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अध्याय नौ: गोपीनाथ पतननायक का उद्धार

अगण्य-धन्य-चैतन्य-गणानां प्रेम-वन्यया ।निन्येऽधन्य-जन-स्वान्त-मरुः शश्वदनूपताम् ॥

१॥

श्री चैतन्य महाप्रभु के असंख्य गौरवान्वित अनुयायियों ने अभागे जनों के मरुस्थल जैसे हृदयों में भावमय प्रेम की बाढ़ ला दी।

जय जय श्री कृष्ण-चैतन्य दयामय । जय जय नित्यानन्द करुण-हृदय ॥

२॥

सर्वाधिक कृपालु अवतार श्रीकृष्ण चैतन्य महाप्रभु की जय हो! भगवान् नित्यानन्द की जय हो, जिनका हृदय सदैव करुणापूरित रहता है! जयाद्वैताचार्य जय जय दयामय । जय गौर-भक्त-गण सब रसमय ॥

३ ॥

श्री अद्वैत आचार्य की जय हो, जो अत्यन्त दयामय हैं! श्री चैतन्य महाप्रभु के सारे भक्तों की जय हो, जो दिव्य आनन्द से सदैव अभिभूत रहते हैं।

एइ-मत महाप्रभु भक्त-गण-सङ्गे।। नीलाचले वास करेन कृष्ण-प्रेम-रङ्गे ॥

४॥

इस तरह अपने निजी भक्तों के साथ सदैव कृष्ण-प्रेम में निमग्न श्री चैतन्य महाप्रभु नीलाचल ( जगन्नाथ पुरी) में रहे।

अन्तरे-बाहिरे कृष्ण-विरह-तरङ्ग । नाना-भावे व्याकुल प्रभुर मन आर अङ्ग ॥

५॥

श्री चैतन्य महाप्रभु सदैव बाहर तथा भीतर से कृष्ण-वियोग की तरंगों का अनुभव करते रहते थे। उनका मन तथा शरीर सदैव विभिन्न आध्यात्मिक विकारों से क्षुब्ध रहता था।

दिने नृत्य-कीर्तन, जगन्नाथ-दरशन । राये राय-स्वरूप-सने रस-आस्वादन ॥

६॥

दिन में वे कीर्तन करते, नृत्य करते और मन्दिर में भगवान जगन्नाथ का दर्शन करते थे। रात में वे रामानन्द राय तथा स्वरूप दामोदर के साथ दिव्य आनन्द का आस्वादन करते थे।

त्रिजगतेर लोक आसि' करेन दरशन । ग्रेइ देखे, सेइ पाय कृष्ण-प्रेम-धन ॥

७॥

तीनों लोकों से लोग श्री चैतन्य महाप्रभु का दर्शन करने आते थे। जो भी उन्हें देखता, वह कृष्ण-प्रेम को दिव्य धन प्राप्त करता था।

मनुष्येर वेशे देव-गन्धर्व-किन्नर ।। सप्त-पातालेर व्रत दैत्य विषधर ॥

८॥

सातों उच्चतर लोकों के निवासी जिनमें देवता, गन्धर्व तथा किन्नर सम्मिलित थे तथा सातों अधोलोकों (पाताल लोक ) के निवासी, जिनमें असुर तथा सर्प सम्मिलित थे, मनुष्य के वेश में श्री चैतन्य महाप्रभु का दर्शन करने आते थे।

सप्त-द्वीपे नव-खण्डे वैसे व्रत जन । नाना-वेशे आसि' करे प्रभुर दरशन ॥

९॥

सात द्वीप तथा नौ खण्ड़ों से लोग विभिन्न वेशों में श्री चैतन्य महाप्रभु का दर्शन करने आते थे।

प्रह्लाद, बलि, व्यास, शुक आदि मुनि-गण ।आसि' प्रभु देखि' प्रेमे हय अचेतन ॥

१०॥

प्रह्लाद महाराज, बलि महाराज, श्रील व्यासदेव, शुकदेव गोस्वामी तथा अन्य अनेक बड़े-बड़े मुनि श्री चैतन्य महाप्रभु का दर्शन करने आते। उनके दर्शन पाकर वे कृष्ण-प्रेम में अचेत हो जाते।

बाहिरे फुकारे लोक, दर्शन ना पाजा ।।‘कृष्ण कह' बलेन प्रभु बाहिरे आसिया ॥

११॥

श्री चैतन्य महाप्रभु को न देख सकने के कारण जनता उनके कमरे के बाहर तुमुल ध्वनि करती। इस तरह श्री चैतन्य महाप्रभु बाहर आते और उनसे कहते, हरे कृष्ण का कीर्तन करो।

प्रभुर दर्शने सब लोक प्रेमे भासे ।। एइ-मत ग्राय प्रभुर रात्रि-दिवसे ॥

१२॥

सभी तरह के लोग महाप्रभु का दर्शन करने आते और उन्हें देखने के बाद वे कृष्ण-प्रेम में विभोर हो जाते। इस तरह श्री चैतन्य महाप्रभु अपने दिन और रातें व्यतीत करते रहे।

एक-दिन लोक आसि' प्रभुरे निवेदिल ।। गोपीनाथेरे ‘बड़ जाना' चाङ्गे चड़ाइल ॥

१३॥

एक दिन सहसा लोग श्री चैतन्य महाप्रभु के पास आये और उन्हें बतलाया कि, भवानन्द राय के पुत्र गोपीनाथ पट्टनायक को राजा के ज्येष्ठ पुत्र बड़जाना ने मृत्यु-दण्ड दे दिया है और उसे चाँग पर चढ़ा दिया गया है।

तले खड्ग पाति' तारे उपरे डारिबे ।। प्रभु रक्षा करेन ग्रबे, तबे निस्तारिबे ॥

१४॥

उन्होंने बतलाया कि, बड़-जाना ने चबूतरे के नीचे तलवारें लगा दी हैं, जिन पर गोपीनाथ को फेंक दिया जायेगा। हे प्रभु, यदि आप रक्षा करें तभी वह बच सकता है।

सवंशे तोमार सेवक-भवानन्द-राय ।।ताँर पुत्र तोमार सेवके राखिते झुयाय ॥

१५॥

भवानन्द राय तथा उनका सारा परिवार आपके सेवक हैं। इसलिए यह सर्वथा उपयुक्त होगा कि आप भवानन्द राय के पुत्र को बचा लें।

प्रभु कहे,–'राजा केने करये ताड़न?' । तबे सेइ लोक कहे सब विवरण ॥

१६॥

श्री चैतन्य महाप्रभु ने पूछा, “राजा उसे क्यों दण्ड दे रहा है? इस पर लोगों ने सारी घटना कह सुनाई।

गोपीनाथ-पट्टनायक रामानन्द-भाइ । सर्व-काल हय तेंह राज-विषयी ॥

१७॥

उन्होंने कहा, रामानन्द राय का भाई गोपीनाथ पट्टनायक सदा से सरकार का खजांची रहा है।

‘मालजाठ्या-दण्डपाटे' तार अधिकार । साधि' पाड़ि' आनि' द्रव्य दिल राज-द्वार ॥

१८॥

वह मालजाळ्या दण्डपाट नामक स्थान में नौकरी करता था, वहीं वह संग्रह कर धन (राजस्व) एकत्र करता था और उसे सरकारी खजाने में जमा करता था।

दुइ-लक्ष काहन तार ठात्रि बाकी ह-इल । दुइ-लक्ष काहन कौड़ि राजा त' मागिल ॥

१९॥

एक बार जब उसने एकत्र की गई राशि जमा की, तो दो लाख काहन कौड़ियाँ उस पर बकाया रह गई। इसलिए राजा ने वह राशि माँगी।

तेह कहे,–स्थूल-द्रव्य नाहि ये गणि' दिब ।क्रमे-क्रमे वेचि' किनि' द्रव्य भरिब ॥

२०॥

गोपीनाथ पट्टनायक ने उत्तर दिया, 'मेरे पास धन नहीं कि मैं आपको तुरन्त नकद दे सकें। कृपया मुझे कुछ समय दीजिये। मैं धीरे-धीरे अपना सामान बेचकर आपके खजाने में यह राशि जमा कर दूंगा।

घोड़ा दश-बार हय, लह' मूल्य करि” ।एत बलि’ घोड़ा आने राज-द्वारे धरि' ॥

२१॥

“मेरे पास दस-बारह अच्छे घोड़े हैं। आप उन्हें उचित मूल्य पर तुरन्त ले लें।' यह कहकर वह सारे घोड़े राजा के द्वार पर ले आया।

एक राज-पुत्र घोड़ार मूल्य भाल जाने ।तारे पाठाइल राजा पात्र-मित्र सने ॥

२२॥

राजकुमारों में से एक यह जानता था कि घोड़ों का ठीक से मूल्य कैसे आँका जाता है। इसलिए राजा ने उसे अपने मन्त्रियों तथा मित्रों के साथ आने के लिए बुला भेजा।

सेइ राज-पुत्र मूल्य करे घाटामा ।गोपीनाथेर क्रोध हैल मूल्य शुनिया ॥

२३॥

किन्तु उस राजकुमार ने जानबूझकर घोड़ों के मूल्य का अनुमान घटा दिया। जब गोपीनाथ पट्टनायक ने लगाया हुआ मूल्य सुना, तो वह अत्यधिक क्रुद्ध हुआ।

सेइ राज-पुत्रेर स्वभाव,—ग्रीवा फिराय ।। ऊर्ध्व-मुखे बार-बार इति-उति चाय ॥

२४॥

उस राजकुमार को अपनी गर्दन घुमाने तथा आकाश की ओर ताकने की तथा बार-बार इधर-उधर देखने की आदत थी।

तारे निन्दा करि' कहे सगर्व वचने । राजा कृपा करे ताते भय नाहि माने ॥

२५ ॥

गोपीनाथ पट्टनायक ने उस राजकुमार की आलोचना की। वह उस राजकुमार से भयभीत नहीं था, क्योंकि राजा उस पर अत्यन्त दयालु रहता था।

‘आमार घोड़ा ग्रीवा ना फिराय ऊर्ध्व नाहि चाय ।ताते घोड़ार मूल्य घाटि करिते ना ग्रुयाय' ॥

२६॥

गोपीनाथ पट्टनायक ने कहा, 'मेरे घोड़े कभी अपनी गर्दन नहीं मोड़ते या ऊपर नहीं देखते। इसलिए उनके मूल्य कम नहीं किये जाने चाहिए।'

शुनि' राजपुत्र-मने क्रोध उपजिल ।।राजार ठात्रि ग्राइ' बहु लागानि करिल ॥

२७॥

यह आलोचना सुनकर राजकुमार अत्यन्त क्रुद्ध हुआ। राजा के पास आकर उसने गोपीनाथ पट्टनायक के विरुद्ध कुछ झूठे आरोप लगाये।

कौड़ि नाहि दिबे एइ, बेड़ाय छद्म करि' ।आज्ञा देह ग्रदि,-चाङ्गे चड़ाञा ल-इ कौड़ि' ॥

२८॥

उसने कहा, 'यह गोपीनाथ पट्टनायक बकाया लौटाना नहीं चाहता। उल्टे वह बहाना करके उसे बुरी तरह से लुटा रहा है। यदि आप आदेश जारी कर दें, तो मैं उसे चाँग पर चढ़ाकर उससे धन वसूल कर सकता हूँ।

राजा बले,–ग्रेइ भाल, सेइ केर ग्राय ।। ये उपाये कौड़ि पाइ, कर से उपाय ॥

२९॥

राजा ने उत्तर दिया, 'तुम जिस उपाय को सर्वश्रेष्ठ समझो, वही अपनाओ। तुम जिस भी उपाय से धन संग्रह कर सको वही उचित है।'

राज-पुत्र आसि' तारे चाङ्गे चड़ाइल । खड़ग-उपरे फेलाइते तले खड़ग पातिल ॥

३०॥

इस तरह राजकुमार लौट गया, उसने गोपीनाथ पट्टनायक को चाँग के चबूतरे पर चढ़ा दिया और उसके नीचे तलवारें फैला दीं, जिन पर उसे फेंका जाना था।

शुनि' प्रभु कहे किछु करि' प्रणय-रोष ।।राज-कौड़ि दिते नारे, राजार किबा दोष? ॥

३१॥

इस विवरण को सुनकर श्री चैतन्य महाप्रभु ने स्नेहमय क्रोध से उत्तर दिया। महाप्रभु ने कहा, गोपीनाथ पट्टनायक राजा को धन नहीं लौटाना चाहता, तो फिर उसे दण्डित करने में राजा को क्या दोष है? राज-विलात्साधि' खाय, नाहि राज-भय । दारी-नाटुयारे दिया करे नाना व्यय ॥

३२॥

गोपीनाथ पट्टनायक सरकार की ओर से धन संग्रह करने का भार लिये हुए है, किन्तु वह इसका दुरुपयोग करता है। वह राजा से डरे बिना नर्तकी युवतियों को देखने में धन लुटा देता है।

येइ चतुर, सेइ कुरुक राज-विषय । राज-द्रव्य शोधि' पाय, तार करुक व्यय ॥

३३॥

यदि कोई बुद्धिमान है, तो वह सरकार की नौकरी करे और सरकारका धन चुकता करने के बाद जो धनराशि बचे, उसे वह खर्च कर सकता हेन-काले और लोक आइल धावा ।। ‘वाणीनाथादि सवंशे लञा गेल बान्धिया' ॥

३४॥

उसी समय एक अन्य व्यक्ति शीघ्र यह सन्देश लेकर आया कि वाणीनाथ राय सपरिवार बन्दी बना लिया गया है।

प्रभु कहे,–राजा आपने लेखार द्रव्य ल-इब ।। आमि—विरक्त सन्यासी, ताहे कि करिब? ॥

३५॥

श्री चैतन्य महाप्रभु ने कहा, राजा निश्चित रूप से स्वयं बकाया धनराशि संग्रह करेगा। मैं तो मात्र एक वैरागी संन्यासी हूँ। मैं क्या कर सकता हूँ? तबे स्वरूपादि ग्रत प्रभुर भक्त-गण। प्रभुर चरणे सबे कैला निवेदन ॥

३६॥

तभी स्वरूप दामोदर गोस्वामी इत्यादि सारे भक्त श्री चैतन्य महाप्रभु के चरणकमलों पर गिर पड़े और सबों ने निम्नलिखित याचना की।

रामानन्द-रायेर गोष्ठी, सब—तोमार 'दास' । तोमार उचित नहे ऐछन उदास ॥

३७॥

रामानन्द राय के परिवार के सारे सदस्य आपके सनातन सेवक हैं। अब वे संकट में हैं। आपके लिए इस तरह से उनके प्रति उदासीन रहना उचित नहीं है।

शुनि' महाप्रभु कहे सक्रोध वचने । मोरे आज्ञा देह' सबे, प्राङराज-स्थाने! ॥

३८॥

यह सुनकर श्री चैतन्य महाप्रभु क्रुद्ध मुद्रा में बोले-तुम लोग मुझे आज्ञा देना चाहते हो कि मैं राजा के पास जाऊँ।

तोमा-सबार एइ मत, राज-ठात्रि ग्राजा । कौड़ि मागि' लङ्मुञि आँचल पातिया ॥

३९ ॥

तुम लोगों का मत है कि मैं राजा के महल में जाऊँ और उससे धन माँगने के लिए अपना वस्त्र फैलाऊँ।

पाँच-गण्डार पात्र हय सन्यासी ब्राह्मण । मागिले वा केने दिबे दुइ-लक्ष काहन? ॥

४०॥

निस्सन्देह, एक संन्यासी या ब्राह्मण पाँच गण्डे तक माँग सकता है, किन्तु उसे दो लाख काहन कौड़ियों की अनुपयुक्त राशि क्यों दी जाय? हेन-काले और लोक आइल धा ।। खड़ेगर उपरे गोपीनाथे दितेछे डारिया ॥

४१॥

तब एक अन्य व्यक्ति यह समाचार लेकर आया कि गोपीनाथ को तलवारों की नोकों पर फेंकने के लिए पूरी प्रस्तुति हो गई है।

शुनि' प्रभुर गण प्रभुरे करे अनुनय ।। प्रभु कहे,–आमि भिक्षुक, आमा हैते किछु नय ॥

४२॥

यह समाचार सुनकर सारे भक्तों ने फिर से महाप्रभु से याचना की, किन्तु महाप्रभु ने उत्तर दिया, मैं तो एक भिक्षुक हूँ। इस विषय में कुछ भी करना मेरे लिए सम्भव नहीं है।

ताते रक्षा करिते यदि हय सबार मने । सबे मेलि' जानाह जगन्नाथेर चरणे ॥

४३॥

इसलिए यदि तुम लोग उसे बचाना चाहते हो, तो तुम सबों को मिलकर भगवान जगन्नाथ के चरणकमलों पर प्रार्थना करनी चाहिए।

ईश्वर जगन्नाथ,—याँर हाते सर्व 'अर्थ' ।।कर्तुमकर्तुमन्यथा करिते समर्थ ॥

४४॥

भगवान् जगन्नाथ पूर्ण पुरुषोत्तम भगवान् हैं। उनमें सारी शक्तियाँ हैं। इसलिए वे स्वतन्त्र होकर कर्म कर सकते हैं और जो चाहें बना सकते हैं या बिगाड़ सकते हैं।

इहाँ यदि महाप्रभु एतेक कहिली ।हरिचन्दन-पात्र ग्राइ' राजारे कहिला ॥

४५ ॥

जब श्री चैतन्य महाप्रभु ने इस प्रकार उत्तर दिया, तब हरिचन्दन पात्र नामक एक अधिकारी ने राजा के पास जाकर यह कहा।

गोपीनाथ-पट्टनायक–सेवक तोमार ।।सेवकेर प्राण-दण्ड नहे व्यवहार ॥

४६॥

उसने कहा, गोपीनाथ पट्टनायक आपका आज्ञाकारी सेवक है। एक सेवक को प्राणदण्ड देना उचित आचरण नहीं है।

विशेष ताहार ठात्रि कौड़ि बाकी हय ।।प्राण निले किबा लाभ? निज धन-क्षय ॥

४७॥

उसका इतना ही दोष है कि उस पर सरकार का कुछ बकाया है। किन्तु यदि उसे मार डाला जाता है, तो इससे क्या लाभ होगा? यथार्थ मूल्ये घोड़ा लह, ग्रेबा बाकी हय ।।क्रमे क्रमे दिबे, व्यर्थ प्राण केने लय ॥

४८॥

अच्छा यह होगा कि घोड़ों को उचित मूल्य पर ले लिया जाय औरशेष राशि उसे धीरे-धीरे चुकता करने दिया जाय। आप उसे व्यर्थ क्यों प्राणदण्ड दे रहे हैं? राजा कहे,–एइ बात् आमि नाहि जानि ।।प्राण केने ल-इब, तार द्रव्य चाहि आमि ॥

४९॥

राजा ने आश्चर्यपूर्वक उत्तर दिया, मैं इसके बारे में कुछ नहीं जानता। उसके प्राण क्यों लिये जायें? मैं तो उससे केवल धन चाहता हूँ।

तुमि ग्राइ' कर ताहाँ सर्व समाधान ।द्रव्य ग्रैछे आइसे, आर रहे तार प्राण ॥

५०॥

वहाँ जाओ और सब कुछ व्यवस्थित कर लो। मैं तो द्रव्य चाहता हूँ, उसके प्राण नहीं।

तबे हरिचन्दन आसि' जानारे कहिल ।। चाङ्गे हैते गोपीनाथे शीघ्र नामाइल ॥

५१॥

तब हरिचन्दन लौट आया और राजकुमार को राजा की इच्छा बतलाई। गोपीनाथ पट्टनायक को तुरन्त ही चाँग से उतार लिया गया।

'द्रव्य देह' राजा मागे—उपाय पुछिल ।।‘यथार्थ-मूल्ये घोड़ा लह', तेह त’ कहिले ॥

५२॥

तब उसे बताया गया कि राजा ने उससे बकाया राशि की माँग की है और पूछा गया कि वह चुकता करने के लिए कौन सा उपाय करेगा। उसने उत्तर दिया, कृपया उचित मूल्य पर मेरे घोड़े ले लीजिये।

‘क्रमे क्रमे दिमु, आर ग्रत किछु पारि ।अविचारे प्राण लह,—कि बलिते पारि?' ॥

५३॥

मैं धीरे-धीरे शेष राशि चुकता कर दूंगा। किन्तु आप बिना विचार किये मेरे प्राण लेने जा रहे थे। भला मैं क्या कह सकता हूँ? यथार्थ मूल्य करि' तबे सब घोड़ा ल-इल ।। आर द्रव्येर मुद्दती करि' घरे पाठाइल ॥

५४॥

तब सरकार ने उचित मूल्य पर सारे घोड़े ले लिये, शेष राशि चुकाने के लिए समय निर्धारित कर दिया गया और गोपीनाथ पट्टनायक को मुक्त कर दिया गया।

एथा प्रभु सेइ मनुष्येरे प्रश्न कैल।। वाणीनाथ कि करे, ग्रबे बान्धिया आनिल? ॥

५५॥

श्री चैतन्य महाप्रभु ने सन्देशवाहक से पूछा, जब वाणीनाथ को बन्दी बनाकर वहाँ लाया गया, तब वह क्या कर रहा था? से कहे- वाणीनाथ निर्भये लय कृष्ण-नाम ।‘हरे कृष्ण, हरे कृष्ण' कहे अविश्राम ॥

५६॥

सन्देशवाहक ने उत्तर दिया, वह निर्भय होकर लगातार महामन्त्र का-हरे कृष्ण, हरे कृष्ण, कृष्ण कृष्ण, हरे हरे। हरे राम, हरे राम, राम राम, हरे हरे को-कीर्तन कर रहा था।

सङ्ख्या लागि' दुइ-हाते अङ्गुलीते लेखा ।सहस्रादि पूर्ण हैले, अङ्गे काटे रेखा ॥

५७॥

उसने दोनों हाथों की अंगुलियों पर जप की गिनती की और जब वह एक हजार बार जप पूरा कर लेता, तो वह अपने शरीर पर एक चिह्न बना लेता।

शुनि' महाप्रभु है-इला परम आनन्द ।के बुझिते पारे गौरेर कृपा-छन्द-बन्ध? ॥

५८॥

यह समाचार सुनकर महाप्रभु अतीव प्रसन्न हुए। भला अपने भक्त पर महाप्रभु की कृपा को कौन समझ सकता है? हेन-काले काशी-मिश्र आइला प्रभु-स्थाने ।प्रभु ताँरे कहे किछु सोद्वेग-वचने ॥

५९॥

उसी समय काशी मिश्र श्री चैतन्य महाप्रभु के आवास पर आये और महाप्रभु उनसे कुछ उद्वेग के साथ बातें करते रहे।

इहाँ रहिते नारि, ग्रामु आलालनाथ । नाना उपद्रव इहाँ, ना पाइ सोयाथ ॥

६०॥

महाप्रभु ने कहा, अब मैं यहाँ और अधिक नहीं ठहर सकता। मैं आलालनाथ जाऊँगा । यहाँ पर अनेक उपद्रव होते रहते हैं और मैं तनिक भी विश्राम नहीं कर पाता।

भवानन्द-रायेर गोष्ठी करे राज-विषय ।नाना-प्रकारे करे तारा राज-द्रव्य व्यय ॥

६१॥

भवानन्द राय के परिवार के सारे सदस्य सरकारी नौकरी में लगे हैं, किन्तु वे सरकारी धन का व्यय नाना प्रकार से करते हैं।

राजार कि दोष? राजा निज-द्रव्य चाय । दिते नारे द्रव्य, दण्ड आमारे जानाय ॥

६२॥

राजा का इसमें क्या दोष है? वह तो सरकार का धन चाहता है। किन्तु जब वे सरकार को जो देय है चुकता नहीं करते, तो दण्डित होते हैं, और वे मेरे पास छुड़वाने के लिए आते हैं।

राजा गोपीनाथे यदि चाङ्गे चड़ाइल । चारि-बारे लोके आसि' मोरे जानाइल ॥

६३॥

जब राजा ने गोपीनाथ पट्टनायक को चाँग पर चढ़ाया, तो सन्देशवाहक मुझे इस घटना के विषय में बताने के लिए चार बार आये।

भिक्षुक सन्यासी आमि निर्जन-वासी । आमाय दुःख देय, निज-दुःख कहि' आसि' ॥

६४॥

मैं भिक्षुक संन्यासी के रूप में एकान्त स्थान में अकेला रहना चाहता हूँ, किन्तु ये लोग अपना दुःख मुझे बताने चले आते हैं और मुझे क्षुब्ध करते हैं।

आजि तारे जगन्नाथ करिला रक्षण। कालि के राखिबे, यदि ना दिबे राज-धन? ॥

६५॥

आज जगन्नाथ जी ने उसे एक बार मृत्यु से बचा लिया है, किन्तु यदि कल वह पुनः खजाने की बकाया राशि को नहीं चुकता, तो उसे कौन संरक्षण देगा? विषयीर वार्ता शुनि' क्षुब्ध हय मन ।ताते इहाँ रहि' मोर नाहि प्रयोजन ॥

६६॥

यदि मैं भौतिकतावादी व्यक्तियों के कार्यों के विषय में सुनता हूँ, तो मेरा मन क्षुब्ध हो उठता है। यहाँ पर मेरे रुकने तथा इस तरह से क्षुब्ध होने की कोई आवश्यकता नहीं है।

काशी-मिश्र कहे प्रभुर धरिया चरणे ।।तुमि केने एइ बाते क्षोभ कर मने? ॥

६७॥

काशी मिश्र ने महाप्रभु के चरणकमल पकड़ लिये और कहा, आप इन बातों से क्षुब्ध क्यों होते हैं? सन्यासी विरक्त तोमार को-सने सम्बन्ध? ।।व्यवहार लागि' तोमा भजे, सेइ ज्ञान-अन्ध ॥

६८ ॥

आप विरक्त संन्यासी हैं। आपके सम्बन्ध ही क्या हैं? जो व्यक्ति किसी भौतिक उद्देश्य से आपकी पूजा करता है, वह समस्त ज्ञान के प्रति अन्धा है।

तोमार भजन-फले तोमाते ‘प्रेम-धन' ।।विषय लागि' तोमाय भजे, सेइ मूर्ख जन ॥

६९॥

काशी मिश्र ने आगे कहा, यदि आपकी तुष्टि के लिए कोई भक्ति में लगता है, तो फलस्वरूप उसमें आपके प्रति सुप्त प्रेम का अधिकाधिक उदय होगा। किन्तु यदि वह भौतिक उद्देश्यों के लिए आपकी भक्ति करता है, तो उसे पक्का मूर्ख समझना चाहिए।

तोमा लागि' रामानन्द राज्य त्याग कैला ।।तोमा लागि' सनातन 'विषय' छाड़िला ॥

७० ॥

आपके लिए ही रामानन्द राय ने दक्षिण भारत का राज्यपाल पद ( गवर्नरी) और सनातन गोस्वामी ने मन्त्री पद का परित्याग किया।

तोमा लागि' रघुनाथ सकल छाड़िल ।हेथाय ताहार पिता विषय पाठाइल ॥

७१ ॥

आपके लिए ही रघुनाथ दास ने अपने पारिवारिक सम्बन्ध त्याग दिये। उसके पिता ने उसकी सेवा के लिए यहाँ धन तथा जन भेजे थे।

तोमार चरण-कृपा हाछे ताहारे । छत्रे मागि' खाय, ‘विषय' स्पर्श नाहि करे ॥

७२॥

फिर भी चूँकि उसे आपके चरणकमलों की कृपा प्राप्त हो चुकी है, इसलिए उसने अपने पिता का धन नहीं लिया है। उल्टे वह लंगर से भीख माँगकर भोजन करता है।

रामानन्देर भाइ गोपीनाथ-महाशय ।। तोमा हैते विषय-वाञ्छा, तार इच्छा नये ॥

७३॥

गोपीनाथ पट्टनायक अच्छा भद्र व्यक्ति है। वह आपसे भौतिक लाभ की इच्छा नहीं करता।

तार दुःख देखि' तार सेवकादि-गण ।। तोमारे जानाइल,——याते 'अनन्य-शरण' ॥

७४।। यह गोपीनाथ नहीं था जिसने उन सारे व्यक्तियों को इसलिए भेजा कि आप उसे दयनीय दशा से मुक्त करा दें, प्रत्युत उसके मित्रों तथा सेवकों ने उसकी क्लेशग्रस्त अवस्था देखकर आपको सूचित किया था, क्योंकि उन सबों को ज्ञात था कि गोपीनाथ आपका शरणागत है।

सेइ 'शुद्ध-भक्त', ये तोमा भजे तोमा लागि' ।आपनार सुख-दुःखे हय भोग-भोगी' ॥

७५ ॥

गोपीनाथ पट्टनायक शुद्ध भक्त है और वह आपकी पूजा केवल आपकी तुष्टि के लिए करता है। वह अपने सुख या दुःख की तनिक भी परवाह नहीं करता, क्योंकि यह तो भौतिकतावादी का कार्य है।

तोमार अनुकम्पा चाहे, भजे अनुक्षण ।।अचिरात् मिले तौर तोमार चरण ॥

७६ ॥

जो व्यक्ति चौबीसों घण्टे आपकी सेवा में एकमात्र आपकी कृपा की कामना करते हुए लगा रहता है, वह शीघ्र ही आपके चरणकमलों की शरण प्राप्त करेगा।

तत्तेऽनुकम्पां सु-समीक्षमाणोभुञ्जान एवात्म-कृतं विपाकम् । हृद्वाग्वपुभिर्विदधन्नमस्तेजीवेत यो मुक्ति-पदे स दाय-भाक् ॥

७७ ।। जो आपकी कृपा की कामना करता है और इस तरह अपने विगत कर्मों के फलस्वरूप सारी विपरीत परिस्थितियों को सहता है, जो अपने मन, वाणी तथा शरीर से आपकी भक्ति में सदा लगा रहता है और जो आपको सदैव नमस्कार करता है, वह निश्चय ही आपका अनन्य भक्त होने के लिए सही पात्र है।

एथा तुमि वसि' रह, केने ग्राबे आलालनाथ?।।केह तोमा ना शुनाबे विषयीर बात् ॥

७८॥

आप कृपा करके यहाँ जगन्नाथपुरी में रहें। आप आलालनाथ क्यों जायें? अब से कोई भी व्यक्ति आपके पास भौतिक विषयों के लिए नहीं आयेगा।

यदि वा तोमार तारे राखिते हय मन । आजि ये राखिल, सेइ करिबे रक्षण ॥

७९॥

अन्त में काशीमिश्र ने महाप्रभु को बतलाया, यदि आप गोपीनाथ को संरक्षण प्रदान करना चाहते हैं, तो भगवान जगन्नाथ भविष्य में भी उसी तरह उसकी रक्षा करते रहेंगे, जिस प्रकार कि आज उन्होंने की है।

एत बलि' काशी-मिश्र गेला स्व-मन्दिरे । मध्याह्न प्रतापरुद्र आइला ताँर घरे ॥

८०॥

यह कहकर काशी मिश्र श्री चैतन्य महाप्रभु के स्थान से अपने मन्दिर लौट गये। दोपहर में राजा प्रतापरुद्र काशी मिश्र के घर आये।

प्रतापरुद्रेर एक आछये नियमे ।।ग्रत दिन रहे तेह श्री-पुरुषोत्तमे ॥

८१॥

जब तक राजा प्रतापरुद्र पुरुषोत्तम में रहे, उन्होंने एक कार्य नियमपूर्वक किया।

नित्य आसि' करे मिश्रेर पाद संवाहन ।।जगन्नाथ-सेवार करे भियान श्रवण ॥

८२॥

वे नित्य काशी मिश्र के घर उनके चरणकमलों को दबाने आते थे। वे उनसे यह भी सुनते कि भगवान जगन्नाथ की सेवा कितनी भव्यता से की जाती है।

राजा मिश्रेर चरण ग्रबे चापिते लागिला ।तबे मिश्र ताँरै किछु भङ्गीते कहिला ॥

८३॥

जब राजा काशी मिश्र के पाँव दबाने लगे, तब उन्होंने राजा से संकेत द्वारा कुछ बतलाया।

देव, शुन आर एक अपरूप बात्! ।।महाप्रभु क्षेत्र छाड़ि' ग्राबेन आलालनाथ! ॥

८४॥

उन्होंने कहा, हे राजन्, एक असामान्य बात सुनिये। श्री चैतन्य महाप्रभु जगन्नाथ पुरी छोड़कर आलालनाथ जाना चाहते हैं।

शुनि राजा दुःखी हैला, पुछिलेन कारण ।तबे मिश्र कहे ताँरै सब विवरण ॥

८५॥

जब राजा ने सुना कि श्री चैतन्य महाप्रभु आलालनाथ जा रहे हैं, तो वह अत्यन्त दुःखी हुआ और उसने इसका कारण पूछा। तब काशी मिश्र ने सारी बातें बताईं।

गोपीनाथ-पट्टनायके ग्रबे चाङ्गे चड़ाइला ।तार सेवक सब आसि' प्रभुरे कहिला ॥

८६॥

उन्होंने कहा, जब गोपीनाथ पट्टनायक को चांग पर चढ़ाया गया, तो उसके सारे सेवक श्री चैतन्य महाप्रभु को बताने गये।

शुनिया क्षोभित हैल महाप्रभुर मन ।।क्रोधे गोपीनाथे कैला बहुत भर्सन ॥

८७।। यह सुनकर श्री चैतन्य महाप्रभु मन में अत्यधिक दुःखी हुए और क्रोध में आकर उन्होंने गोपीनाथ पट्टनायक की भर्त्सना की।

अजितेन्द्रिय हा करे राज़-विषय ।।नाना असत् पथे करे राज-द्रव्य व्यय ॥

८८ । महाप्रभु ने कहा : चूंकि वह इन्द्रियतृप्ति के पीछे पागल रहता है, इसलिए वह सरकारी नौकर के रूप में कार्य करता है, किन्तु वह सरकारी लगान (राजस्व) का व्यय विविध पापकर्मों में करता है।

ब्रह्मस्व-अधिक एइ हय राज-धन ।ताही हरि' भोग करे महा-पापी जन ॥

८९॥

सरकारी राजस्व ब्राह्मण की सम्पत्ति से अधिक पवित्र है। जो सरकारी धन को आत्मसात् करता है और इसे इन्द्रियतृप्ति के लिए व्यवहार में लाता है, वह सबसे बड़ा पापी है।

राजार वर्तन खाय, आर चुरि करे ।।राज-दण्ड्य हय सेइ शास्त्रेर विचारे ॥

९०॥

जो व्यक्ति सरकारी नौकरी करता है, किन्तु सरकारी राजस्व की चोरी करता है, वह राजा द्वारा दण्डनीय है। यही समस्त शास्त्रों का मत है।

निज-कौड़ि मागे, राजा नाहि करे दण्ड ।।राजा–महा-धार्मिक, एइ हय पापी भण्ड! ॥

९१॥

राजा अपना राजस्व का भुगतान चाहता था। वह बलात् दण्ड देना नहीं चाहता था। इसलिए राजा अवश्य ही अत्यन्त धार्मिक है, किन्तु गोपीनाथ पट्टनायक एक बहुत बड़ा धोखेबाज है।

राजा-कड़ि ना देय, आमारे फुकारे ।एइ महा-दुःख इहाँ के सहिते पारे? ॥

९२ ।। वह राजा को राजस्व नहीं देता, किन्तु छूटने के लिए मेरी सहायता चाहता है। यह तो बहुत ही पापमय कृत्य है। यहाँ पर मैं इसे सहन नहीं कर सकता।

आलालनाथ ग्राइ' ताहाँ निश्चिन्ते रहिमु ।।विषयीर भाल मन्द वार्ता ना शुनिमु ॥

९३॥

इसलिए मैं जगन्नाथपुरी छोड़ दूंगा और आलालनाथ जाऊँगा, जहाँ मैं शान्तिपूर्वक रहूँगा और भौतिकतावादी लोगों की ये सब बातें नहीं सुनूंगा।

एत शुनि' कहे राजा पाबा मने व्यथा ।। सब द्रव्य छाड़ों, ग्रदि प्रभु रहेन एथा ॥

९४॥

जब राजा प्रतापरुद्र ने ये सारी बातें सुनीं, तो उसके मन में बहुत वेदना हुई। उसने कहा, गोपीनाथ पर जो भी बकाया है, उसे मैं छोड़ हूँगा, यदि श्री चैतन्य महाप्रभु जगन्नाथपुरी में रहें।

एक-क्षण प्रभुर ग्रदि पाइये दरशने । कोटि-चिन्तामणि-लाभ नहे तार सम ॥

९५॥

यदि क्षण भर के लिए भी श्री चैतन्य महाप्रभु से मेरा साक्षात्कार हो सके, तो मैं करोड़ों चिन्तामणियों के लाभ की भी परवाह नहीं करूंगा।

कोन् छार पदार्थ एइ दुइ-लक्ष काहन? ।। प्राण-राज्य करों प्रभु-पदे निर्मज्छन ॥

९६॥

मुझे दो लाख काहन जैसी इस छोटी राशि की परवाह नहीं है। इसकी क्या बात है, मैं तो महाप्रभु के चरणों पर अपना प्राण और राज्य समेत सर्वस्व समर्पित कर सकता हूँ।

मिश्र कहे, कौड़ि छाड़िबा,---नहे प्रभुर मन ।। तारा दुःख पाय,–एइ ना ग्राय सहन” ॥

९७॥

काशी मिश्र ने राजा को इंगित किया, महाप्रभु नहीं चाहते कि आप अपना बकाया ( प्राप्य ) छोड़ दें। वे तो मात्र इसलिए दुःखी हैं कि सारा परिवार दुःखी है।

राजा कहे,– तारे आमि दुःख नाहि दिये ।। चाङ्गे चड़ा, खडूगे डारा, आमि ना जानिये ॥

९८॥

राजा ने उत्तर दिया, मैं गोपीनाथ पट्टनायक तथा उसके परिवार को न तो दुःख देना चाहता था, न ही मुझे इसका पता था कि उसे चांग पर चढ़ाकर और तलवारों पर फेंककर मार डाला जायेगा।

पुरुषोत्तम-जानारे तेह कैल परिहास । सेइ 'जाना' तारे देखाइल मिथ्या त्रास ॥

९९ ॥

उसने पुरुषोत्तम जाना का परिहास किया। इसलिए राजकुमार ने दण्ड स्वरूप उसे त्रास देना चाहा था।

तुमि ग्राह, प्रभुरे राखह ग्रन करि'। एई मुइ ताहारे छाडिनु सब कौड़ि ॥

१००॥

आप स्वयं श्री चैतन्य महाप्रभु के पास जायें और यत्नपूर्वक उन्हेंजगन्नाथपुरी में रखें। मैं गोपीनाथ पट्टनायक का सारा कर्ज माफ कर दूंगा।

मिश्र कहे, कौड़ि छाड़िबा,-नहे प्रभुर मने ।।कौड़ि छाड़िले प्रभु कदाचित् दुःख माने ॥

१०१॥

काशी मिश्र ने कहा, गोपीनाथ पट्टनायक का कर्ज माफ कर देने से महाप्रभु दुःखी होंगे, क्योंकि यह उनको आशय नहीं है।"

राजा कहे, कौड़ि छाड़िमु,—इहा ना कहिबा ।।सहजे मोर प्रिय ता 'रा,इहा जानाइबा ॥

१०२॥

राजा ने कहा, मैं गोपीनाथ पट्टनायक का सारा ऋण समाप्त कर दूंगा, किन्तु इसकी चर्चा महाप्रभु से न करें। उन्हें केवल इतना बतलायें कि भवानन्द राय के सारे पारिवारिक जन तथा गोपीनाथ पट्टनायक मेरे प्रिय मित्र हैं।

भवानन्द-राय—आमार पूज्य-गवित ।।ताँर पुत्र-गणे आमार सहजेइ प्रीत ॥

१०३ ॥

भवानन्द राय मेरी पूजा तथा सम्मान के योग्य हैं। अतएव मैं उसके पुत्रों के प्रति सहज ही स्नेहिल हूँ।

एत बलि' मिश्रे नमस्करि' राजा घरे गेला ।गोपीनाथे 'बड़ जानाय' डाकिया आनिला ॥

१०४॥

काशी मिश्र को नमस्कार करके राजा अपने महल को चला गया। उसने गोपीनाथ और अपने ज्येष्ठ राजकुमार को बुलवाया।

राजा कहे,–सब कौड़ि तोमारे छाड़िहुँ ।।सेई मालजाठ्या दण्ड पाट तोमारे त' दिलॆ ॥

१०५ ॥

राजा ने गोपीनाथ पट्टनायक से कहा, तुम खजाने के जितने धन केऋणी हो, वह सब माफ किया जाता है और तुम्हें मालजाठ्य दण्डपाट नामक स्थान पुनः वसूली के लिए दिया जाता है।

आर बार ऐछे ना खाइह राज-धन । आजि हैते दिलॆ तोमाय द्विगुण वर्तन ॥

१०६॥

अब तुम पुनः सरकारी राजस्व का दुरुपयोग न करना। यदि तुम सोचते हो कि तुम्हारा वेतन अपर्याप्त है, तो अब से उसे दुगुना कर दिया जायेगा।

एत बलि’ ‘नेत-धटी' तारे पराइल । प्रभु-आज्ञा ला ग्राह, विदाय तोमा दिल ॥

१०७॥

यह कहकर राजा ने उसके शरीर पर एक रेशमी चादर डालकर उसे नियुक्त कर दिया। उसने कहा, श्री चैतन्य महाप्रभु के पास जाओ और उनसे आज्ञा लेकर अपने घर चले जाना। मैं तुम्हें विदा करता हूँ। अब तुम जा सकते हो।

परमार्थे प्रभुर कृपा, सेह रहु दूरे ।। अनन्त ताहार फल, के बलिते पारे? ॥

१०८॥

श्री चैतन्य महाप्रभु की कृपा से निश्चय ही आध्यात्मिक प्रगति की जा सकती है। निस्सन्देह, उनकी कृपा के फल का अनुमान कोई नहीं लगा सकता।

‘राज्य-विषय-फल एइ कृपार 'आभासे'! ।। ताहार गणना कारो मने नाहि आइसे! ॥

१०९॥

गोपीनाथ पट्टनायक ने महाप्रभु की कृपा की एक झलक मात्र से राज ऐश्वर्य का फल प्राप्त किया। इसलिए उनकी कृपा की पूरी महिमा की गणना कोई नहीं कर सकता।

काहाँ चाङ्गे चड़ा लय धन-प्राण! । काहाँ सब छाड़ि' सेइ राज्यादि-प्रदान! ॥

११०॥

कहाँ तो गोपीनाथ पट्टनायक को मारे जाने के लिए चांग पर चढ़ाया गया था और उसका सारा धन छीन लिया गया था, और कहाँ उसका सारा ऋण समाप्त कर दिया गया और उसे उसी स्थान का संग्राहक नियुक्त कर दिया गया।

काहाँ सर्वस्व वेचि' लय, देया ना ग्राय कौड़ि!। काहाँ द्विगुण वर्तन, पराय नेत-धड़ि! ॥

१११॥

कहाँ तो गोपीनाथ अपनी सारी सम्पत्ति बेचकर भी अपना बकाया चुकता नहीं कर पा रहा था, कहाँ उसका वेतन अब दुगुना हो गया और उसे रेशमी पगड़ी से सम्मानित किया गया।

प्रभुर इच्छा नाहि, तारे कौड़ि छाड़ाइबे ।। द्विगुण वर्तन करि' पुनः ‘विषय' दिबे ॥

११२॥

श्री चैतन्य महाप्रभु न तो यह चाहते थे कि गोपीनाथ पट्टनायक का सरकारी बकाया समाप्त कर दिया जाय, न ही उनकी इच्छा थी कि उसका वेतन दुगना कर दिया जाय या वह पुनः उसी स्थान का संग्रहाक नियुक्त कर दिया जाय।

तथापि तार सेवक आसि' कैल निवेदन । ताते क्षुब्ध हैल ग्रबे महाप्रभुर मन ॥

११३॥

जब गोपीनाथ पट्टनायक का सेवक श्री चैतन्य महाप्रभु के पास गया और महाप्रभु को उसकी दयनीय दशा उसने बतलाई, तो महाप्रभु कुछ क्षुब्ध तथा असन्तुष्ट हुए।

विषय-सुख दिते प्रभुर नाहि मनोबल । निवेदन-प्रभावेह तबु फले एत फल ॥

११४॥

महाप्रभु की आन्तरिक इच्छा यह नहीं थी कि उसके भक्त को भौतिकऐश्वर्य का सुख मिले; फिर भी मात्र उन्हें सूचित किये जाने से ऐसा बड़ा फल प्राप्त हुआ।

के कहिते पारे गौरेर आश्चर्य स्वभाव? । ब्रह्मा-शिव आदि याँर ना पाय अन्तर्भाव ॥

११५ ॥

श्री चैतन्य महाप्रभु के अद्भुत स्वभाव का अनुमान कोई नहीं लगा। सकता। यहाँ तक कि ब्रह्माजी तथा शिवजी भी महाप्रभु के मनोभावों को नहीं समझ पाते।

एथा काशी-मिश्र आसि' प्रभुर चरणे ।। राजार चरित्र सब कैला निवेदने ॥

११६॥

काशी मिश्र श्री चैतन्य महाप्रभु के पास गये और उन्हें राजा का मनोभाव विस्तार से बतलाया।

प्रभु कहे,–काशी-मिश्र, कि तुमि करिला? ।राज-प्रतिग्रह तुमि आमा' कराइला? ॥

११७॥

राजा के साथ काशी मिश्र की चालों को सुनकर श्री चैतन्य महाप्रभु ने कहा,हे काशी मिश्र, तुमने यह क्या किया? तुमने तो मुझे राजा से अप्रत्यक्ष रूप से सहायता लेने को बाध्य किया है।

मिश्र कहे,–शुन, प्रभु, राजार वचने ।।अकपटे राजा एइ कैला निवेदने ॥

११८॥

काशी मिश्र ने कहा : हे प्रभु, राजा ने बिना किसी कपट के ऐसा किया है। कृपया उसका निवेदन तो सुनें।

‘प्रभु येन नाहि जानेन,—राजा आमार लागिया ।।दुइ-लक्ष काहन कौड़ि दिलेक छाड़िया ॥

११९॥

राजा ने कहा, 'महाप्रभु से इस तरह कहें कि वे यह न सोचें कि राजा ने उनके लिए दो लाख काहन कौड़ियाँ छोड़ दी हैं।

भवानन्देर पुत्र सब---मोर प्रियतम ।।इँहा-सबाकारे आमि देखि आत्म-सम ॥

१२०॥

श्री चैतन्य महाप्रभु से यह बताओ कि भवानन्द के सारे पुत्र मुझे विशेष रूप से प्रिय हैं। मैं उन्हें अपने परिवार के सदस्यों जैसा मानता हूँ।

अतएव ग्राहाँ ग्राहाँ देइ अधिकार । खाय, पिये, लुटे, विलाय, ना करों विचार ॥

१२१॥

इसलिए मैंने उन्हें विभिन्न स्थानों पर संग्राहक के रूप में नियुक्त कर दिया है और यद्यपि वे सरकारी धन व्यय करते हैं, खाते, पीते, लूटते तथा मनमाना बाँटते हैं, किन्तु मैं इन्हें गम्भीरता से नहीं लेता।

राजमहिन्दार 'राजा' कैनु राम-राय । ये खाइल, येबा दिल, नाहि लेखा-दाय ॥

१२२॥

मैंने रामानन्द राय को राजमहेन्द्री का राज्यपाल ( गवर्नर) बना दिया था। उसने उस पद पर रहकर कितना धन एकत्र किया और बाँटा, इसका कोई लेखा-जोखा नहीं है।

गोपीनाथ एइ-मत 'विषय' करिया ।दुइ-चारि-लक्ष काहन रहे त' खाजा ॥

१२३ ।। संग्राहक नियुक्त हो जाने पर गोपीनाथ पहले की ही तरह, अपनी इच्छानुसार सामान्यतया दो-चार लाख काहन खर्च करता।

किछु देय, किछु ना देय, ना करि विचार ।‘जाना'-सहित अप्रीत्ये दुःख पाइल एइ-बार ॥

१२४॥

गोपीनाथ पट्टनायक कुछ संग्रह करता और कुछ देता-वह इच्छानुसार खर्च करता, किन्तु मैं इसे कोई गम्भीर बात नहीं मानता। किन्तु इस बार वह राजकुमार के साथ अप्रीतिकर व्यवहार के कारण कष्ट में पड़ गया।

‘जाना' एत कैला,—इहा मुइ नाहि जानों ।भवानन्देर पुत्र-सबे आत्म-सम मानों ॥

१२५ ॥

राजकुमार ने मेरे जाने बिना ही ऐसी स्थिति उत्पन्न कर दी, किन्तु मैं तो भवानन्द राय के सारे पुत्रों को अपने सम्बन्धियों जैसा मानता हूँ।

ताँहा लागि' द्रव्य छाड़ि'इहा मात् जाने ।‘सहजेइ मोर प्रीति हय ताहा-सने' ॥

१२६॥

उनसे घनिष्ठ सम्बन्ध के कारण मैंने गोपीनाथ पट्टनायक का सारा बकाया समाप्त कर दिया है। श्री चैतन्य महाप्रभु यह बात नहीं जानते। मैंने जो कुछ किया है, वह भवानन्द राय के परिवार के साथ अपने घनिष्ठ सम्बन्ध के कारण किया है।

शुनिया राजार विनय प्रभुर आनन्द ।।हेन-काले आइला तथा राय भवानन्द ॥

१२७॥

काशी मिश्र से राजा के मनोभावों के विषय में इन कथनों को सुनकर श्री चैतन्य महाप्रभु अत्यन्त प्रसन्न हुए। उसी समय भवानन्द राय भी वहाँ आ गये।

पञ्च-पुत्र-सहिते आसि' पड़िला चरणे ।।उठा प्रभु तौरे कैला आलिङ्गने ॥

१२८॥

भवानन्द राय अपने पाँचों पुत्रों सहित श्री चैतन्य महाप्रभु के चरणकमलों पर गिर पड़े और महाप्रभु ने उन्हें उठाकर उनका आलिंगन किया।

रामानन्द-राय आदि सबाई मिलिला ।भवानन्द-राय तबे बलिते लागिला ॥

१२९॥

इस तरह रामानन्द राय, उनके सारे भाई तथा उनके पिता श्री चैतन्य महाप्रभु से मिले। तब भवानन्द राय ने कहना प्रारम्भ किया।

तोमार किङ्कर एइ सब मोर कुल ।। ए विपदे राखि' प्रभु, पुनः निला मूल ॥

१३०॥

उन्होंने कहा, मेरे परिवार के ये सारे सदस्य आपके सनातन सेवक है। आपने हमें इस महान् विपत्ति से बचाया है, अतएव आपने हमें उचित मूल्य पर खरीद लिया है।

भक्त-वात्सल्य एबे प्रकट करिला ।। पूर्वे येन पञ्च-पाण्डवे विपदे तारिला ॥

१३१॥

अब अपने भक्तों के प्रति अपने प्रेम का प्रदर्शन किया है, जिस तरह पहले आपने पाँचों पाण्डवों को महान् विपत्ति से बचाया था।

‘नेतधटी'-माथे गोपीनाथ चरणे पड़िला ।।राजार कृपा-वृत्तान्त सकल कहिली ॥

१३२॥

सिर पर रेशमी चादर लपेटे गोपीनाथ पट्टनायक महाप्रभु के चरणकमलों पर गिर पड़ा और राजा द्वारा अपने प्रति प्रदर्शित कृपा का विस्तार से वर्णन करने लगा।

बाकी-कौड़ि बाद, आर द्विगुण वर्तन कैली । पुनः ‘विषय' दिया ‘नेत-धटी' पराइला ॥

१३३॥

उसने कहा, राजा ने मेरा बकाया समाप्त कर दिया है। उसने मुझे रेशमी वस्त्र से सम्मानित करते हुए मेरे पद पर मुझे पुनः नियुक्त कर दिया है और मेरा वेतन दुगना कर दिया है।

काहाँ चाङ्गेर उपर सेइ मरण-प्रमाद!।काहाँ 'नेत-धटी' पुनः,-ए-सब प्रसादः ॥

१३४॥

कहाँ मुझे मार डालने के लिए चांग पर चढ़ा दिया गया था और कहाँ उल्टे मुझे रेश्मी वस्त्र से सम्मानित किया गया। यह सब आपकी कृपा है।

चाङ्गेर उपरे तोमार चरण ध्यान कैलें।चरण-स्मरण-प्रभावे एइ फल पाइलें ॥

१३५ ॥

चांग पर मैंने आपके चरणकमलों का ध्यान करना प्रारम्भ किया और उस स्मरण की शक्ति से यह सब फल प्राप्त हुआ।

लोके चमत्कार मोर ए सब देखिया ।।प्रशंसे तोमार कृपा-महिमा गाजा ॥

१३६॥

मेरा यह सब देखकर आश्चर्यचकित जनता आपकी कृपा की महानता का वर्णन कर रही है।

किन्तु तोमार स्मरणेर नहे एइ ‘मुख्य-फल' ।‘फलाभास' एइ,—याते ‘विषय' चञ्चल ॥

१३७॥

किन्तु हे प्रभु, आपके चरणकमलों का ध्यान करने का मुख्य फल यह नहीं है। भौतिक ऐश्वर्य नश्वर है, अतएव यह तो आपकी कृपा के फल की एक झलक मात्र है।

राम-राये, वाणीनाथे कैला निर्विषय' । सेइ कृपा मोते नाहि, ग्राते ऐछे हय! ॥

१३८॥

आपकी वास्तविक कृपा तो रामानन्द राय तथा वाणीनाथ राय को मिली है, क्योंकि आपने उन्हें समस्त भौतिक ऐश्वर्य से विरक्त करा दिया है। मैं सोचता हूँ कि आपने मुझ पर ऐसी कृपा नहीं की।

शुद्ध कृपा कर, गोसाञि, घुचाह 'विषय' । निर्विण्ण है-इनु, मोते ‘विषय' ना हय ॥

१३९ ॥

आप मुझ पर शुद्ध कृपा करें, जिससे मैं भी विरक्त बन सकें। मैं अब और अधिक भौतिक भोग नहीं चाहता।

प्रभु कहे,—सन्यासी ग्रबे ह-इबा पञ्च-जन ।। कुटुम्ब-बाहुल्य तोमार के करे भरण? ॥

१४० ॥

श्री चैतन्य महाप्रभु ने कहा, यदि तुम सबके सब संन्यासी हो जाओगे और आर्थिक-व्यापार में रुचि नहीं लोगे, तो तुम्हारे बड़े परिवार के भरणपोषण को भार कौन उठायेगा? महा-विषय कर, किबा विरक्त उदास ।जन्मे-जन्मे तुमि पञ्च–मोर 'निज-दास' ॥

१४१॥

तुम पाँचों भाई चाहे भौतिक कार्यों में मग्न रहो या पूर्णतया विरक्त हो जाओ, तुम सभी जन्म-जन्मांतर मेरे नित्य दास हो।

किन्तु मोर करिह एक 'आज्ञा' पालन ।‘व्यय ना करिह किछु राजार मूल-धन' ॥

१४२ ॥

किन्तु मेरी एक आज्ञा का पालन करना । राजा के लगान (राजस्व) से कुछ भी भी खर्च न करना।

जार मूल-धन दिया ये किछु लभ्य हय ।।सेइ धन करिह नाना धर्म-कर्मे व्यय ॥

१४३॥

सर्वप्रथम तुम्हें राजा का लगान अदा करना चाहिए और तब जो बचे उसे तुम धार्मिक तथा सकाम कर्मों में व्यय कर सकते हो।

असद्व्यय ना करिह,—याते दुई-लोक याय ।एत बलि' सबाकारे दिलेन विदाय ॥

१४४॥

पाप कर्मों में एक छदाम भी खर्च मत करना, क्योंकि इस तरह तुम दोनों लोकों में (इस जन्म तथा अगले जन्म में ) हानि में रहोगे। यह कहकर श्री चैतन्य महाप्रभु ने उन्हें विदा किया।

रायेर घरे प्रभुर ‘कृपा-विवर्त' कहिल ।।भक्त-वात्सल्य-गुण ग्राते व्यक्त हैल ॥

१४५॥

इस तरह भवानन्द राय के परिवार में श्री चैतन्य महाप्रभु की महिमा का कथन होता रहा। यह कृपा स्पष्ट रूप से प्रदर्शित की गई थी, यद्यपि यह इससे कुछ भिन्न प्रतीत हो रही थी।

सबाय आलिङ्गिया प्रभु विदाय यबे दिला । हरि-ध्वनि करि' सब भक्त उठि' गेला ॥

१४६ ॥

श्री चैतन्य महाप्रभु ने उन सबों का आलिंगन किया और उन्हें विदा किया। तब सारे भक्त उठे और उच्च स्वर से ‘हरि बोल' का उच्चारण करते हुए चले गये।

प्रभुर कृपा देखि' सबार हैल चमत्कार ।।ताहारा बुझिते नारे प्रभुर व्यवहार ॥

१४७॥

भवानन्द राय के परिवार पर महाप्रभु की असामान्य कृपा होते देखकर प्रत्येक व्यक्ति आश्चर्यचकित था। वे श्री चैतन्य महाप्रभु के व्यवहार को समझ नहीं सके।

तारा सबे ग्रदि कृपा करिते साधिल ।।'आमा' हैते किछु नहे--प्रभु तबे कहिल ॥

१४८ ।। निस्सन्देह, जब सारे भक्तों ने महाप्रभु से प्रार्थना की थी कि वेगोपीनाथ पट्टनायक पर कृपा करें, तब महाप्रभु ने उत्तर दिया था कि वे ऐसा नहीं कर सकते।

गोपीनाथेर निन्दा, आर आपन-निर्वेद । एइ-मात्र कहिल–इहार ना बुझिबे भेद ॥

१४९॥

मैंने गोपीनाथ पट्टनायक को दण्ड तथा श्री चैतन्य महाप्रभु की उदासीनता का ही वर्णन किया है। किन्तु इस व्यवहार का गम्भीर अर्थ समझ पाना अत्यन्त कठिन है।

काशी-मिश्रे ना साधिल, राजारे ना साधिले ।उद्योग विना महाप्रभु एत फल दिल ॥

१५० ॥

काशी मिश्र या राजा को स्वयं प्रार्थना किये जाने के बिना ही श्री। चैतन्य महाप्रभु ने गोपीनाथ पट्टनायक को इतना अधिक दे दिया।

चैतन्य-चरित्र एइ परम गम्भीर ।।सेइ बुझे, ताँर पदे याँर मन 'धीर' ॥

१५१॥

श्री चैतन्य महाप्रभु के मनोभाव इतने गम्भीर हैं कि कोई उन्हें तभी समझ सकता है, जब उसकी पूर्ण श्रद्धा महाप्रभु के चरणकमलों की सेवा में हो।

ग्रेइ इहां शुने प्रभुर वात्सल्य-प्रकाश ।।प्रेम-भक्ति पाय, तॉर विपद ग्राय नाश ॥

१५२ ।। यदि कोई समझकर अथवा बिना समझे बूझे ही गोपीनाथ पट्टनायक के कार्यों तथा श्री चैतन्य महाप्रभु की उस पर अहैतुकी कृपा सम्बन्धी इस घटना को सुनता है, तो वह निश्चय ही महाप्रभु के प्रेम-भक्ति-पद को प्राप्त करेगा और उसकी सारी विपदाएँ नष्ट हो जायेंगी।

श्री-रूप-रघुनाथ-पदे झार आश ।।चैतन्य-चरितामृत कहे कृष्णदास ॥

१५३ ॥

श्री रूप तथा श्री रघुनाथ के चरणकमलों की वन्दना करते हुए तथा सदैव उनकी कृपा की कामना करते हुए उनके चरणचिह्नों पर चलकर मैं कृष्णदास श्री चैतन्य-चरितामृत का वर्णन कर रहा हूँ।

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