← श्रीमद्भागवतम् स्कन्ध 1 की सूची
अध्याय पंद्रह: पांडव समय पर सेवानिवृत्त हो गए
1.15एवं कृष्णसखः कृष्णो क्षात्रा राजा विकल्पितः।
नानाशैकास्पदम रूप॑कृष्णविश्लेषक्शितः ॥
१॥
सूत उवाचएवं कृष्णसखः कृष्णो क्षात्रा राजा विकल्पितःनानाशैकास्पदम रूप॑ं कृष्णविश्लेषकशितः सूतः उबाच--सूत गोस्वामी ने कहा; एवम्--इस प्रकार; कृष्ण-सखः:--कृष्ण का विख्यात मित्र; कृष्ण: --अर्जुन; भ्रात्रा--अपने बड़े भाई; राज्ञा--राजा युधिष्टिर द्वारा; विकल्पित:--सोचा गया; नाना--विविध; शट्जा-आस्पदम्--अनेक संशयों परआधारित; रूपम्--रूप; कृष्ण--भगवान् श्रीकृष्ण की; विश्लेष--वियोग की भावना से; कर्शित:--अत्यन्त दुखी |
सूत गोस्वामी ने कहा : भगवान् कृष्ण का विख्यात मित्र अर्जुन, महाराज युथ्चिष्टिर की सशंकितजिज्ञासाओं के अतिरिक्त भी, कृष्ण के वियोग की प्रबल अनुभूति के कारण शोक-संतप्त था।
"
शोकेन शुष्यद्वदनहृत्सरोजो हतप्रभ: ।
विभुं तमेवानुस्मरन्नाशक्नोत्प्रतिभाषितुम् ॥
२॥
शोकेन--विरह से; शुष्यत्-वदन--सूखता मुँह; हत्-सरोज:--कमल-सहश हृदय; हत--विहीन; प्रभ:--शारीरिक कान्ति;विभुम्--परम; तम्-- भगवान् कृष्ण को; एब--निश्चय ही; अनुस्मरन्-- भीतर ही भीतर सोचते हुए; न--नहीं; अशक्नोत्--समर्थ हो सका; प्रतिभाषितुम्--ठीक से उत्तर देने के लिए
शोक से अर्जुन का मुँह तथा कमल-सहश हृदय सूख चुके थे, अतएव उसकी शारीरिक कान्तिचली गई थी।
अब भगवान् का स्मरण करने पर, वह उत्तर में एक शब्द भी न बोल पाया।
"
कृच्छेण संस्तभ्य शुच: पाणिनामृज्य नेत्रयो: ।
परोक्षेण समुन्नद्धप्रणयौत्कण्ठ्यकातर: ॥
३॥
कृच्छेण--बड़ी कठिनाई से; संस्तभ्य--वेग को रोककर; शुच्ः--विरह के; पाणिना--अपने हाथों से; आमृज्य--पोंछते हुए;नेत्रयो:--आँखों को; परोक्षेण--दृष्टि से दूर होने के कारण; समुन्नद्ध--अत्यधिक; प्रणय-औत्कण्ठ्य--स्नेह का उत्सुकतापूर्वकस्मरण करते हुए; कातर:--व्याकुल
उसने बड़ी कठिनाई से आँखों में भरे हुए शोकाश्रुओं को रोका।
वह अत्यन्त दुखी था,क्योंकि भगवान् कृष्ण उसकी दृष्टि से ओझल थे और वह उनके लिए अधिकाधिक स्नेह काअनुभव कर रहा था।
"
सख्यं मैत्रीं सौहदं च सारथ्यादिषु संस्मरन् ।
नृपमग्रजमित्याह बाष्पगद्गदया गिरा ॥
४॥
सख्यम्--शुभचिन्तन; मैत्रीम्-- आशीर्वाद; सौहदम्--घनिष्ठतापूर्वक सम्बन्धित; च-- भी; सारथ्य-आदिषु--सारथी बनने आदिमें; संस्मरन्--इन सबों को स्मरण करते हुए; नृपम्--राजा से; अग्रजम्--बड़ा भाई; इति--इस प्रकार; आह--कहा; बाष्प--उसासें भरते; गदगदया--अभिभूत होकर; गिरा--वाणी से |
भगवान् कृष्ण को तथा उनकी शुभकामनाओं, आशीषों, घनिष्ठ पारिवारिक सम्बन्ध एवंउनके रथ हाँकने का स्मरण करके, अर्जुन का गला रुँध आया और वह भारी साँस लेता हुआबोलने लगा।
"
अर्जुन उवाचवद्चितोहं महाराज हरिणा बन्धुरूपिणा ।
येन मेपहतं तेजो देवविस्मापनं महत् ॥
५॥
अर्जुन: उवाच-- अर्जुन ने कहा; वश्चितः--त्यक्त; अहम्--मैं; महा-राज--हे राजा; हरिणा-- भगवान् द्वारा; बन्धु-रूपिणा--घनिष्ठ मित्र रूपी; येन--जिससे; मे--मेरा; अपहतम्--छीना गया है; तेज:--पराक्रम; देव--देवता; विस्मापनम्--आश्चर्यजनक; महत्--अत्यधिक प्रबल।
अर्जुन ने कहा : हे राजन, मुझे अपना घनिष्ठ मित्र माननेवाले भगवान् हरि ने मुझे अकेलाछोड़ दिया है।
इस तरह मेरा प्रबल पराक्रम, जो देवताओं तक को चकित करनेवाला था, अबमुझमें नहीं रह गया है।
"
यस्य क्षणवियोगेन लोको ह्वप्रियदर्शन: ।
उक्थेन रहितो होष मृतक: प्रोच्यते यथा ॥
६॥
यस्य--जिसके; क्षण--एक क्षण; वियोगेन--वियोग से; लोकः--सारे ब्रह्माण्ड; हि--निश्चय ही; अप्रिय-दर्शन:--प्रत्येकवस्तु प्रतिकूल लगती है; उक्थेन--जीवन से; रहित:--विहीन; हि--निश्चय ही; एष:--ये सारे शरीर; मृतक:--शव; प्रोच्यते--कहे जाते हैं; यथा--जिस तरह
मैंने अभी-अभी उन्हें खोया है, जिनके क्षणमात्र वियोग से सारे ब्रह्माण्ड प्रतिकूल तथा शून्यहो जायेंगे, जिस तरह प्राण के बिना शरीर।
"
यत्संश्रयाद् द्रुपदगेहमुपागतानांराज्ञां स्वयंवरमुखे स्मरदुर्मदानाम् ।
तेजो हतं खलु मयाभिहतश्च मत्स्य:सज्जीकृतेन धनुषाधिगता च कृष्णा ॥
७॥
यत्--जिसके कृपामय; संश्रयात्--बल से; द्रपद-गेहम्--राजा द्रुपद के महल में; उपागतानाम्--सभी एकत्र; राज्ञामू--राजाओंका; स्वयंवर-मुखे--स्वयंवर के अवसर पर; स्मर-दुर्मदानाम्--समस्त कामुक विचारवालों का; तेज:--बल; हतम्--हरा गया;खलु--मानो; मया--मेरे द्वारा; अभिहतः--छेदा गया; च--भी; मत्स्य:--मछली का निशाना; सज्जी-कृतेन--धनुष तैयारकरके; धनुषा--उस धनुष से; अधिगता--प्राप्त किया; च-- भी; कृष्णा--द्रौपदी |
उनकी कृपामयी शक्ति से ही मैं उन समस्त कामोन्मत्त राजकुमारों को परास्त कर सका, जोराजा द्रुपद के महल में स्वयंवर के अवसर पर एकत्र हुए थे।
अपने धनुषबाण से मैं मत्स्य लक्ष्यका भेदन कर सका और इस प्रकार द्रौपदी का पाणिग्रहण कर सका।
"
यत्सन्रिधावहमु खाण्डवमग्नयेदा-मिन्रं च सामरगणं तरसा विजित्य ।
लब्धा सभा मयकृताद्धुतशिल्पमायादिग्भ्योहरत्नुपतयो बलिमध्वरे ते ॥
८॥
यत्--जिसके; सन्निधौ--पास में होने से; अहम्--मैंने; उ--आश्चर्यवाचक शब्द; खाण्डवम्--स्वर्ग के राजा इन्द्र का सुरक्षितबन; अग्नये--अग्निदेव को; अदाम्-- प्रदान किया; इन्द्रम्--इन्द्र को; च-- भी; स--सहित; अमर-गणम्--देवताओं को;तरसा--कौशल के साथ; विजित्य--जीतकर; लब्धा--प्राप्त करके; सभा--सभा भवन; मय-कृता--मय द्वारा निर्मित;अद्भुत--अत्यन्त अद्भुत; शिल्प--कला तथा कारीगरी; माया--शक्ति; दिग्भ्य:--सभी दिशाओं से; अहरन्--एकत्र;नृपतय:--सारे राजकुमार; बलिम्--भेंटें; अध्वरे--ले आये; ते--आप।
चूँकि वे मेरे निकट थे, अतएव मेरे लिए अत्यन्त कौशलपूर्वक स्वर्ग के शक्तिशाली राजाइन्द्रदेव को उनके देव-पार्षदों सहित जीत पाना सम्भव हो सका और इस तरह अग्निदेव खाण्डववन को विनष्ट कर सके।
उन्हीं की कृपा से, मय नामक असुर को जलते हुए खाण्डव बन सेबचाया जा सका।
इस तरह हम अत्यन्त आश्चर्यमयी शिल्प-कला वाले सभाभवन का निर्माणकर सके, जहाँ राजसूय-यज्ञ के समय सारे राजकुमार एकत्र हो सके और आपको आदर प्रदानकर सके।
"
यत्तेजसा नृपशिरोझ्ुप्रिमहन्मखार्थम्आर्योअ्नुजस्तव गजायुतसत्त्ववीर्य: ।
तेनाहता: प्रमथनाथमखाय भूपायन्मोचितास्तदनयन्बलिमध्वरे ते ॥
९॥
यत्--जिसके; तेजसा-- प्रभाव से; नृप-शिर:-अड्प्रिमू--जिसके पाँव राजाओं के सिरों से अलंकृत हों; अहनू--मारा हुआ;मख-अर्थम्--यज्ञ हेतु; आर्य:--सम्माननीय, श्रेष्ठ; अनुज:--छोटा भाई; तब--आपका; गज-अयुत--दस हजार हाथी; सत्त्व-वीर्य:--शक्तिशाली जीवन; तेन--उसके द्वारा; आहता:--एकत्रित; प्रमथ-नाथ-- भूतों के देवता ( महाभेरव ); मखाय--यज्ञके लिए; भूषपा:--राजा; यत्-मोचिता:--जिसके द्वारा वे छोड़े गये; तत्-अनयनू--वे सब लाये; बलिमू--कर; अध्वरे--भेंटकिया; ते--आपको ।
दस हजार हाथियों की शक्ति रखनेवाले आपके छोटे भाई ने भगवान् की ही कृपा सेजरासंध का वध किया, जिसकी पादपूजा अनेक राजाओं द्वारा की जाती थी।
ये सारे राजाजरासंध के महाभेरव यज्ञ में बलि चढ़ाये जाने के लिए लाए गये थे, किन्तु उनको छुड़ा दियागया।
बाद में उन्होंने आपका आधिपत्य स्विकार किया।
"
पत्नयास्तवाधिमखक्लृप्तमहाभिषेक-श्लाधिष्ठचारुकबरं कितवै: सभायाम् ।
स्पृष्ट विकीर्य पदयो: पतिताश्रुमुख्यायस्तत्स्त्रियोकृतहतेशविमुक्तकेशा: ॥
१०॥
पल्या: --पत्नी का; तब--आपकी; अधिमख--विशाल यज्ञोत्सव के समय; क्ल॒प्त--वस्त्राभूषित; महा-अभिषेक-- अच्छी तरहपवित्र की गई; एलाधिष्ट--इस प्रकार महिमावान; चारु--सुन्दर; कबरम्--बालों की चोटी; कितवै:--दुष्टों के द्वारा;सभायाम्--सभा में; स्पृष्टभू--पकड़ी जाने पर; विकीर्य--खोलकर; पदयो: --पैरों पर; पतित-अश्रु-मुख्या:--आँखों में अश्रुभरकर चरणों में गिरी हुई का; यः--वह; तत्--उनकी; स्त्रिय:--पत्नियाँ; अकृत--हो गई; हत-ईश--पतिविहीन; विमुक्त-केशा:--खुले हुए बाल।
उन्होंने ही उन दुष्टों की पत्नियों के बाल खोल दिये, जिन्होंने आपकी महारानी ( द्रौपदी ) कीउस चोटी को खोलने का दुस्साहस किया था, जो महान् राजसूय-यज्ञ अनुष्ठान के अवसर परसुन्दर ढंग से सजाई तथा पवित्र की गई थी।
उस समय वह अपनी आँखों में आँसू भर करभगवान् कृष्ण के चरणों पर गिर पड़ी थी।
"
यो नो जुगोप वन एत्य दुरन्तकृच्छाद्दुर्वाससोरिरचितादयुताग्रभुग् यः ।
शाकान्नशिष्टमुपयुज्य यतख्रिलोकींतृप्ताममंस्त सलिले विनिमग्नसड्ड: ॥
११॥
यः--जिसने; न:--हमको; जुगोप--सुरक्षा प्रदान की; वने--वन में; एत्य--प्रवेश करके; दुरन््त-- भयानक ; कृच्छात्--संकटसे; दुर्वाससः --दुर्वासा मुनि के; अरि--शत्रु द्वारा; रचितात्--बनाया गया; अयुत--दस हजार; अग्र-भुक्--पहले खानेवाला;यः--वह व्यक्ति; शाक-अन्न-शिष्टमू--बचा हुआ भोजन, जूठन; उपयुज्य--स्वीकार करके; यतः--क्योंकि; त्रि-लोकीम्--तीनों संसारों को; तृप्ताम्--संतुष्ट; अमंस्त--मन में सोचा; सलिले--जल के भीतर; विनिमग्न-सद्गभः--सभी जल में विलीनहुए।
हमारे वनवास के समय, दस हजार शिष्यों के साथ भोजन करनेवाले दुर्वासा मुनि ने हमेंभयावह संकट में डालने के लिए, हमारे शत्रुओं के साथ मिलकर चाल चली।
उस समय उन्होंने(कृष्ण ने ) केवल जूठन ग्रहण करके हमें बचाया था।
इस तरह उनके भोजन ग्रहण करने सेनदी में स्नान करती मुनि-मण्डली ने अनुभव किया कि वह भोजन से पूर्ण रूप से सन्तुष्ट हो गईऔर तीनों लोक भी सम्तुष्ट हो गये।
"
यत्तेजसाथ भगवान् युधि शूलपाणि-विस्मापित: सगिरिजोस्त्रमदान्निजं मे ।
अन्येडपि चाहममुनैव कलेवरेणप्राप्तो महेन्द्रभवने महदासनार्धम् ॥
१२॥
यत्--जिसके; तेजसा--प्रभाव से; अथ--एक समय; भगवान्--ई श्वर ( शिवजी ); युधि--युद्ध में; शूल-पाणि: --त्रिशूलधारी;विस्मापित:--आश्चर्यचकित; स-गिरिज:--हिमालय की पुत्री समेत; अस्त्रम्--अस्त्र; अदातू--दिया; निजम्-- अपना; मे--मुझको; अन्ये अपि-- और दूसरे भी; च--तथा; अहम्--मैं; अमुना--उनके ; एव--निश्चय ही; कलेवरेण--शरीर से; प्राप्त:--प्राप्त; महा-इन्द्र-भवने--इन्द्रदेव के घर में; महत्--महान्; आसन-अर्धम्--आधा ऊँचा आसन।
यह उन्हीं का प्रताप था कि मैं एक युद्ध में शिवजी तथा उनकी पत्नी पर्वतराज हिमालय कीकन्या को आश्चर्यचकित करने में समर्थ हुआ।
इस तरह वे ( शिवजी ) मुझ पर प्रसन्न हुए औरउन्होंने मुझे अपना निजी अस्त्र प्रदान किया।
अन्य देवताओं ने भी मुझे अपने-अपने अस्त्र भेंटकिये और इसके अतिरिक्त, मैं इसी वर्तमान शरीर से स्वर्गलोक पहुँच सका, जहाँ मुझे आधे ऊँचेआसन पर बैठने दिया गया।
"
तत्रैव मे विहरतो भुजदण्डयुग्मं गाण्डीवलक्षणमरातिवधाय देवा: ।
सेन्द्रा: श्रिता यदनुभावितमाजमीढ तेनाहमद्य मुषित: पुरुषेण भूम्ना ॥
१३॥
तत्र--उस स्वर्गलोक में; एब--निश्चय ही; मे--मैं स्वयं; विहरत:--अतिथि के रूप में रहते हुए; भुज-दण्ड-युग्मम्--अपनीदोनों भुजाओं को; गाण्डीव--गांडीव धनुष; लक्षणम्--चिह्ृ; अराति--निवातकवच नामक असुर; वधाय--मारने के लिए;देवा:--सारे देवता; स--सहित; इन्द्रा:--स्वर्ग का राजा, इन्द्र; अ्ता:--शरण लेकर; यत्--जिसके; अनुभावितम्--शक्तिमानहोने के लिए सम्भव; आजमीढ--हे राजा आजमीढ के वंशज; तेन--उसके द्वारा; अहम्--मैं; अद्य--इस समय; मुधित:--रहित; पुरुषेण--व्यक्ति से; भूम्ना--परम।
जब मैं स्वर्गलोक में अतिथि के रूप में कुछ दिन रुका रहा, तो इन्द्रदेव समेत स्वर्ग केसमस्त देवताओं ने निवातकवच नामक असुर को मारने के लिए गाण्डीव धनुष धारणकरनेवाली मेरी भुजाओं का आश्रय लिया था।
हे आजमीढ के वंशज राजा, इस समय मैं पूर्णपुरुषोत्तम भगवान् से विहीन हो गया हूँ, जिनके प्रभाव से मैं इतना शक्तिशाली था।
"
यद्वान्धव: कुरुबलाब्धिमनन्तपार-मेको रथेन ततरेहमतीर्यसत्त्वम् ।
प्रत्याहतं बहु धनं च मया परेषांतेजास्पदं मणिमयं च हतं शिरोभ्य: ॥
१४॥
यत्-बान्धव:--जिनकी मैत्री मात्र से; कुरू-बल-अब्धिम्--कुरुओं की सैन्य-शक्ति-रूपी सागर को; अनन्त-पारम्--दु्लघ्य;एकः--एकाकी; रथेन--रथ पर आरूढ़ होकर; ततरे--पार करने में समर्थ था; अहम्--मैं; अतीर्य--अजेय; सत्त्वम्--अस्तित्व; प्रत्याहतम्--वापस ले लिया; बहु--अत्यधिक; धनमू--धन; च-- भी; मया--मेरे द्वारा; परेषामू-शत्रु का; तेज-आस्पदम्--तेज ( प्रकाश ) का स्त्रोत; मणि-मयम्--मणियों से अलंकृत; च-- भी; हतम्--बलपूर्वक लाया गया; शिरोभ्य: --उनके सिरों से।
कौरवों की सैन्यशक्ति उस समुद्र की तरह थी, जिसमें अनेक अजेय प्राणी रहते थे।
फलतःवह दु्लघ्य थी।
किन्तु उनकी मित्रता के कारण, मैं रथ पर आरूढ़ होकर, उसे पार कर सका।
यह उन्हीं की कृपा थी कि मैं गौवों को वापस ला सका और बलपूर्वक राजाओं के तमाम मुकुटएकत्र कर सका, जो समस्त तेज के स्त्रोत रत्नों से जटित थे।
"
यो भीष्मकर्णगुरुशल्यचमूष्वदभ्र-राजन्यवर्यरथमण्डलमण्डितासु ।
अग्रेचरो मम विभो रथयूथपाना-मायुर्मनांसि च हशा सह ओज आर्च्छत् ॥
१५॥
यः--केवल वे ही; भीष्य-- भीष्म; कर्ण--कर्ण ; गुरु--द्रोणाचार्य; शल्य--शल्य; चमूषु--व्यूह के मध्य; अदभ्र--विशाल;राजन्य-वर्य--बड़े-बड़े राजकुमार; रथ-मण्डल--रथों की श्रृंखला; मण्डितासु--अलंकृत; अग्रे चर:--आगे-आगे जाते हुए;मम--मेरा; विभो--हे राजा; रथ-यूथ-पानाम्--सारे रथी; आयु:--उप्र अथवा सकाम कर्म; मनांसि--मानसिक उधल-पुथल;च--भी; दशा--चितवन से; सह:--शक्ति; ओज: --पराक्रम; आर्च्छत्--वापस ले लिया।
एकमात्र वे ही थे जिन्होंने सबों की आयु छीन ली थी और जिन्होंने युद्धभूमि में भीष्म, कर्ण,द्रोण, शल्य, इत्यादि कौरवों द्वारा निर्मित सैन्य-व्यूह की कल्पना तथा उत्साह को हर लिया था।
उन सबकी योजना अत्यन्त पटु थी और आवश्यकता से अधिक थी, लेकिन उन्होंने ( भगवान् श्रीकृष्ण ने ) आगे बढ़कर यह सब कर दिखाया।
"
यद्दोःषु मा प्रणिहितं गुरुभीष्मकर्ण-नप्तृत्रिगर्तशल्यसैन्धवबाहिकाद: ।
अख्राण्यमोघमहिमानि निरूपितानिनोपस्पृशु्न्हरिदासमिवासुराणि ॥
१६॥
यत्--जिसके अन्तर्गत; दोःषु--हथियारों की सुरक्षा; मा प्रणिहितम्--स्वयं मेरे स्थित होने पर; गुरु--द्रोणाचार्य; भीष्म --भीष्म; कर्ण--कर्ण; नप्तृ-- भूरिश्रवा; त्रिगर्त--राजा सुशर्मा; शल्य--शल्य; सैन्धव--राजा जयद्रथ; बाहिक--महाराज शान्तनु( भीष्म के पिता ) का भाई; आद्यि:--इत्यादि; अस्त्राणि--अस्त्रों को; अमोघ--- अचूक; महिमानि--अत्यन्त शक्तिशाली;निरूपितानि--व्यवहत; न--नहीं; उपस्पृशु: --स्पर्श किया; नृहरि-दासम्--नृसिंह देव का सेवक ( प्रहाद ); इब--सहृश;असुराणि--असुरों द्वारा प्रयुक्त हथियार |
भीष्म, द्रोण, कर्ण, भूरिश्रवा, सुशर्मा, शल्य, जयद्रथ तथा बाहिक जैसे बड़े-बड़ेसेनापतियों ने अपने-अपने अचूक हथियार मुझ पर चलाये, लेकिन उनकी ( भगवान् कृष्ण की )कृपा से सब वे मेरा बाल बाँका भी न कर पाये।
इसी प्रकार भगवान् नृसिंह देव के परम भक्तप्रह्माद महाराज असुरों द्वारा प्रयुक्त समस्त शस्त्रास्त्रों से अप्रभावित रहे ।
"
सौत्ये वृतः कुमतिनात्मद ईश्वरो मे यत्पादपद्ममभवाय भजन्ति भव्या: ।
मां श्रान्तवाहमरयो रथिनो भुविष्ठंन प्राहरन् यदनुभावनिरस्तचित्ता: ॥
१७॥
सौत्ये--सारथी के विषय में; वृतः--लगा हुआ; कुमतिना--बुरी चेतना के कारण; आत्म-दः --उद्धार करनेवाला; ईश्वर: --परमेश्वर; मे--मेरा; यत्--जिसको; पाद-पद्ममू--चरणकमल को; अभवाय--मोक्ष के मामले में; भजन्ति--सेवा करते हैं;भव्या:--बुद्धिमान पुरुष; माम्--मुझको; श्रान्त-प्यासा; वाहम्-मेरे घोड़े; अरय:--शत्रु; रधिन:--महान् सेनापति; भुवि-प्रम-- भूमि पर खड़े हुए; न--नहीं; प्राहरन्-- आक्रमण किया; यत्--जिसकी; अनुभाव--कृपा; निरस्त--अनुपस्थित होने से;चित्ता:--मन ।
यह उन्हीं की कृपा थी कि जब मैं अपने प्यासे घोड़ों के लिए जल लेने रथ से नीचे उतरा था,तो मेरे शत्रुओं ने मुझे मारने की परवाह न की।
यह तो अपने प्रभु के प्रति मेरा असम्मान ही थाकि मैंने उन्हें अपना सारथी बनाने का दुस्साहस किया, क्योंकि मोक्ष प्राप्त करने के लिए श्रेष्ठपुरुष उनकी पूजा तथा सेवा करते हैं।
"
नर्माण्युदाररुचिरस्मितशोभितानिहे पार्थ हेर्जुन सखे कुरुनन्दनेति ।
सझल्पितानि नरदेव हृदिस्पृशानिस्मर्तुर्लुठन्ति हृदयं मम माधवस्य ॥
१८॥
नर्माणि--परिहास में बातचीत; उदार--खुलकर बातें करनेवाले; रुचिर--अच्छी लगनेवाली; स्मित-शोभितानि--हँसीले चेहरेसे अलंकृत; हे--हे, अरे ( सम्बोधन का चिह्न ); पार्थ--हे पृथा-पुत्र; हे--हे; अर्जुन--अर्जुन; सखे--मित्र; कुरू-नन्दन--कुरुवंश के पुत्र; इति--इस प्रकार; सञ्लल्पितानि--ऐसी बातचीत; नर-देव--हे राजा; हृदि--हृदय में; स्पृशानि--स्पर्श करती;स्मर्तु:--उन्हें स्मरण करके; लुठन्ति--अभिभूत करती हैं; हृदयम्--हृदय तथा आत्मा को; मम--मेरे; माधवस्य--माधव(कृष्ण ) काहे राजनू, उनके परिहास तथा उनकी मुक्त बातें अत्यन्त सुहावनी तथा सौंदर्य से अलंकृतहोती थीं।
'हे पार्थ, हे सखा, हे कुरुनन्दन' कहकर उनका पुकारना तथा उनकी समस्तसहदयता की अब मुझे याद आ रही है और मैं अभिभूत हूँ।
"
शय्यासनाटनविकत्थनभोजनादि-प्वैक्याद्ययस्य ऋतवानिति विप्रलब्ध: ।
सख्यु: सखेव पितृवत्तनयस्य सर्वसेहे महान्महितया कुमतेरघं मे ॥
१९॥
शय्या--एक ही बिस्तर पर सोना; आसन--एक ही आसन पर बैठना; अटन--साथ-साथ घूमना; विकत्थन--आत्मश्लाघा;भोजन--साथ-साथ खाना; आदिषु--इत्यादि में; ऐक्यात्--एकत्व होने से; वयस्य--हे मित्र; ऋतवान्--सत्यवादी; इति--इसप्रकार; विप्रलब्ध:--बुरा आचरण किया गया; सख्यु:--मित्र से; सखा इब--मित्र की भाँति; पितृवत्-पिता की भाँति;तनयस्य--बालक का; सर्वम्--सारे; सेहे--सह लेते; महान्--महान्; महितया--यश से; कुमते: --दुर्बुद्धि का; अधम्--अपराध; मे--मेरे
सामान्यतः हम दोनों साथ-साथ रहते और सोते, साथ-साथ बैठते और घूमने जाते।
और बहादुरी के कार्यों के लिए आत्म-प्रशंसा करते हुए कभी-कभी यदि कोई भूल होती, तो मैं उन्हेंयह कहकर चिढ़ाया करता था 'हे मित्र, तुम तो बड़े सत्यवादी हो।
उस समय भी जब उनकामहत्व घटता होता, वे परमात्मा होने के कारण, मेरी उटपटांग बातों को सह लेते थे और मुझेउसी प्रकार क्षमा कर देते थे जिस तरह एक सच्चा मित्र अपने सच्चे मित्र को या पिता अपने पुत्रको क्षमा कर देता है।
"
सोऊहं नृपेन्द्र रहित: पुरुषोत्तमेनसख्या प्रियेण सुहृदा हृदयेन शून्य: ।
अध्वन्युरुक्रमपरिग्रहमड़ रक्षन्गोपैरसद्धिरबलेव विनिर्जितोडस्मि ॥
२०॥
सः--वह; अहम्-मैं; नृप-इन्द्र--हे सम्राट; रहित:--विहीन; पुरुष-उत्तमेन--पर मे श्वर द्वारा; सख्या-- अपने मित्र द्वारा;प्रियेण--अपने सर्वाधिक प्रिय द्वारा; सुहदा--शुभचिन्तक द्वारा; हदयेन--हृदय तथा आत्मा से; शून्य:--शून्य, रहित;अध्वनि--हाल ही में; उरुक्रम-परिग्रहम्--सर्वशक्तिमान की पत्नियाँ; अड्भ--शरीर; रक्षन्--रक्षा करते हुए; गोपैः--ग्वालोंद्वारा; असद्धिः--नास्तिक, असभ्य, दुष्ट; अबला इब--निर्बल स्त्री की तरह; विनिर्जित: अस्मि--पराजित हो चुका हूँ।
हे राजनू, अब मैं अपने मित्र तथा सर्वाधिक प्रिय शुभचिन्तक पूर्ण पुरुषोत्तम भगवान् सेविलग हो गया हूँ, अतएवं मेरा हृदय हर तरह से शून्य-सा प्रतीत हो रहा है।
उनकी अनुपस्थिति में, जब मैं कृष्ण की तमाम पत्नियों की रखवाली कर रहा था, तो अनेक अविश्वस्त ग्वालों नेमुझे हरा दिया।
"
तट्ठै धनुस्त इषव: स रथो हयास्तेसोऊहं रथी नृपतयो यत आनमन्ति ।
सर्व क्षणेन तदभूदसदीशरिक्तंभस्मन्हुतं कुहकराद्धमिवोप्तमूष्याम् ॥
२१॥
तत्--वही; बै--निश्चय ही; धनुः--धनुष; ते इषवः--वही तीर; सः--वही; रथ:--रथ; हया: ते--वे ही घोड़े; सः अहम्-मैंवही अर्जुन हूँ; रथी--रथारूढ़ वीर; नृपतय: --सारे राजा; यतः--जिनको; आनमन्ति--नमस्कार किया करते थे; सर्वम्--सब;क्षणेन--एक क्षण भर में; तत्--वे सब; अभूत्--हो गये; असत्--व्यर्थ; ईश--ई श्वर के कारण; रिक्तम्--रिक्त होने से;भस्मन्--राख; हुतम्--घी की आहुति; कुहक-राद्धम्--जादूगरी से उत्पन्न धन; इब--सहश; उप्तम्--बोया हुआ; ऊष्याम्--बंजर भूमि में
मेरे पास वही गाण्डीव धनुष है, वे ही तीर हैं, उन्हीं घोड़ों के द्वारा खींचा जानेवाला वही रथहै और उन्हें इस्तेमाल करनेवाला मैं वही अर्जुन हूँ, जिसके सामने सारे राजा सिर झुकाया करतेथे।
किन्तु भगवान् कृष्ण की अनुपस्थिति में वे सब एक ही क्षण में शून्य हो गये हैं।
यह वैसा हीहै जैसे राख में घी की आहूति डालना, जादू की छड़ी से धन एकत्र करना या बंजर भूमि में बीजबोना।
"
राज॑स्त्वयानुपृष्टानां सुहृदां नः सुहृत्पुरे ।
विप्रशापविमूढानां निघ्नतां मुष्टिभिमिथ: ॥
२२॥
वारुणीं मदिरां पीत्वा मदोन्मथितचेतसाम् ।
अजानतामिवान्योन्यं चतु:पदञ्चावशेषिता: ॥
२३॥
राजनू--हे राजन; त्ववा--आपके द्वारा; अनुपृष्टानाम्--पूछे गये; सुहृदाम्-मित्रों तथा सम्बन्धियों का; नः--हमारे; सुहत्-पुरे--द्वारका नगरी में; विप्र--ब्राह्मण के; शाप--शाप से; विमूढानाम्--मूर्खो का; निध्नताम्--मारे हुओं का; मुष्टिभि: --लाठियों द्वारा; मिथ: --परस्पर; वारुणीम्--खमीर उठे चावल को; मदिराम्--शराब को; पीत्वा--पीकर; मद-उन्मधित--नशेमें आकर; चेतसाम्--मानसिक स्थिति का; अजानताम्--न जानते हुए; इब--सहृश; अन्योन्यम्--एक दूसरे को; चतु:--चार;पशञ्च--पाँच; अवशेषिता:--अब बचे हुए।
हे राजन, चूँकि आपने द्वारका नगरी के हमारे मित्रों तथा सम्बन्धियों के विषय में पूछा है,अतएव मैं आपको सूचित कर रहा हूँ कि वे सब ब्राह्मणों द्वारा शापित होकर, सड़े हुए चावलों सेबनी शराब पीकर उन्मत्त हो उठे और एक-दूसरे को न पहचानने के कारण लाठियाँ लेकरपरस्पर लड़ने लगे।
अब केवल चार-पाँच को छोड़कर शेष सभी मर चुके हैं।
"
प्रायेणेतद् भगवत ईश्वरस्य विचेष्टितम् ।
मिथो निघ्नन्ति भूतानि भावयन्ति च यन्मिथ: ॥
२४॥
प्रायेण एतत्--प्राय: यह; भगवत:-- भगवान् की; ई श्वरस्थ--ईश्वर की; विचेष्टितम्--इच्छा से; मिथ:--परस्पर; निध्नन्ति--मारते हैं; भूतानि--जीवों को; भावयन्ति--तथा पालते हैं; च-- भी; यत्--जिसका; मिथ:--परस्पर।
वास्तव में यह सब भगवान् की इच्छा के फलस्वरूप है कि कभी-कभी लोग एक दूसरे कोमार डालते हैं और कभी एक दूसरे की रक्षा करते हैं।
"
जलौकसां जले यद्वन्महान्तोदन्त्यणीयस: ।
दुर्बलान्बलिनो राजन्महान्तो बलिनो मिथ: ॥
२५॥
एवं बलिएऐटर्यदुभिर्महद्धिरितरान् विभु: ।
यदून्यदुभिरन्योन्यं भूभारान् सझहार ह ॥
२६॥
जलौकसाम्--जलचरों का; जले--जल में; यद्वत्--जिस तरह; महान्त:--बड़ा प्राणी; अदन्ति--निगल जाते हैं; अणीयस:--छोटा प्राणी; दुर्बलानू--दुर्बल को; बलिन:--बलवान; राजनू--हे राजन; महान्त:--सबसे बलवान; बलिन:--कम बली;मिथः--द्न्द्ध में; एवम्--इस तरह; बलिप्ठै:--सर्वाधिक बलवान द्वारा; यदुभि:--यदुवंशियों द्वारा; महद्धधिः--सर्वाधिकशक्तिशाली; इतरान्--सामान्य लोग; विभु:--पूर्ण पुरुषोत्तम भगवान्; यदून्--सारे यदुवंशियों; यदुभि: --यदुओं द्वारा;अन्योन्यम्--परस्पर; भू-भारानू--धरती का भार; सझ्हार--उतार दिया; ह--भूतकाल में ।
हे राजनू, जिस तरह समुद्र में बड़े तथा बलशाली जलचर, छोटे-मोटे तथा निर्बल जलचरोंको निगल जाते हैं, उसी तरह पूर्ण पुरुषोत्तम भगवान् ने भी धरती का भार हलका करने केलिए, निर्बल यदु को मारने के लिए बलशाली यदु को और छोटे यदु को मारने के लिए बड़े यदुको भिड़ा दिया है।
"
देशकालार्थयुक्तानि हत्तापोपशमानि च ।
हरन्ति स्मरतश्चित्तं गोविन्दाभिहितानि मे ॥
२७॥
देश--अवकाश; काल--समय; अर्थ--महत्ता; युक्तानि--से युक्त; हत्--हृदय; ताप-- जलन; उपशमानि--बुझाना; च--तथा; हरन्ति--आकर्षित कर रहे हैं; स्मरत:--स्मरण करने से; चित्तमू--मन को; गोविन्द--हर्ष के परम पुरुष; अभिहितानि--के द्वारा कहा गया; मे--मुझको
अब मैं भगवान् ( गोविन्द ) द्वारा मुझे दिये गये उपदेशों की ओर आकृष्ट हूँ, क्योंकि वे देश-काल की समस्त परिस्थितियों में हृदय की जलन को शान्त करनेवाले आदेशों से परिपूर्ण बनाएगये हैं।
"
सूत उवाचएवं चिन्तयतो जिष्णो: कृष्णपादसरोरुहम् ।
सौहार्देनातिगाढेन शान्तासीद्विमला मति: ॥
२८॥
सूतः उबाच--सूत गोस्वामी ने कहा; एबम्--इस प्रकार; चिन्तयतः--उपदेशों का चिन्तन करते हुए; जिष्णो:-- भगवान् के;कृष्ण-पाद--कृष्ण के चरण; सरोरुहम्--कमलों की तरह के; सौहार्देन--घनिष्ठ मित्रता से; अति-गाढेन--अत्यधिक घनिष्ठतामें; शान्ता--शान्त; आसीत्--हो गया; विमला--किसी भौतिक कल्मष का रंच भी नहीं; मतिः--मन
सूत गोस्वामी ने कहा : इस प्रकार भगवान् के उपदेश, जो अत्यधिक घनिष्ठ मित्रता में प्रदानकिये गये थे उसके विषय में सोचने में तथा उनके चरणकमलों का चिन्तन करने में तल्लीनअर्जुन का मन शान्त और समस्त भौतिक कल्मष से रहित हो गया।
"
वासुदेवाड्श्यनुध्यानपरिबृंहितरंहसा ।
भक्त्या निर्मथिताशेषकषायधिषणोऊर्जुन: ॥
२९॥
वबासुदेव-अद्झपध्नि-- भगवान् के चरणकमल; अनुध्यान--निरन्तर स्मरण करने से; परिबृंहित--विस्तीर्ण; रंहसा--अत्यन्त वेग से;भक्त्या--भक्ति से; निर्मधित--शान्त हुआ; अशेष---असीम; कषाय-- प्रहार; धिषण: -- धारणा; अर्जुन: --अर्जुन ।
अर्जुन द्वारा भगवान् श्रीकृष्ण के चरणकमलों का निरन्तर स्मरण किये जाने से उसकी भक्तितेजी से बढ़ गई, जिसके फलस्वरूप उसके विचारों का सारा मैल दूर हो गया।
"
गीत॑ भगवता ज्ञानं यत् तत् सड्ग्राममूर्धनि ।
कालकर्मतमोरुद्धं पुनरध्यगमत् प्रभु; ॥
३०॥
गीतम्--उपदिष्ट; भगवता-- भगवान् द्वारा; ज्ञानमू-दिव्य ज्ञान; यत्--जो; तत्--वह; सड्ग्राम-मूर्थनि--युद्ध के बीच में;काल-कर्म--समय तथा कर्म; तम:-रुद्धम्--ऐसे अंधकार से घिरा; पुनः अध्यगमत्--पुनः स्मरण हो आया; प्रभुः--अपनीइन्द्रियों का स्वामी ।
भगवान् की लीलाओं तथा कार्यकलापों के कारण तथा उनकी अनुपस्थिति से ऐसा लगाकि अर्जुन भगवान् द्वारा दिये गये उपदेशों को भूल गया हो।
लेकिन, वास्तव में बात ऐसी न थीऔर वह पुनः अपनी इन्द्रियों का स्वामी बन गया।
"
विशोको ब्रह्मसम्पत्त्या सज्छिन्नद्वैतसंशय: ।
लीनप्रकृतिनैर्गुण्यादलिड्भत्वादसम्भव: ॥
३१॥
विशोक:--शोक से रहित; ब्रह्म-सम्पत्त्या--आध्यात्मिक सम्पत्ति के अधिकारी होने से; सउिछलन्न--पूर्ण रूप से कटकर; द्वैत-संशय:--द्वैत के संशय से; लीन--संलग्न; प्रकृति--भौतिक प्रकृति; नैर्गुण्यात्--अध्यात्म में रहने से; अलिड्डत्वात्-- भौतिकशरीर से विहीन होने के कारण; असम्भव:--जन्म तथा मृत्यु से मुक्त
आध्यात्मिक सम्पत्ति से युक्त होने के कारण उसके द्वैत के संशय पूर्ण रूप से छिन्न हो गये।
इस तरह वह भौतिक प्रकृति के तीनों गुणों से मुक्त होकर अध्यात्म में स्थित हो गया।
अब जन्मतथा मृत्यु के पाश में उसके फँसने की कोई आशंका न थी, क्योंकि वह भौतिक रूप से मुक्त होचुका था।
"
निशम्य भगवन्मार्ग संस्थां यदुकुलस्य च ।
स्वःपथाय मतिं चक्रे निभृतात्मा युधिष्टिर: ॥
३२॥
निशम्य--कहकर; भगवत्-- भगवान् के विषय में; मार्गमू-- भगवान् के प्रकट तथा अप्रकट होने के रास्ते; संस्थाम्--अन्त;यदु-कुलस्य--राजा यदु के वंश का; च--भी; स्व:-- भगवान् का धाम; पथाय--रास्ते में; मतिम्--इच्छा; चक्रे--ध्यान दिया;निभृत-आत्मा--अकेले, एकान्त; युधिष्ठिर:--राजा युधिष्ठिर ने
भगवान् कृष्ण के स्वधाम गमन को सुनकर तथा यदुवंश के पृथ्वी के अस्तित्व का अन्तसमझकर, महाराज युध्िष्ठिर ने भगवद्धाम जाने का निश्चय किया।
"
पृथाप्यनुश्रुत्य धनञझ्जयोदित॑नाशं यदूनां भगवद्गतिं च ताम् ।
एकान्तभकक्त्या भगवत्यधोक्षजेनिवेशितात्मोपरराम संसृते: ॥
३३॥
पृथा--कुन्ती ने; अपि-- भी; अनुश्रुत्य--सुनकर; धनझ्जय--अर्जुन द्वारा; उदितम्--कथित; नाशम्-- अन्त; यदूनाम्--यदुवबंशका; भगवत्-- भगवान् का; गतिमू--तिरो धान; च-- भी; तामू--उन सबको; एक-अन्त--अनन्य; भक्त्या--भक्ति से;भगवति--भगवानू् श्रीकृष्ण में; अधोक्षजे-- अध्यात्म में; निवेशित-आत्मा--पूर्ण मनोयोग से; उपरराम--मुक्त हो गयी;संसृतेः-- भौतिक अस्तित्व से ।
अर्जुन द्वारा यदुबंश के नाश तथा भगवान् कृष्ण के अन्तर्धान होने की बात सुनकर, कुन्तीने पूर्ण मनोयोग से दिव्य भगवान् की भक्ति में अपने को लगा दिया और इस तरह संसार केआवागमन से मोक्ष प्राप्त किया।
"
ययाहरद् भुवो भारं तां तनुं विजहावज: ।
कण्टक॑ कण्टकेनेव ट्वयं चापीशितु: समम् ॥
३४॥
यया--जिससे; अहरत्--छीन लिया; भुवः--संसार का; भारम्-- भार, बोझा; ताम्--उस; तनुम्--शरीर को; विजहौ--त्यागदिया; अजः--अजन्मा ने; कण्टकमू--काँटे को; कण्टकेन--काँटे से; इब--सहश; द्वयम्--दोनों; च-- भी; अपि--यद्यपि;ईशितु:--नियंत्रण करते हुए; समम्--समान ।
सर्वोपरि अजन्मा भगवान् श्रीकृष्ण ने यदुवंश के सदस्यों से अपना-अपना शरीर त्यागकरवा दिया और इस तरह उन्होंने पृथ्वी के भार को उतारा।
यह कार्य काँटे को काँटे सेनिकालने जैसा था, यद्यपि नियन्ता के लिए दोनों एक से हैं।
"
यथा मत्स्यादिरूपाणि धत्ते जह्याद् यथा नट: ।
भूभार: क्षपितो येन जहौ तच्च कलेवरम् ॥
३५॥
यथा--जिस तरह; मत्स्य-आदि--मत्स्य अवतार इत्यादि; रूपाणि--स्वरूप; धत्ते--स्वीकार करते हैं; जह्यात्--ऊपर से छोड़देते हैं; यथा--जिस तरह; नटः--नट, जादूगर; भू-भार:--संसार का भार; क्षपित:--उद्धार; येन--जिससे; जहौ--जाने दिया;तत््--उस; च-- भी; कलेवरम्--शरीर को ।
परमेश्वर ने जिस शरीर को पृथ्वी का भार कम करने के लिए प्रकट किया था, उसे उन्होंनेछोड़ दिया।
वे एक जादूगर के समान विभिन्न शरीरों को, यथा मत्स्य अवतार तथा अन्य अवतारोंमें धारण करने के लिए एक शरीर को छोड़ते हैं।
"
यदा मुकुन्दो भगवानिमां महींजहौ स्वतन्वा श्रवणीयसत्कथ: ।
तदाहरेवाप्रतिबुद्धचेतसा-मभद्रहेतु: कलिरन्ववर्तत ॥
३६॥
यदा--जब; मुकुन्दः--कृष्ण ने; भगवान्-- भगवान्; इमाम्--इस; महीम्--पृथ्वी को; जहौ--छोड़ा; स्व-तन्वा--अपने उसीशरीर के साथ; श्रवणीय-सत्-कथः--उनके विषय में अ्रवण करने योग्य है; तदा--उस समय; अहः एव--उसी दिन से;अप्रति-बुद्ध-चेतसाम्--जिनके मन पर्याप्त विकसित नहीं हैं उनके; अभद्र-हेतुः--सारे दुर्भाग्य का कारण; कलि: अन्ववर्तत--कलि पूर्ण रूप से प्रकट हुआ
जब भगवान् श्रीकृष्ण ने अपने उसी रूप के साथ इस पृथ्वीलोक को छोड़ दिया, उसी दिनसे कलि, जो पहले ही अंशतः प्रकट हो चुका था, अल्पज्ञों के लिए अशुभ परिस्थितियाँ उत्पन्नकरने के लिए पूरी तरह प्रकट हो गया।
"
युधिष्टिरस्तत्परिसर्पणं बुध:पुरे च राष्ट्र च गृहे तथात्मनि ।
विभाव्य लोभानृतजिद्महिंसना-दधर्मचक्रं गमनाय पर्यधात् ॥
३७॥
युधिष्ठिर: --महाराज युधिष्ठिर; तत्--उस; परिसर्पणम्--विस्तार को; बुध:--पूर्ण अनुभवी; पुरे--राजधानी में; च--भी;राष्ट्रे--राज्य में; च--तथा; गृहे--घर में; तथा-- और; आत्मनि--अपने में; विभाव्य--देखकर; लोभ--लालच; अनृत--झूठ;जिहा--कुटिल नीति; हिंसन-आदि--हिंसा, ईर्ष्या; अधर्म--अधर्म; चक्रमू--छल; गमनाय-- प्रस्थान के लिए; पर्यधात्--तदनुसार वस्त्र धारण किये।
महाराज युधिष्टिर पर्याप्त बुद्धिमान थे कि वे कलियुग के प्रभाव को समझ गये, जिसकेविशेष लक्षण होते हैं--बढ़ता लालच, असत्य भाषण, धोखा देना तथा सारी राजधानी, राज्य,घर तथा समस्त व्यक्तियों में हिंसा का आधिक्य इत्यादि ।
अतएव उन्होंने घर छोड़ने की तैयारी कीऔर तदनुकूल वस्त्र धारण कर लिये।
"
स्वराट् पौत्रं विनयिनमात्मन: सुसम॑ गुणै: ।
तोयनीव्या: पति भूमेरभ्यषिज्ञद्गजाहये ॥
३८॥
स्व-राट्--सम्राट; पौत्रमू--पौत्र को; विनयिनमू-- भली-भाँति प्रशिक्षित; आत्मन:--अपना; सु-समम्--सभी प्रकार से समान;गुणैः--गुणों से; तोय-नीव्या:--समुद्रों से घिरा; पतिम्--स्वामी को; भूमे:--भूमि के; अभ्यषिज्ञत्--सिंहासन पर बिठाया;गजाह्यये--हस्तिनापुर की राजधानी में ।
तत्पश्चात् उन्होंने हस्तिनापुर की राजधानी में, उन्होंने अपने पौत्र को सिंहासनारूढ़ किया, जोसमुद्र से घिरी सारी भूमि के स्वामी तथा सम्राट के रूप में प्रशिक्षित था और उन्हीं के समानसुयोग्य था।
"
मथुरायां तथा वज्र॑ शूरसेनपतिं तत: ।
प्राजापत्यां निरूप्येष्टिमग्नीनपिबदी श्वर: ॥
३९॥
मथुरायाम्-मथुरा में; तथा-- भी; वज़्म्--वज़ को; शूरसेन-पतिम्--शूरसेन का राजा; ततः--तत्पश्चात्; प्राजापत्याम्--प्रजापति यज्ञ; निरूप्प--सम्पन्न करके ; इष्टिमू--लक्ष्य; अग्नीन्--अग्नि को; अपिबत्--अपने में स्थापित किया; ई श्वर: --समर्थ।
तब उन्होंने अनिरुद्ध ( भगवान् कृष्ण के पौत्र ) के पुत्र बज्ञ को मथुरा में शूरसेन का राजाबना दिया।
तत्पश्चात् महाराज युधिष्ठिर ने प्राजापत्य यज्ञ किया और गृहस्थ जीवन त्यागने के लिएअपने भीतर अग्नि प्रतिष्ठित की।
"
विसृज्य तत्र तत् सर्व दुकूलवलयादिकम् ।
निर्ममो निरहड्भार: सज्छिन्नाशेषबन्धन: ॥
४० ॥
विसृज्य--त्याग कर; तत्र--वे सब; तत्--यह; सर्वम्--सब कुछ; दुकूल--पेटी; वबलय-आदिकम्--कंगन आदि; निर्मम: --उदास; निरहड्लारः:--अनासक्त; सऊिछलन्न--पूर्ण रूप से कटा हुआ; अशेष-बन्धन:--असीम लगाव ।
महाराज युध्चिष्टिर ने अपने सारे वस्त्र, कमर-पेटी तथा राजसी आभूषण तुरन्त त्याग दिये औरवे पूर्ण रूप से उदासीन तथा प्रत्येक वस्तु से विरक्त हो गये।
"
वाचं जुहाव मनसि तत्प्राण इतरे च तम् ।
मृत्यावपानं सोत्सर्ग तं पद्मत्वे ह्मजोहवीतू ॥
४१॥
वाचम्--वाणी को; जुहाव--त्याग दिया; मनसि--मन में; तत् प्राणे--मन को श्वास लेने में; इतरे च--अन्य इन्द्रियों को भी;तम्--उसमें; मृत्यौ--मृत्यु में; अपानम्-- श्वास; स-उत्सर्गम्-पूर्ण समर्पण को; तम्--उस; पञ्ञत्वे--पाँच तत्त्वों से बने शरीरमें; हि--निश्चय ही; अजोहवीत्--समाहित कर दिया।
तब उन्होंने अपनी सारी इन्द्रियों को मन में, मन को जीवन में, जीवन को प्राण में, अपने पूर्णअस्तित्व को पाँच तत्त्वों के शरीर में तथा अपने शरीर को मृत्यु में समाहित कर दिया।
तत्पश्चात्शुद्ध आत्मा के रूप में वे देहात्म-बुद्धि से मुक्त हो गये।
"
त्रित्वे हुत्वा च पञ्ञत्वं तच्चैकत्वेडजुहोन्मुनि: ।
सर्वमात्मन्यजुहवीद्ब्रह्मण्यात्मानमव्यये ॥
४२॥
त्रित्वे--तीनों गुणों में; हुत्वा--आहुति करके; च-- भी; पश्ञत्वम्-पाँच तत्त्व; तत्--वह; च-- भी; एकत्वे--एक अविद्या में;अजुहोत्--लीन हो गया; मुनि:--विचारवान; सर्वम्--कुल मिलाकर; आत्मनि--आत्मा में; अजुहवीत्--स्थिर; ब्रह्मणि--आत्मा में; आत्मानम्--आत्मा को; अव्यये--कभी न समाप्त होने वाले
इस प्रकार उन्होंने पंचत्त्वमय स्थूल शरीर को विनष्ट करके, प्रकृति के तीन गुणों में मिलाकरउसे अज्ञानता में मिला दिया और तब उस अज्ञानता को आत्मा या ब्रह्म में विलीन कर दिया, जोसर्वदा अक्षय है।
"
चीरवासा निराहारो बद्धवाड्मुक्तमूर्धज: ।
दर्शयन्नात्मनो रूपं जडोन्मत्तपिशाचवत् ।
अनवेक्षमाणो निरगादश्रुण्वन्बधिरो यथा ॥
४३॥
चीर-वासा:--चिथड़े ग्रहण किये; निराहार:--ठोस भोजन करना त्याग दिया; बद्ध-वाक्--बोलना बन्द कर दिया; मुक्त-मूर्धज:--बाल खोल दिए; दर्शयन्--दिखाने लगे; आत्मन:--अपने; रूपम्--शारीरिक स्वरूप को; जड--निष्क्रिय; उन्मत्त--पागल; पिशाच-वत्--उजड्डु की तरह; अनवेक्षमाण:--प्रतीक्षा किये बिना; निरगात्--स्थित था; अश्रृण्वन्--बिना सुने;बधिरः--बहरा व्यक्ति; यथा--जिस तरह।
तत्पश्चात् महाराज युथिष्ठिर ने फटे हुए वस्त्र पहन लिये, ठोस आहार लेना बन्द कर दिया, वेजान कर गूँगे बन गये और बालों को खोल दिया।
इन सबके मिल-जुले रुप में, वे एक उजड्ड यावृत्तिविहीन पागल की तरह दिखने लगे।
वे किसी वस्तु के लिए अपने भाइयों पर आश्रित नहींरहे।
वे बहरे मनुष्य की तरह कुछ भी न सुनने लगे।
"
उदीचीं प्रविवेशाशां गतपूर्वा महात्मभि: ।
हृदि ब्रह्म परं ध्यायन्नावर्तेत यतो गत: ॥
४४॥
उदीचीम्--उत्तरी दिशा; प्रविवेश-आशाम्--वहाँ प्रवेश करने की इच्छा करनेवाले; गत-पूर्वाम्--अपने पूर्वजों द्वारा स्वीकृतपथ; महा-आत्मभि:--विशाल हृदय के कारण; हृदि--हृदय के भीतर; ब्रह्म--परमे श्वर; परम्--परम; ध्यायन्--निरन्तर ध्यानकरते हुए; न आवर्तेत--अपने दिन बिताये; यतः--जहाँ कहीं भी; गतः--गये ।
तब उन्होंने उत्तर दिशा की ओर अपने पूर्वजों तथा महापुरुषों द्वारा स्वीकृत पथ पर चलते हुएप्रस्थान किया, जिससे वे परमेश्वर के विचार में पूर्ण रूप से लग सकें।
वे जहाँ कहीं भी गये,इसी तरह रहे।
"
सर्वे तमनुनिर्जग्मुर्श्रातर: कृतनिश्चया: ।
कलिनाधर्ममित्रेण दृष्ठा स्पृष्टा: प्रजा भुवि ॥
४५॥
सर्वे--सारे; तम्--उनको; अनुनिर्जग्मु:--पीछा करते हुए घर छोड़ दिया; भ्रातर:-- भाइयों ने; कृत-निश्चया:--निश्चित रूप से;कलिना--कलियुग द्वारा; अधर्म--अधर्म; मित्रेण--मित्र के द्वारा; दृष्टा--देखकर; स्पूष्टा:--प्रभावित, वशी भूत; प्रजा: --सारेनागरिक; भुवि--पृथ्वी पर।
महाराज युथ्रिष्ठिर के छोटे भाईयों ने देखा कि कलियुग का पहले से ही संसार भर मेंपदार्पण हो चुका है और राज्य के नागरिक पहले से ही अधर्म द्वारा प्रभावित हैं।
अतएव उन्होंने अपने बड़े भाई के चरण-चिन्हों का अनुगमन करने का निश्चय किया।
"
ते साधुकृतसर्वार्था ज्ञात्वात्यन्तिकमात्मन: ।
मनसा धारयामासुर्वेकुण्ठचरणाम्बुजम् ॥
४६ ॥
ते--वे सब; साधु-कृत--साधु के अनुरूप किया गया; सर्ब-अर्था:--प्रत्येक योग्य वस्तु से युक्त; ज्ञात्वा--जानकर;आत्यन्तिकम्--चरम; आत्मन: --जीव का; मनसा--मन के भीतर; धारयाम् आसु:--पालन किया; बैकुण्ठ--वैकुण्ठ केस्वामी; चरण-अम्बुजम्--चरणकमल का।
उन्होंने धर्म के सारे नियम सम्पन्न कर लिये थे।
अतएवं उनका यह निश्चय ठीक ही था किभगवान् श्रीकृष्ण के चरणकमल ही सबों के चरम लक्ष्य हैं।
अतएव उन्होंने बिना व्यवधान केउनके चरणों का ध्यान किया।
"
तद्धदयानोद्रिक्तया भकत्या विशुद्धधिषणा: परे ।
तस्मिन् नारायणपदे एकान्तमतयो गतिम् ॥
४७॥
अवापुर्दुरवापां ते असद्धिर्विषयात्मभि: ।
विधूतकल्मषा स्थानं विरजेनात्मनैव हि ॥
४८॥
तत्--वह; ध्यान--ध्यान; उत्रिक्तया--मुक्त होकर; भक्त्या--भक्ति से; विशुद्ध--विशुद्ध; धिषणा: --बुद्धि द्वारा; परे--अध्यात्म में; तस्मिन्--उसमें; नारायण-- भगवान् श्रीकृष्ण के; पदे--चरणकमल में; एकान्त-मतय:--जो एक और अनन्य ऐसेभगवान् में स्थित हैं, उनके; गतिम्--गन्तव्य; अवापु:--प्राप्त किया; दुरवापाम्--प्राप्त करना अत्यन्त कठिन; ते--उनके द्वारा;असद्धिः:--भौतिकतावादियों द्वारा; विषय-आत्मभि: -- भौतिक आवश्यकताओं में लीन; विधूत-- धोया हुआ; कल्मषा: --भौतिक मल; स्थानम्--धाम; विरजेन--रजोगुण से रहित; आत्मना एब--ठीक उसी शरीर से; हि--निश्चय ही ।
इस प्रकार भक्तिभाव से निरन्तर स्मरण करने से उत्पन्न भक्तिमयी शुद्ध चेतना के द्वारा उन्होंनेआदि नारायण भगवान् कृष्ण द्वारा अधिशासित बैकुण्ठलोक प्राप्त किया।
यह बैकुण्ठलोककेवल उन्हें प्राप्त होता है, जो अविचल भाव से एक परमेश्वर का ध्यान धरते हैं।
भगवान्श्रीकृष्ण का यह धाम गोलोक वृन्दावन कहलाता है और यह उन व्यक्तियों को प्राप्त नहीं होता,जो जीवन की भौतिक अवधारणा में लीन रहते हैं।
लेकिन समस्त भौतिक कल्मष से पूर्ण रूप सेशुद्ध होने के कारण पाण्डवों ने अपने इसी शरीर में उस धाम को प्राप्त किया।
"
विदुरोपि परित्यज्य प्रभासे देहमात्मन: ।
कृष्णावेशेन तचिचत्त: पितृभि: स्वक्षयं ययौ ॥
४९॥
विदुरः--विदुर ( महाराज युधिष्टिर के चाचा ); अपि-- भी; परित्यज्य--त्याग कर; प्रभासे--प्रभास नामक तीर्थस्थल में; देहम्आत्मन:--अपना शरीर; कृष्ण--परमे श्वर; आवेशेन--उसी विचार में लीन होकर; तत्--उनका; चित्त:--विचार तथा कार्य;पितृभि:--पितृलोक के वासियों सहित; स्व-क्षयम्--अपने निजी धाम को; ययौ--चला गये।
तीर्थाटन के लिए गये हुए विदुर ने प्रभास में अपना शरीर त्याग किया।
चूँकि वे भगवान्कृष्ण के विचार में मग्न रहते थे, अतएवं उनका स्वागत पितृलोक के निवासियों ने किया, जहाँवे अपने मूल पद पर लौट गये।
"
द्रौपदी च तदाज्ञाय पतीनामनपेक्षताम् ।
वासुदेवे भगवति होकान्तमतिराप तम् ॥
५०॥
द्रौपदी--द्रौपदी ( पाण्डव पत्ती )) च--तथा; तदा--उस समय; आज्ञाय--भगवान् कृष्ण को भलीभाँति जानते हुए; पतीनाम्--पतियों के; अनपेक्षताम्--उसकी परवाह न करनेवाले; वासुदेवे-- भगवान् वासुदेव ( कृष्ण ) में; भगवति-- भगवान्; हि--ठीकउसी तरह; एक-अन्त--पूर्णतया; मतिः -- ध्यान; आप--प्राप्त किया; तम्--उसको ( भगवान् को )।
द्रौपदी ने भी देखा कि उसके पतिगण, उसकी परवाह किये बिना घर छोड़ रहे हैं।
वेभगवान् वासुदेव कृष्ण को भलीभाँति जानती थीं।
अतएव वे तथा सुभद्रा दोनों भगवान् कृष्णके ध्यान में लीन हो गई और अपने-अपने पतियों की सी गति प्राप्त की।
"
यः श्रद्धयैतद् भगवत्त्रियाणांपाण्डो: सुतानामिति सम्प्रयाणम् ।
श्रुणोत्यलं स्वस्त्ययनं पवित्रलब्ध्वा हरौ भक्तिमुपैति सिद्धिम् ॥
५१॥
यः--जो कोई; श्रद्धया--श्रद्धापूर्वक ; एतत्--यह; भगवत्-प्रियाणाम्-- भगवान् के अत्यन्त प्रियजनों का; पाण्डो: --पाण्डुके; सुतानाम्--पुत्रों का; इति--इस प्रकार; सम्प्रयाणम्ू--चरम लक्ष्य के लिए प्रस्थान; श्रणोति--सुनता है; अलम्ू--केवल;स्वस्त्ययनम्-सौभाग्य; पवित्रम्--पूरी तरह शुद्ध; लब्ध्वा--प्राप्त करके; हरौ -- भगवान् की; भक्तिम्--भक्ति को; उपैति--प्राप्त करता है; सिद्धिम्--सिद्धि को |
पाण्डु-पुत्रों द्वार जीवन के परम लक्ष्य भगवद्धाम के लिए प्रस्थान का यह विषय अत्यन्त शुभ तथा परम पवित्र है।
अतएव जो भी इस कथा को भक्तिभावपूर्वक सुनता है, वह जीवन की परम सिद्धि भगवद्भक्ति को निश्चय ही प्राप्त करता है।
"
