अध्याय चार: सनातन गोस्वामी ने जगन्नाथ पुरी में भगवान के दर्शन किये
वृन्दावनात्पुनः प्राप्तं श्री-गौरः श्री-सनातनम् । देह-पातादवन्स्नेहाशुद्धं चक्रे परीक्षया ॥
१॥
जब सनातन गोस्वामी वृन्दावन से लौटे, तो श्री चैतन्य महाप्रभु ने उन्हें आत्महत्या करने के संकल्प से स्नेहपूर्वक बचाया। तत्पश्चात् उनकी परीक्षा लेकर श्री चैतन्य महाप्रभु ने उनके शरीर को शुद्ध बना दिया।"
जय जय श्री-चैतन्य जय नित्यानन्द ।। जयाद्वैत-चन्द्र जय गौर-भक्त-वृन्द ॥
२॥
। श्री चैतन्य महाप्रभु की जय हो! श्री नित्यानन्द प्रभु की जय हो! श्री अद्वैतचन्द्र की जय हो! तथा श्री चैतन्य महाप्रभु के समस्त भक्तों की जय हो!" नीलाचल हैते रूप गौड़े ग्रबे गेला ।मथुरा हैते सनातन नीलांचल आइला ॥
३॥
जब श्रील रूप गोस्वामी जगन्नाथ पुरी से बंगाल लौट गये, तो सनातन गोस्वामी श्री चैतन्य महाप्रभु से मिलने के लिए मथुरा से जगन्नाथ पुरी आये।"
झारिखण्ड-वनपथे आइला एकेला चलिया ।।कभु उपवास, कभु चर्वण करिया ॥
४॥
सनातन गोस्वामी ने अकेले ही मध्य भारत के झारिखण्ड के जंगली रास्ते से होकर यात्रा की। कभी वे उपवास करते तो कभी भोजन करते।"
झारिखण्डेर जलेर दोषे, उपवास हैते ।।गात्रे कण्डु हैल, रसा पड़े खाजुयाइते ॥
५॥
। झारखण्ड जंगल में खराब पानी मिलने तथा उपवास करने के कारण सनातन गोस्वामी को एक रोग हो गया, जिससे उनका सारा शरीर ग्युजलाता रहता। इस तरह वे खुजली के घावों से पीड़ित थे, जिनसे तरल पदार्थ (पीब) निकलता था।"
निर्वेद हइल पथे, करेन विचार ।।'नीच-जाति, देह मोर---अत्यन्त असार ॥
६॥
। निराशा में सनातन गोस्वामी ने विचार किया, “मैं नीच जाति का हूँ। और मेरा यह शरीर भक्तिमय सेवा के लिए व्यर्थ है।"
जगन्नाथे गेले ताँर दर्शन ना पाइमु ।।प्रभुर दर्शन सदा करिते नारिमु ॥
७॥
। जब मैं जगन्नाथ पुरी जाऊँगा, तो मैं न तो जगन्नाथजी के दर्शन कर सर्केगा, न ही श्री चैतन्य महाप्रभु का सर्वदा दर्शन कर पाऊँगा।"
मन्दिर-निकटे शुनि ताँर वासा-स्थिति ।। मन्दिर निकटे ग्राइते मोर नाहि शक्ति ॥
८॥
“मैंने सुना है कि श्री चैतन्य महाप्रभु का निवासस्थान जगन्नाथजी के मन्दिर के समीप है। किन्तु मन्दिर के समीप तक जाने की मुझमें शक्ति नहीं होगी।"
जगन्नाथेर सेवक फेरे कार्य-अनुरोधे । ताँर स्पर्श हैले मोर हबे अपराधे ॥
९ ॥
सामान्यतया भगवान् जगन्नाथ के सेवक अपना-अपना कार्य करने के लिए इधर-उधर घूमते फिरते हैं, किन्तु यदि वे मुझे छू लेंगे, तो मैं अपराधी बनूंगा।।"
ताते ग्रदि एइ देह भाल-स्थाने दिये ।।दुःख-शान्ति हय आर सद्गति पाइये ॥
१०॥
“इसलिए यदि मैं यह शरीर किसी अच्छे स्थान में उत्सर्ग कर दें, तो मेरा दुःख दूर हो जायेगा और मुझे उच्च गति प्राप्त होगी।"
जगन्नाथ रथ-यात्राय हइबेन बाहिर ।।ताँर रथ-चाकाय छाड़िमु एइ शरीर ॥
११॥
‘रथयात्रा उत्सव के समय जब भगवान जगन्नाथ मन्दिर से बाहर आते है, तो मैं उनके रथ के पहिए के नीचे अपना शरीर छोड़ दूंगा।"
महाप्रभुर आगे, आर देखि' जगन्नाथ ।।रथे देह छाड़िमु,—एइ परम-पुरुषार्थ' ॥
१२॥
जगन्नाथजी का दर्शन करने के बाद मैं श्री चैतन्य महाप्रभु की उपस्थिति में रथ के पहिए के नीचे अपना शरीर-त्याग कर दूंगा। यह मेरे जीवन का सर्वोच्च वर होगा।"
एइ त' निश्चय करि' नीलाचले आइला ।लोके पुछि' हरिदास-स्थाने उत्तरिला ॥
१३॥
। यह निश्चय करके सनातन गोस्वामी नीलाचल गये, जहाँ लोगों से दिशा पूछकर वे हरिदास ठाकुर के निवासस्थान जा पहुँचे।"
हरिदासेर कैला तेह चरण वन्दन ।जानि' हरिदास ताँरे कैला आलिङ्गन ॥
१४॥
उन्होंने हरिदास ठाकुर के चरणकमलों की वन्दना की। वे उन्हें जानते थे, अतः उन्होंने उनका आलिंगन किया।"
महाप्रभु देखिते ताँर उत्कण्ठित मन ।हरिदास कहे,–'प्रभु आसिबेन एखन' ॥
१५॥
। सनातन गोस्वामी श्री चैतन्य महाप्रभु के चरणकमलों का दर्शन करने के लिए अत्यन्त उत्सुक थे। इसलिए हरिदास ठाकुर ने कहा, “महाप्रभु शीघ्र ही यहाँ आने वाले हैं।"
हेन-काले प्रभु ‘उपल-भोग' देखिया ।।हरिदासे मिलिते आइला भक्त-गण लञा ॥
१६ ॥
उसी समय श्री चैतन्य महाप्रभु जगन्नाथ मन्दिर में उपल भोग (प्रातःकालीन जलपान ) देखकर अपने अन्य भक्तों के साथ हरिदास ठाकुर से मिलने के लिए आये।।"
प्रभु देखि' मुँहे पड़े दण्डवत् हा ।।प्रभु आलिङ्गिला हरिदासेरे उठा ॥
१७॥
श्री चैतन्य महाप्रभु को देखकर हरिदास ठाकुर और सनातन गोस्वामी दोनों ने तुरन्त दण्डवत् प्रणाम किया। तब महाप्रभु ने हरिदास को उठाया और गले लगाया।"
हरिदास कहे,–'सनातन करे नमस्कार' । सनातने देखि' प्रभु हैला चमत्कार ॥
१८ ॥
हरिदास ठाकुर ने श्री चैतन्य महाप्रभु से कहा, यह सनातन गोस्वामी आपको प्रणाम कर रहा है। सनातन गोस्वामी को देखकर महाप्रभु अत्यधिक चकित हुए।"
सनातने आलिङ्गिते प्रभु आगु हैला । पाछे भागे सनातन कहिते लागिला ॥
१९॥
जब श्री चैतन्य महाप्रभु उनका आलिंगन करने आगे बढ़े, तो सनातन गोस्वामी पीछे हट गये और इस प्रकार बोले।"
मोरे ना छुडिह, प्रभु, पड़ों तोमार पाय ।।एके नीच-जाति अधम, आर कण्डु-रसा गाय ॥
२०॥
हे प्रभु, कृपया आप मेरा स्पर्श न करें। मैं आपके चरणकमलों पर पड़ता हूँ। मैं नीच जाति में उत्पन्न होने के कारण मनुष्यों में सबसे अधम हैं। इसके अतिरिक्त मेरे शरीर में खुजली का रोग है।"
बलात्कारे प्रभु ताँरै आलिङ्गन कैल ।।कण्डु-क्लेद महाप्रभुर श्री-अङ्गे लागिल ॥
२१॥
किन्तु श्री चैतन्य महाप्रभु ने बलपूर्वक सनातन गोस्वामी का आलिंगन कर लिया। इस तरह खुजली के घावों से रिसता तरल पदार्थ श्री चैतन्य महाप्रभु के दिव्य शरीर में लग गया।"
सब भक्त-गणे प्रभु मिलाइला सनातने । सनातन कैला सबार चरण वन्दने ॥
२२॥
महाप्रभु ने सनातन गोस्वामी से सबका परिचय कराया और सनातन । गोस्वामी ने उन सबके चरणकमलों पर सादर नमस्कार अर्पित किया।"
प्रभु ला वसिला पिण्डार उपरे भक्त-गण ।।पिण्डार तले वसिला हरिदास सनातन ॥
२३॥
। महाप्रभु तथा उनके सारे भक्त चबूतरे के ऊपर बैठ गये और हरिदास ठाकुर तथा सनातन गोस्वामी उसके नीचे बैठे।"
कुशल-वार्ता महाप्रभु पुछेन सनातने ।।तेह कहेन,–'परम मङ्गल देखिनु चरणे' ॥
२४॥
श्री चैतन्य महाप्रभु ने सनातन गोस्वामी से उनकी कुशलता का समाचार पूछा। सनातन ने उत्तर दिया, सब कुशल है, क्योंकि मुझे आपके चरणकमलों के दर्शन हो गये।"
मथुरार वैष्णव-सबेर कुशल पुछिला । सबार कुशल सनातन जानाइला ॥
२५॥
जब महाप्रभु ने मथुरा के समस्त वैष्णवों के विषय में पूछा, तो सनातन गोस्वामी ने उनके स्वास्थ्य एवं सौभाग्य के बारे में बतलाया।"
प्रभु कहे,–इहाँ रूप छिल दश-मासे । इहाँ हैते गौड़े गेला, हैल दिन दश ॥
२६॥
। श्री चैतन्य महाप्रभु ने सनातन गोस्वामी को बतलाया, श्रील रूप गोस्वामी यहाँ पर दस महीने तक थे। वे दस दिन पहले ही बंगाल चले गये हैं।"
तोमार भाइ अनुपमेर हैल गङ्गा-प्राप्ति ।।भाल छिल, रघुनाथे दृढ़ तार भक्ति ॥
२७॥
। तुम्हारा भाई अनुपम अब नहीं रहा। वह एक उत्तम भक्त था, जिसका रघुनाथ ( भगवान् रामचन्द्र) में दृढ़ विश्वास था।"
सनातन कहे,नीच-वंशे मोर जन्म ।।अधर्म अन्याय ग्रत,–आमार कुल-धर्म ॥
२८॥
सनातन गोस्वामी ने कहा, मैं निम्न कुल में उत्पन्न हुआ, क्योंकि मे परिवार सभी प्रकार के अधार्मिक कार्य करता है, जिनसे शास्त्र के आदेश का उल्लंघन होता है।"
हेन वंश घृणा छाड़ि' कैला अङ्गीकार ।तोमार कृपाय वंशे मङ्गल आमार ॥
२९॥
हे प्रभु, आपने मेरे परिवार से घृणा किये बिना मुझे अपने सेवक रूप में स्वीकार किया है। केवल आपकी कृपा से ही मेरे परिवार में मंग ही मंगल है।
सेइ अनुपम-भाइ शिशु-काल हैते ।। रघुनाथ-उपासना करे दृढ़-चित्ते ॥
३०॥
मेरा छोटा भाई अनुपम अपने बचपन से ही रघुनाथ ( भगवान् रामचन्द्र) का महान् भक्त था और वह अत्यन्त दृढ़ता से उनकी पूजा करता था" रात्रि-दिने रघुनाथेर'नाम' आर 'ध्यान' । रामायण निरवधि शुने, करे गान ॥
३१॥
‘वह सदैव रघुनाथ के पवित्र नाम का कीर्तन करता था और उन्हीं व्रत करता था। वह निरन्तर रामायण से भगवान् की लीलाओं के ५ में सुनता था और उन्हीं का कीर्तन करता था।"
आमि आर रूप-तार ज्येष्ठ-सहोदर ।। आमा-दहा-सङ्गे तेह रहे निरन्तर ॥
३२॥
रूप तथा मैं उसके बड़े भाई हैं। वह लगातार हमारे साथ रहा।"
आमा-सबा-सङ्गे कृष्ण-कथा, भागवत शुने ।ताहार परीक्षा कैलँ आमि-दुइ-जने ॥
३३॥
वह हमारे साथ श्रीमद्भागवत तथा कृष्ण विषयक वार्ताएँ सुनता था और हम दोनों उसकी परीक्षा लिया करते थे।"
शुनह वल्लभ, कृष्ण परम-मधुर ।।सौन्दर्य, माधुर्य, प्रेम-विलास–प्रचुर ॥
३४॥
हम कहते, ‘हे वल्लभ, हमसे सुनो। भगवान् कृष्ण परम आकर्षक हैं। उनका सौन्दर्य, मधुरता तथा प्रेम की लीलाएँ अनन्त हैं।"
कृष्ण-भजन कर तुमि आमा-मुँहार सङ्गे।।तिन भाइ एकत्र रहिमु कृष्ण-कथा-रङ्गे’ ॥
३५॥
तुम हम दोनों के साथ कृष्ण की भक्ति में लगो। हम तीनों भाई एकसाथ रहेंगे और भगवान् कृष्ण की लीलाओं की चर्चा का आनन्द लेंगे।"
एइ-मत बार-बार कहि दुइ-जन । ।आमा-मुँहार गौरवे किछु फिरि' गेल मन ॥
३६॥
इस तरह हम दोनों ने उससे बारम्बार कहा और हमारे फुसलाने तथा हमारे प्रति आदरभाव से उसका मन कुछ-कुछ हमारे उपदेशों की ओर मुड़ा।"
तोमा-मुँहार आज्ञा आमि केमने लङ्खिमु?।।दीक्षा-मन्त्र देह' कृष्ण-भजन करिमु’ ॥
३७॥
वल्लभ ने उत्तर दिया, 'हे प्रिय भ्राताओं, मैं आपके आदेशों का उल्लंघन कैसे कर सकता हूँ? मुझे कृष्ण-मन्त्र की दीक्षा दीजिये, जिससे मैं कृष्ण-भक्ति कर सकें।"
एत कहि' रात्रि-काले करेन चिन्तन ।।केमने छाड़िमु रघुनाथेर चरण ॥
३८॥
यह कहकर रात में वह सोचने लगा, 'मैं किस तरह भगवान् रघुनाथ के चरणकमलों को छोड़ पाऊँगा?'"
सब रात्रि क्रन्दन करि' कैल जागरण ।।प्रातः-काले आमा-मुँहाय कैल निवेदन ॥
३९॥
वह रात-भर जागता रहा और रोता रहा। प्रातःकाल वह हमारे पास आया और इस प्रकार निवेदन करने लगा।"
‘रघुनाथेर पाद-पद्ये वेचियाछों माथा ।। काड़िते ना पारों माथा, पाङ बड़ व्यथा ॥
४०॥
“ मैंने अपना सिर भगवान् रामचन्द्र के चरणकमलों पर बेच दिया है। मैं इसे वापस नहीं ले सकता। यह मेरे लिए अत्यधिक पीड़ादायक होगा।"
कृपा करि' मोरे आज्ञा देह' दुइ-जन ।।जन्मे-जन्मे सेवों रघुनाथेर चरण ॥
४१॥
“आप दोनों मुझ पर कृपालु हों तथा इस तरह आज्ञा दें कि मैं जन्मजन्मान्तर भगवान् रघुनाथ के चरणकमलों की सेवा कर सकें।"
रघुनाथेर पाद-पद्म छाड़ान ना ग्राय ।।छाड़िबार मन हैले प्राण फाटि' ग्राय' ॥
४२॥
। ‘मेरे लिए भगवान् रघुनाथ के चरणकमलों को छोड़ पाना असम्भव है। जब मैं उनको छोड़ने के लिए सोचता भी हैं, तो मेरा हृदय विदीर्ण हो जाता है।"
तबे आमि-हे तारे आलिङ्गन कैलें। ‘साधु, दृढ़-भक्ति तोमार—कहि' प्रशंसिलॆ ॥
४३॥
। यह सुनकर हम दोनों ने उसका आलिंगन किया और उसे यह कहकर प्रोत्साहित किया, 'तुम महान् सन्त भक्त हो, क्योंकि भक्ति में तुम्हारा संकल्प दृढ़ है।' इस तरह हम दोनों ने उसकी प्रशंसा की।"
ग्रे वंशेर उपरे तोमार हय कृपा-लेश ।। सकल मङ्गल ताहे खण्डे सब क्लेश' ॥
४४॥
हे प्रभु, आप जिस वंश पर लेश मात्र भी कृपा करते हैं, वह सदैव भाग्यशाली होता है, क्योंकि ऐसी कृपा से सारे कष्ट लुप्त हो जाते हैं।‘" गोसाञि कहेन,–एइ-मत मुरारि-गुप्त ।पूर्वे आमि परीक्षिलँ तार एइ रीत ॥
४५ ॥
श्री चैतन्य महाप्रभु ने कहा, ऐसी ही घटना मुरारि गुप्त के सम्बन्ध में भी है। पहले मैंने उसकी परीक्षा ली और उसका संकल्प ऐसा ही था।"
सेड़ भक्त धन्य, ये ना छाडे प्रभर चरण ।। सेइ प्रभु धन्य, ये ना छाड़े निज-जन ॥
४६॥
। वह भक्त धन्य है, जो अपने स्वामी की शरण नहीं छोड़ता और वह स्वामी धन्य है, जो अपने सेवक को नहीं छोड़ता।।"
दुर्दैवे सेवक यदि ग्राय अन्य स्थाने । सेइ ठाकुर धन्य तारे चुले धरि' आने ॥
४७।। । यदि संयोगवश सेवक सेवा से नीचे गिर जाता है और अन्यत्र चला जाता है, तो वह स्वामी धन्य है, जो उसको बालों से पकड़कर वापस नाता है।"
भाल हैल, तोमार इहाँ हैल आगमने ।एइ घरे रह इहाँ हरिदास-सने ॥
४८॥
यह अच्छा हुआ कि तुम यहाँ आ गये। अब इस कमरे में हरिदास ठाकुर के साथ रहो।।
कृष्ण-भक्ति-रसे मुँह परम प्रधान ।।कृष्ण-रस आस्वादन कर, लह कृष्ण-नाम ॥
४९॥
तुम दोनों ही कृष्ण-भक्ति के रसों को समझने में दक्ष हो। इसलिए तुम दोनों को ऐसे कार्यों का तथा हरे कृष्ण महामन्त्र का आस्वादन करते रहना चाहिए।"
एत बलि' महाप्रभु उठिया चलिला ।।गोविन्द-द्वाराय देंहे प्रसाद पाठाइला ॥
५०॥
यह कहकर श्री चैतन्य महाप्रभु उठे और चल दिये तथा गोविन्द के द्वारा उन्होंने उनके खाने के लिए प्रसाद भेजा।"
एइ मत सनातन रहे प्रभु-स्थाने ।। जगन्नाथेर चक्र देखि' करेन प्रणामे ॥
५१॥
इस तरह सनातन गोस्वामी श्री चैतन्य महाप्रभु की देखरेख में रहे। वे जगन्नाथ मन्दिर के शिखर के चक्र को देखते तथा नमस्कार करते।"
प्रभु आसि' प्रति-दिन मिलेन दुइ-जने ।। इष्ट-गोष्ठी, कृष्ण-कथा कहे कत-क्षणे ॥
५२॥
श्री चैतन्य महाप्रभु प्रतिदिन इन दोनों महान् भक्तों से भेंट करने जाते और कुछ काल तक उनके साथ कृष्ण-कथाओं पर बातें करते।"
दिव्य प्रसाद पाय नित्य जगन्नाथ-मन्दिरे । ताहा आनि' नित्य अवश्य देन दोंहाकारे ॥
५३॥
भगवान् जगन्नाथ के मन्दिर में प्रसाद की भेंट सर्वोच्च कोटि की होती थी। श्री चैतन्य महाप्रभु यह प्रसाद लाते और दोनों भक्तों को देते।"
एक-दिन आसि' प्रभु मुँहारे मिलिला । सनातने आचम्बिते कहिते लागिला ॥
५४॥
एक दिन जब महाप्रभु उनसे मिलने आये, तो वे सहसा सनातन गोस्वामी से कहने लगे।"
सनातन, देह-त्यागे कृष्ण यदि पाइये ।। कोटि-देह क्षणेके तबे छाड़िते पारिये ॥
५५॥
उन्होंने कहा, हे सनातन, यदि मैं आत्महत्या करके कृष्ण को पा सकें, तो करोड़ों शरीर त्यागने में मुझे तनिक भी द्विधा नहीं होगी।"
देह-त्यागे कृष्ण ना पाई, पाइये भजने ।। कृष्ण-प्राप्त्येर उपाय कोन नाहि 'भक्ति' विने ॥
५६ ।।। तुम जान लो कि मात्र शरीर त्यागने से कोई कृष्ण को प्राप्त नहीं कर सकता। कृष्ण तो भक्ति से प्राप्य हैं। उन्हें प्राप्त करने का कोई अन्य उपाय नहीं है।"
देह त्यागादि ग्रत, सब-तमो-धर्म ।। तामो-जो-धर्मे कृष्णोर ना 1/इये मर्म ।। ५७।।। आत्महत्या जैसे कर्म तमोगुण से प्रेरित होते हैं एवं तमो तथा रजोगुण मनुष्य यह नहीं समझ सकता कि कृष्ण कौन हैं।"
‘भक्ति' विना कृष्णे कभु नहे ‘प्रेमोदय' ।। प्रेम विना कृष्ण-प्राप्ति अन्य हैते नय ॥
५८॥
। जब तक कोई भक्ति सम्पन्न नहीं करता, तब तक वह अपने सुप्त कृष्ण-प्रेम को जागृत नहीं कर सकता और उस सुप्त प्रेम को जागृत किये बिना कृष्ण को प्राप्त करने का अन्य कोई साधन नहीं है।"
ने साधयति मां योगो न साङ्ख्यं धर्म उद्धव ।। न स्वाध्यायस्तपस्त्यागो यथा भक्तिर्ममोर्जिता ॥
५९॥
[ पूर्ण पुरुषोत्तम भगवान् कृष्ण ने कहा :‘हे उद्धव, न तो अष्टांग योग द्वारा, न निर्विशेष एकेश्वरवाद द्वारा, न सांख्य योग द्वारा, न वेदों के अध्ययन द्वारा, न तपस्या, दान या संन्यास द्वारा कोई मुझे उतना तुष्ट कर सकता है जितना कि मेरी शुद्ध भक्ति विकसित करके कर सकता है।'" देह-त्यागादि तमो-धर्म-पातक-कारण ।साधक ना पाय ताते कृष्णेर चरण ॥
६०॥
आत्महत्या जैसे उपाय पाप के कारण हैं। ऐसे कर्मों से भक्त कभी भी कृष्ण के चरणकमलों में शरण प्राप्त नहीं कर सकता।"
प्रेमी भक्त वियोगे चाहे देह छाड़िते ।। प्रेमे कृष्ण मिले, सेह ना पारे मरिते ॥
६१॥
“कृष्ण से वियोग की भावनाओं के कारण कभी-कभी उन्नत भक्त पना जीवन त्याग देना चाहता है। किन्तु ऐसे प्रेम से कृष्ण का दर्शन होता । और उस समय वह शरीर त्याग नहीं पाता।"
गाढ़ानुरागेर वियोग ना ग्राय सहन ।। ताते अनुरागी वाञ्छे आपन मरण ॥
६२॥
जो व्यक्ति कृष्ण से प्रगाढ़ प्रेम करता है, वह उनके वियोग को सहन नहीं कर सकता। इसलिए ऐसा भक्त सदैव अपनी मृत्यु चाहता है।"
यस्याङ्ग्रि-पङ्कज-रजः-स्नपनं महान्तो ।वाञ्छन्त्युमा-पतिरिवात्म-तमोऽपहत्यै ।। यह॑म्बुजाक्ष न लभेय भवत्प्रसादं ।जह्यामसुन्व्रत-कृशाञ्छत-जन्मभिः स्यात् ।। ६३ ।।। । “हे कमलनयन, शिवजी जैसे महापुरुष अज्ञान को भगाने के लिए आपके चरणकमलों की धूल में स्नान करने की इच्छा करते हैं। यदि मुझे आपकी कृपा प्राप्त नहीं होती, तो मैं अपनी आयु को कम करने के व्रत का पालन करूंगी और यदि इस तरह आपकी कृपा मिल सकेगी, तो में सैकड़ों जन्मों तक शरीर त्यागती रहूंगी।'" सिञ्चाङ्ग नस्त्वदधरामृत-पूरकेण ।हासावलोक-कल-गीत-ज-हृच्छयाग्निम् ।। नो चेद्वयं विरह-जाग्न्युपयुक्त-देहाध्यानेन याम पदयोः पदवीं सखे ते ।। ६४॥
है प्रिय कृष्ण, आपने अपनी हँसीयुक्त चितवन तथा मधुर बातों से मारे हदयों में कामवासना की अग्नि उत्पन्न कर दी है। अब आपको अपने होठों की अमृतधारा से हमें चूमकर इस अग्नि को बुझाना चाहिए। ॥
कृपा करके ऐसा करें। अन्यथा हे मित्र, आपके विरह के कारण हमारे भधी के भीतर की अग्नि हमारे शरीरों को क्षार कर देगी। इस तरह ध्यान । हम आपके चरणकमलों की शरण पा सकेंगी।"
कुबुद्धि छाड़िया कर श्रवण-कीर्तन । अचिरात् पाबे तबे कृष्णेर चरण । ६५ ।। श्री चैतन्य महाप्रभु ने सनातन गोस्वामी को कहा, तुम अपनी समस्त व्यर्थ की इच्छाएँ छोड़ दो, क्योंकि वे कृष्ण के चरणकमलों की शरण पाने के लिए अनुपयुक्त हैं। तुम अपने आपको श्रवण तथा कीर्तन में लगाओ। तब तुम तुरन्त ही बिना संशय के कृष्ण की शरण पा सकोगे।"
नीच-जाति नहे कृष्णा-भजने अयोग्य ।। सत्कुल-विप्र नहे भजनेर स्रोग्य ॥
६६॥
निम्न कुल में उत्पन्न व्यक्ति भगवान् कृष्ण की भक्ति करने के लिए अयोग्य नहीं होता, न ही कोई व्यक्ति भक्ति के लिए इसलिए योग्य होता है कि वह कुलीन ब्राह्मण परिवार में उत्पन्न हुआ है।"
ग्रेइ भजे सेइ बड़, अभक्त–हीन, छार । कृष्ण-भजने नाहि जाति-कुलादि-विचार ॥
६७॥
जो भी भक्ति करता है, वही महान् है, जबकि अभक्त सदैव गर्हित एवं निन्दनीय है। इसलिए भगवद्भक्ति करने में किसी के जाति, कुल इत्यादि का विचार नहीं होता।"
दीनेरे अधिक दया करे भगवान् ।कुलीन, पण्डित, धनीर बड़ अभिमान ॥
६८ ॥
। पूर्ण पुरुषोत्तम भगवान् श्रीकृष्ण सदैव दीनों तथा दुखियारों के प्रति कृपालु रहते हैं, किन्तु कुलीन, विद्वान तथा धनी सदैव अपने पदों का १० करते हैं।"
विप्राद् द्वि-षड्-गुण-युतादरविन्द-नाभपादारविन्द-विमुखात् श्रुपचं वरिष्ठम् ।। मन्ये तदर्पित-मनो-वचनेहितार्थप्राणं पुनाति स कुलं न तु भूरि-मानः ॥
६९॥
* भले ही कोई ब्राह्मण कुल में उत्पन्न हो और बारहों ब्राह्मण-गुणों से युक्त हो, किन्तु इतना योग्य होते हुए भी यदि वह कमलनाभ भगवान् कृष्ण के चरणकमलों में समर्पित नहीं होता, तो वह उस चण्डाल के समान भी नहीं है, जिसने अपना मन, वचन, कर्म, धन तथा प्राण भगवान् की सेवा में अर्पित कर दिया है। मात्र ब्राह्मण कुल में जन्म लेना या ब्राह्मण गुणों से युक्त होना पर्याप्त नहीं है। मनुष्य को भगवद्भक्त होना आवश्यक है। इस तरह यदि कोई श्वपच या चण्डाल भक्त है, तो वह न केवल अपना, अपितु अपने सारे परिवार का भी उद्धार करता है, जबकि एक ब्राह्मण, जो भक्त नहीं है, किन्तु केवल ब्राह्मण-योग्यताओं से युक्त है, अपने आपको भी शुद्ध नहीं कर सकता, अपने परिवार की तो बात ही जाने दें।"
भजनेर मध्ये श्रेष्ठ नव-विधा भक्ति ।। ‘कृष्ण-प्रेम', 'कृष्ण' दिते धरे महा-शक्ति ॥
७० ॥
भक्ति सम्पन्न करने की विधियों में नौ संस्तुत विधियाँ सर्वश्रेष्ठ हैं, क्योंकि इन विधियों में कृष्ण तथा उनके प्रति प्रेम प्रदान करने की महान् शक्ति निहित है।"
तार मध्ये सर्वश्रेष्ठ नाम-सङ्कीर्तन ।। निरपराधे नार्म लैले पाय प्रेम-धन ॥
७१॥
। भक्ति की नौं विधियों में से सर्वाधिक महत्त्वपूर्ण है भगवान् के पवित्र नाम का सदैव कीर्तन करना। यदि कोई दस प्रकार के अपराधों से बचते हुए ऐसा करता है, तो वह आसानी से भगवान् के अमूल्य प्रेम को प्राप्त कर लेता है।"
एत शुनि' सनातनेर हैल चमत्कार ।।प्रभुरे ना भाय मोर मरण-विचार ॥
७२॥
यह सुनकर सनातन गोस्वामी को अत्यधिक आश्चर्य हुआ। वे समझ गये, ‘आत्महत्या करने का मेरा निर्णय श्री चैतन्य महाप्रभु को अच्छा नहीं नगा।‘ सर्वज्ञ महाप्रभु निषेधिला मोरे ।प्रभुर चरण धरि' कहेन ताँहारे । ७३ ॥
मनातन गोस्वामी ने निष्कर्ष निकाला, ‘भूत, वर्तमान तथा भविष्य को जानने वाले श्री चैतन्य महाप्रभु ने मुझे आत्महत्या करने से मना किया है।‘ तब वे महाप्रभु के चरणों पर गिर पड़े और उनसे इस तरह बोले।"
सर्वज्ञ, कृपालु तुमि ईश्वर स्वतन्त्र ।। ग्रैछे नाचाओ, तैछे नाचि,—ग्रेन काष्ठ-यन्त्र ॥
७४।। हे प्रभु, आप सर्वज्ञ, कृपालु तथा स्वतन्त्र परमेश्वर हैं। मैं तो । कठपुतली की ही तरह, जैसा आप चाहते हैं, नाचता हूँ।"
नीच, अधम, पामर मुञि पामर-स्वभाव । मोरे जियाइले तोमार किबी हबे लाभ?’ ॥
७५ ॥
। मैं नीच कुल में जन्मा हूँ। निस्सन्देह, मैं सबसे नीच हूँ। मैं घृणित हूँ, क्योंकि मुझमें पापी व्यक्ति के सारे दुर्गुण हैं। यदि आप मुझे जीवित रखते हैं, तो क्या लाभ होगा?’" प्रभु कहे,तोमार देह मोर निज-धन । तुमि मोरे करियाछ आत्म-समर्पण ॥
७६ ॥
श्री चैतन्य महाप्रभु ने कहा, तुम्हारा शरीर मेरी सम्पत्ति है। तुम इसे पहले ही मुझको समर्पण कर चुके हो। इसलिए अब अपने शरीर पर तुम्हारा कोई अधिकार नहीं है।"
परेर द्रव्य तुमि केने चाह विनाशिते ?।।धर्माधर्म विचार किबा ना पार करिते? ॥
७७॥
तुम दूसरे की सम्पत्ति को क्यों नष्ट करना चाहते हो? क्या तुम यह विचार नहीं कर सकते कि क्या उचित है और क्या अनुचित?" तोमार शरीर—मोर प्रधान 'साधन' ।ए शरीरे साधिमु आमि बहु प्रयोजन ॥
७८॥
तुम्हारा शरीर अनेक आवश्यक कार्य सम्पन्न कराने के लिए मेरा प्रमुख साधन है। तुम्हारे शरीर के द्वारा मैं अनेक कार्यों को पूरा करूंगा।"
भक्त-भक्ति-कृष्णप्रेम-तत्त्वेर निधार ।। वैष्णवेर कृत्य, आर वैष्णव-आचार ॥
७९॥
। तुम्हें भक्त, भक्ति, ईश्वर-प्रेम, वैष्णवों के कर्तव्य तथा वैष्णव के गुणों का निर्धारण करना होगा।"
कृष्ण-भक्ति, कृष्णप्रेम-सेवा-प्रवर्तन । लुप्त-तीर्थ-उद्धार, आर वैराग्य-शिक्षण ॥
८०॥
तुम्हें कृष्ण-भक्ति बतलानी होगी, कृष्ण-प्रेम अनुशीलन के के स्थापित करने होंगे, लुप्त तीर्थस्थलों का उद्धार करना होगा तथा लोग को शिक्षा देनी होगी कि संन्यास किस तरह ग्रहण किया जाए।
निज-प्रिय-स्थान मोर—मथुरा-वृन्दावन । ताहाँ एत धर्म चाहि करिते प्रचारण ॥
८१॥
मथुरा-वृन्दावन मेरा अति प्रिय अपना धाम है। मैं कृष्णभावनामृत का प्रचार करने के लिए वहाँ अनेक कार्य करना चाहता हूँ।"
मातार आज्ञाय आमि वसि नीलाचले । ताहाँ 'धर्म' शिखाइते नाहि निज-बले ॥
८२॥
। “मैं अपनी माता के आदेश से जगन्नाथ पुरी में रह रहा हूँ, अतएव मैं लोगों को धार्मिक सिद्धान्तों के अनुसार रहना सिखाने के लिए मथुरावृन्दावन नहीं जा सकता।"
एत सब कर्म आमि ग्रे-देहे करिमु । ताहा छाड़िते चाह तुमि, केमने सहिमु? ॥
८३॥
मुझे यह सारा कार्य तुम्हारे शरीर के माध्यम से कराना है, किन्तु तुम ।। इसे त्यागना चाहते हो। यह मैं कैसे सह सकता हूँ?’" तबे सनातन कहे,_तोमाके नमस्कारे । तोमार गम्भीर हृदय के बुझिते पारे? ॥
८४॥
उस समय सनातन गोस्वामी ने श्री चैतन्य महाप्रभु से कहा, मैंआपको सादर नमस्कार करता हूँ। आप अपने हृदय के भीतर जो गहन विचार करते हैं, उन्हें कोई नहीं समझ सकता।"
काष्ठेर पुतली ग्रेन कुहके नाचाय ।। आपने ना जाने, पुतली किबा नाचे गाय! ॥
८५॥
कठपुतली जादूगर के निर्देशानुसार नाचती-गाती है, किन्तु यह नहीं जानती कि वह किस तरह नाच-गा रही है।"
यारे ग्रैछे नाचाओ, से तैछे करे नर्तने । कैछे नाचे, केबा नाचाय, सेह नाहि जाने ॥
८६॥
हे प्रभु, आप जिस तरह नचाते हैं, मनुष्य उसी के अनुसार नाचता है, किन्तु वह कैसे नाचता है और उसे कौन नचाता है, वह यह नहीं जानता।‘" हरिदासे कहे प्रभु,_शुन, हरिदास ।।परेर द्रव्य इँहो चाहेन करिते विनाश ॥
८७॥
तब श्री चैतन्य महाप्रभु ने हरिदास ठाकुर से कहा, हे प्रिय हरिदास, जरा मेरी बात सुनो। यह भद्र पुरुष पराई सम्पति को नष्ट करना चाहता है।"
परेर स्थाप्य द्रव्य केह ना खाय, विलाय ।।निषेधिह इँहारे,—ग्रेन ना करे अन्याय ॥
८८ ॥
जिसे पराया धन सौंपा जाता है, वह न तो उसे वितरित करता है, न ही अपने उपयोग में लाता है। इसलिए उससे कहो कि ऐसा अवैध कार्य न करे।"
हरिदास कहे,’मिथ्या अभिमान करि ।तोमार गम्भीर हृदय बुझिते ना पारि ॥
८९॥
हरिदास ठाकुर ने उत्तर दिया, “हम अपनी क्षमताओं पर झूठे ही गर्व करते हैं। वस्तुतः हम आपके गहन विचारों को समझ नहीं सकते।"
कोन् को कार्य तुमि कर कोन् द्वारे । तुमि ना जानाइले केह जानते ना पारे ॥
९०॥
जब तक आप हमें बताते नहीं, तब तक हम न तो आपके अभिप्राय को समझ पाते हैं, न ही यह कि किसके माध्यम से आप क्या कराना चाहते हैं।"
एतादृश तुमि इँहारे करियाछ अङ्गीकार । एत सौभाग्य इहाँ ना हय काहार ॥
११॥
हे महोदय, चूँकि आप जैसे महापुरुष ने सनातन गोस्वामी को गीकार कर लिया है, अतएव वह अत्यधिक भाग्यशाली है। उसके समान भाग्यशाली कोई दूसरा नहीं हो सकता।"
तब महाप्रभु करि' मुँहारे आलिङ्गन ।। ‘मध्याह्न' करिते उठि' करिला गमन ।। ९२ ॥
इस तरह श्री चैतन्य महाप्रभु ने हरिदास ठाकुर तथा सनातन गोस्वामी दोनों का आलिंगन किया और तब उठ खड़े हुए एवं दोपहर का कृत्य करने के लिए चले गये।"
सनातने कहे हरिदास करि' आलिङ्गन ।तोमार भाग्येर सीमा ना ग्राय कथन ॥
९३ ॥
हरिदास ठाकुर ने सनातन का आलिंगन करते हुए कहा, “हे प्रिय सनातन, कोई भी व्यक्ति तुम्हारे सौभाग्य की सीमा नहीं पा सकता।"
तोमार देह कहेन प्रभु ‘मोर निज-धन' ।।तोमा-सम भाग्यवान् नाहि कोन जन ॥
९४॥
। “श्री चैतन्य महाप्रभु ने तुम्हारे शरीर को अपना व्यक्तिगत धन मान लिया है। अतएव तुम्हारे सौभाग्य की कोई तुलना नहीं कर सकता।"
निज-देहे ग्ने कार्य ना पारेन करिते ।। से कार्य कराइबे तोमा, सेह मथुराते ॥
९५॥
। जो कुछ श्री चैतन्य महाप्रभु अपने निजी शरीर से नहीं कर सकते, उसे वे तुम्हारे माध्यम से कराना चाहते हैं और वे इसे मथुरा में कराना चाहते हैं ।"
ये कराइते चाहे ईश्वर, सेइ सिद्ध हय ।। तोमार सौभाग्य एइ कहिलँ निश्चय ॥
९६॥
“पूर्ण पुरुषोत्तम भगवान् हमसे जो भी कराना चाहते हैं, वह सफलतापूर्वक सम्पन्न हो जायेगा। यह तुम्हारा महान् सौभाग्य है। यह मेरा परिपक्व मत है।"
भक्ति-सिद्धान्त, शास्त्र-आचार-निर्णय ।। तोमा-द्वारे कराइबेन, बुझिहुँ आशय ॥
९७॥
मैं श्री चैतन्य महाप्रभु की बातों से समझ सकता हूँ कि वे चाहते हैं। कि तुम भक्ति के सिद्धान्त तथा शास्त्रनिर्णित विधि-विधान पर ग्रन्थ लिखो।"
आमार एइ देह प्रभुर कार्ये ना लागिल । भारत-भूमिते जन्मि' एइ देह व्यर्थ हैल ॥
९८॥
मेरा शरीर श्री चैतन्य महाप्रभु की सेवा में काम न आ सका। इसलिए भारत-भूमि में जन्म लेकर भी यह शरीर व्यर्थ रहा।"
सनातन कहे,–तोमा-सम केबा आछे आन । महाप्रभुर गणे तुमि–महा-भाग्यवान्! ॥
९९ ॥
सनातन गोस्वामी ने उत्तर दिया, हे हरिदास ठाकुर, आपके समान कौन है? आप श्री चैतन्य महाप्रभु के संगियों में से एक हैं। अतएव आप गर्वाधिक भाग्यवान हो।"
अवतार-कार्य प्रभुर–नाम-प्रचारे ।सेइ निज-कार्य प्रभु करेन तोमार द्वारे ॥
१०० ॥
। श्री चैतन्य महाप्रभु जिस उद्देश्य के लिए अवतार के रूप में आये हैं, वह भगवान् के पवित्र नाम के कीर्तन की महत्ता का विस्तार करना है। अब वे इसे स्वयं करने के बदले आपके माध्यम से इसका विस्तार कर रहे हैं।"
प्रत्यह कर तिन-लक्ष नाम-सङ्कीर्तन ।सबार आगे कर नामेर महिमा कथन ॥
१०१॥
हे महोदय, आप तो नित्य ही तीन लाख बार नाम का कीर्तन करते हो और हर एक को ऐसे कीर्तन की महत्ता के विषय में बतलाते हो।"
आपने आचरे केह, ना करे प्रचार ।। प्रचार करेन केह, ना करेन आचार ।। १०२।। कुछ लोग बहुत अच्छा आचरण करते हैं, किन्तु कृष्णभावनामृत मम्प्रदाय का प्रचार नहीं करते, जबकि अन्य लोग प्रचार करते हैं, किन्तु उचित रीति से आचरण नहीं करते।"
‘आचार’, ‘प्रचार', नामेर करह ‘दुइ' कार्य । तुमि सर्व-गुरु, तुमि जगतेर आर्य ॥
१०३।। आप अपने निजी आचरण तथा अपने प्रचार द्वारा पवित्र नाम से सम्बन्धित दोनों कार्यों को एक ही साथ करते हो। इसलिए आप सारे जगत् के गुरु हो, क्योंकि आप जगत् में सबसे उन्नत भक्त हो।"
एइ-मत दुइ-जन नाना-कथा-रङ्गे।।कृष्ण-कथा आस्वादय रहि' एक-सङ्गे ॥
१०४॥
इस तरह वे दोनों कृष्ण विषयक कथाओं की चर्चा करते हुए अपना समय बिताते थे। अतः दोनों ने एकसाथ जीवन का आनन्द लिया।"
यात्रा-काले आइला सब गौड़ेर भक्त-गण ।।पूर्ववत् कैला सबे रथ-यात्रा दरशन ॥
१०५॥
रथयात्रा के समय बंगाल के सारे भक्त रथ-उत्सव के दर्शन हेतु आये, जैसाकि वे पहले आये थे।"
रथ-अग्ने प्रभु तैछे करिला नर्तन ।।देखि चमत्कार हैल सनातनेर मन ।। १०६॥
रथयात्रा उत्सव के समय श्री चैतन्य महाप्रभु पुनः जगन्नाथजी के रथ के आगे-आगे नाचे। जब सनातन गोस्वामी ने यह देखा, तो उनका मन । चकित हो गया।"
वर्षार चारि-मास रहिला सब निज भक्त-गणे ।सबा-सङ्गे प्रभु मिलाइला सनातने ॥
१०७॥
बंगाल से आये महाप्रभु के भक्त वर्षा ऋतु के चार महीने जगन्नाथ ५री में रहे और श्री चैतन्य महाप्रभु ने उन सबसे सनातन गोस्वामी का परिचय कराया।"
अद्वैत, नित्यानन्द, श्रीवास, वक्रेश्वर ।। वासुदेव, मुरारि, राघव, दामोदर ॥
१०८॥
पुरी, भारती, स्वरूप, पण्डित-गदाधर । सार्वभौम, रामानन्द, जगदानन्द, शङ्कर ॥
१०९॥
काशीश्वर, गोविन्दादि ग्रत भक्त-गण ।। सबा-सने सनातनेर कराइला मिलन ॥
११०।। श्री चैतन्य महाप्रभु ने अद्वैत आचार्य, नित्यानन्द प्रभु, श्रीवास ठाकुर, वक्रेश्वर पण्डित, वासुदेव दत्त, मुरारि गुप्त, राघव पण्डित, दामोदर पण्डित, परमानन्द पुरी, ब्रह्मानन्द भारती, स्वरूप दामोदर, गदाधर पण्डित, सार्वभौम भट्टाचार्य, रामानन्द राय, जगदानन्द पण्डित, शंकर पण्डित, काशीश्वर तथा गोविन्द तथा अन्य चुने हुए भक्तों से सनातन गोस्वामी का परिचय कराया।"
यथा-योग्य कराइल सबार चरण वन्दन ।।ताँरे कराइला सबार कृपार भाजन ॥
१११॥
। महाप्रभु ने सनातन गोस्वामी से समस्त भक्तों को उपयुक्त ढंग से नमस्कार करने को कहा। इस तरह उन्होंने उन सबसे सनातन गोस्वामी का परिचय उनकी कृपा का पात्र बनाने के उद्देश्य से कराया।"
सद्गुणे, पाण्डित्ये, सबार प्रिय–सनातन ।।यथा-स्रोग्य कृपा-मैत्री-गौरव-भाजन ॥
११२॥
सनातन गोस्वामी अपने पाण्डित्य तथा उत्तम गुणों के कारण हर एक को प्रिय थे। इसलिए उन लोगों ने उन्हें योग्यता के अनुसार कृपा, मित्रता तथा सम्मान प्रदान किया।"
सकल वैष्णव ग्रबे गौड़-देशे गेला ।।सनातन महाप्रभुर चरणे रहिला ॥
११३॥
जब रथयात्रा उत्सव के बाद अन्य सारे भक्त बंगाल लौट गये, तो सनातन गोस्वामी श्री चैतन्य महाप्रभु के चरणकमलों के संरक्षण में रहते रहे।
दोल-यात्रा-आदि प्रभुर सङ्क्ते देखिल ।।दिने-दिने प्रभु-सङ्गे आनन्द बाड़िल ॥
११४॥
सनातन गोस्वामी ने श्री चैतन्य महाप्रभु के साथ दोल यात्रा उत्सव देखा। इस तरह महाप्रभु की संगति में उनका आनन्द बढ़ता गया।"
पूर्वे वैशाख-मासे सनातन ग्रबे आइला ।ज्यैष्ठ-मासे प्रभु तारे परीक्षा करिला ॥
११५ ॥
सनातन गोस्वामी श्री चैतन्य महाप्रभु को मिलने जगन्नाथ पुरी में अप्रैल-मई के महीने में आये थे और श्री चैतन्य महाप्रभु ने मई-जून के महीने में उनकी परीक्षा ली थी।"
ज्यैष्ठ-मासे प्रभु ग्रमेश्वर-टोटा आइला ।।भक्त-अनुरोधे ताहाँ भिक्षा ग्रे करिला ॥
११६॥
। मई-जून माह में श्री चैतन्य महाप्रभु यमेश्वर (शिवजी ) के उद्यान में आये और वहाँ पर भक्तों के अनुरोध पर प्रसाद ग्रहण किया।"
मध्याह्न-भिक्षा-काले सनातने बोलाइल ।। प्रभु बोलाइला, ताँर आनन्द बाड़िल ॥
११७॥
दोपहर में जब भोजन का समय हुआ, तो महाप्रभु ने सनातन गोस्वामी को बुलाया, जिनका सुख इस बुलावे के कारण बढ़ गया।"
मध्याह्ने समुद्र-बालु हाछे अग्नि-सम ।। सेइ-पथे सनातन करिला गमन ॥
११८॥
दोपहर के समय समुद्र-तट की बालू आग के समान झुलस रही थी, किन्तु सनातन गोस्वामी उसी रास्ते से आये।"
‘प्रभु बोलाछे',—एइ आनन्दित मने । तप्त-बालुकाते पा पोड़े, ताहा नाहि जाने ॥
११९॥
महाप्रभु द्वारा बुलाए जाने के हर्ष से अभिभूत सनातन गोस्वामी को यह अनुभव नहीं हुआ कि उनके पाँव गरम बालू से जले जा रहे हैं।"
दुइ पाये फोस्का हैल, तबु गेला प्रभु-स्थाने ।। भिक्षा करि' महाप्रभु करियाछेन विश्रामे ॥
१२०॥
यद्यपि गर्मी के कारण उनके दोनों पाँवों के तलुवों में फफोले पड़ गये थे, तो भी वे श्री चैतन्य महाप्रभु के पास गये। वहाँ उन्होंने महाप्रभु को भोजन के बाद विश्राम करते पाया।"
भिक्षा-अवशेष-पात्र गोविन्द तारे दिला ।। प्रसाद पाञा सनातन प्रभु-पाशे आइला ॥
१२१॥
। गोविन्द ने सनातन गोस्वामी को महाप्रभु के भोजन का अवशेषपात्र प्रदान किया। प्रसाद पाने के बाद सनातन गोस्वामी श्री चैतन्य महाप्रभु के पास गये।"
प्रभु कहे,–'कोन्पथे आइला, सनातन?' ।।तेह कहे,–'समुद्र-पथे, करिलँ आगमन' ॥
१२२॥
जब महाप्रभु ने पूछा, तुम किस मार्ग से होकर आये हो ?’ तो सनातन गोस्वामी ने उत्तर दिया, ‘मैं समुद्र-तट के मार्ग से आया हूँ।"
प्रभु कहे,–तप्त-बालुकाते केमने आइला? ।सिंह-द्वारेर पथ-शीतल, केने ना आइला? ॥
१२३॥
श्री चैतन्य महाप्रभु ने कहा, “तुम समुद्र किनारे से होकर कैसे आये, जहों की बालू इतनी गरम है? तुम सिंह-द्वार के सामने के मार्ग से क्यों नहीं आये? वह अत्यन्त शीतल है।"
तप्त-बालुकाय तोमार पाय हैल व्रण । चलिते ना पार, केमने करिला सहन? ॥
१२४॥
गरम बालू ने तुम्हारे तलवों में फफोले उत्पन्न कर दिये होंगे। अब तुम चल नहीं सकते। तुमने इसे कैसे सहन किया?" सनातन कहे,—दुख बहुत ना पाइलें । पाये व्रण हाछे ताहा ना जानिहुँ ॥
१२५॥
सनातन गोस्वामी ने उत्तर दिया, मुझे न तो अधिक पीड़ा का अनुभव हुआ, न ही मैं यह जान पाया कि तपिश के कारण फफोले पड़े हैं।"
सिंह-द्वारे ग्राइते मोर नाहि अधिकार ।। विशेषे----ठाकुरेर ताहाँ सेवकेर प्रचार ॥
१२६॥
सिंह-द्वार के निकट से जाने का मुझे अधिकार नहीं है, क्योंकि वहाँ जगन्नाथजी के सेवक सदा आते-जाते रहते हैं।"
सेवक गतागति करे, नाहि अवसर ।तार स्पर्श हैले, सर्व-नाश हबे मोर ॥
१२७॥
वहाँ सेवक निरन्तर आते-जाते रहते हैं। यदि मैं उन्हें छू लेता, तो मेरा सर्वनाश हो जाता।"
शुनि' महाप्रभु मने सन्तोष पाइला ।तुष्ट हा ताँरै किछु कहिते लागिला ॥
१२८॥
इन सब बातों को सुनकर श्री चैतन्य महाप्रभु अत्यन्त प्रसन्न हुए और इस तरह बोले।"
यद्यपिओ तुमि हओ जगत्पावन ।। तोमो-स्पर्शे पवित्र हय देव-मुनि-गण ॥
१२९॥
तथापि भक्त-स्वभाव-मर्यादा-रक्षण । मर्यादा-पालन हय साधुर भूषण ॥
१३०॥
। हे प्रिय सनातन, यद्यपि तुम सारे ब्रह्माण्ड के उद्धारक हो, और देवता तथा बड़े-बड़े सन्त तक तुम्हारे स्पर्श से शुद्ध बन जाते हैं, किन्तु वैष्णव-शिष्टाचार का पालन और रक्षण करना भक्त का गुण है। वैष्णवशिष्टाचार को बनाये रखना भक्त का आभूषण है।"
मर्यादा-लङ्घने लोक करे उपहास ।।इह-लोक, पर-लोक–दुइ हय नाश ॥
१३१॥
यदि कोई व्यक्ति शिष्टाचार के नियमों का उल्लंघन करता है, तो लोग उसकी हँसी उड़ाते हैं और इस तरह वह इह लोक तथा परलोक दोनों में विनष्ट हो जाता है।"
मर्यादा राखिले, तुष्ट कैले मोर मन ।। तुमि ऐछे ना करिले करे को जन? ॥
१३२॥
तुमने शिष्टाचार का पालन करके मेरे मन को तुष्ट किया है। तुम्हारे अतिरिक्त इस उदाहरण को कौन दिखलाएगा?" एत बलि' प्रभु ताँरे आलिङ्गन कैल।।ताँर कण्डु-रसा प्रभुर श्री-अङ्गे लागिल ॥
१३३॥
यह कहकर श्री चैतन्य महाप्रभु ने सनातन गोस्वामी का आलिंगन किया। सनातन के शरीर के खुजली के घावों से रिसने वाली पस महाप्रभु के शरीर में लग गई।"
बार बार निषेधेन, तबु करे आलिङ्गन ।अङ्गे रसा लागे, दुःख पाय सनातन ॥
१३४॥
यद्यपि सनातन गोस्वामी ने श्री चैतन्य महाप्रभु को आलिंगन करने से बार-बार मना किया, किन्तु महाप्रभु ने फिर भी वही किया। अतः उनके शरीर पर सनातन के शरीर से निकली पस का लेप हो गया। इससे सनातन गोस्वामी अत्यधिक दुःखी हुए।"
एइ-मते सेवक-प्रभु हे घर गेला ।।आर दिन जगदानन्द सनातनेरे मिलिला ॥
१३५॥
इस तरह सेवक तथा स्वामी अपने-अपने घर चले गये। अगले दिन जगदानन्द पण्डित सनातन गोस्वामी से मिलने गये।"
दुइ-जन वसि' कृष्ण-कथा-गोष्ठी कैला ।।पण्डितेरे सनातन दुःख निवेदिला ॥
१३६॥
जब जगदानन्द पण्डित तथा सनातन गोस्वामी एकसाथ बैठ गये और कृष्ण विषयक कथाएँ चलाने लगे, तो सनातन गोस्वामी ने जगदानन्द पण्डित से अपना दुःख कह सुनाया।"
इहाँ आइलाँ प्रभुरे देखि दुःख खण्डाइते ।। येबा मने, ताहा प्रभु ना दिला करिते ॥
१३७॥
यहाँ मैं श्री चैतन्य महाप्रभु के दर्शन करके अपना दुःख कम करने आया था, किन्तु महाप्रभु ने मुझे वह नहीं करने दिया जो मेरे मन में था।"
निषेधिते प्रभु आलिङ्गन करेन मोरे ।।मोर कण्डु-रसा लागे प्रभुर शरीरे ॥
१३८॥
“यद्यपि मैं उन्हें ऐसा करने से मना करता हूँ, तो भी श्री चैतन्य महाप्रभु मेरा आलिंगन करते हैं, जिससे उनके शरीर पर मेरी खुजली के घावों से निकली पस का लेप हो जाता है।"
अपराध हय मोर, नाहिक निस्तार ।। जगन्नाथेह ना देखिये,—ए दुःख अपार ॥
१३९॥
इस तरह मैं उनके चरणकमलों पर अपराध कर रहा हूँ, जिसके कारण निश्चय ही मेरा उद्धार नहीं होगा। साथ ही, मैं भगवान जगन्नाथ के दर्शन भी नहीं कर सकता। यही मेरा महान् दुःख है।"
हित-निमित्त आइलाङ आमि, हैल विपरीते ।। कि करिले हित हय नारि निर्धारिते ॥
१४०॥
मैं तो यहाँ अपने लाभ के लिए आया था, किन्तु मैं अब देखता हूँ। कि मुझे ठीक उसका विपरीत मिल रहा है। मैं नहीं जानता, न ही मैं निश्चित कर सकता हूँ कि मुझे किस तरह लाभ होगा।"
पण्डित कहे,तोमार वास-योग्य वृन्दावन' ।। रथ-यात्रा देखि ताहाँ करह गमन ॥
१४१॥
जगदानन्द पण्डित ने कहा, तुम्हारे रहने के लिए सर्वाधिक उपयुक्त स्थान वृन्दावन है। तुम रथयात्रा उत्सव का दर्शन करने के बाद वहाँ लौट सकते हो।"
प्रभुर आज्ञा हाछे तोमा' दुइ भाये । । वृन्दावने वैस, ताहाँ सर्व-सुख पाइये ॥
१४२॥
महाप्रभु ने पहले ही तुम दोनों भाइयों को आदेश दे दिया है कि वृन्दावन में जाकर रहो। वहाँ तुम्हें सारा सुख मिलेगा।"
ग्रे-कार्ये आइला, प्रभुर देखिला चरण । रथे जगन्नाथ देखि' करह गमन’ ॥
१४३॥
यहाँ आने का तुम्हारा उद्देश्य पूरा हो चुका है, क्योंकि तुम महाप्रभु। के चरणकमलों का दर्शन कर चुके हो। इसलिए रथयात्रा में रथ पर जगन्नाथजी के दर्शन करने के बाद तुम जा सकते हो।"
सनातन कहे,_भाल कैला उपदेश ।।ताहाँ ग्राब, सेइ मोर 'प्रभु-दत्त देश ॥
१४४।। सनातन गोस्वामी ने उत्तर दिया, आपने मुझे बहुत अच्छा परामर्श दिया है। मैं वहाँ अवश्य जाऊँगा, क्योंकि उसी स्थान को महाप्रभु ने मेरे रहने के लिए दिया है।"
एत बलि' बँहे निज-कार्ये उठि' गेला ।। आर दिन महाप्रभु मिलिबारे आइला ॥
१४५॥
। इस तरह बातें करके सनातन गोस्वामी तथा जगदानन्द पण्डित अपने अपने कार्यों पर लौट गये। अगले दिन श्री चैतन्य महाप्रभु हरिदास तथा सनातन गोस्वामी से मिलने गये।"
हरिदास कैला प्रभुर चरण वन्दन । हरिदासे कैला प्रभु प्रेम-आलिङ्गन ॥
१४६॥
हरिदास ठाकुर ने श्री चैतन्य महाप्रभु के चरणकमलों पर नमस्कार किया और महाप्रभु ने प्रेमावेश में उनका आलिंगन किया।"
दूर हैते दण्ड-परणाम करे सनातन । प्रभु बोलाय बार बार करिते आलिङ्गन ॥
१४७॥
। सनातन गोस्वामी ने दूर ही से नमस्कार तथा दण्डवत् किया, किन्तु श्री चैतन्य महाप्रभु ने उनको आलिंगन करने के लिए बारम्बार पास बुलाया।"
अपराध-भये तेह मिलिते ना आइल । महाप्रभु मिलिबारे सेइ ठाजि गेल ॥
१४८॥
अपराध करने के भय से सनातन गोस्वामी श्री चैतन्य महाप्रभु से मिलने आगे नहीं आये। किन्तु महाप्रभु उनसे मिलने आगे बढ़े।"
सनातन भागि' पाछे करेन गमन ।। बलात्कारे धरि, प्रभु कैला आलिङ्गन ॥
१४९॥
सनातन गोस्वामी पीछे हट गये, किन्तु श्री चैतन्य महाप्रभु ने उन्हें बलपूर्वक पकड़ लिया और उनका आलिंगन कर लिया।"
दुइ जन ला प्रभु वसिला पिण्डाते ।निर्विण्ण सनातन लागिला कहिते ॥
१५०॥
। महाप्रभु दोनों को अपने साथ लेकर एक पवित्र स्थान पर बैठ गये। तब वैराग्य में उन्नत सनातन गोस्वामी बोलने लगे।"
हित लागि' आइनु मुञि, हैल विपरीत ।।सेवा-योग्य नहि, अपराध करों निति निति ॥
१५१॥
उन्होंने कहा, ‘मैं तो यहाँ अपने लाभ के लिए आया था, किन्तु मैं देखता हूँ कि उसका उल्टा हो रहा है। मैं सेवा के लिए अयोग्य हूँ। मैं दिनप्रतिदिन अपराध ही करता हूँ।"
सहजे नीच-जाति मुञि, दुष्ट, ‘पापाशय' ।।मोरे तुमि छुडिले मोर अपराध हय ॥
१५२॥
। मैं स्वभाव से निम्नजन्मा हूँ। मैं पापकर्मों का प्रदूषित जलाशय हूँ। यदि आप मुझे छूते हैं, तो वह मेरे लिए और भी बड़ा अपराध होगा।"
ताहाते आमार अङ्गे कण्डु-रसा-रक्त चले ।।तोमार अङ्गे लागे, तबु स्पर्शह तुमि बले ॥
१५३॥
“तिस पर मेरे शरीर के खाज के घावों से जो खून बह रहा है, आपके शरीर को लगता है, फिर भी आप मुझे बलपूर्वक छूते हैं।"
बीभत्स स्पर्शिते ना कर घृणा-लेशे ।।एइ अपराधे मोर हबे सर्व-नाशे ॥
१५४॥
हे महोदय, मेरा शरीर भयावह स्थिति में है, फिर भी उसका स्पर्श करने में आपको तनिक भी घृणा नहीं होती। इस अपराध के कारण मेरे लिए प्रत्येक मंगल समाप्त हो जायेगा।"
ताते इहाँ रहिले मोर ना हय 'कल्याण' ।।आज्ञा देह'—रथ देखि' याङ वृन्दावन ॥
१५५॥
इसलिए मैं देखता हूँ कि यहाँ रुककर मैं कोई भी मंगल नहीं कर पाऊँगा। कृपया मुझे रथयात्रा उत्सव के बाद वृन्दावन लौट जाने की अनुमति का आदेश दें।"
जगदानन्द-पण्डिते आमि मुक्ति पुछिल ।।वृन्दावन ग्राइते तेंह उपदेश दिल ॥
१५६॥
। मैंने जगदानन्द पण्डित से उनका मत जानने के लिए परामर्श किया है और उन्होंने भी वृन्दावन लौट जाने का परामर्श दिया है।
एत शुनि' महाप्रभु सरोष-अन्तरे । जगदानन्दे क्रुद्ध हा करे तिरस्कारे ॥
१५७॥
यह सुनकर क्रुद्ध होकर श्री चैतन्य महाप्रभु जगदानन्द पण्डित की भर्त्सना करने लगे।"
कालिकार बटुया जगा ऐछे गर्वी हैल ।। तोमा-सबारेह उपदेश करिते लागिल ॥
१५८॥
जगा (जगदानन्द पण्डित ) अभी केवल छोकरा है, किन्तु वह इतना गर्वीला हो गया है कि अपने आपको तुम जैसे व्यक्ति को उपदेश देने के लिए सक्षम मानता है।"
व्यवहारे-परमार्थे तुमि-तार गुरु-तुल्य । तोमारे उपदेशे, ना जाने आपन-मूल्य ॥
१५९॥
आध्यात्मिक उन्नति के मामले में तथा सामान्य व्यवहार में भी तुम उसके गुरु तुल्य हो। फिर भी वह अपने मूल्य को न जानते हुए तुम्हें परामर्श देने का दुस्साहस करता है।"
आमार उपदेष्टा तुमि प्रामाणिक आर्छ ।तोमारेह उपदेशे—बालका करे ऐछे कार्य ॥
१६०॥
हे प्रिय सनातन, तुम तो मेरे सलाहकार जैसे हो, क्योंकि तुम प्रामाणिक व्यक्ति हो। किन्तु जगा तुमको उपदेश देना चाहता है। यह तो एक शरारती बालक की धृष्टता ही है।"
शुनि' सनातन पाये धरि' प्रभुरे कहिल ।।‘जगदानन्देर सौभाग्य आजि से जानिल ॥
१६१॥
जब श्री चैतन्य महाप्रभु इस तरह जगदानन्द पण्डित को डाँट रहे थे, तो सनातन गोस्वामी महाप्रभु के चरणों पर गिर पड़े और बोले, मैं अब जगदानन्द के सौभाग्य को समझ पाया।"
आपनार' असौभाग्य' आजि हैल ज्ञान ।। जगते नाहि जगदानन्द-सम भाग्यवान् ॥
१६२॥
मैं अपने दुर्भाग्य को भी समझ गया। इस जगत् में जगदानन्द के समान भाग्यशाली कोई नहीं है।"
जगदानन्दे पियाओ आत्मीयता-सुधा-रस ।। मोरे पियाओ गौरव-स्तुति-निम्ब-निशिन्दा-रस ॥
१६३ ॥
। आप तो जगदानन्द को स्नेहमय सम्बन्धों का अमृत पिला रहे हैं। और मेरी गौरव स्तुति करके आप मुझे नीम तथा निशिन्दा का कटु रस पिला रहे हैं।"
आजिह नहिल मोरे आत्मीयता-ज्ञान! ।। मोर अभाग्य, तुमि–स्वतन्त्र भगवान्! ॥
१६४॥
यह मेरा दुर्भाग्य है कि आपने मुझे अपने आत्मीय जन के रूप में स्वीकार नहीं किया। किन्तु आप पूर्णतया स्वतन्त्र पूर्ण पुरुषोत्तम भगवान् हैं।"
शुनि' महाप्रभु किछु लज्जित हैला मने । ताँरै सन्तोषिते किछु बलेन वचने ॥
१६५॥
यह सुनकर श्री चैतन्य महाप्रभु कुछ लज्जित हुए। सनातन गोस्वामी को तुष्ट करने के उद्देश्य से उन्होंने निम्नलिखित शब्द कहे।"
‘जगदानन्द प्रिय आमार नहे तोमा हैते ।। मर्यादा-लङ्घन आमि ना पारों सहिते ॥
१६६॥
हे प्रिय सनातन, तुम यह मत सोचना कि जगदानन्द मुझे तुमसे अधिक प्रिय है। किन्तु मैं आदर्श शिष्टाचार का अतिक्रमण सहन नहीं कर सकता।"
काहाँ तुमि–प्रामाणिक, शास्त्रे प्रवीण!।।काहाँ जगा—कालिकार बटुया नवीन! ॥
१६७॥
तुम शास्त्रों के अनुभवी विद्वान हो, जबकि जगा केवल एक युवा बालक है।"
आमाकेह बुझाइते तुमि धर शक्ति ।कत ठाजि बुझााछ व्यवहार-भक्ति ॥
१६८॥
। तुममें मुझ तक को प्रभावित करने की शक्ति है। तुम पहले ही कई स्थानों पर मुझे अपने सामान्य व्यवहार तथा भक्ति के विषय में समझा चुके" तोमारे उपदेश करे, ना याय सहन ।अतएव तारे आमि करिये भर्सन ॥
१६९॥
जगा का तुम्हें उपदेश देना मुझे असह्य है। इसीलिए मैं उसकी भर्त्सना कर रहा हूँ।"
बहिरङ्ग-ज्ञाने तोमारे ना करि स्तवन ।।तोमार गुणे स्तुति कराय ग्रैछे तोमार गुण ॥
१७० ॥
मैं तुम्हारी प्रशंसा इसलिए नहीं करता, क्योंकि मैं तुम्हें अपने घनिष्ठ मम्बन्धों से बाहर मानता हूँ, अपितु इसलिए कि तुम वास्तव में इतने योग्य हो कि लोगों को तुम्हारे गुणों की प्रशंसा करने के लिए बाध्य होना पड़ता" यद्यपि काहार 'ममता' बहु-जने हय ।। प्रीति-स्वभावे काहाते कोन भावोदय ॥
१७१॥
‘यद्यपि एक व्यक्ति का कई व्यक्तियों से स्नेह होता है, किन्तु उनके जी सम्बन्धों के स्वभाव के अनुसार विभिन्न प्रकार के प्रेमों का उदय होता है।"
तोमार देह तुमि कर बीभत्स-ज्ञान ।। तोमार देह आमारे लागे अमृत-समान ॥
१७२॥
तुम अपने शरीर को बीभत्स मानते हो, किन्तु मैं सोचता हूँ कि तुम्हारा शरीर अमृत के समान है।"
अप्राकृत-देह तोमार 'प्राकृत' कभु नये । ।तथापि तोमार ताते प्राकृत-बुद्धि हय ॥
१७३॥
“वस्तुतः तुम्हारा शरीर दिव्य है, भौतिक नहीं है। किन्तु तुम इसे भौतिक बुद्धि से सोच रहे हो।"
‘प्राकृत' हैले ह तोमार वपु नारि उपेक्षिते ।। भद्राभद्र-वस्तु-ज्ञान नाहिक 'प्राकृते' ॥
१७४॥
“यदि तुम्हारा शरीर भौतिक होता, तो भी मैं उसकी उपेक्षा न कर पाता, क्योंकि भौतिक शरीर को न तो अच्छा मानना चाहिए न बुरा।।"
किं भद्रं किमभद्रं वा द्वैतस्यावस्तुनः कियत् ।। वाचोदितं तदनृतं मनसा ध्यातमेव च ॥
१७५॥
“कृष्ण से सम्बन्ध न रखने वाली जिस भी वस्तु की अनुभूति की जाती हो, उसे माया समझना चाहिए। शब्दों द्वारा उच्चरित या मन में अनुभव किये गये एक भी भ्रम यथार्थ नहीं होते। चूँकि भ्रम यथार्थ नहीं होता, इसलिए जिसे हम बुरा सोचते हैं और जिसे अच्छा सोचते है, उनमें कोई अन्तर नहीं होता। जब हम परम सत्य की बात करते हैं, तो ऐसी कल्पनाएँ लागू नहीं होतीं।'" द्वैते' भद्राभद्र-ज्ञान, सब–'मनोधर्म' । । ‘एइ भाल, एइ मन्द',—एइ सब 'भ्रम' ॥
१७६॥
“भौतिक जगत् में अच्छे-बुरे की कल्पनाएँ मन की उपज होती हैं। इसलिए यह कहना कि 'यह अच्छा है' और 'यह बुरा है' कोरी भूल है।"
ज्ञा विद्या-विनय-सम्पन्ने ब्राह्मणे गवि हस्तिनि ।शुनि चैव श्व-पाके च पण्डिताः सम-दर्शिनः ॥
१७७॥
विनम्र साधु पुरुष वास्तविक ज्ञान के बल पर विद्वान तथा विनीत ब्राह्मण, गाय, हाथी, कुत्ते तथा चण्डाल को समदृष्टि से देखते हैं।'" न-विज्ञान-तृप्तात्मा कूट-स्थो विजितेन्द्रियः ।।युक्त इत्युच्यते योगी सम-लोष्ट्राश्म-काञ्चनः ॥
१७८॥
जो व्यक्ति जीवन में अर्जित ज्ञान तथा उसके उपयोग से पूर्णतया सन्तुष्ट रहता है और अपने आध्यात्मिक पद पर स्थिर होता है, जो व्यक्ति अपनी इन्द्रियों को पूरी तरह वश में रखता है और जो व्यक्ति कंकर, पत्थर तथा सोने को एक-सा देखता है, वह पूर्ण योगी कहलाता है।'" आमि त'–सन्यासी, आमार ‘सम-दृष्टि' धर्म ।चन्दन-पङ्केते आमार ज्ञान हय 'सम' ॥
१७९॥
चूंकि मैं संन्यासी हैं, इसलिए मेरा धर्म भेद-भाव करना नहीं, अपितु समदृष्टि रखने का है। मेरा ज्ञान चन्दन तथा कीचड़ में समदृष्टि रखता है।"
एइ लागि' तोमा त्याग करिते ना ग्रुयाय ।।घृणा-बुद्धि करि यदि, निज-धर्म स्नाय’ ॥
१८०॥
इस कारण मैं तुम्हारा त्याग नहीं कर सकता। यदि मैं तुमसे घृणा करूंगा, तो मैं अपने वृत्तिपरक धर्म से विचलित हो जाऊँगा।"
हरिदास कहे, प्रभु, ग्रे कहिला तुमि ।।एइ ‘बाह्य प्रतारणा' नाहि मानि आमि ॥
१८१॥
हरिदास ने कहा, हे प्रभु, आपने जो कुछ कहा है, वह बाह्य औपचारिकता है। मैं इसे स्वीकार नहीं करता।"
आमा-सब अधमे ग्रे करियाछ अङ्गीकार ।। दीन-दयालु-गुण तोमार ताहाते प्रचार ॥
१८२॥
। हे प्रभु, हम सब पतित हैं, किन्तु आपने पतितों पर दयालु होने के अपने गुण के कारण हमें स्वीकार किया है। यह जगत-विख्यात है।"
प्रभु हासि' कहे,–शुन, हरिदास, सनातन ।।तत्त्वतः कहि तोमा-विषये भैछे मोर मन ॥
१८३॥
श्री चैतन्य महाप्रभु हँसे और बोले, हे हरिदास, हे सनातन, सुनो। अब मैं तुमसे सच कह रहा हूँ कि मेरा मन तुम लोगों से किस तरह अनुरक्त है।"
तोमारे ‘लाल्य', आपनाके लालक' अभिमान । लालकेर लाल्ये नहे दोष-परिज्ञान ॥
१८४॥
। हे हरिदास तथा सनातन, मैं तुम दोनों को अपने बच्चों जैसा मानता हूँ, जिनका पालन मेरे द्वारा होना है। पालक कभी भी पालितों के दोषों पर गम्भीरता से विचार नहीं करता।"
आपनारे हय मोर अमान्य-समान ।।तोमा-सबारे करों मुजि बालक-अभिमान ॥
१८५॥
। मैं अपने आपको आदर के अयोग्य समझता हूँ, किन्तु स्नेह के कारण मैं तुम लोगों को अपने बच्चों के समान मानता हूँ।"
मातार भैछे बालकेर 'अमेध्य' लागे गाय ।।घृणा नाहि जन्मे, आर महा-सुख पाय ॥
१८६॥
। जब बालक मल-मूत्र कर देता है, तो वह माता के शरीर में लग जाता है, किन्तु माता कभी भी बच्चे से घृणा नहीं करती। उल्टे उसे धोने में वह अपार आनन्द पाती है।"
लाल्यामेध्य' लालकेर चन्दन-सम भाय ।।सनातनेर क्लेदे आमार घृणा ना उपजाय ॥
१८७॥
माता को पाले जाने वाले बालक का मल-मूत्र चन्दन-लेप के समान प्रतीत होता है। इसी तरह जब सनातन गोस्वामी के घावों से रिसने वाला दुर्गंधयुक्त द्रव्य मेरे शरीर में छू जाता है, तो मुझे उससे घृणा नहीं होती।"
हरिदास कहे,–‘तुमि ईश्वर दया-मय ।तोमार गम्भीर हृदय बुझन ना ग्राय ॥
१८८॥
हरिदास ठाकुर ने कहा, “हे महोदय, आप पूर्ण पुरुषोत्तम भगवान् हैं और हमारे प्रति अत्यन्त कृपालु हैं। कोई नहीं जान सकता कि आपके अगाध स्नेहिल हृदय में क्या है।"
वासुदेव—गलत्कुष्ठी, ताते अङ्ग-कीड़ा-मय । तारे आलिङ्गन कैला हुआ सदय ॥
१८९॥
आपने वासुदेव कोढ़ी का आलिंगन किया, जिसका शरीर पूरी तरह कीड़ों से भरा था। आप इतने दयालु हैं कि उसकी ऐसी दशा होते हुए भी आपने उसका आलिंगन किया।"
आलिङ्गिया कैला तार कन्दर्प-सम अङ्ग ।बुझिते ना पारि तोमार कृपार तरङ्ग ॥
१९०॥
। आपने उसका आलिंगन करके उसके शरीर को कामदेव का-सा सुन्दर बना दिया। हम आपकी कृपा की तरंगों को समझ नहीं सकते।"
प्रभु कहे,–वैष्णव-देह ‘प्राकृत' कभु नय ।।‘अप्राकृत' देह भक्तेर 'चिदानन्द-मय' ॥
१९१॥
। श्री चैतन्य महाप्रभु ने कहा, एक भक्त का शरीर कभी भी भौतिक नहीं होता। वह दिव्य, आध्यात्मिक आनन्द से पूर्ण माना जाता है।"
दीक्षा-काले भक्त करे आत्म-समर्पण ।। सेइ-काले कृष्ण तारे करे आत्म-सम ॥
१९२॥
‘दीक्षा के समय जब भक्त अपने आपको भगवान् की सेवा में पूर्णतया समर्पित कर देता है, तब कृष्ण उसे अपने समान ही उत्तम स्वीकार कर लेते हैं।"
सेइ देह करे तार चिदानन्द-मये ।।अप्राकृत-देहे ताँर चरण भजय ॥
१९३॥
। जब भक्त का शरीर इस तरह आध्यात्मिक बन जाता है, तो भक्त उस दिव्य शरीर से भगवान् के चरणकमलों की सेवा करता है।"
मर्यो यदा त्यक्त-समस्त-कर्मानिवेदितात्मा विचिकीर्षितो मे । तदामृतत्वं प्रतिपद्यमानो।मयात्म-भूयाय च कल्पते वै ॥
१९४॥
जब जन्म-मृत्यु को प्राप्त होने वाला जीव मेरा आदेश पूरा करने के लिए अपना जीवन मुझे समर्पित करते हुए सारे भौतिक कार्यों को त्याग देता है और इस तरह मेरे आदेशों के अनुसार कर्म करता है, उस समय वह अमरता के पद तक पहुँच जाता है। तब वह मेरे साथ प्रेम-रस के आदान-प्रदान में आध्यात्मिक आनन्द लूटने के योग्य बन जाता है।'" सनातनेर देहे कृष्ण कण्डु उपजात्रा ।। आमा परीक्षिते इहाँ दिला पाठाजा ॥
१९५॥
। कृष्ण ने किसी प्रकार सनातन गोस्वामी के शरीर में खुजली के घाव प्रकट कर दिये हैं और मेरी परीक्षा लेने के लिए उसे यहाँ भेज दिया है।"
घृणा करि' आलिङ्गन ना करिताम ग्रबे ।।कृष्ण-ठाजि अपराध-दण्ड पाइताम तबे ॥
१९६॥
यदि मैंने सनातन गोस्वामी से घृणा की होती और उसका आलिंगन न किया होता, तो निश्चय ही कृष्ण के प्रति अपराध करने के लिए मैं दण्डित होता।"
पारिषद-देह एइ, ना हय दुर्गन्ध ।।प्रथम दिवसे पाइलँ चतु:सम-गन्ध ॥
१९७॥
सनातन गोस्वामी कृष्ण के संगियों में से एक है। उसके शरीर से कोई दुर्गन्ध नहीं आ सकती। पहले दिन जब मैंने उनका आलिंगन किया, तो मुझे चतुःसम ( चन्दन, कपूर, अगुरु तथा कस्तूरी के मिश्रण) की सुगन्धि आयी।"
वस्तुतः प्रभु ग्रबे कैला आलिङ्गन ।। ताँर स्पर्शे गन्ध हैल चन्दनेर सम ॥
१९८॥
वस्तुतः जब श्री चैतन्य महाप्रभु ने सनातन गोस्वामी का आलिंगन किया, तो महाप्रभु के स्पर्श मात्र से चन्दन-लेप के ही समान सुगन्ध प्रकट हुई।"
प्रभु कहे,–सनातन, ना मानिह दुःख ।। तोमार आलिङ्गने आमि पाइ बड़ सुख ॥
१९९॥
श्री चैतन्य महाप्रभु ने कहा, हे प्रिय सनातन, दुःखी मत हो, क्योंकि जब मैं तुम्हारा आलिंगन करता हूँ, तब वास्तव में मुझे महान् सुख मिलता" ए-वत्सर तुमि इहाँ रह आमा-सने ।वत्सर रहि' तोमारे आमि पाठाइ वृन्दावने ॥
२००॥
। “तुम मेरे साथ जगन्नाथ पुरी में एक वर्ष तक रहो। उसके बाद मैं तुम्हें वृन्दावन भेज दूंगा।"
एत बलि' पुनः तारे कैला आलिङ्गन ।।कण्डु गेल, अङ्ग हैल सुवर्णेर सम ॥
२०१॥
यह कहकर श्री चैतन्य महाप्रभु ने सनातन गोस्वामी का पुनः आलिंगन किया। इस तरह सनातन के छाले तुरन्त लुप्त हो गये और उनका सारा शरीर सोने के रंग जैसा हो गया।"
देखि' हरिदास मने हैला चमत्कार ।।प्रभुरे कहेन,---एइ भङ्गी ये तोमार ॥
२०२॥
। यह परिवर्तन देखकर अत्यधिक आश्चर्यचकित हुए हरिदास ठाकुर ने महाप्रभु से कहा, ‘यह आपकी लीला है।"
सेइ झारिखण्डेर पानी तुमि खाओयाइला ।।सेइ पानी-लक्ष्ये इँहार कण्डु उपजाइला ॥
२०३॥
। हे प्रभु, आपने सनातन गोस्वामी को झारिखण्ड जल पीने को बाध्य किया और वास्तव में उनके शरीर में खुजली के घाव आपने ही उत्पन्न किये।"
कण्डु करि' परीक्षा करिले सनातने ।।एइ लीला-भङ्गी तोमार केह नाहि जाने ॥
२०४॥
इन खुजली के घावों को इस तरह उत्पन्न करके आपने सनातन गोस्वामी की परीक्षा ली। आपकी दिव्य लीलाओं को कोई भी नहीं समझ सकता।"
है आलिङ्गिया प्रभु गेला निजालय ।।प्रभुर गुण कहे मुँहे हा प्रेम-मय ॥
२०५॥
हरिदास ठाकुर तथा सनातन गोस्वामी दोनों का आलिंगन करने के बाद श्री चैतन्य महाप्रभु अपने स्थान पर लौट गये। तब हरिदास ठाकुर तथा सनातन गोस्वामी ने भावविभोर होकर महाप्रभु के दिव्य गुणों का वर्णन करना शुरू किया।"
एइ-मत सनातन रहे प्रभु-स्थाने । कृष्ण-चैतन्य-गुण-कथा हरिदास-सने ॥
२०६॥
इस तरह सनातन गोस्वामी श्री चैतन्य महाप्रभु के संरक्षण में रहे और हरिदास ठाकुर के साथ श्री चैतन्य महाप्रभु के दिव्य गुणों की चर्चा करते रहे।
दोल-यात्रा देखि' प्रभु तौरै विदाय दिला ।वृन्दावने ये करिबेन, सब शिखाइला ॥
२०७॥
दोलयात्रा उत्सव देखने के बाद श्री चैतन्य महाप्रभु ने सनातन गोस्वामी को वृन्दावन में जो कुछ करना था, उसका पूरी तरह आदेश देकर उन्हें विदा किया।"
ग्रे-काले विदाय हैला प्रभुर चरणे ।।दुइ-जनार विच्छेद-दशा ना ग्राय वर्णने ॥
२०८॥
जब सनातन गोस्वामी तथा श्री चैतन्य महाप्रभु ने एक दूसरे से विदा ली, तो जो विरह दृश्य उपस्थित हुआ, उसका यहाँ पर वर्णन नहीं किया जा सकता।"
येइ वन-पथे प्रभु गेला वृन्दावन ।। सेइ-पथे ग्राइते मन कैला सनातन ॥
२०९॥
सनातन गोस्वामी ने उसी जंगल के मार्ग से होकर वृन्दावन जाने का निश्चय किया, जिससे होकर महाप्रभु गये थे।"
ग्रे-पथे, ग्रे-ग्राम-नदी-शैल, याहाँ प्रेइ लीला । बलभद्र-भट्ट-स्थाने सब लिखि' निला ॥
२१०॥
सनातन गोस्वामी ने बलभद्र भट्टाचार्य से पूछकर उन सारे गाँवों, नदियों तथा पर्वतों का नाम लिख लिया, जहाँ जहाँ श्री चैतन्य महाप्रभु ने अपनी लीलाएँ सम्पन्न की थीं।"
महाप्रभुर भक्त-गणे सबारे मिलिया । सेइ-पथे चलि' ग्राय से-स्थान देखिया ॥
२११॥
सनातन गोस्वामी श्री चैतन्य महाप्रभु के सारे भक्तों से मिले और तब उन्होंने उसी रास्ते से यात्रा करके उन स्थानों को देखा, जिनसे होकर श्री चैतन्य महाप्रभु गुजरे थे।"
ये-ये-लीला प्रभु पथे कैला ग्रे-ये-स्थाने । ताहा देखि' प्रेमावेश हय सनातने ।। २१२॥
जब भी सनातन गोस्वामी ऐसे किसी स्थान को देखते, जहाँ श्री चैतन्य महाप्रभु ने मार्ग में अपनी लीलाएँ की थीं, तब वे तुरन्त ही प्रेमावेश से पूरित हो जाते।"
ऐइ-मते सनातन वृन्दावने आइला ।।पाछे आसि' रूप-गोसाञि ताँहारे मिलिला ॥
२१३॥
। इस तरह सनातन गोस्वामी वृन्दावन पहुँचे। बाद में रूप गोस्वामी आये और उनसे मिले।"
एक-वत्सर रूप-गोसाजिर गौड़े विलम्ब हैल ।।कुटुम्बेर 'स्थिति'-अर्थ विभाग करि' दिल ॥
२१४॥
श्रील रूप गोस्वामी को बंगाल में एक वर्ष का विलम्ब हो गया, क्योंकि वे अपना धन अपने सम्बन्धियों को बाँट रहे थे और उन्हें उनकी समुचित स्थितियों में स्थापित कर रहे थे।"
गौड़े से अर्थ छिल, ताहा आनाइला ।। कुटुम्ब-ब्राह्मण-देवालये बाँटि' दिला ॥
२१५॥
। उन्होंने बंगाल में जो भी धन संग्रह किया था, उसे एकत्र किया और उसे अपने सम्बन्धियों, ब्राह्मणों तथा मन्दिरों में बाँट दिया।"
सब मनः-कथा गोसाजि करि' निर्वाहण ।। निश्चिन्त हञा शीघ्र आइला वृन्दावन ॥
२१६॥
इस तरह उनके मन में जितने कार्य थे, उन्हें सम्पन्न करके वे पूर्णतया तुष्ट होकर वृन्दावन लौट आये।"
दुइ भाइ मिलि' वृन्दावने वास कैला ।।प्रभुर ने आज्ञा, मुँहे सब निर्वाहिला ॥
२१७॥
दोनों भाई वृन्दावन में मिले, जहाँ वे श्री चैतन्य महाप्रभु की इच्छा को पूरी करने के लिए रहे।
नाना-शास्त्र आनि' लुप्त-तीर्थ उद्धारिला ।।वृन्दावने कृष्ण-सेवा प्रकाश करिला ॥
२१८॥
श्रील रूप गोस्वामी तथा सनातन गोस्वामी ने अनेक प्रामाणिक शास्त्र एकत्र किये और इन शास्त्रों के साक्ष्य के आधार पर समस्त लुप्त तीर्थस्थलों का पुनरुद्धार किया। इस तरह उन्होंने भगवान् कृष्ण की पूजा हेतु मन्दिरों की स्थापना की।"
सनातन ग्रन्थ कैला 'भागवतामृते' ।भक्त-भक्ति-कृष्ण-तत्त्व जानि ग्राहा हैते ॥
२१९॥
श्रील सनातन गोस्वामी ने बृहद्-भागवतामृत का संकलन किया। इस पुस्तक के द्वारा यह जाना जा सकता है कि कौन भक्त है, भक्ति की विधि क्या है और परम सत्य कृष्ण कौन हैं।"
सिद्धान्त-सार ग्रन्थ कैला 'दशम-टिप्पनी' ।।कृष्ण-लीला-रस-प्रेम ग्राहा हैते जानि ॥
२२०॥
श्रील सनातन गोस्वामी ने दशम स्कन्ध का भाष्य दशम टिप्पणी के भाम से लिखा, जिससे हम भगवान् कृष्ण की दिव्य लीलाओं तथा प्रेमावेश को समझ सकते हैं।"
‘हरि-भक्ति-विलास'-ग्रन्थ कैला वैष्णव-आचार । वैष्णवेर कर्तव्य ग्राहाँ पाइये पार ॥
२२१॥
उन्होंने हरिभक्ति विलासका भी संकलन किया, जिससे हम भक्त के आदर्श आचरण को तथा वैष्णव के कर्तव्य की पूरी सीमा को समझ सकते हैं।"
आर व्रत ग्रन्थ कैला, ताहा के करे गणन ।। ‘मदन-गोपाल-गोविन्देर सेवा'-प्रकाशन ॥
२२२॥
श्रील सनातन गोस्वामी ने अन्य कई ग्रन्थ भी संकलित किये हैं। उनकी गणना कौन कर सकता है? इन ग्रन्थों का मूलभूत सिद्धान्त हम सबको यह बतलाना है कि मदनमोहन तथा गोविन्दजी से किस तरह प्रेम किया जाए।"
रूप-गोसाजि कैलारसामृत-सिन्धु' सार ।।कृष्ण-भक्ति-रसेर ग्नाहाँ पाइये विस्तार ॥
२२३॥
। श्रील रूप गोस्वामी ने भी कई ग्रन्थ लिखे, जिनमें से सर्वाधिक विख्यात है भक्तिरसामृतसिन्धु। इस ग्रन्थ से कृष्ण-भक्ति के सार तथा ऐसी सेवा से प्राप्त होने वाले दिव्य रस को समझा जा सकता है।"
उज्वल-नीलमणि'-नाम ग्रन्थ कैल आर ।। राधा-कृष्ण-लीला-रस ताहाँ पाइये पार ॥
२२४॥
श्रील रूप गोस्वामी ने उज्वल नीलमणि नामक ग्रन्थ का भी संकलन किया, जिससे हम श्री श्रीराधाकृष्ण के प्रेम-व्यवहार की पराकाष्ठा को समझ सकते हैं।"
‘विदग्ध-माधव', 'ललित-माधव,—नाटक-मुगल । कृष्ण-लीला-रस ताहाँ पाइये सकल ॥
२२५॥
। श्रील रूप गोस्वामी ने दो महत्त्वपूर्ण नाटक भी लिखे, जिनके नाम विदग्ध माधव तथा ललित माधव हैं, जिनसे कृष्ण की लीलाओं से प्राप्य समस्त रसों को समझा जा सकता है।"
'दान-केलि-कौमुदी' आदि लक्ष-ग्रन्थ कैल । सेइ सब ग्रन्थे व्रजेर रस विचारिल ॥
२२६॥
श्रील रूप गोस्वामी ने 'दानकेलिकौमुदी' ग्रन्थ से प्रारम्भ करके एक लाख श्लोकों की रचना की। इन शास्त्रों में उन्होंने वृन्दावन-लीलाओं के दिव्य रसों की विस्तार से व्याख्या की है।"
ताँर लघु-भ्राता–श्री-वल्लभ-अनुपम ।।ताँर पुत्र महा-पण्डित–जीव-गोसाजि नाम ॥
२२७॥
। श्रील रूप गोस्वामी के छोटे भाई श्री वल्लभ या अनुपम के पुत्र बहुत बड़े विद्वान थे, जिनका नाम श्रील जीव गोस्वामी था।"
सर्व त्यजि' तेंहो पाछे आइला वृन्दावन ।। तेह भक्ति-शास्त्र बहु कैला प्रचारण ॥
२२८॥
श्रील जीव गोस्वामी अपना सर्वस्व त्यागकर वृन्दावन आये। बाद में उन्होंने भी भक्ति विषयक अनेक पुस्तकें लिखीं और प्रचार-कार्य को बढ़ाया।"
‘भागवत-सन्दर्भ-नाम कैल ग्रन्थ-सार। भागवत-सिद्धान्तेर ताहाँ पाइये पार ॥
२२९॥
श्रील जीव गोस्वामी ने विशेष रूप से भागवत सन्दर्भया षट् सन्दर्भ ग्रन्थ की रचना की, जो समस्त शास्त्रों का निचोड़ है। इस ग्रन्थ से भक्ति तथा भगवान् के विषय में निर्णायक ज्ञान प्राप्त किया जा सकता है।"
‘गोपाल-चम्पू' नाम ग्रन्थ सार कैल । व्रज-प्रेम-लीला-रस-सार देखाइल ॥
२३०॥
उन्होंने गोपाल चम्पू नामक ग्रन्थ भी लिखा, जो समस्त वैदिक साहित्य का सार है। इस ग्रन्थ में उन्होंने राधाकृष्ण के प्रेम के आदान-प्रदान तथा वृन्दावन-लीलाओं को प्रदर्शित किया है।बढ़ाया।"
'षट्सन्दर्भ' कृष्ण-प्रेम-तत्त्व प्रकाशिल ।।चारि-लक्ष ग्रन्थ तेंहो विस्तार करिल ॥
२३१॥
। षट् सन्दर्भ में श्रील जीव गोस्वामी ने कृष्ण-प्रेम विषयक सत्य को प्रकट किया है। इस तरह उनके सारे ग्रन्थों का विस्तार चार लाख श्लोकों में हुआ है।"
जीव-गोसाजि गौड़ हैते मथुरा चलिला ।।नित्यानन्द-प्रभु-ठाञि आज्ञा मागिला ॥
२३२॥
जब जीव गोस्वामी की इच्छा बंगाल से मथुरा जाने की हुई, तो उन्होंने श्रील नित्यानन्द प्रभु से अनुमति माँगी।"
प्रभु प्रीत्ये ताँर माथे धरिला चरण ।।रूप-सनातन-सम्बन्धे कैला आलिङ्गन ॥
२३३॥
जीव गोस्वामी का रूप गोस्वामी तथा सनातन गोस्वामी से, जो कि श्री चैतन्य महाप्रभु के अति कृपापात्र थे, सम्बन्ध होने के कारण श्री नित्यानन्द प्रभु ने श्रील जीव गोस्वामी के सिर पर अपने चरण रखे और उनका आलिंगन किया।"
आज्ञा दिला,_शीघ्र तुमि ग्राह वृन्दावने ।तोमार वंशे प्रभु दियाछेन सेइ-स्थाने ॥
२३४॥
। श्री नित्यानन्द प्रभु ने आज्ञा दी, हाँ, तुम शीघ्र वृन्दावन जाओ। वह स्थान श्री चैतन्य महाप्रभु ने तुम्हारे परिवार को, तुम्हारे पिता तथा चाचाओं को दिया है, इसलिए तुम वहाँ शीघ्र जाओ।"
ताँर आज्ञाय आइला, आज्ञा-फल पाइला । शास्त्र करि' कत-काल' भक्ति' प्रचारिला ॥
२३५॥
श्री नित्यानन्द प्रभु की आज्ञा से वे वृन्दावन गये और सचमुच ही उन्होंने उनकी आज्ञा का फल प्राप्त किया, क्योंकि उन्होंने दीर्घकाल तक अनेक पुस्तकों की रचना की और वृन्दावन से भक्ति सम्प्रदाय का प्रचार किया।"
एइ तिन-गुरु, आर रघुनाथ-दास ।। इँहा-सबार चरण वन्दों, याँर मुञि 'दास' ॥
२३६॥
रूप गोस्वामी, सनातन गोस्वामी तथा जीव गोस्वामी-ये तीनों तथा रघुनाथ दास गोस्वामी भी उसी तरह से मेरे गुरु हैं। इसलिए मैं उनके चरणकमलों की वन्दना करता हूँ, क्योंकि मैं उनका दास हूँ।"
एइ त कहिलँ पुनः सनातन-सङ्गमे । प्रभुर आशय जानि याहार श्रवणे ॥
२३७॥
इस तरह मैंने महाप्रभु की सनातन गोस्वामी से पुनः भेंट का वर्णन किया है। इसे सुनकर मैं महाप्रभु की इच्छा समझ सकता हूँ।"
चैतन्य-चरित्र एइ–इक्षु-दण्ड-सम ।।चर्वण करिते हय रस-आस्वादन ॥
२३८॥
श्री चैतन्य महाप्रभु के ये गुण गन्ने के समान हैं, जिससे इसे चूसने वाले को दिव्य रस का स्वाद मिलता है।"
श्री-रूप-रघुनाथ-पदे यार आश ।।चैतन्य-चरितामृत कहे कृष्णदास ॥
२३९॥
श्रील रूप तथा श्री रघुनाथ के चरणकमलों की वन्दना करते हुए, सदैव उनकी कृपा की कामना करते हुए, मैं कृष्णदास उनके चरणचिह्नों पर चलकर श्री चैतन्य-चरितामृत का वर्णन कर रहा हूँ।"
