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अध्याय पच्चीसवाँ: वाराणसी के सभी निवासी वैष्णव कैसे बने?

वैष्णवी-कृत्य सन्यासि-मुखान्काशी-निवासिनः । सनातनं सु-संस्कृत्य प्रभुर्तीलाद्रिमागमत् ॥

१॥

वाराणसी के समस्त निवासियों को, जिनमें संन्यासी मुख्य थे, वैष्णव बना लेने के बाद तथा वाराणसी में सनातन गोस्वामी को पूरी तरह शिक्षा और उपदेश देने के बाद, श्री चैतन्य महाप्रभु जगन्नाथ पुरी लौट गये।

जय जय श्री-चैतन्य जय नित्यानन्द । जयाद्वैत-चन्द्र जय गौर-भक्त-वृन्द ॥

२॥

श्री चैतन्य महाप्रभु की जय हो! श्री नित्यानन्द प्रभु की जय हो! अद्वैतचन्द्र की जय हो तथा श्री चैतन्य महाप्रभु के समस्त भक्तों की जय हो! एइ मत महाप्रभु दुइ मास पर्यन्त । शिखाइला ताँरै भक्ति-सिद्धान्तेर अन्त ॥

३॥

श्री चैतन्य महाप्रभु ने लगातार दो मास तक श्री सनातन गोस्वामी को भक्ति के सारे सिद्धान्तों की शिक्षा प्रदान की।

‘परमानन्द कीर्तनीया'–शेखरेर सङ्गी ।प्रभुरे कीर्तन शुनाय, अति बड़ रङ्गी ॥

४॥

जब तक श्री चैतन्य महाप्रभु वाराणसी में रहे, चन्द्रशेखर के मित्र परमानन्द कीर्तनिया हरे कृष्ण महामन्त्र तथा अन्य गीतों का कीर्तन बड़े ही विनोदपूर्ण ढंग से श्री चैतन्य महाप्रभु को सुनाया करते थे।

सन्यासीर गण प्रभुरे ग्रदि उपेक्षिल ।।भक्त-दुःख खण्डाइते तारे कृपा कैल ॥

५॥

जब वाराणसी में मायावादी संन्यासियों ने श्री चैतन्य महाप्रभु की आलोचना की, तो महाप्रभु के भक्त अत्यन्त दुखित हुए। अतः श्री चैतन्य महाप्रभु ने उन्हें तुष्ट करने के लिए उन संन्यासियों पर अपनी कृपा प्रदर्शित की।

सन्यासीरे कृपा पूर्वे लिखियाछों विस्तारिया ।उद्देशे कहिये इहाँ सङ्क्षेप करिया ॥

६ ॥

आदिलीला के सातवें अध्याय में वाराणसी में श्री चैतन्य महाप्रभु द्वारा संन्यासियों के उद्धार का विस्तृत वर्णन मैं पहले ही कर चुका हूँ, किन्तु इस अध्याय में मैं उसको संक्षेप में दुहराऊँगा।

ग्राहाँ ताहाँ प्रभुर निन्दा करे सन्यासीर गण ।। शुनि' दुःखे महाराष्ट्रीय विप्र करये चिन्तन ॥

७॥

जब वाराणसी में मायावादी संन्यासी जगह-जगह श्री चैतन्य महाप्रभु की निन्दा कर रहे थे, तो एक महाराष्ट्रीय ब्राह्मण इस निन्दा को सुनकर अत्यन्त दुखित होकर सोचने लगा।

प्रभुर स्वभाव,--येबा देखे सन्निधाने ।। 'स्वरूप' अनुभवि' ताँरै 'ईश्वर' करि' माने ॥

८॥

उस महाराष्ट्रीय ब्राह्मण ने सोचा, जो कोई भी श्री चैतन्य महाप्रभु के स्वभाव को ध्यान से देखता है, वह तुरन्त ही उनके व्यक्तित्व का अनुभव करके उन्हें परम ईश्वर रूप में स्वीकार कर लेता है।

कोन प्रकारे पारों ग्रदि एकत्र करते ।। इहा देखि' सन्यासि-गण हबे इँहार भक्ते ॥

९॥

यदि मैं किसी तरह सारे संन्यासियों को एक साथ इकट्टे कर सकें, तो वे निश्चय ही महाप्रभु के व्यक्तिगत गुणों को देखकर उनके भक्त बन जायेंगे।

वाराणसी-वास आमार हय सर्व-काले । सर्व-काल दुःख पाब, इहा ना करिले ॥

१०॥

मुझे अपने शेष जीवन-भर वाराणसी में निवास करना होगा। यदि मैं इस योजना को पूरा न कर सका, तो मैं निश्चय ही मानसिक क्लेश उठाता रहूँगा।

एत चिन्ति' निमन्त्रिल सन्यासीर गणे । तबे सेइ विप्र आइल महाप्रभुर स्थाने ॥

११॥

इस तरह सोचते हुए उस महाराष्ट्रीय ब्राह्मण ने वाराणसी के समस्त संन्यासियों को आमन्त्रित किया। ऐसा करने के बाद अन्त में वह श्री चैतन्य महाप्रभु को आमन्त्रित करने पहुँचा।

हेन-काले निन्दा शुनि' शेखर, तपन ।।दुःख पाञा प्रभु-पदे कैला निवेदन ॥

१२॥

तभी चन्द्रशेखर तथा तपन मिश्र दोनों ने श्री चैतन्य महाप्रभु के विषय में निन्दनीय आलोचना सुनी, तो वे अत्यन्त दुःखी हुए। वे श्री चैतन्य महाप्रभु के चरणकमलों में एक निवेदन करने आये।

भक्त-दुःख देखि' प्रभु मनेते चिन्तिल ।। सन्यासीर मन फिराइते मन हइल ॥

१३॥

उन्होंने विनती की और श्री चैतन्य महाप्रभु ने अपने भक्तों का दुःख देखकर मायावादी संन्यासियों का मन फिराने का निश्चय किया।

हेन-काले विप्र आसि’ करिल निमन्त्रण । अनेक दैन्यादि करि' धरिल चरण ॥

१४॥

जब श्री चैतन्य महाप्रभु मायावादी संन्यासियों से मिलने के विषय में गम्भीरतापूर्वक विचार कर रहे थे तभी वह महाराष्ट्रीय ब्राह्मण उनके पास पहुँचा। उसने अत्यन्त विनयपूर्वक निमन्त्रण दिया और श्री चैतन्य महाप्रभु के चरणकमलों का स्पर्श किया।

तबे महाप्रभु ताँर निमन्त्रण मानिला । आर दिन मध्याह्न करि' ताँर घरे गेला ॥

१५॥

श्री चैतन्य महाप्रभु ने उसका निमन्त्रण स्वीकार कर लिया और अगले दिन अपने दोपहर के कार्यों से निवृत्त होकर वे उस ब्राह्मण के घर गये।

ताहाँ ग्रैछे कैला प्रभु सन्यासीर निस्तार। पञ्च-तत्त्वाख्याने ताही करियाछि विस्तार ॥

१६॥

मैं पंचतत्त्व-श्री चैतन्य महाप्रभु, श्री नित्यानन्द प्रभु, अद्वैत प्रभु, गदाधर प्रभु तथा श्रीवास-के यश का वर्णन करते समय आदिलीला के सातवें अध्याय में श्री चैतन्य महाप्रभु द्वारा मायावादी संन्यासियों के उद्धार का पहले ही वर्णन कर चुका हूँ।

ग्रन्थ बाड़े, पुनरुक्ति हय त' कथन । ताहाँ ये ना लिखिलँ, ताहा करिये लिखन ॥

१७ ॥

चूँकि आदिलीला के सातवें अध्याय में मैं इस घटना का विस्तार से वर्णन कर चुका हूँ, अतः दुबारा वर्णन करके इस पुस्तक के आकार को बढ़ाना नहीं चाहता। फिर भी जो कुछ वहाँ वर्णन करने से रह गया था, उसका समावेश मैं इस अध्याय में करने का प्रयास करूंगा।

ये दिवस प्रभु सन्यासीरे कृपा कैल ।से दिवस हैते ग्रामे कोलाहल हैल ॥

१८॥

जिस दिन से श्री चैतन्य महाप्रभु ने मायावादी संन्यासियों पर कृपा प्रदर्शित की, तब से वाराणसी के निवासियों के बीच इस घटना के विषय में प्रचुर चर्चाएँ होने लगीं।

लोकेर सङ्घट्ट आइसे प्रभुरे देखिते ।।नाना शास्त्रे पण्डित आइसे शास्त्र विचारिते ॥

१९॥

उस दिन से लोगों के दल के दल श्री चैतन्य महाप्रभु को देखने के लिए आने लगे और विविध शास्त्रों के पण्डित महाप्रभु से विविध विषयों पर चर्चा करने लगे।

सर्व-शास्त्र खण्डि' प्रभु' भक्ति' करे सार । सयुक्तिक वाक्ये मन फिराय सबार ॥

२०॥

जब लोग विविध शास्त्रों के सिद्धान्तों की चर्चा करने श्री चैतन्य महाप्रभु के पास आने लगे, तो महाप्रभु ने उनके मिथ्या निष्कर्षों को खण्डित करके भगवद्भक्ति की प्रधानता स्थापित की। उन्होंने विनम्रतापूर्वक तर्क द्वारा उनके मनों को बदल दिया।

उपदेश लञा करे कृष्ण-सङ्कीर्तन ।। सर्व-लोक हासे, गाय, करये नर्तन ॥

२१॥

श्री चैतन्य महाप्रभु से उपदेश पाकर लोग हरे कृष्ण महामन्त्र का कीर्तन करने लगे। इस तरह सारे व्यक्ति महाप्रभु के साथ साथ हँसने, कीतर्न करने तथा नृत्य करने लगे।

प्रभुरे प्रणत हैल सन्यासीर गण । आत्म-मध्ये गोष्ठी करे छाड़ि' अध्ययन ॥

२२॥

सभी मायावादी संन्यासियों ने श्री चैतन्य महाप्रभु को नमस्कार किया और तब वेदान्त तथा मायावाद दर्शन विषयक अपने अध्ययनों को त्यागकर वे उनके आन्दोलन की चर्चा करने लगे।

प्रकाशानन्देर शिष्य एक ताँहार समान ।सभा-मध्ये कहे प्रभुर करिया सम्मान ॥

२३ ॥

श्री प्रकाशानन्द सरस्वती का एक शिष्य जो अपने गुरु के ही समान विद्वान था, उस सभा में श्री चैतन्य महाप्रभु का सम्मान करते हुए बोला।

श्री-कृष्ण-चैतन्य हय 'साक्षात्नारायण' ।‘व्यास-सूत्रेर' अर्थ करेन अति-मनोरम ॥

२४॥

उसने कहा, श्री चैतन्य महाप्रभु साक्षात् भगवान् नारायण हैं। जब वे वेदान्त-सूत्र की व्याख्या करते हैं, तो वह बहुत ही सुन्दर होती है।

उपनिषदेर करेन मुख्यार्थ व्याख्यान ।शुनिया पण्डित-लोकेर जुड़ाय मन-काण ॥

२५॥

श्री चैतन्य महाप्रभु उपनिषदों का सीधा अर्थ बतलाते हैं। जब सारे विद्वान इसे सुनते हैं, तो उनके मन तथा कान सुनकर सन्तुष्ट हो जाते हैं।

सूत्र-उपनिषदेर मुख्यार्थ छाड़िया ।आचार्य 'कल्पना' करे आग्रह करिया ॥

२६॥

शंकराचार्य तो वेदान्त-सूत्र तथा उपनिषदों के मुख्यार्थ को छोड़कर किसी और अर्थ की कल्पना करते हैं।

आचार्य-कल्पित अर्थ ये पण्डित शुने ।मुखे ‘हय' ‘हय' करे, हृदय ना माने ॥

२७॥

शंकराचार्य की सारी व्याख्याएँ काल्पनिक हैं। ऐसी काल्पनिक व्याख्याओं को पण्डित मौखिक रूप से स्वीकार तो कर लेते हैं, किन्तु वे उनके हृदय को नहीं भातीं।

श्री-कृष्ण-चैतन्य-वाक्य दृढ़ सत्य मानि ।। कलि-काले सन्यासे 'संसार' नाहि जिनि ॥

२८॥

श्रीकृष्ण चैतन्य महाप्रभु के शब्द दृढ़ तथा विश्वसनीय हैं और मैं उन्हें सत्य मानता हूँ। इस कलियुग में मात्र औपचारिक रूप से संन्यास ग्रहण करने से कोई व्यक्ति भवबन्धन से छूट नहीं सकता।

हरेर्नाम-श्लोकेर येइ करिला व्याख्यान । सेइ सत्य सुखदार्थ परम प्रमाण ॥

२९॥

हरेर्नाम हरेर्नाम' से प्रारम्भ होने वाले श्लोक की जो व्याख्या श्री चैतन्य महाप्रभु ने की है, वह न केवल कानों को सुख देने वाली है, अपितु प्रबल वास्तविक प्रमाण है।

भक्ति विना मुक्ति नहे, भागवते कय ।।कलि-काले नामाभासे सुखे मुक्ति हय ॥

३०॥

इस कलियुग में भगवद्भक्ति किये बिना कोई व्यक्ति मुक्ति नहीं पा सकता। इस युग में यदि कोई कृष्ण के नाम का ठीक से कीर्तन नहीं करता, तो भी उसे आसानी से मुक्ति मिल जाती है।

यः-सृतिं भक्तिमुदस्य ते विभो ।क्लिश्यन्ति ये केवल-बोध-लब्धये । तेषामसौ क्लेशल एव शिष्यते।नान्यद् यथा स्थूल-तुषावघातिनाम् ॥

३१॥

हे प्रभु, आपकी भक्ति ही एकमात्र शुभ मार्ग है। यदि कोई इसका परित्याग केवल शुष्क ज्ञान के लिए अथवा सारे जीव आत्मा हैं और भौतिक जगत् मिथ्या है-इस धारणा के लिए कर देता है, तो उसे बहुत कष्ट मिलता है। उसे केवल कष्टप्रद तथा अशुभ कर्म ही मिलते हैं। उसके कार्य उस पुआल को पीटने के समान है, जो धान से रहित है। उसका सारा श्रम निष्फल जाता है।'

येऽन्येऽरविन्दाक्ष विमुक्त-मानिनस्त्वय्यस्त-भावादविशुद्ध-बुद्धयः ।। आरुह्य कृच्छेण परं पदं ततः।पतन्त्यधोऽनादृत-मुष्मदङ्घ्रयः ३२ ।। हे कमलसमान नेत्रों वाले, जो लोग यह सोचते हैं कि वे इस जीवन में मुक्त हो चुके हैं, किन्तु जो आपकी भक्ति से रहित हैं, वे शुद्ध बुद्धि से हीन हैं। यद्यपि वे कठोर तपस्या करके आध्यात्मिक पद अर्थात् निर्विशेष ब्रह्म की अनुभूति प्राप्त कर लेते हैं, किन्तु वे पुनः नीचे गिर जाते हैं, क्योंकि वे आपके चरणकमलों की पूजा की उपेक्षा करते हैं।'

‘ब्रह्म'-शब्दे कहे ‘षडू-ऐश्वर्य-पूर्ण भगवान्' ।। ताँरै निर्विशेष' स्थापि, ‘पूर्णता' हय हान ॥

३३॥

ब्रह्म' (महानतम) शब्द पूर्ण पुरुषोत्तम भगवान् को सूचित करता है, जो छहों ऐश्वर्यों से युक्त हैं। किन्तु यदि हम एक पक्षीय निर्विशेष मत स्वीकार करें, तो उनकी पूर्णता घट जाती है।

श्रुति-पुराण कहे कृष्णेर चिच्छक्ति-विलास ।ताहा नाहि मानि, पण्डित करे उपहास ॥

३४॥

वैदिक साहित्य, उपनिषद, ब्रह्मसूत्र तथा सारे पुराण भगवान् की आध्यात्मिक शक्ति के कार्यकलापों का वर्णन करते हैं। यदि मनुष्य भगवान् के व्यक्तिगत कार्यकलापों को स्वीकार नहीं कर सकता, तो वह मूर्खतावश उनका उपहास करता है और निर्विशेष विवरण प्रस्तुत करता हैं।

चिदानन्द कृष्ण-विग्रह ‘मायिक' करि' मानि । एइ बड़ ‘पाप’, सत्य चैतन्येर वाणी ॥

३५॥

मायावादी भगवान् के साकार रूप को आध्यात्मिक तथा आनन्दमय नहीं मानते। यह एक बड़ा पाप है। श्री चैतन्य महाप्रभु के कथन वास्तव में प्रामाणिक हैं।

नातः परं परम यद्भवतः स्वरूपम्।आनन्द-मात्रमविकल्पमविद्ध-वर्चः । पश्यामि विश्व-सृजमेकमविश्वमात्मन्भूतेन्द्रियात्मकमदस्त उपाश्रितोऽस्मि ॥

३६॥

हे परम पूर्ण, मैं इस समय जिस दिव्य रूप का दर्शन कर रहा हूँ, वह दिव्य आनन्द से परिपूर्ण है। यह बहिरंगा शक्ति से कलुषित नहीं है। यह तेज से पूर्ण है। हे प्रभु, इससे बढ़कर आपके विषय में दूसरी कोई समझ नहीं है। आप परमात्मा तथा इस भौतिक जगत् के स्रष्टा हैं, किन्तु आप इस भौतिक जगत् से सम्बन्धित नहीं हैं। आप सृजित रूप तथा विविधता से सर्वथा भिन्न हैं। मैं इस समय आपके जिस रूप का दर्शन कर रहा हूँ, उसी की शरण ग्रहण करता हूँ। यह स्वरूप समस्त जीवों तथा उनकी इन्द्रियों का आदि उद्गम है।

दृष्टं श्रुतं भूत-भवद्भविष्यत्स्थास्तुश्चरिष्णुर्महदल्पकं वा । विनाच्युताद्वस्तु-तरां न वाच्यंस एव सर्वं परमात्म-भूतः ॥

३७॥

पूर्ण पुरुषोत्तम भगवान् श्रीकृष्ण समस्त कारणों के कारण हैं। वे भूत, वर्तमान तथा भविष्य हैं एवं वे चर तथा अचर हैं। वे महानतम तथा लघुतम हैं और वे दृश्य तथा प्रत्यक्ष अनुभवगम्य हैं। वे वैदिक साहित्य में विख्यात हैं। हर वस्तु कृष्ण है और उनके बिना कहीं कोई अस्तित्व नहीं है। वे समस्त ज्ञान के मूल हैं और वे समस्त शब्दों द्वारा ज्ञेय हैं।'

तद्वा इदं भुवन-मङ्गल मङ्गलोय | ध्याने स्म नो दरशितं त उपासकानाम् । तस्मै नमो भगवतेऽनुविधेम तुभ्यंग्रोऽनादृतो नरक-भाग्भिरसत्प्रसङ्गैः ॥

३८ ॥

हे सर्व-मंगलमय! हमारे कल्याण के लिए आप हमारे ध्यान में प्रकट होते हैं। इस प्रकार आप अपने दिव्य रूप को प्रकट करके हमारी पूजा सम्भव बनाते हैं। हम आप परम पुरुष को सादर नमस्कार करते हैं। और आपकी पूजा करते हैं, जिसे निर्विशेषवादी अल्पज्ञान के कारण नहीं । मानते। इस तरह वे नरक को जाने योग्य हैं।

अवजानन्ति मां मूढ़ा मानुषीं तनुमाश्रितम् ।। परं भावमजानन्तो मम भूत-महेश्वरम् ॥

३९॥

मूर्ख लोग मेरा अनादर करते हैं, क्योंकि मैं मनुष्य की तरह प्रकट होता हूँ। वे समस्त कारणों के कारण, भौतिक शक्ति के स्रष्टा के रूप में मेरी परम स्थिति को नहीं जानते।।

तानहं द्विषतः क्रूरान्संसारेषु नराधमान् ।। क्षिपाम्यजत्रमशुभानासुरीष्वेव योनिषु ॥

४०॥

जो लोग मेरे स्वरूप से ईष्र्या करते हैं, जो क्रूर तथा दुष्ट हैं और मनुष्यों में अधम हैं, उन्हें मैं निरन्तर नारकीय स्थिति में विविध आसुरी योनियों में डाल देता हूँ।

सूत्रेर परिणाम-वाद, ताहा ना मानिया । ‘विवर्त-वाद' स्थापे, 'व्यास भ्रान्त' बलिया ॥

४१॥

परिणामवाद (शक्ति का रूपान्तर) को न मानकर श्रीपाद शंकराचार्य ने इसके बहाने कि व्यासदेव ने त्रुटि की है, मोह के सिद्धान्त (विवर्तवाद) को स्थापित करना चाहा है।

एइ त' कल्पित अर्थ मने नाहि भाय । शास्त्र छाड़ि' कुकल्पना पाषण्डे बुझाय ॥

४२॥

श्रीपाद शंकराचार्य ने अपनी व्याख्या तथा कल्पित अर्थ दिये हैं। यह किसी भी विवेकवान व्यक्ति के मन को पसन्द नहीं आता। उन्होंने नास्तिकों को विश्वास दिलाने तथा उन्हें अपने वश में करने के लिए ऐसा किया है।

परमार्थ-विचार गेल, करि मात्र 'वाद' ।काहाँ मुक्ति पाब, काहाँ कृष्णेर प्रसाद ॥

४३॥

मायावादी इत्यादि नास्तिक दार्शनिक मुक्ति या कृष्ण-कृपा की परवाह नहीं करते। वे तो केवल नास्तिकवाद के पक्ष में गलत तर्क करते रहते हैं तथा झूठे वाद फैलाते रहते हैं। वे न तो आध्यात्मिक विषयों पर विचार करते हैं, न उनमें व्यस्त रहते हैं।

व्यास-सूत्रेर अर्थ आचार्य करियाछे आच्छादन । एइ हय सत्य श्री कृष्ण-चैतन्य-वचन ॥

४४॥

निष्कर्ष तो यह है कि शंकराचार्य की काल्पनिक व्याख्या से वेदान्त-सूत्र का अर्थ आच्छादित हो जाता है। श्रीकृष्ण चैतन्य महाप्रभु ने जो कुछ कहा है, वह पूर्णतया सत्य है।

चैतन्य-गोसाबि ग्रेइ कहे, सेइ मत सार।।आर यत मत, सेइ सब छारखार ॥

४५ ॥

श्री चैतन्य महाप्रभु जो भी अर्थ लगाते हैं वही पूर्ण है। अन्य कोई व्याख्या विकृति मात्र है।

एत कहि' सेइ करे कृष्ण-सङ्कीर्तन ।।शुनि' प्रकाशानन्द किछु कहेन वचन ॥

४६॥

यह कहकर प्रकाशानन्द सरस्वती का शिष्य कृष्ण-नाम का कीर्तन करने लगा। उसे सुनकर प्रकाशानन्द सरस्वती ने निम्नलिखित बात कही।

आचार्गेर आग्रह–'अद्वैत-वाद' स्थापिते ।ताते सूत्रार्थ व्याख्या करे अन्य रीते ॥

४७॥

प्रकाशानन्द सरस्वती ने कहा शंकराचार्य अद्वैतवाद दर्शन की स्थापना करने के लिए अत्यन्त उत्सुक थे। अतः उन्होंने अद्वैत दर्शन के समर्थन हेतु वेदान्त-सूत्र या वेदान्त-दर्शन की व्याख्या भिन्न ढंग से की।

'भगवत्ता' मानिले 'अद्वैत' ना याये स्थापन । अतएव सब शास्त्र करये खण्डन ॥

४८॥

यदि हम भगवान् के व्यक्तित्व को स्वीकार कर लें, तो उस दर्शन की स्थापना नहीं हो सकती, जो यह मानता है कि भगवान् तथा जीव एक हैं। इसलिए शंकराचार्य ने सभी प्रकार के शास्त्रों के विरुद्ध तर्क रखा और उनका खण्डन किया।

ग्रेइ ग्रन्थ-कर्ता चाहे स्व-मत स्थापिते । शास्त्रेर सहज अर्थ नहे ताँहा हैते ॥

४९॥

जो भी व्यक्ति अपना मत या दर्शन स्थापित करना चाहता है, वह प्रत्यक्ष व्याख्या के सिद्धान्तानुसार किसी शास्त्र की विवेचना नहीं कर सकता।

‘मीमांसक' कहे,'ईश्वर हय कर्मेर अङ्ग' ।।‘साङ्ख्य' कहे,–'जगतेर प्रकृति कारण-प्रसङ्ग’ ॥

५०॥

मीमांसावादी दार्शनिकों का मत है कि यदि ईश्वर हैं, तो वे हमारे सकाम कर्मों के अधीन हैं। इसी तरह सांख्य दार्शनिक जो प्रकट जगत् का विश्लेषण करते हैं, कहते हैं कि प्रकट जगत् का कारण भौतिक प्रकृति है।

'न्याय' कहे,—‘परमाणु हैते विश्व हय' ।।‘मायावादी' निर्विशेष-ब्रह्मे ‘हेतु' कय ॥

५१॥

न्याय के अनुयायी ( नैयायिक) मानते हैं कि परमाणु ही विश्व के प्राकट्य का कारण है और मायावादी चिन्तक मानते हैं कि निर्विशेष ब्रह्मतेज ही विश्व का कारण है।

पातञ्जल' कहे,–'ईश्वर हय स्वरूप-ज्ञान'। वेद-मते कहे ताँरे ‘स्वयं-भगवान्' ॥

५२॥

पातंजल दार्शनिकों का कहना है कि जब कोई स्वरूपसिद्ध हो जाता है, वह भगवान् को समझता है। इसी प्रकार वेदों तथा वेद मत के अनुसार भगवान् आदि कारण हैं।

छयेर छये मत व्यास कैला आवर्तन ।।सेइ सब सूत्र लञा 'वेदान्त'-वर्णन ॥

५३॥

इन छहों दार्शनिक मतों का अध्ययन करने के बाद व्यासदेव ने इन सबको वेदान्त दर्शन के अन्तर्गत सारभूत कर दिया।

‘वेदान्त'-मते,---ब्रह्म 'साकार' निरूपण ।।‘निर्गुण' व्यतिरेके तिंहो हय त’ ‘सगुण' ॥

५४॥

वेदान्त दर्शन के अनुसार परम सत्य एक पुरुष हैं। जब ‘निर्गुण'शब्द का प्रयोग होता है, तो यह समझना चाहिए कि भगवान् के गुण पूर्णतया आध्यात्मिक हैं।

परम कारण ईश्वर केह नाहि माने । स्व-स्व-मत स्थापे पर-मतेर खण्डने ॥

५५॥

उपर्युक्त दार्शनिकों में से कोई भी दार्शनिक समस्त कारणों के कारण पूर्ण पुरुषोत्तम भगवान् की परवाह नहीं करता। वे अन्यों के दार्शनिक मतों का खण्डन करने और अपने मत को स्थापित करने में ही सदैव लगे रहते हैं।

ताते छय दर्शन होते 'तत्त्व' नाहि जानि ।।‘महाजन' ग्रेइ कहे, सेइ 'सत्य' मानि ॥

५६॥

छहों दार्शनिक मतों के अध्ययन से परम सत्य तक नहीं पहुँचा जा सकता। इसलिए हमारा कर्तव्य है कि महाजनों के मार्ग का अनुसरण करें। वे जो भी कहते हैं, उसे ही परम सत्य के रूप में स्वीकार कर लेना चाहिए।

तर्कोऽप्रतिष्ठः श्रुतयो विभिन्नानासावृषिर्यस्य मतं न भिन्नम् । धर्मस्य तत्त्वं निहितं गुहायांमहाजनो येन गतः स पन्थाः ॥

५७॥

शुष्क तर्क अनिर्णीत होते हैं। जिस महापुरुष का मत अन्यों से भिन्न नहीं होता, वह महान् ऋषि नहीं माना जाता। नाना प्रकार के वेदों के अध्ययन-मात्र से कोई उस सही मार्ग पर नहीं आ सकता, जिससे धार्मिक सिद्धान्त समझे जाते हैं। इन धार्मिक सिद्धान्तों का वास्तविक सत्य तो शुद्ध स्वरूपसिद्ध व्यक्ति के हृदय में छिपा रहता है। फलतः जैसाकि शास्त्रों द्वारा पुष्टि होती है, मनुष्य को महाजनों के द्वारा बताये गये प्रगतिशील मार्ग को स्वीकार करना चाहिए।'

श्री-कृष्ण-चैतन्य-वाणी–अमृतेर धार । तिंहो ये कहये वस्तु, सेइ 'तत्त्व'- सार ॥

५८॥

श्री चैतन्य महाप्रभु के शब्द अमृत की धारा हैं। वे जिसे परम सत्य कहते हैं, वास्तव में वही समस्त आध्यात्मिक ज्ञान का सार है।

ए सब वृत्तान्त शुनि' महाराष्ट्रीय ब्राह्मण । प्रभुरे कहिते सुखे करिला गमन ॥

५९॥

इन सारे कथनों को सुनकर वह महाराष्ट्रीय ब्राह्मण खुशी-खुशी श्री चैतन्य महाप्रभु को बताने गया।

हेन-काले महाप्रभु पञ्च-नदे स्नान करि' ।। देखिते चलियाछेन 'बिन्दु-माधव हरि' ॥

६०॥

जब वह महाराष्ट्रीय ब्राह्मण चैतन्य महाप्रभु को मिलने गया, तब महाप्रभु पंचनद में स्नान करके बिन्दु माधव मन्दिर जा रहे थे।

पथे सेइ विप्र सब वृत्तान्त कहिले ।।शुनि' महाप्रभु सुखे ईषत् हासिल ॥

६१॥

जब महाप्रभु रास्ते में जा रहे थे, तब उस महाराष्ट्रीय ब्राह्मण ने उन्हें वह घटना सुनाई जो प्रकाशानन्द सरस्वती के दल में घटी थी। यह सुनकर श्री चैतन्य महाप्रभु सुखी होकर हँसने लगे।

माधव-सौन्दर्य देखि' आविष्ट हइला । अङ्गनेते आसि' प्रेमे नाचिते लागिला ॥

६२॥

बिन्दु माधव मन्दिर पहुँचकर श्री चैतन्य महाप्रभु बिन्दु माधव भगवान् का सौन्दर्य देखकर भावमय प्रेम में विभोर हो उठे। फिर वे मन्दिर के आँगन में नृत्य करने लगे।

शेखर, परमानन्द, तपन, सनातन ।चारि-जन मिलि' करे नाम-सङ्कीर्तन ॥

६३ ॥

श्री चैतन्य महाप्रभु के साथ चार जन थे-चन्द्रशेखर, परमानन्द पुरी, तपन मिश्र तथा सनातन गोस्वामी। वे सब हरे कृष्ण महामन्त्र का कीर्तन इस प्रकार कर रहे थे।

हरये नमः कृष्ण यादवाय नमः ।।गोपाल गोविन्द राम श्री-मधुसूदन ॥

६४॥

वे हरये नमः कृष्ण यादवाय नमः, गोपाल गोविन्द राम श्री मधुसूदन बोलकर कीर्तन कर रहे थे।

चौदिकेते लक्ष लोक बले ‘हरि' ‘हरि' ।।उठिल मङ्गल-ध्वनि स्वर्ग-मर्त्य भरि' ॥

६५॥

चारों दिशाओं में लाखों लोग हरि! हरि! बोल उठे। इस तरह तुमुल तथा मंगल ध्वनि से सारा ब्रह्माण्ड भर गया।

निकटे हरि-ध्वनि शुनि' परकाशानन्द ।देखिते कौतुके आइला लळा शिष्य-वृन्द ॥

६६॥

जब पास ही रह रहे प्रकाशानन्द सरस्वती ने हरे कृष्ण महामन्त्र की तुमुल ध्वनि सुनी, तो वे तथा उनके शिष्य तुरन्त ही महाप्रभु को देखने आये।

देखिया प्रभुर नृत्य, प्रेम, देहेर माधुरी ।। शिष्य-गण-सङ्गे सेइ बले 'हरि' ‘हरि' ॥

६७॥

जब प्रकाशानन्द सरस्वती ने महाप्रभु का दर्शन किया, तो वे स्वयं तथा उनके शिष्य भी श्री चैतन्य महाप्रभु के साथ कीर्तन करने लगे। प्रकाशानन्द सरस्वती महाप्रभु के नृत्य तथा उनके भावमय प्रेम एवं उनके शारीरिक सौन्दर्य से मुग्ध हो गये।

कम्प, स्वर-भङ्ग, स्वेद, वैवर्य, स्तम्भ ।। अश्रु-धाराय भिजे लोक, पुलक-कदम्ब ॥

६८ ॥

महाप्रभु के शरीर में भावमय आध्यात्मिक रूपान्तर (विकार) होने लगे। उनका शरीर काँपने लगा और उनकी वाणी अवरुद्ध हो गई। उन्हें पसीना आ गया, वे पीले पड़ गये और उनके आँसुओं की निरन्तर धारा से वहाँ पर खड़े सारे लोग भीग गये। महाप्रभु के शरीर में जो रोमांच ( पुलक) हुआ, वह कदम्ब पुष्पों जैसा प्रतीत हो रहा था।

हर्ष, दैन्य, चापल्यादि 'सञ्चारी' विकार । देखि' काशी-वासी लोकेर हैल चमत्कार ॥

६९ ॥

महाप्रभु के हर्ष तथा दैन्य को देखकर तथा उनकी भावविभोर बातें करते सुनकर सारे लोग चकित हुए। निस्सन्देह, बनारस ( काशी ) के सारे निवासियों ने महाप्रभु के शारीरिक विकारों को देखा और वे आश्चर्यचकित हो गये।

लोक-सङ्घट्ट देखि' प्रभुर ‘बाह्य' ग्रबे हैल । सन्यासीर गण देखि' नृत्य संवरिले ॥

७० ॥

जब श्री चैतन्य महाप्रभु को बाह्य चेतना आई, तो उन्होंने देखा कि अनेक मायावादी संन्यासी तथा अन्य लोग वहाँ एकत्रित हो गये हैं। अतः उन्होंने उस समय अपना नृत्य रोक दिया।

प्रकाशानन्देर प्रभु वन्दिला चरण ।प्रकाशानन्द आसि' ताँर धरिल चरण ॥

७१ ॥

कीतर्न बन्द करने के बाद दैन्य के महान् उदारहण श्री चैतन्य महाप्रभु ने प्रकाशानन्द सरस्वती के चरणों की वन्दना की। इस पर प्रकाशानन्द सरस्वती तुरन्त आगे आये और उन्होंने महाप्रभु के चरणकमल पकड़ लिये।

प्रभु कहे,‘तुमि जगद्गुरु पूज्यतम ।आमि तोमार ना हइ 'शिष्येर शिष्य' सम ॥

७२॥

जब प्रकाशानन्द सरस्वती ने महाप्रभु के चरणकमल पकड़ लिए, तो महाप्रभु ने कहा, हे महोदय, आप जगद्गुरु हैं, अतः आप परम पूज्य हैं। जहाँ तक मेरा प्रश्न है, मैं तो आपके शिष्यों के शिष्य के भी समान नहीं हैं।

छ हल्ला केने कर हीनेर वन्दन । आमार सर्व-नाश हय, तुमि ब्रह्म-सम ॥

७३॥

श्री चैतन्य महाप्रभु ने कहा, आप महान् आध्यात्मिक पुरुष हैं, अतः आपको मुझ जैसे व्यक्ति की पूजा नहीं करनी चाहिए। मैं तो बहुत ही तुच्छ हूँ। यदि आप ऐसा करेंगे, तो मेरी आध्यात्मिक शक्ति का ह्रास हो जायेगा, क्योंकि आप निर्विशेष ब्रह्म के तुल्य हैं।

यद्यपि तोमारे सब ब्रह्म-सम भासे । लोक-शिक्षा लागि' ऐछे करिते ना आइसे' ॥

७४॥

हे महोदय, आपके लिए हर व्यक्ति निर्विशेष ब्रह्म के पद पर है, किन्तु सामान्य जनों को प्रबुद्ध करने के लिए आपको ऐसा नहीं करना चाहिए।

तेंहो कहे, ‘तोमार पूर्वे निन्दा-अपराध ग्ने करिल ।तोमार चरण-स्पर्शे, सब क्षय गेल ॥

७५ ॥

प्रकाशानन्द सरस्वती ने उत्तर दिया, इसके पूर्व मैंने आपकी निन्दा करके आपके प्रति अनेक अपराध किये हैं, किन्तु अब आपके चरणों का स्पर्श करने से मेरे सारे अपराध नष्ट हो गये हैं।

जीवन्मुक्ता अपि पुनन्ति संसार-वासनाम् ।। यद्यचिन्त्य-महा-शक्तौ भगवत्यपराधिनः ॥

७६॥

यदि मुक्त कहलाने वाला व्यक्ति इस जीवन में अचिन्त्य शक्तियों के आगार पूर्ण पुरुषोत्तम भगवान् के प्रति अपराध करता है, तो वह पुनः नीचे गिर जायेगा और भौतिक भोग के लिए भौतिक वातावरण की इच्छा करेगा।'

स वै भगवतः श्रीमत्पाद-स्पर्श-हताशुभः ।। भेजे सर्प-वपुर्हित्वा रूपं विद्याधरार्चितम् ॥

७७॥

श्रीकृष्ण के चरणकमलों का स्पर्श पाकर वह सर्प तुरन्त ही अपने पापमय जीवन के कर्मफलों से मुक्त हो गया। इस तरह उसे सर्प ने अपना शरीर त्याग दिया और सुन्दर विद्याधर देवता का शरीर धारण कर लिया।

प्रभु कहे,–'विष्णु' ‘विष्णु', आमि क्षुद्र जीव हीन ।जीवे 'विष्णु' मानिएइ अपराध-चिह्न ॥

७८ ॥

जब प्रकाशानन्द सरस्वती ने श्रीमद्भागवत का श्लोक उधृत करते हुए अपनी बात सिद्ध करनी चाही, तो श्री चैतन्य महाप्रभु ने तुरन्त भगवान् विष्णु का नाम लेते हुए प्रतिरोध किया। तत्पश्चात् महाप्रभु ने अपने आपकोमहापतित जीव के रूप में प्रस्तुत करते हुए कहा, “यदि कोई पतित बद्ध जीवात्मा को विष्णु, भगवान् या अवतार के रूप में स्वीकार करता है, तो वह महान् अपराध करता है।

जीवे 'विष्णु' बुद्धि दूरे—येइ ब्रह्म-रुद्र-सम ।नारायणे माने तारे ‘पापण्डीते' गणन ॥

७९ ॥

श्री चैतन्य महाप्रभु ने आगे कहा, सामान्य जीव की क्या बात है, ब्रह्माजी तथा शिवजी को भी विष्णु या नारायण के समान नहीं माना जा सकता। यदि कोई ऐसा करता है, तो उसे अपराधी तथा नास्तिक समझा जाना चाहिए।

ग्रस्तु नारायणं देवं ब्रह्म-रुद्रादि दैवतैः ।। समत्वेनैव वीक्षेत स पाषण्डी भवेधुवम् ॥

८० ॥

जो व्यक्ति ब्रह्मा तथा शिव जैसे देवताओं को नारायण के समकक्ष मानता है, उसे पाषण्डी या अपराधी माना जाना चाहिए।'

प्रकाशानन्द कहे, तुमि साक्षात्भगवान् ।तबु यदि कर ताँर 'दास'-अभिमान ॥

८१॥

प्रकाशानन्द ने उत्तर दिया, आप साक्षात् पूर्ण पुरुषोत्तम भगवान् कृष्ण हैं। फिर भी आप अपने आपको उनका सनातन सेवक मान रहे हैं।

तबु पूज्य हओ, तुमि बड़ आमा हैते ।सर्व-नाश हय मोर तोमार निन्दाते ॥

८२॥

हे प्रभु, आप परमेश्वर हैं और यद्यपि आप अपने आपको भगवान् का दास मानते हैं, तो भी आप पूज्य हैं। आप मुझसे श्रेष्ठ हैं। चूंकि मैंनेआपकी निन्दा की है, अतएव मेरी सारी आध्यात्मिक उपलब्धियाँ नष्ट हो चुकी हैं।

मुक्तानामपि सिद्धानां नारायण-परायणः ।।सु-दुर्लभः प्रशान्तात्मा कोटिष्वपि महा-मुने ॥

८३ ॥

हे महर्षि, अज्ञान से मुक्त करोडों मुक्त पुरुषों में से तथा लगभग सिद्धि प्राप्त कर चुके करोड़ों सिद्धों में से शायद ही कोई एक नारायण का शुद्ध भक्त होता है। केवल ऐसा ही भक्त वास्तव में पूर्णतया तुष्ट तथा शान्त होता है।'

आयुः श्रियं शो धर्मं लोकानाशिष एव च ।।हन्ति श्रेयांसि सर्वाणि पुंसो महदतिक्रमः ॥

८४॥

जब कोई व्यक्ति महात्माओं से दुर्व्यवहार करता है, तो उसकी आयु, ऐश्वर्य, यश, धर्म, सम्पत्ति तथा सौभाग्य सभी नष्ट हो जाते हैं।'

नैषां मतिस्तावदुरुक्रमाद्मि | स्पृशत्यनर्थापगमो यदर्थः । महीयसां पाद-रजोऽभिषेकनिष्किञ्चनानां न वृणीत यावत् ॥

८५ ॥

जब तक मानव समाज उन महात्माओं अर्थात् भक्तों के चरणकमलों की धूल को धारण नहीं करता, जिन्हें भौतिक सम्पत्ति से कुछ लेना-देना नहीं होता, तब तक मनुष्य अपना ध्यान कृष्ण के चरणकमलों की ओर नहीं ले जा सकता। वे चरणकमल भौतिक जीवन की समस्त अवांछित कष्टप्रद स्थितियों का विनाश कर देते हैं।'

एबे तोमार पादाब्जे उपजिबे भक्ति ।तथि लागि' करि तोमार चरणे प्रणति ॥

८६॥

आज से मैं आपके चरणकमलों में भक्ति विकसित करूंगा। इसीलिए मैं आपके पास आया हूँ और आपके चरणकमलों पर गिरा हूँ।

एत बलि' प्रभुरे लञा तथाय वसिल ।।प्रभुरे प्रकाशानन्द पुछिते लागिल ॥

८७।। यह कहकर प्रकाशानन्द सरस्वती श्री चैतन्य महाप्रभु के साथ बैठ गये और महाप्रभु से इस प्रकार प्रश्न करने लगे।

मायावादे करिला यत दोषेर आख्यान ।सबे एइ जानि' आचार्मेर कल्पित व्याख्यान ॥

८८ ॥

प्रकाशानन्द सरस्वती ने कहा, आपने मायावाद दर्शन में जिन दोषों को इंगित किया है, उन्हें हम समझ सकते हैं। शंकराचार्य द्वारा दी गई सारी व्याख्याएँ काल्पनिक हैं।

सूत्रेर करिला तुमि मुख्यार्थ-विवरण । ताहा शुनि' सबार हैल चमत्कार मन ॥

८९॥

हे प्रभु, आपने ब्रह्मसूत्र की व्याख्या करते हुए जो भी प्रत्यक्ष अर्थ दिये हैं, वे हम सबके लिए निश्चय ही अत्यन्त चकित करने वाले हैं।

तुमि त' ईश्वर, तोमार आछे सर्व-शक्ति ।। सङ्क्षेप-रूपे कह तुमि शुनिते हय मति ॥

९० ॥

आप पूर्ण पुरुषोत्तम भगवान् हैं, अतएव आपमें अचिन्त्य शक्तियाँ हैं। मैं आपसे ब्रह्मसूत्र के विषय में संक्षेप में सुनना चाहता हूँ।

प्रभु कहे,–आमि 'जीव', अति तुच्छ-ज्ञान! ।।व्यास-सूत्रेर गम्भीर अर्थ, व्यास–भगवान् ॥

९१॥

श्री चैतन्य महाप्रभु ने उत्तर दिया, मैं एक सामान्य जीव हूँ, अतएव मेरा ज्ञान अत्यन्त तुच्छ है। किन्तु ब्रह्मसूत्र का अर्थ अत्यन्त गहन है, क्योंकि इसके लेखक व्यासदेव तो स्वयं भगवान् हैं।

ताँर सूत्रेर अर्थ कोन जीव नाहि जाने । अतएव आपने सूत्रार्थ करियाछे व्याख्याने ॥

९२॥

सामान्य व्यक्ति के लिए वेदान्त-सूत्र का अर्थ समझ पाना कठिन है, किन्तु व्यासदेव ने अहैतुकी कृपावश स्वयं इसका अर्थ बतलाया है।

येइ सूत्र-कर्ता, से यदि करये व्याख्यान । तबे सूत्रेर मूल अर्थ लोकेर हय ज्ञान ॥

९३॥

यदि वेदान्त-सूत्र की व्याख्या इसके लेखक स्वयं व्यासदेव द्वारा | की जाए, तो सामान्य लोग इसके मूल अर्थ को समझ सकते हैं।

प्रणवेर येइ अर्थ, गायत्रीते सेइ हय ।। सेइ अर्थ चतुःश्लोकीते विवरिया कय ॥

९४॥

ॐकार ध्वनि का अर्थ गायत्री मन्त्र में निहित है। उसी की विस्तृत व्याख्या श्रीमद्भागवत के चार श्लोकों ( चतुःश्लोकी) में हुई है।

ब्रह्मारे ईश्वर चतुःश्लोकी ने कहिला ।ब्रह्मा नारदे सेइ उपदेश कैला ॥

९५ ॥

पूर्ण पुरुषोत्तम भगवान् ने श्रीमद्भागवत के उन चार श्लोकों में ब्रह्माजी से जो भी कहा था, उसकी व्याख्या ब्रह्माजी ने नारद से भी की।

नारद सेइ अर्थ व्यासेरे कहिला ।।शुनि' वेद-व्यास मने विचार करिला ॥

९६॥

ब्रह्माजी ने नारद मुनि से जो भी कहा था, उसे ही नारद मुनि ने पुनः व्यासदेव से कहा। इसके बाद व्यासदेव ने अपने मन में इन उपदेशों पर विचार किया।

एइ अर्थ–आमार सूत्रेर व्याख्यानुरूप ।‘भागवत' करिब सूत्रेर भाष्य-स्वरूप ॥

९७ ॥

श्रील व्यासदेव ने विचार किया कि उन्हें नारद मुनि से ॐकार की जो भी व्याख्या मिली है, उसे वे अपने ग्रन्थ श्रीमद्भागवत में ब्रह्मसूत्र की टीका के रूप में विस्तार से बतलायेंगे।

चारि-वेद-उपनिषदे व्रत किछु हय । तार अर्थ लञा व्यास करिला सञ्चय ॥

९८॥

चारों वेदों तथा १०८ उपनिषदों में जितने वैदिक सिद्धान्त थे, उन्हें व्यासदेव ने संचित करके वेदान्त सूत्र के रूप में प्रस्तुत किया।

येइ सूत्रे येइ ऋक्—विषय-वचन । भागवते सेई ऋक्श्लोके निबन्धन ॥

९९॥

वेदान्त-सूत्र में समस्त वैदिक ज्ञान का अर्थ बतलाया गया है और श्रीमद्भागवत में वही अर्थ अठारह हजार श्लोकों में वर्णित हुआ है।

अतएव ब्रह्म-सूत्रेर भाष्य-श्री-भागवत । भागवत-श्लोक, उपनिषत्कहे 'एक' मत ।। १००॥

अतः निष्कर्ष यह निकलता है कि ब्रह्मसूत्र की व्याख्या श्रीमद्भागवत में विस्तृत रूप से की गई है और श्रीमद्भागवत के श्लोकों में जो कुछ कहा गया है, उनसे उसी उद्देश्य (अर्थ) की पूर्ति होती है, जो उपनिषदों में दी गई व्याख्या से होती है।

आत्मावास्यमिदं विश्व यत्किञ्चिज्जगत्यां जगत् ।।तेन त्यक्तेन भुञ्जीथा मा गृधः कस्य स्विद्धनम् ॥

१०१॥

इस ब्रह्माण्ड के भीतर जड़ तथा चेतन सब कुछ भगवान् द्वारा संचालित है और वह उसी भगवान् का है। अतः मनुष्य को केवल वे ही वस्तुएँ स्वीकार करनी चाहिए, जो उसके लिए नियत कर दी गई हैं। उसे यह जानते हुए कि अन्य वस्तुएँ किसकी हैं, उन्हें स्वीकार नहीं करनी चाहिए।'

भागवतेर सम्बन्ध, अभिधेय, प्रयोजन ।। चतुःश्लोकीते प्रकट तार करियाछे लक्षण ॥

१०२॥

श्रीमद्भागवत का सार-भगवान् से हमारा सम्बन्ध, उस सम्बन्ध में हमारे कार्य तथा जीवन का लक्ष्य-श्रीमद्भागवत के चार श्लोकों में, जिन्हें चतुःश्लोकी कहते हैं, दिया हुआ है। इन्हीं चार श्लोकों में हर बात की व्याख्या की गई है।

आमि---‘सम्बन्ध'-तत्त्व, आमार ज्ञान-विज्ञान ।आमा पाइते साधन-भक्ति' अभिधेय'-नाम ॥

१०३॥

( भगवान् कृष्ण कहते हैं :) 'मैं सारे सम्बन्धों का केन्द्र हूँ। मेरे सम्बन्ध में ज्ञान तथा उस ज्ञान का व्यावहारिक उपयोग ही वास्तविक ज्ञान है। भक्ति के लिए मेरे पास आना अभिधेय कहलाता है।

साधनेर फल--'प्रेम' मूल-प्रयोजन ।।सेइ प्रेमे पाय जीव आमार 'सेवन' ॥

१०४॥

सेवा करने से मनुष्य क्रमशः भगवत्प्रेम के पद तक ऊपर उठता है। यही जीवन का मुख्य लक्ष्य है। भगवत्प्रेम के पद पर मनुष्य भगवान् की सेवा में शाश्वत रूप से लगा रहता है।

ज्ञानं परम-गुह्यं मे ग्रद्विज्ञान-समन्वितम् । स-रहस्यं तदङ्गं च गृहाण गदितं मया ॥

१०५॥

मैं जो कुछ तुमसे कह रहा हूँ, उसे ध्यानपूर्वक सुनो, क्योंकि मेरे विषय में दिव्य ज्ञान न केवल वैज्ञानिक है अपितु रहस्यों से पूर्ण है।

एइ ‘तिन' तत्त्व आमि कहिनु तोमारे ।।‘जीव' तुमि एइ तिन नारिबे जानिबारे ॥

१०६॥

हे ब्रह्मा, मैं तुम्हें यह सारा सत्य बतलाऊँगा। क्योंकि तुम जीव हो,अतः मेरे बताये बिना तुम मेरे साथ अपने सम्बन्ध, भक्ति-कार्य तथा जीवन के आखरी प्रयोजन को नहीं समझ सकोगे।

भैछे आमार स्वरूप', ग्रैछे आमार स्थिति' । ग्रैछे आमार गुण, कर्म, षडू-ऐश्वर्य-शक्ति ।। १०७॥

मैं तुम्हें अपने वास्तविक स्वरूप तथा अपनी स्थिति, अपने गुण, कर्म तथा छह ऐश्वर्य बतलाऊँगा।'

आमार कृपाय एइ सब स्फुरुक तोमारे ।। एत बलि' तिन तत्त्व कहिला ताँहारे ॥

१०८॥

भगवान् कृष्ण ने ब्रह्माजी को आश्वासन दिया, 'मेरी कृपा से ये बातें तुम में जागृत होंगी।' यह कहकर भगवान् ब्रह्माजी को तीनों तत्त्व (सत्य) बतलाने लगे।

ग्रावानहं ग्रथा-भावो ग्रदूप-गुण-कर्मकः ।।तथैव तत्त्व-विज्ञानमस्तु ते मदनुग्रहात् ॥

१०९॥

मेरी अहैतुकी कृपा से मेरा व्यक्तित्व, विविध रस, गुण तथा लीला ये सभी तुममें प्रकाशित हों।

सृष्टिर पूर्वे षडू-ऐश्वर्य-पूर्ण आमि त' हइये ।‘प्रपञ्च', ‘प्रकृति', 'पुरुष' आमातेइ लये ॥

११० ॥

भगवान् ने कहा, 'इस सृष्टि की उत्पत्ति के पूर्व मैं विद्यमान था और समग्र भौतिक शक्ति, भौतिक प्रकृति तथा सारे जीव मुझमें स्थित थे।

सृष्टि करि' तार मध्ये आमि प्रवेशिये ।।प्रपञ्च ग्ने देख सब, सेह आमि हइये ॥

१११॥

इस सृष्टि की रचना के बाद मैंने इसमें प्रवेश किया। तुम इस सृष्टि में जो कुछ देखते हो, वह मेरी शक्ति का विस्तार मात्र है।

प्रलये अवशिष्ट आमि ‘पूर्ण' हइये ।प्राकृत प्रपञ्च पाय आमातेइ लये ॥

११२॥

जब सारे ब्रह्माण्ड का लय होता है, तब मैं पूर्णरूपेण बचा रहता हूँ और दिखने वाली हर वस्तु पुनः मुझमें सुरक्षित हो जाती है।

अहमेवासमेवाग्रे नान्यद् ग्रसदसत्परम् ।पश्चादहं यदेतच्च ग्रोऽवशिष्येत सोऽस्म्यहम् ॥

११३॥

सृष्टि के पूर्व केवल मैं रहता हूँ और कोई अन्य-चाहे स्थूल हो या सूक्ष्म या आदि-नहीं रहता। सृष्टि के बाद मैं ही हर वस्तु में रहता हूँ और प्रलय के बाद मैं ही शाश्वत बना रहता हूँ।

अहमेव-श्लोके 'अहम्'--तिन-बार ।पूर्णेश्वर्य श्री-विग्रह-स्थितिर निर्धार ॥

११४॥

अहमेव' से प्रारम्भ होने वाले श्लोक में 'अहम्' शब्द तीन बार आया है। प्रारम्भ में 'अहमेव' शब्द हैं। दूसरी पंक्ति में 'पश्चाद् अहम्' शब्द हैं और इसके अन्त में 'सोऽस्म्यहम्' शब्द आये हैं। यह 'अहम्' परम पुरुष का सूचक है।'अहम्' की पुनरावृत्ति से छह ऐश्वर्यों से युक्त दिव्य पुरुष की पुष्टि होती है।

ग्रे ‘विग्रह' नाहि माने, ‘निराकार' माने ।तारे तिरस्करिबारे करिला निर्धारणे ॥

११५॥

निर्विशेषवादी परमेश्वर के व्यक्तिगत लक्षणों से युक्त साकार रूप को नहीं मानते। इस श्लोक में परम पुरुष पर इसलिए बल दिया गया है, जिससे वे इसे स्वीकार करने की आवश्यकता को समझें। इसीलिए‘अहम्' शब्द तीन बार आया है। किसी बात पर बल देने के लिए तीन बार कहना पड़ता है।

एइ सब शब्दे हय---'ज्ञान'-'विज्ञान'-विवेक ।माया-कार्य, माया हैते आमि व्यतिरेक ॥

११६॥

[ भगवान् कृष्ण ने आगे कहा : ‘इन सारे शब्दों में वास्तविक अध्यात्मिक ज्ञान तथा उसके व्यावहारिक उपयोग पर विचार किया गया है। यद्यपि बहिरंगा शक्ति मुझ से ही उत्पन्न है, किन्तु मैं उससे अलग हूँ।

ग्रैछे सूर्येर स्थाने भासये ‘आभास' ।सूर्य विना स्वतन्त्र तार ना हय प्रकाश ॥

११७॥

कभी-कभी सूर्य के बदले सूर्य के प्रतिबिम्ब का अनुभव किया जाता है, किन्तु सूर्य का प्रकाश कभी-भी सूर्य से स्वतन्त्र होकर सम्भव नहीं हो सकता।

मायातीत हैले हय आमार 'अनुभव' ।।एइ 'सम्बन्ध'-तत्त्व कहिलँ, शुन आर सब ॥

११८॥

दिव्य पद प्राप्त करने वाला व्यक्ति मेरा अनुभव कर सकता है। यह अनुभव परमेश्वर के साथ सम्बन्ध का आधार है। मैं इस विषय को और आगे बतलाता हूँ।

ऋतेऽर्थं ग्रत्प्रतीयेत न प्रतीयेत चात्मनि ।तद्विद्यादात्मनो मायां ग्रथाभासो यथा तमः ॥

११९॥

मेरे बिना जो सत्य प्रतीत होता है, वह निश्चित रूप से मेरी भ्रामक शक्ति (माया) है, क्योंकि मेरे बिना किसी वस्तु का अस्तित्व नहीं रहे सकता। यह छाया में वास्तविक प्रकाश के प्रतिबिम्ब के समान है, क्योंकि प्रकाश में न तो छाया होती है ने प्रतिबिम्ब होता है।

‘अभिधेय' साधन-भक्तिर शुनह विचार ।।सर्व-जन-देश-काल-दशाते व्याप्ति ग्रार ॥

१२०॥

अब मुझसे भक्ति की विधि के विषय में सुनो, जो किसी भी देश, व्यक्ति, काल तथा परिस्थिति में लागू होती है।

‘धर्मादि' विषये त्रैछे ए‘चारि' विचार । साधन-भक्ति-एइ चारि विचारेर पार ॥

१२१॥

जहाँ तक धार्मिक सिद्धान्तों को सम्बन्ध है, उसमें व्यक्ति, देश, काल तथा दशा का विचार किया जाता है। किन्तु भक्ति में ऐसा विचार नहीं किया जाता है। भक्ति इन समस्त विचारों के परे है।"

सर्व-देश-काल-दशाये जनेर कर्तव्य । गुरु-पाशे सेइ भक्ति प्रष्टव्य, श्रोतव्य ॥

१२२ ।। अतः हर देश में, हर परिस्थिति में तथा सभी कालों में यह हर एक व्यक्ति का कर्तव्य है कि वह प्रामाणिक गुरु के पास जाए, भक्ति के विषय में उससे प्रश्न करे और भक्ति की व्याख्या को सुने।।

एतावदेव जिज्ञास्यं तत्त्व-जिज्ञासुनात्मनः ।अन्वय-व्यतिरेकाभ्यां ग्रत्स्यात्सर्वत्र सर्वदा ।। १२३।। अतः दिव्य ज्ञान में रुचि रखने वाले व्यक्ति को चाहिए कि वह सर्वव्यापक सत्य के विषय में जानने के लिए सदैव प्रत्यक्ष तथा अप्रत्यक्ष रूप से प्रश्न करे।।

आमाते ये ‘प्रीति', सेइ 'प्रेम' प्रयोजन' ।।कार्य-द्वारे कहि तार ‘स्वरूप'-लक्षण ॥

१२४॥

मेरे लिए परम स्नेह ( प्रीति ) भगवत्प्रेम कहलाता है और यही जीवन का चरम लक्ष्य ( प्रयोजन ) है। मैं ऐसे प्रेम के प्राकृतिक लक्षणों की व्याख्या एक व्यावहारिक उदाहरण द्वारा करूंगा।

पञ्च-भूत ग्रैछे भूतेर भितरे-बाहिरे । भक्त-गणे स्फुरि आमि बाहिरे-अन्तरे ॥

१२५॥

प्रत्येक जीव के भीतर तथा बाहर पाँच भौतिक तत्त्व विद्यमान हैं। इसी प्रकार मैं, पूर्ण पुरुषोत्तम भगवान् भक्त के हृदय में तथा उसके शरीर के बाहर भी प्रकट रहता हूँ।

ग्रथा महान्ति भूतानि भूतेषूच्चावचेष्वनु । प्रविष्टान्यप्रविष्टानि तथा तेषु न तेष्वहम् ॥

१२६॥

जिस प्रकार भौतिक तत्त्व सारे जीवों के शरीर में प्रवेश करते हैं और उन सबके बाहर भी बने रहते हैं, उसी तरह मैं सारी भौतिक सृष्टियों के भीतर विद्यमान रहकर भी उनके भीतर नहीं रहता।

भक्त आमा प्रेम बान्धियाछे हृदय-भितरे ।ग्राहाँ नेत्र पड़े ताहाँ देखये आमारे ॥

१२७॥

अति उन्नत भक्त मुझ भगवान् को प्रेम द्वारा अपने हृदय में बाँध सकता है। वह जहाँ भी देखता है, मेरे अतिरिक्त और कुछ नहीं देखता।

विसृजति हृदयं न ग्रस्य साक्षाद्धरिरवशाभिहितोऽप्यघौघ-नाशः । प्रणय-रसनया धृताघ्रि-पद्मः | स भवति भागवत-प्रधान उक्तः ॥

१२८॥

अपने भक्तों के हर अमंगल को नष्ट करने वाले पूर्ण पुरुषोत्तम भगवान् हरि अपने भक्तों के हृदयों को तब भी नहीं छोड़ते, जब वे उनका स्मरण तथा कीर्तन मन लगाकर न करते हों। इसका कारण यह है कि प्रेमकी डोरी भक्तों के हृदयों में भगवान् को सदैव बाँधे रखती है। ऐसे भक्तों को अत्यन्त उच्च ( भागवत-प्रधान ) माना जाना चाहिए।

सर्व-भूतेषु यः पश्येद्भगवद्भावमात्मनः ।भूतानि भगवत्यात्मन्येष भागवतोत्तमः ॥

१२९॥

भक्ति में उन्नत व्यक्ति ( भागवत ) आत्माओं के आत्मा पूर्ण पुरुषोत्तम भगवान् कृष्ण को हर वस्तु के भीतर देखता है। फलतः वह पूर्ण पुरुषोत्तम भगवान् के स्वरूप को समस्त कारणों के कारण के रूप में देखता है और यह समझता है कि सारी वस्तुएँ उनमें स्थित हैं।

गायन्त उच्चैरमुमेव संहताःविचिक्युरुन्मत्तक-वद्वनाद्वनम् । पप्रच्छुराकाश-वदन्तरं बहिर्भूतेषु सन्तं पुरुषं वनस्पतीन् ॥

१३०॥

सारी गोपियाँ कृष्ण के दिव्य गुणों का जोर-जोर से कीर्तन करने के लिए एकत्र हो गईं और वे पागल स्त्रियों की तरह एक जंगल से दूसरे जंगल में घूमने लगीं। वे सारे जीवों के भीतर तथा बाहर स्थित भगवान् के विषय में जिज्ञासा करने लगीं। निस्सन्देह, वे उन परम पुरुष के विषय में सारे पौधौं तथा वनस्पतियों से भी पूछ रही थीं।

अतएव भागवते एइ 'तिन' कय ।।सम्बन्ध-अभिधेय-प्रयोजन-मय ॥

१३१॥

श्री चैतन्य महाप्रभु ने आगे बतलाया, भगवान् से मनुष्य का सम्बन्ध, भक्तिमय कार्यकलाप तथा भक्ति और जीवन के चरम लक्ष्य भगवत्प्रेम की प्राप्ति-ये तीन श्रीमद्भागवत के विषय हैं।

वदन्ति तत्तत्त्व-विदस्तत्त्वं ग्रज्ज्ञानमद्वयम् । ब्रह्मेति परमात्मेति भगवानिति शब्द्यते ॥

१३२॥

स्वरूपसिद्ध व्यक्ति परम सत्य की एकीकृत पहचान विभिन्न नामों से करते हैं। ये हैं-निर्विशेष ब्रह्म, अन्तर्यामी परमात्मा तथा पूर्ण पुरुषोत्तम भगवान्।

भगवानेक आसेदमग्र आत्मात्मनां विभुः ।। आत्मेच्छानुगतावात्मा अनाना-मत्युपलक्षणः ॥

१३३॥

ब्रह्माण्ड की सृष्टि के पूर्व सृजनशीलता भगवान् के स्वरूप में समा गई। उस समय सारी शक्तियाँ तथा अभिव्यक्तियाँ भगवान् के शरीर में संरक्षित हो गईं। भगवान् समस्त कारणों के कारण हैं। वे सर्वव्यापी तथा आत्मनिर्भर पुरुष हैं। सृष्टि के पूर्व वे अपनी आध्यात्मिक शक्ति समेत आध्यात्मिक जगत् में विद्यमान थे, जहाँ विविध वैकुण्ठ लोक प्रकट हैं।'

एते चांश-कलाः पुंसः कृष्णस्तु भगवान्स्वयम् ।इन्द्रारि-व्याकुलं लोकं मृड़यन्ति युगे युगे ॥

१३४॥

ईश्वर के ये सारे अवतार पुरुष अवतारों के या तो पूर्ण विस्तार हैं। या पूर्ण विस्तारों के अंश ( कलाएँ ) हैं। किन्तु कृष्ण स्वयं पूर्ण पुरुषोत्तम भगवान् हैं। वे प्रत्येक युग में अपने विभिन्न स्वरूपों से संसार की रक्षा करते हैं, जब यह संसार इन्द्र के शत्रुओं द्वारा उपद्रवग्रस्त रहता है।

एइत' ‘सम्बन्ध', शुन' अभिधेय' भक्ति ।।भागवते प्रति-श्लोके व्यापे झार स्थिति ॥

१३५॥

पूर्ण पुरुषोत्तम भगवान् से मनुष्य का यही सनातन सम्बन्ध है। अब भक्ति सम्पन्न करने के विषय में सुनो। यह सिद्धान्त श्रीमद्भागवत के प्रत्येक श्लोक में व्याप्त है।

भक्त्याहमेकया ग्राह्यः श्रद्धयात्मा प्रियः सताम् ।भक्तिः पुनाति मन्निष्ठा श्व-पाकानपि सम्भवात् ॥

१३६।। [ भगवान् कृष्ण ने कहा : 'भक्तों तथा साधुओं को अत्यन्त प्रिय होने से मैं अविचल श्रद्धा तथा भक्ति द्वारा प्राप्त किया जाता हूँ। यह भक्तियोग, जिससे मेरे प्रति क्रमशः अनुरक्ति बढ़ती जाती है, चण्डालों में भी जन्में मनुष्य को शुद्ध कर देती है। अर्थात् भक्तियोग के द्वारा हर व्यक्ति आध्यात्मिक स्तर तक पहुँच सकता है।

न साधयति मां योगो न साङ्ख्यं धर्म उद्धव ।ने स्वाध्यायस्तपस्त्यागो ग्रथा भक्तिर्ममोर्जिता ॥

१३७ ।। [ पूर्ण पुरुषोत्तम भगवान् कृष्ण ने कहा :‘हे उद्धव, कोई न तो अष्टांग योग द्वारा, न निर्विशेषवाद द्वारा या परम सत्य के वैश्लेषिक अध्ययन द्वारा, न वेदाध्ययन द्वारा, न तपस्या द्वारा, न दान द्वारा, न ही संन्यास द्वारा मुझे उतना प्रसन्न कर सकता है, जितना कि मेरे प्रति अनन्य भक्ति उत्पन्न करके कर सकता है।

भयं द्वितीयाभिनिवेशतः स्याद्ईशादपेतस्य विपर्युयोऽस्मृतिः । तन्माययातो बुध आभजेत्तं ।भक्त्यैकयेशं गुरु-देवतात्मा ॥

१३८॥

जब जीव कृष्ण से भिन्न माया द्वारा आकृष्ट होता है, तब वह भयसे आक्रान्त रहता है। भौतिक शक्ति माया द्वारा पूर्ण पुरुषोत्तम भगवान् से अलग हो जाने के कारण उसका जीवन-बोध पलट जाता है। दूसरे शब्दों में, वह कृष्ण का सनातन सेवक होने के स्थान पर कृष्ण का प्रतियोगी बन जाता है। इसे विपर्ययोऽस्मृतिः कहते हैं। इस भूल को सुधारने के लिए विद्वान तथा उन्नत व्यक्ति पूर्ण पुरुषोत्तम भगवान् को अपने गुरु, पूज्य देव तथा जीवन के स्रोत के रूप में पूजता है। इस तरह वह अनन्य भक्तियोग द्वारा भगवान् की पूजा करता है।

एबे शुन, प्रेम, येइ–मूल ‘प्रयोजन'।पुलकाश्रु-नृत्य-गीत—याहार लक्षण ॥

१३९॥

अब तुम मुझसे सुनो कि वास्तविक भगवत्प्रेम क्या होता है। यह जीवन का मूल लक्ष्य है। शरीर का कम्पन, आँखों में अश्रु, कीर्तन तथा नृत्य इसके लक्षण हैं।

स्मरन्तः स्मारयन्त्यश्च मिथोऽघौघ-हरं हरिम् ।।भक्त्या सञ्जातया भक्त्या बिभ्रत्युत्पुलकां तनुम् ॥

१४०॥

भक्तों के प्रत्येक अमंगल को दूर करने वाले पूर्ण पुरुषोत्तम भगवान् हरि का मात्र स्मरण करके तथा अन्यों को उनका स्मरण कराते हुए शुद्ध भक्तजन प्रेमानन्द के आध्यात्मिक शरीरिक लक्षण व्यक्त करते हैं। यह पद विधिपूर्वक भक्ति करके और तब रागानुग प्रेम करने के स्तर पर उठने से प्राप्त होता है।

एवं-व्रतः स्व-प्रिय-नाम-कीर्त्याजातानुरागो द्रुत-चित्त उच्चैः । हसत्यथो रोदिति रौति गायत्य् ।उन्माद-वन्नृत्यति लोक-बाह्यः ॥

१४१॥

जब मनुष्य सचमुच भक्ति में उन्नत होता है और अपने प्रिय भगवान् के पवित्र नाम का कीर्तन करने में आनन्द का अनुभव करता है, तो वह उत्तेजित हो उठता है और जोर-जोर से नाम कीर्तन करता है। वह आसपासवालों की परवाह किये बिना हँसता है, रोता है, चंचल हो उठता है और पागल की तरह कीर्तन भी करता है।

अतएव भागवत–सूत्रेर 'अर्थ'-रूप । निज-कृत सूत्रेर निज-' भाष्य'-स्वरूप ॥

१४२ ॥

श्रीमद्भागवत वेदान्त-सूत्र का सही सही अर्थ बताता है। वेदान्त सूत्र के लेखक व्यासदेव हैं और स्वयं उन्होंने ही उन सूत्रों की व्याख्या श्रीमद्भागवत के रूप में की है।

अर्थोऽयं ब्रह्म-सूत्राणांभारतार्थ-विनिर्णयःगायत्री-भाष्य-रूपोऽसौवेदार्थ-परिबृंहितः पुराणानां साम-रूप;साक्षाद्भगवतोदितः द्वादश-स्कन्ध--युक्तोऽयंशत-विच्छेद- संयुतः ग्रन्थोऽष्टाद?- साहस्रःश्रीमद्भागवताभिधः ॥

१४३-१४४॥

वेदान्त सूत्र का अर्थ श्रीमद्भागवत में पाया जाता है। महाभारत का पूरा सारांश भी इसमें है। ब्रह्म-गायत्री की टीका भी इसी में है और समस्त वैदिक ज्ञान के सहित इसे विस्तृत रूप दिया गया है। श्रीमद्भागवत सर्वश्रेष्ठ पुराण है और इसकी रचना पूर्ण पुरुषोत्तम भगवान् ने अपने व्यासदेव अवतार के रूप में की। इसमें बारह स्कन्ध हैं, ३३५ अध्याय हैं और अठारह हजार श्लोक हैं।

सर्व-वेदेतिहासानां सारं सारं समुद्धृतम् ॥

१४५ ॥

सारे वैदिक साहित्य तथा समस्त इतिहासों के सार को श्रीमद्भागवत में संकलित कर दिया गया है।'

सर्व-वेदान्त-सारं हि श्रीमद्भागवतमिष्यते ।तद्रसामृत-तृप्तस्य नान्यत्र स्याद्रतिः क्वचित् ॥

१४६॥

श्रीमद्भागवत को समस्त वैदिक साहित्य तथा वेदान्त दर्शन का सार माना जाता है। जो भी श्रीमद्भागवत के दिव्य रस का आस्वादन करता है, वह किसी अन्य साहित्य की ओर कभी आकृष्ट नहीं होता।'

गायत्रीर अर्थे एइ ग्रन्थ-आरम्भन । सत्यं परं---सम्बन्ध, धीमहि---साधन-प्रयोजन ॥

१४७॥

श्रीमद्भागवत के प्रारम्भ में ब्रह्म-गायत्री मन्त्र की व्याख्या दी हुई है।‘सत्यं परं' अर्थात् परम सत्य सम्बन्ध को सूचित करता है और धीमहि अर्थात् 'हम उनका ध्यान करते हैं' भक्ति के सम्पादन का तथा जीवन के चरम लक्ष्य ( प्रयोजन ) का सूचक है।

जन्माद्यस्य यतोऽन्वयादितरतश्चार्थेष्वभिज्ञः स्वराट् | तेने ब्रह्म हृदा ग्न आदि-कवये मुह्यन्ति यत्सूरयः । तेजो-वारि-मृदां ग्रथा विनिमयो यत्र त्रि-सर्गोऽमृषा ।धाम्ना स्वेन सदा निरस्ते-कुहकं सत्यं परं धीमहि ॥

१४८॥

हे वसुदेव के पुत्र मेरे प्रभु श्रीकृष्ण, हे सर्वव्यापी भगवान्, मैं आपको सादर नमस्कार करता हूँ। मैं उन भगवान् श्रीकृष्ण का ध्यान करता हूँ, जो परम सत्य हैं और प्रकट ब्रह्माण्डों की सृष्टि, स्थिति तथा प्रलय के समस्त कारणों के मूल कारण हैं। वे समस्त प्राकट्यों से प्रत्यक्ष तथा अप्रत्यक्ष रूप से अवगत रहते हैं तथा वे स्वतन्त्र हैं, क्योंकि उनके परे अन्य कोई कारण नहीं है। उन्होंने ही सब से पहले प्रथम जीव ब्रह्मा के हृदय में वैदिक ज्ञान प्रदान किया। उनके द्वारा बड़े-बड़े ऋषि और देवता भी मोहग्रस्त हो जाते हैं, जिस प्रकार कोई अग्नि में जल अथवा जल में भूमि की भ्रमपूर्ण अवस्थिति को देखकर मोहित होता है। उन्हीं के कारण सारे भौतिक ब्रह्माण्ड, जो प्रकृति के तीन गुणों की प्रतिक्रिया द्वारा अस्थायी तौर पर अभिव्यक्त हैं, अवास्तविक होते हुए भी वास्तविक प्रतीत होते हैं। अतः मैं उन परम सत्य भगवान् श्रीकृष्ण का ध्यान करता हूँ, जो अपने उस दिव्य धाम में सदैव विद्यमान रहते हैं, जो कि भौतिक जगत् के मोह से सदैव मुक्त रहता है। मैं उन्हीं का ध्यान करता हूँ, क्योंकि वे परम सत्य हैं।

धर्मः प्रोज्झित-कैतवोऽत्र परमो निर्मत्सराणां सतां | वेद्यं वास्तवमत्र वस्तु शिव-दं ताप-त्रयोन्मूलनम् । श्रीमद्भागवते महा-मुनि--कृते किं वा परैरीश्वरः।सद्यो हृद्यवरुध्यतेऽत्र कृतिभिः शुश्रूषुभिस्तत्क्षणात् ॥

१४९ ।। यह भागवत पुराण भौतिक दृष्टि से प्रेरित होने वाले समस्त धार्मिक कृत्यों को पूर्णतया बहिष्कृत करते हुए सर्वोच्च सत्य का प्रतिपादन करता है, जो पूर्णतया शुद्ध हृदय वाले भक्तों के द्वारा समझा जा सकता है। यह सर्वोच्च सत्य ऐसी वास्तविकता है, जो माया से पृथक् होते हुए सबके कल्याण के लिए है। ऐसा सत्य तीनों प्रकार के सन्तापों को समूल नष्ट करने वाला है। महामुनि व्यासदेव द्वारा ( अपनी परिपक्व अवस्था में ) संकलित यह सुन्दर भागवत भगवत्-साक्षात्कार के लिए अपने आप में पर्याप्त है। और किसी शास्त्र की क्या आवश्यकता है? ज्योंही कोई ध्यानपूर्वक तथा विनीत भाव से भागवत के सन्देश को सुनता है, वैसे ही ज्ञान के इस अनुशीलन से परमेश्वर उसके हृदय में स्थापित हो जाते हैं।'

‘कृष्ण-भक्ति-रस-स्वरूप' श्री-भागवत ।ताते वेद-शास्त्र हैते परम महत्त्व ॥

१५०॥

श्रीमद्भागवत कृष्ण-भक्ति से उत्पन्न रस की सीधी सूचना देता है। अतः यह अन्य सारे वैदिक ग्रन्थों से अधिक महत्त्वपूर्ण है।

निगम-कल्प-तरोर्गलितं फलंशुक-मुखादमृत-द्रव-संयुतम् । पिबत भागवतं रसमालयंमुहुरहो रसिका भुवि भावुकाः ॥

१५१॥

श्रीमद्भागवत समस्त वैदिक ग्रन्थों का सार है और यह वैदिक ज्ञानरूपी कल्पतरु का परिपक्व फल माना जाता है। शुकदेव गोस्वामी के मुख से निकलने के कारण यह मीठा बन गया है। आप में से जो विचारवान हैं और रसों का आस्वादन करना चाहते हैं, उन्हें इस पक्व फल का आस्वादन करने का सदैव प्रयत्न करना चाहिए। हे विचारवान भक्तों, जब तक आप दिव्य आनन्द में निमग्न नहीं होते, तब तक आपको इस श्रीमद्भागवत का आस्वादन करना चालु रखना चाहिए और जब आप इस आनन्द में पूरी तरह मग्न हो जाओ, तो इसके रसों का सदा सदा आस्वादन करते रहना चाहिए।'

वयं तु न वितृप्याम उत्तम:श्लोक-विक्रमे ।। ग्रच्छृण्वतां रस-ज्ञानां स्वादु स्वादु पदे पदे ॥

१५२॥

हम स्तोत्रों तथा स्तुतियों से यशोगान किये जाने वाले भगवान् की दिव्य लीलाओं को सुनते हुए कभी नहीं थकते। जो उनकी संगति का आनन्द उठाते हैं, वे प्रति क्षण उनकी लीलाओं के श्रवण का आस्वादन करते हैं।'

अतएव भागवत करह विचार । इहा हैते पाबे सूत्र-श्रुतिर अर्थ-सार ॥

१५३॥

श्री चैतन्य महाप्रभु ने प्रकाशानन्द सरस्वती को उपदेश दिया, अत्यधिक छानबीन करके श्रीमद्भागवत का अध्ययन करो। तब आप ब्रह्मसूत्र के वास्तविक अर्थ को समझ सकोगे।

निरन्तर कर कृष्ण-नाम-सङ्कीर्तन । हेलाय मुक्ति पाबे, पाबे प्रेम-धन ॥

१५४॥

श्री चैतन्य महाप्रभु ने आगे कहा, “सदैव श्रीमद्भागवत की चर्चा करो और भगवान् कृष्ण के पवित्र नाम का निरन्तर जप करो। इस तरह आप आसानी से मुक्ति प्राप्त कर सकोगे और भगवत्प्रेम का आनन्द प्राप्त करने के लिए उन्नत बनोगे।

मुक्ता अपि लीलया विग्रहं कृत्वा भगवन्तं भजन्ते ॥

१५६ ।। निर्विशेष ब्रह्म तेज में लीन मुक्तात्मा भी कृष्ण की लीलाओं के प्रति आकृष्ट होता है। इस तरह वह अर्चाविग्रह स्थापित करके भगवान् की पूजा करता है।'

ब्रह्म-भूतः प्रसन्नात्मा न शोचति न काङ्क्षति ।। समः सर्वेषु भूतेषु मद्भक्तिं लभते पराम् ॥

१५५ ॥

जो इस तरह दिव्य अवस्था में स्थित है, उसे तुरन्त परम ब्रह्म की अनुभूति होती है और वह पूर्णतया प्रसन्न हो जाता है। वह न कभी शोक करता है न किसी वस्तु की कामना करता है। वह हर जीव के प्रति समभाव रखता है। उस अवस्था में वह मेरी शुद्ध भक्ति प्राप्त करता है।'

परिनिष्ठितोऽपि नैर्गुण्ये उत्तम:श्लोक-लीलया ।।गृहीत-चेता राजर्षे आख्यानं ग्रदधीतवान् ॥

१५७॥

[ शुकदेव गोस्वामी ने परीक्षित महाराज को सम्बोधित किया : 'हे राजन्, यद्यपि मैं दिव्य पद पर पूर्णतया स्थित था, फिर भी मैं भगवान् कृष्ण की लीलाओं के प्रति आकृष्ट हुआ। इसलिए मैंने अपने पिता से श्रीमद्भागवत का अध्ययन किया।

तस्यारविन्द-नयनस्य पदारविन्दकिञ्जल्क-मिश्र-तुलसी-मकरन्द-वायुः ।। अन्तर्गतः स्व-विवरेण चकार तेषांसक्षोभमक्षर-जुषामपि चित्त-तन्वोः ॥

१५८॥

जब भगवान् के चरणकमलों से तुलसी दलों तथा केसर की सुगन्ध ले जाने वाली वायु उन मुनियों ( कुमारों) के नासारन्ध्रों से होकर हृदय में प्रविष्ट हुई, तो उन्हें अपने शरीर तथा मन दोनों में ही विकार का अनुभव हुआ, यद्यपि वे निर्विशेष ब्रह्म के उपासक थे।'

आत्मारामाश्च मुनयो निर्ग्रन्था अप्युरुक्रमे ।। कुर्वन्त्यहेतुकी भक्तिमित्थम्भूत-गुणो हरिः ॥

१५९॥

जो स्वयं सन्तुष्ट आत्माराम हैं और बाह्य भौतिक इच्छाओं के प्रति आकृष्ट नहीं होते हैं, वे भी उन श्रीकृष्ण की प्रेमाभक्ति के प्रति आकृष्ट होते हैं जिनके गुण दिव्य हैं और जिनके कार्यकलाप अद्भुत हैं। भगवान् हरि को कृष्ण कहा जाता है, क्योंकि उनमें ऐसे दिव्य आकर्षक गुण हैं।

हेन-काले सेइ महाराष्ट्रीय ब्राह्मण ।सभाते कहिल सेइ श्लोक-विवरण ॥

१६०॥

उसी समय उस महाराष्ट्रीय ब्राह्मण ने आत्माराम श्लोक की श्री चैतन्य महाप्रभु द्वारा की गई व्याख्या का उल्लेख किया।

एइ श्लोकेर अर्थ प्रभु 'एकषष्टि' प्रकार । करियाछेन, ग्राहा शुनि' लोके चमत्कार ॥

१६१॥

महाराष्ट्रीय ब्राह्मण ने बतलाया कि श्री चैतन्य महाप्रभु ने इस श्लोक के ६१ प्रकार से अर्थ किये हैं। यह सुनकर सभी लोग चकित हो गये।

तबे सब लोक शुनिते आग्रह करिल । ‘एकषष्टि' अर्थ प्रभु विवरि' कहिल ॥

१६२ ।। जब वहाँ पर एकत्र सारे लोगों ने आत्माराम श्लोक के ६१ अर्थों को फिर से सुनने की इच्छा व्यक्त की, तो श्री चैतन्य महाप्रभु ने पुनः उनकी व्याख्या की।

शुनिया लोकेर बड़ चमत्कार हैल । चैतन्य-गोसाञि---श्री-कृष्ण', निर्धारिल ॥

१६३ ॥

जब सबने श्री चैतन्य महाप्रभु से आत्माराम श्लोक की व्याख्या सुनी, तो वे आश्चर्यचकित रह गये। उन्होंने निष्कर्ष निकाला कि श्री चैतन्य महाप्रभु और कोई नहीं, अपितु साक्षात् भगवान् कृष्ण हैं।

एत कहि' उठिया चलिला गौरहरि । नमस्कार करे लोक हरि-ध्वनि करि ॥

१६४॥

इन व्याख्याओं को दोबारा देने के बाद श्री चैतन्य महाप्रभु उठे और उन्होंने वहाँ से विदा ली। सभी लोगों ने उन्हें नमस्कार किया तथा महामन्त्र का कीर्तन किया।

सब काशी-वासी करे नाम-सङ्कीर्तन ।प्रेमे हासे, काँदे, गाय, करये नर्तन ॥

१६५ ॥

काशी (वाराणसी) के सारे निवासी प्रेम में भावविभोर होकर हरे कृष्ण महामन्त्र का कीर्तन करने लगे। कभी वे हँसते, कभी रोते, कभी कीर्तन करते और कभी नाचते।

सन्यासी पण्डित करे भागवत विचार ।वाराणसी-पुर प्रभु करिला निस्तार ॥

१६६॥

इसके बाद वाराणसी के सारे मायावादी संन्यासी तथा पण्डित श्रीमद्भागवत के विषय में विचार-विमर्श करने लगे। इस तरह श्री चैतन्य महाप्रभु ने उनका उद्धार किया।

निज-लोक लञा प्रभु आइला वासाघर ।।वाराणसी हैल द्वितीय नदीया-नगर ॥

१६७॥

तत्पश्चात् श्री चैतन्य महाप्रभु अपने पार्षदों समेत अपने निवासस्थान पर लौट आये। इस प्रकार उन्होंने सारे वाराणसी नगर को दूसरे नवद्वीप ( नदिया नगर) में परिणत कर दिया।

निज-गण लञा प्रभु कहे हास्य करि' ।काशीते आमि आइलाङ वेचिते भावकालि ॥

१६८॥

श्री चैतन्य महाप्रभु ने अपने पार्षदों के बीच हँसी करते हुए कहा, “मैं यहाँ अपना भावमय प्रेम बेचने के लिए आया था।

काशीते ग्राहक नाहि, वस्तु ना विकाय ।।पुनरपि देशे वहि' लओया नाहि ग्राय ॥

१६९॥

यद्यपि मैं वाराणसी में अपना सामान बेचने आया था, किन्तु यहाँ कोई ग्राहक नहीं थे। अतः मेरे लिए आवश्यक हो गया कि उस सामान को मैं अपने देश वापस ले जाऊँ।

आमि बोझा वहिमु, तोमा-सबार दुःख हैल ।।तोमा-सबार इच्छाय विना-मूल्ये बिलाइल ॥

१७० ।। तुम सभी दुःखी थे कि मेरे सामान को कोई खरीद नहीं रहा और मुझे उसे लौटकर ले जाना होगा। अतः तुम सबकी इच्छा से ही मैंने उसे बिना मूल्य ही बाँट दिया।

सबे कहे,---लोक तारिते तोमार अवतार ।‘पूर्व' ‘दक्षिण' 'पश्चिम' करिला निस्तार ॥

१७१॥

तब महाप्रभु के सारे भक्तों ने कहा, आप पतितात्माओं का उद्धार करने के लिए अवतरित हुए हैं। आपने पूर्व तथा दक्षिण में उनका उद्धार किया है और अब आप पश्चिम में उनका उद्धार कर रहे हैं।

'एक' वाराणसी छिल तोमाते विमुख ।ताहा निस्तारिया कैला आमा-सबार सुख ॥

१७२ ॥

केवल वाराणसी बच गया था, क्योंकि वहाँ के लोग आपके प्रचार-कार्य के विरुद्ध थे। अब आपने उनका उद्धार कर दिया, जिससे हम सभी अत्यन्त सुखी हुए हैं।

वाराणसी-ग्रामे व्रदि कोलाहल हैले ।शुनि' ग्रामी देशी लोक आसिते लागिल ॥

१७३ ॥

जब इन घटनाओं का समाचार प्रसारित हुआ, तो आसपास के सारे लोग श्री चैतन्य महाप्रभु का दर्शन करने आने लगे।

लक्ष कोटि लोक आइसे, नाहिक गणन ।सङ्कीर्ण-स्थाने प्रभुर ना पाये दरशन ॥

१७४॥

करोड़ों लोग श्री चैतन्य महाप्रभु का दर्शन करने आये, जिनकी कोई गिनती नहीं थी। चूँकि महाप्रभु का आवास छोटा था, इसलिए हर कोई उनका दर्शन नहीं कर सका।

प्रभु ग्रबे स्नाने ग्रान विश्वेश्वर-दरशने ।दुइ-दिके लोक करे प्रभु-विलोकने ॥

१७५।। जब श्री चैतन्य महाप्रभु गंगा-स्नान करने तथा विश्वेश्वर मन्दिर में दर्शन करने जाते, तो लोग महाप्रभु को देखने के लिए दोनों ओर पंक्तिबद्ध हो जाते।

बाहु तुलि' प्रभु कहे—बल 'कृष्ण' ‘हरि' ।दण्डवत्करे लोके हरि-ध्वनि करि' ॥

१७६ ॥

जब महाप्रभु लोगों के पास से निकलते, तो वे अपनी भुजाएँ उठाकर कहते, कृष्ण बोल! हरि बोल! सारे लोग हरे कृष्ण कीर्तन द्वारा उनका स्वागत करते और इसी कीर्तन द्वारा उनको नमस्कार करते।

एइ-मत दिन पञ्च लोक निस्तारिया ।। आर दिन चलिला प्रभु उद्विग्न हा ॥

१७७ ॥

इस तरह श्री चैतन्य महाप्रभु पाँच दिनों तक लोगों का उद्धार करते रहे। अन्त में अगले दिन वे वहाँ से प्रस्थान करने के लिए उत्सुक हो उठे।

रात्रे उठि' प्रभु यदि करिला गमन ।। पाछे लाग्-लइला तबे भक्त पञ्च जन ॥

१७८॥

छठे दिन जल्दी उठकर जब श्री चैतन्य महाप्रभु प्रस्थान करने लगे, तो पाँच भक्त उनके पीछे-पीछे लग गये।

तपन मिश्र, रघुनाथ, महाराष्ट्रीय ब्राह्मण ।चन्द्रशेखर, कीर्तनीया-परमानन्द,—पञ्च जन ॥

१७९॥

ये पाँच भक्त थे-तपन मिश्र, रघुनाथ, महाराष्ट्रीय ब्राह्मण, चन्द्रशेखर तथा परमानन्द कीर्तनिया।

सबे चाहे प्रभु-सङ्गे नीलाचल ग्राइते ।सबारे विदाय दिला प्रभु ग्रन-सहिते ॥

१८० ।। ये पाँचों श्री चैतन्य महाप्रभु के साथ जगन्नाथ पुरी जाना चाहते थे, किन्तु महाप्रभु ने बड़े ही यत्न से इन सबको विदा किया।

याँर इच्छा, पाछे आइस आमारे देखते ।।एबे आमि एका ग्रामु झारिखण्ड-पथे ॥

१८१॥

श्री चैतन्य महाप्रभु ने कहा, यदि तुम मुझे मिलना चाहते हो, तो बाद में आ सकते हो, किन्तु इस समय मैं अकेले ही झारखंड जंगल से होता हुआ जाऊँगा।

सनातने कहिला, तुमि ग्राह' वृन्दावन ।तोमार दुइ भाइ तथा करियाछे गमन ॥

१८२॥

श्री चैतन्य महाप्रभु ने सनातन गोस्वामी को आदेश दिया कि वे वृन्दावन जाएँ और उन्हें यह बतलाया कि उनके दो भाई पहले ही वहाँ जा चुके हैं।

काँथा-करङ्गिया मोर काङ्गाल भक्त-गण ।वृन्दावने आइले ताँदेर करिह पालन ॥

१८३ ॥

श्री चैतन्य महाप्रभु ने सनातन गोस्वामी से कहा, मेरे जितने भी भक्त वृन्दावन जाते हैं, वे सामान्यतया बहुत निर्धन होते हैं। उनके पास केवल एक फटी रजाई तथा एक छोटा कमंडलु रहता है। अतः हे सनातन, तुम उन्हें शरण देकर उनका पालन करना।

एत बलि' चलिला प्रभु सबा आलिङ्गिया । सबेइ पड़िला तथा मूच्छित हा ॥

१८४॥

यह कहकर श्री चैतन्य महाप्रभु ने सबका आलिंगन किया और जब वे अपने मार्ग पर चलने लगे, तो वे सबके सब मूर्छित होकर भूमि पर गिर पड़े।

कत-क्षणे उठि' सबे दुःखे घरे आइला । सनातन-गोसाञि वृन्दावनेरे चलिला ॥

१८५॥

कुछ समय के बाद सारे भक्त उठे और अत्यन्त दुःखी मन से अपनेअपने घर लौट गये। सनातन गोस्वामी अकेले ही वृन्दावन के लिए चल पड़े।

एथा रूप-गोसाजि ग्रबे मथुरा आइला ।।ध्रुव-घाटे तौरे सुबुद्धि-राय मिलिला ॥

१८६॥

जब रूप गोस्वामी मथुरा पहुँचे, तो उनकी भेंट सुबुद्धि राय से यमुना के तट पर धुवघाट नामक स्थान पर हुई।

पूर्वे ग्रबे सुबुद्धि-राय छिला गौड़े अधिकारी' ।हुसेन-खाँ ‘सैयद' करे ताहार चाकरी ॥

१८७॥

पहले सुबुद्धि राय गौड़देश ( बंगाल) में एक बहुत बड़े जमींदार थे। तब सैयद हुसेन खान उनका नौकर था।

दीघि खोदाइते तारे 'मुन्सीफ' कैला ।।छिद्र पाजा राय तारे चाबुक मारिला ॥

१८८॥

सुबुद्धि राय ने हुसेन खान को एक बड़ी झील खुदवाने का काम सौंपा, किन्तु एक बार उसके काम में त्रुटि पाकर उन्होंने उसे कोड़े से मारा।

पाछे ग्रबे हुसेन-खाँ गौड़े ‘राजा' हइल ।।सुबुद्धि-रायेरे तिंहो बहु बाड़ाइल ॥

१८९॥

बाद में हुसेन खान केन्द्रीय मुसलमानी सरकार द्वारा नवाब नियुक्त किया गया। उसने कृतज्ञतावश सुबुद्धि राय के ऐश्वर्य में वृद्धि की।

तार स्त्री तार अङ्गे देखे मारणेर चिह्न ।सुबुद्धि-रायेरे मारिते कहे राजा-स्थाने ॥

१९०॥

बाद में जब नवाब सैयद हुसेन खान की पत्नी ने उसके शरीर पर चाबुक के निशान देखे, तो उसने उससे सुबुद्धि राय की हत्या कर देने का आग्रह किया।

राजा कहे,---आमार पोष्टा राय हय 'पिता' ।ताहारे मारिमु आमि, भाल नहे कथा ॥

१९१।। हुसेन खान ने उत्तर दिया, सुबुद्धि राय ने बड़ी ही सावधानी से मेरा पालन-पोषण किया है। वे मेरे पिता तुल्य ही थे। अब तुम उन्हें मारने के लिए मुझसे कह रही हो। यह अच्छा प्रस्ताव नहीं है।

स्त्री कहे,-----जाति लह', यदि प्राणे ना मारिबे ।राजा कहे,—जाति निले इँहो नाहि जीबे ॥

१९२॥

अन्तिम विकल्प के रूप में नवाब की पत्नी ने उपदेश दिया कि वह सुबुद्धि राय को अपनी जाति से भ्रष्ट करके उसे मुसलमान बना ले। किन्तु हुसेन खान ने कहा कि यदि वह ऐसा करेगा, तो सुबुद्धि राय जीवित नहीं रहेगा।

स्त्री मरिते चाहे, राजा सङ्कटे पड़िल ।करोंयार पानि तार मुखे देओयाइल ॥

१९३॥

उसके लिए यह संकट आ खड़ा हुआ, क्योंकि उसकी पत्नी सुबुद्धि राय को मार डालने के लिए आग्रह करती रही। अन्त में नवाब ने किसी मुसलमान के जल पीने के घड़े से सुबुद्धि राय के सिर के ऊपर थोड़ासा जल छिड़क दिया।

तबे सुबुद्धि-राय सेइ ‘छद्म' पाजा ।वाराणसी आइला, सब विषय छाड़िया ॥

१९४॥

अपने ऊपर नवाब द्वारा जल छिड़के जाने को एक सुअवसर मानकर सुबुद्धि राय ने अपना परिवार तथा व्यापार छोड़ दिया और वाराणसी चले आये।

प्रायश्चित्त पुछिला तिंहो पण्डितेर गणे ।। ताँरा कहे,—तप्त-घृत खाजा छाड़' प्राणे ॥

१९५ ।। जब सुबुद्धि राय ने वाराणसी के विद्वान ब्राह्मणों से पूछा कि किस तरह मुसलमान बनने का प्रायश्चित्त किया जाए, तो उन्होंने उपदेश दिया कि वे गर्म घी पीकर अपना प्राण छोड़ दें।

केह कहे,--एइ नहे, ‘अल्प' दोष हय ।।शुनिया रहिला राय करिया संशय ॥

१९६॥

जब सुबुद्धि राय ने कुछ अन्य ब्राह्मणों से पूछा, तो उन्होंने कहा कि उन्होंने कोई गर्हित दोष (अपराध) नहीं किया, अतः उसे गरम घी पीकर प्राण नहीं त्यागना चाहिए। फलस्वरूप सुबुद्धि राय संशय में थे कि वे क्या करें? तबे ग्रदि महाप्रभु वाराणसी आइला ।ताँरे मिलि' राय आपन-वृत्तान्त कहिली ।। १९७॥

इसी उलझन में सुबुद्धि राय श्री चैतन्य महाप्रभु से मिले, जब वे वाराणसी में ठहरे थे। सुबुद्धि राय ने सारी स्थिति बतलाई और महाप्रभु से पूछा कि वे क्या करें।

प्रभु कहे,—इहाँ हैते ग्राह' वृन्दावन ।।निरन्तर कर कृष्ण-नाम-सङ्कीर्तन ॥

१९८॥

महाप्रभु ने उन्हें उपदेश दिया, तुम वृन्दावन जाओ और वहाँ हरे कृष्ण मन्त्र का निरन्तर कीर्तन करो।

एक 'नामाभासे' तोमार पाप-दोष ग्राबे । आर 'नाम' लइते कृष्ण-चरण पाइबे ॥

१९९॥

श्री चैतन्य महाप्रभु ने सुबुद्धि राय को यह भी उपदेश दिया “हरे कृष्ण मन्त्र का जप प्रारम्भ करो और जब तुम्हारा जप प्रायः शुद्ध हो जायेगा, तब तुम्हारे सब पापकर्म के फल जाते रहेंगे। भलीभाँति जप करने के बाद तुम्हें कृष्ण के चरणकमलों में शरण मिल सकेगी।

आर कृष्ण-नाम लैते कृष्ण-स्थाने स्थिति ।महा-पातकेर हय एइ प्रायश्चित्त ॥

२०० ॥

जब तुम कृष्ण के चरणकमलों में स्थित होते हो, तो तुम्हें कोई पापमय कर्मफल छू नहीं सकता। सारे पापमय कार्यों का यही सबसे अच्छा समाधान है।

पाजा आज्ञा राय वृन्दावनेरे चलिला ।प्रयाग, अयोध्या दिया नैमिषारण्ये आइला ॥

२०१॥

इस तरह श्री चैतन्य महाप्रभु से वृन्दावन जाने की आज्ञा पाकर सुबुद्धि राय वाराणसी से चल पड़े और प्रयाग, अयोध्या तथा नैमिषारण्य होते हुए वृन्दावन की ओर गये।

कतक दिवस राय नैमिषारण्ये रहिला ।प्रभु वृन्दावन हैते प्रयाग स्राइला ॥

२०२ ॥

सुबुद्धि राय कुछ काल तक नैमिषारण्य में रहे। उसी बीच श्री चैतन्य महाप्रभु वृन्दावन भ्रमण करने के बाद प्रयाग गये।

मथुरा आसिया राय प्रभु-वार्ता पाइल ।।प्रभुर लाग ना पाञा मने बड़ दुःख हैल ॥

२०३॥

मथुरा पहुँचने पर सुबुद्धि राय को महाप्रभु के कार्यक्रम की जानकारी मिली। वे अत्यन्त दुःखी हुए, क्योंकि वे महाप्रभु से सम्पर्क नहीं कर सके।

शुष्क-काष्ठ आनि' राय वेचे मथुराते ।।पाँच छय पैसा हय एक एक बोझाते ॥

२०४॥

सुबुद्धि राय जंगल से सूखी लकड़ी बीनते और मथुरा शहर में लाकर उसे बेचते । उसे हर बोझ के लिए पाँच या छह पैसे मिलते।

आपने रहे एक पैसार चाना चाबाइया ।।आर पैसा बाणिया-स्थाने राखेन धरिया ॥

२०५।। सूखी लकड़ी बेचकर जीविकोपार्जन करने वाले सुबुद्धि राय एक पैसे के भुने चने चबाकर रहते और शेष पैसों को वे किसी बनिये के यहाँ जमा कर देते।

दुःखी वैष्णव देखि' तौरे करान भोजन ।।गौड़ीया आइले दधि, भात, तैल-मर्दन ॥

२०६॥

सुबुद्धि राय अपनी बचत से मथुरा आने वाले बंगाली वैष्णवों को दही खरीदकर देते थे। वह उन्हें पका चावल ( भात ) तथा मालिश के लिए तेल देते। जब वह किसी दुखियारे वैष्णव को देखते, तो वे अपने धन का उपयोग उसे भोजन कराने में करते।

रूप-गोसाजि, आइले ताँरै बहु प्रीति कैला। आपन-सङ्गे ला ‘द्वादश वन' देखाइला ॥

२०७॥

जब रूप गोस्वामी मथुरा आये, तो सुबुद्धि राय प्रेम तथा स्नेहवश अनेक प्रकार से उनकी सेवा करना चाहते थे। वे स्वयं रूप गोस्वामी को वृन्दावन के बारहों वन दिखाने ले गये।

मास-मात्र रूप-गोसाजि रहिला वृन्दावने ।शीघ्र चलि' आइला सनातनानुसन्धाने ॥

२०८॥

रूप गोस्वामी मथुरा तथा वृन्दावन में सुबुद्धि राय के साथ एक मास तक रहे। इसके बाद वे अपने ज्येष्ठ भाई सनातन गोस्वामी की खोज करने के लिए वृन्दावन से चल पड़े।

गङ्गा-तीर-पथे प्रभु प्रयागेरे आइला ।।ताहा शुनि' दुइ-भाइ से पथे चलिला ॥

२०९॥

जब रूप गोस्वामी ने सुना कि श्री चैतन्य महाप्रभु गंगा नदी के तट के मार्ग से होकर प्रयाग चले गये हैं, तो रूप तथा उनका भाई अनुपम महाप्रभु से मिलने उसी मार्ग से होकर गये।

एथा सनातन गोसाञि प्रयागे आसिया ।मथुरा आइला सरान राज-पथ दिया ॥

२१०॥

प्रयाग पहुँचकर सनातन गोस्वामी श्री चैतन्य महाप्रभु की आज्ञा का पालन करते हुए राज मार्ग से होकर वृन्दावन गये।

मथुराते सुबुद्धि-राय ताहारे मिलिला ।रूप-अनुपम-कथा संकलि कहिला ॥

२११॥

जब सनातन गोस्वामी सुबुद्धि राय से मथुरा में मिले, तो उन्होंने उनके छोटे भाइयों रूप गोस्वामी तथा अनुपम के विषय में सब कुछ बतलाया।

गङ्गा-पथे दुइ–भाइ राज-पथे सनातन ।अतएव ताँहा सने ना हैल मिलन ॥

२१२॥

चूँकि सनातन गोस्वामी आम मार्ग से होकर वृन्दावन गये और रूप गोस्वामी तथा अनुपम गंगातट के मार्ग से होकर गये, अतः वे एक दूसरे से नहीं मिल पाये।

सुबुद्धि-राय बहु स्नेह करे सनातने ।। व्यवहार-स्नेह सनातन नाहि माने ॥

२१३॥

सुबुद्धि राय तथा सनातन गोस्वामी संन्यास ग्रहण करने के पूर्व एक दूसरे को जानते थे। अतः सुबुद्धि राय ने सनातन गोस्वामी के साथ बहुत स्नेह प्रदर्शित किया, किन्तु सनातन गोस्वामी उसके भाव तथा स्नेह को स्वीकार करने में संकोच कर रहे थे।

महा-विरक्त सनातन भ्रमेन वने वने ।। प्रति-वृक्षे, प्रति-कुल्ले रहे रात्रि-दिने ॥

२१४॥

संन्यास आश्रम में अत्यन्त उन्नत होने के कारण सनातन गोस्वामी एक वन से दूसरे वन में घूमा करते और कभी-भी पत्थर के बने किसी भी निवासस्थान में आश्रय नहीं लेते थे। वे वृक्षों के नीचे, अथवा कुंजों के नीचे दिन-रात रहा करते।

मथुरा-माहात्म्य-शास्त्र सङ्ग्रह करिया ।। लुप्त-तीर्थ प्रकट कैला वनेते भ्रमिया ॥

२१५॥

श्रील सनातन गोस्वामी ने मथुरा में पुरातत्व खनन के विषय में कुछ पुस्तकें एकत्र कीं और वन में भ्रमण करके उन सारे तीर्थस्थानों का पुनरुद्धार किया।

एइ-मत सनातन वृन्दावनेते रहिला ।। रूप-गोसाजि दुइ–भाइ काशीते आइला ॥

२१६ ॥

सनातन गोस्वामी वृन्दावन में बने रहे और रूप गोस्वामी तथा अनुपम वाराणसी लौट आये।

महाराष्ट्रीय द्विज, शेखर, मिश्र-तपन । तिन-जन सह रूप करिला मिलन ॥

२१७ ॥

जब रूप गोस्वामी बनारस आये, तो वे महाराष्ट्रीय ब्राह्मण, चन्द्रशेखर तथा तपन मिश्र से मिले।

शेखरेर घरे वासा, मिश्र-घरे भिक्षा ।मिश्र-मुखे शुने सनातने प्रभुर 'शिक्षा' ॥

२१८॥

वाराणसी में रूप गोस्वामी चन्द्रशेखर के घर में रहे और तपन मिश्र के घर प्रसाद ग्रहण किया। इस तरह उन्होंने वाराणसी में श्री चैतन्य महाप्रभु द्वारा सनातन गोस्वामी को दी गई शिक्षाओं को सुना।

काशीते प्रभुर चरित्र शुनि' तिनेर मुखे ।सन्यासीरे कृपा शुनि' पाइला बड़ सुखे ॥

२१९॥

वाराणसी में रहते हुए रूप गोस्वामी ने श्री चैतन्य महाप्रभु के समस्त कार्यकलापों के विषय में सुना। जब उन्होंने मायावादी संन्यासियों का उनके द्वारा किये गये उद्धार के विषय में सुना, तो वे बहुत सुखी हुए।

महाप्रभुर उपर लोकेर प्रणति देखिया ।। सुखी हैला लोक-मुखे कीर्तन शुनिया ॥

२२० ॥

जब रूप गोस्वामी ने देखा कि वाराणसी के सारे लोगों ने श्री चैतन्य महाप्रभु का आदर किया है, तो वे अत्यन्त सुखी हुए। यहाँ तक कि उन्होंने सामान्य लोगों से भी कहानियाँ सुनीं।

दिन दश रहि रूप गौड़े यात्रा कैल ।सनातन-रूपेर एइ चरित्र कहिल ॥

२२१॥

वाराणसी में लगभग दस दिन रुककर रूप गोस्वामी बंगाल लौट गये। इस तरह मैंने रूप तथा सनातन के कार्यकलापों का वर्णन किया है | एथा महाप्रभु यदि नीलाद्रि चलिला ।निर्जन वन-पथे ग्राइते महा सुख पाइला ॥

२२२ ॥

जब श्री चैतन्य महाप्रभु जगन्नाथ पुरी लौट रहे थे, तब वे एकान्त जंगल से होकर निकले और ऐसा करने में उन्हें परम सुख प्राप्त हुआ।

सुखे चलि' आइसे प्रभु बलभद्र-सङ्गे।।पूर्ववत्मृगादि-सङ्गे कैला नाना-रङ्गे ॥

२२३॥

श्री चैतन्य महाप्रभु प्रसन्नतापूर्वक अपने सेवक बलभद्र भट्टाचार्य के साथ जगन्नाथ पुरी लौट आये। महाप्रभु ने पहले की ही तरह जंगल के पशुओं के साथ अनेक मनोहर क्रीड़ाएँ कीं।

आठारनालाते आसि' भट्टाचार्य ब्राह्मणे ।पाठान्ना बोलाइला निज-भक्त-गणे ॥

२२४॥

जब श्री चैतन्य महाप्रभु जगन्नाथ पुरी के निकट आठारनाला नामक स्थान पर पहुँचे, तो उन्होंने बलभद्र भट्टाचार्य को अपने भक्तों को बुला लाने के लिए भेजा।

शुनिया भक्तेर गण ग्रेन पुनरपि जीला । देहे प्राण आइले, ग्रेन इन्द्रिय उठिला ॥

२२५॥

बलभद्र भट्टाचार्य से महाप्रभु के आगमन का समाचार सुनकर भक्तगण इतने सुखी हुए मानों उन्हें अपने प्राण वपास मिले हो। ऐसा लग रहा था मानों उनके शरीरों में पुनः चेतना लौट आई हो। उनकी इन्द्रियाँ भी चलायमान हो उठीं।

आनन्दे विह्वल भक्त-गण धाञा आइला ।नरेन्द्रे आसिया सबे प्रभुरे मिलिला ॥

२२६॥

परम आनन्द से विह्वल होकर सारे भक्त दौड़कर महाप्रभु से भेंट करने आये। वे उनसे विख्यात झील नरेन्द्र सरोवर के तट पर मिले।

पुरी-भारतीर प्रभु वन्दिलेन चरण ।दोंहे महाप्रभुरे कैला प्रेम-आलिङ्गन ॥

२२७।। जब परमानन्द पुरी तथा ब्रह्मानन्द भारती श्री चैतन्य महाप्रभु से मिले, तो महाप्रभु ने अपने गुरु के इन गुरु-भाइयों को सादर नमस्कार किया। तब उन दोनों ने प्रेमपूर्वक महाप्रभु का आलिंगन किया।

दामोदर-स्वरूप, पण्डित-गदाधर ।। जगदानन्द, काशीश्वर, गोविन्द, वक्रेश्वर ॥

२२८॥

स्वरूप दामोदर, गदाधर पण्डित, जगदानन्द, काशीश्वर, गोविन्द तथा वक्रेश्वर-ये सारे भक्त महाप्रभु से मिलने आये।

काशी-मिश्र, प्रद्युम्न-मिश्र, पण्डित-दामोदर ।हरिदास-ठाकुर, आर पण्डित-शङ्कर ॥

२२९॥

काशी मिश्र, प्रद्युम्न मिश्र, दामोदर पण्डित, हरिदास ठाकुर तथा शंकर पण्डित भी महाप्रभु से मिलने वहाँ आये।

आर सब भक्त प्रभुर चरणे पड़िला ।सबा आलिङ्गिया प्रभु प्रेमाविष्ट हैला ॥

२३०॥

अन्य सारे भक्त भी आये और महाप्रभु के चरणकमलों पर गिर पड़े। बदले में श्री चैतन्य महाप्रभु ने अत्यन्त प्रेमविभोर होकर उन सबको आलिंगन किया।

आनन्द-समुद्रे भासे सब भक्त-गणे ।सबा लञा चले प्रभु जगन्नाथ-दरशने ॥

२३१॥

इस तरह वे सब आनन्द सागर में मग्न हो गये। तत्पश्चात् महाप्रभु तथा उनके सारे भक्त अर्चाविग्रह-दर्शन के लिए जगन्नाथ मन्दिर की ओर बढ़े।

जगन्नाथ देखि' प्रभु प्रेमाविष्ट हैला ।भक्त-सङ्गे बहु-क्षण नृत्य-गीत कैला ॥

२३२॥

ज्योंही श्री चैतन्य महाप्रभु ने मन्दिर में जगन्नाथ का दर्शन किया, वे तुरन्त प्रेमाविष्ट हो गये। वे लम्बे समय तक अपने भक्तों के साथ कीर्तन तथा नृत्य करते रहे।

जगन्नाथ-सेवक आनि माला-प्रसाद दिला ।। तुलसी पड़िछा आसि’ चरण वन्दिला ॥

२३३॥

पुरोहितगण तुरन्त ही उन सबके लिए फूल-मालाएँ तथा प्रसाद ले आये। मन्दिर का तुलसी नामक चौकीदार भी आया और उसने श्री चैतन्य महाप्रभु को नमस्कार किया।

‘महाप्रभु आइला'—ग्रामे कोलाहल हैल ।। सार्वभौम, रामानन्द, वाणीनाथ मिलिल ।। २३४॥

जब यह समाचार प्रचारित हो गया कि श्री चैतन्य महाप्रभु जगन्नाथ पुरी में आ गये हैं, तो सार्वभौम भट्टाचार्य, रामानन्द राय तथा वाणीनाथ राय आदि भक्त उनसे मिलने आये।

सबा सङ्गे लञा प्रभु मिश्र-वासा आइला । सार्वभौम, पण्डित-गोसाजि निमन्त्रण कैला ॥

२३५॥

तब महाप्रभु तथा उनके भक्त काशी मिश्र के निवासस्थान पर गये। सार्वभौम भट्टाचार्य तथा पण्डित गोसांई ने भी महाप्रभु को अपने घरों में भोजन करने के लिए आमन्त्रित किया।

प्रभु कहे,-महा-प्रसाद आन' एई स्थाने । सबा-सङ्गे इहाँ आजि करिमु भोजने” ॥

२३६॥

उनका आमन्त्रण स्वीकार करके महाप्रभु ने उनसे कहा कि वे सारा प्रसाद वहीं ले आयें, जिससे वे अपने भक्तों के साथ भोजन कर सकें।

तबे हे जगन्नाथ-प्रसाद आनिल ।सब-सङ्गे महाप्रभु भोजन करिल ॥

२३७॥

श्री चैतन्य महाप्रभु का आदेश पाकर सार्वभौम भट्टाचार्य तथा पण्डित गोसांई दोनों जगन्नाथ मन्दिर से पर्याप्त प्रसाद ले आये। तब महाप्रभु ने अपने स्थान पर सबके साथ भोजन किया।

एइ त कहिलँ,—प्रभु देखि' वृन्दावन ।पुनः करिलेन ग्रैछे नीलाद्रि गमन ।। २३८॥

इस तरह मैंने इसका वर्णन किया कि श्री चैतन्य महाप्रभु किस तरह वृन्दावन से जगन्नाथ पुरी लौट आये।

इहा येइ श्रद्धा करि' करये श्रवण ।अचिरात्पाय सेइ चैतन्य-चरण ॥

२३९॥

जो भी श्रद्धा तथा प्रेम के साथ श्री चैतन्य महाप्रभु की लीलाओं को सुनता है, वह शीघ्र ही उनके चरणकमलों की शरण प्राप्त करता है।

मध्य-लीलार करिहुँ एइ दिग्दरशन । छय वत्सर कैला ग्रैछे गमनागमन ॥

२४०॥

इस तरह मैंने मध्यलीला का सारांश दिया है, जोकि श्री चैतन्य महाप्रभु की जगन्नाथ पुरी आने-जाने की यात्राओं का वर्णन है। निस्सन्देह, महाप्रभु छह वर्षों तक निरन्तर इधर से उधर यात्रा करते रहे।

शेष अष्टादश वत्सर नीलाचले वास । भक्त-गण-सङ्गे करे कीर्तन-विलास ॥

२४१॥

चौबीस वर्ष की आयु में संन्यास ग्रहण करने के बाद श्री चैतन्य महाप्रभु चौबीस वर्षों तक और जीवित रहे। इनमें से छह वर्षों तक वे भारत-भर में विस्तृत यात्राएँ करते रहे-कभी जगन्नाथ पुरी आते तो कभी वहाँ से बाहर जाते। छह वर्षों तक यात्रा करने के बाद महाप्रभु ने जगन्नाथ पुरी में निवास किया और अपने जीवन के शेष अठारह वर्षों तक वहीं रहे। इन अठारह वर्षों में वे मुख्यतया अपने भक्तों के साथ हरे कृष्ण कीर्तन करते रहे।

मध्य-लीलार क्रम एबे करि ।। कैले हय कथार आस्वाद ॥

२४२॥

अब मैं मध्यलीला के सारे अध्यायों का क्रमवार पुनः अवलोकन करूँगा, जिससे इन विषयों के दिव्य गुणों का आस्वादन किया जा सके।

प्रथम परिच्छेदे—शेष-लीलार सूत्र-गण ।। तथि-मध्ये कोन भागेर विस्तार वर्णन ॥

२४३ ॥

प्रथम अध्याय में मैंने अन्त्यलीला की रूपरेखा दी है। इस अध्याय में महाप्रभु की उन कुछ लीलाओं का विस्तृत वर्णन है, जो उनके जीवन के अन्तिम काल में घटीं।

द्वितीय परिच्छेदे—प्रभुर प्रलाप-वर्णन ।। तथि-मध्ये नाना-भावेर दिग्दरशन ॥

२४४॥

द्वितीय अध्याय में मैंने श्री चैतन्य महाप्रभु के द्वारा पागल व्यक्ति जैसी बातें करने का वर्णन किया है। इस अध्याय में यह इंगित किया गया है। कि श्री चैतन्य महाप्रभु किस तरह विभिन्न भावभंगिमाएँ प्रकट करते थे।

तृतीय परिच्छेदे प्रभुर कहिलँ सन्यास ।।आचार घरे ग्रैछे करिला विलास ॥

२४५ ॥

तीसरे अध्याय में मैंने महाप्रभु द्वारा संन्यास ग्रहण करने तथा अद्वैत आचार्य के घर पर उनके द्वारा अपनी लीलाओं का आस्वादन करने का वर्णन किया है।

चतुर्थे–माधव पुरीर चरित्र-आस्वादन ।गोपाल स्थापन, क्षीर-चुरिर वर्णन ॥

२४६॥

चौथे अध्याय में मैंने माधवेन्द्र पुरी द्वारा गोपाल अर्चाविग्रह की स्थापना का तथा गोपीनाथ द्वारा रेमुणा में खीरपात्र चुराने का वर्णन किया है।

पञ्चमे---साक्षि-गोपाल-चरित्र-वर्णन ।नित्यानन्द कहे, प्रभु करेन आस्वादन ॥

२४७॥

पाँचवे अध्याय में मैंने साक्षीगोपाल की कथा कही है। इसे नित्यानन्द प्रभु ने सुनाया था और श्री चैतन्य महाप्रभु ने सुना था।

षष्ठे–सार्वभौमेर करिला उद्धार ।सप्तमे–तीर्थ-यात्रा, वासुदेव निस्तार ॥

२४८॥

छठे अध्याय में मैंने बतलाया है कि सार्वभौम भट्टाचार्य को उद्धार कैसे हुआ और सातवें अध्याय में महाप्रभु द्वारा विभिन्न तीर्थस्थलों की यात्रा करने और उनके द्वारा वासुदेव के उद्धार का वर्णन किया है।

अष्टमे--रामानन्द-संवाद विस्तार ।‘सर्व-सिद्धान्तेर सार' ॥

२४९॥

आठवें अध्याय में मैंने रामानन्द राय के साथ महाप्रभु के विस्तृत संवाद का उल्लेख किया है। रामानन्द द्वारा दिये गये समस्त वैदिक साहित्य के सार को महाप्रभु ने स्वयं सुना।

नवमे–कहिलँ दक्षिण-तीर्थ-भ्रमण ।।दशमे–कहिलें सर्व-वैष्णव-मिलन ॥

२५० ॥

नौवें अध्याय में मैंने महाप्रभु की दक्षिण भारत एवं विविध तीर्थस्थानों की यात्रा का वर्णन किया है। दसवें अध्याय में मैंने महाप्रभु के सभी भक्तों से मिलन का वर्णन किया है।

एकादशे–श्री-मन्दिरे ‘बेड़ा-सङ्कीर्तन' ।।द्वादशे-गुण्डिचा-मन्दिर-मार्जन-क्षालन ॥

२५१॥

ग्यारहवें अध्याय में मैंने उस हरे कृष्ण महामन्त्र के महान् संकीर्तन का वर्णन किया है, जिससे महाप्रभु घिरे थे। बारहवें अध्याय में मैंने गुण्डिचा मन्दिर की सफाई और धुलाई का वर्णन किया है।

त्रयोदशे—रथ-आगे प्रभुर नर्तन । चतुर्दशे–‘हेरा-पञ्चमी'-यात्रा-दरशन ।। २५२॥

तेरहवें अध्याय में मैंने जगन्नाथजी के रथ के आगे-आगे श्री चैतन्य महाप्रभु के नृत्य का वर्णन किया है। चौदहवें अध्याय में हेरापंचमी उत्सव का विवरण दिया गया है।

तार मध्ये व्रज-देवीर भावेर श्रवण ।। स्वरूप कहिला, प्रभु कैला आस्वादन ॥

२५३॥

चौदहवें अध्याय में ही स्वरूप दामोदर द्वारा गोपियों के भाव का वर्णन और श्री चैतन्य महाप्रभु द्वारा उसका आस्वादन भी दिया गया है।

पञ्चदशे–भक्तेर गुण श्री-मुखे कहिल ।। सार्वभौम-घरे भिक्षा, अमोघ तारिल ॥

२५४॥

पन्द्रहवें अध्याय में मैंने यह बतलाया है कि श्री चैतन्य महाप्रभु ने अपने भक्तों के गुणों की अत्यधिक प्रशंसा कैसे की और सार्वभौम भट्टाचार्य के घर पर दोपहर का भोजन कैसे ग्रहण किया। उस समय उन्होंने अमोघ का उद्धार किया।

षोड़शे-वृन्दावन-यात्रा गौड़-देश-पथे ।। पुनः नीलाचले आइला, नाटशाला हैते ॥

२५५ ॥

सोलहवें अध्याय में श्री चैतन्य महाप्रभु का वृन्दावन के लिए प्रस्थान और बंगाल होकर यात्रा करने का वर्णन है। बाद में महाप्रभु कानाइ नाटशाला से जगन्नाथ पुरी लौट आये।

सप्तदशे–वनपथे मथुरा-गमन ।अष्टादशे- वृन्दावन-विहार-वर्णन ॥

२५६॥

सत्रहवें अध्याय में मैंने झारखण्ड के विकट जंगल से होकर महाप्रभु की यात्रा और मथुरा में उनके आगमन का वर्णन किया है। अठारहवें अध्याय में मैंने वृन्दावन के जंगल में महाप्रभु के भ्रमण का वर्णन दिया है।

ऊनविंशे मथुरा हैते प्रयाग-गमन ।तार मध्ये श्री-रूपेरे शक्ति-सञ्चारण ॥

२५७।। उन्नीसवें अध्याय में मैंने इस बात का वर्णन किया है कि महाप्रभु मथुरा से प्रयाग लौट आते हैं और श्री रूप गोस्वामी को भक्ति का प्रसार करने के लिए शक्ति प्रदान करते हैं।

विंशति परिच्छेदे—सनातनेर मिलन ।।तार मध्ये भगवानेर स्वरूप-वर्णन ॥

२५८॥

बीसवें अध्याय में सनातन गोस्वामी से महाप्रभु की भेंट का वर्णन हुआ है। महाप्रभु ने विस्तार से पूर्ण पुरुषोत्तम भगवान् के स्वरूप का वर्णन किया है।

एकविंशे कृष्णैश्वर्य-माधुर्य वर्णन । द्वाविंशे द्विविध साधन-भक्तिर विवरण ॥

२५९॥

इक्कीसवें अध्याय में कृष्ण के सौन्दर्य तथा ऐश्वर्य का वर्णन है और बाइसवें अध्याय में भक्ति सम्पन्न करने के दो प्रकारों का वर्णन है।

त्रयोविंशे--प्रेम-भक्ति-रसेर कथन । चतुर्विशे–'आत्मारामाः'-श्लोकार्थ वर्णन ॥

२६०॥

तेईसवें अध्याय में दिव्य भक्ति के रसों का वर्णन हुआ है और चौबीसवें अध्याय में महाप्रभु द्वारा आत्माराम श्लोक की व्याख्या दी गई है।

पञ्चविंशे काशी-वासीरे वैष्णव-करण । काशी हैते पुनः नीलाचले आगमन ॥

२६१॥

पच्चीसवें अध्याय में काशीवासियों के वैष्णव बनने तथा वाराणसी से महाप्रभु के पुनः नीलाचल चले जाने का वर्णन है।

पञ्चविंशति परिच्छेदे एइ कैलें ।। ग्राहार श्रवणे हय ग्रन्थार्थ-आस्वाद ॥

२६२॥

इस तरह मैंने इन लीलाओं का सार पच्चीसवें अध्याय में दे दिया है। इन्हें सुनकर इस शास्त्र के सम्पूर्ण तात्पर्य को समझा जा सकता है।

सङ्क्षेपे कहिलॅ एइ मध्य-लीलार सार । कोटि-ग्रन्थे वर्णन ना ग्राय इहार विस्तार ॥

२६३ ॥

मैंने अब मध्यलीला के सम्पूर्ण विषय का सारांश दे दिया है। इन लीलाओं का विस्तृत वर्णन करोड़ों पुस्तकों में भी नहीं किया जा सकता।

जीव निस्तारिते प्रभु भ्रमिला देशे-देशे ।आपने आस्वादि' भक्ति करिला प्रकाशे ॥

२६४॥

समस्त पतितात्माओं का उद्धार करने के लिए महाप्रभु ने देश-प्रदेश में भ्रमण किया। उन्होंने भक्ति के दिव्य आनन्द का स्वयं आस्वादन किया और उसी के साथ-साथ भक्ति मत का सर्वत्र प्रसार किया।

कृष्ण-तत्त्व, भक्ति-तत्त्व, प्रेम-तत्त्व सार । भाव-तत्त्व, रस-तत्त्व, लीला-तत्त्व आर ॥

२६५ ॥

कृष्णभावना का अर्थ है कृष्ण के सत्य को, भक्ति के सत्य को, भगवत्प्रेम के सत्य को, भावात्मक प्रेम के सत्य को, दिव्य रसों के सत्य को तथा भगवान् की लीलाओं के सत्य को समझना।

श्री-भागवत-तत्त्व-रस करिला प्रचारे । कृष्ण-तुल्य भागवत, जानाइला संसारे ॥

२६६॥

श्री चैतन्य महाप्रभु ने दिव्य सत्यों का तथा श्रीमद्भागवत के रसों का स्वयं प्रचार किया है। श्रीमद्भागवत तथा पूर्ण पुरुषोत्तम भगवान् अभिन्न हैं, क्योंकि श्रीमद्भागवत श्रीकृष्ण का शब्द अवतार है।

भक्त लागि' विस्तारिला आपन-वदने । काहाँ भक्त-मुखे कहाइ शुनिला आपने ॥

२६७ ॥

श्री चैतन्य महाप्रभु ने श्रीमद्भागवत के प्रयोजन का प्रचार किया। उन्होंने कभी अपने भक्तों के लाभ के लिए स्वयं उपदेश दिया और कभी अपने किसी भक्त को बोलने के लिए शक्ति प्रदान करके स्वयं सुना।

श्री-चैतन्य-सम आर कृपालु वदान्य ।भक्त-वत्सल ना देखि त्रिजगते अन्य ॥

२६८॥

तीनों लोकों के भीतर सारे विवेकशील व्यक्ति इस प्रमाण को स्वीकार करते हैं कि श्री चैतन्य महाप्रभु से न तो कोई अधिक कृपालु तथा वदान्य है और न उनके समान अपने भक्तों पर अन्य कोई इतना वत्सल है।

श्रद्धा करि' एइ लीला शुन, भक्त-गण ।इहार प्रसादे पाइबा चैतन्य-चरण ॥

२६९॥

सारे भक्तों को श्री चैतन्य महाप्रभु की लीलाओं को श्रद्धापूर्वक तथा प्रेमपूर्वक सुनना चाहिए। इस तरह भगवत्कृपा से उनके चरणकमलों में शरण प्राप्त हो सकती है।

इहार प्रसादे पाइबा कृष्ण-तत्त्व-सार । सर्व-शास्त्र-सिद्धान्तेर इहाँ पाइबा पार ॥

२७०॥

श्री चैतन्य महाप्रभु की लीलाओं को समझने से मनुष्य कृष्ण के विषय में सत्य को समझ सकता है। और कृष्ण को समझने पर वह विविध प्रामाणिक शास्त्रों में वर्णित सारे ज्ञान की सीमा को समझ सकता है।

कृष्ण-लीला अमृत-सार, तार शत शत धार, | दश-दिके वहे ग्राहा हैते ।। से चैतन्य-लीला हय, सरोवर अक्षय, मनो-हंस चराह' ताहाते ॥

२७१ ॥

कृष्ण की लीलाएँ समस्त अमृत का सार हैं और वह अमृत सैकड़ों धाराओं में सभी दिशाओं में बहता है। श्री चैतन्य महाप्रभु की लीलाएँ सनातन सरोवर हैं। मनुष्य को चाहिए कि इस दिव्य सरोवर में अपने मनरूपी हंस को तैरने दे।

भक्त-गण, शुन मोर दैन्य-वचन तोमा-सबार पद-धूलि, अङ्गे विभूषण करि', ।।किछु मुजि करो निवेदन ।। २७२॥

हे समस्त भक्तों, मैं अत्यन्त विनयपूर्वक आपके चरणकमलों पर अपने आपको अर्पित करता हूँ और आपके चरणों की धूल को अपने शरीर पर आभूषण के समान धारण करता हूँ। हे भक्तों, कृपा करके मेरी एक बात और सुनो।

कृष्ण-भक्ति-सिद्धान्त-गण, ग्राते प्रफुल्ल पद्म-वन,तार मधु करि' आस्वादन ।। प्रेम-रस-कुमुद-वने, प्रफुल्लित रात्रि-दिने,ताते चराओ मनो-भृङ्ग-गण ॥

२७३॥

कृष्ण-भक्ति कमल के फूलों के प्रफुल्लित जंगल के समान है, जिसमें प्रचुर मधु है। मैं हर एक से इस मधु को चखने की प्रार्थना करता हूँ। यदि सारे ज्ञानी अपने मन रूपी भौंरों को इस कमल के जंगल में ले आयें और हर्षित होकर दिन-रात कृष्ण के प्रेम का आनन्द लूटें, तो उनका ज्ञान पूरी तरह दिव्य रूप से तुष्ट हो जायेगा।

नाना-भावेर भक्त-जन, हंस-चक्रवाक-गण,याते सबे' करेन विहार ।। कृष्ण-केलि सुमृणाल, ग्राहा पाइ सर्व-काल,भक्त-हंस करये आहार ॥

२७४॥

जिन भक्तों को कृष्ण से सम्बन्ध है, वे हंसों तथा चक्रवाकों ( चकोर) के समान हैं, जो कमलों के वन में क्रीड़ा करते हैं। उन कमल की कलियाँ कृष्ण की लीलाएँ हैं और वे हंस-तुल्य भक्तों के लिए पकवान हैं। भगवान् श्रीकृष्ण सदैव अपनी दिव्य लीलाओं में लगे रहते हैं, अतः भक्तगण श्री चैतन्य महाप्रभु के चरणचिह्नों पर चलकर उन कमल-कलियों को सदैव ग्रहण कर सकते हैं, क्योंकि वे कृष्ण की लीलाएँ हैं।

सेइ सरोवरे गिया, हंस-चक्रवाक हा,सदा ताहाँ करह विलास । खण्डिबे सकल दुःख, पाइबा परम सुख,अनायासे हबे प्रेमोल्लास ॥

२७५॥

श्री चैतन्य महप्रभु के सारे भक्तों को उस सरोवर में जाना चाहिए और श्री चैतन्य महाप्रभु के चरणकमलों की शरण में सदैव रहकर उस दिव्य जल में हंस तथा चक्रवाक पक्षी बनना चाहिए। उन्हें भगवान् श्रीकृष्ण की सेवा करते रहना चाहिए और सदा जीवन का सुख भोगना चाहिए। इस तरह सारे दुःख कम हो जायेंगे, भक्तों को परम सुख मिलेगा तथा उल्लासपूर्ण भगवत्प्रेम का उदय होगा।

एइ अमृत अनुक्षण, साधु महान्त-मेघ-गण,विश्वोद्याने करे वरिषण ।। ताते फले अमृत-फल, भक्त खाय निरन्तर,तार शेषे जीये जग-जन ॥

२७६ ॥

जिन भक्तों ने श्री चैतन्य महाप्रभु के चरणकमलों की शरण ले रखी है, वे सारे विश्व में अमृतमय भक्ति के वितरण का उत्तरदायित्व लेते हैं। वे उन बादलों के समान हैं, जो इस जगत् में भगवत्प्रेम रूपी फल का पोषण करने वाली भूमि पर जल बरसाते हैं। भक्तगण फल को जीभरकर खाते हैं और जो कुछ शेष बचता है, वह साधारण लोग ग्रहण करते हैं। इस तरह वे सुखपूर्वक रहते हैं।

चैतन्य-लीला—अमृत-पूर, कृष्ण-लीला—सुकर्पूर,दुहे मिलि' हय सुमाधुर्य ।। साधु-गुरु-प्रसादे, ताहा ग्रेइ आस्वादे,सेइ जाने माधुर्य-प्राचुर्य ॥

२७७॥

श्री चैतन्य महाप्रभु की लीलाएँ अमृत से पूर्ण हैं और श्रीकृष्ण की लीलाएँ कपूर के समान हैं। जब इन दोनों को मिला दिया जाता है, तो इनका स्वाद अत्यन्त मधुर हो जाता है। शुद्ध भक्तों की कृपा से जो भी उनका आस्वादन करता है, वह उस मधुरता की गहराई को समझ सकता है।

ये लीला-अमृत विने, खाय यदि अन्न-पाने,तबे भक्तेर दुर्बल जीवन ।। ग्रार एक-बिन्दु-पाने, उत्फुल्लित तनु-मने,हासे, गाय, करये नर्तन ॥

२७८ ॥

लोग पर्याप्त अन्न खा-खाकर हृष्ट-पुष्ट बनते हैं, किन्तु जो भक्त केवल सामान्य अन्न खाता है और श्री चैतन्य महाप्रभु तथा कृष्ण की दिव्य लीलाओं का आस्वादन नहीं करता, वह धीरे-धीरे दुर्बल हो जाता है और दिव्य पद से नीचे गिर जाता है। किन्तु यदि कोई कृष्ण की लीलाओं के अमृत की एक बूंद भी पी लेता है, तो उसके शरीर तथा मन प्रफुल्लित हो उठते हैं और वह हँसने, गाने तथा नाचने लगता है।

ए अमृत कर पान, ग्रार सम नाहि आन,चित्ते करि' सुदृढ़ विश्वास ।। ना पड़' कुतर्क-गर्ते, अमेध्य कर्कश आवर्ते,| ग्राते पड़िले हय सर्व-नाश ॥

२७९॥

पाठकों को इस अद्भुत अमृत का पान करना चाहिए, क्योंकि इसके समान अन्य कुछ नहीं है। उन्हें अपने मनों के भीतर श्रद्धा को दृढ़ बनाये रखकर सावधान रहना चाहिए कि वे झूठे तर्को या दुर्भाग्यपूर्ण परिस्थितियों के भंवर-जाल में न गिरें। यदि कोई ऐसी स्थिति में गिर जाता है, तो उसका सर्वनाश हो जाता है।

श्री-चैतन्य, नित्यानन्द, अद्वैतादि भक्त-वृन्द,आर व्रत श्रोता भक्तगण । तोमा-सबार श्री-चरण, करि शिरे विभूषण,ग्राहा हैते अभीष्ट-पूरण ॥

२८०॥

अन्त में मैं श्री चैतन्य महाप्रभु, नित्यानन्द प्रभु, अद्वैत प्रभु तथा अन्य समस्त भक्तों तथा पाठकों से निवेदन करता हूँ कि मैं आप सबके चरणकमलों को अपने सिर पर मुकुट की भाँति धारण करता हूँ। इस तरह मेरा अभीष्ट पूरा हो जायेगा।

श्री-रूप-सनातन-रघुनाथ-जीव-चरण, | शिरे धरि,—यार करों आश ।। कृष्ण-लीलामृतान्वित, चैतन्य-चरितामृत,कहे किछु दीन कृष्णदास ॥

२८१॥

श्रील रूप गोस्वामी, श्री सनातन गोस्वामी, रघुनाथ दास गोस्वामी, रघुनाथ भट्ट गोस्वामी तथा जीव गोस्वामी के चरणों को अपने सिर पर रखकर मैं सदैव उनकी कृपा की इच्छा करता हूँ। इस तरह मैं कृष्णदास श्री चैतन्य महाप्रभु की लीलाओं के अमृत का वर्णन करने का विनम्र प्रयास कर रहा हूँ, जोकि भगवान् कृष्ण की लीलाओं के साथ मिलीजुली हैं।

श्रीमन्मदन-गोपाल-गोविन्द-देव-तुष्टये ।चैतन्यार्पितमस्त्वेतच्चैतन्य-चरितामृतम् ॥

२८२॥

श्री मदनगोपाल तथा गोविन्द देव की तुष्टि के लिए मैं प्रार्थना करता हूँ कि चैतन्य-चरितामृत नामक यह ग्रन्थ श्रीकृष्ण चैतन्य महाप्रभु को अर्पित की जाए।"

तदिदमति-रहस्यं गौर-लीलामृतं ग्रत्खल-समुदय-कोलैर्नादृतं तैरलभ्यम् । क्षतिरियमिह का मे स्वादितं यत्समन्तात् ।सहृदय-सुमनोभिर्मोदमेषां तनोति ॥

२८३॥

यह श्रीचैतन्य-चरितामृत, जिसमें श्री चैतन्य महाप्रभु की लीलाएँ है, अत्यन्त रहस्यमय ग्रन्थ है। यह समस्त भक्तों का प्राणधन है। जो लोग इस ग्रन्थ का आस्वादन करने के अयोग्य हैं, जो शूकरों तथा कूकरों की तरह ईष्र्यालु हैं, वे निश्चित रूप से इसकी प्रशंसा नहीं करेंगे। किन्तु इससे मेरे प्रयास को क्षति नहीं पहुँचेगी। श्री चैतन्य महाप्रभु की ये लीलाएँ अवश्य ही उन सारे साधु पुरुषों को अच्छी लगेंगी जिनके हृदय स्वच्छ हैं। वे अवश्य ही इसका आनन्द लूटेंगे। हम चाहते हैं कि इससे उनका आनन्द अधिकाधिक बढ़े।

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