← श्रीमद्भागवतम् स्कन्ध 1 की सूची
अध्याय सोलह: परीक्षित को कलियुग कैसे प्राप्त हुआ
1.16सूत उवाचततः परीक्षिद् द्विजवर्यशिक्षयामहीं महाभागवत: शशास ह ।
यथा हिसूत्यामभिजातकोविदा:समादिशन् विप्र महद्गुणस्तथा ॥
१॥
सूतः उबाच--सूत गोस्वामी ने कहा; ततः--तत्पश्चात्; परीक्षित्--महाराज परीक्षित ने; द्विज-वर्य--श्रेष्ठ ब्राह्मण; शिक्षया--अपने उपदेशों से; महीम्-- पृथ्वी को; महा-भागवतः--परम भक्त; शशास--शासन किया; ह-- भूतकाल में; यथा--जैसाउन्होंने कहा था; हि--निश्चय ही; सूत्यामू--उनके जन्म के समय; अभिजात-कोविदा:--जन्म के समय पटु ज्योतिषी;समादिशन्--अभिमत व्यक्त किया; विप्र--हे ब्राह्मण; महत्-गुण:--महान् गुण; तथा--उसी के अनुसार सत्यसूत गोस्वामी ने कहा : हे विद्वान ब्राह्मणों, तब महाराज परीक्षित श्रेष्ठ द्विज ब्राह्मणों केआदेशों के अनुसार महान् भगवद्भक्त के रूप में संसार पर राज्य करने लगे।
उन्होंने उन महान्गुणों के द्वारा शासन चलाया, जिनकी भविष्यवाणी उनके जन्म के समय पटु ज्योतिषियों ने कीथी।
"
स उत्तरस्य तनयामुपयेम इरावतीम् ।
जनमेजयादी श्रतुरस्तस्यामुत्पादयत् सुतान् ॥
२॥
सः--उसने; उत्तरस्थ--राजा उत्तर की; तनयाम्--पुत्री को; उपयेमे--विवाह किया; इरावतीम्--इरावती को; जनमेजय-आदीन्--महाराज जनमेजय तथा अन्य; चतुरः--चार; तस्याम्--उसमें; उत्पादयत्--जन्म दिया; सुतान्--पुत्रों कोराजा परीक्षित ने राजा उत्तर की पुत्री इरावती से विवाह किया और उससे उन्हें ज्येष्ठ पुत्रमहाराज जनमेजय सहित चार पुत्र प्राप्त हुए।
"
आजहाराश्रमेधांख्रीन् गज़ायां भूरिदक्षिणान् ।
शारद्वतं गुरु कृत्वा देवा यत्राक्षिगोचरा: ॥
३॥
आजहार--सम्पन्न किया; अश्व-मेधान्--अश्वमेध यज्ञ; त्रीन्--तीन; गड्ढडायाम्--गंगा तट पर; भूरि--पर्याप्त; दक्षिणान्--दक्षिणाएँ, पुरस्कार; शारद्वतम्--कृपाचार्य को; गुरुम्--गुरु; कृत्वा--चुनकर; देवा:--देवतागण; यत्र--जहाँ पर; अक्षि--आँखें; गोचरा:--दृष्टिगत ।
महाराज परीक्षित ने कृपाचार्य को अपना गुरु चुनने के बाद गंगा के तट पर तीन अश्वमेथयज्ञ किये।
इन्हें आगन्तुकों एवं निमंत्रितों को पर्याप्त दक्षिणा देकर संपन्न किया गया।
इन यज्ञों मेंसामान्य लोग भी देवताओं का दर्शन पा सके।
"
निजग्राहौजसा वीर: कलिं दिग्विजये क्नचित् ।
नृपलिज्भधरं शूद्रं घ्नन्तं गोमिथुनं पदा ॥
४॥
निजग्राह--पर्याप्त दण्डित; ओजसा--पराक्रम से; वीर:--वीर पुरुष; कलिम्--इस युग के स्वामी, कलि को; दिग्विजये--विश्वको विजित करने के मार्ग पर; क्चितू--एक बार; नृप-लिड्डर-धरम्--राजा का वेश धारण करके विचरण करने वाला;शूद्रमू--नीच जाति का; घ्नन्तमू--चोट पहुँचाते हुए; गो-मिथुनम्--गाय तथा बैल की जोड़ी को; पदा--पाँव में ।
एक बार, जब महाराज परीक्षित विश्व-दिग्विजय करने निकले, तो उन्होंने देखा किकलियुग का स्वामी, जो शूद्र से भी निम्न था, राजा का वेश धारण करके गाय तथा बैल कीजोड़ी के पाँवों पर प्रहार कर रहा था।
राजा ने उसे पर्याप्त दण्ड देने के लिए तुरन्त पकड़ लिया।
"
शौनक उवाच कस्य हेतोर्निजग्राह कलि दिग्विजये नृप: ।
नृदेवचिहृधृक्शूद्रको सौ गां य: पदाहनत् ।
तत्कथ्यतां महाभाग यदि कृष्णकथाश्रयम् ॥
५॥
शौनकः उवाच--शौनक ऋषि ने कहा; कस्य--किस; हेतो:--कारण से; निजग्राह--पर्याप्त दण्ड दिया; कलिम्--कलियुगके स्वामी को; दिग्विजये--अपनी विश्व यात्रा के समय; नृप:--राजा; नृ-देव--राजसी व्यक्ति; चिह्र-धूक्--के समान सजाहुआ; शूद्रक:--शूढ्रों में भी अधम; असौ--वह; गाम्--गाय को; यः--जो; पदा अहनतू्--लात से मारा; तत्--वह सब;कथ्यताम्--कृपा करके कहो; महा-भाग--हे परम भाग्यशाली; यदि--यदि, फिर भी; कृष्ण--कृष्ण विषयक; कथा-आश्रयम्--उनकी कथाओं से सम्बन्धित ।
शौनक ऋषि ने पूछा : महाराज परीक्षित ने उसे केवल दण्ड क्यों दिया, जबकि वह शूद्रों मेंअधम था, उसने राजा का वेश बना रखा था तथा गाय पर पाद प्रहार किया था? ये सब घटनाएंयदि भगवान् कृष्ण की कथा से सम्बन्धित हों, तो कृपया इनका वर्णन करें।
"
अथवास्य पदाम्भोजमकरन्दलिहां सताम् ।
किमन्यैरसदालापैरायुषो यदसद्व्यय: ॥
६॥
अथवा--अन्यथा; अस्य--उनका ( भगवान् कृष्ण का ); पद-अम्भोज--चरणकमल; मकरन्द-लिहाम्--कमल पुष्प के मधुको चाटनेवाले; सताम्--निरन्तर जीवित रहनेवालों के; किम् अन्यैः:--अन्य किसी वस्तु से क्या लाभ; असतू-- भ्रामक;आलापै:--विषय, प्रसंग; आयुष:--आयु में; यत्--जो है; असत्-व्ययः--जीवन का अपव्यय ।
भगवान् के भक्त भगवान् के चरणकमलों से प्राप्त मधु के चाटने के आदी हैं।
उन कथाप्रसंगों से क्या लाभ जो मनुष्य के बहुमूल्य जीवन को व्यर्थ नष्ट करें ?"
क्षुद्रायुषां नृणामड़ मर्त्यानामृतमिच्छताम् ।
इहोपहूतो भगवान्मृत्यु: शामित्रकर्मणि ॥
७॥
क्षुद्र-- अत्यन्त छोटी; आयुषाम्--आयु वाले; नृणाम्-मनुष्यों का; अड़--हे सूत गोस्वामी; मर्त्यानामू-मरनेवालों का;ऋतम्-शाश्वत् जीवन; इच्छताम्--चाहनेवालों का; इह--यहाँ; उपहूतः--उपस्थित होने के लिए बुलाया गया; भगवानू--भगवान् का प्रतिनिधित्व करते हुए; मृत्यु:--मृत्यु के नियंत्रक, यमराज; शामित्र--दमन करते हुए; कर्मणि--कार्यो को।
हे सूत गोस्वामी, मनुष्यों में से कुछ ऐसे हैं, जो मृत्यु से मुक्ति पाने के और शाश्वत जीवन प्राप्तकरने के इच्छुक होते हैं।
वे मृत्यु के नियंत्रक यमराज को बुलाकर वध किये जाने की क्रिया सेबच जाते हैं।
"
न कश्चिन्म्रियते तावद् यावदास्त इहान्तक: ।
एतदर्थ हि भगवानाहूत: परमर्षिभि: ।
अहो नृलोके पीयेत हरिलीलामृतं बच: ॥
८॥
न--नहीं; कश्चित्--कोई; प्रियते--मरेगा; तावत्--तब तक; यावत्--जब तक; आस्ते--उपस्थित हैं; इह--यहाँ; अन्तक: --जीवन का अन्त करने वाले; एतत्--यह; अर्थम्--कारण; हि--निश्चय ही; भगवान्-- भगवान् के प्रतिनिधि; आहूत:--आमंत्रित; परम-ऋषिभि: --बड़े-बड़े ऋषियों द्वारा; अहो--ओह; नू-लोके--मानव समाज में; पीयेत--पीने दो; हरि-लीला--भगवान् की दिव्य लीलाएँ; अमृतम्-- अमृत; वच:--कथाएँ ।
जब तक सबों की मृत्यु के कारण यमराज यहाँ पर उपस्थित हैं, तब तक किसी की मृत्युनहीं होगी।
ऋषियों ने मृत्यु के नियंत्रक यमराज को आमंत्रित किया है, जो भगवान् के प्रतिनिधिहैं।
उनकी पकड़ में आनेवाले सारे जीवों को भगवान् की दिव्य लीलाओं की इस वार्ता के रूपमें मृत्युगहित अमृत का श्रवण करने का लाभ उठाना चाहिए।
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मन्दस्य मन्दप्रज्ञस्थ वयो मन्दायुषश्च वै ।
निद्रया हियते नक्तं दिवा च व्यर्थकर्मभि: ॥
९॥
मन्दस्य--आलसी का; मन्द--अल्प; प्रज्॒स्थ--बुद्धि का; वयः-- आयु; मन्द--लघु; आयुष:--आयु का; च--तथा; वै--ठीक-ठीक; निद्रया--सोने में; हियते--बीत जाती है; नक्तम्--रात्रि; दिवा--दिन; च--भी; व्यर्थ--बेकार; कर्मभि:--कार्योंमें
अल्प बुद्धि तथा कम आयु वाले आलसी मनुष्य रात को सोने में तथा दिन को व्यर्थ केकार्यों में बिता देते हैं।
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सूत उवाचयदा परीक्षित् कुरुजाड्नलेवसत्कलि प्रविष्ट॑ निजचक्रवर्तिते ।
निशम्य वार्तामनतिप्रियां ततःशरासनं संयुगशौण्डिराददे ॥
१०॥
सूतः उबाच--सूत गोस्वामी ने कहा; यदा--जब; परीक्षित्--महाराज परीक्षित; कुरु-जाड्ले--कुरु प्रदेश की राजधानी में;अवसत्--रहते थे; कलिमू--कलियुग के लक्षण; प्रविष्टमू--प्रवेश किया; निज-चक्रवर्तिते--अपनी सीमा में; निशम्य--इसतरह का सुनकर; वार्तामू--समाचार को; अनति-प्रियाम्--अधिक रोचक नहीं; ततः--तत्पश्चात्; शरासनम्-- धनुष-बाण;संयुग--अवसर पाकर; शौण्डि: -- वीरोचित कार्य-कलाप; आददे--ग्रहण किया
सूत गोस्वामी ने कहा : जब महाराज परीक्षित कुरू-साम्राज्य की राजधानी में रह रहे थे, तोअपने राज्य की सीमा के भीतर कलियुग के लक्षणों को प्रवेश होते देखा।
जब उन्हें इसका पताचला, तो उन्हें यह रुचिकर प्रतीत नहीं हुआ।
लेकिन इससे उन्हें उसके विरुद्ध लड़ने का अवसरअवश्य प्राप्त हो सका।
अतएव उन्होंने अपना धनुष-बाण उठाया और सैनिक कार्यवाही के लिएसन्नद्ध हो गये।
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स्वलड्कृतं श्यामतुरज़योजित॑रथं मृगेन्द्रध्वजमाश्रित: पुरात् ।
वृतो रथाश्वद्विपपत्तियुक्तयास्वसेनया दिग्विजयाय निर्गतः ॥
११॥
सु-अलड्कृतम्--अच्छी तरह से सजकर; श्याम--काले; तुरड्र--घोड़े; योजितम्--जोते हुए; रथम्--रथ को; मृग-इन्द्र--सिंह; ध्वजम्--ध्वजा लगी; आश्रित:--संरक्षण में; पुरात्--राजधानी से; वृत:--घिरा हुआ; रथ--सारथी; अश्व--अ श्वारोहीदल; द्विपपत्ति--हाथी; युक्तया--इस तरह सुसज्जित; स्व-सेनया--पैदल सेना के साथ; दिग्विजयाय--जीतने के लिए;निर्गतः--बाहर गया।
महाराज परीक्षित काले घोड़ों द्वारा खींचे जानेवाले रथ पर सवार हो गये।
उनकी ध्वजा परसिंह का चिन्ह अंकित था।
इस प्रकार सुसज्जित होकर तथा सारथियों, अश्वारोहियों, हाथीयोंतथा पैदल सैनिकों से घिरे हुए, उन्होंने सभी दिशाएँ जीतने के लिए राजधानी से प्रस्थान किया।
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भद्राश्च॑ केतुमालं च भारत चोत्तरान् कुरून् ।
किम्पुरुषादीनि वर्षाणि विजित्य जगृहे बलिमू ॥
१२॥
भद्राश्म्-- भद्रा श्र; केतुमालम्--केतुमाल; च-- भी; भारतम्-- भारत; च--तथा; उत्तरान्--उत्तरी देश; कुरूनू--कुरुवंश काराज्य; किम्पुरुष-आदीनि--हिमालय की उत्तरी दिशा के आगे का देश; वर्षाणि--पृथ्वी-लोक के भागों को; विजित्य--जीतकर; जगृहे--वसूल किया; बलिमू-- भेंटें |
तब महाराज परीक्षित ने पृथ्वी-लोक के समस्त भागों--भद्राश्च, केतुमाल, भारत,कुरुजांगल का उत्तरी भाग, किम्पुरुष इत्यादि को जीत लिया और उनके शासकों से भेंटें वसूलकीं।
"
तत्र तत्रोपश्रुण्वान: स्वपूर्वेषां महात्मनाम् ।
प्रगीयमाणं च यश: कृष्णमाहात्म्यसूचकम् ॥
१३॥
आत्मानं च परित्रातमश्वत्थाम्नोड्खतेजस: ।
स्नेहं च वृष्णिपार्थानां तेषां भक्ति च केशवे ॥
१४॥
तेभ्य: परमसन्तुष्ट: प्रीत्युज्गम्भितलोचन: ।
महाधनानि वासांसि ददौ हारान् महामना: ॥
१५॥
तत्र तत्र--जहाँ-जहाँ राजा गये; उपश्रुण्वान:--निरन््तर सुनते रहे; स्व-पूर्वषाम्-- अपने पुरखों के विषय में; महा-आत्मनामू--जोसबके सब भगवान् के महान् भक्त थे; प्रगीयमाणम्--इस तरह सम्बोधित करनेवालों को; च-- भी; यशः--यश; कृष्ण--भगवान् कृष्ण; माहात्म्य--यशस्वी कार्य; सूचकम्--सूचित करनेवाले; आत्मानम्-- अपने को; च--भी; परित्रातम्--उद्धारकिया; अश्वत्थाम्न: --अश्वत्थामा का; अस्त्र--हथियार; तेजस:--शक्तिशाली किरणें; स्नेहम्--स्नेह; च-- भी; वृष्णि-पार्थानाम्--वृष्णि तथा पृथा की सन््तानों के बीच; तेषामू--उन सब की; भक्तिम्-भक्ति; च--भी; केशवे-- भगवान् कृष्णमें; तेभ्य:--उनको; परम--अत्यधिक; सन्तुष्ट:--प्रसन्न; प्रीति--आकर्षण; उज्जूम्भित--हर्ष से खुले; लोचन:--नेत्रोंबाला;महा-धनानि--बहुमूल्य धन; वासांसि--वस्त्र; ददौ--दान में दिया; हारानू--गले के हार; महा-मना:--विशाल हृदय-वाला
राजा जहाँ कहीं भी जाते, उन्हें निरन्तर अपने उन महान् पूर्वजों का यशोगान सुनने मिलता,जो सभी भगवद्भक्त थे, तथा भगवान् श्रीकृष्ण के यशस्वी कार्यो की गाथा सुनने को भीमिलती।
वे यह भी सुनते कि किस तरह वे स्वयं अश्रत्थामा के ब्रह्मास्त्र के प्रचण्ड ताप सेभगवान् कृष्ण द्वारा बचाये गये थे।
लोग वृष्णि तथा पृथा-वंशियों के मध्य अत्यधिक स्नेह काभी उल्लेख करते, क्योंकि पृथा भगवान् केशव के प्रति अत्यधिक श्रद्धावान थी।
राजा ने ऐसेयशोगान करनेवालों से अत्यधिक प्रसन्न होकर परम सनन््तोष के साथ अपनी आँखें खोलीं।
उदारतावश उन्होंने प्रसन्न होकर उन्हें मूल्यवान मालाएँ तथा वस्त्र भेंट किये।
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सारथ्यपारषदसेवनसख्यदौत्य-वीरासनानुगमनस्तवनप्रणामान् ।
स्निग्धेषु पाण्डुषु जगत्प्रणतिं च विष्णो-भक्ति करोति नृपतिश्वरणारविन्दे ॥
१६॥
सारथ्य--सारथी के पद की स्वीकृति; पारषद--राजसूय यज्ञ की सभा में प्रधान पद की स्वीकृति ( अग्रत्व ); सेवन-- भगवान्की सेवा में मन को निरन्तर लगाना; सख्य--भगवान् को मित्र-रूप में सोचना; दौत्य--दूत-पद को स्वीकारना; वीर-आसन--रात्रि में हाथ में तलवार लिए रखवाले के पद की स्वीकृति; अनुगमन--चरणचिल्लें पर चलना; स्तवन-- प्रार्थना करना;प्रणामान्ू-- प्रणाम् करते हुए; स्निग्धेषु--जो लोग भगवान् की इच्छा के प्रति विनप्र हैं उनको, विनीत; पाण्डुषु--पाण्डवों में;जगतू--विश्व; प्रणतिमू--जिसकी आज्ञा का पालन किया जाय, उसको; च--तथा; विष्णो: --विष्णु की; भक्तिम्--भक्ति;'करोति--करता है; नृ-पतिः:--राजा; चरण-अरविन्दे-- भगवान् के चरणकमलों पर
महाराज परीक्षित ने सुना कि जिन भगवान् कृष्ण ( विष्णु ) की आज्ञा का पालन सारा जगतकरता है, उन्होंने अपनी अहैतुकी कृपा से पाण्डु के विनीत पुत्रों की उनकी इच्छानुसार सभीप्रकार से सेवाएँ कीं, जिनमें सारथी बनने से लेकर अग्रपूजा ग्रहण करने तथा दूत बनने, मित्रबनने, रात्रि में रक्षक बनकर सेवाएँ करने के कार्य सम्मिलित हैं।
उन्होंने सेवक की भाँतिपाण्डवों की आज्ञा का पालन किया तथा आयु में छोटों की भाँति उन्हें प्रणाम किया।
जबमहाराज परीक्षित ने यह सब सुना, तो वे भगवान् के चरणकमलों की भक्ति से अभिभूत हो उठे।
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तस्यैवं वर्तमानस्य पूर्वेषां वृत्तिमन्वहम् ।
नातिदूरे किलाश्चर्य यदासीतू तन्निबोध मे ॥
१७॥
तस्य--महाराज परीक्षित का; एवम्--इस प्रकार; वर्तमानस्य--ऐसे विचारों में लीन रहकर; पूर्वेषाम्-- अपने पूर्वजों में;वृत्तिमू--अच्छा कार्य; अन्बहम्-दिन-प्रतिदिन; न--नहीं; अति-दूरे--काफी दूर; किल--निश्चय ही; आश्चर्यम्--आश्चर्यजनक; यत्--वह; आसीत्-- था; तत्--जो; निबोध-- उसे जानो; मे--मुझसे
अब तुम लोग मुझसे वह घटना सुन सकते हो, जो तब घटी, जब महाराज परीक्षित अपनेपूर्वजों की उत्तम वृत्तियों के विषय में सुनते हुए तथा उन विचारों में डूबे हुए अपने दिन बिता रहे थे।
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धर्म: पदैकेन चरन् विच्छायामुपलभ्य गाम् ।
पृच्छति स्माश्रुवदनां विवत्सामिव मातरम् ॥
१८॥
धर्म:--साक्षात् धर्म; पदा--पाँव से; एकेन--एक ही; चरन्--विचरण करते; विच्छायाम्--शोक की छाया से ग्रसित;उपलभ्य--मिलकर; गाम्--गाय को; पृच्छति--पूछते हुए; स्म--सहित; अश्रु-वदनामू--मुख-मंडल में अश्रुओं सहित;विवत्साम्--बिना बछड़े की; इब--सहृश; मातरम्--माता को ।
साक्षात् धर्म, बैल के रूप में विचरण कर रहा था।
उसे गाय के रूप में साक्षात् पृथ्वी मिली,जो ऐसी माता के समान शोकग्रस्त दिखाई पड़ी, जो अपना पुत्र खो चुकी हो।
उसकी आँखों मेंआँसू थे और उसके शरीर का सौन्दर्य उड़ गया था।
धर्म ने पृथ्वी से इस प्रकार प्रश्न किया।
"
धर्म उवाचकच्चिद्धद्रेडनामयमात्मनस्तेविच्छायासि म्लायतेषन्मुखेन ।
आलक्षये भवतीमन्तराधिदूरे बन्धुं शोचसि कझ्जनाम्ब ॥
१९॥
धर्म: उबाच-- धर्म ने पूछा; कच्चित्--क्या; भद्वे--महोदया; अनामयम्--स्वस्थ एवं प्रसन्न; आत्मन: --स्वयं; ते--आपको;विच्छाया असि--शोक की छाया से आवृत प्रतीत होते हैं; म्लायता--श्याम रंग की; ईषत्--कुछ-कुछ; मुखेन--मुख मंडल से;आलक्षये--आप दिखती हो; भवतीम्--आप; अन्तराधिम्-- आन्तरिक व्याधि; दूरे--दूर स्थित; बन्धुम्--मित्र के विषय में;शोचसि--चिन्ता कर रहै हैं; कञ्नन--कोई; अम्ब--हे माता ।
धर्म ने ( बैल रूप में ) पूछा : हे महोदया, आप स्वयं स्वस्थ तथा प्रसन्न तो हैं? आप शोककी छाया से आवृत क्यों हैं? आपके मुख से ऐसा लगता है कि आप म्लान पड़ गई हैं।
क्याआपको कोई भीतरी रोग हो गया है या आप अपने किसी दूर स्थित सम्बन्धी के विषय में सोचरही हैं ?"
पादैर्न्यून शोचसि मैकपाद-मात्मानं वा वृषलैभेशक्ष्यमाणम् ।
आहो सुरादीन् हतयज्ञभागान्प्रजा उत स्विन्मघवत्यवर्षति ॥
२०॥
पादैः--तीन पाँवों से; न्यूनमू--विहीन; शोचसि-- क्या आप शोक कर रही हो; मा--मेरा; एक-पादम्--केवल एक पाँव;आत्मानम्--अपना शरीर; वा--अथवा; वृषलै:--अवैध मांस-भक्षकों के द्वारा; भोक्ष्यमाणम्--शोषित किये जाने के लिए;आहो:--यज्ञ में; सुर-आदीन्--देवता-गण; हत-यज्ञ--यज्ञ से रहित; भागान्-- हिस्से; प्रजा:--जीव; उत--बढ़ता हुआ;स्वित्--कहीं; मघवति--दुर्भिक्ष में; अवर्षति--वर्षा न होने से
मेरे तीन पाँव नहीं रहे और अब मैं केवल एक पाँव पर खड़ा हूँ।
क्या आप मेरी इस दशा परशोक कर रही हैं या इस बात पर कि अब आगे अवैध मांस-भक्षक आपका शोषण करेंगे? याआप इसलिए दुखी हैं कि अब देवताओं को यज्ञ की बलि में से अपना हिस्सा नहीं मिल रहा,क्योंकि इस समय कोई यज्ञ सम्पन्न नहीं हो रहे ? या आप दुर्भिक्ष तथा सूखे के कारण दुखीजीवों के लिए दुखित हो रही हैं?"
अरक्ष्यमाणा: स्त्रिय उर्वि बालान् शोचस्यथो पुरुषादैरिवार्तान् ।
वाचं देवीं ब्रह्मकुले कुकर्म-ण्यब्रह्मण्ये राजकुले कुलाग्रूयानू ॥
२१॥
अरक्ष्यमाणा:--अरक्षित; स्त्रियः--स्त्रियाँ; उर्वि-- पृथ्वी पर; बालानू--बच्चों को; शोचसि--आपको तरस आ रही है; अथो--इस तरह; पुरुष-आदैः--आदमियों के द्वारा; इब--सहृश; आर्तान्--दुखियारी; वाचम्--वाणी; देवीम्--देवी को; ब्रह्मकुले--ब्राह्मण-कुल में; कुकर्मणि--धर्म के विरुद्ध कार्य करता है; अब्रह्मण्ये--ब्राह्मण-संस्कृति के विरोधी लोग; राज-कुले--प्रशासनिक वंश में; कुल-अछयान्-- अधिकांश कुल ( ब्राह्मण )
क्या आप को उन दुखियारी स्त्रियों तथा बच्चों पर दया आ रही है, जिन्हें चरित्रहीन पुरुषोंद्वारा अकेले छोड़ दी गई हैं? अथवा आप इसलिए दुखी हैं कि ज्ञान की देवी अधर्म में रतब्राह्मणों के हाथ में हैं? या यह आप देख कर दुखी हैं कि ब्राह्मणों ने उन राजकुलों का आश्रयग्रहण कर लिया है, जो ब्राह्मण संस्कृति का आदर नहीं करते ?"
कि क्षत्रबन्धूनू कलिनोपसृष्टान्राष्ट्राणि वा तैरवरोपितानि ।
इतस्ततो वाशनपानवास:स्नानव्यवायोन्मुखजीवलोकम् ॥
२२॥
किमू--क्या; क्षत्र-बन्धून्-- अयोग्य प्रशासक; कलिना--कलियुग के प्रभाव से; उपसृष्टानू--मोह--ग्रस्त; राष्ट्रिणि --राज्य केमामले; वा--अथवा; तैः --उनके द्वारा; अवरोपितानि--अव्यवस्थित किया गया; इतः--इधर; तत:--उधर; वा-- अथवा;अशन--भोजन ग्रहण करते हुए; पान--पेय; वास:--आवास; स्नान--स्नान; व्यवाय--संभोग; उन्मुख--प्रवृत्त; जीव-लोकम्--मानव-समाज ।
अब तथाकथित प्रशासक इस कलियुग के प्रभाव से मोहग्रस्त हो गये हैं और इस तरहउन्होंने राज्य के सारे मामलों को अस्त-व्यस्त कर रखा है।
क्या आप इस कुव्यवस्था के लिएशोक कर रही हैं ? अब सामान्य जनता खाने, पीने, सोने तथा सहवास के विधि-विधानों कापालन नहीं कर रही है और वह सारे कार्य कहीं भी और कैसे भी करने के लिए सन्नद्ध रहती है।
क्या आप इस कारण से अप्रसन्न हैं?"
यद्वाम्ब ते भूरिभरावतारकृतावतारस्य हरेर्धरित्रि ।
अन्तहिंतस्य स्मरती विसृष्टाकर्माणि निर्वाणविलम्बितानि ॥
२३॥
यद्वा--हो सकता है; अम्ब--हे माता; ते--आपका; भूरि-- भारी; भर--बोझा; अवतार--बोझा घटाना; कृत--किया गया;अवतारस्य--अवतारी; हरे: -- भगवान् श्रीकृष्ण का; धरित्रि--हे पृथ्वी; अन्तर्हितस्य--दृष्टि से ओझल भगवान् का; स्मरती--सोचते हुए; विसृष्टा--किया गया सब कुछ; कर्माणि--कर्म; निर्वाण--मोक्ष; विलम्बितानि--जो निहित हो
हे माता पृथ्वी, पूर्ण पुरुषोत्तम भगवान् हरि ने तुम्हारे भारी बोझ को उतारने के लिए हीश्रीकृष्ण के रूप में स्वयं अवतार लिया।
यहाँ के उनके सारे कार्य दिव्य हैं और वे मोक्ष-पथ कोपक्का करनेवाले हैं।
अब आप उनकी उपस्थिति से विहीन हो गई हैं।
शायद अब आप उन्हीं कार्योंको सोच रही हैं और उनकी अनुपस्थिति में दुखी हो रही हैं।
"
इदं ममाचक्ष्व तवाधिमूलंवसुन्धरे येन विकशितासि ।
कालेन वा ते बलिनां बलीयसासुराचितं कि हतमम्ब सौभगम् ॥
२४॥
इदम्--यह; मम--मुझको; आचक्ष्व--कृपया बताओ; तब--तुम्हारे; आधिमूलम्--आपके दुखों की जड़; वसुन्धरे--हे समस्तधन की खान; येन--जिससे; विकर्शिता असि--इतनी दुर्बल हो; कालेन--समय के प्रभाव से; वा--अथवा; ते--आपका;बलिनाम्--अत्यन्त शक्तिशाली से; बलीयसा--अधिक शक्तिशाली; सुर-अर्चितम्--देवताओं द्वारा वन्दनीय; किम्--क्या;हतम्--छीन लिया; अम्ब--माता; सौभगम्--सौभाग्य ।
हे माता, आप सारे धन की खान हैं।
कृपया मुझे अपने उन कष्टों का मूल कारण बतायें,जिससे आप इस दुर्बल अवस्था को प्राप्त हुई हैं।
मैं सोचता हूँ कि अत्यन्त बलवानों को भीजीतनेवाले प्रबल काल ने देवताओं द्वारा वन्दनीय आपके सारे सौभाग्य को छीन लिया है।
धरण्युवाचभवान् हि वेद तत्सर्व" यन्मां धर्मानुपृच्छसि ।
चतुर्भिर्वर्तसे येनपादैलोकसुखावहै: ॥
२५॥
धरणी उवाच--माता पृथ्वी ने उत्तर दिया; भवान्--आप; हि--निश्चय ही; वेद--जानते हैं; तत् सर्वम्--वह सब, जिसे आपमुझसे पूछा है; यत्--जो; माम्--मुझसे; धर्म--हे धर्म-रूप पुरुष; अनुपृच्छसि-- आप एक-एक करके पूछा; चतुर्भि:--चारों;वर्तसे--आप उपस्थित हो; येन--जिससे; पादैः--पाँवों से; लोक--प्रत्येक लोक में; सुख-आवहै:--सुख को बढ़ानेवाला |
( गाय के रूप में ) पृथ्वी देवी ने ( बैल-रूप में ) धर्म-रूप पुरुष को इस प्रकार उत्तर दिया :हे धर्म, आपने मुझसे जो भी पूछा है, वह आपको ज्ञात हो जायेगा।
मैं आपके उन सारे प्रश्नों काउत्तर देने का प्रयास करूँगी।
कभी आप भी अपने चार पाँवों द्वारा पालित थे और आपनेभगवान् की कृपा से सारे विश्व में सुख की वृद्धि की थी।
"
सत्यं शौचं दया क्षान्तिस्त्याग: सनन््तोष आर्जवम् ।
शमो दमस्तप: साम्यं तितिक्षोपरति: श्रुतम् ॥
२६॥
ज्ञानं विरक्तिरैश्वर्य शौर्य तेजो बल॑ स्मृति: ।
स्वातन्त्रयं कौशल कान्तिर्धर्य मार्दवमेव च ॥
२७॥
प्रागल्भ्यं प्रश्रय: शीलं सह ओजो बल॑ भग: ।
गाम्भीर्य स्थैर्यमास्तिक्यं कीर्तिमानोनहड्कृति: ॥
२८॥
एते चान्ये च भगवज्नित्या यत्र महागुणा: ।
प्रार्था महत्त्वमिच्छद्धिर्न वियन्ति सम कहिंचित् ॥
२९॥
तेनाहं गुणपात्रेण श्रीनिवासेन साम्प्रतम् ।
शोचामि रहित॑ लोक पाप्मना कलिनेक्षितम् ॥
३०॥
सत्यम्--सच्चाईं; शौचम्--स्वच्छता; दया--दूसरे के दुखों को न सह पाना; क्षान्तिः--क्रोध का कारण होते हुए भीआत्मसंयम; त्याग: --वैराग्य; सन््तोष: --आत्म-तुष्टि; आर्जवम्--स्पष्टता; शमः--मन की स्थिरता; दम:--इन्द्रियों का संयम;तपः--अपने उत्तरदायित्व के प्रति सच्चाई; साम्यम्--मित्र तथा शत्रु के बीच भेदभाव न करना; तितिक्षा--अन्यों के अपराधों केप्रति सहनशीलता; उपरति:--लाभ-हानि के प्रति उदासीनता; श्रुतम्--शास्त्रों के आदेशों का पालन; ज्ञानम्-ज्ञान ( आत्म-साक्षात्कार ); विरक्ति:--इन्द्रियभोग से अनासक्ति; ऐश्वर्यमू--नायकत्व; शौर्यम्--बहादुरी; तेज:--प्रभाव, प्रताप; बलम्--असम्भव को सम्भव बनाना; स्मृतिः--समुचित कर्तव्य की खोज; स्वातन््यम्--अन्यों पर आश्रित न रहना; कौशलमू--सारीकार्यकुशलता; कान्ति:--सौन्दर्य; धैर्यमू--उपद्रव से मुक्ति; मार्दवम्--दयालुता; एव--इस प्रकार; च-- भी; प्रागल्भ्यम्--उदारता; प्रश्रय:--विनय; शीलम्--शील; सह:--संकल्प; ओज:--पूर्ण ज्ञान; बलम्--उपयुक्त दक्षता; भग:--भोग काविषय; गाम्भीयम्--प्रसन्नता; स्थैर्यम्--स्थिरता; आस्तिक्यम्--आज्ञाकारिता; कीर्ति:--यश; मान: --पूजित होने के योग्य;अनहड्कृति:--निरभिमानता; एते--ये सब; च अन्ये--तथा अन्य अनेक; च--तथा; भगवनू-- भगवान्; नित्या:--शा श्वत;यत्र--जहाँ; महा-गुणा:--बड़े-बड़े गुण; प्रार्थ्या:--रखने के योग्य; महत्त्वम्--महानता; इच्छद्द्रि:--इच्छा करनेवाले; न--कभी नहीं; वियन्ति--घटते हैं; स्म--सदैव; कर्हिचित्--किसी समय; तेन--उनके द्वारा; अहम्--मैं; गुण-पात्रेण-- समस्तगुणों का आगार; श्री-- भाग्य की देवी; निवासेन--रहने के स्थान द्वारा; साम्प्रतम्--हाल ही में; शोचामि--सोच रही हूँ;रहितमू--विहीन; लोकम्-ग्रह; पाप्मना--समस्त पापों के संग्रह से; कलिना--कलि द्वारा; ईक्षितम्--देखा जाता है।
उनमें निम्नलिखित गुण तथा अन्य अनेक दिव्य गुण पाये जाते हैं, जो शाश्वत रूप सेविद्यमान रहते हैं और उनसे कभी विलग नहीं होते।
ये हैं ( १ ) सच्चाई ( २) स्वच्छता ( ३ ) दूसरेके दुखों को सह न पाना, (४) क्रोध को नियंत्रित करने की शक्ति, (५) आत्मतुष्टि,(६ ) निष्कपटता, (७)मन की स्थिरता, (८ ) इन्द्रियों का संयम, (९ ) उत्तरदायित्व,(१० ) समता, (११) सहनशीलता, (१२ ) समदर्शिता, (१३ ) आज्ञाकारिता, ( १४) ज्ञान,(१५ ) इन्द्रिय भोग से अनासक्ति, (१६) नायकत्व, (१७ ) बहादुरी, (१८) प्रभाव,(१९ ) असम्भव को सम्भव बनाना, ( २० ) कर्तव्य पालन, (२१ ) पूर्ण स्वतंत्रता,( २२ ) कार्यकुशलता, ( २३ ) सौन्दर्यमयता, ( २४) धैर्य, ( २५ ) दयालुता, ( २६ ) उदारता, ( २७ ) विनय,(२८ ) शील,( २९ ) संकल्प, ( ३० ) ज्ञान की पूर्णता, (३१ ) उपयुक्त दक्षता, (३२) समस्तभोग विषयों का स्वामित्व, ( ३३ ) प्रसन्नता, ( ३४ ) स्थिरता, ( ३५ ) आज्ञाकारिता, ( ३६ ) यश,(३७ ) पूजा, ( ३८ ) निरभिमानता, ( ३९ ) अस्तित्व ( भगवान् के रूप में ), (४० ) शाश्रतता।
समस्त सत्त्व तथा सौन्दर्य के आगार पूर्ण पुरुषोत्तम भगवान् श्रीकृष्ण ने इस धरा पर अपनी दिव्यलीलाएँ बन्द कर दी हैं।
उनकी अनुपस्थिति में कलि ने सर्वत्र अपना प्रभाव फैला लिया है।
अतएव मैं संसार की यह दशा देखकर अत्यन्त दुखी हूँ।
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आत्मानं चानुशोचामि भवन्तं चामरोत्तमम् ।
देवान् पितृनृषीन् साधून् सर्वान् वर्णास्तथाश्रमानू ॥
३१॥
आत्मानम्--स्वयं; च-- भी; अनुशोचामि--शोक कर रही हूँ; भवन्तम्--आप; च-- भी; अमर-उत्तमम्--देवताओं में श्रेष्ठ;देवानू-देवताओं के लिए; पितृनू--पितृलोक के निवासियों के लिए; ऋषीन्--ऋषियों के लिए; साधून्--भक्तों के लिए;सर्वानू--सभी; वर्णानू--जातियों के लिए; तथा--और; आश्रमान्--मानव समाज के चारों आश्रमों के लिए।
है देवताओं में श्रेष्ठ, में अपने विषय में तथा आपके विषय में और उसी के साथ ही साथसभी देवताओं, ऋषियों, पितृलोक के निवासियों, भगवद्भक्तों तथा वर्णाश्रम-धर्म के पालकसभी मनुष्यों के विषय में सोच रही हूँ।
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ब्रह्मादयो बहुतिथं यदपाड़मोक्ष-कामास्तप: समचरन् भगवत्प्रपन्ना: ।
सा श्री: स्ववासमरविन्दवनं विहाययत्पादसौभगमलं भजतेउनुरक्ता ॥
३२॥
तस्याहमब्जकुलिशाह्लुशकेतुकेतै:श्रीमत्पदर्भगवत: समलड्कृताड़ी ।
त्रीनत्ययोच उपलभ्य ततो विभूतिलोकान् स मां व्यसृजदुत्स्मयतीं तदन्ते ॥
३३॥
ब्रह्म-आदय: --ब्रह्मा जैसे देवता; बहु-तिथम्--अनेक दिनों तक; यत्--लक्ष्मी देवी का; अपाड्-मोक्ष--कृपा-कटाक्ष;'कामा:--कामना करनेवाला; तप: --तपस्या; समचरन्--सम्पन्न करते हुए; भगवत्-- भगवान् की; प्रपन्ना:--शरणागत; सा--वे ( लक्ष्मी ); श्री:--लक्ष्मीजी; स्व-वासम्--अपने धाम को; अरविन्द-वनम्--कमलों के वन को; विहाय--छोड़कर; यत्--जिनका; पाद--पाँव; सौभगमू--कल्याणमय; अलमू्--निःसंकोच भाव से; भजते--पूजती हैं; अनुरक्ता-- आकृष्ट हुई;तस्य--उनका; अहम्--मैं; अब्न--कमल पुष्प; कुलिश--वज़; अद्भुश-हाथी हाँकने का अंकुश; केतु--झंडा; केतैः--चिह्न; श्रीमत्--समस्त ऐश्वर्य के स्वामी; पदैः--चरणों के तलवों से; भगवत:--भगवान् का; समलड्कृत-अड्री--इस तरह सेसज्जित देहवाले; त्रीन्--तीन; अति--एक से एक बढ़कर; अरोचे--सुन्दरतापूर्वक अलंकृत; उपलभ्य--प्राप्त करके; ततः--तत्पश्चात्; विभूतिम्--विशिष्ट शक्तियों को; लोकान्--लोकों को; सः--उन््होंने; मामू--मुझको; व्यसृजत्--त्याग दिया;उत्स्मयतीम्-गर्व का अनुभव करते हुए; तत्-अन्ते--अन्त में
सौभाग्य की देवी लक्ष्मीजी, जिनकी कृपा-कटाक्ष के लिए ब्रह्मा जैसे देवता तरसा करते थेऔर जिनके लिए वे दिन में अनेक बार भगवान् के शरणागत होते थे, वे कमल-वन के अपनेनिवासस्थान को त्याग कर भी भगवान् के चरणकमलों की सेवा में संलग्न हुई थीं।
मुझे वेविशिष्ट शक्तियाँ प्राप्त हुई थीं, जिनसे मैं ध्वज, बज़, अंकुश तथा कमल चिट्ढों से, जो भगवान्के चरणकमलों के चिन्ह हैं, अलंकृत होकर तीनों लोकों की सम्पत्ति को परास्त कर सकती थी।
लेकिन अन्त में, जब मैंने अनुभव किया कि मैं कितनी भाग्यशालिनी हूँ, तब भगवान् ने मुझेत्याग दिया।
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मक्षौहिणीशतमपानुददात्मतन्त्र: ।
त्वां दुःस्थमूनपदमात्मनि पौरुषेणसम्पादयन् यदुषु रम्यमबिशभ्रदड़म् ॥
३४॥
यः--जो; वै--निश्चय ही; मम--मेरा; अति-भरम्--अत्यन्त बोझिल; आसुर-वंश--नास्तिक; राज्ञामू--राजाओं का;अक्षौहिणी--एक अक्षौहिणी ( एक अक्षौहिणी में २९,८७० रथ, इतने ही हाथी, १,०९,३५० पैदल सैनिक तथा ६५,६१०अश्वारोही होते हैं ); शतम्--ऐसी सैकड़ों अक्षौहिणी; अपानुदत्--नष्ट कर डाली; आत्म-तन््त्र:--आत्म-निर्भर; त्वामू--तुमको;दुःस्थम्--कठिनाई में डालकर; ऊन-पदम्--खड़े होने की शक्ति से रहित; आत्मनि--आन्तरिक; पौरुषेण--शक्ति के बल पर;सम्पादयन्--सम्पन्न करने के लिए; यदुषु--यदुवंश में; रम्यम्--दिव्य रूप से सुन्दर; अबिभ्रत्--स्वीकार किया; अड्रमू--शरीरको
,हे धर्म-पुरुष, मैं नास्तिक राजाओं द्वारा नियोजित अत्यधिक सैन्य-समूह के भार से बोझिलहो उठी थी और अब भगवान् की कृपा से उससे उबर सकी हूँ।
इसी प्रकार आप भी कष्टटप्रदअवस्था में थे और खड़े भी नहीं हो सकते थे।
इस तरह आपको भी उबारने के लिए यदुवंश में वेअपनी अन्तरंगा शक्ति से अवतरित हुए थे।
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का वा सहेत विरहं पुरुषोत्तमस्यप्रेमावलोकरुचिरस्मितवल्गुजल्पै: ।
स्थैर्य समानमहरन्मधुमानिनीनांरोमोत्सवो मम यदद्धष्रिविटड्जलिताया: ॥
३५॥
का--कौन; वा--या तो; सहेत--सहन कर सकता है; विरहम्--वियोग; पुरुष-उत्तमस्य--पूर्ण पुरुषोत्तम भगवान् का; प्रेम--प्रेममयी; अवलोक--चितवन; रुचिर-स्मित--मोहक हँसी; वल्गु-जल्पैः:--हृदय को भानेवाली बोली; स्थैर्यम्--गम्भीरता; स-मानम्--प्रणय-सम्बन्धी क्रोध; अहरत्--जीता; मधु--प्रियतमा; मानिनीनाम्--सत्यभामा जैसी स्त्रियों का; रोम-उत्सव:--प्रसन्नता से रोमांच; मम--मेरा; यत्--जिसका; अद्धप्नि-- पाँव; विटड्डिताया:--से अंकित।
अतएव ऐसा कौन है, जो उन पूर्ण पुरुषोत्तम भगवान् के विरह की व्यथा को सह सकता है ?वे अपनी प्रेमभरी मीठी मुस्कान, सुहावनी चितवन तथा मीठी-मीठी बातों से सत्यभामा जैसीप्रियतमाओं की गम्भीरता तथा प्रणय क्रोध ( हाव-भाव ) को जीतनेवाले थे।
जब वे मेरी ( पृथ्वीकी ) सतह पर चलते थे, तो मैं उनके चरणकमल की धूल में धँस जाती थी और फिर घास सेआच्छादित हो जाती थी, जो हर्ष से उत्पन्न मेरे शरीर पर रोमांच जैसा था।
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तयोरेवं कथयतो: पृथिवीधर्मयोस्तदा ।
परीक्षिन्नाम राजर्षि: प्राप्त: प्राचीं सरस्वतीम् ॥
३६॥
तयो:--उनके मध्य; एवम्--इस प्रकार; कथयतो:--वार्ता में संलग्न; पृथिवी--पृथ्वी; धर्मयो: --तथा धर्म दोनों; तदा--उससमय; परीक्षित्--राजा परीक्षित; नाम--नामक; राज-ऋषि: --राजाओं में ऋषि-तुल्य; प्राप्त:--आ गये; प्राचीम्--पूर्व-वाहिनी; सरस्वतीम्--सरस्वती नदी के तट पर |
जब पृथ्वी तथा धर्म-पुरुष इस प्रकार बातों में संलग्न थे, तो राजर्षि परीक्षित पूर्व की ओर बहनेवाली सरस्वती नदी के तट पर पहुँच गये।
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