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अध्याय तीन: श्रील हरिदास ठाकुर की महिमा

वन्देऽहं श्री-गुरोः श्री-युत-पद-कमलं श्री-गुरूवैष्णवांश्च ।श्री-रूपं साग्रजातं सह-गण-रघुनाथान्वितं तं स-जीवम् । साद्वैतं सावधूतं परिजन-सहितं कृष्ण-चैतन्य-देवं ।श्री-राधा-कृष्ण-पादान्सह-गण-ललिता-श्री-विशाखान्वितांश्च ॥

१।। मैं अपने गुरु तथा भक्ति-मार्ग के अन्य सारे उपदेशकों के चरणकमलों में सादर नमस्कार करता हूँ। मैं सारे वैष्णवों, श्रील रूप गोस्वामी, श्रील सनातन गोस्वामी, श्री रघुनाथ दास गोस्वामी, श्री जीव गोस्वामी समेत छहों गोस्वामियों तथा उनके संगियों को सादर नमस्कार करता हूँ। मैं श्री अद्वैत आचार्य प्रभु, श्री नित्यानन्द प्रभु, श्री चैतन्य महाप्रभु तथा श्रीवास ठाकुर आदि उनके सारे भक्तों को सादर नमस्कार करता हूँ। तत्पश्चात् मैं भगवान् श्रीकृष्ण, श्रीमती राधारानी तथा ललिता, विशाखा आदि समस्त गोपियों को सादर नमस्कार करता हूँ।"

जय जय गौरचन्द्र जय नित्यानन्द ।जयाद्वैत-चन्द्र जय गौर-भक्त-वृन्द ॥

२॥

श्री चैतन्य महाप्रभु की जय हो! श्री नित्यानन्द प्रभु की जय हो! श्री अद्वैत आचार्य की जय हो! तथा श्री चैतन्य महाप्रभु के सारे भक्तों की जय" पुरुषोत्तमे एक उड़िया-ब्राह्मण-कुमार।पितृ-शून्य, महा-सुन्दर, मृदु-व्यवहार ॥

३॥

जगन्नाथ पुरी में एक बालक था, जो उड़ीसा के निवासी एक ब्राह्मण का पुत्र था, किन्तु बाद में उसका पिता नहीं रहा। इस बालक के शारीरिक लक्षण अत्यन्त सुन्दर थे और उसका आचरण अत्यन्त शालीन था।"

प्रभु-स्थाने नित्य आइसे, करे नमस्कार ।। प्रभु-सने बात् कहे प्रभु-'प्राण' तार ॥

४॥

प्रभुते ताहार प्रीति, प्रभु दया करे ।।दामोदर तार प्रीति सहिते ना पारे ॥

५॥

यह बालक नित्य ही श्री चैतन्य महाप्रभु के पास आता और उन्हें सादर नमस्कार करता। वह श्री चैतन्य महाप्रभु से खुलकर बातें करता, क्योंकि महाप्रभु उसके प्राणस्वरूप थे, किन्तु महाप्रभु के साथ इस बालक की घनिष्ठता तथा उसके प्रति महाप्रभु की दया दामोदर पण्डित को असह्य हो रही थी।"

बार बार निषेध करे ब्राह्मण-कुमारे । प्रभुरे ना देखिले सेइ रहिते ना पारे ॥

६॥

दामोदर पण्डित इस ब्राह्मण बालक को महाप्रभु के पास जाने से । बार-बार मना करते, किन्तु वह बालक श्री चैतन्य महाप्रभु के दर्शन किये बिना घर पर रहना बरदाश्त नहीं कर सकता था।"

नित्य आइसे, प्रभु तारे करे महा-प्रीत । याँहा प्रीति ताँहा आइसे,—बालकेर रीत ॥

७॥

यह बालक नित्य ही महाप्रभु के पास आता और वे उसके साथ बहुत स्नेह का व्यवहार करते। यह किसी भी बालक का स्वभाव है कि वह उस व्यक्ति से मिलने जाता है, जो उसे स्नेह करता है।"

ताहा देखि' दामोदर दुःख पाय मने । बलिते ना पारे, बालक निषेध ना माने ॥

८॥

यह दामोदर पण्डित के लिए असह्य था। वे अत्यधिक दुःखी हुए, किन्तु वे कुछ कह नहीं पा रहे थे, क्योंकि बालक उनके निषेधों की अनदेखी कर देता।"

आर दिन सेइ बालक प्रभु-स्थाने आइला ।।गोसाजि तारे प्रीति करि' वार्ता पुछिला ॥

९॥

एक दिन जब वह बालक श्री चैतन्य महाप्रभु के पास आया, तो महाप्रभु ने बड़े ही स्नेह के साथ उससे सभी प्रकार के समाचार पूछे।।"

कत-क्षणे से आलक उठि' झबे गेला ।।सहिते ना पारे, दामोदर कहिते लागिला ॥

१०॥

कुछ समय बाद जब वह बालक उठकर चला गया, तो दामोदर पण्डित जो यह सह नहीं पा रहे थे, कहने लगे।"

अन्योपदेशे पण्डित–कहे गोसाजिर ठाञि।।‘गोसाजि’ ‘गोसाञि' एबे जानिमु‘गोसाजि' ॥

११ ॥

। दामोदर पण्डित ने धृष्टतापूर्वक महाप्रभु से कहा, ‘सारे लोग आपको महान् शिक्षक कहते हैं, क्योंकि आप अन्यों को उपदेश देते हैं, किन्तु अब हम देखेंगे कि आप किस तरह के शिक्षक हैं।।"

एबे गोसाजिर गुण-ग्रश सब लोके गाइबे ।तबे गोसाजिर प्रतिष्ठा पुरुषोत्तमे हइबे ॥

१२॥

आप गोसांइ ( गुरु या आचार्य) के नाम से विख्यात हैं, किन्तु अब आपके गुण तथा यश की बात सारे पुरुषोत्तम नगर में व्याप्त होगी। आपके पद को कैसा धक्का लगेगा!" शुनि' प्रभु कहे,–'क्या कह, दामोदर?'।दामोदर कहे,—तुमि स्वतन्त्र 'ईश्वर' ॥

१३॥

यद्यपि श्री चैतन्य महाप्रभु जानते थे कि दामोदर पण्डित शुद्ध तथा सरल भक्त थे, किन्तु यह प्रगल्भ बात सुनकर महाप्रभु ने कहा, हे दामोदर, तुम यह क्या ऊटपटाँग बात कह रहे हो? दामोदर पण्डित ने उत्तर दिया, “आप तो स्वतन्त्र परमेश्वर हैं, समस्त आलोचनाओं के परे हैं।"

स्वच्छन्दे आचार कर, के पारे बलिते?। मुखर जगतेर मुख पार आच्छादिते ? ॥

१४॥

‘हे प्रभु, आप जैसा चाहें वैसा कर सकते हैं। आपको रोकने के लिए कोई कुछ नहीं कर सकता। फिर भी सम्पूर्ण संसार बातूनी है। लोग कुछ भी कह सकते हैं। आप उन्हें कैसे रोक सकते हैं?" पण्डित हज मने केने विचार ना कर? ।। राण्डी ब्राह्मणीर बालके प्रीति केने कर? ॥

१५॥

‘हे प्रभु, आप विद्वान शिक्षक हैं। आप यह विचार क्यों नहीं करते। कि यह बालक एक विधवा ब्राह्मणी का पुत्र है? आप इसके प्रति इतने भेहिल क्यों हैं?" यद्यपि ब्राह्मणी सेइ तपस्विनी सती ।। तथापि ताहार दोष—सुन्दरी ग्रुवती ॥

१६॥

यद्यपि इस बालक की माता पूर्णतया तपस्विनी तथा सती है, किन्तु उसमें एक सहज दोष है कि वह अत्यन्त सुन्दर युवती है।"

तुमि-ह--परम युवा, परम सुन्दर ।। लोकेर काणाकाणि-बाते देह अवसर' ।।१७।। और हे प्रभु, आप सुन्दर आकर्षक तरुण व्यक्ति हैं। अतएव निश्चित रूप से लोग आपके बारे में कानाफूसी करेंगे। आप उन्हें ऐसा अवसर क्यों प्रदान करें?" एत बलि' दामोदर मौन हइला ।अन्तरे सन्तोष प्रभु हासि' विचारिला ॥

१८॥

यह कहकर दामोदर पण्डित मौन हो गये। श्री चैतन्य महाप्रभु अपने अन्तर में प्रसन्न होकर मुसकाये और दामोदर पण्डित की धृष्टता पर विचार करने लगे।"

इहारे कहिये शुद्ध-प्रेमेर तरङ्ग । दामोदर-सम मोर नाहि 'अन्तरङ्ग’ ॥

१९॥

( श्री चैतन्य महाप्रभु ने सोचा :) यह धृष्टता मेरे प्रति शुद्ध प्रेम का संकेत भी है। दामोदर पण्डित जैसा मेरा कोई अन्य घनिष्ठ मित्र नहीं है।"

एतेक विचारि' प्रभु मध्याह्न चलिना ।। आर दिने दामोदरे निभृते बोलाइला ॥

२० ॥

इस तरह सोचते हुए श्री चैतन्य महाप्रभु दोपहर के कृत्य सम्पन्न करने चले गये। अगले दिन उन्होंने दामोदर पण्डित को एकान्त में बुलाया।"

प्रभु कहे,–‘दामोदर, चलह नदीया ।।मातार समीपे तुमि रह ताँहा ग्राजा ॥

२१॥

महाप्रभु ने कहा, हे मित्र दामोदर, अच्छा होगा कि तुम नदिया जाओ और मेरी माता के साथ रहो।।"

तोमा विना ताँहार रक्षक नाहि देखि आन ।आमाके-ह याते तुमि कैला सावधान ॥

२२॥

“मैं तुम्हारे अतिरिक्त उसका कोई दूसरा रक्षक नहीं देख रहा हूँ, क्योंकि तुम इतने सतर्क रहते हो कि तुम मुझे भी सावधान कर सकते हो।।"

तोमा समनिरपेक्ष' नाहि मोर गणे।।'निरपेक्ष' नहिले 'धर्म' ना ग्राय रक्षणे ॥

२३॥

। तुम मेरे संगियों में सर्वाधिक निष्पक्ष हो। यह बहुत अच्छी बात है, क्योंकि निष्पक्ष हुए बिना मनुष्य धर्म की रक्षा नहीं कर सकता।"

आमा हैते ग्रे ना हय, से तोमा हैते हय ।।आमारे करिला दण्ड, आन केबा हय ॥

२४॥

जो मैं नहीं कर सकता, वह तुम कर सकते हो। निस्सन्देह, तुम मुझे भी दण्डित कर सकते हो, अन्यों की बात जाने दो।"

मातार गृहे रह ग्राइ मातार चरणे ।।तोमार आगे नहिबे कारो स्वच्छन्दाचरणे ॥

२५ ॥

। ‘तुम्हारे लिए सबसे अच्छी बात यही होगी कि तुम मेरी माता के चरणकमलों की शरण में जाओ, क्योंकि तुम्हारे सामने कोई भी वतन्त्रतापूर्वक आचरण नहीं कर सकेगा।"

मध्ये मध्ये आसिबा कभु आमार दरशने । शीघ्र करि' पुनः ताहाँ करह गमने ॥

२६॥

“बीच-बीच में तुम यहाँ मुझे देखने आ सकते हो और शीघ्र ही फिर से वहाँ जा सकते हो।"

मातारे कहिह मोर कोटी नमस्कारे । मोर सुख-कथा कहि' सुख दिह' ताँरै ॥

२७॥

। “मेरी माता से मेरा कोटि-कोटि नमस्कार कहना। कृपा करके उनसे यहाँ के मेरे सुख के विषय में कहना और इस तरह उन्हें सुख पहुँचाना।

‘निरन्तर निज-कथा तोमारे शुनाइते । एइ लागि' प्रभु मोरे पाठाइला इहाँते' ॥

२८॥

उनसे कहना कि मैंने अपने निजी कार्यकलापों की सूचना देने के लिए तुम्हें भेजा है, जिससे वे मेरे सुख में भाग ले सकें।

एत कहि' मातार प्रने सन्तोष जन्माइह ।।आर गुह्य-कथा ताँरे स्मरण कराइह ॥

२९॥

इस तरह बोलकर माता शची के मन को तुष्ट करना। उन्हें मेरे इस सन्देश के साथ एक अत्यन्त गोपनीय घटना के सम्बन्ध में स्मरण दिलाना।"

‘बारे बारे आसि' आमि तोमार भवने । मिष्टान्न व्यञ्जन सब करिये भोजने ।। ३०॥

‘ मैं आपके घर आपके द्वारा अर्पण की जाने वाली उन सारी मिठाइयों तथा तरकारियों को खाने के लिए बारम्बार आता हूँ।"

भोजन करिये आमि, तुमि ताहा जान ।। बाह्य विरहे ताहा स्वप्न करि मान ॥

३१॥

आप जानती हो कि मैं आता हूँ और भोजन करता हूँ, किन्तु बाह्य विरह के कारण आप इसे स्वप्न मानती हो।"

एइ माघ-सङ्क्रान्त्ये तुमि रन्धन करिला ।। नाना व्यञ्जन, क्षीर, पिठा, पायस रान्धिला ॥

३२॥

। पिछले माघ संक्रान्ति उत्सव के समय आपने मेरे लिए अनेक प्रकार की सब्जियाँ, गाढ़ा दूध, रोटियाँ तथा खीर बनाई थी।"

कृष्णे भोग लागाजा ग्रबे कैला ध्यान ।।आमार स्फूर्ति हैल, अश्रु भरिल नयन ॥

३३॥

। आपने भगवान् कृष्ण को भोजन अर्पित किया और अभी तुम ध्यान में ही थीं कि मैं सहसा प्रकट हुआ और आपकी आँखें आँसूओं से भर गई।"

आस्ते-व्यस्ते आमि गिया सकलि खाइल ।आमि खाइ, देखि' तोमार सुख उपजिल ॥

३४॥

मैं वहाँ अत्यन्त हड़बड़ी में गया और सब कुछ खा गया। जब आपने मुझे खाते देखा, तो आपको महान् सुख का अनुभव हुआ।"

क्षणेके अश्रु मुछिया शून्य देखि' पात ।।स्वपन देखिलँ, ‘ग्रेन निमाजि खाइल भात' ॥

३५ ॥

जब आपने अपनी आँखें पोंछ डालीं, तो क्षण-भर में तुमने देखा कि तुमने जो कुछ मुझे पत्तल में दिया था, वह खाली है। तब तुमने सोचा, मैंने सपना देखा कि मानो निमाइ सब कुछ खा रहा है।"

बाह्य-विरह-दशाय पुनः भ्रान्ति हैल ।।‘भोग ना लागाइलँ',–एइ ज्ञान हैल ॥

३६॥

बाह्य विरह की दशा में आप यह सोचकर पुनः भ्रम में थीं कि आपने वह भोजन भगवान् विष्णु को अर्पित नहीं किया है।"

पाक-पात्रे देखिला सब अन्न आछे भरि' ।।पुनः भोग लागाइला स्थान-संस्कार करि' ॥

३७॥

। तब आप भोजन पकाने के बर्तन देखने गईं और देखा कि हर बर्तन भोजन से भरा है। अतएव आपने भोग लगाने के स्थान को साफ करके फिर से भोग लगाया।"

एइ-मत बार बार करिये भोजन् ।। तोमार शुद्ध-प्रेमे मोरे करे आकर्षण ॥

३८ ॥

। “इस तरह आपके द्वारा भेंट की जाने वाली हर वस्तु मैं पुनः पुनः खाता हूँ, क्योंकि मैं आपके शुद्ध प्रेम द्वारा आकृष्ट होता हूँ।"

तोमार आज्ञाते आमि आछि नीलाचले ।। निकटे लञा ग्राओ आमा तोमार प्रेम-बले' ।। ३९ ।। “एकमात्र आपके आदेश से मैं नीलाचल (जगन्नाथ पुरी ) में रह रहा हैं। फिर भी आप मेरे प्रति अपने गहन प्रेम के कारण मुझे अपने निकट खींचती रहती हो।'" एइ-मत बार बार कराइह स्मरण ।मोर नाम लञा ताँर वन्दिह चरण ॥

४०॥

श्री चैतन्य महाप्रभु ने दामोदर पण्डित से कहा, ‘मेरी माता को इस तरह से बारम्बार स्मरण कराना और मेरा नाम लेकर उनके चरणकमलों की पूजा करना।

एत कहि' जगन्नाथेर प्रसाद आनाइल ।माताके वैष्णवे दिते पृथक् पृथक् दिल ॥

४१॥

यह कहकर श्री चैतन्य महाप्रभु ने यह आदेश दिया कि भगवान् जगन्नाथ को अर्पित किये जाने वाले तरह-तरह के प्रसाद लाये जाएँ। तब महाप्रभु ने उसे अलग-अलग बँधा प्रसाद विभिन्न वैष्णवों तथा अपनी माता को देने के लिए दिया।"

तबे दामोदर चलि' नदीया आइला । मातारे मिलिया ताँर चरणे रहिला ॥

४२॥

। इस तरह दामोदर पण्डित नदिया ( नवद्वीप) गये। माता शची से मिलने के बाद वे उनके चरणकमलों के संरक्षण में रहे।"

आचार्गादि वैष्णवेरे महाप्रसाद दिला । प्रभुर यैछे आज्ञा, पण्डित ताहा आचरिला ॥

४३॥

उन्होंने सारा प्रसाद अद्वैत आचार्य जैसे महान् वैष्णवों को दे दिया। इस तरह वे वहाँ रहे और श्री चैतन्य महाप्रभु के आदेश के अनुसार व्यवहार करते रहे।"

दामोदर आगे स्वातन्त्र्य ना हय काहार । तार भये सबे करे सङ्कोच व्यवहार ॥

४४॥

सभी जानते थे कि दामोदर पण्डित व्यावहारिक बर्ताव में अत्यन्त कठोर हैं। अतएव सारे लोग उनसे भयभीत थे और स्वतन्त्र रूप से कुछ भी करने का साहस नहीं करते थे।"

प्रभु-गणे याँर देखे अल्प-मर्यादा-लङ्घन ।।वाक्य-दण्ड करि' करे मर्यादा स्थापन ॥

४५॥

दामोदर पण्डित श्री चैतन्य महाप्रभु के हर भक्त को जिसे वे उचित आचरण से थोड़ा भी विचलित हुआ पाते, मौखिक रूप से दण्ड देते। इस तरह उन्होंने आदर्श शिष्टाचार स्थापित किया।"

एइ-त कहिल दामोदरेर वाक्य-दण्ड ।याहार श्रवणे भागे 'अज्ञान पाषण्ड' ॥

४६॥

इस तरह मैंने दामोदर पण्डित के शाब्दिक दण्ड का वर्णन किया है। जब कोई इसके विषय में सुनता है, तो नास्तिक सिद्धान्त तथा अज्ञान भाग जाते हैं।अतएव गूढ़ अर्थ किछुडू ना जानि ।"

चैतन्येर लीला--गम्भीर, कोटि-समुद्र हैते ।।कि लागि' कि करे, केह ना पारे बुझिते ॥

४७॥

श्री चैतन्य महाप्रभु की लीलाएँ करोड़ों समुद्रों से भी अधिक गहरी हैं। अतएव कोई नहीं समझ सकता कि वे क्या करते हैं अथवा क्यों ऐसा करते हैं।"

अतएव गूढ़ अर्थ किछुडू ना जानि ।बाह्य अर्थ करिबारे करि टानाटानि ॥

४८॥

मैं श्री चैतन्य महाप्रभु के कार्यकलापों का गहन अर्थ नहीं जानता। मैं यथासम्भव उनकी बाह्य व्याख्या करने का प्रयास करूंगा।"

एक-दिन प्रभु हरिदासेरे मिलिला ।।ताँहा ला गोष्ठी करि' ताँहारे पुछिला ॥

४९॥

एक दिन श्री चैतन्य महाप्रभु हमेशा की तरह हरिदास ठाकुर से मिले और विचार-विमर्श के दौरान उन्होंने यह पूछा।"

हरिदास, कलि-काले ग्रवन अपार ।। गो-ब्राह्मणे हिंसा करे महा दुराचार ॥

५०॥

हे हरिदास ठाकुर, इस कलियुग में अधिकांश लोग वैदिक संस्कृति से विहीन हैं, अतएव वे यवन कहलाते हैं। वे केवल गौवों तथा ब्राह्मण संस्कृति की हत्या करने में ही लगे रहते हैं। इस तरह ये सभी यवन पापकर्मों में लगे रहते हैं।"

इहा-सबार कोन् मते हइबे निस्तार? ।। तोहार हेतु ना देखिये,—ए दुःख अपार ॥

५१॥

इन यवनों का उद्धार किस तरह होगा? मुझे महान् दुःख है कि मुझे इसका कोई रास्ता नहीं दिखाई देता।

हरिदास कहे,–प्रभु, चिन्ता ना करिह ।। यवनेर संसार देखि' दु:ख ना भाविह ॥

५२॥

हरिदास ठाकुर ने उत्तर दिया, हे प्रिय प्रभु, आप चिन्ता न करें। आप भौतिक संसार में यवनों की दशा देखकर दुःखी न हों।"

ग्रवन-सकलेर ‘मुक्ति' हबे अनायासे । ‘हा राम, हा राम' बलि' कहे नामाभासे ॥

५३॥

चूँकि सारे यवन ‘हा राम, हा राम' कहने के अभ्यस्त हैं, इसलिए वे इस नामाभास द्वारा सरलतापूर्वक उबार लिए जायेंगे।"

महा-प्रेमे भक्त कहे,‘हा राम, हा राम' ।। ग्रवनेर भाग्य देख, लय सेइ नाम ॥

५४॥

एक भक्त अत्यधिक प्रेमवश पुकारता है-‘हे मेरे भगवान् रामचन्द्र! हे मेरे भगवान् रामचन्द्र!' किन्तु यवन भी जप करते हैं ‘हा राम, हा राम!' जरा उनका सौभाग्य तो देखें।

यद्यपि अन्य सङ्केते अन्य हय नामाभास ।।तथापि नामेर तेज ना हय विनाश ॥

५५॥

नामाचार्य हरिदास ठाकुर ने, जो कि नाम-कीर्तन के प्रामाणिक आचार्य हैं, कहा, “भगवान् के पवित्र नाम के उच्चारण द्वारा भगवान् के अतिरिक्त अन्य किसी वस्तु का संकेत करना नामाभास का उदाहरण है। जब नाम का इस तरह से उच्चारण किया जाता है, तो भी उसकी दिव्य शक्ति विनष्ट नहीं होती।"

दंष्ट्रि-दंष्ट्राहतो म्लेच्छो हा रामेति पुनः पुनः ।।उक्त्वापि मुक्तिमाप्नोति किं पुनः श्रद्धया गृणन् ॥

५६॥

“सुअर के दाँत से मारा जा रहा और व्यथित होकर बारम्बार हा राम, हो राम' चिल्लाने वाला म्लेच्छ भी मुक्ति प्राप्त करता है। तो फिर उन लोगों के विषय में क्या कहा जाए, जो आदर तथा श्रद्धा से पवित्र नाम का उच्चारण करते हैं?" अजामिल पुत्रे बोलाय बलि 'नारायण' । विष्णु-दूत आसि’ छाड़ाय ताहार बन्धन ॥

५७॥

अजामिल जीवन-भर महान् पापी था, किन्तु अपनी मृत्यु के समय उसने अचानक अपने सबसे छोटे पुत्र को पुकारा, जिसका नाम नारायण था, तो विष्णु के दूत यमराज के बन्धन से उसे छुड़ाने आ गये।।

‘राम' दुइ अक्षर इहा नहे व्यवहित ।। प्रेम-वाची ‘हा'-शब्द ताहाते भूषित ॥

५८ ॥

राम' शब्द में दो अक्षर 'रा' तथा 'म' हैं। ये विलग नहीं किये जा सकते और प्रेमवाची शब्द 'हा' से अलंकृत हैं, जिसका अर्थ है 'हे'।"

नामेर अक्षर-सबेर एइ त' स्वभाव ।। व्यवहित हैले ना छाड़े आपन-प्रभाव ॥

५९॥

पवित्र नाम के अक्षरों की इतनी आध्यात्मिक शक्ति है कि अनुचित ढंग से बोले जाने पर भी अपना प्रभाव दिखाते हैं।"

नामैकं यस्य वाचि स्मरण-पथ-गतं श्रोत्र-मूलं गतं वा ।शुद्धं वाशुद्ध-वर्ण व्यवहित-रहितं तारयत्येव सत्यम् ।। तच्चेद्देह-द्रविण-जनता-लोभ-पाषण्ड-मध्येनिक्षिप्तं स्यान्न फल-जनकं शीघ्रमेवात्र विप्र ॥

६०॥

यदि भक्त एक बार भी भगवान् के पवित्र नाम का उच्चारण करता है अथवा यह उसके मन में या श्रवण करने के माध्यम रूपी कान में प्रवेश करता है, तो यह पवित्र नाम निश्चय ही उसे भवबन्धन से उबार लेगा, चाहे नामोच्चारण व्याकरण के अनुसार सही ढंग से किया गया हो या गलत ढंग से किया गया हो, चाहे मिलाकर अथवा अलग-अलग खण्डों में किया गया हो। इसलिए हे ब्राह्मण, पवित्र नाम की शक्ति निश्चित रूप से महान् है। किन्तु यदि कोई पवित्र नाम के उच्चारण का उपयोग भौतिक शरीर, भौतिक सम्पत्ति तथा अनुयायियों के लिए अथवा लोभ या नास्तिकता के प्रभाव में आकर करता है-अर्थात् अपराधसहित नामोच्चारण किया जाता है-तो ऐसे उच्चारण से तुरन्त वांछित फल नहीं मिलेगा। अतएव भगवान् के पवित्र नाम का उच्चारण करते समय सावधानीपूर्वक अपराधों से बचना चाहिए।"

नामाभास हैते हय सर्व-पाप-क्षय ॥

६१॥

नामाचार्य हरिदास ठाकुर ने कहा, “यदि कोई अपराधरहित होकर अपूर्ण रीति से भी पवित्र नाम का उच्चारण करता है, तो वह पापमय जीवन के सारे फलों से मुक्त हो सकता है।"

तं निव्र्याजं भज गुण-निधे पावनं पावनानांश्रद्धा-रज्यन्मतिरतितरामुत्तमः-श्लोक-मौलिम् । प्रोद्यन्नन्तःकरण-कुहरे हन्त यन्नाम-भानोर् ।आभासोऽपि क्षपयति महा-पातक-ध्वान्त-राशिम् ॥

६२॥

* हे सभी सद्गुणों की खान, आप समस्त पावन करने वालों को भी पावन करने वाले, उत्तमश्लोक शिरोमणि श्रीकृष्ण की पूजा करें। आप श्रद्धायुक्त, अविचलित मन से, निष्कपट होकर तथा अत्युच्च रीति से उनकी पूजा करें। इस प्रकार उन भगवान् की पूजा करें, जिनका नाम मृर्य के समान है, क्योंकि जिस तरह सूर्य के किंचित प्रकट होने पर भी रात्रि का अन्धकार दूर हो जाता है, उसी तरह कृष्ण के पवित्र नाम का थोड़ा-सा भी प्राकट्य अज्ञान के सारे अन्धकार को, जो विगत जन्मों में मम्पन्न बड़े-बड़े पापों के कारण हृदय में उत्पन्न होता है, दूर भगा सकता" नामाभास हैते हय संसारेर क्षय ॥

६३॥

भगवान् के पवित्र नाम का क्षीण प्रकाश भी पापमय जीवन के सारे फलों को दूर कर सकता है।"

म्रियमाणो हरेर्नाम गृणन्पुत्रोपचारितम् ।।अजामिलोऽप्यगाद्धाम किमुत श्रद्धया गृणन् ॥

६४॥

“मरणासन्न अजामिल ने अपने पुत्र नारायण को बुलाने के उद्देश्य से भगवान् के नाम का उच्चारण किया, फिर भी उसे वैकुण्ठ प्राप्त हुआ। तो फिर उनके विषय में क्या कहा जाए, जो श्रद्धा तथा आदरपूर्वक पवित्र नाम का उच्चारण करते हैं?'"

नामाभासे 'मुक्ति' हय सर्व-शास्त्रे देखि ।।श्री-भागवते ताते अजामिल---साक्षी' ॥

६५ ॥

। भगवान् के पवित्र नाम के तेज की हल्की-सी किरणों से भी ( नामाभास ) मनुष्य मुक्ति प्राप्त कर सकता है। इसे हम समस्त प्रामाणिक शास्त्रों में देख सकते हैं। इसका साक्ष्य श्रीमद्भागवत में अजामिल की कथा में मिलता है।"

शुनिया प्रभुर सुख बाड़ये अन्तरे ।। पुनरपि भङ्गी करि' पुछये ताँहारे ॥

६६॥

जब हरिदास ठाकुर से श्री चैतन्य महाप्रभु ने यह सुना, तो उनके हृदय में सुख बढ़ गया, किन्तु स्वभावतः उन्होंने और आगे पूछा।"

पृथिवीते बहु-जीव–स्थावर-जङ्गम् ।।इहा-सबार कि प्रकारे हइबे मोचन?॥

६७॥

। महाप्रभु ने कहा, इस पृथ्वी पर अनेक जीव हैं-कुछ अचर हैं और कुछ चर। वृक्षों, लताओं, कीड़ों तथा अन्य जीवों का क्या होगा? वे कैसे भवबन्धन से छूट सकेंगे?" हरिदास कहे,’प्रभु, से कृपा तोमार ।। स्थावर-जङ्गम आगे करियाछ निस्तार ।। ६८ ॥

हरिदास ठाकुर ने उत्तर दिया, हे प्रिय प्रभु, सारे चर तथा अचर प्राणियों का उद्धार तो आपकी कृपा से होता है। आपने पहले ही यह कृपा करके उनका उद्धार किया है।"

तुमि ग्रे करियाछ एइ उच्च सङ्कीर्तन ।। स्थावर-जमेर सेइ हयत' श्रवण ॥

६९॥

“आपने उच्च स्वर से हरे कृष्ण मन्त्र का कीर्तन किया है और हर चर या अचर प्राणी ने उसे सुनकर लाभ उठाया है।"

शुनिया जङ्गमेर हय संसार-क्षय ।। स्थावरे से शब्द लागे, प्रतिध्वनि हय ॥

७० ॥

हे प्रभु, जिन चर प्राणियों ने आपके उच्च संकीर्तन को सुना है, वे पहले ही भवबन्धन से छूट चुके हैं, और जब वृक्ष जैसे अचर जीव उसे सुनते हैं, तो एक प्रतिध्वनि होती है।"

‘प्रतिध्वनि' नहे, सेइ करये 'कीर्तन' । तोमार कृपार एई अकथ्य कथन ॥

७१।। । किन्तु, वास्तव में यह प्रतिध्वनि नहीं, यह तो अचर जीवों का कीर्तन है। यद्यपि यह अचिन्त्य है, किन्तु आपकी कृपा से यह सब सम्भव है।"

सकल जगते हय उच्च सङ्कीर्तन । शुनिया प्रेमावेशे नाचे स्थावर--जङ्गम ॥

७२॥

। “जब आपके अनुयायियों द्वारा विश्वभर में हरे कृष्ण मन्त्र का उच्च स्वर से कीर्तन होता है, तो सारे अचर तथा चर जीव भक्तिमय प्रेम में नृत्य करते हैं।"

ग्रैछे कैला झारिखण्डे वृन्दावन ग्राइते ।। बलभद्र-भट्टाचार्य कहियाछेन आमाते ॥

७३॥

। हे प्रभु, जब आप झारखंड जंगल से होते हुए वृन्दावन जा रहे थे, तब जितनी सारी घटनाएँ घटीं, उनका वर्णन आपके सेवक बलभद्र भट्टाचार्य ने मुझसे किया है।"

वासुदेव जीव लागि' कैल निवेदन । तबे अङ्गीकार कैला जीवेर मोचन ॥

७४॥

जब आपके भक्त वासुदेव दत्त ने आपके चरणकमलों पर सारे जीवों के उद्धार के लिए निवेदन किया, तो आपने वह प्रार्थना स्वीकार कर ली।"

जगत् निस्तारिते एइ तोमार अवतार ।। भक्त-भाव आगे ताते कैला अङ्गीकार ॥

७५ ॥

। हे प्रभु, आपने इस संसार के सारे पतितात्माओं का उद्धार करने के गए ही भक्त का रूप स्वीकार किया है।"

उच्च सङ्कीर्तन ताते करिला प्रचार ।।स्थिर-चर जीवेर सब खण्डाइला संसार’ ॥

७६ ॥

। ‘आपने हरे कृष्ण महामन्त्र के उच्च कीर्तन का प्रचार किया है और म तरह से सारे चर तथा अचर प्राणियों को भव-बन्धन से मुक्त किया" प्रभु कहे,-सब जीव मुक्ति ग्रबे पाबे ।।एइ त' ब्रह्माण्ड तबे जीव-शून्य हबे! ॥

७७॥

। भी चैतन्य महाप्रभु ने उत्तर दिया, “यदि सारे जीवों को मुक्ति मिल जाए, तो सारा ब्रह्माण्ड जीवों से विहीन हो जायेगा।"

हरिदास बले,–‘तोमार ग्रावत्मयें स्थिति । तावत् स्थावर-जङ्गम, सर्व जीव-जाति ॥

७८॥

सब मुक्त करि' तुमि वैकुण्ठे पाठाइबा ।।सूक्ष्म-जीवे पुनः कर्मे उद्बद्ध करिबा ॥

७९ ॥

हरिदास ने कहा, हे प्रभु, जब तक आप इस भौतिक जगत् में स्थित हैं, तब तक आप विभिन्न योनियों के समस्त विकसित चर तथा अचर जीवों को वैकुण्ठ लोक भेजते रहेंगे। तब आप पुनः उन जीवों को जागृत करेंगे, जो अब भी विकसित नहीं हैं और उन्हें कार्यों में लगायेंगे।"

सेइ जीव हबे इहाँ स्थावर-जङ्गम् ।।ताहाते भरिबे ब्रह्माण्ड येन पूर्व-सम ॥

८० ॥

। इस तरह सारे चर तथा अचर जीव अस्तित्व को प्राप्त होंगे और सम्पूर्ण ब्रह्माण्ड पहले की तरह पूरित हो जायेगा। है।'" पूर्वे येन रघुनाथ सब अयोध्या लञा ।। वैकुण्ठके गेला, अन्य-जीवे अयोध्या भराजा ॥

८१॥

‘पृर्वकाल में जब भगवान् रामचन्द्र ने यह जगत् छोड़ा, तो वे अयोध्या के मारे जीवों को अपने साथ लेते गये। तत्पश्चात् उन्होंने अयोध्या को पुनः अन्य जीवों से भर दिया।"

अवतरि' तुमि ऐछे पातियाछ हाट ।। केह ना बुझिते पारे तोमारे गूढ़ नाट ॥

८२ ॥

हे प्रभु, आपने इस भौतिक जगत् में अवतरित होकर एक योजना प्रारम्भ कर दी है, किन्तु कोई यह नहीं जानता कि आप किस तरह कार्य करते हैं।"

पूर्वे ग्रेन व्रजे कृष्ण करि' अवतार । सकल ब्रह्माण्ड-जीवेर खण्डाइला संसार ॥

८३॥

पूर्वकाल में, जब भगवान् कृष्ण वृन्दावन में अवतरित हुए, तो उन्होंने ब्रह्माण्ड के सारे जीवों को भौतिक स्थिति से इसी तरह मुक्त कर दिया था।"

न चैवं विस्मयः कार्यों भवता भगवत्यजे ।। योगेश्वरेश्वरे कृष्णे यत एतद्विमुच्यते ॥

८४॥

अजन्मा, योगेश्वरों के भी ईश्वर, पूर्ण पुरुषोत्तम भगवान् कृष्ण समस्त घर तथा अचर प्राणियों का उद्धार करते हैं। भगवान् के कार्यकलाप तनिक भी आश्चर्यजनक नहीं है।"

अयं हि भगवान्दृष्टः कीर्तितः संस्मृतश्च । द्वेषानुबन्धेनाप्यखिल-सुरासुरादि- दुर्लभं फलं प्रयच्छति, किमुत सम्यग्भक्तिमताम्’ इति ॥

८५॥

भले ही पूर्ण पुरुषोत्तम भगवान् को ईर्ष्या की दृष्टि से देखा जाये, इनका महिमागान किया जाये या उनका स्मरण किया जाये, तो भी वे अत्यन्त गुह्य मुक्ति प्रदान करते हैं, जो देवताओं तथा असुरों को विरले ही प्राप्त हो पाती है। तो फिर उनके विषय में क्या कहा जाए, जो पहले से भगवान् की भक्तिमयी सेवा में पूरी तरह से लगे हुए हैं?" तैछे तुमि नवद्वीपे करि' अवतार ।। सकल-ब्रह्माण्ड-जीवेर करिला निस्तार ॥

८६॥

आपने नवद्वीप में अवतरित होकर, कृष्ण की ही तरह, ब्रह्माण्ड के सारे जीवों को पहले से ही उद्धार कर दिया है।"

ये कहे,–'चैतन्य-महिमा मोर गोचर हय' ।। से जानुक, मोर पुनः एइ त निश्चय ॥

८७॥

कोई कह सकता है कि वह श्री चैतन्य महाप्रभु की महिमा को समझता है। वह जो भी जान सके जाने, किन्तु जहाँ तक मेरा सम्बन्ध है, मेरा तो यही निर्णय है।"

तोमार ने लीला महा अमृतेर सिंधु। मोर मनो-गोचर नहे तारे एक बिन्दु ॥

८८॥

हे प्रिय प्रभु, आपकी लीलाएँ अमृत के सागर के समान हैं। मेरे लिए उस सागर की महिमा की कल्पना कर पाना या उसकी एक बूंद तक को समझ पाना भी सम्भव नहीं है।"

एत शुनि' प्रभुर मने चमत्कार हैल । ‘मोर गूढ़-लीला हरिदास केमने जानिल?' ॥

८९॥

यह सब सुनकर श्री चैतन्य महाप्रभु आश्चर्यचकित हुए। उन्होंने सोचा, ये तो वास्तव में मेरी गुह्य लीलाएँ हैं। हरिदास उन्हें कैसे समझ गया?" मनेर सन्तोषे ताँरै कैला आलिङ्गन ।। बाह्ये प्रकाशिते ए-सब करिला वर्जन ॥

९०॥

हरिदास ठाकुर के कथनों से अत्यधिक सन्तुष्ट होकर श्री चैतन्य महाप्रभु ने उनका आलिंगन किया। किन्तु बाह्य रूप से इन विषयों पर उन्होंने अधिक विचार-विमर्श नहीं किया।"

ईश्वर-स्वभाव, ऐश्वर्य चाहे आच्छादिते ।। भक्त-ठात्रि लुकाइते नारे, हय त' विदिते ॥

९१॥

यह पूर्ण पुरुषोत्तम भगवान् का स्वभाव है। यद्यपि वे अपने ऐश्वर्य को छिपाना चाहते हैं, किन्तु वे अपने भक्तों के समक्ष ऐसा नहीं कर पाते। यह सर्वविदित है।"

उल्लङ्कित-त्रिविध-सीम-समातिशायिसम्भावनं तव परिव्रढ़िम-स्वभावम् । माया-बलेन भवतापि निगुह्यमानंपश्यन्ति केचिदनिशं त्वदनन्य-भावाः ॥

९२॥

हे प्रभु, भौतिक प्रकृति में हर वस्तु काल, देश तथा विचार से सीमित होती है। किन्तु आपके गुण अतुलनीय तथा अद्वितीय होने के कारण मदैव ऐसी सीमाओं से परे होते हैं। आप कभी-कभी ऐसे गुणों को अपनी शक्ति से छिपा लेते हैं, किन्तु तो भी आपके अनन्य भक्त आपको सभी परिस्थितियों में देख सकने में सदा समर्थ होते हैं।"

तबे महाप्रभु निज-भक्त-पाशे ग्राजा ।। हरिदासेर गुण कहे शत-मुख हा ॥

९३॥

तब श्री चैतन्य महाप्रभु अपने निजी भक्तों के पास गये और उनसे दास ठाकुर के दिव्य गुणों के बारे में इस प्रकार बतलाने लगे मानो के मैकड़ों मुख हों।"

भक्तेर गुण कहिते प्रभुर बाड़ये उल्लास ।भक्त-गण-श्रेष्ठ ताते श्री-हरिदास ॥

९४॥

श्री चैतन्य महाप्रभु को अपने भक्तों का गुणगान करने में बड़ी प्रसन्नता होती है और इन भक्तों में हरिदास ठाकुर सर्वोपरि हैं।"

हरिदासेर गुण-गण–असङ्ख्य, अपार ।। केह कोन अंशे वर्णे, नाहि पाय पार ॥

९५॥

हरिदास ठाकुर के दिव्य गुण असंख्य तथा अगाध हैं। कोई उनके एक अंश का वर्णन भले कर ले, किन्तु उन सबकी गणना कर पाना असम्भव है।"

चैतन्य-मङ्गले श्री-वृन्दावन-दास ।। हरिदासेर गुण किछु करियाछेन प्रकाश ॥

९६ ॥

चैतन्य मंगल में श्रील वृन्दावन दास ठाकुर ने कुछ सीमा तक हरिदास ठाकुर के गुणों का वर्णन किया है।"

सब कहा ना ग्राय हरिदासेर चरित्र । केह किछु कहे करिते आपना पवित्र ॥

९७ ।। हरिदास ठाकुर के सभी गुणों का वर्णन कोई नहीं कर सकता। अपने आप को पवित्र बनाने के लिए उनके विषय में कोई कुछ कह सकता है।"

वृन्दावन-दास ग्राहा ना कैल वर्णन ।। हरिदासेर गुण किछु शुन, भक्त-गण ॥

९८॥

। हे श्री चैतन्य महाप्रभु के भक्तों, अब हरिदास ठाकुर के उन गुणों के विषय में थोड़ा सुनो, जिनका वर्णन वृन्दावनदास ठाकुर ने विस्तार से नहीं किया है।"

हरिदास ग्नबे निज-गृह त्याग कैला ।।बेनापोलेर वन-मध्ये कत-दिन रहिला ॥

१९॥

अपना घर छोड़ने के बाद हरिदास ठाकुर कुछ समय तक बेनापोल के जंगल में रहे।"

निर्जन-वने कुटिर करि' तुलसी सेवन ।।रात्रि-दिने तिन लक्ष नाम-सङ्कीर्तन ॥

१००॥

हरिदास ठाकुर ने एकान्त जंगल में एक कुटिया बनाई। वहाँ उन्होंने तुलसी का पौधा लगाया और तुलसी के समक्ष वे प्रतिदिन तीन लाख बार भगवान् के नाम का जप किया करते थे। वे दिन-रात निरन्तर जप किया करते थे।"

ब्राह्मणेर घरे करे भिक्षा निर्वाहण ।। प्रभावे सकल लोक करये पूजन ॥

१०१॥

शारीरिक पालन-पोषण के लिए वे एक ब्राह्मण के घर जाकर कुछ भोजन माँग लाते। वे आध्यात्मिक रूप से इतने प्रभावशाली थे कि अासपास के सारे लोग उनकी पूजा करते थे।"

सेइ देशाध्यक्ष नाम-रामचन्द्र खॉन ।।वैष्णव-विद्वेषी सेइ पाषण्ड-प्रधान ॥

१०२॥

रामचन्द्र खान नामक एक व्यक्ति उस जिले का जमींदार था। वह वैष्णवों से द्वेष रखता था, अतएव वह बहुत बड़ा नास्तिक था।"

हरिदासे लोके पूजे, सहिते ना पारे ।।ताँर अपमान करिते नाना उपाय करे ॥

१०३ ॥

हरिदास ठाकुर को जिस तरह से सम्मान प्रदान किया जाता था, उसे न सह सकने के कारण रामचन्द्र खान ने उनका अपमान करने के लिए नाना प्रकार की योजनाएँ बनाईं।।"

कोन-प्रकारे हरिदासेर छिद्र नाहि पाय ।।वेश्या-गणे आनि' करे छिद्रेर उपाय ॥

१०४॥

किन्तु उसे किसी भी उपाय से हरिदास ठाकुर के चरित्र में कोई दोष नहीं मिल सका। अतएव उसने स्थानीय वेश्याएँ बुलाईं और वह हरिदास की पवित्रता को श्रेयहीन करने की योजना बनाने लगा।"

वेश्या-गणे कहे,- एइ वैरागी हरिदास ।। तुमि-सब कर इहार वैराग्य-धर्म नाश ॥

१०५॥

रामचन्द्र खान ने वेश्याओं से कहा, हरिदास ठाकुर नाम का एक वैरागी है। तुम सब उसे तपस्या के व्रत से विचलित करने की कोई युक्ति निकालो।"

वेश्या-गण-मध्ये एक सुन्दरी युवती ।।से कहे,–तिन-दिने हरिब ताँर मति ॥

१०६ ॥

इन वेश्याओं में से एक आकर्षक युवती को चुना गया। उसने वादा किया, मैं तीन दिनों के भीतर हरिदास ठाकुर के मन को आकृष्ट कर लूंगी।

खाँन कहे,_मोर पाइक ग्राउक तोमार सने ।तोमार सहित एकत्र तारे धरि' ग्रेन आने ॥

१०७॥

रामचन्द्र खान ने उस वेश्या से कहा, मेरा सिपाही तुम्हारे साथ जायेगा, जिससे वह तुम्हें हरिदास ठाकुर के साथ देखते ही तुरन्त उसे बन्दी बना ले और तुम दोनों को मेरे पास ले आये।"

वेश्या कहे,–‘मोर सङ्ग हउक एक-बार ।। द्वितीय-बारे धरिते पाइक लइमु तोमार ॥

१०८॥

वेश्या ने उत्तर दिया, ‘पहले मुझे उससे एक बार उनके साथ संग कर लेने दीजिये, तब दूसरी बार मैं अपने साथ आपके सिपाही को उन्हें बन्दी बनाने के लिए ले जाऊंगी।

रात्रि-काले सेइ वेश्या सुवेश धरिया ।। हरिदासेर वासाय गेल उल्लसित हा ॥

१०९॥

रात में वह वेश्या खूब सज-धजकर हरिदास ठाकुर की कुटिया में अत्यन्त हर्षपूर्वक गई।"

तुलसी नमस्करि' हरिदासेर द्वारे ग्राञा । गोसाजिरे नमस्करि' रहिला दाण्डाज्ञा ॥

११०॥

तुलसी के पौधे को नमस्कार करने के बाद वह हरिदास ठाकुर के द्वार पर गई और उन्हें नमस्कार करके वहाँ खड़ी हो गई।"

अङ्ग उघाड़िया देखाइ वसिला दुयारे ।कहिते लागिला किछु सुमधुर स्वरे ॥

१११॥

वह उनकी दृष्टि के सामने अपने शरीर को प्रदर्शित करते हुए दरवाजे की देहली पर बैठ गई और उनसे अत्यन्त मधुर शब्दों में बोली।"

ठाकुर, तुमि-परम-सुन्दर, प्रथम ग्रौवन ।। तोमा देखि' को नारी धरिते पारे मन? ॥

११२॥

हे ठाकुर, हे महान् उपदेशक, महान् भक्त, आपका शरीर अतीव सुगठित है और आपके यौवन का शुभारम्भ अभी हो ही रहा है। आपको देखने के बाद ऐसी कौन-सी स्त्री होगी, जो अपने मन को वश में रख सके? ।"

तोमार सङ्गम लागि' लुब्ध मोर मन । ।तोमा ना पाइले प्राण ना ग्राय धारण’ ॥

११३॥

। मैं आपके संग की इच्छुक हूँ। मेरा मन इसके लिए ललचाया हुआ है। यदि मैं आपको नहीं पाती, तो मैं अपने प्राण धारण नहीं कर सकेंगी।"

हरिदास कहे,–‘तोमा करिमु अङ्गीकार । सङ्ख्या -नाम-समाप्ति यावत् ना हय आमार ॥

११४॥

तावत् तुमि वसि' शुन नाम-सङ्कीर्तन ।नाम-समाप्ति हैले करिमु ये तोमार मन ॥

११५॥

। हरिदास ठाकुर ने उत्तर दिया, मैं तुम्हें अवश्य अपना लूंगा, किन्तु तुम्हें तब तक प्रतीक्षा करनी होगी, जब तक मैं अपनी जप माला में अपने निर्धारित जप समाप्त न कर लँ। उस समय तक कृपया बैठो और पवित्र नाम के जप का श्रवण करो। ज्योंही मैं नाम जप समाप्त कर लूंगा, मैं तुम्हारी इच्छा पूरी करूंगा।"

एत शुनि' सेइ वेश्या वसिया रहिला ।कीर्तन करे हरिदास प्रातः काल हैला ॥

११६॥

यह सुनकर वह वेश्या वहीं बैठी रही और हरिदास ठाकुर भोर होने तक जपमाला पर जप करते रहे।"

प्रातः-काल देखि' वेश्या उठिया चलिला ।सब समाचार स्राइ खाँनेरे कहिला ॥

११७॥

जब उस वेश्या ने देखा कि सुबह हो गई, तो वह उठी और चली गई। रामचन्द्र खान के पास आकर उसने सारे समाचार बतलाए।"

‘आजि आमा अङ्गीकार करियाछे वचने ।।कालि अवश्य ताहार सङ्गे हइबे सङ्गमे ॥

११८॥

आज हरिदास ठाकुर ने मेरे साथ भोग करने का वचन दिया है। कल निश्चय ही मेरा उसके साथ संग होगा।"

आर दिन रात्रि हैले वेश्या आइल ।।हरिदास तारे बहु आश्वास करिल ॥

११९॥

। अगली रात को जब वह वेश्या फिर से आई, तो हरिदास ठाकुर ने उसे अनेक आश्वासन दिये।

‘कालि दुःख पाइला, अपराध ना लइबा मोर ।अवश्य करिमु आमि तोमाय अङ्गीकार ॥

१२०॥

कल रात को तुम्हें निराश होना पड़ा। कृपया मेरा अपराध क्षमा कर दो। मैं अवश्य ही तुम्हें स्वीकार करूंगा।"

तावत् इहाँ वसि' शुन नाम-सङ्कीर्तन । नाम पूर्ण हैले, पूर्ण हबे तोमार मन' ॥

१२१।। । कृपया बैठो और तब तक हरे कृष्ण महामन्त्र का जप सुनो, जब तक मेरा नियमित जप पूरा नहीं हो जाता। तब तुम्हारी इच्छा अवश्यमेव पूरी हो जायेगी।"

तुलसीरे ताङ्के वेश्या नमस्कार करि' ।।द्वारे वसि' नाम शुने बले 'हरि' ‘हरि' ॥

१२२॥

तुलसी के पौधे को तथा हरिदास ठाकुर को नमस्कार करके वह द्वार पर बैठ गई। हरिदास ठाकुर को हरे कृष्ण मन्त्र का जप करते सुनकर वह भी ‘हे मेरे प्रभु हरि, हे मेरे प्रभु हरि’ का उच्चारण करने लगी।"

रात्रि-शेष हैल, वेश्या उसिमिसि करे । तार रीति देखि' हरिदास कहेन ताहारे ॥

१२३॥

जब रात समाप्त हो गई, तो वेश्या व्याकुल हो उठी। यह देखकर । हरिदास ठाकुर उससे इस तरह बोले।।"

कोटि-नाम-ग्रहण-यज्ञ करि एक-मासे ।। एइ दीक्षा करियाछि, हैल आसि' शेषे ॥

१२४॥

मैंने एक मास में एक करोड़ नाम जप करने का व्रत ले रखा है। किन्तु अब यह समाप्ति पर है।"

आजि समाप्त हइबे,—हेन ज्ञान छिल ।। समस्त रात्रि निहुँ नाम समाप्त ना हैल ॥

१२५ ॥

मैंने सोचा था कि मैं हरे कृष्ण मन्त्र जपने का अपना यज्ञ आज समाप्त कर सकेंगा। मैंने सारी रात नाम जप करने का भरसक प्रयास किया, किन्तु अब भी उसे समाप्त नहीं कर सका।"

कालि समाप्त हबे, तबे हबे व्रत-भङ्ग ।। स्वच्छन्दे तोमार सङ्गे हइबेक सङ्ग’ ॥

१२६॥

कल मैं अवश्य ही समाप्त कर लूंगा और मेरा व्रत पूरा हो जायेगा। तब मेरे लिए सम्भव हो सकेगा कि पूरी स्वतन्त्रता से तुम्हारे साथ रमण । सर्केगा।"

वेश्या गिया समाचार खाँनेरे कहिल ।। आर दिन सन्ध्या हइते ठाकुर-ठाञि आइल ॥

१२७॥

माह वेश्या रामचन्द्र खान के पास लौट गई और जो कुछ हुआ था, उसे बतलाया। अगले दिन वह शीघ्र ही, सन्ध्या होते आ गई और हरिदास ठाकुर के पास रुकी रही।

तुलसीके, ठाकुरके नमस्कार करि' ।।द्वारे वसि' नाम शुने, बले ‘हरि' ‘हरि' ॥

१२८॥

तुलसी वृक्ष को तथा हरिदास ठाकुर को नमस्कार करने के बाद वह कमरे की दहलीज पर बैठ गई। इस तरह वह हरिदास ठाकुर का कीर्तन सुनने लगी और स्वयं भी उसने ‘हरि' ‘हरि' अर्थात् भगवान् के पवित्र नाम का उच्चारण किया।"

‘नाम पूर्ण हबे आजि', बले हरिदास ।।‘तबे पूर्ण करिमु आजि तोमार अभिलाष' ॥

१२९॥

हरिदास ठाकुर ने उसे बतलाया, “आज मेरा नाम जप पूरा हो जायेगा। तब मैं तुम्हारी सारी इच्छाएँ तुष्ट करूंगा।"

कीर्तन करिते ऐछे रात्रि-शेष हैल ।। ठाकुरेर सने वेश्यार मन फिरि' गेल ॥

१३०॥

जप करते-करते रात बीत गई, किन्तु हरिदास ठाकुर की संगति के कारण वेश्या का मन बदल चुका था।"

दण्डवत् हा पड़े ठाकुर-चरणे ।। रामचन्द्र-खाँनेर कथा कैल निवेदने ॥

१३१॥

वह वेश्या अब शुद्ध हो गई थी। वह हरिदास ठाकुर के चरणकमलों पर गिर पड़ी और उसने स्वीकार किया कि रामचन्द्र खान ने उन्हें दूषित करने के लिए उसे नियुक्त किया था।"

वेश्या हा मुञि पाप करियाछों अपार । कृपा करि' कर मो-अधमे निस्तार ॥

१३२॥

उसने कहा, चूँकि मैंने वेश्या का पेशा अपनाया है, अतएव मैंने असंख्य पापकर्म किये हैं। हे प्रभु, मुझ पर कृपालु हों। मुझ पतिता का उद्धार करें।"

ठाकुर कहे,----खाँनेर कथा सब आमि जानि ।अज्ञ मूर्ख सेइ, तारे दुःख नाहि मानि ॥

१३३॥

हरिदास ठाकुर ने उत्तर दिया, मैं रामचन्द्र खान के षड्यंत्र के बारे । में सब कुछ जानता हूँ। वह एक निपट अज्ञानी मूर्ख है। इसलिए उसके कार्यों से मैं दुःखी नहीं हूँ।"

सेइ-दिन ग्राइताम ए-स्थान छाड़िया ।। तिन दिन रहिलाङ तोमा निस्तार लागिया ॥

१३४॥

जिस दिन रामचन्द्र खान मेरे विरुद्ध षड्यंत्र रच रहा था, उसी दिन मैंने यह स्थान छोड़ दिया होता, किन्तु तुम मेरे पास आई, इसलिए मैं तुम्हारा उद्धार करने के लिए तीन दिनों तक यहाँ रुका रहा।"

वेश्या कहे,–कृपा करि' करह उपदेश ।।कि मोर कर्तव्य, ग्राते ग्राय भव-क्लेश ॥

१३५॥

वेश्या ने कहा, कृपया मेरे आध्यात्मिक गुरु बनिये। मेरे कर्तव्य के बारे में उपदेश दीजिये, जिससे मुझे भौतिक अस्तित्व से छुटकारा मिल सके।"

ठाकुर कहे,–घरेर द्रव्य ब्राह्मणे कर दान ।एइ घरे आसि' तुमि करह विश्राम ॥

१३६॥

। हरिदास ठाकुर ने उत्तर दिया, तुम तुरन्त अपने घर जाओ और तुम्हारी जितनी सम्पत्ति हो, उसे ब्राह्मणों में बाँट दो। तब इस कुटिया में लौट आओ और सदा के लिए कृष्णभावना में यहाँ रहो।।"

निरन्तर नाम लओ, कर तुलसी सेवन ।। अचिरात् पाबे तबे कृष्णेर चरण ॥

१३७॥

निरन्तर हरे कृष्ण मन्त्र का जप करो और जल से सींचकर तथा तुति करके तुलसी की सेवा करो। इस तरह तुम तुरन्त ही कृष्ण के अरणकमलों की शरण पाने का अवसर प्राप्त कर सकोगी।"

एत बलि' तारे 'नाम' उपदेश करि' ।।उठिया चलिला ठाकुर बलि' ‘हरि' ‘हरि' ॥

१३८॥

इस तरह वेश्या को हरे कृष्ण मन्त्र के कीर्तन की विधि के विषय में उपदेश देकर हरिदास ठाकुर उठे और लगातार हरि हरि कीर्तन करते हुए अले गये।"

तबे सेइ वेश्या गुरुर आज्ञा लइल ।गृह-वित्त ग्रेबा छिल, ब्राह्मणेरे दिल ॥

१३९॥

। तत्पश्चात् उस वेश्या ने अपने पास जो भी घरेलू सम्पत्ति थी, उसे अपने गुरु की आज्ञानुसार ब्राह्मणों में वितरित कर दिया।"

माथा मुड़ि' एक-वस्त्रे रहिल सेइ घरे ।।रात्रि-दिने तिन-लक्ष नाम ग्रहण करे ॥

१४०॥

वैष्णव-नियमों के अनुसार उस वेश्या ने अपना सिर मुंडा लिया और केवल एक वस्त्र पहने उसी कमरे में रहने लगी। वह अपने गुरु के पदचिह्नों पर चलकर प्रतिदिन तीन लाख नाम का जप करने लगी। वह दिन-रात जप करती रहती थी।"

तुलसी सेवन करे, चर्वण, उपवास ।इन्द्रिय-दमन हैल, प्रेमेर प्रकाश ॥

१४१॥

वह अपने गुरु के पदचिह्नों पर चलकर तुलसी की पूजा करने लगी। वह नियमित भोजन न खाकर, भिक्षा में जो मिलता उसे खाती और यदि कुछ न मिलता तो उपवास करती। इस तरह बहुत कम खाकर तथा उपवास करके उसने इन्द्रियों को वश में कर लिया और ज्योंही उसकी इन्द्रियाँ वश में हो गईं, त्योंही उसमें ईश्वर-प्रेम के लक्षण प्रकट होने लगे।"

प्रसिद्धा वैष्णवी हैल परम-महान्ती ।।बड़ बड़ वैष्णव ताँर दर्शनेते ग्रान्ति ।। १४२॥

इस तरह वह वेश्या विख्यात भक्तिन बन गई। वह आध्यात्मिक जीवन में अत्यन्त उन्नत हो गई और अनेक बड़े-बड़े वैष्णव उसके दर्शन के लिए आने लगे।"

वेश्यार चरित्र देखि' लोके चमत्कार ।।हरिदासेर महिमा कहे करि' नमस्कार ।। १४३ ।। वेश्या की उन्नत चरित्र देखकर सारे लोग चकित थे। सारे लोगों ने हरिदास ठाकुर के प्रभाव का गुणगान किया और उन्हें नमस्कार किया।"

रामचन्द्र खाँन अपराध-बीज कैल ।सेइ बीज वृक्ष हा आगेते फलिल ॥

१४४॥

हरिदास ठाकुर को विचलित करने के लिए वेश्या को प्रेरित करके गमचन्द्र खान ने उनके चरणों में अपराध के बीज को उगने दिया। बाद में यही बीज एक वृक्ष बन गया और जब यह फला, तो रामचन्द्र खान ने इसके फल खाये।"

महदपराधेर फल अद्भुत कथन ।प्रस्ताव पाञा कहि, शुन, भक्त-गण ॥

१४५।। उच्च भक्त के चरणों पर इस अपराध से एक अद्भुत कथा का जन्म हुआ। इन घटनाओं से प्राप्त अवसर का लाभ उठाकर मैं वह सब बतलाऊँगा, जो घटित हुआ। हे भक्तों, इसे सुनो।"

सहजेइ अवैष्णव रामचन्द्र-खाँन ।। हरिदासेर अपराधे हैल असुर-समान ॥

१४६॥

रामचन्द्र खान स्वभावतः अभक्त था। अब, हरिदास ठाकुर के चरणों पर अपराध करके वह पूरा आसुरी नास्तिक जैसा बन गया।"

वैष्णव-धर्म निन्दा करे, वैष्णव-अपमान ।। बहु-दिनेर अपराधे पाइल परिणाम ॥

१४७॥

वैष्णव धर्म की निन्दा करने तथा दीर्घकाल तक भक्तों का अपमान करने के कारण अब उसे अपने अपराध-कर्मों का फल मिला।"

नित्यानन्द-गोसाजि गौड़े ग्रबे आइला ।प्रेम प्रचारिते तबे भ्रमिते लागिला ॥

१४८॥

जब नित्यानन्द प्रभु भक्ति सम्प्रदाय का प्रचार करने बंगाल लौट आये, तो वे सारे देश में भ्रमण करने लगे।"

प्रेम-प्रचारण आर पाषण्ड-दलन ।।दुइ-कार्ये अवधूत करेन भ्रमण ॥

१४९॥

। भगवान् के सर्वाधिक समर्पित भक्त नित्यानन्द प्रभु दो कार्यों सेभक्ति सम्प्रदाय का प्रचार करने तथा नास्तिकों को परास्त और दमन करने के उद्देश्य से-देश-भर में भ्रमण करने लगे।"

सर्वज्ञ नित्यानन्द आइला तार घरे । आसिया वसिला दुर्गा-मण्डप-उपरे ॥

१५०॥

भगवान् नित्यानन्द, जो कि पूर्ण पुरुषोत्तम भगवान् होने के कारण सर्वज्ञ हैं, रामचन्द्र खान के घर आये और दुर्गामण्डप की वेदी पर बैठ गये।"

अनेक लोक-जन सङ्ग अङ्गन भरिल ।। भितर हैते रामचन्द्र सेवक पाठाइल ॥

१५१॥

जब दुर्गामण्डप तथा आँगन लोगों की भीड़ से भर गया, तो रामचन्द्र खान ने घर के भीतर से अपने नौकर को नित्यानन्द प्रभु के पास भेजा।"

सेवक बले गोसाजि, मोरे पाठाइल खाँन ।गृहस्थेर घरे तोमाय दिब वासा-स्थान ॥

१५२॥

उस नौकर ने नित्यानन्द प्रभु को सूचित किया, हे महाशय, रामचन्द्र खान ने मुझे भेजा है कि मैं आपको किसी सामान्य व्यक्ति के घर में रहने का स्थान दें।"

गोयालार गोशाला हय अत्यन्त विस्तार ।।इहाँ सङ्कीर्ण-स्थल, तोमार मनुष्य अपार ॥

१५३ ॥

आप किसी ग्वाले के घर जा सकते हैं, क्योंकि गोशाला विस्तृत होती है, जबकि यहाँ दुर्गामण्डप में स्थान अपर्याप्त है, क्योंकि आपके साथ अनेक अनुयायी हैं।"

भितरे आछिला, शुनि' क्रोधे बाहिरिला ।अट्ट अट्ट हासि' गोसाजि कहिते लागिला ॥

१५४॥

जब नित्यानन्द प्रभु ने रामचन्द्र खान के नौकर का यह आदेश सुना, तो वे अत्यधिक क्रुद्ध हुए और बाहर आ गये। उच्च स्वर से हँसते हुए वे इस प्रकार बोले।।"

'सत्य कहे,—एइ घर मोर योग्य नय ।।म्लेच्छ गो-वध करे, तार योग्य हय ॥

१५५॥

रामचन्द्र खान ने ठीक ही कहा है। यह स्थान मेरे लिए अनुपयुक्त है। यह गोवध करने वाले मांसाहारियों के लिए उपयुक्त है।"

एत बलि' क्रोधे गोसान्नि उठिया चलिला ।। तारे दण्ड दिते से ग्रामे ना रहिला ॥

१५६॥

यह कहकर नित्यानन्द प्रभु उठे और क्रुद्ध होकर चले गये। रामचन्द्र ग्रान को दण्ड देने के लिए वे उस गाँव में भी नहीं रुके।"

इहाँ रामचन्द्र खान सेवके आज्ञा दिल ।। गोसाबि ग्राहाँ वसिला, तार माटी खोदाइल ॥

१५७॥

रामचन्द्र खान ने नौकर को आज्ञा दी कि जहाँ पर नित्यानन्द प्रभु बैठे थे, उस स्थान की मिट्टी खोद डाले।

गोमय-जले लेपिला सब मन्दिर-प्राङ्गण ।तबु रामचन्द्रेर मन ना हैल परसन्न ॥

१५८ ॥

। दुर्गामंडप मन्दिर तथा आँगन को शुद्ध करने के लिए रामचन्द्र खान ने इन्हें गोबर मिले जल से छिड़काया और लिपवाया, फिर भी उसका मन प्रसन्न न था।

दस्यु-वृत्ति करे रामचन्द्र राजारे ना देय कर ।।क्रुद्ध हा म्लेच्छ उजिर आइल तार घर ॥

१५९॥

रामचन्द्र का पेशा आपत्तिजनक था, क्योंकि वह सरकार को कर देने से जी चुराता था। इसलिए सरकारी वित्त मन्त्री नाराज था और वह उसके घर आया।

आसि' सेइ दुर्गा-मण्डपे वासा कैल ।।अवध्य वध करि' मांस से-घरे रान्धाइल ॥

१६० ।। उस मुसलमान मन्त्री ने रामचन्द्र खान के दुर्गामण्डप को अपना निवासस्थान बनाया। उसने एक गाय मारी और वहाँ माँस पकाया।

स्त्री-पुत्र-सहित रामचन्द्रेरे बान्धिया । तार घर-ग्राम लुटे तिन-दिन रहिया ।। १६१॥

। उसने रामचन्द्र खान को उसकी पत्नी तथा बच्चों समेत बन्दी बना लिया और फिर लगातार तीन दिनों तक उसके घर तथा गाँव को लूटा।"

सेइ घरे तिन दिन करे अमेध्य रन्धन ।आर दिन सबा लञा करिला गमन ।। १६२॥

उसने उसी कमरे में लगातार तीन दिनों तक गोमांस पकाया। तब अगले दिन अपने अनुयायियों सहित वह चला गया।"

जाति-धन-जन खानेर सकल लइल । बहु-दिन पर्यन्त ग्राम उजाड़ रहिल ॥

१६३॥

उस मुसलमान मन्त्री ने रामचन्द्र खान का पद, सम्पत्ति तथा अनुयायी छीन लिये। कई दिनों तक गाँव उजाड़ बना रहा।"

महान्तेर अपमान ग्ने देश-ग्रामे हय ।। एक जनार दोषे सब देश उजाड़ये ॥

१६४॥

जहाँ भी किसी महान् भक्त का अपमान किया जाता है, वहाँ एक व्यक्ति के दोष से सारा गाँव या नगर पीड़ित होता है।"

हरिदास-ठाकुर चलि' आइला चान्दपुरे । आसिया रहिला बलराम-आचार घरे ॥

१६५ ।। हरिदास ठाकुर चलते-चलते चान्दपुर नामक गाँव में आये। वहाँ पर वे बलराम आचार्य के घर पर ठहरे।"

हिरण्य, गोवर्धन—दुइ मुलुकेर मजुमदार ।।तार पुरोहित—‘बलराम' नाम ताँर ॥

१६६॥

हिरण्य तथा गोवर्धन उस देश की उस तहसील के दो सरकारी कोषाध्यक्ष थे। उनके पुरोहित का नाम बलराम आचार्य था।"

हरिदासेर कृपा-पात्रे, ताते भक्ति-माने ।।ग्रन करि' ठाकुरेरे राखिला सेइ ग्रामे ॥

१६७॥

बलराम आचार्य पर हरिदास ठाकुर की कृपा के कारण वह हरिदास ठाकुर से अत्यधिक लगाव रखता था। इसीलिए उसने हरिदास ठाकुर को गाँव में अत्यन्त यत्नपूर्वक रखी।"

निर्जन पर्ण-शालाय करेन कीर्तन ।।बलराम-आचार्य-गृहे भिक्षा-निर्वाहण ॥

१६८॥

। उस गाँव में हरिदास ठाकुर को एकान्त फूस की कुटिया दे दी गई थी, जहाँ वे हरे कृष्ण महामन्त्र का जप करते रहते थे। वे बलराम आचार्य के घर पर प्रसाद लेते थे।"

रघुनाथ-दास बालक करेन अध्ययन ।।हरिदास-ठाकुरेरे ग्राइ' करेन दर्शन ॥

१६९।। रघुनाथ दास, जो गोवर्धन मजुमदार का पुत्र था और बाद में रघुनाथ दास गोस्वामी बना, उस समय बालक अवस्था में पढ़ाई कर रहा था। वह नित्य ही हरिदास ठाकुर का दर्शन करने आता था।"

हरिदास कृपा करे ताँहार उपरे । सेइ कृपा 'कारण' हैल चैतन्य पाइबारे ॥

१७० ।।। स्वाभाविक रूप से हरिदास ठाकुर उसके प्रति कृपालु थे और इस वैष्णव के कृपापूर्ण आशीर्वाद से ही वह बाद में श्री चैतन्य महाप्रभु के चरणकमलों की शरण प्राप्त कर सका।।"

ताहाँ ग्रैछे हैल हरिदासेर महिमा कथन ।।व्याख्यान,—अद्भुत कथा शुन, भक्त-गण ॥

१७१ ॥

हिरण्य तथा गोवर्धन के निवासस्थान पर व्याख्यान होते थे, जिनमें हरिदास ठाकुर की महिमा का गुणगान होता था। हे भक्तों, उस अद्भुत कथा को सुनो।"

एक-दिन बलराम मिनति करिया ।। मजुमदारेर सभाय आईला ठाकुरे ला ॥

१७२॥

एक दिन बलराम आचार्य ने अत्यन्त दीनतापूर्वक हरिदास ठाकुर से प्रार्थना की कि वे हिरण्य तथा गोवर्धन मजुमदारों की सभा में चलें। अतः बलराम आचार्य हरिदास ठाकुर के साथ वहाँ गये।"

ठाकुर देखि' दुई भाइ कैला अभ्युत्थान । पाय पड़ि' आसन दिला करिया सम्मान ॥

१७३॥

। हरिदास ठाकुर को देखकर दोनों भाई तुरन्त उठ खड़े हुए और उनके चरणकमलों पर गिर पड़े। तत्पश्चात् उन्होंने अत्यन्त आदरपूर्वक उन्हें बैठने के लिए आसन दिया।"

अनेक पण्डित सभाय, ब्राह्मण, सज्जन । दुई भाइ महा-पण्डित हिरण्य, गोवर्धन ॥

१७४॥

। उस सभा में अनेक विद्वज्जन, ब्राह्मण तथा सम्माननीय भद्र पुरुष थे। हिरण्य तथा गोवर्धन, ये दोनों भाई भी महान् पण्डित (विद्वान) थे।"

हरिदासेर गुण सबे कहे पञ्च-मुखे ।शुनिया त' दुइ भाइ पाइला बड़ सुखे ॥

१७५ ॥

वहाँ सारे लोग हरिदास ठाकुर के महान् गुणों का बखान करने लगे, मानो उनके पाँच-पाँच मुख हों। यह सुनकर दोनों भाई परम सुखी हुए।"

तिन-लक्ष नाम ठाकुर करेन कीर्तन ।।नामेर महिमा उठाइल पण्डित-गण ॥

१७६ ॥

सभा में इसका उल्लेख किया गया कि हरिदास ठाकुर प्रतिदिन तीन लाख कृष्ण-नाम का जप करते थे। इस तरह सारे विद्वान पवित्र नाम की महिमा के विषय में विचारविमर्श करने लगे।"

केह बले,-'नाम हैते हय पाप-क्षय' ।।केह बले,--‘नाम हैते जीवेर मोक्ष हय' ॥

१७७॥

उनमें से कुछेक ने कहा, भगवान् के पवित्र नाम का जप करने से मनुष्य सारे पापमय जीवन के फलों से मुक्त हो जाता है। अन्यों ने कहा, भगवान् के पवित्र नाम के जप मात्र से जीव भवबन्धन से छूट जाता है।"

हरिदास कहेन,_’नामेर एइ दुइ फल नय ।नामेर फले कृष्ण-पदे प्रेम उपजय ॥

१७८॥

। हरिदास ठाकुर ने आपत्ति की, “ये दोनों वर पवित्र नाम के जप के सही फल नहीं हैं। वास्तव में अपराधरहित नाम-जप से कृष्ण के चरणकमलों के प्रति प्रेम जागृत होता है।"

एवं-व्रतः स्व-प्रिय-नाम-कीर्त्याजातानुरागो द्रुत-चित्त उच्चैः ।। हसत्यथो रोदिति रौति गायत्य् ।उन्माद-वन्नृत्यति लोक-बाह्यः ॥

१७९॥

“जब कोई व्यक्ति वास्तव में उन्नत होता है और अपने प्रिय भगवान् के नाम-कीर्तन में आनन्द लेता है, तो वह उत्तेजित हो उठता है और उच्च स्वर से नाम-कीर्तन करता है। वह हँसता है, रोता है, चंचल होता है और उन्मत्त की तरह बाहरी लोगों की परवाह किये बिना कीर्तन करता है।'" आनुषङ्गिक फल नामेर–‘मुक्ति', ‘पाप-नाश' ।ताहार दृष्टान्त त्रैछे सूर्येर प्रकाश ॥

१८० ॥

“मुक्ति तथा पाप-फलों का क्षय-ये दो भगवन्नाम कीर्तन के साथ मिलने वाले गौण फल हैं। इसका उदाहरण प्रात:कालीन सूर्य-प्रकाश के चमकने में पाया जाता है।"

अंहः संहरदखिलं सकृद्उदयादेव सकल-लोकस्य ।। तरणिरिव तिमिर-जलधिंजयति जगन्मङ्गलं हरेर्नाम ॥

१८१॥

जिस तरह उदय होता हुआ सूर्य तुरन्त ही समुद्र जैसे अगाध, जगत् । के सारे अन्धकार को दूर कर देता है, उसी तरह भगवान् के पवित्र नाम यदि एक बार अपराधरहित होकर उच्चारण किया जाए, तो जीव के पापी जीवन के सारे पापफलों को दूर कर देता है। उस भगवान् के पवित्र नाम की जय हो, जो सारे जगत् के लिए मंगलकारी है।"

एइ श्लोकेर अर्थ कर पण्डितेर गण ।।सबे कहे,--‘तुमि कह अर्थ-विवरण' ॥

१८२॥

। इस श्लोक को सुनाकर हरिदास ठाकुर ने कहा, हे विद्वानों, जरा इस श्लोक का अर्थ बतलाओ। किन्तु श्रोताओं ने हरिदास ठाकुर से अनुरोध किया, अच्छा यही होगा कि आप ही इस महत्त्वपूर्ण श्लोक का अर्थ बतलाएँ।"

हरिदास कहेन,–‘प्रैछे सूर उदय ।उदय ना हैते आरम्भे तमेर हय क्षय ॥

१८३॥

हरिदास ठाकुर ने कहा, जब सूर्यका उदय होने लगता है, तो उसके दृश्यमान होने के पूर्व ही वह रात के अन्धकार को दूर कर देता है।

चौर-प्रेत-राक्षसादिर भय हय नाश ।।उदय हैले धर्म-कर्म-आदि परकाश ॥

१८४॥

। सूर्य-प्रकाश के प्रथम दर्शन होते ही चोरों, प्रेतों तथा असुरों का भय तुरन्त चला जाता है और जब सूर्य वास्तव में दिखता है, तो हर वस्तु प्रकट हो जाती है और हर व्यक्ति अपने धार्मिक कार्य तथा नियमित कर्तव्य करना प्रारम्भ कर देता है।"

ऐछे नामोदयारम्भे पाप-आदिर क्षय ।। उदय कैले कृष्ण-पदे हय प्रेमोदय ॥

१८५॥

इसी तरह यह प्रथम संकेत कि भगवान् के पवित्र नाम का निरपराध जप जाग्रत हो चुका है, तुरन्त पापमय जीवन के फलों का क्षय कर देता है। और जब कोई निरपराध होकर नाम का जप करता है, तो उसमें कृष्ण । के चरणकमलों पर प्रेमभाव युक्त सेवा जाग्रत हो जाती है।"

‘मुक्ति' तुच्छ-फल हय नामाभास हैते ॥

१८६ मुक्ति तो भगवान् के पवित्र नाम के अपराध रहित जप की जागृति के आभास से प्राप्त होने वाला एक नगण्य फल है।"

म्रियमाणो हरेर्नाम गृणन्पुत्रोपचारितम् ।।अजामिलोऽप्यगाद्धाम किमुत श्रद्धया गृणन् ॥

१८७।। मृत्यु के समय अजामिल ने अपने पुत्र नारायण को बुलाने के उद्देश्य से भगवान् के पवित्र नाम का उच्चारण किया। फिर भी उसे वैकुण्ठ लोक प्राप्त हुआ। तो फिर उन लोगों के विषय में क्या कहा जा सकता है, जो श्रद्धा तथा आदरपूर्वक पवित्र नाम का कीर्तन करते हैं?" ये मुक्ति भक्त ना लय, से कृष्ण चाहे दिते ॥

१८८॥

जो मुक्ति शुद्ध भक्त को स्वीकार्य नहीं है, वह कृष्ण द्वारा सदा बिना किसी कठिनाई के प्रदान की जाती है।"

सालोक्य-सार्टि-सारूप्य-सामीप्यैकत्वमप्युत ।।दीयमानं न गृह्णन्ति विना मत्सेवनं जनाः ॥

१८९।। यदि मैं सालोक्य, सार्टि, सारूप्य, सामीप्य या एकत्व-इन मुक्तियों को अपने भक्तों को प्रदान भी करूं, तो वे मेरी सेवा की तुलना में इन्हें स्वीकार नहीं करते।"

‘गोपाल चक्रवर्ती' नाम एक-जन । मजुमदारेर घरे सेइ आरिन्दा प्रधान ॥

१९०॥

हिरण्य तथा गोवर्धन मजुमदार के घर पर गोपाल चक्रवर्ती नामक एक व्यक्ति सरकारी मुख्य कर संग्राहक था।"

गौड़े रहि' पात्साहा-आगे आरिन्दा-गिरि करे ।।बार-लक्ष मुद्रा सेइ पात्सार ठात्रि भरे ॥

१९१॥

। यह गोपाल चक्रवर्ती बंगाल में रहता था। कर संग्राहक के रूप में उसका काम था, बारह लाख मुद्राएँ एकत्र करके शाही खजाने में जमा करना।"

परम-सुन्दर, पण्डित, नूतन-यौवन ।। नामाभासे मुक्ति' शुनि' ना हइल सहन ॥

१९२॥

उसका शरीर सुन्दर था और वह पण्डित तथा युवावस्था को प्राप्त था, किन्तु वह इस कथन को सहन नहीं कर पाया कि मात्र नामाभास से ( भगवान् के पवित्र नाम के शुद्ध उच्चारण की झलक मात्र से) कोई मुक्ति प्राप्त कर सकता है।"

क्रुद्ध हा बले सेइ सरोष वचन ।। भावुकेर सिद्धान्त शुन, पण्डितेर गण ॥

१९३।। यह युवक गोपाल चक्रवर्ती हरिदास ठाकुर के कथन सुनकर अत्यधिक कुपित हुआ। उसने तुरन्त उनकी आलोचना की, “हे विद्वज्जनों, जरा इस भावुक भक्त का निष्कर्ष तो सुनो।"

कोटि-जन्मे ब्रह्म-ज्ञाने येइ 'मुक्ति' नय ।। एइ कहे, नामाभासे सेइ 'मुक्ति' हय ॥

१९४।। करोड़ों जन्मों के बाद जब कोई मनुष्य परम ज्ञान में पूर्ण हो जाता है, तब भी उसे मुक्ति नहीं मिल पाती; फिर भी यह व्यक्ति कहता है कि उस मुक्ति को केवल नामाभास से प्राप्त की जा सकती है।"

हरिदास कहेन,—केने करह संशय? ।। शास्त्रे कहे,—नामाभास-मात्रे ‘मुक्ति' ह्य ॥

१९५॥

। हरिदास ठाकुर ने कहा, “तुम सन्देह क्यों कर रहे हो? प्रामाणिक शास्त्र कहते हैं कि मनुष्य मात्र नामाभास से, पवित्र नाम की झलक मात्र से मुक्ति पा सकता है।"

भक्ति-सुख-आगे ‘मुक्ति' अति-तुच्छ हय ।। अतएव भक्त-गण 'मुक्ति' नाहि लय ॥

१९६॥

जो भक्त भक्ति के दिव्य आनन्द का भोग करता है, उसके लिए मुक्ति अतीव नगण्य है। इसलिए शुद्ध भक्त कभी भी मुक्ति पाने की अभिलाषा नहीं रखते।"

त्वत्साक्षात्करणाह्लाद-विशुद्धाब्धि-स्थितस्य मे ।। सुखानि गोष्पदायन्ते ब्राह्माण्यपि जगद्गुरो ॥

१९७॥

। हे प्रिय प्रभु, हे ब्रह्माण्ड के स्वामी, चूँकि मैंने आपका प्रत्यक्ष दर्शन किया है, इसलिए मेरे दिव्य आनन्द ने महासागर का रूप धारण कर लिया है। अब उस सागर में स्थित होने से मैं अनुभव करता हूँ कि ब्रह्मानन्द समेत अन्य समस्त तथाकथित सुख गाय के खुर के चिह्न में भरे हुए जल के समान हैं।"

विप्र कहे,_नामाभासे ग्रदि ‘मुक्ति' नय ।।तबे तोमार नाक काटि' करह निश्चय ॥

१९८॥

। गोपाल चक्रवर्ती ने कहा, यदि कोई मात्र नामाभास से मुक्त न हो। सके, तो आप इसे निश्चय ही जान लें कि मैं आपकी नाक काट लूंगा।"

हरिदास कहेन, यदि नामाभासे मुक्ति' नय ।।तबे आमार नाक काटिमु,—एइ सुनिश्चय’॥

१९९।। तब हरिदास ठाकुर ने गोपाल चक्रवर्ती की चुनौती स्वीकार कर ली। उन्होंने कहा, ‘यदि नामाभास से मुक्ति प्राप्त न हो सके, तो निश्चित रूप में मैं अपनी नाक काट दूंगा।"

शुनि' सभासद् उठे करि' हाहाकार ।मजुमदार सेइ विप्रे करिल धिक्कार ॥

२००॥

सभा के सारे सदस्य जिन्होंने चुनौती सुनी, वे अत्यधिक क्षुब्ध हो गये। वे हाहाकार करते हुए उठ खड़े हुए। हिरण्य तथा गोवर्धन मजुमदार दोनों ने ही उस ब्राह्मण कर संग्राहक को तुरन्त डाँटा।"

बलाइ-पुरोहित तारे करिला भर्सन ।“घट-पटिया मूर्ख तुञि भक्ति काँहा जान? ॥

२०१॥

। बलराम आचार्य नामक पुरोहित ने भी गोपाल चक्रवर्ती को डाँटा। मने कहा, “तुम मूर्ख तर्कवादी हो। तुम भगवद्भक्ति के बारे में क्या जानो?" हरिदास-ठाकुरे तुञि कैलि अपमान! ।। सर्व-नाश हबे तोर, ना हबे कल्याण ॥

२०२॥

तुमने हरिदास ठाकुर का अपमान किया है। इसलिए तुम्हारे लिए भयावह स्थिति उत्पन्न होगी। तुम्हें किसी शुभ फल की आशा नहीं करनी चाहिए।"

शुनि' हरिदास तबे उठिया चलिला । मजुमदार सेइ विप्रे त्याग करिला ॥

२०३॥

। तब हरिदास ठाकुर जाने के लिए उठे और गोपाल चक्रवर्ती के स्वामी दोनों मजुमदारों ने तुरन्त ही गोपाल चक्रवर्ती को अपनी नौकरी से हटा दिया।"

सभा-सहिते हरिदासेर पड़िला चरणे ।। हरिदास हासि' कहे मधुर-वचने ॥

२०४॥

दोनों मजुमदार सभा के सारे सदस्यों सहित हरिदास ठाकुर के चरणकमलों पर गिर पड़े। किन्तु हरिदास ठाकुर मुस्कुरा रहे थे। उन्होंने मीठी वाणी में कहा।"

तोमा-सबार दोष नाहि, एइ अज्ञ ब्राह्मण । तार दोष नाहि, तार तर्क-निष्ठ मन ॥

२०५॥

उन्होंने कहा, तुम सबका कोई दोष नहीं है। निस्सन्देह, इस अज्ञानी तथाकथित ब्राह्मण का भी दोष नहीं है, क्योंकि वह शुष्क चिन्तन तथा तर्क का अभ्यस्त है।"

तर्केर गोचर नहे नामेर महत्त्व ।। कोथा हैते जानिबे से एइ सब तत्त्व? ॥

२०६॥

‘कोई व्यक्ति मात्र तर्कवितर्क से पवित्र नाम की महिमा को नहीं समझ सकता। इसलिए यह व्यक्ति सम्भवतः नाम की महिमा को नहीं समझ सका।"

ग्राह घर, कृष्ण करुन कुशल सबार ।।आमार सम्बन्धे दुःख ना हरक काहार ॥

२०७॥

अब आप सभी अपने-अपने घर जायें। भगवान् कृष्ण आप सबको आशीर्वाद दें। मेरे अपमानित होने के कारण आप दुःखी न हों।"

तबे से हिरण्य-दास निज घरे आइल ।। सेइ ब्राह्मणे निज द्वारे-माना कैल ॥

२०८॥

तब हिरण्य दास मजुमदार अपने घर लौट आया और उसने आदेश Iया कि गोपाल चक्रवर्ती घर के भीतर नहीं जा सकता।"

तिन दिन भितरे सेइ विप्रेर 'कुष्ठ' हैल ।। अति उच्च नासा तार गलिया पड़िल ॥

२०९॥

तीन दिनों के भीतर उस ब्राह्मण को कोढ़ हो गया, जिसके फलस्वरूप उसकी उठी हुई नाक गलकर गिर पड़ी।"

चम्पक-कलि-सम हस्त-पदाङ्गलि ।। कोङ्कड़ हद्दल सबे, कुष्ठे गेल गलि' ॥

२१०॥

। उस ब्राह्मण के हाथ तथा पाँव की अँगुलियाँ सुनहरे रंग के चम्पक की कलियों के समान सुन्दर थीं, किन्तु कोढ़ के कारण वे सब मुरझा गईं और धीरे-धीरे गल गईं।"

देखिया सकल लोक हैल चमत्कार । हरिदासे प्रशंसि' ताँरे करे नमस्कार ॥

२११॥

गोपाल चक्रवर्ती की दशा देखकर सारे लोग चकित थे। सबने । हरिदास ठाकुर के प्रभाव की प्रशंसा की और उन्हें नमस्कार किया।"

यद्यपि हरिदास विप्रेर दोष ना लइला ।। तथापि ईश्वर तारे फल भुञ्जाइला ॥

२१२॥

यद्यपि वैष्णव के रूप में हरिदास ठाकुर ने ब्राह्मण के अपराध को गम्भीरता के साथ नहीं लिया, किन्तु पूर्ण पुरुषोत्तम भगवान् इसे सहन नहीं कर सके, अतः उन्होंने ब्राह्मण को यह फल भोगने के लिए बाध्य किया।"

भक्त-स्वभाव,--अज्ञ-दोष क्षमा करे ।। कृष्ण-स्वभाव,-भक्त-निन्दा सहिते ना पारे ॥

२१३॥

यह शुद्ध भक्त का गुण है कि वह अज्ञानी धूर्त द्वारा किये गये किसी भी अपराध को क्षमा कर देता है। किन्तु कृष्ण का गुण यह है कि वे अपने भक्तों की निन्दा नहीं सहन कर पाते।"

विप्रेर कुष्ठ शुनि' हरिदास मने दुःखी हैला ।। बलाइ-पुरोहिते कहि' शान्तिपुर आइला ॥

२१४॥

जब हरिदास ठाकुर ने सुना कि ब्राह्मण गोपाल चक्रवर्ती को कोढ़ हो गया है, तो वे दुःखी हुए। तत्पश्चात् हिरण्य मजुमदार के पुरोहित बलराम आचार्य को बतलाकर वे अद्वैत आचार्य के घर शान्तिपुर चले गये।।"

आचार्ये मिलिया कैला दण्डवत्प्रणाम । अद्वैत आलिङ्गन करि' करिला सम्मान ॥

२१५॥

अद्वैत आचार्य से मिलकर हरिदास ठाकुर ने सादर दण्डवत् प्रणाम किया। अद्वैत आचार्य ने बदले में उनका आलिंगन किया और सम्मान दिखलाया।"

गङ्गा-तीरे गोंफा करि' निर्जने ताँरे दिला ।। भागवत-गीतार भक्ति-अर्थ शुनाइला ॥

२१६॥

। अद्वैत आचार्य ने हरिदास ठाकुर के लिए गंगा के तट पर एकान्त स्थान में एक गुफा जैसा घर बनवा दिया और भक्ति के सन्दर्भ में भीमद्भागवत तथा भगवद्गीता का वास्तविक अर्थ उन्हें बताया।"

आचार घरे नित्य भिक्षा-निर्वाहण ।। दुइ जना मिलि' कृष्ण-कथा-आस्वादन ॥

२१७ ॥

हरिदास ठाकुर नित्यप्रति अद्वैत आचार्य के घर पर भोजन करते। वे दोनों मिलकर कृष्ण विषयक चर्चाओं का अमृत-आस्वादन करते।"

हरिदास कहे,–‘गोसाञि, करि निवेदने । मोरे प्रत्यह अन्न देह' को प्रयोजने? ॥

२१८॥

हरिदास ठाकुर ने कहा, हे अद्वैत आचार्य, मैं आपके समक्ष कुछ निवेदन करना चाहता हूँ। आप प्रतिदिन मुझे खाने के लिए भोजन की भिक्षा देते हैं। इसकी क्या आवश्यकता है?" महा-महा-विप्र एथा कुलीन-समाज । नीचे आदर कर, ना वासह भय लाज!! ।।२१९।। । हे महोदय, आप बड़े-बड़े ब्राह्मणों तथा कुलीनों के समाज में रह रहे हैं, किन्तु बिना भय या लज्जा के आप मुझ जैसे निम्न जाति के व्यक्ति का आदर करते हैं।"

अलौकिक आचार तोमार कहिते पाइ भय ।। सेइ कृपा करिबी,—य़ाते मोर रक्षा हय’ ॥

२२०॥

हे महाशय, आपका आचरण असामान्य है। निस्सन्देह, कभी-कभी तो मैं आपसे बोलते हुए डरता हूँ। किन्तु समाज के आचरण से मेरी रक्षा करके मेरे ऊपर कृपा करें।"

आचार्य कहेन, तुमि ना करिह भय । सेइ आचरिब, ग्रेइ शास्त्र-मत हय ॥

२२१॥

। अद्वैत आचार्य ने उत्तर दिया, हे प्रिय हरिदास, तुम भयभीत मत होओ। मैं प्रामाणिक शास्त्रों द्वारा अनुमोदित सिद्धान्तों के अनुसार ही कड़ाई से व्यवहार करूंगा।

तुमि खाइले हय कोटि-ब्राह्मण-भोजन’ ।। एत बलि, श्राद्ध-पात्र कराइला भोजन ॥

२२२॥

अद्वैत आचार्य ने कहा, आपको खिलाना एक करोड़ ब्राह्मणों को खिलाने के समान है। अतएव आप यह श्राद्धपात्र स्वीकार करें। इस तरह अद्वैत आचार्य ने उन्हें खिलाया।"

जगत् निस्तार लागि' करेन चिन्तन ।अवैष्णव-जगत् केमने हइबे मोचन? ॥

२२३॥

अद्वैत आचार्य सदैव इन विचारों में मग्न रहते थे कि सम्पूर्ण जगत् के पतितात्माओं का किस तरह उद्धार किया जाए। उन्होंने सोचा, ‘सारा जगत् अभक्तों से भरा पड़ा है। उनका उद्धार किस तरह हो सकेगा? ।"

कृष्ण अवतारिते अद्वैत प्रतिज्ञा करिला ।जल-तुलसी दिया पूजा करिते लागिला ॥

२२४॥

समस्त पतितात्माओं का उद्धार करने का दृढ़ संकल्प लेकर अद्वैत आचार्य ने कृष्ण को अवतरित करवाने का निश्चय किया। इस व्रत के साथ भगवान् की पूजा करने के लिए वे गंगाजल तथा तुलसी दल अर्पित करने लगे।"

हरिदास करे गोंफाय नाम-सङ्कीर्तन ।।कृष्ण अवतीर्ण हडबेन, एइ ताँर मन ।। २२५ ॥

। इसी तरह हरिदास ठाकुर गंगा के किनारे अपनी गुफा में कृष्ण का अवतरण कराने की दृष्टि से जप करते रहे।"

दुइ-जनेर भक्त्ये चैतन्य कैला अवतार ।।नाम-प्रेम प्रचारि' कैला जगत् उद्धार ॥

२२६॥

इन दोनों व्यक्ति की भक्ति के कारण श्री चैतन्य महाप्रभु अवतार के रूप में आये। इस तरह सारे जगत् का उद्धार करने के लिए उन्होंने भगवान् के पवित्र नाम तथा कृष्ण-प्रेम का प्रचार किया।"

आर अलौकिक एक चरित्र ताँहार ।।याहार श्रवणे लोके हय चमत्कार ॥

२२७॥

हरिदास ठाकुर के असामान्य व्यवहार से सम्बन्धित एक अन्य घटना है। इसको सुनकर कोई भी आश्चर्यचकित हो जायेगा।"

तर्क ना करिह, तर्कागोचर ताँर रीति ।।विश्वास करिया शुन करिया प्रतीति ॥

२२८॥

ऐसी घटनाओं को शुष्क तर्क किये बिना सुनो, क्योंकि ये घटनाएँ हमारे भौतिक तर्क से परे हैं। मनुष्य को इन पर श्रद्धापूर्वक विश्वास करना चाहिए।"

एक-दिन हरिदास गोंफाते वसिया ।।नाम-सङ्कीर्तन करेन उच्च करिया ॥

२२९॥

। एक दिन हरिदास ठाकुर अपनी गुफा में बैठे थे और अत्यधिक उच्च स्वर से पवित्र भगवन्नाम का कीर्तन कर रहे थे।"

ज्योत्स्नावती रात्रि, दश दिक्सुनिर्मल ।।गङ्गार लहरी ज्योत्स्नाय करे झल-मल ॥

२३०॥

पूर्णिमा की रात्रि थी, जिससे गंगा की लहरें झिलमिला रही थीं। सारी दिशाएँ निर्मल तथा प्रकाशमान थीं।"

द्वारे तुलसी लेपा-पिण्डिर उपर ।। गोंफार शोभा देखि' लोकेर जुड़ाय अन्तर ॥

२३१॥

स्वच्छ वेदी पर तुलसी के पौधे से युक्त गुफा की शोभा को जो भी ग्यता, वह चकित रह जाता और हृदय में तुष्ट होता।।"

हेन-काले एक नारी अङ्गने आइल ।। ताँर अङ्ग-कान्त्ये स्थान पीत-वर्ण हइल ॥

२३२॥

उसी समय उस सुन्दर परिदृश्य में एक स्त्री आँगन में प्रकट हुई। उसके शरीर का सौन्दर्य इतना प्रकाशमान था कि सारा स्थान पीली आभा से भर गया।"

ताँर अङ्ग-गन्धे दश दिक् आमोदित । भूषण-ध्वनिते कर्ण हय चमकित ॥

२३३ ।। उसके शरीर की सुगन्ध से सारी दिशाएँ महकने लगीं और उसके गहनों की झंकार से कान झंकरित हो गये।"

आसिया तुलसीरे सेइ कैला नमस्कार ।।तुलसी परिक्रमा करि' गेला गोंफा-द्वार ॥

२३४॥

वहाँ आकर उस स्त्री ने तुलसी को नमस्कार किया और तुलसी की परिक्रमा करके वह उस गुफा के दरवाजे पर आई, जहाँ हरिदास ठाकुर बैठे थे।"

योड़-हाते हरिदासेर वन्दिला चरण ।।द्वारे वसि' कहे किछु मधुर वचन ॥

२३५॥

। उसने हाथ जोड़कर हरिदास ठाकुर के चरणकमलों पर नमस्कार किया। फिर द्वार पर बैठकर वह अत्यन्त मधुर वाणी में बोली।"

जगतेर बन्धु तुमि रूप-गुणवान् ।। तव सङ्ग लागि' मोर एथाके प्रयाण ॥

२३६॥

हे प्रिय मित्र, आप तो सारे जगत् के मित्र हैं। आप इतने सुन्दर तथा योग्य हैं। मैं यहाँ आपके साथ संग-सुख लाभ के लिए आई हूँ।"

मोरे अङ्गीकार कर ही सदय ।। दीने दया करे,—एइ साधु-स्वभाव हय’ ॥

२३७॥

‘हे महोदय, आप कृपया मुझे स्वीकार करें और मेरे प्रति कृपालु हों, क्योंकि समस्त साधुजनों का स्वभाव है कि वे दीन तथा पतितों के प्रति कृपालु होते हैं।"

एत बलि' नाना-भाव करये प्रकाश ।। ग्राहार दर्शने मुनिर हय धैर्य-नाश ॥

२३८॥

यह कहकर वह विविध हावभाव प्रकट करने लगी, जिसे देखकर बड़े-से-बड़े दार्शनिक का भी धैर्य छूट जाता।"

निर्विकार हरिदास गम्भीर-आशय ।।बलिते लागिला ताँरे हा सदय ॥

२३९॥

हरिदास ठाकुर अविचलित थे, क्योंकि उनका संकल्प दृढ़ था। वे उस पर कृपालु होकर उससे बोले।"

सङ्ख्या -नाम-सङ्कीर्तन-एइ 'महा-यज्ञ' मन्ये ।।ताहाते दीक्षित आमि हइ प्रति-दिने ॥

२४०॥

मैंने प्रतिदिन निश्चित संख्या में नाम-कीर्तन करने के महान् यज्ञ-व्रत की दीक्षा ले रखी है।

यावत्कीर्तन समाप्त नहे, ना करि अन्य काम ।। कीर्तन समाप्त हैले, हय दीक्षार विश्राम ॥

२४१॥

जब तक जप करने का व्रत अधूरा है, तब तक मैं किसी अन्य वस्तु की कामना नहीं करता। जब मैं अपना जप समाप्त कर लेता हूँ, तब मुझे दूसरा कुछ करने का अवसर मिलता है।"

द्वारे वसि' शुन तुमि नाम-सङ्कीर्तन ।।नाम समाप्त हैले करिमु तव प्रीति-आचरण ॥

२४२॥

। तुम द्वार पर बैठ जाओ और हरे कृष्ण महामन्त्र का जप सुनो। जप समाप्त होते ही मैं तुम्हारी मनोकामना पूरी करूँगा।"

एत बलि' करेन तेंहो नाम-सङ्कीर्तन ।।सेइ नारी वसि' करे श्री-नाम-श्रवण ॥

२४३॥

यह कहकर हरिदास ठाकुर ने भगवान् के पवित्र नाम का जप जारी त्रा । इस तरह उनके समक्ष बैठी वह स्त्री पवित्र नाम का जप सुनने लगी।"

कीर्तन करिते आसि' प्रातःकाल हैल ।। प्रातः-काल देखि नारी उठिया चलिल ॥

२४४॥

इस तरह उनके जप करते-करते सुबह हो गई और जब उस स्त्री ने देखा कि सुबह हो गई, तो वह उठी और चली गई।"

एड-मत तिन-दिन करे आगमन ।। नाना भाव देखाय, ग्राते ब्रह्मार हरे मन ॥

२४५ ॥

इस तरह वह तीन दिनों तक हरिदास ठाकुर के पास आती रही और विविध स्त्री-भंगिमाएँ दिखलाती रही, जो ब्रह्मा के भी मन को विमोहित कर लें।"

कृष्णे नामाविष्ट-मना सदा हरिदास ।। अरण्ये रोदित हैल स्त्री-भाव-प्रकाश ॥

२४६॥

हरिदास ठाकुर सदैव कृष्ण के विचारों में तथा कृष्ण के पवित्र नाम में मग्न रहते थे। इसलिए स्त्री ने जो भंगिमाएँ प्रकट कीं, वे जंगल में रोने के समान थीं।"

"text":"तृत्य दिवस रात्रि सेसा याबे हैला। ठाकुरेर स्थानी नारी कहते लागिला।।२४७।। तीसरे दिन की रात के अंत में, महिला ने हरिदास ठकुरा से इस प्रकार से बात की।"

तिन दिन वञ्चिला आमा करि' आश्वासन । रात्रि-दिने नहे तोमार नाम-समापन ।। २४८ ।। हे महोदय, आपने तीन दिनों तक झूठा आश्वासन देकर मुझे धोखा या है, क्योंकि मैं देखती हूँ कि आपका दिन-रात चलने वाला यह नाम जप कभी समाप्त नहीं होने वाला है।"

हरिदास ठाकुर कहेन,आमि कि करिमु?।।नियम करियाछि, ताहा केमने छाड़िमु?॥

२४९ ॥

हरिदास ठाकुर ने कहा, मेरी प्रिय मित्र, मैं कर ही क्या सकता हूँ? मैंने व्रत ले रखा है। तो फिर मैं उसे कैसे त्याग सकता हूँ?" तबे नारी कहे ताँरै करि' नमस्कार ।।‘आमि–माया' करिते आइलाङ परीक्षा तोमार ॥

२५०॥

हरिदास ठाकुर को नमस्कार करके वह स्त्री बोली, ‘मैं पूर्ण पुरुषोत्तम भगवान् की मोहिनी शक्ति, माया हूँ। मैं यहाँ आपकी परीक्षा लेने आई थी।"

ब्रह्मादि जीव, आमि सबारे मोहिलें ।एकेला तोमारे आमि मोहिते नारिलॆ ॥

२५१॥

‘ मैंने पहले ब्रह्मा तक के मन को मोहित किया है, अन्यों की बात जाने दें। केवल आपके मन को ही मैं आकृष्ट नहीं कर सकी।"

महा-भागवत तुमि,---तोमार दर्शने । तोमार कृष्ण-नाम-कीर्तन-श्रवणे ॥

२५२॥

चित्त शुद्ध हैल, चाहे कृष्ण-नाम लैते ।।कृष्ण-नाम उपदेशि' कृपा कर मोते ॥

२५३॥

हे महोदय, आप सर्वश्रेष्ठ भक्त हैं। आपके दर्शन मात्र से तथा आपको कृष्ण के पवित्र नाम का जप करते सुनकर मेरी चेतना शुद्ध हो गई है। अब मैं भगवान् के पवित्र नाम का कीर्तन करना चाहती हूँ। कृपया रे कृष्ण महामन्त्र जप के आनन्द के विषय में उपदेश देने की मुझ पर कृपा करें।"

चैतन्यावतारे वहे प्रेमामृत-वन्या ।।सब जीव प्रेमे भासे, पृथिवी हैल धन्या ।। २५४॥

श्री चैतन्य महाप्रभु का अवतार होने से भगवत्प्रेम रूपी सनातन अमृत की बाढ़ आ गई है। सारे जीव उसे बाढ़ में बह रहे हैं। अब सारा जगत महाप्रभु का कृतज्ञ है।"

ए-वन्याय ग्रे ना भासे, सेइ जीव छार।।कोटि-कल्पे कभु तार नाहिक निस्तार ॥

२५५ ॥

। जो इस बाढ़ में नहीं बहता, उसे धिक्कार है। ऐसे व्यक्ति को करोड़ों कल्पों तक उद्धार नहीं किया जा सकता।"

पूर्वे आमि राम-नाम पाञाछि 'शिव' हैते ।।तोमार सङ्गे लोभ हैल कृष्ण-नाम लेते ॥

२५६ ॥

पहले मुझे शिवजी से भगवान् राम का पवित्र नाम प्राप्त हुआ था, किन्तु अब आपकी संगति के फलस्वरूप मैं भगवान् कृष्ण के पवित्र नाम का जप करने के लिए अत्यधिक उत्सुक हूँ।"

मुक्ति-हेतुक तारक हय 'राम-नाम' ।। कृष्ण-नाम' पारक हल्ला करे प्रेम-दान ॥

२५७ ।। ‘भगवान् राम का पवित्र नाम निश्चय ही मुक्ति को देने वाला है, 1,न्तु कृष्ण का पवित्र नाम भवसागर को पार कराने वाला तथा अन्त में 1, प्रेम प्रदान कराने वाला है।"

कृष्ण-नाम देह' तुमि मोरे कर धन्या ।।आमारे भासाय ग्रैछे एइ प्रेम-वन्या ॥

२५८॥

कृपा करके मुझे कृष्ण-नाम दीजिये और मुझे भाग्यशालिनी बनाइये, जिससे मैं भी श्री चैतन्य महाप्रभु द्वारा प्रवर्तित भगवत्-प्रेम रूपी बाढ़ में बह सकें।"

एत बलि' वन्दिला हरिदासेर चरण ।हरिदास कहे,कर कृष्ण-सङ्कीर्तन ॥

२५९॥

इस तरह कहकर माया ने हरिदास ठाकुर के चरणकमलों की पूजा की और उन्होंने ‘तुम हरे कृष्ण महामन्त्र का जप करो यह कहकर उसे । दीक्षा दी।"

उपदेश पाञा माया चलिला हा प्रीत ।। ए-सब कथाते कारो ना जन्मे प्रतीत ॥

२६०॥

इस तरह हरिदास ठाकुर से उपदेश पाकर माया अत्यन्त प्रसन्न होकर चली गई। दुर्भाग्यवश कुछ लोगों को इन कथाओं में श्रद्धा नहीं होती।"

प्रतीत करिते कहि कारण इहार ।। ग्राहार श्रवणे हय विश्वास सबार ॥

२६१॥

इसलिए मैं उन कारणों को बतलाऊँगा कि लोगों को क्यों श्रद्धा करनी चाहिए। जो भी इसे सुनेगा वह श्रद्धालु बन जायेगा।"

चैतन्यावतारे कृष्ण-प्रेमे लुब्ध हा ।। ब्रह्म-शिव-सनकादि पृथिवीते जन्मिया ॥

२६२॥

कृष्णभावनामृत आन्दोलन आरम्भ करने के लिए श्री चैतन्य महाप्रभु के अवतार के समय ब्रह्माजी, शिवजी तथा चारों कुमारों ने कृष्ण-प्रेम द्वारा मुग्ध होकर इस पृथ्वी पर जन्म लिया।"

कृष्ण-नाम लञा नाचे, प्रेम-वन्याय भासे ।। नारद-प्रह्लादादि आसे मनुष्य-प्रकाशे ॥

२६३॥

। महर्षि नारद तथा प्रह्लाद जैसे सारे भक्त मनुष्य के रूप में कृष्ण-नाम का संकीर्तन करते, नाचते तथा भगवत्प्रेम की बाढ़ में बहते हुए वह आये।"

लक्ष्मी-आदि करि' कृष्ण-प्रेमे लुब्ध हा ।। नाम-प्रेम आस्वादिला मनुष्ये जन्मिया ॥

२६४॥

। कृष्ण-प्रेम से मुग्ध होकर देवी लक्ष्मी इत्यादि मनुष्य रूप में वहाँ आईं और उन्होंने नाम-प्रेम का आस्वादन किया।"

अन्येर का कथा, आपने व्रजेन्द्र-नन्दन ।। अवतरि' करेन प्रेम-रस आस्वादन ॥

२६५॥

औरों की बात जाने दें, नन्द महाराज के पुत्र कृष्ण तक हरे कृष्ण शीर्तन के रूप में भगवत्प्रेम का अमृत चखने के लिए स्वयं अवतरित होते है।"

माया-दासी ‘प्रेम' मागे, इथे कि विस्मय? ।।‘साधु-कृपा'-'नाम' विना ‘प्रेम' ना जन्मय ॥

२६६॥

तो इसमें क्या आश्चर्य है यदि कृष्ण की दासी, बहिरंगा शक्ति माया भगवत्प्रेम की याचना करती है? भक्त की कृपा के बिना तथा भगवान् के पवित्र नाम के कीर्तन के बिना भगवत्प्रेम सम्भव नहीं है।"

चैतन्य-गोसाजिर लीलार एइ त' स्वभाव ।।त्रिभुवन नाचे, गाय, पाञा प्रेम-भाव ॥

२६७॥

श्री चैतन्य महाप्रभु की लीलाओं में तीनों लोक भगवत्प्रेम के सम्पर्क में आकर नाचते तथा कीर्तन करते हैं। यह उनकी लीलाओं का स्वभाव है।"

कृष्णा-आदि, आर ग्रत स्थावर-जङ्गमे ।।कृष्ण-प्रेमे मत्त करे कृष्ण-सङ्कीर्तने ॥

२६८॥

कृष्ण का पवित्र नाम इतना आकर्षक है कि सारे चर तथा अचर जीव एवं स्वयं भगवान् कृष्ण तक जो-जो इसका कीर्तन करता है, वह कृष्ण-प्रेम से पूरित हो उठता है। हरे कृष्ण महामन्त्र के कीर्तन का यह प्रभाव है।"

स्वरूप-गोसात्रि कड़चाय ये-लीला लिखिले ।।रघुनाथ-दास-मुखे ये सब शुनिल ॥

२६९ ।। मैंने रघुनाथ दास गोस्वामी के मुख से वह सब कुछ सुना है, जो स्वरूप दामोदर गोस्वामी ने श्री चैतन्य महाप्रभु की लीलाओं के बारे में अपनी टिप्पणियों में अंकित किया है।"

सेइ सब लीला कहि सङ्क्षेप करिया ।।चैतन्य-कृपाते लिखि क्षुद्र-जीव हा ॥

२७० ॥

। मैंने उन लीलाओं का संक्षिप्त वर्णन किया है। मैंने जो कुछ लिखा है, वह श्री चैतन्य महाप्रभु की कृपा से लिखा है, क्योंकि मैं एक तुच्छ जीव हूँ।"

हरिदास ठाकुरेर कहिलॆ महिमार कण ।।ग्राहार श्रवणे भक्तेर जुड़ाय श्रवण ॥

२७१॥

मैंने हरिदास ठाकुर की महिमा के कणमात्र का वर्णन किया है। इसे सुनकर हर भक्त के कान तुष्ट हो जाते हैं।"

श्री-रूप-रघुनाथ-पदे ग्रार आश ।।चैतन्य-चरितामृत कहे कृष्णदास ॥

२७२॥

श्री रूप तथा श्री रघुनाथ के चरणकमलों की वन्दना करते हुए, सदैव उनकी कृपा की कामना करते हुए मैं कृष्णदास उनके चरणचिह्नों । पर चलते हुए श्री चैतन्य-चरितामृत का वर्णन कर रहा हूँ।"

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