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अध्याय सोलह: भगवान श्री चैतन्य महाप्रभु ने भगवान श्री कृष्ण के होठों से अमृत का स्वाद चखा

वन्दे श्री-कृष्ण-चैतन्यं कृष्ण-भावामृतं हि यः ।आस्वाद्यास्वादयन्भक्तान्प्रेम-दीक्षामशिक्षयत् ॥

१॥

मैं उन श्री चैतन्य महाप्रभु को नमस्कार करता हूँ, जिन्होंने स्वयं कृष्ण-प्रेम के अमृत का आस्वादन किया और फिर अपने भक्तों को उपदेश दिया कि उसका आस्वादन किस तरह करें। इस तरह श्री चैतन्य महाप्रभु उन्हें दिव्य ज्ञान में दीक्षित करने के लिए कृष्ण के प्रेमावेश के विषय में उन्हें उपदेश दिया।

जय जय श्री-चैतन्य जय नित्यानन्द ।। जयाद्वैत-चन्द्र जय गौर-भक्त-वृन्द ॥

२॥

श्री चैतन्य महाप्रभु की जय हो! श्री नित्यानन्द प्रभु की जय हो! श्री अद्वैत आचार्य की जय हो! तथा महाप्रभु के समस्त भक्तवृन्द की जय हो! एइ-मत महाप्रभु रहेन नीलाचले ।।भक्त-गण-सङ्गे सदा प्रेम-विह्वले ॥

३॥

इस तरह श्री चैतन्य महाप्रभु अपने भक्तों के साथ सदैव प्रेम-भक्ति में निमग्न रहते हुए जगन्नाथ पुरी में रहे।

वर्षान्तरे आइला सब गौड़ेर भक्त-गण ।पूर्ववत् आसि' कैल प्रभुर मिलन ॥

४॥

अगले वर्ष, हमेशा की तरह सब भक्तगण बंगाल से जगन्नाथ पुरी गये और पिछले वर्षों की तरह वहाँ भक्तों तथा श्री चैतन्य महाप्रभु को मिलाप हुआ।

ताँ-सबार सङ्गे आइल कालिदास नाम ।कृष्ण-नाम विना तेंहो नाहि कहे अन ॥

५॥

| बंगाल के भक्तों के साथ कालिदास नाम के एक सज्जन आये। वे पवित्र कृष्णनाम के अतिरिक्त अन्य कुछ नहीं कहते थे।

महा-भागवत तेहो सरल उदार । कृष्ण-नाम-‘सङ्केते' चालाय व्यवहार ॥

६॥

कालिदास बहुत उन्नत भक्त थे, किन्तु थे सरल और उदार। वे अपने सारे काम-काज करते समय कृष्ण नाम का कीर्तन करते रहते थे।

कौतुकेते तेंहो यदि पाशक खेलाय ।। हरे कृष्ण' 'कृष्ण' करि' पाशक चालाय ॥

७॥

जब वह हँसी में पाँसे खेलते, तो भी वे हरे कृष्ण कहकर पाँसा फेंकते थे।

रघुनाथ-दासेर तेंहो हय ज्ञाति-खुड़ा ।वैष्णवेर उच्छिष्ट खाइते तेंहो हैल बुड़ा ॥

८॥

कालिदास रघुनाथ दास गोस्वामी के चाचा थे। वे आजीवन, यहाँ तक कि वृद्धावस्था में भी, वैष्णवों द्वारा छोड़े गये उच्छिष्ट को खाने का प्रयास करते।

गौड़-देशे हय व्रत वैष्णवेर गण ।।सबार उच्छिष्ट तेंहो करिल भोजन ॥

९॥

कालिदास ने, बंगाल में जितने वैष्णव थे, उन सबों का उच्छिष्ट खाया था।

ब्राह्मण-वैष्णव ग्रत—छोट, बड़ हय ।।उत्तम-वस्तु भेट ला ताँर ठाजि ग्राय ॥

१०॥

वे ब्राह्मण कुलों में उत्पन्न समस्त वैष्णवों के पास जाते, चाहे वे न। भक्त हों या उन्नत भक्त हों, और उन्हें उत्तम खाद्य वस्तुएँ भेंट करते थे।

ताँर ठाञि शेष-पात्र लयेन मागिया ।।काहाँ ना पाय, तबे रहे लुकाजा ॥

११॥

वे ऐसे वैष्णवों से जूठन माँगते और यदि उन्हें कुछ नहीं मिलता था, तो वे छिप जाते थे।

भोजन करिले पात्र फेला प्राय ।।लुकाञा सेइ पात्र आनि' चाटि' खाय ॥

१२ ॥

जब वैष्णव भोजन कर लेते और अपने पत्तल फेंक देते, तो कालिदास छुपी जगह से बाहर निकल आते और पत्तलों को लेकर जूठन चाटते।

शूद्र-वैष्णवेर घरे ग्राय भेट ला । एइ-मत ताँर उच्छिष्ट खाय लुकाजा ॥

१३॥

वे शूद्र परिवारों में उत्पन्न वैष्णवों के भी घरों में भेंट लेकर जाते। तब में छिप जाते और जब वे जूठन फेंकते तो उसे खाते।

भूडिमालि-जाति, वैष्णव'--'झड़' ताँर नाम । आम्र-फल ला तेंहो गेला तर स्थान ॥

१४॥

झडु ठाकुर नाम के एक महान् वैष्णव थे, जो मुँइमालि जाति के थे। कालिदास उनके घर अपने साथ आम लेकर गये।

आम्र भेट दिया ताँर चरण वन्दिला । ताँर पत्नीरे तबे नमस्कार कैला ॥

१५॥

कालिदास ने वे आम झडु ठाकुर को भेंट किये और उन्हें नमस्कार किया। तब उन्होंने ठाकुर की पत्नी को भी नमस्कार किया।

पत्नी-सहित तेहो आछेन वसिया । बहु सम्मान कैला कालिदासेरे देखिया ॥

१६॥

जब कालिदास झडु ठाकुर के यहाँ गये, तो उन्होंने देखा कि वे साधु पुरुष अपनी पत्नी के साथ बैठे हैं। ज्योंही झडु ठाकुर ने कालिदास को देखा, उन्होंने भी उसी तरह नमस्कार किया।

इष्टगोष्ठी कत-क्षण करि' ताँर सने ।झडु-ठाकुर कहे ताँरै मधुर वचने ॥

१७॥

कालिदास के साथ कुछ काल तक चर्चा करने के बाद झडु ठाकुर ने उनसे निम्नलिखित मधुर शब्दों में कहा।

आमिनीच-जाति, तुमि,—अतिथि सर्वोत्तम ।कोन् प्रकारे करिमु आमि तोमार सेवन? ॥

१८॥

मैं नीच जाति का हूँ और आप मेरे अति सम्मानित अतिथि हैं। मैं किस तरह आपकी सेवा करूं? आज्ञा देह',—ब्राह्मण-घरे अन्न ला दिये।ताहाँ तुमि प्रसाद पाओ, तबे आमि जीये ॥

१९ ॥

यदि आप आज्ञा दें, तो मैं कुछ भोजन ब्राह्मण के घर भेज दें, जहां आप प्रसाद ग्रहण कर सकते हैं। यदि आप ऐसा करें, तो मैं अत्यन्त सुखपूर्वक जी पाऊँगा।

कालिदास कहे,---ठाकुर, कृपा कर मोरे ।तोमार दर्शने आइनु मुइ पतित पामरे ॥

२०॥

कालिदास ने उत्तर दिया, हे महोदय, आप मुझ पर कृपा करें। मैं आपका दर्शन करने आया हूँ, यद्यपि मैं अत्यन्त नीच तथा पापी हूँ।

पवित्र ह-इनु मुइ पाइनु दरशन ।।कृतार्थ ह-इनु, मोर सफल जीवन ॥

२१॥

आपके दर्शन मात्र से मैं पवित्र हो गया हूँ। मैं आपको अत्यन्त कृतज्ञ हूँ, क्योंकि अब मेरा जीवन सफल हो गया है।

एक वाञ्छा हय, यदि कृपा करि' कर ।। पाद-रज देह', पाद मोर माथे धर ॥

२२॥

हे महोदय, मेरी एक इच्छा है। आप मेरे सिर पर अपना पाँव रखने की कृपा करें, जिससे आपके पाँव की धूल मेरे सिर का स्पर्श कर सके।

ठाकुर कहे, ऐछे बात् कहिते ना युयाये ।। आमिनीच-जाति, तुमि सुसज्जन राय ॥

२३ ॥

झडु ठाकुर ने उत्तर दिया, मुझसे इसके लिए कहना आपको शोभा नहीं देता। मैं अत्यन्त निम्न जाति का हूँ, जबकि आप सम्माननीय धनी सज्जन हैं।

तबे कालिदास श्लोक पड़ि' शुनाइल ।।शुनि' झडु-ठाकुरेर बड़ सुख ह-इल ॥

२४॥

तब कालिदास ने कुछ श्लोक सुनाये, जिन्हें सुनकर झडु ठाकुर अत्यन्त सुखी हुए।

न मेऽभक्तश्चतुर्वेदी मद्भक्तः श्व-पचः प्रियः ।।तस्मै देयं ततो ग्राह्य स च पूज्यो यथा ह्यहम् ॥

२५॥

कोई संस्कृत साहित्य में कितना ही विद्वान पण्डित क्यों न हो, यदि वह शुद्ध भक्ति में नहीं लगा है, तो वह मेरा भक्त नहीं माना जाता। किन्तु यदि चण्डाल परिवार में उत्पन्न कोई व्यक्ति शुद्ध भक्त होता है, जिसे सकाम कर्म या ज्ञान के माध्यम से भोग की इच्छा नहीं रहती, तो वह मुझे अत्यन्त प्रिय होता है। उसे सभी तरह का आदर दिया जाना चाहिए और वह जो भी दे उसे स्वीकार किया जाना चाहिए, क्योंकि ऐसे भक्त मेरे ही समान पूज्य हैं।'

विप्राद् द्वि-षडू-गुण-युतादरविन्द-नाभपादारविन्द-विमुखात्श्व-पचं वरिष्ठम् । मन्ये तदर्पित-मनो-वचनेहितार्थप्राणं पुनाति स कुलं न तु भूरि-मानः ॥

२६॥

ब्राह्मण कुल में जन्मा और बारहों ब्राह्मण गुणों से सम्पन्न व्यक्ति योग्य होते हुए भी यदि कमलनाभ भगवान् कृष्ण के चरणकमलों की भक्ति नहीं करता, तो वह उस चण्डाल के तुल्य भी नहीं होता, जो अपना मन, वचन, कर्म, धन तथा जीवन भगवान् की सेवा में समर्पित कर चुका है। केवल ब्राह्मण कुल में जन्म लेना अथवा ब्राह्मण गुणों से युक्त होना पर्याप्त नहीं है। मनुष्य को भगवान् का शुद्ध भक्त बनना चाहिए। यदि कोई श्वपच या चण्डाल व्यक्ति भक्त होता है, तो वह न केवल अपना, अपितु अपने पूरे परिवार का उद्धार कर देता है, जबकि अभक्त ब्राह्मण, ब्राह्मण गुणों से युक्त होते हुए भी अपने आपको भी पवित्र नहीं कर सकता, अपने परिवार की बात तो दूर रही।

अहो बत श्व-पचोऽतो गरीयान्यज्जिह्वाग्रे वर्तते नाम तुभ्यम् । तेपुस्तपस्ते जुहुवुः सस्नुरार्या । | ब्रह्मानूचुर्नाम गृणन्ति ये ते ॥

२७॥

हे प्रभु, जो भी व्यक्ति आपके पवित्र नाम को सदा अपनी जिह्वा पर रखता है, वह दीक्षित ब्राह्मण से भी बढ़कर है। भले ही उसने श्वपच (चण्डाल ) कुल में जन्म लिया हो और भौतिकता की दृष्टि से मनुष्यों में अधम हो, फिर भी वह महिमामंडित है। भगवान् के पवित्र नाम का जप करने की यही तो अद्भुत शक्ति है! जो पवित्र नाम का जप करता है, समझ लो कि वह सभी तरह की तपस्याएँ कर चुका है। वह सारे वेदों का अध्ययन कर चुका है, उसने वेदवर्णित सारे महान् यज्ञ सम्पन्न कर लिये। हैं और उसने समस्त तीर्थस्थलों में पहले ही स्नान कर लिया है और सचमुच वही आर्य है।'

शुनि' ठाकुर कहे,– शास्त्र एइ सत्य कय । सेइ श्रेष्ठ, ऐछे ग्राँते कृष्ण-भक्ति हय ॥

२८॥

श्रीमद्भागवत शास्त्र से इन उद्धरणों को सुनकर झडु ठाकुर ने उत्तर दिपा, हाँ, यह सच है, क्योंकि यह शास्त्र का कथन है। किन्तु यह उसके लिए सत्य है, जो कृष्ण-भक्ति में वास्तव में अग्रसर हो।

आमिनीच-जाति, आमार नाहि कृष्ण-भक्ति । अन्य ऐछे हय, आमाय नाहि ऐछे शक्ति ॥

२९॥

ऐसा पद अन्यों के लिए उपयुक्त हो सकता है, किन्तु मुझमें ऐसी आध्यात्मिक शक्ति नहीं है। मैं तो नीच जाति का हूँ और मुझमें रंच मात्र भी कृष्ण-भक्ति नहीं है।

तारे नमस्करि' कालिदास विदाय मागिला ।।झडु-ठाकुर तबे ताँर अनुव्रजि' आइला ॥

३०॥

कालिदास ने फिर से झडु ठाकुर को नमस्कार किया और उनसे जाने की अनुमति माँगी। उनके जाते ही सन्त झडु ठाकुर उनके पीछे गये।

तारै विदाय दिया ठाकुर यदि घरे आइल । ताँर चरण-चिह्न येइ ठाञि पड़िल ॥

३१॥

कालिदास को विदा करने के बाद झडु ठाकुर अपने घर लौट आये और अनेक स्थानों पर अपने पदचिह्न छोड़ते आये, जो स्पष्ट दृष्टिगोचर हो रहे थे।

सेइ धूलि लजा कालिदास सर्वाङ्गे लेपिला ।ताँर निकट एक-स्थाने लुका रहिला ॥

३२॥

कालिदास ने उन चरणचिह्नों की धूल अपने सारे शरीर पर पोत ली। तब वे झडु ठाकुर के घर के निकट एक स्थान में छिप गये।

झडु-ठाकुर घर ग्राइ' देखि' आम्र-फल ।।मानसेई कृष्ण-चन्द्रे अर्पिला सकल ॥

३३॥

घर लौटकर झडु ठाकुर ने कालिदास द्वारा भेंट किये गये आमों को देखा। उन्होंने मन ही मन उन्हें कृष्णचन्द्र को अर्पित कर दिया।

कलार पाटुया-खोला हैते आम्र निकाशिया ।।ताँर पत्नी ताँरै देन, खायेन चूषिया ॥

३४॥

तब झडु ठाकुर की पत्नी ने केले की पत्ती तथा छाल से लपेटे आमों को निकाला और उन्हें झडु ठाकुर को दिया, जिन्होंने उनको चूसना प्रारम्भ कर दिया।

चूषि' चूषि' चोषा आँठि फेलिला पाटुयाते ।।तारे खाओयाञा ताँर पत्नी खाय पश्चाते ॥

३५॥

जब वे उन्हें चूस चुके, तो उन्होंने गुठली और छिलके को केले के पत्ते पर छोड़ दिया और उनकी पत्नी अपने पति को खिलाने के बाद स्वयं खाने लगी।

आँटि-चोषा सेइ पाटुया-खोलाते भरिया । बाहिर उच्छिष्ट-गर्ते फेलाइला ला ॥

३६॥

जब वह खा चुकी, तो उसने केले की पत्तों और छाल में गुठलियाँ तथा छिलके ले लिये और उन्हें ले जाकर कूड़ादान में फेंक दिया।

सेइ खोला, आँठि, चोकला चूषे कालिदास ।चूषिते चूषिते हय प्रेमेते उल्लास ॥

३७॥

कालिदास ने केले के पत्ते तथा आम की गुठली और छिलके को चूसा। चूसते समय वे प्रसन्नता के मारे प्रेमाविष्ट हो गये।

एइ-मत व्रत वैष्णव वैसे गौड़-देशे । कालिदास ऐछे सबार निला अवशेषे ॥

३८॥

इस तरह कालिदास ने बंगाल में निवास करने वाले सारे वैष्णवों का जूठन खाया।

सेइ कालिदास ग्रबे नीलाचले आइला ।। महाप्रभु ताँर उपर महा-कृपा कैला ॥

३९ ॥

जब यही कालिदास जगन्नाथपुरी अर्थात् नीलाचल आये, तब श्री अतन्य महाप्रभु ने उन पर महान् कृपा की।

प्रति-दिन प्रभु यदि ग्रा'न दरशने ।।जल-करङ्ग ला गोविन्द ग्राय प्रभु-सने ॥

४० ॥

श्री चैतन्य महाप्रभु प्रतिदिन नियमित रूप से जगन्नाथ जी के मन्दिर में दर्शन करने जाते और उस समय उनका निजी सेवक गोविन्द उनका कमण्डल लेकर उनके साथ-साथ जाता।

सिंह-द्वारेर उत्तर-दिके कपाटेर आड़े।बाइश 'पाहाच'-तले आछे एक निम्न गाड़े ॥

४१॥

सिंहद्वार के उत्तर में, दरवाजे के पीछे से बाईस सीढ़ियाँ मन्दिर को जाती हैं और इन सीढ़ियों के नीचे एक गड्ा है।

सेइ गाड़े करेन प्रभु पाद-प्रक्षालने । तबे करिबारे ग्राय ईश्वर-दरशने ॥

४२ ॥

श्री चैतन्य महाप्रभु इसी गड्ढे में अपने पाँव धोया करते और उसके बाद भगवान् जगन्नाथ का दर्शन करने मन्दिर में प्रवेश करते।

गोविन्देरे महाप्रभु कैराछे नियम ।। ‘मोर पाद-जल ग्रेन ना लय कोन जन’ ॥

४३॥

श्री चैतन्य महाप्रभु ने अपने सेवक गोविन्द को आदेश दे रखा था कि उनके पादप्रक्षालित जल को कोई न ले।

प्राणि-मात्र ले-इते ना पाय सेइ जल ।। अन्तरङ्ग भक्त लय करि' कोन छल ॥

४४॥

महाप्रभु की सख्त आज्ञा के कारण कोई जीव यह जल नहीं ले सकता किन्तु उनके कुछ अन्तरंग भक्त किसी न किसी युक्ति से इसे ले लेते।

एक-दिन प्रभु ताँहा पाद प्रक्षालिते ।।कालिदास आसि' ताहाँ पातिलेन हाते ॥

४५॥

एक दिन जब श्री चैतन्य महाप्रभु उसी स्थान पर अपने पाँव धो रहे ॥

, तो कालिदास वहाँ आये और जल लेने के लिए अपनी अंजुली बढ़ाई।

एक अञ्जलि, दुइ अञ्जलि, तिन अञ्जलि पिला ।तबे महाप्रभु ताँरे निषेध करिला ॥

४६॥

कालिदास ने एक अँजुली पानी पिया, फिर दूसरी और तीसरी अंजुली कर भी पानी पिया। तब श्री चैतन्य महाप्रभु ने और अधिक पीने से उन्हें ना कर दिया।

अतःपर आर ना करिह पुनर्बार ।।एतावता वाञ्छा-पूरण करिहुँ तोमार ॥

४७॥

अब फिर से इस तरह मत करना। मैंने यथासम्भव तुम्हारी इच्छा पूरी कर दी है।

सर्वज्ञ-शिरोमणि चैतन्य ईश्वर ।।वैष्णवे ताँहार विश्वास, जानेन अन्तर ॥

४८॥

श्री चैतन्य महाप्रभु सर्वश्रेष्ठ, सर्वज्ञ पूर्ण पुरुषोत्तम भगवान् हैं। इसलिए वे जान गये कि कालिदास के अन्तर में वैष्णवों के प्रति पूरी श्रद्धा है।

सेइ-गुण लञा प्रभु ताँरै तुष्ट ह-इला ।।अन्येर दुर्लभ प्रसाद ताँहारे करिला ॥

४९॥

इसी गुण के कारण श्री चैतन्य महाप्रभु ने उन्हें ऐसी कृपा से तुष्ट किया, जो अन्य किसी के लिए प्राप्त नहीं है।

बाइश ‘पाहाच'-पाछे उपर दक्षिण-दिके ।। एक नृसिंह-मूर्ति आर्छन उठिते वाम-भागे ॥

५०॥

दक्षिण दिशा में बाइस सीढ़ियों के पीछे ऊपर की ओर नृसिंह देव के विग्रह हैं, जो सीढ़ियों से चढ़कर मन्दिर जाते समय बाँई ओर पड़ती है।

प्रति-दिन ताँरे प्रभु करेन नमस्कार ।। नमस्करि' एइ श्लोक पड़े बार-बार ॥

५१॥

श्री चैतन्य महाप्रभु मन्दिर जाते समय अपने बाएँ पड़ने वाले नृसिंह भगवान् के अर्चाविग्रह को नमस्कार करते। नमस्कार करते समय वे बारम्बार निम्नलिखित श्लोक पढ़ते।

नमस्ते नर-सिंहाय प्रह्लादाह्लाद-दायिने । हिरण्यकशिपोर्वक्षः-शिला-टङ्क-नखालये ॥

५२॥

हे नृसिंहदेव, मैं आपको सादर नमस्कार करता हूँ। आप प्रह्लाद महाराज को हर्ष प्रदान करने वाले हैं। आपके नाखूनों ने हिरण्यकशिपू के वक्षस्थल को पत्थर काटने की छेनी के समान विदीर्ण कर डाला था।

इतो नृसिंहः परतो नृसिंहोयतो यतो यामि ततो नृसिंहः । बहिनृसिंहो हृदये नृसिंहोनृसिंहमादिं शरणं प्रपद्ये ॥

५३॥

इधर भगवान् नृसिंह हैं, उस ओर भी भगवान् नृसिंह हैं। मैं जहाँ भी जाता हूँ, वहाँ भगवान् नृसिंहदेव को देखता हूँ। वे मेरे हृदय के बाहर और भीतर हैं। इसलिए मैं आदि भगवान् नृसिंहदेव की शरण ग्रहण करता हूँ, जो कि पूर्ण पुरुषोत्तम भगवान् हैं।

तबे प्रभु करिला जगन्नाथ दरशन । घरे आसि' मध्याह्न करि' करिल भोजन ॥

५४॥

भगवान् नृसिंहदेव को नमस्कार करने के बाद श्री चैतन्य महाप्रभु ने भगवान् जगन्नाथ के मन्दिर में दर्शन किये। तब अपने घर आकर दोपहर के कृत्य करने के बाद उन्होंने भोजन किया।

बहिर आछे कालिदास प्रत्याशा करिया । गोविन्देरे ठारे प्रभु कहेन जानिया ॥

५५ ॥

कालिदास श्री चैतन्य महाप्रभु के शेष प्रसाद की आशा में दरवाजे के बाहर खड़े थे। यह जानते हुए महाप्रभु ने गोविन्द को संकेत किया।

महाप्रभुर इङ्गित गोविन्द सब जाने ।।कालिदासेरे दिल प्रभुर शेष-पात्र-दाने ॥

५६॥

गोविन्द श्री चैतन्य महाप्रभु के सारे संकेतों को जानता था। इसलिए उसने तुरन्त ही श्री चैतन्य महाप्रभु के भोजन का शेष प्रसाद कालिदास को दे दिया।

वैष्णवेर शेष-भक्षणेर एतेक महिमा । कालिदासे पाओयाइल प्रभुर कृपा-सीमा ॥

५७॥

वैष्णव के भोजन का शेष ग्रहण करना इतना महत्त्वपूर्ण है कि श्री चैतन्य महाप्रभु अपनी सर्वोच्च कृपा कालिदास पर अर्पित करने के लिए प्रेरित हुए।

ताते 'वैष्णवेर झुटा' खाओ छाड़ि' घृणा-लाज ।। ग्राहा हैते पाइबा निज वाञ्छित सब काज ॥

५८॥

इसलिए घृणा तथा संकोच को त्यागकर वैष्णवों के भोजन का शेष खाने का प्रयास करो, क्योंकि इस तरह से तुम्हें जीवन का वांछित लक्ष्य बत हो सकेगा।

कृष्णोर उच्छिष्ट हय 'महा-प्रसाद' नाम । ‘भक्त-शेष' हैले ‘महा-महाप्रसादाख्यान' ॥

५९ ॥

कृष्ण को अर्पित किये गये भोजन का शेष महाप्रसाद कहलाता है। और जब यह महाप्रसाद किसी भक्त द्वारा ग्रहण किया जाता है, तो यह शेष महा-महाप्रसाद बन जाता है।

भक्त-पद-धूलि आर भक्त-पद-जल । भक्त-भुक्त-अवशेष,—तिन महा-बल ॥

६०॥

भक्त के चरणों की धूल, भक्त के चरणों का प्रक्षालित जल तथा भक्त द्वारा छोड़ा गया शेष भोजन-ये तीन अत्यन्त शक्तिशाली वस्तुएँ हैं।

एइ तिन-सेवा हैते कृष्ण-प्रेमा हय । पुनः पुनः सर्व-शास्त्रे फुकारिया कय ॥

६१ ॥

इन तीनों की सेवा से मनुष्य को कृष्ण-प्रेम का परम लक्ष्य प्राप्त होता है। सारे प्रामाणिक शास्त्रों में बारम्बार पुकार-पुकारकर इसकी घोषणा की गई है।

ताते बार बार कहि,शुन भक्त-गण ।। विश्वास करिया कर ए-तिन सेवन ॥

६२।। इसलिए हे प्रिय भक्तों, कृपया मुझसे यह सुन लो, क्योंकि मैं बारम्बार आग्रहपूर्वक कहता हूँ कि इन तीनों में श्रद्धा रखो और बिना संकोच के इनकी सेवा करो।

तिन हैते कृष्ण-नाम-प्रेमेर उल्लास ।कृष्णेर प्रसाद, ताते ‘साक्षी' कालिदास ॥

६३ ॥

इन तीनों से मनुष्य को जीवन का सर्वोच्च लक्ष्य-कृष्ण-प्रेमप्राप्त होता है। यह भगवान् कृष्ण की सबसे बड़ी कृपा है। कालिदास सके प्रत्यक्ष प्रमाण ।

नीलाचले महाप्रभु रहे एइ-मते ।कालिदासे महा-कृपा कैला अलक्षिते ॥

६४॥

इस प्रकार श्री चैतन्य महाप्रभु जगन्नाथपुरी अर्थात् नीलाचल में रहे और उन्होंने कालिदास पर अप्रत्यक्ष रीति से महती कृपा प्रदान की।

से वत्सर शिवानन्द पत्नी लजा आइला ।‘पुरी-दास'-छोट-पुत्रे सङ्केते आनिला ॥

६५॥

इस वर्ष शिवानन्द सेन अपने साथ अपनी पत्नी तथा अपने सबसे छोटे पुत्र पुरीदास को भी ले आये।

पुत्र सङ्गे ला तेहो आइला प्रभु-स्थाने ।पुत्रेरे कराइली प्रभुर चरण वन्दने ॥

६६॥

शिवानन्द सेन अपने पुत्र को लेकर श्री चैतन्य महाप्रभु का दर्शन करने उनके निवास पर गये। उन्होंने अपने पुत्र से महाप्रभु के चरणकमलों पर सादर नमस्कार करवाया।

‘कृष्ण कह' बलि' प्रभु बलेन बार बार ।तबु कृष्ण-नाम बालक ना करे उच्चार ॥

६७॥

श्री चैतन्य महाप्रभु ने उस बालक से कृष्ण नाम का उच्चारण करने के लिए बारम्बार कहा, किन्तु बालक ने पवित्र नाम का उच्चारण नहीं किया।

शिवानन्द बालकेरे बहु ग्रन करिला ।।तबु सेइ बालक कृष्ण-नाम ना कहिला ॥

६८॥

यद्यपि शिवानन्द सेन ने उस बालक से कृष्ण के पवित्र नाम का उच्चारण करवाने का काफी प्रयास किया, किन्तु बालक ने नामोच्चारण नहीं किया।

प्रभु कहे,–आमि नाम जगते लओयाइहुँ । स्थावरे पर्यन्त कृष्ण-नाम कहाइलें ॥

६९॥

श्री चैतन्य महाप्रभु ने कहा, मैंने तो सारे जगत् को कृष्ण नाम लेने के लिए प्रेरित किया। मैंने वृक्षों तथा अचर वनस्पतियों को भी पवित्र नाम का कीर्तन करने के लिए प्रेरित किया।

इहारे नारिलें कृष्ण-नाम कहाइते!। शुनिया स्वरूप-गोसाजि लागिला कहिते ॥

७० ॥

किन्तु मैं इस बालक से कृष्ण नाम नहीं कहलवा सका। यह सुनकर स्वरूप दामोदर गोस्वामी कहने लगे।

तुमि कृष्ण-नाम-मन्त्र कैला उपदेशे ।। मन्त्र पाञा कार आगे ना करे प्रकाशे ॥

७१॥

उन्होंने कहा, हे प्रभु, आप उसे कृष्ण नाम में दीक्षित कर चुके हैं। किन्तु मन्त्र प्राप्त करने के बाद वह सबों के समक्ष उसे व्यक्त नहीं करेगा।

मने मने जपे, मुखे ना करे आख्यान । एइ इहार मन:-कथा-करि अनुमान ॥

७२॥

यह बालक मन ही मन मन्त्र का जप करता है, उसे उच्च स्वर से नहीं कहता। जहाँ तक मेरा अनुमान है, यही उसका मनोभाव है।

आर दिन कहेन प्रभु,–'पड़, पुरी-दास' ।। एइ श्लोक करि' तेंहो करिला प्रकाश ॥

७३॥

एक अन्य दिन जब महाप्रभु ने उस बालक से कहा, हे पुरीदास, तुम सुनाओ। तो उसने निम्नलिखित श्लोक बनाकर सबों के सामने व्यक्त किया।

श्रवसोः कुवलयमक्ष्णोर् । अञ्जनमुरसो महेन्द्र-मणि-दाम । वृन्दावन-रमणीनांमण्डनमखिलं हरिर्जयति ॥

७४॥

श्रीकृष्ण वृन्दावन की गोपांगनाओं के कानों के लिए नीले कमल के फूल के तुल्य हैं। वे आँखों के अंजन हैं, वक्षस्थल के लिए इन्द्रनीलमणि की माला हैं और उनके आभूषण हैं। उन भगवान् श्री हरि, कृष्ण की जय हो।

सात वत्सरेर शिशु, नाहि अध्ययन ।ऐछे श्लोक करे, लोकेर चमत्कार मन ॥

७५ ॥

यद्यपि वह बालक केवल सात वर्ष का था और उसे कोई शिक्षा नहीं मिली थी, फिर भी उसने इतना अच्छा श्लोक रचा। इससे हर व्यक्ति आश्चर्यचकित हो गया।

चैतन्य-प्रभुर एइ कृपार महिमा ।।ब्रह्मादि देव ग्रार नाहि पाय सीमा ॥

७६ ॥

यह श्री चैतन्य महाप्रभु की अहैतुकी कृपा की महिमा ही है, जिसका अनुमान ब्रह्माजी एवं देवतागण भी नहीं लगा सकते।

भक्त-गण प्रभु-सङ्गे रहे चारि-मासे ।।प्रभु आज्ञा दिला सबे गेला गौड़-देशे ॥

७७॥

सारे भक्त लगातार चार महीने श्री चैतन्य महाप्रभु के साथ रहे। तब महाप्रभु ने उन्हें बंगाल लौट जाने की आज्ञा दी। इसलिए वे लौट गये।

ताँ-सबार सङ्गे प्रभुर छिल बाह्य-ज्ञान।ताँरा गेले पुनः हैला उन्माद प्रधान ॥

७८ ॥

जब तक ये भक्त नीलाचल अर्थात् जगन्नाथपुरी में रहे, श्री चैतन्य महाप्रभु ने बाह्य चेतना बनाए रखी, किन्तु उनके जाते ही महाप्रभु पुनः फष्ण-प्रेम के उन्माद में खो गये।

रात्रि-दिने स्फुरे कृष्णेर रूप-गन्ध-रस ।। साक्षादनुभवे,—ग्रेन कृष्ण-उपस्पर्श ॥

७९ ॥

श्री चैतन्य महाप्रभु रात-दिन कृष्ण के सौन्दर्य, सुगन्ध तथा रस का प्रत्यक्ष आस्वादन करने लगे, मानो वे कृष्ण का प्रत्यक्ष स्पर्श कर रहे हों।

एक-दिन प्रभु गेला जगन्नाथ-दरशने । सिंह-द्वारे दल-इ आसि' करिल वन्दने ॥

८० ॥

एक दिन जब श्री चैतन्य महाप्रभु जगन्नाथजी के मन्दिर में दर्शन के लिए गये, तो सिंहद्वार के द्वारपाल ने उनके पास पहुँचकर उन्हें नमस्कार किया।

तारे बले,–'कोथा कृष्ण, मोर प्राण-नाथ? ।।मोरे कृष्ण देखाओ' बलि' धरे तार हात ॥

८१॥

महाप्रभु ने उससे पूछा, मेरे प्राणनाथ कृष्ण कहाँ हैं? मुझे कृष्ण दिखलाओ। यह कहकर उन्होंने द्वारपाल का हाथ पकड़ लिया।

सेह कहे,---‘इँहा हय व्रजेन्द्र-नन्दन ।आइस तुमि मोर सङ्गे, कराङदरशन' ॥

८२॥

द्वारपाल ने उत्तर दिया, महाराज नन्द के पुत्र यहीं हैं। कृपया मेरे साथ आयें। मैं आपको दर्शन करा दूंगा।

‘तुमि मोर सखा, देखाह—काहाँ प्राण-नाथ?' ।एत बलि' जगमोहन गेला धरि' तार हात ॥

८३॥

श्री चैतन्य महाप्रभु ने द्वारपाल से कहा : तुम मेरे मित्र हो। कृपया ने मेरे हृदय के स्वामी को दिखला दो।' इतना कहने के बाद वे दोनों जगमोहन नामक स्थान पर गये, जहाँ सभी लोग भगवान जगन्नाथ का रीन पाते हैं।

सेह बले,---‘एइ देख श्री-पुरुषोत्तम ।नेत्र भरिया तुमि करह दरशन' ॥

८४॥

द्वारपाल ने कहा, वह देखो, श्री पुरुषोत्तम वहाँ हैं! यहाँ से आप जी भरकर भगवान् का दर्शन कर सकते हैं।

गरुड़ेर पाछे रहि' करेन दरशन ।देखेन,—जगन्नाथ हय मुरली-वदन ॥

८५॥

श्री चैतन्य महाप्रभु गरुड़ स्तम्भ के पीछे खड़े रहे और उन्होंने वहाँ से जगन्नाथ जी को देखा। किन्तु जैसे ही उन्होंने देखा, जगन्नाथ जी भगवान् कृष्ण बन गये, जो अपने मुख में वंशी धारण किये थे।

एइ लीला निज-ग्रन्थे रघुनाथ-दास । ‘गौराङ्ग-स्तव-कल्पवृक्षे' करियाछेन प्रकाश ॥

८६॥

रघुनाथ दास गोस्वामी ने अपनी पुस्तक 'गौरांगस्तव कल्पवृक्ष' में इस घटना का बहुत सुन्दर वर्णन किया है।

क्व में कान्तः कृष्णस्त्वरितमिह तं लोकय सखेत्वमेवेति द्वाराधिपमभिवदन्नुन्मद इव ।। द्रुतं गच्छ द्रष्टुं प्रियमिति तदुक्तेन धृत-तद् ।भुजान्तगराङ्गो हृदय उदयन्मां मदयति ॥

८७॥

हे द्वारपाल, हे मेरे मित्र, मेरे प्राणधन कृष्ण कहाँ हैं? मुझे उनका पनि शीघ्रता से कराओ।' श्री चैतन्य महाप्रभु ने उन्मत्त की तरह उस आरपाल को इन शब्दों से सम्बोधित किया। द्वारपाल ने उनका हाथ पकड़कर शीघ्रता में उत्तर दिया, ‘आइये, आप अपने प्रियतम को देखिये!' वे श्री चैतन्य महाप्रभु मेरे हृदय में उदय हों और मुझे भी उन्मत्त बनायें।

हेन-काले ‘गोपाल-वल्लभ-भोग लागाइल । शङ्खघण्टा-आदि सह आरति बाजिल ॥

८८॥

तभी भगवान जगन्नाथ को गोपाल वल्लभ भोग नामक भोजन अर्पित किया जा रहा था और शंख ध्वनि तथा घंटे की ध्वनि के साथ आरती की जा रही थी।

भोग सरिले जगन्नाथेर सेवक-गण । प्रसाद ला प्रभु-ठात्रि कैल आगमन ॥

८९॥

जब आरती समाप्त हो गई, तो प्रसाद बाहर लाया गया और भगवान जगन्नाथ के सेवकगण कुछ प्रसाद लेकर श्री चैतन्य महाप्रभु को देने आये।"

माला पराञा प्रसाद दिल प्रभुर हाते ।। आस्वाद दूरे रहु, झार गन्धे मन माते ॥

९० ॥

भगवान जगन्नाथ के सेवकों ने सर्वप्रथम श्री चैतन्य महाप्रभु को माला पहनाई और तब उन्हें जगन्नाथ जी का प्रसाद दिया। यह प्रसाद इतना अच्छा था कि स्वाद की बात छोड़ दें, इसकी सुगन्ध ही मन को उन्मत्त बनाने वाली थी।

बहु-मूल्य प्रसाद सेइ वस्तु सर्वोत्तम ।तार अल्प खाओयाइते सेवक करिल व्रतन ॥

९१॥

यह प्रसाद बहुमूल्य वस्तुओं से बना हुआ था। इसलिए सेवकगण उसको थोड़ा-सा अंश श्री चैतन्य महाप्रभु को खिलाना चाह रहे थे।

तार अल्प ला प्रभु जिह्वाते यदि दिला ।। आर सब गोविन्देर आँचले बान्धिला ॥

९२॥

श्री चैतन्य महाप्रभु ने प्रसाद का थोड़ा अंश चखा। शेष भाग गोविन्द ने अपने वस्त्र के छोर में बाँध लिया।

कोटि-अमृत-स्वाद पाञा प्रभुर चमत्कार । सर्वाङ्गे पुलक, नेत्रे वहे अश्रु-धार ॥

९३॥

यह प्रसाद श्री चैतन्य महाप्रभु को अमृत से करोड़ों गुना अधिक स्वादिष्ट लगा, अतएव वे पूर्णतया तुष्ट हो गये। उन्हें रोमांच हो आया और उनके नेत्रों से अविरत अश्रुधारा बहने लगी।

‘एइ द्रव्ये एत स्वाद काहाँ हैते आइल? ।।कृष्णेर अधरामृत इथे सञ्चारिल' ॥

९४॥

श्री चैतन्य महाप्रभु ने विचार किया, इस प्रसाद में ऐसा स्वाद को से आया? निश्चय ही कृष्ण के होठों के अमृत के स्पर्श से ऐसा हुआ है।

एई बुद्धये महाप्रभुर प्रेमावेश हैल ।।जगन्नाथेर सेवक देखि' सम्वरण कैल ॥

९५ ॥

यह समझकर श्री चैतन्य महाप्रभु को कृष्ण के प्रेमावेश का अनुभव हुआ, किन्तु भगवान् जगन्नाथ के सेवकों को देखकर उन्होंने अपने आपको सँभाला।

‘सुकृति-लभ्य फेला-लव'—बलेन बार-बार ।ईश्वर-सेवक पुछे,–'कि अर्थ इहार'? ॥

९६॥

महाप्रभु बारम्बार कहते रहे, बहुत ही सौभाग्य से भगवान् को अर्पित प्रसाद का एक कण मिल पाता है। जगन्नाथ मन्दिर के सेवकों ने पूछा, इसका अर्थ क्या है? प्रभु कहे,एइ ग्रे दिला कृष्णाधरामृत । ब्रह्मादि-दुर्लभ एइ निन्दये 'अमृत' ॥

९७॥

श्री चैतन्य महाप्रभु ने उत्तर दिया, ये कृष्ण द्वारा किये गये भोजन के शेष हैं, अतएव उनके होठों के स्पर्श से अमृत में परिणत हो गये हैं। यह स्वर्गिक अमृत से बढ़कर है और ब्रह्मा जैसे देवताओं के लिए भी दुर्लभ है।

कृष्णेर ग्रे भुक्त-शेष, तार 'फेला'-नाम ।।तार एक 'लव' ग्रे पाय, सेइ भाग्यवान् ॥

९८॥

कृष्ण द्वारा छोड़ा गया भोजन फेला कहलाता है। जो इसका अल्पांश भी प्राप्त कर लेता है, उसे अत्यन्त भाग्यशाली मानना चाहिए।

सामान्य भाग्य हैते तार प्राप्ति नाहि हय ।।कृष्णेर ग्राँते पूर्ण-कृपा, सेइ ताही पाय ॥

९९ ॥

जो केवल सामान्य भाग्यवान् है, उसे ऐसी कृपा प्राप्त नहीं हो सकती। केवल वे ही ऐसा शेष प्रसाद पा सकते हैं, जिन पर कृष्ण की पूर्ण कृपा हो।

‘सुकृति'-शब्दे कहे 'कृष्ण-कृपा-हेतु पुण्य' ।।सेइ याँर हय, ‘फेला पाय सेइ धन्य ॥

१००॥

सुकृति' शब्द कृष्ण कृपा से सम्पन्न होने वाले पुण्य कर्मों का द्योतक है। जो ऐसी कृपा प्राप्त करने के लिए भाग्यशाली होता है, वही भगवान् के भोजन का शेष पाता है और धन्य हो जाता है।

एत बलि' प्रभु ता-सबारे विदाय दिला ।। उपल-भोग देखिया प्रभु निज-वासा आइला ॥

१०१॥

यह कहकर श्री चैतन्य महाप्रभु ने सारे सेवकों को विदा कर दिया। फिर उपल भोग उत्सव के दर्शन करने के उपरान्त वे अपने स्थान पर लौट आये।

मध्याह्न करिया कैला भिक्षा निर्वाहण ।। कृष्णधिरामृत सदा अन्तरे स्मरण ॥

१०२॥

दोपहर के कृत्य पूरे करने के बाद श्री चैतन्य महाप्रभु ने दोपहर का भोजन किया, किन्तु वे लगातार कृष्ण के शेष प्रसाद का स्मरण करते रहे। बाह्य-कृत्य करेन, प्रेमे गरगर मन । कष्टे सम्वरण करेन, आवेश सघन ॥

१०३ ॥

श्री चैतन्य महाप्रभु अपने बाह्य कार्य तो सम्पन्न करते, किन्तु उनका मन प्रेम से पूरित रहता। वे बड़ी कठिनाई से अपने मन को रोक पाते, तो भी वह सदैव गहन भाव से अभिभूत हो उठता।

सन्ध्या-कृत्य करि' पुनः निज-गण-सङ्गे।।निभृते वसिला नाना-कृष्ण-कथा-रङ्गे ॥

१०४॥

अपने सन्ध्या कर्म समाप्त कर लेने के बाद श्री चैतन्य महाप्रभु एकान्त स्थान में अपने निजी संगियों के साथ बैठ गये और अत्यन्त हर्ष के साथ कृष्ण की लीलाओं की चर्चा की।

प्रभुर इङ्गिते गोविन्द प्रसाद आनिला ।।पुरी-भारतीरे प्रभु किछु पाठाइला ॥

१०५ ॥

श्री चैतन्य महाप्रभु के संकेत पर गोविन्द भगवान जगन्नाथ जी का प्रसाद ले आया। महाप्रभु ने कुछ प्रसाद परमानन्द पुरी तथा ब्रह्मानन्द भारती के लिए भिजवाया।

रामानन्द-सार्वभौम-स्वरूपादि-गणे । सबारे प्रसाद दिल करिया वण्टने ॥

१०६ ।। तब श्री चैतन्य महाप्रभु ने प्रसाद का कुछ अंश रामानन्द राय, पार्वभौम भट्टाचार्य, स्वरूप दामोदर गोस्वामी तथा अन्य सारे भक्तों को दिया।

प्रसादेर सौरभ्य-माधुर्य करि' आस्वादन ।। अलौकिक आस्वादे सबार विस्मित हैल मन ॥

१०७॥

जब उन सबों ने प्रसाद की असाधारण मधुरता तथा सुगन्ध का आस्वादन किया, तो हर एक का मन आश्चर्यचकित हो गया।

प्रभु कहे,–एइ सबै हय 'प्राकृत' द्रव्य । ऐक्षव, कर्पूर, मरिच, एलाइच, लवङ्ग गव्य ॥

१०८॥

रसवास, गुड़त्वक-आदि ग्रत सब । ‘प्राकृत' वस्तुर स्वाद सबार अनुभव ॥

१०९॥

श्री चैतन्य महाप्रभु ने कहा, चीनी, कपूर, काली मिर्च, इलायची, लौंग, मक्खन, मसाले तथा मुलेठी-ये सभी तो भौतिक वस्तुएँ हैं। इन सभी भौतिक वस्तुओं का स्वाद प्रत्येक ने पहले लिया है।

सेइ द्रव्ये एत आस्वाद, गन्ध लोकातीत ।।आस्वाद करिया देख,—सबार प्रतीत ॥

११०॥

महाप्रभु ने आगे कहा, किन्तु इन वस्तुओं में असामान्य स्वाद तथा सुगन्ध है। जरा चखो तो और अन्तर का अनुभव करके देखो।

आस्वाद दूरे रहु, ग्रार गन्धे माते मन ।।आपना विना अन्य माधुर्य कराय विस्मरण ॥

१११॥

स्वाद के अतिरिक्त सुगन्ध तक मन को भाती है और वह उसके आगे अन्य किसी भी मधुरता को भुला देती है।

ताते एइ द्रव्ये कृष्णाधर-स्पर्श हैल ।अधरेर गुण सब इहाते सञ्चारिल ॥

११२॥

इसलिए इससे यह समझना चाहिए कि इन सामान्य वस्तुओं में कृष्ण के होठों के दिव्य अमृत का स्पर्श हुआ है, जिससे इनमें उन होठों के सारे आध्यात्मिक गुण आ गये हैं।

अलौकिक-गन्ध-स्वाद, अन्य-विस्मारण ।महा-मादक हय एइ कृष्णाधरेर गुण ॥

११३॥

कृष्ण के होठों के गुण हैं-असाधारण अत्यन्त मोहक सुगन्ध तथा स्वाद, जो अन्य सारे अनुभवों को विस्मृत करा देते हैं।

अनेक 'सुकृते' इहा हाछे सम्प्राप्ति ।।सबे एइ आस्वाद कर करि' महा-भक्ति ॥

११४॥

यह प्रसाद अनेक पुण्य कार्यों के फलस्वरूप ही प्राप्त हुआ है। अब इसका अतीव श्रद्धा तथा भक्ति के साथ आस्वादन करो।

हरि-ध्वनि करि' सबे कैला आस्वादन । आस्वादिते प्रेमे मत्त ह-इल सबारे मन ॥

११५॥

सबों ने उच्च स्वर से हरि नाम का कीर्तन करते हुए प्रसाद का आस्वादन किया। उसका आस्वादन करते ही उनके मन प्रेमावेश से उन्मत्त न हो उठे।

प्रेमावेशे महाप्रभु ग्नबे आज्ञा दिला । रामानन्द-राय श्लोक पड़िते लागिला ॥

११६॥

प्रेमावेश में श्री चैतन्य महाप्रभु ने रामानन्द राय को कुछ श्लोक सुनाने का आदेश दिया। तब रामानन्द राय इस प्रकार बोले।

सुरत-वर्धनं शोक-नाशनं ।स्वरित-वेणुना सुष्ठ-चुम्बितम् । इतर-राग-विस्मारणं नृणां ।वितर वीर नस्तेऽधरामृतम् ॥

११७॥

हे दानवीर, कृपया हमें अपने होठों का अमृत प्रदान करें। यह अमृत भोग की कामेच्छाओं को बढ़ाता है और भौतिक जगत् में शोक को कम करता है। कृपया हमें अपने उन होठों का अमृत दें, जिनका स्पर्श आपकी दिव्य ध्वनि करने वाली वंशी करती है, क्योंकि वह अमृत सारे मनुष्यों को उनकी अन्य सारी आसक्तियों को भूल जाने के लिए प्रेरित करता है।

श्लोक शुनि' महाप्रभु महा-तुष्ट हैला ।राधार उत्कण्ठा-श्लोक पड़िते लागिला ॥

११८॥

रामानन्द राय द्वारा यह श्लोक सुनाने पर श्री चैतन्य महाप्रभु अत्यधिक तुष्ट हुए। तब उन्होंने स्वयं निम्नलिखित श्लोक सुनाया, जिसे श्रीमती राधारानी ने अत्यन्त उत्कण्ठा में कहा था।

व्रजातुल-कुलाङ्गनेतर-रसालि-तृष्णा-हरप्रदीव्यदधरामृतः सुकृति-लभ्य-फेला-लवः ।सुधा-जिदहिवल्लिका-सुदल-वीटिका-चर्वितःस मे मदन मोहनः सखि तनोति जिह्वा-स्पृहाम् ॥

११९॥

हे सखी, पूर्ण पुरुषोत्तम भगवान् कृष्ण के होठों का अद्वितीय अमृत अनेकानेक पुण्य कर्मों के बाद ही प्राप्त किया जा सकता है। वृन्दावन की सुन्दर गोपियों के लिए वह अमृत अन्य सारे स्वादों की इच्छा को दूर करता है। मदनमोहन सदैव पान खाते हैं, जो स्वर्ग के अमृत को भी मात करता है। वे निश्चित रूप से हमारी जीभ की इच्छाओं को वर्धित कर रहे हैं।

एत कहि' गौर-प्रभु भावाविष्ट हा ।दुइ श्लोकेर अर्थ करे प्रलाप करिया ॥

१२०॥

यह कहकर श्री चैतन्य महाप्रभु प्रेमावेश से विह्वल हो गये। उन्मत्त की तरह बातें करते हुए वे इन दोनों श्लोकों का अर्थ बतलाने लगे।

तनु-मन कराय क्षोभ, बाड़ाय सुरत-लोभ, | हर्ष-शोकादि-भार विनाशय । पासराय अन्य रस, जगत्करे आत्म-वश,लज्जा, धर्म, धैर्य करे क्षय नागर, शुन तोमार अधर-चरित माताय नारीर मन, जिह्वा करे आकर्षण,विचारिते सब विपरीत ॥

१२२॥

भगवान् चैतन्य ने श्रीमती राधारानी के भाव में कहा, “हे प्रेमी, आपके दिव्य होठों के कुछ गुणों का मुझे वर्णन करने दो। वे हर एक के मन तथा तन को चंचल बनाते हैं, वे भोग की कामेच्छा को बढ़ाते हैं, वे भौतिक सुख और शोक के भार को नष्ट कर देते हैं और सारे भौतिक स्वादों को भुलवा देते हैं। सारा संसार उनके वशीभूत हो जाता है। वे विशेषतया स्त्रियों की लज्जा, धर्म तथा धैर्य को विनष्ट कर देते हैं। निस्सन्देह, वे समस्त स्त्रियों के मन में उन्मत्तता को बढ़ावा देते हैं। आपके होठ जीभ के लोभ को बढ़ाकर उसे अपनी ओर आकृष्ट करते हैं। इन सब बातों पर विचार करते हुए हम देखती हैं कि आपके दिव्य होठ हमें सदैव प्याकुल बनाते हैं।

आछुक नारीर काय, कहिते वासिये लाज,तोमार अधर बड़ धृष्ट-राय ।। पुरुषे करे आकर्षण, आपना पियाइते मन,अन्य-रस सब पासराय ॥

१२३॥

हे कृष्ण, चूंकि आप पुरुष हो, इसलिए यह कोई असाधारण बात नहीं है कि आपके होठों का आकर्षण स्त्रियों के मन को क्षुब्ध करता है। किन्तु मुझे यह कहते लज्जा आती है कि आपके होठ कभी-कभी आपकी बंशी तक को आकृष्ट करते हैं, जो एक पुरुष माना जाता है। वह तुम्हारे होठों के अमृत का पान करना पसन्द करता है, इसीलिए उसे भी अन्य सारे स्थादों की विस्मृति हो जाती है।

सचेतन रहु दूरे, अचेतन सचेतन करे,तोमार अधर—बड़ वाजिकर। तोमार वेणु शुष्केन्धन, तार जन्माय इन्द्रिय-मन, | तारे आपना पियाय निरन्तर ॥

१२४॥

आपके होठों द्वारा चेतन जीवों के अतिरिक्त कभी-कभी अचेतन पदार्थ भी चेतन बना दिये जाते हैं। इसलिए आपके होठ बहुत बड़े जादूगर हैं। विडम्बना तो यह है कि यद्यपि आपकी वंशी मात्र सूखा काष्ठ है, किन्तु आपके होठ उसे अपना अमृत पिलवाते हैं। वे शुष्क काष्ठ की बनी वंशी में मन तथा इन्द्रियाँ उत्पन्न करते हैं और उसे दिव्य आनन्द प्रदान करते हैं।

वेणु धृष्ट-पुरुष हला, पुरुषाधर पिया पिया,गोपी-गणे जानाय निज-पान ।। अहो शुन, गोपी-गण, बले पिडो तोमार धन,तोमार यदि थाके अभिमान ॥

१२५॥

वह वंशी ( वेणु) अत्यन्त धृष्ट पुरुष है, जो अन्य पुरुष के होठों के वाद का बारम्बार पान करता है। यह वंशी रूपी पुरुष अपने गुणों का विज्ञापन करते हुए गोपियों से कहता है, हे गोपियों, यदि तुम्हें स्त्रियाँ होने का गर्व है, तो आगे आओ और अपनी सम्पत्ति का-भगवान् के होठों के अमृत का-भोग करो।'

तबे मोरे क्रोध करि', लज्जा भय, धर्म, छाड़ि', | छाड़ि' दिमु, कर आसि' पान ।। नहे पिमु निरन्तर, तोमाय मोर नाहिक डर,अन्ये देखों तृणेर समान ॥

१२६॥

इस पर वंशी ने क्रुद्ध होकर मुझसे कहा, 'तुम अपनी लाज, भय तथा धर्म छोड़ दो और आकर कृष्ण के होठों का पान करो। इस शर्त पर मैं उनके प्रति अपनी अनुरक्ति छोडूंगी, किन्तु यदि तुम अपनी लाज तथा भय नहीं छोड़ सकती, तो मैं निरन्तर कृष्ण के होठों को अमृत पान करती रहूँगी। मैं कुछ कुछ भयभीत हूँ, क्योंकि तुम्हें भी उस अमृत को पीने का अधिकार है, लेकिन अन्यों को मैं तिनके के बराबर मानती हूँ।

अधरामृत निज-स्वरे, सञ्चारिया सेइ बले,आकर्षय त्रिजगत्जन । आमरा धर्म-भय करि', रहि' यदि धैर्य धरि',तबे आमाय करे विड़म्बन ॥

१२७॥

कृष्ण के होठों का अमृत उनकी वंशी ध्वनि के साथ मिलकर तीनों लोकों के सारे लोगों को आकृष्ट करता है। किन्तु यदि हम गोपियाँ धर्म का आदर करने के कारण धैर्य धारण किये रहती हैं, तो यह वंशी हमारी आलोचना करती है।

नीवि खसाय गुरु-आगे, लज्जा-धर्म कराय त्यागे,केशे धरि' ग्रेन लञा ग्राय ।। आनि' कराय तोमार दासी, शुनि' लोक करे हासि',एइ-मत नारीरे नाचाय ॥

१२८ ॥

आपके होठों का अमृत तथा आपकी वंशी की ध्वनि दोनों मिलकर हमारे कमरपट्टे को ढीला कर देते हैं और हमें अपने गुरुजनों के समक्ष भी अपनी लज्जा तथा धर्म को छोड़ने के लिए प्रेरित करते हैं। मानो वे हमारे केश पकड़कर बलपूर्वक हमें ले जाते हैं और आपकी दासी बनने के लिए हमसे आत्म समर्पण कराते हैं। ये घटनाएँ सुनकर लोग हम पर हँसते हैं। इस तरह हम पूरी तरह वंशी के अधीन हो गईं हैं।

शुष्क बाँशेर लाठिखान, एत करे अपमान,एइ दशा करिल, गोसान्नि । ना सहि' कि करिते पारि, ताहे रहि मौन धरि', चोरार माके डाकि' कान्दिते नाइ ॥

१२९॥

यह वंशी मात्र बांस की सूखी लाठी है, किन्तु यह हमारी स्वामिनी बनकर इतने प्रकार से हमारा अपमान करती है कि हम दुःखद स्थिति के लिए बाध्य हो जाती हैं। भला इसको सहन करने के अतिरिक्त हम कर भी क्या सकती हैं? जब चोर दण्डित हो रहा हो, तब चोर की माता न्याय के लिए उच्च स्वर से रो नहीं सकती। इसलिए हम मात्र मौन रह जाती हैं।

अधरेर एइ रीति, आर शुन कुनीति,से अधर-सने ग्रार मेला ।। सेइ भक्ष्य-भोज्य-पान, हय अमृत-समान,नाम तार हय ‘कृष्ण-फेला' ॥

१३०॥

इन होठों का यही रीति है। जरा अन्य अन्यायों का तो विचार करो। इन होठों को जो भी वस्तु छू जाती है-चाहे भोजन, पेय या पान ही क्यों न हो-अमृत के समान बन जाती है। तब वह वस्तु कृष्ण-फेला अर्थात् कृष्ण का शेष प्रसाद कहलाती है।

से फेलार एक लव, ना पाय देवता सब,ए दम्भे केबा पातियाय? ।। बहु-जन्म पुण्य करे, तबे ‘सुकृति' नाम धरे,से 'सुकृते' तार लव पाय ॥

१३१॥

अनेक प्रार्थनाओं के बाद भी देवता ऐसे भोजन के शेष का एक कोटा-सा अंश तक नहीं पा सकते। जरा उस शेष प्रसाद के गर्व की कल्पना तो करो! जिस व्यक्ति ने अनेकानेक जन्मों तक पुण्य किये हैं। और इस तरह से भक्त बन गया है, वही ऐसे भोजन का शेष प्राप्त कर सकता है।

कृष्ण ये खाय ताम्बूल, कहे तार नाहि मूल,ताहे आर दम्भ-परिपाटी ।। तार येबा उद्गार, तारे कय 'अमृत-सार',गोपीर मुख करे 'आलबाटी' ॥

१३२॥

कृष्ण द्वारा चबाया गया पान अमूल्य है और उनके मुख से ऐसे चबाये हुए पान का शेष अमृत का सार कहलाता है। जब गोपियाँ इस उच्छिष्ट को ग्रहण करती हैं, तब उनके मुख कृष्ण के पीकदान बन जाते है।

ए-सब-तोमार कुटिनाटि, छाड़ एइ परिपाटी,वेणु-द्वारे काँहे हर' प्राण ।। आपनार हासि लागि', नह नारीर वध-भागी, देह' निजाधरामृत-दान ॥

१३३॥

इसलिए हे कृष्ण, आपने जितनी चालें इतनी दक्षता से चला रखी हैं, उन सबों को त्याग दो। अपनी वंशी की ध्वनि से गोपियों के प्राण लेने का प्रयास मत करो। अपनी हँसी तथा उपहास से आप स्त्रियों का वध करने के उत्तरदायी बन रहे हो। आपके लिए अच्छा होगा कि हमें अपने होठों के अमृत का दान देकर हमें तुष्ट करो।

कहिते कहिते प्रभुर मन फिरि' गेल ।।क्रोध-अंश शान्त हैल, उत्कण्ठा बाड़िल ॥

१३४॥

जब श्री चैतन्य महाप्रभु इस तरह बातें कर रहे थे, तब उनका मन बदल गया। उनका क्रोध शान्त हो गया, किन्तु उनका मानसिक क्षोभ बढ़ गया।

परम दुर्लभ एइ कृष्णाधरामृत । ताहा येइ पाय, तार सफल जीवित ॥

१३५॥

श्री चैतन्य महाप्रभु ने आगे कहा, कृष्ण के होठों का यह अमृत प्राप्त करना अत्यन्त दुर्लभ है, किन्तु यदि किसी को यह थोड़ा-सा भी मिल जाता है, तो उसका जीवन सफल हो जाता है।

योग्य हा केह करिते ना पाय पान ।। तथापि से निर्लज्ज, वृथा धरे प्राण ॥

१३६ ॥

जब इस अमृत को पीने के लिए समर्थ व्यक्ति इसका पान नहीं करता, तो वह निर्लज्ज व्यक्ति व्यर्थ ही जीवन धारण करता है।

अयोग्य हा ताहा केह सदा पान करे ।ग्रोग्य जन नाहि पाय, लोभे मात्र मरे ॥

१३७॥

ऐसे लोग भी हैं, जो उस अमृत को पीने के योग्य नहीं हैं, फिर भी वे उसे लगातार पीते हैं, जबकि कुछ ऐसे योग्य व्यक्ति हैं, जो उसे कभी नहीं पाते और ललचाते हुए मर जाते हैं।

ताते जानि,—कोन तपस्यार आछे बल ।।अयोग्येरे देओयाय कृष्णाधरामृत-फल ॥

१३८॥

इससे यह समझ लेना होगा कि ऐसे अयोग्य व्यक्ति ने किसी तपस्या के बल पर कृष्ण के होठों का अमृत प्राप्त किया होगा।

‘कह राम-राय, किछु शुनिते हय मन' ।।भाव जानि' पड़े राय गोपीर वचन ॥

१३९॥

श्री चैतन्य महाप्रभु ने पुनः रामानन्द राय से कहा, कृपया कुछ कहो। मैं सुनना चाहता हूँ। स्थिति समझते हुए रामानन्द राय ने गोपियों के निम्नलिखित वचन सुनाये।

गोप्यः किमाचरदयं कुशलं स्म वेणुर्दामोदाधर-सुधामपि गोपिकानाम् । भुङ्गे स्वयं यदवशिष्ट-रसं ह्रदिन्यो | हृष्यत्त्वचोऽश्रु मुमुचुस्तरवो यथार्याः ॥

१४०॥

हे गोपियों, इस वंशी ने स्वतन्त्र रूप से कृष्ण के होठों का अमृत पान करने के लिए तथा वास्तव में जिन गोपियों के निमित्त यह अमृत है, उन्हें केवल थोड़ा-सा अवशिष्ट दिलाने के लिए कौन से पुण्य कर्म किये होंगे? वंशी के पूर्वज बांस के वृक्षों ने प्रसन्नता के आँसू बहाये। उसकी माता, नदी, जिसके किनारे बाँस उगे थे, हर्ष का अनुभव करती है, इसीलिए उसके शरीर में खिले हुए कमलपुष्प रोमांच ( खडे हुए रोम) की तरह लग रहे हैं।

एइ श्लोक शुनि' प्रभु भावाविष्ट हो ।उत्कण्ठाते अर्थ करे प्रलाप करिया ॥

१४१॥

इस श्लोक का पाठ सुनकर श्री चैतन्य महाप्रभु प्रेमाविष्ट हो गये है। अत्यन्त चंचल मन से उन्मत्त व्यक्ति की तरह इसका अर्थ ऐसे करने लगे।

एहो व्रजेन्द्र-नन्दन, व्रजेर कोन कन्या-गण,अवश्य करिब परिणय । से-सम्बन्धे गोपी-गण, झारे माने निज-धन,से सुधा अन्येर लभ्य नय ॥

१४२॥

कुछ गोपियों ने अन्य गोपियों से कहा, जरा व्रजेन्द्र नन्दन कृष्ण की आश्चर्यजनक लीलाओं को तो देखो! वे निश्चित रूप से वृन्दावन की सारी गोपियों के साथ विवाह करेंगे। इसीलिए गोपियाँ निश्चिन्त हैं कि कृष्ण के होठों का अमृत उनकी निजी सम्पत्ति है और इसे कोई दूसरा नहीं भोग सकता।'

गोपी-गण, कह सब करिया विचारे कोन् तीर्थ, कोन् तप, कोन् सिद्ध-मन्त्र-जप, । एइ वेणु कैल जन्मान्तरे? ॥

१४३॥

हे गोपियों! ठीक से विचार करो कि इस वंशी ने अपने विगत वन में कितने पुण्यकर्म किये होंगे। हम नहीं जानतीं कि उसने कितने सार्थों का भ्रमण किया, कौन सी तपस्या की अथवा कौन से सिद्ध मन्त्र का जप किया।

हेन कृष्णाधर-सुधा, ये कैल अमृत मुधा, | यार आशाय गोपी धरे प्राण ।। एइ वेणु अयोग्य अति, स्थावर 'पुरुष-जाति', | सेइ सुधा सदा करे पान ॥

१४४॥

यह वंशी सर्वथा अयोग्य है, क्योंकि यह केवल जड़ बाँस का खण्ड है। इतना ही नहीं, यह पुरुष जाति की है। फिर भी यह वंशी कृष्णके होठों के उस अमृत का पान कर रही है, जो प्रत्येक प्रकार के वर्णनयोग्य अमृत की मधुरता को लाँघने वाला है। गोपियाँ उस अमृत की आशा में ही जीवित हैं।

झार धन, ना कहे तारे, पान करे बलात्कारे,पिते तारे डाकिया जानाय ।। तार तपस्यार फल, देख इहार भाग्य-बल,इहार उच्छिष्ट महा-जने खाये ॥

१४५ ॥

यद्यपि कृष्ण के होठों का अमृत एक मात्र गोपियों को धन है, किन्तु यह नगण्य लाठी जैसी वंशी बलपूर्वक उस अमृत का पान कर रही है और गोपियों को भी पीने के लिए उच्च स्वर से निमन्त्रण दे रही है। जरा इस वंशी की तपस्या तथा सौभाग्य के बल को तो देखो! बड़े-बड़े भक्त तक वंशी द्वारा कृष्ण के होठों का अमृत पान किये जाने के बाद ही उस अमृत का पान करते हैं।

मानस-गङ्गा, कालिन्दी, भुवन-पावनी नदी,कृष्ण यदि ताते करे स्नान । वेणुर झुटाधर--रस, हा लोभे परवश,सेइ काले हर्षे करे पान ॥

१४६॥

जब कृष्ण यमुना तथा मानस गंगा जैसी विश्व को पवित्र करने वाली नदियों में स्नान करते हैं, तब वे नदियाँ लोभ तथा हर्ष के साथ उनके होठों के अमृतमय रस के उच्छिष्ट का पान करती हैं।

ए-त नारी रहु दूरे, वृक्ष सब तार तीरे,तप करे पर-उपकारी ।। नदीर शेष-रस पाजा, मूल-द्वारे आकर्षिया, केने पिये, बुझिते ना पारि ॥

१४७॥

इन नदियों के अतिरिक्त, ये वृक्ष जो उनके किनारों पर महामुनियों | की तरह खड़े हैं और सारे जीवों का कल्याण करने में लगे हैं, वे अपनीजड़ों से नदी के जल को खींचकर कृष्ण के होठों के अमृत का पान करते रहते हैं। हम नहीं समझ पातीं कि वे इस तरह क्यों पान करते हैं।

निजाङ्करे पुलकित, पुष्पे हास्य विकसित, मधु-मिषे वहे अश्रु-धार ।। वेणुरे मानि' निज-जाति, आर्येर ग्रेन पुत्र-नाति, ‘वैष्णव' हैले आनन्द-विकार ॥

१४८॥

यमुना तथा गंगा नदियों के किनारे के वृक्ष सदैव प्रसन्न रहते हैं। वे अपने फूलों से हँसते और झरते मधु के रूप में अश्रु गिराते प्रतीत होते हैं। जिस तरह वैष्णव पुत्र या पौत्र के पूर्वज दिव्य आनन्द का अनुभव करते हैं, उसी तरह ये वृक्ष भी आनन्दित हैं, क्योंकि वंशी इनके परिवार की सदस्या है।

वेणुर तप जानि ग्रबे, सेइ तप करि तबे, ए- अयोग्य, आमरा—योग्या नारी ।या ना पाञा दुःखे मरि, अयोग्य पिये सहिते नारि,ताहा लागि तपस्या विचारि ।। १४९॥

गोपियों ने विचार किया, 'यह वंशी अपने पद के सर्वथा अयोग्य हैं । हम यह जानना चाहती हैं कि इस वंशी ने किस तरह की तपस्या की , जिससे कि हम भी वही तपस्या कर सकें । यद्यपि यह वंशी अयोग्य , किन्तु वह कृष्ण के होठों का अमृत पाने कर रही है। यह देखकर हम ग्य गोपियाँ दुःख के मारे मरी जा रही हैं। इसलिए हमें वंशी द्वारा विगत वन में की हुई तपस्या पर विचार करना चाहिए।

एतेक प्रलाप करि', प्रेमावेशे गौरहरि,सङ्गे ला स्वरूप-राम-राय ।। कभु नाचे, कभु गाय, भावावेशे मूच्र्छा ग्राय, एइ-रूपे रात्रि-दिन ग्राय ॥

१५०॥

इस प्रकार उन्मत्त पुरुष की तरह बातें करते हुए श्री चैतन्य महाप्रभुप्रेमाविष्ट हो गये। वे स्वरूप दामोदर गोस्वामी तथा रामानन्द राय-इन अपने दो मित्रों के संग कभी नृत्य करते, कभी गाते, तो कभी प्रेमावेश में मूर्छित हो जाते। श्री चैतन्य महाप्रभु अपने दिन तथा अपनी रातें इसी प्रकार बिताते।

स्वरूप, रूप, सनातन, रघुनाथेर श्री-चरण,शिरे धरि करि ग्रार आश ।। चैतन्य-चरितामृत, अमृत हैते परामृत,गाय दीन-हीन कृष्णदास ॥

१५१॥

स्वरूप, रूप, सनातन तथा रघुनाथ दास की कृपा की आशा करते हुए तथा उनके चरणकमलों को सिर पर धारण करते हुए मैं, अत्यन्त पतित कृष्णदास, श्री चैतन्य-चरितामृत महाकाव्य का गायन कर रहा है, जो कि दिव्य आनन्द रूपी अमृत से भी मधुर है।

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