← श्रीमद्भागवतम् स्कन्ध 1 की सूची

अध्याय तीन: कृष्ण सभी अवतारों के स्रोत हैं

1.3सूत उवाचजगृहे पौरुषं रूपं भगवान्महदादिभि: ।

सम्भूतं षोडशकलमादौलोकसिसृक्षया ॥

१॥

सूतः उबाच--सूत ने कहा; जगृहे--स्वीकार किया; पौरुषम्‌--पुरुष अवतार रूप में पूर्णाश; रूपमू--रूप; भगवान्‌--भगवान्‌; महत्‌-आदिभि:-- भौतिक जगत के अवयवों सहित; सम्भूतम्‌--इस तरह उत्पन्न; षोडश-कलम्‌--सोलह मुख्यसिद्धान्त; आदौ-प्रारम्भ में; लोक--ब्रह्माण्ड; सिसृक्षया--उत्पन्न करने के विचार से।

सूतजी ने कहा : सृष्टि के प्रारम्भ में, भगवान्‌ ने सर्वप्रथम विराट पुरुष अवतार के रूपमें अपना विस्तार किया और भौतिक सृजन के लिए सारी सामग्री प्रकट की।

इस प्रकारसर्वप्रथम भौतिक क्रिया के सोलह तत्त्व उत्पन्न हुए।

यह सब भौतिक ब्रह्माण्ड को उत्पन्नकरने के लिए किया गया।

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यस्याम्भसि शयानस्य योगनिद्रां वितन्वत: ।

नाभिहदाम्बुजादासीद्रह्मा विश्वसृ॒जां पति: ॥

२॥

यस्य--जिसके; अम्भसि--जल में; शयानस्य--लेटे हुए; योग-निद्राम्‌-ध्यान में सोये हुए; वितन्व॒तः--विस्तार करतेहुए; नाभि--नाभि रूपी; हृद--सरोवर के; अम्बुजातू--कमल से; आसीत्‌--प्रकट हुआ; ब्रह्मा--जीवों के पितामह;विश्व--ब्रह्माण्ड का; सृजाम्‌--शिल्पी; पति:--स्वामी ।

पुरुष के एक अंश ब्रह्माण्ड के जल के भीतर लेटते हैं, उनके शरीर के नाभि-सरोवरसे एक कमलनाल अंकुरित होता है और इस नाल के ऊपर खिले कमल-पुष्प से ब्रह्माण्डके समस्त शिल्पियों के स्वामी ब्रह्मा प्रकट होते हैं।

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यस्यावयवसंस्थानै: कल्पितो लोकविस्तर: ।

तद्दै भगवतो रूप॑ विशुद्धं सत्त्ममूर्जितम्‌ ॥

३॥

यस्य--जिसका; अवयव--शारीरिक विस्तार; संस्थानैः --में स्थित; कल्पित:--कल्पित किया गया; लोक--निवासियोंके ग्रह; विस्तर:--विभिन्न; तत्‌ बै--लेकिन वह है; भगवतः-- भगवान्‌ का; रूपम्‌--रूप; विशुद्धम्‌-शुद्ध; सत्त्वम्‌--अस्तित्व; ऊर्जितम्‌--सर्वश्रेष्ठ |

ऐसा विश्वास किया जाता है कि समस्त ब्रह्माण्ड के ग्रहमंडल पुरुष के विराट शरीर मेंस्थित हैं, किन्तु उन्हें सर्जित भौतिक अवयवों से कोई सरोकार नहीं होता।

उनका शरीरनित्य आध्यात्मिक अस्तित्वमय है जिसकी कोई तुलना नहीं है।

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पश्यन्त्यदो रूपमदभ्नरचक्षुषासहस्रपादोरुभुजाननाद्भधुतम्‌ ।

सहसतमूर्धश्रवणाक्षिनासिकं सहस्रमौल्यम्बरकुण्डलोल्लसत्‌ ॥

४॥

'पश्यन्ति--देखते हैं; अदः--पुरुष का; रूपमू--रूप; अदभ्ब--पूर्ण; चक्षुषा-- आँखों से; सहस्त्र-पाद--हजारों पाँव;ऊरू--जंघाएँ; भुज-आनन--हाथ तथा मुख; अद्भुतम्-- आश्चर्यजनक; सहस्त्र--हजारों; मूर्ध--शिर; श्रवण--कान;अक्षि--आँखें; नासिकम्‌--नाक; सहस््र--हजारों; मौलि--मालाएँ; अम्बर--वस्त्र; कुण्डल--कर्णाभूषण; उललसत्‌--चमकते हुए।

भक्तगण अपने विमल (पूर्ण ) नेत्रों से उस पुरुष के दिव्य रूप का दर्शन करते हैंजिसके हजारों-हजार पाँव, जंघाएँ, भुजाएँ तथा मुख हैं और सबके सब अद्वितीय हैं।

उसशरीर में हजारों सिर, आँखें, कान तथा नाक होते हैं।

वे हजारों मुकुटों तथा चमकतेकुण्डलों से अलंकृत हैं और मालाओं से सजाये गये हैं।

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एतन्नानावताराणां निधानं बीजमव्ययम्‌ ।

यस्यांशांशेन सृज्यन्ते देवतिर्यड्नरादय: ॥

५॥

एतत्--यह ( रूप ) ; नाना--अनेक; अवताराणाम्‌-- अवतारों का; निधानम्‌--स्त्रोत; बीजमू--बीज; अव्ययम्‌--अविनाशी; यस्य--जिसका; अंश--पूर्ण अंश; अंशेन--भिन्नांश से; सृज्यन्ते--उत्पन्न होते हैं; देव--देवता; तिर्यक्‌--पशु; नर-आदय: --मनुष्य इत्यादि।

यह रूप ( पुरुष का द्वितीय प्राकट्य ) ब्रह्माण्ड के भीतर नाना अवतारों का स्त्रोत तथाअविनाशी बीज है।

इसी रूप के कणों तथा अंशों से देवता, मनुष्य इत्यादि विभिन्न जीवउत्पन्न होते हैं।

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स एव प्रथमं देव: कौमारं सर्गमाश्रित: ।

चचार दुश्वरं ब्रह्मा ब्रह्मचर्यमखण्डितम्‌ ॥

६॥

सः--उसने; एव--ही; प्रथमम्‌--पहला; देव: --परमे श्वर; कौमारम्‌--कुमारगण ( अविवाहित ); सर्गम्‌--सृष्टि;आश्रितः--अधीन; चचार--सम्पन्न किया; दुश्वरम्‌--करना अत्यन्त कठिन, दुष्कर; ब्रह्मा--ब्रह्मा की कोटि में;ब्रह्मचर्यम्‌-ब्रह्म की अनुभूति प्राप्त करने की तपस्या में; अखण्डितम्‌--अविच्छिन्न |

सृष्टि के प्रारम्भ में सर्वप्रथम ब्रह्मा के चार अविवाहित पुत्र ( कुमारगण ) थे, जिन्होंनेब्रह्मचर्य त्रत का पालन करते हुए परम सत्य के साक्षात्कार हेतु कठोर तपस्या की।

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द्वितीयं तु भवायास्य रसातलगतां महीम्‌ ।

उद्धरिष्यन्रुपादत्त यज्ञेश: सौकरं वपु: ॥

७॥

द्वितीयम्‌--दूसरा; तु--लेकिन; भवाय--कल्याण के लिए; अस्य--इस पृथ्वी के; रसातल--निम्नतम भागमें; गताम्‌--गयी हुई; महीम्‌--पृथ्वी को; उद्धरिष्यन्‌--उठा कर; उपादत्त--स्थापित किया; यज्ञेश: --स्वामी या परम भोक्ता;सौकरम्‌--सूकर का; वपु:--अवतार ।

समस्त यज्ञों के परम भोक्ता ने सूकर का अवतार ( द्वितीय अवतार ) स्वीकार कियाऔर पृथ्वी के कल्याण हेतु उसे ब्रह्माण्ड के रसातल क्षेत्र से ऊपर उठाया।

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तृतीयमृषिसर्ग बै देवर्षित्वमुपेत्य सः ।

तन्त्रं सात्वतमाचष्ट नैष्कर्म्य कर्मणां यत: ॥

८॥

तृतीयम्‌--तीसरा; ऋषि-सर्गमू--ऋषिसर्ग; वै--निश्चय ही; देवर्षित्वम्‌--देवताओं में ऋषि का अवतार; उपेत्य--स्वीकारकरके; सः--उन्‍्होंने; तन्त्रमू--वेदों का भाष्य; सात्वतम्--विशेष रूप से भक्ति के लिए; आचष्ट--संग्रह किया;नैष्कर्म्यम्‌--निष्काम्‌; कर्मणाम्‌--कर्म का; यत:--जिससे ।

ऋषियों के सर्ग में, भगवान्‌ ने देवर्षि नारद के रूप में, जो देवताओं में महर्षि हैं, तीसराशक्त्यावेश अवतार ग्रहण किया।

उन्होंने उन वेदों का भाष्य संकलित किया जिनमें भक्तिमिलती है और जो निष्काम कर्म की प्रेरणा प्रदान करते हैं।

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तुर्ये धर्मकलासगें नरनारायणावृषी ।

भूत्वात्मोपशमोपेतमकरोदुश्वरं तप: ॥

९॥

तुर्ये--चौथी बार; धर्म-कला--धर्मराज की पत्नी से; सर्गे--उत्पन्न; नर-नारायणौ--नर तथा नारायण; ऋषी--ऋषि;भूत्वा--होकर; आत्म-उपशम--इन्द्रिय निग्रह द्वारा; उपेतम्‌--प्राप्ति के लिए; अकरोत्‌--किया; दुश्चरम्‌--अत्यन्तकठिन; तपः--तपस्या ।

चौथे अवतार में भगवान्‌ राजा धर्म की पत्नी के जुड़वाँ पुत्र नर तथा नारायण बने।

फिरउन्होंने इन्द्रियों को वश में करने के लिए कठिन तथा अनुकरणीय तपस्या की।

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पञ्चम: कपिलो नाम सिद्धेश: कालविप्लुतम्‌ ।

प्रोवाचासुरये साड्ख्यं तत्त्वग्रामविनिर्णयम्‌ ॥

१०॥

पश्ञममः--पाँचवाँ; कपिल:--कपिल; नाम--नामक ; सिद्धेश:--सिद्धों में श्रेष्ठ काल--समय द्वारा; विप्लुतम्‌--नष्ट;प्रोवाच--कहा; आसुरये--आसुरि नामक ब्राह्मण से; साइड्ख्यम्‌--सांख्यशास्त्र, तत्त्वज्ञान; तत्त्व-ग्राम--सृष्टिकारी तत्त्वोंका समूह; विनिर्णयम्‌-- भाष्य ।

भगवान्‌ कपिल नामक पाँचवाँ अवतार सिद्धों में सर्वोपरि है।

उन्होंने आसुरि ब्राह्मणको सृष्टिकारी तत्त्वों तथा सांख्य शास्त्र का भाष्य बताया, क्योंकि कालक्रम से यह ज्ञानवि-नष्ट हो चुका था।

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पष्ठमत्रेरपत्यत्वं वृत: प्राप्तोडनसूयया ।

आन्वीक्षिकीमलर्काय प्रह्नादादिभ्य ऊचिवान्‌ ॥

११॥

षष्ठटम्‌--छठवाँ; अत्रेः--अत्रि का; अपत्यत्वमू--पुत्रत्व; वृत:--माँगने पर; प्राप्त:--प्राप्त किया गया; अनसूयया--अनसूया द्वारा; आन्वीक्षिकीम्‌--अध्यात्म के विषय पर; अलर्काय--अलर्क को; प्रह्मद-आदिभ्य:--प्रह्नाद तथा अन्योंको; ऊचिवान्--बताया।

पुरुष के छठे अवतार अत्रि मुनि के पुत्र थे।

वे अनसूया की प्रार्थना पर उनके गर्भ सेउत्पन्न हुए थे।

उन्होंने अलर्क, प्रह्द तथा अन्यों ( यदु, हैहय आदि ) को अध्यात्म के विषयमें उपदेश दिया।

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ततः सप्तम आकृत्यां रुचेर्यज्ञोी भ्यजायत ।

स यामाद्यै: सुरगणैरपात्स्वायम्भुवान्तरम्‌ ॥

१२॥

ततः--तत्पश्चात्‌; सप्तमे--सातवाँ; आकूत्याम्‌--आकूति के गर्भ से; रुचे:--प्रजापति रुचि के द्वारा; यज्ञ:--यज्ञ रूप मेंभगवान्‌ का अवतार; अभ्यजायत--अवतरित हुए; सः--वे; याम-आद्यै:--यम इत्यादि से; सुर-गणै:--देवताओं केद्वारा; अपातू-शासन किया; स्वायम्भुव-अन्तरम्‌--स्वाम्भुव मनु का काल परिर्वतन ( मन्वन्तर )सातवें अवतार प्रजापति रुचि तथा उनकी पत्नी आकूति के पुत्र यज्ञ थे।

उन्होंनेस्वायम्भुव मनु के बदलने पर शासन सँभाला और अपने पुत्र यम जैसे देवताओं कीसहायता प्राप्त की।

अष्टमे मेरुदेव्यां तु नाभेरजात उरुक्रम: ।

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अष्टमे मेरुदेव्यां तु नाभेर्जात उरुक्रम: ।

दर्शयन्‌ वर्त्म धीराणां सर्वाश्रमनमस्कृतम्‌ ॥

१३॥

अष्टमे--आठवाँ अवतार; मेरुदेव्याम्‌ तु--की पत्नी मेरुदेवी के गर्भ से; नाभेः--राजा नाभि; जात:--जन्म लिया;उरुक्रम:--सर्वथा शक्तिमान भगवान्‌; दर्शयन्‌--दिखाया; बर्त्म--रास्ता; धीराणाम्‌--पूर्ण लोगों का; सर्व--सभी;आश्रम--जीवन के चारों आश्रमों द्वारा; नमस्कृतम्‌--समादरित, वंदनीय |

आठवाँ अवतार राजा ऋषभ के रूप में हुआ।

वे राजा नाभि तथा उनकी पली मेरुदेवीके पुत्र थे।

इस अवतार में भगवान्‌ ने पूर्णता का मार्ग दिखलाया जिसका अनुगमन उनलोगों द्वारा किया जाता है, जिन्होंने अपनी इन्द्रियों को पूर्ण रूप से संयमित कर लिया हैऔर जो सभी वर्णाश्रमों के लोगों द्वारा वन्दनीय हैं।

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ऋषिभिर्याचितो भेजे नवम॑ पार्थिवं वपु: ।

दुग्धेमामोषधीर्विप्रास्तेनायं स उशत्तम: ॥

१४॥

ऋषिभि: --मुनियों द्वारा; याचित:--माँगे जाने पर; भेजे--स्वीकार किया; नवमम्‌--नवाँ; पार्थिवम्‌--पृथ्वी के शासक;वपु:--शरीर; दुग्ध--दुहते हुए; इमाम्‌--ये सब; ओषधी:--पृथ्वी की उपजें; विप्रा: --हे ब्राह्मणों; तेन--के द्वारा;अयमू--यह; सः--वह; उशत्तम:--अत्यन्त आकर्षक ।

हे ब्राहणों, मुनियों द्वारा प्रार्थना किये जाने पर, भगवान्‌ ने नवें अवतार में राजा ( पृथु )का शरीर स्वीकार किया जिन्होंने विविध उपजें प्राप्त करने के लिए पृथ्वी को जोता।

'फलस्वरूप पृथ्वी अत्यन्त सुन्दर तथा आकर्षक बन गईं।

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रूपं स जगहे मात्स्यं चाक्षुषोदधिसम्प्लवे ।

नाव्यारोप्य महीमय्यामपाह्दैवस्वतं मनुम्‌ ॥

१५॥

रूपम्‌--रूप; सः--उसने; जगृहे--स्वीकार किया; मात्स्यमू--मछली का; चाक्षुष--चाक्षुष; उदधि--जल; सम्प्लवे--बाढ़, प्रलय; नावि--नाव में; आरोप्य--रख कर; मही--पृथ्वी; मय्याम्‌--डूबा हुआ; अपात्‌--रक्षा की; वैवस्वतम्‌--वैवस्वत; मनुम्‌--मनुष्य के पिता, मनु को |

जब चाक्षुष मनु के युग के बाद पूर्ण जलप्रलय हुआ और सारा जगत जल में डूब गयाथा, तब भगवान्‌ मछली ( मत्स्य ) के रूप में प्रकट हुए और वैवस्वत मनु को नाव मेंरखकर उनकी रक्षा की।

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सुरासुराणामुदधि मथ्नतां मन्दराचलम्‌ ।

दश्ने कमठरूपेण पृष्ठ एकादशे विभु: ॥

१६॥

सुर--आस्तिकों; असुराणाम्‌--तथा नास्तिकों का; उदधिम्‌--समुद्र में; मथ्नताम्‌--मंथन करते हुए; मन्दराचलम्‌--मन्दराचल पर्वत को; दश्ले-- धारण किया; कमठ--कच्छप; रूपेण--के रूप में; पृष्ठे--पीठ पर; एकादशे--ग्यारहवाँ;विभु:--महान।

भगवान्‌ का ग्यारहवाँ अवतार कच्छप के रूप में हुआ, जिनकी पीठ ब्रह्माण्ड केआस्तिकों तथा नास्तिकों के द्वारा मथानी के रूप में प्रयुक्त किये जा रहे मन्दराचल पर्वत केलिए आधार बनी।

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धान्वन्तरं द्वादशमं त्रयोदशममेव च ।

अपाययत्सुरानन्यान्मोहिन्या मोहयन्‌ ख्रिया ॥

१७॥

धान्वन्तरम्‌-- धन्वन्तरि नामक भगवान्‌ का अवतार; द्वादशमम्‌--बारहवाँ; त्रयोदशमम्‌--तेरहवाँ; एब--निश्चय ही; च--तथा; अपाययत्‌--पीने के लिए दिया; सुरानू--देवताओं को; अन्यान्‌--अन्यों को; मोहिन्या--सुन्दरी द्वारा; मोहयन्‌--मोहते हुए; स्त्रिया--स्त्री के रूप में।

बारहवें अवतार में भगवान्‌ धन्वन्तरि के रूप में प्रकट हुए और तेरहवें अवतार में उन्होंनेस्त्री के मनोहर सौंदर्य द्वारा नास्तिकों को मोहित किया और देवताओं को पीने के लिएअमृत प्रदान किया।

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चतुर्दश नारसिंहं बिश्रद्ैत्येन्द्रमूजितम्‌ ।

ददार करजैरूरावेरकां कटकृद्यथा ॥

१८॥

चतुर्दशम्‌--चौदहवें; नार-सिंहम्‌--आधा मनुष्य तथा आधा सिंह शरीर वाले भगवान्‌ का अवतार; बिभ्रतू--अवतरितहुए; दैत्य-इन्द्रमू--नास्तिकों का राजा; ऊर्जितम्‌--अत्यन्त बलिष्ठ; ददार--चीर डाला; करजै:--नाखूनों से; ऊरौ--गोदमें; एरकाम्--बेंत को; कट-कृत्--बढ़ई; यथा--जिस तरह ।

चौदहवें अवतार में भगवान्‌ नृसिंह के रूप में प्रकट हुए और अपने नाखूनों से नास्तिकहिरण्यकशिपु के बलिष्ठ शरीर को उसी प्रकार चीर डाला, जिस प्रकार बढ़ई लट्ठे को चीरदेता है।

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पञ्चद्शं वामनकं कृत्वागादध्वरं बले: ।

पदत्रयं याचमान: प्रत्यादित्सुस्त्रिपिष्टपम्‌ ॥

१९॥

पञ्मदशम्‌--पन्दहवाँ; वामनकम्‌--बौना ब्राह्मण; कृत्वा-- धारण करके; अगात्‌--गये; अध्वरम्‌--यज्ञ स्थल में;बले:--राजा बलि के; पद-त्रयम्‌--केवल तीन पद; याचमान:--माँगते हुए; प्रत्यादित्सु:--मन में लौटाने की इच्छा करतेहुए; त्रि-पिष्टपम्‌--तीनों लोकों का राज्य ।

पन्द्रहवें अवतार में भगवान्‌ ने बौने ब्राह्मण ( वामन ) का रूप धारण किया और वेमहाराज बलि द्वारा आयोजित यज्ञ में पधारे।

यद्यपि वे हृदय से तीनों लोकों का राज्य प्राप्तकरना चाह रहे थे, किन्तु उन्होंने केवल तीन पग भूमि दान में माँगी।

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अवतारे षोडशमे पश्यन्‌ ब्रह्मद्गरहो नृपान्‌ ।

त्रिःसप्तकृत्व: कुपितो नि:क्षत्रामकरोन्महीम्‌ ॥

२० ॥

अवतारे-- भगवान्‌ के अवतार में; षोडशमे--सोलहवदें; पश्यन्‌--देखते हुए; ब्रह्म-द्रुह:--ब्राह्मणों के आदेशों की अवज्ञाकरने वाले; नृपान्--राजाओं को; त्रि:-सप्त--सात का तीन गुना, इक्कीस बार; कृत्व:--किया था; कुपित:--क्रुद्ध;निः--रहित; क्षत्रामू-प्रशासक वर्ग से; अकरोत्‌--किया; महीम्‌--पृथ्वी को |

सोलहवें अवतार में भगवान्‌ ने ( भूगुपति के रूप में ) क्षत्रियों का इक्कीस बार संहारकिया, क्‍योंकि वे ब्राह्मणों ( बुद्धिमान वर्ग ) के विरुद्ध किये गये विद्रोह के कारण उनसेक्रुद्ध थे।

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ततः सप्तदशे जात: सत्यवत्यां पराशरातू ।

चक्रे वेदतरो: शाखा दृष्टा पुंसोडइल्पमेधस: ॥

२१॥

ततः--तत्पश्चात्‌; सप्तदशे--सत्रहवें अवतार में; जात:--उत्पन्न हुआ; सत्यवत्याम्‌--सत्यवती के गर्भ से; पराशरात्--पराशर मुनि द्वारा; चक्रे --तैयार किया; वेद-तरो:--वेदों के कल्पवृक्ष की; शाखा:--शाखाएँ; दृष्ठा--देखकर; पुंस:--सामान्य जन; अल्प-मेधस:--अल्पज्ञतत्पश्चात्‌ सत्रहवें अवतार में भगवान्‌, पराशर मुनि के माध्यम से सत्यवती के गर्भ से श्रीव्यासदेव के रूप में प्रकट हुए।

उन्होंने यह देखकर कि जन-सामान्य अल्पज्ञ हैं, एकमेव वेदको अनेक शाखाओं-प्रशाखाओं में विभक्त कर दिया।

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नरदेवत्वमापन्न: सुरकार्यचिकीर्षया ।

समुद्रनिग्रहादीनि चक्रे वीर्याण्यत: परम्‌ ॥

२२॥

नर--मनुष्य; देवत्वमू-देवत्व; आपन्न:--का स्वरूप ग्रहण करके; सुर--देवता; कार्य--कर्म; चिकीर्षया--सम्पन्नकरने के लिए; समुद्र--हिन्द महासागर; निग्रह-आदीनि--निग्रह इत्यादि; चक्रे --किया; वीर्याणि---अतिमानवीयपराक्रम; अतः परम्-तत्पश्चात्‌ |

अठारहवें अवतार में भगवान्‌ राजा राम के रूप में प्रकट हुए।

उन्होंने देवताओं के लिएमनभावन कार्य करने के उद्देश्य से हिन्द महासागर को वश में करते हुए समुद्र पार केनिवासी नास्तिक राजा रावण का वध करके अपनी अतिमानवीय शक्ति का प्रदर्शन किया।

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एकोनविंशे विंशतिमे वृष्णिषु प्राप्य जन्मनी ।

रामकृष्णाविति भुवो भगवानहरद्धरम्‌ ॥

२३॥

एकोनविंशे--उन्नीसवें में; विंशतिमे--बीसवें में भी; वृष्णिषु--वृष्णि वंश में; प्राप्प--पाकर; जन्मनी -- जन्म; राम--बलराम; कृष्णौ--तथा श्रीकृष्ण; इति--इस प्रकार; भुवः--जगत का; भगवान्‌-- भगवान्‌ ने; अहरत्‌--दूर किया;भरम्‌--बोझ को ।

उन्नीसवें तथा बीसवें अवतारों में भगवान्‌ वृष्णि वंश में ( यदु कुल में ) भगवान्‌ बलरामतथा भगवान्‌ कृष्ण के रूप में अवतरित हुए और इस तरह उन्होंने संसार के भार को दूरकिया।

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ततः कलौ सम्प्रवृत्ते सम्मोहाय सुरद्विषाम्‌ ।

बुद्धो नाम्नाज्ससुत: कीकटेषु भविष्यति ॥

२४॥

ततः--तत्पश्चात्‌; कलौ--कलियुग में; सम्प्रवृत्ते--अनुघटित होगा; सम्मोहाय--मोहने के लिए; सुर--आस्तिक;द्विषाम्‌--ईर्ष्यालुओं को; बुद्धः-- भगवान्‌ बुद्ध; नाम्ता--नामक; अज्जन-सुत: --अंजना के पुत्र; कीकटेषु--गया( बिहार ) प्रान्त में; भविष्यति--होगा।

तब भगवान्‌ कलियुग के प्रारम्भ में गया प्रान्त में अंजना के पुत्र, बुद्ध के रूप में उनलोगों को मोहित करने के लिए प्रकट होंगे, जो श्रद्धालु आस्तिकों से ईर्ष्या करते हैं।

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अथासौ युगसम्ध्यायां दस्युप्रायेषु राजसु ।

जनिता विष्णुयशसो नाम्ना कल्किर्जगत्पति: ॥

२५॥

अथ--त्पश्चात्‌; असौ--वही भगवान्‌; युग-सन्ध्यायाम्‌--युगों के बीच में; दस्यु--लुटेरे; प्रायेषु--प्राय:; राजसु--शासक; जनिता--जन्म लेगा; विष्णु --विष्णु नामक; यशसः:--' यशा ' कुलनामयुक्त; नाम्ना--नाम से; कल्कि: --भगवान्‌ का अवतार; जगतू-पति:--जगत के स्वामी ।

तत्पश्चात्‌ सृष्टि के सर्वोसर्वा भगवान्‌ दो युगों के सन्धिकाल में कल्कि अवतार के रूपमें जन्म लेंगे और विष्णु यशा के पुत्र होंगे।

उस समय पृथ्वी के शासक लुटेरे बन चुके होंगे।

"

अवतारा हासड्ख्येया हरे: सत्त्वनिधेद्िजा: ।

यथाविदासिन: कुल्या: सरसः स्यु: सहस्रश: ॥

२६॥

अवतारा:--अवतार; हि--निश्चय ही; असड्ख्येया:--असंख्य; हरे: --हरि के, भगवान्‌ के; सत्त्व-निधे:--अच्छाई( सतोगुण ) के सागर के; द्विजा:--ब्राह्मण; यथा--जिस तरह; अविदासिन:--अक्षय; कुल्या: --नाले; सरस:--विशालझीलों के; स्यु:--है; सहस्नरश:--हजारोंहे ब्राह्मणों, भगवान्‌ के अवतार उसी तरह असंख्य हैं, जिस प्रकार अक्षय जल के स्त्रोतसे निकलने वाले ( असंख्य ) झरने।

" ऋषयो मनवो देवा मनुपुत्रा महौजस: ।

कला: सर्वे हरेरेव सप्रजापतय: स्मृता: ॥

२७॥

ऋषय:--ऋषिगण; मनव: --समस्त मनु; देवा: --सारे देवता; मनु-पुत्रा:--मनु की सारी सन्‍्तानें; महा-ओजस: --अत्यन्तशक्तिमान; कलाः--पूर्णाश के अंश; सर्वे--सामूहिक रूप से; हरेः-- भगवान्‌ का; एव--निश्चय ही; स-प्रजापतय: --प्रजापतियों सहित; स्मृता:--जाने जाते हैं ।

सारे ऋषि, मनु, देवता तथा विशेष रूप से शक्तिशाली मनु की सन्‍्तानें भगवान्‌ के अंशया उन अंशों की कलाएँ हैं।

इसमें प्रजापतिगण भी सम्मिलित हैं।

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एते चांशकला: पुंस: कृष्णस्तु भगवान्‌ स्वयम्‌ ।

इन्द्रारिव्याकुलं लोक॑ मृडयन्ति युगे युगे ॥

२८॥

एते--ये सब; च--तथा; अंश--पूर्णाश; कला:--पूर्णाश के भी अंश; पुंसः--परम पुरुष के ; कृष्ण:-- भगवान्‌ कृष्ण;तु--लेकिन; भगवानू-- भगवान्‌; स्वयम्‌--साक्षात्‌; इन्द्र-अरि--इन्द्र के शत्रु से; व्याकुलमू--विचलित; लोकम्‌--सारेलोक को; मृडयन्ति--सुरक्षा प्रदान करते हैं; युगे युगे--विभिन्न युगों मेंउपर्युक्त सारे अवतार या तो भगवान्‌ के पूर्ण अंश या पूर्णाश के अंश ( कलाएं ) हैं,लेकिन श्रीकृष्ण तो आदि पूर्ण पुरुषोत्तम भगवान्‌ हैं।

वे सब विभिन्न लोकों में नास्तिकोंद्वारा उपद्रव किये जाने पर प्रकट होते हैं।

भगवान्‌ आस्तिकों की रक्षा करने के लिएअवतरित होते हैं।

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जन्म गुह्म॑ं भगवतो य एतत्प्रयतो नर: ।

सायं प्रातर्गूणन्‌ भक्‍त्या दुःखग्रामाद्विमुच्यते ॥

२९॥

जन्म--जन्म; गुह्मम्‌-गुप्त; भगवत:-- भगवान्‌ का; य:--जो; एतत्‌--वे सब; प्रयतः--सावधानी से; नर: --मनुष्य;सायम्‌--शाम को; प्रातः--प्रातःकाल; गृणन्‌--पाठ करता, बाँचता है; भक्त्या--भक्तिपूर्वक; दुःख-ग्रामात्‌--समस्तकष्टों से; विमुच्यते--छूट जाता हैजो कोई भी भगवान्‌ के गुह्य अवतारों का सावधानीपूर्वक प्रतिदिन सुबह तथा शामको पाठ करता है, वह जीवन के समस्त दुखों से छूट जाता है।

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एतद्रूपं भगवतो हारूपस्य चिदात्मन: ।

मायागुणैविरचितं महदादिभिरात्मनि ॥

३०॥

एतत्‌--ये सब; रूपमू--रूप; भगवतः-- भगवान्‌ के; हि--निश्चय ही; अरूपस्थ--जिनका कोई भौतिक रूप नहीं हैउनका; चित्‌-आत्मन:--ब्रह्म के; माया-- भौतिक शक्ति, माया; गुणैः --गुणों से; विरचितम्‌--निर्मित; महत्-आदिभिः--पदार्थ के अवयवों से; आत्मनि--आत्मा मेंभगवान्‌ के विराट रूप की धारणा, जिसमें वे इस भौतिक जगत में प्रकट होते हैं,काल्पनिक है।

यह तो अल्पज्ञों (तथा नवदीक्षितों ) को भगवान्‌ के रूप की धारणा मेंप्रवेश कराने के लिए है।

लेकिन वस्तुत: भगवान्‌ का कोई भौतिक रूप नहीं होता।

यथा नभसि मेघौधो रेणुर्वा पार्थिवोनिले ।

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यथा नभसि मेघौधो रेणुर्वा पार्थिवोनिले ।

एवं द्रष्टरे दृश्यत्वमारोपितमबुद्धिभि: ॥

३१॥

यथा--जिस प्रकार; नभसि--आकाश में; मेघ-ओघ:--बादलों का समूह; रेणु;--धूल; बवा--तथा; पार्थिव: --मलिनता, धुंधलका; अनिले--वायु में; एवम्--इस प्रकार; द्रष्टरे--देखने वाले को; दृश्यत्वम्‌--देखने के लिए;आरोपितम्‌--आरोपित होता है; अबुदर्द्धेभिः--अल्पज्ञों द्वाराबादल तथा धूल वायु द्वारा ले जाए जाते हैं, लेकिन अल्पज्ञ लोग कहते हैं कि आकाशमेघाच्छादित है और वायु धूलिमय ( मलिन ) है।

इसी प्रकार वे लोग आत्मा के विषय में भीभौतिक शरीर की धारणाओं का आरोपण करते हैं।

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अतः परं यदव्यक्तमव्यूढगुणबृंहितम्‌ ।

अदृष्ठश्रुतवस्तुत्वात्स जीवो यत्पुनर्भव: ॥

३२॥

अतः--यह; परम्‌--परे; यत्‌--जो; अव्यक्तम्‌--अप्रकट; अव्यूढ--बिना किसी प्रकार के रूप के; गुण-बूंहितम्‌-गुणोंसे प्रभावित; अदृष्ट-- अदृश्य, अनदेखा; अश्रुत--अनसुना; वस्तुत्वात्‌-वैसा होने से; सः--वह; जीव:--जीव; यत्‌--जो; पुनः-भव: --बारम्बार जन्म ग्रहण करता है।

रूप की इस स्थूल अवधारणा से परे रूप की एक अन्य सूक्ष्म धारणा है, जिसका कोईआकार नहीं होता और जो अनदेखा, अनसुना तथा अव्यक्त होता है।

जीव का रूप इससूक्ष्मता से परे है, अन्यथा उसे बारम्बार जन्म न लेना पड़ता।

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यत्रेमे सदसद्गुपे प्रतिषिद्धे स्वसंविदा ।

अविद्ययात्मनि कृते इति तद्ढह्मदर्शनम्‌ ॥

३३॥

यत्र--जब भी; इमे--इन सबमें; सत्‌-असत्‌--स्थूल तथा सूक्ष्म; रूपे--के रूपों में; प्रतिषिद्धे--दूर हो जाने पर; स्व-संविदा--आत्म-साक्षात्कार द्वारा; अविद्यया--अज्ञान से; आत्मनि--आत्मा में; कृते--आरोपित; इति--इस प्रकार;तत्‌--वह है; ब्रह्म-दर्शनम्‌-परमे श्वर के दर्शन की विधि।

जब कभी मनुष्य आत्म-साक्षात्कार द्वारा यह अनुभव करता है कि स्थूल तथा सूक्ष्मदोनों शरीरों का शुद्ध आत्मा से कोई सरोकार नहीं, उस समय वह अपना तथा साथ ही साथभगवान्‌ का दर्शन करता है।

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यद्येषोपरता देवी माया वैशारदी मति: ।

सम्पन्न एवेति विदुर्महिम्नि स्वे महीयते ॥

३४॥

यदि--यदि, फिर भी; एषा--वे; उपरता--दमित; देवी माया--माया; वैशारदी--ज्ञान से पूर्ण; मतिः-- प्रकाश;सम्पन्न: --सेवा परिपूर्ण; एब--निश्चय ही; इति--इस प्रकार; विदु:--जानते हुए; महिम्नि--महिमा में; स्वे-- अपनी;महीयते--प्रतिष्ठितयदि माया का शमन हो जाता है और यदि भगवत्कृपा से जीव ज्ञान से सम्पन्न हो जाताहै, तो उसे तुरन्त आत्म-साक्षात्कार का प्रकाश प्राप्त होता है और वह अपनी महिमा मेंप्रतिष्ठित ( महिमामण्डित ) हो जाता है।

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एवं जन्मानि कर्माणि ह्ाकर्तुरजनस्य च ।

वर्णयन्ति सम कवयो वेदगुद्यानि हत्पते: ॥

३५॥

एवम्‌--इस प्रकार; जन्मानि--जन्म; कर्माणि--कर्म; हि--निश्चय ही; अकर्तु:--अकर्ता के; अजनस्थ--अजन्मा के;च--तथा; वर्णयन्ति--वर्णन करते हैं; स्म-- भूत काल में; कवय: --विद्वान; वेद-गुह्मानि--वेदों के द्वारा न जाने जासकने योग्य, गोपनीय; हत्-पते: --हृदय के स्वामी के ।

इस प्रकार विद्वान पुरुष उस अजन्मा तथा अकर्ता के जन्मों तथा कर्मों का वर्णन करतेहैं, जो वैदिक साहित्य के लिए भी ज्ञेय नहीं हैं।

वे हृदयेश हैं।

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स वा इदं विश्वममोघलील:सृजत्यवत्यत्ति न सज्जतेस्मिन्‌ ।

भूतेषु चान्तर्हित आत्मतन्त्र:षाड्वर्गिक॑ जिप्रति षड्गुणेश: ॥

३६॥

सः--परमेश्वर; वा-- अथवा; इृदम्--इस; विश्वम्‌--प्रकट ब्रह्माण्ड को; अमोघ-लील:--जिनके कर्म निष्कलंक हैं वे;सृजति--उत्पन्न करते हैं; अवति अत्ति--पालन तथा संहार करते हैं; न--नहीं; सज्जते--से प्रभावित होते हैं; अस्मिनू--उनमें; भूतेषु--समस्त जीवों में; च--तथा; अन्तर्हित: -- भीतर रहकर; आत्म-तन्‍्त्र:--स्वतन्त्र; षाटू-वर्गिकम्‌-- भगवान्‌के षड्‌ ऐश्वयों से युक्त; जिप्नति--सुंगधि की तरह ऊपर-ऊपर आसक्त; षट्-गुण-ईश:--छहों इन्द्रियों के स्वामी ॥

जिनके कर्म सदैव निष्कलुष होते हैं वे भगवान्‌ छह इन्द्रियों के स्वामी हैं और छहोंऐश्वर्यों के साथ सर्वशक्तिमान हैं।

वे दृश्य ब्रह्माण्डों की सृष्टि करते हैं, उनका पालन करते हैंऔर रंचमात्र भी प्रभावित हुए बिना उनका संहार करते हैं।

वे समस्त जीवों के भीतरविद्यमान रहते हैं और सदैव स्वतन्त्र होते हैं।

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न चास्य कश्चिन्निपुणेन धातु-रवैति जन्तु: कुमनीष ऊतीः ।

नामानि रूपाणि मनोवचोभि:सन्‍्तन्वतो नटचर्यामिवाज्ञ: ॥

३७॥

न--नहीं; च--तथा; अस्य-- भगवान्‌ का; कश्चित्--कोई; निपुणेन--निपुणता से; धातु:--स्त्रष्टा का; अवैति--जानसकता है; जन्तु:--जीव; कुमनीष:--अज्ञानी; ऊती:-- भगवान्‌ के कार्य; नामानि--उनके नाम; रूपाणि--उनके रूप;मनः-वचोभि:--मानसिक तर्क या वाणी के द्वारा; सन्तन्‍्वतः--व्यक्त करते हुए; नट-चर्याम्‌--नाटकीय कर्म, करामात;इब--सहश; अज्ञ:-मूर्ख ।

मूर्ख मनुष्य अपने अल्प ज्ञान के कारण भगवान्‌ के रूपों, नामों तथा कर्मो की दिव्यप्रकृति को नहीं जान सकते, क्योंकि वे तो किसी नाटक में एक पात्र की तरह कार्य कर रहे होते हैं।

न ही ऐसे मनुष्य अपने तर्क या अपनी वाणी द्वारा भी ऐसी बातों को व्यक्त कर सकते हैं।

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स वेद धातु: पदवीं परस्यदुरन्तवीर्यस्य रथाक्रपाणे: ।

योमायया सन्ततयानुवृत्त्याभजेत तत्पादसरोजगन्धम्‌ ॥

३८॥

सः--वे ही; वेद--जान सकते हैं; धातु:--स्त्रष्टा की; पदवीम्‌--महिमा को; परस्य-- अध्यात्म का; दुरन्त-वीर्यस्य--अत्यन्त शक्तिशाली का; रथ-अड्ड-पाणे:-- भगवान्‌ कृष्ण का, जो हाथ में रथ का चक्र धारण करते हैं; यः--जो;अमायया--किसी हिचक के बिना; सन्ततया--निरन्तर; अनुवृत्त्या--अनुकूल होकर; भजेत--सेवा करता है; ततू-पाद--उनके चरणों की; सरोज-गन्धमू--कमल की महक।

जो बिना हिचक के अबाध रूप से अपने हाथों में रथ का चक्र धारण करने वालेभगवान्‌ के चरणकमलों की अनुकूल सेवा करता है, वही इस जगत के स्त्रष्टा की पूर्णमहिमा, शक्ति तथा दिव्यता को समझ सकता है।

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अथेह धन्या भगवन्त इत्थंयद्वासुदेवेईखिललोकनाथे ।

कुर्वन्ति सर्वात्मकमात्मभावं॑न यत्र भूय: परिवर्त उग्र: ॥

३९॥

अथ--इस प्रकार; इह--इस संसार में; धन्या:--सफल; भगवन्त:--पूर्ण रूप से ज्ञात; इत्थम्‌--ऐसा; यत्‌--जो;वबासुदेवे-- भगवान्‌ के प्रति; अखिल--सम्पूर्ण; लोक-नाथे--समस्त ब्रह्माण्डों के स्वामी के प्रति; कुर्वन्ति-- प्रेरित करतेहैं; सर्व-आत्मकम्‌--शत प्रतिशत; आत्म--आत्मा; भावम्‌--आह्ाद; न--कभी नहीं; यत्र--जहाँ; भूय:--फिर;परिवर्त:--पुनरावृत्ति; उग्र:-- भयानक ।

इस संसार में केवल ऐसी जिज्ञासाओं द्वारा ही मनुष्य सफल तथा पूर्णतः ज्ञात हो सकताहै, क्योंकि ऐसी जिज्ञासाओं से अखिल ब्रह्माण्डों के स्वामी भगवान्‌ के प्रति दिव्यआह्ादकारी प्रेम उत्पन्न होता है और जन्म-मृत्यु की घोर पुनरावृत्ति से शत प्रतिशत प्रतिरक्षाकी गारंटी प्राप्त होती है।

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इदं भागवतं नाम पुराणं ब्रह्मसम्मितम्‌ ।

उत्तमश्लोकचरितं चकार भगवानृषि: ।

नि:श्रेयसाय लोकस्य धन्यं स्वस्त्ययनं महत् ॥

४०॥

इदम्‌--इस; भागवतम्‌-- भगवान्‌ तथा उनके शुद्ध भक्तों की कथा वाले ग्रन्थ को; नाम--नामक; पुराणम्‌--वेदों केअनुपूरक; ब्रह्म-सम्मितम्‌-- भगवान्‌ श्रीकृष्ण का अवतार; उत्तम-शलोक--भगवान्‌ का; चरितम्‌--कार्यकलाप;चकार--संकलित किया; भगवान्‌-- भगवान्‌ के अवतार; ऋषि: -- श्री व्यासदेव ने; नि: श्रेयसाय--परम कल्याण केलिए; लोकस्य--सब लोगों के; धन्यम्‌--पूर्ण रूप से सफल, धन्य; स्वस्ति-अयनम्‌--सर्व आनन्दमय; महत्‌--परिपूर्ण ।

यह श्रीमद्धागवत भगवान्‌ का साहित्यावतार है, जिसे भगवान्‌ के अवतार वेदव्यास नेसंकलित किया है।

यह सभी लोगों के परम कल्याण के निमित्त है और यह सभी तरह सेसफल, आनन्दमय तथा परिपूर्ण है।

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तदिदं ग्राहयामास सुतमात्मवतां वरम्‌ ।

सर्ववेदेतिहासानां सारं सारं समुद्धृतम्‌ ॥

४१॥

तत्‌--उस; इृदम्‌--यह; ग्राहयाम्‌ आस--स्वीकार कराया; सुतम्‌--उनके पुत्र को; आत्मवताम्‌--स्वरूपसिद्ध को;वरम्‌--अत्यन्त आदरणीय; सर्व--समस्त; वेद--वैदिक साहित्य ( ज्ञान ग्रन्थ ); इतिहासानाम्‌--समस्त इतिहासों का;सारम्‌--सार, निष्कर्ष; सारम्‌--सार; समुद्धृतम्‌--निकाला हुआ।

स्वरूपसिद्धों में अत्यन्त सम्माननीय श्री व्यासदेव ने समस्त वैदिक वाड्मय तथाब्रह्माण्ड के इतिहासों का सार निकाल कर इसे अपने पुत्र को प्रदान किया।

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सतु संश्रावयामास महाराजं परीक्षितम्‌ ।

प्रायोपविष्टे गड़ायां परीतं परमर्षिभि: ॥

४२॥

सः--व्यासदेव के पुत्र ने; तु--पुनः; संश्राववाम्‌ आस--सुनाया; महा-राजम्‌--राजा; परीक्षितम्‌--परीक्षित को; प्राय-उपविष्टम्‌--अन्न-जल रहित मृत्यु के लिए बैठे; गड्डायाम्‌--गंगा नदी के तट पर; परीतम्‌-घिरे हुए; परम-ऋषिभि: --बड़े-बड़े ऋषियों द्वारा।

व्यासदेव के पुत्र शुकदेव गोस्वामी ने, अपनी पारी में महाराज परीक्षित को भागवतसुनाई जो तब निर्जल तथा निराहार रहकर मृत्यू की प्रतीक्षा करते हुए गंगा नदी के तट परऋषियों से घिरे बैठे हुए थे।

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कृष्णे स्वधामोपगते धर्मज्ञानादिभि: सह ।

कलौ नष्टदृशामेष पुराणार्को धुनोदित: ॥

४३॥

कृष्णे--कृष्ण के; स्व-धाम--अपने धाम; उपगते--वापस जाने पर; धर्म--धर्म; ज्ञान--ज्ञान; आदिभि:--इत्यादि;सह--साथ; कलौ--कलियुग में; नष्ट-हशाम्‌--जिन लोगों के दृष्टि नष्ट हो चुकी है उनके; एष:--ये सब; पुराण-अर्कः--सूर्य के समान प्रकाशमान पुराण; अधुना--इस समय; उदितः--उदय हुआ है।

यह भागवत पुराण सूर्य के समान तेजस्वी है और धर्म, ज्ञान आदि के साथ कृष्ण द्वाराअपने धाम चले जाने के बाद ही इसका उदय हुआ।

जिन लोगों ने कलियुग में अज्ञान केगहन अन्धकार के कारण अपनी दृष्टि खो दी है, उन्हें इस पुराण से प्रकाश प्राप्त होगा।

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तत्र कीर्तयतो विप्रा विप्रषेंर्भूरितेजस: ।

अहं चाध्यगमं तत्र निविष्टस्तदनुग्रहातू ।

सोऊहं व: श्रावयिष्यामि यथाधीतं यथामति ॥

४४॥

तत्र--वहाँ; कीर्तवतः--कीर्तन करते हुए; विप्रा:--हे ब्राह्मणों; विप्र-ऋषेः--ब्रह्मर्षि से; भूरि--अत्यधिक; तेजस:--शक्तिशाली; अहम्‌--मैं; च-- भी; अध्यगमम्‌--समझ सकता हूँ; तत्र--उस सभा में; निविष्ट:--पूर्ण रूप से एकाग्रचितहोकर; ततू-अनुग्रहात्‌--उसकी कृपा से; सः--वही वस्तु; अहम्‌--मैं; बः--तुमको; श्रावयिष्यामि--सुनाऊँगा; यथा-अधीतम्‌ यथा-मति--अपने अनुभव के आधार परहे विद्वान ब्राह्मणों, जब शुकदेव गोस्वामी ने वहाँ पर ( महाराज परीक्षित की उपस्थितिमें ) भागवत सुनाया, तो मैंने अत्यन्त धयानपूर्वक सुना और इस तरह उनकी कृपा से मैंने उनमहान शक्ति-सम्पन्न ऋषि से भागवत सीखा।

अब मैं तुम लोगों को वही सब सुनाने काप्रयत्न करूँगा, जो मैंने उनसे सीखा तथा जैसा मैंने आत्मसात्‌ किया।

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