← श्रीमद्भागवतम् स्कन्ध 1 की सूची
अध्याय पाँच: व्यासदेव के लिए श्रीमद्भागवत पर नारद के निर्देश
1.5सूत उवाचअथ तं सुखमासीन उपासीनं बृहच्छुवा: ।
देवर्षि: प्राह विप्रर्षिवीणापाणि: स्मयज्निव ॥
१॥
सूतः उबाच--सूतजी ने कहा; अथ--अतएव; तम्--उसको; सुखम् आसीन:--सुखपूर्वक बैठे हुए; उपासीनम्--पासबैठे हुए को; बृहत्-श्रवा:--अत्यन्त सम्मानित; देवर्षि:--देवताओं के परम ऋषि ने; प्राह--कहा; विप्रर्षिम्--ब्राह्मणों केऋषि ( ब्रह्मर्षि ) से; वीणा-पाणि:--हाथ में वीणा लिए; स्मयन् इब--मानो हँसते हुए।
सूत गोस्वामी ने कहा: इस तरह देवर्षि ( नारद ) सुखपूर्वक बैठ गये और मानोमुस्कराते हुए ब्रह्मर्षि ( व्यासदेव ) को सम्बोधित किया।
"
नारद उवाचपाराशर्य महाभाग भवत: कच्चिदात्मना ।
परितुष्यति शारीर आत्मा मानस एव वा ॥
२॥
नारदः उवाच--नारद ने कहा; पाराशर्य --हे पराशर-पुत्र; महा-भाग--परम भाग्यशाली; भवत:--आपका; कच्चित्--यदि यह है; आत्मना--आत्म-साक्षात्कार से; परितुष्यति--तुष्टि होती है; शारीर:--शरीर की पहचान; आत्मा--स्व;मानस:--मन की पहचान; एव--निश्चय ही; वा--तथा।
व्यासदेव को पराशर पुत्र, सम्बोधित करते हुए नारद ने पूछा : क्या तुम मन या शरीरको आत्म-साक्षात्कार का लक्ष्य मान कर सन्तुष्ट हो ?"
जिज्ञासितं सुसम्पन्नमपि ते महदद्धुतम् ।
कृतवान् भारत॑ यस्त्वं सर्वार्थपरिबृंहितम् ॥
३॥
जिज्ञासितम्-पूर्ण रूप से पूछा गया; सुसम्पन्नम्--पदटु, दक्ष; अपि--होने पर भी; ते--तुम्हारा; महत्-अद्भुतम्--महानतथा अद्भुत; कृतवान्--तैयार किया; भारतम्--महाभारत; यः त्वम्--जो तुमने किया है; सर्व-अर्थ--सम्पूर्ण फलोंसहित; परिबृंहितम्--विस्तार से व्याख्या की गईतुम्हारी जिज्ञासाएँ पूर्ण हैं और तुम्हारा अध्ययन भी भलीभाँति पूरा हो चुका है।
इसमें संदेह नहीं कि तुमने एक महान् एवं अद्भुत ग्रंथ महाभारत तैयार किया है, जो सभी प्रकारके वैदिक फलों ( पुरुषार्थों ) की विशद व्याख्या से युक्त है।
"
जिज्ञासितमधीतं च ब्रह्म यत्तत्सनातनम् ।
तथापि शोचस्यात्मानमकृतार्थ इव प्रभो ॥
४॥
जिज्ञासितम्--पूर्ण रूप से विचारा हुआ; अधीतमू-प्राप्त ज्ञान; च--तथा; ब्रह्म--परम, ब्रह्म; यत्--जो; तत्--उस;सनातनमू्--शाश्वत को; तथापि--फिर भी; शोचसि--पश्चात्ताप करते हो; आत्मानम्--अपने आपको; अकृत-अर्थ:--व्यर्थ; इब--सहश; प्रभो--हे महाशय।
तुमने निराकार ब्रह्म विषयक एवं उससे प्राप्त होने वाले ज्ञान को भलीभाँति लिपिबद्धकिया है।
तो इतना सब होते हुए, हे मेरे प्रभु,अपने को व्यर्थ समझ कर हताश होने की क्याबात है?व्यास उवाचअस्त्येव मे सर्वमिदं त्वयोक्तंतथापि नात्मा परितुष्यते मे ।
"
व्यास उवाचअस्त्येव मे सर्वमिदं त्वयोक्तं तथापि नात्मा परितुष्यते मे ।
तन्मूलमव्यक्तमगाधबोधं पृच्छामहे त्वात्मभवात्मभूतम् ॥
५॥
व्यास:--व्यास ने; उवाच--कहा; अस्ति-- है; एव--निश्चय ही; मे--मेरा; सर्वम्--समस्त; इृदम्--यह; त्ववा-- आपकेद्वारा; उक्तमू--कहा गया; तथापि--फिर भी; न--नहीं; आत्मा--आत्मा; परितुष्यते--संतुष्ट करता है; मे--मुझको;तत्--जिसका; मूलमू--जड़; अव्यक्तम्--अहृश्य; अगाध-बोधम्-- अगाध ज्ञान वाला मनुष्य; पृच्छामहे--पूछता हूँ;त्वा--आपसे; आत्म-भव--स्वतः उत्पन्न; आत्म-भूतम्--सन्तानश्री व्यासदेव ने कहा : आपने मेरे विषय में जो कुछ कहा, वह सब सही है।
इन सब केबावजूद मैं संतुष्ट नहीं हूँ।
अतएव मैं आपसे अपने असंतोष के मूल कारण के विषय में पूछरहा हूँ, क्योंकि आप स्वयंभू ( बिना भौतिक माता पिता के उत्पन्न ब्रह्मा ) की सन्तान होनेके कारण अगाध ज्ञान से युक्त व्यक्ति हैं।
"
स वै भवान् वेद समस्तगुह्य-मुपासितो यत्पुरुष: पुराण: ।
परावरेशो मनसैव विश्वसृजत्यवत्यत्ति गुणैरसड़र: ॥
६॥
सः--इस तरह; बै--निश्चय ही; भवानू--आप; वेद--जानते हैं; समस्त--समग्र; गुह्ममू--गोपनीय; उपासितः --पूजित;यत्--क्योंकि; पुरुष:-- भगवान्; पुराण: -- प्राचीन तम्, पुरातन; परावरेश: -- भौतिक तथा आध्यात्मिक जगतों केनियन्ता; मनसा--मन से; एव--केवल; विश्वम्--ब्रह्मण्ड को; सृजति--उत्पन्न करते हैं; अवति अत्ति--संहार करते हैं;गुणैः--गुणात्मक पदार्थ से; असड्भरः--निर्लिप्तहे प्रभो, जो कुछ भी गोपनीय है वह आपको ज्ञात है, क्योंकि आप भौतिक जगत केसृष्ठा तथा संहारक एवं आध्यात्मिक जगत के पालक आदि भगवान् की पूजा करते हैं जोभौतिक प्रकृति के तीनों गुणों से परे हैं।
"
मन्तश्वरो वायुरिवात्मसाक्षी ।
परावरे ब्रह्मणि धर्मतो ब्रतैःस्नातस्य मे न्यूनमलं विचक्ष्व ॥
७॥
त्वमू--आप; पर्यटन्--विचरण करते हुए; अर्क:--सूर्य; इब--सहृश; त्रि-लोकीम्--तीनों लोकों में; अन्त:-चरः --प्रत्येक व्यक्ति के हृदय में प्रवेश करने वाले; वायु: इब--सर्वव्यापी वायु की भाँति; आत्म--स्वरूपसिद्ध; साक्षी--गवाह;परावरे--कार्य तथा कारण के मामले में; ब्रह्मणि--ब्रह्म में; धर्मतः--अनुशासन सम्बन्धी नियमों के अन्तर्गत; ब्रतैः--ब्रतमें; स्नातस्थ--लीन रहने वाले; मे--मेरा; न्यूनमू--कमी, दोष; अलमू्--स्पष्ट रूप से; विचक्ष्व--खोज निकालेंआप सूर्य के समान तीनों लोकों में विचरण कर सकते हैं और वायु के समान प्रत्येकव्यक्ति के अन्दर प्रवेश कर सकते हैं।
इसलिए आप सर्वव्यापी परमात्मा के तुल्य हैं।
अतःआपसे प्रार्थना है कि नियमों तथा ब्रतों का पालन करते हुए दिव्यता में लीन रहने पर भीमुझमें जो कमी हो, उसे खोज निकालें।
"
श्रीनारद उवाचभवतानुदितप्रायं यशो भगवतोमलम् ।
येनैवासौ न तुष्येत मन्ये तदर्शनें खिलम् ॥
८॥
श्री-नारद: उबाच-- श्री नारद ने कहा; भवता--तुम्हारे द्वारा; अनुदित-प्रायम्--प्रायः अप्रशंसित; यश: --महिमा;भगवतः--भगवान् की; अमलमू--निष्कलंक, निर्मल; येन--जिससे; एव--निश्चय ही; असौ--वे ( भगवान् ); न--नहीं; तुष्पेत--प्रसन्न होता; मन्ये--मैं सोचता हूँ; तत्--उस; दर्शनमू--दर्शन को; खिलमू--निम्न ।
श्री नारद ने कहा : वास्तव में तुमने भगवान् की अलौकिक तथा निर्मल महिमा का प्रसार नहीं किया।
जो दर्शन ( शास्त्र ) परमेश्वर की दिव्य इन्द्रियों को तुष्ट नहीं कर पाता, वह व्यर्थ समझा जाता है।
"
यथा धर्मादयश्चार्था मुनिवर्यानुकीर्तिता: ।
न तथा वासुदेवस्य महिमा ह्ानुवर्णित: ॥
९॥
यथा--जिस प्रकार; धर्म-आदय:--धार्मिक आचरण के चारों नियम; च--तथा; अर्था:--प्रयोजन; मुनि-वर्य--मुनियोंमें श्रेष्ठ, तुम्हारे द्वारा; अनुकीर्तिता:--बारम्बार वर्णित; न--नहीं; तथा--उसी प्रकार; वासुदेवस्थ-- भगवान् श्रीकृष्ण का;महिमा--यश; हि--निश्चय ही; अनुवर्णित:--इस प्रकार से निरन्तर वर्णित ।
हे महामुनि, यद्यपि आपने धार्मिक कृत्य इत्यादि चार पुरुषार्थों का विस्तार से वर्णनकिया है, किन्तु आपने भगवान् वासुदेव की महिमा का वर्णन नहीं किया है।
"
न यद्वचश्चित्रपदं हरेर्यशोजगत्पवित्र प्रगूणीत कहिंचित् ।
तद्बायसं तीर्थमुशन्ति मानसान यत्र हंसा निरमन्त्युशिकक्षया: ॥
१०॥
न--नहीं; यत्--वह; बच: --वाणी; चित्र-पदम्-- अलंकारिक; हरेः-- भगवान् का; यश: --महिमा; जगत्--ब्रह्माण्ड;पवित्रम्--पवित्र; प्रगूणीत--वर्णित; कहिंचित्--मुश्किल से; तत्--उस; वायसम्--कौवे को; तीर्थम्-तीर्थ-स्थान;उशन्ति--सोचते हैं; मानसा:--साधु पुरुष; न--नहीं; यत्र--जहाँ; हंसा:--परमहंस पुरुष; निरमन्ति-- आनन्द लेते हैं;उशिक्-क्षया:--दिव्य धाम के वासी।
जो वाणी सम्पूर्ण ब्रह्माण्ड के वायुमण्डल को परिशुद्ध करने वाले भगवान् की महिमाका वर्णन नहीं करती, उसे साधु पुरुष कौवों के स्थान के समान मानते हैं।
चूँकि परमहंसपुरुष दिव्य लोक के वासी होते हैं, अतः उन्हें ऐसे स्थान में कोई आनन्द नहीं मिलता।
"
तद्बाग्विसों जनताघविप्लवोयस्मिन् प्रतिश्लोकमबद्धवत्यपि ।
नामान्यनन्तस्य यशोड्डलितानि यत्श्रण्वन्ति गायन्ति गृणन्ति साधव: ॥
११॥
तत्--उस; वाक्--वाणी; विसर्ग:--सृष्टि; जनता--जनसामान्य; अघध--पाप; विप्लव:--क्रान्तिकारी; यस्मिन्--जिसमें;प्रति-शलोकम्--प्रत्येक श्लोक; अबद्धवति-- अनियमित रूप से रचा गया; अपि--होते हुए भी; नामानि--दिव्य नामआदि; अनन्तस्थ--असीम भगवान् के; यशः--महिमा; अड्डितानि--चित्रित; यत्--जो; श्रृण्वन्ति--सुनते हैं; गायन्ति--गाते हैं; गृणन्ति--स्वीकार करते हैं; साधव:--शुद्ध मनुष्य जो निष्ठावान हैं।
दूसरी ओर, जो साहित्य असीम परमेश्वर के नाम, यश, रूपों तथा लीलाओं की दिव्यमहिमा के वर्णन से पूर्ण है, वह कुछ भिन्न ही रचना है जो इस जगत की गुमराह सभ्यता केअपवित्र जीवन में क्रान्ति लाने वाले दिव्य शब्दों से ओतप्रोत है।
ऐसा दिव्य साहित्य, चाहेवह ठीक से न भी रचा हुआ हो, ऐसे पवित्र मनुष्यों द्वारा सुना, गाया तथा स्वीकार कियाजाता है, जो नितान्त निष्कपट होते हैं।
"
नैष्कर्म्यमप्यच्युतभाववर्जितंन शोभते ज्ञानमलं निरझ्ञनम् ।
कुतः पुनः शश्वदभद्रमी श्वरेन चार्पितं कर्म यदप्यकारणम् ॥
१२॥
नैष्कर्म्यममू--आत्म-साक्षात्कार ( सकाम कर्मो के बन्धन से मुक्त होकर ); अपि--के बावजूद; अच्युत--अमोघ भगवान्हभाव--विचार; वर्जितम्--विहीन, से रहित; न--नहीं; शोभते-- अच्छा लगता है; ज्ञानम्--दिव्य ज्ञान; अलमू्-- धीरेधीरे; निरज्ननम्--उपाधियों से रहित; कुतः--कहाँ है; पुन:--फिर; शश्वत्--निरन्तर; अभद्रमू-- अहितकर, अशुभ;ईश्वेर--ईश्वर के प्रति; न--नहीं; च--तथा; अर्पितमू--अर्पित किया हुआ; कर्म--कर्म; यत् अपि--जो है; अकारणम्--निष्काम ।
आत्म-साक्षात्कार का ज्ञान समस्त भौतिक आसक्ति से रहित होने पर भी शोभा नहींदेता यदि वह अच्युत (ईश्वर ) के भाव से शून्य हो।
तो फिर उन सकाम कर्मों से क्या लाभहै, यदि वे भगवान् की भक्ति के लिए काम न आ सकें और जो स्वभावतः प्रारम्भ से हीदुखप्रद तथा क्षणिक होते है ?"
अथो महाभाग भवानमोघहक्शुचिश्रवा: सत्यरतो धृतब्रत: ।
उरुक्रमस्याखिलबन्धमुक्तयेसमाधिनानुस्मर तद्ठिचेष्टितम् ॥
१३॥
अथो--अतः; महा-भाग--परम भाग्यशाली; भवान्--आप; अमोघ-हक्--सिद्ध दृष्टा; शुचि-- पवित्र, निर्मल; श्रवा:--प्रसिद्ध; सत्य-रत:--सत्य ब्रत को पालने वाला; धृत-ब्रत:--आध्यात्मिक गुणों में स्थित; उरुक्रमस्थ--अलौकिक कार्यकरनेवाले ( ईश्वर ) का; अखिल--सम्पूर्ण जगत का; बन्ध--बन्धन; मुक्तये--मुक्ति के लिए; समाधिना--समाधि केद्वारा; अनुस्मर--बारम्बार सोच कर वर्णन करो; ततू-विचेष्टितम्--भगवान् की विविध लीलाओं को |
हे व्यासदेव, तुम्हारी दृष्टि सभी तरह से पूर्ण है।
तुम्हारी उत्तम ख्याति निष्कलुष है।
तुमअपने ब्रत में हढ़ हो और सत्य में स्थित हो।
अतएवं तुम समस्त लोगों को भौतिक बन्धन सेमुक्ति दिलाने के लिए भगवान् की लीलाओं के विषय में समाधि के द्वारा चिन्तन कर सकतेहो।
"
ततो&न्यथा किद्ञन यद्ठिवक्षत: पृथग्दृशस्तत्कृतरूपनामभि: ।
न कर्चिचित्क्रापि च दुःस्थिता मति-लभेत वाताहतनौरिवास्पदम् ॥
१४॥
ततः--उससे; अन्यथा--पृथक्; किल्नन--कुछ; यत्--जो भी; विवक्षत:--वर्णन करने के लिए इच्छुक; पृथक्--अलगसे; दृश:--दृष्टि; तत्-कृत--उसकी प्रतिक्रिया; रूप--रूप; नामभि:--नामों से; न कर्हिंचित्ू-- कभी नहीं; क्रापि--कोई; च--तथा; दुःस्थिता मति:--दोलायमान मन; लभेत--प्राप्त करता है; वात-आहत--वायु से प्रताड़ित; नौ: --नाव; इब--सहश; आस्पदम्-स्थान।
तुम भगवान् के अतिरिक्त विभिन्न रूपों, नामों तथा परिणामों के रूप में जो कुछ भीवर्णन करना चाहते हो, वह प्रतिक्रिया द्वारा मन को उसी प्रकार आंदोलित करने वाला है,जिस प्रकार आश्रय विहीन नाव को चक्रवात आंदोलित करता है।
"
जुगुप्सितं धर्मकृतेडनुशासतःस्वभावरक्तस्य महान् व्यतिक्रम: ।
यद्वाक्यतो धर्म इतीतर: स्थितोन मन्यते तस्य निवारणं जन: ॥
१५॥
जुगुप्सितम्--अत्यन्त घृणित; धर्म-कृते--धर्म हेतु; अनुशासतः--आदेश के अनुसार; स्वभाव-रक्तस्थ--स्वभाव सेअनुरक्त; महानू--महान; व्यतिक्रम:--अनुचित; यत्-वाक्यत:--जिसके उपदेश से; धर्म:--धर्म; इति--इस प्रकार है;इतरः--जन-सामान्य; स्थित:--स्थिर; न--नहीं; मन्यते--सोचते हैं; तस्य--उसका; निवारणम्--निषेध; जन:--वेलोगसामान्य लोगों में भोग करने की स्वाभाविक प्रवृत्ति होती है और तुमने धर्म के नाम परउन्हें वैसा करते रहने के लिए प्रोत्साहित किया है।
यह अत्यन्त घृणित तथा अत्यन्त अनुचितहै।
चूँकि वे लोग तुम्हारे उपदेशों के अनुसार मार्गदर्शन प्राप्त करते हैं, अतः वे ऐसे कार्योंको धर्म के नाम पर ग्रहण करेंगे और निषेधों की भी परवाह नहीं करेंगे।
"
विचक्षणो स्याहति वेदितुं विभो-रनन्तपारस्य निवृत्तित: सुखम् ।
प्रवर्तमानस्य गुणैरनात्मन-स्ततो भवान्दर्शय चेष्टितं विभो: ॥
१६॥
विचक्षण:--अत्यन्त पटु; अस्य--उसका; अहति--के योग्य है; वेदितुमू--जानने के लिए; विभो:-- भगवान् का;अनन्त-पारस्थ--असीम का; निवृत्तित:--से निवृत्त; सुखम्-- भौतिक सुख; प्रवर्तमानस्य--अनुरक्तों का; गुणै:--भौतिक गुणों से; अनात्मन:--आध्यात्मिक ज्ञान से शून्य; ततः--अतः; भवान्--आप; दर्शय--मार्गदर्शन करें;चेष्टितम्--कार्यकलाप; विभो: -- भगवान् के ॥
भगवान् असीम हैं।
केवल वही निपुण व्यक्ति इस आध्यात्मिक ज्ञान को समझने केलिए योग्य है, जो भौतिक सुख के कार्यकलापों से विरक्त हो चुका हो।
अतः जो लोगभौतिक आसक्ति के कारण सुस्थापित नहीं हैं, उन्हीं को तुम परमेश्वर के दिव्य कार्यों केवर्णनों के माध्यम से दिव्य अनुभूति की विधियाँ दिखलाओ।
"
त्यक्त्वा स्वधर्म चरणाम्बुजं हरे-भजन्नपक्को थ पतेत्ततो यदि ।
यत्र क्व वाभद्रमभूदमुष्य किको वार्थ आप्तो भजतां स्वधर्मत: ॥
१७॥
त्यक्त्वा--त्याग कर; स्व-धर्मम्--अपने वृत्तिपरक कार्य को; चरण-अम्बुजमू--चरणकमल; हरे: --हरि ( भगवान् ) के;भजनू--भक्ति के दौरान; अपक्र:--कच्ची, अप्रौड; अथ--के लिए; पतेत्--गिरता है; ततः--उस स्थान से; यदि--यदि; यत्र--जहाँ; क्क--किस तरह का; वा--या ( व्यंग्य से ); अभद्रमू--प्रतिकूल; अभूत्--होगा; अमुष्य--उसका;किमू--कुछ नहीं; कः वा अर्थ:--क्या लाभ है; आप्त: --प्राप्त किया हुआ; अभजताम्--अभक्तों का; स्व-धर्मत:--अपनी वृत्ति में लगे रह कर।
जिसने भगवान् की भक्तिमय सेवा में प्रवृत्त होने के लिए अपनी भौतिक वृत्तियों कोत्याग दिया है, वह कभी-कभी कच्ची अवस्था में नीचे गिर सकता है, तो भी उसकेअसफल होने का कोई खतरा नहीं रहता।
इसके विपरीत, अभक्त, चाहे अपनी वृत्तियों( कर्तव्यों ) में पूर्ण रूप से रत क्यों न हो, उसे कुछ भी लाभ नहीं होता।
"
तस्यैव हेतो: प्रयतेत कोविदोन लभ्यते यद्भ्रमतामुपर्यध: ।
तललभ्यते दु:खवदन्यत: सुखकालेन सर्वत्र गभीररंहसा ॥
१८॥
तस्य--उसी; एव--केवल; हेतो: --कारण का; प्रयतेत--प्रयत्त करना चाहिए; कोविद:--आध्यात्मिक रूप से प्रवृत्त;न--नहीं; लभ्यते--मिलता है; यत्--जो; भ्रमताम्--विचरण करते हुए; उपरि अध:--ऊपर से नीचे तक; तत्--वह;लभ्यते--प्राप्त किया जा सकता है; दुःखवत्--दुखों के समान; अन्यतः--पूर्व कर्म के कारण; सुखम्--इन्द्रिय-भोग;कालेन--समय के साथ; सर्वत्र--सभी जगह; गभीर--सूक्ष्म; रंहसा--उन्नति प्रगतिजो व्यक्ति वास्तव में बुद्धिमान तथा तत्वज्ञान में रूचि रखने वाले हैं, उन्हें चाहिए कि वेउस सार्थक अन्त के लिए ही प्रयत्त करें, जो उच्चतम लोक ( ब्रह्मलोक ) से लेकर निम्नतमलोक ( पाताल ) तक विचरण करने से भी प्राप्य नहीं है।
जहाँ तक इन्द्रिय-भोग से प्राप्तहोने वाले सुख की बात है, यह तो कालक्रम से स्वत: प्राप्त होता है, जिस प्रकार हमारे नचाहने पर भी हमें दुख मिलते रहते हैं।
"
न वै जनो जातु कथबझ्ञनात्रजे-न्मुकुन्दसेव्यन्यवदड़ संसृतिम् ।
स्मरन्मुकुन्दाड्घ्य्रुपगूहनं पुन-विंहातुमिच्छेन्न रसग्रहो जन: ॥
१९॥
न--कभी नहीं; वै--निश्चय ही; जनः--व्यक्ति; जातु--किसी समय; कथज्लन--किसी तरह; आब्रजेत्--नहीं आता;मुकुन्द-सेवी-- भगवान् का भक्त; अन्यवत्--अन्यों की तरह; अड्ड--हे प्रिय; संसतिमू-- भौतिक जगत; स्मरन्--स्मरणकरते हुए; मुकुन्द-अड्धप्रि-- भगवान् के चरणकमल; उपगूहनम्--घूमते हुए; पुन:--फिर; विहातुम्--त्यागने की इच्छासे; इच्छेत्--इच्छा; न--कभी नहीं; रस-ग्रह:--जिसने रसास्वादन किया है; जनः--व्यक्ति
हे प्रिय व्यासयद्यपि भगवान् कृष्ण का भक्त भी कभी-कभी, किसी न किसी कारणसे नीचे गिर जाता है, लेकिन उसे दूसरों ( सकाम कर्मियों आदि ) की तरह भव-चक्र मेंनहीं आना पड़ता, क्योंकि जिस व्यक्ति ने भगवान् के चरणकमलों का आस्वादन एक बारकिया है, वह उस आनन्द को पुनः पुनः स्मरण करने के अतिरिक्त और कुछ नहीं कर सकता।
"
इदं हि विश्व भगवानिवेतरोयतो जगत्स्थाननिरोधसम्भवा: ।
तद्धि स्वयं वेद भवांस्तथापि तेप्रादेशमात्रं भवत: प्रदर्शितम् ॥
२०॥
इदम्--यह; हि--सम्पूर्ण; विश्वम्-विश्व; भगवान्-- भगवान्; इब-- प्रायः वैसा ही; इतर:--ऊपर से भिन्न; यतः--जिससे; जगत्--संसार; स्थान--अवस्थित हैं; निरोध--संहार; सम्भवा:--उत्पत्ति; तत् हि--विषयक; स्वयम्-- अपनेआप; वेद--जानो; भवान्--आप; तथा अपि--फिर भी; ते--तुमको; प्रादेश-मात्रमू--मात्र सारांश; भवत:--तुमको;प्रदर्शितम्--बताया गया।
पूर्ण पुरुषोत्तम भगवान् स्वयं विश्व स्वरूप हैं तथापि उससे निर्लिप्त भी हैं।
उन्हीं से यहहृश्य जगत उत्पन्न हुआ है, उन्हीं पर टिका है और संहार के बाद उन्हीं में प्रवेश करता है।
तुम इस सबके विषय में जानते हो।
मैंने तो केवल सारांश भर प्रस्तुत किया है।
"
त्वमात्मनात्मानमवेह्ममोघहक्परस्य पुंस: परमात्मन: कलाम ।
अजं प्रजातं जगत: शिवाय त-न्महानुभावाभ्युदयोधिगण्यताम् ॥
२१॥
त्वमू--तुम; आत्मना--अपने आप से; आत्मानम्-- भगवान् को; अवेहि--ढूँढो; अमोघ-हक्--पूर्ण दृष्टि वाला; परस्थ--अध्यात्म का; पुंसः-- भगवान्; परमात्मन: --परमात्मा का; कलाम्--अंश; अजम्--अजन्मा; प्रजातम्--जन्म लियागया; जगत:--संसार के; शिवाय--कल्याण के लिए; तत्--उस; महा-अनुभाव-पूर्ण पुरुषोत्तम भगवान् श्रीकृष्ण की;अभ्युदयः--लीलाएँ; अधिगण्य-ताम्--विस्तार से बताओ।
तुममें पूर्ण दृष्टि है।
तुम पूर्ण पुरुषोत्तम भगवान् को जान सकते हो, क्योंकि तुमभगवान् के अंश के रूप में विद्यमान हो।
यद्यपि तुम अजन्मा हो, लेकिन समस्त लोगों केकल्याण हेतु इस पृथ्वी पर प्रकट हुए हो।
अतः भगवान् श्रीकृष्ण की लीलाओं का अधिकविस्तार से वर्णन करो।
"
इदं हि पुंसस्तपस: श्रुतस्य वास्विष्टस्य सूक्तस्य च बुद्धिदत्तयो: ।
अविच्युतो<र्थ: कविभिर्निरूपितोयदुत्तमश्लोकगुणानुवर्णनम् ॥
२२॥
इदम्--यह; हि--निश्चय ही; पुंसः --प्रत्येक व्यक्ति का; तपस:--तपस्या के द्वारा; श्रुतस्थ--वेदों के अध्ययन से; वा--अथवा; स्विष्टस्थ--यज्ञ का; सूक्तस्य--आध्यात्मिक शिक्षा का; च--तथा; बुद्धि--ज्ञान का अनुशीलन; दत्तयो:--दान;अविच्युत:--अचूक; अर्थ:--प्रयोजन; कविभि:--मान्य दिद्वान द्वारा; निरूपित:--निष्कर्ष रूप में प्राप्त किया गया,वर्णित; यत्--जो; उत्तमश्लोक-- भगवान् जिनका वर्णन चुने हुए श्लोकों ( पद्य ) से किया जाता है; गुण-अनुवर्णनम्--दिव्य गुणों का वर्णन
विद्वन्मण्डली ने यह स्पष्ट निष्कर्ष निकाला है कि तपस्या, वेदाध्ययन, यज्ञ, दान तथास्तुति-जप का अचूक प्रयोजन ( उद्देश्य ) उत्तमश्लोक भगवान् की दिव्य लीलाओं के वर्णनमें जाकर समाप्त होता है।
"
अहं पुरातीतभवे भवं मुनेदास्यास्तु कस्याश्वन वेदवादिनाम् ।
निरूपितो बालक एव योगिनांशुश्रूषणे प्रावृषि निर्विविक्षताम् ॥
२३॥
अहमू--ैं; पुरा--प्राचीन काल में, पहले; अतीत-भवे--पूर्व कल्प में; अभवम्--हो गया; मुने--हे मुनि; दास्याः--दासी का; तु--लेकिन; कस्याश्चवन--किसी; वेद-वादिनाम्--वेदान्त के अनुयायियों का; निरूपित:--लगा हुआ;बालक:--छोटा नौकर; एव--केवल; योगिनाम्--भक्तों की; शुश्रूषणे--सेवा में; प्रावृषि--वर्षा ऋतु के चार मासों में;निर्विविक्षतामू--साथ रहते हुए।
हे मुनि, पिछले कल्प में मैं किसी दासी के पुत्र रूप में उत्पन्न हुआ, जो वेदान्त सिद्धान्तोंके अनुयायी ब्राह्मणों की सेवा करती थी।
जब वे लोग वर्षा ऋतु के चातुर्मास में साथ-साथरहते थे, तो मैं उनकी सेवा टहल ( व्यक्तिगत सेवा ) किया करता था।
"
ते मय्यपेताखिलचापले भ॑केदान्तेडधृतक्रीडनके३नुवर्तिनि ।
चक्कर: कृपां यद्यपि तुल्यदर्शना:शुश्रूषमाणे मुनयोल्पभाषिणि ॥
२४॥
ते--वे; मयि--मुझ में; अपेत--न भोगकर; अखिल--सभी प्रकार की; चापले--रुचियाँ; अर्भके--बालक में;दान्ते--इन्द्रियों को वश में करके; अध्ृत-क्रीडनके -- खेल-कूद की आदतों में अभ्यस्त न होकर; अनुवर्तिनि--आज्ञाकारी; चक्कु:--प्रदान किया; कृपाम्--अहैतुकी कृपा; यद्यपि--यद्यपि; तुल्य-दर्शना:--स्वभाव से निष्पक्ष;शुश्रूषमाणे-- श्रद्धावान के प्रति; मुन॒यः--वेदान्त के अनुयायी मुनिगण; अल्प-भाषिणि--मितभाषी, कम बोलने वाले
यद्यपि वे स्वभाव से निष्पक्ष थे, किन्तु उन वेदान्त के अनुयायिओं ने मुझ पर अहैतुकीकृपा की।
जहाँ तक मेरी बात थी, मैं इन्द्रियजित था और बालक होने पर भी खेलकूद सेअनासक्त था।
साथ ही, मैं चपल न था और कभी भी जरूरत से ज्यादा बोलता नहीं था( मितभाषी था )।
"
उच्छिष्टलेपाननुमोदितो द्विजैःसकृत्स्म भुझे तदपास्तकिल्बिष: ।
एवं प्रवृत्तस्य विशुद्धचेतस-स्तद्धर्म एवात्मरुचि: प्रजायते ॥
२५॥
उच्छिष्ट-लेपान्--जूठन; अनुमोदित: --अनुमति से; द्विजै:--वेदान्ती ब्राह्मणों द्वारा; सकृतू--एक बार; स्म--था; भुझ्ञे--ग्रहण किया; तत्--उस कार्य से; अपास्त--नष्ट हो गये; किल्बिष:--सारे पाप; एवम्--इस प्रकार; प्रवृत्तस्य--लगे हुए;विशुद्ध-चेतस: --शुद्ध चित्त वाले का; तत्--वह विशेष; धर्म:--स्वभाव; एव--निश्चय ही; आत्म-रुचि:--दिव्यआकर्षण; प्रजायते--प्रकट हुआ।
।
उनकी अनुमति से मैं केवल एक बार उनकी जूठन खाता था और ऐसा करने से मेरेसारे पाप तुरन्त ही नष्ट हो गये।
इस प्रकार सेवा में लगे रहने से मेरा हृदय शुद्ध हो गया औरतब वेदान्तियों का स्वभाव मेरे लिए अत्यन्त आकर्षक बन गया।
"
तत्रान्वहं कृष्णकथा: प्रगायता-मनुग्रहेणाश्रणवं मनोहरा: ।
ता: श्रद्धया मेडनुपदं विश्वण्वतःप्रियश्रवस्यज्र ममाभवद्गुचि: ॥
२६॥
तत्र--वहाँ; अनु-- प्रतिदिन; अहम्--मैं; कृष्ण-कथा:--कृष्ण के कार्यकलापों का वर्णन; प्रगायताम्--गायन करतेहुए; अनुग्रहेण-- अहैतुकी कृपावश; अश्रृणवम्--सुनते हुए; मन:-हराः:--आकर्षक; ता:--वे; श्रद्धया--आदरपूर्वक;मे--मेरा; अनुपदम्-प्रत्येक पग पर; विश्रुण्वत:--ध्यान से सुनते हुए; प्रियअ्रवसि-- भगवान् का; अड्र--हे व्यासदेव;मम--मेरा; अभवत्--ऐसी बन गईं; रुचि: -- प्रवृत्ति ।
हे व्यासदेव, उस संगति में तथा उन महान् वेदान्तियों की कृपा से, मैं उनके द्वाराभगवान् कृष्ण की मनोहर लीलाओं का वर्णन सुन सका और इस प्रकार ध्यानपूर्वक सुनतेरहने से भगवान् के विषय में प्रतिक्षण अधिकाधिक सुनने के प्रति मेरी रुचि बढ़तीही गई।
"
तस्मिस्तदा लब्धरुचेर्महामतेप्रियश्रवस्यस्खलिता मतिर्मम ।
ययाहमेतत्सदसत्स्वमाययापश्ये मयि ब्रह्मणि कल्पितं परे ॥
२७॥
तस्मिन्--ऐसा होने पर; तदा--उस समय; लब्ध--प्राप्त; रुचे:--रुचि; महा-मते--हे महामुनि; प्रियश्रवसि-- भगवान्पर; अस्खलिता मतिः--अनवरत ध्यान; मम--मेरा; यया--जिससे; अहम्--मैं; एतत्--ये सब; सत्-असत्--स्थूल तथासूक्ष्म; स्व-मायया--अपने ही अज्ञान से; पश्ये--देखता हूँ; मयि--मुझमें; ब्रह्म णि---सर्वोपरि; कल्पितम्--स्वीकारकिया जाता है; परे-- अध्यात्म में ।
हे महामुनि, ज्योंही मुझे भगवान् का आस्वाद प्राप्त हुआ, त्योंही मेरा ध्यान भगवान् काश्रवण करने के प्रति अटल हो गया।
और ज्योंही मेरी रुचि विकसित हो गई, त्योंही मुझेअनुभव हुआ कि मैंने अज्ञानतावश ही स्थूल तथा सूक्ष्म आवरणों को स्वीकार किया है,क्योंकि भगवान् तथा मैं दोनों ही दिव्य हैं।
"
इत्थं शरत्प्रावृषिकावृतू हरे-विश्वण्वतो मेउनुसवं यशोमलम् ।
सड्जीत्त्यमानं मुनिभिर्महात्मभि-भक्ति: प्रवृत्तात्मरजस्तमोपहा ॥
२८॥
इत्थमू--इस प्रकार; शरत्--शरद् ऋतु; प्रावषिकौ--वर्षा ऋतु; ऋतू--दो ऋतुएँ; हरेः-- भगवान् का; विश्रृण्वत:--निरन्तर श्रवण करते हुए; मे--मैं स्वयं; अनुसवम्--निरन्तर; यशः अमलम्--धवल कीर्ति; सड्डीत्यमानम्--जपी जाकर;मुनिभि:--मुनियों द्वारा; महा-आत्मभि:--महात्माओं द्वारा; भक्ति: --भक्तिमय सेवा; प्रवृत्ता--प्रवाहित होने लगी;आत्म--जीव; रज:--रजोगुण; तम--तमोगुण; उपहा--नाश करने वाली
इस प्रकार वर्षा तथा शरद् दोनों ऋतुओं में, मुझे इन महामुनियों से भगवान् हरि कीधवल कीर्ति का निरन्तर कीर्तन सुनते रहने का सुअवसर प्राप्त हुआ।
ज्योंही मेरी भक्ति काप्रवाह होने लगा कि रजोगुण तथा तमोगुण के सारे आवरण विलुप्त हो गये।
तस्यैवं मेउनुरक्तस्य प्रश्नितस्य हतैनसः ।
श्रदधानस्य बालस्य दान्तस्यानुचरस्य च ॥
२९॥
तस्य--उसका; एवम्--इस प्रकार; मे--मेरा; अनुरक्तस्थय--उनसे आसक्त; प्रश्नितस्थ--आज्ञाकारी का; हत--मुक्त;एनस:--पापों से; श्रदध्धानस्य-- श्रद्धावान; बालस्य--बालक का; दान्तस्य--संयमी का; अनुचरस्य--उपदेशों का हढ़तासे पालन करने वाले का; च--तथा ।
मैं उन मुनियों के प्रति अत्यधिक आसक्त था।
मेरा आचरण विनम्र था और उनकी सेवाके कारण मेरे सारे पाप विनष्ट हो चुके थे।
मेरे हृदय में उनके प्रति प्रबल श्रद्धा थी।
मैंनेइन्द्रियों को वश में कर लिया था और मैं तन तथा मन से उनका हढ़ता से अनुगमन करतारहा था।
"
ज्ञानं गुह्मतमं यत्तत्साक्षाद्धशवतोदितम् ।
अन्ववोचनू गमिष्यन्त: कृपया दीनवत्सला: ॥
३०॥
ज्ञानमू--ज्ञान; गुह्तमम्--गोपनीय; यत्--जो है; तत्--उस; साक्षात्-प्रत्यक्ष; भगवता उदितमू--स्वयं भगवान् द्वाराप्रतिपादित; अन्ववोचन्--उपदेश दिया; गमिष्यन्त:--जाते समय; कृपया--अहैतुकी कृपा से; दीन-वत्सला:--जो दीनोंके प्रति अत्यन्त दयालु हैं।
दीन जनों पर अत्यन्त दयालु, उन भक्तिवेदान्तों ने जाते समय मुझे उस गुह्मतम विषयका उपदेश, जिसका उपदेश स्वयं भगवान् देते हैं।
"
येनैवाहं भगवतो वासुदेवस्य वेधस: ।
मायानुभावमविदं येन गच्छन्ति तत्पदम् ॥
३१॥
येन--जिससे; एब--निश्चय ही; अहम्-मैं; भगवत: -- भगवान् का; वासुदेवस्थ-- भगवान् श्रीकृष्ण का; वेधस: --परम स्त्रष्टा का; माया--शक्ति; अनुभावम्- प्रभाव; अविदम्--सरलता से समझा गया; येन-- जिससे; गच्छन्ति--जाते हैं; तत्-पदम्-- भगवान् के चरणकमलों में |
उस गुह्य ज्ञान से, मैं सम्पूर्ण पदार्थों के सृष्ठा, पालक तथा संहार-कर्ता भगवान् श्रीकृष्ण की शक्ति के प्रभाव को ठीक-ठीक समझ सका।
उसे जान लेने पर कोई भी मनुष्य उनके पास लौटकर उनसे साक्षात् भेंट कर सकता है।
"
एतत्संसूचितं ब्रह्म॑स्तापत्रयचिकित्सितम् ।
यदी श्वरे भगवति कर्म ब्रह्मणि भावितम् ॥
३२॥
एतत्--इतना; संसूचितम्--दिद्वानों द्वारा निर्धारित; ब्रह्मनू--हे ब्राह्मण व्यास; ताप-त्रय--तीन प्रकार के ताप ( कष्ट ) ;चिकित्सितम्--उपचार, औषधि; यत्--जो; ईश्वर--परम नियामक; भगवति-- भगवान् में; कर्म--नियत कार्य;ब्रह्मणि--ब्रह्म में; भावितमू--समर्पित ।
हे ब्राह्मण व्यासदेव, विद्वानों द्वारा यह निश्चित हुआ है कि समस्त कष्टों तथा दुखों केउपचार का सर्वोत्तम उपाय यह है कि अपने सारे कर्मो को भगवान् ( श्रीकृष्ण ) की सेवा मेंसमर्पित कर दिया जाय।
"
आमयो यश्व भूतानां जायते येन सुव्रत ।
तदेव ह्यामयं द्र॒व्यं न पुनाति चिकित्सितम् ॥
३३॥
आमयः-व्याधियाँ; यः च--जो भी; भूतानाम्--जीवों की; जायते--सम्भव होती है; येन--जिसके द्वारा; सुब्रत--हेमहात्मा; तत्--वह; एव--ही; हि--निश्चय ही; आमयम्--व्याधि; द्रव्यम्--वस्तु; न--नहीं; पुनाति-- अच्छा करती है;चिकित्सितम्--उपचार की गईं।
हे श्रेष्ठ पुरुष, क्या भेषज विज्ञान की विधि से प्रयुक्त की गई कोई वस्तु उस रोग कोठीक नहीं कर देती, जिससे ही वह रोग उत्पन्न हुआ हो ?"
एवं नृणां क्रियायोगा: सर्वे संसृतिहेतव: ।
त एवात्मविनाशाय कल्पन्ते कल्पिता: परे ॥
३४॥
एवम्--इस प्रकार; नृणाम्--मनुष्यों के; क्रिया-योगा:--सारे कार्यकलाप; सर्वे--सब कुछ; संसृति-- भौतिक अस्तित्व;हेतव:--कारण; ते--वे; एब--निश्चय ही; आत्म--कार्य रूपी वृक्ष; विनाशाय--नष्ट करने के लिए; कल्पन्ते--सक्षमहोते हैं; कल्पिता:--समर्पित; परे--पर मे श्वर में ।
इस प्रकार जब मनुष्य के सारे कार्यकलाप भगवान् की सेवा में समर्पित होते हैं, तोवही सारे कर्म जो उसके शाश्वत बन्धन के कारण होते हैं, कर्म रूपी वृक्ष के विनाशकर्ताबन जाते हैं।
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यदत्र क्रियते कर्म भगवत्परितोषणम् ।
ज्ञानं यत्तदधीनं हि भक्तियोगसमन्वितम् ॥
३५॥
यतू--जो भी; अत्र--इस जीवन या जगत में; क्रियते--करता है; कर्म--कार्य; भगवत्-- भगवान् की; परितोषणम्--तुष्टि हेतु; ज्ञानमू--ज्ञान; यत् तत्--जो इस तरह कहलाता है; अधीनम्-- आश्रित; हि--निश्चय ही; भक्ति-योग-- भक्तिसम्बन्धी; समन्वितम्-भक्तियोग से युक्त ।
इस जीवन में भगवान् की तुष्टि के लिए जो भी कार्य किया जाता है, उसे भक्तियोगअथवा भगवान् के प्रति दिव्य प्रेमा भक्ति कहते हैं और जिसे ज्ञान कहते हैं, वह तो सहगामीकारक बन जाता है।
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कुर्वाणा यत्र कर्माणि भगवच्छिक्षयासकृतू ।
गृणन्ति गुणनामानि कृष्णस्यानुस्मरन्ति च ॥
३६॥
कुर्वाणा:--करते हुए; यत्र--जहाँ; कर्माणि--कर्तव्य; भगवत्-- भगवान् की; शिक्षया--इच्छा से; असकृत्--निरन्तर;गृणन्ति--ग्रहण करता है; गुण--गुण; नामानि--नाम; कृष्णस्य--कृष्ण के; अनुस्मरन्ति--निरन्तर स्मरण करता है;च--तथा।
पूर्ण पुरूषोत्तम भगवान् श्रीकृष्ण के आदेशानुसार कर्म करते हुए मनुष्य निरन्तर उनकाउनके नामों का तथा उनके गुणों का स्मरण करता है।
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ॐ नमो भगवते तुभ्यं वासुदेवाय धीमहि ।
प्रद्युम्नायानिरुद्धाय नम: सड्डूर्षणाय च ॥
३७॥
ॐ-भगवान् की दिव्य महिमा के कीर्तन का प्रतीक; नम: -- भगवान् को नमस्कार करना; भगवते-- भगवान् को;तुभ्यम्--तुमको; वासुदेवाय--वसुदेव के पुत्र भगवान् को; धीमहि--उच्चारण या कीर्तन करें; प्रद्यम्माय अनिरुद्धायसड्डूर्षणाय--ये तीनों वासुदेव के पूर्ण अंश हैं; नम:--सादर नमस्कार है; च--तथा।
आइये, हम सब वासुदेव तथा उनके पूर्ण अंश प्रद्युम्म, अनिरुद्ध तथा संकर्षण सहितउनकी महिमा का कीर्तन करें।
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इति मूर्त्यभिधानेन मन्त्रमूर्तिममूर्तिकम् ।
यजते यज्ञपुरुषं स सम्यग्दर्शन: पुमान् ॥
३८॥
इति--इस प्रकार; मूर्ति--प्रतिरूप; अभिधानेन--शब्द या ध्वनि में; मन्त्र-मूर्तिमू--दिव्य उच्चारण का स्वरूप;अमूर्तिकम्-- भगवान् जिनका कोई भौतिक रूप नहीं है; यजते--पूजा करते हैं; यज्ञ--विष्णु; पुरुषम्-- भगवान् को;सः--वह ही; सम्यक् --पूर्णरूप से; दर्शन:--जिसने देखा है; पुमान्--व्यक्ति |
इस प्रकार वास्तविक दृष्टा वही है, जो दिव्य मन्त्रमूर्ति, श्रीभगवान् विष्णु की पूजाकरता है, जिनका कोई भौतिक रूप नहीं होता।
"
इमं स्वनिगमं ब्रह्मन्नवेत्य मदनुष्ठितम् ।
अदाम्मे ज्ञानमैश्वर्य स्वस्मिनू भावं च केशव: ॥
३९॥
इममू्--इस प्रकार; स्व-निगमम्-- भगवान् विषयक वेदों का गुह्य ज्ञान; ब्रह्मन्--हे ब्राह्मण ( व्यासदेव ); अवेत्य--यहजानकर; मत्-ेरे द्वारा; अनुष्ठितम्--सम्पन्न; अदात्--वर दिया; मे--मुझे; ज्ञानमू-दिव्य ज्ञान; ऐश्वर्यम्-ऐश्वर्य ;स्वस्मिनू--निजी; भावम्-प्रगाढ़ प्यार तथा स्नेह; च--तथा; केशव: -- भगवान् कृष्ण नेहे ब्राह्मण, इस प्रकार सर्वप्रथम भगवान् कृष्ण ने मुझे वेदों के गुह्मतम अंशों में निहितभगवान् के दिव्य ज्ञान का, फिर आध्यात्मिक ऐश्वर्य का और तब अपनी घनिष्ठ प्रेममय सेवाका वर दिया।
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त्वमप्यदश्रश्रुत विश्रुतं विभो:समाप्यते येन विदां बुभुत्सितम् ।
प्राख्याहि दुःखेर्मुहुरर्दितात्मनांसड्क्लेशनिर्वाणमुशन्ति नान्न्यथा ॥
४०॥
त्वमू--तुम; अपि-- भी; अदभ्र--विशाल; श्रुत--वैदिक साहित्य; विश्रुतम्--सुना हुआ; विभो:--सर्वशक्तिमान का;समाप्यते--सन्तुष्ट; येन--जिससे; विदाम्--विद्वान का; बुभुत्सितम्-दिव्य ज्ञान सीखने के इच्छुक को; प्राख्याहि--वर्णन करो; दुःखैः--दुखों से; मुहुः--सदैव; अर्दित-आत्मनाम्--पीड़ित जनसमूह को; सड्क्लेश--कष्ट को;निर्वाणम्--शमन; उशन्ति न--नहीं निकल पाते; अन्यथा--अन्य साधनों से ।
अतः कृपा करके सर्वशक्तिमान के उन कार्यकलापों का वर्णन करो, जिसे तुमने वेदोंके अपार ज्ञान से जाना है, क्योंकि उससे महान् विद्वज्जनों की ज्ञान-पिपासा की तृप्ति होगीऔर साथ ही सामान्य लोगों के कष्टों का भी शमन होगा, जो भौतिक दुखों से सदैव पीड़ितरहते हैं।
निस्सन्देह, इन कष्टों से उबरने का कोई अन्य साधन नहीं है।
"
