अध्याय चौबीस: आत्माराम श्लोक की इकसठवीं व्याख्याएँ
आत्मारामेति पद्यार्कस्यार्थाशून् ग्रः प्रकाशयन् । जगत्तमो जहाराव्यात्स चैतन्योदयाचलः ॥
१॥
श्री चैतन्य महाप्रभु की जय हो, जिन्होंने पूर्व दिशा के क्षितिज की तरह व्यवहार किया, जहाँ आत्माराम श्लोक का सूर्य उदित हुआ। उन्होंने विभिन्न अर्थों के रूप में इसकी किरणें बिखेरीं और इस तरह उन्होंने भौतिक जगत् के अन्धकार को दूर किया। वे ब्रह्माण्ड की रक्षा करें।
जय जय श्री-चैतन्य जय नित्यानन्द ।। जयाद्वैत-चन्द्र जय गौर-भक्त-वृन्द ॥
२॥
श्री चैतन्य महाप्रभु की जय हो! श्री नित्यानन्द प्रभु की जय हो! श्री अद्वैतचन्द्र की जय हो तथा श्री चैतन्य के समस्त भक्तों की जय हो! तबे सनातन प्रभुर चरणे धरिया । पुनरपि कहे किछु विनय करिया ॥
३॥
इसके बाद सनातन गोस्वामी ने श्री चैतन्य महाप्रभु के चरणकमल पकड़ लिए और विनीत भाव से इस प्रकार याचना की।
‘पूर्वे शुनियाछों, तुमि सार्वभौम-स्थाने ।एक श्लोके आठार अर्थ कैराछ व्याख्याने ॥
४॥
सनातन गोस्वामी ने कहा, हे प्रभु, मैंने सुना है कि आप इससे पहले सार्वभौम भट्टाचार्य के घर पर आत्माराम श्लोक की अठारह प्रकार से विविध व्याख्याएँ कर चुके हैं।
आत्मारामाश्च मुनयो निर्ग्रन्था अप्युरुक्रमे ।।कुर्वन्त्यहैतुकीं भक्तिमित्थम्भूत-गुणो हरिः ॥
५॥
श्री चैतन्य महाप्रभु बोले, मैं एक पागल व्यक्ति हूँ और सार्वभौम चार्य दूसरे पागल व्यक्ति हैं। अतएव उन्होंने मेरे शब्दों को सच मान लिया।
आश्चर्य शुनिया मोर उत्कण्ठित मन ।। कृपा करि' कह ग्रदि, जुड़ाय श्रवण' ॥
६॥
मैंने यह अद्भुत कथा सुनी है, इसीलिए मैं आपकी व्याख्या पुनः सुनने के लिए अत्यन्त उत्सुक हूँ। यदि आप इसे फिर से कहें, तो मैं इसे सुनकर अत्यन्त प्रसन्न हूँगा।
प्रभु कहे,–आमि वातुल, आमार वचने ।। सार्वभौम वातुल ताहा सत्य करि' माने ॥
७॥
जो लोग आत्म सन्तुष्ट ( आत्माराम ) हैं तथा बाह्य भौतिक इच्छाओं । द्वारा आकृष्ट नहीं होते, वे भी श्रीकृष्ण की प्रेमाभक्ति द्वारा आकृष्ट हो जाते हैं, क्योंकि उनके गुण दिव्य और कार्यकलाप अद्भुत हैं। भगवान हरि इसीलिए कृष्ण कहलाते हैं, क्योंकि उनके लक्षण इतने दिव्य और आकर्षक हैं।
किबी प्रलापिलाङ, किछु नाहिक स्मरणे ।।तोमार सङ्ग-बले ग्रदि किछु हय मने ॥
८॥
मुझे स्मरण नहीं है कि मैंने उस सम्बन्ध में क्या कहा था, किन्तु यदि तुम्हारी संगति से मेरे मन में कुछ आता है, तो मैं उसे बतलाऊँगा।
सहजे आमार किछु अर्थ नाहि भासे ।।तोमा-सबार सङ्ग-बले ग्रे किछु प्रकाशे ॥
९॥
सामान्यतया मैं अपने आप कोई व्याख्या नहीं कर सकता, किन्तु भले ही तुम्हारी संगति से कुछ अपने आप प्रकट हो जाये।
एकादश पद एइ श्लोके सुनिर्मल ।।पृथक् नाना अर्थ पदे करे झलमल ॥
१०॥
इस श्लोक में ग्यारह स्पष्ट शब्द हैं, किन्तु जब उनका अलग-अलग अध्ययन किया जाता है, तो प्रत्येक शब्द से विविध अर्थ झलकते हैं।
'आत्मा'-शब्दे ब्रह्म, देह, मन, ग्रन, धृति ।।बुद्धि, स्वभाव,—-एइ सात अर्थ-प्राप्ति ॥
११॥
आत्मा शब्द के सात विभिन्न अर्थ हैं: परम सत्य, शरीर, मन, प्रयत्न, दृढ़ता, बुद्धि तथा स्वभाव।
आत्मा देह-मनो-ब्रह्म-स्वभाव-धृति-बुद्धिषु, प्रयत्ने च इति ॥
१२॥
आत्मा के पर्याय हैं-शरीर, मन, परम सत्य, स्वभाव, धृति, बुद्धि तथा प्रयत्न।'
एइ साते रमे येइ, सेइ आत्माराम-गण । आत्माराम-गणेर आगे करिब गणन ॥
१३॥
आत्माराम' शब्द उसका द्योतक है, जो इन सातों ( परम सत्य, शरीर, मन इत्यादि) में आनन्द लेता है। बाद में मैं आत्मारामों के नाम गिनाऊँगा।
‘मुनि'-आदि शब्देर अर्थ शुन, सनातन । पृथक्पृथकर्थ पाछे करिब मिलन ॥
१४॥
हे सनातन, पहले 'मुनि' इत्यादि अन्य शब्दों के अर्थ सुनो। सर्वप्रथम मैं उनके अलग-अलग अर्थ बतलाऊँगा और बाद में उन्हें जोड़ूंगा।
‘मुनि'-शब्दे मनन-शील, आर कहे मौनी । तपस्वी, व्रती, ग्रति, आर ऋषि, मुनि ॥
१५॥
मुनि' शब्द उसका सूचक है, जो मननशील है, जो गम्भीर या मौन रहता है, तपस्वी है, जो बड़े व्रत रखता है, जो संन्यासी है और जो सन्त है। ये ‘मुनि' शब्द के विविध अर्थ हैं।
'निर्ग्रन्थ'-शब्दे कहे, अविद्या-ग्रन्थि-हीन । विधि-निषेध-वेद-शास्त्र-ज्ञानादि-विहीन ॥
१६॥
निर्ग्रन्थ' शब्द उसका सूचक है, जो अज्ञान की भौतिक गाँठ से छूट चुका है। यह उसका भी सूचक है, जो वैदिक साहित्य में दिये गये समस्त विधि-विधानों से विहीन है। यह ज्ञान से शून्य का भी सूचक है। मूर्ख, नीच, म्लेच्छ आदि शास्त्र-रिक्त-गण । धन-सञ्चयीनिर्ग्रन्थ, और ये निर्धन ॥
१७॥
निर्ग्रन्थ' उनका भी सूचक है, जो अशिक्षित हैं, नीच हैं, दुराचारी , असंयमित हैं और जो वैदिक साहित्य के प्रति आदर से रहित हैं। यह शब्द पूँजीपति तथा निर्धन का भी सूचक है।
निर्निश्चये निष्क्रमार्थे निर्निर्माण-निषेधयोः ।ग्रन्थो धनेऽथ सन्दर्भे वर्ण-सङ्ग्रथनेऽपि च ॥
१८॥
उपसर्ग निः का प्रयोग निश्चय, वर्गीकरण, निर्माण या निषेध के अर्थ में किया जाता है। ग्रन्थ शब्द का अर्थ धन, निबन्ध तथा शब्दों को जोड़ना है।
'उरुक्रम'-शब्दे कहे, बड़ याँर क्रम ।।‘क्रम'-शब्दे कहे एई पाद-विक्षेपण ॥
१९॥
उरुक्रम' शब्द का अर्थ है, जिसका क्रम अर्थात् कदम बड़ा हो। ‘क्रम' शब्द का अर्थ है पाँव को आगे रखना अर्थात् कदम, डग।।
शक्ति, कम्प, परिपाटी, झुक्ति, शक्त्ये आक्रमण ।चरण-चालने काँपाइल त्रिभुवन ॥
२०॥
क्रम' के अन्य अर्थ भी हैं-शक्ति, काँपना, विधि, तर्क तथा आगे बढ़कर बलपूर्वक आक्रमण करना। इस तरह वामन ने तीनों लोकों को। कॅपा दिया था।
विष्णोर्नु वीर्घ गणनां कतमोऽर्हतीहयः पार्थिवान्यपि कविर्विममे रजांसि । चस्कम्भ ग्रः स्व-रंहसास्खलता त्रि-पृष्ठंग्रस्मास्त्रि-साम्य-सदनादुरु कम्पयानम् ॥
२१॥
भले ही विद्वान व्यक्ति इस भौतिक जगत् के सूक्ष्म परमाणुओं की गणना कर ले, फिर भी वह भगवान् विष्णु की शक्तियों की गणना नहीं कर सकता। भगवान् विष्णु ने वामन अवतार के रूप में भौतिक जगत् के मूल से लेकर सत्यलोक तक के सारे लोकों को बिना किसी बाधा के वश में कर लिया। निस्सन्देह, उन्होंने अपने कदमों के बल से प्रत्येक लोक को कँपा दिया।'
विभु-रूपे व्यापे, शक्त्ये धारण-पोषण ।।माधुर्य-शक्त्ये गोलोक, ऐश्वर्ये परव्योम ॥
२२॥
अपने सर्वव्यापी रूप के माध्यम से पूर्ण पुरुषोत्तम पुरुषोत्तम भगवान् ने सम्पूर्ण ब्रह्माण्ड का विस्तार किया है। वे अपनी असाधारण शक्ति से इस सृष्टि का धारण और पोषण करते हैं। वे अपनी माधुर्य शक्ति से गोलोक वृन्दावन का पालन करते हैं। वे अपने छः ऐश्वर्यों से अनेक वैकुण्ठ लोकों का पालन करते हैं।
माया-शक्त्ये ब्रह्माण्डादि-परिपाटी-सृजन ।‘उरुक्रम'-शब्देर एइ अर्थ निरूपण ॥
२३॥
उरुक्रम' शब्द पूर्ण पुरुषोत्तम भगवान् का द्योतक है, जिन्होंने अपनी बहिरंगा शक्ति से असंख्य ब्रह्माण्डों की सम्यक् रचना की है।
क्रमः शक्ती परिपाट्यां क्रमश्चालन-कम्पयोः ॥
२४॥
क्रम शब्द के भिन्न-भिन्न अर्थ हैं। यह शक्ति, क्रमबद्ध योजना, ग ( पग), चालन या कम्पन के लिए प्रयुक्त होता है।'
'कुर्वन्ति'-पद एइ परस्मैपद हये ।।कृष्ण-सुख-निमित्त भजने तात्पर्य कहय ॥
२५॥
कुर्वन्ति' शब्द का अर्थ है, वे दूसरों के लिए कुछ करते हैं, 'चूंकि यह ‘करना' क्रिया का एक रूप है, अतः यह 'अन्यों के लिए किये गये कार्य' को सूचित करता है। यह उस भक्ति के सन्दर्भ में प्रयुक्त होता है, जिसे कृष्ण की तुष्टि के लिए की जाती है। कुर्वन्ति' शब्द का यही तात्पर्य है।
स्वरित-जितः कर्जभिप्राये क्रिया-फले ॥
२६॥
आत्मनेपद के अन्त्य तभी प्रयुक्त होते हैं, जब कर्म का फल क्रियाओं के कर्ता को मिलता है, जिसका सूचक अ या स्वरित स्वर होता हैं।
‘हेतु'-शब्दे कहे—भुक्ति-आदि वाञ्छान्तरे । भुक्ति, सिद्धि, मुक्ति मुख्य एइ तिन प्रकारे ॥
२७॥
हेतु शब्द का अर्थ यह है कि किसी उद्देश्य से कोई कार्य किया है। उद्देश्य तीन हो सकते हैं : चाहे कोई उस फल को स्वयं भोगना ना हो, चाहे कोई भौतिक सिद्धि प्राप्त करना चाहता हो या मुक्ति प्राप्त ना चाहता हो।
एक भुक्ति कहे, भोग–अनन्त-प्रकार ।सिद्धि-अष्टादश, मुक्ति–पञ्च-विधाकार ॥
२८॥
सर्वप्रथम हम भुक्ति' (भौतिक भोग) शब्द लेते हैं। यह भुक्ति अनन्त प्रकार की होती है। हम ‘सिद्धि' शब्द को भी ले सकते हैं, जो अठारह प्रकार की होती है। इसी तरह 'मुक्ति' शब्द के पाँच प्रकार हैं।
एइ याँहा नाहि, ताहा भक्ति--'अहैतुकी' ।ग्राहा हैते वश हय श्री कृष्ण कौतुकी ॥
२९॥
अहैतुकी भक्ति भोग, सिद्धि या मुक्ति द्वारा प्रेरित नहीं होती। जब मनुष्य इन सारे कल्मषों से मुक्त हो जाता है, तब वह अत्यन्त कौतुकी कृष्ण को अपने वश में कर सकता है।
‘भक्ति'-शब्देर अर्थ हय दश-विधाकार। एक–साधन', 'प्रेम-भक्ति'–नव प्रकार ॥
३०॥
भक्ति शब्द के दस अर्थ हैं। इनमें से एक है विधि-विधानों के अनुसार भक्ति करना ( साधन भक्ति) और दूसरी भक्ति, जिसे प्रेमभक्ति कहते हैं नौ प्रकार की है।
‘रति'-लक्षणा, ‘प्रेम'-लक्षणा, इत्यादि प्रचार । भाव-रूपा, महाभाव-लक्षण-रूपा आर ॥
३१॥
इसके बाद भगवत्प्रेम के लक्षणों की व्याख्या की गई है, जो नौ प्रकार के हैं-रति से लेकर भाव और अन्त में महाभाव तक।
शान्त-भक्तेर रति बाड़े 'प्रेम'-पर्यन्त । दास्य-भक्तेर रति हय 'राग'-दशा-अन्त ॥
३२॥
शान्त भाव के भक्तों का कृष्ण के प्रति आकर्षण भगवत्प्रेम तक बढ़ता जाता है और दास्य भाव के भक्तों का आकर्षण राग तक बढ़ता है।
सखा-गणेर रति हय 'अनुराग' पर्यन्त । पितृ-मातृ-स्नेह आदि 'अनुराग'-अन्त ॥
३३॥
वृन्दावन के भक्तगण, जो कि भगवान् के मित्र हैं, वे अपने प्रेम को। अनुराग तक वर्धित कर सकते हैं। कृष्ण के माता-पिता का वात्सल्य-स्नेह अनुराग-दशा के अन्त को प्राप्त हो सकता है।
कान्ता-गणेर रति पाय 'महाभाव'-सीमा । ‘भक्ति'-शब्देर एइ सब अर्थेर महिमा ॥
३४॥
वृन्दावन की गोपियाँ, जो कृष्ण से माधुर्य-प्रेम द्वारा युक्त हैं, वे अपने प्रेम को महाभाव दशा तक ले जा सकती हैं।‘भक्ति' शब्द के ये कुछ महिमायुक्त अर्थ हैं।
‘इत्थम्भूत-गुणः'-शब्देर शुनह व्याख्यान । ‘इत्थं'-शब्देर भिन्न अर्थ, 'गुण'-शब्देर आन ॥
३५॥
अब आत्माराम श्लोक में आये 'इत्थम्भूतगुण' शब्द का अर्थ सुनो। ‘इत्थम्भूत' के विभिन्न अर्थ होते हैं और 'गुण' के उससे भिन्न अर्थ होते हैं।
'इत्थम्भूत'-शब्देर अर्थ—पूर्णानन्दमय ।। याँर आगे ब्रह्मानन्द तृण-प्राय हय ॥
३६॥
इत्थम्भूत' शब्द दिव्य रूप से बहुत ही उन्नत है, क्योंकि इसका अर्थ है 'दिव्य आनन्द से पूर्ण।' इस दिव्य आनन्द के समक्ष ब्रह्म-तादात्म्य से प्राप्त आनन्द ( ब्रह्मानन्द) तिनके के समान तुच्छ प्रतीत होता है।
त्वत्साक्षात्करणाह्लाद-विशुद्धाब्धि-स्थितस्य मे ।। सुखानि गोष्पदायन्ते ब्राह्माण्यपि जगद्गुरो ॥
३७॥
हे प्रभु, हे ब्रह्माण्ड के स्वामी, चूँकि मैंने आपका प्रत्यक्ष दर्शन किया है, इसलिए मेरे आनन्द ने महासमुद्र का रूप धारण कर लिया है। अब इस समुद्र में स्थित होने के कारण मैं यह अनुभव कर रहा हूँ कि अन्य सारे तथाकथित आनन्द बछड़े के खुर की छाप में भरे जल के समान हैं।
सर्वाकर्षक, सर्वाह्लादक, महा-रसायन । आपनार बले करे सर्व-विस्मारण ॥
३८॥
भगवान् कृष्ण इतने महान् हैं कि वे अन्य किसी से भी अधिक आकर्षक तथा प्रसन्न करने वाले हैं। वे आनन्द के सर्वोत्तम धाम हैं। वे अपने बल से अन्य सारे आनन्दों को भुलवा देने वाले हैं।
भुक्ति-मुक्ति-सिद्धि-सुख छाड़य ग्रार गन्धे ।।अलौकिक शक्ति-गुणे कृष्ण-कृपाय बान्धे ॥
३९॥
शुद्ध भक्ति इतनी उत्कृष्ट होती है कि व्यक्ति इसके आगे भौतिक सुख, भौतिक मुक्ति तथा योगसिद्धि का सुख आसानी से भूल जाता है। इसलिए भक्त कृष्ण की कृपा तथा उनकी असामान्य शक्ति तथा गुणों से बँध जाता है।
शास्त्र-युक्ति नाहि इहाँ सिद्धान्त-विचार ।।एइ स्वभाव-गुणे, ग्राते माधुर सार ॥
४०॥
जब मनुष्य दिव्य पद पर कृष्ण के प्रति आकृष्ट हो जाता है, तब न शास्त्र के आधार पर कोई तर्क काम करता है, न ही ऐसे सिद्धान्तों पर कोई विचार हो पाता है। यही उनका दिव्य गुण है, जो समस्त दिव्य माधुर्य को सार है।
‘गुण' शब्देर अर्थ—कृष्णेर गुण अनन्त ।सच्चिद्-रूप-गुण सर्व पूर्णानन्द ॥
४१॥
कृष्ण के गुण दिव्य और अनन्त हैं। समस्त आध्यात्मिक गुण दिव्य आनन्द से पूर्ण हैं।
ऐश्वर्य-माधुर्घ-कारुण्ये स्वरूप पूर्णता ।।भक्त-वात्सल्य, आत्म-पर्यन्त वदान्यता ॥
४२॥
ऐश्वर्य, माधुर्य तथा करुणा जैसे कृष्ण के दिव्य गुण सब तरह से पूर्ण हैं। जहाँ तक अपने भक्तों के प्रति कृष्ण की वत्सलता का प्रश्न है, वे इतने वदान्य हैं कि वे अपने भक्तों को अपने आप तक को दे देते हैं।
अलौकिक रूप, रस, सौरभादि गुण ।। कारो मन कोन गुणे करे आकर्षण ॥
४३॥
कृष्ण के गुणों की कोई सीमा नहीं है। भक्तगण उनके असाधारण सौन्दर्य, रसों तथा सुगन्धि से आकृष्ट होते हैं। इस तरह वे विभिन्न दिव्य रसों में विभिन्न रूप से स्थित होते हैं। इसीलिए कृष्ण को सर्व-आकर्षक कहा जाता है।
सनकादिर मन हरिल सौरभादि गुणे ॥
४४॥
चारों कुमार-मुनियों ( सनक, सनातन, सनन्दन तथा सनत्कुमार) के मन भगवान् को अर्पित तुलसी की सुगन्ध के कारण भगवान् के चरणकमलों के प्रति आकृष्ट हो गये।
तस्यारविन्द-नयनस्य पदारविन्दकिञ्जल्क-मिश्र-तुलसी-मकरन्द-वायुः ।अन्तर्गतः स्व-विवरेण चकार तेषांसक्षोभमक्षर-जुषामपि चित्त-तन्वोः ॥
४५ ॥
जब कमलनयन भगवान् के चरणकमलों से तुलसी-दल तथा केसर की सुगन्धि ले जाने वाली वायु उन कुमारों के नासारन्ध्रों से होकर हृदयों में प्रविष्ट हुई, तो उन्हें शरीर तथा मन दोनों में परिवर्तन का अनुभव हुआ, यद्यपि वे निराकार ब्रह्म धारणा के प्रति आसक्त थे।'
शुकदेवेर मन हरिल लीला-श्रवणे ॥
४६॥
शुकदेव का मन भगवान् की लीलाओं के श्रवण में खो गया था।
परिनिष्ठितोऽपि नैर्गुण्ये उत्तम:श्लोक-लीलया ।।गृहीत-चेता राजर्षे आख्यानं ग़दधीतवान् ॥
४७॥
[ शुकदेव गोस्वामी ने परीक्षित महाराज से कहा : ‘हे राजन, यद्यपि मैं पूर्णतया दिव्य पद को प्राप्त था, किन्तु फिर भी मैं भगवान कृष्ण की लीलाओं के प्रति आकृष्ट हो गया। इसीलिए मैंने अपने पिता से श्रीमद्भागवत का अध्ययन किया।
स्व-सुख-निभृत-चेतास्तव्युदस्तान्य-भावोऽप्यजित-रुचिर-लीलाकृष्ट-सारस्तदीयम् । व्यतनुत कृपया ग्रस्तत्त्व-दीपं पुराणंतमखिल-वृजिन-घ्नं व्यास-सूनुं नतोऽस्मि ॥
४८॥
मैं समस्त पापफलों को नष्ट करने वाले व्यासपुत्र श्रील शुकदेव गोस्वामी को सादर नमस्कार करता हूँ। आत्म-साक्षात्कार एवं आनन्द से पूर्ण होने के कारण उनकी कोई भौतिक इच्छा नहीं थी। फिर भी वे पूर्ण पुरुषोत्तम भगवान् की दिव्य लीलाओं के प्रति आकृष्ट हुए और लोगों पर दया करके उन्होंने श्रीमद्भागवत नामक दिव्य ऐतिहासिक ग्रन्थ का वर्णन किया। यह ग्रन्थ परम सत्य के दीपक के समान है।
श्री-अङ्ग-रूपे हरे गोपिकार मन ॥
४९॥
भगवान् श्रीकृष्ण अपने सुन्दर दिव्य स्वरूप द्वारा समस्त गोपियों के मन को हर लेते हैं।
वीक्ष्यालकावृत-मुखं तवे कुण्डल-श्री| गण्ड-स्थलाधर-सुधं हसितावलोकम् । दत्ताभयं च भुज-दण्ड-ग्रुगं विलोक्यवक्षः श्रियैक-रमणं च भवाम दास्यः ॥
५०॥
हे कृष्ण, हम तो आपकी दासियों के रूप में आत्मसमर्पण कर चुकी हैं, क्योंकि हमने बालों की लटों से अलंकृत आपके सुन्दर मुख को, आपके गालों पर लटकते आपके कुण्डलों को, आपके होठों के अमृत को तथा आपके मृदुहास्य की सुन्दरता को देखा है और साहस प्रदान करने वाली आपकी भुजाओं द्वारा हम आलिंगित भी हुई हैं। चूंकि हमने आपके सुन्दर तथा प्रशस्त वक्षस्थल को देखा है, अतएव हम आपकी शरण में हैं।
रूप-गुण-श्रवणे रुक्मिण्यादिर आकर्षण ॥
५१॥
रुक्मिणी आदि द्वारका की रानियाँ भी कृष्ण के दिव्य सौन्दर्य तथा गुणों को सुनकर उनकी और आकृष्ट हो जाती हैं।
श्रुत्वा गुणान्भुवन-सुन्दर शृण्वतां तेनिर्विश्य कर्ण-विवरैर्हरतोऽङ्ग-तापम् ।रूपं दृशां दृशिमतामखिलार्थ-लाभं। त्वय्यच्युताविशति चित्तमपत्रपं मे ॥
५२॥
हे अतीव सुन्दर कृष्ण, मैंने दूसरों से आपके दिव्य गुणों के विषय में सुना है, जिसके कारण मेरे शरीर के सारे दुःख जाते रहे हैं। यदि कोई आपके दिव्य सौन्दर्य का दर्शन कर लेता है, तो उसके नेत्रों को जीवन का सारा लाभ प्राप्त हो जाता है। हे अच्युत, आपके गुणों के विषय में सुनकर मैं लज्जाविहीन हो गई हूँ और मैं आपके प्रति आकृष्ट हो चुकी हूँ।'
वंशी-गीते हरे कृष्ण लक्ष्म्यादिर मन ॥
५३॥
भगवान् कृष्ण अपनी दिव्य वंशी बजाकर लक्ष्मी देवी आदि के भी मन को आकृष्ट कर लेते हैं।
कस्यानुभावोऽस्य न देव विद्महेतवाघ्रि-रेणु-स्परशाधिकारः । ग्रद्वाञ्छया श्रीलंलनाचरत्तपो ।विहाय कामान्सु-चिरं धृत-व्रता ॥
५४॥
हे प्रभु, हम नहीं जानतीं कि कालिय सर्प को किस तरह आपके चरणकमलों की धूल को स्पर्श करने का सुअवसर प्राप्त हो सका। ऐसा अवसर पाने के लिए तो लक्ष्मीजी ने सारी इच्छाएँ त्यागकर सदियों तक कठोर व्रत लेकर तपस्या की थी। निस्सन्देह, हम नहीं जानती हैं कि इस कालिय सर्प को यह सुअवसर कैसे प्राप्त हो सका?' ।
योग्य-भावे जगते व्रत युवतीर गण ॥
५५॥
कृष्ण न केवल गोपियों एवं लक्ष्मीओं के मनों को आकृष्ट करने । वाले हैं, अपितु वे तीनों लोकों की युवतियों के भी मनों को आकृष्ट करते हैं | का स्त्रयङ्ग ते कल-पदामृत-वेणु-गीतसम्मोहितार्य-चरितान्न चलेत्रि-लोक्याम् । त्रैलोक्य-सौभगमिदं च निरीक्ष्य रूपंग्रगो-द्विज-द्रुम-मृगाः पुलकोन्यबिभ्रन् ॥
५६॥
हे भगवान् कृष्ण, भला तीनों लोकों में वह कौन-सी स्त्री होगी, जो आपकी अद्भुत बाँसुरी से निकले मधुर संगीत की लहरियों से मोहित न हो जाए? भला इस तरह कौन-सी स्त्री अपने पतिव्रता पथ से विचलित नहीं हो जायेगी? आपका सौन्दर्य तीनों लोकों में सर्वोत्कृष्ट है। आपके सौन्दर्य को देखकर गौवें, पक्षी, पशु तथा वन के वृक्ष भी हर्ष के मारे जड़ हो जाते हैं।'
गुरु-तुल्य स्त्री-गणेर वात्सल्ये आकर्षण । दास्य-सख्यादि-भावे पुरुषादि गण ॥
५७॥
वृन्दावन की स्त्रियाँ, जो वयोवृद्धा हैं, कृष्ण के प्रति मातृ-स्नेह से आकृष्ट होती हैं। वृन्दावन के पुरुष कृष्ण के प्रति सेवक, मित्र तथा पिता के रूप में आकृष्ट होते हैं।
पक्षी, मृग, वृक्ष, लता, चेतनाचेतन । प्रेमे मत्त करि' आकर्षये कृष्ण-गुण ॥
५८॥
कृष्ण के गुण जड़ तथा चेतन को समान रूप से मोहने वाले हैं। यहाँ तक कि पक्षी, पशु तथा वृक्ष भी कृष्ण के गुणों से आकृष्ट हो जाते हैं।
‘हरिः'-शब्दे नानार्थ, दुइ मुख्यतम ।सर्व अमङ्गल हरे, प्रेम दिया हरे मन ॥
५९॥
यद्यपि हरि शब्द के अनेक अर्थ हैं, किन्तु उनमें से दो मुख्य हैं। एक अर्थ यह है कि भगवान् अपने भक्त का सारा अमंगल हर लेते हैं और दूसरा अर्थ यह है कि वे भगवत्प्रेम द्वारा मन को आकृष्ट करते हैं।
ग्रैछे तैछे ग्रोहि कोहि करये स्मरण ।।चारि-विध ताप तार करे संहरण ॥
६० ॥
जब भक्त जहाँ कहीं भी और जैसे कैसे भी पूर्ण पुरुषोत्तम भगवान् का सदैव स्मरण करता है, तो भगवान् हरि जीवन के चार प्रकार के तापों को हर लेते हैं।
ग्रंथाग्निः सु-समृद्धार्चः करोत्येधांसि भस्म-सात् ।तथा मद्विषया भक्तिरुद्धवैनांसि कृत्स्नशः ॥
६१॥
जिस प्रकार पूरी तरह प्रज्वलित अग्नि द्वारा सारा ईंधन जलकर राख हो जाता है, उसी तरह मेरी सेवा में लगने पर मनुष्य के सारे पापकृत्य पूर्णतया दूर हो जाते हैं।'
तबे करे भक्ति-बाधक कर्म, अविद्या नाश ।।श्रवणाद्येर फल ‘प्रेमा' करये प्रकाश ॥
६२॥
इस तरह जब पूर्ण पुरुषोत्तम भगवान् की कृपा से सारे पापकर्म दूर हो जाते हैं, तो धीरे-धीरे भक्ति के मार्ग के सारे अवरोध एवं उसी के साथ इन अवरोधों से उत्पन्न अज्ञान भी दूर हो जाते हैं। इसके बाद मनुष्य श्रवण, कीर्तन आदि नौ प्रकार की भक्ति के माध्यम से अपने मूल भगवत्प्रेम कोरी तरह से प्रकट करता है।
निज-गुणे तबे हरे देहेन्द्रिय-मन । ऐछे कृपालु कृष्ण, ऐछे ताँर गुण ॥
६३॥
जब भक्त सारे भौतिक पापकर्मों से मुक्त हो जाता है, तो कृष्ण उसके शरीर, मन तथा इन्द्रियों को अपनी सेवा में लगा लेते हैं। इस तरह कृष्ण अत्यन्त कृपालु हैं और उनके दिव्य गुण अत्यन्त आकर्षक हैं।
चारि पुरुषार्थ छाड़ाय, गुणे हरे सबार मन ।‘हरि'-शब्देर एइ मुख्य कहिलँ लक्षण ॥
६४॥
जब मनुष्य का मन, इन्द्रियाँ तथा शरीर हरि के दिव्य गुणों के प्रति आकृष्ट हो जाते हैं, तो वह भौतिक सफलता के चारों सिद्धान्तों का परित्याग कर देता है। इस तरह मैंने ‘हरि' शब्द के मुख्य अर्थों की व्याख्या कर दी है।
‘च' 'अपि', दुइ शब्द ताते 'अव्यय' हय ।। ग्रेइ अर्थ लागाइये, सेइ अर्थ होय ॥
६५॥
जब समुच्चय-बोधक च तथा क्रियाविशेषण अपि ये दो शब्द इस श्लोक में जोड़ दिये जाते हैं, तो इस श्लोक से जैसा भी अर्थ चाहें, प्राप्त किया जा सकता है।
तथापि च-कारेर कहे मुख्य अर्थ सात ॥
६६॥
च' शब्द की व्याख्या सात प्रकार से की जा सकती है।
चान्वाचये समाहारेऽन्योन्यार्थे च समुच्चये । ग्रलान्तरे तथा पाद-पूरणेऽप्यवधारणे ॥
६७॥
यह शब्द च ( तथा ) का प्रयोग किसी शब्द या वाक्य को पिछले शब्द या वाक्य से जोड़ने, समाहार करने, अर्थ में सहायता करने, सामूहिक जानकारी देने, अन्य विकल्प सुझाने या श्लोक के चरण की पूर्ति करने के लिए किया जाता है। इसका प्रयोग निश्चय के अर्थ में भी होता है।'
अपि-शब्दे मुख्य अर्थ सात विख्यात ॥
६८ ॥
| अपि' शब्द के सात मुख्य अर्थ होते हैं। वे इस प्रकार हैं।
अपि सम्भावना-प्रश्न-शङ्का-गह-समुच्चये ।।तथा युक्त पदार्थेषु काम-चार-क्रियासु च ॥
६९॥
यह शब्द अपि का प्रयोग सम्भावना, प्रश्न, सन्देह, निन्दा, समुच्चय, वस्तुओं का सही ढंग से सम्प्रयोग तथा अतिशियोक्ति के अर्थ में किया जाता है।
एइ त' एकादश पदेर अर्थ-निर्णय । एबे श्लोकार्थ करि, ग्रथा ये लागय ॥
७० ॥
मैं अब ग्यारह अलग-अलग शब्दों के विभिन्न अर्थ बतला चुका हूँ। अब मैं इस श्लोक का पूरा अर्थ कहूँगा, जैसाकि यह विभिन्न स्थलों पर उपयुक्त है।
‘ब्रह्म' शब्देर अर्थतत्त्व सर्व-बृहत्तम । स्वरूप ऐश्वर्य करि' नाहि ग्राँर सम ॥
७१॥
ब्रह्म' शब्द परम सत्य को सूचक है, जो अन्य सभी सत्यों से श्रेष्ठ है। यह मूल स्वरूप है और इस परम सत्य के तुल्य अन्य कोई सत्य नहीं है।
बृहत्त्वाद्हणत्वाच्च तद्ब्रह्म परमं विदुः ।।तस्मै नमस्ते सर्वात्मन् ग्रोगि-चिन्त्याविकारवत् ॥
७२॥
मैं उन परम सत्य को सादर नमस्कार करता हूँ। वे सर्वव्यापक तथा : महान् योगियों के लिए सर्वोच्च विषय हैं। वे अपरिवर्तनशील हैं और सबके आत्मा हैं।'
सेइ ब्रह्म-शब्दे कहे स्वयं-भगवान् ।अद्वितीय-ज्ञान, याँहा विना नाहि आन ॥
७३॥
ब्रह्म' शब्द का वास्तविक अर्थ पूर्ण पुरुषोत्तम भगवान् है, जो अद्वितीय हैं और जिनके बिना अन्य किसी भी वस्तु का अस्तित्व सम्भव नहीं है।
वदन्ति तत्तत्त्व-विदस्तत्त्वं प्रज्ज्ञानमद्वयम् ।ब्रह्मेति परमात्मेति भगवानिति शब्द्यते ॥
७४॥
विद्वान अध्यात्मवादी, जो परम सत्य को जानते हैं, कहते हैं कि वे ही अद्वय ज्ञान हैं और वे ही निराकार ब्रह्म, अन्तर्यामी परमात्मा तथा भगवान् कहलाते हैं।'
सेइ अद्वय-तत्त्व कृष्ण–स्वयं-भगवान् ।।तिन-काले सत्य तिंहो-शास्त्र-प्रमाण ॥
७५ ॥
वे अद्वय परम सत्य कृष्ण हैं, जो पूर्ण पुरुषोत्तम भगवान् हैं। वे भूत, वर्तमान तथा भविष्य के परम सत्य हैं। यही समस्त प्रामाणिक शास्त्रों का प्रमाण है।
अहमेवासमेवाग्रे नान्यद् ग्रसदसत्परम् ।। पश्चादहं यदेतच्च योऽवशिष्येत सोऽस्म्यहम् ॥
७६ ॥
सृष्टि के पूर्व केवल मैं विद्यमान रहता हूँ, कोई स्थूल, सूक्ष्म या । आदि तत्त्व कुछ भी नहीं रहता। सृष्टि के बाद मैं ही प्रत्येक वस्तु में - विद्यमान रहता हूँ और संहार के बाद केवल मैं ही शाश्वत रूप से रह जाता ‘आत्म'-शब्दे कहे कृष्ण बृहत्त्व-स्वरूप ।सर्व-व्यापक, सर्व-साक्षी, परम-स्वरूप ॥
७७॥
आत्मा' शब्द सर्वोच्च सत्य, कृष्ण का सूचक है। वे सबके सर्वव्यापी साक्षी हैं और परम स्वरूप हैं।
आततत्वाच्च मातृत्वादात्मा हि परमो हरिः ॥
७८ ॥
भगवान् हरि प्रत्येक वस्तु के सर्वव्यापक आदि उद्गम हैं। इसलिए वे सबके परमात्मा हैं।'
सेइ कृष्ण-प्राप्ति-हेतु त्रिविध साधन' ।ज्ञान, योग, भक्ति,—तिनेर पृथक्लक्षण ॥
७९॥
परम सत्य कृष्ण के चरणकमलों को प्राप्त करने के तीन साधन हैं। ये हैं--दार्शनिक चिन्तन, योगाभ्यास तथा भक्तिमय सेवा। इन तीनों के लक्षण अलग-अलग हैं।
तिन साधने भगवान् तिने स्वरूपे भासे ।।ब्रह्म, परमात्मा, भगवत्ता,—त्रिविध प्रकाशे ॥
८० ॥
परम सत्य तो एक ही हैं, किन्तु उन्हें समझने के प्रक्रिया के अनुसार वे--ब्रह्म, परमात्मा तथा भगवान् ये तीन रूपों में-प्रकट होते हैं।
वदन्ति तत्तत्त्व-विदस्तत्त्वं ज्ञानमद्वयम् । ब्रह्मेति परमात्मेति भगवानिति शब्द्यते ॥
८१॥
परम सत्य को जानने वाले विद्वान अध्यात्मवादी कहते हैं कि यह भद्वय ज्ञान है और निर्विशेष ब्रह्म, अन्तर्यामी परमात्मा तथा भगवान् कहलाता है।'
‘ब्रह्म-आत्मा'-शब्दे यदि कृष्णेरे कहय । ‘रूढ़ि-वृत्त्ये' निर्विशेष अन्तर्यामी कय ॥
८२ ॥
यद्यपि 'ब्रह्म' तथा 'आत्मा' शब्द कृष्ण के सूचक हैं, किन्तु उनके प्रत्यक्ष अर्थ क्रमशः निर्विशेष ब्रह्म तथा परमात्मा के ही सूचक हैं।
ज्ञान-मार्गे---निर्विशेष-ब्रह्म प्रकाशे । योग-मार्गे--अन्तर्रामि-स्वरूपेते भासे ॥
८३ ।। यदि कोई दार्शनिक चिन्तन के मार्ग का अनुसरण करता है, तो परम सत्य अपने आपको निर्विशेष ब्रह्म के रूप में प्रकट करते हैं, किन्तु यदि वह योग का अनुगामी है, तो परम सत्य ( भगवान्) स्वयं को परमात्मा के रूप में प्रकट करते हैं।
राग-भक्ति-विधि-भक्ति हय दुइ-रूप ।‘स्वयं-भगवत्त्वे', भगवत्त्वे प्रकाश द्वि-रूप ॥
८४॥
भक्ति-कर्म दो प्रकार का है-रागानुग (स्वतःस्फूर्त ) तथा विधिविधानपरक ( साधन भक्ति)। रागानुगा भक्ति से मनुष्य को मूल भगवान् अर्थात् कृष्ण की प्राप्ति होती है और विधि-विधानों (वैधी भक्ति) से मनुष्य को भगवान् का विस्तार रूप प्राप्त होता है।
राग--भक्त्ये व्रजे स्वयं-भगवाने पाय ॥
८५ ॥
वृन्दावन में रागानुगा भक्ति सम्पन्न करने से मनुष्य को मूल पूर्ण पुरुषोत्तम भगवान् कृष्ण प्राप्त होते हैं।
नायं सुखापो भगवान्देहिनां गोपिका-सुतः ।।ज्ञानिनां चात्म-भूतानां ग्रथा भक्तिमतामिह ॥
८६॥
माता यशोदा के पुत्र पूर्ण पुरुषोत्तम भगवान् कृष्ण रागानुगा प्रेमाभक्ति में लगे भक्तों के लिए उपलब्ध हैं, किन्तु वे ज्ञानियों, कठिन तपस्या द्वारा आत्म-साक्षात्कार के लिए प्रयत्न करने वालों या शरीर को आत्मा के तुल्य मानने वालों के लिए उतनी सरलता से सुलभ नहीं होते।'
विधि-भक्त्ये पार्षद-देहे वैकुण्ठेते ग्राय ॥
८७॥
वैधी भक्ति करने से मनुष्य नारायण का पार्षद बनता है और आध्यात्मिक आकाश में वैकुण्ठ लोक प्राप्त करता है।
ग्रच्च व्रजन्त्यनिमिषामृषभानुवृत्त्या | दूरे-ग्रमा ह्युपरि नः स्पृहणीय-शीलाः ।। भर्तुर्मथः सु-यशसः कथनानुरागवैक्लव्य-बाष्प-कलया पुलकी-कृताङ्गाः ।।८८ ॥
जो भगवान् कृष्ण के कार्यों की चर्चा करते हैं, वे भक्ति के चरम पद को प्राप्त रहते हैं और उनके नेत्रों से अश्रु तथा शारीरिक पुलक के लक्षण दृष्टिगोचर होते हैं। ऐसे लोग योग-पद्धति के विधि-विधानों का अभ्यास किये बिना ही कृष्ण की भक्ति करते हैं। उनमें सारे आध्यात्मिक गुण पाये जाते हैं और वे वैकुण्ठ लोकों को जाते हैं, जो हमारे ऊपर स्थित हैं।'
सेइ उपासक हय त्रिविध प्रकार । अकाम, मोक्ष-काम, सर्व-काम आर ॥
८९।। भक्तगण तीन वर्गों में विभाजित हैं-अकाम (निष्काम ), मोक्षकाम ( मोक्ष के इच्छुक ) तथा सर्वकाम ( भौतिक सिद्धि के इच्छुक)।
अकामः सर्वकामो वा मोक्षकाम उदारधीः ।तीव्रण भक्तिय़ोगेन व्रजेत पुरुषं परम् ॥
९०॥
जो वास्तव में बुद्धिमान है, वह भले ही भौतिक इच्छाओं से मुक्त भक्त हो, या सारी भौतिक सुविधाएँ चाहने वाला कर्मी हो अथवा मोक्ष की कामना करने वाला ज्ञानी हो, उसे पूर्ण पुरुषोत्तम भगवान् की तुष्टि के लिए गम्भीरतापूर्वक भक्तियोग का पालन करना चाहिए।'
बुद्धिमान्-अर्थे–यदि ‘विचार-ज्ञ' हय ।निज-काम लागिह तबे कृष्णेरे भजये ॥
९१॥
उदारधीः' शब्द का अर्थ बुद्धिमान या विचारवान है। इसीलिए मनुष्य अपनी इन्द्रियतृप्ति के लिए भी कृष्ण की भक्ति में संलग्न होता है।
भक्ति विनु कोन साधन दिते नारे फल ।।सब फल देय भक्ति स्वतन्त्र प्रबल ॥
९२॥
अन्य विधियाँ तब तक कोई फल प्रदान नहीं कर सकतीं, जब तक उनकी संगति भक्ति से नहीं हो जाती। किन्तु भक्ति इतनी प्रबल तथा स्वतन्त्र है कि यह मनुष्य को सारे वांछित फल दे सकती है।
अजा-गल-स्तन-न्याय अन्य साधन ।।अतएव हरि भजे बुद्धिमान् जन ॥
९३॥
भक्ति को छोड़कर आत्म-साक्षात्कार की सारी विधियाँ बकरी के गले के स्तन के समान हैं। अतः बुद्धिमान मनुष्य आत्म-साक्षात्कार की अन्य सारी विधियों को त्यागकर एकमात्र भक्ति को अपनाता है।
चतुर्विधा भजन्ते मां जनाः सुकृतिनोऽर्जुन ।आर्ते जिज्ञासुरर्थार्थी ज्ञानी च भरतर्षभ ॥
९४॥
हे भरत-श्रेष्ठ ( अर्जुन ), चार प्रकार के पुण्यात्मा मेरी भक्ति करते हैं-आर्त ( दुःखी ), धने का इच्छुक, जिज्ञासु तथा परम पूर्ण के ज्ञान की खोज करने वाला।'
आर्त, अर्थार्थी, दुइ सकाम-भितरे गणि।।जिज्ञासु, ज्ञानी,-दुइ मोक्ष-काम मानि ॥
९५॥
भौतिकतावादी भक्तगण भक्ति तथा कृष्ण की पूजा तब करते हैं, | जब वे संकट में होते हैं या उन्हें धन की आवश्यकता होती है। जो लोग र वस्तु के परम स्रोत को जानने के लिए वास्तव में उत्सुक रहते हैं, तथा जो लोग ज्ञान की खोज में रहते हैं, वे अध्यात्मवादी कहलाते हैं, क्योंकि 'वे समस्त भौतिक कल्मष से मुक्ति चाहते हैं।
एइ चारि सुकृति हय महा-भाग्यवान् ।तत्तत्कामादि छाड़ि' हय शुद्ध-भक्तिमान् ॥
९६ ॥
पवित्र पृष्ठभूमि होने के कारण इन चारों प्रकार के लोगों को अत्यन्त भाग्यवान मानना चाहिए। ऐसे लोग धीरे-धीरे भौतिक इच्छाओं का परित्याग कर देते हैं और शुद्ध भक्त बन जाते हैं।
साधु-सङ्ग-कृपा किम्वा कृष्णेर कृपाय ।।कामादि ‘दुःसङ्ग' छाड़ि' शुद्ध-भक्ति पाय ॥
९७ ॥
वैष्णव, प्रामाणिक गुरु तथा कृष्ण की विशेष कृपा से ही मनुष्य भक्ति-पद को प्राप्त होता है। इस पद पर मनुष्य सारी भौतिक इच्छाओं तथा अवांछित लोगों की संगति को त्याग देता है। इस तरह मनुष्य शुद्ध भक्ति के पद को प्राप्त करता है।
सत्सङ्गान्मुक्त-दुःसङ्गो हातुं नोत्सहते बुधः । कीर्त्यमानं यशो ग्रस्य सकृदाकण्यं रोचनम् ॥
१८ ॥
बुद्धिमान लोग, जिन्होंने शुद्ध भक्तों की संगति में रहकर परमेश्वर को समझ लिया है और जो भौतिक कुसंगति से मुक्त हो चुके हैं, पहले केवल एक बार सुनने पर भी भगवान् की महिमा के श्रवण की उपेक्षा नहीं कर सकते।'
‘दुःसङ्ग’ कहिये--‘कैतव', 'आत्म-वञ्चना' ।। कृष्ण, कृष्ण-भक्ति विनु अन्य कामना ।। ९९॥
अपने आपको और दूसरों को ठगना कैतव कहा जाता है। इस तरह ठगने वाले ठगों की संगति करना दुःसंग कहलाता है, जिसका अर्थ है बुरी संगति। जो लोग कृष्ण की सेवा करने के अतिरिक्त अन्य बातें चाहते हैं, वे भी दुःसंग कहलाते हैं।
धर्मः प्रोज्झित-कैतवोऽत्र परमो निर्मत्सराणां सतांवेद्यं वास्तवमत्र वस्तु शिव-दं ताप-त्रयोन्मूलनम् । श्रीमद्भागवते महा-मुनि-कृते किं वा परैरीश्वरः ।सद्यो हृद्यवरुध्यतेऽत्र कृतिभिः शुश्रूषुभिस्तत्क्षणात् ॥
१०० ॥
महामुनि व्यासदेव द्वारा चार प्रारम्भिक श्लोकों से विरचित महान् शास्त्र श्रीमद्भागवत में अत्यन्त दयालु-हृदय वाले उन्नत भक्तों का वर्णन हुआ है और इसमें भौतिकता से प्रेरित धार्मिकता के वंचना-मार्गों का पूरा बहिष्कार हुआ है। वह शाश्वत धर्म के सर्वोच्च सिद्धान्तों की स्थापना करता है, जिनसे जीव के तीन प्रकार के कष्ट वास्तविक रूप से दूर हो सकते हैं और वह सम्पन्नता तथा ज्ञान का सर्वोच्च वर प्रदान कर सकता है। जो लोग विनीत होकर सेवाभाव से इस शास्त्र का सन्देश ग्रहण करना चाहते हैं, वे तुरन्त ही भगवान् को अपने हृदयों में बन्दी बना सकते हैं। अतएव श्रीमद्भागवत के अतिरिक्त अन्य किसी शास्त्र की आवश्यकता नहीं है।'
‘प्र'-शब्दे-मोक्ष-वाञ्छा कैतव-प्रधान । एइ श्लोके श्रीधर-स्वामी करियाछेन व्याख्यान ॥
१०१॥
प्रोज्झित' शब्द के प्रारम्भ में 'प्र' उपसर्ग विशेष रूप से मोक्षकामी या ब्रह्म में लीन होने के इच्छुक लोगों की ओर संकेत करता है। ऐसी इच्छा को ठग-प्रवृत्ति में प्रमुख माननी चाहिए। महान् भाष्यकार श्रीधर स्वामी ने इस श्लोक की व्याख्या इसी रूप में की है।
सकाम-भक्ते 'अज्ञ' जानि' दयालु भगवान् । स्व-चरण दिया करे इच्छार पिधान ॥
१०२॥
जब दयालु भगवान् यह समझ लेते हैं कि मूर्ख भक्त भौतिक सम्पन्नता चाहता है, तो वे उसे अपने चरणकमलों में कृपा करके शरण देते हैं। इस तरह भगवान् उसकी अवांछित इच्छाओं को ढक देते हैं।
सत्यं दिशत्यथितमर्थितो नृणां | नैवार्थ-दो ग्रत्पुनरर्थिता ग्रतः । स्वयं विधत्ते भजतामनिच्छताम्।इच्छा-पिधानं निज-पाद-पल्लवम् ॥
१०३ ॥
जब भी कोई कृष्ण से अपनी इच्छापूर्ति के लिए प्रार्थना करता है, तो वे उसे अवश्य ही पूरी कर देते हैं, किन्तु वे कोई ऐसी वस्तु प्रदान नहीं करते जिससे उसे बारम्बार अपनी और इच्छाएँ पूरी करने के लिए याचना नी पड़े। जब मनुष्य अन्य इच्छाएँ होने पर भी भगवान् की सेवा में गा रहता है, तो कृष्ण उसे बलात् अपने चरणकमलों में शरण प्रदान ते हैं, जहाँ व्यक्ति अन्य सारी इच्छाएँ इच्छाओं को भूल जाता है।
साधु-सङ्ग, कृष्ण-कृपा, भक्तिर स्वभाव ।ए तिने सब छाड़ाय, करे कृष्णे 'भाव' ॥
१०४॥
साधु-संग, कृष्ण-कृपा तथा भक्ति की प्रकृति-ये तीनों समस्त अवांछित संगति को त्यागने तथा क्रमशः भगवत्प्रेम का पद प्राप्त करने में सहायक होते हैं।
आगे व्रत व्रत अर्थ व्याख्यान करिब ।। कृष्ण-गुणास्वादेर एइ हेतु जानिब ॥
१०५॥
इस तरह मैं आत्माराम श्लोक के सारे शब्दों की व्याख्या करता चलूंगा। यह स्मरण रहे कि ये सारे शब्द कृष्ण के दिव्य गुणों का आस्वादन कराने के निमित्त हैं।
श्लोक-व्याख्या लागि' एइ करितुं आभास ।एबे करि श्लोकेर मूलार्थ प्रकाश ॥
१०६॥
मैंने इस श्लोक का अर्थ इंगित करने के लिए ही इतनी सारी व्याख्याएँ की हैं। अब मैं इस श्लोक का वास्तविक अर्थ कहने जा रही हैं।
ज्ञान-मार्गे उपासक दुइत' प्रकार ।केवल ब्रह्मोपासक, मोक्षाकाङ्क्षी आर ॥
१०७॥
ज्ञान-मार्ग के उपासक दो प्रकार के होते हैं-एक तो ब्रह्म उपासक, जो निर्विशेष ब्रह्म के उपासक होते हैं तथा दूसरे मोक्षाकांक्षी, जो मोक्ष की आकांक्षा करते हैं।
केवल ब्रह्मोपासक तिन भेद हय ।।साधक, ब्रह्ममय, आर प्राप्त-ब्रह्म-लय ॥
१०८॥
निर्विशेष ब्रह्म के उपासकों के तीन प्रकार हैं-साधक, ब्रह्म के ध्यान में मग्न रहने वाले तथा निर्विशेष ब्रह्म को वस्तुतः प्राप्त।
भक्ति विना केवल ज्ञाने 'मुक्ति' नाहि हय ।।भक्ति साधन करे येइ 'प्राप्त-ब्रह्म-लय' ॥
१०९॥
भक्ति से रहित मानसिक चिन्तन के माध्यम से ही मुक्ति प्राप्त नहीं की जा सकती। किन्तु यदि भक्ति सम्पन्न की जाती है, तो स्वतः ब्रह्म-पद प्राप्त हो जाता है।
भक्तिर स्वभाव,—ब्रह्म हैते करे आकर्षण ।दिव्य देह दिया कराय कृष्णेर भजन ॥
११०॥
विचित्र बात है कि जो भक्ति करता है, वह निर्विशेष ब्रह्म-पद से दूर हटता जाता है। उसे कृष्ण की सेवा में लगने के लिए दिव्य शरीर प्रदान किया जाता है।
भक्त-देह पाइले हय गुणेर स्मरण ।। गुणाकृष्ट हञा करे निर्मल भजन ॥
१११॥
भक्त का आध्यात्मिक शरीर प्राप्त होने पर मनुष्य कृष्ण के दिव्य गुणों को स्मरण कर सकता है। कृष्ण के दिव्य गुणों के प्रति आकृष्ट होने मात्र से मनुष्य उनकी सेवा में लगकर शुद्ध भक्त बन जाता है।
मुक्ता अपि लीलया विग्रहं कृत्वा भगवन्तं भजन्ते ॥
११२॥
निर्विशेष ब्रह्म में मग्न रहने वाला मुक्तात्मा भी कृष्ण की लीलाओं के प्रति आकृष्ट होता है। तब वह अर्चाविग्रह स्थापित करके भगवान् की सेवा करता है।
जन्म हैते शुक-सनकादि 'ब्रह्ममय' ।।कृष्ण-गुणाकृष्ट हा कृष्णेरे भजय ॥
११३॥
यद्यपि शुकदेव गोस्वामी तथा चारों कुमार सदैव निर्विशेष ब्रह्म के विचार में डूबे रहते थे और इस तरह ब्रह्मवादी थे, फिर भी वे कृष्ण की दिव्य लीलाओं तथा गुणों के द्वारा आकृष्ट हुए थे। इसीलिए बाद में वे कृष्ण-भक्त बन गये।
सनकाद्यैर कृष्ण-कृपाय सौरभे हरे मन ।।गुणाकृष्ट हा करे निर्मल भजन ॥
११४॥
चारों कुमारों के मन कृष्ण के चरणकमलों पर चढ़ाये गये फूलों की सुगन्ध से आकृष्ट हो गये। इस तरह कृष्ण के दिव्य गुणों से आकृष्ट होकर वे शुद्ध भक्ति में लग गये।
तस्यारविन्द-नयनस्य पदारविन्दकिञ्जल्क-मिश्र-तुलसी-मकरन्द-वायुः । अन्तर्गतः स्व-विवरेण चकार तेषांसक्षोभमक्षर-जुषामपि चित्त-तन्वोः ॥
११५ ॥
जब कमल जैसे नेत्रों वाले भगवान् के चरणकमलों पर चढ़े। तुलसी-दल तथा केसर की सुगन्धि को ले जाने वाली वायु उन ऋषियों ( कुमारों) के नासारन्ध्रों से होकर उनके हृदयों में पहुँची, तो निर्विशेष ब्रह्म में आसक्त होते हुए भी उन्होंने अपने शरीर तथा मन दोनों में परिवर्तन का अनुभव किया।'
व्यास-कृपाय शुकदेवेर लीलादि-स्मरण ।।कृष्ण-गुणाकृष्ट हुआ करेन भजन ।। ११६॥
श्रील व्यासदेव की कृपा से शुकदेव गोस्वामी भगवान् कृष्ण की लीलाओं के प्रति आकृष्ट हुए। इस तरह कृष्ण के दिव्य गुणों के प्रति आकृष्ट होने पर वे भी भक्त बन गये और उनकी सेवा करने लगे।
हरेर्गुणाक्षिप्त-मतिर्भगवान्बादरायणिः ।।अध्यगान्महदाख्यानं नित्यं विष्णु-जन-प्रियः ॥
११७॥
भगवान् की दिव्य लीलाओं द्वारा अत्यधिक आकृष्ट होने पर श्रील शुकदेव गोस्वामी का मन कृष्णभावना से उत्तेजित हुआ। अतः वे अपने |पिता की कृपा से श्रीमद्भागवत का अध्ययन करने लगे।
नव-योगीश्वर जन्म हैते ‘साधक' ज्ञानी ।विधि-शिव-नारद-मुखे कृष्ण-गुण शुनि' ॥
११८॥
नौ योगीश्वर ( योगेन्द्र) जन्म से ही परम सत्य के निर्विशेष दार्शनिक थे। किन्तु उन्होंने ब्रह्माजी, शिवजी तथा महर्षि नारद से कृष्ण के गुणों के विषय में सुना, तो वे भी कृष्ण-भक्त बन गये।
गुणाकृष्ट हा करे कृष्णेर भजन ।।एकादश-स्कन्धे ताँर भक्ति-विवरण ॥
११९॥
श्रीमद्भागवत के ग्यारहवें स्कन्ध में उन नवों योगेन्द्रों की भक्ति का पूरा वर्णन मिलता है, जिन्होंने भगवान् के दिव्य गुणों के द्वारा आकृष्ट होकर भक्ति की।
अक्लेशां कमल-भुवः प्रविश्य गोष्ठीं ।कुर्वन्तः श्रुति-शिरसां श्रुतिं श्रुत-ज्ञाः ।। उत्तुङ्गं यदु-पुर-सङ्गमाय रङ्गंयोगीन्द्राः पुलक-भृतो नवाप्यवापुः ॥
१२०॥
नवों योगेन्द्र ब्रह्माजी के सान्निध्य में गये और उनसे उन्होंने उपनिषदों का वास्तविक अर्थ सुना। यद्यपि वे पहले से वैदिक ज्ञान के जानकार थे, किन्तु ब्रह्मा के मुख से कृष्णभावना के विषय में सुनकर वे अत्यन्त पुलकित हुए। इस प्रकार उन्होंने भगवान् कृष्ण के निवासस्थान द्वारका में प्रविष्ट होना चाहा। इस तरह अन्त में वे रंगक्षेत्र नामक स्थान को प्राप्त र सके।'
मोक्षाकाङ्क्षी ज्ञानी हय तिन-प्रकार ।मुमुक्षु, जीवन्मुक्त, प्राप्त-स्वरूप आर ॥
१२१॥
निर्विशेष ब्रह्म में लीन होने के इच्छुक लोग भी तीन प्रकार के होते ४-वे जो मुक्त होना चाहते हैं, वे जो पहले से मुक्त हैं तथा वे जो ब्रह्म का साक्षात्कार कर चुके हैं।
‘मुमुक्षु' जगते अनेक संसारी जन ।। ‘मुक्ति' लागि' भक्त्ये करे कृष्णेर भजन ॥
१२२॥
इस भौतिक जगत् में अनेक लोग हैं, जो मुक्ति की कामना करते हैं और इसके लिए वे भगवान् कृष्ण की भक्ति करते हैं।
मुमुक्षवो घोर-रूपान्हित्वा भूत-पतीनथ । नारायण-कलाः शान्ता भजन्ति ह्यनसूयवः ॥
१२३॥
जो लोग भवबन्धन से छूटना चाहते हैं, वे भयानक रूप वाले देवताओं की पूजा करना बन्द कर देते हैं। ऐसे शान्त भक्त, जो देवताओं से ईर्ष्या नहीं करते, पूर्ण पुरुषोत्तम भगवान् नारायण के विविध रूपों की पूजा करते हैं।'
सेइ सबेर साधु-सङ्गे गुण स्फुराय । कृष्ण-भजन कराय, 'मुमुक्षा' छाड़ाये ॥
१२४॥
देवपूजा से आसक्त लोग यदि सौभाग्यवश भक्तों की संगति पा जाते हैं, तो उनकी सुप्त भक्ति तथा भगवान् के गुणों के प्रति उनका भनुराग धीरे-धीरे जाग्रत हो उठता है। इस तरह वे भी कृष्ण की भक्ति करने लगते हैं और मुक्ति तथा निर्विशेष ब्रह्म में लीन होने की इच्छा का परित्याग कर देते हैं।
अहो महात्मन्बहु-दोष-दुष्टोऽप्येकेन भात्येष भवो गुणेन । सत्सङ्गमाख्येन सुखावहेनकृताद्य नो येन कृशा मुमुक्षा ॥
१२५ ॥
हे महा विद्वान भक्त, यद्यपि इस भौतिक जगत् में अनेक दोष हैं, किन्तु एक सुअवसर है और वह है भक्तों की संगति। ऐसी संगति से अत्यधिक सुख प्राप्त होता है। इसी सद्गुण के कारण ब्रह्मज्योति से तादात्म्य द्वारा मोक्ष प्राप्त करने की हमारी प्रबल इच्छा निर्बल पड़ गई। है।'
नारदेर सङ्गे शौनकादि मुनि-गण ।मुमुक्षा छाड़िया कैला कृष्णेर भजन ॥
१२६॥
नारद जैसे महामुनि की संगति से शौनक तथा अन्य बड़े-बड़े ऋषियों ने मोक्ष की इच्छा त्याग दी और कृष्ण की भक्तिमय सेवा में लग गये।
कृष्णेर दर्शने, कारो कृष्णेर कृपाय ।। मुमुक्षा छाड़िया गुणे भजे ताँर पाय ॥
१२७॥
कृष्ण के दर्शन या कृष्ण की विशेष कृपा पाने मात्र से मनुष्य मोक्ष की इच्छा छोड़ सकता है। कृष्ण के दिव्य गुणों के द्वारा आकर्षित होने पर मनुष्य उनकी सेवा में लग सकता है।
अस्मिन्सुख-धन-मूर्तीपरमात्मनि वृष्णि-पत्तने स्फुरति । आत्मारामतया में। वृथा गतो बत चिरं कालः ॥
१२८॥
इस द्वारका धाम में मैं आध्यात्मिक आनन्द के मूर्तिमान रूप पूर्ण पुरुषोत्तम भगवान् कृष्ण द्वारा आकृष्ट हो रहा हूँ। केवल उनका दर्शन करके मैं परम सुख का अनुभव कर रहा हूँ। ओह, निर्विशेष-अनुशीलन द्वारा स्वरूपसिद्ध बनने के प्रयास में मैंने कितना समय आँवा दिया है। यही मेरे सन्ताप का कारण है!' ‘जीवन्मुक्त' अनेक, सेइ दुइ भेद जानि ।।'भक्त्ये जीवन्मुक्त', 'ज्ञाने जीवन्मुक्त' मानि ॥
१२९॥
ऐसे अनेक लोग हैं, जो इसी जीवन में मुक्त हो चुके होते हैं। कुछ तो भक्ति करके और कुछ ज्ञान की विधि द्वारा मुक्त बनते हैं।
'भक्त्ये जीवन्मुक्त' गुणाकृष्ट हा कृष्ण भजे ।।शुष्क-ज्ञाने जीवन्मुक्त अपराधे अधो मजे ॥
१३०॥
जो लोग भक्ति द्वारा मुक्त बनते हैं, वे कृष्ण के दिव्य गुणों द्वारा अधिकाधिक आकृष्ट होते जाते हैं। इस प्रकार वे उनकी सेवा में लग जाते हैं। जो लोग शुष्क ज्ञान द्वारा मुक्त बनते हैं, वे अन्त में अपने अपराधी कृत्य द्वारा पुनः नीचे गिर जाते हैं।
येऽन्येऽरविन्दाक्ष विमुक्त-मानिनस्त्वय्यस्त-भावादविशुद्ध-बुद्धयः ।। आरुह्य कृच्छ्रेण परं पदं ततः ।पतन्त्यधोऽनादृत-युष्मदछ्यः ॥
१३१॥
हे कमलनयन, जो लोग आपकी भक्ति के बिना ही इस जीवन में अपने आपको मुक्त मानते हैं, उनकी बुद्धि अशुद्ध रहती है। यद्यपि वे विविध कठोर तपस्याएँ करते हैं और निर्विशेष ब्रह्म साक्षात्कार रूपी आध्यात्मिक पद प्राप्त कर लेते हैं, फिर भी आपके चरणकमलों की पूजा की उपेक्षा करने के कारण वे पुनः नीचे गिर जाते हैं।
ब्रह्म-भूतः प्रसन्नात्मा न शोचति न काङ्क्षति ।। समः सर्वेषु भूतेषु मद्भक्तिं लभते पराम् ॥
१३२॥
जो दिव्य पद को प्राप्त है, उसे तुरन्त ही परम ब्रह्म की अनुभूति होती है और वह पूर्णतया प्रसन्न हो जाता है। वह न तो कभी शोक करता है, न किसी वस्तु की कामना करता है। वह प्रत्येक जीव के प्रति समभाव रखता है। उस स्थिति में वह मेरी शुद्ध भक्ति को प्राप्त करता है।'" अद्वैत-वीथी-पथिकैरुपास्याःस्वानन्द-सिंहासन-लब्ध-दीक्षाः ।। शठेन केनापि वयं हठेनदासी-कृता गोप-वधू-विटेन ॥
१३३॥
यद्यपि मैं अद्वैत पथ पर चलने वालों द्वारा पूजित था तथा योगपद्धति द्वारा आत्म-साक्षात्कार में दीक्षित था, तो भी मैं बलपूर्वक किसी नटखट बालक द्वारा, जो सदैव गोपियों के साथ परिहास करता रहता है, दासी बना दिया गया हूँ।'
भक्ति-बले ‘प्राप्त-स्वरूप' दिव्य-देह पाय । कृष्ण-गुणाकृष्ट हन्ना भजे कृष्ण-पाय ॥
१३४॥
जिसने भक्ति द्वारा अपना वैधानिक पद प्राप्त कर लिया है, उसे इसी जीवन में ही दिव्य देह प्राप्त हो जाता है। वह कृष्ण के दिव्य गुणों के द्वारा आकर्षित होने पर उनके चरणकमल की सेवा में पूर्णरूपेण लग जाता है।
निरोधोऽस्यानुशयनमात्मनः सह शक्तिभिः ।।मुक्तिर्हित्वान्यथा-रूपं स्वरूपेण व्यवस्थितिः ॥
१३५ ॥
जब महाविष्णु विश्राम करते हैं और विराट् जगत् को समेट लेते हैं (विनष्ट कर देते हैं), तब सारे जीव तथा अन्य शक्तियाँ उन्हीं में समा जाती हैं। मुक्ति का अर्थ है परिवर्तनशील स्थूल तथा सूक्ष्म शरीरों को त्याग करने के बाद अपने सनातन मूल स्वरूप में स्थित रहना।'
कृष्ण-बहिर्मुख-दोषे माया हैते भय । कृष्णोन्मुख भक्ति हैते माया-मुक्त हय ॥
१३६ ॥
कृष्णभावनामृत का विरोध करके मनुष्य पुनः माया के प्रभाव द्वारा बद्ध तथा भयभीत हो जाता है। श्रद्धापूर्वक भक्तिमयी सेवा सम्पन्न करने से मनुष्य माया से मुक्त हो जाता है।
भयं द्वितीयाभिनिवेशतः स्याद्ईशादपेतस्य विपर्ययोऽस्मृतिः । तन्माययातो बुध अभिजेत्तं ।भक्त्यैकयेशं गुरु-देवतात्मा ॥
१३७॥
जब जीव कृष्ण से पृथक् भौतिक शक्ति द्वारा आकृष्ट होता है, तो वह भयाक्रान्त हो जाता है। चूंकि वह भौतिक शक्ति द्वारा पूर्ण पुरुषोत्तम भगवान् से अलग कर दिया जाता है, उसकी जीवन-धारणा विपरीत हो जाती है। दूसरे शब्दों में, वह कृष्ण का नित्य दास बनने के बजाय कृष्ण का प्रतियोगी बन जाता है। इसे विपर्ययः अस्मृतिः कहते हैं। इस भूल का निराकरण करने के लिए जो मनुष्य वास्तव में विद्वान एवं उन्नत होता है, वह पूर्ण पुरुषोत्तम भगवान् की पूजा अपने गुरु, पूज्य अर्चाविग्रह तथा जीवन के उद्गम के रूप में करता है। इस तरह वह अनन्य भक्ति की विधि द्वारा भगवान् की पूजा करता है।'
दैवी ह्येषा गुण-मयी मम माया दुरत्यया । मामेव ये प्रपद्यन्ते मायामेतां तरन्ति ते ॥
१३८॥
तीन गुणों से युक्त मेरी इस दैवी शक्ति को जीत पाना कठिन है। किन्तु जिन्होंने मेरी शरण ग्रहण कर ली है, वे इसको सरलता से पार कर सकते हैं।'
भक्ति विनु मुक्ति नाहि, भक्त्ये मुक्ति हय ।। १३९॥
भक्ति के बिना किसी को मुक्ति प्राप्त नहीं होती। मुक्ति तो एकमात्र भक्ति द्वारा ही प्राप्त की जाती है।
यः-सृतिं भक्तिमुदस्य ते विभोक्लिश्यन्ति ये केवल-बोध-लब्धये । तेषामसौ क्लेशल एव शिष्यतेनान्यद् यथा स्थूल-तुषावघातिनाम् ॥
१४०॥
हे प्रभु, आपकी भक्ति ही एकमात्र शुभ मार्ग है। यदि कोई इसे केवल शुष्क ज्ञान के लिए या इस विचार से त्याग देता है कि ये सारे जीव आत्माएँ हैं और भौतिक जगत् मिथ्या है, तो उसे बहुत कष्ट मिलता है। केवल कष्टप्रद तथा अशुभ कार्यकलाप ही उसके हाथ लगते हैं। उसके कार्य उसी तरह हैं, जैसे धान से रहित भूसे को पीटना। उसका सारा श्रम व्यर्थ जाता है।'
ग्रेऽन्येऽरविन्दाक्ष विमुक्त-मानिनस्त्वय्यस्त-भावादविशुद्ध-बुद्धयः ।।आरुह्य कृच्छेण परं पदं ततःपतन्त्यधोऽनादृत-ग्रुष्मदङ्ग्रयः ॥
१४१॥
.हे कमलनेत्रों वाले, जो लोग आपकी भक्ति के बिना ही इस जीवन में अपने आपको मुक्त मानते हैं, उनकी बुद्धि अशुद्ध रहती है। यद्यपि वे कठोर तपस्याएँ करते हैं और निर्विशेष ब्रह्म-साक्षात्कार रूपी आध्यात्मिक पद को प्राप्त कर लेते हैं, फिर भी आपके चरणकमलों की पूजा की उपेक्षा करने के कारण वे पुनः नीचे गिर जाते हैं।'
ग्र एषां पुरुषं साक्षादात्म-प्रभवमीश्वरम् ।। न भजन्त्यवजानन्ति स्थानाभ्रष्टाः पतन्त्यधः ॥
१४२ ॥
यदि कोई चारों वर्षों तथा आश्रमों में ही अपनी स्थिति बनाये रखता है, किन्तु भगवान् विष्णु की पूजा नहीं करता, तो वह अपने गर्वित स्थान से गिरकर नरक में जाता है।
भक्त्ये मुक्ति पाइलेह अवश्य कृष्णेरे भजय ॥
१४३॥
जब कोई भक्ति करने से सचमुच मुक्ति पा लेता है, तो वह भगवान की दिव्य प्रेमाभक्ति में सदैव लगा रहता है।
मुक्ता अपि लीलया विग्रहं कृत्वा भगवन्तं भजन्ते ॥
१४४॥
निर्विशेष ब्रह्मतेज में निमग्न मुक्तात्मा भी कृष्ण की लीलाओं के प्रति आकर्षित होता है। इस तरह वह अर्चाविग्रह स्थापित करके भगवान् की सेवा करता है।'
एइ छय आत्माराम कृष्णेरे भजय ।पृथक्-पृथक् च-कारे इहा 'अपि'र अर्थ कय ॥
१४५ ॥
ये छह प्रकार के आत्माराम कृष्ण की प्रेमाभक्ति में लगे रहते हैं। भन्न प्रकार की सेवाएँ'च' लगाकर सूचित की जाती हैं और वे 'अपि निस्सन्देह) का भी अर्थ वहन करते हैं।
आत्मारामाश्च अपि करे कृष्णे अहैतुकी भक्ति ।मुनयः सन्तः इति कृष्ण-मनने आसक्ति ॥
१४६ ॥
छहों प्रकार के आत्माराम बिना किसी अन्य अभिलाषा के कृष्ण की भक्ति करते हैं। मुनयः तथा सन्तः शब्द उन लोगों के सूचक हैं, जो कृष्ण का ध्यान करने में अत्यन्त अनुरक्त हैं।
निर्ग्रन्थाः अविद्या-हीन, केह-विधि-हीन । ग्राहाँ येइ ग्रुक्त, सेइ अर्थेर अधीन ॥
१४७॥
निर्ग्रन्थाः' शब्द का अर्थ है 'बिना अज्ञान के' तथा 'विधि-विधान से रहित ।' इनमें से जो भी अर्थ उपयुक्त हो, उसे लिया जा सकता है।
च-शब्दे करि यदि ‘इतरेतर' अर्थ ।।आर एक अर्थ कहे परम समर्थ ॥
१४८ ॥
च' शब्द का प्रयोग विभिन्न स्थलों में करने से भिन्न-भिन्न अर्थ निकलते हैं। इनके अतिरिक्त, एक अन्य भी अर्थ है, जो अत्यन्त महत्त्वपूर्ण हैं।
आत्मारामाश्च आत्मारामाश्च करि' बार छय ।पञ्च आत्माराम छय च-कारे लुप्त हय ॥
१४९॥
यद्यपि 'आत्मारामाश्च' शब्द की छह पुनरावृतियाँ की जा सकती हैं, किन्तु केवल 'च' शब्द जोड़ने से पाँच आत्माराम लुप्त हो जाते हैं।
एक 'आत्माराम'-शब्द अवशेष रहे । एक 'आत्माराम'-शब्दे छय-जन कहे ॥
१५०॥
इसलिए आत्माराम शब्द की पुनरावृति करने की आवश्यकता नहीं ह जाती। केवल एक पर्याप्त है और यही एक शब्द छह व्यक्तियों का सूचित करता है।
सरूपाणामेक-शेष एक-विभक्तौ”।उक्तार्थानामप्रयोगः। रामश्च रामश्च रामश्च रामा इतिवत् ॥
१५१॥
एक ही रूप तथा विभक्ति होने पर केवल अन्तिम शब्द को रखा जाता है। उदाहरणार्थ, रामश्च, रामश्च, रामश्च इत्यादि के लिए रामाः शब्द प्रयुक्त किया जाता है।
तबे ये चे-कार, सेइ ‘समुच्चय' कय ।।आत्मारामाश्च मुनयश्च कृष्णेरे भजय ॥
१५२॥
समुच्चयबोधक शब्द'च' के प्रयोग से यह इंगित किया जाता है कि सारे आत्माराम तथा सन्त कृष्ण की सेवा करते हैं और उन्हें पूजते हैं।
निर्ग्रन्था अपिर एइ 'अपि'–सम्भावने ।एइ सात अर्थ प्रथमे करिलॅ व्याख्याने ॥
१५३॥
निर्ग्रन्थाः' के साथ 'अपि' जुड़ने से सम्भावना व्यक्त होती है। इस तरह मैंने ( आत्माराम श्लोक के) सात प्रकार के अर्थ समझाने की चेष्टा की है।
अन्तर्वामि-उपासक ‘आत्माराम' कय ।।सेइ आत्माराम योगीर दुइ भेद हय ॥
१५४॥
जो योगी अपने अन्तर में परमात्मा की पूजा करता है, वह भी आत्माराम कहलाता है। आत्माराम-योगियों के दो प्रकार हैं।
सगर्भ, निगर्भ, एइ हय दुई भेद ।।एक एक तिन भेदे छय विभेद ॥
१५५ ॥
आत्माराम-योगियों के दो प्रकार-सगर्भ तथा निगर्भ कहलाते हैं। इनमें से प्रत्येक के तीन-तीन भेद हैं, अतः परमात्मा के उपासकों के छह प्रकार हुए।
केचित्स्व-देहान्तहृदयावकाशे | प्रादेश-मात्रं पुरुषं वसन्तम् । चतुर्भुजं कञ्ज-रथाङ्ग-शङ्खगदा-धरं धारणया स्मरन्ति ॥
१५६ ॥
कुछ योगी भगवान् का चिन्तन अपने हृदयों के भीतर छह इंच मा। वाले भगवान् के रूप में करते हैं। भगवान् के चार हाथ हैं, जिनमें से शंख, गदा, चक्र तथा पद्म धारण किये रहते हैं। जो योगी अपने हृदय में विष्णु के इस रूप की पूजा करते हैं, वे सगर्भ योगी कहलाते हैं।'
एवं हरी भगवति प्रतिलब्ध-भावोभक्त्या द्रवधृदय उत्पुलकः प्रमोदात् ।। औत्कण्ठ्य-बाष्प-कलया मुहुरद्यमानस्तच्चापि चित्त-बड़िशं शनकैर्वियुड़े ॥
१५७॥
जब किसी को पूर्ण पुरुषोत्तम भगवान् से प्रेम होता है, तो उसका हृदय भक्तियोग से द्रवित हो उठता है और उसे दिव्य आनन्द का अनुभव होता है। उसके शरीर में लक्षण प्रकट होते हैं और उत्सुकतावश उसकी आँखों में आँसू आ जाते हैं। इस तरह उसे आध्यात्मिक आनन्द मिलता है। जब हृदय अत्यधिक व्यथित होता है, तो चिन्तनमग्न मन ध्यान के लक्ष्य से उसी तरह धीरे-धीरे विलग होने लगता है, जिस तरह मछली पकड़ने का काँटा।'
‘ग्रोगारुरुक्षु', ‘ग्रोगारूढ़' ‘प्राप्त-सिद्धि' आर । एइ तिन भेदे हय छय प्रकार ॥
१५८॥
योग की प्रगति के इन तीन विभागों-योगारुरुक्षु, योगारुढ़ तथा प्राप्त-सिद्धि के द्वारा योगियों के छह भेद हो जाते हैं।
आरुरुक्षोर्मुनेर्योगं कर्म कारणमुच्यते । ग्रोगारूढ़स्य तस्यैव शर्मः कारणमुच्यते ॥
१५९॥
जो सन्त लोग योग-सिद्धि प्राप्त करना चाहते हैं, वे योगाभ्यास करते हैं और उसके नियमों को दृढ़ता से पालन करते हैं। वे आसन तथा प्राणायाम करते हैं। जो लोग पहले से इस पद को प्राप्त हुए रहते हैं, वे ध्यान करते हैं और अपने मन को भगवान् पर केन्द्रित करते हैं। वे समस्त भौतिक कार्यों को त्यागकर अपने मन को सन्तुलित ( शम) रखते हैं।'
यदा हि नेन्द्रियार्थेषु न कर्मस्वनुषज्जते ।।सर्व-सङ्कल्प-सन्यासी ग्रोगारूढ़स्तदोच्यते ॥
१६० ।। जब मनुष्य इन्द्रियतृप्ति के लिए कर्म करने में कोई रुचि नहीं लेता और समस्त भौतिक इच्छाओं को त्याग देता है, तो उसे योगारूढ़ कहा जाता है।
एइ छय योगी साधु-सङ्गादि-हेतु पा ।।कृष्ण भजे कृष्ण-गुणे आकृष्ट हा ॥
१६१॥
जब शुद्ध योगी भक्तों की संगति करता है, तो वह भगवान् के दिव्य णों से आकृष्ट होने के फलस्वरूप कृष्ण की भक्ति में लग जाता है।
च-शब्दे ' अपि'र अर्थ इहाङको कहय ।।‘मुनि', ‘निर्ग्रन्थ'-शब्देर पूर्ववतर्थ हय ॥
१६२॥
यहाँ पर 'च' तथा 'अपि' शब्दों के अर्थों का प्रयोग किया जा सकता है। ‘मुनि' तथा 'निर्ग्रन्थ' शब्दों के अर्थ पहले जैसे ही हैं।
उरुक्रमे अहैतुकी काहाँ कोन अर्थ ।।एई तेर अर्थ कहिलँ परम समर्थ ॥
१६३ ॥
अहैतुकी' शब्द सदैव पूर्ण पुरुषोत्तम भगवान् उरुक्रम के लिए प्रयुक्त किया जाता है। इस तरह मैंने आत्माराम श्लोक के अर्थ तेरह प्रकारों से बताये हैं।
एइ सब शान्त ग्रबे भजे भगवान् ।‘शान्त' भक्त करि' तबे कहि ताँर नाम ॥
१६४॥
ये तेरह प्रकार के योगी तथा मुनि शान्त भक्त कहलाते हैं, क्योंकि ये पूर्ण पुरुषोत्तम भगवान् की दिव्य प्रेमाभक्ति शान्त अवस्था में करते हैं।
'आत्मा' शब्दे ‘मन’ कह—मने येइ रमे ।। साधु-सङ्गे सेह भजे श्री-कृष्ण-चरणे ॥
१६५ ॥
कभी-कभी 'आत्मा' शब्द का अर्थ 'मन' होता है। उस दशा में 'आत्माराम' शब्द का अर्थ होगा, वह व्यक्ति जो मानसिक चिन्तन द्वारा तुष्ट रहता है। जब ऐसा व्यक्ति किसी शुद्ध भक्त की संगति करता है, तो बह कृष्ण के चरणकमलों की भक्ति शुरू कर देता है।
उदरमुपासते म्र ऋषि-वर्मसु कूर्प-दृशःपरिसर-पद्धतिं हृदयमारुणयो दहरम् । तत उदगादनन्त तव धाम शिरः परमंपुनरिह यत्समेत्य न पतन्ति कृतान्त-मुखे ॥
१६६ ॥
जो लोग महान् सन्त योगियों का अनुसरण करते हैं, वे योग-आसन विधि अपनाते हैं और अपने उदर से पूजा शुरू कर देते हैं, जहाँ पर ब्रह्मको स्थित बतलाया जाता है। ऐसे लोग शार्कराक्ष कहलाते हैं, जिसका अर्थ यह है कि वे स्थूल देहात्मबुद्धि में स्थित हैं। कुछ लोग अरुण का के भी अनुयायी हैं। इस पथ का अनुसरण करते हुए ये लोग नाड़ियों की क्रिया का निरीक्षण करते हैं। इस तरह वे धीरे-धीरे हृदय तक पहुँचते है, जहाँ सूक्ष्म ब्रह्म अर्थात् परमात्मा स्थित रहते हैं। तब वे उनकी उपासना करते हैं। हे असीम अनन्त! इन लोगों से बेहतर तो वे योगी हैं, जो अपने शिरोभाग से आपकी पूजा करते हैं। वे उदर से प्रारम्भ करके हृदय से होकर सिर के ऊपरी भाग तक पहुँच जाते हैं और ब्रह्मरन्ध्र से होकर निकल जाते हैं, जो खोपड़ी के ऊपर एक छिद्र है। इस तरह ये योगी सिद्धि-पद को प्राप्त होते हैं और जन्म-मृत्यु के चक्र में दुबारा प्रवेश नहीं करते।'
एहो कृष्ण-गुणाकृष्ट महा-मुनि हो ।अहैतुकी भक्ति करे निर्ग्रन्थ हा ॥
१६७॥
योगीगण कृष्ण के दिव्य गुणों से आकर्षित होकर महान् मुनि बन जाते हैं। तब वे योग-विधि से बाधित नहीं होते और वे अनन्य भक्ति करने लगते हैं।
'आत्मा'-शब्दे ‘यत्न' कहे---यत्न करिया ।।मुनयोऽपि कृष्ण भजे गुणाकृष्ट हा ॥
१६८ ॥
आत्मा' शब्द का एक अर्थ ‘प्रयत्न' भी है। कुछ सन्त कृष्ण के दिव्य गुणों द्वारा आकर्षित होकर उनकी सेवा करने योग्य बनने के लिए महान् प्रयत्न करते हैं।
तस्यैव हेतोः प्रयतेत कोविदोन लभ्यते यद्भ्रमतामुपर्यधः ।। तल्लभ्यते दुःख-वदन्यतः सुखंकालेन सर्वत्र गभीर-रंहसा ॥
१६९॥
ब्रह्मलोक तथा सत्यलोक से पाताललोक तक ऊपर नीचे घूमने पर भी दिव्य पद की प्राप्ति नहीं की जा सकती। यदि कोई सचमुच बुद्धिमान तथा विद्वान है, तो उसे उस दुर्लभ दिव्य पद को प्राप्त करने का प्रयत्न करना चाहिए। चौदहों लोकों में जो भौतिक सुख उपलब्ध हो सकता है, उसे काल के प्रभाव से उसी तरह प्राप्त किया जा सकता है, जिस प्रकारकालक्रम में दुःख प्राप्त होता है। किन्तु चूँकि आध्यात्मिक चेतना को इस प्रकार प्राप्त नहीं की जा सकती, अतएव इसके लिए प्रयास करना। चाहिए।'
सद्धर्मस्यावबोधाय येषां निर्बन्धिनी मतिः । अचिरादेव सर्वार्थः सिध्यत्येषामभीप्सितः ॥
१७०॥
जो अपनी आध्यात्मिक चेतना जाग्रत करने के लिए उत्सुक हैं, जिनकी बुद्धि अचल है और विचलित नहीं होती, वे निश्चय ही वांछित जीवन लक्ष्य प्राप्त करते हैं।'
च-शब्द अपि-अर्थे, 'अपि'–अवधारणे ।। ग्रलाग्रह विना भक्ति ना जन्माय प्रेमे ॥
१७१॥
च' शब्द का प्रयोग 'अपि' के स्थान में किया जा सकता है, जो किसी बात पर बल देने वाला है। इस तरह इसका अर्थ यह हुआ कि भक्ति में निष्ठावान प्रयत्न के बिना भगवत्प्रेम प्राप्त नहीं किया जा सकता।
साधनौधैरनासङ्गैरलभ्या सु-चिरादपि ।।हरिणा चाश्वदेयेति द्विधा सा स्यात्सु-दुर्लभा ॥
१७२॥
भक्ति की पूर्णता प्राप्त करना दो कारणों से अतीव कठिन है। पहला यह कि जब तक कोई कृष्ण के प्रति अनुरक्त नहीं होता, तब तक उसे भक्ति की पूर्णता प्राप्त नहीं होती, भले ही वह दीर्घकाल तब भक्ति क्यों न करता रहे। दूसरा यह कि कृष्ण सरलता से भक्ति की पूर्णता प्रदान नहीं करते।'
तेषां सतत-युक्तानां भजतां प्रीति–पूर्वकम् ।। ददामि बुद्धि-योगं तं येन मामुपयान्ति ते ॥
१७३ ॥
जो लोग निरन्तर मेरी भक्ति में लगे रहते हैं और प्रेमपूर्वक मेरी सेवा करते हैं, उन्हें मैं बुद्धि प्रदान करता हूँ जिसके द्वारा वे मुझ तक आ सकते हैं।'
'आत्मा'-शब्दे ‘धृति' कहे,——धैर्ये येइ रमे । धैर्यवन्त एव हल्ला करय भजने ॥
१७४॥
आत्मा का दूसरा अर्थ धृति या धैर्य है। जो व्यक्ति धैर्यपूर्वक प्रयास करता है, वह आत्माराम है। ऐसा व्यक्ति धैर्यपूर्वक भक्ति में लगता है।
‘मुनि'-शब्दे-पक्षी, भृङ्गः ‘निर्ग्रन्थे'- मूर्ख-जन ।कृष्ण-कृपाय साधु-कृपाय दोंहार भजन ॥
१७५ ॥
मुनि' शब्द के अर्थ 'पक्षी' तथा 'भौंरा' भी हैं। निर्ग्रन्थ' शब्द मूर्ख लोगों का सूचक है। कृष्ण की कृपा से ऐसे जीव जब किसी साधु (गुरु) के सम्पर्क में आते हैं, तो वे भक्ति में लग जाते हैं।
प्रायो बताम्ब मुनयो विहगा वनेऽस्मिन्कृष्णेक्षितं तदुदितं कल-वेणु-गीतम् । आरुह्य ये द्रुम-भुजान् रुचिर-प्रवालान्शृण्वन्ति मीलित-दृशो विगतान्य-वाचः ॥
१७६ ॥
हे माता, इस जंगल में सारे पक्षी वृक्षों की सुन्दर शाखाओं पर बैठने के बाद अपनी आँखें बन्द किये हैं और किसी अन्य ध्वनि से आकृष्ट हुए बिना केवल कृष्ण की बाँसुरी की ध्वनि सुन रहे हैं। ऐसे पक्षी जरूर मुनियों जैसे पद पर ही होंगे।
एतेऽलिनस्तव यशोऽखिल-लोक-तीर्थंगायन्त आदि-पुरुषानुपथं भजन्ते । प्रायो अमी मुनि-गणा भवदीय-मुख्यागूढ़ वनेऽपि न जहत्यनघात्म-दैवम् ॥
१७७॥
हे मूर्तिमन्त सौभाग्य! हे आदि पुरुष, ये सारे भौंरे आपके दिव्य यश का गान कर रहे हैं, जिससे समग्र ब्रह्माण्ड शुद्ध हो जायेगा। निस्सन्देह, ये जंगल में आपके पथ का अनुसरण कर रहे हैं और आपकी पूजा कर रहे हैं। वस्तुतः ये सभी साधु पुरुष हैं, किन्तु अब इन्होंने भ्रमरों। का रूप धारण कर रखा है। यद्यपि आप मनुष्य की तरह क्रीड़ा कर रहे हैं, किन्तु वे भूल नहीं पाये कि आप उनके आराध्य देव हैं।'
सरसि सारस-हंस-विहङ्गाश्चारु-गीत-हृत-चेतस एत्य । हरिमुपासत ते व्रत-चित्ताहन्त मीलित-दृशो धृत-मौनाः ॥
१७८ ॥
जल में सारे सारस तथा हंस कृष्ण की बाँसुरी के मधुर गीत से मोहित हो रहे हैं। वे पूर्ण पुरुषोत्तम भगवान् के निकट पहुँचकर पूरे मनोयोग से उनकी पूजा कर रहे हैं। अरे, वे तो अपनी आँखें बन्द किये हैं और पूर्णतया शान्त हो गये हैं।'
किरात-हूनान्ध्र-पुलिन्द-पुक्कशा | आभीर-शुम्भा यवनाः खशादयः ।। येऽन्ये च पापा यदपाश्रयाश्रयाःशुध्यन्ति तस्मै प्रभविष्णवे नमः ॥
१७९ ॥
'धृति' शब्द का प्रयोग तब भी किया जाता है, जब कोई ज्ञान में परिपूर्ण होता है। जब पूर्ण पुरुषोत्तम भगवान् के चरणकमलों को प्राप्त 'जर लेने के बाद भक्त के सारे भौतिक कष्ट दूर हो जाते हैं, तब वह पूर्णता के उच्चतम पद 'महापूर्ण' को प्राप्त करता है।
किंवा 'धृति'-शब्दे निज-पूर्णतादि-ज्ञान कय ।।दुःखाभावे उत्तम-प्राप्त्ये महा-पूर्ण हय ॥
१८०॥
मैं परम शक्तिमान उन भगवान् को नमस्कार करता हूँ, जिनके भक्तों की शरण ग्रहण करने से किरात, हूण, आन्ध्र, पुलिन्द, पुक्कश, आभीर, शुम्भ, यवन और खश तथा अन्य जातियाँ भी, जो पापकर्म में निरत रहती हैं, शुद्ध हो सकती हैं।
धृतिः स्यात्पूर्णता-ज्ञान-दुःखाभावोत्तमाप्तिभिः ।। अप्राप्तातीत-नष्टार्था-नभिसंशोचनादि-कृत् ॥
१८१॥
धृति वह पूर्णता है, जो दुःख की अनुपस्थिति में और भगवज्ञान प्राप्त होने तथा शुद्ध भगवत्प्रेम प्राप्त होने पर अनुभव की जाती है। लक्ष्य प्राप्त न कर सकने अथवा किसी प्राप्त की हुई वस्तु की क्षति से उत्पन्न सन्ताप इस पूर्णता को प्रभावित नहीं करते।'
कृष्ण-भक्त–दुःख-हीन, वाञ्छान्तर-हीन । कृष्ण-प्रेम-सेवा-पूर्णानन्द-प्रवीण ।। १८२ ॥
कृष्ण का भक्त कभी दुःखी अवस्था में नहीं रहता, न ही उसे कृष्ण की सेवा करने के अतिरिक्त कोई अन्य इच्छा होती है। वह अनुभवी तथा उन्नत होता है। वह कृष्ण-प्रेम के दिव्य आनन्द का अनुभव करता है और उन्हीं की सेवा में पूर्णता के साथ लगा रहता है।
मत्सेवया प्रतीतं ते सालोक्यादि-चतुष्टयम् ।। नेच्छन्ति सेवया पूर्णाः कुतोऽन्यत्काल-विप्लुतम् ॥
१८३॥
मेरी सेवा करने से अपनी इच्छाएँ पूरी कर लेने के बाद मेरे भक्त चार प्रकार की मुक्तियों को स्वीकार नहीं करते, जो ऐसी सेवा से सरलता से प्राप्त की जा सकती हैं। तो फिर वे ऐसे आनन्दों को क्यों स्वीकार करेंगे, जो समय के साथ विलुप्त हो जाते हैं?' हृषीकेशे हृषीकाणि झस्य स्थैर्य-गतानि हि ।। स एव धैर्यमाप्नोति संसारे जीव-चञ्चले ॥
१८४॥
इस भौतिक जगत् में सारे जीव अपने चंचल स्वभाव के कारण विचलित रहते हैं। किन्तु भक्त इन्द्रियों के स्वामी भगवान् के चरणकमलों की सेवा में स्थिर रहता है। ऐसा व्यक्ति धैर्य तथा सहिष्णुता में स्थित माना जाता है।'
‘च'–अवधारणे, इहा 'अपि'—समुच्चये । धृतिमन्त हा भजे पक्षि-मूर्ख-चये ॥
१८५॥
च' शब्द बल देने के लिए है और 'अपि' शब्द समुच्चय के रूप में प्रयुक्त है। इस प्रकार यह समझना होगा कि मन्द प्राणी भी ( पक्षी तथा निरक्षर) सहनशील हो सकते हैं और कृष्ण-भक्ति में लग सकते हैं।
‘आत्मा'-शब्दे ‘बुद्धि' कहे बुद्धि-विशेष ।। सामान्य-बुद्धि-युक्त व्रत जीव अवशेष ॥
१८६॥
आत्मा' शब्द विशेष प्रकार की बुद्धि के लिए भी प्रयुक्त होता है। चूँकि सामान्यतया समस्त जीवों में थोड़ी-बहुत बुद्धि होती है, अतः ये इसमें आ जाते हैं।
बुद्धये रमे आत्माराम दुइ त' प्रकार ।‘पण्डित' मुनि-गण, निर्ग्रन्थ 'मूर्ख' आर ॥
१८७॥
हर जीव में किसी न किसी तरह की बुद्धि रहती है और जो अपनी बुद्धि का उपयोग करता है, वह आत्माराम कहलाता है। आत्माराम के दो प्रकार हैं-एक तो विद्वान तथा दार्शनिक और दूसरा अशिक्षित तथा मूर्ख है।
कृष्ण-कृपाय साधु-सङ्गे रति-बुद्धि पाय ।।सब छाड़ि' शुद्ध-भक्ति करे कृष्ण-पाय ॥
१८८॥
कृष्ण की कृपा एवं भक्तों की संगति से शुद्ध भक्ति के प्रति व्यक्ति का आकर्षण और बुद्धि बढ़ती है, अतः वह सब कुछ त्यागकर कृष्ण एवं उनके शुद्ध भक्तों के चरणकमलों में अपने आपको नियुक्त कर देता है।
अहं सर्वस्य प्रभवो मत्तः सर्वं प्रवर्तते ।। इति मत्वा भजन्ते मां बुधा भाव-समन्विताः ॥
१८९॥
मैं ( कृष्ण ) हर वस्तु का उद्गम हूँ। हर वस्तु मुझ से ही उद्भूत होती है। जो बुद्धिमान इसे भलीभाँति जान लेते हैं, वे प्रेम तथा भक्ति के साथ मेरी सेवा में लग जाते हैं।'
ते वै विदन्त्यतितरन्ति च देव-मायांस्त्री-शूद्र-हूण-शबरा अपि पाप-जीवाः ।। प्रद्यद्भुत-क्रम-परायण-शील-शिक्षास्तिर्यग्जना अपि किमु श्रुत-धारणा ग्रे ॥
१९०॥
स्त्रियाँ, शूद्र, असभ्य पहाड़ी जातियाँ, शिकारी तथा अन्य अनेक निम्न कुल में उत्पन्न लोगों के साथ ही पक्षी तथा पशु भी अद्भुत प्रकार से कार्य करने वाले पूर्ण पुरुषोत्तम भगवान् की सेवा कर सकते हैं और भक्तों के पथ का अनुसरण करते हुए उनसे शिक्षा ग्रहण कर सकते हैं। यद्यपि अज्ञान का सागर विस्तृत है, फिर भी वे इसे पार कर सकते हैं। तो फिर जो लोग वैदिक ज्ञान में उन्नत हैं, उनके लिए कौन-सी कठिनाई है?' विचार करिया ग्रबे भजे कृष्ण-पाय ।। सेइ बुद्धि देन ताँरे, झाते कृष्ण पाय ॥
१९१॥
इन सब बातों पर विचार करते हुए जब कोई कृष्ण के चरणकमलों की सेवा में संलग्न होता है, तो कृष्ण उसे ऐसी बुद्धि प्रदान करते हैं, जिससे वह धीरे-धीरे भगवत्सेवा में पूर्णता की ओर आगे बढ़ सकता है।
तेषां सतत-युक्तानां भजतां प्रीति–पूर्वकम् ।। ददामि बुद्धि-योगं तं ग्रेन मामुपयान्ति ते ॥
१९२॥
जो लोग निरन्तर भक्ति करते हैं और प्रेमपूर्वक मेरी सेवा करते हैं, उन्हें मैं ऐसा ज्ञान प्रदान करता हूँ, जिससे वे मेरे पास आ सकते हैं।'
सत्सङ्ग, कृष्ण-सेवा, भागवत, नाम ।। व्रजे वास,—एइ पञ्च साधन प्रधान ॥
१९३॥
भक्ति-पद तक ऊपर उठने के लिए निम्नलिखित पाँच बातों का ध्यान रखना चाहिए-भक्तों की संगति करना, भगवान् कृष्ण की सेवा में लगना, श्रीमद्भागवत का पाठ करना, भगवान के पवित्र नाम का कीर्तन करना तथा वृन्दावन या मथुरा में निवास करना।
एइ-पञ्च-मध्ये एक स्वल्प' यदि हय ।। सुबुद्धि जनेर हय कृष्ण-प्रेमोदय ॥
१९४॥
यदि कोई इन पाँचों बातों में से किसी एक में थोड़ा भी अग्रसर होता है और बुद्धिमान होता है, तो कृष्ण के प्रति उसका सुप्त प्रेम क्रमशः जाग्रत हो उठता है।
दुरूहाद्भुत-वीर्येऽस्मिन्श्रद्धा दूरेऽस्तु पञ्चके । यत्र स्वल्पोऽपि सम्बन्धः सद्धियां भाव-जन्मने ॥
१९५॥
इन पाँचों सिद्धान्तों की शक्ति अतीव अद्भुत है और समझनी मुश्किल है। उनमें श्रद्धा के बिना ही निरपराध व्यक्ति उनके साथ रंचमात्र सम्बन्ध होने पर अपने सुप्त कृष्ण-प्रेम को जाग्रत कर सकता है।'
उदार महती ग्राँर सर्वोत्तमा बुद्धि । नाना कामे भजे, तबु पाय भक्ति-सिद्धि ।। १९६॥
यदि मनुष्य वास्तव में उदार तथा बुद्धिमान है, तो वह आगे बढ़ सकता है और भक्ति में पूर्ण बन सकता है, भले ही उसमें भौतिक इच्छाएँ क्यों न हों और चाहे वह किसी स्वार्थ से भगवान् की सेवा क्यों न करता है।
अकामः सर्व-कामो वा मोक्ष-काम उदार-धीः ।। तीव्रण भक्ति-योगेन यजेत पुरुषं परम् ॥
१९७॥
कोई चाहे सकाम हो या अकाम अथवा भगवान् से तादात्म्य का इच्छुक हो, वह तभी बुद्धिमान है जब वह दिव्य प्रेमाभक्ति द्वारा पूर्ण पुरुषोत्तम भगवान् कृष्ण की पूजा करता है।'
भक्ति-प्रभाव,---सेइ काम छाड़ा । कृष्ण-पदे भक्ति कराय गुणे आकर्षिया ॥
१९८॥
भक्ति इतनी प्रबल है कि जब कोई इसमें लग जाता है, तो वह क्रमशः समस्त भौतिक इच्छाओं का परित्याग कर देता है और पूरी तरह से कृष्ण के चरणकमलों के प्रति अनुरक्त हो जाता है। यह सब भगवान् के दिव्य गुणों के प्रति आकर्षण से ही सम्भव होता है।
सत्यं दिशत्यर्थितमर्थितो नृणां ।| नैवार्थ-दो ग्रत्पुनरर्थिता ग्रतः । स्वयं विधत्ते भजतामनिच्छताम् | इच्छा-पिधानं निज-पाद-पल्लवम् ॥
१९९॥
जब भी कृष्ण से किसी इच्छा को पूरा करने के लिए प्रार्थना की जाती है, तो वे अवश्य ही वैसा करते हैं, किन्तु वे ऐसी कोई वस्तु नहीं प्रदान करते, जिसका उपभोग किये जाने के बाद अधिकाधिक इच्छाओं को पूरा करने के लिए बारम्बार याचना करनी पड़े। जब किसी की अन्य इच्छाएँ होती हैं, किन्तु वह भगवान् की सेवा में लगता है, तो कृष्ण उसे बलात् अपने चरणकमलों में शरण देते हैं, जहाँ वह अन्य सारी इच्छाओं को भूल जाता है।'
‘आत्मा'-शब्दे 'स्वभाव' कहे, ताते येइ रमे ।। आत्माराम जीव व्रत स्थावर-जङ्गमे ॥
२००॥
आत्मा' शब्द का अन्य अर्थ मनुष्य का लाक्षणिक स्वभाव' है। जो भी अपने विशिष्ट प्रकार के स्वभाव का भोग करता है, वह आत्माराम कहलाता है। अतः सारे जीव भी, चाहे चर हों या अचर, आत्माराम कहलाते हैं।
जीवेर स्वभाव-कृष्ण-'दास'-अभिमान । देहे आत्म-ज्ञाने आच्छादित सेइ 'ज्ञान' ॥
२०१॥
हर जीव का मूल स्वभाव अपने आपको कृष्ण का सनातन सेवक समझना है। फिर भी माया के वशीभूत होकर वह अपने आपको शरीर समझता है और इस तरह उसकी मूल चेतना ढक जाती है।
च-शब्दे ‘एव', 'अपि'-शब्द समुच्चये ।। ‘आत्मारामा एव' हा श्री कृष्ण भजये ॥
२०२॥
उस दशा में ‘च' शब्द का अर्थ ‘एव' होता है। ‘अपि' शब्द को समुच्चय के अर्थ में लिया जा सकता है। इस तरह श्लोक का पाठ होगा ‘आत्मारामा एव' अर्थात् ‘सभी तरह के जीव भी कृष्ण की पूजा करते हैं।'
एइ जीव--सनकादि सब मुनि-जन । ‘निर्ग्रन्थ'—मूर्ख, नीच, स्थावर-पशु-गण ॥
२०३॥
इन जीवों में चार कुमारों जैसे महापुरुष, निम्न जाति के मूर्खजन, वृक्ष, पौधे, पक्षी तथा पशु भी सम्मिलित हैं।
व्यास-शुक-सनकादिर प्रसिद्ध भजन । ‘निर्ग्रन्थ' स्थावरादिर शुन विवरण ॥
२०४॥
व्यास, शुक तथा चारों कुमारों की भक्ति पहले से विख्यात रही है। अब मैं बताऊँगा कि किस प्रकार वृक्ष एवं पौधे जैसे अचर जीव भी भगवान् की भक्ति करते हैं।
कृष्ण-कृपादि-हेतु हैते सबार उदय ।।कृष्ण-गुणाकृष्ट हा ताँहारे भजय ॥
२०५॥
हर व्यक्ति कृष्ण की कृपा का पात्र है, जिसमें व्यासदेव, चारों कुमार, शुकदेव गोस्वामी, निम्न योनि के प्राणी, वृक्ष, पौधे तथा पशु सम्मिलित हैं। कृष्ण की कृपा से वे ऊपर उठते हैं और उनकी सेवा में लगते हैं।
धन्येयमह्य धरणी तृण-वीरुधस्त्वत् ।पाद-स्पृशो द्रुम-लताः करजाभिमृष्टाः । नद्योऽद्रयः खग-मृगाः सदयावलोकैर्गोप्योऽन्तरेण भुजयोरपि यत्स्पृहा श्रीः ॥
२०६॥
वृन्दावन की यह भूमि (व्रजभूमि ) आज धन्य है, क्योंकि आपके अरणकमलों ने इसकी मिट्टी तथा घास का स्पर्श किया है। आपकी अंगुलियों के नखों ने वृक्षों तथा लताओं का स्पर्श किया है तथा आपकी कृपामयी आँखों ने नदियों, पर्वतों, पक्षियों तथा पशुओं पर दृष्टि डाली है। आपके भुजाओं ने गोपियों का आलिंगन किया है और लक्ष्मी तक यही चाहती हैं। अब ये सभी धन्य हैं।'
गा गोपकैरनु-वनं नयतोरुदार| वेणु-स्वनैः कल-पदैस्तनु-भृत्सु सख्यः ।। अस्पन्दनं गतिमतां पुलकस्तरूणांनिर्योग-पाश-कृत-लक्षणयोर्विचित्रम् ॥
२०७॥
हे सखी, कृष्ण तथा बलराम दोनों ही अपनी गौवों के आगे आगे अपने ग्वालमित्रों के साथ जंगल से होकर जा रहे हैं। उन दोनों के पास रस्सियाँ हैं, जिनसे गौवें दुहते समय वे उनके पिछले पाँव बाँध देते हैं। जय वे अपनी बाँसुरियाँ बजाते हैं, तो सारे चर प्राणी चकित रह जाते हैं और अचर प्राणी उनके मधुर संगीत से अतीव हर्ष का अनुभव करते हैं। ये सारी बातें निश्चय ही अत्यन्त आश्चर्यजनक हैं।'
वन-लतास्तरव आत्मनि विष्णुव्यञ्जयन्त्य इव पुष्प-फलाढूयाः । प्रणत-भार-विटपा मधु-धाराः | प्रेम-हृष्ट-तनवो ववृषुः स्म ॥
२०८॥
सारे पौधे, लताएँ तथा वृक्ष कृष्ण-प्रेम के कारण फूल-फलों से लदे थे। इससे वे झुके जा रहे थे। वे इस प्रकार के अगाध कृष्ण-प्रेम से इतने प्रेरित थे कि वे निरन्तर मधु की वर्षा कर रहे थे। गोपियों ने वृन्दावन के सारे जंगलों को इसी प्रकार देखे।'
किरात-हूणान्ध्र-पुलिन्द-पुल्कशाआभीर-शुम्भा ग्रवनाः खसादयः ।। येऽन्ये च पापा ग्रदपाश्रयाश्रयाः ।शुध्यन्ति तस्मै प्रभविष्णवे नमः ॥
२०९।। किरात, हूण, आन्ध्र, पुलिन्द, पुक्कश, आभीर, शुम्भ, यवन तथा खश जातियाँ तथा वे भी जो पापकर्म करने के अभ्यस्त हैं, भगवान् के भक्तों की शरण ग्रहण करने से शुद्ध हो सकते हैं, क्योंकि भगवान् परम शक्तिमान हैं। मैं उन्हें सादर नमस्कार करता हूँ।
आगे ‘तेर' अर्थ करिलँ, आर ‘छय' एइ ।।ऊनविंशति अर्थ हइल मिलि' एइ दुइ ॥
२१०॥
मैंने पहले ही ( आत्माराम श्लोक के) तेरह अर्थ बतला दिये हैं। अब ये छह और हैं। इन्हें मिलाकर कुल उन्नीस हो जाते हैं।
एइ ऊनिश अर्थ करिलु, आगे शुन आर ।आत्म-शब्दे 'देह' कहे,—चारि अर्थ तार ॥
२११।। मैं अभी तक उन्नीस भिन्न-भिन्न अर्थ कर चुका हूँ। अब अन्य अर्थ सुनो।'आत्म' शब्द शरीर का भी द्योतक है और इसे चार प्रकार से ग्रहण किया जा सकता है।
देहारामी देहे भजे ‘देहोपाधि ब्रह्म'।सत्सङ्गे सेह करे कृष्णेर भजन ॥
२१२॥
देहात्म-बुद्धि वाला व्यक्ति अपने ही शरीर को ब्रह्म समझकर पूजता है, किन्तु जब वह भक्त के सम्पर्क में आता है, तो वह इस गलत खयाल को त्याग देता है और कृष्ण की भक्ति में लग जाता है।
उदरमुपासते ग्न ऋषि-वर्मसु कूर्प-दृशःपरिसर-पद्धतिं हृदयमारुणयो दहरम् । तत उदगादनन्त तव धाम शिरः परमंपुनरिह ग्रत्समेत्य न पतन्ति कृतान्त-मुखे ॥
२१३॥
जो लोग महान् सन्त योगियों के मार्ग का अनुसरण करते हैं, वे । यौगिक आसन करते हैं और उदर से पूजा करना प्रारम्भ करते हैं, जहाँ ब्रह्म का वास बताया जाता है। ऐसे लोग शार्कराक्ष कहलाते हैं, जिसका अर्थ यह होता है कि वे स्थूल देहात्म-बुद्धि में स्थित हैं। कुछ आरुण ऋषि के भी अनुयायी होते हैं। वे उनके मार्ग का अनुसरण करते हुए नाड़ियों के कार्य का अवलोकन करते हैं। इस तरह वे क्रमशः हृदय तक पहुँचते हैं, जहाँ सूक्ष्म ब्रह्म यो परमात्मा स्थित हैं। तब वे उनकी उपासना करते हैं। हे अनन्त! इनसे अच्छे तो वे योगीजन हैं, जो अपने शिरोभाग से आपकी पूजा करते हैं। उदर से चल करके हृदय होते हुए वे सिर के ऊपरी भाग तक पहुँचते हैं, जहाँ से वे ब्रह्मरन्ध्र तक पहुँचते हैं, जो खोपड़ी की चोटी पर स्थित छिद्र है। इस तरह ये योगी सिद्धि प्राप्त करते हैं और जन्ममृत्यु के चक्र में फिर से नहीं पड़ते।'
देहारामी कर्म-निष्ठ-----ग्राज्ञिकादि जन ।सत्सङ्गे 'कर्म' त्यजि' करय भजन ॥
२१४॥
जो लोग देहात्म-बुद्धि में स्थित रहते हैं, वे मुख्यतः सकाम कर्म में संलग्न होते हैं। जो लोग यज्ञ तथा अनुष्ठान करते हैं, वे भी इसी श्रेणी में आते हैं। किन्तु किसी तरह जब वे शुद्ध भक्त के सम्पर्क में आते हैं, तब वे अपना सकाम कर्म त्यागकर भगवान् की सेवा में पूरी तरह लग जाते हैं। कर्मण्यस्मिन्ननाश्वासे धूम-धूम्रात्मनां भवान् । आपाययति गोविन्द-पाद-पद्मासवं मधु ॥
२१५ ॥
हमने अभी-अभी यह सकाम कर्म-अग्निहोम-शुरू किया है, किन्तु अपने कर्म में अनेक त्रुटियों के कारण हम इसके फल के विषय में निश्चित नहीं हैं। धुएँ से हमारे शरीर काले पड़ गये हैं, किन्तु हमें भगवान् गोविन्द के चरणकमलों के उस अमृत से सचमुच प्रसन्न हैं, जिसे आप वितरित कर रहे हैं।'
तपस्वी' प्रभृति मृत देहारामी हय ।।साधु-सङ्गे तप छाड़ि' श्री कृष्ण भजय ॥
२१६॥
उच्च लोक जाने के लिए कठोर तपस्या करने वाले तपस्वी भी इसी श्रेणी में आते हैं। जब ऐसे व्यक्ति किसी भक्त के सम्पर्क में आते हैं, तो वे सारे ऐसे अभ्यास को त्यागकर भगवान् कृष्ण की सेवा में लग जाते है।'
प्रत्पाद-सेवाभिरुचिस्तपस्विनाम्अशेष-जन्मोपचितं मलं धियः । सद्यः क्षिणोत्यन्वहमेधती सती | ग्रथा पदाङ्गुष्ठ-विनिःसृता सरित् ॥
२१७॥
प्रेमाभक्ति का आस्वाद गंगा नदी के जल के समान है, जो भगवान् कृष्ण के पैरों से निकलती है। जो लोग तपस्या करते हैं, उनके द्वारा अनेक जन्मों के संचित पापकर्मों का फल इस आस्वाद से नित्य प्रति घटता जाता है।'
देहारामी, सर्व-काम-सब आत्माराम ।।कृष्ण-कृपाय कृष्ण भजे छाड़ि' सब काम ॥
२१८॥
जब तक मनुष्य देहात्म-बुद्धि के अधीन श्रम करता है, तब तक उसे अनेकानेक भौतिक इच्छाओं की पूर्ति करनी पड़ती है। ऐसा व्यक्ति आत्माराम कहलाता है। जब ऐसे आत्माराम पर कृष्ण की कृपा होती है, तो वह अपनी तथाकथित आत्मतुष्टि त्याग देता है और भगवान् की दिव्य प्रेमाभक्ति में लग जाता है।
स्थानाभिलाषी तपसि स्थितोऽहं।त्वां प्राप्तवान्देव-मुनीन्द्र-गुह्यम् ।काचं विचिन्वन्नपि दिव्य-रत्नंस्वामिन्कृतार्थोऽस्मि वरं न याचे ॥
२१९॥
[ पूर्ण पुरुषोत्तम भगवान् से आशिर्वाद प्राप्त करते समय ध्रुव महाराज ने कहा : 'हे प्रभु, चूंकि मैं ऐश्वर्य से युक्त भौतिक पद की खोज में था, इसलिए मैं कठोर तपस्या कर रहा था। अब मैंने आपको पा लिये हैं, जो देवताओं, सन्तों तथा राजाओं को भी कठिनाई से प्राप्त हो पाते हैं। मैं तो काँच के टुकड़े की खोज कर रहा था, किन्तु बदले में मुझे अमूल्य रत्न मिल गया है। अतः मैं इतना सन्तुष्ट हूँ कि अब मैं आपसे कोई भी वर नहीं माँगना चाहता।'
एइ चारि अर्थ सह हइल 'तेइश' अर्थ ।।आर तिन अर्थ शुन परम समर्थ ॥
२२० ॥
पहले बताए गये श्लोक के अन्य उन्नीस अर्थों के साथ यह ‘आत्माराम' शब्द चार और अर्थ देता है, जब इसका अर्थ 'देहात्मबुद्धि के अधीन श्रम करता हुआ' लिया जाता है। इससे कुल मिलाकर तेईस अर्थ हो जाते हैं। अब अन्य तीन अर्थ सुनो जो अत्यन्त उपयुक्त हैं।
च-शब्दे ‘समुच्चये', आर अर्थ कय । ‘आत्मारामाश्च मुनयश्च' कृष्णेरे भजय ॥
२२१॥
जैसाकि ऊपर कहा जा चुका है, 'च' का प्रयोग ‘समुच्चय' के अर्थ में भी किया जा सकता है। इस अर्थ के अनुसार सारे आत्माराम तथा मुनि कृष्ण की सेवा में लगे रहते हैं।‘समुच्चय' के अतिरिक्त भी 'च' शब्द का एक अन्य अर्थ होता है।
‘निर्ग्रन्थाः' हा इहाँ 'अपि'–निर्धारणे । ‘रामश्च कृष्णश्च' ग्रथा विहरये वने ॥
२२२॥
निर्ग्रन्थाः' शब्द विशेषण की तरह प्रयुक्त हो सकता है और 'अपि' शब्द निश्चयात्मकता के लिए। उदाहरणार्थ रामश्च कृष्णश्च का अर्थ यह है कि राम तथा कृष्ण दोनों जंगल में विचरण करना पसन्द करते हैं।
च-शब्दे 'अन्वाचये' अर्थ कहे आर ।।‘बटो, भिक्षामट, गां चानय' त्रैछे प्रकार ॥
२२३॥
च' शब्द का अर्थ और भी है, जिसका अभिप्राय है एक ही समय एक गौण कार्य का सम्पन्न होना। च के इस अर्थ को समझना अन्वाचय कहलाता है। एक उदाहरण है, 'हे ब्रह्मचारी, भिक्षा माँगने जाओ और साथ ही गौवों को ले आओ।
कृष्ण-मनने मुनि कृष्णे सर्वदा भजय ।।‘आत्मारामा अपि' भजे,—गौण अर्थ कये ॥
२२४॥
वे सन्त पुरुष, जो सदैव कृष्ण का ध्यान करते हैं, भगवद्भक्ति में लगे रहते हैं। आत्माराम भी भगवान् की सेवा में व्यस्त रहते हैं। यही गौण अर्थ है।
‘च' एवार्थे–‘मुनयः एव' कृष्णेरे भजय ।आत्मारामा अपि–'अपि' 'ग'-अर्थ कय ॥
२२५॥
च' शब्द इस निश्चयात्मकता को भी सूचक है कि सन्त पुरुष ही कृष्ण-भक्ति करने में व्यस्त रहते हैं। आत्माराम अपि सन्धि में 'अपि' का प्रयोग दोषारोपण (निन्दा) करने में होता है।
'निर्ग्रन्थ हजा'–एइ सँहार ‘विशेषण' ।।आर अर्थ शुन, ग्रैछे साधुर सङ्गम ॥
२२६॥
निर्ग्रन्थ' शब्द मुनि तथा आत्माराम दोनों की विशेषता बताने वाला विशेषण है। इसका एक अन्य अर्थ भी है, जो तुम मुझसे सुन सकते हो। यह भक्त की संगति का सूचक है। अब मैं बतलाऊँगा कि किस तरह भक्त की संगति से निर्ग्रन्थ भी भक्त बन सकता है।
निर्ग्रन्थ-शब्दे कहे तबे 'व्याध', निर्धन' ।।साधु-सङ्गे सेह करे श्री-कृष्ण-भजन ॥
२२७॥
निर्ग्रन्थ' शब्द जो ‘अपि' के साथ मिलकर निश्चयात्मकता का सूचक है, ऐसे व्यक्ति को बताता है, जो पेशे से या तो शिकारी हो या अत्यन्त निर्धन हो। तो भी जब ऐसा व्यक्ति नारद जैसे महान् सन्त की संगति करता है, तो वह कृष्ण-भक्ति में संलग्न हो जाता है।
‘कृष्णारामाश्च' एव हय कृष्ण-मनन ।व्याध हा हय पूज्य भागवतोत्तम ॥
२२८॥
कृष्णारामाश्च' शब्द उसका सूचक है, जो कृष्ण के चिन्तन में आनन्द पाता है। भले ही ऐसा व्यक्ति शिकारी क्यों न हो, फिर भी वह पूजनीय है और भक्तों में श्रेष्ठ है।
एक भक्त-व्याधेर कथा शुन सावधाने । ग्राहा हैते हय सत्सङ्ग-महिमार ज्ञाने ॥
२२९॥
अब मैं एक कथा सुनाऊँगा कि एक शिकारी किस तरह नारद मुनि जैसे महापुरुष की संगति से महान् भक्त बना। इस कथा से शुद्ध भक्त की संगति की महानता को समझा जा सकता है।
एक दिन श्री-नारद देखि' नारायण ।। त्रिवेणी-स्नाने प्रयाग करिला गमन ॥
२३०॥
एक बार महान् सन्त नारद मुनि भगवान् नारायण से वैकुण्ठ में भेंट करने के बाद गंगा, यमुना तथा सरस्वती-इन तीन नदियों के संगम में स्नान करने प्रयाग गये।
वन-पथे देखे मृग आछे भूमे पड़ि'।बाण-विद्ध भग्न-पाद करे धडू-फड़ि ॥
२३१॥
जंगल से जाते हुए नारद मुनि ने रास्ते में एक हिरन पड़ा देखा, जो एक तीर से बिंधा हुआ था। उसके पाँव टूट चुके थे और वह तीव्र पीड़ा के कारण तड़प रहा था।
आर कत-दूरे एक देखेन शूकर ।। तैछे विद्ध भग्न-पाद करे धडू-फड़ ॥
२३२॥
कुछ ही दूरी पर नारद मुनि ने तीर से बिंधा एक सुअर देखा। उसके भी पाँव टूटे थे और वह पीड़ा से तड़प रहा था।
ऐछे एक शशक देखे आर कत-दूरे ।।जीवेर दुःख देखि' नारद व्याकुल-अन्तरे ॥
२३३॥
जब वे आगे बढ़े, तो उन्होंने एक खरगोश को भी तड़पते देखा। नारद मुनि इन जीवों को इस तरह कष्ट भोगते देखकर हृदय में अत्यधिक दुःखी हुए।
कत-दूरे देखे व्याध वृक्षे ओंत हा ।।मृग मारिबारे आछे बाण झुड़िया ॥
२३४॥
जब नारद मुनि और आगे बढ़े, तो उन्होंने एक वृक्ष के पीछे एक शिकारी को देखा। यह शिकारी तीर लिये था और अन्य पशुओं को मारने के लिए तैयार था।
श्याम-वर्ण रक्त-नेत्र महा-भयङ्कर । धनुर्बाण हस्ते,—ग्रेन ग्रम दण्ड-धर ॥
२३५॥
इस शिकारी का शरीर काला था। उसकी आँखें लाल-लाल थीं और वह अत्यन्त भयानक लग रहा था। वह ऐसा दिख रहा था, मानो वह यमराज हो, जो वहाँ पर अपने हाथों में धनुष-बाण लिए खड़े हो।।
पथ छाड़ि' नारद तार निकटे चलिल । नारदे देखि' मृग सब पलाञा गेल ॥
२३६॥
जब नारद मुनि जंगल का मार्ग छोड़कर शिकारी के पास गये, तो सारे पशुओं ने तुरन्त उन्हें देखा और वहाँ से भाग गये।
क्रुद्ध हा व्याध ताँरै गालि दिते चाय ।। नारद-प्रभावे मुखे गालि नाहि आय ॥
२३७॥
जब सारे पशु भाग गये, तो शिकारी ने गाली देकर नारद को दण्डित करना चाहा, किन्तु नारद के समक्ष वह एक भी बुरा शब्द उच्चारित न कर सका।
गोसाजि, प्रयाण-पथ छाड़ि' केने आइला ।। तोमा देखि' मोर लक्ष्य मृग पलाइला ॥
२३८॥
शिकारी ने नारद मुनि से कहा, 'हे गोस्वामी! हे महामुनि! आपने मेरे पास आने के लिए जंगल में से होकर जाने वाले सामान्य मार्ग को क्यों छोड़ा? आपको देखते ही मेरे शिकार के सारे पशु भाग गये।'
नारद कहे,–पथ भुलि' आइलाङ पुछिते । मने एक संशय हय, ताहा खण्डाइते ॥
२३९॥
नारद मुनि ने उत्तर दिया, 'मार्ग छोड़कर मैं तुम्हारे पास अपना एक सन्देह दूर करने आया हूँ।
पथे ने शूकर-मृग, जानि तोमार हय ।। व्याध कहे, येइ कह, सेइ त निश्चय ॥
२४० ॥
मैं संशय में था कि ये सारे अधमरे सुअर तथा अन्य पशु क्या तुम्हारे हैं।' शिकारी ने उत्तर दिया, हाँ, आप जो कह रहे हैं, सही है।
नारद कहे,–यदि जीवे मार' तुमि बाण ।। अर्ध-मारा कर केने, ना लओ पराण? ॥
२४१॥
तब नारद मुनि ने पूछा, 'तुमने इन पशुओं को पूरी तरह से क्यों नहीं मारा? तुमने उनके शरीरों में अपने तीर बेधकर उन्हें अधमरा क्यों रखा?' व्याध कहे,शुन, गोसाञि, ‘मृगारि' मोर नाम ।पितार शिक्षाते आमि करि ऐछे काम ॥
२४२॥
शिकारी ने उत्तर दिया, ‘हे साधु पुरुष, मेरा नाम मृगारि अर्थात् पशुओं का शत्रु है। मेरे पिता ने इन्हें इसी प्रकार मारे जाने की शिक्षा मुझे दी है।
अर्ध-मारा जीव यदि धडू-फड़ करे ।तबे त' आनन्द मोर बाड़ये अन्तरे ॥
२४३॥
जब मैं अधमरे पशुओं को तड़पते देखता हूँ, तो मुझे बड़े आनन्द का अनुभव होता है।'
नारद कहे,—'एक-वस्तु मागि तोमार स्थाने' ।।व्याध कहे,–मृगादि लह, ग्रेइ तोमार मने ॥
२४४॥
तब नारद मुनि ने शिकारी से कहा, 'मुझे तुमसे एक वस्तु माँगनी है।' शिकारी ने उत्तर दिया, 'आप जो भी पशु या अन्य वस्तु चाहें उसे ले सकते हैं।
मृग-छाल चाह यदि, आइस मोर घरे ।।येइ चाह ताहा दिब मृग-व्याघ्राम्बरे ॥
२४५ ॥
यदि आपको मृगछाला चाहिए तो मेरे पास अनेक हैं। मैं आपको मृगछाला या व्याघ्र की खाल दे दूंगा।'
नारद कहे,–इहा आमि किछु नाहि चाहि ।।आर एक-दान आमि मागि तोमा-ठाजि ॥
२४६॥
नारद मुनि ने कहा, 'मैं कोई छाल नहीं चाहता। मैं तुमसे दान में केवल एक वस्तु चाहता हूँ।
कालि हैते तुमि नेइ मृगादि मारिबा । प्रथमेइ मारिबा, अर्ध-मारा ना करिबा ॥
२४७॥
मैं तुमसे याचना करता हूँ कि आज से आगे तुम पशुओं को पूरी तरह मारोगे और उन्हें अधमरा नहीं छोड़ोगे।'
व्याध कहे,_किबा दान मागिला आमारे । अर्ध मारिले किबा हय, ताहा कह मोरे ॥
२४८ ॥
शिकारी ने उत्तर दिया, 'हे महाशय, आप मुझसे यह क्या माँग रहे हैं? इन पड़े हुए अधमरे पशुओं में क्या बुराई है? क्या आप मुझे बतला सकेंगे?' नारद कहे,–अर्ध मारिले जीव पाय व्यथा । जीवे दुःख दितेछ, तोमार हइबे ऐछे अवस्था ॥
२४९ ॥
नारद मुनि ने उत्तर दिया, 'यदि तुम पशुओं को अधमरा छोड़ते हो, तो तुम जान-बूझकर उन्हें पीड़ा पहुँचाते हो। अत: बदले में तुम्हें दुःख भोगना होगा।'
व्याध तुमि, जीव मार—'अल्प' अपराध तोमार । कदर्थना दिया मार'——ए पाप 'अपार' ॥
२५०॥
नारद मुनि ने आगे कहा, 'हे शिकारी, तुम्हारा कार्य पशुओं को वध करना है। यह तो तुम्हारा अल्प अपराध है। किन्तु जब तुम जानबूझकर उन्हें अधमरा छोड़कर व्यर्थ तड़पाते हो, तो तुम बहुत भारी पाप करते हो।'
कदर्थिया तुमि व्रत मारिला जीवेरे । तारा तैछे तोमा मारिबे जन्म-जन्मान्तरे ॥
२५१॥
नारद मुनि ने कहा : 'तुमने जिन पशुओं को मारा है और व्यर्थ ही जिन्हें पीड़ा पहुँचाई है, वे सब एक-एक करके अगले जन्मों में तुम्हें मारते रहेंगे।'
नारद-सङ्गे व्याधेर मन परसन्न हइल । ताँर वाक्य शुनि' मने भय उपजिल ॥
२५२॥
इस तरह नारद मुनि की संगति से वह शिकारी अपने पापकृत्यों को थोड़ा-बहुत स्वीकार करने लगा। अतः वह अपने अपराधों के कारण कुछ भयभीत हो उठा।।
व्याध कहे,–बाल्य हैते एई आमार कर्म । केमने तरिमु मुञि पामर अधम ? ॥
२५३॥
शिकारी ने स्वीकार किया कि उसके द्वारा पापकर्म हुए हैं। तय उसने कहा, 'मुझे बचपन से ही इस पेशे की शिक्षा दी गई है। अब मैं सोच रहा हूँ कि मैं किस तरह अपने अनगिनत पापकर्मों से मुक्त हो सकता हूँ।'
एइ पाप ग्राय मोर, केमन उपाये? ।निस्तार करह मोरे, पड़ों तोमार पाये ॥
२५४॥
शिकारी ने आगे कहा, 'हे महानुभाव, कृपया मुझे बतायें कि मैं अपने पापी जीवन के कर्मफलों से किस प्रकार छुटकारा पा सकता हूँ। अब मैं पूरी तरह से आपकी शरण में हैं और आपके चरणकमलों पर पड़ता हूँ। कृपया मेरे पापकर्म के फलों से मेरा उद्धार करें।'
नारद कहे,----‘यदि धर आमार वचन । तबे से करिते पारि तोमार मोचन' ॥
२५५ ॥
नारद मुनि ने शिकारी को आश्वस्त किया, 'यदि तुम मेरे उपदेशों को सुनोगे, तो मैं तुम्हारी मुक्ति का उपाय ढूंढ निकालूंगा।'
व्याध कहे,–'येइ कह, सेइ त' करिब' ।नारद कहे,–'धनुक भाङ्ग, तबे से कहिब' ॥
२५६ ॥
तब शिकारी ने कहा, हे मान्यवर, आप जो कहते हैं वही मैं करूंगा।' नारद ने उसे तुरन्त आदेश दिया, 'पहले तुम अपना धनुष तोड़ डालो। तब मैं तुम्हें बतलाऊँगा कि तुम्हें क्या करना है।'
व्याध कहे,–'धनुक भाङ्गिले वर्तिब केमने?' ।। नारद कहे,–'आमि अन्न दिब प्रति-दिने' ॥
२५७॥
शिकारी ने उत्तर दिया, 'यदि मैं अपना धनुष तोड़ता हूँ, तो फिर मैं अपना भरण-पोषण कैसे करूँगा?' नारद मुनि ने उत्तर दिया, चिन्ता मत करो। मैं तुम्हें प्रतिदिन भोजन दिया करूंगा।'
धनुक भाङ्गि' व्याध ताँर चरणे पड़िल । तारे उठाजा नारद उपदेश कैल ॥
२५८॥
नारद मुनि द्वारा इस प्रकार आश्वस्त किये जाने पर शिकारी ने अपना धनुष तोड़ डाला, तुरन्त ही सन्त के चरणकमलों पर गिर पड़ा और अपने आपको पूर्ण समर्पित कर दिया। बाद में नारद मुनि ने अपने हाथ से उसे उठाया और आध्यात्मिक उन्नति का उपदेश दिया।
घरे गिया ब्राह्मणे देह' व्रत आछे धन । एक एक वस्त्र परि' बाहिर हओ दुइ-जन ॥
२५९॥
तब नारद मुनि ने शिकारी को उपदेश दिया, “तुम घर लौट जाओ और तुम्हारे पास जितना धन है उसे उन शुद्ध ब्राह्मणों में बाँट दो, जो परम सत्य को जानने वाले हैं। ब्राह्मणों को अपना धन बाँटने के बाद तुम तथा तुम्हारी पत्नी दोनों ही अपने पहनने के लिए एक एक वस्त्र लेकर गृह-त्याग कर दो।'
नदी-तीरे एक-खानि कुटीर करिया ।तार आगे एक-पिण्डि तुलसी रोपिया ॥
२६० ॥
नारद मुनि ने कहा, 'तुम अपना घर छोड़कर नदी किनारे जाओ। वहाँ तुम एक छोटी-सी कुटिया बनाओ और उस कुटिया के सामने एक चबूतरे में तुलसी का एक पौधा लगाओ।
तुलसी-परिक्रमा कर, तुलसी-सेवन । निरन्तर कृष्ण-नाम करिह कीर्तन ॥
२६१॥
अपने घर के सामने तुलसी रोपने के बाद नित्य प्रति उस तुलसी वृक्ष की परिक्रमा करना, उसे जल देकर सेवा देना और निरन्तर हरे कृष्ण महामन्त्र का कीर्तन करना।
आमि तोमाय बहु अन्न पाठाइमु दिने ।सेई अन्न लबे, ग्रत खाओ दुइ-जने ॥
२६२॥
नारद मुनि ने आगे कहा, 'मैं तुम दोनों को नित्य प्रति पर्याप्त भोजन भेज दिया करूँगा, जिससे तुम इच्छानुसार भोजन कर सकोगे।'
तबे सेइ मृगादि तिने नारद सुस्थ कैल ।।सुस्थ हा मृगादि तिने धाज्ञा पलाइल ॥
२६३॥
तत्पश्चात् वे तीनों पशु जो अधमरे थे, नारद मुनि द्वारा पुनः जीवित कर दिये गये। वे पशु उठकर तेजी से भाग गये।
देखिया व्याधेर मने हैल चमत्कार ।।घरे गेल व्याध, गुरुके करि' नमस्कार ॥
२६४॥
जब शिकारी ने अधमरे पशुओं को भागते देखा, तो वह आश्चर्यचकित रह गया। तब उसने नारद मुनि को सादर नमस्कार किया और वह अपने घर लौट आया।
यथा-स्थाने नारद गेला, व्याध घरे आइल ।नारदेर उपदेशे सकल करिल ॥
२६५ ॥
इसके बाद नारद मुनि अपने गन्तव्य को चले गये। वह शिकारी घर लौटकर अपने गुरु नारद के उपदेशों का अक्षरशः पालन करने लगा।
ग्रामे ध्वनि हैल, व्याध 'वैष्णव' हइल ।ग्रामेर लोक सब अन्न आनिते लागिल ॥
२६६॥
यह समाचार सारे गाँव में फैल गया कि शिकारी वैष्णव बन गया है। सारे ग्रामवासी भिक्षा लाकर उस वैष्णव को देने लगे जो पहले एक शिकारी था।
एक दिन अन्न आने दश-बिश जने । दिने तत लय, व्रत खाय दुइ जने ॥
२६७॥
एक दिन में दस या बीस लोगों के लिए पर्याप्त भोजन आता, किन्तु शिकारी तथा उसकी पत्नी उतना ही स्वीकार करते, जितना वे दोनों खा सकते थे।
एक-दिन नारद कहे,—शुनह, पर्वते ।। आमार एक शिष्य आछे, चलह देखिते ॥
२६८ ॥
एक दिन अपने मित्र पर्वत मुनि से बातें करते हुए नारद मुनि ने उनसे कहा कि चलो, चलकर उनके शिकारी शिष्य को देख आयें।
तबे दुइ ऋषि आइला सेइ व्याध-स्थाने ।।दूर हैते व्याध पोइल गुरुर दरशने ॥
२६९॥
जब दोनों ऋषि शिकारी के स्थान के निकट पहुँचे, तो शिकारी ने दूर से ही उन्हें आते देखा।
आस्ते-व्यस्ते धान्ना आसे, पथ नाहि पाय ।।पथेर पिपीलिका इति-उति धरे पाय ॥
२७० ॥
वह शिकारी बड़ी तेजी से अपने गुरु की ओर दौड़ पड़ा, किन्तु वह पृथ्वी पर गिरकर प्रणाम नहीं कर सका, क्योंकि वहाँ चीटियाँ पाँवों के चारों ओर इधर-उधर दौड़ रही थीं।
दण्डवत्स्थाने पिपीलिकारे देखियो । वस्त्रे स्थान झाड़ि' पड़े दण्डवत् हन्ना ।। २७१ ॥
चींटियों को देखकर शिकारी ने उन्हें एक वस्त्र से हटाया। भूमि को इस तरह चीटियों से साफ करके वह नमस्कार करने के लिए दण्डवत् गिर पड़ा।
नारद कहे,–व्याध, एइ ना हय आश्चर्य ।। हरि-भक्त्ये हिंसा-शून्य हय साधु-वर्य ॥
२७२ ॥
नारद मुनि ने कहा, 'हे शिकारी, ऐसा आचरण तनिक भी आश्चर्यजनक नहीं है। भक्ति में मनुष्य स्वतः अहिंसक बन जाता है। वह साधु-पुरुषों में सर्वोत्तम होता है।
एते न ह्यद्भुता व्याध तवाहिंसादयो गुणाः ।हरि-भक्तौ प्रवृत्ता ये न ते स्युः पर-तापिनः ॥
२७३॥
हे शिकारी, तुमने अहिंसा जैसे जिन सद्गुणों को विकसित कर रखा है, वे बहुत आश्चर्यजनक नहीं हैं, क्योंकि भगवद्भक्ति में लगे व्यक्ति कभी भी अन्यों को ईर्ष्यावश पीड़ा पहुँचाने की मनोवृत्ति नहीं रखते।'
तबे सेइ व्याध दोंहारे अङ्गने आनिल । कुशासन आनि' दोंहारे भक्त्ये वसाइल ॥
२७४॥
तब उस शिकारी ने दोनों ऋषियों का अपने आँगन में स्वागत किया। उसने उनके बैठने के लिए कुश की चटाई बिछा दी और बड़ी ही भक्ति के साथ उनसे बैठने की प्रार्थना की।
जल आनि' भक्त्ये दोंहार पाद प्रक्षालिल ।। सेइ जल स्त्री-पुरुषे पिया शिरे लइल ॥
२७५ ॥
तब वह जल ले आया और बड़ी ही भक्ति के साथ उसने जल से ऋषियों का पाद-प्रक्षालन किया। तब पति-पत्नी दोनों ने उस जल को पिया और अपने सिरों पर छिड़का।।
कम्प-पुलकाश्रु हैल कृष्ण-नाम गाजा ।।ऊर्ध्व बाहु नृत्य करे वस्त्र उड़ाजा ॥
२७६॥
जब उस शिकारी ने अपने गुरु के समक्ष हरे कृष्ण महामन्त्र का कीर्तन किया, तो उसका शरीर काँपने लगा और नेत्रों से अश्रुओं की धारा बह चली। भावविभोर होकर वह अपने हाथ उठाकर अपने वस्त्रों को ऊपर-नीचे लहराता हुआ नृत्य करने लगा।
देखिया व्याधेर प्रेम पर्वत-महामुनि ।नारदेरे कहे, तुमि हओ स्पर्श-मणि ॥
२७७॥
जब पर्वत मुनि ने शिकारी के भावमय प्रेम के लक्षणों को देखा तो वे नारद से बोले, 'निश्चय ही आप स्पर्शमणि हो।'
अहो धन्योऽसि देवर्षे कृपया यस्य तत्क्षात् । नीचोऽप्युत्पुलको लेभे लुब्धको रतिमच्युते ॥
२७८ ॥
पर्वत मुनि ने आगे कहा, 'हे मित्र नारद, आप तुभ्र देवताओं में ऋषि के रूप में विख्यात हैं। आपकी कृपा से इस शिकारी जैसा निम्न-जन्मा व्यक्ति भी तुरन्त कृष्ण के प्रति अनुरक्त हो सकता है।'
नारद कहे,–वैष्णव, तोमार अन्न किछु आय?'। व्याध कहे, यारे पाठाओ, सेइ दिया ग्राय ॥
२७९॥
तब नारद मुनि ने शिकारी से पूछा, 'हे वैष्णव, क्या तुम्हारे पास अपने जीवन-निर्वाह के लिए कोई आय है?' शिकारी ने उत्तर दिया, हे गुरु, आप जिसे भी भेजते हैं, वह जब मुझसे मिलने आता है, कुछ न कुछ मुझे देता है।
एत अन्न ना पाठाओ, किछु कार्य नाइ ।सबै दुइ-जनार योग्य भक्ष्य-मात्र चाइ ॥
२८० ।। उस पूर्व-शिकारी ने कहा, 'कृपया इतना अन्न मत भेजें। केवल उतना ही भेजें जितना हम दोनों के लिए पर्याप्त हो, अधिक नहीं।'
नारद कहे,—‘ऐछे रह, तुमि भाग्यवान् ।एत बलि' दुइ-जन हइला अन्तर्धान ॥
२८१॥
नारद मुनि ने एक दिन से अधिक भोजन की आपूर्ति की इच्छा न करने के प्रति सहमति व्यक्त की और उसे यह कहते हुए आशीर्वाद दिया कि, 'तुम भाग्यशाली हो।' तत्पश्चात् नारद मुनि तथा पर्वत मुनि उस स्थान से अन्तर्धान हो गये।
एइ त कहिलें तोमाय व्याधेर आख्यान ।।ग्रा शुनिले हये साधु-सङ्ग-प्रभाव-ज्ञान ॥
२८२॥
इस प्रकार मैंने शिकारी की घटना का वर्णन किया। इस कथा को सुनकर भक्तों की संगति के प्रभाव को समझा जा सकता है।
एइ आर तिन अर्थ गणनाते पाइल ।। एइ दुइ अर्थ मिलि' ‘छाब्बिश' अर्थ हैल ॥
२८३॥
इस तरह हमें ( आत्माराम श्लोक के ) तीन अर्थ और मिल गये हैं। अन्य अर्थों के साथ इन्हें मिलाने पर अर्थों की कुल संख्या छब्बीस हो जाती है।
आर अर्थ शुन, शाहा–अर्थेर भाण्डार ।।स्थूले ‘दुइ' अर्थ, सूक्ष्मे ‘बत्रिश' प्रकार ॥
२८४॥
एक अन्य अर्थ भी है, जो नाना प्रकार के अर्थों से पूर्ण है। वस्तुतः दो स्थूल अर्थ हैं और बत्तीस सूक्ष्म अर्थ हैं।
'आत्मा'-शब्दे कहे---सर्व-विध भगवान् । एक ‘स्वयं भगवान्', आर 'भगवान्'-आख्यान २८५ ॥
'आत्मा' शब्द पूर्ण पुरुषोत्तम भगवान् के समस्त विभिन्न अंशों का द्योतक है। इनमें से एक स्वयं पूर्ण पुरुषोत्तम भगवान् कृष्ण हैं और शेष कृष्ण के विभिन्न अवतार या अंश हैं।
ताँते रमे येइ, सेइ सब–‘आत्माराम' । ‘विधि-भक्त', 'राग-भक्त', दुइ-विध नाम ॥
२८६॥
जो व्यक्ति पूर्ण पुरुषोत्तम भगवान् की सेवा में सदैव लगा रहता है, वह आत्माराम कहलाता है। आत्माराम के दो प्रकार होते हैं। पहला आत्माराम वह है जो वैधी भक्ति में लगा रहता है ( वैधी भक्त ) तथा दूसरा वह है जो रागानुगा भक्ति में लगा रहता है ( राग भक्त)।
दुइ-विध भक्त हय चारि चारि प्रकार ।पारिषद, साधन-सिद्ध, साधक-गण आर ॥
२८७॥
वैधी तथा रागानुगा भक्ति में लगे आत्मारामों के चार-चार प्रकार हैं। ये हैं-नित्य पार्षद, भक्ति द्वारा सिद्धिप्राप्त पार्षद ( साधन-सिद्ध) ' तथा भक्ति में लगे हुए साधक जिनके दो प्रकार हैं।
जात-अजात-रति-भेदे साधक दुइ भेद ।।विधि-राग-मार्गे चारि चारि अष्ट भेद ॥
२८८॥
भक्ति का अभ्यास करने वाले ( साधक) या तो परिपक्व होते हैं। (जात) अथवा अपरिपक्व (अजात ) होते हैं। अतः साधक दो प्रकार के होते हैं। चूंकि भक्तगण या तो वैधी भक्ति करते हैं या रागानुगा भक्ति और चूँकि इन दोनों के अन्तर्गत चार-चार प्रकार होते हैं, अतः कुल मिलाकर आठ भेद हो जाते हैं।
विधि-भक्त्ये नित्य-सिद्ध पारिषद--'दास' ।।सखा' 'गुरु', ‘कान्ता-गण',—चारि-विध प्रकाश ॥
२८९ ।। वैधी भक्ति करने से मनुष्य नित्यसिद्ध पार्षद के पद को प्राप्त होता है। यथा दास, सखा, गुरुजन या प्रियतमा। इनमें से प्रत्येक के चार प्रकार है।
साधन-सिद्ध—दास, सखा, गुरु, कान्ता-गए ।जात-रति साधक-भक्त–चारि-विध जन ।। २९० ॥
जिन्होंने भक्ति के द्वारा सिद्धि प्राप्त की है ( साधन--सिद्ध) उनमें दास, सखा, गुरुजन तथा प्रेमिकाएँ ( गोपियाँ)-ये चार आते हैं। इसी प्रकार परिपक्व भक्तों (जातरति साधक भक्तों ) के चार प्रकार हैं।
अज्ञात-रति साधक-भक्त,——ए चारि प्रकार । विधि-मार्गे भक्ते घोड़श भेद प्रचार ॥
२९१ ॥
वैधी भक्ति के अन्तर्गत अपरिपक्व भक्त ( अजातरति साधक भक्त) भी हैं। ये भी चार प्रकार के होते हैं। इस तरह वैधी भक्ति के अन्तर्गत कुल भोलह प्रकार हैं।
राग-भार्गे ऐछे भक्ते षोड़श विभेद ।दुइ मार्गे आत्मारामेर बत्रिश विभेद ॥
२९२॥
रागानुगा भक्ति के अन्तर्गत भी सोलह प्रकार के भक्त हैं। इस प्रकार इन दोनों मार्गों का आनन्द लेने वाले आत्मारामों के बत्तीस प्रकार हैं।
‘मुनि', 'निर्ग्रन्थ’, ‘च' 'अपि',—चारि शब्देर अर्थ ।ग्राहाँ येइ लागे, ताहा करिये समर्थ ॥
२९३ ।। जब इन बत्तीस प्रकार के भक्तों की विशेषता ‘मुनि,' ‘निन्थ, ‘च,' तथा 'अपि' शब्दों द्वारा बताई जाती है, तब उन्हें विभिन्न प्रकारों से बढ़ाया जा सकता है और उनकी भलीभाँति व्याख्या की जा सकती हैं।
बत्रिशे छाब्बिशे मिलि, अष्ट-पञ्चाश। आर एक भेद शुन अर्थेर प्रकाश ॥
२९४॥
जब हम भक्तों के छब्बीस प्रकारों को इन बत्तीस प्रकारों में जो देते हैं, तो कुल संख्या अट्ठावन हो जाती है। अब तुम मुझसे अर्थों की और अभिव्यक्तियाँ सुन सकते हो।
इतरेतर 'च' दिया समास करिये । ‘आटान्न'-बार आत्माराम नाम लइये ॥
२९५ ॥
इस तरह मैं हर शब्द के बाद 'च' शब्द जोड़ता हूँ, तो समास बनता है। इस तरह विभिन्न आत्मारामों के नाम अट्ठावन बार लिये जा सकते हैं।
‘आत्मारामाश्च आत्मारामाश्च' आटान्न-बार ।। शेषे सब लोप करि' राखि एक-बार ॥
२९६ ॥
इस तरह अट्ठावन अर्थों में से प्रत्येक के लिए 'आत्मारामाः' शब्द की 'च' के साथ पुनरावृत्ति की जा सकती है। इस पूर्वकथित विधि का । पालन करते हुए तथा अन्तिम के अतिरिक्त अन्य सभी अर्थों का निषेध करते हुए हमारे पास जो बचेगा, वह समस्त अर्थों का प्रतिनिधित्व करता है। सरूपाणामेक-शेष एक-विभक्तौ, उक्तार्थानामप्रयोग इति ॥
२९७॥
एक ही रूप तथा एक ही विभक्ति वाले सारे शब्दों में से केवल अन्तिम को रहने दिया जाता है।'
आटान्न च-कारेर सब लोप हय । एक आत्माराम-शब्दे आटान्न अर्थ कय ॥
२९८॥
सारे च-कार अर्थात् 'च' से युक्त शब्द हटा लिए जाने पर भी केवल एक शब्द 'आत्माराम' से अट्ठावन विभिन्न अर्थ प्राप्त किये जा सकते हैं।
अश्वत्थ-वृक्षाश्च बट-वृक्षाश्च कपित्थ-वृक्षाश्च आम्र-वृक्षाश्च वृक्षाः ॥
२९९ ॥
इस बहुवचन शब्द 'वृक्षाः' से सारे वृक्ष यथा बरगद, पीपल, कैथा तथा आम के वृक्षों का संकेत होता है।'
अस्मिन्वने वृक्षाः फलन्ति भैछे हय ।।तैछे सब आत्माराम कृष्ण भक्ति करय ॥
३०० ॥
आत्माराम श्लोक वैसा ही है जैसाकि यह वाक्य, 'इस जंगल में अनेक विभिन्न वृक्षों में फल लगते हैं। सारे आत्माराम भगवान् कृष्ण की सेवा करते हैं।
‘आत्मारामाश्च' समुच्चये कहिये च-कार ।। ‘मुनयश्च' भक्ति करे,—एई अर्थ तार ॥
३०१॥
आत्मारामाः' शब्द को अट्ठावन बार उच्चरित करके तथा 'च' को समुच्चयवाचक मानकर इसके साथ 'मुनयः' शब्द जोड़ा जा सकता है। तब इसका अर्थ यह होगा कि मुनिगण भी भगवान् कृष्या की भक्ति करते हैं। इस तरह कुल उनसठ अर्थ हो जाते हैं।
‘निर्ग्रन्था एव' हा, 'अपि'—निर्धारणे ।। एइ ‘ऊनषष्टि' प्रकार अर्थ करिहुँ व्याख्याने ॥
३०२॥
तत्पश्चात् 'निर्ग्रन्थाः ' शब्द को लेते हुए तथा 'अपि' को पुष्ट करने के अर्थ में लेते हुए मैंने इस शब्द के उनसठवे अर्थ की व्याख्या करने का प्रयास किया है।
सर्व-समुच्चये आर एक अर्थ हय । ‘आत्मारामाश्च मुनयश्च निर्ग्रन्थाश्च' भजय ॥
३०३ ॥
सारे शब्दों को एकसाथ लेने पर एक अन्य अर्थ होता है। चाहे कोई आत्माराम हो, मुनि हो या निर्ग्रन्थ, हर व्यक्ति को भगवान् की सेवा करनी चाहिए।
'अपि'-शब्द–अवधारणे, सेह चारि बार ।।चारि-शब्द-सङ्गे एवेर करिबे उच्चार ॥
३०४॥
जब अपि' शब्द निर्णय के अर्थ में प्रयुक्त किया जाता है, तो चार शब्दों के साथ 'एव' शब्द चार बार उच्चरित हो सकता है।
उरुक्रमे एव भक्तिमेव अहैतुकीमेव कुर्वन्त्येव ॥
३०५ ॥
उरुक्रम,' 'भक्ति,' 'अहैतुकी' तथा 'कुर्वन्ति' शब्दों को ‘एव' के साथ बारम्बार मिलाते हैं। इस तरह अन्य अर्थ निकलता है।
एइ त कहिलै श्लोकेर 'षष्टि' सङ्ख्यक अर्थ ।आर एक अर्थ शुन प्रमाणे समर्थ ॥
३०६॥
अब तक मैं इस श्लोक के साठ भिन्न-भिन्न अर्थ दे चुका हूँ, तो भी एक अन्य अर्थ है, जो अत्यधिक स्पष्ट है।
‘आत्मा'-शब्दे कहे 'क्षेत्रज्ञ जीव'-लक्षण ।।ब्रह्मादि कीट-पर्यन्तताँर शक्तिते गणन ॥
३०७॥
आत्मा' शब्द उस जीव का भी सूचक है, जो अपने शरीर के विषय में जानता है। यह अन्य लक्षण है। ब्रह्माजी से लेकर एक क्षुद्र चींटी तक हर एक को भगवान् की तटस्था शक्ति के रूप में गिना जाता है।
विष्णु-शक्तिः परा प्रोक्ता क्षेत्रज्ञाख्या तथा परा ।।अविद्या-कर्म-संज्ञान्या तृतीया शक्तिरिष्यते ॥
३०८॥
भगवान् विष्णु की शक्ति की तीन श्रेणियाँ हैं-अध्यात्मिक शक्ति, जीव तथा अविद्या। आध्यात्मिक शक्ति ज्ञान से पूर्ण होती है। जीव यद्यपि आध्यात्मिक शक्ति से सम्बन्धित होते हैं, किन्तु वे मोहग्रस्त होते रहते हैं; और तीसरी शक्ति, जो अविद्या से भरी होती है, सदैव सकाम कम में देखने में आती है।'
क्षेत्रज्ञ आत्मा पुरुषः प्रधानं प्रकृतिः स्त्रिया ॥
३०९॥
क्षेत्रज्ञ' शब्द जीव, भोक्ता, प्रधान तथा भौतिक प्रकृति का द्योतक भ्रमिते भ्रमिते यदि साधु-सङ्ग घाय ।सब त्यजि' तबे सिंहो कृष्णेरे भजय ।। ३१०॥
विभिन्न योनियों में जीव विभिन्न लोकों में विचरण करते हैं, किन्तु पदि कदाचित् उन्हें शुद्ध भक्त ( साधु) की संगति प्राप्त हो जाती है, तो सारे कार्य त्यागकर भगवान् कृष्ण की सेवा में लग जाते हैं।
पाटि अर्थ कहिलँ, सब—कृष्णेर भजने ।सेई अर्थ हय एइ सब उदाहरणे ॥
३११॥
इस तरह मैंने साठ भिन्न-भिन्न अर्थ बतलाये और वे सबके सब कृष्ण की सेवा को ही लक्षित करते हैं। इतने सारे उदाहरण देने के बाद यही एकमात्र अर्थ है।
‘एक-षष्टि' अर्थ एबे स्फुरिल तोमा-सङ्गे।।तोमार भक्ति-वशे उठे अर्थेर तरङ्गे ॥
३१२॥
अब तुम्हारी संगति से एक अन्य अर्थ स्फुरित हुआ है। तुम्हारी भक्ति के कारण ही अर्थों की तरंगें उठ रही हैं।
अहं वेद्मि शुको वेत्ति व्यासो वेत्ति न वेत्ति वा । भक्त्या भागवतं ग्राह्यं न बुद्ध्या न च टीकया ॥
३१३॥
[ शिवजी ने कहा : 'श्रीमद्भागवत को या तो मैं जानता हूँ या व्यासपुत्र शुकदेव गोस्वामी जानते हैं, तथा व्यासदेव जानते हैं अथवा नहीं जानते। इस निष्कलंक पुराण श्रीमद्भागवत को केवल भक्ति से सीखा जा सकता है-भौतिक बुद्धि, चिन्तन विधियों या काल्पनिक टीकाओं द्वारा नहीं।
अर्थ शुनि' सनातन विस्मित हा । स्तुति करे महाप्रभुर चरणे धरिया ॥
३१४॥
आत्माराम श्लोक के विभिन्न अर्थों की व्याख्या सुनकर सनातन गोस्वामी आश्चर्यचकित हो गये। वे श्री चैतन्य महाप्रभु के चरणकमलों पर गिर पड़े और स्तुति करने लगे।
साक्षात् ईश्वर तुमि व्रजेन्द्र-नन्दन । तोमार निश्वासे सर्व-वेद-प्रवर्तन ॥
३१५॥
सनातन गोस्वामी ने कहा, हे प्रभु, आप महाराज नन्द के पुत्र पूर्ण पुरुषोत्तम भगवान् कृष्ण हैं। सारे वैदिक ग्रन्थ आपके श्वास के माध्यम से ध्वनित होते हैं।
तुमि—वक्ता भागवतेर, तुमि जान अर्थ ।।तोमा विना अन्य जानिते नाहिक समर्थ ॥
३१६ ।। हे प्रभु, आप भागवत के आदि वक्ता हैं। अतः आप ही इसके वास्तविक अर्थ को जानते हैं। आपके अतिरिक्त अन्य कोई भी श्रीमद्भागवत के गुह्य अर्थ को नहीं समझ सकता।
प्रभु कहे, केने कर आमार स्तवन ।भागवतेर स्वरूप केने ना कर विचारण? ॥
३१७ ॥
श्री चैतन्य महाप्रभु ने उत्तर दिया, तुम मेरा स्तवन क्यों कर रहे हो? तुम्हें श्रीमद्भागवत की दिव्य स्थिति को समझना चाहिए। तुम इस महत्त्वपूर्ण बात पर क्यों नहीं विचार करते? कृष्ण-तुल्य भागवत–विभु, सर्वाश्रय ।।प्रति-श्लोके प्रति-अक्षरे नाना अर्थ कय ॥
३१८ ॥
श्रीमद्भागवत कृष्ण के तुल्य महान् है, जोकि परमेश्वर तथा सबके आश्रय हैं। श्रीमद्भागवत के प्रत्येक श्लोक में तथा प्रत्येक अक्षर में अनेक अर्थ निहित हैं।
प्रश्नोत्तरे भागवते करियाछे निर्धार । याँहार श्रवणे लोके लागे चमत्कार ॥
३१९॥
श्रीमद्भागवत का रूप प्रश्नों तथा उत्तरों में दिया हुआ है। इस तरह निष्कर्ष स्थापित किया जाता है। इन प्रश्नों तथा उत्तरों को सुनकर मनुष्य को अत्यधिक आश्चर्य होता है।
ब्रूहि योगेश्वरे कृष्णो ब्रह्मण्ये धर्म-वर्मणि ।। स्वां काष्ठामधुनोपेते धर्मः कं शरणं गतः ॥
३२० ॥
अब जबकि परम सत्य, योगेश्वर श्रीकृष्ण अपने धाम प्रस्थान करे चुके हैं, तो कृपया हमें बताइये कि इस समय धर्म की रक्षा किसके द्वारा की जा रही है।
कृष्णे स्व-धामोपगते धर्म-ज्ञानादिभिः सह ।कलौ नष्ट-दृशामेष पुराणार्कोऽधुनोदितः ॥
३२१॥
जब कृष्ण धर्म तथा दिव्य ज्ञान समेत अपने धाम के लिए प्रस्थान कर गये, तो श्रीमद्भागवत नामक यह पुराण इस कलियुग में सूर्य के समान उन लोगों को आलोक देने के लिए उदित हुआ है, जो आध्यात्मिक दृष्टि से विहीन हैं।'
एइ मत कहिलै एक श्लोकेर व्याख्यान । बातुलेर प्रलाप करि' के करे प्रमाण? ॥
३२२॥
इस तरह मैंने एक पागल की तरह केवल एक श्लोक के अर्थ की व्याख्या की है। मैं नहीं जानता कि इसे प्रमाण के रूप में कौन ग्रहण करेगा।
आमा-हेन येबा केह'बातुल' हय । एइ-दृष्टे भागवतेर अर्थ जानय” ॥
३२३॥
यदि कोई मेरे ही समान पागल बनता है, तो इस विधि से वह भी श्रीमद्भागवत के अर्थ को समझ सकता है।
पुनः सनातन कहे झुड़ि' दुइ करे । प्रभु आज्ञा दिला 'वैष्णव-स्मृति' करिबारे ।। ३२४॥
हाथ जोड़कर सनातन गोस्वामी ने कहा, हे प्रभु, आपने मुझे वैष्णवों के कार्यकलापों के विषय में एक निर्देशिका ( स्मृति ) लिखने का आदेश दिया है।
मुजिनीच-जाति, किछु ना जानों आचार ।मो-हैते कैछे हय स्मृति-परचार ॥
३२५ ॥
मैं अत्यन्त नीच व्यक्ति हूँ। मुझे अच्छे आचरण का तनिक भी ज्ञान नहीं है। मेरे लिए वैष्णवों के कार्यकलापों के विषय में प्रामाणिक निर्देश लिखना कैसे संभव हो सकता है? सूत्र करि' दिशा यदि करह उपदेश ।आपने करह यदि हृदये प्रवेश ॥
३२६॥
तब सनातन गोस्वामी ने महाप्रभु से निवेदन किया, कृपया आप स्वयं मुझे बतायें कि मैं वैष्णव आचरण के विषय में इस कठिन ग्रन्थ को कैसे लिखें। कृपया आप मेरे हृदय में प्रकट हों।
तबे तार दिशा स्फुरे मो-नीचेर हृदय ।ईश्वर तुमि,——ये कराह, सेइ सिद्ध हय ॥
३२७॥
यदि आप मेरे हृदय में प्रकट हों और इस पुस्तक को लिखने के लिए स्वयं निर्देश दें, तब मैं निम्न जन्मा होते हुए भी आशा कर सकता हूँ कि इसे लिख पाऊँगा। आप ऐसा कर सकते हैं, क्योंकि आप स्वयं पूर्ण पुरुषोत्तम भगवान् हैं और आप जो आदेश देंगे वही पूर्ण है।
प्रभु कहे,-ये करिते करिबा तुमि मन ।।कृष्ण सेइ सेइ तोमा कराबे स्फुरण ॥
३२८॥
श्री चैतन्य महाप्रभु ने उत्तर दिया, “तुम जो भी करना चाहते हो, उसे कृष्ण-कृपा के बल पर सही-सही कर सकोगे। वे वास्तविक तात्पर्य प्रकट कर देंगे।
तथापि एइ सूत्रेर शुन दिग्दरशन । सकारण लिखि आदौ गुरु-आश्रयण ॥
३२९॥
चूँकि तुमने मुझसे संक्षेप रूपरेखा प्रदान करने के लिए कहा है, अतः इन कुछ संकेतों को सुनो। प्रारम्भ में यह बताओ कि प्रामाणिक गुरु की शरण किस तरह ग्रहण करनी चाहिए।
गुरु-लक्षण, शिष्य-लक्षण, दोंहार परीक्षण । सेव्य–भगवान्, सर्व-मन्त्र-विचारण ॥
३३०॥
| तुम्हारी पुस्तक में प्रामाणिक गुरु तथा प्रामाणिक शिष्य दोनों के लक्षण दिये जाने चाहिए। तब गुरु स्वीकार करने के पूर्व मनुष्य गुरु की स्थिति के विषय में आश्वस्त हो सकता है। इसी तरह गुरु शिष्य की स्थिति के बारे में आश्वस्त हो सकता है। पूर्ण पुरुषोत्तम भगवान् कृष्ण को आराध्य या सेव्य के रूप में वर्णित किये जाने चाहिए और तुम्हें कृष्ण, राम या भगवान् के अन्य किसी अंश की पूजा के बीजमन्त्र पर विचार करना चाहिए।
मन्त्र-अधिकारी, मन्त्र-सिद्ध्यादि-शोधन । दीक्षा, प्रातः-स्मृति-कृत्य, शौच, आचमन ॥
३३१॥
तुम्हें मन्त्र प्राप्त करने के लिए आवश्यक योग्यताएँ, मन्त्र की सिद्धि, मन्त्र की शुद्धि, दीक्षा, प्रातःकालीन कर्म, भगवान् का स्मरण, शुद्धता तथा मुख एवं शरीर के अन्य भागों की शुद्धता के विषय में चर्चा करनी चाहिए।
दन्त-धावन, स्नान, सन्ध्यादि वन्दन । गुरु-सेवा, ऊर्ध्व-पुण्ड्र-चक्रादि-धारण ।। ३३२॥
तुम्हें यह वर्णन करना चाहिए कि प्रातःकाल नियमित रूप से भक्त किसी तरह अपने दाँत साफ करे, स्नान करे, भगवान् की स्तुति करे और गुरु को नमस्कार करे। तुम्हें इसका भी वर्णन करना चाहिए कि वह गुरु की सेवा कैसे करे और अपने शरीर के बारह स्थानों पर ऊर्ध्वपुण्डू (तिलक ) लगाये और वह अपने शरीर पर भगवान् के पवित्र नामों को या भगवान् के चिह्नों-चक्र, गदा आदि-को कैसे अंकित करे।
गोपीचन्दन-माल्य-धृति, तुलसी-आहरण ।।वस्त्र-पीठ-गृह-संस्कार, कृष्ण-प्रबोधन ॥
३३३॥
इसके बाद तुम्हें यह वर्णन करना चाहिए कि भक्त को किस तरह शरीर को गोपीचन्दन से सजाना चाहिए, गले में कंठीमाला पहनना, तुलसी के पौधे से तुलसी दल एकत्र करना, अपने वस्त्र तथा वेदी को स्वच्छ करना, अपना घर साफ करना, मन्दिर जाना तथा किस तरह भगवान् कृष्ण का ध्यान आकृष्ट करने के लिए घंटा बजाना चाहिए।
पञ्च, षोड़श, पञ्चाशत् उपचारे अर्चन ।।पञ्च-काल पूजा आरति, कृष्णेर भोजन-शयन ॥
३३४॥
इसके उपरान्त तुम श्रीविग्रह की पूजा का भी वर्णन करना, जिसमें दिन में कम से कम पाँच बार कृष्ण को भोजन अर्पित किया जाए; कृष्ण को निश्चित समय में सुलाया जाए। तुम पाँच, सोलह या पचास वस्तुओं की सूची के अनुसार भगवान् की पूजा तथा आरती करने की विधि का भी वर्णन करना।
श्री-मूर्ति-लक्षण, आर शालग्राम-लक्षण । कृष्ण-क्षेत्र-यात्रा, कृष्ण-मूर्ति-दरशन ।। ३३५ ॥
उसमें अर्चाविग्रह तथा शालग्राम शिला के लक्षणों की विवेचना हो। मन्दिर में अर्चाविग्रहों के दर्शन तथा वृन्दावन, मथुरा तथा द्वारका जैसे पवित्र स्थानों की यात्रा करने की भी व्याख्या हो।
नाम-महिमा, नामापराध दूरे वर्जन । वैष्णव-लक्षण, सेवापराध-खण्डन ॥
३३६ ॥
तुम भगवन्नाम की महिमा का वर्णन करना और यह भी लिखना कि भगवन्नाम जपते समय होने वाले अपराधों का सावधानीपूर्वक त्याग करना चाहिए। तुम्हें वैष्णव के लक्षणों का वर्णन करना चाहिए। अर्चाविग्रह की पूजा करते समय होने वाले सभी प्रकार के अपराधों ( सेवापराध) को त्याग देने या उन्हें निष्प्रभावित करने की भी विवेचना होनी चाहिए।
शङ्ख-जल-गन्ध-पुष्प-धूपादि-लक्षण ।जप, स्तुति, परिक्रमा, दण्डवत् वन्दन ॥
३३७॥
पूजा सामग्री-यथा जल, शंख, फूल, धूप ( अगरबत्ती ) तथा दीपक का वर्णन किया जाए। तुम धीरे धीरे जप करने, स्तुति करने, प्रदक्षिणा करने तथा नमस्कार करने का भी उल्लेख करना। इन सबका ठीक से वर्णन करना।
पुरश्चरण-विधि, कृष्ण-प्रसाद-भोजन ।अनिवेदित-त्याग, वैष्णव-निन्दादि-वर्जन ॥
३३८॥
अन्य उल्लेखनीय बातें हैं-पुरश्चरण करने की विधि, कृष्ण प्रसाद ग्रहण करना, अनिवेदित भोजन का त्याग तथा भगवद्भक्तों की निन्दा न करना।
साधु-लक्षण, साधु-सङ्ग, साधु-सेवन । असत्सङ्ग-त्याग, श्री-भागवत-श्रवण ॥
३३९॥
तुम्हें भक्त के लक्षण, भक्तों की संगति करने की विधि, सेवा द्वारा भक्त को प्रसन्न करने की विधि तथा अभक्तों के संग का त्याग करने की विधि का वर्णन करना चाहिए। इसके उपरान्त नियमित रूप में श्रीमद्भागवत्-पाठ श्रवण के महत्त्व की भी व्याख्या होनी चाहिए।
दिन-कृत्ये, पक्ष-कृत्य, एकादश्यादि-विवरण । मास-कृत्य, जन्माष्टम्यादि-विधि-विचारण ॥
३४०॥
नित्य कर्तव्यों का वर्णन करना चाहिए और पाक्षिक कृत्य का भी-विशेषतया एकादशी व्रत रखने की विधि का भी वर्णन करना चाहिए। तुम्हें मासिक कृत्यों का, विशेषतया जन्माष्टमी, रामनवमी तथा नृसिंह-चतुर्दशी जैसे उत्सवों को मनाने का भी वर्णन करना चाहिए।
एकादशी, जन्माष्टमी, वामन-द्वादशी । श्री-राम-नवमी, आर नृसिंह-चतुर्दशी ॥
३४१॥
एकादशी, जन्माष्टमी, वामनद्वादशी, रामनवमी तथा नृसिंह चतुर्दशी-इन सबका वर्णन करना चाहिए।
एइ सबे विद्धा-त्याग, अविद्धा-करण । अकरणे दोष, कैले भक्तिर लम्भन ॥
३४२॥
तुम्हें संस्तुति करनी चाहिए कि मिश्रित एकादशी से बचा जाए और शुद्ध एकादशी मनाई जाए। तुम्हें इसके न मनाने से होने वाले दोष का भी वर्णन करना चाहिए। इन बातों के विषय में सतर्कता की आवश्यकता है। यदि सतर्क नहीं रहा जायेगा, तो भक्ति की उपेक्षा होगी।
सर्वत्र प्रमाण दिबे पुराण-वचन ।। श्री-मूर्ति-विष्णु-मन्दिर-करण-लक्षण ॥
३४३ ॥
तुम वैष्णव-आचरण, वैष्णव-मन्दिरों तथा अर्चाविग्रहों की स्थापना के विषय में या अन्य बातों के विषय में जो भी कहो, उसकी पुष्टि पुराणों के प्रमाण से होनी चाहिए।
‘सामान्य' सदाचार, आर 'वैष्णव'-आचार । कर्तव्याकर्तव्य सब 'स्मार्त' व्यवहार ॥
३४४॥
तुम्हें वैष्णव के आचरण एवं कार्यों का सामान्य तथा विशिष्ट वर्णन प्रस्तुत करना चाहिए। तुम करणीय तथा अकरणीय बातों की भी रूपरेखा प्रस्तुत करो। इन सबका वर्णन विधि एवं शिष्टाचार के रूप में होना चाहिए।
एइ सङ्क्षेपे सूत्र कहिलै दिग्दरशन । ग्रबे तुमि लिखिबा, कृष्ण कराबे स्फुरण ॥
३४५ ॥
इस प्रकार मैंने वैष्णव विधि-विधानों की संक्षिप्त रूपरेखा दी है। मैंने यह सब संक्षेप में कहा है, जिससे तुम्हें कुछ निर्देश मिल सके। जय तुम इस विषय में लिखोगे, तो कृष्ण तुम्हें आध्यात्मिक रूप से जाग्रत करके तुम्हारी सहायता करेंगे।
एइ त कहिलु प्रभुर सनातने प्रसाद ।। याहार श्रवणे चित्तेर खण्डे अवसाद ॥
३४६॥
अनुवादे इस प्रकार मैंने सनातन गोस्वामी पर श्री चैतन्य महाप्रभु की कृपा का वर्णन किया है। जब कोई इन कथाओं को सुनेगा, तो उसके हृदय के सारे कलुष धुल जायेंगे।
निज-ग्रन्थे कर्णपूर विस्तार करिया ।। सनातने प्रभुर प्रसाद राखियाछे लिखिया ॥
३४७॥
प्रामाणिक कवि कवि-कर्णपूर ने चैतन्य-चन्द्रोदय-नाटक नामक एक ग्रन्थ लिखा है। इसमें बताया गया है कि श्री चैतन्य महाप्रभु ने किस तरह अपनी विशेष कृपा से सनातन गोस्वामी को आशीर्वाद दिया।
गौड़ेन्द्रस्य सभा-विभूषण-मणिस्त्यक्त्वा य ऋद्धां श्रियं| रूपस्याग्रज एष एव तरुणीं वैराग्य-लक्ष्मीं दधे । अन्तर्भक्ति-रसेन पूर्ण-हृदयो बाह्येऽवधूताकृतिः।शैवालैः पिहितं महा-सर इव प्रीति–प्रदस्तद्विदाम् ॥
३४८॥
| श्रील रूप गोस्वामी के बड़े भाई श्रील सनातन गोस्वामी बंगाल के शासक हुसेन शाह की सरकार में अत्यन्त महत्त्वपूर्ण मन्त्री थे और वे उस सभा के अत्यन्त उज्वल मणि माने जाते थे। उनके पास राजकीय पद का सारा ऐश्वर्य था, किन्तु उन्होंने वैराग्य की तरुणी देवी को अंगीकार करनेके लिए अपना सर्वस्व त्याग दिया। यद्यपि बाहर से वे ऐसे साधु लगते थे जिसने सर्वस्व त्याग दिया हो, किन्तु उनका हृदय भक्ति के आनन्द से ओतप्रोत था। इस तरह वे काई से आच्छादित गहरे सरोवर के समान थे। वे उन समस्त भक्तों के लिए आनन्द के विषय थे, जो भक्ति के विज्ञान को जानते थे।
तं सनातनमुपागतमक्ष्णोर्दृष्ट-मात्रमतिमात्र-दयार्द्रः ।। आलिलिङ्ग परिघायत-दोभ्या॑ ।सानुकम्पमथ चम्पक-गौरः ॥
३४९॥
जैसे ही सनातन गोस्वामी श्री चैतन्य महाप्रभु के समक्ष आये, वैसे ही वे उन्हें देखते ही दयार्द्र हो उठे। सुनहले चम्पक फूल के वर्ण वाले महाप्रभु ने अपनी बाँहों में भरकर उनका आलिंगन किया और अत्यधिक स्नेह व्यक्त किया।
कालेन वृन्दावन-केलि-वार्तालुप्तेति तां ख्यापयितुं विशिष्य ।। कृपामृतेनाभिषिषेच देवस्तत्रैव रूपं च सनातनं च ॥
३५०॥
काल के प्रभाव से वृन्दावन में कृष्ण-लीलाओं का दिव्य समाचार प्रायः विलुप्त हो चुका था। उन दिव्य लीलाओं प्रस्थापित करने के लिए श्री चैतन्य महाप्रभु ने श्रील रूप गोस्वामी तथा सनातन गोस्वामी को अपनी कृपारूपी अमृत से शक्ति प्रदान की, जिससे वे वृन्दावन में यह कार्य पूरा कर सकें।
एइ त कहिलॆ सनातने प्रभुर प्रसाद ।ग्राहार श्रवणे चित्तेर खण्डे अवसाद ॥
३५१॥
इस तरह मैंने श्री चैतन्य महाप्रभु द्वारा सनातन गोस्वामी पर कृपा प्रदान करने का वर्णन किया है। यदि कोई इसे सुनेगा, तो उसके हृदय को सारा विषाद लुप्त हो जायेगा।
कृष्णेर स्वरूप-गणेर सकल हय 'ज्ञान' । विधि-राग-मार्गे 'साधन-भक्ति'र विधान ॥
३५२॥
सनातन गोस्वामी को दिये गये इन उपदेशों को पढ़कर कृष्ण के विविध अंशों तथा वैधी एवं रागानुगा भक्ति की विधियों से पूरी तरा। अवगत हुआ जा सकेगा। इस तरह प्रत्येक वस्तु पूरी तरह से जानी जा सकती है।
‘कृष्ण-प्रेम', 'भक्ति-रस', 'भक्तिर सिद्धान्त' ।इहार श्रवणे भक्त जानेन सब अन्त ॥
३५३ ॥
इन उपदेशों को पढ़कर शुद्ध भक्त कृष्ण-प्रेम, भक्ति-रस तथा भनि के निष्कर्ष को समझ सकता है। इन उपदेशों का अध्ययन करके व्यक्ति इन बातों के अन्तिम निष्कर्ष को अच्छी तरह समझ सकता है।
श्री-चैतन्य-नित्यानन्द-अद्वैत-चरण ।। याँर प्राण-धन, सेइ पाय एइ धन ॥
३५४॥
इन उपदेशों के निष्कर्ष को वही जान सकता है, जिसके लिए श्री बैतन्य महाप्रभु, नित्यानन्द प्रभु तथा अद्वैत प्रभु के चरणकमल ही जीवन तथा प्राण हैं।
श्री-रूप-रघुनाथ-पदे ग्रार आश ।।चैतन्ये-चरितामृत कहे कृष्णदास ॥
३५५ ॥
श्री रूप तथा श्री रघुनाथ के चरणकमलों में प्रार्थना करते हुए एवं सदैव उनकी कृपा की कामना करते हुए मैं कृष्णदास उनके चरणचिह्न पर चलकर श्रीचैतन्य-चरितामृत का वर्णन कर रहा हूँ।
