।।बन्धु देखि' बन्धु येन 'भेट' ला ग्राय ॥

२०१॥

फूल-फल से लदे वृक्ष तथा लताएँ महाप्रभु के चरणों पर गिरकर नाना प्रकार की भेंटों से उनका स्वागत करने लगीं, मानो उनके मित्र हों।

प्रभु देखि' वृन्दावनेर स्थावर-जङ्गम् ।।आनन्दित—बन्धु ग्रेन देखे बन्धु-गण ॥

२०२॥

इस तरह वृन्दावन के सारे चर तथा अचर प्राणी महाप्रभु को देखकर परम हर्षित हुए। ऐसा लग रहा था मानों मित्रगण अपने अन्य मित्र को देखकर प्रसन्न हुए हों।

ता-सबार प्रीति देखि' प्रभु भावावेशे ।।सबा-सने क्रीड़ा करे हा तार वशे ॥

२०३॥

उनके स्नेह को देखकर महाप्रभु प्रेमाविष्ट हो गये। वे उनसे उसी तरह येलने लगे, जिस तरह मित्र एक दूसरे के साथ खेलते हैं। इस तरह वे रवेच्छा से अपने मित्रों के वशीभूत हो गये।

प्रति वृक्ष-लता प्रभु करेन आलिङ्गन ।पुष्पादि ध्याने करेन कृष्णे समर्पण ॥

२०४॥

श्री चैतन्य महाप्रभु हर वृक्ष तथा हर लता को आलिंगन करने लगे और ने बदले में उन्हें अपने फल-फूल समर्पित करने लगे, मानो वे समाधि में हो।

अश्रु-कम्प-पुलक-प्रेमे शरीर अस्थिरे ।‘कृष्ण' बल, 'कृष्ण' बल–बले उच्चैःस्वरे ॥

२०५॥

महाप्रभु का शरीर चंचल था और उसमें अश्रु, कॅपन तथा हर्ष प्रकट हो रहे थे। वे जोर-जोर से कृष्ण बोल! कृष्ण बोल! कह रहे थे।

स्थावर-जङ्गम मिलि' करे कृष्ण-ध्वनि ।।प्रभुर गम्भीर-स्वरे ग्रेन प्रति-ध्वनि ॥

२०६॥

तब सारे चर तथा अचर प्राणी हरे कृष्ण की दिव्य ध्वनि का उच्चारण करने लगे, मानो वे चैतन्य महाप्रभु के गहन स्वर की प्रतिध्वनि कर रहे हों।

मृगेर गला धरि' प्रभु करेन रोदने ।मृगेर पुलक अङ्गे, अश्रु नयने ॥

२०७॥

फिर महाप्रभु मृगों को गले लगाकर रोने लगे। उन मृगों के शरीरों से हर्ष प्रकट हो रहा था और नेत्रों में आँसू थे।

वृक्ष-डाले शुक-शारी दिल दरशन ।।ताहा देखि' प्रभुर किछु शुनिते हैल मन ॥

२०८॥

| जब नर तथा मादा तोता वृक्ष की डाल पर दिखे, तो महाप्रभु उन्हें देखकर उनको बोलते हुए सुनना चाहते थे।

शुक-शारिका प्रभुर हाते उड़ि' पड़े।प्रभुके शुनाज्ञा कृष्णेर गुण-श्लोक पड़े ॥

२०९॥

नर तथा मादा दोनों तोते उड़कर महाप्रभु के हाथ पर बैठ गये और कृष्ण के दिव्य गुणों का गान करने लगे, जिसे महाप्रभु सुनते रहे।

सौन्दर्य ललनालि-धैर्य-दलनं लीला रमा-स्तम्भिनी ।वीर्यं कन्दुकताद्रि-वर्यममला: पारे-पराधं गुणाः ।। शीलं सर्व-जनानुरञ्जनमहो यस्यायमस्मत्प्रभुर् ।विश्वं विश्व-जनीन-कीर्तिरवतात्कृष्णो जगन्मोहनः ॥

२१०॥

नर तोता गाने लगा, पूर्ण पुरुषोत्तम भगवान् कृष्ण का गुणगान ब्रह्माण्ड में हर एक के लिए लाभप्रद है। उनका सौन्दर्य वृन्दावन की गोपियों को मात देने वाला है और उनके धैर्य को दमित करने वाला है। उनकी लीलाएँ लक्ष्मीदेवी को स्तम्भित करने वाली हैं तथा उनका शारीरिक बल गोवर्धन पर्वत को गेंद जैसा छोटा खिलौना बना देता है। उनके निर्मल गुण अनन्त हैं और उनका आचरण सबको तुष्ट करने वाला है। भगवान् कृष्ण सबके लिए आकर्षक हैं। ओह, हमारे प्रभु सारे ब्रह्माण्ड का पालन करें।

शुक-मुखे शुनि' तबे कृष्णेर वर्णन । शारिका पड़ये तबे राधिका-वर्णन ।। २११॥

न तोते से भगवान् कृष्ण का वर्णन सुनकर मादा तोता श्रीमती भगिनी का वर्णन करने लगी।

श्री-राधिकायाः प्रियता सु-रूपता ।सु-शीलता नर्तन-गान-चातुरी ।। गुणालि-सम्पत्कविता च राजते ।जगन्मनो-मोहन-चित्त-मोहिनी ॥

२१२॥

मादा तोता ने कहा, श्रीमती राधारानी का स्नेह, उनका अनुपम गर्म तथा उत्तम आचरण, उनका कलापूर्ण नृत्य तथा गायन और उनकी ता ---- सबके सब इतने आकर्षक हैं कि वे उन कृष्ण के मन को भी ए कर लेते हैं, जो ब्रह्माण्ड के हर व्यक्ति के मन को आकर्षित करने वाले हैं ।

पुनः शुक कहे,—कृष्ण ‘मदन-मोहन' ।।तबे आर श्लोक शुक करिल पठन ॥

२१३॥

तत्पश्चात् नर तोते ने कहा, कृष्ण तो कामदेव के भी मन को मोहने वाले हैं। फिर वह दूसरा श्लोक सुनाने लगा।

वंशी-धारी जगन्नारी-चित्त-हारी से शारिके ।।विहारी गोप-नारीभिर्जीयान्मदन-मोहनः ॥

२१४॥

तब तोते ने कहा, हे प्रिये शारी! ( मादा तोता ) श्रीकृष्ण वंशी धारण करने वाले हैं और ब्रह्माण्ड-भर की सारी स्त्रियों के हृदयों को हरने वाले हैं। वे सुन्दर गोपिकाओं के विशेष रूप से भोक्ता हैं और कामदेव को भी मोहने वाले हैं। आओ उनका यशोगान करें! पुनः शारी कहे शुके करि' परिहास ।ताहा शुनि' प्रभुर हैल विस्मय-प्रेमोल्लास ॥

२१५॥

तब मादा तोता ने नर तोते से परिहास करते हुए बोलना प्रारम्भ किया और श्री चैतन्य महाप्रभु उसे इस तरह बोलते सुनकर अद्भुत प्रेम से कित रह गये।

राधा-सङ्गे ग्रदा भाति तदा ‘मदन-मोहनः ।अन्यथा विश्व-मोहोऽपि स्वयं 'मदन-मोहितः ॥

२१६॥

मादा तोता (शारी) ने कहा, जब श्रीकृष्ण राधारानी के साथ होते है, तब वे कामदेव को भी मोहने वाले ( मदनमोहन ) होते हैं। अन्यथा जब अकेले होते हैं, तब वे समस्त ब्रह्माण्ड को मोहने वाले होते हुए भी काम के शीभूत हो जाते हैं।

शुक-शारी उड़ि' पुनः गेल वृक्ष-डाले । मयूरेर नृत्य प्रभु देखे कुतूहले ॥

२१७॥

तब नर तथा मादा तोते उड़कर वृक्ष की डाल पर चले गये और श्री चैतन्य महाप्रभु अत्यन्त उत्सुकतापूर्वक मोरों का नृत्य देखने लगे।

मयूरेर कण्ठ देखि' प्रभुर कृष्ण-स्मृति हैल ।। प्रेमावेशे महाप्रभु भूमिते पड़िल ॥

२१८॥

जब महाप्रभु ने मोरों की नीली गर्दन देखी, तो तुरन्त उनमें कृष्ण की स्मृति जाग उठी और वे प्रेमाविष्ट होकर भूमि पर गिर पड़े।

प्रभुरे मूर्च्छित देखि' सेइ त ब्राह्मण । भट्टाचार्य-सङ्गे करे प्रभुर सन्तर्पण ॥

२१९॥

जब ब्राह्मण ने देखा कि श्री चैतन्य महाप्रभु मूर्च्छित हो गये हैं, तो उसने तथा बलभद्र भट्टाचार्य ने उनकी देख-रेख की।

आस्ते-व्यस्ते महाप्रभुर ला बहिर्वास ।।जल-सेक करे अङ्गे, वस्त्रेर वातास ॥

२२०॥

| । उहोंने तुरन्त महाप्रभु के शरीर पर पानी छिड़का। फिर उन्होंने महाप्रभु । बाहरी वस्त्र ले लिया और उससे पंखा झलने लगे।

प्रभु-कर्णे कृष्ण-नाम कहे उच्च करि' ।।चेतन पाना प्रभु ग्रा'न गड़ागड़ि ॥

२२१॥

| फिर वे महाप्रभु के कान में कृष्ण-नाम का उच्चारण करने लगे। महाप्रभु को चेतना आई, तो वे भूमि पर लोटने लगे।

कण्टक-दुर्गम वने अङ्ग क्षत हैल।।भट्टाचार्य कोले करि' प्रभुरे सुस्थ कैल ॥

२२२ ।। जब महाप्रभु भूमि पर लोट रहे थे, तब तीक्ष्ण काँटों से उनका शरीर घायल हो गया। बलभद्र भट्टाचार्य ने गोद में उठाकर उन्हें शान्त किया।

कृष्णावेशे प्रभुर प्रेमे गरगर मन ।।‘बोल्’ ‘बोल्’ करि' उठि' करेन नर्तन ॥

२२३॥

श्री चैतन्य महाप्रभु का मन कृष्ण के प्रेम में भ्रमण कर रहा था। वे तुरन्त उठ खड़े हुए और बोले, कीर्तन करो! कीर्तन करो! फिर वे स्वयं नाचने लगे।

भट्टाचार्य, सेइ विप्र ‘कृष्ण-नाम' गाय ।।नाचिते नाचिते पथे प्रभु चलि' ग्राय ॥

२२४॥

महाप्रभु का आदेश पाने पर बलभद्र भट्टाचार्य तथा ब्राह्मण दोनों कृष्ण-नाम का कीर्तन करने लगे। तब महाप्रभु नाचते-नाचते मार्ग पर आगे बढ़ने लगे।

प्रभुर प्रेमावेश देखि' ब्राह्मण—विस्मित ।।प्रभुर रक्षा लागि' विप्र होइला चिन्तित ॥

२२५ ॥

वह ब्राह्मण श्री चैतन्य महाप्रभु के प्रेमावेश के भावों को देखकर विस्मित था। फिर वह महाप्रभु को सुरक्षा प्रदान करने के लिए चिन्तित हो उठा।

नीलाचले छिला भैछे प्रेमावेश मन ।।वृन्दावन ग्राइते पथे हैल शत-गुण ॥

२२६ ।। श्री चैतन्य महाप्रभु का मन जगन्नाथ पुरी में प्रेमावेश में मग्न था, किन्तु जब वे वृन्दावन के मार्ग से होकर निकल रहे थे, तब वह प्रेम सैकड़ों गुना बढ़ गया।

सहस्र-गुण प्रेम बाड़े मथुरा दरशने ।।लक्ष-गुण प्रेम बाड़े, भ्रमेन ग्रबे वने ॥

२२७॥

जब महाप्रभु ने मथुरा देखा तो उनका प्रेम हजार गुना बढ़ गया, किन्तु जब वे वृन्दावन के जंगलों में घूम रहे थे, तब वह लाख गुना बढ़ गया।

अन्य-देश प्रेम उछले 'वृन्दावन'-नामे । साक्षात्भ्रमये एबे सेइ वृन्दावने ॥

२२८॥

प्रेमे गरगर मन रात्रि-दिवसे ।स्नान-भिक्षादि-निर्वाह करेन अभ्यासे ॥

२२९॥

जब श्री चैतन्य महाप्रभु अन्यत्र थे, तब वृन्दावन का नाम सुनकर ही उनका प्रेम बढ़ जाता था। अब जबकि वे वृन्दावन के जंगल में वास्तव में भ्रमण कर रहे थे, तो उनका मन रात-दिन प्रेम में निमग्न रहता था। वे मात्र अभ्यास के कारण खाते और नहाते थे।

एइ-मत प्रेम यावत्भ्रमिल'बार' वन ।।एकत्र लिखि, सर्वत्र ना ग्राय वर्णन ॥

२३०॥

इस तरह मैंने महाप्रभु के प्रेम का वर्णन किया है, जो वृन्दावन के धारहों वनों में भ्रमण करते समय उन्होंने एक स्थान पर प्रकट किया। सभी स्थानों पर उन्होंने क्या अनुभव किया इसका पूरा-पूरा वर्णन कर पाना असंभव होगा ।

वृन्दावने हैल प्रभुर ग्रतेक प्रेमेर विकार । कोटि-ग्रन्थे 'अनन्त' लिखेन ताहार विस्तार ॥

२३१॥

वृन्दावन में श्री चैतन्य महाप्रभु को प्रेम-विकार की जो अनुभूति हुई, उसका विशद वर्णन करने के लिए भगवान् अनन्त लाखों ग्रन्थों की रचना करते हैं।

तबु लिखिबारे नारे तार एक कण । उद्देश करिते करि दिग्दरशन ॥

२३२॥

चूंकि भगवान् अनन्त स्वयं इन लीलाओं के एक अंश का भी वर्णन नहीं कर सकते, अतः मैं तो केवल दिशा-निर्देश ही कर रहा हूँ।

जगत्भासिल चैतन्य-लीलार पाथारे ।याँर व्रत शक्ति तत पाथारे साँतारे ॥

२३३॥

सारा संसार श्री चैतन्य महाप्रभु की लीलाओं की बाढ़ में डूब गया। कोई भी व्यक्ति अपनी शक्ति के अनुसार ही उस जल में तैर सकता है।

श्री-रूप-रघुनाथ-पदे ग्रार आश ।।चैतन्य-चरितामृत कहे कृष्णदास ॥

२३४॥

श्री रूप तथा श्री रघुनाथ के चरणकमलों में प्रार्थना करते हुए तथा सदैव उनकी कृपा की आकांक्षा करते हुए मैं कृष्णदास उनके उनके चरण चिन्हों का अनुमान करता हुआ श्री चैतन्य चरितामृत कह रहा हूँ ।"

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