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अध्याय नौ: भगवान कृष्ण की उपस्थिति में भीष्मदेव का निधन
1.9भगवान् कृष्ण की उपस्थिति में भीष्मदेव का देह-त्यागसूत उवाचइति भीत: प्रजाद्रोहात्सर्वधर्मविवित्सया ।
ततो विनशन प्रागाद् यत्र देवव्रतोपतत् ॥
१॥
सूतः उबाच-- श्री सूत गोस्वामी ने कहा; इति--इस प्रकार; भीत:--डरे हुए; प्रजा-द्रोहात्- प्रजा के मारे जाने से; सर्व--समस्त; धर्म--धर्म के कार्य; विवित्सया--जानने के लिए; ततः--तत्पश्चात्; विनशनम्--युद्ध-स्थल; प्रागात्--वे गए;यत्र--जहाँ; देव-ब्रतः--भीष्मदेव; अपतत्--मरने के लिये लेटे थे।
सूत गोस्वामी ने कहा : कुरुक्षेत्र के युद्ध स्थल में इतने सारे लोगों का वध करने केकारण घबराये हुए महाराज युधिष्ठिर उस स्थल पर गये, जहाँ नर-संहार हुआ था।
वहाँ परभीष्मदेव मरणासन्न होकर शरशय्या पर लेटे थे।
"
तदा ते भ्रातर: सर्वे सदश्वै: स्वर्णभूषितै: ।
अन्वगच्छन् रथैरविंप्रा व्यासधौम्यादयस्तथा ॥
२॥
तदा--तब; ते--वे सब; भ्रातर:--भाई; सर्वे--एकत्र; सत्-अश्वैः-- श्रेष्ठ घोड़ों द्वारा खींचे जानेवाले; स्वर्ण--सोने से;भूषितै:--विभूषित; अन्वगच्छनू-- अनुगमन किया; रथे:--रथों पर; विप्रा:--हे ब्राह्मणों; व्यास--व्यासदेव; धौम्य--धौम्य मुनि; आदय:--इत्यादि; तथा--उसी प्रकार।
उस समय उनके सारे भाई स्वर्णाभूषणों से सजे हुए उच्च कोटि के घोड़ों द्वारा खींचेजानेवाले सुन्दर रथों पर उनके पीछे-पीछे चल रहे थे।
उनके साथ व्यासदेव तथा धौम्य जैसेऋषि ( पाण्डवों के विद्वान पुरोहित ) तथा अन्य लोग थे।
"
भगवानपि विप्रर्षे रथेन सधनझय: ।
स तैर्व्यरोचत नृप: कुबेर इव गुह्कैः ॥
३॥
भगवान्--भगवान् ( श्रीकृष्ण ); अपि--भी; विप्र-ऋषे--हे ब्रह्मर्षियों; रथेन--रथ पर; स-धनझ्ञय: -- धनञ्जय ( अर्जुन )सहित; सः--वे; तैः--उनके द्वारा; व्ययोचत--अत्यन्त राजसी प्रतीत हो रहे थे; नृप:--राजा ( युधिष्ठिर ); कुवेर--देवताओं का भंडारी, कुबेर; इब--सहश; गुह्मकैः--गुह्मक नामक साथियों से
हे ब्रह्मर्षी, भगवान् श्रीकृष्ण भी, अर्जुन के साथ रथ पर सवार होकर पीछे-पीछे चलेआ रहे थे।
इस प्रकार राजा युधिष्टिर अत्यन्त राजसी प्रतीत हो रहे थे, मानो कुबेर अपनेसाथियों ( गुह्यकों ) से घिरा हो।
इृष्ठा निपतितं भूमौ दिवश्च्युतमिवामरम् ।
प्रणेमु: पाण्डवा भीष्मं सानुगा: सह चक्रिणा ॥
४॥
इष्टा--देखकर; निपतितम्--लेटे; भूमौ-- भूमि पर; दिवः--आकाश से; च्युतम्--गिरे हुए; इब--सहृश; अमरम्--देवता; प्रणेमु;--प्रणाम किया; पाण्डबवा:--पाण्डु-पुत्रों ने; भीष्मम्-- भीष्म को; स-अनुगा: --अपने छोटे भाइयों सहित;सह--सहित; चक्रिणा --चक्रधारी भगवान्।
आकाश से आ गिरे देवता के समान उन्हें ( भीष्मदेव को ) भूमि पर लेटे देखकरपाण्डव-सम्राट युधिष्ठटिर ने अपने छोटे भाइयों तथा भगवान् कृष्ण समेत उन्हें प्रणाम किया।
"
इृष्ठा निपतितं भूमौ दिवश्च्युतमिवामरम् ।
प्रणेमु: पाण्डवा भीष्म सानुगा: सह चक्रिणा ॥
४॥
इृष्ठा--देखकर; निपतितम्--लेटे; भूमौ-- भूमि पर; दिव:ः--आकाश से; च्युतम्--गिरे हुए; इब--सहृश; अमरम्ू-- देवता; प्रणेमु:--प्रणाम किया; पाण्डवा: --पाण्डु-पुत्रों ने; भीष्मम्-- भीष्म को; स-अनुगा:--अपने छोटे भाइयों सहित; सह--सहित; चक्रिणा--चक्रधारी भगवान्.
आकाश से आ गिरे देवता के समान उन्हें ( भीष्यदेव को ) भूमि पर लेटे देखकर पाण्डव-सम्राट युधिष्ठटिर ने अपने छोटे भाइयों तथा भगवान् कृष्ण समेत उन्हें प्रणाम किया।
"
तत्र ब्रह्मर्षय: सर्वे देवर्षयश्चव सत्तम ।
राजर्षयश्व तत्रासन् द्रष्टू भरतपुड़वम् ॥
५॥
तत्र--वहाँ; ब्रह्म-ऋषय: --ब्राह्मणों में ऋषि; सर्वे--समस्त; देव-ऋषय:--देवताओं में ऋषि; च--तथा; सत्तम--सतोगुण को प्राप्त; राज-ऋषय: --राजाओं में ऋषि; च--तथा; तत्र--उस स्थान पर; आसन्--उपस्थित थे; द्रष्टम्--देखने के लिए; भरत--राजा भरत के वंशजों में; पुड्रवम्--प्रधान को ।
राजा भरत के वंशजों में प्रधान ( भीष्म ) को देखने के लिए ब्रह्माण्ड के सारे सतोगुणीमहापुरुष, यथा देवर्षि, ब्रह्मर्षि तथा राजर्षि वहाँ पर एकत्र हुए थे।
"
पर्वतो नारदो धौम्यो भगवान् बादरायण: ।
बृहदश्वो भरद्वाज: सशिष्यो रेणुकासुत: ॥
६॥
वस्िष्ठ इन्द्रप्रमदर्त्रितो गृत्समदोसितः ।
कक्षीवान् गौतमोअत्रिश्व कौशिको थ सुदर्शन: ॥
७॥
पर्वतः--पर्वत मुनि; नारद: --नारद मुनि; धौम्य:--धौम्य; भगवान्--ईश्वर के अवतार; बादरायण:--व्यासदेव;बृहदश्च:--बृहदश्च; भरद्वाज:-- भरद्वाज; स-शिष्य:--अपने शिष्यों सहित; रेणुका-सुत:--परशुराम; वसिष्ठ:--वशिष्ठ;इन्द्रप्रमद:--इन्द्रप्रमद; त्रित:--त्रित; गृत्समद: --गृत्समद; असित:--असित; कक्षीवान्--कक्षीवान; गौतम: --गौतम;अत्रिः--अत्रि; च--तथा; कौशिक: --कौशिक; अथ--तथा; सुदर्शन: --सुदर्शन ।
पर्वत मुनि, नारद, धौम्य, ईश्वर के अवतार व्यास, बृहदश्च, भरद्वाज, परशुराम तथाउनके शिष्य, वसिष्ठ, इन्द्रप्रमद, त्रित, गृत्समद, असित, कक्षीवान्, गौतम, अत्रि, कौशिकतथा सुदर्शन जैसे सारे ऋषि वहाँ उपस्थित थे।
"
अन्ये च मुनयो ब्रह्मन् ब्रह्मगतादयोमला: ।
शिष्यैरुपेता आजग्मु: कश्यपाज्धिरसादय: ॥
८॥
अन्ये--अन्य कई; च-- भी; मुनय:--मुनिगण; ब्रह्मनू--हे ब्राह्मणों; ब्रह्मगत--शुकदेव गोस्वामी; आदय: --इत्यादि;अमला:--पूर्ण रूप से शुद्ध; शिष्यैः--शिष्यों के द्वारा; उपेता:--साथ-साथ; आजम्मु:--आये; कश्यप--कश्यप;आ्विस--आंगिरस; आदयः--आदि।
तथा शुकदेव गोस्वामी एवं अन्य पवित्रात्माएं, कश्यप, आंगिरस इत्यादि अपने-अपनेशिष्यों के साथ वहाँ पर आये।
"
तानू समेतान् महाभागानुपलभ्य वसूत्तम: ।
पूजयामास धर्मज्ञो देशकालविभागवित् ॥
९॥
तान्--उन सभी; समेतान्--समवेत; महा-भागान्--अत्यन्त शक्तिशाली पुरुषों को; उपलभ्य--पाकर; वसु-उत्तम:--बसुओं में श्रेष्ठ ( भीष्मदेव ने ); पूजयाम् आस--स्वागत किया; धर्म-ज्ञ:--धर्म का ज्ञाता; देश--स्थान; काल--समय;विभाग-वित्--जो देश-काल के अनुसार अपने को समंजित कर लेता है।
आठ वसुओं में सर्वश्रेष्ठ भीष्मदेव ने वहाँ पर एकत्र हुए समस्त महान् तथा शक्तिसम्पन्नऋषियों का स्वागत किया, क्योंकि भीष्मदेव को देश तथा काल के अनुसार समस्त धार्मिकनियमों की भलीभाँति जानकारी थी।
"
कृष्णं च तत्प्रभावज्ञ आसीन॑ जगदीश्वरम् ।
हृदिस्थं पूजयामास माययोपात्तविग्रहम् ॥
१०॥
कृष्णम्-भगवान् श्रीकृष्ण को; च--भी; तत्--उनका; प्रभाव-ज्ञ:--महिमा को जाननेवाले ( भीष्म ); आसीनम्--बैठेहुए; जगतू-ईश्वरम्-ब्रह्माण्ड के स्वामी को; हृदि-स्थम्--हृदय में आसीन; पूजयाम् आस--पूजा; मायया--अन्तरंगाशक्ति के द्वारा; उपात्त--प्रकट; विग्रहम्-स्वरूप को |
भगवान् श्रीकृष्ण प्रत्येक के हृदय में आसीन हैं, तो भी वे अपनी अन्तरंगा शक्ति सेअपना दिव्य रूप प्रकट करते हैं।
ऐसे भगवान् साक्षात भीष्मदेव के समक्ष बैठे हुए थे।
औरचूँकि भीष्मदेव उनकी महिमा से परिचित थे, अतएव उन्होंने उनकी विधिवत् पूजा की।
"
पाण्डुपुत्रानुपासीनान् प्रश्नयप्रेमसज्भतान् ।
अभ्याचष्टानुरागाश्रैरन्धी भूतेन चक्षुषा ॥
११॥
पाण्डु--महाराज युध्िष्ठिर तथा उनके भाइयों के दिवंगत पिता के; पुत्रान्--पुत्रों को; उपासीनान्--पास ही शान्त बैठे हुए;प्रश्रय--अभिभूत; प्रेम--प्रेमभाव में; सड्गतान्--एकत्र हुए; अभ्याचष्ट--बधाई दी; अनुराग -प्रेमपूर्वक; अश्रै:--आनन्दाश्रुओं द्वारा; अन्धी भूतेन--आप्लावित; चक्षुषा--नेत्रों से |
पास ही महाराज पाण्डु के सारे पुत्र शान्त बैठे थे और अपने मरणासन्न पितामह के प्रेमसे अभिभूत थे।
यह देखकर भीष्मदेव ने उन्हें भावपूर्ण बधाई दी।
उनके नेत्रों में आनन्दा श्रुथे, क्योंकि वे प्रेम तथा स्नेह से आप्लावित हो गये थे।
"
अहो कष्टमहो न्याय्यं यद्यूयं धर्मनन्दना: ।
जीवितु नार्हथ क्लष्टं विप्रधर्माच्युताश्रया: ॥
१२॥
अहो--अहो; कष्टम्--कितना कष्ट; अहो --ओह; अन्याय्यम्--कितना अन्याय; यत्-- क्योंकि; यूयम्--तुम सभी; धर्म-नन्दना:--साक्षात् धर्म के पुत्र; जीवितुमू--जीवित रहने के लिए; न--कभी नहीं; अर्हथ--योग्य हो; क्लिप्टम्--कष्ट;विप्र--ब्राह्मण; धर्म--धर्म; अच्युत--ई श्वर द्वारा; आश्रया: --सुरक्षित होकर
भीष्मदेव ने कहा : ओह, तुम लोगों ने, साक्षात् धर्म के पुत्र होते हुए भी, कितनीयातनाएँ तथा कितना अन्याय सहा है।
उन कष्टों के अन्तर्गत तुम सबको जीवित रहने कीआशा न थी, फिर भी ब्राह्मणों, ईश्वर तथा धर्म ने तुम्हारी रक्षा की है।
"
संस्थितेडतिरथे पाण्डौ पृथा बालप्रजा वधू: ।
युष्पत्कृते बहून् क्लेशान् प्राप्ता तोकवती मुहु: ॥
१३॥
संस्थिते--मृत्यु के बाद; अति-रथे--महान सेनानायक; पाण्डौ--पाण्डु की; पृथा--कुन्ती; बाल-प्रजा--छोटे-छोटेबच्चों वाले; वधू:--मेरी पुत्रवधू; युष्मत्-कृते--तुम्हारे कारण; बहूनू-- अनेक; क्लेशान्--कष्टों को; प्राप्ता--भोगकर;तोक-वती--बड़े-बड़े बालकों के होने पर भी; मुहुः--निरन्तर ।
जहाँ तक मेरी पुत्रवधू कुन्ती का सम्बन्ध है, वह महान् सेनापति पाण्डु की मृत्यु होने परअनेक सारे बच्चों के साथ विधवा हो गई और इस के कारण उसने घोर कष्ट सहे।
और अबजब तुम लोग बड़े हो गये हो, तो भी वह तुम्हारे कर्मों के कारण काफी कष्ट उठा रही है।
"
सर्व कालकृतं मन्ये भवतां च यदप्रियम् ।
सपालो यद्वशे लोको वायोरिव घनावलि: ॥
१४॥
सर्वम्--यह सब; काल-कृतम्--काल द्वारा किया गया; मन्ये--मैं सोचता हूँ; भवताम् च--तुम्हारे लिए भी; यत्--जोभी; अप्रियम्--अप्रिय; स-पाल:--शासकों समेत; यत्-वशे--उस काल के वशीभूत; लोक:--प्रत्येक लोक में सभीलोग; वायो: --वायु ले जाती है; इब--सहृश; घन-आवलि:--बादलों का समूह |
मेरे विचार से यह सब प्रबल काल के कारण हुआ है, जिसके वशीभूत होकर हर कोईव्यक्ति प्रत्येक लोक में मारा मारा फिरता है, जिस प्रकार वायु द्वारा बादल इधर से उधर लेजाये जाते हैं।
"
यत्र धर्मसुतो राजा गदापाणिर्वृकोदर: ।
कृष्णोस््री गाण्डिवं चाप॑ सुहत्कृष्णस्ततो विपत् ॥
१५॥
यत्र--जहाँ; धर्म-सुतः--धर्मराज का पुत्र; राजा--राजा; गदा-पाणि:--हाथ में शक्तिशाली गदा धारण करनेवाला;वृकोदरः--भीम; कृष्ण: --अर्जुन; अस्त्री--अस्त्र धारण करनेवाला; गाण्डिवम्--गाण्डीव को; चापम्-- धनुष; सुहत्--शुभेच्छु; कृष्ण: -- भगवान् कृष्ण; ततः--उससे; विपत्--विपत्ति ।
ओह, अपरिहार्य काल का प्रभाव कितना आश्चर्यजनक होता है, यह अपरिवर्तनीय हैअन्यथा धर्मराज के पुत्र युधिष्ठिर, गदाधारी भीम तथा गाण्डीव अस्त्र धारण करनेवालेबलशाली महानू धनुर्धर अर्जुन एवं सबके ऊपर पाण्डवों के प्रत्यक्ष हितैषी कृष्ण के होतेहुए यह विपत्ति क्यों आती ?"
न हास्य कर्हिचिद्राजन् पुमान् वेद विधित्सितम् ।
यद्विजिज्ञासया युक्ता मुह्यन्ति कबयोपि हि ॥
१६॥
न--कभी नहीं; हि--निश्चय ही; अस्य--उसका; कर्हिचित्--कोई भी; राजन्--हे राजा; पुमान्--कोई; वेद--जानताहै; विधित्सितम्--योजना; यत्--जो; विजिज्ञासबा--जिज्ञासा; युक्ता:--लगा हुआ; मुहान्ति--मोहग्रस्त; कवय:--बड़े -बड़े विचारक; अपि-- भी; हि--निश्चय ही।
हे राजन् भगवान् ( श्रीकृष्ण ) की योजना को कोई नहीं जान सकता।
यद्यपि बड़े-बड़ेचिन्तक उनके विषय में जिज्ञासा करते हैं, लेकिन वे मोहित हो जाते हैं।
"
तस्मादिदं दैवतन्त्रं व्यवस्य भरतर्षभ ।
तस्यानुविहितोनाथा नाथ पाहि प्रजा: प्रभो ॥
१७॥
तस्मात्--अतएव; इृदम्--यह; दैव-तन्त्रमू-- भाग्य का वशीकरण; व्यवस्य--निश्चित करके; भरत-ऋषभ--हे भरतवंशमें श्रेष्ठ; तस्थ--उसके द्वारा; अनुविहित:--इच्छित; अनाथा: -- असहाय; नाथ--हे स्वामी; पाहि--रक्षा करो; प्रजा: --जनता की; प्रभो-हे प्रभु।
अतएव हे भरतवंश में श्रेष्ठ ( युधिष्ठिर ), मैं मानता हूँ कि यह सब भगवान् की योजनाके अन्तर्गत है।
तुम भगवान् की अचिन्त्य योजना को स्वीकार करो और उसका पालनकरो।
अब तुम नियुक्त किए गये शासनाध्यक्ष हो, अतएव हे महाराज, आपको अब उनलोगों की देखभाल करनी चाहिए जो असहाय हो चुके हैं।
"
एष वे भगवान्साक्षादाद्यो नारायण: पुमान् ।
मोहयन्मायया लोकं गूढश्चरति वृष्णिषु ॥
१८॥
एष:--यह; वै--निश्चय ही; भगवान्-- भगवान्; साक्षात्--मूल; आद्य:--प्रथम; नारायण:--परमे श्वर ( जल में शयनकरनेवाले ); पुमान्--परम भोक्ता; मोहयन्--मोहित करनेवाला; मायया--स्वसर्जित शक्ति द्वारा; लोकम्- ग्रहों को;गूढः--अकल्पनीय; चरति--विचरण करता है; वृष्णिषु--वृष्णिकुल में ।
ये श्रीकृष्ण अकल्पनीय आदि भगवान् ही हैं।
ये प्रथम नारायण अर्थात् परम भोक्ता हैं।
लेकिन ये राजा वृष्णि के वंशजों में हमारी ही तरह विचरण कर रहे हैं और हमें स्व-सृजितशक्ति के द्वारा मोहग्रस्त कर रहे हैं।
"
अस्यानुभावं भगवान् वेद गुह्मतमं शिव: ।
देवर्षिनारद: साक्षाद्धभवान् कपिलो नृप ॥
१९॥
अस्य--उनकी; अनुभावम्--महिमा; भगवान्--सर्वशक्तिमान; वेद--जानते हैं; गुह्य-तमम्--अत्यन्त गोपनीय; शिव:--शिवजी; देव-ऋषि: --देवताओं में महान ऋषि; नारद:--नारद; साक्षात्-प्रत्यक्ष; भगवान्-- भगवान्; कपिल: --कपिल; नृप--हे राजा
हे राजन, शिवजी, देवर्षि नारद तथा भगवान् के अवतार कपिल--ये सभी प्रत्यक्षसम्पर्क द्वारा भगवान् की महिमा के विषय में अत्यन्त गोपनीय जानकारी रखते हैं।
"
यं मन्यसे मातुलेयं प्रियं मित्र सुहृत्तमम् ।
अकरो: सचिवं दूतं सौहदादथ सारधिम् ॥
२०॥
यमू--व्यक्ति; मन्यसे--सोचते हो; मातुलेयम्--ममेरे भाई को; प्रियम्--अत्यन्त प्रिय; मित्रम्--मित्र; सुहत्-तमम्--अत्यधिक हितैषी; अकरोः--किया गया; सचिवम्--मन्त्री; दूतम्--दूत; सौहदात्--शुभ कामना से; अथ--तत्पश्चात्;सारथिम्--सारथी ।
हे राजन, तुमने अज्ञानवश ही जिस व्यक्ति को अपना ममेरा भाई, अपना अत्यन्त प्रियमित्र, शुभेषी, मन्त्री, दूत, उपकारी इत्यादि माना है, वे स्वयं भगवान् श्रीकृष्ण हैं।
"
सर्वात्मन: समहशो ह्ाद्दवस्यानहड्कृते: ।
तत्कृतं मतिवैषम्यं निरवद्यस्थ न क्नचित् ॥
२१॥
सर्व-आत्मन:--प्रत्येक जीव के हृदय में वास करनेवाले का; सम-हृशः--सबों पर समान रूप से दयालु होनेवाले का;हि--निश्चय ही; अद्बयस्थ--परम का; अनहड्कृतेः--मिथ्या अहंकार की सारी पहचान से मुक्त; ततू-कृतम्--उनके द्वारासब कुछ किया गया; मति-- चेतना; वैषम्यम्--विषमता, अन्तर; निरवद्यस्थ--समस्त आसक्ति से मुक्त हुआ; न--कभीनहीं; क्चितू--किसी अवस्था मेंपूर्ण पुरुषोत्तम भगवान् होने के कारण वे प्रत्येक के हृदय में विद्यमान हैं।
वे सबों परसमान रूप से दयालु हैं और भेदाभेद के मिथ्या अहंकार से सर्वथा मुक्त हैं।
अतएवं वे जोकुछ करते हैं, वह भौतिक उन्माद से मुक्त होता है।
वे समदर्शा हैं।
"
तथाप्येकान्तभक्तेषु पश्य भूपानुकम्पितम् ।
यन्मेअसूंस्त्यजत: साक्षात्कृष्णो दर्शममागत: ॥
२२॥
तथापि--फिर भी; एकान्त--एकनिष्ठ; भक्तेषु --भक्तों में; पश्य--देखो; भू-प--हे राजा; अनुकम्पितम्--कितनादयावान; यत्--जिसके लिए; मे--मेरा; असूनू--जीवन; त्यजत:--समाप्त करते हुए; साक्षात्-- प्रत्यक्ष; कृष्ण:--भगवान्; दर्शनमू--सामने; आगत:--कृपा करके आये हैं।
सबों पर समान रूप से दयालु होते हुए भी वे अब कृपापूर्वक मेरे समक्ष आये हैं, जबमें मेरे जीवन का अंत कर रहा हूँ, क्योंकि मैं उनका अनन्य सेवक हूँ।
"
भकत्यावेश्य मनो यस्मिन् वाचा यन्नाम कीर्तयन् ।
त्यजन् कलेवरं योगी मुच्यते कामकर्मभि: ॥
२३॥
भक्त्या--भक्तिपूर्वक; आवेश्य--चिन्तन करके; मन: --मन; यस्मिन्--जिसमें; वाचा--शब्दों से; यत्--कृष्ण का;नाम--पवित्र नाम; कीर्तबन्--कीर्तन करते हुए; त्यजन्--परित्याग करते हुए; कलेवरम्--इस भौतिक शरीर को;योगी--भक्त; मुच्यते--मोक्ष पाता है; काम-कर्मभि:--सकाम कर्मों से ।
वे पुरुषोत्तम भगवान् जो एकाग्र भक्ति तथा चिन्तन से एवं पवित्र नाम के कीर्तन सेभक्तों के मन में प्रकट होते हैं, वे उन भक्तों को उनके द्वारा भौतिक शरीर को छोड़ते समयसकाम कर्मो के बन्धन से मुक्त कर देते हैं।
"
स देवदेवो भगवान् प्रतीक्षतांकलेवरं यावदिदं हिनोम्यहम् ।
प्रसन्नहासारुणलोचनोल््लस-न्मुखाम्बुजो ध्यानपथश्चतुर्भुज: ॥
२४॥
सः--वे; देव-देव:--देवताओं के भी देवता, प्रभुओं में श्रेष्ठ भगवान्-- भगवान्; प्रतीक्षताम्--कृपया प्रतीक्षा करें;'कलेवरम्--शरीर को; यावत्--जब तक; इृदम्--इस; हिनोमि--त्याग दूँ; अहम्--मैं; प्रसन्न--प्रसन्न; हास--हँसते हुए;अरुण-लोचन--प्रातःकालीन सूर्य के समान लाल नेत्र; उल्लसत्--सुन्दर ढंग से सजाये; मुख-अम्बुज:--कमल केसमान उनका मुख; ध्यान-पथ:--मेरे ध्यान के मार्ग में; चतुर-भुज:--चार भुजाओंबाले नारायण ( भीष्मदेव द्वारा आराध्यदेव )चतुर्भुज-रूप
उगते सूर्य की भाँति अरुणनेत्रों तथा सुन्दर रीति से सजाये, मुस्करातेकमलमुख वाले मेरे भगवान्, आप उस क्षण तक यहीं मेरी प्रतीक्षा करें, जब तक मैं अपनायह भौतिक शरीर छोड़ न दूँ।
"
सूत उवाचयुधिष्टिरस्तदाकर्ण्य शयानं शरपञ्जरे ।
अपृच्छद्विविधान्धर्मानृषीणां चानुश्रण्वताम् ॥
२५॥
सूतः उबाच-- श्री सूत गोस्वामी ने कहा; युथिष्टिर:--राजा युथिष्ठिर; तत्--वह; आकर्ण्य--सुनकर; शयानमू्--लेटे हुए;शर-पञ्ञरे--बाणों की शय्या पर; अपृच्छत्--पूछा; विविधान्--विविध; धर्मानू--कर्तव्यों को; ऋषीणाम्--ऋषियों का;च--तथा; अनुशभ्रुण्वताम्--सुनने के बाद।
सूत गोस्वामी ने कहा : भीष्मदेव को इस प्रकार आग्रहपूर्ण स्वर में बोलते देखकर,महाराज युधिष्ठिर ने समस्त महर्षियों की उपस्थिति में उनसे विभिन्न धार्मिक कृत्यों केअनिवार्य सिद्धान्त पूछे।
"
पुरुषस्वभावविहितान् यथावर्ण यथाश्रमम् ।
वैराग्यरागोपाधिभ्यामाम्नातोभयलक्षणान् ॥
२६॥
पुरुष--मनुष्य; स्व-भाव--अपने गुणों से; विहितान्--विहित, अनुमत; यथा--के अनुसार; वर्णम्--जातियों कावर्गीकरण; यथा--के अनुसार; आश्रमम्--जीवन के आश्रम; बैराग्य--विरक्ति; राग--आसक्ति; उपाधिभ्याम्--ऐसीउपाधियों से; आम्नात--क्रमबद्ध रूप से; उभय--दोनों; लक्षणान्--लक्षणों को ।
महाराज युथ्रिष्ठिर के पूछे जाने पर भीष्मदेव ने सर्वप्रथम व्यक्ति की योग्यताओं केअनुसार जातियों के वर्गीकरण (वर्ण ) तथा जीवन के आश्रमों का वर्णन किया।
फिर उन्होंने क्रमबद्ध रूप से निवृत्ति तथा प्रवृत्ति नामक दो उपखण्डों का वर्णन किया।
"
दानधर्मान् राजधर्मान् मोक्षधर्मान् विभागश: ।
स्त्रीधर्मान् भगवद्धर्मानू समासव्यासयोगत: ॥
२७॥
दान-धर्मान्--दान के कृत्यों को; राज-धर्मान्--राजाओं के राज्य विषयक कार्य-कलापों को; मोक्ष-धर्मानू--मोक्ष केकार्यों को; विभागश: --विभागानुसार; स्त्री-धर्मानू--स्त्रियों के कर्तव्य को; भगवत्-धर्मानू--भक्तों के कार्यों को;समास--सामान्यता; व्यास--स्पष्ट रूप से; योगत:--योग के द्वारा।
तब उन्होंने दान-कर्मों, राजा के राज्य-विषयक कार्यकलापों तथा मोक्ष-कर्मों कीखणड-वार व्याख्या की।
फिर उन्होंने स्त्रियों तथा भक्तों के कर्तव्यों का संक्षेप में विशदरूप से वर्णन किया।
"
धर्मार्थकाममोक्षांश्व सहोपायान् यथा मुने ।
नानाख्यानेतिहासेषु वर्णयामास तत्त्ववित् ॥
२८॥
धर्म--वृत्तिपरक कार्य; अर्थ--आर्थिक विकास; काम--च्छा पूर्ति; मोक्षानू--चरम-मुक्ति; च--तथा; सह--साथ;उपायान्--उपायों के; यथा--जिस तरह; मुने--हे मुनि; नाना--अनेक; आख्यान--ऐतिहासिक कथाओं के पाठ द्वारा;इतिहासेषु--इतिहासों में; वर्णयाम् आस--वर्णन किया; तत्त्व-वित्-सत्य के ज्ञाता।
तत्पश्चात्, उन्होंने इतिहास से उद्धरण देते हुए, विभिन्न आश्रमों तथा जीवन कीअवस्थाओं के वृत्तिपरक कार्यों का वर्णन किया, क्योंकि वे उस सत्य से भलीभाँतिपरिचित थे।
"
धर्म प्रवदतस्तस्य स काल: प्रत्युपस्थित: ।
यो योगिनश्डन्दमृत्योर्वाज्छितस्तूत्तरायण: ॥
२९॥
धर्मम्--वृत्तिपरक कार्यो को; प्रवदतः--वर्णन करते हुए; तस्य--उसका; सः--वह; काल:--समय; प्रत्युपस्थित: --प्रकट हुआ; यः--जो है; योगिन:--योगियों के लिए; छन्द-मृत्यो: --इच्छित समय में मृत्यु करनेवाले का; वाउ्छित:--केद्वारा इच्छित; तु--लेकिन; उत्तरायण:--वह अवधि, जब सूर्य उत्तरी क्षितिज पर रहता है।
जब भीष्मदेव वृत्तिपरक कर्तव्यों का वर्णन कर रहे थे, तभी सूर्य उत्तरी गोलार्द्द कीओर चला गया।
इच्छानुसार मरनेवाले योगी इसी अवधि की कामना करते हैं।
"
तदोपसंहत्य गिर: सहस्रणी-विमुक्तसड़ं मन आदिपूरुषे ।
कृष्णे लसत्पीतपटे चतुर्भुजेपुरःस्थितेड्मीलितहग्व्यधारयत् ॥
३०॥
तदा--उस समय; उपसंहत्य--हटाकर; गिर: --वाणी; सहस्त्रणी:-- भीष्मदेव ( जो हजारों विद्याओं तथा कलाओं मेंनिष्णात थे ); विमुक्त-सड्रम्--अन्य सारी बातों से पूर्ण रूप से मुक्त; मनः--मन; आदि-पूरुषे-- आदि भगवान्; कृष्णे--कृष्ण में; लसतू-पीत-पटे--पीताम्बर से सुशोभित; चतुर्-भुजे--चार भुजाओं वाले आदि नारायण में; पुर: --समक्ष;स्थिते--खड़े; अमीलित--खुले हुए; हक्--दृष्टि; व्यधारयत्--स्थिर कर लिया।
तत्पश्चात् वह व्यक्ति, जो हजारों अर्थों से युक्त विभिन्न विषयों पर बोलता था तथाहजारों युद्धों में लड़ चुका था और हजारों व्यक्तियों की रक्षा कर चुका था, उसने बोलनाबन्द कर दिया।
उसने समस्त बन्धन से पूर्ण रूप से मुक्त होकर, अन्य सभी वस्तुओं सेअपना मन हटाकर, अपने खुले नेत्रों को उन आदि भगवान् श्रीकृष्ण पर टिका दिया, जोउनके समक्ष खड़े थे, जो चार भुजाओं वाले थे और जगमग करते एवं चमचमाते हुए पीतवस्त्र धारण किये थे।
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विशुद्धया धारणया हताशुभ-स्तदीक्षयैवाशु गतायुधश्रम: ।
निवृत्तसर्वेन्द्रियवृत्तिविभ्रम-स्तुष्टाव जन्यं विसृजझनार्दनम् ॥
३१॥
विशुद्धबा--विशुद्ध; धारणया-- ध्यान से; हत-अशुभ:-- भौतिक अस्तित्व के अशुभ गुणों को जिसने कम कर दिया है;तत्--उसको; ईक्षया--देखने से; एब--केवल; आशु--तुरन््त; गता--गये हुए; युध--तीरों से; श्रम:-- थकान;निवृत्त--रोका जाकर; सर्व--समस्त; इन्द्रिय--इन्द्रियों के; वृत्ति--कार्यकलाप; विशभ्रम:--लिप्त होकर; तुष्टाब--उसनेप्रार्थना की; जन्यम्-- भौतिक आश्रय; विसृजन्-्यागते हुए; जनार्दनम्--जीवों के नियन्ता को
शुद्ध ध्यान द्वारा भगवान् श्रीकृष्ण को देखते हुए, वे तुरन्त समस्त भौतिक अशुभअवस्थाओं से और तीरों के घाव से होनेवाली शारीरिक पीड़ा से मुक्त हो गये।
इस प्रकारउनकी सारी इन्द्रियों के कार्यकलाप रूक गये और उन्होंने शरीर को त्यागते हुए समस्तजीवों के नियन्ता की दिव्य भाव से स्तुति की।
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श्रीभीष्पम उवाच: इति मतिरुपकल्पिता वितृष्णा भगवति सात्वतपुड्रवे विभूम्नि ।
स्वसुखमुपगते क्लचिद्विहर्तुप्रकृतिमुपेयुषि यद्धवप्रवाह: ॥
३२॥
श्री-भीष्य: उबाच--श्री भीष्मदेव ने कहा; इति--इस प्रकार; मतिः--सोचना, अनुभव करना तथा चाहना;उपकल्पिता--नियुक्त करना; वितृष्णा--समस्त इन्द्रिय इच्छाओं से मुक्त; भगवति-- भगवान् में; सात्वत-पुड्रवे-- भक्तोंके नेता में; विभूम्नि--परम; स्व-सुखम्--आत्म-तोष; उपगते--प्राप्त हुए; क्रचितू--कभी-कभी; विहर्तुम्--दिव्यआनन्द से; प्रकृतिमू--भौतिक जगत में; उपेयुषि--स्वीकार करें; यत्-भव--जिनसे सृष्टि; प्रवाह:--बनी है तथा विनष्टहोती है
भीष्मदेव ने कहा : अभी तक मैं जो सोचता, जो अनुभव करता तथा जो चाहता था,वह विभिन्न विषयों तथा वृत्तियों के अधीन था, किन्तु अब मुझे उसे परम शक्तिमान भगवान्श्रीकृष्ण में लगाने दो।
वे सदैव आत्मतुष्ट रहनेवाले हैं, किन्तु कभी-कभी भक्तों के नायकहोने के कारण, इस भौतिक जगत में अवतरित होकर दिव्य आनन्द-लाभ करते हैं, यद्यपियह सारा भौतिक जगत उन्हीं के द्वारा सृजित है।
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त्रिभुवनकमनं तमालवर्णरविकरगौरवराम्बरं दधाने ।
वपुरलककुलावृताननाब्जंविजयसखे रतिरस्तु मेडउनवद्या ॥
३३॥
त्रि-भुवन--तीनों लोक; कमनम्--अभीष्ट; तमाल-वर्णम्--तमालवृक्ष जैसे नीले रंगवाले; रवि-कर--सूर्य की किरणोंवाला; गौर--सुनहरा रंग; वराम्बरम्--चमचमाता वस्त्र; दधाने--पहने हुए; वपु:--शरीर; अलक-कुल-आवृत--चन्दनकी रचना से आवृत; अनन-अब्जम्--कमल के समान मुख; विजय-सखे--अर्जुन के मित्र में; रति: अस्तु--आसक्ति हो;मे--मेरी; अनवद्या-- फल की इच्छा से रहित, निष्काम ।
श्रीकृष्ण अर्जुन के घनिष्ठ मित्र हैं।
वे इस धरा पर अपने दिव्य शरीर सहित प्रकट हुएहैं, जो तमाल वृक्ष सहश नीले रंग का है।
उनका शरीर तीनों लोकों ( उच्च, मध्य तथाअघोलोक ) में हर एक को आकृष्ट करनेवाला है।
उनका चमचमाता पीताम्बर तथाचन्दनचर्चित मुखकमल मेरे आकर्षण का विषय बने और मैं किसी प्रकार के फल कीइच्छा न करूँ।
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युधि तुरगरजोविधूम्रविष्वक् -कचलुलितश्रमवार्यलड्कृतास्ये ।
मम निशितशरैर्विभिद्यमान-त्वचि विलसत्कवचेस्तु कृष्ण आत्मा ॥
३४॥
युधि--युद्ध- भूमि में; तुरग--घोड़े; रज:-- धूल; विधूम्र--धुएँ के रंग में परिणत; विष्वक्--लहराते; कच--बाल;लुलित--बिखरे हुए; श्रमवारि--पसीना; अलड्कृत--सुशोभित; आस्ये --मुख पर; मम--मेंरे; निशित--नुकीले;शरैः--वाणों से; विभिद्यमान--बिंधा हुआ; त्वचि--खाल में; विलसत्--आनन्द लेते हुए; कवचे--कवच में; अस्तु--हो; कृष्णे-- श्रीकृष्ण में; आत्मा--मन
युद्धक्षेत्र में ( जहाँ मित्रतावश श्रीकृष्ण अर्जुन के साथ रहे थे) भगवान् कृष्ण केलहराते केश घोड़ों की टापों से उठी धूल से धूसरित हो गये थे तथा श्रम के कारण उनकामुख-मण्डल पसीने की बूँदों से भीग गया था।
मेरे तीक्ष्ण बाणों से बने घावों से इनअलंकरणों की शोभा उन्हें अच्छी लग रही थी।
मेरा मन उन्हीं श्रीकृष्ण के पास चले।
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सपदि सखिवचो निशम्य मध्येनिजपरयोर्बलयो रथं निवेश्य ।
स्थितवति परसैनिकायुरक्ष्णाहतवति पार्थसखे रतिर्ममास्तु ॥
३५॥
सपदि--युद्ध-भूमि में; सखखि-वच:--मित्र का आदेश; निशम्य--सुनकर; मध्ये--बीच में; निज--अपना; परयो:--तथाविपक्षीदल; बलयो:--शक्ति; रथम्--रथ में; निवेश्य--प्रविष्ट होकर; स्थितवति--वहाँ रुक कर; पर-सैनिक--विपक्षीदल के सैनिकों की; आयुः--आयु, उप्र; अक्ष्णा--देखने से; हतवति--कम करने का कार्य, छीन लेना; पार्थ--पृथा-पुत्र अर्जुन का; सखे--मित्र में; रतिः--घनिष्ठ सम्बन्ध, प्रीति; मम--मेरा; अस्तु--हो अपने मित्र के आदेश का पालन करते हुए
भगवान् श्रीकृष्ण कुरुक्षेत्र के युद्धस्थल मेंअर्जुन तथा दुर्योधन के सैनिकों के बीच में प्रविष्ट हो गये और वहाँ स्थित होकर उन्होंनेअपनी कृपापूर्ण चितवन से विरोधी पक्ष की आयु क्षीण कर दी।
यह सब शत्रु पर उनकेइृष्टिपात करने मात्र से ही हो गया।
मेरा मन उन कृष्ण में स्थिर हो।
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व्यवहितपृतनामुखं निरीक्ष्यस्वजनवधाद्विमुखस्य दोषबुद्धया ।
कुमतिमहरदात्मविद्यया य-श्वरणरति: परमस्य तस्य मेउस्तु ॥
३६॥
व्यवहित--दूर खड़े; पृतना--सैनिकों के; मुखम्--मुँह को; निरीक्ष्य--देखकर; स्व-जन--सम्बन्धीगण; वधात्--मारनेसे; विमुखस्थ--हिचकनेवाले का; दोष-बुद्धया--दूषित बुद्धि से; कुमतिम्--अल्पज्ञान; अहरत्--समूल नष्ट किया;आत्म-विद्यया--दिव्य ज्ञान से; यः--जो; चरण--चरणों का; रतिः--आकर्षण; परमस्य--परम का; तस्य--उस; मे--मेरा; अस्तु--हो
जब युद्धक्षेत्र में अर्जुन अपने समक्ष सैनिकों तथा सेनापतियों को देखकर अज्ञान सेकलुषित हो रहा लग रहा था, तो भगवान् ने उसके अज्ञान को दिव्य ज्ञान प्रदान करकेसमूल नष्ट कर दिया।
उनके चरणकमल सदैव मेरे आकर्षण के लक्ष्य बने रहें।
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स्वनिगममपहाय मत्प्रतिज्ञा-मृतमधिकर्तुमवप्लुतो रथस्थ: ।
धृतरथचरणो भ्ययाच्चलद्गु-हरिरिव हन्तुमिभं गतोत्तरीय: ॥
३७॥
स्व-निगमम्-- अपनी सत्यनिष्ठा; अपहाय--निरस्त करने के लिए; मत्-प्रतिज्ञामू--मेरी प्रतिज्ञा; ऋतम्--वास्तविक;अधि--अधिक; कर्तुमू--करने के लिए; अवप्लुतः--नीचे उतरते हुए; रथ-स्थ:--रथ से; धृत--ग्रहण करके; रथ--रथ; चरण:--पहिया, चक्र; अभ्ययात्--तेजी से चले; चलदगु:--पृथ्वी को पद-दलित करते; हरिः--सिंह; इब--सहश; हन्तुमू--मारने के लिए; इभम्--हाथी को; गत--एक ओर छोड़कर; उत्तरीय:--उत्तरीय, ओढ़ने का वस्त्र,दुपट्टा |
मेरी इच्छा को पूरी करते हुए तथा अपनी प्रतिज्ञा तोड़कर, वे रथ से नीचे उतर आये,उसका पहिया उठा लिया और तेजी से मेरी ओर दौड़े, जिस तरह कोई सिंह किसी हाथी कोमारने के लिए दौड़ पड़ता है।
इसमें उनका उत्तरीय वस्त्र भी रास्ते में गिर गया।
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शितविशिखहतो विशीर्णदंश:क्षतजपरिप्लुत आततायिनो मे ।
प्रसभमभिससार मद्गधार्थस भवतु मे भगवान् गतिर्मुकुन्द: ॥
३८॥
शित--पैना; विशिख--बाण; हत:--से घायल; विशीर्ण-दंशः--छिन्न हुआ कवच; क्षतज--घावों से; परिप्लुतः--रक्तसे सने; आततायिन: --महान आक्रामक; मे--मेरा; प्रसभम्--क्रुद्ध मुद्रा में; अभिससार--चलने लगे; मत्-वध-अर्थम्--मुझे मारने के लिए; सः--वे; भवतु--हो; मे--मेरे; भगवान्--भगवान्; गति:--लक्ष्य; मुकुन्दः--मो क्षदाताभगवान् श्रीकृष्ण जो मोक्ष के दाता हैं, वे मेरे अनन्तिम गंतव्य हों।
युद्ध-क्षेत्र में उन्होंनेमेरे ऊपर आक्रमण किया, मानो वे मेरे पैने बाणों से बने घावों के कारण क्रुद्ध हो गये हों।
उनका कवच छितरा गया था और उनका शरीर खून से सन गया था।
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विजयरथकुट॒म्ब आत्ततोत्रेधृतहयरश्मिनि तच्छियेक्षणीये ।
भगवति रतिरस्तु मे मुमूर्षों-यंमिह निरीक्ष्य हता गता: स्वरूपम् ॥
३९॥
विजय--अर्जुन; रथ--रथ; कुटुम्बे--जान की बाजी लगाकर जिस वस्तु की रक्षा की जाय; आत्त-तोत्रे--दाहिने हाथ मेंचाबुक लिए; धृत-हय--घोड़ों की लगाम थामे; रश्मिनि--रस्सियाँ; तत्-भ्रिया--सुन्दरतापूर्वक खड़े हुए; ईक्षणीये--देखे जाने के लिए; भगवति--भगवान् में; रति: अस्तु--मेरा आकर्षण हो; मे--मेरा; मुमूर्षो:--मरणासन्न; यम्--जिसको; इह--इस संसार में; निरीक्ष्य--देखने से; हता:--मारे गये; गता: --प्राप्त; स्व-रूपम्--मूल रूप को ।
मृत्यु के अवसर पर मेरा चरम आकर्षण भगवान् श्रीकृष्ण के प्रति हो।
मैं अपना ध्यानअर्जुन के उस सारथी पर एकाग्र करता हूँ, जो अपने दाहिने हाथ में चाबुक लिए थे औरबाएँ हाथ से लगाम की रस्सी थामे और सभी प्रकार से अर्जुन के रथ की रक्षा करने के प्रतिअत्यंत सावधान थे।
जिन लोगों ने कुरुक्षेत्र के युद्धस्थल में उनका दर्शन किया, उन सबों नेमृत्यु के बाद अपना मूल स्वरूप प्राप्त कर लिया।
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ललितगतिविलासवल्गुहास-प्रणयनिरीक्षणकल्पितोरुमाना: ।
कृतमनुकृतवत्य उन्मदान्धा:प्रकृतिमगन् किल यस्य गोपवध्व: ॥
४०॥
ललित--आकर्षक; गति--हिलना-डुलना; विलास--मुग्ध करनेवाले कृत्य; बल्गुहास--मधुर मुस्कान; प्रणय--प्रेमपूर्ण; निरीक्षण--चितवन; कल्पित--मानसिकता; उरुमाना: --अत्यन्त महिमावान; कृत-मनु-कृत-वत्य:--चाल काअनुकरण करने में; उन्मद-अन्धा:--आनन्द में पागल हुए; प्रकृतिमू--लक्षण; अगनू--प्राप्त किया; किल--निश्चय ही;यस्य--जिसका; गोप-वध्वः--गोपियाँ ।
मेरा मन उन भगवान् श्रीकृष्ण में एकाग्र हो, जिनकी चाल तथा प्रेम भरी मुस्कान नेब्रजधाम की रमणियों ( गोपियों ) को आकृष्ठट कर लिया।
[रास लीला से भगवान् केअन्तर्धान हो जाने पर गोपिकाओं ने भगवान् की लाक्षणिक गतियों का अनुकरण किया।
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मुनिगणनृपवर्यसह्लुलेउन्त:सदसि युधिष्टिरराजसूय एषाम् ।
अर्हणमुपपेद ईक्षणीयोमम हृशिगोचर एप आविरात्मा ॥
४१॥
मुनि-गण--परम विद्वान साधुजन; नूप-वर्य--महान शासक राजा; सब्जुले--समूह में से; अन्तः-सदसि--सभा, सम्मेलनमें; युधिष्ठिर--महाराज युधिष्ठटिर का; राज-सूये--राजा द्वारा सम्पन्न यज्ञ; एघाम्--समस्त महापुरुषों का; अ्हणम्--सादरपूजा; उपपेद--प्राप्त किया; ईक्षणीय:-- आकर्षण की वस्तु; मम--मेरी; दृशि--दृष्टि; गोचर:--जितना दिखे उसी केभीतर, समक्ष; एब: आवि:--उपस्थिति; आत्मा--आत्मा।
महाराज युथ्िष्ठिर द्वारा सम्पन्न राजसूय यज्ञ में विश्व के सारे महापुरुषों, राजाओं तथाविद्वानों की एक महान् सभा हुई थी और उस सभा में सबों ने श्रीकृष्ण की पूजा परम पूज्यभगवान् के रूप में की थी।
यह सब मेरी आँखों के सामने हुआ और मैंने इस घटना कोयाद रखा, जिससे मेरा मन भगवान् में लगा रहे।
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तमिममहमजं शरीरभाजांहृदि हृदि धिष्ठितमात्मकल्पितानाम् ।
प्रतिह्शमिव नैकधार्कमेक॑समधिगतोउस्मि विधूतभेदमोह: ॥
४२॥
तमू्--उस भगवान् को; इमम्--इस समय जो मेरे समक्ष है; अहम्--मैं; अजम्--अजन्मा; शरीर-भाजाम्--बद्धजीव के;हृदि--हृदय में; हदि--हृदय में; धिष्ठितम्--स्थित; आत्म--परमात्मा; कल्पितानाम्-शुष्क चिन्तकों का; प्रतिहशम्--प्रत्येक दिशा में; इब--सद्ृश; न एकधा--एक नहीं; अर्कम्--सूर्य को; एकम्--केवल एक; समधि-गतः अस्मि--मैंध्यान में समाधिस्थ हूँ; विधूत--मुक्त होकर; भेद-मोह:--द्वैत की भ्रांत धारणा से ।
अब मैं पूर्ण एकाग्रता से एक ईश्वर श्रीकृष्ण का ध्यान कर सकता हूँ, जो इस समय मेरेसामने उपस्थित हैं, क्योंकि अब मैं प्रत्येक के हृदय में, यहाँ तक कि मनोधर्मियों के हृदय मेंभी रहनेवाले उनके प्रति द्वैत भाव की स्थिति को पार कर चुका हूँ।
वे सबों के हृदय में रहतेहैं।
भले ही सूर्य को भिन्न-भिन्न प्रकार से अनुभव किया जाय, किन्तु सूर्य तो एक ही है।
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सूत उवाचकृष्ण एवं भगवति मनोवाग्दृष्टिवृत्तिभि: ।
आत्मन्यात्मानमावेश्य सोन्त: श्वास उपारमत् ॥
४३॥
सूतः उबाच--सूत गोस्वामी ने कहा; कृष्णे--पूर्ण पुरुषोत्तम भगवान् कृष्ण में; एबम्--एकमात्र; भगवति-- भगवान् में;मनः--मन से; वाक्--वाणी से; दृष्टि--दृष्टि से; वृत्तिभि: --कार्यो से; आत्मनि--परमात्मा में; आत्मानम्--जीव को;आवेश्य--लीन करके; सः--वे ; अन्त:- ध्रास:-- ध्वास खींचकर; उपारमत्--शान्त हो गए
सूत गोस्वामी ने कहा : इस प्रकार भीष्मदेव ने मन, वाणी, दृष्टि तथा कार्यों से अपनेआपको परमात्मा अर्थात् पूर्ण पुरुषोत्तम भगवान् श्रीकृष्ण में लीन कर दिया और शान्त होगये और उनकी श्वास रुक गई।
"
सम्पद्यमानमाज्ञाय भीष्मं ब्रह्मणि निष्कले ।
सर्वे बभूवुस्ते तृष्णीं वयांसीव दिनात्यये ॥
४४॥
सम्पद्यमानम्-में लीन होकर; आज्ञाय--इसे जानकर; भीष्मम्-- श्री भीष्मदेव के विषय में; ब्रह्मणि--पर ब्रह्म में; निष्कले--असीम; सर्वे--उपस्थित सभी लोग; बभूवु: ते--वे सब हो गये; तृष्णीमू--मौन; वयांसि इब-पक्षियों की तरह; दिन-अत्यये--दिन के समाप्त होने पर।
यह जानकर कि भीष्मदेव अनन्त परम पूर्ण में लीन हो गये, वहाँ पर उपस्थित सारे लोग उसी तरह मौन हो गये, जिस प्रकार दिन समाप्त होने पर पक्षी मौन हो जाते हैं।
"
तत्र दुन्दुभयो नेदुर्देवमानववादिता: ।
शशंसु: साधवो राज्ञां खात्पेतु: पुष्पवृष्टय: ॥
४५॥
तत्र--तत्पश्चात्; दुन्दुभय:--नगाड़े; नेदु:--बजने लगे; देव--अन्य ग्रहों के देवता; मानब--सारे देशों के मनुष्य;वादिता:--के द्वारा बजाये जाकर; शशंसु: -- प्रशंसा की; साधव:--ईमानदार; राज्ञाम्--राजाओं के द्वारा; खात्--आकाश से; पेतु:--गिरने लगी; पुष्प-वृष्टय:--पुष्पों की वर्षा |
तत्पश्चात् मनुष्यों तथा देवताओं ने सम्मान में नगाड़े बजाये और निष्ठावान राजाओं नेसम्मान तथा आदर प्रदर्शित किया और आकाश्न से पुष्पों की वर्षा होने लगी।
"
तस्य निर्हरणादीनि सम्परेतस्य भार्गव ।
युधिष्टिर: कारयित्वा मुहूर्त दु:खितो भवत् ॥
४६॥
तस्य--उसका; निरहरण-आदीनि--दाह संस्कार; सम्परेतस्थ--मृत देह का; भार्गव--हे भृगुवंशी; युधिष्ठिर: --महाराजयुथिष्ठटिर; कारयित्वा--सम्पन्न करके; मुहूर्तम्-- क्षण भर के लिए; दु:खितः--दुखी; अभवत्-हुए।
हे भूगुवंशी ( शौनक ), भीष्मदेव के मृत देह का दाह संस्कार सम्पन्न करने के बाद,महाराज युधिष्ठिर क्षण भर के लिए शोकाभिभूत हो गये।
"
तुष्टवुर्मुन॒यों दृष्टा: कृष्णं तद्गुह्मगामभि: ।
ततस्ते कृष्णहदया: स्वाश्रमान् प्रययु: पुन: ॥
४७॥
तुष्ठवु:--सन्तुष्ट हुए; मुन॒यः--व्यासदेव आदि मुनिगण; हृष्टा:--प्रसन्न मुद्रा में; कृष्णम्-- भगवान् कृष्ण को; तत्--उसका; गुहा--गोपनीय; नामभि:--उनके नाम से; ततः--तत्पश्चात्; ते--वे; कृष्ण-हदया:--कृष्ण को हृदय में धारणकरनेवाले; स्व-आ श्रमान्-- अपने-अपने आश्रमों को; प्रययु:--लौट गये; पुन:--फिर ।
तब समस्त मुनियों ने वहाँ पर उपस्थित भगवान् श्रीकृष्ण का यशोगान गुह्ा वैदिकमन्त्रों से किया।
वे भगवान् कृष्ण को सदा के लिए अपने हृदय में धारण करके अपने-अपने आश्रमों को लौट गए।
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ततो युधिष्ठिरो गत्वा सहकृष्णो गजाह्ययम् ।
पितरं सान्त्वयामास गान्धारीं च तपस्विनीम् ॥
४८ ॥
ततः--तत्पश्चात्; युधिष्ठटिर:--महाराज युधिष्टिर ने; गत्वा--वहाँ जाकर; सह--साथ; कृष्ण:-- भगवान् के; गजाह्ययम्--गजाह्नय, हस्तिनापुर नाम की राजधानी में; पितरम्--अपने ताऊ ( धृतराष्ट्र ) को; सान्वयाम् आस--ढाढस बँधाया;गान्धारीम्--धधृतराष्ट्र की पत्ती को; च--तथा; तपस्विनीम्--तपस्विनी ।
तत्पश्चात् महाराज युधिष्ठिर भगवान् श्रीकृष्ण के साथ तुरन्त ही अपनी राजधानी,हस्तिनापुर गये और वहाँ पर अपने ताऊ धृतराष्ट्र तथा अपनी ताई तपस्विनी गान्धारी कोढाढस बँधाया।
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पित्रा चानुमतो राजा वासुदेवानुमोदित: ।
चकार राज्य धर्मेण पितृपैतामहं विभु; ॥
४९॥
पित्रा--ताऊ धृतराष्ट्र द्वारा; च--तथा; अनुमत:--उनकी अनुमति से; राजा--राजा युधिष्टिर ने; वासुदेव-अनुमोदित:--भगवान् श्रीकृष्ण द्वारा पुष्ट किये जाने पर; चकार--चलाया; राज्यम्--राज्य; धर्मेण--राज-नियमों के सिद्धान्त अनुसार;पितृ-पिता; पैतामहम्--पूर्वज जैसा; विभु:--महान्
तत्पश्चात् परम धर्मात्मा राजा महाराज युधिष्ठिर ने अपने ताऊ द्वारा प्रतिपादित तथा श्रीकृष्ण द्वारा अनुमोदित राजनियमों के सिद्धान्त अनुसार साम्राज्य का संचालन किया।
"
