← श्रीमद्भागवतम् स्कन्ध 1 की सूची

अध्याय दो: दिव्यता और दिव्य सेवा

1.2 व्यास उवाचइति सम्प्रश्नसंहष्टो विप्राणां रौमहर्षणि:।प्रतिपूज्यवच्स्तेषां प्रवक्तुमुपचक्रमे ॥१॥

व्यास: उबाच--व्यास ने कहा; इति--इस प्रकार; सम्प्रश्न--पूर्ण जिज्ञासा; संहृष्ट:--पूर्ण रूप से सन्तुष्ट; विप्राणाम्‌--वहाँके मुनियों का; रौमहर्षणि: --रोमहर्षण के पुत्र, उग्रश्रवा; प्रतिपूज्य--उनको धन्यवाद देकर; वच:--शब्द; तेषाम्‌--उनके; प्रवक्तुमू--उन्हें उत्तर देने के लिए; उपचक्रमे--प्रयत्त किया।

रोमहर्षण के पुत्र उग्रश्रवा ( सूत गोस्वामी ) ने ब्राह्मणों के सम्यक्‌ प्रश्नों से पूर्णतः प्रसन्नहोकर उन्हें धन्यवाद दिया और वे उत्तर देने का प्रयास करने लगे।

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सूत उवाचयं प्रत्रजन्तमनुपेतमपेतकृत्यंट्वैपायनों विरहकातर आजुहाव ।

पुत्रेति तन्‍मयतया तरवोभिनेदु-स्तं सर्वभूतहदयं मुनिमानतोस्मि ॥

२॥

सूतः उबाच--सूत गोस्वामी ने कहा; यम्‌--जिसको; प्रत्नजन्तम्‌--संन्यास लेते समय; अनुपेतम्‌--जनेऊ ( यज्ञोपवीत )संस्कार किये बिना; अपेत--संस्कार न करके; कृत्यम्--करणीय कर्तव्य; द्वैपायन:--व्यासदेव ने; विरह--वियोग से;कातरः--भयभीत होकर; आजुहाव--पुकारा; पुत्र इति--हे पुत्र; तत्-मयतया--इस प्रकार लीन होकर; तरव:--सारेवृक्षों ने; अभिनेदु:--उत्तर दिया; तमू--उसको; सर्व--समस्त; भूत--जीवों के; हृदयम्‌--हदय; मुनिम्‌--मुनि को;आनतः अस्मि--नमस्कार करता हूँ।

श्रील सूत गोस्वामी ने कहा : मैं उन महामुनि ( शुकदेव गोस्वामी ) को सादर नमस्कारकरता हूँ जो सबों के हृदय में प्रवेश करने में समर्थ हैं।

जब वे यज्ञोपवीत संस्कार अथवा उच्च जातियों द्वारा किए जाने वाले अनुष्ठानों को सम्पन्न किये बिना संन्यास ग्रहण करनेचले गये तो उनके पिता व्यासदेव उनके वियोग के भय से आतुर होकर चिल्ला उठे, 'हेपुत्र, ' उस समय जो वैसी ही वियोग की भावना में लीन थे, केवल ऐसे वृशज्षों ने शोकग्रस्तपिता के शब्दों का प्रतिध्वनि के रूप में उत्तर दिया।

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यः स्वानुभावमखिलश्रुतिसारमेक-मध्यात्मदीपमतितितीर्षतां तमोन्धम्‌ ।

संसारिणां करुणयाह पुराणगुट्मंतंव्याससूनुमुपयामि गुरुं मुनीनामू ॥

३॥

यः--जो; स्व-अनुभावम्‌--आत्म-अनु भवी; अखिल--समस्त; श्रुति--वेदों का; सारम्‌--सार, निष्कर्ष; एकम्‌--एकमात्र; अध्यात्म--दिव्य; दीपम्‌--दीपक; अतितितीर्षताम्‌--पार जाने की इच्छा से; तमः अन्धम्‌--गहन अन्धकारमयभौतिक अस्तित्व; संसारिणाम्--भौतिकतावादी मनुष्यों का; करूणया--अहैतुकी कृपा से; आह--कहा; पुराण--पुराण, वेदों के पूरक ग्रंथ; गुह्मम्‌--अत्यन्त गोपनीय; तम्‌--उन; व्यास-सूनुम्‌--व्यासदेव के पुत्र को; उपयामि--नमस्कार करता हूँ; गुरुम्‌--गुरु को; मुनीनामू--मुनियों के ।

मैं समस्त मुनियों के गुरु, व्यासदेव के पुत्र ( शुकदेव ) को सादर नमस्कार करता हूँजिन्होंने संसार के गहन अंधकारमय भागों को पार करने के लिए संघर्षशील उन निपटभौतिकतावादियों के प्रति अनुकम्पा करके बैदिक ज्ञान के सार रूप इस परम गुह्ा पुराणको स्वयं आत्मसात्‌ करने के बाद अनुभव द्वारा कह सुनाया।

"

नारायणं नमस्कृत्य नरं चैव नरोत्तमम्‌ ।

देवीं सरस्वतीं व्यासं ततो जयमुदीरयेत्‌ ॥

४॥

नारायणम्‌-- भगवान्‌ को; नम:-कृत्य-- नमस्कार करके; नरम्‌ च एब--तथा नारायण ऋषि को; नर-उत्तमम्‌--सर्वश्रेष्ठमनुष्य; देवीम्‌-देवी; सरस्वतीम्‌--विद्या की अधिष्ठात्री को; व्यासम्‌-व्यासदेव को; तत:ः--तत्पश्चात्‌; जयम्‌--विजयप्राप्त करने के लिए; उदीरयेत्‌--घोषित करे।

विजय के साधनस्वरूप इस श्रीमद्धागवत का पाठ करने ( सुनने ) के पूर्व मनुष्य को चाहिए कि वह श्रीभगवान्‌ नारायण को, नरोत्तम नरनारायण ऋषि को, विद्या की देवी माता सरस्वती को तथा ग्रंथकार श्रील व्यासदेव को नमस्कार करे।

"

मुनय: साधु पृष्टोड5हं भवद्धिलोकमज्गनलम्‌ ।

यत्कृत: कृष्णसम्प्रश्नो येनात्मा सुप्रसीदति ॥

५॥

मुनयः--हे मुनियों; साधु--यह प्रासंगिक है; पृष्ट:ः--पूछा गया; अहम्‌--मैं; भवद्धि:ः--आप लोगों के द्वारा; लोक--संसार; मड्डलम्‌--मंगल, कल्याण; यत्‌--क्योंकि; कृत: --बनाया गया; कृष्ण -- भगवान्‌; सम्प्रश्न: --संगत प्रश्न;येन--जिससे; आत्मा--स्व; सुप्रसीदति--पूर्ण रूप से प्रसन्न होता है।

हे मुनियों, आपने मुझसे ठीक ही प्रश्न किया है।

आपके प्रश्न शलाघनीय हैं, क्योंकि उनका सम्बन्ध भगवान्‌ कृष्ण से है और इस प्रकार वे विश्व-कल्याण के लिए हैं।

ऐसे प्रश्नों से ही पूर्ण आत्मतुष्टि हो सकती है।

"

स वै पुंसां परो धर्मो यतो भक्तिरधोक्षजे ।

अहैतुक्यप्रतिहता ययात्मा सुप्रसीदति ॥

६॥

सः--वह; बै--निश्चय ही; पुंसामू--मनुष्यों के लिए; पर:--दिव्य; धर्म:--वृत्ति; यतः--जिससे; भक्ति:--भक्ति;अधोक्षजे--अध्यात्म के प्रति; अहैुतुकी--अकारण; अप्रतिहता--अखण्ड; यया--जिससे; आत्मा--आत्मा;सुप्रसीदति--पूर्ण रूप से प्रसन्न होता है।

सम्पूर्ण मानवता के लिए परम वृत्ति ( धर्म ) वही है, जिसके द्वारा सारे मनुष्य दिव्यभगवान्‌ की प्रेमा-भक्ति प्राप्त कर सकें।

ऐसी भक्ति अकारण तथा अखण्ड होनी चाहिएजिससे आत्मा पूर्ण रूप से तुष्ट हो सके ।

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वासुदेवे भगवति भक्तियोग: प्रयोजित: ।

जनयत्याशु वैराग्यं ज्ञानं च यदहैतुकम्‌ ॥

७॥

वासुदेवे--कृष्ण के प्रति; भगवति--भगवान्‌ के प्रति; भक्ति-योग: --भक्ति सम्बन्ध; प्रयोजित:--व्यवहतत; जनयति--उत्पन्न करता है; आशु--तुरन्त ही; वैराग्यमू--वैराग्य, विरक्ति; ज्ञाममू--ज्ञान; च--तथा; यत्‌-- जो; अहैतुकम्‌--अकारण।

भगवान्‌ श्रीकृष्ण की भक्ति करने से मनुष्य तुरन्त ही अहैतुक ज्ञान तथा संसार सेवैराग्य प्राप्त कर लेता है।

"

धर्म: स्वनुष्ठित: पुंसां विष्वक्सेनकथासु यः ।

नोत्पादयेद्यदि रतिं श्रम एव हि केवलम्‌ ॥

८॥

धर्म: --वृत्ति; स्वनुष्ठितः--अपने पद के अनुसार सम्पन्न; पुंसामू--मनुष्यों का; विष्वक्सेन-- भगवान्‌ ( पूर्ण अंश ) की;कथासु--कथा में; यः--जो है; न--नहीं; उत्पादयेत्‌--उत्पन्न करता है; यदि--यदि; रतिम्‌--आसक्ति; श्रम:--व्यर्थश्रम; एव--निरा; हि--निश्चय ही; केवलम्‌--पूर्ण रूप से ।

मनुष्य द्वारा अपने पद के अनुसार सम्पन्न की गई वृत्तियाँ यदि भगवान्‌ के सन्देश केप्रति आकर्षण उत्पन्न न कर सकें, तो वे निरी व्यर्थ का श्रम होती हैं।

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धर्मस्य ह्यापवर्ग्यस्य नार्थोर्थायोपकल्पते ।

नार्थस्य धर्मैकान्तस्य कामो लाभाय हि स्मृत: ॥

९॥

धर्मस्य--वृत्ति का; हि--निश्चय ही; आपवर्ग्यस्य--अन्तिम मोक्ष का; न--नहीं; अर्थ:--अन्त, लक्ष्य; अर्थाय-- भौतिकलाभ के लिए; उपकल्पते--साधन के हेतु; न--न तो; अर्थस्य-- भौतिक लाभ का; धर्म-एक-अन्तस्य--धर्म में लगे हुएके लिए; काम:--इन्द्रियतृष्ति के; लाभाय--लाभ हेतु; हि--सही सही; स्मृतः:--ऋषियों द्वारा बताया गया है।

समस्त वृत्तिपरक कार्य निश्चय ही परम मोक्ष के निमित्त होते हैं।

उन्हें कभी भौतिकलाभ के लिए सम्पन्न नहीं किया जाना चाहिए।

इससे भी आगे, ऋषियों के अनुसार, जोलोग परम वृत्ति ( धर्म ) में लगे हैं, उन्हें चाहिए कि इन्द्रियतृष्ति के संवर्धन हेतु भौतिक लाभका उपयोग कदापि नहीं करना चाहिए।

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कामस्य नेन्द्रियप्रीतिर्लाभो जीवेत यावता ।

जीवस्य तत्त्वजिज्ञासा नार्थों यश्वेह कर्मभि: ॥

१०॥

'कामस्य--इच्छाओं का; न--नहीं; इन्द्रिय--इन्द्रियों की; प्रीतिः:--तुष्टि; लाभ:--लाभ; जीवेत--आत्मसंरक्षण;यावता--जितना; जीवस्य--जीव का; तत्त्व--परम सत्य की; जिज्ञासा--पूछताछ, उत्कंठा; न--नहीं; अर्थ:--अन्त,लक्ष्य; यः च इह--अन्य जो भी; कर्मभि:--वृत्तियों के द्वारा।

जीवन की इच्छाएँ इन्द्रियतृप्ति की ओर लक्षित नहीं होनी चाहिए।

मनुष्य को केवलस्वस्थ जीवन की या आत्म-संरक्षण की कामना करनी चाहिए, क्योंकि मानव तो परम सत्यके विषय में जिज्ञासा करने के निमित्त बना है।

मनुष्य की वृत्तियों का इसके अतिरिक्त,अन्य कोई लक्ष्य नहीं होना चाहिए।

"

वदन्ति तत्तत्त्वविदस्तत्त्वं यज्ज्ञानमद्दयम्‌ ।

ब्रहति परमात्मेति भगवानिति शब्द्यते ॥

११॥

वदन्ति--वे कहते हैं; तत्‌--वह; तत्त्व-विदः--विद्वान लोग; तत्त्वमू--परम सत्य को; यत्‌--जो; ज्ञानम्--ज्ञान;अद्वयम्‌--अद्ठैत; ब्रह्म इति--ब्रह्म नाम से जाना जाने वाला; परमात्मा इति--परमात्मा नाम से जाना जाने वाला; भगवान्‌इति--भगवान्‌ नाम से जाना जाने वाला; शब्द्यते--कहलाने वाले हैं।

परम सत्य को जानने वाले विद्वान अध्यात्मवादी ( तत्त्वविद ) इस अद्बय तत्त्व को ब्रह्म,परमात्मा या भगवान्‌ के नाम से पुकारते हैं।

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तच्छुद्धाना मुनयो ज्ञानवैराग्ययुक्तया ।

पश्यन्त्यात्मनि चात्मानं भकत्या श्रुतगृहीतया ॥

१२॥

तत्‌--वह; श्रदधधाना:--गम्भीर जिज्ञासु; मुन॒यः --मुनिगण; ज्ञान--ज्ञान; वैराग्य--वैराग्य; युक्तया--से समन्वित;'पश्यन्ति--देखते हैं; आत्मनि-- अपने में; च--तथा; आत्मानम्‌--परमात्मा को; भक्त्या--भक्ति से; श्रुत--वेद से;गृहीतया--भली भाँति ग्रहण किया गया।

ज्ञान तथा वैराग्य से समन्वित गम्भीर जिज्ञासु या मुनि, वेदान्त-श्रुति के श्रवण से ग्रहणकी हुई भक्ति द्वारा परम सत्य की अनुभूति करता है।

"

अत: पुम्भिद्विजश्रेष्ठा वर्णाश्रमविभागश: ।

स्वनुष्ठितस्य धर्मस्य संसिद्धि्हरितोषणम्‌ ॥

१३॥

अतः--अतएव; पुम्भि:--मनुष्य द्वारा; द्विज- श्रेष्ठा:-हे द्विजों में श्रेष्ठ; वर्ण-आश्रम--चार वर्णो तथा जीवन के चारआश्रमों के; विभागश:--विभाजन से; स्वनुष्ठितस्थ-- अपने कर्तव्यों का; धर्मस्य--वृत्तिपरक; संसिद्द्धिः--सर्वोच्चसिद्धि; हरि--भगवान्‌ को; तोषणम्‌--तुष्ट या प्रसन्न करना ।

अतः हे द्विजश्रेष्ठ, निष्कर्ष यह निकलता है कि वर्णाश्रम धर्म के अनुसार अपने कर्तव्योंको पूरा करने से जो परम सिद्धि प्राप्त हो सकती है, वह है भगवान्‌ को प्रसन्न करना।

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तस्मादेकेन मनसा भगवान्‌ सात्वतां पति: ।

श्रोतव्य: कीर्तितव्यश्व ध्येय: पूज्यश्च नित्यदा ॥

१४॥

तस्मात्--अतः; एकेन--एक, एकाग्र; मनसा--मन के ध्यान द्वारा; भगवान्‌-- भगवान्‌; सात्वताम्‌-भक्तों के; पति:--रक्षक; श्रोतव्य: --सुनने योग्य; कीर्तितव्य:--गुणगान के योग्य; च--तथा; ध्येय:--स्मरण करने योग्य; पूज्य: --पूजनेके योग्य, पूजनीय; च--तथा; नित्यदा--निरन्तरअतएव मनुष्य को एकाग्रचित से उन पूर्ण पुरुषोत्तम भगवान्‌ के विषय में निरन्तरश्रवण, कीर्तन, स्मरण तथा पूजन करना चाहिए, जो भक्तों के रक्षक हैं।

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यदनुध्यासिना युक्ता: कर्मग्रन्थिनिबन्धनम्‌ ।

छिन्दन्ति कोविदास्तस्य को न कुर्यात्कथारतिम्‌ ॥

१५॥

यतू--जो; अनुध्या-- स्मृति रूपी; असिना--तलवार से; युक्ता:--युक्त, समन्वित; कर्म--कर्म की; ग्रन्थि--गाँठ;निबन्धनम्‌--बँधी हुई; छिन्दन्ति--काटते हैं; कोविदाः --बुद्धिमान; तस्थ--उसका; कः--कौन; न--नहीं; कुर्यात्‌--करेंगे; कथा--सन्देश, कथाएँ; रतिम्‌--ध्यान।

हाथ में तलवार लिए बुद्धिमान मनुष्य भगवान्‌ का स्मरण करते हुए कर्म की बंँधी हुईंग्रंथि को काट देते हैं।

अतएव ऐसा कौन होगा जो उनके सन्देश की ओर ध्यान नहीं देगा ?"

शुश्रूषो: श्रद्धानस्य वासुदेवकथारुचि: ।

स्यान्महत्सेवया विप्रा: पुण्यतीर्थनिषेवणात्‌ ॥

१६॥

शुश्रूषो:-- श्रवण में व्यस्त; श्रद्दधानस्य-- श्रद्धापूर्वक; वासुदेव--वासुदेव की; कथा--संदेश, कथा में; रुचि:--लगाव;स्थातू--सम्भव बन जाता है; महत्‌-सेवया--शुद्ध भक्तों की सेवा करके; विप्रा:--हे द्विजगण; पुण्य-तीर्थ--समस्त पापोंसे शुद्ध हुओं की; निषेवणात्‌--सेवा से ।

हे द्विजो, जो भक्त समस्त पापों से पूर्ण रूप से मुक्त हैं, उनकी सेवा करने से महान सेवाहो जाती है।

ऐसी सेवा से वासुदेव की कथा सुनने के प्रति लगाव उत्पन्न होता है।

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श्रण्वतां स्‍वकथा: कृष्ण: पुण्यश्रवणकीर्तन: ।

हद्यन्त:स्थो ह्यभद्राणि विधुनोति सुहृत्सताम्‌ ॥

१७॥

श्रण्वताम्‌--जिन्होंने कथा सुनने की रुचि उत्पन्न कर ली है; स्व-कथा:--अपनी वाणी; कृष्ण: -- भगवान्‌; पुण्य--पावन; श्रवण--सुनना; कीर्तन:--कीर्तन करना; हृदि अन्त: स्थ:--अपने हादय के भीतर; हि--निश्चय ही; अभद्राणि--पदार्थ को भोगने की इच्छा; विधुनोति--स्वच्छ करता है, विमल बनाता है; सुहत्‌--उपकारी; सताम्‌--सत्यनिष्ठ के प्रत्येक हृदय में परमात्मास्वरूप स्थित तथा सत्यनिष्ठ भक्तों के हितकारी भगवान् ‌श्रीकृष्ण, उस भक्त के हृदय से भौतिक भोग की इच्छा को हटाते हैं जिसने उनकी कथाओंको सुनने में रुचि उत्पन्न कर ली है, क्योंकि ये कथाएँ ठीक से सुनने तथा कहने पर अत्यन्तपुण्यप्रद हैं।

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नष्टप्रायेष्वभद्रेषु नित्य भागवतसेवया ।

भगवत्युत्तमश्लोके भक्तिर्भवति नैप्ठिकी ॥

१८॥

नष्ट--समाप्त; प्रायेषु--प्रायः शून्य; अभद्रेषु--समस्त अमंगलों से; नित्यम्‌--नियमित रूप से; भागवत--श्रीमद्भागवतया शुद्ध भक्त की; सेवया--सेवा द्वारा; भगवति-- भगवान्‌ में; उत्तम--दिव्य; एलोके--स्तुतियाँ; भक्ति:--प्रेमाभक्ति,सेवा; भवति--( उत्पन्न ) होती है; नैप्ठिकी--अटल, अविचल ।

भागवत की कक्षाओं में नियमित उपस्थित रहने तथा शुद्ध भक्त की सेवा करने से हृदयके सारे दुख लगभग पूर्णतः विनष्ट हो जाते हैं और उन पुण्यश्लोक भगवान्‌ में अटलप्रेमाभक्ति स्थापित हो जाती है, जिनकी प्रशंसा दिव्य गीतों से की जाती है।

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तदा रजस्तमोभावा: कामलोभादयश्च ये ।

चेत एतैरनाविद्धं स्थितं सत्त्वे प्रसीदति ॥

१९॥

तदा--उस समय; रज:--रजोगुण में; तम:--तमो गुण; भावा:--परिस्थिति; काम--काम तथा इच्छा; लोभ--लालसा;आदयः--आदि आदि; च--तथा; ये--जो भी हैं; चेत:--मन; एतैः--इनसे; अनाविद्धम्‌--प्रभावित हुए बिना;स्थितम्‌--स्थित होकर; सत्त्वे--सतोगुण में; प्रसीदति--परम प्रसन्न होता हैज्योंही हृदय में अटल प्रेमा भक्ति स्थापित हो जाती है, प्रकृति के रजोगुण तथा तमोगुणके प्रभाव जैसे काम, इच्छा तथा लोभ हृदय से लुप्त हो जाते हैं।

तब भक्त सत्त्वगुण मेंस्थित होकर परम सुखी हो जाता है।

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एवं प्रसन्नमनसो भगवद्धक्तियोगत: ।

भगवत्तत्त्वविज्ञानं मुक्तसड्गस्यथ जायते ॥

२०॥

एवम्‌--इस प्रकार; प्रसन्न--स्फूर्त; मनस:--मन से; भगवत्‌-भक्ति-- भगवान्‌ की भक्ति के; योगतः--सम्पर्क से;भगवत्‌--भगवान्‌ का; तत्त्व--ज्ञान; विज्ञानम्‌-वैज्ञानिक; मुक्त--मुक्त हुआ; सड्ल्‍स्थ--संगति का; जायते--हो जाताहै।

इस प्रकार शुद्ध सत्त्व में स्थित होकर, जिस मनुष्य का मन भगवान्‌ की भक्ति के संसर्गसे प्रसन्न हो चुका होता है उसे समस्त भौतिक संगति से मुक्त होने पर भगवान्‌ का सहीवैज्ञानिक ज्ञान ( विज्ञान तत्त्व ) प्राप्त होता है।

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भिद्यते हृदयग्रन्थिश्छिद्यन्ते सर्वसंशया: ।

क्षीयन्ते चास्य कर्माणि दृष्ट एवात्मनीश्वरे ॥

२१॥

भिद्यते--भिद जाती है; हदय--हृदय की; ग्रन्थि:--गाँठें; छिद्यन्ते--खण्ड-खण्ड हो जाते हैं; सर्व--सभी; संशया: --भ्रम, संदेह; क्षीयन्ते--समाप्त हो जाते हैं; च--तथा; अस्य--उसकी; कर्माणि--सकाम कर्मों की श्रृंखला; दृष्टे--देखनेके पश्चात्‌; एब--निश्चय ही; आत्मनि--स्वयं आत्मा को; ई श्वरे-- प्रधान या स्वामी में ।

इस प्रकार हृदय की गाँठ भिद जाती है और सारे सशंय छिन्न-भिन्न हो जाते हैं।

जबमनुष्य आत्मा को स्वामी के रूप में देखता है, तो सकाम कर्मो की श्रृंखला समाप्त हो जातीहै।

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अतो वै कवयो नित्यं भक्ति परमया मुदा ।

वासुदेवे भगवति कुर्वन्त्यात्मप्रसादनीम्‌ ॥

२२॥

अतः--अतएव; बै--निश्चय ही; कवय:--सारे अध्यात्मवादी; नित्यमू--अनादि काल से; भक्तिमू-- भगवान्‌ की सेवा;'परमया--परम; मुदा--अत्यन्त प्रसन्नता के साथ; वासुदेवे-- श्रीकृष्ण में; भगवति-- भगवान्‌; कुर्वन्ति--करते हैं;आत्म--आत्मा को; प्रसादनीम्‌--जो प्रमुदित करने वाली है।

अतएव, निश्चय ही सारे अध्यात्मवादी अनन्त काल से अत्यन्त प्रसन्नतापूर्वक भगवान् ‌श्रीकृष्ण की भक्ति करते आ रहे हैं, क्योंकि ऐसी भक्ति आत्मा को प्रमुदित करने वाली है।

सत्त्वं रजस्तम इति प्रकृतेर्गुणास्तै-युक्त: पर: पुरुष एक इहास्य धत्ते ।

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स्थित्यादये हरिविरिजश्विहरेति संज्ञा:श्रेयांसि तत्र खलु सत्त्वतनोर्नणां स्यु: ॥

२३॥

सत्त्वम्‌--सत्त्वगुण; रज:--रजोगुण; तम:--तमोगुण; इति--इस प्रकार; प्रकृते:--प्रकृति के; गुणा:--गुण; तैः--उनकेद्वारा; युक्त:--समन्वित; पर: --दिव्य; पुरुष: --पुरुष; एक:--एक; इह अस्य--इस भौतिक जगत का; धत्ते--स्वीकारकरता है; स्थिति-आदये--उत्पत्ति, पालन तथा संहार आदि को; हरि--विष्णु भगवान्‌; विरिश्धि--ब्रह्मा; हर--शिवजी;इति--इस प्रकार; संज्ञाः--विभिन्न स्वरूप; श्रेयाँंसि--चरम लाभ; तत्र--वहाँ; खलु--निस्सन्देह; सत्त्व--सात्त्विक;तनो:--रूप; नृणाम्‌--मनुष्यों का; स्यु:--प्राप्त किया।

दिव्य भगवान्‌ प्रकृति के तीन गुणों--सत्त्व, रज तथा तम--से अप्रत्यक्ष रूप सेसम्बद्ध हैं और वे भौतिक जगत की उत्पत्ति, पालन तथा संहार के लिए ब्रह्मा, विष्णु तथाशिव, इन तीन गुणात्मक रूपों को ग्रहण करते हैं।

इन तीनों रूपों में से सत्त्व गुण वालेविष्णु से सारे मनुष्य परम लाभ प्राप्त कर सकते हैं।

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पार्थिवाद्दरुणो धूमस्तस्मादग्निस्रयीमय: ।

तमसस्तु रजस्तस्मात्सत्त्व॑ं यद्रह्मदर्शनम्‌ ॥

२४॥

पार्थिवात्‌--पृथ्वी से; दारूण:--ईंधन; धूम:--धुँआ; तस्मात्‌--उससे; अग्नि:-- अग्नि; त्रयी--वैदिक यज्ञ; मयः--सेबना; तमसः--तमोगुण में; तु--लेकिन; रज:--रजोगुण; तस्मात्‌--उससे; सत्त्वम्‌--सतोगुण; यत्‌--जो; ब्रह्म --परमसत्य; दर्शनमू--साक्षात्कार।

अग्निकाष्ट मृदा का रूपान्तर है, लेकिन काष्ट से बेहतर धुँआ है।

अग्नि उससे भी उत्तमहै, क्योंकि अग्नि से ( वैदिक यज्ञों से ) हमें श्रेष्ठ ज्ञान के लाभ प्राप्त हो सकते हैं।

इसीप्रकार रजोगुण तमोगुण से बेहतर है, लेकिन सत्त्वगुण सर्वश्रेष्ठ है, क्योंकि सत्त्वगुण सेमनुष्य परम सत्य का साक्षात्कार कर सकता है।

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भेजिरे मुनयो5थाग्रे भगवन्तमधोक्षजम्‌ ।

सत्त्वं विशुद्धं क्षेमाय कल्पन्ते येडनु तानिह ॥

२५॥

भेजिरे--की सेवा; मुनयः--मुनियों ने; अथ--इस प्रकार; अग्रे--पूर्वकाल में; भगवन्तम्‌-- भगवान्‌ के प्रति;अधोक्षजम्‌--अध्यात्म, गुणातीत; सत्त्वम्‌-अस्तित्व; विशुद्धम्‌-प्रकृति के तीनों गुणों से परे; क्षेमाय--परम लाभ प्राप्तकरने के लिए; कल्पन्ते--योग्य हैं; ये--जो; अनु--अनुसरण करते हैं; तानू--वे; इह--इस संसार में ॥

पूर्वकाल में समस्त महामुनियों ने भगवान्‌ की सेवा की, क्योंकि वे प्रकृति के तीनोंगुणों से परे हैं।

उन्होंने भौतिक परिस्थितियों से मुक्त होने के लिए और फलस्वरूप परमलाभ प्राप्त करने के लिए पूजा की।

अतएव जो कोई इन महामुनियों का अनुसरण करता हैवह भी इस भौतिक संसार में मोक्ष का अधिकारी बन जाता है।

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मुमुक्षवों घोररूपान्‌ हित्वा भूतपतीनथ ।

नारायणकला: शान्ता भजन्ति ह्मनसूयव: ॥

२६॥

मुमुक्षयः --मो क्षकामी व्यक्ति; घोर-- भयानक; रूपान्‌--रूपों को; हित्वा--त्याग कर; भूत-पतीन्--देवतागण; अथ--इस कारण से; नारायण-- भगवान्‌ के; कला: --स्वांशों; शान्ता:--परम आनन्दमय; भजन्ति--पूजा करते हैं; हि--निश्चय ही; अनसूयव:--द्वेषरहित ।

जो लोग मोक्ष के प्रति गम्भीर हैं, वे निश्चय ही द्वेषरहित होते हैं और सबका सम्मानकरते हैं।

किन्तु, फिर भी वे देवताओं के घोर रूपों का अस्वीकार करके, केवल भगवान्‌विष्णु तथा उनके स्वांशों के कल्याणकारी रूपों की ही पूजा करते हैं।

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रजस्तमः:प्रकृतय: समशीला भजन्ति वै ।

पितृभूतप्रजेशादीन्धश्रियै श्वर्यप्रजेप्सतव: ॥

२७॥

रज:--रजोगुण; तम:--तमोगुण; प्रकृतबः--उस स्वभाव का; सम-शीला:--एक ही कोटि के; भजन्ति--पूजा करते हैं;वै--निश्चय ही; पितृ--पितरगण; भूत-- अन्य जीव; प्रजेश-आदीनू-- प्रजापति इत्यादि; अ्रिया--सम्पन्नता; ऐश्वर्य--सम्पत्ति तथा शक्ति; प्रजा--सन्तति, सनन्‍्तान; ईप्सवः--ऐसी इच्छा करते हुए।

जो लोग रजोगुणी तथा तमोगुणी हैं वे पितरों, अन्य जीवों तथा उन देवताओं की पूजाकरते हैं, जो सृष्टि सम्बन्धी कार्यकलापों के प्रभारी हैं, क्योंकि वे स्त्री, धन, शक्ति तथासन्‍्तान का लाभ उठाने की इच्छा से प्रेरित होते हैं।

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वासुदेवपरा वेदा वासुदेवपरा मखा: ।

वासुदेवपरा योगा वासुदेवपरा: क्रिया: ॥

२८॥

वासुदेवपरं ज्ञानं वासुदेवपरं तप: ।

वासुदेवपरो धर्मों वासुदेवपरा गति: ॥

२९॥

वासुदेव-- भगवान्‌; परा:--परम लक्ष्य; वेदा:--प्रामाणिक शास्त्र; वासुदेव-- भगवान्‌; परा:--पूजा करने के लिए;मखा:--यज्ञ; वासुदेव-- भगवान्‌; परा: -- प्राप्त करने के साधन; योगा:--यौगिक साज-सामग्री; वासुदेव-- भगवान्‌ के;परा:--उनके अधीन; क्रिया:--सकाम कर्म; वासुदेव-- भगवान्‌; परम्‌--परम; ज्ञानमू--ज्ञान; वासुदेव-- भगवान्‌;परम्‌--सर्व श्रेष्ठ; तप:--तपस्या; वासुदेव-- भगवान्‌; पर:--सर्वोच्च गुण; धर्म:--धर्म; वासुदेव--भगवान्‌; परा:--चरम; गति:--जीवन का लक्ष्य ।

,प्रामाणिक शास्त्रों में ज्ञान का परम उद्देश्य पूर्ण पुरुषोत्तम परमेश्वर श्रीकृष्ण हैं।

यज्ञकरने का उद्देश्य उन्हें ही प्रसन्न करना है।

योग उन्हीं के साक्षात्कार के लिए है।

सारे सकामकर्म अन्ततः उन्हीं के द्वारा पुरस्कृत होते हैं।

वे परम ज्ञान हैं और सारी कठिन तपस्याएँ उन्हींको जानने के लिए की जाती हैं।

उनकी प्रेमपूर्ण सेवा करना ही धर्म है।

वे ही जीवन केचरम लक्ष्य हैं।

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स एवेदं ससर्जाग्रे भगवानात्ममायया ।

सदसद्गरूपया चासौ गुणमयागुणो विभु: ॥

३०॥

सः--वह; एव--ही; इृदम्‌--इस; ससर्ज--उत्पन्न किये गये; अग्रे--पहले; भगवान्‌-- भगवान्‌; आत्म-मायया--अपनीनिजी शक्ति से; सत्--कारण; असत्‌--प्रभाव, फल; रूपया--रूपों के द्वारा; च--तथा; असौ--वही भगवान्‌; गुण-मय--भौतिक प्रकृति के गुणों में; अगुण: --दिव्य; विभुः--परम ।

इस भौतिक सृष्टि के प्रारम्भ में, उन भगवान्‌ ( वासुदेव ) ने अपने दिव्य पद पर रहकरअपनी ही अन्तरंगा शक्ति से कारण तथा कार्य की शक्तियाँ उत्पन्न कीं।

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तया विलसितेष्वेषु गुणेषु गुणवानिव ।

अन्त:प्रविष्ट आभाति विज्ञानेन विजृुम्भित: ॥

३१॥

तया--उनके द्वारा; विलसितेषु--यद्यपि कार्य में; एघु--इन; गुणेषु-- भौतिक प्रकृति के गुणों में; गुणवान्‌--गुणों सेप्रभावित होने वाला; इब--मानो; अन्तः-- भीतर; प्रविष्ट: --घुसा हुआ; आभाति--प्रतीत होता है; विज्ञानेन--दिव्यचेतना से; विजुृम्भित:--पूर्ण रूप से प्रकाशित ।

भौतिक पदार्थ की उत्पत्ति करने के बाद, भगवान्‌ ( वासुदेव ) अपना विस्तार करकेउसमें प्रवेश करते हैं।

यद्यपि वे प्रकृति के गुणों में रहते हुए उत्पन्न जीवों में से एक जैसेलगते हैं, किन्तु वे सदैव अपने दिव्य पद पर पूर्ण रूप से आलोकित रहते हैं।

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यथा ह्यवहितो वह्िि्दारुष्वेक: स्वयोनिषु ।

नानेव भाति विश्वात्मा भूतेषु च तथा पुमान्‌ ॥

३२॥

यथा--जिस तरह; हि--उसी तरह; अवहितः--से युक्त; वह्िः--अग्नि; दारुषु--काष्ठ में; एक:--एक; स्व-योनिषु--अपनी योनियों में; नाना इब--अनेक जीवों की तरह; भाति--प्रकाशित होता है; विश्व-आत्मा--परमात्मा रूप भगवान्‌;भूतेषु--जीवों में; च--तथा; तथा--उसी तरह; पुमान्‌--परम पुरुष।

परमात्मा रूप में भगवान्‌ सभी वस्तुओं में उसी तरह व्याप्त रहते हैं जिस तरह काष्ट केभीतर अग्नि व्याप्त रहती है और इस प्रकार यद्यपि वे एक एवं अद्वितीय हैं, वे अनेक प्रकारसे दिखते हैं।

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असौ गुणमयैभविर्भूतसूक्ष्मेन्द्रियात्मभि: ।

स्वनिर्मितेषु निर्विष्टो भुड़े भूतेषु तदुगुणान्‌ ॥

३३॥

असौ--वे परमात्मा; गुण-मयै:--प्रकृति के गुणों से प्रभावित; भावैः--स्वाभाविक रूप से; भूत--उत्पन्न; सूक्ष्म--सूक्ष्म;इन्द्रिय--इन्द्रियाँ; आत्मभि:--जीवों द्वारा; स्व-निर्मितेषु--अपनी ही सृष्टि में; निर्विष्ट:--प्रवेश करके; भुड्ढे -- भोग केलिए प्रेरित करते हैं; भूतेषु--जीवों में; तत्‌-गुणान्‌--प्रकृति के वे गुण।

भौतिक जगत के तीन गुणों से प्रभावित हुए जीवों के देह में परमात्मा प्रविष्ट होते हैंऔर सूक्ष्म मन के द्वारा तीन गुणों के फल भोगने के लिए जीवों को प्रेरित करते हैं।

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भावयत्येष सत्त्वेन लोकान्‌ वै लोकभावन: ।

लीलावतारानुरतो देवतिर्यड्नरादिषु ॥

३४॥

भावयति--पालन करते हैं; एघ:--इन सबका; सत्त्वेन--सतोगुण से; लोकान्‌--ब्रह्माण्ड भर में; वै--सामान्य रूप से;लोक-भावन: --समस्त ब्रह्माण्डों के स्वामी; लीला--कार्यकलाप; अवतार--अवतार; अनुरतः -- भूमिका ग्रहण करतेहुए; देव--देवता; तिर्यक्‌--निम्न पशु; नर-आदिषु--मनुष्यों में ।

इस प्रकार सारे ब्राह्माण्डों के स्वामी देवताओं, मनुष्यों तथा निम्न पशुओं से आवासितसारे ग्रहों का पालन-पोषण करने वाले हैं।

वे अवतरित होकर शुद्ध सत्त्वगुण में रहने वालोंके उद्धार हेतु लीलाएँ करते हैं।

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