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अध्याय आठ: रामचन्द्र पुरी भगवान की आलोचना करते हैं

तं वन्दे कृष्ण-चैतन्यं रामचन्द्र-पुरी-भयात् ।।लौकिकाहारतः स्वं यो भिक्षान्नं समकोचयत् ॥

१॥

। मैं उन श्री चैतन्य महाप्रभु को सादर नमस्कार करता हूँ, जिन्होंने रामचन्द्र पुरी की आलोचना से डरकर अपना भोजन करना कम कर दिया।"

जय जय श्री-चैतन्य करुणा-सिन्धु-अवतार ।ब्रह्मा-शिवादिक भजे चरण याँहार ॥

२॥

। करुणा के सागर श्री चैतन्य महाप्रभु की जय हो! उनके चरणकमलों की पूजा ब्रह्माजी तथा शिवजी जैसे देवता तक करते हैं।"

जय जय अवधूत-चन्द्र नित्यानन्द ।।जगत् बाँधिल ग्रेह दिया प्रेम-फाँद ॥

३॥

महानतम अवधूत श्री नित्यानन्द प्रभु की जय हो, जिन्होंने भगवद् प्रेम की गाँठ से सारे जगत् को बाँध दिया।"

जय जय अद्वैत ईश्वर अवतार ।। कृष्ण अवतारि' कैल जगत् निस्तार ॥

४॥

पूर्ण पुरुषोत्तम भगवान् के अवतार श्री अद्वैत प्रभु की जय हो! उन्होंने कृष्ण को अवतरित कराया और इस तरह सम्पूर्ण जगत् का उद्धार किया।"

जय जय श्रीवासादि ग्रत भक्त-गण ।। श्री-कृष्ण-चैतन्य प्रभु–याँर प्राण-धन ॥

५॥

श्रीवास ठाकुर इत्यादि समस्त भक्तों की जय हो! श्रीकृष्ण चैतन्य महाप्रभु उन सबके प्राण एवं जीवन हैं।"

एई-मत गौरचन्द्र निज-भक्त-सङ्गे।। नीलाचले क्रीड़ा करे कृष्ण-प्रेम-तरङ्गे ॥

६॥

। इस तरह श्री चैतन्य महाप्रभु ने जगन्नाथपुरी में निजी भक्तों के साथ कृष्ण-प्रेम की तरंगों में विविध लीलाएँ सम्पन्न कीं।"

हेन-काले रामचन्द्र-पुरी-गोसाजि आइला ।परमानन्द-पुरीरे आर प्रभुरे मिलिला ॥

७॥

तभी रामचन्द्र पुरी गोसांइ नामक एक संन्यासी परमानन्द पुरी तथा श्री चैतन्य महाप्रभु से मिलने आया।"

परमानन्द-पुरी कैल चरण वन्दन ।पुरी-गोसाजि कैल तौरै दृढ़ आलिङ्गन ॥

८॥

। परमानन्द पुरी ने रामचन्द्रपुरी के चरणों की वन्दना की और रामचन्द्र पुरी ने उनका गाढ़ आलिंगन किया।"

महाप्रभु कैला ताँरै दण्डवत् नति ।।आलिङ्गन करि' तेंहो कैल कृष्ण-स्मृति ॥

९॥

श्री चैतन्य महाप्रभु ने भी रामचन्द्र पुरी को नमस्कार किया, जिसने महाप्रभु का आलिंगन किया और इस तरह कृष्ण का स्मरण किया।"

तिन-जने इष्ठ-गोष्ठी कैला कत-क्षण ।जगदानन्द-पण्डित ताँरै कैला निमन्त्रण ॥

१०॥

इन तीनों ने कुछ समय तक कृष्ण के विषय में बातें कीं और तब जगदानन्द पण्डित ने आकर रामचन्द्र पुरी को निमन्त्रण दिया।"

जगन्नाथेर प्रसाद आनिला भिक्षार लागिया ।।ग्रथेष्ट भिक्षा करिला तेंहो निन्दार लागिया ॥

११॥

अधिक मात्रा में जगन्नाथ जी का प्रसाद वितरित करने के लिए लाया गया। रामचन्द्र पुरी ने डटकर भोजन किया, किन्तु उसके बाद वह जगदानन्द पण्डित के दोष हूँढना चाहता था।"

भिक्षा करि' कहे पुरी,_’शुन, जगदानन्द ।।अवशेष प्रसाद तुमि करह भक्षण’ ॥

१२॥

। भोजन कर लेने के बाद रामचन्द्र पुरी ने अनुरोध किया, ‘प्रिय जगदानन्द, जरा सुनो तो। तुम इस बचे हुए भोजन को खा लो।"

आग्रह करिया ताँरे वसि' खाओयाइल ।।आपने आग्रह करि' परिवेशन कैल ॥

१३॥

रामचन्द्र पुरी ने अत्यन्त उत्सुकतापूर्वक जगदानन्द पण्डित को बैठाया और उन्हें स्वयं प्रसाद परोसा।।"

आग्रह करिया पुनः पुनः खाओयाइल ।।आचमन कैले निन्दा करिते लागिल ॥

१४॥

बारम्बार अनुरोध करके रामचन्द्र पुरी ने उन्हें खूब खिलाया, किन्तु जब जगदानन्द हाथ-मुँह धो चुके, तो रामचन्द्र पुरी उनकी आलोचना करने लगा।"

शुनि, चैतन्य-गण करे बहुत भक्षण ।।‘सत्य' सेइ वाक्य, साक्षात् देखिलँ एखन ॥

१५॥

। उसने कहा, ‘मैंने सुना है कि श्री चैतन्य महाप्रभु के अनुयायी आवश्यकता से अधिक खाते हैं। अब मैंने प्रत्यक्ष देख लिया है कि यह सच है।"

सन्यासीरे एत खाओयजा करे धर्म नाश ।।वैरागी हा एत खाय, वैराग्येर नाहि 'भास’ ॥

१६॥

संन्यासी को अत्यधिक खिलाने से उसके नियम भंग हो जाते हैं, क्योंकि जब संन्यासी अत्यधिक भोजन करता है, तो उसका वैराग्य नष्ट हो जाता है।

एइ त' स्वभाव ताँर आग्रह करिया ।। पिछे निन्दा करे, आगे बहुत खाओयाजा ॥

१७॥

रामचन्द्र पुरी का स्वभाव था कि वह पहले किसी को आवश्यकता से अधिक खिलाता था और बाद में उसकी आलोचना करता था।

पूर्वे ग्रबे माधवेन्द्र करेन अन्तर्धान । रामचन्द्र-पुरी तबे आइला ताँर स्थान ॥

१८॥

इसके पहले जब माधवेन्द्र पुरी अन्तिम साँसें गिन रहे थे, तब रामचन्द्र-पुरी उनके स्थान पर आया।

पुरी-गोसाबि करे कृष्ण-नाम-सङ्कीर्तन ।। ‘मथुरा ना पाइनु' बलि' करेन क्रन्दन ॥

१९ ॥

माधवेन्द्र पुरी कृष्ण के पवित्र नाम का कीर्तन कर रहे थे और कभीकभी रो रहे थे, ‘हे प्रभु, मुझे मथुरा में शरण नहीं मिली।

रामचन्द्र-पुरी तबे उपदेशे ताँरै ।।शिष्य हा गुरुके कहे, भय नाहि करे ॥

२०॥

तब रामचन्द्र पुरी इतना मूर्ख था कि उसने निडर होकर अपने गुरु को उपदेश देने का दुस्साहस किया।

तुमि-पूर्ण-ब्रह्मानन्द, करह स्मरण ।।ब्रह्मवित् हा केने करह रोदन?’ ॥

२१॥

उसने कहा, ‘यदि आप दिव्य आनन्द को प्राप्त हैं, तो आपको अब केवल ब्रह्म का स्मरण करना चाहिए। आप क्यों रो रहे हैं? शुनि' माधवेन्द्र-मने क्रोध उपजिल ।। ‘दूर, दूर, पापिष्ठ' बलि' भर्त्सना करिल ॥

२२॥

यह उपदेश सुनकर माधवेन्द्र पुरी अत्यधिक क्रुद्ध हुए और, ‘निकल जा, रे पापी!’ कहकर उसको डाँटा।

‘कृष्ण ना पाइनु, ना पाइनु 'मथुरा' ।।आपन-दुःखे मरों—एइ दिते आइल ज्वाला ॥

२३॥

हे भगवान् कृष्ण! मैं न तो आपके पास और न ही आपके धाम मथुरा पहुँच पाया। मैं अपने दुःख में मर रहा हूँ और उस पर यह मूढ़ अब मुझे और पीड़ा देने आया है।

मोरे मुख ना देखाबि तुइ, ग्राओ ग्रथि-तथि ।तोरे देखि' मैले मोर हबे असद्गति ॥

२४॥

तुम मुझे अपना मुँह मत दिखाओ! तुम अन्यत्र जहाँ कहीं जाना चाहो, चले जाओ। यदि मैं तुम्हारा मुँह देखते हुए मरूँगा, तो मुझे जीवन । को गन्तव्य प्राप्त नहीं हो सकेगा।

कृष्ण ना पाइनु मुबि मरों आपनार दु:खे ।मोरे ‘ब्रह्म' उपदेशे एई छार मूर्ख ॥

२५॥

मैं कृष्ण की शरण पाये बिना मर रहा हूँ, इसलिए मैं अत्यधिक दुःखी हूँ। अब यह गर्हित मूर्ख मुझे ब्रह्म के विषय में उपदेश देने आया एइ ग्रे श्री-माधवेन्द्र श्रीपाद उपेक्षा करिल ।। सेइ अपराधे ईंहार'वासना' जन्मिल ॥

२६॥

। इस तरह रामचन्द्र पुरी को माधवेन्द्र पुरी ने तिरस्कृत कर दिया। अपने अपराध के कारण उसके भीतर धीरे-धीरे भौतिक इच्छा उदित हुई।

शुष्क-ब्रह्म-ज्ञानी, नाहि कृष्णेर 'सम्बन्ध' ।। सर्व लोक निन्दा करे, निन्दाते निर्बन्ध ॥

२७॥

। जो व्यक्ति शुष्क तर्कवितर्क में लगा रहता है, उसका कृष्ण से कोई सम्बन्ध नहीं रहता। उसका कार्य वैष्णवों की आलोचना करना रह जाता है। इस तरह वह आलोचना करने में लगा रहता है।

ईश्वर-पुरी गोसाञि करे श्रीपाद-सेवन ।। स्वहस्ते करेन मल-मूत्रादि मार्जन ॥

२८॥

। श्री चैतन्य महाप्रभु के गुरु ईश्वर पुरी ने अपने हाथों से माधवेन्द्र पुरी का मलमूत्र साफ करके उनकी सेवा की।

निरन्तर कृष्ण-नाम कराय स्मरण । कृष्ण-नाम, कृष्ण-लीला शुनाय अनुक्षण ॥

२९॥

ईश्वर पुरी सदैव माधवेन्द्र पुरी को भगवान् कृष्ण का पवित्र नाम तथा उनकी लीलाएँ सुनाते थे। इस तरह उन्होंने माधवेन्द्र पुरी को तिरोधान के समय भगवान् कृष्ण के नाम तथा लीलाओं का स्मरण कराने में सहायता की।

तुष्ट ही पुरी ताँरे कैला आलिङ्गन ।।वर दिला--‘कृष्णे तोमार हउक प्रेम-धन' ॥

३० ॥

। ईश्वर पुरी से प्रसन्न होकर माधवेन्द्र पुरी ने उनका आलिंगन किया और यह वर दिया कि वे कृष्ण के महान् भक्त तथा प्रेमी होंगे।

सेइ हैते ईश्वर-पुरी–‘प्रेमेर सागर' ।।रामचन्द्र-पुरी हैल सर्व-निन्दाकर ॥

३१॥

। इस तरह ईश्वर पुरी कृष्ण-प्रेम के सागर के तुल्य बन गये, जबकि रामचन्द्र पुरी शुष्क चिन्तक तथा हर एक का आलोचक बना।

महदनुग्रह-निग्रहेर 'साक्षी' दुइ-जने ।।एइ दुइ-द्वारे शिखाइला जग-जने ॥

३२॥

ईश्वर पुरी को माधवेन्द्र पुरी का आशीर्वाद प्राप्त हुआ, जबकि रामचन्द्र पुरी को उनकी डाँट मिली। इसलिए ये दो व्यक्ति-ईश्वर पुरी तथा रामचन्द्र पुरी-महापुरुष के आशीर्वाद तथा दण्ड के पात्र होने के दृष्टान्त हैं। माधवेन्द्र पुरी ने ये दो दृष्टान्त प्रस्तुत करके सारे जगत् को शिक्षा दी।

जगद्गुरु माधवेन्द्र करि' प्रेम दान ।।एइ श्लोक पड़ि' तेंहो कैल अन्तर्धान ॥

३३॥

इस तरह समस्त संसार के गुरु, श्रीपाद माधवेन्द्र पुरी ने कृष्ण-प्रेम का दान किया। इस भौतिक जगत् से विदा लेते समय उन्होंने निम्नलिखित श्लोक का उच्चारण किया।

हृदयं त्वदलोक-कातरंदयित भ्राम्यति किं करोम्यहम् ॥

३४॥

। “हे प्रभु! हे दीनदयाल स्वामी! हे मथुरापति! मैं कब आपको फिर से देसुँगी? आपको न देख पाने के कारण मेरा क्षुब्ध हृदय अस्थिर हो चुका है। हे मेरे परम प्रिय, मैं अब क्या करूँ? ।

एइ श्लोके कृष्ण-प्रेम करे उपदेश ।कृष्णेर विरहे भक्तेर भाव-विशेष ॥

३५॥

इस श्लोक में माधवेन्द्र पुरी यह शिक्षा देते हैं कि किस तरह कृष्णप्रेम प्राप्त किया जाए। कृष्ण से विरह में व्यक्ति आध्यात्मिक पद को प्राप्त होता है।

पृथिवीते रोपण करि' गेला प्रेमाङ्कर ।सेइ प्रेमाङ्कुरेर वृक्ष–चैतन्य-ठाकुर ॥

३६॥

अनवाद श्री माधवेन्द्र पुरी ने इस भौतिक जगत् में कृष्ण-प्रेम का बीज बोया और तब विदा ली। वही बीज बाद में श्री चैतन्य महाप्रभु के रूप में विशाल वृक्ष बन गया।

प्रस्तावे कहिलँ पुरी-गोसाजिर निर्माण । ।येइ इहा शुने, सेइ बड़ भाग्यवान् ॥

३७॥

संयोगवश मैंने माधवेन्द्र पुरी के तिरोधान का वर्णन किया है। जो भी इसे सुनता है, उसे अत्यन्त भाग्यशाली माना जाना चाहिए।

रामचन्द्र-पुरी ऐछे रहिला नीलाचले ।।विरक्त स्वभाव, कभु रहे कोन स्थले ॥

३८॥

इस तरह रामचन्द्र पुरी जगन्नाथ पुरी में ठहरा रहा। जैसाकि संन्यासियों में प्रथा है, कभी वे किसी स्थान पर रहते और फिर वहाँ से चले जाते।

अनिमन्त्रण भिक्षा करे, नाहिक निर्णय । अन्येर भिक्षार स्थितिर लयेन निश्चय ॥

३९॥

इसका कोई निश्चय नहीं रहता था कि रामचन्द्र पुरी कहाँ भोजन करेगा, क्योंकि वह अनिमन्त्रित होने पर भी ऐसा करता था। तो भी वह इस बात को सुनिश्चत करने में बहुत सतर्क रहता कि अन्य लोग कैसे भोजन करते हैं।

प्रभुर निमन्त्रणे लागे कौड़ि चारि पण ।।कभु काशीश्वर, गोविन्द खान तिन जन ॥

४०॥

श्री चैतन्य महाप्रभु को निमन्त्रित करने में ३२० कौड़ियाँ व्यय होतीं। इससे श्री चैतन्य महाप्रभु तथा कभी-कभी काशीश्वर और गोविन्द इन तीनों का भोजन हो जाता।।

प्रत्यह प्रभुर भिक्षा इति-उति हय ।केह ग्रदि मूल्य आने, चारि-पण-निर्णय ॥

४१॥

महाप्रभु नित्य अलग-अलग स्थानों में भोजन करते और यदि कोई भोजन का मूल्य चुकता करना चाहता, तो उसका मूल्य केवल चार पण निश्चित था।

प्रभुर स्थिति, रीति, भिक्षा, शयन, प्रयाण । रामचन्द्र-पुरी करे सर्वानुसन्धान ॥

४२॥

रामचन्द्र पुरी सभी तरह की सूचनाएँ एकत्र करने में लगा रहता कि श्री चैतन्य महाप्रभु कहाँ पर हैं, उनके नियम क्या हैं, वे कहाँ भोजन करते हैं, कहाँ सोते और कहाँ-कहाँ आते जाते हैं।

प्रभुर ग्रतेक गुण स्पर्शिते नारिल ।। छिद्र चाहि' बुले, काँहा छिद्र ना पाइल ॥

४३॥

चूंकि रामचन्द्र पुरी केवल दोष निकालने में लगा रहता, इसलिए वह श्री चैतन्य महाप्रभु के दिव्य गुणों को नहीं समझ सका। उसका एकमात्र कार्य दोष निकालना था, किन्तु फिर भी उसे कोई दोष नहीं मिल पाया।

‘सन्यासी हल्ला करे मिष्टान्न भक्षण ।।एइ भोगे हय कैछे इन्द्रिय-वारण'? ॥

४४॥

। अन्त में उसने एक दोष हूंढ निकाला। उसने कहा, “भला एक संन्यासी इतनी तरह की मिठाइयाँ कैसे खा सकता है? यदि वह मिठाइयाँ खाता है, तो उसके लिए इन्द्रियों को वश में रखना अत्यन्त कठिन होगा।

एइ निन्दा करि' कहे सर्व-लोक-स्थाने ।।प्रभुरे देखितेह अवश्य आइसे प्रति-दिने ॥

४५॥

। इस तरह रामचन्द्र पुरी सबके समक्ष महाप्रभु की निन्दा करता, किन्तु तो भी वह नित्यप्रति नियमपूर्वक महाप्रभु के दर्शनार्थ आता।

प्रभु गुरु-बुद्ध्ये करेन सम्भ्रम, सम्मान । तेहो छिद्र चाहि' बुले,–एइ तार काम ॥

४६॥

जब वे दोनों मिलते, तो महाप्रभु उसे गुरु के गुरुभाई मानते हुए नमस्कार करते। किन्तु रामचन्द्र पुरी का कार्य महाप्रभु के दोषों को ढूँढना रहता।

ग्रत निन्दा करे ताहा प्रभु सब जाने ।तथापि आदर करे बड़इ सम्भ्रमे ॥

४७॥

श्री चैतन्य महाप्रभु जानते थे कि रामचन्द्र पुरी सबके समक्ष उनकी आलोचना करता है, किन्तु जब भी वह महाप्रभु से भेंट करने आता, तो महाप्रभु उसका सभी प्रकार से सम्मान करते।

एक-दिन प्रातः-काले आइला प्रभुर घर ।पिपीलिका देखि' किछु कहेन उत्तर ॥

४८॥

एक दिन रामचन्द्र पुरी प्रातःकाल श्री चैतन्य महाप्रभु के स्थान पर आया। बहुत सी चींटियाँ देखकर महाप्रभु की आलोचना करने की दृष्टि से उसने कुछ कहा।"

रात्रावत्र ऐक्षवमासीत्, तेन पिपीलिकाः सञ्चरन्ति । अहो! विरक्तानां सन्यासिनामियमिन्द्रियलालसेति ब्रुवन्नुत्थाय गतः ॥

४९॥

उसने कहा, गत रात्रि में यहाँ मिश्री थी, इसलिए यहाँ पर चींटियाँ घूम रही हैं। हाय, यह विरक्त संन्यासी ऐसी इन्द्रियतृप्ति में आसक्त है! इस तरह कहकर वह उठा और चला गया।

प्रभु परम्पराय निन्दा कैराछेन श्रवण ।।एबे साक्षात् शुनिलेन ‘कल्पित' निन्दन ॥

५०॥

श्री चैतन्य महाप्रभु ने रामचन्द्र पुरी द्वारा की जाने वाली निन्दा की अफवाहें तो सुन रखी थीं, किन्तु अब तो उन्होंने उसके मनगढंत आरोपों को प्रत्यक्ष सुना।

सहजेइ पिपीलिका सर्वत्र बेड़ाय । ताहाते तर्क उठात्रा दोष लागाय ॥

५१॥

चींटियाँ सामान्यतया यहाँ, वहाँ तथा सर्वत्र घूमती रहती हैं, किन्तु रामचन्द्र पुरी तो काल्पनिक दोष की ताक में था, अतएव उसने यह आरोप लगाते हुए महाप्रभु की आलोचना की कि उनके कमरे में मिठाइयाँ रही होंगी।

शुनि' ताहा प्रभुर सङ्कोच-भय मने ।। गोविन्दे बोला किछु कहेन वचने ॥

५२॥

यह आलोचना सुनने के बाद महाप्रभु को संशय तथा भय हुआ। इसलिए उन्होंने गोविन्द को बुलाकर इस प्रकार आदेश दिया।

आजि हैते भिक्षा आमार एइ त' नियम ।।पिण्डा-भोगेर एक चौठि, पाँच-गण्डार व्यञ्जन ॥

५३॥

आज से यह नियम होगा कि मैं जगन्नाथजी के प्रसाद का एक चौथाई मात्र तथा पाँच गण्डा मूल्य की सब्जियाँ ग्रहण किया करूंगा।

इहा बइ अधिक आर किछु ना आनिबा।।अधिक आनिले आमा एथा ना देखिबा’ ॥

५४॥

यदि तुम इससे अधिक कुछ भी लाये, तो तुम मुझे यहाँ नहीं देखोगे।"

सकल वैष्णवे गोविन्द कहे एइ बात् ।।शुनि' सबार माथे प्रैछे हैल वज्राघात ॥

५५॥

गोविन्द ने यह सूचना सारे भक्तों को पहुँचा दी। जब उन्होंने इसे सुना, तो उन्हें लगा कि उनके सिरों पर वज्रपात हो गया है।

रामचन्द्र-पुरीके सबाय देय तिरस्कार ।‘एइ पापिष्ठ आसि' प्राण लइल सबार' ॥

५६॥

सारे भक्तों ने यह कहकर रामचन्द्र पुरी को धिक्कारा, “यह पापी व्यक्ति यहाँ आया हुआ है और इसने हमारे प्राण ले लिये हैं।"

सेइ-दिन एक-विप्र कैल निमन्त्रण । एक-चौठि भात, पाँच-गण्डार व्यञ्जन ॥

५७॥

एइ-मात्र गोविन्द कैल अङ्गीकार ।माथाय घा मारे विप्र, करे हाहाकार ॥

५८॥

उस दिन एक ब्राह्मण ने श्री चैतन्य महाप्रभु को निमन्त्रण दिया। जब गोविन्द ने केवल पाँच गण्डा मूल्य की सब्जियाँ तथा अन्नपात्र का एक चौथाई अन्न स्वीकार किया, तो उस ब्राह्मण ने निराशावश अपना माथा पीटा और चिल्लाया, “हाय! हाय! सेइ भात-व्यञ्जन प्रभु अर्धेक खाइल ।। ये किछु रहिल, ताहा गोविन्द पाइल ॥

५९॥

श्री चैतन्य महाप्रभु ने आधा चावल तथा आधी सब्जियाँ ही खाईं और जो बचा रहा, उसे गोविन्द ने ग्रहण किया।

अर्धाशन करेन प्रभु, गोविन्द अर्धाशन ।। सब भक्त-गण तबे छाड़िल भोजन ॥

६०॥

इस तरह श्री चैतन्य महाप्रभु तथा गोविन्द आधापेट भोजन करते। इसके कारण अन्य सारे भक्तों ने भोजन करना त्याग दिया।

गोविन्द-काशीश्वरे प्रभु कैला आज्ञापन । ‘मुँहे अन्यत्र मागि' कर उदर भरण' ॥

६१॥

श्री चैतन्य महाप्रभु ने गोविन्द तथा काशीश्वर को आज्ञा दी, “तुम दोनों अपना पेट भरने के लिए अन्यत्र भिक्षा ग्रहण कर सकते हो।"

एइ-रूप महा-दुःखे दिन कत गेल । शुनि' रामचन्द्र-पुरी प्रभु-पाश आइल ।। ६२ ॥

इस तरह से कुछ दिन अतीव दुःख में बीते। यह सब सुनकर रामचन्द्र पुरी श्री चैतन्य महाप्रभु के पास गया।

प्रणाम करि' प्रभु कैला चरण वन्दन । प्रभुरे कहये किछु हासिया वचन ॥

६३॥

श्री चैतन्य महाप्रभु ने रामचन्द्र पुरी के चरणों की पूजा करके उसे नमस्कार किया। तब वह हँसा और महाप्रभु से बोला।

सन्यासीर धर्म नहे 'इन्द्रिय-तर्पण' । ग्रैछे तैछे करे मात्र उदर भरण ॥

६४॥

। रामचन्द्र पुरी ने परामर्श दिया, “यह संन्यासी का कर्तव्य नहीं है कि वह अपनी इन्द्रियों की तृप्ति करे। उसे तो किसी भी तरह अपना पेट भरना चाहिए।"

तोमारे क्षीण देखि, शुनि,—कर अर्धाशन ।। एइ ‘शुष्क-वैराग्य' नहे सन्यासीर 'धर्म' ॥

६५ ।। मैंने सुना है कि आपने अपना भोजन आधा कर दिया है। मैं देख रहा हूँ कि आप दुर्बल हैं। ऐसा शुष्क वैराग्य भी संन्यासी का धर्म नहीं है।

ग्रथा-स्रोग्य उदर भरे, ना करे ‘विषय' भोग ।।सन्यासीर तबे सिद्ध हय ज्ञान-योग ॥

६६॥

संन्यासी तो अपने शरीर के पालन के लिए जितना चाहिए उतना ही खाता है, किन्तु वह अपनी भौतिक इन्द्रियों की तुष्टि नहीं करता। संन्यासी इसी तरह से अपने आध्यात्मिक ज्ञान में पूर्ण बनता है।

नात्यश्नतोऽपि योगोऽस्ति न चैकान्तमनश्नतः ।। न चाति-स्वप्न-शीलस्य जाग्रतो नैव चार्जुन ॥

६७॥

युक्ताहार-विहारस्य युक्त-चेष्टस्य कर्मसु ।।युक्त-स्वप्नावबोधस्य योगो भवति दुःख-हा ॥

६८॥

[ भगवान् कृष्ण ने कहा : ‘हे अर्जुन, जो अधिक खाता है या बहुत कम खाता है, जो अधिक सोता है और बहुत स्वप्न देखता है, अथवा जो पर्याप्त नहीं सोता, उसके योगी बनने की कोई सम्भावना नहीं है। जो खाने, सोने, आमोद-प्रमोद तथा कार्य करने के अभ्यास में नियमित रहता है, वह योगाभ्यास द्वारा समस्त भौतिक क्लेशों से मुक्त रह सकता है।"

प्रभु कहे,_अज्ञ बालक मुइ 'शिष्य' तोमार । मोरे शिक्षा देह',—एइ भाग्य आमार’ ॥

६९॥

तब श्री चैतन्य महाप्रभु ने विनयपूर्वक निवेदन किया, ‘मैं एक नादान बालक के समान हैं और आपके शिष्य के समान हैं। यह मेरा बड़ा सौभाग्य है कि आप मुझे शिक्षा दे रहे हैं।"

एते शुनि' रामचन्द्र-पुरी उठि' गेला ।। भक्त-गण अर्धाशन करे,—पुरी गोसाञि शुनिला ॥

७० ॥

यह सुनकर रामचन्द्र पुरी उठा और चला गया। उसने विभिन्न स्रोतों से यह भी सुना कि श्री चैतन्य महाप्रभु के सारे भक्त आधे पेट भोजन कर रहे हैं।"

आर दिन भक्त-गण-सह परमानन्द-पुरी ।। प्रभु-पाशे निवेदिला दैन्य-विनय करि' ॥

७१॥

अगले दिन, परमानन्द पुरी तथा अन्य भक्त अत्यन्त दीनता तथा विनयपूर्वक श्री चैतन्य महाप्रभु के पास पहुँचे।"

रामचन्द्र-पुरी हय निन्दुक-स्वभाव । तार बोले अन्न छाड़ि' किबा हबे लाभ? ॥

७२ ॥

परमानन्द पुरी ने कहा, “मेरा गुरुभाई रामचन्द्र पुरी स्वभाव से बुरा आलोचक है। यदि आप उसके शब्दों के कारण भोजन करना त्यागते हैं, तो इससे क्या लाभ होगा? पुरीर स्वभाव,—ग्रथेष्ट आहार कराञा ।ने ना खाय, तारे खाओयाय ग्नतन करिया ॥

७३॥

यह तो रामचन्द्र पुरी का स्वभाव है कि वह पहले किसी को पेट भर खाने देता है और यदि कोई आवश्यकता से अधिक नहीं खाता, तो बड़े यत्न से वह उसे खिलाकर रहता खाओयाञा पुनः तारे करये निन्दन ।।‘एत अन्न खाओ, तोमार कत आछे धन? ॥

७४॥

‘इस तरह वह किसी को भी आवश्यकता से अधिक खिलाता है। और तब प्रत्यक्ष आलोचना करता है कि, तुम इतना अधिक खाते हो। तुम्हारे खजाने में कितना धन है? सन्यासीके एत खाओयाजा कर धर्म नाश! ।। अतएव जानिनु,—तोमार किछु नाहि भास' ॥

७५॥

। 'यही नहीं, संन्यासियों को इतना अधिक खिलाकर तुम उनके धर्म का विनाश करते हो। इसलिए मैं समझ सकता हूँ कि तुममें कोई उन्नति नहीं है।'" के कैछे व्यवहारे, केबा कैछे खाय ।। एइ अनुसन्धान तेंहो करय सदाय ॥

७६ ॥

यह तो रामचन्द्र पुरी का धंधा बन चुका है कि वह सदैव अन्यों के बारे में पूछताछ करता रहता है कि वे किस तरह खाते हैं और नित्य प्रति किस तरह का व्यवहार करते हैं।"

शास्त्रे येइ दुइ धर्म कैराछे वर्जन ।। सेइ कर्म निरन्तर ईंहार करणे ॥

७७॥

शास्त्रों में जिन दो प्रकार के कर्मों का निषेध हुआ है, वे ही उसके नित्य कर्म हैं।"

पर-स्वभाव-कर्माणि न प्रशंसेन्न गर्हयेत् ।।विश्वमेकात्मकं पश्यन्प्रकृत्या पुरुषेण च ॥

७८ ॥

“मनुष्य को यह देखना चाहिए कि भौतिक प्रकृति तथा जीव के संयोग के फलस्वरूप यह ब्रह्माण्ड स्वभाव से कार्यशील है। इसलिए अन्यों के स्वभावों या कर्मों की न तो प्रशंसा करनी चाहिए, न आलोचना।'" तार मध्ये पूर्व-विधि ‘प्रशंसा' छाड़िया ।।पर-विधि 'निन्दा' करे ‘बलिष्ठ' जानिया ॥

७९॥

इन दो नियमों में से रामचन्द्र पुरी प्रशंसा करना छोड़कर पहले नियम का पालन करता है, किन्तु यह जानते हुए भी कि दूसरा नियम अधिक प्रमुख है, वह अन्यों की आलोचना करके उसकी उपेक्षा कर देता है।

पूर्व-परयोर्मध्ये पर-विधिर्बलवान् ॥

८०॥

“पहले के और बाद के नियमों में से बाद का नियम ही अधिक महत्त्वपूर्ण है।"

ग्राहाँ गुण शत आछे, ताहा ना करे ग्रहण । गुण-मध्ये छले करे दोष-आरोपण ॥

८१॥

एक आलोचक सैकड़ों अच्छे गुणों के होने पर भी उन पर विचार नहीं करता। प्रत्युत वह किसी न किसी चाल से उन गुणों में दोष निकाल लेता है।

इँहार स्वभाव इहाँ करिते ना नुयाय ।।तथापि कहिये किछु मर्म-दुःख पाय ॥

८२॥

। इसलिए किसी को रामचन्द्र पुरी के सिद्धान्तों का अनुगमन नहीं करना चाहिए। तो भी मुझे उसके विरुद्ध कुछ कहना पड़ रहा है, क्योंकि वह हमारे हृदयों को दुःखी कर रहा है।

इँहार वचने केने अन्न त्याग कर? ।।पूर्ववत् निमन्त्रण मान',—सबार बोल धर ॥

८३॥

। आपने रामचन्द्र पुरी की आलोचना के कारण ठीक से भोजन करना क्यों छोड़ दिया है? कृपया पहले की तरह निमन्त्रण स्वीकार करें। यही हम सबकी प्रार्थना है।"

प्रभु कहे,_सबे केने पुरीरे कर रोष?।।'सहज' धर्म कहे तेंहो, ताँर किबा दोष? ॥

८४॥

। श्री चैतन्य महाप्रभु ने उत्तर दिया, “आप सब लोग रामचन्द्र पुरी से रुष्ट क्यों हैं? वे संन्यास जीवन के स्वाभाविक सिद्धान्तों को बता रहे हैं। आप लोग उन्हें क्यों दोष दे रहे हैं? ग्रति हजा जिह्वा-लाम्पट्य–अत्यन्त अन्याय ।।यतिर धर्म,—प्राण राखिते आहार-मात्र खाय ॥

८५॥

एक संन्यासी के लिए जिह्वा की तुष्टि में लगना महान् अपराध है। संन्यासी का कर्तव्य है कि जितना शरीर और आत्मा को एक साथ रखने के लिए आवश्यक हो, उतना ही खाना चाहिए।"

तबे सबे मेलि' प्रभुरे बहु ग्रन कैला ।। सबार आग्रहे प्रभु अर्धेक राखिला ॥

८६॥

सबने मिलकर अनुनय-विनय की कि श्री चैतन्य महाप्रभु पूरा भोजन किया करें, तो भी महाप्रभु वैसा करने के लिए राजी नहीं हुए। प्रत्युत उन्होंने पहले का आधा ग्रहण करना स्वीकार करके उनके अनुरोध का । उत्तर दिया।"

दुइ-पण कौड़ि लागे प्रभुर निमन्त्रणे ।।कभु दुइ-जन भोक्ता, कभु तिन-जने ॥

८७॥

श्री चैतन्य महाप्रभु को निमन्त्रण देने के लिए आवश्यक भोजन का मूल्य दो पण कौड़ियाँ ( १६० कौड़ियाँ) निश्चित की गई और उस भोजन को दो व्यक्ति, तो कभी-कभी तीन व्यक्ति खाया करते।"

अभोज्यान्न विप्र यदि करेन निमन्त्रण ।।प्रसाद-मूल्य लइते लागे कौड़ि दुइ-पण ॥

८८॥

। यदि ऐसा ब्राह्मण निमन्त्रण देता, जिसके घर का निमन्त्रण स्वीकार नहीं किया जा सकता था, तो उसे प्रसाद खरीदने के लिए दो पण कौड़ियाँ देनी होती थीं।

भोज्यान्न विप्र यदि निमन्त्रण करे।किछु 'प्रसाद' आने, किछु पाक करे घरे ॥

८९॥

। जब ऐसा ब्राह्मण निमन्त्रण देता, जिसके घर का निमन्त्रण स्वीकार किया जा सकता था, तो वह ब्राह्मण प्रसाद का कुछ अंश खरीदता और शेष को अपने घर में तैयार करता।"

पण्डित-गोसान्नि, भगवानाचार्य, सार्वभौम ।। निमन्त्रणेर दिने यदि करे निमन्त्रण ॥

९०॥

ताँ-सबार इच्छाय प्रभु करेन भोजन ।।ताहाँ प्रभुर स्वातन्त्र्य नाइ, ग्रैछे ताँर मन ॥

९१॥

यदि किसी दिन श्री चैतन्य महाप्रभु को भोजन करने का निमन्त्रण अन्यों के यहाँ से मिला रहता और यदि गदाधर पण्डित, भगवान् आचार्य या सार्वभौम भट्टाचार्य उन्हें निमन्त्रण देते, तो श्री चैतन्य महाप्रभु को तनिक भी छूट नहीं रहती थी। वे उनकी इच्छानुसार उनको निमन्त्रण स्वीकार कर लेते।।

भक्त-गणे सुख दिते प्रभुर 'अवतार' ।ग्राहाँ भैछे स्रोग्य, ताहाँ करेन व्यवहार ॥

९२॥

श्री चैतन्य महाप्रभु का अवतार वस्तुतः भक्तों को सुख देने के लिए हुआ। इसीलिए समय तथा परिस्थिति के उपयुक्त उन्होंने व्यवहार किया।"

कभु लौकिक रीति,—ग्रेन 'इतर' जन ।कभु स्वतन्त्र, करेन 'ऐश्वर्य' प्रकटन ॥

९३॥

पूर्ण स्वतन्त्र होने के कारण श्री चैतन्य महाप्रभु कभी सामान्य व्यक्ति की तरह आचरण करते और कभी अपना ईश्वरीय ऐश्वर्य प्रकट करते।"

कभु रामचन्द्र-पुरीर हय भृत्य-प्राय । ।कभु तारे नाहि माने, देखे तृण-प्राय ॥

९४॥

वे कभी रामचन्द्र पुरी को अपना स्वामी मानते और अपने आपको उसका सेवक, तो कभी वे उसकी परवाह न करके उसे तिनके जैसा तुच्छ मानते।"

ईश्वर-चरित्र प्रभुर—बुद्धिर अगोचर ।ग्रबे येइ करेन, सेइ सब–मनोहर ॥

९५॥

। श्री चैतन्य महाप्रभु पूर्ण पुरुषोत्तम भगवान् जैसा ही आचरण करते, जो किसी की भी बुद्धि की सीमा के परे होता। उन्होंने जो चाहा सो किया, किन्तु उनके सारे कार्य अतीव सुन्दर होते थे।"

एइ-मत रामचन्द्र-पुरी नीलाचले ।। दिन कत रहि' गेला 'तीर्थ' करिबारे ॥

९६॥

इस प्रकार रामचन्द्र पुरी कुछ दिनों तक नीलाचल (जगन्नाथ पुरी ) में रहा। फिर वह विभिन्न तीर्थस्थानों की यात्रा करने चला गया।"

तेंहो गेले प्रभुर गण हैल हरषित ।।शिरेर पाथर ग्रेन पड़िल आचम्बित ॥

९७॥

। भक्तगण रामचन्द्र पुरी को अपने सिर के भारी बोझ के समान मानते थे। अतएव जब वह जगन्नाथ पुरी से चला गया, तो वे अपने आपको अत्यन्त सुखी अनुभव करने लगे, मानो उनके सिर से भारी पत्थर का बोझ भूमि पर गिर गया हो।

स्वच्छन्दे निमन्त्रण, प्रभुर कीर्तन-नर्तन ।।स्वच्छन्दे करेन सबे प्रसाद भोजन ॥

९८॥

उसके चले जाने के बाद सब लोग पुनः सुखी हुए। श्री चैतन्य महाप्रभु सदा की तरह निमन्त्रण स्वीकार करने लगे और सामूहिक कीर्तन तथा नृत्य का नेतृत्व करने लगे। हर कोई बिना रोक-टोक प्रसाद स्वीकार करने लगा।"

गुरु उपेक्षा कैले, ऐछे फल हय ।।क्रमे ईश्वर-पर्यन्त अपराधे ठेकय ॥

९९ ॥

यदि किसी का गुरु उसका तिरस्कार कर देता है, तो वह इतना पतित हो जाता है कि रामचन्द्र पुरी की तरह वह पूर्ण पुरुषोत्तम भगवान् के प्रति भी अपराध करता है।"

यद्यपि गुरु-बुद्ध्ये प्रभु तार दोष ना लइल ।।तार फल-द्वारा लोके शिक्षा कराइल ।। १००॥

। श्री चैतन्य महाप्रभु ने रामचन्द्र पुरी के अपराधों पर विचार नहीं किया, क्योंकि वे उसे अपना गुरु मानते थे। किन्तु उसके चरित्र ने हर एक को गुरु का अपमान करने के परिणाम के विषय में शिक्षा दी।

चैतन्य-चरित्र—ग्रेन अमृतेर पूर ।। शुनिते श्रवणे मने लागये मधुर ॥

१०१॥

श्री चैतन्य महाप्रभु का चरित्र अमृत से पूर्ण है। उसके विषय में सुनना कान तथा मन को अच्छा लगता है।

चैतन्य-चरित्र लिखि, शुन एक-मने ।। अनायासे पाबे प्रेम श्री कृष्ण-चरणे ॥

१०२॥

मैं श्री चैतन्य महाप्रभु के चरित्र के विषय में लिख रहा हूँ। हे पाठकों, कृपया ध्यान से इसे सुनो, क्योंकि इससे तुम श्रीकृष्ण के चरणकमलों में परमानन्दमय प्रेम सरलता से प्राप्त कर सकोगे।

श्री-रूप-रघुनाथ-पदे यार आश ।। चैतन्य-चरितामृत कहे कृष्णदास ॥

१०३॥

श्री रूप तथा श्री रघुनाथ के चरणकमलों की वन्दना करते हुए तथा सदैव उनकी कृपा की कामना करते हुए उनके चरणचिह्नों पर चलकर मैं कृष्णदास श्री चैतन्य चरितामृत का वर्णन कर रहा हूँ।"

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