← श्रीमद्भागवतम् स्कन्ध 1 की सूची
अध्याय चार: श्री नारद का प्राकट्य
1.4व्यास उवाचइति ब्रुवाणं संस्तूय मुनीनां दीर्घसत्रिणाम् ।
वृद्ध: कुलपति: सूतं बहवृच: शौनकोउब्रवीत् ॥
१॥
व्यास: उबाच--व्यासदेव ने कहा; इति--इस प्रकार; ब्रुवाणम्--बोलते हुए; संस्तूय--बधाई देकर; मुनीनाम्--बड़े-बड़ेसाधुओं में; दीर्घ--दीर्घकालीन; सत्रिणाम्--यज्ञ सम्पन्न करने में लगे रहने वाले; वृद्धः--वयोवृद्ध; कुल-पति:--सभाके अध्यक्ष; सूतम्--सूत गोस्वामी को; बहु-ऋच:--विद्वान; शौनक:--शौनक ने; अब्रवीतू--सम्बोधित किया ।
सूत गोस्वामी को इस प्रकार बोलते देखकर, दीर्घकालीन यज्ञोत्सव में लगे हुए समस्तऋषियों में विद्वान तथा वयोवृद्ध अग्रणी शौनक मुनि ने सूत गोस्वामी को निम्न प्रकारसम्बोधित करते हुए बधाई दी।
"
शौनक उवाचसूत सूत महाभाग वद नो वदतां वर ।
कथां भागवतीं पुण्यां यदाह भगवाड्छुक: ॥
२॥
शौनक: उवाच--शौनक ने कहा; सूत सूत--हे सूत गोस्वामी; महा-भाग--परम भाग्यशाली; वद--कृपया कहें; नः--हमसे; बदताम्--बोलने वालों में से; वर--आदरणीय; कथाम्--कथा के सन्देश को; भागवतीम्-- भागवत की;पुण्याम्-पवित्र; यत्--जो; आह--कहा; भगवान्--परम शक्तिमान; शुक:-- श्री शुकदेव गोस्वामी ने |
शौनक ने कहा : हे सूत गोस्वामी, जो बोल सकते हैं तथा सुना सकते हैं, उन सबों मेंआप सर्वाधिक भाग्यशाली तथा सम्माननीय हैं।
कृपा करके श्रीमद्धागवत की पुण्य कथाकहें, जिसे महान् तथा शक्तिसम्पन्न ऋषि शुकदेव गोस्वामी ने सुनाइ थी।
"
कस्मिन् युगे प्रवृत्तेयं स्थाने वा केन हेतुना ।
कुतः सझ्जोदित: कृष्ण: कृतवान् संहितां मुनि: ॥
३॥
कस्मिनू--किस; युगे--युग में ; प्रवृत्ता-- प्रारम्भ हुआ; इयम्--इस; स्थाने--स्थान पर; वा--अथवा; केन--किस;हेतुना--कारण से; कुत:--कहाँ से; सज्जोदित:--प्रेरणा पाई; कृष्ण:--द्वैधायन व्यास ने; कृतवान्--संकलित किया;संहिताम्--वैदिक साहित्य को; मुनिः--विद्वान।
यह ( कथा ) सर्वप्रथम किस युग में तथा किस स्थान में प्रारम्भ हुई और किस कारणइसे प्रारम्भ किया गया? महामुनि कृष्ण द्वैपायन व्यास ने इस साहित्य ( ग्रंथ ) को संकलित करने की प्रेरणा कहाँ से प्राप्त की ?"
तस्य पुत्रों महायोगी समहर्डनिर्विकल्पक: ।
एकान्तमतिसुन्निद्रो गूढो मूढ इवेयते ॥
४॥
तस्य--उसका; पुत्र:--पुत्र; महा-योगी--परम भक्त; सम-हक्--समदर्शी ; निर्विकल्पक: --नितान्त ब्रह्मवादी; एकान्त-मतिः--मन की निष्ठा, ब्रह्मवाद में स्थिर; उन्निद्र:--अज्ञान से परे; गूढ:--प्रच्छन्न; मूढ:--जड़; इब--सहृश; इयते--प्रतीतहोता हैउनका (व्यासदेव का ) पुत्र परम भक्त, समदर्शी ब्रह्मवगादी था जिसका मन सदैवब्रह्मवाद में केन्द्रित रहता था।
वह संसारी कर्मों से परे था, लेकिन प्रकट न होने के कारणअज्ञानी-जैसा लगता था।
"
हृष्ठानुयान्तमृषिमात्मजमप्यनग्नंदेव्यो हिया परिदधुर्न सुतस्य चित्रम् ।
तद्ीक्ष्य पृष्छति मुनौ जगदुस्तवास्तिस्त्रीपुम्भिदा न तु सुतस्य विविक्तद्ष्टे: ॥
५॥
इृष्टा--देखकर; अनुयान्तम्--पीछा करते हुए; ऋषिम्--ऋषि; आत्मजम्--अपने पुत्र को; अपि--यद्यपि; अनग्नम्--नग्न नहीं; देव्य: --सुन्दरियों ने; हिया--लज्जा से; परिदधु;--शरीर ढक लिया; न--नहीं; सुतस्य--पुत्र का; चित्रम्--आश्चर्यजनक; तत् वीक्ष्य--यह देखकर; पृच्छति--पूछता है; मुनौ--मुनि ( व्यास ) को; जगदुः--उत्तर दिया; तब--तुम्हारा; अस्ति-- है; स्त्री-पुमू--नर तथा नारी; भिदा--अन्तर; न--नहीं; तु--लेकिन; सुतस्य--पुत्र का; विविक्त--शुद्ध, पवित्र; दृष्टे--देखने वाले का |
जब श्रील व्यासदेव अपने पुत्र के पीछे-पीछे जा रहे थे, तो नग्न स्नान करती सुन्दरतरुणियों ने बस्त्रों से अपने शरीर ढक लिए, यद्यपि व्यासदेव स्वयं नग्न न थे।
लेकिन जबउनका पुत्र वहीं से गुजरा था, तब उन्होंने वैसा नहीं किया था।
मुनि ने इसके बारे में पूछा तो तरुणियों ने उत्तर दिया कि उनका पुत्र पवित्र है और जब वह उनकी ओर देख रहा था, तोउसने स्त्री तथा पुरुष में कोई भेद नहीं माना।
लेकिन मुनि तो भेद मान रहे थे।
"
कथमालक्षित: पौरै: सम्प्राप्त: कुरुजाड्लान् ।
उन्मत्तमूकजडवद्विचरन् गजसाह्ये ॥
६॥
कथम्-कैसे; आलक्षित:--मान्य; पौरैः:--नागरिकों द्वारा; सम्प्राप्त:--पहुँचे हुए; कुरू-जाड्रलानू--कुरू-जांगल प्रदेशमें; उन्मत्त--पागल; मूक --गूँगा; जडवत्--मूढ़ के समान; विचरन्--घूमते हुए; गज-साह्ये--हस्तिनापुर में ।
कुरु तथा जांगल प्रदेशों में पागल, गूँगे तथा मूढ़ की भाँति घूमने के बाद, जब वे( व्यासपुत्र श्रील शुकदेव ) हस्तिनापुर ( अब दिल्ली ) नगर में प्रविष्ट हुए, तो वहाँ केनागरिकों ने उन्हें कैसे पहचाना ?"
कथं वा पाण्डवेयस्य राजर्षेरमुनिना सह ।
संवाद: समभूत्तात यत्रैषा सात्वती श्रुति: ॥
७॥
कथम्--किस तरह; वा--भी;; पाण्डवेयस्थ--पाण्डु के वंशज ( परीक्षित ) के; राजर्षे:--राजर्षि; मुनिना--मुनिके;सह--साथ; संवाद:--संवाद, वार्ता; समभूत्--हुआ; तात--हे प्रिय; यत्र--जहाँ; एघा--इस तरह; सात्वती--दिव्य;श्रुतिः--वेदों का सार।
राजा परीक्षित की इस महामुनि से कैसे भेंट हुई जिसके फलस्वरूप वेदों के इस महान्दिव्य सार ( भागवत ) का वाचन सम्भव हो सका ?"
स गोदोहनमात्र हि गृहेषु गृहमेधिनाम् ।
अवेक्षते महाभागस्तीर्थीकुर्व॑स्तदाश्रमम् ॥
८॥
सः--वे ( शुकदेव गोस्वामी ) ; गो-दोहन-मात्रमू--केवल गाय दुहते समय तक; हि--निश्चय ही; गृहेषु--घर में; गृह-मेधिनाम्--गृहस्थों के; अवेक्षते--प्रतीक्षा करते हैं; महा-भाग:--परम भाग्यशाली; तीर्थी--तीर्थ यात्रा; कुर्वन्--करतेहुए; तत् आश्रममू--उस घर को |
वे ( शुकदेव गोस्वामी ) किसी गृहस्थ के द्वार पर उतनी ही देर रुकते, जितने समय मेंगाय दुही जा सकती है।
वे उस घर को पवित्र करने के लिए ही ऐसा करते थे।
"
अभिमन्युसुतं सूत प्राहुर्भागवतोत्तमम् ।
तस्य जन्म महाश्चर्य कर्माणि च गृणीहि न: ॥
९॥
अभिमन्यु-सुतम्--अभिमन्यु के पुत्र को; सूत--हे सूत; प्राहु:--कहा जाता है; भागवत-उत्तमम्--प्रथम श्रेणी का भगवद्भक्त; तस्य--उसका; जन्म--जन्म; महा-आश्चर्यम्--अत्यन्त आश्चर्यजनक; कर्माणि--कर्म; च--तथा; गृणीहि--कृपया कहें; नः--हमसे ४कहा जाता है कि महाराज परीक्षित उच्च कोटि के भगवद्धक्त थे और उनके जन्म तथाकर्म अत्यन्त आश्चर्यजनक थे।
कृपया उनके विषय में हमें बताएँ।
"
स सम्राट् कस्य वा हेतो: पाण्डूनां मानवर्धन: ।
प्रायोपविष्टो गड़ायामनाहत्याधिराट्श्रियम् ॥
१०॥
सः--वे ; सप्राट्--महाराजा; कस्य--किस; वा--अथवा; हेतो: --कारण से; पाण्डूनामू--पाण्डु के पुत्रों का; मान-वर्धन:--कुल को सम्पन्न करने वाला; प्राय-उपविष्ट:--बैठे तथा उपवास करते; गड्डायामू--गंगा के तट पर; अनाहत्य--उपेक्षा करके; अधिराट्--प्राप्त किया राज्य; अ्रियम्--ऐ श्वर्य ।
वे एक महान् सम्राट थे और उनके पास उपार्जित राज्य के सारे ऐश्वर्य थे।
वे इतनेवरेण्य थे कि उनसे पाण्डु वंश की प्रतिष्ठा बढ़ रही थी।
तो फिर वे सब कुछ त्याग कर गंगानदी के तट पर बैठकर क्यों आमरण उपवास करने लगे?"
नमन्ति यत्पादनिकेतमात्मन:शिवाय हानीय धनानि शत्रव: ।
कथं स वीर: श्रियमज् दुस्त्यजांयुवैषतोत्स्नष्टमहो सहासुभि: ॥
११॥
नमन्ति--झुकते हैं; यत्-पाद--जिनके पाँव के; निकेतम्--नीचे; आत्मन:-- अपने; शिवाय--कल्याण के लिए;हानीय--लाकर; धनानि--सम्पत्ति; शत्रवः--शत्रुगण; कथम्--किस कारण से; सः--वह; वीर:--वीर; ख्रियम्--ऐश्वर्य; अड़्--हे; दुस्त्यजाम्--जिसका छोड़ पाना दुष्कर है उसे; युवा--युवावस्था में; ऐषत--इच्छा की; उत्स्रष्टम्--त्याग देने के लिए; अहो--ओअरे; सह--साथ; असुभि:--जीवन केवे इतने बड़े सम्राट थे कि उनके सारे शत्रु आकर अपनी भलाई के लिए उनके चरणोंपर अपना शीश झुकाते थे और अपनी सारी सम्पत्ति अर्पित करते थे।
वे तरुण औरशक्तिशाली थे और उनके पास अलभ्य राजसी ऐश्वर्य था।
तो फिर वे अपना सर्वस्व, यहाँ तक कि अपना जीवन भी, क्यों त्यागना चाह रहे थे?"
शिवाय लोकस्य भवाय भूतयेय उत्तमश्लोकपरायणा जना: ।
जीवन्ति नात्मार्थमसौ पराश्रयंमुमोच निर्विद्य कुत: कलेवरम् ॥
१२॥
शिवाय--कल्याण हेतु; लोकस्य--समस्त जीवों के; भवाय--समुन्नति के लिए; भूतये--आर्थिक विकास के लिए;ये--जो है; उत्तम-शलोक-परायणा:-- भगवान् के कार्य के प्रति अनुरक्त; जना:--लोग; जीवन्ति--जीते हैं; न--लेकिननहीं; आत्म-अर्थम्--स्वार्थ; असौ--वह; पर-आश्रयम्-- अन्यों के लिए शरण; मुमोच--त्याग दिया; निर्विद्य--समस्तप्रकार की आसक्ति से मुक्त होकर; कुतः--किस लिए; कलेवरम्--मर्त्य शरीर को ।
जो लोग भगवत्कार्य में अनुरक्त रहते हैं, वे दूसरों के कल्याण, उन्नति तथा सुख केलिए ही जीवित रहते हैं।
वे किसी स्वार्थवश जीवित नहीं रहते।
अतएव राजा (९ परीक्षित ) नेसमस्त सांसारिक वैभव की आसक्ति से मुक्त होते हुए भी, अपने उस मर्त्य शरीर को क्योंत्यागा जो दूसरों के लिए आश्रयतुल्य था ?"
तत्सर्व न: समाचक्ष्व पृष्टो यदिह किल्लन ।
मन्ये त्वां विषये वाचां स्नातमन्यत्र छान्दसात् ॥
१३॥
'तत्--वह; सर्वम्--सारा; नः--हमसे; समाचक्ष्व--स्पष्ट कहें; पृष्ट:--प्रश्न पूछा; यत् हह--यहाँ पर; किज्लनन--वह सब;मन्ये--हम सोचते हैं; त्वामू--आपको; विषये--सारे विषयों में; वाचाम्--; स्नातमू-पूर्ण रूप से ज्ञात;अन्यत्र--छोड़कर; छान्दसात्-वेदों का अंश।
हम जानते हैं कि आप वेदों के कतिपय अंश को छोड़कर अन्य समस्त विषयों के अर्थमें पटु हैं, अतएव आप उन सरे प्रश्नों की स्पष्ट व्याख्या कर सकते हैं, जिन्हें हमने आपसे अभी पूछा है।
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सूत उवाचद्वापरे समनुप्राप्ते तृतीये युगपर्यये ।
जात: पराशराद्योगी वासव्यां कलया हरे: ॥
१४॥
सूतः उबाच--सूत गोस्वामी ने कहा; द्वापरे--द्वापर युग में; समनुप्राप्ते--आविर्भाव होने पर; तृतीये--तृतीय; युग--युग;पर्यये--के स्थान पर; जात:--प्रकट हुआ; पराशरात्--पराशर से; योगी--महान ऋषि; वासव्याम्--वसु की पुत्री केगर्भ में; कलया--पूर्ण अंश में; हरेः-- भगवान् के ॥
सूत गोस्वामी ने कहा : जिस समय द्वापर युग का त्रेता युग से अतिव्यापन हो रहा था,तो वसु की पुत्री सत्यवती के गर्भ से पराशर द्वारा महान ऋषि ( व्यासदेव ) ने जन्म लिया।
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स कदाचित्सरस्वत्या उपस्पृश्य जलं शुचि: ।
विविक्त एक आसीन उदिते रविमण्डले ॥
१५॥
सः--वे; कदाचित्--एक बार; सरस्वत्या:--सरस्वती नदी के तट पर; उपस्पृश्य--प्रातः:कालीन आचमन से निवृत्तहोकर; जलम्--जल से; शुचि:--पवित्र होकर; विविक्ते--एकाग्रता; एक:--अकेले; आसीन:--इस प्रकार बैठे हुए;उदिते--उदय होने वाले; रवि-मण्डले--सूर्य के गोले का |
एक बार सूर्योदय होते ही उन्होंने ( व्यासदेव ने ) सरस्वती के जल से प्रातःकालीनआचमन किया और मन एकाग्र करने के लिए वे एकान्त में बैठ गये।
"
परावरज्ञ: स ऋषि: कालेनाव्यक्तरंहसा ।
युगधर्मव्यतिकरं प्राप्त भुवि युगे युगे ॥
१६॥
पर-अवर--भूत तथा भविष्य का; ज्ञ:--जानने वाला; सः--वह; ऋषि: --व्यासदेव; कालेन--समय पाकर; अव्यक्त--अप्रकट; रंहसा--महान शक्ति से; युग-धर्म--युग के अनुरूप कार्य; व्यतिकरम्--विसंगतियाँ, दोष; प्राप्तम्-प्राप्त होनेपर; भुवि--पृथ्वी पर; युगे युगे--विभिन्न युगों में ।
महर्षि व्यासदेव ने युग के कर्तव्यों में विरोधाभास देखा।
कालक्रम में पृथ्वी पर अदृश्यशक्तियों के कारण विभिन्न युगों में ऐसा होता रहता है।
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भौतिकानां च भावानां शक्तिहासं च तत्कृतम् ।
अश्रद्धधानान्नि:सत्त्वान्दुर्मेधानू हसितायुष; ॥
१७॥
दुर्भगांश्व जनान् वीक्ष्य मुनिर्दिव्येन चक्षुषा ।
सर्ववर्णाश्रमाणां यद्ृध्यौ हितममोघहक् ॥
१८॥
भौतिकानाम् च--पदार्थ से निर्मित प्रत्येक वस्तु का भी; भावानाम्-कर्म; शक्ति-हासम् च--तथा प्राकृतिक शक्ति काक्षय; तत्-कृतम्--उसके द्वारा किया गया; अश्रद्दधानानू-- श्रद्धाविहीन का; निःसत्त्वानू--सतोगुण के अभाव के कारणअधीर; दुर्मेधान्--दुर्बुद्धि वाला; हसित--घटा हुआ; आयुष:--जीवन अवधि का; दुर्भगान् च--तथा अभागे; जनान्--जन सामान्य को; वीक्ष्य--देखकर; मुनि:--मुनि; दिव्येन--दिव्य; चक्षुषा--दृष्टि से; सर्व--समस्त; वर्ण-आश्रमाणाम्--जीवन के समस्त स्तरों तथा आश्रमों का; यत्--जो; दध्यौ--विचार किया; हितम्--कल्याण; अमोघ-हक्-पूर्ण ज्ञान से युक्त।
परम ज्ञानी ऋषि, अपनी दिव्य दृष्टि से, युग के प्रभाव से प्रत्येक भौतिक वस्तु कीअवनति को देख सकते थे।
वे यह भी देख सकते थे कि श्रद्धाविहीन व्यक्तियों की आयुक्षीण होगी और वे सच्चगुण के अभाव के कारण अधीर रहेंगे।
इस प्रकार उन्होंने समस्तवर्णों तथा आश्रमों के लोगों के कल्याण पर विचार किया।
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चातुर्होत्रं कर्म शुद्ध प्रजानां वीक्ष्य वैदिकम् ।
व्यदधाद्यज्ञसन्तत्यै वेदमेक॑ चतुर्विधम् ॥
१९॥
चातु:--चार; होत्रमू--यज्ञ की अग्नियाँ; कर्म शुद्धम्-कर्म की शुदर्द्धि; प्रजानामू--प्रजा का; वीक्ष्य--देखकर;वैदिकम्--वैदिक अनुष्ठानों के अनुसार; व्यदधात्--बनाया; यज्ञ--यज्ञ; सन्तत्यै--विस्तार के लिए; वेदम् एकम्--केवल एक वेद को; चतुः-विधम्--चार विभागों में ।
उन्होंने देखा कि वेदों में वर्णित यज्ञ वे साधन हैं, जिनसे लोगों की वृत्तियों को शुद्धबनाया जा सकता है।
अतः इस विधि को सरल बनाने के लिए ही उन्होंने एक ही वेद केचार भाग कर दिये, जिससे वे लोगों के बीच फैल सकें।
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ऋग्यजु:सामाथर्वाख्या वेदाश्वत्वार उद्धृता: ।
इतिहासपुराणं च पञ्ञमो वेद उच्यते ॥
२०॥
ऋग्-यजु:-साम-अथर्व-आख्या: --चार वेदों के नाम; वेदा:--वेद; चत्वार: --चार; उद्धृता:--पृथक्-पृथक् अंगों मेंबँटा; इतिहास--ऐतिहासिक प्रलेख ( महाभारत ); पुराणम् च--तथा सारे पुराण; पञ्ञम: --पाँचवा; वेद: --ज्ञान का मूलस्त्रोत; उच्यते--कहा जाता हैमूल ज्ञान के स्त्रोतों ( वेदों ) के चार पृथक् विभाग किये गये।
लेकिन पुराणों में वर्णितऐतिहासिक तथ्य तथा प्रामाणिक कथाएँ पंचम वेद कहलाती हैं।
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तत्रग्वेद्धर: पैल: सामगो जैमिनि: कवि: ।
वैशम्पायन एवैको निष्णातो यजुषामुत ॥
२१॥
तत्र--वहाँ; ऋगू-वेद-धर:--ऋग्वेद के आचार्य; पैल:--पैल नामक ऋषि; साम-ग:--सामवेद का; जैमिनि:--जैमिनिनामक ऋषि; कवि:--अत्यन्त योग्य; वैशम्पायन:--वैशम्पायन नामक ऋषि; एव--ही; एक: --अकेले; निष्णात:--पटु; यजुषाम्--यजुर्वेद के; उत--यशस्वी ।
वेदों के चार खण्डों में विभाजित हो जाने के बाद, पैल ऋषि ऋग्वेद के आचार्य बनेऔर जैमिनि साम वेद के |
यजुर्वेद के कारण एकमात्र वैशम्पायन यशस्वी हुए।
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अर्थर्वाज्विर्सामासीत्सुमन्तुर्दारुणो मुनि: ।
इतिहासपुराणानां पिता मे रोमहर्षण: ॥
२२॥
अथर्व--अथर्ववेद; अड्डिर्साम्--अंगिरा ऋषि को; आसीतू--सौंपा गया; सुमन्तु:--सुमन्तुमुनि नाम से ज्ञात; दारुण: --अथर्ववेद में गम्भीरता से संलग्न; मुनि:--मुनि; इतिहास-पुराणानामू--ऐतिहासिक प्रलेखों तथा पुराणों; पिता--पिता;मे--मेरा; रोमहर्षण: --ऋषि रोमहर्षण ।
अत्यन्त अनुरक्त रहने वाले सुमन्तु मुनि अंगिरा को अथर्ववेद सौंपा गया और मेरे पितारोमहर्षण को प्राण तथा इतिहास सौंपे गये।
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त एत ऋषयो वेदं स्व स्व॑ं व्यस्यन्ननेकधा ।
शिष्यै: प्रशिष्यैस्तच्छिष्यैर्वेदास्ते शाखिनो भवन् ॥
२३॥
ते--वे; एते--ये सब; ऋषय: --विद्वान; वेदम्--विभिन्न वेदों को; स्वम् स्वम्--अपने अपने विषयों के; व्यस्यनू--प्रस्तुतकिया; अनेकधा--अनेक; शिष्यै:--शिष्य; प्रशिष्यै:--शिष्यों के शिष्य; तत्-शिष्यै:--उनके भी शिष्यों द्वारा; वेदाःते--उन वेदों के अनुयायी; शाखिन:--विभिन्न शाखाएँ; अभवनू--इस प्रकार बनीं |
इन सब विद्वानों ने अपनी पारी में, उन्हें सौंपे गये वेदों को अपने अनेक शिणष्यों, प्रशिष्योंतथा उनके भी शिष्यों को प्रदान किया और इस प्रकार वेदों के अनुयायियों की अपनी-अपनी शाखाएँ बनीं।
"
त एव वेदा दुर्मेधेर्धार्यन्ते पुरुषर्यथा ।
एवं चकार भगवान् व्यास: कृपणवत्सल: ॥
२४॥
ते--वे; एव--निश्चय ही; वेदा:--ज्ञान के ग्रंथ; दुर्मेधेः --अल्पज्ञों द्वारा; धार्यन्ते--धारण किये जाते हैं; पुरुषैः--मनुष्यद्वारा; यथा--जिस तरह; एवम्--इस प्रकार; चकार--संकलित किया; भगवान्--शक्तिशाली; व्यास: --व्यास मुनि ने;कृपण-वत्सल:--अज्ञानी जनता के प्रति दयालु।
इस प्रकार, अज्ञानी जनसमूह पर अत्यन्त कृपालु ऋषि व्यासदेव ने वेदों का संकलनकिया, जिससे कम ज्ञानी पुरुष भी उनको आत्मसात् कर सकें।
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स्त्रीशूद्रद्विजबन्धूनां त्रयी न श्रुतिगोचरा ।
कर्मश्रेयसि मूढानां श्रेय एवं भवेदिह ।
इति भारतमाख्यानं कृपया मुनिना कृतम् ॥
२५॥
स्त्री--स्त्री वर्ग; शूद्र-- श्रमिक वर्ग; द्विज-बन्धूनाम्--द्विजों के मित्रों का; त्रयी--तीन; न--नहीं; श्रुति-गोचरा--समझनेके लिए; कर्म--कर्म में; श्रेयसि--कल्याण में; मूढानाम्--मूर्खो का; श्रेय:--परम लाभ; एवम्--इस प्रकार; भवेत्--प्राप्त किया; इह--इससे; इति--इस प्रकार सोचकर; भारतम्--महाभारत; आख्यानम्--ऐतिहासिक तथ्य; कृपया--महत अनुकम्पावश; मुनिना--मुनि द्वारा; कृतम्-पूरा हुआ है।
महर्षि ने अनुकम्पावश हितकर समझा कि यह मनुष्यों को जीवन का चरम लक्ष्य प्राप्तकरने में यह सहायक होगा।
इस प्रकार उन्होंने स्त्रियों, शूद्रों तथा द्विज-बन्धुओं के लिएमहाभारत नामक महान ऐतिहासिक कथा का संकलन किया।
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एवं प्रवृत्तस्य सदा भूतानां श्रेयसि द्विजा: ।
सर्वात्मकेनापि यदा नातुष्यद्धूदयं ततः ॥
२६॥
एवम्--इस प्रकार; प्रवृत्तस्य--संलग्न रहने वाले का; सदा--सदैव; भूतानाम्--जीवों का; श्रेयसि--कल्याण में;द्विजा:--हे द्विजो; सर्वात्मकेन अपि--सभी प्रकार से; यदा--जब; न--नहीं; अतुष्यत्--तुष्ट हो गया; हृदयम्--मन;ततः--उस समय ।
हे द्विज ब्राह्मणो, यद्यपि वे समस्त लोगों के समग्र कल्याण कार्य में लगे रहे, तो भीउनका मन भरा नहीं।
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नातिप्रसीदद्धृदय: सरस्वत्यास्तटे शुचौ ।
वितर्कयन् विविक्तस्थ इदं चोवाच धर्मवित् ॥
२७॥
न--नहीं; अतिप्रसीदत्-- अत्यधिक तुष्ट; हृदयः--हृदय में; सरस्वत्या:--सरस्वती नदी के; तटे--किनारे; शुचचौ --पवित्र;वितर्कयन्--विचार करके; विविक्त-स्थ:--एकान्त में स्थित; इृदम् च--यह भी; उबाच--कहा; धर्म-वित्-- धर्म काज्ञाता)इस प्रकार मन में असंतुष्ट रहते हुए ऋषि ने तुरन्त विचार करना प्रारम्भ कर दिया,क्योंकि वे धर्म के सार के ज्ञाता और मन ही मन कहा :" धृतब्रतेन हि मया छन्दांसि गुरवोग्नय: ।
मानिता निर्व्यलीकेन गृहीतं चानुशासनम् ॥
२८ ॥
भारतव्यपदेशेन ह्ाम्नायार्थश्न प्रदर्शित: ।
हृश्यते यत्र धर्मादि सत्रीशूद्रादिभिरप्युत ॥
२९॥
धृत-ब्रतेन--कठिन ब्रत करते हुए; हि--निश्चय ही; मया--मेरे द्वारा; छन्दांसि--वैदिक मन्त्र; गुरव:--गुरुजन;अग्नय:--यज्ञ की अग्नि; मानिता:--भलीभाँति पूजित; निर्व्यलीकेन--किसी छटद्म से रहित; गृहीतम् च--तथा स्वीकृत;अनुशासनम्--पारम्परिक अनुशासन; भारत--महा भारत के; व्यपदेशेन--संकलन से; हि--निश्चय ही; आम्नाय-अर्थ:--शिष्य-परम्परा की अभिव्यक्ति; च--तथा; प्रदर्शित:--ठीक प्रकार से कहा गया; दहृश्यते--जो आवश्यक है, उससे; यत्र--जहाँ; धर्म-आदिः--धर्म का मार्ग; स्त्री-शूद्र-आदिभि: अपि--यहाँ तक कि स्त्रियों, शूद्रों आदि के द्वारा; उत--कहा गया।
मैंने कठिन ब्रतों का पालन करते हुए वेदों की, गुरु की तथा यज्ञ वेदी की मिथ्याडम्बरके बिना पूजा की है।
मैंने अनुशासन का भी पालन किया है और महाभारत की व्याख्या केमाध्यम से शिष्य-परम्परा को अभिव्यक्ति दी है, जिससे स्त्रियाँ, शूद्र तथा अन्य ( द्विजबन्धु )लोग भी धर्म के मार्ग का अवलोकन कर सकते हैं।
"
तथापि बत मे दैद्यो द्यात्मा चैवात्मना विभु: ।
असम्पन्न इवाभाति ब्रह्मवर्चस्य सत्तम: ॥
३०॥
तथापि--यद्यपि; बत--दोष; मे--मेरा; दैह्य:--शरीर में स्थित; हि--निश्चय ही; आत्मा--जीव; च--तथा; एव-- भी;आत्मना--अपने से; विभु:--पर्याप्त; असम्पन्न:--विहीन; इब आभाति--प्रतीत होता है; ब्रह्म-वर्चस्थ--वेदान्तियों का;सत्तम:--परम |
वेदों के लिए जितनी बातों की आवश्यकता है, यद्यपि मैं उनसे पूर्णरूप से सज्जित हूँ,तथापि मैं अपूर्णता का अनुभव कर रहा हूँ।
"
कि वा भागवता धर्मा न प्रायेण निरूपिता: ।
प्रिया: परमहंसानां त एव ह्यच्युतप्रिया: ॥
३१॥
किम् वा--अथवा; भागवता: धर्मा:--जीवों के भक्ति-कार्य; न--नहीं; प्रायेण--प्राय:; निरूपिता: --संकेत किया;प्रिया:--प्रिय; परमहंसानामू--सिद्ध पुरुषों का; ते एब--वे भी; हि--निश्चय ही; अच्युत-- अचूक; प्रिया:--आकर्षक |
हो सकता है कि मैंने भगवान् की भक्ति का विशेष रूप से कोई संकेत न किया हो,जो सिद्ध जीवों तथा अच्युत भगवान् दोनों को प्रिय है।
"
तस्यैवं खिलमात्मानं मन्यमानस्य खिद्यत: ।
कृष्णस्य नारदोभ्यागादाश्रमं प्रागुदाह॒तम् ॥
३२ ॥
तस्य--उसका; एवम्--इस प्रकार; खिलम्--अपरा; आत्मानम्--आत्मा; मन्यमानस्य--मन के भीतर सोचते हुए;खिद्यत:--पश्चात्ताप करते; कृष्णस्य--कृष्ण द्वैपायन व्यास का; नारद: अभ्यागात्--नारद का आगमन हुआ;आश्रमम्--कुटिया में; प्राकु--पहले; उदाहतम्--कहा गया।
जैसा कि पहले कहा जा चुका है, जब व्यासदेव अपने दोषों के विषय में पश्चात्ताप कररहे थे, उसी समय सरस्वती नदी के तट पर स्थित कृष्णद्वैपायन व्यास की कुटिया में नारदजी पधारे।
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तमभिज्ञाय सहसा प्रत्युत्थायागतं मुनि: ।
पूजयामास विधिवज्नारदं सुरपूजितम् ॥
३३॥
तम् अभिज्ञाय--उनके ( नारद के ) शुभ आगमन को देखकर; सहसा--एकाएक; प्रत्युत्थाय--उठकर; आगतम्--आयेहुए; मुनिः--व्यासदेव ने; पूजयाम् आस--पूजा; विधि-वत्--विधि ( ब्रह्मा ) को प्रदान किये जाने वाले सम्मान के साथ;नारदम्--नारद को; सुर-पूजितम्--देवताओं द्वारा पूजित |
श्री नारद के शुभागमन पर श्री व्यासदेव सम्मानपूर्वक उठकर खड़े हो गये और उन्होंनेसृष्ठा ब्रह्म जी के समान उनकी पूजा की।
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