← श्रीमद्भागवतम् स्कन्ध 1 की सूची

अध्याय आठ: रानी कुंती और परीक्षित की प्रार्थना से उद्धार हुआ

1.8सूत उवाचअथ ते सम्परेतानां स्वानामुदकमिच्छताम्‌ ।

दातुं सकृष्णागज्जायां पुरस्कृत्य ययु: स्त्रिय: ॥

१॥

सूतः उबाच--सूत ने कहा; अथ--इस प्रकार; ते--पाण्डवजन; सम्परेतानाम्‌--मृतकों का; स्वानाम्‌--स्वजनों का;उदकम्‌--जल; इच्छताम्‌-पाने की इच्छा से; दातुमू-देने के लिए; स-कृष्णा:--द्रौपदी के सहित; गड्भायाम्‌-गंगा केतट पर; पुरस्कृत्य--आगे करके; ययुः--गईं; स्त्रियः--स्त्रियाँ ।

सूत गोस्वामी ने कहा : तत्पश्चात्‌, पाण्डवगण अपने मृत परिजनों की इच्छानुसार उन्हेंजल-दान देने हेतु द्रौपदी सहित गंगा के तट पर गये।

स्त्रियाँ आगे-आगे चल रही थीं।

"

ते निनीयोदक॑ सर्वे विलप्य च भृशं पुन: ।

आप्लुता हरिपादाब्जरज:पूतसरिज्जले ॥

२॥

ते--वे सब; निनीय--अर्पित करके; उदकम्‌--जल; सर्वे--सभी; विलप्य--विलाप करके; च--तथा; भूशम्‌--पर्याप्त;पुन:--फिर; आप्लुता: --स्नान किया; हरि-पादाब्जन-- भगवान्‌ के चरणकमल की; रज: --धूलि से; पूत--पवित्र;सरित्‌--गंगा नदी के; जले--जल में ।

उनके लिए शोक कर चुकने तथा पर्याप्त गंगाजल अर्पित कर चुकने के बाद उन सबोंने गंगा में स्नान किया, जिसका जल भगवान्‌ के चरणकमलों की धूलि मिल जाने केकारण पवित्र हो गया है।

"

तत्रासीनं कुरुपतिं धृतराष्ट्रं सहानुजम्‌ ।

गान्धारीं पुत्रशोकार्ता पृथां कृष्णां च माधव: ॥

३॥

तत्र--वहाँ; आसीनम्‌--बैठे हुए; कुरु-पतिम्‌--कुरुओं के राजा; धृतराष्ट्रमू-- धृतराष्ट्र को; सह-अनुजम्‌--अपने भाइयोंसहित; गान्धारीम्‌--गांधारी को; पुत्र--बेटे के; शोक-अर्तामू--शोक से पीड़ित; पृथाम्‌--कुन्ती को; कृष्णाम्‌--द्रौपदीको; च--भी; माधव:--भगवान्‌ श्रीकृष्ण ने ।

वहीं कुरुवंशियों के राजा महाराज युधिष्टिर अपने छोटे भाइयों, धृतराष्ट्र, गांधारी, कुन्तीतथा द्रौपदी सहित बैठ गये।

वे सभी शोक से अत्यधिक पीड़ित थे।

भगवान्‌ कृष्ण भी वहाँ थे।

"

सान्त्वयामास मुनिभिर्वतबन्धूज्शुचार्पितान्‌ ।

भूतेषु कालस्य गति दर्शयन्ञ प्रतिक्रियाम्‌ ॥

४॥

सान्त्वयाम्‌ आस--ढाढस बँधाया; मुनिभि:--वहाँ पर उपस्थित मुनियों समेत; हत-बन्धून्--जिनके मित्र तथा सम्बन्धीमारे गये थे; शुचार्पितान्--सभी को धक्का पहुँचा हुआ; भूतेषु--जीवों पर; कालस्थ--सर्वशक्तिमान के परम नियम की;गतिम्‌--प्रतिक्रिया; दर्शयन्‌--दिखलाया; न--नहीं; प्रतिक्रियामू--उपचार।

सर्वशक्तिमान के कठोर नियमों तथा जीवों पर उनकी प्रतिक्रियाओं का दृष्टान्त देते हुए,भगवान्‌ श्रीकृष्ण तथा सारे मुनियों ने समस्त स्तब्ध एवं शोकार्त-जनों को ढाढ़स बँधाया।

"

साधयित्वाजातशत्रो: स्व॑ राज्यं कितवै्तम्‌ ।

घातयित्वासतो राज्ञ: कचस्पर्शक्षतायुष: ॥

५॥

साधबित्वा--सम्पन्न करके; अजात-शत्रो:--जिसके कोई शत्रु न हो, उसका; स्वम्‌ राज्यमू-- अपना राज्य; कितवै:--धूर्तों के द्वारा ( दुर्योधन तथा उसका दल ); हतम्‌--छीना गया; घातयित्वा--वध कराकर; असतः--दुष्ट; राज्ञ:--रानी के;कच--केशों का गुच्छा; स्पर्श--छूने से; क्षत--घटी हुईं; आयुष:--आयु द्वारा।

धूर्त दुर्योधन तथा उसके दल ने छल करके अजातशत्रु युधिष्ठिर का राज्य छीन लियाथा।

भगवत्कृपा से वह फिर प्राप्त हो गया और जिन दुष्ट राजाओं ने दुर्योधन का साथ दियाथा, वे सब भगवान्‌ के द्वारा मार डाले गये।

अन्य लोग भी मारे गये, क्योंकि महारानीद्रौपदी के केशों को पकड़कर खींचने से उनकी आयु क्षीण हो चुकी थी।

"

याजयित्वाश्वमेथैस्तं त्रिभिरुत्तमकल्पकै: ।

तद्यश: पावन दिक्षु शतमन्योरिवातनोत्‌ ॥

६॥

याजयित्वा--सम्पन्न करके; अश्वमेधैः --अश्वमेध यज्ञों के द्वारा, जिनमें घोड़े की बलि दी जाती है; तम्--उनको ( राजायुधिष्ठिर को ); त्रिभिः--तीन; उत्तम--सर्व श्रेष्ठ; कल्पकैः--समुचित सामग्रियों के द्वारा तथा योग्य पुरोहितों द्वारा सम्पन्न;तत्‌--वह; यश: --ख्याति; पावनम्‌--यशस्वी; दिक्षु--समस्त दिशाएँ; शत-मन्यो:--इन्द्र, जिसने ऐसे एक सौ यज्ञ कियेथे; इब--सहृश; अतनोत्‌--फैल गयी ।

भगवान्‌ श्रीकृष्ण ने महाराज युधिष्ठिर से तीन श्रेष्ठ अश्वमेध यज्ञ सम्पन्न कराये और इसतरह उनकी पवित्र ख्याति सौ यज्ञ करनेवाले इन्द्र की तरह ही सर्व दिशाओं में फैल गई।

"

आमन्त्र्य पाण्डुपुत्रांश्व शैनेयोद्धवरसंयुतः ।

द्वैपायनादिभिर्विप्रै: पूजितै: प्रतिपूजित: ॥

७॥

आमन्त्रय--विदाई लेकर; पाण्डु-पुत्रानू--पाण्डु के समस्त पुत्रों से; च-- भी; शैनेय--सात्यफि; उद्धव--उद्द्धव;संयुतः--समेत; द्वैवायन-आदिभि:--व्यासदेव जैसे ऋषियों के द्वारा; विप्रैः--ब्राह्मणों के द्वारा; पूजितैः--पूजित होकर;प्रतिपूजित:--भगवान्‌ ने भी समान रूप से आदानप्रदान किया |

फिर भगवान्‌ श्रीकृष्ण ने सात्यकि तथा उद्धव के साथ प्रस्थान के लिए तैयारी की।

उन्होंने श्रील व्यासदेव आदि ब्राह्मणों से पूजित होने के बाद पाण्डु-पुत्रों को आमन्त्रितकिया।

भगवान्‌ ने सभी का समुचित अभिवादन किया।

"

गन्तुं कृतमतिर्त्रह्मन्‌ द्वारकां रथमास्थित: ।

उपलेभेभिधावन्तीमुत्तरां भवविह्लाम्‌ ॥

८॥

गन्तुमू--जाने के लिये इच्छुक; कृतमति:--संकल्प करके; ब्रह्मनू-हे ब्राह्मण; द्वारकाम्‌--द्वारका की ओर; रथम्-रथपर; आस्थित:--आरूढ़; उपलेभे--देखा; अभिधावन्तीम्‌--तेजी से आती हुई; उत्तराम्‌--उत्तरा को; भय-विहलाम्‌--भयभीत ।

ज्योंही वे द्वारका प्रस्थान्‌ के लिये रथ पर सवार हुए, त्योंही उन्होंने भयभीत उत्तरा कोतेजी से उनकी ओर आते हुए देखा।

"

उत्तरोवाचपाहि पाहि महायोगिन्‌ देवदेव जगत्पते ।

नान्‍यं त्वदभयं पश्ये यत्र मृत्यु: परस्परम्‌ ॥

९॥

उत्तरा उबाच--उत्तरा ने कहा; पाहि पाहि--रक्षा करें, रक्षा करें; महा-योगिन्‌--सर्वोच्च योगी; देव-देव--पूज्यों के भीपूज्य; जगत्‌-पते--हे ब्रह्माण्ड के स्वामी; न--नहीं; अन्यम्‌-दूसरा; त्वत्‌--आपके अतिरिक्त; अभयम्‌-- भय से रहितहोने का भाव; पश्ये--देखती हूँ; यत्र--जहाँ; मृत्यु: --मृत्यु; परस्परम्‌--द्वैत जगत में ।

उत्तरा ने कहा : हे देवाधिदेव, हे ब्रह्माण्ड के स्वामी, आप सबसे महान्‌ योगी हैं।

कृपयामेरी रक्षा करें, क्योंकि इस द्वैतपूर्ण जगत में मुझे मृत्यु के पाश से बचानेवाला आपकेअतिरिक्त अन्य कोई नहीं है।

"

अभिद्रवति मामीश शरस्तप्तायसो विभो ।

काम दहतु मां नाथ मा मे गर्भो निपात्यतामू ॥

१०॥

अभिद्रवति--ओर आता हुआ; माम्‌--मेरी; ईश--हे प्रभु; शर:--बाण; तप्त--अग्नितुल्य; अयस:--लोह; विभो--हेमहान्‌; कामम्‌--इच्छा; दहतु--जला दे; माम्‌--मुझको; नाथ--हे रक्षक; मा--मत; मे--मेरा; गर्भ: --गर्भ;निपात्यताम्‌-गर्भपात हो |

हे प्रभु, आप सर्वशक्तिमान हैं।

एक दहकता हुआ लोहे का बाण मेरी ओर तेजी से आरहा है।

मेरे प्रभु, यदि आपकी इच्छा हो तो यह मुझे भले ही जला दे, लेकिन यह मेरे गर्भको जलाकर गर्भपात न करे।

हे प्रभु, कृपया मेरे पर इतना अनुग्रह करें।

"

सूत उवाचउपधार्य वचस्तस्या भगवान्‌ भक्तवत्सल: ।

अपाण्डवमिदं कर्त द्रौणेरख्रमबुध्यत ॥

११॥

सूतः उवाच--सूत गोस्वामी ने कहा; उपधार्य--धैर्यपूर्वक सुनकर; वच:--शब्द; तस्या:--उसके; भगवानू-- भगवान्‌ ने;भक्त-वत्सलः--अपने भक्तों के प्रति अत्यन्त प्रेम से युक्त; अपाण्डवम्‌--पाण्डवों के वंशज के बिना; इृदम्‌--यह;कर्तुमू--इसे करने के लिये; द्रौणेः:--द्रोणाचार्य के पुत्र का; अस्त्रमू-हथियार; अबुध्यत--समझा।

सूत गोस्वामी ने कहा : उसके बचनों को धीरज के साथ सुनकर, अपने भक्तों के प्रतिसदैव अत्यन्त वत्सल रहनेवाले, भगवान्‌ श्रीकृष्ण तुरन्त समझ गये कि द्रोणाचार्य के पुत्रअश्वत्थामा ने पाण्डव-वंश के अन्तिम वंशज को समाप्त करने ( निर्बीज करने ) के लिये हीब्रह्मास्त्र छोड़ा है।

"

तहीोँवाथ मुनिश्रेष्ठ पाण्डवा: पञ्ञ सायकान्‌ ।

आत्मनोभिमुखान्दीप्तानालक्ष्यास्त्राण्युपाददु: ॥

१२॥

तहिं--तब; एव-- भी; अथ--अतएव; मुनि-श्रेष्ठ--हे मुनियों में प्रमुख; पाण्डवा:--पाण्डु के पुत्र; पञ्च--पाँच;सायकान्‌--हथियार; आत्मन:--स्वयं; अभिमुखान्--की ओर; दीप्तानू--लपलपाते; आलक्ष्य--देखकर; अस्त्राणि--हथियार; उपाददुः--ग्रहण किया।

हे महान्‌ विचारकों ( मुनियों ) में अग्रणी ( शौनक जी ), उस दहकते हुए ब्रह्मास्त्र कोअपनी ओर आते देखकर पाँचों पाण्डवों ने अपने-अपने पाँचों हथियार सँभाले।

"

व्यसन वीक्ष्य तत्तेषामनन्यविषयात्मनाम्‌ ।

सुदर्शनेन स्वास्त्रेण स्वानां रक्षां व्यधाद्विभु: ॥

१३ ॥

व्यसनम्‌--महान संकट को; वीक्ष्य--देखकर; तत्‌--उस; तेषाम्‌--उनका; अनन्य--दूसरा नहीं; विषय--साधन;आत्मनाम्‌--इस प्रकार प्रवृत्त; सुदर्शनेन--कृष्ण के चक्र द्वारा; स्व-अस्त्रेण --हथियार से; स्वानाम्‌--अपने भक्तों की;रक्षाम्‌--सुरक्षा; व्यधात्‌--की; विभु:--सर्वशक्तिमान ने।

सर्वशक्तिमान्‌ भगवान्‌ श्रीकृष्ण ने यह देखकर कि उनके अनन्य भक्तों पर, जो पूर्णरूप से उनके शरणागत थे, महान्‌ संकट आनेवाला है, उनकी रक्षा के लिए तुरन्त ही अपनासुदर्शन चक्र उठा लिया।

"

अन्तःस्थः सर्वभूतानामात्मा योगेश्वरो हरि: ।

स्वमाययावृणोद्गर्भ वैराट्या: कुरुतन्तवे ॥

१४॥

अन्तःस्थ:--अन्तर में रहते हुए; सर्ब--समस्त; भूतानाम्‌--जीवों के; आत्मा--आत्मा; योग-ईश्वर: --समस्त योग केस्वामी; हरि: --पर मे श्वर; स्व-मायया-- अपनी निजी शक्ति से; आवृणोत्‌--आच्छादित कर लिया; गर्भम्‌-- भ्रूण को;बैराट्या:--उत्तरा के; कुरु-तन्तवे--महाराज कुरु की वंशवृद्धि के लिए।

परम योगेश्वर श्रीकृष्ण प्रत्येक व्यक्ति के हृदय में परमात्मा के रूप में निवास करते हैं।

अतएव, कुरु-वंश की संतति की रक्षा करने के लिए उन्होंने उत्तरा के गर्भ को अपनी निजीशक्ति से आवृत कर लिया।

"

यच्प्यस्र॑ ब्रह्मशिरस्त्वमोघं चाप्रतिक्रियम्‌ ।

वैष्णवं तेज आसाद्य समशाम्यद्‌ भृगूद्ह ॥

१५॥

यद्यपि--यद्यपि; अस्त्रमू--अस्त्र; ब्रहा-शिर:--परम्‌, सर्वश्रेष्ठ; तु--लेकिन; अमोघम्‌--बिना रोक-टोक के; च--तथा;अप्रतिक्रियमू--जिसका निवारण न किया जा सके ; वैष्णवम्‌--विष्णु से सम्बन्धित; तेज:--बल; आसाद्य--सामने आनेपर; समशाम्यत्‌--शान्त पड़ गया; भृगु-उद्वह-हे भूगु-वंशकी शान।

है शौनक, यद्यपि अश्वत्थामा द्वारा छोड़ा गया परम ब्रह्मासत्र अमोघ था और उसकानिवारण नहीं हो सकता था, लेकिन विष्णु ( श्रीकृष्ण ) के तेज के समक्ष वह निष्क्रिय होगया और व्यर्थ हो गया।

"

मा मंस्था ह्ोेतदाश्चर्य सर्वाश्चर्यमयेच्युते ।

य इदं मायया देव्या सृजत्यवति हन्त्यज: ॥

१६॥

मा--मत; मंस्था:--सोचो; हि--निश्चय ही; एतत्‌--ये सब; आश्चर्यम्--आश्चर्यजनक; सर्व--समस्त; आश्चर्य-मये --परम आश्चर्ययुक्त; अच्युते--अच्युत में; यः--जो; इृदम्‌--यह ( सृष्टि ); मायया--उनकी शक्ति द्वारा; देव्या--दिव्य;सृजति--उत्पन्न करता है; अवति--पालन करता है; हन्ति--संहार करता है; अजः--अजन्मा

हे ब्राह्मणों, इसे गुह्य तथा अच्युत भगवान्‌ के कार्य-कलापों में विशेष आश्चर्यजनकमत सोचो।

वे अपनी दिव्य शक्ति से समस्त भौतिक वस्तुओं का सृजन, पालन तथा संहारकरते हैं यद्यपि वे स्वयं अजन्मा हैं।

"

ब्रह्मतेजोविनिर्मुक्तरात्मजै: सह कृष्णया ।

प्रयाणाभिमुखं कृष्णमिदमाह पृथा सती ॥

१७॥

ब्रह्म-तेज:--ब्रह्मासत्र का विकिरण ; विनिर्मुक्त:--से बचकर; आत्म-जै:--अपने पुत्रों; सह--समेत; कृष्णया--द्रौपदीके; प्रयाण--जाते हुए; अभिमुखम्‌-- ओर; कृष्णम्‌--भगवान्‌ कृष्ण को; इदम्‌--यह; आह--कहा; पृथा--कुन्ती ने;सती--भगवान्‌ की भक्त, सती ।

इस प्रकार ब्रह्मासत्र के विकिरण से बचकर भगवान्‌ की भक्त सती कुन्ती ने अपने पाँचपुत्रों तथा द्रोपदी-सहित, घर के लिए प्रस्थान करने को उद्यत श्रीकृष्ण को इस तरहसम्बोधित किया।

"

कुन्त्युवाचनमस्ये पुरुष त्वाद्यमीश्वरं प्रकृतेः परम्‌ ।

अलक्ष्यं सर्वभूतानामन्तर्बहिरवस्थितम्‌ ॥

१८॥

कुन्ती उवाच-- श्रीमती कुन्ती ने कहा; नमस्ये--मेरा नमस्कार है; पुरुषम्‌--परम पुरुष को; त्वा--आप; आद्यम्--मूल;ईश्वरम्‌--नियन्ता; प्रकृते:--भौतिक ब्रह्माण्डों के; परमू--परे; अलक्ष्यम्‌--अहृश्य; सर्व--समस्त; भूतानाम्‌--जीवों के;अन्त:-- भीतर; बहि:--बाहर; अवस्थितम्‌--स्थित ।

श्रीमती कुन्ती ने कहा : हे कृष्ण, मैं आपको नमस्कार करती हूँ, क्योंकि आप ही आदिपुरुष हैं और इस भौतिक जगत के गुणों से निर्लिप्त रहते हैं।

आप समस्त वस्तुओं के भीतरतथा बाहर स्थित रहते हुए भी सबों के लिए अदृश्य हैं।

"

मायाजवनिकाच्छन्नमज्ञाधोक्षजमव्ययम्‌ ।

न लक्ष्यसे मूढहशा नटो नाट्यधरो यथा ॥

१९॥

माया--ठगने वाली; जबनिका--पर्दा; आच्छन्नम्‌--ढका; अज्ञा--अज्ञानी; अधोक्षजम्‌-- भौतिक बोध की सीमा से परे( दिव्य ); अव्ययम्‌-- अविनाशी; न--नहीं; लक्ष्यसे--दिखता है; मूढ-हशा--मूर्ख देखनेवाले के द्वारा; नटः--कलाकार; नाट्य-धर:-- अभिनेता का भेष धारण किये; यथा--जिस प्रकार।

सीमित इन्द्रिय-ज्ञान से परे होने के कारण, आप ठगिनी शक्ति ( माया ) के पर्दे से ढकेरहनेवाले शाश्रत अव्यय तत्त्व हैं।

आप मूर्ख दर्शक के लिए ठीक उसी प्रकार अदृश्य रहतेहैं, जिस प्रकार अभिनेता के वस्त्र पहना हुआ कलाकार पहचान में नहीं आता।

"

तथा परमहंसानां मुनीनाममलात्मनाम्‌ ।

भक्तियोगविधानार्थ कथं पश्येम हि स्त्रिय: ॥

२०॥

तथा--इसके अतिरिक्त; परमहंसानाम्‌--उन्नत अध्यात्मवादियों का; मुनीनाम्--महान चिन्तकों या विचारकों का; अमल-आत्मनाम्‌--आत्मा तथा पदार्थ में अन्तर करने में सक्षम; भक्ति-योग--भक्ति का विज्ञान; विधान-अर्थम्‌--सम्पन्न करनेके लिए; कथम्‌-कैसे; पश्येम--देख सकती हैं; हि--निश्चित ही; स्त्रियः--स्त्रियाँ ॥

आप उन्नत अध्यात्मवादियों तथा आत्मा एवं पदार्थ में अन्तर करने में सक्षम होने सेशुद्ध बने विचारकों के हृदयों में भक्ति के दिव्य विज्ञान का प्रसार करने के लिए स्वयंअवतरित होते हैं।

तो फिर हम स्त्रियाँ आपको किस तरह पूर्ण रूप से जान सकती हैं? ---+ - ४ " कृष्णाय वासुदेवाय देवकीनन्दनाय च ।

नन्दगोपकुमाराय गोविन्दाय नमो नम: ॥

२१॥

कृष्णाय--भगवान्‌ को; वासुदेवाय--वसुदेव के पुत्र को; देवकी-नन्दनाय--देवकी के पुत्र को; च--तथा; नन्द-गोप--नन्द तथा ग्वालों के; कुमाराय-- पुत्र को; गोविन्दाय-- भगवान्‌ को, जो इन्द्रियों तथा गौवों के प्राण हैं; नमः--सादर नमस्कार; नमः --नमस्कार।

अतः मैं उन भगवान्‌ को सादर नमस्कार करती हूँ, जो वसुदेव के पुत्र, देवकी केलाडले, नन्द के लाल तथा वृन्दावन के अन्य ग्वालों एवं गौवों तथा इन्द्रियों के प्राण बनकरआये हैं।

"

नमः--नमस्कार है; पड्डुज-नाभाय-- भगवान्‌ को, जिनके उदर के मध्यभाग में कमल-पुष्प के समान विशेष गट्ढा है;नमः--नमस्कार; पड्डूज-मालिने--कमल-पुष्प की माला से निरन्तर सज्जित रहनेवाले को; नम:--नमस्कार; पड्लज-नेत्राय--जिनकी दृष्टि कमल-पुष्प के समान शीतल है; नमः ते--आपको नमस्कार है; पड्डूज-अड्ख्रये--कमल-पुष्पों सेअंकित चरण के तलवों वाले को |

जिनके उदर के मध्य में कमलपुष्प के सहृश गर्त है, जो सदैव कमल-पुष्प की मालाधारण करते हैं, जिनकी चितवन कमल-पुष्प के समान शीतल है और जिनके चरणों ( केतलवों ) में कमल अंकित हैं, उन भगवान्‌ को मैं सादर नमस्कार करती हूँ।

"

यथा हृषीकेश खलेन देवकीकंसेन रुद्धातिचिरं शुचार्पिता ।

विमोचिताहं च सहात्मजा विभोत्वयैव नाथेन मुहुर्विपदूगणात्‌ ॥

२३॥

यथा--मानो; हषीकेश--इन्द्रियों के स्वामी; खलेन--ईष्यालु के द्वारा; देवकी--देवकी ( श्रीकृष्ण की माता ); कंसेन--राजा कंस द्वारा; रुद्धा--बन्दी बनाया गया; अति-चिरम्--दीर्घ काल तक; शुच-अर्पिता--दुखी; विमोचिता--मुक्तकिया; अहम्‌ च--मैं भी; सह-आत्म-जा--अपने बच्चों सहित; विभो--हे महान्‌; त्ववा एब--आप ही के द्वारा;नाथेन--रक्षक के रूप में; मुहुः--निरन्तर; विपत्‌-गणात्‌--विपत्तियों के समूह से ।

हे हृषीकेश, हे इन्द्रियों के स्वामी तथा देवों के देव, आपने दीर्घ काल तक बनन्‍दीगृह मेंबन्दिनी बनाई गई और दुष्ट राजा कंस द्वारा सताई जा रही अपनी माता देवकी को तथाअनवरत विपत्तियों से घिरे हुए मेरे पुत्रों समेत मुझको मुक्त किया है।

"

दसत्सभाया वनवासकृच्छुत: ।

मृधे मृधेडनेकमहारथाखत्रतोद्रौण्यखनतश्वास्म हरेभिरक्षिता: ॥

२४॥

विषात्‌--विष से; महा-अग्ने:--प्रबल अग्निकाण्ड से; पुरुष-अद--मनुष्य के भक्षक से; दर्शनात्--मल्लयुद्ध करके;असतू--दुष्ट; सभाया:--सभा से; वन-बास--जंगल में प्रवासित; कृच्छुतः--कष्ट से; मृधे मृथे--युद्ध में बारम्बार;अनेक--अनेक; महा-रथ--बड़े-बड़े सेनानायक; अस्त्रतः--हथियार से; द्रौणि--द्रोणाचार्य के पुत्र के; अस्त्रतः--अस्त्रसे; च--तथा; आस्म-- था; हरे--हे भगवान्‌; अभिरक्षिता:--पूर्ण रूप से सुरक्षित ।

है कृष्ण, आपने हमें विषाक्त भोजन से, भीषण अग्नि-काण्ड से, मानव-भक्षीओं से,दुष्ट सभा से, वनवास-काल के कष्टों से तथा महारथियों द्वारा लड़े गये युद्ध से बचाया है।

और अब आपने हमें अश्वत्थामा के अस्त्र से बचा लिया है।

"

विपद: सन्तु ता: शश्त्तत्र तत्र जगदगुरो ।

भवतो दर्शन यत्स्यादपुनर्भवदर्शनम्‌ ॥

२५॥

विपदः--विपत्तियाँ; सनन्‍्तु--आने दो; ताः--सारी; शश्वत्‌--पुनः पुनः; तत्र--वहाँ; तत्र--तथा वहाँ; जगत्-गुरो--हेजगत के स्वामी; भवत:--आपकी; दर्शनम्‌--भेंट; यत्‌--जो; स्थात्‌--हो; अपुन:--फिर नहीं; भव-दर्शनम्‌--जन्म-मृत्यु को बारम्बार देखना |

मैं चाहती हूँ कि ये सारी विपत्तियाँ बारम्बार आयें, जिससे हम आपका दर्शन पुनः पुनःकर सकें, क्योंकि आपके दर्शन का अर्थ यह है कि हमें बारम्बार होने वाले जन्म तथा मृत्युको नहीं देखना पड़ेगा।

"

जन्मैश्वर्यश्रुतश्रीभिरिधमानमद: पुमान्‌ ।

नैवार्हत्यभिधातुं वै त्वामकिद्लनगोचरम्‌ ॥

२६॥

जन्म--जन्म; ऐश्वर्य--ऐश्वर्य; श्रुत--शिक्षा; श्रीभि: --सुन्दरता के स्वामित्व द्वारा; एधमान--लगातार वृद्धि करता हुआ;मदः--प्रमत्तता; पुमान्--मनुष्य; न--कभी नहीं; एब--ही; अर्हति--पात्र होता है; अभिधातुम्‌--सम्बोधित करने केलिये; बै--निश्चय ही; त्वामू--आपको; अकिज्ञन-गोचरम्‌--जो भौतिक दृष्टि से दरिद्र मनुष्य के द्वारा सरलता से प्राप्त होसके।

हे प्रभु, आप सरलता से प्राप्त होने वाले हैं, लेकिन केवल उन्हीं के द्वारा, जो भौतिकइृष्टि से अकिंचन हैं।

जो सम्मानित कुल, ऐश्वर्य, उच्च शिक्षा तथा शारीरिक सौंदर्य के द्वाराभौतिक प्रगति के पथ पर आगे बढ़ने के प्रयास में लगा रहता है, वह आप तक एकनिष्ठभाव से नहीं पहुँच पाता।

"

नमोकिड्जनवित्ताय निवृत्तगुणवृत्तये ।

आत्मारामाय शान्ताय कैवल्यपतये नम: ॥

२७॥

नमः--नमस्कार है; अकिज्ञन-वित्ताय--निर्धनों के धन-स्वरूप को; निवृत्त--भौतिक गुणों की क्रियाओं से सदा परे;गुण--भौतिक गुण; वृत्तये--स्नेह; आत्म-आरामाय--आत्मतुष्ट को; शान्ताय--परम शान्त को; कैवल्य-पतये--अद्ठैतवादियों के स्वामी को; नम:--प्रणाम है |

मैं निर्धनों के धन आपको नमस्कार करती हूँ।

आपको प्रकृति के भौतिक गुणों कीक्रियाओं-प्रतिक्रियाओं से कोई सरोकार नहीं है।

आप आत्म-तुष्ट हैं, अतएब आप परमशान्त तथा अद्ठैतवादियों के स्वामी कैवल्य-पति हैं।

"

मन्ये त्वां कालमीशानमनादिनिधनं विभुम्‌ ।

सम॑ चरन्तं सर्वत्र भूतानां यन्मिथ: कलि: ॥

२८॥

मन्ये--मानती हूँ; त्वामू--आपको; कालमू्‌--शा श्रत समय; ईशानम्‌--परमे श्वर; अनादि-निधनम्‌-- आदि-अन्त रहित;विभुम्‌--सर्वव्यापी; समम्‌--समान रूप से दयालु; चरन्तम्‌--वितरित करते हुए; सर्वत्र--सभी जगह; भूतानामू--जीवोंका; यत्‌ मिथ: --मतभेद; कलि:--कलह।

हे भगवान्‌, मैं आपको शाश्वत समय, परम नियन्ता, आदि-अन्त से रहित तथासर्वव्यापी मानती हूँ।

आप सबों पर समान रूप से दया दिखलाते हैं।

जीवों में जो पारस्परिककलह है, वह सामाजिक मतभेद के कारण है।

तात्पर्य : कुन्ती देवी जानती थीं कि कृष्ण न तो उनके भतीजे हैं और न उनके पितृकुल केसामान्य पारिवारिक सदस्य हैं।

वे अच्छी तरह जानती थीं कि कृष्ण आदि-भगवान्‌ हैं, जो" न वेद कश्चिद्धगवंश्विकी र्पितंतवेहमानस्य नृणां विडम्बनम्‌ ।

न यस्य कश्चिदयितोस्ति कर्हिचिद्‌द्वेष्यश्च यस्मिन्‌ विषमा मतिनणाम्‌ ॥

२९॥

न--नहीं; वेद--जानता; कश्चित्‌--कोई; भगवन्‌--हे भगवान्‌; चिकीर्षितम्‌--लीलाएँ; तब--आपकी; ईहमानस्थ--सांसारिक व्यक्तियों की भाँति; नृणाम्‌--सामान्य लोगों का; विडम्बनम्‌-- भ्रामक; न--कभी नहीं; यस्य--जिसका;कश्चित्‌--कोई; दयितः--विशेष कृपा-पात्र; अस्ति-- है; कर्हिचित्‌-- कहीं; द्वेष्य: --ईर्ष्या की वस्तु; च--तथा;यस्मिन्--जिसमें; विषमा--पक्षपात; मति:--विचार; नृणाम्‌--मनुष्यों का ।

है भगवान्‌, आपकी दिव्य लीलाओं को कोई समझ नहीं सकता, क्योंकि वे मानवीयप्रतीत होती हैं और इस कारण भ्रामक हैं।

न तो आपका कोई विशेष कृपा-पात्र है, न हीकोई आपका अप्रिय है।

यह केवल लोगों की कल्पना ही है कि आप पक्षपात करते हैं।

स्वयं पशुओं, मनुष्यों, ऋषियों तथा जलचरों के मध्य अवतरित होते हैं।

सचमुच ही यहअकरानेवाली बात है।

"

जन्म कर्म च विश्वात्मन्नजस्याकर्तुरात्मन: ।

तिर्यड्नृषिषु याद:सु तदत्यन्तविडम्बनम्‌ ॥

३०॥

जन्म--जन्म; कर्म--कर्म; च--तथा; विश्व-आत्मन्‌--हे विश्व के आत्मा; अजस्य--अजन्मा की; अकर्तु:--निष्क्रिय की; आत्मन:--प्राण-शक्ति की; तिर्यक्‌-पशु; नू-- मनुष्य; ऋषिषु--ऋषियों में; याद:सु--जल में; तत्‌--वह; अत्यन्त-- वास्तविक, अत्यन्त; विडम्बनमू-- भ्रामक, चकराने वाली।

हे विश्वात्मा, यह सचमुच ही चकरा देनेवाली बात ( विडम्बना ) है कि आप निष्क्रिय रहते हुए भी कर्म करते हैं और प्राणशक्ति रूप तथा अजन्मा होकर भी जन्म लेते हैं।

आप स्वयं पशुओं, मनुष्यों, ऋषियों तथा जलचरों के मध्य अवतरित होते हैं।

सचमुच ही यह चकरानेवाली बात है।

"

गोप्याददे त्वयि कृतागसि दाम तावद्‌या ते दशाश्रुकलिलाझनसम्भ्रमाक्षम्‌ ।

वक्‍त्रं निनीय भयभावनया स्थितस्यसा मां विमोहयति भीरपि यद्विभेति ॥

३१॥

गोपी--ग्वालिन ( यशोदा ) ने; आददे--लिया; त्वयि--आप पर; कृतागसि--अड़चन डालने पर ( मक्खन की मटकीफोड़ने पर ); दाम--रस्सी; तावत्‌--उस समय; या--जो; ते--तुम्हारी; दशा--स्थिति; अश्रु-कलिल--अश्रुपूरित;अज्न--काजल; सम्भ्रम--विचलित; अक्षम्‌--नेत्र; वक्‍्रम्‌--चेहरा, मुँह; निनीय--नीचे की ओर; भय-भावनया--भय की भावना से; स्थितस्य--स्थिति का; सा--वह; माम्--मुझको; विमोहयति--मोहग्रस्त करती है; भी: अपि--साक्षात्‌ भय भी; यत्‌--जिससे; बिभेति-- भयभीत है

हे कृष्ण जब आपने कोई अपराध किया था, तब यशोदा ने जैसे ही आपको बाँधने केलिए रस्सी उठाई, तो आपकी व्याकुल आँखें अश्रुओं से डबडबा आईं, जिससे आपकीआँखों का काजल धुल गया।

यद्यपि आपसे साक्षात्‌ काल भी भयभीत रहता है, फिर भीआप भयभीत हुए।

यह दृश्य मुझे मोहग्रस्त करनेवाला है।

"

केचिदाहुरजं जात॑ पुण्यश्लोकस्य कीर्तये ।

यदो: प्रियस्यान्ववाये मलयस्येव चन्दनम्‌ ॥

३२॥

केचित्‌--कोई; आहुः--कहता है; अजम्‌--अजन्मा; जातम्‌--उत्पन्न; पुण्य-शलोकस्य--महान पुण्यात्मा राजा की;कीर्तये--कीर्ति-विस्तार करने के लिए; यदो:--राजा यदु का; प्रियस्थ--प्रिय; अन्ववाये--कुल में; मलयस्य--मलयपर्वत का; इब--सहृश; चन्दनम्‌--चन्दन

कुछ कहते हैं कि अजन्मा का जन्म पुण्यात्मा राजाओं की कीर्तिका विस्तार करने केलिए हुआ है और कुछ कहते हैं कि आप अपने परम भक्त राजा यदु को प्रसन्न करने केलिए जन्मे हैं।

आप उसके कुल में उसी प्रकार प्रकट हुए हैं, जिस प्रकार मलय पर्वत मेंअन्दन होता है।

"

अपरे वसुदेवस्य देवक्यां याचितोभ्यगात्‌ ।

अजत्त्वमस्य क्षेमाय वधाय च सुरद्विषाम् ॥

३३॥

अपरे--अन्य लोग; वसुदेवस्थ--वसुदेव का; देवक्याम्‌--देवकी का; याचित: --प्रार्थना किये जाने पर; अभ्यगात्‌ --जन्म लिया; अज:--अजन्मा; त्वम्--आप; अस्य--इसके; क्षेमाय--कल्याण के लिए; वधाय--वध करने के लिए;च--तथा; सुर-द्विषामू-देवताओं से ईर्ष्या करनेवालों का

अन्य लोग कहते हैं कि चूँकि वसुदेव तथा देवकी दोनों ने आपके लिए प्रार्थना की थी,अतएव आप उनके पुत्र-रूप में जन्मे हैं।

निस्सन्देह, आप अजन्मा हैं, फिर भी आप देवताओंका कल्याण करने तथा उनसे ईर्ष्या करनेवाले असुरों को मारने के लिए जन्म स्वीकार करतेहैं।

"

भारावतारणायान्ये भुवो नाव इवोदधौ ।

सीदन्त्या भूरिभारेण जातो ह्यात्मभुवार्थित: ॥

३४॥

भार-अवतारणाय--संसार का भार कम करने के लिए; अन्ये--अन्य लोग; भुव:--संसार का; नाव: --नाव; इब--सहश; उदधौ--समुद्र में; सीदन्त्या:--आर्त, दुखी; भूरि--अत्यधिक; भारेण-- भार से; जात: --उत्पन्न; हि--निश्चय ही;आत्म-भुवा--ब्रह्मा द्वारा; अर्थित: --प्रार्थना किये जाने पर

कुछ कहते हैं कि जब यह संसार, भार से बोझिल समुद्री नाव की भाँति, अत्यधिकपीड़ित हो उठा तथा आपके पुत्र ब्रह्मा ने प्रार्थना की, तो आप कष्ट का शमन करने के लिएअवतरित हुए हैं।

"

भवेस्मिन्‌ क्लिश्यमानानामविद्याकामकर्मभि: ।

श्रवणस्मरणाहाणि करिष्यन्निति केचन ॥

३५॥

भवे--भौतिक संसार में; अस्मिन्--इस; क्लिश्यमानानाम्--कष्ट भोगने-वालों का; अविद्या--अज्ञान; काम--इच्छा;कर्मभि:--सकाम कर्म करने के कारण; श्रवण--सुनने; स्मरण--याद करने; अर्हाणि--पूजन; करिष्यन्--कर सकताहै; इति--इस प्रकार; केचन-- अन्य लोग।

तथा कुछ कहते हैं कि आप श्रवण, स्मरण, पूजन आदि की भक्ति को जागृत करने केलिए प्रकट हुए हैं, जिससे भौतिक कष्टों को भोगनेवाले बद्धजीव इसका लाभ उठाकरमुक्ति प्राप्त कर सकें ।

"

श्रुण्वन्ति गायन्ति गृणन्त्यभीक्ष्णश:स्मरन्ति नन्दन्ति तवेहितं जना: ।

त एव पश्यन्त्यचिरेण तावक॑भवप्रवाहोपरमं पदाम्बुजम्‌ ॥

३६॥

श्रुण्वन्ति--सुनते हैं; गायन्ति--कीर्तन करते हैं; गृणन्ति--ग्रहण करते हैं; अभी क्ष्णश: --निरन्तर; स्मरन्ति--स्मरण करतेहैं; नन्दन्ति--हर्षित होते हैं; तब--आपके ; ईहितम्‌--कार्य-कलापों को; जना:--लोग; ते--वे; एव--निश्चय ही;'पश्यन्ति--देख सकते हैं; अचिरिण--शीघ्र ही; तावकम्‌--आपका; भव-प्रवाह--पुनर्जन्म की धारा; उपरमम्‌--बन्दहोना, रोकना; पद-अम्बुजमू--चरणकमल।

हे कृष्ण, जो आपके दिव्य कार्यकलापों का निरन्तर श्रवण, कीर्तन तथा स्मरण करतेहैं या दूसरों को ऐसा करते देखकर हर्षित होते हैं, वे निश्चय ही आपके उन चरणकमलों कादर्शन करते हैं, जो जन्म-मृत्यु के पुनगागमन को रोकनेवाले हैं।

"

अप्यद्य नस्त्वं स्वकृतेहित प्रभो जिहाससि स्वित्सुहदो5नुजीविन: ।

येषां न चान्यद्धवतः पदाम्बुजातू'परायणं राजसु योजितांहसाम्‌ ॥

३७॥

अपि--यदि; अद्य--आज; न:-- हमको; त्वमू--आप; स्व-कृत-- अपने आप सम्पन्न; ईहित--सारे कर्म; प्रभो--हे मेरेप्रभु; जिहाससि--त्यागते हो; स्वित्‌--सम्भवत: ; सुहृदः--घनिष्ठ मित्र; अनुजीविन: --दया पर निर्भर; येषामू--जिनका;न--न तो; च--तथा; अन्यत्‌--कोई अन्य; भवत:--आपके ; पद-अम्बुजात्--चरणकमलों से; परायणम्‌-- आश्रित;राजसु--राजाओं के प्रति; योजित--लगे हुए; अंहसाम्‌-शत्रुताहे मेरे प्रभु, अपने सारे कर्तव्य स्वयं पूरे कर दिये हैं।

आज जब हम आपकी कृपा परपूरी तरह आश्रित हैं और जब हमारा और कोई रक्षक नहीं है और जब सारे राजा हमसेशत्रुता किये हुए हैं, तो क्या आप हमें छोड़कर चले जायेंगे ?जिस तरह आत्मा के अदृश्य होते ही शरीर का नाम तथा यश समाप्त हो जाता है, उसीतरह यदि आप हमारे ऊपर कृपा-दृष्टि नहीं करेंगे, तो पाण्डवों तथा यदुओं समेत हमारा यशतथा गतिविधियाँ तुरन्त ही नष्ट हो जाएँगी।

"

के वयं नामरूपाभ्यां यदुभि: सह पाण्डवा: ।

भवतोडदर्शन॑ यहिं हृषीकाणामिवेशितु: ॥

३८॥

के--कौन हैं; वयम्‌--हम; नाम-रूपाभ्याम्‌-ख्याति तथा सामर्थ्यरहित; यदुभि: --यदुओं के; सह--साथ; पाण्डवा:-- तथा पाण्डबगण; भवत:--आपकी; अदर्शनम्‌--अनुपस्थिति; यहिं--मानो; हषीकाणाम्‌--इन्द्रियों का; इब--सहश; ईशितु:--जीव का।

जिस तरह आत्मा के अदृश्य होते ही शरीर का नाम तथा यश समाप्त हो जाता है, उसी तरह यदि आप हमारे ऊपर कृपा-दृष्टि नहीं करेंगे, तो पाण्डबों तथा यदुओं समेत हमारा यश तथा गतिविधियाँ तुरन्त ही नष्ट हो जाएँगी।

"

नेयं शोभिष्यते तत्र यथेदानीं गदाधर ।

त्वत्पदैरद्धिता भाति स्वलक्षणविलक्षितै: ॥

३९॥

न--नहीं; इयम्‌--यह हमारा राज्य; शोभिष्यते--सुन्दर लगेगा; तत्र--तब; यथा--जैसा अब है, इस रूप में; इदानीम्‌--कैसे; गदाधर--हे कृष्ण; त्वत्‌--आपके; पदैः--चरणों के द्वारा; अद्धिता--अंकित; भाति--शोभायमान हो रही है; स्व-लक्षण--आपके चि्ढों से; विलक्षितैः:--चिह्लों से ।

हे गदाधर ( कृष्ण ), इस समय हमारे राज्य में आपके चरण-चिह्नों की छाप पड़ी हुई है,और इसके कारण यह सुन्दर लगता है, लेकिन आपके चले जाने पर यह ऐसा नहीं रहजायेगा।

"

इमे जनपदाः स्वृद्धा: सुपक्रौषधिवीरुध: ।

वनाद्रिनद्युदन्वन्तो होधन्ते तव वीक्षितै: ॥

४०॥

इमे--ये सब; जन-पदा:--नगर तथा शहर; स्वृद्धा:--समृद्ध; सुपक्त--पूर्ण रूप से पकक्‍्व; औषधि--जड़ी -बूटी;वीरुध:--वनस्पतियाँ; वन--जंगल; अद्वि--पहाड़ियाँ; नदी--नदियाँ; उदन्वन्त:--समुद्र; हि--निश्चय ही; एधन्ते--वृद्ध्धिकरते हुए; तब--आपके ; वीक्षितै:--देखने से ।

ये सारे नगर तथा ग्राम सब प्रकार से समृद्ध हो रहे हैं, क्योंकि जड़ी-बूटियों तथा अन्नोंकी प्रचुरता है, वृक्ष फलों से लदे हैं, नदियाँ बह रही हैं, पर्वत खनिजों से तथा समुद्र सम्पदासे भरे पड़े हैं।

और यह सब उन पर आपकी कृपा-दृष्टि पड़ने से ही हुआ है।

"

अथ विश्वेश विश्वात्मन्‌ विश्वमूर्ते स्वकेषु मे ।

स्नेहपाशमिमं छिन्धि हढं पाण्डुषु वृष्णिषु ॥

४१॥

अथ--अतः; विश्व-ईश--हे ब्रह्माण्ड के स्वामी; विश्व-आत्मनू--हे ब्रह्माण्ड के आत्मा; विश्व-मूर्ते--हे विश्व-रूप;स्वकेषु मेरे स्वजनों में; मे--मेरे; स्नेह-पाशम्‌--स्नेह बन्धन को; इमम्‌--इस; छिन्धि--काट डालो; हढम्‌--कड़े;पाण्डुषु--पाण्डवों के लिए; वृष्णिषु--वृष्णियों के लिए भी ।

अतः हे ब्रह्माण्ड के स्वामी, हे ब्रह्माण्ड के आत्मा, हे विश्व-रूप, कृपा करके मेरेस्वजनों, पाण्डवों तथा वृष्णियों के प्रति मेरे स्नेह-बन्धन को काट डालें।

"

त्वयि मेनन्यविषया मतिर्मधुपतेसकृत्‌ ।

रतिमुद्दहतादड्स्‍ गड़ेवौघमुदन्वति ॥

४२॥

त्वयि--आप में; मे--मेरा; अनन्य-विषया---अनन्य; मतिः-- ध्यान; मधु-पते--हे मधु के स्वामी; असकृत्‌--निरन्तर;रतिमू--आकर्षण; उद्गहतात्--आप्लावित हो सकता है; अद्धा--प्रत्यक्ष रीति से; गड्भा--गंगानदी; इव--सहृश;ओघम्‌--बहती है; उदन्वति--समुद्र को ।

हे मधुपति, जिस प्रकार गंगा नदी बिना किसी व्यवधान के सदैव समुद्र की ओर बहतीहै, उसी प्रकार मेरा आकर्षण अन्य किसी ओर न बँट कर आपकी ओर निरन्तर बना रहे।

"

श्रीकृष्ण कृष्णसख वृष्ण्यृषभावनिष्रुग्‌राजन्यवंशदहनानपवर्गवीर्य ।

गोविन्द गोद्विजसुरातिहरावतारयोगेश्वराखिलगुरों भगवन्नमस्ते ॥

४३॥

श्री-कृष्ण--हे कृष्ण; कृष्ण-सख--हे अर्जुन के मित्र; वृष्णि--वृष्णि कुल के; ऋषभ-हे प्रमुख; अवनि--पृथ्वी;ध्रुदू--विप्लवी; राजन्य-वंश--राजाओं का वंश; दहन--हे विनाशकर्ता; अनपवर्ग--बिना अवनति के ; वीर्य--पराक्रम;गोविन्द--हे गोलोक के स्वामी; गो--गौवों के ; द्विज--ब्राह्मणों के; सुर--देवताओं के; अर्ति-हर--दुख दूर करने केलिए; अवतार--हे अवतार लेनेवाले; योग-ई श्रर--हे योग के स्वामी; अखिल--सम्पूर्ण जगत के; गुरो--हे गुरु;भगवनू--हे समस्त ऐश्वर्यों के स्वामी; नमः ते--आपको नमस्कार है।

हे कृष्ण, हे अर्जुन के मित्र, हे वृष्णिकुल के प्रमुख, आप उन समस्त राजनीतिक पक्षोंके विध्वंसक हैं, जो इस धरा पर उपद्रव फैलानेवाले हैं।

आपका शौर्य कभी क्षीण नहींहोता।

आप दिव्य धाम के स्वामी हैं और आप गायों, ब्राह्मणों तथा भक्तों के कष्टों को दूरकरने के लिए अवतरित होते हैं।

आपमें सारी योग-शक्तियाँ हैं और आप समस्त विश्व केउपदेशक ( गुरु ) हैं।

आप सर्वशक्तिमान ईश्वर हैं।

मैं आपको सादर प्रणाम करती हूँ।

"

सूत उवाचपृथयेत्थं कलपदै: परिणूताखिलोदय: ।

मन्दं जहास वैकुण्ठो मोहयज्निव मायया ॥

४४॥

सूतः उवाच--सूत ने कहा; पृथया--पृथा ( कुन्ती ) द्वारा; इत्थमू--यह; कल-पदैः--चुने हुए शब्दों द्वारा; परिणूत--'पूजित होकर; अखिल--सम्पूर्ण; उदबः--यश; मन्दम्‌--मन्द-मन्द; जहास--मुस्कराये; वैकुण्ठ:-- भगवान्‌; मोहयन्‌--मोहित करते हुए; इब--सहृशञ; मायया--अपनी योगशक्ति के द्वारा।

सूत गोस्वामी ने कहा : इस प्रकार भगवान्‌ अपने महिमागान के लिए चुने हुए शब्दों मेंकुन्तीदेवी के द्वारा की गई प्रार्थना सुनकर मन्द-मन्द मुसकाए।

यह मुस्कान उनकीयोगशक्ति के समान ही मोहक थी।

"

तां बाढमित्युपामन्त्रय प्रविश्य गजसाह्ययम्‌ ।

स्त्रियश्व स्वपुरं यास्यन्‌ प्रेम्णा राज्ञा निवारित: ॥

४५॥

ताम्‌--उन सबों को; बाढम्‌--स्वीकृत; इति--इस प्रकार; उपामन्त्रय--बाद में सूचित करके; प्रविश्य--प्रवेश करके;गजसाहयम्‌--हस्तिनापुर के महल में; स्त्रियः च--अन्य स्त्रियाँ; स्व-पुरम्--अपने निवास; यास्यन्‌--बिदा होते समय;प्रेम्णा--प्रेमपूर्वक; राज्ञा--राजा द्वारा; निवारित:--रोके गये

इस तरह श्रीमती कुन्तीदेवी की प्रार्थनाएं स्वीकार करने के बाद भगवान्‌ ने हस्तिनापुरके राजमहल में प्रवेश करके अन्य स्त्रियों को अपने प्रस्थान की सूचना दी।

लेकिन उन्हें प्रस्थान करते देख, राजा युधिष्ठिर ने उन्हें रोक लिया और अत्यन्त प्रेमपूर्वक उनसे याचनाकी।

"

व्यासादैरीश्वरेहाजैः कृष्णेनाद्धुतकर्मणा ।

प्रबोधितो पीतिहासैर्नाबुध्यत शुचार्पित: ॥

४६॥

व्यास-आइद्यै:--व्यास इत्यादि मुनियों द्वारा; ईश्वर--सर्वशक्तिमान ई श्वर; ईहा-- की इच्छा से; ज्ैः--विद्वान; कृष्णेन--स्वयं कृष्ण द्वारा; अद्भुत-कर्मणा--अद्भुत कार्य करनेवाले के द्वारा; प्रबोधित:--ढाढस बँधाने पर; अपि--यद्यपि;इतिहासै: --इतिहास के साक्ष्यों द्वारा; न--नहीं; अबुध्यत--संतुष्ट हुए; शुचा अर्पित: --दुखी अत्यधिक शोक में डूबे हुए

राजा युथ्िष्ठिर, व्यास आदि मुनियों तथा अद्भुत कर्मकरनेवाले साक्षात्‌ भगवान्‌ कृष्ण के उपदेशों से तथा समस्त ऐतिहासिक साक्ष्य से सान्त्वनानहीं पा सके।

"

आह राजा धर्मसुतश्चिन्तयन्‌ सुहृदां वधम्‌ ।

प्राकृतेनात्मना विप्रा: स्नेहमोहवर्श गत: ॥

४७॥

आह--कहा; राजा--राजा युधिष्टिर ने; धर्म-सुत:--धर्म ( यमराज ) के पुत्र; चिन्तयन्‌--सोचते हुए; सुहृदाम्‌-मित्रों के;वधम्‌--वध को; प्राकृतत--भौतिक विचार से; आत्मना--अपने द्वारा; विप्रा:--हे ब्राह्मणो; स्नेह--स्नेह; मोह--मोह;वशम्‌-के वशी भूत; गतः--गया हुआ।

धर्मपुत्र, राजा युधिष्ठिर, अपने मित्रों की मृत्यु से अभिभूत थे और सामान्यभौतिकतावादी मनुष्य की भाँति शोक-सन्तप्त थे।

हे मुनियो, इस प्रकार स्नेह से मोहग्रस्तहोकर वे बोले।

"

अहो मे पश्यताज्ञानं हृदि रूढं दुरात्मनः ।

पारक्यस्यैव देहस्य बह्व्यो मेउक्षौहिणीहता: ॥

४८ ॥

अहो--हाय; मे--मेरा; पश्यत--जरा देखो तो; अज्ञानम्‌--अज्ञान; हृदि--हृदय में; रूढम्‌--स्थित; दुरात्मन:--पापी का;पारक्यस्य--अन्यों के लिए; एव--निश्चय ही; देहस्य--शरीर का; बह्व्यः--अनेकानेक ; मे--मेरे द्वारा; अक्षौहिणी:--अक्षौहिणी सेनाए; हताः--मारी गई

राजा युधिष्ठिर ने कहा : हाय, मैं सबसे पापी मनुष्य हूँए! जरा मेरे हृदय को तो देखो,जो अज्ञान से पूर्ण है! यह शरीर, जो अन्ततः परोपकार के लिए होता है, उसने अनेकाने कअक्षौहिणी सेनाओं का वध करा दिया है।

"

बालट्विजसुहन्मित्रपितृभ्रातृगुरुद्रुह: ।

न मे स्यान्निरयान्मोक्षो हपि वर्षायुतायुतै: ॥

४९॥

बाल--लड़के; द्वि-ज--दो बार जन्म लेनेवाले; सुहृत्--शुभचिन्तक; मित्र--मित्र; पितृ--चाचा-ताऊ; भ्रातृ-भाई;गुरु--शिक्षक का; द्रुहः--मारनेवाला; न--कभी नहीं; मे--मेरा; स्थात्--होगा; निरयात्--नरक से; मोक्ष: --मुक्ति;हि--निश्चय ही; अपि--यद्यपि; वर्ष--साल; अयुत--लाखों; आयुतैः--जोड़े जाने पर।

मैंने अनेक बालकों, ब्राह्मणों, शुभ-चिन्तकों, मित्रों, चाचा-ताउओं, गुरुओं तथाभाइयों का वध किया है।

भले ही मैं लाखों वर्षों तक जीवित रहूँ, लेकिन मैं इन सारे पापोंके कारण मिलनेवाले नरक से कभी भी छुटकारा नहीं पा सकूँगा।

"

नैनो राज्न: प्रजाभर्तुर्थर्मयुद्धे वधो द्विषाम्‌ ।

इति मे न तु बोधाय कल्पते शासनं वच: ॥

५०॥

न--कभी नहीं; एन:--पाप; राज्ञ:--राजा का; प्रजा-भर्तुः--प्रजा के पालन में व्यस्त रहनेवाले; धर्म--सही निमित्त केलिए; युद्धे--युद्ध में; वध: --संहार; द्विषामू--शत्रुओं का; इति--ये सब; मे--मेरे लिए; न--कभी नहीं; तु--लेकिन;बोधाय--संतोष के लिए; कल्पते--वे शासन चलाने के लिए हैं; शासनम्--आदेश; वच:--शब्दों का |

जो राजा अपनी प्रजा के पालन में लगा रह कर सही निमित्त के लिए वध करता है, उसेकोई पाप नहीं लगता।

लेकिन यह आदेश मेरे ऊपर लागू नहीं होता।

"

स््रीणां मद्धतबन्धूनां द्रोहो योसाविहोत्थित: ।

कर्मभिर्गृहमेधीयैर्नाह कल्पो व्यपोहितुम्‌ ॥

५१॥

स्त्रीणाम्‌--स्त्रियों के; मत्‌--मेरे द्वारा; हत-बन्धूनाम्‌--मारे गये मित्रों का; द्रोह:--शत्रुता; यः--जो; असौ--ये सब;इह--यहाँ; उत्थित:--संचित हुई है; कर्मभि: --कार्य करने से; गृहमेधीयै:-- भौतिक कल्याण में लगे मनुष्यों द्वारा; न--कभी नहीं; अहम्‌--मैं; कल्प:--आशा कर सकता हूँ; व्यपोहितुम्‌--उसे मिटा पाने की ।

मैनें अनेक स्त्रियों के बंधुओं का वध किया है और इस तरह मैंने इस हद तक शत्रुतामोल ली है कि भौतिक कल्याण-कार्य के द्वारा इसे मिटा पाना सम्भव नहीं है।

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यथा पड्लेन पड्ढाम्भ: सुरया वा सुराकृतम्‌ ।

भूतहत्यां तथैवैकां न यज्ञेर्मार्ट्रमहति ॥

५२॥

यथा--जिस तरह; पट्लेन--कीचड़ से; पद्ल-अम्भ:--कीचड़-मिश्रित जल; सुरया--मदिरा से; वा--अथवा;सुराकृतम्‌-मदिरा के स्पर्श से उत्पन्न अशुद्धि; भूत-हत्याम्--पशुओं की हत्या; तथा--उसी प्रकार; एब--निश्चय ही;एकाम्--एक; न--कभी नहीं; यज्जै:--यज्ञों के द्वारा; माईटम्‌--प्रायश्चित्त करना; अहति--सम्भव है।

जिस प्रकार गंदे पानी को कीचड़ में डालकर छाना नहीं जा सकता, अथवा जैसे मद्रासे मलिन हुए पात्र को मदिरा से स्वच्छ नहीं किया जा सकता, उसी प्रकार नर-संहार काप्रायश्चित पशुओं की बलि देकर नहीं किया जा सकता।

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