← श्रीमद्भागवतम् स्कन्ध 1 की सूची

अध्याय चौदह: भगवान कृष्ण का अदृश्य होना

1.14सूत उवाचसम्प्रस्थिते द्वारकायां जिष्णौ बन्धुदिहृक्षया ।

ज्ञातुं च पुण्यश्लोकस्य कृष्णस्य च विचेष्टितम्‌ ॥

१॥

सूतः उबाच--सूत गोस्वामी ने कहा; सम्प्रस्थिते--जाकर; द्वारकायाम्‌--द्वारका नगरी में; जिष्णौ--अर्जुन; बन्धु--मित्रों तथासम्बन्धियों से; दिहक्षया--मिलने के लिए; ज्ञातुमू--जानने के लिए; च--भी; पुण्य-शलोकस्य--जिनका यश वैदिक स्तोत्रोंद्वारा गाया जाता है; कृष्णस्य--भगवान्‌ कृष्ण का; च--तथा; विचेष्टितम्‌--अगला कार्यक्रम ।

श्री सूत गोस्वामी ने कहा : भगवान्‌ श्रीकृष्ण तथा अन्य मित्रों को मिलने तथा भगवान्‌ सेउनके अगले कार्यकलापों के विषय में जानने के लिए अर्जुन द्वारका गये।

"

व्यतीता: कतिचिन्मासास्तदा नायात्ततोर्जुन: ।

ददर्श घोररूपाणि निमित्तानि कुरूद्वह: ॥

२॥

व्यतीताः--व्यतीत करके; कतिचित्‌--कुछ; मासाः --महीने; तदा--उस समय; न आयात्‌--नहीं लौटा; ततः--वहाँ से;अर्जुन:--अर्जुन; ददर्श--देखा; घोर-- भयानक; रूपाणि-- दृश्य ; निमित्तानि--विभिन्न कारण; कुरु-उद्बह:--महाराज युधिष्ठिरनेकुछ मास बीत गये, किन्तु अर्जुन वापस नहीं लौटे।

तब महाराज युथ्िष्ठिर को कुछअपशकुन दिखने लगे, जो अपने आप में अत्यन्त भयानक थे।

"

कालस्य च गति रौद्रां विपर्यस्तर्तुधर्मिण: ।

पापीयसी नृणां वार्ता क्रोधलोभानृतात्मनाम्‌ ॥

३॥

कालस्य--शाश्वत समय की; च--भी; गतिम्‌--दिशा; रौद्रामू-- भयानक; विपर्यस्त--विपरीत; ऋतु--मौसम की; धर्मिण:--नियमितताएँ; पापीयसीम्‌--पापी; नृणाम्‌--मनुष्य की; वार्तामू--जीविका का साधन; क्रोध--क्रोध; लोभ--लोभ; अनृत--झूठ; आत्मनामू--लोगों का।

उन्होंने देखा कि सनातन काल की गति बदल गई है और यह अत्यन्त भयावह था।

ऋतु-सम्बन्धी नियमितताओं में व्यतिक्रम हो रहे थे।

सामान्य लोग अत्यन्त लालची, क्रोधी तथाधोखेबाज हो गये थे।

वे देख रहे थे कि वे सभी जीविका के अनुचित साधन अपना रहे थे।

"

जिह्मप्रायं व्यवहतं शाठद्यमिश्र॑ च सौहदम्‌ ।

पितृमातृसुहृदभ्रातृदम्पतीनां च कल्कनम्‌ ॥

४॥

जिहा-प्रायम्‌-- धोखा देना; व्यवहतम्‌--समस्त सामान्य लेन-देन के कार्यों में; शाउद्य--कपट; मिश्रम्‌-- अपमिश्रित; च--तथा;सौहदम्‌-मैत्रीपूर्ण शुभचिन्तकों से सम्बन्धित; पितृ-पिता; मातृ--माता-सम्बन्धी; सुहत्--शुभचिन्तक; भ्रातृ--निजी भाई;दम्‌-पतीनाम्‌--पति-पत्ती-विषयक; च--भी; कल्कनम्‌--पारस्परिक कलहसारे सामान्य लेन-देन, यहाँ तक कि मित्रों के बीच के व्यवहार तक, कपट के कारणदूषित हो गये थे।

पारिवारिक मामलों में पिता, माता तथा पुत्रों के बीच, शुभचिन्तकों के बीचतथा भाई-भाई के बीच सदैव गलतफहमी होती थी।

यहाँ तक कि पति तथा पत्नी के बीच भीसदैव तनाव तथा झगड़ा होता रहता था।

"

निमित्तान्यत्यरिष्टानि काले त्वनुगते नृणाम्‌ ।

लोभाद्यधर्मप्रकृति दृष्ठोवाचानुजं नृप: ॥

५॥

निमित्तानि--कारण; अति--गम्भीर; अरिष्टानि--अशुभ लक्षण, अपशकुन; काले--कालक्रम में; तु--लेकिन; अनुगते--चला जाना; नृणाम्‌--मानव जाति का; लोभ-आदि--यथा लालच; अधर्म--अधर्म; प्रकृतिमू--आदतें; दृष्टा--देख कर;उवाच--कहा; अनुजम्‌--छोटे भाई से; नृप:--राजा ने।

कालक्रम में ऐसा हुआ कि लोग लोभ, क्रोध, गर्व इत्यादि के अभ्यस्त हो गये।

महाराजयुधिष्टिर ने इन सब अपशकुनों को देखकर अपने छोटे भाई से कहा।

"

युधिष्टिर उवाचसम्प्रेषितो द्वारकायां जिष्णुर्बन्धुदिहक्षया ।

ज्ञातुं च पुण्यश्लोकस्य कृष्णस्य च विचेष्टितम्‌ ॥

६॥

युथिष्ठिर: उबाच--महाराज युधिष्ठिर ने कहा; सम्प्रेषित:--गया हुआ है; द्वारकायाम्‌--द्वारका; जिष्णु:--अर्जुन; बन्धु--मित्रोंसे; दिहक्षया--मिलने के लिए; ज्ञातुमू--जानने के लिए; च--भी; पुण्य-शइलोकस्य-- भगवान्‌ का; कृष्णस्य-- श्रीकृष्ण का;च--तथा; विचेष्टितम्‌-कार्यक्रम

महाराज युधिष्ठिर ने अपने छोटे भाई भीमसेन से कहा : मैंने अर्जुन को द्वारका भेजा था किवह अपने मित्रों से भेंट कर आये और भगवान्‌ श्रीकृष्ण से उनका कार्यक्रम जानता आये।

"

गताः सप्ताधुना मासा भीमसेन तवानुज: ।

नायाति कस्य वा हेतोरनहिं वेदेदमझसा ॥

७॥

गता:--बीत चुके; सप्त--सात; अधुना--इस समय तक; मासा:--महीने; भीमसेन--हे भीमसेन; तब--तुम्हारा; अनुज: --छोटा भाई; न--नहीं; आयाति--आता है; कस्य--किसलिए; वा--अथवा; हेतो: --कारण; न--नहीं; अहम्‌-मैं; वेद--जानता हूँ; इदम्‌--यह; अज्जसा--वास्तव में ।

जब से वह गया है, तब से सात मास बीत चुके हैं, फिर भी वह लौटा नहीं।

मुझे ठीक सेपता नहीं है कि वहाँ क्‍या हो रहा है।

"

अपि देवर्षिणादिष्ट: स कालोउयमुपस्थित: ।

यदात्मनोज्भमाक्रीडं भगवानुत्सिसृक्षति ॥

८॥

अपि--क्या; देव-ऋषिणा--देवर्षि ( नारद ) द्वारा; आदिष्ट:--आदेश दिया गया; सः--वह; काल:--शाश्वत समय; अयम्‌--यह; उपस्थित:--आ चुका है; यदा--जब; आत्मन:--अपने आप; अड्डम्-- अंश; आक्रीडम्‌--प्राकट्य; भगवान्‌-- भगवान्‌हउत्सिसृक्षति--छोड़ने जा रहे हैं।

क्या वे अपनी मर्त्यलोक की लीलाओं को छोड़ने जा रहे हैं, जैसा देवर्षि नारद ने इंगितकिया था? कया वह समय आ भी चुका है?"

यस्मान्न: सम्पदो राज्यं दारा: प्राणा: कुलं प्रजा: ।

आसन्सपतलविजयो लोकाश्व यदनुग्रहात्‌ ॥

९॥

यस्मात्‌--जिससे; नः--हमारा; सम्पदः--ऐश्वर्य; राज्यमू--राज्य; दारा:--पत्नियाँ; प्राणा:--जीवनाधार; कुलम्--वंश;प्रजा:--प्रजागण; आसन्‌--सम्भव हुए; सपतल--प्रतियोगी; विजय:--जीतकर; लोका:--उच्च लोकों में भावी निवास; च--तथा; यत्‌--जिसके; अनुग्रहात्‌--अनुग्रह से

केवल उन्हीं से हमारा सारा राजसी ऐश्वर्य, अच्छी पत्नियाँ, जीवन, सन्तान, प्रजा के ऊपरनियंत्रण, शत्रुओं पर विजय तथा उच्चलोकों में भावी निवास, सभी कुछ सम्भव हो सका।

यहसब हम पर उनकी अहैतुकी कृपा के कारण है।

"

पश्योत्पातान्नरव्याप्न दिव्यान् भौमान्‌ सदैहिकान्‌ ।

दारुणान्‌ शंसतोदूराद्धयं नो बुद्धिमोहनम्‌ ॥

१०॥

पश्य--जरा देखो तो; उत्पातान्‌--उत्पातों को; नर-व्याप्र--हे बाघ-सहश बलवाले मनुष्य; दिव्यानू--आकाश की या ग्रहों केप्रभाव से घटनेवाली; भौमान्‌--पृथ्वी पर की घटनाएँ; स-दैहिकान्--शरीर तथा मन की घटनाएँ; दारुणान्‌--अत्यन्तखतरनाक; शंसतः--सूचित करनेवाली; अदूरात्--निकट के भविष्य में; भयम्-- भय, खतरा; नः--हमारी; बुद्धि--बुद्धि को;मोहनम्‌--मोहग्रस्त करनेवाला।

हे पुरुषव्याप्र, जरा देखो तो कि दैवी प्रभावों, पृथ्वी की प्रतिक्रियाओं तथा शारीरिकवेदनाओं के कारण उत्पन्न होने वाली कितनी खतरनाक आपदाएँ हमारी बुद्धि को मोहित करकेनिकट के भविष्य में आने वाले खतरे की सूचना दे रही हैं।

"

ऊर्वक्षिबाहवो मद्मं स्फुरन्त्यड्ग पुन: पुनः ।

वेपथुश्रापि हृदये आराद्यास्यन्ति विप्रियम्‌ ॥

११॥

ऊरु--जाँचें; अक्षि--आँखें; बाहव:-- भुजाएँ; महाम्‌-- मेरे; स्फुरन्ति--फड़कते हैं; अड्र--शरीर का बाँया भाग; पुनः पुन:--बारम्बार; वेपथु;:-- धड़कनें; च-- भी; अपि--निश्चय ही; हृदये--हृदय में; आरात्‌--डर के मारे; दास्यन्ति--सूचित कर रहे हैं;विप्रियम्-- अशुभ, अनिष्ट ।

मेरे शरीर का बाँयाँ भाग, मेरी जाँघें, भुजाएँ तथा आँखें बारम्बार फड़क रही हैं।

भय से मेराहृदय धड़क रहा है।

ये सब अनिष्ट घटना को सूचित करने वाले हैं।

"

शिवैषोद्यन्तमादित्यमभिरौत्यनलानना ।

मामड़ सारमेयोयमभिरेभत्यभीरुवत् ॥

१२॥

शिवा--सियारिन; एषा--यह; उद्यन्तम्‌--उगता; आदित्यम्‌--सूर्य को; अभि--की ओर; रौति--रोती हुई; अनल--अग्नि;आनना- मुँह; माम्‌-मुझको; अड्ग--हे भीम; सारमेय: --कुत्ता; अयमू--यह; अभिरेभति-- भूकता है; अभीरु -वत्‌--भयरहित |

हे भीम, जरा देखो तो यह सियारिन किस तरह उगते हुए सूर्य को देखकर रो रही है औरअग्नि उगल रही है और यह कुत्ता किस तरह निर्भय होकर, मुझ पर भूक रहा है।

"

शस्ता: कुर्वन्ति मां सव्यं दक्षिणं पशवोपरे ।

वाहांश्व पुरुषव्याप्र लक्षये रूतो मम ॥

१३॥

शस्ता:--गाय जैसे उपयोगी पशु; कुर्वन्ति--रखते हैं; माम्‌--मुझको ; सव्यम्‌--बाईं ओर; दक्षिणम्‌--प्रदक्षिणा करते हुए;'पशव: अपरे--अन्य पशु, यथा गधे; वाहान्-घोड़े ( वाहक ); च--भी; पुरुष-व्याप्र--हे पुरुषों में बाघ; लक्षये--मैं देख रहाहूँ; रूदतः--रोते हुए; मम--मेरे हे भीमसेन, हे पुरुष-व्याप्र

अब गाय जैसे उपयोगी पशु मेरी बाई ओर से निकले जा रहे हैंऔर गधे जैसे निम्न पशु, मेरी प्रदक्षिणा कर रहे हैं।

मेरे घोड़े मुझे देखकर रोते प्रतीत होते हैं।

"

मृत्युदूत: कपोतोयमुलूक: कम्पयन्‌ मन: ।

प्रत्युलुकश्च कुह्ानैर्विश्व॑ वै शून्यमिच्छत: ॥

१४॥

मृत्यु-- मृत्यु का; दूतः--दूत; कपोतः-- कबूतर; अयम्‌--यह; उलूक: --उल्लू; कम्पयन्‌--कँपाती हुई; मनः--मन;प्रत्युलूक:--उल्लुओं के प्रतियोगी, कौवे; च--तथा; कुह्मानैः--चीख; विश्वम्‌--ब्रह्माण्ड; बै-- अथवा; शून्यम्-शून्य;इच्छत:--चाहते हैं।

जरा देखो तो! यह कबूतर मानो मृत्यु का दूत हो।

उलल्‍लुओं तथा उनके प्रतिद्वन्द्दी कौवों कीचीख मेरे हृदय को दहला रही है।

ऐसा प्रतीत होता है मानो वे सम्पूर्ण ब्रह्माण्ड को शून्य बनादेना चाहते हैं।

"

धूत्रा दिश: परिधय: कम्पते भू: सहाद्विभि: ।

निर्घातश्च महांस्तात साक॑ च स्तनयित्नुभि: ॥

१५॥

धूप्रा:-- धुँधली; दिश:--सभी दिशाएँ; परिधय: --मंडल; कम्पते--काँपती हुईं; भूः--पृथ्वी; सह अद्विभि:--पर्वतों समेत;निर्घा:--आकाश से वज़्पात; च-- भी; महान्‌--विशाल; तात--हे भीम; साकम्‌--सहित; च-- भी; स्तनयित्नुभि: --बिनाबादल के गर्जन।

जरा देखो तो, किस तरह धुँआ आकाश को घेरे हुए है।

ऐसा प्रतीत हो रहा है मानो पृथ्वीतथा पर्वत काँप रहे हों।

बिना बादलों की यह गर्जन तो जरा सुनो और आकाश से गिरते ब्रजपातको तो देखो!" वायुर्वाति खरस्पर्शों रजसा विसृज॑स्तम: ।

असूग वर्षन्ति जलदा बीभत्समिव सर्वत: ॥

१६॥

वायु:--वायु; वाति--बह रही है; खर-स्पर्श:--तेजी से; रजसा--धूल से; विसृजन्‌--उत्पन्न करते; तम: --अँधेरा; असृक्‌ --रक्त; वर्षन्ति--बरसा रहे हैं; जलदाः--बादल; बीभत्सम्‌-- भयानक; इब--सहश; सर्वतः--सर्वत्र

वायु तेजी से बह रही है और वह सर्वत्र धूल बिखरा कर अँधेरा उत्पन्न कर रही है।

बादलसर्वत्र रक्तिम आपदाओं की वर्षा कर रहे हैं।

"

सूर्य हतप्रभं पश्य ग्रहमर्द मिथो दिवि ।

ससह्डुलैर्भूतगणैज्वलिते इव रोदसी ॥

१७॥

सूर्यमू--सूर्य को; हत-प्रभम्‌--क्षीण पड़ती किरणों वाले; पश्य--जरा देखो; ग्रह-मर्दम्‌--तारों की भिड़न्त; मिथ:--परस्पर;दिवि--आकाश् में; स-सह्ढुलैः --एक दूसरे से मिलकर; भूत-गणै:--जीवों द्वारा; ज्वलिते--जलाया जाकर; इब--मानो;रोदसी--रो रहा होसूर्य की किरणें मन्द पड़ रही हैं और तारे परस्पर भिड़ रहे प्रतीत हो रहे हैं।

भ्रमित जीवजलते हुए तथा रोते प्रतीत हो रहे हैं।

"

नद्यो नदाश्व क्षुभिता: सरांसि च मनांसि च ।

न ज्वलत्यग्निराज्येन कालोयं कि विधास्यति ॥

१८॥

नद्यः--नदियाँ; नदा: च--तथा सहायक नदियाँ; क्षुभिता:--सभी विश्लुब्ध; सरांसि--जलाशय; च--तथा; मनांसि--मन;च--भी; न--नहीं; ज्वलति-- जलती है; अग्नि:--अग्नि; आज्येन--घी की सहायता से; काल:--काल, समय; अयम्‌--यहकितना असामान्य है; किम्‌--क्या; विधास्यति--होनेवाला है।

नदियाँ, नाले, तालाब, जलाशय तथा मन सभी विश्षुब्ध हैं।

घी से अग्नि नहीं जल रही हैं,यह कैसा असामान्य समय है ? आखिर क्‍या होने वाला है?"

न पिबन्ति स्तनं वत्सा न दुह्मन्ति च मातरः: ।

रुदन्त्यश्रुमुखा गावो न हृष्यन्त्यृषभा ब्रजे ॥

१९॥

न--नहीं; पिबन्ति--पीते हैं; स्तनम्‌-- थन को; वत्सा:--बछड़े; न--नहीं; दुह्मन्ति--दुहने देती हैं; च-- भी; मातर:--गाएँ;रुदन्ति--रोती हैं; अश्रु-मुखा:--आँसुओं से युक्त मुँह; गाव:--गाएँ; न--नहीं; हृष्यन्ति-- प्रसन्न होते हैं; ऋषभा: --बैल;ब्रजे--चरागाह में

बछड़े न तो गौवों के थनों में मुँह लगा रहे हैं, न गौवें दूध देती हैं।

वे आँखों में आँसू भरेखड़ी-खड़ी रम्भा रही हैं और बैलों को चरागाहों में कोई प्रसन्नता नहीं हो रही है।

"

दैवतानि रुदन्तीव स्विद्यन्ति ह्युच्वलन्ति च ।

इमे जनपदा ग्रामा: पुरोद्यानाकराश्रमा: ।

भ्रष्टश्रियो निरानन्दा: किमघं दर्शयन्ति न: ॥

२०॥

दैवतानि--मन्दिरों के अर्चाविग्रह; रुदन्ति--रोते प्रतीत हो रहे हैं; इब--सहश; स्विद्यन्ति--पसीज रहे हैं; हि--निश्चय ही;उच्चलन्ति--मानो बाहर जा रहे हों; च--भी; इमे--ये; जन-पदा: --शहर, नगर; ग्रामा:--गाँव; पुर--कस्बे; उद्यान--बगीचे;आकर--खानें; आश्रमा:--कुटिया; भ्रष्ट--रहित; थ्रिय: --सौन्दर्य से; निरानन्दा:--समस्त आनन्द से विहीन; किमू--किसतरह की; अघम्‌--आपत्तियाँ; दर्शबन्ति-- प्रकट होने वाली हैं; नः--हम पर।

मन्दिर में अर्चाविग्रह रोते, शोक करते तथा पसीजते प्रतीत हो रहे हैं।

ऐसा लगता है कि वेप्रयाण करनेवाले हैं।

सारे नगर, ग्राम, कस्बे, बगीचे, खानें तथा आश्रम अब सौन्दर्यविहीन तथासमस्त आनन्द से रहित हैं।

मैं नहीं जानता कि हम पर किस तरह की विपत्तियाँ आनेवाली हैं।

"

मन्य एवैर्महोत्पातैर्नून भगवत: पदै: ।

अनन्यपुरुषश्रीभिहीना भूहतसौभगा ॥

२१॥

मन्ये--मैं मान लेता हूँ; एतैः--इन सबसे; महा--महान्‌; उत्पातैः--उत्पातों से; नूनमू--के अभाव में; भगवतः--भगवान्‌ का;पदैः--पाँव के तलवे में चिह्न; अनन्य--असामान्य; पुरुष--परम पुरुष का; श्रीभिः--शुभ चिह्नों से; हीना--विहीन; भू:--पृथ्वी; हत-सौभगा--सौभाग्य से रहित।

मैं सोचता हूँ कि पृथ्वी पर की ये सारी उथल-पुथल विश्व के सौभाग्य की किसी बहुत बड़ीहानि को सूचित करनेवाले हैं।

संसार भाग्यशाली था कि उस पर भगवान्‌ के चरणकमलों केपदचिन्ह अंकित हुए।

किन्तु ये लक्षण यह सूचित कर रहे हैं कि अब आगे ऐसा नहीं रह पाएगा।

"

इति चिन्तयतस्तस्य दृष्टारिप्टेन चेतसा ।

राज्ञ: प्रत्यागमद्‌ ब्रह्मन्‌ यदुपुर्या: कपिध्वज: ॥

२२॥

इति--इस तरह; चिन्तयत:--अपने आप सोचते हुए; तस्थ--उनका; दृष्टा--देखकर; अर्ष्टिन--अपशकुन से; चेतसा--मन से;राज्ः--राजा को; प्रति--वापस; आगमत्‌-- आया; ब्रह्मनू-हे ब्रह्माण; यदु-पुर्या:--यदुओं के राज्य से; कपि-ध्वज:--अर्जुन

हे ब्राह्मण शौनक, जब महाराज युधिष्ठिर उस समय पृथ्वी पर इन अशुभ लक्षणों को देख रहेथे और अपने मन में इस प्रकार सोच रहे थे, तभी अर्जुन यदुओं की पुरी ( द्वारका ) से वापस आगये।

"

तं पादयोर्निपतितमयथापूर्वमातुरम्‌ ।

अधोवदनमब्बिन्दून्‌ सृजन्तं नयनाब्जयो: ॥

२३॥

तम्‌--उसको ( अर्जुन को ); पादयो:--पाँवों पर; निपतितम्‌--गिर कर; अयथा-पूर्वम्--अपूर्व रीति से; आतुरम्‌--खिन्न; अधः-वदनम्‌--मुख नीचा किये; अप्‌-बिन्दून्--जल के बिन्दु; सृजन्तम्‌--उत्पन्न करते हुए; नयन-अब्जयो:--कमल-जैसे नेत्रों से।

जब उसने राजा के चरणों पर नमन किया, तो राजा ने देखा कि उनकी निराशा अभूतपूर्वथी।

उनका सिर नीचे झुका था और उनके कमल-नेत्रों से आँसू झर रहे थे।

"

विलोक्योद्विग्नहदयो विच्छायमनुजं नृप: ।

पृच्छति सम सुहन्मध्ये संस्मरज्नारदेरितम्‌ ॥

२४॥

विलोक्य--देखकर; उद्विग्न--चिन्तित; हृदय: --हृदय; विच्छायमू--पीला चेहरा; अनुजम्‌--अर्जुन को; नृप:--राजा ने; पृच्छतिस्म--पूछा; सुहत्‌-मित्रों के; मध्ये--मध्य में; संस्मरन्‌--स्मरण करते हुए; नारद--नारदमुनि द्वारा; ईरितम्‌--सूचित

हृदय की उद्धिग्नताओं के कारण अर्जुन को पीला हुआ देखकर, राजा ने नारदमुनि द्वाराबताये गये संकेतों का स्मरण करते हुए, मित्रों के मध्य में ही उनसे पूछा।

"

युधिष्टिर उवाचकच्दानर्तपुर्या न: स्वजना: सुखमासते ।

मधुभोजदशाहर्हिसात्वतान्धकवृष्णय: ॥

२५॥

युथिष्ठटिर: उवाच--युधिष्ठिर ने कहा; कच्चित्‌--क्या; आनर्त-पुर्याम्‌-द्वारका में; न:--हमारे; स्व-जना:--सम्बन्धी; सुखम्‌--सुखपूर्वक; आसते--दिन बिता रहे हैं; मधु--मधु; भोज-- भोज; दशाई--दशाई; आई--आई; सात्वत--सात्वत; अन्धक--अन्धक; वृष्णय:--वृष्णि परिवार के ।

महाराज युधिष्ठिर ने कहा : मेरे भाई, मुझे बताओ कि हमारे मित्र तथा सम्बन्धी, यथा मधु,भोज, दशाई, आह, सात्वत, अन्धक तथा यदुवंश के सारे सदस्य, अपने दिन सुख से बिता रहे हैंन?"

शूरो मातामह: कच्वित्स्वस्त्यास्ते वाथ मारिष: ।

मातुल: सानुज: कच्चित्कुशल्यानकदुन्दुभि: ॥

२६॥

शूरः--शूरसेन; मातामह:--नाना; कच्चित्‌--क्या; स्वस्ति--सभी शुभ; आस्ते--अपने दिन बिता रहे हैं; वा--अथवा; अथ--अतएव; मारिष: --आदरणीय; मातुल:--मामा; स-अनुज:--अपने छोटे भाइयों सहित; कच्चित्--क्या; कुशली--सभीकुशल; आनक-दुन्दुभि:--वसुदेव ।

मेरे आदरणीय नाना शूरसेन प्रसन्न तो हैं? तथा मेरे मामा वसुदेव तथा उनके छोटे भाई ठीक से तो हैं?"

सप्त स्वसारस्तत्पत्न्यो मातुलान्य: सहात्मजा: ।

आसते सस्नुषा: क्षेमं देवकीप्रमुखा: स्वयम्‌ ॥

२७॥

सप्त--सात; स्व-सार:--परस्पर बहनें; तत्‌-पत्य:--उनकी पत्ियाँ; मातुलान्य:--मौसियाँ; सह--के साथ; आत्म-जा:--पुत्रतथा पौत्र; आसते--सभी हैं; सस्नुषा:--अपनी बहुओं सहित; क्षेमम्‌--सुख; देवकी--देवकी ; प्रमुखा:--अग्रणी; स्वयम्‌--स्वयं।

देवकी इत्यादि उनकी सातों पत्नियाँ परस्पर बहिनें हैं।

वे तथा उनके पुत्र एवं बहुएँ सब सुखीतो हैं?"

कच्चिद्राजाहुको जीवत्यसत्पुत्रोस्य चानुज: ।

हृदीकः ससुतोक्रूरो जयन्तगदसारणा: ॥

२८॥

आसते कुशलं कच्चिद्ये च शत्रुजिदादय: ।

कच्चिदास्ते सुखं रामो भगवान्‌ सात्वतां प्रभु: ॥

२९॥

कच्चित्--क्या; राजा--राजा; आहुक: --उग्रसेन का अन्य नाम; जीवति--अब भी जीवित है; असत्‌--शैतान, दुष्ट; पुत्र: --पुत्र; अस्य--उनका; च--भी; अनुज: --छोटा भाई; हृदीक: --हृदीक; स-सुतः --अपने पुत्र कृतवर्मा समेत; अक्वूर:--अक्रूर;जयन्त--जयन्त; गद--गद; सारणा:--सारण; आसते--सब हैं; कुशलम्‌-- आनन्द से; कच्चित्‌--क्या; ये--वे; च-- भी;शत्रुजितू--शत्रुजित; आदय:--आदि; कच्चित्‌--क्या; आस्ते--वे हैं; सुखम्‌-- अच्छी तरह; राम:--बलराम; भगवान्‌ --भगवान्‌; सात्वताम्-भक्तों के; प्रभु:--रक्षक ।

क्या उग्रसेन जिसका पुत्र दुष्ट कंस था तथा उनका छोटा भाई अब भी जीवित हैं? क्‍याहृदीक तथा उसका पुत्र कृतवर्मा कुशल से हैं? क्या अक्रूर, जयन्त, गद, सारण तथा शत्रुजितप्रसन्न हैं ? भक्तों के रक्षक भगवान्‌ बलराम कैसे हैं ?"

प्रद्युम्न: सर्ववृष्णीनां सुखमास्ते महारथ: ।

गम्भीररयोनिरुद्धो वर्धती भगवानुत ॥

३०॥

प्रद्युम्न:--प्रद्युम्न ( भगवान्‌ कृष्ण के पुत्र ); सर्व--सभी; वृष्णीनाम्‌--वृष्णि-परिवार के सदस्यों का; सुखम्‌--सुख; आस्ते--हैं; महा-रथ:--महान्‌ सेनापति; गम्भीर--गहराई से; रयः--दक्षता; अनिरुद्ध:--अनिरुद्ध ( कृष्ण का पौत्र ); वर्धते--बढ़ता है;भगवान्‌-- भगवान्‌; उत--अवश्य चाहिए।

वृष्णि-कुल के महान्‌ सेनापति प्रद्युम्न कैसे हैं? वे प्रसन्न तो हैं? और भगवान्‌ के पूर्ण अंशअनिरुद्ध ठीक से तो हैं?"

सुषेणश्चारुदेष्णश्व साम्बो जाम्बवतीसुत: ।

अन्ये च कार्णिणप्रवरा: सपुत्रा ऋषभादय: ॥

३१॥

सुषेण: --सुषेण; चारुदेष्ण: --चारुदेष्ण; च--तथा; साम्ब:--साम्ब; जाम्बवती-सुतः--जाम्बवती का पुत्र; अन्ये-- अन्य;च--भी; कार्णिणग-- भगवान्‌ कृष्ण के पुत्र; प्रवरा:--सेना-नायक; स-पुत्रा:--अपने-अपने पुत्रों सहित; ऋषभ--ऋष भ;आदय:--त्यादि ।

कृष्ण के सभी सेना-नायक पुत्र यथा सुषेण, चारुदेष्ण, जाम्बवती-पुत्र साम्ब तथा ऋषभअपने-अपने पुत्रों समेत ठीक से तो रह रहे हैं ?"

तथैवानुचरा: शौरे: श्रुतदेवोद्धवादय: ।

सुनन्दनन्दशीर्षण्या ये चान्ये सात्वतर्षभा: ॥

३२॥

अपि स्वस्त्यासते सर्वे रामकृष्णभुजाश्रया: ।

अपि स्मरन्ति कुशलमस्माकं बद्धसौहदा: ॥

३३॥

तथा एव--इसी प्रकार; अनुचरा:--नित्य-संगी; शौरे:-- भगवान्‌ श्रीकृष्ण के, यथा; श्रुतदेव-- श्रुतदेव; उद्धव-आदय:--उद्धवतथा अन्य; सुनन्द--सुनन्द; नन्द--नन्द; शीर्षण्या:-- अन्य नायक; ये--वे सब; च--तथा; अन्ये--अन्य; सात्वत--मुक्त जीव;ऋषभा:-- श्रेष्ठ पुरुष; अपि--यदि; स्वस्ति--कुशल से; आसते-हैं; सर्वे--वे सब; राम--बलराम; कृष्ण-- भगवान्‌ कृष्ण;भुज-आश्रया:--के संरक्षण में; अपि--यदि भी; स्मरन्ति--स्मरण करते हैं; कुशलम्‌--कुशलता; अस्माकम्‌--हमारे; बद्ध-सौहदा:--शाश्वत मैत्री से बँधे हुए |

इसके अतिरिक्त, श्रुतदेव, उद्धव तथा अन्य, नन्द, सुनन्द तथा अन्य मुक्तात्माओं के नायक,जो भगवान्‌ के नित्यसंगी हैं, भगवान्‌ बलराम तथा कृष्ण द्वारा सुरक्षित तो हैं? वे सब अपना-अपना कार्य ठीक से चला रहें हैं न? वे जो हमसे नित्य मैत्री-पाश में बँधे हैं, हमारी कुशलता केबारे में पूछते तो हैं ?"

भगवानपि गोविन्दो ब्रह्मण्यो भक्तवत्सल: ।

कच्चित्पुरे सुधर्मायां सुखमास्ते सुहृदवृत: ॥

३४॥

भगवान्‌-- भगवान्‌ कृष्ण; अपि--भी; गोविन्द: --जो गायों तथा इन्द्रियों को अनुप्राणित करते हैं; ब्रह्मण्य:--भक्तों या ब्राह्मणोंको समर्पित; भक्त-वत्सलः --भक्तों के प्रति स्नेहपूर्ण; कच्चित्‌--क्या; पुरे--द्वारकापुरी में; सुधर्मायाम्‌--पतवित्र सभा में;सुखम्‌--सुख; आस्ते--भोग करते हैं; सुहृत्‌-वृतः--मित्रों से घिरे हुए।

पूर्ण पुरूषोत्तम भगवान्‌ श्रीकृष्ण, जो गायों, इन्द्रियों तथा ब्राह्मणों को आनन्द प्रदान करनेवाले हैं और अपने भक्तों के प्रति अत्यन्त वत्सल हैं, अपने मित्रों से घिर कर, द्वारकापुरी में पवित्रसभा का भोग तो कर रहे हैं ?"

मज्लाय च लोकानां क्षेमाय च भवाय च ।

आस्ते यदुकुलाम्भोधावाद्योनन्तसख: पुमान्‌ ॥

३५॥

यद्वाहुदण्डगुप्तायां स्वपुर्या यदवोचिता: ।

क्रीडन्ति परमानन्दं महापौरुषिका इव ॥

३६॥

मड्ुलाय--कल्याण के लिए; च--भी; लोकानाम्‌--समस्त लोकों के; क्षेमाय--सुरक्षा के लिए; च--तथा; भवाय--उन्नति केलिए; च--भी; आस्ते--हैं; यदु-कुल-अम्भोधौ--यदुवंश रूपी सागर में; आद्यः--आदि; अनन्त-सख:--अनन्त ( बलराम ) केसाथ; पुमान्‌--परम भोक्ता; यत्--जिसको; बाहु-दण्ड-गुप्तायाम्‌--उनके बाहुओं से सुरक्षित होकर; स्व-पुर्यामू--अपनी नगरीमें; यदव:--यदुवंश के सदस्य; अर्चिता:--योग्यता के अनुसार; क्रीडन्ति-- आनन्द ले रहे हैं; परम-आनन्दम्‌--दिव्य आनन्द;महा-पौरुषिका:--वैकुण्ठ के वासी; इब--सहृशपरम भोक्ता आदि

भगवान्‌ तथा जो मूल भगवान्‌ अनन्त हैं, बलराम यदुवंश रूपी सागर मेंसमस्त ब्रह्माण्ड के कल्याण, सुरक्षा तथा उन्नति के लिए निवास कर रहे हैं।

और सारे यदुवंशीभगवान्‌ की भुजाओं द्वारा सुरक्षित रहकर, वैकुण्ठवासियों की भाँति जीवन का आनन्द उठा रहेहैं।

"

यत्पादशुश्रूषणमुख्यकर्मणासत्यादयो द्वय्ष्रसहस्रयोषित: ।

निर्जित्य सड़्ख्ये त्रिदशांस्तदाशिषोहरन्ति वज्जायुधवल्‍लभोचिता: ॥

३७॥

यत्‌--जिसका; पाद--पैर; शुश्रूषण-- भोग; मुख्य--सर्वाधिक महत्त्वपूर्ण; कर्मणा--कर्म के; सत्य-आदय:--सत्यभामाइत्यादि रानियाँ; द्वि-अष्ट-- आठ का दो गुना ( सोलह ); सहस्त्र--हजार; योषित:--स्त्रियाँ; निर्जित्य--दमन करके; सड्ख्ये--युद्ध में; त्रि-दशानू-- स्वर्ग के निवासियों को; तत्-आशिष:--देवताओं द्वारा भोग्य; हरन्ति--हर लेते हैं; वज़ञ-आयुध-वललभा--वज् के स्वामी की पत्नियाँ; उचिता:--योग्य ।

समस्त सेवाओं में सर्वाधिक महत्वपूर्ण, भगवान्‌ के चरणकमलों की शुश्रूषा करने मात्र से,द्वारका-स्थित सत्यभामा के अधीक्षण में रानियों ने भगवान्‌ को प्रेरित किया कि वे देवताओं कोजीत लें।

इस प्रकार रानियाँ उन वस्तुओं का भोग कर रही हैं, जो वज्ज के नियंत्रक की पत्नियोंद्वारा भोग्य हैं।

"

यद्वाहुदण्डाभ्युदयानुजीविनोयदुप्रवीरा ह्मकुतोभया मुहु: ।

अधिक्रमन्त्यडूप्रिभिराहतां बलात्‌सभां सुधर्मा सुरसत्तमोचिताम्‌ ॥

३८॥

यत्‌--जिसके; बाहु-दण्ड--बाँहों के द्वारा; अभ्युदय--प्रभावित; अनुजीविन:--सदैव जीवित रहकर; यदु--यदुबंशी लोग;प्रवीरा:--महान्‌ वीर; हि अकुतोभया:--सभी प्रकार से निर्भय; मुहुः--निरन्तर; अधिक्रमन्ति--पार करते हैं; अद्धप्रिभि:--पैरसे; आहताम्‌--लाये गये; बलात्‌--बलपूर्वक; सभाम्‌--सभाभवन को; सुधर्माम्‌--सुधर्मा नामक; सुर-सत्‌-तम--देवताओं मेंश्रेष्ठ; उचिताम्‌--योग्य ।

बड़े-बड़े यदुवंशी वीर भगवान्‌ श्रीकृष्ण की बाहुओं द्वारा सुरक्षित रहकर सभी प्रकार सेनिर्भय बने रहते हैं।

अतएव उनके चरण उस सुधर्मा के सभा-भवन में पड़ते रहते हैं, जो सर्वश्रेष्ठदेवताओं के लिए है, किन्तु जो उनसे छीन लिया गया था।

"

कचिवत्तेडनामयं तात भ्रष्टतेजा विभासि मे ।

अलब्धमानोवज्ञात: कि वा तात चिरोषित: ॥

३९॥

कच्चित्--कहीं; ते--तुम्हारा; अनामयम्‌--स्वास्थ्य ठीक तो है; तात--मेरे भ्राता; भ्रष्ट--विहीन; तेजा:--कान्ति; विभासि--प्रतीत होते हो; मे--मुझको; अलब्ध-मान:--सम्मान न पाया हुआ; अवज्ञात:--उपेक्षित; किम्‌--क्या; वा--अथवा; तात--मेरेभ्राता; चिरोषित:--दीर्घकाल तक रहने के कारण

मेरे भाई अर्जुन, मुझे बताओ कि तुम्हारा स्वास्थ्य ठीक तो है? ऐसा लगता है कि तुम्हारेशरीर की कान्ति खो गई है।

क्या द्वारका में दीर्घकाल तक रहने से, अन्यों द्वारा असम्मान तथाउपेक्षा दिखलाने से ऐसा हुआ है ?"

कच्चिन्नाभिहतो भावै: शब्दादिभिरमड़लै: ।

न दत्तमुक्तमर्थिभ्य आशया यत्प्रतिश्रुतम्‌ ॥

४०॥

कच्चितू--कहीं; न--नहीं; अभिहतः--सम्बोधित, कहा गया; अभावै: --अमित्रतापूर्ण; शब्द-आदिभि:--शब्दों आदि से;अमडूलै:--अशुभ; न--नहीं; दत्तम्‌--दान में दिया गया; उक्तम्‌--कहा गया; अर्थिभ्य:--याचक को; आशया--आशा से;यतू--जो; प्रतिश्रुतम्‌--दिये जाने के लिए वचन-बद्ध

कहीं किसी ने तुम्हें अपमानजनक शब्द तो नहीं कहे ? या तुम्हें धमकाया तो नहीं ? कया तुमयाचक को दान नहीं दे सके ? या किसी से अपना वचन नहीं निभा पाये ?"

कच्चित्त्वं ब्राह्मणं बाल॑ गां वृद्ध रोगिणं स्त्रियम्‌ ।

शरणोपसृतं सत्त्वं नात्याक्षी: शरणप्रद: ॥

४१॥

कच्चित्-कहीं; त्वम्‌-तुम; ब्राह्मणम्‌--ब्राह्मणों को; बालम्--बालक को; गाम्--गाय को; वृद्धम्‌--बूढ़े व्यक्ति को;रोगिणम्‌--रोगी को; स्त्रियम्‌--स्त्री को; शरण-उपसूतम्‌--रक्षा के लिए आये हुए को; सत्त्वम्‌--किसी जीव को; न--क्या;अत्याक्षी:--शरण नहीं दी हो; शरण-प्रद:--जो शरण का पात्र रहा है।

तुम तो सदा से सुपात्र जीवों के यथा ब्राह्मणों, बालकों, गायों, स्त्रियों तथा रोगियों के रक्षकरहे हो।

क्‍या तुम उनके शरण माँगे जाने पर उन्हें शरण नहीं दे सके ?"

कचिवत्त्वं नागमोगम्यां गम्यां वासत्कृतां ख्रियम्‌ ।

पराजितो वाथ भवान्नोत्तमैर्नासमै: पथि ॥

४२॥

कच्चित्--कहीं; त्वम्--तुमने; न--नहीं; अगम: --सम्पर्क किया है; अगम्याम्‌--दुश्नरित्र; गम्याम्--स्वीकार्य; वा-- अथवा;असतू-कृताम्‌--अनुचित व्यवहार; स्त्रियम्‌--स्त्री से; पपजित:--हराया हुआ; वा--अथवा; अथ--अन्तत:; भवानू--तुम;न--न तो; उत्तमैः --उच्चतर शक्ति द्वारा; न--नहीं; असमै:--समान धर्म वाले द्वारा; पथि--मार्ग में |

क्या तुमने दुश्चरित्र स्त्री से समागम किया है अथवा सुपात्र स्त्री के साथ तुमने भद्र व्यवहार नहीं किया? अथवा तुम मार्ग में किसी ऐसे व्यक्ति के द्वारा पराजित किये गये हो, जो तुमसेनिकृष्ट है या तुम्हारे समकक्ष हो ?"

अपि स्वित्पर्यभुड्क्थास्त्वं सम्भोज्यान्‌ वृद्धबालकान्‌ ।

जुगुप्सितं कर्म किद्चित्कृतवान्न यदक्षमम्‌ ॥

४३॥

अपि स्वितू--यदि ऐसा हो तो; पर्य--एक ओर छोड़कर; भुड्क्था:--खाया है; त्वमू--तुमने; सम्भोज्यान्--साथ-साथ खाने केयोग्य; वृद्ध-वृद्ध पुरुषों को; बालकान्‌--बच्चों को; जुगुप्सितम्‌-गर्हित; कर्म--काम; किश्जित्--कुछ; कृतवान्‌--तूमनेकिया होगा; न--नहीं; यत्‌--जो; अक्षमम्‌--जिसे क्षमा न किया जा सके ।

क्या तुमने उन वृद्धों तथा बालकों की परवाह नहीं की, जो तुम्हारे साथ भोजन करने केयोग्य थे? क्या उन्हें छोड़कर तुमने अकेले भोजन किया है? कया तुमने कोई अक्षम्य गलती कीहै, जो निन्दनीय मानी जाती है ?"

कच्िवत्‌ प्रेष्ठटममेनाथ हृदयेनात्मबन्धुना ।

शून्योस्मि रहितो नित्यं मन्यसे तेन्यथा न रुक्‌ ॥

४४॥

कच्चित्‌--कहीं; प्रेष्ट-तमेन--सर्वाधिक प्रिय को; अथ--मेरा भाई अर्जुन; हृदयेन--अत्यन्त घनिष्ठ; आत्म-बन्धुना--अपने मित्रकृष्ण से; शून्य: --शून्य; अस्मि--हूँ; रहित:--खोकर; नित्यम्--सदा के लिए; मन्यसे--तुम सोचते हो; ते--तुम्हारा;अन्यथा--अन्यथा; न--कभी नहीं; रुकू--मानसिक ताप।

अथवा कहीं ऐसा तो नहीं है कि तुम इसलिए रिक्त अनुभव कर रहे हो, क्योंकि तुमने अपनेघनिष्ठ मित्र भगवान्‌ कृष्ण को खो दिया हो ? हे मेरे भ्राता अर्जुन, तुम्हारे इतने हताश होने कामुझे कोई अन्य कारण नहीं दिखता।

"

TO TOP

← पिछला अध्याय · अगला अध्याय →

← श्रीमद्भागवतम् स्कन्ध 1 की सूची