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अध्याय सात: श्री चैतन्य महाप्रभु और वल्लभ भट्ट की मुलाकात

चैतन्य-चरणाम्भोज-मकरन्द-लिहो भजे ।।येषां प्रसाद-मात्रेण पामरोऽप्यमरो भवेत् ॥

मैं श्री चैतन्य महाप्रभु के भक्तों को सादर नमस्कार करता हूँ। महाप्रभु के चरणकमलों से मधु को चाटने में लगे भक्तों की अहैतुकी कृपा से ही एक पतितात्मा तक सदा के लिए मुक्त हो जाता है।"

जय जय श्री-चैतन्य जय नित्यानन्द ।। जयाद्वैत-चन्द्र जय गौर-भक्त-वृन्द ॥

२॥

श्री चैतन्य महाप्रभु की जय हो! श्री नित्यानन्द प्रभु की जय हो! श्री अद्वैतचन्द्र की जय हो! और श्री चैतन्य महाप्रभु के सारे भक्तों की जय हो! वर्षान्तरे व्रत गौड़ेर भक्त-गण आइला । पूर्ववत् महाप्रभु सबारे मिलिला ॥

३॥

। अगले वर्ष बंगाल के सारे भक्त श्री चैतन्य महाप्रभु से भेंट करने गये और महाप्रभु पहले की ही तरह उन सबसे मिले।"

एइ-मत विलास प्रभुर भक्त-गण लञा ।।हेन-काले वल्लभ-भट्ट मिलिल आसिया ॥

४॥

इस तरह श्री चैतन्य महाप्रभु अपने भक्तों के साथ अपनी लीलाएँ करते रहे। तब एक विद्वान पण्डित, जिनका नाम वल्लभ भट्ट था, महाप्रभु से मिलने जगन्नाथपुरी गये।।"

आसिया वन्दिल भट्ट प्रभुर चरणे ।।प्रभु' भागवत-बुद्ध्ये' कैला आलिङ्गने ॥

५॥

जब वल्लभ भट्ट आये, तो उन्होंने महाप्रभु के चरणकमलों में नमस्कार किया। महाप्रभु ने उन्हें महान् भक्त के रूप में स्वीकार करते हुए उनका आलिंगन किया।"

मान्य करि' प्रभु तारे निकटे वसाइला ।। विनय करिया भट्ट कहिते लागिला ॥

६॥

श्री चैतन्य महाप्रभु ने वल्लभ भट्ट को अत्यन्त सम्मानपूर्वक अपने निकट बैठाया। तब वल्लभ भट्ट अत्यन्त विनयपूर्वक कहने लगे।"

बहु-दिन मनोरथ तोमा' देखिबारे ।जगन्नाथ पूर्ण कैला, देखिलँ तोमारे ॥

७॥

हे प्रभु, मैं बहुत समय से आपका दर्शन करना चाह रहा था। अब भगवान् जगन्नाथ ने मेरी यह इच्छा पूरी की है, इसलिए मैं आपका दर्शन कर रहा हूँ।"

तोमार दर्शन ग्रे पाय सेइ भाग्यवान् ।।तोमाके देखिये,—ग्रेन साक्षात्भगवान् ॥

८॥

। जो आपका दर्शन पाता है, वह सचमुच भाग्यशाली है, क्योंकि आप साक्षात् पूर्ण पुरुषोत्तम भगवान् हैं।"

तोमारे ये स्मरण करे, से हय पवित्र ।दर्शने पवित्र हबे,—इथे कि विचित्र? ॥

९॥

चूँकि जो कोई आपका स्मरण करता है, वह पवित्र हो जाता है, इसलिए इसमें कौन सा आश्चर्य है कि आपका दर्शन करने पर कोई पवित्र हो जाये? येषां संस्मरणात्पुंसां सद्यः शुध्यन्ति वै गृहाः ।।किं पुनर्दर्शन-स्पर्श-पाद-शौचासनादिभिः ॥

१०॥

महापुरुषों का स्मरण करने मात्र से सारा घर पवित्र हो जाता है, तो फिर उनका प्रत्यक्ष दर्शन करने, उनके चरणकमलों का स्पर्श करने, उनका पाद-प्रक्षालन करने या उन्हें आसन देने के विषय में क्या कहा जा सकता है।"

कलि-कालेर धर्म-कृष्ण-नाम-सङ्कीर्तन ।कृष्ण-शक्ति विना नहे तार प्रवर्तन ॥

११॥

कलियुग में मूलभूत धार्मिक प्रणाली कृष्ण के पवित्र नाम का कीर्तन करने की है। कृष्ण द्वारा शक्ति प्राप्त किये बिना संकीर्तन आन्दोलन का प्रसार कोई नहीं कर सकता।"

ताहा प्रवर्ताइला तुमि,—एइ त 'प्रमाण' ।।कृष्ण-शक्ति धर तुमि, इथे नाहि आन ॥

१२॥

“आपने कृष्णभावनामृत आन्दोलन को प्रसारित किया है। इसलिए यह स्पष्ट है कि आप कृष्ण द्वारा शक्ति प्राप्त हैं। इसमें कोई सन्देह नहीं" जगते करिला तुमि कृष्ण-नाम प्रकाशे । ग्रेइ तोमा देखे, सेइ कृष्ण-प्रेमे भासे ॥

१३॥

आपने सारे जगत् में कृष्ण नाम को उजागर किया है। जो भी आपको देखता है, वह तुरन्त कृष्ण-प्रेम में निमग्न हो जाता है।"

प्रेम-परकाश नहे कृष्ण-शक्ति विने ।।'कृष्ण'–एक प्रेम-दाता, शास्त्र-प्रमाणे ॥

१४॥

कृष्ण द्वारा विशेष शक्ति प्राप्त किये बिना कोई कृष्ण-प्रेम उजागर नहीं कर सकता, क्योंकि कृष्ण ही परमानन्द प्रेम के एकमात्र दाता हैं। यही सारे प्रामाणिक शास्त्रों का निर्णय है।"

सन्त्ववतारा बहवःपुष्कर-नाभस्य सर्वतोभद्राः ।। कृष्णादन्यः को वालतास्वपि प्रेम-दो भवति’ ॥

१५ ॥

* भगवान् के कई सर्वमंगलकारी अवतार हो सकते हैं, किन्तु भगवान् कृष्ण के अतिरिक्त ऐसा कौन है, जो शरणागतों को भगवत्प्रेम प्रदान कर सके ?" महाप्रभु कहे–‘शुन, भट्ट महा-मति ।।मायावादी सन्यासी आमि, ना जानि कृष्ण-भक्ति ॥

१६॥

श्री चैतन्य महाप्रभु ने उत्तर दिया, “हे प्रिय वल्लभ भट्ट, आप विद्वान पण्डित हो। कृपया मेरी बात सुनो। मैं तो मायावादी संन्यासी हूँ। इसलिए कृष्णभक्ति जानने का मेरे पास कोई अवसर नहीं है।"

अद्वैताचार्य-गोसाजि-साक्षातीश्वर' ।।ताँर सङ्गे आमार मन हइल निर्मल ॥

१७॥

फिर भी मेरा मन शुद्ध हो गया है, क्योंकि मैंने अद्वैत आचार्य की संगति की है, जो कि साक्षात् भगवान् हैं।"

सर्व-शास्त्रे कृष्ण-भक्त्ये नाहि याँर सम ।अतएव 'अद्वैत-आचार्य' ताँर नाम ॥

१८॥

उनका समस्त प्रामाणिक शास्त्रों का ज्ञान तथा उनकी भगवान् कृष्ण की भक्ति अद्वितीय है। इसीलिए वे अद्वैत आचार्य कहलाते हैं।"

याँहार कपाते म्लेच्छेर हय कृष्ण-भक्ति । के कहिते पारे ताँर वैष्णवता-शक्ति? ॥

१९॥

वे इतने महान् पुरुष हैं कि अपनी कृपा से मांसाहारियों ( म्लेच्छों) तक को कृष्ण भक्ति दिला सकते हैं। इसलिए उनकी वैष्णवता की शक्ति का अनुमान कौन लगा सकता है? ।"

नित्यानन्द-अवधूत-‘साक्षातीश्वर' ।। भावोन्मादे मत्त कृष्ण-प्रेमेर सागर ॥

२०॥

नित्यानन्द प्रभु अवधूत भी साक्षात् पूर्ण पुरुषोत्तम भगवान् हैं। वे प्रेमावेश के उन्माद में सदैव उन्मत्त रहते हैं। निस्सन्देह, वे कृष्ण-प्रेम के सागर हैं।"

घडू-दर्शन-वेत्ता भट्टाचार्य-सार्वभौम ।। षडू-दर्शने जगद्गुरु भागवतोत्तम ॥

२१॥

सार्वभौम भट्टाचार्य छः दार्शनिक मतों के पूर्ण ज्ञाता हैं। इसलिए वे दर्शन के छः मार्गों को सिखाने में जगद्गुरु हैं। वे भक्तों में सर्वश्रेष्ठ हैं।"

तेह देखाइला मोरे भक्ति-स्रोग-पार ।। ताँर प्रसादे जानिहुँ 'कृष्ण-भक्ति-योग' सार ॥

२२॥

सार्वभौम भट्टाचार्य ने मुझे भक्ति की सीमा दिखलाई है। एकमात्र उन्हीं की कृपा से मैं यह समझ सका हूँ कि कृष्ण की भक्ति ही समस्त योग का सार है।"

रामानन्द-राय कृष्ण-रसेर 'निधान' । तेह जानाइला---कृष्ण-स्वयं भगवान् ॥

२३॥

श्रील रामानन्द राय कृष्ण भक्ति के दिव्य रस के आखरी ज्ञाता हैं। उन्होंने मुझे उपदेश दिया है कि कृष्ण ही पूर्ण पुरुषोत्तम भगवान् हैं।"

ताते प्रेम-भक्ति--पुरुषार्थ-शिरोमणि' ।। राग-मार्गे प्रेम-भक्ति 'सर्वाधिक' जानि ॥

२४॥

‘रामानन्द राय की कृपा से मैं समझ सका हूँ कि कृष्ण-प्रेम जीवन का सर्वोच्च लक्ष्य है और कृष्ण का रागानुग प्रेम सर्वोच्च पूर्णता है।"

दास्य, सख्य, वात्सल्य, आर ग्रे शृङ्गार ।। दास, सखा, गुरु, कान्ता,–'आश्रय' साहार ॥

२५॥

दास, मित्र, गुरुजन तथा प्रेमिका-ये दास्य, सख्य, वात्सल्य तथा श्रृंगार रसों के आश्रय हैं।"

‘ऐश्वर्य-ज्ञान-मुक्त', 'केवल'-भाव आर। ऐश्वर्य-ज्ञाने ना पाइ व्रजेन्द्र-कुमार ॥

२६॥

भाव के दो प्रकार हैं। भगवान् के पूर्ण ऐश्वर्यों के ज्ञान से युक्त भाव ऐश्वर्यज्ञान-युक्त कहलाता है। और शुद्ध निष्कलुष भाव केवल कहलाता है। महाराज नन्द के पुत्र कृष्ण के ऐश्वर्य मात्र के ज्ञान से उनके चरणकमलों की शरण प्राप्त नहीं की जा सकती।।"

नायं सुखापो भगवान्देहिनां गोपिका-सुतः ।। ज्ञानिनां चात्म-भूतानां यथा भक्ति-मतामिह ॥

२७॥

माता यशोदा के पुत्र, पूर्ण पुरुषोत्तम भगवान् कृष्ण उन भक्तों के लिए सुलभ हैं, जो रागानुगा भक्ति में लगे हैं, किन्तु जो लोग मानसिक चिन्तक (ज्ञानी ) हैं, जो कठोर तपस्या द्वारा आत्म-साक्षात्कार प्राप्त करने के लिए प्रयत्नशील हैं या जो शरीर को आत्मा ही मानते हैं, उनके लिए भगवान् दुर्लभ हैं।'" ‘आत्म-भूत-शब्दे कहे 'पारिषद-गण' ।। ऐश्वर्य-ज्ञाने लक्ष्मी ना पाइला व्रजेन्द्र-नन्दन ॥

२८॥

* आत्मभूत' शब्द का अर्थ 'निजी संगी' है। भगवान् के ऐश्वर्य ज्ञान द्वारा लक्ष्मीजी नन्द महाराज के पुत्र की शरण प्राप्त नहीं कर पाईं।"

नायं श्रियोऽङ्ग उ नितान्त-रतेः प्रसादःस्वर्योषितां नलिन-गन्ध-रुचां कुतोऽन्याः ।। रासोत्सवेऽस्य भुज-दण्ड-गृहीत-कण्ठलब्धाशिषां य उदगाव्रज-सुन्दरीणाम् ॥

२९॥

‘जब भगवान् श्रीकृष्ण रास लीला में गोपियों के साथ नृत्य कर रहे थे, तब भगवान् की बाहें गोपियों की गर्दन का आलिंगन कर रही थीं। यह दिव्य कृपा न तो कभी लक्ष्मीजी को, न ही वैकुण्ठ में अन्य प्रेयसियों को प्राप्त हो पाई थी। यहाँ तक कि स्वर्ग लोक की सर्वोत्तम सुन्दरियों ने भी, जिनकी शारीरिक कान्ति तथा सुगन्ध कमल पुष्पों के समान होती है, कभी ऐसी कृपा की कल्पना नहीं की थी। तो फिर संसारी स्त्रियों के विषय में क्या कहा जाए, जो भौतिक अनुमान के अनुसार अत्यन्त सुन्दर कही जाती हैं?'"

शुद्ध-भावे सखा करे स्कन्धे आरोहण ।।शुद्ध-भावे व्रजेश्वरी करेन बन्धन ॥

३०॥

शुद्ध कृष्ण चेतना में कृष्ण का मित्र कृष्ण के कन्धों पर चढ़ जाता है और माता यशोदा कृष्ण को बाँध देती हैं।"

‘मोर सखा', 'मोर पुत्र', एई 'शुद्ध' मन ।अतएव शुक-व्यास करे प्रशंसन ॥

३१॥

शुद्ध कृष्ण चेतना में भगवान् के ऐश्वर्यो के ज्ञान के बिना ही भक्त कृष्ण को अपना मित्र या पुत्र मानता है। इसलिए इस भक्ति भाव की प्रशंसा शुकदेव गोस्वामी तथा व्यासदेव जैसे महाजन भी करते हैं।"

इत्थं सतां ब्रह्म-सुखानुभूत्यादास्यं गतानां पर-दैवतेन । मायाश्रितानां नर-दारकेणसाकं विजह्वः कृत-पुण्य-पुञ्जाः ॥

३२॥

। “जो लोग भगवान् की ब्रह्मज्योति की प्रशंसा करते हुए आत्मसाक्षात्कार में लगे हुए हैं तथा जो पूर्ण पुरुषोत्तम भगवान् को स्वामी के रूप में स्वीकार करके भक्ति में लगे हुए हैं अथवा जो भगवान् को सामान्य पुरुष मानकर माया के पाश में बँधे हुए हैं, वे यह नहीं समझ सकते कि कुछ महापुरुष प्रचूर पुण्य कर्म संचित करके भगवान् के साथ मैत्री वश ग्वाल बालों के रूप में खेल रहे हैं।"

त्रय्या चोपनिषद्भिश्च साङ्ख्य-योगैश्च सात्वतैः ।। उपगीयमान-माहात्म्यं हरिं सामन्यतात्मजम् ॥

३३॥

• जब माता यशोदा ने कृष्ण के मुख के भीतर समस्त ब्रह्माण्डों को देखा, तो वे कुछ समय के लिए निश्चय ही आश्चर्यचकित हो गईं। जिस प्रकार इन्द्र तथा अन्य देवी-देवताओं की पूजा होती है, उसी प्रकार तीन वेदों के अनुयायी यज्ञों द्वारा भगवान् की पूजा करते हैं। उपनिषदों के अध्ययन द्वारा उनकी महानता को समझने वाले सन्त निराकार ब्रह्म के रूप में उनकी उपासना करते हैं। ब्रह्माण्ड का वैश्लेषिक अध्ययन करने वाले महान् दार्शनिक पुरुष के रूप में उनकी उपासना करते हैं। महान् योगी सर्वव्यापी परमात्मा के रूप में तथा भक्त पूर्ण पुरुषोत्तम भगवान् के रूप में उनकी उपासना करते हैं। फिर भी माता यशोदा भगवान् को अपना पुत्र ही समझतीं थीं।'" नन्दः किमकरोद्बह्मन्श्रेय एवं महोदयम् ।।यशोदा वा महा-भागा पपौ यस्याः स्तनं हरिः ॥

३४॥

“हे ब्राह्मण, नन्द महाराज ने पूर्ण पुरुषोत्तम भगवान् कृष्ण को पुत्र । रूप में पाने के लिए कौन सा पुण्य कर्म किया? तथा माता यशोदा ने । कौन-सा पुण्यकर्म किया जिससे परम भगवान् कृष्ण ने उन्हें 'माता' कहकर पुकारा और उनके स्तनों का दूध पिया?'"

ऐश्वर्य देखिलेह 'शुद्धेर' नहे ऐश्वर्य ज्ञान । अतएव ऐश्वर्य हइते 'केवल'-भाव प्रधान ॥

३५॥

यदि शुद्ध भक्त कृष्ण के ऐश्वर्य को देखता भी है, तो वह उसे स्वीकार नहीं करता। इसलिए शुद्ध चेतना ( केवल भाव) भगवान् के ऐश्वर्य ज्ञान से अधिक श्रेष्ठ है।"

ए सब शिखाइला मोरे राय-रामानन्द । अनर्गल रस-वेत्ता प्रेम-सुखानन्द ॥

३६॥

। रामानन्द राय दिव्य रसों से भलीभाँति अवगत हैं। वे कृष्ण-प्रेमावेश के सुख में निरन्तर तन्मय रहते हैं। उन्हीं ने मुझे यह सब सिखाया है।"

कहन ना याय रामानन्देर प्रभाव।। राय-प्रसादे जानिहुँ व्रजेर 'शुद्ध' भाव ॥

३७॥

“रामानन्द राय के प्रभाव तथा ज्ञान का वर्णन कर सकना असम्भव है, क्योंकि उन्हीं की कृपा से मैं वृन्दावनवासियों के शुद्ध प्रेम को समझ सकी।"

दामोदर-स्वरूप-‘प्रेम-रस' मूर्तिमान् ।। ग्राँर सङ्गे हैल व्रज-मधुर-रस-ज्ञान ॥

३८॥

। प्रेमावेश का दिव्य रस स्वरूप दामोदर द्वारा मूर्तिमान होता है। उनकी संगति से मैंने वृन्दावन के दिव्य माधुर्य रस को समझा है।"

‘शुद्ध-प्रेम' व्रज-देवीर-काम-गन्ध-हीन । ‘कृष्ण-सुख-तात्पर्य',—एइ तार चिह्न ॥

३९॥

“गोपियों तथा श्रीमती राधारानी का शुद्ध प्रेम भौतिक कामवासना के लेशमात्र से रहित है। ऐसे दिव्य प्रेम की कसौटी यह है कि इसका एकमात्र उद्देश्य कृष्ण को तुष्ट करना है।"

यत्ते सुजात-चरणाम्बुरुहं स्तनेषु ।भीताः शनैः प्रिय दधीमहि कर्कशेषु ।। तेनाटवीमटसि तव्यथते न किं स्वित् ।कूर्पादिभिर्भमति धीर्भवदायुषां नः ॥

४०॥

हे प्रिय, आपके चरणकमल इतने कोमल हैं कि हम डरते-डरते उन्हें अपने वक्षस्थलों पर धीरे से रखती हैं कि कहीं आपके चरणों को चोट न लग जाए। हमारे प्राण केवल आप पर आश्रित हैं। इसलिए हमारे मन इस बात से चिन्तित हैं कि वनमार्ग में घूमते समय आपके चरण कहीं। कंकरों से क्षत-विक्षत न हो जायें।"

गोपी-गणेर शुद्ध-प्रेम ऐश्वर्य-ज्ञान-हीन ।।प्रेमेते भर्त्सना करे एइ तार चिह्न ॥

४१॥

“ऐश्वर्य के ज्ञान से रहित शुद्ध प्रेम के वशीभूत गोपियाँ कभी-कभी कृष्ण की भर्त्सना करती हैं। यह शुद्ध प्रेम का लक्षण है।"

पति-सुतान्वय-भ्रातृ-बान्धवान् ।अतिविलछ्य तेऽन्त्यच्युतागताः ।। गति-विदस्तवोद्गीत-मोहिताःकितव योषितः कस्त्यजेन्निशि ॥

४२॥

‘हे प्रिय कृष्ण, हम गोपियों ने अपने पतियों, पुत्रों, परिवार, भाइयों तथा मित्रों के आदेश की अवहेलना की है और आपके पास आने के लिए उनका संग छोड़ा है। आप हमारी इच्छाओं के विषय में सब कुछ जानते हैं। हम आपकी वंशी के सर्वोत्कृष्ट संगीत से आकृष्ट होकर ही आई हैं। किन्तु आप बहुत बड़े शठ निकले, क्योंकि इस रात्रि में ऐसा कौन होगा, जो हम जैसी तरुणियों का साथ छोड़ देगा?' सर्वोत्तम भजन एड सर्व-भक्ति जिनि' ।।अतएव कृष्ण कहे,---‘आमि तोमार ऋणी' ॥

४३॥

। गोपियों का माधुर्य प्रेम सर्वोच्च भक्ति है, जो भक्ति की अन्य सारी विधियों को पार कर जाती है। इसलिए भगवान् कृष्ण को कहना पड़ा, 'हे गोपियों, मैं तुम लोगों को ऋण नहीं उतार सकता। निस्सन्देह, मैं तुम लोगों का सदैव ऋणी हूँ।"

न पारयेऽहं निरवद्य-संयुजां स्व-साधु-कृत्यं विबुधायुषापि वः ।। या माभजन्दुर्जय-गेह-शृङ्खलाः ।संवृश्च्य तद्वः प्रतियातु साधुना ॥

४४॥

हे गोपियों, मैं तुम लोगों की निष्कलंक सेवा के ऋण को ब्रह्मा की आयु तक में भी नहीं चुका सकता। मुझसे तुम लोगों का यह सम्बन्ध निन्दा से परे है। तुम लोगों ने समस्त घरेलू सम्बन्धों को तोड़कर मेरी पूजा की है, जिन्हें तोड़ पाना कठिन होता है। इसलिए तुम्हारे यशस्वी कार्य ही तुम्हारा पुरस्कार बने। ऐश्वर्य-ज्ञान हैते केवला-भाव—प्रधान ।पृथिवीते भक्त नाहि उद्धव-समान ॥

४५ ॥

शुद्ध कृष्ण-प्रेम ऐश्वर्य में कृष्ण-प्रेम से सर्वथा भिन्न होता है और सर्वोच्च पद पर होता है। इस पृथ्वी पर उद्धव से बढ़कर कोई भक्त नहीं" तेह झाँर पद-धूलि करेन प्रार्थन ।। स्वरूपेर सङ्गे पाइलँ ए सब शिक्षण ॥

४६॥

“उद्धव गोपियों के चरणकमलों की धूलि अपने सिर पर धारण करना चाहते हैं। मैंने स्वरूप दामोदर से भगवान् कृष्ण के इन सारे दिव्य प्रेमव्यापारों के विषय में सीखा है।"

आसामहो चरण-रेणु-जुषामहं स्यां ।वृन्दावने किमपि गुल्म-लतौषधीनाम् । या दुस्त्यजं स्व-जनमार्य-पथं च हित्वाभेजुर्मुकुन्द-पदवीं श्रुतिभिर्विमृग्याम् ॥

४७॥

वृन्दावन की गोपियों ने अपने पतियों, पुत्रों तथा अन्य पारिवारिक जनों का साथ छोड़ दिया है, जिन्हें छोड़ पाना अत्यन्त कठिन होता है। और उन्होंने वैदिक ज्ञान से खोजे जाने वाले मुकुन्द के चरणकमलों की शरण ग्रहण करने के लिए सतीत्व का मार्ग त्याग दिया है। ओह, यदि मैं वृन्दावन की कोई झाड़ी, लता या औषधी बन जाऊँ, से कितना भाग्यशाली हूँगा, क्योंकि तब गोपियाँ इन्हें अपने पाँव से रौदंती हुईं अपने चरणकमलों की धूल से आशीर्वाद देंगी।"

हरिदास-ठाकुर–महा-भागवत-प्रधान । प्रति दिन लय तेह तिन-लक्ष नाम ॥

४८॥

नामाचार्य हरिदास ठाकुर समस्त शुद्ध भक्तों में से सर्वाधिक पूज्य हैं। वे प्रति दिन तीन लाख पवित्र नामों का जप करते हैं।"

नामेर महिमा आमि ताँर ठात्रि शिखिलें ।ताँर प्रसादे नामेर महिमा जानिहुँ ॥

४९॥

मैंने तो भगवान् के पवित्र नाम की महिमा के विषय में हरिदास ठाकुर से सीखा है और उनकी कृपा से इस महिमा को जाना है।"

आचार्यरत्न आचार्यनिधि पण्डित-गदाधर ।। जगदानन्द, दामोदर, शङ्कर, वक्रेश्वर ॥

५०॥

काशीश्वर, मुकुन्द, वासुदेव, मुरारि ।। आर व्रत भक्त-गण गौड़े अवतरि' ॥

५१॥

कृष्ण-नाम-प्रेम कैला जगते प्रचार ।। इँहा सबार सङ्गे कृष्ण-भक्ति ग्ने आमार ॥

५२॥

आचार्यरत्न, आचार्यनिधि, गदाधर पण्डित, जगदानन्द, दामोदर, शंकर, वक्रेश्वर, काशीश्वर, मुकुन्द, वासुदेव, मुरारि तथा अन्य अनेक भक्तों ने कृष्ण के पवित्र नाम की महिमा तथा कृष्ण के प्रति प्रेम केमहत्त्व का जन-जन में प्रचार करने हेतु बंगाल में अवतार लिया है। मैंने इन्हीं से कृष्ण-भक्ति का अर्थ सीखा है।"

भट्टर हृदये दृढ़ अभिमान जानि' ।।भङ्गी करि' महाप्रभु कहे एत वाणी ॥

५३॥

यह जानते हुए कि वल्लभ भट्ट का हृदय गर्वित है, श्री चैतन्य महाप्रभु ने ये शब्द यह जताने के लिए कहे कि भक्ति के बारे में किस तरह सीखा जा सकता है।"

आमि से 'वैष्णव',--भक्ति-सिद्धान्त सब जानि ।।आमि से भागवत-अर्थ उत्तम वाखानि’ ॥

५४॥

[ वल्लभ भट्ट सोच रहे थे : ’मैं महान् वैष्णव हूँ। वैष्णव दर्शन के सारे सिद्धान्तों को सीखने के बाद मैं श्रीमद्भागवत का अर्थ समझ सकता हूँ और बहुत अच्छी तरह से इसकी व्याख्या कर सकता हूँ।"

भट्टर मनेते एइ छिल दीर्घ गर्व ।।प्रभुर वचन शुनि' से हइल खर्व ॥

५५ ॥

वल्लभ भट्ट के मन में ऐसा गर्व दीर्धकाल से चला आ रहा था, किन्तु जब उन्होंने श्री चैतन्य महाप्रभु का उपदेश सुना, तो उनका गर्व चूर-चूर हो गया।"

प्रभुर मुखे वैष्णवता शुनिया सबार ।। भट्टर इच्छा हैल ताँ-सबारे देखिबार ॥

५६॥

जब वल्लभ भट्ट ने श्री चैतन्य महाप्रभु के मुख से इन सारे भक्तों की शुद्ध वैष्णवता के बारे में सुना, तो तुरन्त उनकी इच्छा उन सबके दर्शनों के लिए हुई।"

भट्ट कहे,–ए सब वैष्णव रहे कोन् स्थाने ? । कोन् प्रकारे पाइमु इहाँ-सबार दर्शने? ॥

५७॥

वल्लभ भट्ट ने कहा, ‘ये सारे वैष्णव कहाँ रहते हैं और मैं उनका दर्शन किस तरह कर सकता हूँ?" प्रभु कहे,’केह गौड़े, केह देशान्तरे । सब आसियाछे रथ-यात्रा देखिबारे ॥

५८ ॥

श्री चैतन्य महाप्रभु ने उत्तर दिया, ‘यद्यपि उनमें से कुछ बंगाल में और कुछ अन्य राज्यों में रहते हैं, किन्तु वे सभी रथयात्रा के दर्शन हेतु यहाँ आये" इहाङि रहेन सबे, वासा---नाना-स्थाने ।इहाङिपाइबा तुमि सबार दर्शने ॥

५९॥

। इस समय वे सब यहीं रह रहे हैं। उनके आवास विभिन्न स्थानों में हैं। यहीं आप उन सबके दर्शन कर सकोगे।"

तबे भट्ट कहे बहु विनय वचन ।।बहु दैन्य करि' प्रभुरे कैल निमन्त्रण ॥

६०॥

तत्पश्चात् अत्यन्त विनय तथा दीनतापूर्वक वल्लभ भट्ट ने श्री चैतन्य महाप्रभु को अपने घर पर भोजन करने के लिए निमन्त्रित किया।"

आर दिन सब वैष्णव प्रभु-स्थाने आइला ।।सबा-सने महाप्रभु भट्टे मिलाइला ॥

६१॥

अगले दिन जब सारे भक्त श्री चैतन्य महाप्रभु के स्थान पर आये, तो महाप्रभु ने उस सबसे वल्लभ भट्ट का परिचय कराया।"

'वैष्णवे र तेज देखि' भट्टर चमत्कार ।ताँ-सबार आगे भट्ट–खद्योत-आकार ॥

६२॥

वे उनके मुखमण्डलों के तेज को देखकर चकित थे। निस्सन्देह, उन सबके बीच में वल्लभ भट्ट एक जुगनू समान लग रहे थे।"

तबे भट्ट बहु महाप्रसाद आनाइल ।।गण-सह महाप्रभुरे भोजन कराइल ॥

६३॥

तब वल्लभ भट्ट प्रचुर मात्रा में भगवान् जगन्नाथजी का प्रसाद ले आये और उन्होंने श्री चैतन्य महाप्रभु तथा उनके संगियों को अच्छी तरह से भोजन कराया।"

परमानन्द पुरी-सङ्गे सन्यासीर गण ।। एक-दिके वैसे सब करिते भोजन ॥

६४॥

परमानन्द पुरी इत्यादि श्री चैतन्य महाप्रभु के सारे संन्यासी संगी एक ओर बैठ गये और सबने प्रसाद प्राप्त किया।"

अद्वैत, नित्यानन्द-राय-पार्थे दुइ-जन ।। मध्ये महाप्रभु वसिला, आगे-पाछे भक्त-गण ॥

६५॥

श्री चैतन्य महाप्रभु समस्त भक्तों के बीच बैठे। अद्वैत आचार्य तथा नित्यानन्द प्रभु महाप्रभु के दोनों ओर बैठे। अन्य भक्त महाप्रभु के आगे और पीछे बैठे।"

गौड़ेर भक्त यत कहिते ना पारि । अङ्गने वसिला सब हुआ सारि सारि ॥

६६॥

बंगाल के सारे भक्त, जिनकी गिनती करने में मैं असमर्थ हूँ, आँगन में पंक्तियों में बैठ गये।"

प्रभुर भक्त-गण देखि' भट्टेर चमत्कार ।। प्रत्येके सबार पदे कैल नमस्कार ॥

६७ ॥

जब वल्लभ भट्ट ने श्री चैतन्य महाप्रभु के सारे भक्तों को देखा, तो उनके आश्चर्य का ठिकाना न रहा, और भक्तिवश उन्होंने उनमें से हर एक के चरणकमलों पर नमस्कार निवेदन किया।"

स्वरूप, जगदानन्द, काशीश्वर, शङ्कर । परिवेशन करे, आर राघव, दामोदर ॥

६८ ॥

स्वरूप दामोदर, जगदानन्द, काशीश्वर तथा शंकर ने राघव तथा दामोदर पण्डित को साथ लेकर प्रसाद वितरण का कार्य भार सँभाला।"

महा-प्रसाद वल्लभ-भट्ट बहु आनाइल । प्रभु-सह सन्यासि-गण भोजने वसिल ॥

६९॥

वल्लभ भट्ट भगवान जगन्नाथ को अर्पित ढेर सारा प्रसाद ले आये थे। इस तरह सारे संन्यासी खाने के लिए श्री चैतन्य महाप्रभु के साथ-साथ बैठ गये।"

प्रसाद पाय वैष्णव-गण बले, ‘हरि' ‘हरि' ।। हरि हरि ध्वनि उठे सब ब्रह्माण्ड भरि' ॥

७० ॥

प्रसाद पाकर सारे वैष्णवों ने हरि! हरि! के पवित्र नाम का उच्चारण किया। हरि के पवित्र नाम की उठती ध्वनि ने सारे ब्रह्माण्ड को पूरित कर दिया।"

माला, चन्दन, गुवाक, पाने अनेक आनिल । सबा' पूजा करि' भट्ट आनन्दित हैल ॥

७१॥

। जब सारे वैष्णव खा चुके, तो वल्लभ भट्ट बहुत सी मालाएँ, चन्दन लेप, मसाले तथा पान ले आये। उन्होंने सब भक्तों की आदरपूर्वक पूजा की और इस तरह अत्यन्त सुखी हुए।"

रथ-यात्रा-दिने प्रभु कीर्तन आरम्भिला । पूर्ववत् सात सम्प्रदाय पृथक् करिला ॥

७२॥

। रथयात्रा के उत्सव के दिन श्री चैतन्य महाप्रभु ने संकीर्तन प्रारम्भ किया। पहले की ही तरह उन्होंने सारे भक्तों को सात टोलियों में बाँट दिया।"

अद्वैत, नित्यानन्द, हरिदास, वक्रेश्वर ।। श्रीवास, राघव, पण्डित-गदाधर ॥

७३॥

सात जन सात-ठाजि करेन नर्तन ।।‘हरि-बोल' बलि' प्रभु करेन भ्रमण ॥

७४॥

अद्वैत, नित्यानन्द, हरिदास ठाकुर, वक्रेश्वर, श्रीवास ठाकुर, राघव पण्डित तथा गदाधर पण्डित-इन सात भक्तों ने सात टोलियाँ बना लीं और नाचने लगे। श्री चैतन्य महाप्रभु’हरि बोल! कीर्तन करते हुए एक टोली से दूसरी टोली में विचरण करने लगे।"

चौद्द मादल बाजे उच्च सङ्कीर्तन ।।एक एक नर्तकेर प्रेमे भासिल भुवन ॥

७५ ॥

उच्च संकीर्तन के साथ-साथ चौदह मृदंग गूंजने लगे। हर टोली को एक-एक नर्तक था, जिसके प्रेमाविष्ट नृत्य से सम्पूर्ण ब्रह्माण्ड आप्लावित हो उठा।"

देखि' वल्लभ-भट्टर हैल चमत्कार ।। आनन्दे विह्वल नाहि आपन-साम्भाल ॥

७६ ।। यह सब देखकर वल्लभ भट्ट पूर्णतया चकित थे। वे दिव्य आनन्द से विह्वल और अपने में खोए हुए थे।"

तबे महाप्रभु सबार नृत्य राखिला । पूर्ववत् आपने नृत्य करते लागिला ॥

७७॥

तब श्री चैतन्य महाप्रभु ने सबका नृत्य रुकवा दिया और पहले की तरह वे स्वयं नाचने लगे।"

प्रभुर सौन्दर्य देखि आर प्रेमोदय ।। ‘एइ त' साक्षात्कृष्ण भट्टर हइल निश्चय ॥

७८॥

श्री चैतन्य महाप्रभु के सौन्दर्य तथा उनके प्रेमावेश का उदय देखकर वल्लभ भट्ट ने निष्कर्ष निकाला कि, “निस्सन्देह, ये भगवान् कृष्ण हैं।"

एत मत रथ-यात्रा सकले देखिल ।।प्रभुर चरित्रे भट्टेर चमत्कार हैल ॥

७९॥

इस तरह वल्लभ भट्ट ने रथयात्रा उत्सव देखा। वे श्री चैतन्य महाप्रभु के चरित्र से चकित थे।"

ग्रात्रानन्तरे भट्ट ग्राइ महाप्रभु-स्थाने ।प्रभु-चरणे किछु कैल निवेदने ॥

८०॥

रथयात्रा समाप्त होने के बाद, एक दिन वल्लभ भट्ट श्री चैतन्य महाप्रभु के निवासस्थान पर गये और उनके चरणकमलों पर एक विनती की।"

भागवतेर टीका किछु करियाछि लिखन ।आपने महाप्रभु यदि करेन श्रवण’ ॥

८१॥

‘मैंने श्रीमद्भागवत पर कुछ टीका लिखी है। क्या कृपा करके आप इसे सुनेंगे? प्रभु कहे,_भागवतार्थ बुझिते ना पारि ।भागवतार्थ शुनिते आमि नहि अधिकारी ॥

८२॥

महाप्रभु ने उत्तर दिया, मैं श्रीमद्भागवत का अर्थ नहीं समझता। निस्सन्देह, मैं उसका अर्थ सुनने का सुपात्र नहीं हूँ। ।"

वसि' कृष्ण-नाम मात्र करिये ग्रहणे ।।सङ्ख्या -नाम पूर्ण मोर नहे रात्रि-दिने ॥

८३॥

मैं मात्र बैठकर कृष्ण के पवित्र नाम का जप करने का प्रयत्न करता हूँ और यद्यपि मैं रात-दिन नाम-जप करता हूँ, तो भी मैं नियत संख्या पूरी नहीं कर पाता।"

भट्ट कहे, ‘कृष्ण-नामेर अर्थ-व्याख्याने ।। विस्तार कैराछि, ताहा करह श्रवणे' ॥

८४॥

वल्लभ भट्ट ने कहा, मैंने कृष्ण के पवित्र नाम के अर्थ की विस्तार से व्याख्या करने का प्रयास किया है। कृपया उस व्याख्या को सुनें।"

प्रभु कहे,कृष्ण-नामेर बहु अर्थ ना मानि ।। 'श्याम–सुन्दर' यशोदा-नन्दन,'–एइ-मात्र जानि ॥

८५ श्री चैतन्य महाप्रभु ने उत्तर दिया, मैं कृष्ण के पवित्र नाम के कई अलग-अलग अर्थ स्वीकार नहीं करता। मैं तो इतना ही जानता हूँ कि भगवान् कृष्ण श्यामसुन्दर तथा यशोदानन्दन हैं। बस, मैं इतना ही जानता हूँ I तमाल-श्यामल-त्विषि श्री-यशोदा-स्तनन्धये ।। कृष्ण-नाम्नो रूढ़िरिति सर्व-शास्त्र-विनिर्णयः ॥

८६॥

‘कृष्ण के पवित्र नाम का एकमात्र तात्पर्य है कि वे तमाल वृक्ष की तरह गहरे नीले हैं और माता यशोदा के पुत्र हैं। यही समस्त प्रामाणिक शास्त्रों का निर्णय है।"

एइ अर्थ आमि मात्र जानिये निर्धार । आर सर्व-अर्थे मोर नाहि अधिकार’ ॥

८७॥

‘मैं श्यामसुन्दर तथा यशोदानन्दन-इन्हीं दो नामों को निश्चित रूप से जानता हूँ। मैं कोई अन्य अर्थ नहीं समझता, न ही उनको समझने की मुझमें क्षमता है।"

फल्गु-प्राय भट्टर नामादि सब-व्याख्या । सर्वज्ञ प्रभु जानि' तारे करेन उपेक्षा ॥

८८॥

श्री चैतन्य महाप्रभु सर्वज्ञ हैं, अतएव वे यह समझ गये कि वल्लभ भट्ट की कृष्ण के पवित्र नाम तथा श्रीमद्भागवत की व्याख्याएँ व्यर्थ हैं। अतएव उन्होंने उनकी परवाह नहीं की।"

विमना हा भट्ट गेला निज-घर । प्रभु-विषये भक्ति किछु हइल अन्तर ॥

८९॥

जब श्री चैतन्य महाप्रभु ने उनकी व्याख्याएँ सुनने से साफ मना कर दिया, तो वल्लभ भट्ट खिन्न होकर अपने घर चले गये। महाप्रभु के प्रति उसकी श्रद्धा तथा भक्ति बदल गई।"

तबे भट्ट गेला पण्डित-गोसाजिर ठात्रि ।।नाना मते प्रीति करि' करे आसा-याइ ॥

९०॥

तत्पश्चात् वल्लभ भट्ट गदाधर पण्डित के घर गये। वे विभिन्न प्रकार से स्नेह प्रदर्शित करके आते-जाते रहे और उनके साथ सम्बन्ध बनाये रखे।"

प्रभुर उपेक्षाय सब नीलाचलेर जन ।।भट्टर व्याख्यान किछु ना करे श्रवण ॥

९१॥

चूँकि श्री चैतन्य महाप्रभु ने वल्लभ भट्ट को गम्भीरतापूर्वक ग्रहण नहीं किया, इसलिए जगन्नाथपुरी के किसी भी व्यक्ति ने उनकी कोई व्याख्या नहीं सुनी।।"

लज्जित हैल भट्ट, हैल अपमाने ।।दुःखित हा गेल पण्डितेर स्थाने ॥

९2॥

लज्जित, अपमानित तथा दुःखित वल्लभ भट्ट गदाधर पण्डित के पास गये।"

दैन्य करि' कहे, ‘निहुँ तोमार शरण ।।तुमि कृपा करि' राख आमार जीवन ॥

९३॥

। उनके पास अत्यन्त विनीत भाव से पहुँचकर वल्लभ भट्ट ने कहा, मान्यवर, मैंने आपकी शरण ले रखी है। आप मुझ पर कृपालु हों और मेरे प्राणों की रक्षा करें।"

कृष्ण-नाम-व्याख्या यदि करह श्रवण ।। तबे मोर लज्जा-पङ्क हय प्रक्षालन ॥

९४॥

कृपा करके आप कृष्णनाम के अर्थ की मेरी व्याख्या सुनें। इससे मेरे ऊपर जो लज्जा का कीचड़ पड़ा है, वह धुल सकेगा।"

सङ्कटे पड़िल पण्डित, करये संशय ।।कि करिबेन,—एको, करिते ना पारे निश्चय ॥

९५ ॥

इस तरह पण्डित गोसांई संकट में पड़ गये। वे ऐसे संशय में थे कि उनके लिए यह निश्चित कर पाना कठिन हो गया कि वे क्या करें।"

ग्रद्यपि पण्डित आर ना कैला अङ्गीकार ।।भट्ट ग्राइ' तबु पड़े करि' बलात्कार ॥

९६॥

यद्यपि गदाधर पण्डित गोसांई सुनना नहीं चाहते थे, किन्तु वल्लभ भट्ट अत्यन्त बलपूर्वक से अपनी व्याख्या पढ़ने लगे।"

आभिजात्ये पण्डित करिते नारे निषेधन ।।ए सङ्कटे राख, कृष्ण लइलाङ शरण ॥

९७॥

चूँकि वल्लभ भट्ट विद्वान ब्राह्मण थे, अतएव गदाधर पण्डित उन्हें रोक नहीं पाये। इस तरह उन्होंने कृष्ण का ध्यान किया। उन्होंने प्रार्थना की, हे कृष्ण, इस संकट में मेरी रक्षा करें। मैं आपकी शरण में आया हूँ।"

अन्तर्यामी प्रभु जानिबेन मोर मन ।।ताँरै भय नाहि किछु, 'विषम' ताँर गण’ ॥

९८॥

श्री चैतन्य महाप्रभु जन-जन के हृदय में विद्यमान हैं, अतः वे निश्चय ही मेरे मन की बात जान लेंगे। इसलिए मुझे उनसे भय नहीं है। किन्तु उनके संगी अत्यन्त आलोचना-पटु हैं।"

यद्यपि विचारे पण्डितेर नाहि किछु दोष ।।तथापि प्रभुर गण तौरे करे प्रणय-रोष ॥

९९॥

यद्यपि गदाधर पण्डित गोसांई का रंच भर भी दोष नहीं था, किन्तु श्री चैतन्य महाप्रभु के कुछ भक्तों ने उनके प्रति स्नेहमय रोष प्रकट किया।"

प्रत्यह वल्लभ-भट्ट आइसे प्रभु-स्थाने । ‘उद्ग्राहादि प्राय करे आचार्यादि-सने ॥

१००॥

वल्लभ भट्ट प्रति दिन श्री चैतन्य महाप्रभु के स्थान पर आते और अद्वैत आचार्य तथा स्वरूप दामोदर जैसे महापुरुषों से व्यर्थ का तर्क करते थे।"

ग्रेइ किछु करे भट्ट 'सिद्धान्त' स्थापन ।। शुनितेइ आचार्य ताहा करेन खण्डन ॥

१०१॥

। वल्लभ भट्ट उत्सुकतापूर्वक जितने भी सिद्धान्त प्रस्तुत करते, उन सबका खण्डन अद्वैत आचार्य जैसे भक्त कर देते।"

आचार्यादि-आगे भट्ट ग्रबे ग्रबे ग्राय ।। राजहंस-मध्ये ग्रेन रहे बक-प्राय ॥

१०२॥

जब भी वल्लभ भट्ट अद्वैत आचार्य इत्यादि भक्तों की सभा में प्रवेश करते, वे श्वेत हंसों की सभा में बगुले जैसे प्रतीत होते।"

एक-दिन भट्ट पुछिल आचार्येरे।। जीव-'प्रकृति' 'पति' करि' मानये कृष्णेरे ॥

१०३ ॥

एक दिन वल्लभ भट्ट ने अद्वैत आचार्य से कहा, प्रत्येक जीव प्रकृति (स्त्री) है और वह कृष्ण को अपना पति मानता है।"

पति-व्रता हा पतिर नाम नाहि लय । तोमरा कृष्ण-नाम लह,-कोन् धर्म हय?’ ॥

१०४॥

‘पतिव्रता स्त्री का धर्म है कि वह अपने पति का नाम न ले, किन्तु आप सब लोग तो कृष्ण के नाम का उच्चारण करते हैं। इसे किस तरह धर्म कहा जा सकता है? आचार्य कहे,_आगे तोमार 'धर्म' मूर्तिमान् ।। इँहारे पुछह, ईंह करिबेन इहार समाधान ॥

१०५॥

अद्वैत आचार्य ने उत्तर दिया, आपके समक्ष धर्म के साक्षात् मूर्तिमान् स्वरूप श्री चैतन्य महाप्रभु हैं। आप उनसे पूछो, तो वे ही आपको सही उत्तर देंगे।"

शुनि' प्रभु कहेन,–‘तुमि ना जान धर्म-मर्म ।। स्वामि-आज्ञा पाले,——एइ पति-व्रता-धर्म ॥

१०६॥

यह सुनकर श्री चैतन्य महाप्रभु ने कहा, हे वल्लभ भट्ट, आप धर्म के सिद्धान्तों को नहीं जानते। वास्तव में पतिव्रता स्त्री का सर्वप्रथम कर्तव्य यह है कि वह अपने पति की आज्ञा का पालन करे।"

पतिर आज्ञा,—निरन्तर ताँर नाम लइते ।। पतिर आज्ञा पतिव्रता ना पारे लङ्घिते ॥

१०७॥

कृष्ण की आज्ञा है कि उनके नाम का निरन्तर कीर्तन हो। इसलिए जो स्त्री पतिरूप कृष्ण के परायण है, उसे भगवान् के नाम का कीर्तन करना चाहिए, क्योंकि वह अपने पति के आदेश का उल्लघंन नहीं कर सकती।"

अतएव नाम लय, नामेर 'फल' पाय ।। नामेर फले कृष्ण-पदे 'प्रेम' उपजाय’ ॥

१०८॥

‘इस धार्मिक सिद्धान्त का पालन करते हुए कृष्ण को शुद्ध भक्त सदैव उनके पवित्र नाम का कीर्तन करता है। इसके फलस्वरूप उसे कृष्ण-प्रेम का फल प्राप्त होता है।"

शुनिया वल्लभ-भट्ट हैल निर्वचन ।। घरे ग्राइ' मने दुःखे करेन चिन्तन ॥

१०९॥

यह सुनकर वल्लभ भट्ट मूक हो गये। वे अत्यन्त दुःखी होकर घर लौट आये और इस तरह विचार करने लगे।"

नित्य आमार एइ सभाये हय कक्षा-पात । एक-दिन उपरे यदि हय मोर बात् ॥

११०॥

तबे सुख हय, आर सब लज्जा ग्राय । स्व-वचन स्थापिते आमि कि करि उपाय?’ ॥

१११॥

‘मैं इस सभा में प्रति दिन पराजित हो जाता हैं। यदि कदाचित् किसी दिन मैं विजयी हो जाऊँ, तो वह मेरे लिए सुख का महान् स्रोत होगा और मेरी सारी लज्जा जाती रहेगी। किन्तु अपने कथनों को स्थापित करने के लिए मैं किन साधनों को अपनाऊँ? आर दिन आसि' वसिला प्रभुरे नमस्करि' ।।सभाते कहेन किछु मने गर्व करि' ॥

११२॥

अगले दिन जब वे श्री चैतन्य महाप्रभु की सभा में आये, तो महाप्रभु को नमस्कार करके वे बैठ गये और बड़े ही गर्व से कुछ कहने लगे।"

भागवते स्वामीर व्याख्यान कैराछि खण्डन ।लइते ना पारि ताँर व्याख्यान-वचन ॥

११३॥

उन्होंने कहा, ‘मैंने अपनी श्रीमद्भागवत की टीका में श्रीधर स्वामी की व्याख्याओं का खण्डन किया है। मैं उनकी व्याख्याओं को स्वीकार नहीं कर सकता।"

सेइ व्याख्या करेन ग्राहाँ ग्रेइ पड़े आनि' ।।एक-वाक्यता नाहि, ताते 'स्वामी' नाहि मानि’ ॥

११४॥

श्रीधर स्वामी जो भी पढ़ते हैं, उसकी व्याख्या परिस्थिति के अनुसार करते हैं। इसलिए उनकी व्याख्या में एकरूपता नहीं है और उन्हें प्रामाणिक नहीं माना जा सकता।"

प्रभु हासि' कहे,–‘स्वामी ना माने ग्रेइ जन ।वेश्यार भितरे तारे करिये गणन’ ॥

११५॥

श्री चैतन्य महाप्रभु ने हँसते हुए उत्तर दिया, ‘जो व्यक्ति अपने स्वामी (पति) को अधिकारी नहीं मानता उसे मैं वेश्या समझता हूँ।"

एत कहि' महाप्रभु मौन धरिला ।।शुनिया सबार मने सन्तोष हइला ॥

११६॥

यह कहकर श्री चैतन्य महाप्रभु अत्यन्त गम्भीर हो गये। वहाँ पर उपस्थित सारे भक्तों को यह कथन सुनकर अतीव सन्तोष हुआ।"

जगतेर हित लागि' गौर-अवतार ।अन्तरेर अभिमान जानेन ताहार ॥

११७॥

श्री चैतन्य महाप्रभु सारे जगत् के लाभ हेतु अवतार के रूप में प्रकट हुए हैं। इस तरह वे वल्लभ भट्ट के मन को भलीभाँति जान चुके थे।"

नाना अवज्ञाने भट्टे शोधेन भगवान् ।कृष्ण त्रैछे खण्डिलेन इन्द्रेर अभिमान ॥

११८॥

पूर्ण पुरुषोत्तम भगवान् श्री चैतन्य महाप्रभु ने अनेक संकेतों तथा खण्डनों के द्वारा वल्लभ भट्ट को उसी तरह सुधारा, जिस तरह कृष्ण ने इन्द्र के मिथ्या दर्प को खण्डित किया था।"

अज्ञ जीव निज-हिते' 'अहित' करि' माने । गर्व चूर्ण हैले, पाछे उघाड़े नयने ॥

११९॥

। अज्ञानी जीव अपना वास्तविक हित नहीं पहचान पाता। अज्ञानता तथा भौतिक गर्व के कारण वह कभी-कभी हित को अहित मानता है, किन्तु जब उसका गर्व चूर हो जाता है, तो वह अपने वास्तविक हित को देख सकता है।"

घरे आसि' रात्र्ये भट्ट चिन्तिते लागिल ।।पूर्वे प्रयागे मोरे महा-कृपा कैल ॥

१२०॥

उस रात घर लौटकर वल्लभ भट्ट ने सोचा, इसके पूर्व प्रयाग में श्री चैतन्य मुझ पर अत्यन्त दयालु थे।"

स्वगण-सहिते मोर मानिला निमन्त्रण ।।एबे केने प्रभुर मोते फिरि' गेल मन? ॥

१२१॥

उन्होंने अपने अन्य भक्तों सहित मेरा निमन्त्रण स्वीकार किया था और वे मुझ पर अत्यन्त कृपालु थे। यहाँ जगन्नाथपुरी में वे इतना अधिक क्यों बदल गये हैं? ‘आमि जिति',—एइ गर्व-शून्य हउक इँहार चित ।ईश्वर-स्वभाव, करेन सबाकार हित ॥

१२२॥

। अपनी विद्या पर अत्यधिक गर्वित होकर मैं सोच रहा हूँ, मुझे विजयी हो जाने दो।' किन्तु श्री चैतन्य महाप्रभु मेरे इस मिथ्या गर्व को भंग करके मुझे शुद्ध बनाना चाह रहे हैं, क्योंकि पूर्ण पुरुषोत्तम भगवान् का स्वभाव है कि वे हर एक के कल्याण के लिए कार्य करते हैं।"

आपना जानाइते आमि करि अभिमान ।। से गर्व खण्डाइते मोर करेन अपमान ॥

१२३॥

मैं अपने आपको विद्वान पण्डित घोषित करके मिथ्या ही गर्वित हूँ। इसीलिए श्री चैतन्य महाप्रभु मेरे इस मिथ्या गर्व को चूर करके मुझ पर कृपा करने के लिए मेरा अपमान करते हैं।"

आमार ‘हित' करेन,—इहो आमि मानि 'दुःख' ।कृष्णेर उपरे कैल ग्रेन इन्द्र महा-मूर्ख ॥

१२४॥

वे वास्तव में मेरे हित के लिए ऐसा कर रहे हैं, यद्यपि मैं उनके कार्यों को अपमान मानता हूँ। यह उसी घटना के तुल्य है, जिसमें भगवान् कृष्ण ने गर्वित महामूर्ख इन्द्र को सही रास्ते पर लाने के लिए उसके गर्व को चूर किया था।"

एत चिन्ति' प्राते आसि' प्रभुर चरणे ।।दैन्य करि' स्तुति करि' लइल शरणे ॥

१२५॥

। इस तरह सोचकर दूसरे दिन प्रात:काल वल्लभ भट्ट श्री चैतन्य महाप्रभु के पास पहुँचे और अत्यन्त दीनता के साथ अनेक स्तुतियाँ करके उन्होंने महाप्रभु के चरणकमलों की शरण ग्रहण कर ली।"

आमि अज्ञ जीव,—अज्ञोचित कर्म कैलें । तोमार आगे मूर्ख आमि पाण्डित्य प्रकाशितुं ॥

१२६॥

। वल्लभ भट्ट ने स्वीकार किया, “मैं महामूर्ख हूँ और निसन्देह आपके समक्ष अपना पाण्डित्य प्रदर्शित करने का प्रयास करके मैंने मूर्ख जैसा आचरण किया है।"

तुमि-ईश्वर, निजोचित कृपा ये करिला ।अपमान करि' सर्व गर्व खण्डाइला ॥

१२७॥

हे प्रभु, आप पूर्ण पुरुषोत्तम भगवान् हैं। आपने मेरा अपमान करके मेरा समस्त मिथ्या गर्व चूर करने के लिए अपने पद के अनुकूल मुझ पर कृपा की है।"

आमि–अज्ञ, ‘हित'-स्थाने मानि 'अपमाने'।इन्द्र ग्रेन कृष्णेर निन्दा करिल अज्ञाने ॥

१२८॥

मैं अज्ञानी मूर्ख हैं, क्योंकि जो मेरे हित के लिए है, उसे मैं अपमान मानता हूँ। इस प्रकार मैं राजा इन्द्र के समान हूँ, जिसने अज्ञानवश भगवान् कृष्ण को मात कर देना चाहा था।"

तोमार कृपा-अञ्जने एबे गर्व-आन्ध्य गेल ।।तुमि एत कृपा कैला,—एबे 'ज्ञान' हैल ॥

१२९॥

हे प्रभु, आपने मेरी आँखों में अपनी कृपा का अंजन लगाकर मेरे मिथ्या गर्व के अन्धेपन को दूर कर दिया है। आपने मुझ पर इतनी कृपा की है कि अब मेरा अज्ञान समाप्त हो गया है।"

अपराध कैनु, क्षम, लइनु शरण ।कृपा करि' मोर माथे धरह चरण ॥

१३०॥

हे प्रभु, मैंने अपराध किये हैं। कृपया आप मुझे क्षमा कर दें। मैं आपकी शरण में आया हूँ। कृपया अपने चरणकमलों को मेरे सिर पर रखकर आप मुझ पर कृपालु हों।"

प्रभु कहे–तुमि ‘पण्डित' ‘महा-भागवत' ।दुइ-गुण ग्राहाँ, ताहाँ नाहि गर्व-पर्वत ॥

१३१॥

श्री चैतन्य महाप्रभु ने कहा, “आप बहुत बड़े पण्डित तथा बहुत बड़े भक्त भी हो। जहाँ भी ऐसे दो गुण होते हैं, वहाँ मिथ्या गर्व का पर्वत नहीं रह सकता।"

श्रीधर-स्वामी निन्दि' निज-टीका कर! ।।श्रीधर-स्वामी नाहि मान',—एत 'गर्व' धरः ॥

१३२॥

तुमने श्रीधर स्वामी की आलोचना करने का दुःस्साहस किया है। और उनकी प्रामाणिकता को न स्वीकार करके श्रीमद्भागवत पर अपनी टीका करनी शुरू की है। यही आपका मिथ्या गर्व है।"

श्रीधर-स्वामि-प्रसादे ‘भागवत' जानि ।।जगद्गुरु श्रीधर-स्वामी 'गुरु' करि' मानि ॥

१३३॥

* श्रीधर स्वामी सारे जगत् के गुरु हैं, क्योंकि उनकी कृपा से हम श्रीमद्भागवत को समझ सकते हैं। अतएव मैं उन्हें गुरु के रूप में मानता" श्रीधर-उपरे गर्ने ग्रे किछु लिखिबे । ‘अर्थ-व्यस्त' लिखन सेइ, लोके ना मानिबे ॥

१३४॥

श्रीधर स्वामी से श्रेष्ठ बनने का प्रयास करते हुए मिथ्या गर्व से आप चाहे जो भी लिखो, उसका विपरीत तात्पर्य होगा। इसलिए उसकी ओर कोई भी ध्यान नहीं देगा।"

श्रीधरेर अनुगत ग्रे करे लिखन । सब लोक मान्य करि' करिबे ग्रहण ॥

१३५॥

जो व्यक्ति श्रीधर स्वामी के चरणचिह्नों का अनुगमन करते हुए श्रीमद्भागवत पर टीका लिखता है, उसका सभी लोग सम्मान करेंगे और वह सबके द्वारा मान्य होगी।"

श्रीधरानुगत कर भागवत-व्याख्यान ।। अभिमान छाड़ि' भज कृष्ण भगवान् ॥

१३६॥

आप श्रीधर स्वामी के चरणचिह्नों का अनुगमन करते हुए श्रीमद्भागवत की अपनी व्याख्या प्रस्तुत करो। आप अपना मिथ्या गर्व त्याग दो और पूर्ण पुरुषोत्तम भगवान् श्रीकृष्ण की पूजा करो।"

अपराध छाड़ि' कर कृष्ण-सङ्कीर्तन ।। अचिरात् पाबे तबे कृष्णेर चरण’ ॥

१३७॥

। अपने अपराधों को छोड़कर हरे कृष्ण महामन्त्र का कीर्तन करो। तब आप शीघ्र ही कृष्ण के चरणकमलों की शरण पा सकोगे।"

भट्ट कहे,–यदि मोरे हइला प्रसन्न ।। एक-दिन पुनः मोर मान' निमन्त्रण’ ॥

१३८॥

वल्लभ भट्ट आचार्य ने श्री चैतन्य महाप्रभु से प्रार्थना की, “यदि आप मुझ पर सचमुच प्रसन्न हैं, तो एक बार फिर मेरा निमन्त्रण स्वीकार कर लें। ।"

प्रभु अवतीर्ण हैला जगत्तारिते ।।मानिलेन निमन्त्रण, तारे सुख दिते ॥

१३९॥

। समस्त ब्रह्माण्ड का उद्धार करने के लिए अवतार लेने वाले श्री चैतन्य महाप्रभु ने वल्लभ भट्ट को सुख प्रदान करने हेतु उनका निमन्त्रण स्वीकार कर लिया।"

जगतेर ‘हित' हउक–एइ प्रभुर मन ।।दण्ड करि' करे तार हृदय शोधन ॥

१४०॥

श्री चैतन्य महाप्रभु इस भौतिक जगत् में हर एक को सुखी देखने के लिए सदैव उत्सुक रहते हैं। इसलिए कभी-कभी वे किसी-किसी को दण्ड देते हैं, जिससे वह अपने हृदय को शुद्ध कर सके।"

स्वगण-सहित प्रभुर निमन्त्रण कैला ।।महाप्रभु तारे तबे प्रसन्न हइला ॥

१४१॥

जब वल्लभ भट्ट ने श्री चैतन्य महाप्रभु तथा उनके संगियों को निमन्त्रित किया, तो महाप्रभु उनसे अत्यधिक प्रसन्न थे।"

जगदानन्द-पण्डितेर शुद्ध गाढ़ भाव।।सत्यभामा-प्राय प्रेम 'वाम्य-स्वभाव' ॥

१४२॥

श्री चैतन्य महाप्रभु के लिए जगदानन्द पण्डित का शुद्ध प्रमभाव अत्यन्त प्रगाढ़ था। इसकी तुलना सत्यभामा के प्रेम से की जा सकती है, जो कृष्ण से सदैव झगड़ती रहती थीं।"

बार-बार प्रणय कलह करे प्रभु-सने ।।अन्योऽन्ये खमटि चले दुइ-जने ॥

१४३॥

जगदानन्द पण्डित में महाप्रभु से प्रेमपूर्ण झगड़ा करने की आदत थी। उन दोनों के बीच सदैव कुछ न कुछ खटपट चलती रहती थी।"

गदाधर-पण्डितेर शुद्ध गाढ़ भाव ।। रुक्मिणी-देवीर ग्रैछे 'दक्षिण-स्वभाव' ॥

१४४॥

। गदाधर पण्डित का भी श्री चैतन्य महाप्रभु के प्रति शुद्ध प्रेम अत्यन्त प्रगाढ़ था। यह प्रेम रुक्मिणी देवी जैसा था, जो सदैव कृष्ण के प्रति विनीत बनी रहती थीं।"

ताँर प्रणय-रोष देखिते प्रभुर इच्छा हय ।।ऐश्वर्य-ज्ञाने ताँर रोष नाहि उपजय ॥

१४५॥

श्री चैतन्य महाप्रभु कभी-कभी गदाधर पण्डित का स्नेहिल क्रोध (मान) देखना चाहते थे, किन्तु महाप्रभु के ऐश्वर्य का ज्ञान होने के कारण वे कभी रुष्ट नहीं होते थे।"

एइ लक्ष्य पाञा प्रभु कैला रोषाभास ।। शुनि' पण्डितेर चित्ते उपजिल त्रास ॥

१४६ ॥

इसी कारण से श्री चैतन्य महाप्रभु कभी-कभी ऊपरी रोष प्रकट करते थे। इस रोष को सुनकर गदाधर पण्डित के हृदय में महान् भय उत्पन्न हो जाता।।"

पूर्वे ग्रेन कृष्ण यदि परिहास कैल ।।शुनि' रुक्मिणीर मने त्रास उपजिले ॥

१४७॥

पहले, कृष्ण लीला में जब भगवान् कृष्ण ने रुक्मिणी देवी से परिहास किया था, तब उन्होंने उनके शब्दों को गम्भीरता से लिया, जिससे उनके मन में भय उत्पन्न हो गया।"

वल्लभ-भट्टर हय वात्सल्य-उपासन ।बाल-गोपाल-मन्त्रे तेंहो करेन सेवन ॥

१४८॥

वल्लभ भट्ट भगवान् कृष्ण की बाल रूप की पूजा किया करते थे। इसलिए उन्हें बालगोपाल मन्त्र की दीक्षा मिली थी और वे इसी रूप में भगवान् की पूजा करते थे।"

पण्डितेर सने तार मन फिरि' गेल । किशोर-गोपाल-उपासनाय मन दिल ॥

१४९॥

। गदाधर पण्डित की संगति से उनका मन बदल गया और उन्होंने किशोर गोपाल की पूजा में अपने मन को समर्पित कर दिया।"

पण्डितेर ठाञि चाहे मन्त्रादि शिखिते ।। पण्डित कहे,–‘एइ कर्म नहे आमा हैते ॥

१५०॥

। वल्लभ भट्ट गदाधर पण्डित से दीक्षा लेना चाहते थे, किन्तु गदाधर पण्डित ने यह कहकर मना कर दिया, ‘मेरे लिए गुरु के रूप में कार्य करना सम्भव नहीं है।"

आमि--परतन्त्र, आभार प्रभु–गौरचन्द्र ।।ताँर आज्ञा विना आमि ना हइ 'स्वतन्त्र' ॥

१५१॥

मैं पूरी तरह से परतन्त्र हूँ। मेरे प्रभु तो गौरचन्द्र श्री चैतन्य महाप्रभु हैं। मैं उनके आदेश के बिना स्वतन्त्र रूप से कुछ भी नहीं कर सकता।"

तुमि ग्रे आमार ठाजि कर आगमन ।।ताहातेइ प्रभु मोरे देन ओलाहन’ ॥

१५२॥

। हे वल्लभ भट्ट, मेरे यहाँ आपका आना श्री चैतन्य महाप्रभु को पसन्द नहीं है। इसलिए कभी-कभी वे मुझे दण्डित करने के लिए बोलते रहते हैं।"

एइ-मत भट्टर कथेक दिन गेल ।। शेषे ग्रदि प्रभु तारे सुप्रसन्न हैल ॥

१५३॥

निमन्त्रणेर दिने पण्डिते बोलाइला ।।स्वरूप, जगदानन्द, गोविन्दे पाठाइला ॥

१५४॥

इस तरह कुछ दिन बीत गये और जब अन्त में श्री चैतन्य महाप्रभु वल्लभ भट्ट पर प्रसन्न हुए, तो उन्होंने उनका निमन्त्रण स्वीकार कर लिया। तब महाप्रभु ने स्वरूप दामोदर, जगदानन्द पण्डित तथा गोविन्द को। गदाधर पण्डित को बुलाने के लिए भेजा।।"

पथे पण्डितेरे स्वरूप कहेन वचन ।।परीक्षिते प्रभु तोमारे कैला उपेक्षण ॥

१५५॥

रास्ते में स्वरूप दामोदर ने गदाधर पण्डित से कहा, ‘श्री चैतन्य महाप्रभु तुम्हारी परीक्षा लेना चाहते थे। इसीलिए उन्होंने तुम्हारी उपेक्षा की है।"

तुमि केने आसि' ताँरै ना दिला ओलाहन?।भीत-प्राय हा काँहे करिला सहन?’ ॥

१५६॥

तुमने पलटकर उनकी उलाहना क्यों नहीं की? तुमने डरकर उनकी आलोचना क्यों सह ली? पण्डित कहेन,—प्रभु स्वतन्त्र सर्वज्ञ-शिरोमणि ।ताँर सने हठ' करि,—भाल नाहि मानि ॥

१५७॥

गदाधर पण्डित ने कहा, “भगवान् श्री चैतन्य महाप्रभु पूर्णतया स्वतन्त्र हैं। वे सर्वोच्च सर्वज्ञ पुरुष हैं। मेरे लिए शोभा नहीं देता कि मैं उनके बराबर बनकर उनसे बात करता।"

ग्रेइ कहे, सेइ सहि निज-शिरे धरि' ।आपने करिबेन कृपा गुण-दोष विचारि’ ॥

१५८॥

वे जो भी कहते हैं, उसे मैं शिरोधार्य करके सहन कर सकता हूँ। वे मेरे गुण तथा दोषों पर विचार करके स्वयं ही मुझ पर कृपालु होंगे।"

एत बलि' पण्डित प्रभुर स्थाने आइला ।।रोदन करिया प्रभुर चरणे पड़िला ॥

१५९॥

यह कहकर गदाधर पण्डित श्री चैतन्य महाप्रभु के पास गये और रोते हुए उनके चरणकमलों पर गिर पड़े।"

ईषत् हासिया प्रभु कैला आलिङ्गन ।।सबारे शुनाञा कहेन मधुर वचन ॥

१६० ॥

। कुछ-कुछ हँसते हुए महाप्रभु ने उनका आलिंगन किया और उनसे मधुर वचन कहे, जिससे अन्य लोग भी सुन सकें।"

आमि चालाइलें तोमा, तुमि ना चलिला ।।क्रोधे किछु ना कहिला, सकल सहिला ॥

१६१॥

। महाप्रभु ने कहा, ‘मैं तुम्हें उत्तेजित करना चाहता था, किन्तु तुम उत्तेजित नहीं हुए। निस्सन्देह, क्रोध में तुमने कुछ नहीं कहा; प्रत्युत तुमने सब सह लिया।"

आमार भङ्गीते तोमार मन ना चलिला ।। सुदृढ़ सरल-भावे आमारे किनिला’ ॥

१६२॥

। तुम्हारा मन मेरी युक्तियों से विचलित नहीं हुआ। प्रत्युत तुम अपनी सरलता में दृढ़ बने रहे। इस तरह तुमने मुझे खरीद लिया है।"

पण्डितेर भाव-मुद्रा कहन ना ग्राय ।। ‘गदाधर-प्राण-नाथ' नाम हैल ग्राय ॥

१६३॥

कोई भी व्यक्ति गदाधर पण्डित की भाव-भंगिमाओं तथा प्रेम का वर्णन नहीं कर सकता। इसलिए श्री चैतन्य महाप्रभु का दूसरा नाम ‘गदाधर प्राणनाथ' अर्थात् 'गदाधर पण्डित के प्राण' है।"

पण्डिते प्रभुर प्रसाद कहन ना ग्राय ।।‘गदाइर गौराङ्ग' बलि' याँरे लोके गाये ॥

१६४॥

। कोई कह नहीं सकता कि महाप्रभु गदाधर पण्डित पर कितने कृपालु हैं, किन्तु लोग महाप्रभु को गदाइर गौरांग अर्थात् “गदाधर पण्डित के गौरांग महाप्रभु’ के रूप में जानते हैं।"

चैतन्य-प्रभुर लीला के बुझिते पारे? ।।एक-लीलाय वहे गङ्गार शत शत धारे ॥

१६५ ॥

कोई भी श्री चैतन्य महाप्रभु की लीलाओं को समझ नहीं सकता। वे गंगा के समान हैं, क्योंकि उनकी एक लीला से ही सैकड़ों हजारों शाखाएँ बहती हैं।"

पण्डितेर सौजन्य, ब्रह्मण्यता-गुण ।।दृढ़ प्रेम-मुद्रा लोके करिला ख्यापन ॥

१६६॥

गदाधर पण्डित अपने सौम्य आचरण, अपने ब्राह्मण गुणों तथा श्री चैतन्य महाप्रभु के प्रति अपने दृढ़ प्रेम के लिए सारे जगत् में विख्यात हैं।"

अभिमान-पङ्क धुजा भट्टेरे शोधिला ।।सेइ-द्वारा आर सब लोके शिखाइला ॥

१६७॥

। महाप्रभु ने मिथ्या गर्व के कीचड़ को साफ करके वल्लभ भट्ट को शुद्ध किया। ऐसे कार्यों से महाप्रभु ने अन्यों को भी शिक्षा दी।"

अन्तरे 'अनुग्रह,' बाह्ये 'उपेक्षार प्राय' ।।बाह्यार्थ येइ लय, सेइ नाश ग्राय ॥

१६८॥

। वस्तुतः श्री चैतन्य महाप्रभु अपने हृदय के भीतर सदैव कृपालु रहते, किन्तु कभी-कभी वे अपने भक्तों की बाह्य रूप से उपेक्षा करते थे। अतः हमें उनके बाह्य लक्षणों में ही नहीं लगे रहना चाहिए, क्योंकि यदि हम ऐसा करेंगे, तो हमारा विनाश हो जायेगा।"

निगूढ़ चैतन्य-लीला बुझिते कार शक्ति? ।सेइ बुझे, गौरचन्द्रे याँर दृढ़ भक्ति ॥

१६९॥

। श्री चैतन्य महाप्रभु की लीलाएँ अगाध हैं। इन्हें कौन समझ सकता है? केवल वही इन लीलाओं को समझ सकता है, जिसकी उनके चरणकमलों में दृढ़ एवं अगाध भक्ति होती है।"

दिनान्तरे पण्डित कैल प्रभुर निमन्त्रण ।प्रभु ताहाँ भिक्षा कैल ला निज-गण ॥

१७०॥

। अन्य दिन गदाधर पण्डित ने श्री चैतन्य महाप्रभु को भोजन पर बुलाया। महाप्रभु ने अपने संगियों सहित उनके घर पर भोजन किया।"

ताहाङि वल्लभ-भट्ट प्रभुर आज्ञा लैल ।। पण्डित-ठात्रि पूर्व-प्रार्थित सब सिद्धि हैल ॥

१७१॥

वहीं पर वल्लभ भट्ट ने श्री चैतन्य महाप्रभु से अनुमति ली और गदाधर पण्डित से दीक्षा लेने की उनकी इच्छा पूरी हुई।"

एइ त कहिलें वल्लभ-भट्टर मिलन ।। ग्राहार श्रवणे पाय गौर-प्रेम-धन ॥

१७२॥

। इस तरह मैंने वल्लभ भट्ट से महाप्रभु की भेंट का वर्णन किया। इस घटना को सुनकर श्री चैतन्य महाप्रभु के प्रति प्रेम का धन प्राप्त हो सकता श्री-रूप-रघुनाथ-पदे यार आश ।।चैतन्य-चरितामृत कहे कृष्णदास ॥

१७३ ॥

श्री रूप तथा श्री रघुनाथ के चरणकमलों की वन्दना करते हुए तथा उनकी कृपा की सदैव कामना करते हुए उनके चरणचिह्नों पर चलकर मैं कृष्णदास श्री चैतन्य चरितामृत का वर्णन कर रहा हूँ।"

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