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अध्याय तेईसवाँ: जीवन का अंतिम लक्ष्य - ईश्वर का प्रेम

चिराददत्तं निज-गुप्त-वित्तंस्व-प्रेम-नामामृतमत्युदारः । आ-पामरं म्रो विततार गौरः ।कृष्णो जनेभ्यस्तमहं प्रपद्ये ॥

१॥

गौरकृष्ण नाम से विख्यात सर्वाधिक वदान्य पूर्ण पुरुषोत्तम भगवान् । ने हर एक को–यहाँ तक कि अधम से अधर्म व्यक्तियों को भी-अपने प्रेम तथा अपने पवित्र नाम के अमृत-रूप गुह्य खजाना बाँटा। यह इसके पहले कभी भी लोगों को नहीं दिया गया था। अतएव मैं उन्हें सादर नमस्कार करता हूँ।

जय जय गौरचन्द्र जय नित्यानन्द ।।जयाद्वैत-चन्द्र जय गौर-भक्त-वृन्द ॥

२॥

श्री चैतन्य महाप्रभु की जय हो! श्री नित्यानन्द प्रभु की जय हो! अद्वैत चार्य की जय हो! श्री चैतन्य महाप्रभु के समस्त भक्तों की जय हो! एबे शुन भक्ति-फल 'प्रेम'-प्रयोजन । ग्राहार श्रवणे हय भक्ति-रस-ज्ञान ॥

३॥

श्री चैतन्य महाप्रभु ने आगे कहा, हे सनातन, अब भक्ति के फल के बारे में सुनो, जो जीवन का चरम लक्ष्य, भगवत्प्रेम है। यदि कोई व्यक्ति इस विवरण को सुनता है, तो उसे दिव्य भक्ति-रस का ज्ञान प्राप्त हो जाता है।

कृष्णे रति गाढ़ हैले 'प्रेम'-अभिधान ।।कृष्ण-भक्ति-रसेर एइ 'स्थायि-भाव'-नाम ॥

४॥

जब कृष्ण के प्रति स्नेह प्रगाढ़ हो जाता है, तो भक्ति में भगवत्प्रेम की प्राप्ति होती है। ऐसी दशा स्थायी भाव कहलाती है, जिसमें कृष्णभक्ति-रस का स्थायी आस्वादन होता है।

शुद्ध-सत्त्व-विशेषात्मा प्रेम-सूर्यांशु-साम्य-भाक् ।रुचिभिश्चित्त-मसृण्य-कृदसौ भाव उच्यते ॥

५॥

जब भक्ति शुद्ध सत्त्व के दिव्य पद पर की जाती है, तो यह कृष्णप्रेम रूपी सूर्य की किरण जैसी होती है। उस समय भक्ति विविध आस्वादनों के द्वारा हृदय को मृदु बनाती है। तब मनुष्य भाव में स्थित होता है।

ए दुइ,—भावेर 'स्वरूप', 'तटस्थ' लक्षण ।प्रेमेर लक्षण एबे शुन, सनातन ॥

६॥

भाव के दो विविध लक्षण होते हैं-वैधानिक (स्वाभाविक ) तथा तटस्थ। हे सनातन, अब तुम मुझसे प्रेम के लक्षण सुनो।

सम्पँ-मसृणित-स्वान्तो ममत्वातिशयाङ्कितः ।।भावः स एव सान्द्रात्मा बुधैः प्रेमा निगद्यते ॥

७॥

जब वह भाव हृदय को पूर्णरूपेण कोमल बना देता है, भगवान् के प्रति अपनत्व की महान् भावना से समन्वित और अत्यन्त प्रगाढ़ तथा घनीभूत हो जाता है, तो विद्वानों द्वारा वह प्रेम ( भगवत्प्रेम ) कहलाता है।

अनन्य-ममता विष्णौ ममता प्रेम-सङ्गता ।।भक्तिरित्युच्यते भीष्म-प्रह्लादोद्धव-नारदैः ॥

८॥

जब कोई व्यक्ति भगवान् विष्णु के प्रति गूढ़ अपनत्व का भाव उत्पन्न कर लेता है, अथवा जब कोई विष्णु को ही प्रेम के एकमात्र लक्ष्यमानता है, तो ऐसी जागृति भीष्म, प्रह्लाद, उद्धव तथा नारद जैसे महापुरुषों द्वारा भक्ति कहलाती है।'

कोन भाग्ये कोन जीवेर 'श्रद्धा' यदि हय । तबे सेइ जीव 'साधु-सङ्ग' ने करय ॥

९ ॥

यदि सौभाग्यवश कोई जीव कृष्ण में श्रद्धा उत्पन्न कर लेता है, तो वह भक्तों की संगति करना प्रारम्भ कर देता है।

साधु-सङ्ग हैते हय 'श्रवण-कीर्तन' । साधन-भक्त्ये हय ‘सर्वानर्थ-निवर्तन' ॥

१०॥

जब भक्तों की संगति से कोई व्यक्ति भक्ति की ओर उन्मुख होता है, तो वह विधि-विधानों का पालन करने से और कीर्तन तथा श्रवण द्वारा सारे अवांछित कल्मष से मुक्त हो जाता है।

अनर्थ-निवृत्ति हैले भक्त्ये 'निष्ठा' हय ।। निष्ठा हैते श्रवणाद्ये ‘रुचि' उपजय ॥

११॥

जब मनुष्य सारे अवांछित कल्मष से मुक्त हो जाता है, तो वह दृढ़ निष्ठा के साथ अग्रसर होता है। जब भक्ति में दृढ़ निष्ठा जाग्रत हो जाती है, तो श्रवण तथा कीर्तन का आस्वादन भी जाग्रत होता है।

रुचि हैते भक्त्ये हय 'आसक्ति' प्रचुर ।।आसक्ति हैते चित्ते जन्मे कृष्णे प्रीत्यङ्कर ॥

१२ ॥

रुचि जाग्रत होने पर गहरी आसक्ति उत्पन्न होती है और उस आसक्ति से हृदय में कृष्ण-प्रेम का बीज अंकुरित होता है।

सेइ 'भाव' गाढ़ हैले धरे ‘प्रेम'-नाम ।। सेइ प्रेमा ‘प्रयोजन' सर्वानन्द-धाम ॥

१३॥

जब ऐसी भावदशा प्रगाढ़ होती है, तो उसे भगवत्प्रेम कहा जाता है। ऐसा प्रेम जीवन का चरम लक्ष्य है तथा समस्त आनन्द का आगार है।

आदौ श्रद्धा ततः साधु-सङ्गोऽथ भजन-क्रिया ।। ततोऽनर्थ-निवृत्तिः स्यात्ततो निष्ठा रुचिस्ततः ॥

१४॥

अथासक्तिस्ततो भावस्ततः प्रेमाभ्युदञ्चति ।।साधकानामयं प्रेम्णः प्रादुर्भावे भवेत्क्रमः ॥

१५॥

सर्वप्रथम श्रद्धा होनी चाहिए। तब मनुष्य शुद्ध भक्तों की संगतिकरने में रुचि दिखाने लगता है। तत्पश्चात् वह गुरु द्वारा दीक्षित होता है। और उसके आदेशानुसार विधि-विधानों का पालन करता है। इस तरह वह समस्त अवांछित आदतों से मुक्त हो जाता है और भक्ति में स्थिर हो जाता है। इसके बाद रुचि तथा आसक्ति उत्पन्न होती है। यह साधन-भक्ति का मार्ग है। धीरे-धीरे भाव गहन होते जाते हैं और अन्त में प्रेम जाग्रत होता । है। कृष्णभावनामृत में रुचि रखने वाले भक्त के लिए यही भगवत्प्रेम के क्रमिक विकास की प्रक्रिया है।'

सतां प्रसङ्गान्मम वीर्य-संविदोभवन्ति हृत्कर्ण-रसायनाः कथाः । तज्जोषणादाश्वपवर्ग-वर्मनिश्रद्धा रतिर्भक्तिरनुक्रमिष्यति ॥

१६ ॥

आध्यात्मिक रूप से ईश्वर के सशक्त सन्देश की सटीक चर्चा केवल भक्त-समाज में ही हो सकती है और उस संगति में उसे सुनना बहुत ही आनन्ददायक होता है। भक्तों से सुनने पर उसके लिए दिव्य अनुभव का मार्ग शीघ्र खुल जाता है और धीरे-धीरे उसे दृढ़ श्रद्धा ( निष्ठा) प्राप्त होती है, जो कालक्रम से आकर्षण ( रति ) तथा भक्ति में विकसित होती है।'

याँहार हृदये एइ भावाङ्कर हय ।ताँहाते एतेक चिह्न सर्व-शास्त्रे कय ॥

१७॥

यदि किसी के हृदय में वास्तव में दिव्य भाव का बीज रहता है, तो उसके कर्मों में परिलक्षित होगा। सभी शास्त्रों का यही निर्णय है।

क्षान्तिरव्यर्थ-कालत्वं विरक्तिर्मान-शून्यता । आशा-बन्धः समुत्कण्ठा नाम-गाने सदा रुचिः ॥

१८॥

आसक्तिस्तद्गुणाख्याने प्रीतिस्तद्वसति-स्थले ।इत्यादयोऽनुभावाः स्युर्जात-भावारे जने ॥

१९॥

जब कृष्ण के लिए भावरूपी बीज का अंकुरण होता है, तब मनुष्य के स्वभाव में नौ लक्षण प्रकट होते हैं। ये हैं-क्षमाशीलता, समय को व्यर्थ न गॅवाने के प्रति सतर्कता, विरक्ति, मिथ्या मान का अभाव, आशा, उत्सुकता, भगवान् के पवित्र नाम का कीर्तन करने के लिए रुचि, भगवान के दिव्य गुणों के वर्णन के प्रति अनुरक्ति, भगवान् के निवासस्थानों यथा मन्दिर या वृन्दावन जैसे तीर्थस्थान के प्रति स्नेह। ये अनुभाव अर्थात् उत्कट भाव के गौण लक्षण कहलाते हैं। ये सब अनुभाव उस व्यक्ति के हृदय में दृष्टिगोचर होते हैं, जिसमें भगवत्प्रेम अंकुरित होना शुरू हो गया होता है।'

एइ नव प्रीत्यङ्कर ग्राँर चित्ते हय ।।प्राकृत-क्षोभे ताँर क्षोभ नाहि हय ॥

२०॥

यदि किसी के हृदय में कृष्ण के प्रति प्रेम अंकुरित हो जाता है, तो वह भौतिक वस्तुओं से क्षुब्ध नहीं होता।

तं मोपयातं प्रतियन्तु विप्रा ।गङ्गा च देवी धृत-चित्तमीशे । द्विजोपसृष्टः कुहकस्तक्षको वादशत्वलं गायत विष्णु-गाथाः ॥

२१ ॥

हे ब्राह्मणों, मुझे पूर्णतया शरणागत जीव मानो और भगवान् की प्रतिनिधि, माता गंगा भी मुझे ऐसा ही मानें, क्योंकि मैं पहले ही भगवान् के चरणकमलों को अपने हृदय में आसीन कर चुका हूँ। इस तक्षक को, अथवा ब्राह्मण ने जो कुछ भी इन्द्रजाल रचा है, मुझे तुरन्त काटने दें। मेरी एकमात्र इच्छा यह है कि आप लोग भगवान् विष्णु के कार्यों का गायन करते रहें।

कृष्ण-सम्बन्ध विना काल व्यर्थ नाहि ग्राय ॥

२२॥

एक क्षण भी नहीं नष्ट करना चाहिए। प्रत्येक क्षण का उपयोग कृष्ण या उनसे सम्बन्धित बातों के लिए करना चाहिए।

वाग्भिः स्तुवन्तो मनसा स्मरन्तस्तन्वा नमन्तोऽप्यनिशं न तृप्ताः । भक्ताः श्रवन्नेत्र-जला: समग्रम् | आयुर्हरेरेव समर्पयन्ति ॥

२३॥

वे शब्दों से भगवान् की स्तुति करते हैं। वे मन से नित्य भगवान् का स्मरण करते हैं। वे अपने शरीरों से भगवान् को नमस्कार करते हैं। इतने पर भी वे तुष्ट नहीं होते। ऐसा है शुद्ध भक्तों का स्वभाव। वे अपने नेत्रों से अश्रु बहाते हुए अपना सारा जीवन भगवान् की सेवा में अर्पित कर देते हैं।'" भुक्ति, सिद्धि, इन्द्रियार्थ तारे नाहि भाय ॥

२४॥

भौतिक क्षेत्र में लोग भौतिक भोग, योग-सिद्धि तथा इन्द्रियतृप्ति में रुचि दिखाते हैं। किन्तु भक्तों को ये बातें कदापि रुचिकर नहीं लगतीं ।

ग्रो दुस्त्यजान् दार-सुतान् सुहृद् राज्यं हृदि-स्पृशः ।जहौ ग्रुवैव मल-वदुत्तमःश्लोक-लालसः ॥

२५ ॥

| राजा भरत उन पूर्ण पुरुषोत्तम भगवान् कृष्ण का सान्निध्य प्राप्त करने के लिए अत्यन्त उत्सुक थे, जो उत्तमश्लोक कहे जाते हैं, क्योंकि उनकी कृपा प्राप्त करने के लिए स्तुतियाँ की जाती हैं। राजा भरत ने अपनी युवावस्था में अपनी आकर्षक पत्नी तथा पुत्रों एवं अपने प्रिय मित्रों तथा वैभवशाली साम्राज्य को उसी तरह छोड़ दिया, जिस तरह मल का विसर्जन करने के बाद उसे त्याग दिया जाता है।'

‘सर्वोत्तम' आपनाके 'हीन' करि माने ॥

२६॥

यद्यपि शुद्ध भक्त का स्तर सर्वोपरि होता है, फिर भी वह अपने आपको सबसे हीन (तुच्छ) मानता है।

हरौ रतिं वहन्नेष नरेन्द्राणां शिखा-मणिः ।।भिक्षामटन्नरि-पुरे श्व-पाकमपि वन्दते ॥

२७॥

भरत महाराज सदैव अपने हृदय में कृष्ण के प्रति स्नेह वहन करते थे। यद्यपि भरत महाराज राजाओं के मुकुटमणि थे, फिर भी अपने शत्रुओं की नगरी में घूम-घूमकर भिक्षा माँगते थे। यहाँ तक कि वे तुच्छ जाति के चण्डालों को भी नमस्कार करते थे, जो कुत्तों का मांस भक्षण करते हैं।'

‘कृष्ण कृपा करिबेन'-दृढ़ करि' जाने ॥

२८॥

एक पूर्णतया शरणागत भक्त को सर्वदा आशा रहती है कि भगवान् कृष्ण उस पर कृपालु होंगे। उसमें यह आशा दृढ़ रहती है।

न प्रेमा श्रवणादि-भक्तिरपि वा योगोऽथ वा वैष्णवोज्ञानं वा शुभ-कर्म वा कियदहो सज्जातिरप्यस्ति वा । हीनार्थाधिक-साधके त्वयि तथाप्यच्छेद्य-मूला सती ।हे गोपी-जन-वल्लभ व्यथयते हा हा मदाशैव माम् ॥

२९॥

हे प्रभु, न तो मुझमें आपके लिए प्रेम है, न ही मुझमें कीर्तन तथा अवण द्वारा भक्ति करने की योग्यता है। न ही मुझमें वैष्णव की योगशक्ति, ज्ञानं या पुण्यकर्म है। न ही मैं उच्च कुल से सम्बन्धित हूँ। इस तरह मुझमें कुछ भी नहीं है। फिर भी हे गोपियों के प्रिय, मेरे हृदय में निरन्तर एक अटूट आशा है, क्योंकि आप अधम से अधम पर दया करने वाले हैं। वही आशा मुझे निरन्तर पीड़ा दे रही है।'

समुत्कण्ठा हय सदा लालसा-प्रधान ॥

३०॥

यह उत्सुकता भगवान् का सान्निध्य प्राप्त करने के लिए प्रगाढ़ इच्छा से युक्त है।

त्वच्छैशवं त्रि-भुवनाद्भुतमित्यवेहिमच्चापलं च तव वा मम वाधिगम्यम् । तत्किं करोमि विरलं मुरली-विलासिमुग्धं मुखाम्बुजमुदीक्षितुमीक्षणाभ्याम् ॥

३१॥

हे कृष्ण, हे वंशीवादक, आपके शैशव की माधुरी तीनों लोकों में अद्भुत है। मैं आपकी चपलता जानता हूँ और आप मेरी। इसे अन्य कोई नहीं जानता। मैं किसी एकान्त में आपका सुन्दर आकर्षक मुख देखना चाहता हूँ, किन्तु यह हो तो कैसे?' नाम-गाने सदा रुचि, लय कृष्ण-नाम ॥

३२ ॥

नाम के प्रति गहरी रुचि होने से मनुष्य हरे कृष्ण महामन्त्र का निरन्तर करना चाहता है।

रोदन-बिन्दु-मरन्द-स्यन्दिदृगिन्दीवराद्य गोविन्द । तव मधुर-स्वर-कण्ठी ।गायति नामावल बाला ॥

३३॥

हे गोविन्द, यह युवती जिसका नाम राधिका है, मधुर स्वर में आपके पवित्र नाम का गायन करती हुई निरन्तर अश्रु बरसा रही है, मानो फूलों से मधु गिर रहा हो।'

कृष्ण-गुणाख्याने हय सर्वदा आसक्ति ॥

३४॥

| इस भावदशा में भक्त में भगवान् के दिव्य गुणों को कीर्तन औरवर्णन करने की प्रवृत्ति जाग उठती है। उसे इस विधि में आसक्ति हो जाती है।

मधुरं मधुरं वपुरस्य विभोर्| मधुरं मधुरं वदनं मधुरम् । मधु-गन्धि मृदु-स्मितमेतदहो | मधुरं मधुरं मधुरं मधुरम् ॥

३५॥

हे प्रभु, कृष्ण का दिव्य शरीर मधुर है और उनका मुख तो उनके शरीर से भी अधिक मधुर है। किन्तु मधु (शहद) की गन्ध के समान उनके मुख की मृदु हँसी और भी मधुर है।'

कृष्ण-लीला-स्थाने करे सर्वदा वसति ॥

३६॥

कृष्ण के भाव में मग्न भक्त सदैव ऐसे स्थान में निवास करता है, जहाँ कृष्ण ने लीलाएँ की थीं।

कदाहं यमुना-तीरे नामानि तव कीर्तयन् ।।उद्वाष्यः पुण्डरीकाक्ष रचयिष्यामि ताण्डवम् ॥

३७॥

हे पुण्डरीकाक्ष भगवान्, कब मैं अपनी आँखों में आँसू भरकर मुना के तट पर आपके नाम का कीर्तन करते हुए भाव में नृत्य करूँगा?' कृष्णे ‘रतिर' चिह्न एइ कैलँ विवरण ।।‘कृष्ण-प्रेमेर' चिह्न एबे शुन सनातन ॥

३८ ॥

जिस व्यक्ति ने कृष्ण के लिए आकर्षण ( भाव) उत्पन्न कर लिया है, ये उसके लक्षण हैं। अब मुझे उस व्यक्ति के लक्षण बताने दो, जिसने सचमुच कृष्ण-प्रेम प्राप्त कर लिया है। हे सनातन, इसे मुझसे सुनो।

याँर चित्ते कृष्ण-प्रेमा करये उदय ।। ताँर वाक्य, क्रिया, मुद्रा विज्ञेह ना बुझय ॥

३९॥

जो व्यक्ति भगवत्प्रेम को प्राप्त कर चुका है, उसके शब्दों, कार्यों तथा लक्षणों को बड़े से बड़ा विद्वान भी नहीं समझ सकता।

धन्यस्यायं नव-प्रेमा यस्योन्मीलति चेतसि ।। अन्तर्वाणिभिरप्यस्य मुद्रा सुष्ष्ठ सु-दुर्गमा ॥

४० ॥

जिस महापुरुष के हृदय में भगवत्प्रेम जाग्रत हो चुका है, उसके कार्यों तथा लक्षणों को बड़े से बड़ा विद्वान भी नहीं समझ सकता।'

एवं-व्रतः स्व-प्रिय-नाम-कीर्त्याजातानुरागो द्रुत-चित्त उच्चैः ।। हसत्यथो रोदिति रौति गायत्यउन्माद-वन्नृत्यति लोक-बाह्यः ॥

४१॥

जब मनुष्य वास्तव में उन्नत होता है और अपने प्रिय भगवान् के पवित्र नाम का कीर्तन करने में आनन्द का अनुभव करता है, तब वह संक्षोभित होकर उच्च स्वर से भगवन्नाम का कीर्तन करता है। वह बाहरी लोगों की परवाह न करते हुए पागल की तरह हँसता है, रोता है, उत्तेजित होता है और कीर्तन करता है।

प्रेमा क्रमे बाड़ि' हय- स्नेह, मान, प्रणय ।राग, अनुराग, भाव, महाभाव हय ॥

४२॥

इस तरह भगवत्प्रेम बढ़ता जाता है और वह स्नेह, मान, प्रणय, राग, अनुराग, भाव तथा महाभाव के रूप में प्रकट होता है।

बीज, इक्षु, रस, गुड़ तबे खण्ड-सार ।। शर्करा, सिता-मिछरि, शुद्ध-मिछरि आर ॥

४३॥

इस तरह के विकास की उपमा गन्ने के बीज, गन्ने के पौधे, गन्ने के रस, गुड़, खांड, साफ चीनी, मिश्री और शुद्ध मिश्री से दी जाती है।

इहा भैछे क्रमे निर्मल, क्रमे बाड़े स्वाद । रति-प्रेमादिर तैछे बाड़ये आस्वाद ॥

४४॥

जिस प्रकार चीनी को धीरे-धीरे शुद्ध करते रहने पर उसका स्वाद बढ़ता जाता है, उसी तरह यह समझना चाहिए कि जब भगवत्प्रेम जिसकी उपमा बीज से दी जाती है, रति के स्तर से आगे बढ़ता है, तो उसका स्वाद बढ़ता जाता है।

अधिकारि-भेदे रति—पञ्च परकार ।। शान्त, दास्य, सख्य, वात्सल्य, मधुर आर ॥

४५ ॥

इन (स्नेह, मान आदि ) दिव्य गुणों से युक्त पात्र के अनुसार रस च प्रकार के हैं-शान्त, दास्य, सख्य, वात्सल्य तथा माधुर्य ।।

एइ पञ्च स्थायी भाव हय पञ्च'रस' ।ये-रसे भक्त 'सुखी', कृष्ण हय ‘वश' ॥

४६॥

ये पाँचों दिव्य रस स्थायी रूप से विद्यमान रहते हैं। भक्त इनमें से किसी एक के प्रति आकृष्ट हो सकता है और इस तरह वह सुखी हो जाता है। कृष्ण भी ऐसे भक्त की ओर उन्मुख होते हैं और उसके वश में हो जाते है।

प्रेमादिक स्थायि-भाव सामग्री-मिलने ।।कृष्ण-भक्ति रस-रूपे पाय परिणामे ॥

४७॥

जब स्थायी भावों (शान्त, दास्य आदि) को अन्य सामग्री के साथ मिला दिया जाता है, तब भगवद्भक्ति रूपान्तरित होकर रसों से युक्त हो जाती है।

विभाव, अनुभावे, सात्त्विक, व्यभिचारी।स्थायि-भाव 'रस' हय एइ चारि मिलि' ॥

४८॥

विभाव (विशेष भाव), अनुभाव ( अधीनस्थ भाव), सात्त्विक (स्वाभाविक भाव) तथा व्यभिचारी भाव के मिश्रण से स्थायी भाव अधिकाधिक स्वादयुक्त दिव्य रस बन जाता है।

दधि ग्रेने खण्ड-मरिच-कर्पूर-मिलने ।‘रसालाख्य' रस हय अपूर्वास्वादने ॥

४९॥

जब दही में खांड, काली मिर्च तथा कपूर मिला दिये जाते हैं, तो वह अत्यन्त स्वादिष्ट बन जाता है। ठीक वैसे ही जब स्थायी भाव अन्य भाव-लक्षणों से मिलता है, तो वह अपूर्व स्वादिष्ट बन जाता है।

द्विविध विभाव', आलम्बन, उद्दीपन । वंशी-स्वरादि-‘उद्दीपन', कृष्णादि-आलम्बन' ॥

५०॥

विभाव के दो प्रकार हैं-एक आलम्बन तथा दूसरा उद्दीपन। कृष्ण की वंशी-ध्वनि उद्दीपन का उदाहरण है और साक्षात् कृष्ण आलम्बन के उदाहरण हैं।

‘अनुभाव'—स्मित, नृत्य, गीतादि उद्भास्वर ।। स्तम्भादि-‘सात्त्विक अनुभावेर भितर ॥

५१॥

हँसना, नाचना, गाना तथा शरीर के विभिन्न प्रकट लक्षण अनुभाव ( अधीनस्थ भाव) के अन्तर्गत आते हैं। स्तम्भ इत्यादि सात्त्विक भावों को अनुभावों के अन्तर्गत माना जाता है।

निर्वेद-हर्षादि तेत्रिश'व्यभिचारी' ।।सब मिलि''रस' हय चमत्कार-कारी ॥

५२॥

निर्वेद, हर्ष इत्यादि अन्य अवयव भी हैं। सब मिलाकर ३३ प्रकार और जब ये सब एकजुट होते हैं, तो रस अत्यन्त चमत्कारी बन जाता हैं। पञ्च-विध रस–शान्त, दास्य, सख्य, वात्सल्य । मधुर-नाम शृङ्गार-रस-सबाते प्राबल्य ॥

५३॥

दिव्य रस पाँच हैं-शान्त, दास्य, सख्य, वात्सल्य तथा माधुर्य ग, जिसे श्रृंगार रस भी कहा जाता है। रसों में माधुर्य रस सर्वोपरि है।

शान्त-रसे शान्ति-रति 'प्रेम' पर्यन्त हय ।। दास्य-रति 'राग' पर्यन्त क्रमेत बाड़य ॥

५४॥

शान्त रस की स्थिति उस बिन्दु तक बढ़ती जाती है, जहाँ मनुष्य को भगवत्प्रेम में अभिरुचि होने लगती है। दास्य रस क्रमशः भगवान् के रागमय प्रेम (राग) तक बढ़ता जाता है।

सख्य-वात्सल्य-रति पाय 'अनुराग'-सीमा ।।सुबलाछेर 'भाव' पर्यन्त प्रेमेर महिमा ॥

५५ ॥

‘दास्य रस के बाद सख्य रस तथा वात्सल्य रस आते हैं, जो बढ़तेबढ़ते अनुराग की सीमा तक पहुँच जाते हैं। सुबल इत्यादि मित्रों में पाये । जाने वाले प्रेम की महानता भगवान् के भावमय प्रेम के स्तर तक विस्तृत होती है।

शान्तादि रसेर 'योग', 'वियोग' दुइ भेद ।। सख्य-वात्सल्ये योगादिर अनेक विभेद ॥

५६ ।। इन पाँचों रसों के दो-दो विभेद होते हैं-योग (मिलन) तथा वियोग (विछोह)। सख्य तथा वात्सल्य रस में योग तथा वियोग इन दोनों के भी अनेकानेक विभेद हैं।

‘रूढ़', 'अधिरूढ़' भाव–केवल ‘मधुरे' ।। महिषी-गणेर' रूढ़', 'अधिरूढ़' गोपिका-निकरे ॥

५७॥

केवल श्रृंगार (मधुर) रस में ही दो भाव-लक्षण मिलते हैं, जिन्हें रूढ़ ( उन्नत ) तथा अधिरूढ़ ( अत्यधिक उन्नत ) कहा जाता है। रूढ़ भाव द्वारका की पटरानियों में पाया जाता है और अधिरूढ़ भाव गोपियों में पाया जाता है।

अधिरूढ़-महाभाव–दुइ त' प्रकार ।।सम्भोगे 'मादन', विरहे 'मोहन' नाम तार ॥

५८॥

अधिरूढ़ महाभाव के दो प्रकार होते हैं-मादन तथा मोहन। परस्पर मिलन मादन कहलाता है और विरह मोहन कहलाता है।

'मादने'–चुम्बनादि हय अनन्त विभेद । ‘उद्भूर्णा', 'चित्र-जल्प'–‘मोहने' दुइ भेद ॥

५९॥

मादन भाव के अन्तर्गत चुम्बन तथा अन्य अनेक लक्षण आते हैं, जिनकी कोई गिनती नहीं है। मोहन अवस्था के दो विभेद हैं-उद्भूर्णा ( अस्थायित्व) तथा चित्र-जल्प ( पागलों का-सा प्रलाप )।

चित्र-जल्पेर दश अङ्ग-प्रजल्पादि-नाम । भ्रमर-गीता'र दश श्लोक ताहाते प्रमाण ॥

६०॥

चित्रजल्प के अन्तर्गत दस विभाग हैं, जिन्हें प्रजल्प तथा अन्य नामों से पुकारा जाता है। इसका प्रमाण है श्रीमती राधारानी द्वारा कहे गये दस श्लोक, जो 'भ्रमर-गीत' के नाम से विख्यात हैं।

उद्भूर्णा, विवश-चेष्टा—दिव्योन्माद-नाम ।विरहे कृष्ण-स्फूर्ति, आपनाके 'कृष्ण'-ज्ञान ॥

६१॥

उद्भूर्णा ( अस्थायित्व) तथा विवश-चेष्टा ( गर्वपूर्ण कार्य ) दिव्य उन्मत्तता के अंग हैं। कृष्ण के विरह में भक्त को कृष्ण के प्राकट्य की अनुभूति होती है और वह अपने आपको कृष्ण सोचने लगता है।

‘सम्भोग'-‘विप्रलम्भ'-भेदे द्विविध शृङ्गार ।सम्भोगेर अनन्त अङ्ग, नाहि अन्त तार ॥

६२॥

श्रृंगार के दो विभाग हैं-सम्भोग (मिलन) तथा विप्रलम्भ (वियोग)। सम्भोग स्तर पर अनेक विभेद हैं, जिनका वर्णन कर पाना सम्भव नहीं है।

‘विप्रलम्भ' चतुर्विध–पूर्व-राग, मान ।।प्रवासाख्य, आर प्रेम-वैचित्त्य-आख्यान ॥

६३॥

विप्रलम्भ के चार विभाग होते हैं-पूर्व-राग, मान, प्रवास तथा प्रेमवैचित्य।

राधिकाचे ‘पूर्व-राग' प्रसिद्ध ‘प्रवास', 'माने' ।‘प्रेम-वैचित्त्य' श्री-दशमे महिषी-गणे ॥

६४॥

चार प्रकार के वियोग में से तीन ( पूर्वराग, प्रवास तथा मान) श्रीमती राधारानी तथा गोपियों में प्रसिद्ध हैं। द्वारका में पटरानियों में प्रेमवैचित्त्य का भाव अत्यन्त प्रमुख है।

कुररि विलपसि त्वं वीत-निद्रा न शेषेस्वपिति जगति रात्र्यामीश्वरो गुप्त-बोधः ।वयमिव सखि कच्चिद्गाढ़-निर्विद्ध-चेतानलिन-नयन-हासोदार-लीलेक्षितेन ॥

६५ ॥

हे सखी कुररी, अब तो रात्रि हो गई है और श्रीकृष्ण सोये हुए हैं। |तुम न तो सोयी हो, न विश्राम कर रही हो, अपितु विलाप कर रही हो। क्या मैं यह मान लें कि तुम भी हमारी ही तरह कमलनेत्रों वाले कृष्ण की। हासयुक्त उदार चंचल चितवन से प्रभावित हो? यदि ऐसा है, तो तुम्हारा हृदय बुरी तरह से बिंध चुका है। क्या इसीलिए तुम निद्राविहीन विलाप के चिह्न प्रकट कर रही हो?' व्रजेन्द्र-नन्दन कृष्ण–नायक-शिरोमणि । नायिकार शिरोमणि-राधा-ठाकुराणी ॥

६६॥

पूर्ण पुरुषोत्तम भगवान् कृष्ण, जो कि नन्द महाराज के पुत्र के रूपमें प्रकट हुए, अपने सारे व्यवहारों में श्रेष्ठ नायक हैं। इसी प्रकार श्रीमती राधारानी अपने व्यवहारों में सर्वोपरि नायिका हैं।

नायकानां शिरो-रत्नं कृष्णस्तु भगवान् स्वयम् ।ग्रत्र नित्यतया सर्वे विराजन्ते महा-गुणाः ॥

६७॥

कृष्ण तो स्वयं पूर्ण पुरुषोत्तम भगवान् हैं और समस्त नायकों के शिरोमणि हैं। कृष्ण में सारे दिव्य उत्तम गुण स्थायी रूप से विराजते हैं।'

देवी कृष्ण-मयी प्रोक्ता राधिका पर-देवता ।सर्व-लक्ष्मी-मयी सर्व-कान्तिः सम्मोहिनी परा ॥

६८ ॥

दिव्य देवी श्रीमती राधारानी तो भगवान् कृष्ण की साक्षात् प्रतिमूर्ति हैं। वे समस्त लक्ष्मियों की केन्द्रबिन्दु हैं। वे सर्वाकर्षक भगवान् को आकृष्ट करने के लिए समस्त आकर्षण से युक्त हैं। वे भगवान् की आदि अन्तरंगा शक्ति हैं।'

अनन्त कृष्णेर गुण, चौषट्टि–प्रधान ।एक एक गुण शुनि' जुड़ाय भक्त-काण ॥

६९॥

भगवान् कृष्ण के दिव्य गुण अनन्त हैं, जिनमें से चौंसठ प्रधान माने जाते हैं। इन गुणों का क्रमशः श्रवण करने मात्र से भक्तों के कान तृप्त हो जाते हैं।

अयं नेता सु-रम्याङ्गः सर्व-सल्लक्षणान्वितः ।।रुचिरस्तेजसा मुक्तो बलीयान् वयसान्वितः ॥

७० ॥

नायक शिरोमणि कृष्ण का दिव्य शरीर अत्यन्त सुन्दर है। उनका शरीर सभी शुभ लक्षणों से युक्त है। यह शरीर अत्यन्त तेजयुक्त है और आँखों को अत्यन्त सुहावना लगता है। उनका शरीर बलवान तथा यौवन से पूर्ण (किशोर) है।

विविधाद्भुत-भाषा-वित् सत्य-वाक्यः प्रियं-वदः ।वावदूकः सु-पाण्डित्यो बुद्धिमान्प्रतिभान्वितः ॥

७१॥

कृष्ण सारी अद्भुत भाषाओं के वेत्ता हैं। वे सत्यवादी तथा मधुरभाषी हैं। वे बोलने में चतुर ( वाक्पटु) हैं और अत्यन्त बुद्धिमान, विद्वान तथा प्रतिभावान हैं।

विदग्धश्चतुरो दक्षः कृत-ज्ञः सु-दृढ़-व्रतः ।।देश-काल-सुपात्र-ज्ञः शास्त्र-चक्षुः शुचिर्वशी ॥

७२॥

कृष्ण कलात्मक भोग में अत्यन्त पटु हैं। वे अत्यन्त चतुर, दक्ष, कृतज्ञ तथा अपने व्रत पर दृढ़ रहने वाले हैं। वे देश, काल तथा पात्र के अनुसार आचरण करना जानते हैं और शास्त्रों तथा प्रामाणिक ग्रन्थों के माध्यम से देखते हैं। वे अत्यन्त पवित्र तथा आत्मसंयमी हैं।

स्थिरो दान्तः क्षमा-शीलो गम्भीरो धृतिमान्समः ।।वदान्यो धार्मिकः शूरः करुणो मान्य-मान-कृत् ॥

७३॥

भगवान् कृष्ण स्थिर, इन्द्रियों को वश में रखने वाले, क्षमाशील, गम्भीर तथा शान्त हैं। वे सब पर समदृष्टि रखने वाले भी हैं। साथ ही वे दान्य, धार्मिक, शूर तथा दयालु हैं। वे सम्मानित व्यक्तियों के प्रति सदैव आदरयुक्त हैं।

दक्षिणो विनयी ह्रीमान्शरणागत-पालकः ।सुखी भक्त-सुहृत्प्रेम-वश्यः सर्व-शुभं-करः ॥

७४। कृष्ण अत्यन्त सरल तथा उदार हैं, वे विनीत तथा लज्जाशील हैं और शरणागतों के रक्षक हैं। वे परम सुखी, अपने भक्तों के शुभचिन्तक, परम कल्याणप्रद तथा प्रेम के वशीभूत होने वाले हैं।

प्रतापी कीर्तिमान् रक्त-लोकः साधु-समाश्रयः ।नारी-गण-मनोहारी सर्वाराध्यः समृद्धिमान् ॥

७५ ॥

कृष्ण अत्यन्त प्रतापी तथा विख्यात हैं और वे हर एक की अनुरक्ति के लक्ष्य हैं। वे अच्छे तथा गुणी लोगों के आश्रय हैं। वे स्त्रियों के मन को आकृष्ट करने वाले और सबके आराध्य हैं। वे अत्यन्त समृद्धिशाली हैं।

वरीयानीश्वरश्चेति गुणास्तस्यानुकीर्तिताः ।समुद्रा इव पञ्चाशदुर्विगाहा हरेरमी ॥

७६॥

कृष्ण सर्वोपरि हैं और सदैव परमेश्वर तथा नियन्ता के रूप में महिमामंडित किये जाते हैं। इस तरह उपर्युक्त सारे दिव्य गुण उनमें पाये जाते हैं। पूर्ण पुरुषोत्तम भगवान् के उपर्युक्त पचास गुण समुद्र के समान गम्भीर हैं। तात्पर्य यह है कि उन्हें पूर्णरूपेण समझ पाना कठिन है।

जीवेष्वेते वसन्तोऽपि बिन्दु-बिन्दुतया क्वचित् । परिपूर्णतया भान्ति तत्रैव पुरुषोत्तमे ॥

७७॥

जीवों में ये गुण कभी-कभी सूक्ष्म मात्रा में प्रकट होते हैं, किन्तु पूर्ण पुरुषोत्तम भगवान् में तो ये पूरी तरह से प्रकट होते हैं।'

अथ पञ्च-गुणा ये स्युरंशेन गिरिशादिषु ॥

७८॥

इन पचास गुणों के अतिरिक्त भी पूर्ण पुरुषोत्तम भगवान् में पाँच गुण और पाये जाते हैं, जो शिवजी जैसे देवताओं में आंशिक रूप से पाये जाते हैं।

सदा स्वरूप-सम्प्राप्तः सर्वज्ञो नित्य-नूतनः ।। सच्चिदानन्द-सान्द्राङ्गः सर्व-सिद्धि-निषेवितः ॥

७९॥

अथोच्यन्ते गुणाः पञ्च ये लक्ष्मीशादि-वर्तिनः । अविचिन्त्य-महा-शक्तिः कोटि-ब्रह्माण्ड-विग्रहः ॥

८० ॥

अवतारावली-बीजं हतारि-गति-दायकः ।आत्माराम-गणाकर्षीत्यमी कृष्णे किलोद्भुताः ॥

८१॥

ये गुण हैं (१) भगवान् सदैव अपनी मूल स्थिति में रहते हैं, २) वे भर्वज्ञ हैं, (३) वे नित्यनूतन तथा युवा हैं, (४) वे शाश्वतता, ज्ञान तथा आनन्द के घनीभूत रूप हैं तथा (५) वे समस्त योगसिद्धियों से युक्त हैं। इसके अतिरिक्त पाँच गुण और हैं, जो लक्ष्मीपति नारायण में वैकुण्ठ लोकों में पाये जाते हैं। ये गुण कृष्ण में भी पाये जाते हैं, किन्तु ये गुण | शिवजी इत्यादि देवताओं अथवा अन्य जीवों में नहीं पाये जाते। ये गुण हैं (१) भगवान् अचिंत्य सर्वोपरि शक्ति से युक्त हैं, (२) वे अपने शरीर से अनन्त ब्रह्माण्डों की उत्पत्ति करते हैं, (३) वे समस्त अवतारों के मूल स्रोत हैं, (४) वे उनके द्वारा मारे गये शत्रुओं को मुक्ति देते हैं तथा (५) वे स्वयं-सन्तुष्ट आत्मारामों को भी आकृष्ट करते हैं। यद्यपि ये गुण वैकुण्ठ लोक के प्रधान विग्रह नारायण में पाये जाते हैं, किन्तु कृष्ण में तो ये और भी अद्भुत रूप में मिलते हैं।

सर्वाद्भुत-चमत्कार-लीला-कल्लोल-वारिधिः । अतुल्य-मधुर-प्रेम-मण्डित-प्रिय-मण्डलः ॥

८२॥

त्रि-जगन्मानसाकर्षि-मुरली-कल-कूजितः ।। असमानोर्ध्व-रूप-श्री-विस्मापित-चराचरः ॥

८३॥

इन साठ दिव्य गुणों के अतिरिक्त कृष्ण में चार अन्य दिव्य गुण पाये जाते हैं, जो नारायण में भी नहीं पाये जाते। ये हैं—(१) कृष्ण लीलाओं की तरंगों से पूरित सागर के समान हैं, जो तीनों लोकों में हर प्राणी के भीतर आश्चर्य उत्पन्न करने वाली हैं। (२) वे अपने माधुर्य-प्रेम के कार्यकलापों में सदा अपने प्रिय भक्तों से घिरे रहते हैं, जो उनके प्रति अप्रतिम प्रेम रखते हैं।(३) वे अपनी वंशी की मधुर ध्वनि से तीनों लोकों के मनों को आकृष्ट करने वाले हैं।(४) उनका सौन्दर्य तथा उनका ऐश्वर्य अद्वितीय है। न तो कोई उनके समान है और न उनसे बढ़कर है। इस तरह तीनों लोकों में भगवान् सारे चर एवं अचर जीवों को चमत्कृत करते हैं। वे इतने सुन्दर हैं कि वे कृष्ण कहलाते हैं।

लीला प्रेम्णा प्रियाधिक्यं माधुर्यं वेणु-रूपयोः। इत्यसाधारणं प्रोक्तं गोविन्दस्य चतुष्टयम् ॥

८४॥

एवं गुणाश्चतुर्भेदाश्चतुःषष्टिरुदाहृताः ॥

८५ ॥

कृष्ण में नारायण से बढ़कर चार विशेष दिव्य गुण हैं-उनकी | अद्भुत लीलाएँ, अद्भुत संगियों की प्रचुरता ( यथा गोपियाँ) जो उन्हें अत्यन्त प्रिय हैं, उनका अद्भुत सौन्दर्य तथा उनकी बाँसुरी की अद्भुत प्वनि। भगवान् कृष्ण सामान्य जीवों तथा शिवजी समान देवताओं से भी श्रेष्ठ । यहाँ तक कि वे स्वांश नारायण से भी श्रेष्ठ हैं। पूर्ण पुरुषोत्तम भगवान् में कुल मिलाकर ६४ दिव्य गुण पूर्ण रूप से होते हैं।'

अनन्त गुण श्री-राधिकार, पॅचिश प्रधान ।ग्रेइ गुणेर ‘वश' हय कृष्ण भगवान् ॥

८६॥

इसी प्रकार श्रीमती राधारानी में अनन्त दिव्य गुण हैं, जिनमें से पच्चीस प्रमुख हैं। श्रीकृष्ण श्रीमती राधारानी के इन्हीं दिव्य गुणों के वश में रहते हैं।

अथ वृन्दावनेश्वर्याः कीर्त्यन्ते प्रवरा गुणाः मधुरेयं नव-वयाश्चलापाङ्गोज्वल-स्मिता । चारु-सौभाग्य-रेखाढूया गन्धोन्मादित-माधवा ॥

८७॥

सङ्गीत-प्रसराभिज्ञा रम्य-वाँ नर्म-पण्डिता । विनीता करुणा-पूर्णा विदग्धा पाटवान्विता ॥

८८॥

लज्जा-शीला सु-मर्यादा धैर्य-गाम्भीर्य-शालिनी ।। सु-विलासा महाभाव-परमोत्कर्ष-तर्षिणी ॥

८९॥

गोकुल-प्रेम-वसतिर्जगच्छेणी-लसद्-यशाः । गुर्वर्पित-गुरु-स्नेहा सखी-प्रणयिता-वशी ॥

९०॥

कृष्ण-प्रियावली-मुख्या सन्ततोश्रव-केशवा ।। बहुना किं गुणास्तस्याः सङ्ख्यातीता हरेरिव ॥

९१॥

श्रीमती राधारानी के पच्चीस दिव्य गुण इस प्रकार हैं-( १ ) वे अत्यन्त मधुरा हैं।(२) वे नित्य नवयौवना हैं।(३) उनकी आँखें चंचल है।(४) वे उज्वल हँसी हँसती हैं। (५) उनकी रेखाएँ सुन्दर तथा शुभ है।(६) वे कृष्ण को अपनी शारीरिक सुगन्ध से सुखी बनाती हैं।(७) वे गायन में निपुणा हैं।(८) उनकी वाणी मोहक है।(९) वे परिहास करने तथा मधुर बोलने में पटु हैं। (१०) वे अत्यन्त विनीता हैं। (११) वे करुणा से पूर्ण हैं।(१२) वे चतुरा हैं। (१३) वे अपना कार्य करने में पटु हैं।(१४) वे लज्जाशीला हैं।(१५) वे सदैव आदर देवे वाली हैं। (१६) वे सदैव शान्त हैं।(१७) वे सदा गम्भीर रहने वाली हैं।( १८ ) वे जीवन का आनन्द उठाने में पटु हैं।(१९) वे महाभाव में स्थित रहती हैं। (२०) वे गोकुल में प्रेमालापों की आगार हैं।(२१) वे विनीत भक्तों में सर्वाधिक प्रसिद्ध हैं। (२२) वे गुरुजनों के प्रति स्नेह रखने वाली हैं। (२३) वे अपनी सखियों के प्रेम के वश में हैं।( २४) वे प्रमुख गोपी हैं। (२५) वे कृष्ण को निरन्तर अपने वश में रखती हैं। संक्षेप में, वे कृष्ण की ही तरह असीम दिव्य गुणों से युक्त हैं।'

नायक, नायिका,--दुइ रसेर 'आलम्बन' ।।सेइ दुइ श्रेष्ठ, राधा, व्रजेन्द्र-नन्दन ॥

९२॥

नायक तथा नायिका समस्त रसों का आधार होते हैं और श्रीमती राधारानी तथा महाराज नन्द के पुत्र श्रीकृष्ण सर्वश्रेष्ठ नायिका-नायक हैं।

एइ-मत दास्ये दास, सख्ये सखा-गण ।।वात्सल्ये माता पिता आश्रयालम्बन ॥

९३॥

जिस तरह भगवान् कृष्ण तथा श्रीमती राधारानी माधुर्य-प्रेम के आलम्बन तथा आश्रय हैं, उसी तरह दास्य रस में महाराज नन्द के पुत्र । आलम्बन तथा चित्रक, रक्तक तथा पत्रक जैसे दास आश्रय हैं। इसी प्रकार दिव्य सख्य रस में कृष्ण आलम्बन हैं और श्रीदामा, सुदामा तथा सुबल जैसे मित्र आश्रय हैं। दिव्य वात्सल्य रस में कृष्ण आलम्बन हैं और माता यशोदा तथा महाराज नन्द आश्रय हैं।

एइ रस अनुभवे ट्रैछे भक्त-गण ।। ग्रैछे रस हय, शुन ताहार लक्षण ॥

९४॥

अब यह सुनें कि रस किस तरह प्रकट होते हैं और विभिन्न पदों पर स्थित भक्तों द्वारा वे किस तरह अनुभव किये जाते हैं।

भक्ति-निर्धेत-दोषाणां प्रसन्नोज्वल-चेतसाम् । श्री-भागवत-रक्तानां रसिकासङ्ग-रङ्गिणाम् ॥

९५॥

जीवनी-भूत-गोविन्द-पाद-भक्ति-सुख-श्रियाम् ।। प्रेमान्तरङ्ग-भूतानि कृत्यान्येवानुतिष्ठताम् ॥

९६॥

भक्तानां हृदि राजन्ती संस्कार-युगलोज्वला ।। रतिरानन्द-रूपैव नीयमाना तु रस्यताम् ॥

९७॥

कृष्णादिभिर्विभावाद्यैर्गतैरनुभवाध्वनि ।।प्रौढ़ानन्दश्चमत्कार-काष्ठामापद्यते पराम् ॥

९८॥

जो भक्ति द्वारा समस्त भौतिक कल्मष से पूरी तरह मुक्त हो चुके हैं, जो सदैव सन्तुष्ट रहते हैं और जिनके हृदय ज्ञान से पूरी तरह से प्रकाशित हो चुके हैं, जो सदैव श्रीमद्भागवत का दिव्य अर्थ समझने के प्रति अनुरक्त रहते हैं, जो सदैव उन्नत भक्तों का संग करने के लिए उत्सुक रहते हैं, जिनका जीवन मात्र गोविन्द के चरणकमलों की सेवा से प्राप्त आनन्द में है, जो प्रेम के गुह्य कार्यों को सदैव सम्पन्न करते हैं-ऐसे उन्नत भक्तों के लिए, जो सहज ही आनन्द में स्थित रहते हैं, प्रेम का बीज ( रति ) पूर्व तथा वर्तमान संस्कारों से हृदय में विस्तार करता है। इस तरह भावों के अवयवों का मिश्रण स्वादिष्ट बन जाता है और वह भक्त की अनुभूति के अन्तर्गत होने से चमत्कार तथा गहरे आनन्द के सर्वोच्च पद तक पहुँच जाता है।'

एइ रस-आस्वाद नाहि अभक्तेर गणे ।कृष्ण-भक्त-गण करे रस आस्वादने ॥

९९ ॥

कृष्ण तथा विभिन्न दिव्य रसों में स्थित भिन्न-भिन्न भक्तों के बीच जो आदान-प्रदान होता है, उसका अनुभव अभक्तों को नहीं होता। भक्ति में उन्नत भक्त ही पूर्ण पुरुषोत्तम भगवान् के साथ विभिन्न प्रकार की भक्ति आदान-प्रदान को अच्छी तरह समझ सकते हैं।

सर्वथैव दुरूहोऽयमभक्तैर्भगवद्रसः ।तत्पादाम्बुज-सर्वस्वैर्भक्तैरेवानुरस्यते ॥

१०० ॥

भक्त तथा भगवान् के बीच जिस दिव्य रस का आदान-प्रदान किया जाता है, उसे अभक्त लोग नहीं समझ सकते। इन्हें समझना सभी तरह से अत्यन्त कठिन है, किन्तु जिसने भगवान् कृष्ण के चरणकमलों सर्वस्व अर्पित कर दिया है, वह इन दिव्य रसों का आस्वादन कर सकता है।

सङ्क्षेपे कहिलॆ एइ ‘प्रयोजन'-विवरण ।पञ्चम-पुरुषार्थ–एइ ‘कृष्ण-प्रेम'-धन ॥

१०१॥

यह संक्षिप्त विवरण जीवन के चरम लक्ष्य का विस्तार है। निस्सन्देह, यह पाँचवा तथा अन्तिम लक्ष्य है, जो कि मोक्ष-पद से परे है। यह कृष्ण प्रेमधन कहलाता है।

पूर्वे प्रयागे आमि रसेर विचारे ।। तोमार भाइ रूपे कैलँ शक्ति-सञ्चारे ॥

१०२॥

इसके पूर्व मैं तुम्हारे भाई रूप गोस्वामी को इन रसों को समझने की शक्ति प्रदान कर चुका हूँ। प्रयाग में दशाश्वमेध घाट पर उसे शिक्षा देते हुए मैंने ऐसा किया है।

तुमिह करिह भक्ति-शास्त्रेर प्रचार ।मथुराय लुप्त-तीर्थेर करिह उद्धार ॥

१०३ ॥

हे सनातन, तुम भक्ति के प्रामाणिक शास्त्रों का प्रचार करना और मथुरा जिले के लुप्त तीर्थस्थलों का पुनरुद्धार करना।

वृन्दावने कृष्ण-सेवा, वैष्णव-आचार।भक्ति-स्मृति-शास्त्र करि' करिह प्रचार ॥

१०४॥

वृन्दावन में भगवान् कृष्ण तथा राधारानी की सेवा स्थापित करना। भक्तिशास्त्रों का भी संकलन करना और वृन्दावन से भक्ति सम्प्रदाय का प्रचार करना।

मुक्त-वैराग्य-स्थिति सब शिखाइल ।।शुष्क-वैराग्य-ज्ञान सब निषेधिल ॥

१०५॥

तत्पश्चात् श्री चैतन्य महाप्रभु ने सनातन गोस्वामी को विशेष स्थिति के अनुसार उचित वैराग्य के विषय में बतलाया और सभी प्रकार से शुष्क वैराग्य तथा शुष्क ज्ञान का निषेध किया।

अद्वेष्टा सर्व-भूतानां मैत्रः करुण एव च । निर्ममो निरहङ्कारः सम-दुःख-सुखः क्षमी ॥

१०६॥

सन्तुष्टः सततं योगी व्रतात्मा दृढ़ निश्चयः ।।मय्यर्पित-मनो-बुद्धिर्यो मद्भक्तः स मे प्रियः ॥

१०७॥

जो ईष्र्यालु नहीं है अपितु सारे जीवों का दयालु मित्र है, जो अपने आपको स्वामी नहीं मानता, जो मिथ्या अहंकार से रहित है, जो सुख तथा दुःख दोनों में समभाव रखता है, जो सदैव सन्तुष्ट रहता है, जो क्षमावान तथा आत्मसंयमी है, जो संकल्प के साथ भक्ति में संलग्न रहता है और जिसका मन तथा बुद्धि मुझमें समर्पित है-ऐसा भक्त मुझे अत्यन्त प्रिय हैं।

ग्रस्मान्नोद्विजते लोको लोकान्नोद्विजते तु ग्रः ।।हर्षामर्ष-भयोद्वेगैर्मुक्तो ग्रः स च मे प्रियः ॥

१०८॥

जिससे किसी को कोई कष्ट नहीं पहुँचता और जो किसी से विचलित नहीं होता, जो हर्ष, क्रोध, भय तथा चिन्ता से मुक्त है, वह मुझे अत्यन्त प्रिय है।

अनपेक्षः शुचिर्दक्ष उदासीनो गत-व्यथः ।। सर्वारम्भ-परित्यागी यो मे भक्तः स मे प्रियः ॥

१०९॥

जो भक्त किसी अन्य पर आश्रित न रहकर केवल मुझ पर आश्रित रहता है, जो भीतर तथा बाहर से शुद्ध है, जो दक्ष है, जो भौतिक वस्तुओं के प्रति उदासीन है, जो निश्चिन्त है, जो समस्त कष्टों से रहित है और जो सारे पुण्य तथा पाप कार्यों को त्याग देता है, वह मुझे अत्यन्त प्रिय है।

यो न हृष्यति न द्वेष्टि न शोचति न काङ्क्षति । शुभाशुभ-परित्यागी भक्तिमान् ग्रः स मे प्रियः ॥

११०॥

जो न तो भौतिक बातों से हर्षित होता है न द्वेष रखता है, जो न तो शोक करता है न इच्छा करता है, जो शुभ तथा अशुभ भौतिक वस्तुओं का समान रूप से परित्याग करता है और जो मेरी भक्ति में स्थिर रहता है, वह मुझे अत्यन्त प्रिय है।

समः शत्रौ च मित्रे च तथा मानापमानयोः ।। शीतोष्ण-सुख-दुःखेषु समः सङ्ग-विवर्जितः ॥

१११॥

तुल्य-निन्दा-स्तुतिर्मोंनी सन्तुष्टो येन केनचित् ।।अनिकेतः स्थिर-मतिर्भक्तिमान्मे प्रियो नरः ॥

११२॥

जो मित्रों तथा शत्रुओं के प्रति समभाव रखता है, जो मान तथा अपमान, गर्मी तथा सर्दी, सुख तथा दुःख, यश तथा अपयश में एक समान रहता है, जो भौतिक वस्तुओं से सदैव कल्मषरहित, गम्भीर तथा सन्तुष्ट रहता है, जो किसी प्रकार के घर-बार की परवाह नहीं करता तथा जो भक्ति में सदैव स्थिर रहता है, वह मुझे अत्यन्त प्रिय है।

ये तु धर्मामृतमिदं यथोक्तं पर्युपासते ।श्रद्दधाना मत्परमा भक्तास्तेऽतीव में प्रियाः ॥

११३॥

इस तरह से जो व्यक्ति मुझे परम लक्ष्य मानकर अत्यन्त श्रद्धा तथा भक्ति के साथ कृष्णभावनामृत के इन अमर धार्मिक सिद्धान्तों का पालन करता है, वह मुझे अतीव प्रिय है।'

चीराणि किं पथि न सन्ति दिशन्ति भिक्षा | नैवाघ्रि-पाः पर-भृतः सरितोऽप्यशुष्यन् । रुद्धा गुहाः किमजितोऽवति नोपसन्नान् | कस्माद्भजन्ति कवयो धन-दुर्मदान्धान् ॥

११४॥

क्या आम रास्ते में चिथड़े पड़े नहीं मिलते हैं? क्या दूसरों का पालन करने के लिए जीवित रहने वाले वृक्ष अब भिक्षा-दान नहीं करते? क्या नदियाँ सूख जाने के कारण अब प्यासे को जल नहीं देतीं? क्या पर्वतकी गुफाएँ अब बन्द हो चुकी हैं अथवा क्या अजेय भगवान् पृर्ण शरणागतों की रक्षा नहीं करते? तो फिर भक्तों जैसे विद्वान पुरुष उन लोगों की चाटुकारिता करने क्यों जाएँ, जो अपने कठिन परिश्रम से अर्जित किये हुए धन के कारण अन्धे हो रहे हैं? तबे सनातन सब सिद्धान्त पुछिला ।।भागवत-सिद्धान्त गूढ़ सकलि कहिला ॥

११५॥

इस के बाद सनातन गोस्वामी ने श्री चैतन्य महाप्रभु से भक्ति विषयक सारे सिद्धान्तों के विषय में पूछा और महाप्रभु ने श्रीमद्भागवत के गुह्य अर्थों को बहुत अच्छी तरह से बतलाया।

हरि-वंशे कहियाछे गोलोके नित्य-स्थिति ।।इन्द्र आसि' करिल ग्रबे श्री कृष्णेरे स्तुति ॥

११६॥

हरिवंश पुराण में गोलोक वृन्दावन का विवरण मिलता है, जहाँ भगवान् कृष्ण शाश्वत रूप से निवास करते हैं। यह जानकारी इन्द्र ने तब दी, जब कृष्ण ने गोवर्धन पर्वत उठा लिया था और उसने कृष्ण की शरण स्वीकार करके उनकी स्तुति की थी।

मौषल-लीला, आर कृष्ण-अन्तर्धान । केशावतार, आर व्रत विरुद्ध व्याख्यान ॥

११७॥

महिषी-हरण आदि, सब–मायामय ।व्याख्या शिखाइल ग्रैछे सुसिद्धान्त हय ॥

११८॥

कृष्णभावनामृत के निष्कर्षों के विरुद्ध जो काल्पनिक कथाएँ हैं, उनका सम्बन्ध यदुवंश के विनाश, कृष्ण के अन्तर्धान होने, क्षीरोदकशायी विष्णु के श्याम तथा श्वेत बालों से कृष्ण तथा बलराम की उत्पत्ति और रानियों के अपहरण से है। श्री चैतन्य महाप्रभु ने इन कथाओं के सही सही निष्कर्षों की व्याख्या सनातन गोस्वामी से की।

तबे सनातन प्रभुर चरणे धरिया। निवेदन करे दन्ते तृण-गुच्छ लञा ॥

११९॥

तब सनातन गोस्वामी अपने आपको तिनके से भी तुच्छ मानकर प्रतीकात्मक रूप से अपने मुँह में कुछ तिनके दबाकर श्री चैतन्य महाप्रभु के चरणकमलों पर गिर पड़े और उनके चरण पकड़कर उनसे निम्नलिखित निवेदन किया।

नीच-जाति, नीच-सेवी, मुजि सुपामर ।। सिद्धान्त शिखाइला,—ग्रेइ ब्रह्मार अगोचर ॥

१२०॥

सनातन गोस्वामी ने कहा, हे प्रभु, मैं अत्यन्त नीच जाति में उत्पन्न व्यक्ति हूँ। वस्तुतः मैं तो नीच जाति में उत्पन्न लोगों का सेवक हूँ; अतः मैं अत्यन्त नीच हूँ। तो भी आपने मुझे वे सिद्धान्त सिखलाये हैं, जो ब्रह्मा तक को ज्ञात नहीं हैं।

तुमि ग्रे कहिला, एइ सिद्धान्तामृत-सिन्धु ।।मोर मन छुइँते नारे इहार एक-बिन्दु ॥

१२१॥

आपने जो सिद्धान्त मुझसे कहे हैं, वे सत्यरूपी अमृत के सागर हैं। मेरा मन उस सागर की एक बूंद को भी छू पाने में समर्थ नहीं है।

पङ्ग नाचाइते यदि हय तोमार मन ।वर देह' मोर माथे धरिया चरण ॥

१२२ ॥

यदि आप मुझ जैसे लंगड़े व्यक्ति को नचाना चाहते हैं, तो फिरआप मेरे सिर पर अपने चरणकमल रखकर मुझे अपना दिव्य आशीर्वाद दें।

‘मुबि ये शिखालँ तोरे स्फुरुक सकल' ।।एइ तोमार वर हैते हबे मोर बल ॥

१२३॥

क्या अब आप कृपा करके मुझसे कहेंगे कि, ‘जो कुछ मैंने तुमसे कहा है, वह सब तुम में पूरी तरह से प्रकट हो जाए।' मुझे ऐसा वरदान देकर आप मुझे वह शक्ति प्रदान करेंगे, जिससे मैं इसका वर्णन कर सकें।

तबे महाप्रभु ताँर शिरे धरि' करे ।वर दिला–‘एइ सब स्फुरुक तोमारे' ॥

१२४॥

| तब श्री चैतन्य महाप्रभु ने सनातन गोस्वामी के सिर पर अपना हाथ रखा और यह वर दिया, ये सारे उपदेश तुम में प्रकट हो जाएँ।

सङ्क्षेपे कहिलँ–'प्रेम'-प्रयोजन-संवाद । विस्तारि' कहन ना याय प्रभुर प्रसाद ॥

१२५ ।। इस तरह मैंने जीवन के चरम लक्ष्य, भगवत्प्रेम के संवाद का संक्षिप्त पर्णन किया है। श्री चैतन्य महाप्रभु की कृपा का वर्णन विस्तार से नहीं किया जा सकता।

प्रभुर उपदेशामृत शुने येइ जन ।। अचिरात्मिलये ताँरे कृष्ण-प्रेम-धन ॥

१२६ ॥

जो कोई भी महाप्रभु द्वारा सनातन गोस्वामी को दिये गये इन उपदेशों को सुनता है, वह शीघ्र ही कृष्ण-प्रेम का अनुभव करने लगता है।

श्री-रूप-रघुनाथ-पदे यार आश ।। चैतन्य-चरितामृत कहे कृष्णदास ॥

१२७॥

श्री रूप तथा श्री रघुनाथ के चरणकमलों की वन्दना करते हुए और उनकी कृपा की सदैव आकांक्षा करते हुए, मैं कृष्णदास उनके चरणचिह्नों पर चलकर श्रीचैतन्य-चरितामृत का वर्णन कर रहा हूँ।

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