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अध्याय पंद्रह: भगवान श्री चैतन्य महाप्रभु का पारलौकिक पागलपन

दुर्गमे कृष्ण-भावाब्धौ निमग्नोन्मग्न-चेतसा ।गौरेण हरिणा प्रेम-मर्यादा भूरि दर्शिता ॥

१॥

ब्रह्माजी जैसे देवताओं के लिए भी कृष्ण के ऊर्मिपूर्ण प्रेम के सागर को समझ पाना कठिन है। श्री चैतन्य महाप्रभु ने अपनी लीलाएँ सम्पन्न करके अपने आपको उस सागर में निमज्जित कर दिया और उनका हृदय उसी प्रेम में निमग्न हो गया। इस तरह उन्होंने कृष्ण के दिव्य प्रेम के उच्च पद को विविध प्रकार से प्रकट किया।

जय जय श्री कृष्ण-चैतन्य अधीश्वर । जय नित्यानन्द पूर्णानन्द-कलेवर ॥

२॥

पूर्ण पुरुषोत्तम भगवान् श्रीकृष्ण चैतन्य की जय हो! दिव्य आनन्द से पूरित शरीर वाले भगवान् नित्यानन्द की जय हो! जयाद्वैताचार्य कृष्ण-चैतन्य-प्रियतम ।।जय श्रीवास-आदि प्रभुर भक्त-गण ॥

३॥

भगवान् चैतन्य के अत्यन्त प्रिय श्री अद्वैत आचार्य की जय हो! तथा श्रीवास ठाकुर इत्यादि महाप्रभु के भक्तों की जय हो! एइ-मत महाप्रभु रात्रि-दिवसे ।। आत्म-स्फूर्ति नाहि कृष्ण-भावावेशे ॥

४॥

इस तरह कृष्ण-प्रेम रूपी सागर में निमग्न होने से श्री चैतन्य महाप्रभु |न-रात अपने आपको भूले रहते।

कभु भावे मग्न, कभु अर्ध-बाह्य-स्फूर्ति ।।कभु बाह्य-स्फूर्ति, तिन रीते प्रभु-स्थिति ॥

५॥

महाप्रभु तीन प्रकार की चेतना में अपनी स्थिति बनाये रखते थेकभी वे पूर्णतया भावाविष्ट हो जाते, कभी आधी बाह्य चेतना में होते, तो कभी पूर्ण बाह्य चेतना में होते।

स्नान, दर्शन, भोजन देह-स्वभावे हय ।।कुमारेर चाक ग्रेन सतत फिरय ॥

६॥

वस्तुतः श्री चैतन्य महाप्रभु सदैव भावावेश में निमग्न रहते थे, किन्तु जिस तरह कुम्हार का चाक बिना छुए ही चलता रहता है, उसी तरह महाप्रभु के शारीरिक कार्य यथा स्नान करना, जगन्नाथजी के मन्दिर में दर्शन के लिए जाना तथा भोजन करना स्वयं अपने आप होते रहते थे।

एक-दिन करेन प्रभु जगन्नाथ दरशन ।।जगन्नाथे देखे साक्षात्व्रजेन्द्र-नन्दन ॥

७॥

एक दिन जब श्री चैतन्य महाप्रभु मन्दिर में भगवान् जगन्नाथ की ओर देख रहे थे, तब उन्हें जगन्नाथजी साक्षात् नन्द महाराज के पुत्र कृष्ण प्रतीत हुए।

एक-बारे स्फुरे प्रभुर कृष्णेर पञ्च-गुण ।।पञ्च-गुणे करे पञ्चेन्द्रिय आकर्षण ॥

८॥

जब श्री चैतन्य महाप्रभु को जगन्नाथ जी में स्वयं कृष्ण की अनुभूति हुई, तो महाप्रभु की पाँचों इन्द्रियाँ भगवान् कृष्ण के पाँच गुणों के आकर्षण में तुरन्त समा गईं।

एक-मन पञ्च-दिके पञ्च-गुण टाने ।।टानाटानि प्रभुर मन हैल अगेयाने ॥

९॥

श्री चैतन्य महापभु का एक मन भगवान् कृष्ण के पाँच दिव्य गुणों से पाँच दिशाओं में उसी तरह आकर्षित हो रहा था, जिस तरह रस्साकसी में होता है। अतएव महाप्रभु अचेत हो गये।

हेन-काले ईश्वरेर उपल-भोग सरिल ।।भक्त-गण महाप्रभुरे घरे लञा आईल ॥

१० ॥

उसी समय भगवान् जगन्नाथ का उपलभोग उत्सव समाप्त हुआ और जो भक्त श्री चैतन्य महाप्रभु के साथ-साथ मन्दिर गये थे, वे उन्हें घर लौटा ले आये।

स्वरूप, रामानन्द,–एइ दुइ-जन ल ।। विलाप करेन वँहार कण्ठेते धरिया ॥

११ ॥

उस रात श्री चैतन्य महाप्रभु की सेवा में स्वरूप दामोदर गोस्वामी तथा रामानन्द राय रहे। महाप्रभु उन दोनों के गले में हाथ डालकर विलाप करने लगे।

कृष्णेर वियोगे राधार उत्कण्ठित मन । विशाखारे कहे आपन उत्कण्ठा-कारण ॥

१२॥

जब श्रीमती राधारानी कृष्ण के महान् वियोग से अत्यधिक व्याकुल हो गईं, तब उन्होंने विशाखा से अपनी महान् चिन्ता तथा व्याकुलता का कारण बतलाने वाला एक श्लोक कहा।

सेइ श्लोक पड़ि' आपने करे मनस्ताप ।श्लोकेर अर्थ शुनाय हारे करिया विलाप ॥

१३॥

उसी श्लोक को सुनाकर श्री चैतन्य महाप्रभु ने मन के संताप भाव | व्यक्त किया। तब उन्होंने अत्यन्त विलाप करते हुए स्वरूप दामोदर 'मा रामानन्द राय को उस श्लोक की व्याख्या सुनाई।

सौन्दर्यामृत-सिन्धु-भङ्ग-ललना-चित्ताद्रि-सम्प्लावकःकर्णानन्द सनर्म-रम्य-वचनः कोटीन्दु-शीताङ्गकः ।। सौरभ्यामृत-सम्प्लवावृत-जगत्पीयूष-रम्याधरः ।श्री-गोपेन्द्र-सुतः स कर्षति बलात्पञ्चेन्द्रियाण्यालि मे ॥

१४॥

श्री चैतन्य महाप्रभु ने कहा : यद्यपि गोपियों के हृदय ऊँचीपहाड़ियों के सदृश हैं, किन्तु वे कृष्ण के सौन्दर्य रूपी अमृत-सागर की। लहरों से आप्लावित हैं। उनकी मधुर वाणी उनके कानों में प्रविष्ट होकर उन्हें दिव्य आनन्द प्रदान करती है। उनके शरीर को स्पर्श करोड़ों चन्द्रमा से भी अधिक शीतल है और उनकी शारीरिक सुगन्ध का अमृत सम्पूर्ण जगत् को आप्लावित करता है। हे सखी, वे कृष्ण, जो नन्द महाराज के पुत्र हैं और जिनके होंठ अमृत तुल्य हैं, मेरी पाँचों इन्द्रियों को बलपूर्वक खींच रहे हैं।'

कृष्ण-रूप-शब्द-स्पर्श, सौरभ्य-अधर-रस, | ग्रार माधुर्य कहन ना याय ।। देखि' लोभे पञ्च-जन, एक अश्व-मोर मन,चड़ि' पञ्च पाँच-दिके धाय ॥

१५ ॥

भगवान् कृष्ण का सौन्दर्य, उनके शब्दों की ध्वनि तथा उनकी वंशी की ध्वनि, उनका स्पर्श, उनकी सुगन्ध तथा उनके अधरों का स्वाद-ये सब अवर्णनीय मधुरता से ओतप्रोत हैं। जब ये सारे गुण मेरी पाँचों इन्द्रियों को एकाएक आकृष्ट करते हैं, तो मेरी सारी इन्द्रियाँ मेरे मन रूपी अकेले घोड़े पर एक साथ चढ़ जाती हैं, किन्तु वे पाँच विभिन्न दिशाओं में जाना पाहती हैं।

सखि हे, शुन मोर दुःखेर कारण मोर पञ्चेन्द्रिय-गण, महा-लम्पट दस्यु-गण, । सबे कहे, हर' पर-धन ॥

१६॥

हे सखी, मेरे दुःख का कारण सुनो। मेरी पाँचों इन्द्रियाँ वस्तुतः असंयमी धूर्त हैं। वे भलीभाँति जानती हैं कि कृष्ण पूर्ण पुरुषोत्तम भगवान् हैं, किन्तु तो भी वे कृष्ण की सम्पत्ति का हरण करना चाहती हैं।

एक अश्व एक-क्षणे, पाँच पाँच दिके टाने,एक मन कोन्दिके याय?।। एक-काले सबे टाने, गेल घोड़ार पराणे,एइ दुःख सहन ना ग्राय ॥

१७॥

मेरा मन उस अकेले घोड़े के समान है, जिस पर दृष्टि इत्यादि पाँच इन्द्रियाँ आरूढ़ हैं। हर इन्द्रिय उस घोड़े पर आरूढ़ होना चाहती है। इस तरह वे मन को एक साथ पाँच दिशाओं में खींचती हैं। तो यह किस दिशा में जायेगा? यदि वे सब इकट्ठी खींचती हैं, तो बेचारा घोड़ा निश्चित रूप से अपने प्राण त्याग देगा। भला मैं इस क्रूरता को कैसे सह सकती हूँ? इन्द्रिये ना करि रोष, इँहा-सबार काहाँ दोष, | कृष्ण-रूपादिर महा आकर्षण । रूपादि पाँच पाँचे टाने, गेल घोड़ार पराणे,मोर देहे ना रहे जीवन ॥

१८॥

हे सखी, यदि तुम कहो कि 'अपनी इन्द्रियों को वश में करने का प्रयास करो' तो मैं क्या कहूँ? मैं अपनी इन्द्रियों पर रुष्ट नहीं हो सकती। क्या यह उनका दोष है? कृष्ण का सौन्दर्य, शब्द, स्पर्श, सुगन्ध तथा स्वाद स्वभावतः अत्यधिक आकर्षक हैं। ये पाँचों गुण मेरी इन्द्रियों को आकृष्ट कर रहे हैं और इनमें से हर एक मेरे मन को अलग-अलग दिशा में खींच ले जाना चाहता है। इस प्रकार मेरे मन का प्राण महान् संकट में है, जिस तरह किसी घोड़े पर बैठकर पाँच दिशाओं में एक साथ जाने का प्रयास किया जाय। इस तरह मैं भी मृत्यु के संकट में हूँ।

कृष्ण-रूपामृत-सिन्धु, ताहार तरङ्ग-बिन्दु,एक-बिन्दु जगत् डुबाय ।। त्रिजगते व्रत नारी, तार चित्त-उच्च-गिरि,| ताहा डुबाइ आगे उठि' धाय ॥

१९॥

तीनों लोकों में प्रत्येक स्त्री की चेतना निश्चित रूप से एक ऊँचे पर्वत की तरह है, किन्तु कृष्ण की सौन्दर्य-माधुरी समुद्र के तुल्य है। उस ममुद्र की एक बूंद भी सम्पूर्ण जगत् को आप्लावित कर सकती है और तिना के सारे ऊँचे पर्वतों को जलमग्न कर सकती है।

कृष्णेर वचन-माधुरी, नाना-रस-नर्म-धारी,तार अन्याय कथन ना ग्राय ।। जगतेर नारीर काणे, माधुरी-गुणे बान्धि' टाने,टानाटानि काणेर प्राण ग्राय ॥

२०॥

कृष्ण के परिहासपूर्ण वचनों की मधुरता सारी स्त्रियों के हृदयों का अवर्णनीय ध्वंस करती है। उनके शब्द स्त्रियों के कानों को उनके माधुर्य के साथ बाँध लेते हैं। इस तरह की खींचातानी के कारण कान का प्रा। चला जाता है।

कृष्ण-अङ्ग सुशीतल, कि कहिमु तार बल,छटाय जिने कोटीन्दु-चन्दन ।। सशैल नारीर वक्ष, ताहा आकर्षिते दक्ष,आकर्षये नारी-गण-मन ॥

२१॥

कृष्ण का दिव्य शरीर इतना शीतल है कि उसकी उपमा चन्दन-लेप से या करोड़ों चन्द्रमाओं से भी नहीं दी जा सकती। यह समस्त स्त्रियों के उन्नत पर्वतों जैसे स्तनों को दक्षतापूर्वक आकृष्ट करता है। निस्सन्देह, कृष्ण का दिव्य शरीर तीनों लोकों की समस्त स्त्रियों के मनों को आकृष्ट करता है।

कृष्णाङ्ग–सौरभ्य-भर, मृग-मद-मद-हर,नीलोत्पलेर हरे गर्व-धन ।। जगत् नारीर नासा, तार भितर पाते वासा,नारी-गणे करे आकर्षण ॥

२२॥

कृष्ण के शरीर की सुगन्ध कस्तूरी की सुगन्ध से भी अधिक मादक है और यह नीलकमल की सुगन्ध का भी अतिक्रमण करने वाली है। यह संसार की समस्त स्त्रियों के नथुनों में प्रवेश करती है और वहीं अपना निवासस्थान बनाकर उन्हें आकृष्ट करती रहती है।

कृष्णेर अधरामृत, ताते कर्पूर मन्द-स्मित,स्व-माधुर्ये हरे नारीर मन ।। अन्यत्र छाड़ाय लोभ, ना पाइले मने क्षोभ,व्रज-नारी-गणेर मूल-धन ॥

२३॥

कृष्ण के होंठ इतने मधुर हैं कि जब उनमें उनके मन्द हास का कपूर मिल जाता है, तब वे समस्त स्त्रियों के मनों को आकृष्ट करते हैं और उनके बाध्य कर देते हैं कि वे अन्य सारे आकर्षणों का परित्याग कर दें। यदि कृष्ण की मन्दहास रूपी मधुरता नहीं मिल पाती, तो इससे महान् मानसिक कठिनाइयाँ तथा शोक उत्पन्न होता है। यह मधुरता ही वृन्दावन की गोपियों का एकमात्र धन है।

एत कहि' गौरहरि, दुइ-जनार कण्ठ धरि',कहे,—‘शुन, स्वरूप-रामराय ।। काहाँ करों, काहाँ ग्राङ काहाँ गेले कृष्ण पाङ,मुँहे मोरे कह से उपाय' ॥

२४॥

इस तरह कहकर श्री चैतन्य महाप्रभु ने रामानन्द राय तथा स्वरूप दामोदर के गले लग गये। फिर महाप्रभु ने कहा, हे मित्रों, कृपया मेरी बात सुनो। मैं क्या करूँ? मैं कहाँ जाऊँ? कृष्ण को पाने के लिए कहाँ जा सकता हूँ? तुम दोनों मुझे बताओ कि मैं उनको कैसे पा सकता हूँ।

एइ-मत गौर-प्रभु प्रति दिने-दिने । विलाप करेन स्वरूप-रामानन्द-सने ॥

२५॥

इस तरह दिव्य पीड़ा में निमग्न श्री चैतन्य महाप्रभु दिन प्रति दिन रूप दामोदर गोस्वामी तथा रामानन्द राय की गोष्ठी में विलाप करते।

सेइ दुइ-जन प्रभुरे करे आश्वासन । स्वरूप गाय, राय करे श्लोक पठन ॥

२६॥

स्वरूप दामोदर गोस्वामी उपयुक्त गीत गाते और रामानन्द राय उपयुक्त लोक सुनाते, जिससे महाप्रभु का आनन्द वर्धित होता रहे। इस तरह वे न्हें सान्त्वना दे पाते।

कर्णामृत, विद्यापति, श्री-गीत-गोविन्द ।। इहार श्लोक-गीते प्रभुर कराये आनन्द ॥

२७॥

महाप्रभु बिल्वमंगल ठाकुर कृत कृष्णकर्णामृत, विद्यापति की कविता तथा जयदेव गोस्वामी कृत श्री गीतगोविन्द को विशेष रूप से सुनना पसन्द करते थे। जब श्री चैतन्य महाप्रभु के साथी इन पुस्तकों से श्लोक सुनाते और गीत गाते, तब महाप्रभु अत्यधिक आनन्दित होते।

एक-दिन महाप्रभु समुद्र-तीरे ग्राइते ।। पुष्पेर उद्यान तथा देखेन आचम्बिते ॥

२८॥

एक दिन समुद्र के किनारे जाते समय श्री चैतन्य महाप्रभु ने अचानक एक पुष्पवाटिका देखी।

वृन्दावन-भ्रमे ताहाँ पशिला धाजा ।।प्रेमावेशे बुले ताहाँ कृष्ण अन्वेषिया ॥

२९॥

श्री चैतन्य महाप्रभु ने उस पुष्पवाटिका को वृन्दावन समझ लिया और वे तेजी से उसमें प्रवेश कर गये। कृष्ण-प्रेम में मग्न होकर वे पुष्पवाटिका में घूमते रहे और कृष्ण को खोजते रहे।

रासे राधा लञा कृष्ण अन्तर्धान कैला ।पाछे सखी-गण ग्रैछे चाहि' बेड़ाइला ॥

३०॥

जब रास नृत्य के समय कृष्ण राधारानी को लेकर अदृश्य हो गये, तब गोपियाँ उन्हें ढूँढ़ती हुई जंगल में घूमने लगीं। उसी तरह श्री चैतन्य महाप्रभु उस पुष्पवाटिका में घूमते रहे।

सेइ भावावेशे प्रभु प्रति-तरु-लता ।।श्लोक पड़ि' पड़ि' चाहि' बुले ग्रथा तथा ॥

३१॥

गोपियों के भाव में मग्न होकर श्री चैतन्य महाप्रभु इधर-उधर घूमने लगे। वे सारे वृक्षों तथा लताओं से श्लोक सुना सुनाकर कृष्ण के विषय में पूछने लगे।

चूत-प्रियाल-पनसासन-कोविदार| जम्ब्वर्क-बिल्व-बकुलाम्र-कदम्ब-नीपाः ।। येऽन्ये परार्थ-भवका यमुनोपकूलाःशंसन्तु कृष्ण-पदवीं रहितात्मनां नः ॥

३२॥

[ गोपियों ने कहा : , ‘हे चूत वृक्ष, प्रियाल, पनस, आसन तथा कोविदार वृक्षों, हे जंबु वृक्ष, हे अर्क वृक्ष, हे बेल, बकुल तथा आम, है कदम्ब, हे नीप तथा अन्यों का कल्याण करने वाले यमुना तट पर अन्य वृक्षों, कृपा करके हमें बता दो कि कृष्ण कहाँ गये हैं? हम अपने मन को खो चुकी हैं और मृतप्राय हैं।

कच्चित्तुलसि कल्याणि गोविन्द-चरण-प्रिये ।।सह त्वालि-कुलैर्बिभ्रष्टस्तेऽति-प्रियोऽच्युतः ॥

३३ ॥

हे सर्वमंगल तुलसी वृक्ष, तुम गोविन्द के चरणकमलों को अत्यन्त प्रिय हो और वे तुम्हें अत्यन्त प्रिय हैं। क्या तुमने अपने पत्रों की माला ने और भौरों के झुंड से घिरे कृष्ण को यहाँ जाते हुए देखा है? ।

मालत्यदर्शि वः कच्चिन्मल्लिके जाति यूथिके। प्रीतिं वो जनयन् यातः कर-स्पर्शेन माधवः ॥

३४॥

हे मालती, मल्लिका, जाती तथा यूथिका पुष्यों के वृक्षों, क्या तुमने कृष्ण को अपने हाथों से तुम्हें आनन्दित करने के लिए तुम्हारा स्पर्श करते एभर से जाते देखा है? आम्र, पनस, पियाल, जम्बु, कोविदार । तीर्थ-वासी सबे, कर पर-उपकार ॥

३५॥

श्री चैतन्य महाप्रभु ने आगे कहा, हे आम के वृक्ष, हे कटहल के , हे पियाल, जम्बु तथा कोविदार वृक्षों, तुम सभी तीर्थ स्थान के आली हो। इसलिए तुम कृपया अन्यों के कल्याण हेतु कार्य करो।

कृष्ण तोमार इहाँ आइला, पाइला दरशन? । कृष्णेर उद्देश कहि' राखह जीवन ॥

३६॥

क्या तुमने कृष्ण को इधर आते देखा है? कृपा करके हमें बतला दो कि वे किधर से गये हैं और हमारे प्राण बचा लो।

उत्तर ना पाञा पुनः करे अनुमान ।। एइ सब–पुरुष-जाति, कृष्णेर सखार समान ॥

३७॥

जब वृक्षों ने उत्तर नहीं दिया, तो गोपियों ने अनुमान लगाया, चूंकि ये सारे वृक्ष पुरुष जाति के हैं, अतएव अवश्य ही ये कृष्ण के मित्र होंगे।

ए केने कहिबे कृष्णेर उद्देश आमाय?।।ए-स्त्री-जाति लता, आमार सखी-प्राय ॥

३८ ॥

भला ये वृक्ष हमें क्यों बताने लगे कि कृष्ण कहाँ गये हैं? चलो इन ताओं से क्यों न पूछे; ये स्त्री जाति की हैं और ये हमारी सखियों जैसी हैं।

अवश्य कहिबे,—पाछे कृष्णेर दर्शने । एत अनुमानि' पुछे तुलस्यादि-गणे ॥

३९॥

ये हमें अवश्य बतलायेंगी कि कृष्ण कहाँ गये हैं, क्योंकि उन्हें न्होंने स्वयं देखा है। इस तरह अनुमान लगाते हए गोपियों ने तुलसी आदि वृक्षों तथा लताओं से पूछा।

तुलसि, मालति, यूथि, माधवि, मल्लिके ।तोमार प्रिय कृष्ण आइला तोमार अन्तिके? ॥

४० ।। हे तुलसी! हे मालती! हे यूथी, माधवी तथा मल्लिका! तुम सबों को कृष्ण अत्यन्त प्रिय हैं, अतएव वे तुम्हारे पास अवश्य आये होंगे।

तुमि-सब—हओ आमार सखीर समान ।।कृष्णोद्देश कहि' सबे राखह पराण ॥

४१॥

तुम सभी हमारी सखियों के समान हो। कृपा करके हमें बताओ कि कृष्ण किधर गये हैं और हमारे प्राणों की रक्षा करो।

उत्तर ना पाजा पुनः भावेन अन्तरे ।‘एह कृष्ण-दासी, भये ना कहे आमारे' ॥

४२॥

इतने पर भी जब उन्हें उत्तर नहीं मिला, तो गोपियों ने सोचा, ये सारी लताएँ कृष्ण की दासियाँ हैं और भयवश ये हमें नहीं बतलायेंगी।

आगे मृगी-गण देखि' कृष्णाङ्ग-गन्ध पाजा ।तार मुख देखि' पुछेन निर्णय करिया ॥

४३॥

तब गोपियों ने मृगियों को देखा। कृष्ण के शरीर की सुगन्ध पाकर मृगियों के मुखों को देखकर, गोपियों ने यह निश्चित करने के लिए क्या कृष्ण पास में ही हैं, उनसे पूछा।

अप्येण-पत्न्युपगतः प्रिययेह गात्रैस् | तन्वन्दृशां सखि सु-निवृतिमच्युतो वः ।। कान्ताङ्ग-सङ्ग-कुच-कुङ्कम-रञ्जितायाः ।कुन्द-स्रजः कुल-पतेरिह वाति गन्धः ॥

४४॥

श्री चैतन्य महाप्रभु ने कहा, हे मृगी, भगवान् कृष्ण अपनी प्रेयसी फा आलिंगन कर रहे थे, जिससे उसके उठे हुए स्तनों पर लगा कुंकुम कुन्द फूलों की उनकी माला पर चिपक गया है। उस माला की सुगन्ध यहाँ बह रही है। हे प्रिय सखी, क्या तुमने कृष्ण को अपनी सर्वप्रिय संगिनी के साथ इस ओर से जाते और तुम सबों की आँखों के आनन्द को वर्धित करते देखा है?' कह, मृग, राधा-सह श्री कृष्ण सर्वथा ।तोमाय सुख दिते आइला? नाहिक अन्यथा ॥

४५ ॥

हे मृगी, श्रीकृष्ण तुम्हें आनन्दित करने में सदैव प्रसन्न रहते हैं। कृपा करके हमें बताओ कि क्या वे श्रीमती राधारानी के साथ इधर से निकले। हैं? हम सोचती हैं कि वे अवश्य ही इधर आये होंगे।

राधा-प्रिय-सखी आमरा, नहि बहिरङ्ग । । दूर हैते जानि तार ट्रैछे अङ्ग-गन्ध ॥

४६॥

हम कोई बाहरी स्त्रियाँ नहीं हैं। श्रीमती राधारानी की प्रिय सखियाँ होने के कारण हम दूर से ही कृष्ण की शारीरिक गन्ध को जान सकती हैं।

राधा-अङ्ग-सङ्गे कुच-कुङ्कम-भूषित ।। कृष्ण-कुन्द-माला-गन्धे वायु सुवासित ॥

४७॥

कृष्ण द्वारा श्रीमती राधा का आलिंगन करने से उनके वक्षस्थलों में लगा कुंकुम चूर्ण कृष्ण के शरीर को सुशोभित करने वाली कुन्द-माला में लग गया है। उस माला की सुगन्ध ने पूरे वायुमण्डल को सुगन्धित बना दिया है।

कृष्ण इहाँ छाड़ि' गेला, इहों—विरहिणी ।। किबी उत्तर दिबे एइना शुने काहिनी ॥

४८॥

भगवान् कृष्ण ने यह स्थान छोड़ दिया है, इसीलिए मृगियाँ विरह का अनुभव कर रही हैं। वे हमारे शब्द नहीं सुन रहीं, अतएव वे उत्तर दें तो कैसे दें? आगे वृक्ष-गण देखे पुष्प-फल-भरे । शाखा सब पड़ियाछे पृथिवी-उपरे ॥

४९॥

तब गोपियाँ अनेक वृक्षों के पास आईं, जिनकी शाखाएँ फलों तथा फूलों से लदी होने के कारण भूमि पर झुक गईं थीं।

कृष्णे देखि' एइ सब करेन नमस्कार ।कृष्ण-गमन पुछे तारे करिया निर्धार ॥

५०॥

गोपियों ने सोचा कि चूंकि इन सारे वृक्षों ने कृष्ण को अपने पास से जाते हुए देखा होगा, इसलिए वे उन्हें सादर नमस्कार कर रहे हैं। निश्चित करने के उद्देश्य से उन्होंने वृक्षों से पूछा।

बाहुं प्रियांस उपधाय गृहीत-पद्मोरामानुजस्तुलसिकालि-कुलैर्मदान्धैः । अन्वीयमान इह वस्तरवः प्रणामकिं वाभिनन्दति चरन्प्रणयावलोकैः ॥

५१॥

श्री चैतन्य महाप्रभु ने आगे कहा, हे वृक्षों, कृपा करके हमें तलाओ कि क्या बलराम के छोटे भाई कृष्ण ने इधर से जाते हुए, श्रीमती राधारानी के कन्धे पर अपना एक हाथ रखे तथा दूसरे हाथ में जमल लिए हुए तथा तुलसी दलों की सुगन्ध से उन्मत्त भौरों के दल से पीछा किये जाते हुए, तुम्हारे प्रणाम का स्वागत प्रेममयी चितवन से किया है? प्रिया-मुखे भृङ्ग पड़े, ताहा निवारिते ।लीला-पद्म चालाइते हैल अन्य-चित्ते ॥

५२॥

अपनी प्रिया के मुख पर भौरों को बैठने से रोकने के लिए उन्होंने अपने हाथ में लिए कमलफूल से उन्हें भगा दिया और इस तरह उनका मन कुछ चलायमान हुआ।

तोमार प्रणामे कि कैराछेन अवधान? ।। किबा नाहि करेन, कह वचन-प्रमाण ॥

५३॥

जब तुम लोगों ने उन्हें नमस्कार किया, तो उन्होंने उस पर ध्यान दिया कि नहीं? कृपा करके अपने शब्दों के लिए साक्ष्य दो।

कृष्णेर वियोगे एइ सेवक दुःखित ।। किबी उत्तर दिले? इहार नाहिक सम्वित् ॥

५४॥

कृष्ण के वियोग ने इन सेवकों को अत्यन्त दुःखी बना दिया है। अपनी चेतना खोकर भला ये हमें किस तरह उत्तर दे सकते हैं? एत बलि' आगे चले यमुनार कूले ।। देखे,—ताहाँ कृष्ण हय कदम्बेर तले ॥

५५॥

यह कहकर गोपियाँ यमुना नदी के तट की ओर अग्रसर हुईं। वहाँ पर उन्होंने कृष्ण को एक कदम्ब वृक्ष के नीचे देखा।

कोटि-मन्मथ-मोहन मुरली-वदन ।अपार सौन्दर्ये हरे जगन्नेत्र-मन ॥

५६॥

वहाँ पर खड़े अपने होठों पर वंशी रखे हुए, करोड़ों कामदेवों को मोहित करने वाले कृष्ण अपनी असीम सुन्दरता से समस्त जगत् की आँखों तथा मनों को आकृष्ट कर रहे थे।

सौन्दर्य देखिया भूमे पड़े मूच्र्छा पाळा ।हेन-काले स्वरूपादि मिलिला आसिया ॥

५७॥

जब श्री चैतन्य महाप्रभु ने भगवान् की दिव्य सुन्दरता देखी, तो वे अचेत होकर भूमि पर गिर पड़े। उस समय स्वरूप दामोदर गोस्वामी इत्यादि सारे भक्तगण उस पुष्पवाटिका में उनके पास आ गये।

पूर्ववत्सर्वाङ्गे सात्त्विक-भाव-सकल ।अन्तरे आनन्द-आस्वाद, बाहिरे विह्वल ॥

५८॥

उन्होंने पहले की ही तरह श्री चैतन्य महाप्रभु के शरीर में दिव्य प्रेमावेश के लक्षणों को प्रकट देखा। यद्यपि वे बाहर से विह्वल लग रहे थे, किन्तु भीतर से वे दिव्य आनन्द का आस्वादन कर रहे थे।

पूर्ववत्सबे मिलि' कराइला चेतन । उठिया चौदिके प्रभु करेन दर्शन ॥

५९॥

एक बार फिर सारे भक्तों ने मिलकर प्रयासपूर्वक श्री चैतन्य महाप्रभु को फिर से सचेत किया। तब महाप्रभु उठे और चारों ओर देखते हुए इधर-उधर घूमने लगे।

काहाँ गेला कृष्ण? एखनि पाइनु दरशन! । ताँहार सौन्दर्य मोर हरिल नेत्र-मन! ॥

६०॥

श्री चैतन्य महाप्रभु ने कहा, मेरे कृष्ण कहाँ चले गये हैं? मैंने उन्हें अभी देखा था और उनके सौन्दर्य ने मेरे नेत्रों तथा मन को हर लिया है।

पुनः केने ना देखिये मुरली-वदन! ।।ताँहार दर्शन-लोभे भ्रमय नयन ॥

६१॥

मैं कृष्ण को उनके होठों पर मुरली रखे पुनः क्यों नहीं देख पा रहा १? मेरी आँखें उन्हें एक बार पुनः देखने की आशा से इधर-उधर घूम रही है।

विशाखारे राधा त्रैछे श्लोक कहिला ।सेइ श्लोक महाप्रभु पड़िते लागिला ॥

६२॥

तब श्री चैतन्य महाप्रभु ने निम्नलिखित श्लोक सुनाया, जिसे श्रीमती राधारानी ने अपनी प्रिय सखी विशाखा से कहा था।

नवाम्बुदे-लसद्युतिर्नव-तड़ि-मनोज्ञाम्बरःसुचित्र-मुरली-स्फुरच्छरदमन्द-चन्द्राननः ।।मयूर-दल-भूषितः सुभग-तार-हार-प्रभः | स मे मदन-मोहनः सखि तनोति नेत्र-स्पृहाम् ॥

६३ ॥

हे प्रिय सखी, कृष्ण के शरीर की द्युति नवनिर्मित बादल से भी अधिक तेजोमय है और उनका पीताम्बर प्रकट होने वाली नवीन बिजली से अधिक आकर्षक है। उनके सिर पर मोरपंख सुशोभित है और उनके गले में मोतियों की चमकीली माला लटक रही है। ज्योंही वे अपने होठों पर मनोहर मुरली धारण करते हैं, उनका मुखमण्डल पूर्ण शरत्कालीन चन्द्रमा के समान सुन्दर लगता है। ऐसे सौन्दर्य से युक्त कामदेव को मोहित करने वाले मदनमोहन उनके दर्शनार्थ मेरी आँखों की इच्छाओं को बढ़ा रहे हैं।

नव-घन-स्निग्ध-वर्ण, दलिताञ्जन-चिक्कण,इन्दीवर-निन्दि सुकोमल । जिनि' उपमान-गण, हरे सबार नेत्र-मन,कृष्ण-कान्ति परम प्रबल ॥

६४॥

चैतन्य महाप्रभु ने आगे कहा, श्रीकृष्ण का रंग चूर्ण किये हुए अंजन जी भाँति चमकीला है। यह नवनिर्मित बादल की शोभा को अतिक्रमण मरने वाला है और नीले कमल से भी अधिक कोमल है। निस्सन्देह, उनका रंग इतना मोहक है कि यह हर एक के नेत्रों तथा मन को आकृष्ट भरता है और इतना प्रबल है कि सारी उपमाओं को पार कर जाता है।

कह, सखि, कि करि उपाय? कृष्णाद्भुत बलाहक, मोर नेत्र-चातक, ।| ना देखि पियासे मरि' याय ॥

६५॥

हे प्रिय सखी, मुझे बताओ कि मैं क्या करूँ? कृष्ण अद्भुत बादल के समान आकर्षक हैं और मेरी आँखें चातक पक्षी के समान हैं, जो प्यास के मारे मर रही हैं, क्योंकि वे ऐसा बादल नहीं देख पा रहीं।

सौदामिनी पीताम्बर, स्थिर नहे निरन्तर,मुक्ता-हार बक-पाँति भाल । इन्द्र-धनु शिखि-पाखा, उपरे दियाछे देखा,आर धनु वैजयन्ती-माल ॥

६६॥

कृष्ण का पीताम्बर आकाश में चंचल बिजली के समान प्रतीत होता है और उनके गले की मोती की माला बादल के नीचे उड़ रही बगुलों की पंक्ति जैसी प्रतीत होती है। उनके सिर का मोर पंख तथा उनकी वैजयन्ती माला ( पाँच रंग के फूलों वाली ) इन्द्रधनुषों के समान लगती है।

मुरलीर कल-ध्वनि, मधुर गर्जन शुनि',वृन्दावने नाचे मयूर-चय । अकलङ्क पूर्ण-कल, लावण्य-ज्योत्स्ना झलमल,चित्र-चन्द्रेर ताहाते उदय ॥

६७॥

कृष्ण के शरीर की कान्ति नवोदित निष्कलंक पूर्ण चन्द्रमा के समान सुन्दर है और उनकी वंशी की ध्वनि नवनिर्मित बादल की मधुर गर्जना के समान है। जब वृन्दावन के मोर उस ध्वनि को सुनते हैं, तो वे त्य करने लगते हैं।

लीलामृत-वरिषणे, सिञ्चे चौद्द भुवने,हेन मेघ प्रबे देखा दिल ।। दुर्दैव-झञ्झा-पवने, मेघे निल अन्य स्थाने,मरे चातक, पिते ना पाइल ॥

६८ ॥

कृष्ण-लीलाओं का बादल अपनी अमृतवर्षा से चौदहों लोकों को सिक्त कर रहा है। दुर्भाग्यवश जब वह बादल प्रकट हुआ, तो हवा का एक प्रबल झोंका आया जो उसे मुझसे दूर उड़ा ले गया। उस बादल को न देख पाकर मेरे चकोर रूपी नेत्र प्यास से मृतप्राय हो गये हैं।

पुनः कहे,–हाय हाय, पड़ पड़ राम-रय',कहे प्रभु गद्गद आख्याने । रामानन्द पड़े श्लोक, शुनि' प्रभुर हर्ष-शोक,आपने प्रभु करेन व्याख्याने ॥

६९॥

श्री चैतन्य महाप्रभु ने अवरुद्ध वाणी से पुनः कहा, हाय, हाय, रामराय, तुम पढ़ते रहो। इस तरह रामानन्द राय एक श्लोक पढ़ने लगे। इस श्लोक को सुनते हुए महाप्रभु कभी अत्यधिक हर्षित होते, तो कभी शोकसंतप्त हो जाते। बाद में महाप्रभु ने स्वयं ही इस श्लोक की व्याख्या की।

वीझ्यालकावृत-मुखं तव कुण्डल-श्रीगण्ड-स्थलाधर-सुधं हसितावलोकम् ।। दत्ताभयं च भुज-दण्ड-युगं विलोक्यवक्षः श्रियैक-रमणं च भवाम दास्यः ॥

७० ॥

हे कृष्ण, सुंघराले बालों से सुशोभित आपके सुन्दर मुख को, आपके गाल पर लटकते कुण्डलों की शोभा को, आपके होठों के अमृत को, आपकी हँसीली चितवनों के सौन्दर्य को, अभय प्रदान करनेवाली आपकी दोनों भुजाओं को तथा दाम्पत्य का आकर्षण उत्पन्न करनेवाला आपके चौड़े वक्षस्थल के सौन्दर्य को देखकर हमने आपकी दासी बनने ५ लिए अपने आपको समर्पित कर दिया है।

कृष्ण जिनि' पद्य-चन्द, पातियाछे मुख फान्द,ताते अधर-मधु-स्मित चार ।। व्रज-नारी आसि' आसि', फान्दै पड़ि' हय दासी,छाड़ि' लाज-पति-घर-द्वार ॥

७१॥

श्री चैतन्य महाप्रभु ने कहा, चन्द्रमा तथा कमल को जीत लेने के बाद कृष्ण ने मृगी समान गोपियों को पकड़ना चाहा। इसलिए उन्होंने अपने सुन्दर मुख रूपी फन्दे को फैला दिया और गोपियों को फँसाने के लिए उसमें अपनी मधुर हँसी का चारा रख दिया। गोपियाँ उस फन्दे की शिकार बन गईं और अपने घर, परिवार, पति तथा प्रतिष्ठा को त्यागकर कृष्ण की दासियाँ बन गईं।

बान्धव कृष्ण करे व्याधेर आचार नाहि माने धर्माधर्म, हरे नारी-मृगी-मर्म, ।करे नाना उपाय ताहार ॥

७२॥

हे सखी, कृष्ण एक शिकारी जैसा ही आचरण करते हैं। यह शिकारी पुण्य या पाप की परवाह नहीं करता। वह मृगी सदृश गोपियों के अन्तरतम को जीतने के लिए नाना प्रकार की युक्तियाँ अपनाता है।

गण्ड-स्थल झलमल, नाचे मकर-कुण्डल,सेइ नृत्ये हरे नारी-चय ।। सस्मित कटाक्ष-बाणे, ता-सबार हृदये हाने,नारी-वधे नाहि किछु भय ॥

७३॥

कृष्ण के गालों पर नृत्य करते कुण्डल मकर के आकार के हैं और वे बहुत उज्जवल प्रकाश से चमकते हैं। ये नृत्य करते कुण्डल सारी स्त्रियों मनों को आकर्षित करते हैं। इसके अतिरिक्त कृष्ण अपनी मधुर कान भरी चितवन के बाणों से स्त्रियों के हृदयों को बेध देते हैं। इस ह से स्त्रियों का वध करते हुए वे तनिक भी भयभीत नहीं होते।

अति उच्च सुविस्तार, लक्ष्मी-श्रीवत्स-अलङ्कार,कृष्णेर ये डाकातिया वक्ष ।। व्रज-देवी लक्ष लक्ष, ता-सबार मनो-वक्ष,हरि-दासी करिबारे दक्ष ॥

७४॥

कृष्ण के वक्षस्थल पर श्रीवत्स चिह्न जैसे आभूषण हैं, जो लक्ष्मी के निवास का सूचक चिह्न है। उनका वक्षस्थल, जो लुटेरों के वक्षस्थल जैसा चौड़ा है, लाखों व्रजबालाओं के मनों तथा वक्षस्थलों को बलात् आकृष्ट करता है। इस तरह वे सब पूर्ण पुरुषोत्तम भगवान् की दासियाँ बन जाती हैं।

सुललित दीर्घार्गल, कृष्णेर भुज-युगल, | भुज नहे, कृष्ण-सर्प-काय । दुइ शैल-छिद्रे पैशे, नारीर हृदये दंशे, मरे नारी से विष-ज्वालाय ॥

७५ ॥

कृष्ण की दोनों सुन्दर भुजाएँ लम्बी जंजीरों (पाश) के समान हैं। वे उन काले सर्यों के शरीर से भी मिलती जुलती हैं, जो स्त्रियों के दो पर्वताकार-स्तनों के बीच की सन्धि में प्रवेश करके उनके हृदयों को उम लेते हैं। तब स्त्रियाँ विष की अगन से मर जाती हैं।

कृष्ण-कर-पद-तल, कोटि-चन्द्र-सुशीतल,जिनि' कर्पूर-वेणा-मूल-चन्दन ।। एक-बार ग्रार स्पर्शे, स्मर-ज्वाला-विष नाशे, झार स्पर्शे लुब्ध नारी-मन ।। ७६ ।। कपूर, खसखस की जड़ें तथा चन्दन इन तीनों के सम्मिलित शीतलकारी प्रभाव को कृष्ण की हथेलियों की तथा उनके पैरों के तलवों की शीतलता अतिक्रमण कर जाती है, क्योंकि ये करोड़ों चन्द्रमाओं से भी अधिक शीतल तथा मनभावन हैं। यदि स्त्रियों को इनका एक बार भी 'स्पर्श हो जाता है, तो उनके मन बहक जाते हैं और कृष्ण के लिए कामेच्छा की विष ज्वाला तुरन्त दूर हो जाती है।

एतेक विलाप करि' प्रेमावेशे गौरहरि,एई अर्थे पड़े एक श्लोक ।। सेइ श्लोक पड़ि' राधा, विशाखारे कहे बाधा,उघाड़िया हृदयेर शोक ॥

७७॥

प्रेमावेश में विलाप करते हुए श्री चैतन्य महाप्रभु ने तब निम्नलिखित श्लोक सुनाया, जिसे श्रीमती राधारानी ने अपनी सखी श्रीमती विशाखा से अपने हृदय का शोक प्रकट करने के लिए कहा था।

हरिमणि-कवाटिका-प्रतत-हारि-वक्षः-स्थलःस्मरार्त-तरुणी-मन:-कलुष-हारि-दोरर्गलः ।। सुधांशु-हरि-चन्दनोत्पल-सिताभ्र-शीताङ्गकः।स मे मदन-मोहनः सखि तनोति वक्षः-स्पृहाम् ॥

७८ ॥

हे सखी, कृष्ण का वक्षस्थल इन्द्रनील मणि से बने द्वार की तरह चौड़ा और आकर्षक है। उनकी दोनों बाँहें जंजीर की तरह दृढ़ हैं और वे उन युवतियों की मानसिक चिन्ता को दूर कर सकती हैं, जो उनके लिए कामेच्छाओं से पीड़ित हैं। उनका शरीर चन्द्रमा, चन्दन, कमल पुष्प तथा कपूर से भी अधिक शीतल है। इस तरह कामदेव को आकर्षित करने वाले मदनमोहन मेरे वक्षस्थलों की इच्छा को बढ़ा रहे हैं।

प्रभु कहे,–कृष्ण मुजि एखन-इ पाइनु । आपनार दुर्दैवे पुनः हाराइनु ॥

७९॥

तब श्री चैतन्य महाप्रभु ने कहा, अभी-अभी मुझे कृष्ण मिले थे, किन्तु दुर्भाग्यवश मैंने पुनः उन्हें खो दिया है।

चञ्चल-स्वभाव कृष्णेर, ना रय एक-स्थाने ।देखा दिया मन हरि' करे अन्तर्धाने ॥

८०॥

कृष्ण स्वभाव से अत्यधिक चंचल हैं। वे एक स्थान पर नहीं रुकते। वे किसी से मिलते हैं, उसके मन को हर लेते हैं और तब अन्तर्धान हो जाते हैं।

तासां तत्सौभग-मदं वीक्ष्य मानं च केशवः ।प्रशमाय प्रसादाय तत्रैवान्तरधीयत ॥

८१॥

गोपियाँ अपने महान् सौभाग्य से गर्वित हो गईं। उनकी श्रेष्ठता के भाव को दमित करने के लिए तथा उन पर विशेष कृपा प्रदर्शित करने के लिए केशव, जो कि ब्रह्माजी तथा शिवजी का भी दमन करने वाले हैं, रासनृत्य से अन्तर्धान हो गये।

स्वरूप-गोसाजिरे कहेन,–गाओ एक गीत ।। ग्राते आमार हृदयेर हये त’ ‘सम्वित् ॥

८२॥

तब श्री चैतन्य महाप्रभु ने स्वरूप दामोदर गोस्वामी से कहा, आप कृपया एक गीत गाओ जो मेरे हृदय को सचेष्ट कर सके।

स्वरूप-गोसाजि तबे मधुर करिया ।। गीत-गोविन्देर पद गाय प्रभुरे शुनाञा ॥

८३ ॥

इस तरह श्री चैतन्य महाप्रभु की प्रसन्नता के लिए स्वरूप दामोदर गोस्वामी गीत गोविन्द का निम्नलिखित पद अत्यन्त मधुर स्वर में गाने लगे।

रासे हरिमिह विहित-विलासम् ।।स्मरति मनो मम कृत-परिहासम् ॥

८४॥

यहाँ रास नृत्य के स्थल में मैं कृष्ण का स्मरण करती हैं, जिन्हें परिहास करना तथा लीलाएँ करना अत्यन्त प्रिय है।

स्वरूप-गोसाजि ग्रबे एई पद गाहिला ।उठि' प्रेमावेशे प्रभु नाचिते लागिला ॥

८५ ॥

जब स्वरूप दामोदर गोस्वामी ने यह विशिष्ट पद गाया, तो श्री चैतन्य महाप्रभु तुरन्त उठ खड़े हुए और प्रेमावेश में नृत्य करने लगे।

‘अष्ट-सात्त्विक' भाव अङ्गे प्रकट ह-इल । हर्षादि व्यभिचारी' सब उथलिल ॥

८६॥

उस समय श्री चैतन्य महाप्रभु के शरीर में आठों प्रकार के आध्यात्मिक विकार ( सात्त्विक भाव) प्रकट हो आये। यही नहीं, शोक तथा हर्ष इत्यादि तैतीसों व्यभिचारी भाव भी प्रकट हो गये।

भावोदय, भाव-सन्धि, भाव-शाबल्य । भावे-भावे महा-युद्धे सबार प्राबल्य ॥

८७॥

श्री चैतन्य महाप्रभु के शरीर में सारे भाव लक्षण यथा भावोदय, भाव-सन्धि तथा भावशाबल्य उदय हो आये। फिर भावों में परस्पर विकट युद्ध होने लगा और उनमें से हर एक प्रधान बन गया।

सेइ पद पुनः पुनः कराय गायन । पुनः पुनः आस्वादये, करेन नर्तन ॥

८८॥

श्री चैतन्य महाप्रभु ने स्वरूप दामोदर से बारम्बार उसी श्लोक को गाने के लिए कहा। वे जितनी बार गाते, महाप्रभु को नया आस्वादन प्राप्त होता और वे बारम्बार नृत्य करने लगते।

एइ-मत नृत्य यदि ह-इल बहु-क्षण । स्वरूप-गोसाञि पद कैला समापन ॥

८९॥

जब महाप्रभु देर तक नृत्य करते रहे, तब स्वरूप दामोदर गोस्वामी ने उस श्लोक को गाना बन्द कर दिया।

‘बल्’ ‘बल्’ बलि' प्रभु कहेन बार-बार । ना गाय स्वरूप-गोसाजि श्रम देखि' ताँर ॥

९०॥

श्री चैतन्य महाप्रभु ने बारम्बार कहा, गाओ, गाते रहो! गाते रहो! किन्तु महाप्रभु की थकान को देखते हुए स्वरूप दामोदर ने उसे फिर नहीं गाया।

‘बल्’ ‘बल्’ प्रभु बलेन, भक्त-गण शुनि' ।। चौदिकेते सबे मेलि' करे हरि-ध्वनि ॥

९१॥

जब भक्तों ने महाप्रभु को गाते रहो! कहते सुना, तब वे सब उनके चारों ओर एकत्र हो गये और एक साथ हरिनाम का कीर्तन करने लगे।

रामानन्द-राये तबे प्रभुरे वसाइला । वीजनादि करि' प्रभुर श्रम घुचाइला ॥

९२॥

उस समय रामानन्द राय ने महाप्रभु को बैठाया और उन पर पंखा झलकर उनकी थकान दूर की।

प्रभुरे ला गेला सबे समुद्रेर तीरे ।। स्नान कराञा पुनः ताँरै लजा आइला घरे ॥

९३॥

तब सारे भक्त श्री चैतन्य महाप्रभु को समुद्र तट ले गये और उन्हें भान कराया। अन्त में वे उन्हें घर लौटा ले आये।

भोजन कराना प्रभुरे कराइला शयन ।।रामानन्द-आदि सबे गेला निज-स्थान ॥

९४॥

महाप्रभु को दोपहर का भोजन कराने के बाद उन्हें लिटा दिया गया। तब रामानन्द इत्यादि सारे भक्त अपने-अपने घरों को लौट गये।

एइ त कहिलै प्रभुर उद्यान-विहार ।।वृन्दावन-भ्रमे ग्राहाँ प्रवेश ताँहार ॥

९५॥

इस तरह मैंने श्री चैतन्य महाप्रभु के पुष्पवाटिका भ्रमण की लीला का वर्णन किया है। महाप्रभु ने वृन्दावन समझकर इस पुष्पवाटिका में प्रवेश किया था।

प्रलाप सहित एइ उन्माद-वर्णन । श्री-रूप-गोसाजि इहा करियाछेन वर्णन ॥

९६॥

वहाँ पर उन्होंने दिव्य उन्माद तथा प्रलाप प्रकट किया, जिसे छ। गोस्वामी ने अपनी ‘स्तवमाला' में सुन्दर ढंग से इस प्रकार अंकित किया है।

पयो-राशेस्तीरे स्फुरदुपवनाली-कलनया | मुहुर्वृन्दारण्य-स्मरण-जमित-प्रेम-विवशः । क्वचित्कृष्णावृत्ति-प्रचल-रसनो भक्ति-रसिकःस चैतन्यः किं मे पुनरपि दृशोर्यास्यति पदम् ॥

९७॥

श्री चैतन्य महाप्रभु सर्वोच्च भक्त हैं। समुद्र तट पर विचरण करते हुए कभी-कभी वे पास ही सुन्दर उद्यान देखते और उसे वृन्दावन का जंगल समझ बैठते। इस तरह वे कृष्ण-प्रेम से पूर्णतया विह्वल हो जाते तथा पवित्र नाम का कीर्तन और नृत्य करने लगते । जब वे 'कृष्ण! कृष्ण का उच्चारण करते, तो उनकी जीभ निरन्तर चलती रहती। क्या वे पुनः र नेत्रों के समक्ष दृष्टिगोचर होंगे? अनन्त चैतन्य-लीला ना ग्राय लिखने । दिक्-मात्र देखाजा ताहा करिये सूचन ॥

९८॥

श्री चैतन्य महाप्रभु की लीलाएँ अनन्त हैं। उनको ठीक-ठीक लिख पाना सम्भव नहीं है। मैं उनका परिचय देने के प्रयास में उनको इंगित मात्र कर सकता हूँ।

श्री-रूप-रघुनाथ-पदे यार आश । चैतन्य-चरितामृत कहे कृष्णदास ॥

९९॥

श्री रूप तथा श्री रघुनाथ के चरणकमलों की वन्दना करते हुए तथा सदैव उनकी कृपा की कामना करते हुए उनके चरणचिह्नों पर चलते हुए मैं कृष्णदास श्री चैतन्य-चरितामृत का वर्णन कर रहा हूँ।

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