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अध्याय तेरह: ब्रह्मा द्वारा लड़कों और बछड़ों की चोरी
10.13श्रीशुक उवाचसाधु पृष्टे महाभाग त्वया भागवतोत्तम ।
यन्रूतनयसीशस्य श्रृण्वन्नपि कथां मुहुः ॥
१॥
श्री-शुकः उबाच--शुकदेव गोस्वामी ने कहा; साधु पृष्टम्--आपके प्रश्न से मैं सम्मानित हुआ हूँ; महा-भाग--परम भाग्यशालीव्यक्ति; त्ववया--तुम्हारे द्वारा; भागवत-उत्तम-हे सर्वश्रेष्ठ भक्त; यत्-- क्योंकि; नूतनयसि--तुम नया से नया कर रहे हो;ईशस्यथ--भगवान् के; श्रृण्बन् अपि--निरन्तर सुनते हुए भी; कथाम्--लीलाओं को; मुहुः--बारम्बार।
श्रील शुकदेव गोस्वामी ने कहा : हे भक्त शिरोमणि, परम भाग्यशाली परीक्षित, तुमने बहुतसुन्दर प्रश्न किया है क्योंकि भगवान् की लीलाओं को निरन्तर सुनने पर भी तुम उनके कार्यो कोनित्य नूतन रूप में अनुभव कर रहे हो।
सतामयं सारभूतां निसर्गोयदर्थवाणी श्रुतिचितसामपि ।
प्रतिक्षणं नव्यवदच्युतस्य यत्स्त्रिया विटानामिव साधु वार्ता ॥
२॥
सताम्-भक्तों का; अयमू--यह; सार-भूताम्--परमहंसों का, जिन्होंने जीवन सार स्वीकार किया है; निसर्ग:--लक्षण या गुण;यत्--जो; अर्थ-वाणी--जीवन का लक्ष्य, लाभ का लक्ष्य; श्रुति--समझने का उद्देश्य; चेतसाम्ू अपि--जिन्होंने दिव्य विषयोंके आनन्द को ही जीवन लक्ष्य स्वीकार कर रखा है; प्रति-क्षणम्--हर क्षण; नव्य-वत्--मानो नवीन से नवीनतर हो;अच्युतस्य-- भगवान् कृष्ण का; यत्--क्योंकि; स्त्रिया:--स्त्रियों या यौन की ( कथाएँ ); विटानाम्--स्त्रियों से अनुरक्तों यालम्पटों के; इब--सहश; साधु वार्ता--वास्तविक वार्तालाप |
जीवन-सार को स्वीकार करने वाले परमहंस भक्त अपने अन्तःकरण से कृष्ण के प्रतिअनुरक्त होते हैं और कृष्ण ही उनके जीवन के लक्ष्य रहते हैं।
प्रतिक्षण कृष्ण की ही चर्चा करनाउनका स्वभाव होता है, मानो ये कथाएँ नित्य नूतन हों।
वे इन कथाओं के प्रति उसी तरह अनुरक्तरहते हैं जिस तरह भौतिकतावादी लोग स्त्रियों तथा विषय-वासना की चर्चाओं में रस लेते हैं।
श्रुणुष्वावहितो राजन्नपि गुह्ां बदामि ते ।
ब्रूयु: स्निग्धस्य शिष्यस्य गुरवो गुह्ममप्युत ॥
३॥
श्रुणुस्व--कृपया सुनें; अवहित:--ध्यानपूर्वक; राजन्--हे राजा ( महाराज परीक्षित ); अपि--यद्यपि; गुह्मम्--अत्यन्त गोपनीय( क्योंकि सामान्य व्यक्ति कृष्ण-लीलाओं को नहीं समझ सकते ); वदामि--मैं कहूँगा; ते--तुमसे; ब्ूयु:--बताते हैं;स्निग्धस्य--विनीत; शिष्यस्य--शिष्य के; गुरवः--गुरुजन; गुहाम्--अत्यन्त गोपनीय; अपि उत--ऐसा होने पर भी हे राजन, मेरी बात ध्यानपूर्वक सुनें।
यद्यपि भगवान् की लीलाएँ अत्यन्त गुह्या हैं औरसामान्य व्यक्ति उन्हें नहीं समझ सकता किन्तु मैं तुमसे उनके विषय में कहूँगा क्योंकि गुरुजनविनीत शिष्य को गुह्य से गुह्य तथा कठिन से कठिन विषयों को भी बता देते हैं।
तथाघवदनान्मृत्यो रक्षित्वा वत्सपालकान् ।
सरित्पुलिनमानीय भगवानिदमब्रवीत् ॥
४॥
तथा--तत्पश्चात्; अध-बदनात्--अधघासुर के मुख से; मृत्यो:--साक्षात् मृत्यु; रक्षित्वा--रक्षा करके ; वत्स-पालकानू--सारेग्वालबालों तथा बछड़ों को; सरित्-पुलिनम्--नदी के तट पर; आनीय--लाकर; भगवान्-- भगवान् कृष्ण ने; इदम्--ये शब्द;अब्नवीत्ू-कहे |
मृत्यु रूप अघासुर के मुख से बालकों तथा बछड़ों को बचाने के बाद भगवान् कृष्ण उनसब को नदी के तट पर ले आये और उनसे निम्नलिखित शब्द कहे।
अहोतिरम्यं पुलिनं वयस्या:स्वकेलिसम्पन्मृदुलाच्छबालुकम् ।
स्फुटत्सरोगन्धहतालिपत्रिक -ध्वनिप्रतिध्वानलसद्द्रुमाकुलम् ॥
५॥
अहो--ओह; अति-रम्यम्--अतीव सुन्दर; पुलिनमू--नदी का किनारा; वयस्या:--मेरे मित्रो; स्व-केलि-सम्पत्--खेलने कीसामग्री से युक्त; मुदुल-अच्छ-बालुकम्--मुलायम तथा साफ बालूदार किनारा; स्फुटत्--खिला हुआ; सरः-गन्ध--कमल कीगंध से; हत--आकृष्ट; अलि--भौरें का; पत्रिक--तथा पक्षियों की; ध्वनि-प्रतिध्वान--उनकी चहचहाहट तथा उसकीप्रतिध्वनि; लसत्ू--गतिशील; द्रुम-आकुलम्--सुन्दर वृश्षों से पूर्ण
मित्रो, देखो न, यह नदी का किनारा अपने मोहक वातावरण के कारण कितना रम्य लगताहै! देखो न, खिले कमल किस तरह अपनी सुगन्ध से भौरों तथा पक्षियों को आकृष्ट कर रहे हैं।
भौरों की गुनगुनाहट तथा पक्षियों की चहचहाहट जंगल के सभी सुन्दर वृश्षों से प्रतिध्वनित होरही है।
और यहाँ की बालू साफ तथा मुलायम है।
अतः हमारे खेल तथा हमारी लीलाओं केलिए यह सर्वोत्तम स्थान है।
अत्र भोक्तव्यमस्माभिर्दिवारूढं क्षुधार्दिता: ।
वत्सा: समीपेप: पीत्वा चरन्तु शनकैस्तृणम् ॥
६॥
अत्र--यहाँ, इस स्थान पर; भोक्तव्यम्ू-- भोजन किया जाय; अस्माभि:--हम लोगों के द्वारा; दिव-आरूढम्--काफी देर होचुकी है; क्षुधा अर्दिता:-- भूख से थके; वत्सा:--बछड़े; समीपे--पास ही; अप:--जल; पीत्वा--पीकर; चरन्तु--चरने दें;शनकैः--धीरे धीरे; तृणम्ू--घास ६मेरे विचार में हम यहाँ भोजन करें क्योंकि विलम्ब हो जाने से हम भूखे हो उठे हैं।
यहाँबछड़े पानी पी सकते हैं और धीरे धीरे इधर-उधर जाकर घास चर सकते हैं।
तथेति पाययित्वार्भा वत्सानारुध्य शाद्वले ।
मुक्त्वा शिक्यानि बुभुजु: सम॑ भगवता मुदा ॥
७॥
तथा इति--कृष्ण के प्रस्ताव को ग्वालबालों ने स्वीकार कर लिया; पाययित्वा अर्भा:--पानी पीने दिया; वत्सान्ू--बछड़ों को;आरुध्य--वृक्षों में बाँध कर चरने दिया; शाद्वले--हरी मुलायम घास में; मुक्त्वा--खोल कर; शिक्यानि--पोटली, जिनमें खानेकी तथा अन्य वस्तुएँ थीं; बुभुजु:--जाकर आनन्द मनाया; समम्--समान रूप से; भगवता-- भगवान् के साथ; मुदा--दिव्यआनच्द में।
भगवान् कृष्ण के प्रस्ताव को मान कर ग्वालबालों ने बछड़ों को नदी में पानी पीने दिया और फिर उन्हें वृक्षों से बाँध दिया जहाँ हरी मुलायम घास थी।
तब बालकों ने अपने भोजन कीपोटलियाँ खोलीं और दिव्य आनन्द से पूरित होकर कृष्ण के साथ खाने लगे।
कृष्णस्य विष्वक्पुरुराजिमण्डलै-रभ्यानना: फुल्लहशो ब्रजार्भका: ।
सहोपविष्टा विपिने विरेजु-एइछदा यथाम्भोौरुहकर्णिकाया: ॥
८ ॥
कृष्णस्य विष्वक्--कृष्ण को घेर कर; पुरु-राजि-मण्डलै:--संगियों के विभिन्न घेरों से; अभ्यानना:--बीचोबीच देखते हुए,जहाँ कृष्ण बैठे थे; फुल्ल-दहश:--दिव्य आनन्द से प्रफुल्लित चेहरे; ब्रज-अर्भका:--ब्रजभूमि के सारे ग्वालबाल; सह-उपविष्टा:--कृष्ण के साथ बैठे हुए; विपिने--जंगल में; विरेजु:--सुन्दर ढंग से बनाये गये; छदा: --पंखड़ियाँ तथा पत्तियाँ;यथा--जिस प्रकार; अम्भोौरूह--कमल के फूल की; कर्णिकाया:--कोश की |
जिस तरह पंखड़ियों तथा पत्तियों से घिरा हुआ कोई कमल-पुष्प कोश हो उसी तरह बीच मेंकृष्ण बैठे थे और उन्हें घेर कर पंक्तियों में उनके मित्र बैठे थे।
वे सभी अत्यन्त सुन्दर लग रहे थे।
उनमें से हर बालक यह सोच कर कृष्ण की ओर देखने का प्रयास कर रहा था कि शायद कृष्णभी उसकी ओर देखें।
इस तरह उन सबों ने जंगल में भोजन का आनन्द लिया।
केचित्युष्पैर्दलै: केचित्पल्लवैर्डूरै: फलै: ।
शिम्भिस्त्वश्भिर्टषद्धिश्च बुभुजु: कृतभाजना: ॥
९॥
केचित्--कोई; पुष्पैः--फूलों पर; दलैः--फूलों की सुन्दर पत्तियों पर; केचित्ू--कोई; पल्लवबै: --पत्तियों के गुच्छों पर;अह्डुरैः --फूलों के अंकुरों पर; फलैः--तथा कोई फलों पर; शिग्भिः:--कोई डलिया-से डिब्बे में; त्वग्भिः--पेड़ की छाल से;इषद्धिः--चट्टानों पर; च-- और; बुभुजु:ः--आनन्द मनाया; कृत-भाजना:--खाने की प्लेटें बनाकर।
ग्वालबालों में से किसी ने अपना भोजन फूलों पर, किसी ने पत्तियों, फलों या पत्तों केगुच्छों पर, किसी ने वास्तव में ही अपनी डलिया में, तो किसी ने पेड़ की खाल पर तथा किसी ने चट्टानों पर रख लिया।
बालकों ने खाते समय इन्हें ही अपनी प्लेटें ( थालियाँ ) मान लिया।
सर्वे मिथो दर्शयन्त: स्वस्वभोज्यरुचिं पृथक् ।
हसन्तो हासयन्तश्ना भ्यवजहु: सहेश्वरा: ॥
१०॥
सर्वे--सभी ग्वालबाल; मिथ:--परस्पर; दर्शयन्त:--दिखाते हुए; स्व-स्व-भोज्य-रुचिम् पूृथक्-घर से लाये गये भोज्य पदार्थोंकी भिन्न भिन्न किसमें तथा उनके पृथक्-पृथक् स्वाद; हसन्तः--चखने के बाद सभी हँसते हुए; हासयन्त: च--तथा हँसाते हुए;अभ्यवजह्ु;:--भोजन का आनन्द लिया; सह-ई श्वरा:--कृष्ण के साथ।
अपने अपने घर से लाये गये भोजन की किस्मों के भिन्न भिन्न स्वादों को एक-दूसरे कोबतलाते हुए सारे ग्वालों ने कृष्ण के साथ भोजन का आनन्द लिया।
वे एक-दूसरे का भोजनचख-चख कर हँसने तथा हँसाने लगे।
बिभ्रद्वेणुं जठरपटयो: श्रड्डवेत्रे च कक्षेवामे पाणौ मसणकवलं तत्फलान्यड्डुलीषु ।
तिष्ठन्मध्ये स्वपरिसुहदो हासयन्नर्मभिः स्वैःस्वर्गे लोके मिषति बुभुजे यज्ञभुग्बालकेलि: ॥
११॥
बिश्रत् वेणुम्--वंशी को रख कर; जठर-पटयो: --कसे हुए चुस्त वस्त्र तथा पेट के बीच; श्रृड़-वेत्रे--सींग का बना बिगुल तथागाय हाँकने की छड़ी; च--भी; कक्षे--कमर में; वामे--बाएँ; पाणौ--हाथ में लेकर; मसुण-कवलम्--चावल तथा दही सेबना सुन्दर भोजन; तत्ू-फलानि--बेल जैसे फल; अड्'ुलीषु--अँगुलियों के बीच; तिष्ठनू--इस प्रकार रखी; मध्ये--बीच में;स्व-परि-सुहृदः--अपने निजी संगी; हासयन्--हँसाते हुए; नर्मभि:--हास्य; स्वै:-- अपने; स्वर्गे लोके मिषति--स्वर्गलोक केनिवासी इस अद्भुत दृश्य को देख रहे थे; बुभुजे--कृष्ण ने आनन्द लिया; यज्ञ-भुक् बाल-केलि:--यद्यपि वे यज्ञ की आहुतिस्वीकार करते हैं किन्तु बाल-लीला हेतु वे अपने ग्वालबाल मित्रों के साथ बड़ी ही प्रसन्नतापूर्वक भोजन कर रहे थे।
कृष्ण यज्ञ-भुक् हैं--अर्थात् वे केवल यज्ञ की आहुतियाँ ही खाते हैं किन्तु अपनी बाल-लीलाएँ प्रदर्शित करने के लिए वे अपनी वंशी को अपनी कमर तथा दाहिनी ओर कसे वस्त्र केबीच तथा सींग के बिगुल और गाय चराने की लाठी को बाईं ओर खोंस कर बैठ गये।
वे अपनेहाथ में दही तथा चावल का बना सुन्दर व्यंजन लेकर और अपनी अँगुलियों के बीच में उपयुक्तफलों के टुकड़े पकड़कर इस तरह बैठे थे जैसे कमल का कोश हो।
वे आगे की ओर अपनेसभी मित्रों को देख रहे थे और खाते-खाते उनसे उपहास करते जाते थे जिससे सभी ठहाका लगा रहे थे।
उस समय स्वर्ग के निवासी देख रहे थे और आश्चर्यचकित थे कि किस तरह यज्ञ-भुक् भगवान् अब अपने मित्रों के साथ जंगल में बैठ कर खाना खा रहे हैं।
भारतैवं वत्सपेषु भुझ्जानेष्वच्युतात्मसु ।
वत्सास्त्वन्तर्वने दूरं विविशुस्तृणलोभिता: ॥
१२॥
भारत--हे महाराज परीक्षित; एवम्--इस प्रकार ( भोजन करते हुए ); वत्स-पेषु--बछड़े चराने वाले बालकों के साथ;भुज्जानेषु--भोजन करने में व्यस्त; अच्युत-आत्मसु--अच्युत अर्थात् कृष्ण के अभिन्न होने से; बत्सा:--बछड़े; तु--फिर भी;अन्तः-वने--गहन जंगल के भीतर; दूरम्--काफी दूर; विविशु:--घुस गये; तृण-लोभिता: --हरी घास से लुब्ध होकर।
है महाराज परीक्षित, एक ओर जहाँ अपने हृदय में कृष्ण के अतिरिक्त अन्य किसी को नजानने वाले ग्वालबाल जंगल में भोजन करने में इस तरह व्यस्त थे वहीं दूसरी ओर बछड़े हरीघास से ललचाकर दूर घने जंगल में चरने निकल गये।
तान्हष्ठा भयसन्त्रस्तानूचे कृष्णोस्थ भीभयम् ।
मित्राण्याशान्मा विरमतेहानेष्ये वत्सकानहम् ॥
१३॥
तान्ू--उन दूर जा रहे बछड़ों को; दृष्टा--देखकर; भय-सन्त्रस्तान्ू--उन ग्वालबालों को जो भय से क्षुब्ध थे कि गहन बन केभीतर बछड़ों पर कोई खूनी जानवर आक्रमण न कर दे; ऊचे--कृष्ण ने कहा; कृष्ण: अस्य भी-भयम्--कृष्ण, जो स्वयं सभीप्रकार के भय का भी भय हैं ( कृष्ण के रहने पर कोई भय नहीं रहता ); मित्राणि--हे मित्रो; आशात्--भोजन के आनन्द से; माविरमत--मत रुको; इह--इस स्थान में; आनेष्ये--वापस लाये देता हूँ; वत्सकान्ू--बछड़ों को; अहम्--मैं
जब कृष्ण ने देखा कि उनके ग्वालबाल मित्र डरे हुए हैं, तो भय के भी भीषण नियन्ताउन्होंने उनके भय को दूर करने के लिए कहा, ‘मित्रो, खाना मत बन्द करो।
मैं स्वयं जाकरतुम्हारे बछड़ों को इसी स्थान में वापस लाये दे रहा हूँ।
इत्युक्त्वाद्रिदरीकुझ्जगह्नरेष्वात्मवत्सकान् ।
विचिन्वन्भगवान्कृष्ण: सपाणिकवलो ययौ ॥
१४॥
इति उक्त्वा--यह कह कर ( कि मुझे बछड़े लाने दो ); अद्वि-दरी-कुञ्न-गह्ररैषु--पर्वतों, पर्वत की गुफाओं, झाड़ियों तथासँकरी जगहों में; आत्म-वत्सकान्--अपने मित्रों के बछड़ों को; विचिन्वन्--ढूँढ़ते हुए; भगवान्-- भगवान्; कृष्ण: --कृष्ण;स-पाणि-कवलः:--दही तथा चावल अपने हाथ में लिए; ययौ--चल पड़े
कृष्ण ने कहा, ‘मुझे जाकर बछड़े ढूँढ़ने दो।
अपने आनन्द में खलल मत डालो।
' फिरहाथ में दही तथा चावल लिए, भगवान् कृष्ण तुरन्त ही अपने मित्रों के बछड़ों को खोजने चलपड़े।
वे अपने मित्रों को तुष्ट करने के लिए सारे पर्वतों, गुफाओं, झाड़ियों तथा सँकरे मार्गों में खोजने लगे।
अम्भोजन्मजनिस्तदन्तरगतो मायार्भकस्येशितु-ष्ठं मन्लु महित्वमन्यदपि तद्व॒त्सानितो वत्सपान् ।
नीत्वान्यत्र कुरूद्वहान्तरदधात्खेवस्थितो यः पुराइष्ठाघासुरमोक्षणं प्रभवतः प्राप्त: पर विस्मयम् ॥
१५॥
अम्भोजन्म-जनि:--कमल से उत्पन्न ब्रह्माजी; तत्-अन्तर-गत:--ग्वालबालों के साथ भोजन कर रहे कृष्ण के कार्यों में फँसगये; माया-अर्भकस्य--कृष्ण की माया से बनाए गये बालकों के; ईशितु:--परम नियन्ता का; द्रष्टभू--दर्शन करने के लिए;मज्जु--अत्यन्त रोचक; महित्वम् अन्यत् अपि-- भगवान् की अन्य महिमाओं को भी; ततू-वत्सान्ू--उनके बछड़ों को; इत:--जहाँ थे उसकी अपेक्षा; वत्स-पानू--तथा बछड़ों की रखवाली करने वाले ग्वालबालों को; नीत्वा--लाकर; अन्यत्र--दूसरेस्थान पर; कुरूद्वह--हे महाराज परीक्षित; अन्तर-दधात्--छिपा दिया; खे अवस्थित: य:--यह पुरुष ब्रह्म, जो आकाश मेंस्वर्गलोक में स्थित था; पुरा--प्राचीनकाल में; हृप्ठा--देख कर; अघासुर-मोक्षणम्--अघासुर के अद्भुत वध तथा उद्धार को;प्रभवत:--सर्वशक्तिमान परम पुरुष का; प्राप्त: परम् विस्मयम्-- अत्यन्त विस्मित था
हे महाराज परीक्षित, स्वर्गलोक में वास करने वाले ब्रह्मा ने अधासुर के वध करने तथा मोक्षदेने के लिए सर्वशक्तिमान कृष्ण के कार्यकलापों को देखा था और वे अत्यधिक चकित थे।
अब वही ब्रह्म कुछ अपनी शक्ति दिखाना और उस कृष्ण की शक्ति देखना चाह रहे थे, जोमानो सामान्य ग्वालबालों के साथ खेलते हुए अपनी बाल-लीलाएँ कर रहे थे।
इसलिए कृष्णकी अनुपस्थिति में ब्रह्म सारे बालकों तथा बछड़ों को किसी दूसरे स्थान पर लेकर चले गये।
इस तरह वे फँस गये क्योंकि निकट भविष्य में वे देखेंगे कि कृष्ण कितने शक्तिशाली हैं।
ततो वत्सानहष्ट्रैत्य पुलिनेषपि च वत्सपान् ।
उभावपि बने कृष्णो विचिकाय समन्तत: ॥
१६॥
ततः--तत्पश्चात्; वत्सान्ू--बछड़ों को; अद्ृष्ठा--जंगल में न देख कर; एत्य--बाद में; पुलिने अपि--यमुना के तट में भी;च--भी; वत्सपानू--ग्वालबालों को; उभौ अपि--दोनों ही को ( बछड़ों तथा बालकों को ); वने--जंगल में; कृष्ण: -- भगवान्कृष्ण ने; विचिकाय--सर्वत्र ढूँढ़ा; समन््तत:--इधर-उधर।
तत्पश्चात् जब कृष्ण बछड़ों को खोज न पाये तो वे यमुना के तट पर लौट आये किन्तु वहाँभी उन्होंने ग्वालबालों को नहीं देखा।
इस तरह वे बछड़ों तथा बालकों को ऐसे ढूँढ़ने लगे, मानोंउनकी समझ में न आ रहा हो कि यह क्या हो गया।
क्वाप्यद्ृष्टान्तर्विपिने वत्सान्पालांश्व विश्ववित् ।
सर्व विधिकृतं कृष्ण: सहसावजगाम ह ॥
१७॥
क्व अपि--कहीं भी; अद्ृष्ठा--न देखकर; अन्त:-विपिने--जंगल के भीतर; वत्सान्ू--बछड़ों को; पालान्ू च--तथा उनकीरक्षा करने वाले ग्वालबालों को; विश्व-वित्--इस जगत में हो रही प्रत्येक बात को जानने वाले कृष्ण; सर्वम्ू--हर वस्तु को;विधि-कृतम्--ब्रह्मा द्वारा सम्पन्न; कृष्ण:--कृष्ण; सहसा--तुरन््त; अवजगाम ह--समझ गये।
जब कृष्ण बछड़ों तथा उनके पालक ग्वालबालकों को जंगल में कहीं भी ढूँढ़ न पाये तो वेतुरन्त समझ गये कि यह ब्रह्मा की ही करतूत है।
ततः कृष्णो मुदं कर्तु तन्मातृणां च कस्य च ।
उभयायितमात्मानं चक्रे विश्वकृदीश्वर: ॥
१८॥
ततः--तत्पश्चात्; कृष्ण: -- भगवान्; मुदम्-- आनन्द; कर्तुमू--उत्पन्न करने के लिए; तत्-मातृणाम् च--ग्वालबालों तथा बछड़ोंकी माताओं के; कस्य च--तथा ब्रह्मा के ( आनन्द के लिए ); उभयायितम्ू--बछड़ों तथा बालकों, दोनों के रूप में विस्तार;आत्मानम्--स्वयं; चक्रे --किया; विश्व-कृत् ईश्वर: --सम्पूर्ण जगत के स्त्रष्टा होने के कारण उनके लिए यह कठिन न था।
तत्पश्चात् बह्मा को तथा बछड़ों एवं ग्वालबालों की माताओं को आनन्दित करने के लिए,समस्त ब्रह्माण्ड के स्त्रष्टा कृष्ण ने बछड़ों तथा बालकों के रूप में अपना विस्तार कर लिया।
यावद्वत्सपवत्सकाल्पकवपुर्यावत्कराड्ह्यादिकंयावद्यष्टिविषाणवेणुदलशि ग्यावद्विभूषाम्बरम् ।
यावच्छीलगुणाभिधाकृतिवयो यावद्विहारादिकंसर्व विष्णुमयं गिरोड्रवदज: सर्वस्वरूपो बभौ ॥
१९॥
यावत् वत्सप--ग्वालबालों की ही तरह के; वत्सक-अल्पक-वपु:--तथा बछड़ों के कोमल शरीरों जैसे ही; यावत् कर-अद्भप्नि-आदिकम्--वैसी ही नाप के हाथ-पैर वाले; यावत् यष्टि-विषाण-वेणु-दल-शिक्--जैसे उनके बिगुल, वंशी, लाठियाँ, भोजनके छींके आदि थे ठीक वैसे ही; यावत् विभूषा-अम्बरम्--जैसे उनके गहने तथा वस्त्र थे ठीक वैसे ही; यावत् शील-गुण-अभिधा-आकृति-वयः--वैसे ही गुण, आदत, स्वरूप, लक्षण तथा शारीरिक स्वरूप वाले; यावत् विहार-आदिकम्--वैसी हीरुचि या मनोरंजन वाले; सर्वम्--हर वस्तु; विष्णु-मयम्--विष्णु या वासुदेव के अंश; गिर: अड्र-बत्--उन्हीं की तरह कीवाणी; अज: --कृष्ण ने; सर्व-स्वरूप: बभौ--स्वयं हर वस्तु उत्पन्न कर दी।
अपने वासुदेव रूप में कृष्ण ने खोये हुए ग्वाल-बालकों तथा बछड़ों की जितनी संख्या थी,उतने ही वैसे ही शारीरिक स्वरूपों, उसी तरह के हाथों, पाँवों तथा अन्य अंगों वाले, उनकीलाठियों, तुरहियों तथा वंशियों, उनके भोजन के छींकों, विभिन्न प्रकार से पहनी हुईं उनकीविशेष वेशभूषाओं तथा गहनों, उनके नामों, उम्रों तथा विशेष कार्यकलापों एवं गुणों से युक्तस्वरूपों में अपना विस्तार कर लिया।
इस प्रकार अपना विस्तार करके सुन्दर कृष्ण ने यह उक्तिसिद्ध कर दी-- समग्र जयद् विष्णुमयम्-- भगवान् विष्णु सर्वव्यापी हैं।
स्वयमात्मात्मगोवत्सान्प्रतिवार्यात्मवत्सपै: ।
क्रीडन्नात्मविहारैश्व सर्वात्मा प्राविशद्व्रजम् ॥
२०॥
स्वयम् आत्मा--परमात्मा स्वरूप कृष्ण; आत्म-गो-वत्सानू--अपने ही स्वरूप बछड़ों में अपना विस्तार कर लिया; प्रतिवार्यआत्म-वत्सपैः-- पुनः उन्होंने बछड़ों को चराने वाले ग्वालों में परिणत कर लिया; क्रीडन्ू--इस तरह उन लीलाओं में होने वालीहर वस्तु स्वयं बन गये; आत्म-विहारैः च--स्वयं ही अनेक प्रकार से आनन्द लेने लगे; सर्व-आत्मा--परमात्मा, कृष्ण;प्राविशत्--प्रविष्ट किया; ब्रजमू--व्रजभूमि में जो महाराज नन्द तथा यशोदा की भूमि है।
इस तरह अपना विस्तार करने के बाद जिससे वे सभी बछड़ों तथा बालकों की तरह लगेंऔर साथ ही उनके अगुवा भी लगें, कृष्ण ने अब अपने पिता नन्द महाराज की ब्रजभूमि में इसतरह प्रवेश किया जिस तरह वे उन सबके साथ आनन्द मनाते हुए सामान्यतया किया करते थे।
तत्तद्वत्सान्पृथड्नीत्वा तत्तदगोष्ठे निवेश्य सः ।
तत्तदात्माभवद्राजंस्तत्तत्सद्ा प्रविष्टवानू ॥
२१॥
ततू-ततू-वत्सान्ू--जिन जिन गायों के जो जो बछड़े थे, उन्हें; पृथक्--अलग अलग; नीत्वा--ले जाकर; ततू-तत्-गोष्ठे--उनकीअपनी अपनी गोशालाओं में; निवेश्य-- भीतर करके ; सः--कृष्ण ने; तत्-तत्-आत्मा--पहले जैसे विभिन्न व्यक्तियों के रूप में;अभवत्--अपना विस्तार कर लिया; राजन्--हे राजा परीक्षित; ततू-तत्-सद्य--उन उन घरों में; प्रविष्टतान्--घुस गये ( इस तरहकृष्ण सर्वत्र थे )॥
हे महाराज परीक्षित, जिन कृष्ण ने अपने को विभिन्न बछड़ों तथा भिन्न भिन्न ग्वालबालों मेंविभक्त कर लिया था वे अब बछड़ों के रूप में विभिन्न गोशालाओं में और फिर विभिन्न बालकोंके रूपों में विभिन्न घरों में घुसे ।
तन्मातरो वेणुरवत्वरोत्थिताउत्थाप्य दोर्भि: परिरभ्य निर्भरम् ।
स्नेहस्नुतस्तन्यपय:सुधासवरं मत्वा परं ब्रह्म सुतानपाययन् ॥
२२॥
ततू-मातर:--उन उन ग्वालबालों की माताएँ; वेणु-रव--ग्वालबालों द्वारा वंशी तथा बिगुल बजाये जाने की ध्वनि से; त्वर--तुरन्त; उत्थिता:--अपने गृहकार्यों को छोड़ कर उठ गईं; उत्थाप्य--तुरन्त अपने पुत्रों को उठाकर; दोर्भि:--दोनों बाँहों से;परिरभ्य--आलिंगन करके; निर्भरमू--किसी प्रकार का भार अनुभव किये बिना; स्नेह-स्नुत--प्रगाढ़ प्रेम से बहते हुए; स्तन्य-पय:--अपने स्तन का दूध; सुधा-आसवम्--अमृतमय प्रेम की तरह सुस्वादु; मत्वा--मान कर; परम्-परम्; ब्रह्म-- कृष्ण;सुतान् अपाययन्--अपने पुत्रों को पिलाया।
बालकों की माताओं ने अपने अपने पुत्रों की वंशियों तथा बिगुलों की ध्वनि सुन कर अपनाअपना गृहकार्य छोड़ कर उन्हें गोदों में उठा लिया, दोनों बाँहों में भर कर उनका आलिंगन कियाऔर प्रगाढ़ प्रेम के कारण, विशेष रूप से कृष्ण के प्रति प्रेम के कारण स्तनों से बह रहा दूध वेउन्हें पिलाने लगीं।
वस्तुतः कृष्ण सर्वस्व हैं लेकिन उस समय अत्यधिक स्नेह व्यक्त करती हुईं वेपरब्रह्म कृष्ण को दूध पिलाने में विशेष आनन्द का अनुभव करने लगीं और कृष्ण ने उनमाताओं का क्रमशः दूध पिया मानो वह अमृतमय पेय हो।
ततो नृपोन्मर्दनमज्जलेपना-लड्ढाररक्षातिलकाशनादिभि: ।
संलालितः स्वाचरितै: प्रहर्षयन्सायं गतो यामयमेन माधव: ॥
२३॥
ततः--तत्पश्चात्; नृप--हे राजा ( महाराज परीक्षित ); उन्मर्दन--उनकी तेल से मालिश करके; मज्ज--स्नान कराकर; लेपन--शरीर में उबटन लगाकर; अलड्डार--आभूषणों से सजाकर; रक्षा--रक्षा-मंत्रों का उच्चारण करके; तिलक--शरीर में बारहस्थानों पर तिलक लगाकर; अशन-आदिभि:--तथा खूब खिलाकर; संलालित: --इस तरह माताओं द्वारा लाड़-प्यार से; स्व-आचरिति:ः--उनके अपने आचरण से; प्रहर्ष-बन्--माताओं को प्रसन्न करते हुए; सायम्--संध्या समय; गत:--आ गये; याम-यमेन--हर काम के लिए समय पूरा होने पर; माधव:--भगवान् कृष्ण
तत्पश्चात्, हे महाराज परीक्षित, अपनी लीलाओं के कार्यक्रमानुसार कृष्ण शाम को लौटते, हर ग्वालबाल के घर घुसते और असली बच्चों की तरह कार्य करते जिससे उनकी माताओं कोदिव्य आनन्द प्राप्त होता।
माताएँ अपने बालकों की देखभाल करतीं, उन्हें तेल लगातीं, उन्हेंनहलातीं, चन्दन का लेप लगातीं, गहनों से सजातीं, रक्षा-मंत्र पढ़तीं, उनके शरीर पर तिलकलगातीं और उन्हें भोजन करातीं।
इस तरह माताएँ अपने हाथों से कृष्ण की सेवा करतीं।
गावस्ततो गोष्ठमुपेत्य सत्वरंहुड्ढारघोषै: परिहूतसड़तान् ।
स्वकान्स्वकान्वत्सतरानपाययन्मुहुर्लिहन्त्य: सत्रवदौधसं पय: ॥
२४॥
गाव:--बछड़े; तत:--तत्पश्चात्; गोष्ठम्--गोशालाओं में; उपेत्य--पहुँच कर; सत्वरम्--शीघ्र ही; हुड्डार-घोषै: --रैंभाती हुई;परिहूत-सड्रतान्ू--गाएँ बुलाने के लिए; स्वकान् स्वकान्ू--अपनी अपनी माताओं को; वत्सतरान्ू--अपने अपने बछड़ों को;अपाययनू--पिलाती हुईं; मुहुः--बारम्बार; लिहन्त्य:--बछड़ों को चाटतीं; सत्रवत् औधसम् पयः--उनके थनों से प्रचुर दूध बहताहुआ।
तत्पश्चात् सारी गौवें अपने अपने गोष्टठों में घुसतीं और अपने अपने बछड़ों को बुलाने के लिएजोर से रँभाने लगतीं।
जब बछड़े आ जाते तो माताएँ उनके शरीरों को बारम्बार चाटतीं और उन्हेंअपने थनों से बह रहा प्रचुर दूध पिलातीं।
गोगोपीनां मातृतास्मिन्नासीत्स्नेहर्थिकां विना ।
पुरोवदास्वपि हरेस्तोकता मायया विना ॥
२५॥
गो-गोपीनाम्ू--गौवों तथा गोपियों दोनों के लिए; मातृता--मातृ-स्नेह; अस्मिन्ू--कृष्ण के प्रति; आसीत्--सामान्यतया था;स्नेह--स्नेह की; ऋधिकाम्--वृर्द्धि; विना--रहित; पुरः-बत्--पहले की तरह; आसु--गौवों तथा गोपियों के बीच था;अपि--यद्यपि; हरेः--कृष्ण का; तोकता-- मेरा पुत्र कृष्ण है; मायया विना--बिना माया के
प्रारम्भ से ही गोपियों का कृष्ण के प्रति मातृबत स्नेह था।
कृष्ण के प्रति उनका यह स्नेहअपने पुत्रों के प्रति स्नेह से भी अधिक था।
इस तरह अपने स्नेह-प्रदर्शन में वे कृष्ण तथा अपनेपुत्रों में भेद बरतती थीं किन्तु अब वह भेद दूर हो चुका था।
ब्रजौकसां स्वतोकेषु स्नेहवल्ल्याब्दमन्वहम् ।
शनैर्नि:सीम ववृधे यथा कृष्णे त्वपूर्ववत् ॥
२६॥
ब्रज-ओकसाम्--ब्रज के सारे निवासियों का; स्व-तोकेषु--अपने अपने पुत्रों के लिए; स्नेह-बल्ली--स्नेह रूपी लता; आ-अब्दम्--एक वर्ष तक; अनु-अहम्-- प्रतिदिन; शनैः--धीरे धीरे; निःसीम--अपार; ववृधे--बढ़ता गया; यथा कृष्णे--कृष्णको पुत्र रूप मानने से; तु--निस्सन्देह; अपूर्व-वत्--जैसाकि पहले कभी न था।
यद्यपि ब्रजभूमि के सारे निवासियों--ग्वालों तथा गोपियों--में पहले से ही कृष्ण के लिएअपने निजी पुत्रों से अधिक स्नेह था किन्तु अब एक वर्ष तक उनके अपने पुत्रों के प्रति यह स्नेहलगातार बढ़ता ही गया क्योंकि अब कृष्ण उनके पुत्र बन चुके थे।
अब अपने पुत्रों के प्रति, जोकि कृष्ण ही थे, उनके प्रेम की वृद्धि का कोई वारापार न था।
नित्य ही उन्हें अपने पुत्रों से कृष्णजितना प्रेम करने की नई प्रेरणा प्राप्त हो रही थी।
इत्थमात्मात्मनात्मानं वत्सपालमिषेण सः ।
पालयन्वत्सपो वर्ष चिक्रीडे वनगोष्ठयो: ॥
२७॥
इत्थम्--इस प्रकार; आत्मा--परमात्मा, कृष्ण ने; आत्मना--अपने आप से; आत्मानम्--पुनः अपने को; वत्स-पाल-मिषेण--ग्वालों तथा बछड़ों के वेश में; सः--साक्षात् कृष्ण; पालयन्--पालन करते हुए; वत्स-प:ः--बछड़ों को चराते हुए; वर्षम्--लगातार एक वर्ष तक; चिक्रीडे--क्रीडाओं का आनन्द लिया; वन-गोष्ठयो: --वृन्दावन तथा जंगल दोनों में ही ।
इस तरह अपने को ग्वालबालों तथा बछड़ों का समूह बना लेने के बाद भगवान् श्रीकृष्णअपने को उसी रूप में बनाये रहे।
वे उसी प्रकार से वृन्दावन तथा जंगल दोनों ही जगहों में एकवर्ष तक अपनी लीलाएँ करते रहे।
एकदा चारयन्वत्सान्सरामो वनमाविशत् ।
पञ्जषासु त्रियामासु हायनापूरणीष्वज: ॥
२८॥
एकदा--एक दिन; चारयन् वत्सानू--बछड़ों को चराते हुए; स-राम:--बलराम समेत; वनम्--वन में; आविशत्--घुसे; पञ्न-घासु--पाँच या छह; त्रि-यामासु--रातें; हायन--पूरा वर्ष; अपूरणीषु--पूरी न होने पर ( एक वर्ष में पाँच-छह दिन शेष रहनेपर ); अज:--भगवान् श्रीकृष्ण
एक दिन जबकि वर्ष पूरा होने में अभी पाँच-छः रातें शेष थीं कृष्ण बलराम सहित बछड़ोंको चराते हुए जंगल में प्रविष्ट हुए।
ततो विदूराच्चरतो गावो वत्सानुपत्नरजम् ।
गोवर्धनाद्रिशिरसि चरन्त्यो दहशुस्तृणम् ॥
२९॥
ततः--तत्पश्चात्; विदूरातू--अधिक दूर स्थान से नहीं; चरतः--चरती हुईं; गाव:--सारी गौवें; बत्सान्ू--तथा उनके बछड़े;उपब्रजम्--वृन्दावन के निकट चरते हुए; गोवर्धन-अद्वि-शिरसि--गोवर्धन पर्वत की चोटी पर; चरन्त्य:--चरती हुईं; ददशु:--देखा; तृणम्--पास ही मुलायम घास।
तत्पश्चात् गोवर्धन पर्वत की चोटी पर चरती हुई गौवों ने कुछ हरी घास खोजने के लिए नीचेदेखा तो उन्होंने अपने बछड़ों को वृन्दावन के निकट चरते देखा जो अधिक दूरी पर नहीं था।
इृष्टाथ तत्स्नेहवशो स्मृतात्मास गोब्रजो उत्यात्मपदुर्गमार्ग: ।
द्विपात्ककुद्ग्रीव उदास्यपुच्छो'गाडडुड्डू तैरास्त्रुपपा जबेन ॥
३०॥
इृष्ठा--देख कर; अथ--तत्पश्चात्; तत्-स्नेह-वश:--अपने बछड़ों के लिए बढ़े हुए स्नेह के कारण; अस्मृत-आत्मा--मानोंअपने आप को भूल गईं; सः--वह; गो-ब्रज:--गौवों का समूह; अति-आत्म-प-दुर्ग-मार्ग: --मार्ग के अत्यन्त दुर्गम होते हुए भी बछड़ों के लिए अति स्नेह के कारण चराने वालों से बिछड़ कर दूर निकल आई; द्वि-पात्-पैरों की जोड़ी; ककुत्-ग्रीव:--उनकी गर्दन के साथ ही उनके डिल्ले ( कूबड़ ) हिल रहे थे; उदास्य-पुच्छ:--अपने सिर तथा पूछें उठाये; अगात्ू--आई;हुड्डू तै:--हंंकार करती; आस्त्रु-पया:--उनके थनों से दूध बह रहा था; जवेन--बलपूर्वक
जब गायों ने गोवर्धन पर्वत की चोटी से अपने अपने बछड़ों को देखा तो वे अधिक स्नेहवशअपने आप को तथा अपने चराने वालों को भूल गईं और दुर्गम मार्ग होते हुए भी वे अपने बछड़ोंकी ओर अतीव चिन्तित होकर दा मानो वे दो ही पाँवों से दौड़ रही हों।
उनके थन दूध से भरे थेऔर उनमें से दूध बह रहा था, उनके सिर तथा पूछें उठी हुई थीं और उनके डिल्ले ( कूबड़ )उनकी गर्दन के साथ साथ हिल रहे थे।
वे तब तक तेजी से दौड़ती रहीं जब तक वे अपने बच्चोंके पास दूध पिलाने पहुँच नहीं गईं।
समेत्य गावोधो वत्सान्वत्सवत्योउप्यपाययन् ।
गिलन्त्य इव चाड्रॉौनि लिहन्त्यः स्वौधसं पय: ॥
३१॥
समेत्य--एकत्र करके; गाव:--सारी गौवें; अध: --नीचे, गोवर्धन पर्वत के नीचे; वत्सानू--अपने बछड़ों को; वत्स-वत्य:--मानों उन्हें नये बछड़ें उत्पन्न हुए हों; अपि--यद्यपि नये बछड़े उपस्थित थे; अपाययन्--उन्हें पिलाया; गिलन्त्य:--निगलते हुए;इब--मानो; च--भी; अड्रानि-- उनके शरीरों को; लिहन्त्य:--चाटते हुए मानो नवजात बछड़े हों; स्व-ओधसम् पय: --अपनेथन से बहता हुआ दूध।
गौवों ने नये बछड़ों को जन्म दिया था किन्तु गोवर्धन पर्वत से नीचे आते हुए, अपने पुरानेबछड़ों के लिए अतीव स्नेह के कारण इन्हीं बछड़ों को अपने थन का दूध पीने दिया।
वे चिन्तितहोकर उनका शरीर चाटने लगीं मानो उन्हें निगल जाना चाहती हों।
गोपास्तद्रोधनायासमौध्यलज्जोरुमन्युना ।
दुर्गाध्वकृच्छतो भ्येत्य गोवत्सैर्ददशु: सुतान्ू ॥
३२॥
गोपा:-ग्वाले; तत्-रोधन-आयास--गायों को बछड़ों की ओर जाने से रोकने के अपने प्रयास का; मौध्य--निराशा के कारण;लज्ञा--लज्जित होकर; उरु-मन्युना--साथ ही काफी क्रुद्ध होकर; दुर्ग-अध्व-कृच्छुत:--बड़ी कठिनाई से दुर्गम मार्ग पार करतेहुए; अभ्येत्य--वहाँ पहुँच कर; गो-वत्सैः--बछड़ों समेत; ददशु:--देखा; सुतानू--अपने अपने पुत्रों को
गौवों को उनके बछड़ों के पास जाने से रोकने में असमर्थ ग्वाले लज्जित होने के साथ साथक्रुद्ध भी हुए।
उन्होंने बड़ी कठिनाई से दुर्गम मार्ग पार किया किन्तु जब वे नीचे आये और अपनेअपने पुत्रों को देखा तो वे अत्यधिक स्नेह से अभिभूत हो गये।
तदीक्षणोत्प्रेमरसाप्लुताशयाजातानुरागा गतमन्यवोर्भकान् ।
उदुह्म दोर्भि: परिरभ्य मूर्थनिघ्राणैरवापु: परमां मुदं ते ॥
३३॥
ततू-ईक्षण-उत्प्रेम-रस-आप्लुत-आशया: -ग्वालों के सारे विचार अपने पुत्रों को देख कर उठने वाले वात्सल्य-प्रेम में लीन होगये; जात-अनुरागा:--अत्यधिक आकर्षण का अनुभव करते हुए; गत-मन्यव:--क्रोध दूर हो जाने से; अर्भकान्--अपने पुत्रोंको; उदुह्म--उठाकर; दोर्भि: -- अपनी बाँहों से; परिरभ्य--आलिंगन करके; मूर्धनि--सिर पर; पघ्राणैः --सूँघ कर; अवापु:--प्राप्त किया; परमाम्--सर्वोच्च; मुदम्ू--आनन्द; ते--उन ग्वालों ने |
उस समय ग्वालों के सारे विचार अपने अपने पुत्रों को देखने से उत्पन्न वात्सल्य-प्रेम रस मेंविलीन हो गये।
अत्यधिक आकर्षण का अनुभव करने से उनका क्रोध छू-मन्तर हो गया।
उन्होंनेअपने पुत्रों को उठाकर बाँहों में भर कर आलिंगन किया और उनके सिरों को सूँघ कर सर्वोच्चआनन्द प्राप्त किया।
ततः प्रवयसो गोपास्तोकाश्लेषसुनिर्वृता: ।
कृच्छाच्छनैरपगतास्तदनुस्मृत्युदअव: ॥
३४॥
ततः--तत्पश्चात्; प्रबयस:--वयस्क; गोपा:--ग्वाले; तोक-आश्लेष-सुनिर्वृता: -- अपने पुत्रों का आलिंगन करके परम प्रसन्नहुए; कृच्छातू-- कठिनाई से; शनैः--धीरे धीरे; अपगता:--आलिंगन करना छोड़ कर जंगल लौट गये; तत्-अनुस्मृति-उद-श्रव: --अपने पुत्रों का स्मरण करने पर उनकी आँखों से आँसू आ गये।
तत्पश्चात् प्रौढ़ ग्वाले अपने पुत्रों के आलिंगन से अत्यन्त तुष्ठ होकर बड़ी कठिनाई औरअनिच्छा से उनका आलिंगन धीरे धीरे छोड़ कर जंगल लौट आये।
किन्तु जब उन्हें अपने पुत्रोंका स्मरण हुआ तो उनकी आँखों से आँसू लुढ़क आये।
ब्रजस्य राम: प्रेमर्थ्वीक्ष्यौत्कण्ठ्यमनुक्षणम् ।
मुक्तस्तनेष्वपत्येष्वप्यहेतुविदचिन्तयत् ॥
३५॥
ब्रजस्य--गायों के झुंड का; राम:--बलराम; प्रेम-ऋधे: --स्नेह बढ़ने के कारण; वीक्ष्य--देख कर; औतू-कण्ठ्यम्-- अनुरक्ति;अनु-क्षणम्--निरन्तर; मुक्त-स्तनेषु--बड़े हो जाने के कारण अपनी माताओं का स्तन-पान छोड़ चुके थे; अपत्येषु--उन बछड़ोंको; अपि--भी; अहेतु-वित्--कारण न समझने से; अचिन्तयत्--इस प्रकार सोचने लगे।
स्नेहाधिक्य के कारण गौवों को उन बछड़ों से भी निरन्तर अनुराग था, जो बड़े होने केकारण उनका दूध पीना छोड़ चुके थे।
जब बलदेव ने यह अनुराग देखा तो इसका कारण उनकीसमझ में नहीं आया अतः वे इस प्रकार सोचने लगे।
किमेतदद्धुतमिव वासुदेवेडखिलात्मनि ।
ब्रजस्य सात्मनस्तोकेष्वपूर्व प्रेम वर्धते ॥
३६॥
किम्--क्या; एतत्--यह; अद्भुतम्ू--अद्भुत; इब--जैसा; वासुदेवे --वासुदेव कृष्ण में; अखिल-आत्मनि--सारे जीवों केपरमात्मा; ब्रजस्य--सारे ब्रजवासियों का; स-आत्मन:--मेरे समेत; तोकेषु--इन बालकों में; अपूर्वम्-- अपूर्व ; प्रेम--प्रेम;वर्धते--बढ़ रहा है|
यह विचित्र घटना कया है? सभी व्रजवासियों का, मुझ समेत इन बालकों तथा बछड़ों केप्रति अपूर्व प्रेम उसी तरह बढ़ रहा है, जिस तरह सब जीवों के परमात्मा भगवान् कृष्ण के प्रतिहमारा प्रेम बढ़ता है।
केयं वा कुत आयाता दैवी वा नार्युतासुरी ।
प्रायो मायास्तु मे भर्तुर्नान्या मेडषपि विमोहिनी ॥
३७॥
का--कौन; इयम्--यह; वा--अथवा; कुतः--कहाँ से; आयाता--आयी है; दैवी --देवी; वा--अथवा; नारी--स्त्री; उत--अथवा; आसुरी--राक्षसी; प्रायः --अधिकांशत:; माया--माया; अस्तु--हो सकती है; मे--मेरे; भर्तुः--प्रभु, कृष्ण के; न--नहीं; अन्या--कोई दूसरा; मे--मेरा; अपि--निश्चित रूप से; विमोहिनी--मोहग्रस्त करने वाली |
यह योगशक्ति कौन है और वह कहाँ से आई है? क्या वह देवी है या कोई राक्षसी है?अवश्य ही वह मेरे प्रभु कृष्ण की माया होगी क्योंकि उसके अतिरिक्त मुझे और कौन मोहसकता है?
इति सज्ञिन्त्य दाशाहों वत्सान््सवयसानपि ।
सर्वानाचष्ट वैकुण्ठं चक्षुषा वयुनेन सः ॥
३८ ॥
इति सशञ्ञिन्त्य--इस प्रकार सोच कर; दाशाई:--बलदेव ने; वत्सान्ू--बछड़ों को; स-वयसान्-- अपने साथियों समेत; अपि--भी; सर्वानू--सारे; आचष्ट--देखा; वैकुण्ठम्--केवल श्रीकृष्ण रूप में; चक्षुषा वयुनेन--दिव्य ज्ञान के चश्लुओं द्वारा; सः--उसने ( बलदेव ने )
इस प्रकार सोचते हुए बलराम अपने दिव्य ज्ञान के चक्षुओं से देख सके कि ये सारे बछड़ेतथा कृष्ण के साथी श्रीकृष्ण के ही अंश हैं।
नैते सुरेशा ऋषयो न चैतेत्वमेव भासीश भिदाश्रयेडपि ।
सर्व पृथक्त्वं निगमात्कथं वदे-त्युक्तेन वृत्तं प्रभुणा बलोउबैत् ॥
३९॥
न--नहीं; एते--ये लड़के; सुर-ईशा:--देवताओं में श्रेष्ठ; ऋषय:--ऋषिगण; न--नहीं; च--तथा; एते--ये बछड़े; त्वमू--तुम ( कृष्ण ); एब--केवल; भासि--प्रकट हो रहे हो; ईश--हे परम नियन्ता; भित्-आश्रये--नाना प्रकार के भेद में; अपि--होते हुए भी; सर्वमू--प्रत्येक वस्तु; पृथक्-विद्यमान; त्वम्ू--तुम ( कृष्ण ); निगमात्--संक्षेप में; कथम्--कैसे; बद--बतलाओ; इति--इस प्रकार; उक्तेन--( बलदेव द्वारा ) प्रार्थना किये जाने पर; वृत्तम्--स्थिति; प्रभुणा--कृष्ण द्वारा ( कही जानेपर ); बलः--बलदेव; अवैत्--समझ गये।
भगवान् बलदेव ने कहा, 'हे परम नियन्ता, मेरे पहले सोचने के विपरीत ये बालक महान्देवता नहीं हैं न ही ये बछड़े नारद जैसे महान् ऋषि हैं।
अब मैं देख सकता हूँ कि तुम्हीं अपने कोनाना प्रकार के रूप में प्रकट कर रहे हो।
एक होते हुए भी तुम बछड़ों तथा बालकों के विविधरूपों में विद्यमान हो।
कृपा करके मुझे यह विस्तार से बतलाओ।
बलदेव द्वारा इस प्रकारप्रार्थना किये जाने पर कृष्ण ने सारी स्थिति समझा दी और बलदेव उसे समझ भी गये।
ताददेत्यात्मभूरात्ममानेन त्रुट्यनेहसा ।
पुरोवदाब्दं क्रीडन्तं ददशे सकल॑ हरिम् ॥
४०॥
तावत्--तब तक; एत्य--लौट कर; आत्म-भू:--ब्रह्मा ने; आत्म-मानेन--अपनी माप के अनुसार; त्रुटि-अनेहसा -- क्षण- भरमें; पुरः-वत्--पहले की तरह; आ-अब्दम्--एक वर्ष तक; क्रीडन्तम्--खेलते हुए; ददशे--देखा; स-कलम्--अपने अंशोंसहित; हरिम्-- भगवान् हरि ( श्रीकृष्ण ) को |
जब ब्रह्मा एक क्षण के बाद ( अपनी गणना के अनुसार ) वहाँ लौटे तो उन्होंने देखा कियद्यपि मनुष्य की माप के अनुसार पूरा एक वर्ष बीत चुका है, तो भी कृष्ण उतने समय बाद भीउसी तरह अपने अंशरूप बालकों तथा बछड़ों के साथ खेलने में व्यस्त हैं।
यावन्तो गोकुले बाला: सवत्सा: सर्व एव हि ।
मायाशये शयाना मे नाद्यापि पुनरुत्थिता: ॥
४१॥
यावन्त:--उतने ही; गोकुले--गोकुल में; बाला:--बालक; स-वत्सा:--अपने अपने बछड़ों के साथ; सर्वे--सभी; एव--निस्सन्देह; हि-- क्योंकि; माया-आशये--माया की सेज पर; शयानाः --सो रहे हैं; मे--मेरी; न--नहीं; अद्यू--आज; अपि--भी; पुन:--फिर से; उत्थिता: --उठे हैं भगवान्
ब्रह्म ने सोचा: गोकुल के जितने भी बालक तथा बछड़े थे उन्हें मैंने अपनीयोगशक्ति की सेज पर सुला रखा है और आज के दिन तक वे जगे नहीं हैं।
इत एतेउत्र कुत्रत्या मनन््मायामोहितेतरे ।
तावन्त एव तत्राब्दं क्रीडन्तो विष्णुना समम् ॥
४२॥
इतः--इस कारण से; एते--अपने अपने बछड़ों समेत ये सारे बालक; अत्र--यहाँ पर; कुत्रत्या:--कहाँ से आये हैं; मत्-माया-मोहित-इतरे--मेरी माया से मोहित हुओं के अतिरिक्त; तावन्तः--उतने ही बालक; एव--निस्सन्देह; तत्र--वहाँ पर; आ-अब्दमू--एक वर्ष तक; क्रीडन्त:--खेल रहे हैं; विष्णुना समम्--कृष्ण के साथ।
यद्यपि पूरे एक वर्ष तक कृष्ण के साथ उतने ही बालक तथा बछड़े खेलते रहे फिर भी येमेरी योगशक्ति से मोहित बालकों से भिन्न हैं।
ये कौन हैं ? ये कहाँ से आये ?
एवमेतेषु भेदेषु चिरं ध्यात्वा स आत्मभू: ।
सत्या: के कतरे नेति ज्ञातुं नेष्ट कथज्लन ॥
४३॥
एवम्--इस तरह; एतेषु भेदेषु--इन बालकों के बीच, जो पृथक् विद्यमान हैं; चिरम्--दीर्घकाल तक; ध्यात्वा--सोच कर;सः--वह; आत्म-भू: --ब्रह्मा; सत्या:--असली; के --कौन; कतरे--कौन; न--नहीं हैं; इति--इस प्रकार; ज्ञातुमू--जानने केलिए; न--नहीं; इष्टे--समर्थ था; कथञ्लन--किसी भी तरह से
इस तरह दीर्घकाल तक विचार करते करते भगवान् ब्रह्मा ने उन दो प्रकार के बालकों मेंअन्तर जानने का प्रयास किया जो एक-दूसरे से पृथक् रह रहे थे।
वे यह जानने का प्रयास करतेरहे कि कौन असली है और कौन नकली है किन्तु वे कुछ भी नहीं समझ पाये।
एवं सम्मोहयन्विष्णुं विमोहं विश्वमोहनम् ।
स्वयैव माययाजोपि स्वयमेव विमोहित: ॥
४४॥
एवम्--इस तरह से; सम्मोहयन्--मोहित करने की इच्छा से; विष्णुम्--सर्वव्यापी भगवान् कृष्ण को; विमोहम्--जो कभीमोहित नहीं किये जा सकते; विश्व-मोहनम्--किन्तु जो सारे ब्रह्माण्ड को मोहित करने वाले हैं; स्वया--अपने ही द्वारा; एव--निस्सन्देह; मायया--योगशक्ति द्वारा; अज:--ब्रह्मा; अपि-- भी; स्वयम्--स्वयं ; एब--निश्चय ही; विमोहित:--मोहित हो गये।
चूँकि ब्रह्मा ने सर्वव्यापी भगवान् कृष्ण को, जो कभी मोहित नहीं किये जा सकते अपितुसम्पूर्ण ब्रह्माण्ड को मोहित करने वाले हैं, मोहित करना चाहा इसलिए वे स्वयं ही अपनीयोगशक्ति द्वारा मोह में फँस गये।
तम्यां तमोवन्नैहारं खद्योतार्चिरिवाहनि ।
महतीतरमायैशयं निहन्त्यात्मनि युज्शतः ॥
४५॥
तम्याम्--अँधेरी रात में; तम:ः-वत्-- अंधकार के समान; नैहारम्--बर्फ से उत्पन्न; खद्योत-अर्चि: --जुगनू का प्रकाश; इब--सहश; अहनि--दिन के समय, सूर्य-प्रकाश में; महति--महापुरुष में; इतर-माया--अपरा शक्ति; ऐश्यम्--सामर्थ्य; निहन्ति--नष्ट करती है; आत्मनि--अपने को; युज्भञत:ः--प्रयोग करने वाले
व्यक्ति को जिस तरह अँधेरी रात में बर्फ का अँधेरा तथा दिन के समय जुगनू के प्रकाश का कोईमहत्व नहीं होता, उसी तरह निकृष्ट व्यक्ति की योगशक्ति महान् शक्तिशाली व्यक्ति के विरुद्धप्रयोग किये जाने पर कुछ भी नहीं कर पाती, उलटे उस निकृष्ट व्यक्ति की शक्ति कम हो जातीहै।
तावत्सवें वत्सपाला: पश्यतोजस्य तत्क्षणात् ।
व्यदृश्यन्त घनश्यामा: पीतकौशेयवासस: ॥
४६॥
तावत्--इतने लम्बे समय से; सर्वे--सभी; वत्स-पाला:--बछड़े तथा उन्हें चराने वाले बालक दोनों ही; पश्यत:--देखते हुए;अजस्य--ब्रह्मा के; तत्-क्षणात्--तुरन्त; व्यहश्यन्त--दिखलाई पड़े; घन-श्यामा:--श्याम बादलों के स्वरूप वाले; पीत-'कौशेय-वाससः -- पीला रेशमी वस्त्र पहने हुए।
जब ब्रह्मा देख रहे थे तो तुरन्त ही सारे बछड़े तथा उन्हें चराने वाले बालक नीले बादलों केरंग वाले स्वरूप में पीले रेशमी वस्त्र पहने हुए प्रकट होने लगे।
चतुर्भुजा: शट्डुचक्रगदाराजीवपाणय: ।
किरीटिनः कुण्डलिनो हारिणो वनमालिन: ॥
४७॥
श्रीवत्साड्रददोरलकम्बुकड्डणपाणय: ।
नूपुरैः कटकैर्भाता: कटिसूत्राडुलीयकै: ॥
४८ ॥
चतुः:-भुजा:--चार भुजाओं वाले; शद्भु-चक्र-गदा-राजीव-पाण-य:--अपने हाथों में शंख, चक्र, गदा तथा कमल का फूलधारण किये; किरीटिन:--अपने सिरों पर मुकुट पहने; कुण्डलिन:--कानों में कुण्डल पहने; हारिण:--मोती के हार पहने;बन-मालिन:--जंगल के फूलों की मालाएँ पहने; श्रीवत्स-अड्भद-दो-रत्न-कम्बु-कड्जूण-पाणय: --अपने वक्षस्थलों में लक्ष्मीका चिह्न, भुजाओं में बाजूबन्द, गलों में कौस्तुभ मणि, जिसमें शंख जैसी तीन रेखाएँ अंकित थीं तथा हाथों में कंगन पहने हुए;नूपुरैः--पाँवों में घुंघुरू से युक्त; कटकैः--टखबनों में चूड़ों से युक्त; भाता:--सुन्दर लग रहे थे; कटि-सूत्र-अद्डुली-यकै:--कमर में पवित्र करधनी तथा अंगुलियों में अँगूठियों समेत |
इन सबों के चार हाथ थे जिनमें शंख, चक्र, गदा तथा कमल धारण किये थे।
वे अपने सिरोंपर मुकुट पहने थे, उनके कानों में कुंडल और गलों में जंगली फूलों के हार थे।
उनके वक्षस्थलोंके दाहिनी ओर के ऊपरी भाग में लक्ष्मी का चिन्ह था।
वे अपनी बाहों में बाजूबन्द, शंख जैसीतीन रेखाओं से अंकित गलों में कौस्तुभ मणि तथा कलाइयों में कंगन पहने थे।
उनके टखनों मेंपायजेब थीं, पाँवों में आभूषण और कमर में पवित्र करधनी थी।
वे सभी अत्यन्त सुन्दर लग रहेथे।
आइडूप्रिमस्तकमापूर्णास्तुलसीनवदामभि: ।
कोमलै: सर्वगात्रेषु भूरिपुण्यवरदर्पिति: ॥
४९ ॥
आ-अद्धप्रि-मस्तकम्-पाँव से लेकर सिर तक; आपूर्णा:--पूरी तरह सजा; तुलसी-नव-दामभि:--तुलसी की ताजी पत्तियों सेबने हारों से; कोमलै:--कोमल; सर्व-गात्रेषु--पूरे शरीर में; भूरि-पुण्यवत्-अर्पितैः --पुण्यकर्मो में लगे भक्तों द्वारा अर्पित कियेगये।
पाँव से लेकर सिर तक उनके शरीर के सारे अंग तुलसी दल से बने ताजे मुलायम हारों सेपूरी तरह सज्जित थे जिन्हें पुण्यकर्मो ( श्रवण तथा कीर्तन ) द्वारा भगवान् की पूजा में लगे भक्तोंने अर्पित किया था।
चन्द्रिकाविशदस्मेरे: सारुणापाडुवीक्षितैः ।
स्वकार्थानामिव रजःसत्त्वाभ्यां स्त्रष्टणालका: ॥
५०॥
चन्द्रिका-विशद-स्मेरे:--पूर्ण वर्द्धमान चन्द्रमा की तरह शुद्ध मुसकान से; स-अरुण-अपाडु-वीक्षितै:-- अपनी लाल-लालआँखों की स्वच्छ चितवन से; स्वक-अर्थानाम्--अपने भक्तों की इच्छाओं के; इब--सहृश; रज:-सत्त्वाभ्यामू--रजो तथा सतोगुणों से; स्त्रष्ट-पालका:--स्त्रष्टा तथा पालनकर्ता थे।
वे विष्णु रूप जो चंद्रमा के बढ़ते हुए प्रकाश के तुल्य थे, अपनी शुद्ध मुस्कान तथा अपनीलाल-लाल आँखों की तिरछी चितवन के द्वारा, अपने भक्तों की इच्छाओं को, मानो रजोगुणएवं तमोगुण से, उत्पन्न करते तथा पालते थे।
आत्मादिस्तम्बपर्यन्तैमूर्तिमद्धिश्वराचरै: ।
नृत्यगीताद्यनेकाहैं: पृथक्पृथगुपासिता: ॥
५१॥
आत्म-आदि-स्तम्ब-पर्यन्तै:--ब्रह्मा से लेकर क्षुद्र जीव तक; मूर्ति-मद्धिः--वही रूप धारण करके; चर-अचरैः--चल तथाअचल प्राणियों द्वारा; नृत्य-गीत-आदि-अनेक-अहै: -- पूजा के विविध साधनों द्वारा, यथा नाच और गाने से; पृथक् पृथक्--अलग अलग; उपासिता:--पूजित होकर।
चतुर्मुख ब्रह्मा से लेकर श्रुद्र से क्षुद्र जीव, चाहे वे चर हों या अचर, सबों ने स्वरूप प्राप्तकर रखा था और वे अपनी अपनी क्षमताओं के अनुसार नाच तथा गायन जैसी पूजा विधियों सेउन विष्णु मूर्तियों की अलग अलग पूजा कर रहे थे।
अणिमाद्यैर्महिमभिरजाद्याभिर्विभूतिभि: ।
चतुर्विशतिभिस्तत्त्वै: परीता महदादिभि: ॥
५२॥
अणिमा-आद्यि:--अणिमा इत्यादि; महिमभि:--महिमा आदि; अजा-आद्याभि:--अजा आदि; विभूतिभि:ः--शक्तियों से; चतुः-विंशतिभि: --चौबीस; तत्त्वै:--जगत की सृष्टि के तत्त्वों द्वारा; परीता:--( सारी विष्णु मूर्तियाँ ) घिरी हुई; महत्-आदिभि: --महत् तत्त्व इत्यादि से |
वे सारी विष्णु मूर्तियाँ अणिमा इत्यादि सिद्धधियों, अजा इत्यादि योगसिद्धियों तथा महत तत्त्वआदि सृष्टि के २४ तत्त्वों से घिरी हुई थीं।
कालस्वभावसंस्कारकामकर्मगुणादिभि: ।
स्वमहिध्वस्तमहिभिर्मूर्तिमद्धिरुपासिता: ॥
५३॥
काल--समय; स्वभाव--स्वभाव; संस्कार--संस्कार; काम--इच्छा; कर्म--सकाम कर्म; गुण--तीन गुण; आदिभि:--इत्यादि के द्वारा; स्व-महि-ध्वस्त-महिभि:--जिसकी स्वतंत्रता भगवान् की शक्ति के अधीन थी; मूर्ति-मद्धिः--स्वरूप वाली;उपासिताः --पूजित हो रहे थे।
तब भगवान् ब्रह्म ने देखा कि काल, स्वभाव, संस्कार, काम, कर्म तथा गुण--ये सभीअपनी स्वतंत्रता खो कर पूर्णतया भगवान् की शक्ति के अधीन होकर स्वरूप धारण किये हुए थेऔर उन विष्णु मूर्तियों की पूजा कर रहे थे।
सत्यज्ञानानन्तानन्दमात्रैकरसमूर्तयः ।
अस्पृष्टभूरिमाहात्म्या अपि ह्युपनिषदृशाम् ॥
५४॥
सत्य--शाश्वत; ज्ञान--ज्ञान से युक्त; अनन्त--असीम; आनन्द--आनन्द से पूर्ण; मात्र--केवल; एक-रस--सदैव स्थित;मूर्तयः -- स्वरूप; अस्पृष्ट-भूरि-माहात्म्या:--जिसकी महती महिमा छू तक नहीं जाती; अपि--भी; हि-- क्योंकि; उपनिषत्-हशाम्--उपनिषदों का अध्ययन करने वाले ज्ञानियों द्वारा
वे समस्त विष्णु मूर्तियाँ शाश्वत, असीम स्वरूपों वाली, ज्ञान तथा आनन्द से पूर्ण एवं कालके प्रभाव से परे थीं।
उपनिषदों के अध्ययन में रत ज्ञानीजन भी उनकी महती महिमा का स्पर्शतक नहीं कर सकते थे।
एवं सकृद्ददर्शाज: परब्रह्मात्मनोउखिलान् ।
यस्य भासा सर्वमिदं विभाति सचराचरम् ॥
५५॥
एवम्--इस प्रकार; सकृत्--एक ही साथ; दरदर्श--देखा; अजः--ब्रह्मा ने; पर-ब्रह्म--परम सत्य के; आत्मन:--अंश;अखिलानू--सारे बछड़ों तथा बालकों को; यस्य--जिसके; भासा-- प्रकट होने से; सर्वम्--सभी; इृदम्--यह; विभाति--व्यक्त है; स-चर-अचरम्--जो कुछ भी चर तथा अचर है
इस प्रकार भगवान् ब्रह्मा ने परब्रह्न को देखा जिसकी शक्ति से यह सम्पूर्ण ब्रह्माण्ड सारे चरतथा अचर प्राणियों समेत व्यक्त होता है।
उन्होंने उसी के साथ ही सारे बछड़ों तथा बालकों कोभगवान् के अंशों के रूप में देखा।
ततोतिकुतुकोद्वुत्यस्तिमितैकादशेन्द्रिय: ।
तद्धाम्नाभूदजस्तृष्णीं पूर्देव्यन्तीव पुत्रिका ॥
५६॥
ततः--तब; अतिकुतुक-उद्दुत्य-स्तिमित-एकादश-इन्द्रिय:--जिनकी ग्यारह इन्द्रियाँ आश्चर्य के कारण क्षुब्ध हो चुकी थीं औरदिव्य आनन्द के कारण स्तम्भित हो गई थीं; तद्-धाम्ना--उन विष्णु मूर्तियों के तेज से; अभूत्ू--हो गया; अजः --ब्रह्मा;तृष्णीम्-मौन; पू:-देवी-अन्ति--ग्राम्य देवता की उपस्थिति में; इब--जिस तरह; पुत्रिका--बच्चे द्वारा बनाया गया मिट्टी काखिलौना।
तब उन विष्णु मूर्तियों की तेज शक्ति से ब्रह्मा की ग्यारहों इन्द्रियाँ आश्चर्य से क्षुब्ध तथा दिव्यआनन्द से स्तब्ध हो चुकी थीं अतः वे मौन हो गये मानो ग्राम्य देवता की उपस्थिति में किसीबच्चे की मिट्टी की बनी गुड़िया हो।
इतीरेशेउतक्ये निजमहिमनि स्वप्रमितिकेपरत्राजातोतन्निरसनमुखब्रह्मकमितौ ।
अनीशेपि द्र॒ष्ठ किमिदर्मिति वा मुह्मति सतिचच्छादाजो ज्ञात्वा सपदि परमोडजाजवनिकाम् ॥
५७॥
इति--इस प्रकार; इरा-ईशे--इरा अर्थात् सरस्वती के स्वामी, ब्रह्म के; अतर्क्ये--परे; निज-महिमनि--अपनी महिमा; स्व-प्रमितिके--स्वतः व्यक्त तथा आनन्दमय के; परत्र--परे; अजात:--भौतिक शक्ति ( प्रकृति ); अतत्--अप्रासंगिक; निरसन-मुख--अप्रासंगिक के परित्याग द्वारा; ब्रह्यक--वेदान्त द्वारा; मितौ--ज्ञानवान; अनीशे --असमर्थ होने से; अपि-- भी; द्रष्ठम्--देखने के लिए; किम्ू--क्या; इृदम्--यह; इति--इस प्रकार; वा--अथवा; मुह्यति सति--मोहित होकर; चच्छाद--हटा दिया;अजः-भगवान् कृष्ण ने; ज्ञात्वा--जान कर; सपदि--तुरन्त; परम:--सर्व श्रेष्ठ अजा-जवनिकाम्--माया का पर्दा)परब्रह्म मानसिक तर्क के परे है।
वह स्वतः व्यक्त, अपने ही आनन्द में स्थित तथा भौतिकशक्ति के परे है।
वह वेदान्त के द्वारा अप्रासंगिक ज्ञान के निरसन करने पर जाना जाता है।
इसतरह जिस भगवान् की महिमा विष्णु के सभी चतुर्भुज स्वरूपों की अभिव्यक्ति से प्रकट हुई थीउससे सरस्वती के प्रभु ब्रह्माजी मोहित थे।
उन्होंने सोचा, '‘यह क्या है?' और उसके बाद वेदेख भी नहीं पाये।
तब भगवान् कृष्ण ने ब्रह्मा की स्थिति समझते हुए तुरन्त ही अपनी योगमायाका परदा हटा दिया।
ततोडर्वाक्प्रतिलब्धाक्ष: कः परेतवदुत्थितः ।
कृच्छादुन्मील्य वै दृष्टीराचष्टेदं सहात्मना ॥
५८ ॥
ततः--तब; अर्वाक्--बाह्य; प्रतिलब्ध-अक्ष:--चेतना जागृत होने पर; कः--ब्रह्मा; परेत-वत्--मृत व्यक्ति की तरह;उत्थित:--उठ खड़े हुए; कृच्छात्--कठिनाई से; उन््मील्य--खोल कर; बै--निस्सन्देह; दृष्टी:--अपनी आँखें; आचष्ट--देखा;इदम्--इस ब्रह्माण्ड को; सह-आत्मना--अपने सहित ।
तब ब्रह्मा की बाह्य चेतना वापस लौटी और वे इस तरह उठ खड़े हुए मानो मृत व्यक्तिजीवित हो उठा हो।
बड़ी मुश्किल से अपनी आँखें खोलते हुए उन्होंने अपने सहित ब्रह्माण्ड कोदेखा।
सपद्येवाभितः पश्यन्दिशो पश्यत्पुर:स्थितम् ।
वृन्दावन जनाजीव्यद्रुमाकीर्ण समाप्रियम् ॥
५९॥
सपदि--तुरन््त; एव--निस्सन्देह; अभित:--चारों ओर; पश्यन्ू--देखते हुए; दिशः--दिशाओं में; अपश्यत्--ब्रह्मा ने देखा;पुरः-स्थितम्ू--सामने स्थित; वृन्दावनम्--वृन्दावन; जन-आजीव्य-द्रुम-आकीर्णम्--वृक्षों से पूरित, जो निवासियों की जीविकाके साधन थे; समा-प्रियम्ू--और जो सारी ऋतुओं में समान रूप से सुहावने थे।
तब सारी दिशाओं में देखने पर भगवान् ब्रह्मा ने तुरन्त अपने समक्ष वृन्दावन देखा जो उनवृक्षों से पूरित था, जो निवासियों की जीविका के साधन थे और सारी ऋतुओं में समान रूप सेप्रिय लगने वाले थे।
यत्र नैसर्गदुवैरा: सहासन्रूमगादय: ।
मित्राणीवाजितावासद्गुतरुट्तर्षकादिकम् ॥
६०॥
यत्र--जहाँ; नैसर्ग--प्रकृति द्वारा; दुर्वराः--वैर होने पर; सह आसनू--साथ साथ रहते हैं; नू--मनुष्य; मृग-आदय:--तथा पशु;मित्राणि--मित्रगण; इब--सहृश; अजित-- श्रीकृष्ण के; आवास--निवासस्थान; द्रत--चले गये; रुट्ू--क्रोध; तर्षक-आदिकम्--प्यास इत्यादि |
वृन्दावन भगवान् का दिव्य धाम है जहाँ न भूख है, न क्रोध, न प्यास।
यद्यपि मनुष्यों तथाहिंस््र पशुओं में स्वाभाविक वैर होता है किन्तु वे यहाँ दिव्य मैत्री-भाव से साथ साथ रहते हैं।
तत्रोद्नहत्पशुपवंशशिशुत्वनाट्यंब्रह्माद्दयं परमनन्तमगाधबो धम् ।
वत्सान्सखीनिव पुरा परितो विचिन्व-देक॑ सपाणिकवल परमेछ्यचष्ट ॥
६१॥
तत्र--वहाँ ( वृन्दावन में ); उद्दहत्ू-- धारण करते हुए; पशुप-वंश-शिशुत्व-नाट्यूम्-ग्वालों के परिवार में शिशु बनने की क्रीड़ा( कृष्ण का अन्य नाम गोपाल है अर्थात् वह जो गौवें पालता है ); ब्रह्म--ब्रह्म; अद्दयम्--अद्वितीय; परम्--परम; अनन्तमू--असीम; अगाध-बोधम्--अपार ज्ञान से युक्त; वत्सान्ू--बछड़ों को; सखीन्--तथा उनके संगी बालकों को; इब पुरा--पहलेकी तरह; परितः--सर्वत्र; विचिन्वत्--खोजते हुए; एकम्--अकेले, अपने आप; स-पाणि-कवलम्--हाथ में भोजन का कौरलिये; परमेष्ठी --ब्रह्माजी ने; अचष्ट--देखा
तब भगवान् ब्रह्मा ने उस ब्रह्म ( परम सत्य ) को जो अद्ठय है, ज्ञान से पूर्ण है और असीम हैग्वालों के परिवार में बालक-वेश धारण करके पहले की ही तरह हाथ में भोजन का कौर लिएबछड़ों को तथा अपने ग्वालमित्रों को खोजते हुए एकान्त में खड़े देखा।
इृष्ठा त्वेण निजधोरणतोवतीर्यपृथ्व्यां वपु:; कनकदण्डमिवाभिपात्य ।
स्पृष्ठा चतुर्मुकुटकोटिभिरडूप्रियुग्मंनत्वा मुदश्रुसुजलैरकृताभिषेकम् ॥
६२॥
इृष्ठा--देख कर; त्वरेण--तेजी से; निज-धोरणत:--अपने वाहन हंस से; अवतीर्य --उतरे; पृथ्व्याम्ू--पृथ्वी पर; बपु:--उनकाशरीर; कनक-दण्डम् इब--सोने की छड़ी जैसा; अभिपात्य--गिर पड़े; स्पृष्टा--छूकर; चतु:-मुकुट-कोटि-भि: --अपने चारोंमुकुटों के सिरों से; अड्ध्रि-युग्मम्ू--दोनों चरणकमलों को; नत्वा--नमस्कार करके; मुत्-अश्रु-सु-जलै:-- अपने प्रसन्नता केअश्रुओं के जल से; अकृत--सम्पन्न किया अभिषेकम्--उनके चरणकमल पखारने का उत्सव
यह देख कर ब्रह्मा तुरन्त अपने वाहन हंस से नीचे उतरे और भूमि पर सोने के दण्ड केसमान गिर कर भगवान् कृष्ण के चरणकमलों का स्पर्श अपने सिर में धारण किये हुए चारोंमुकुटों के अग्रभागों ( सरों ) से किया।
उन्होंने नमस्कार करने के बाद अपने हर्ष-अश्रुओं केजल से कृष्ण के चरणकमलों को नहला दिया।
उत्थायोत्थाय कृष्णस्य चिरस्य पादयो: पतन् ।
आस्ते महित्वं प्राग्दष्ठं स्मृत्वा स्मृत्वा पुनः पुनः ॥
६३॥
उत्थाय उत्थाय--बारम्बार उठ कर; कृष्णस्य--कृष्ण के; चिरस्य--दीर्घकाल से; पादयो:--चरणकमलों पर; पतन्--गिर कर;आस्ते--पड़े रहे; महित्वम्--महानता; प्राक्-दृष्टम्--जिसे उन्होंने पहले देखा था; स्मृत्वा स्मृत्वा--स्मरण कर करके; पुनःपुनः--बारम्बार।
काफी देर तक भगवान् कृष्ण के चरणकमलों पर बारम्बार उठते हुए और फिर नमस्कारकरते हुए ब्रह्मा ने भगवान् की उस महानता का पुनः पुनः स्मरण किया जिसे उन्होंने अभी अभीदेखा था।
शनैरथोत्थाय विमृज्य लोचनेमुकुन्दमुद्ठीक्ष्य विनप्रकन्धर: ।
कृताझ्जलि: प्रश्रयवान्समाहितःसवेपथुर्गद्गदयैलतेलया ॥
६४॥
शनै:--धीरे-धीरे; अथ--तब; उत्थाय--उठ कर; विमृज्य--पोंछ कर; लोचने--अपनी दोनों आँखें; मुकुन्दम्--मुकुन्द याभगवान् कृष्ण को; उद्दीक्ष्--ऊपर देखते हुए; विनप्र-कन्धर: --अपनी गर्दन झुकाये; कृत-अद्जलि:--हाथ जोड़े हुए; प्रश्रय-वान्--अत्यन्त विनीत; समाहित:ः--मन को एकाग्र किये; स-वेपथु:--काँपते हुए शरीर से; गदगदया--अवरुद्ध; ऐलत--ब्रह्माप्रशंसा करने लगे; ईलया--शब्दों से
तब धीरे-धीरे उठते हुए और अपनी दोनों आँखें पोंछते हुए ब्रह्मा ने मुकुन्द की ओर देखा।
फिर अपना सिर नीचे झुकाये, मन को एकाग्र किये तथा कंपित शरीर से वे लड़खड़ाती वाणी से विनयपूर्वक भगवान् कृष्ण की प्रशंसा करने लगे।
