← श्रीमद्भागवतम् स्कन्ध 10 की सूची
अध्याय चौदह: ब्रह्मा की भगवान कृष्ण से प्रार्थना
10.14श्रीब्रह्मोवाचनौमीड्य ते भ्रवपुषे तडिदम्बरायगुझ्जावतंसपरिपिच्छलसन्मुखाय ।
वन्यस्त्रजे कवलवेत्रविषाणवेणु-लक्ष्मश्रिये मृदुपदे पशुपाड़्जाय ॥
१॥
श्री-ब्रह्मा उवाच--ब्रह्मा ने कहा; नौमि--मैं यशोगान करता हूँ; ईड्यू--हे पूज्य; ते--आपका; अभ्र--काले बादल की तरह;वपुषे--शरीर वाले; तडित्ू--बिजली की भाँति; अम्बराय--जिसके वस्त्र; गुज्ञा--घुंघुची से बने; अवतंस--( कान के )आभूषण; परिपिच्छ--तथा मोर पंख; लसत्--शोभायमान; मुखाय--जिसका मुखमंडल; वन्य-स्त्रजे--वन फूलों की माला पहने; कवल--कौर; वेत्र--दंड; विषाण-- भेंस के सींग का बना बिगुल; वेणु--तथा बाँसुरी; लक्ष्म--लक्षणों से युक्त;भ्रिये--जिसका सौंदर्य; मृदु--मुलायम; पदे--जिसके पाँव; पशु-प--ग्वाले ( नन्द महाराज ) के; अड्र-जाय--पुत्र को
ब्रह्मा ने कहा : हे प्रभु, आप ही एकमात्र पूज्य भगवान् हैं अतएवं आपको प्रसन्न करने केलिए मैं आपको सादर नमस्कार करता हूँ और आपकी स्तुति करता हूँ।
हे ग्वालनरेश पुत्र,आपका दिव्य शरीर नवीन बादलों के समान गहरा नीला है; आपके वस्त्र बिजली के समानदेदीप्यमान हैं और आपके मुखमण्डल का सौन्दर्य गुझ्ला के बने आपके कुण्डलों से तथा सिर परलगे मोरपंख से बढ़ जाता है।
अनेक वन-फूलों तथा पत्तियों की माला पहने तथा चराने कीछड़ी ( लकुटी ), श्रृंग और वंशी से सज्जित आप अपने हाथ में भोजन का कौर लिए हुए सुन्दररीति से खड़े हुए हैं।
अस्यापि देव वपुषो मदनुग्रहस्यस्वेच्छामयस्य न तु भूतमयस्य कोपि ।
नेशे महि त्ववसितुं मनसान्तरेणसाक्षात्ततैव किमुतात्मसुखानु भूते: ॥
२॥
अस्य--इसका; अपि--भी; देव--हे प्रभु; वपुष:--शरीर; मत्-अनुग्रहस्थ--जिसने मेरे ऊपर कृपा दिखलाई है; स्व-इच्छा-मयस्य--जो अपने शुद्ध भक्तों की इच्छा से प्रेरित होकर प्रकट होते हैं; न--नहीं; तु--दूसरी ओर; भूत-मयस्य--पदार्थ कीउपज; कः--ब्रह्मा; अपि-- भी; न ईशे--मैं समर्थ नहीं हूँ; महि--शक्ति; तु--निस्सन्देह; अवसितुम्--अनुमान लगाने में; मनसा--मन से; अन्तरेण--जो नियंत्रित होती तथा विरत होती है; साक्षात्--प्रत्यक्ष; तब--आपकी; एव--निस्सन्देह; किम्उत--क्या कहा जाय; आत्म--आप में; सुख--सुख के; अनुभूतेः--आपके अनुभव का |
हे प्रभु, न तो मैं, न ही अन्य कोई आपके इस दिव्य शरीर के सामर्थ्य का अनुमान लगासकता है, जिसने मुझ पर इतनी कृपा दिखाई है।
आपका शरीर आपके शुद्ध भक्तों की इच्छापूरी करने के लिए प्रकट होता है।
यद्यपि मेरा मन भौतिक कार्यकलापों से पूरी तरह विरत है, तोभी मैं आपके साकार रूप को नहीं समझ पाता।
तो भला मैं आपके ही अन्तर में आपके द्वाराअनुभूत सुख को कैसे समझ सकता हूँ?
ज्ञाने प्रयासमुदपास्यथ नमन्त एवजीवन्ति सन्मुखरितां भवदीयवार्ताम् ।
स्थाने स्थिता: श्रुतिगतां तनुवाइमनोभि-ये प्रायशो उजित जितोप्यसि तैस्त्रिलोक्याम् ॥
३॥
ज्ञाने--ज्ञान के लिए; प्रयासम्ू--प्रयास; उदपास्य--त्यागकर; नमन्त:--नमस्कार करते हुए; एब--केवल; जीवन्ति--जीवितरहते हैं; सत्-मुखरिताम्--शुद्ध भक्तों द्वारा उच्चारित; भवदीय-वार्तामू--आपकी कथा; स्थाने--अपने भौतिक स्थान में;स्थिता:--स्थित रहकर; श्रुति-गताम्--सुन करके प्राप्त; तनु--अपने शरीर द्वारा; वाकू--शब्द; मनोभि:--तथा मन के द्वारा;ये--जो; प्रायशः--अधिकांशत: ; अजित--हे अजेय; जितः--जीते गये; अपि--फिर भी; असि--हो जाते हो; तैः--उनकेद्वारा; त्रि-लोक्याम्ू--तीनों लोकों में |
जो लोग अपने प्रतिष्ठित सामाजिक पदों पर रहते हुए ज्ञान-विधि का तिरस्कार करते हैं औरमन, वचन और कर्मों से आपके तथा आपके कार्यकलापों के गुणगान के प्रति सम्मान व्यक्तकरते हैं और आप तथा आपके द्वारा गुंजित इन कथाओं में अपना जीवन न्योछावर कर देते हैं, वेनिश्चित रूप से आपको जीत लेते हैं अन्यथा आप तीनों लोकों में किसी के द्वारा भी अजेय हैं।
श्रेयःसूतिं भक्तिमुदस्य ते विभोक्लिश्यन्ति ये केवलबोधलब्धये ।
तेषामसौ क्लेशल एव शिष्यतेनान्यद्यथा स्थूलतुषावधातिनाम् ॥
४ ॥
श्रेय:--परम लाभ का; सृतिम्--मार्ग; भक्तिमू-- भक्ति; उदस्य--त्याग करके; ते--वे; विभो--हे सर्वशक्तिमान भगवान्;क्लिशएयन्ति--क्लेश सहन करते हैं; ये--जो; केवल--एकमात्र; बोध--ज्ञान की; लब्धये--प्राप्ति के लिए; तेषामू--उनकेलिए; असौ--यह; क्लेशल:--झंझट; एव--केवल; शिष्यते--रहती है; न--कुछ नहीं; अन्यत्--दूसरा; यथा--जिस तरह;स्थूल-तुष--थोथी भूसी; अवघातिनाम्-मारनेवालों के लिए
हे प्रभु, आत्म-साक्षात्कार का सर्वोत्तम मार्ग तो आपकी ही भक्ति है।
यदि कोई इस मार्ग कोत्याग करके ज्ञान के अनुशीलन में प्रवृत्त होता है, तो उसे क्लेश उठाना होगा और वांछित फलभी नहीं मिल पाएगा।
जिस तरह थोथी भूसी को पीटने से अन्न ( गेहूँ ) नहीं मिलता उसी तरह जोकेवल चिन्तन करता है उसे आत्म-साक्षात्कार नहीं हो पाता।
उसके हाथ केवल क्लेश लगता है।
पुरेह भूमन्बह॒वोपि योगिन-स्त्वदर्पितेहा निजकर्मलब्धया ।
विबुध्य भक्त्यैव कथोपनीतयाप्रपेद्रिउज्लोच्युत ते गतिं पराम् ॥
५॥
पुरा-- भूतकाल में; इह--इस संसार में; भूमन्--हे सर्वशक्तिमान; बहवः--अनेक; अपि--निस्सन्देह; योगिन:--योगी जन;त्वत्--आपके प्रति; अर्पित-- अर्पित; ईहा: --अपने सारे प्रयास; निज-कर्म--अपने नियत कर्तव्यों से; लब्धया--जो प्राप्तकिया जाता है; विब॒ुध्य--समझने पर; भक्त्या--भक्ति के द्वारा; एब--निस्सन्देह; कथा-उपनीतया-- आपकी कथाओं केश्रवण तथा कीर्तन के माध्यम से अनुशीलित; प्रपेदिरि--समर्पण द्वारा उन्होंने प्राप्त किया; अज्ञ:--सरलता से; अच्युत--हेअच्युत; ते--आपका; गतिम्--गन्तव्य; परामू--परम |
हे सर्वशक्तिमान, भूतकाल में इस संसार में अनेक योगीजनों ने अपने कर्तव्य निभाते हुएतथा अपने सारे प्रयासों को आपको अर्पित करते हुए भक्तिपद प्राप्त किया है।
हे अच्युत, आपकेश्रवण तथा कीर्तन द्वारा सम्पन्न ऐसी भक्ति से वे आपको जान पाये और आपकी शरण में जाकरआपके परमधाम को प्राप्त कर सके।
तथापि भूमन्महिमागुणस्य तेविबोद्धुमर्हत्यमलान्तरात्मभि: ।
अविक्रियात्स्वानुभवादरूपतोह्ानन्यबोध्यात्मतया न चान्यथा ॥
६॥
तथा अपि--फिर भी; भूमन्--हे असीम; महिमा--शक्ति; अगुणस्थ-- भौतिक गुणों से रहित; ते--आपकी ; विबोद्धुम्--समझने के लिए; अ्हति--समर्थ होता है; अमल--निष्कलंक; अन्तः-आत्मभि:--मन तथा इन्द्रयों से; अविक्रियात्-- भौतिक भेद पर निराभ्ित; स्व-अनुभवात्--परमात्मा के अनुभव से; अरूपतः-- भौतिक रूपों के प्रति अनुरक्त हुए बिना; हि--निस्सन्देह; अनन्य-बोध्य-आत्मतया--बिना किसी अन्य प्रकाशक के, जैसाकि स्वतः प्रकट; न--नहीं; च--तथा; अन्यथा--नहीं तो |
किन्तु अभक्तगण आपके पूर्ण साकार रूप में आपका अनुभव नहीं कर सकते।
फिर भीहृदय के अन्दर आत्मा की प्रत्यक्ष अनुभूति द्वारा वे निर्विशेष ब्रह्म के रूप में आपका अनुभव करसकते हैं।
किन्तु वे ऐसा तभी कर सकते हैं जब वे अपने मन तथा इन्द्रियों को सारी भौतिकउपाधियों तथा इन्द्रिय-विषयों के प्रति आसक्ति से शुद्ध कर लें।
केवल इस विधि से ही उन्हेंआपका निर्विशेष स्वरूप प्रकट हो सकेगा।
गुणात्मनस्तेपि गुणान्विमातुंहितावतीऋनस्य क ईशिरेउस्य ।
कालेन यैर्वा विमिता: सुकल्पै-भूपांशव: खे मिहिका द्युभास: ॥
७॥
गुण-आत्मन: --समस्त उत्तम गुणों से सम्पन्न व्यक्ति का; ते--आप; अपि--निश्चय ही; गुणान्--गुणों को; विमातुम्--गिनने केलिए; हित-अवतीर्णस्य--जो समस्त जीवों के हित के लिए अवतीर्ण हुआ है; के--कौन; ईशिरे--समर्थ है; अस्य--ब्रह्माण्डका; कालेन--काल क्रम में; यैः--जिसके द्वारा; वा--अथवा; विमिता:--गिना हुआ; सु-कल्पै:--महान् विज्ञानियों द्वारा; भू-पांशवः--पृथ्वी लोक के परमाणु; खे--आकाश में; मिहिका:--बर्फ के कण; द्यु-भास:--तारों तथा ग्रहों का प्रकाश |
समय के साथ, विद्वान दार्शनिक या विज्ञानी, पृथ्वी के सारे परमाणु, हिम के कण या शायद सूर्य, नक्षत्र तथा ग्रहों से निकलने वाले ज्योति कणों की भी गणना करने में समर्थ होसकते हैं किन्तु इन विद्वानों में ऐसा कौन है, जो आप में अर्थात् पूर्ण पुरुषोत्तम परमेश्वर में निहितअसीम दिव्य गुणों का आकलन कर सके।
ऐसे भगवान् समस्त जीवात्माओं के कल्याण केलिए इस धरती पर अवतरित हुए हैं।
तत्तेडनुकम्पां सुसमीक्षमाणोभुज्जान एवात्मकृतं विपाकम् ।
हृद्वाग्वपुर्भिविंदधन्नमस्तेजीवेत यो मुक्तिपदे स दायभाक् ॥
८॥
तत्--अतः; ते--आपकी; अनुकम्पाम्--दया की; सु-समीक्षमाण:--आशा रखते हुए; भुज्ञान:--सहन करते हुए; एब--निश्चय ही; आत्म-कृतम्--अपने से किया गया; विपाकमू--कर्म फल; हत्--हृदय; वाक्--वाणी; वपुर्भि: --तथा शरीर से;विदधनू--अर्पित करते हुए; नम:ः--नमस्कार; ते--आपको; जीवेत-- जीवित रहता है; यः--जो; मुक्ति-पदे--मुक्ति पद केलिए; सः--वह; दाय-भाक्--असली उत्तराधिकारी |
हे प्रभु, जो व्यक्ति अपने विगत दुष्कर्मों के फलों को थैर्यपूर्वक सहते हुए तथा अपने मन,वाणी तथा शरीर से आपको नमस्कार करते हुए सत्यनिष्ठा से आपकी अहैतुकी कृपा प्रदत्त कियेजाने की प्रतीक्षा करता है, वह अवश्य ही मोक्ष का भागी होता है क्योंकि यह उसका अधिकारबन जाता है।
'पश्येश मेनार्यमनन्त आद्येपरात्मनि त्वय्यपि मायिमायिनि ।
मायां वितत्येक्षितुमात्मवैभवंहाहं कियानैच्छमिवार्चिरग्नौ ॥
९॥
पश्य--जरा देखें तो; ईश--हे प्रभु; मे--मेरा; अनार्यम्--निन्दनीय आचरण; अनन्ते-- अनन्त के विरुद्ध; आद्ये--आदि; पर-आत्मनि--परमात्मा; त्वयि--तुम; अपि-- भी; मायि-मायिनि--माया के स्वामियों के लिए; मायाम्--( मेरी ) माया; वितत्य--विस्तृत होकर; ईक्षितुमू--देखने के लिए; आत्म--आपकी; बैभवम्--शक्ति को; हि--निस्सन्देह; अहम्--मैं; कियान्--कितनी; ऐच्छम्--मैंने इच्छा की; इब--सहश; अर्चि:--चिनगारी; अग्नौ--अग्नि की तुलना में
हे प्रभु, मेरी अशिष्ठटता को जरा देखें! आपकी शक्ति की परीक्षा करने के लिए मैंने अपनीमायामयी शक्ति से आपको आच्छादित करने का प्रयत्त किया जबकि आप असीम तथा आदिपरमात्मा हैं, जो मायापतियों को भी मोहित करनेवाले हैं।
आपके सामने भला मैं क्या हूँ?विशाल अग्नि की उपस्थिति में मैं छोटी चिनगारी की तरह हूँ।
अतः क्षमस्वाच्युत मे रजो भुवोहाजानतस्त्वत्पूथगीशमानिनः ।
अजावलेपान्धतमोन्धचक्षुषएषोनुकम्प्यो मयि नाथवानिति ॥
१०॥
अतः--अतएव; क्षमस्व--कृपया क्षमा कर दें; अच्युत--हे अच्युत प्रभु; मे--मुझको; रज:-भुवः--रजोगुण में उत्पन्न; हि--निस्सन्देह; अजानत: --अज्ञान होने से; त्वत्--आपसे; पृथक्--भिन्न; ईश--नियन्ता; मानिन: --अपने को मानते हुए; अज--अजन्मा; अवलेप--आवरण; अन्ध-तम:ः--अज्ञान के ऐसे अंधकार से; अन्ध--अन्धी; चक्षुष:--मेरी आँखें; एष:--यह व्यक्ति;अनुकम्प्य:--दया दिखानी चाहिए; मयि--मुझ पर; नाथ-वान्--अपने स्वामी के रूप में पाकर; इति--ऐसा सोचते हुए |
अतएव हे अच्युत भगवान्, मेरे अपराधों को क्षमा कर दें।
मैं रजोगुण से उत्पन्न हुआ हूँ औरस्वयं को आपसे पृथक् ( स्वतंत्र ) नियन्ता मानने के कारण मैं निरा मूर्ख हूँ।
अज्ञान के अंधकारसे मेरी आँखें अंधी हो चुकी हैं जिसके कारण मैं अपने को ब्रह्माण्ड का अजन्मा स्त्रष्टा समझ रहाहूँ।
किन्तु मुझे आप अपना सेवक मानें और अपनी दया का पात्र बना लें।
क्वाहं तमोमहदहंखचराग्निवार्भू -संवेष्टिताण्डघटसप्तवितस्तिकायः ।
क्वेहग्विधाविगणिताण्डपराणुचर्या-वाताध्वरोमविवरस्य च ते महित्वम् ॥
११॥
क्व--कहाँ; अहम्--मैं; तम:--भौतिक प्रकृति; महत्--सम्पूर्ण भौतिक शक्ति; अहम्--मिथ्या अहंकार; ख--आकाश;चर--वायु; अग्नि--आग; वा: -- जल; भू--पृथ्वी; संवेष्टित--घिरा हुआ; अण्ड-घट--घड़े के सदृश ब्रह्माण्ड; सप्त-वितस्ति--सात बालिशएत; काय: --शरीर; क्व--कहाँ; ईहक्-- इसके ; विधा--सह॒श; अविगणित-- असीम; अण्ड--ब्रह्माण्ड;पर-अणु--परमाणु की धूल सहृश; चर्या--चलायमान; वात-अध्व--वायु के छेद; रोम--शरीर के रोमों के; विवरस्थ--छेदोंके; च--भी; ते--आपकी; महित्वम्--महानता ।
कहाँ मैं अपने हाथ के सात बालिश्तों के बराबर एक क्षुद्र प्राणी जो भौतिक प्रकृति, समग्रभौतिक शक्ति, मिथ्या अहंकार, आकाश, वायु, जल तथा पृथ्वी से बने घड़े-जैसे ब्रह्माण्ड सेघिरा हुआ हूँ! और कहाँ आपकी महिमा! आपके शरीर के रोमकूपों से होकर असंख्य ब्रह्माण्डउसी प्रकार आ-जा रहे हैं जिस तरह खिड़की की जाली के छेदों से धूल कण आते-जाते रहतेहैं।
उत्क्षेपणं गर्भगतस्य पादयो:कि कल्पते मातुरधोक्षजागसे ।
किमस्तिनास्तिव्यपदेश भूषित॑तवास्ति कुक्षे: कियदप्यनन्तः ॥
१२॥
उत्क्लेपणम्--लात मारना; गर्भ-गतस्य--गर्भस्थ शिशु; पादयो:--दोनों पाँवों का; किम्--क्या; कल्पते--मूल्य है; मातुः--माता के लिए; अधोक्षज--हे दिव्य प्रभु; आगसे--अपराध के रूप में; किम्--क्या; अस्ति--है; न अस्ति--नहीं है; व्यपदेश--उपाधि से; भूषितम्--अलंकृत; तब--आपका; अस्ति-- है; कुक्षे:--उदर के; कियत्--कितना; अपि--भी; अनन्तः--बाह्य ।
हे प्रभु अधोक्षज, कया कोई माता अपने गर्भ के भीतर स्थित शिशु द्वारा लात मारे जाने कोअपराध समझती है? क्या आपके उदर के बाहर वास्तव में ऐसी किसी वस्तु का अस्तित्व है, जिसे दार्शनिक जन ‘'है ' या ‘'नहीं है' की उपाधि प्रदान कर सकें ?
जगत्त्रयान्तोदधिसम्प्लवोदेनारायणस्योदरनाभिनालातू ।
विनिर्गतोजस्त्विति वाडन वे मृषाकिन््त्वीश्वर त्वन्न विनिर्गतोउस्मि ॥
१३॥
जगतू-त्रय--तीनों लोकों की; अन्त--विजय में ; उदधि--सारे समुद्रों में; सम्प्लतब--पूर्ण आप्लावन का; उदे--जल में;नारायणस्य-- भगवान् नारायण के; उदर--उदर से उग कर; नाभि--नाभि; नालातू--कमल के डंठल से; विनिर्गतः--बाहरनिकले; अजः--ब्रह्मा; तु--निस्सन्देह; इति--इस प्रकार कहते हुए; वाक्--शब्द; न--नहीं हैं; वै--निश्चय ही; मृषा--झूठा;किन्तु--इस प्रकार; ईश्वर--हे ई श्वर; त्वत्-- आपसे; न--नहीं; विनिर्गतः--विशेष रूप से निकला; अस्मि--मैं हूँ।
हे प्रभु, ऐसा कहा जाता है कि जब प्रलय के समय तीनों लोक जलमग्न हो जाते हैं, तोआपके अंश, नारायण, जल में लेट जाते हैं, उनकी नाभि से धीरे-धीरे एक कमल का फूलनिकलता है और उस फूल से ब्रह्मा का जन्म होता है।
अवश्य ही ये वचन झूठे नहीं हैं।
तो क्या मैंआपसे उत्पन्न नहीं हूँ?
नारायणस्त्वं न हि सर्वदेहिना-मात्मास्यधीशाखिललोकसाक्षी ।
नारायणोडड़ं नरभूजलायना-त्तच्चापि सत्यं न तवैव माया ॥
१४॥
नारायण: -- भगवान् नारायण; त्वम्--तुम; न--नहीं; हि-- क्या; सर्व--सभी; देहिनाम्--देहधारी जीवों के; आत्मा--परमात्मा;असि--हो; अधीश--हे परम नियन्ता; अखिल--सम्पूर्ण; लोक--लोकों के; साक्षी --गवाह; नारायण: -- श्री नारायण;अड्डमू--अंश; नर-- भगवान् से; भू--निकलकर; जल--जल के; अयनात्--प्रकट करने वाले स्त्रोत होने से; तत्--वह अंश;च--तथा; अपि--निस्सन्देह; सत्यमू--सच; न--नहीं; तब--तुम्हारा; एबव--तनिक भी; माया--मोहक शक्ति |
है परम नियन्ता, प्रत्येक देहधारी जीव के आत्मा तथा समस्त लोकों के शाश्वत साक्षी होने केकारण क्या आप आदि नारायण नहीं हैं ? निस्सन्देह, भगवान् नारायण आपके ही अंश हैं और वेनारायण इसलिए कहलाते हैं क्योंकि ब्रह्माण्ड के आदि जल के जनक हैं।
वे सत्य हैं, आपकीमाया से उत्पन्न नहीं हैं।
तच्चेजजलस्थं तव सज्जगद्ठ पु:कि मे न दृष्ट भगवंस्तदेव ।
कि वा सुदृष्ट हदि मे तदेवकि नो सपद्येव पुनर्व्यदशि ॥
१५॥
तत्--वह; चेतू--यदि; जल-स्थम्--जल में स्थित था; तब--तुम्हारा; सत्ू--असली; जगत्--सम्पूर्ण ब्रह्माण्ड को आश्रय देतेहुए; वपु:--दिव्य शरीर; किमू--क्यों; मे--मेरे द्वारा; न दृष्टमू--नहीं देखा गया; भगवन्--हे भगवन्; तदा एब--उसी समय;किम्--क्यों; वा--अथवा; सु-दृष्टमू-- भलीभाँति देखा हुआ; हृदि--हृदय में; मे--मेरे द्वारा; तदा एब--तभी ही; किमू- क्यों;न--नहीं; उ--दूसरी ओर; सपदि--अचानक; एव--निस्सन्देह; पुनः--फिर; व्यदर्शि--देखा गया।
हे प्रभु, यदि सम्पूर्ण ब्रह्माण्ड को शरण देने वाला आपका यह दिव्य शरीर वास्तव में जल मेंशयन करता है, तो फिर आप मुझे तब क्यों नहीं दिखे जब मैं आपको खोज रहा था? और तबक्यों आप सहसा प्रकट नहीं हो गये थे यद्यपि मैं अपने हृदय में आपको ठीक से देख नहीं पायाथा।
अन्रैव मायाधमनावतारेहास्य प्रपञ्लस्य बहि: स्फुटस्य ।
कृत्स्नस्य चान्तर्जठरे जनन्यामायात्वमेव प्रकटीकृतं ते ॥
१६॥
अत्र--इसी; एव-- ही; माया-धमन--हे माया को वश में करने वाले; अवतारे--अवतार में; हि--निश्चय ही; अस्य--इस;प्रपञ्लस्थ--सृजित जगत का; बहि:--बाहर से; स्फुटस्य--दृश्य; कृत्स्तनस्य--सम्पूर्ण; च--तथा; अन्त:-- भीतर; जठरे--आपके उदर में; जनन्या:--आपकी माता के; मायात्वमू--आपकी मायावी शक्ति; एब--निस्सन्देह; प्रकटी-कृतम्--प्रकट कीजा चुकी है; ते--आपके द्वारा |
हे प्रभु, आपने इसी अवतार में यह सिद्ध कर दिया है कि आप माया के परम नियंत्रक हैं।
यद्यपि आप अब इस ब्रह्माण्ड के भीतर हैं किन्तु सारा ब्रह्माण्ड आपके दिव्य शरीर के भीतरहै--आपने इस तथ्य को माता यशोदा के समक्ष अपने उदर के भीतर ब्रह्माण्ड दिखलाकरप्रदर्शित कर दिया है।
यस्य कुक्षाविदं सर्व सात्मं भाति यथा तथा ।
तत्त्वय्यपीह तत्सर्व किमिंदं मायया विना ॥
१७॥
यस्य--जिसके; कुक्षौ--उदर में; इदम्--यह विराट जगत; सर्वम्ू--सारा; स-आत्मम्--अपने समेत; भाति--प्रकट कियाजाता है; यथा--जिस तरह; तथा--उसी तरह; तत्--वह; त्वयि--तुम में; अपि--यद्यपि; इह--बाह्य रूप से यहाँ; तत्--वहविराट जगत; सर्वम्--सम्पूर्ण; किम्ू--क्या; इदम्--यह; मायया--आपकी अचिन्त्य शक्ति के प्रभाव के; विना--बिना।
जिस तरह आप समेत यह सारा ब्रह्माण्ड आपके उदर में प्रदर्शित किया गया था उसी तरहअब यह उसी रूप में यहाँ पर प्रकट हुआ है।
आपकी अचिन्त्य शक्ति की व्यवस्था के बिना भलाऐसा कैसे घटित हो सकता है ?
अद्यैव त्वहतेउस्य कि मम न ते मायात्वमादर्शित-मेकोसि प्रथमं ततो ब्रजसुहृद्दत्सा: समस्ता अपि ।
तावन्तोसि चतुर्भुजास्तदखिलै: साक॑ मयोपासिता-स्तावन्त्येव जगन्त्यभूस्तदमितं ब्रह्माद्दयं शिष्यते ॥
१८॥
अद्य--आज; एव--ही; त्वत् ऋते--आपसे पृथक्; अस्य--इस ब्रह्माण्ड का; किम्ू--क्या; मम--मुझको; न--नहीं; ते--आपके द्वारा; मायात्वम्ू--आपकी अचिन्त्य शक्ति का आधार; आदर्शितम्--दिखलाया हुआ; एक:--अकेले; असि--हो;प्रथमम्--सर्वप्रथम; ततः--तब; ब्रज-सुहृत्--आपके वृन्दावन के ग्वालबाल मित्र; वत्सा:--तथा बछड़े; समस्ता:--सारे;अपि--भी; तावन्त:ः --उतने ही; असि--हो गये; चतु:-भुजा: -- भगवान् विष्णु की चार भुजाएँ; तत्ू--तब; अखिलै:--सबों केद्वारा; साकम्ू--साथ; मया--मेरे द्वारा; उपासिता:--पूजित होकर; तावन्ति--उतनी ही संख्या के; एब-- भी; जगन्ति--ब्रह्माण्ड; अभू:--बन गये; तत्ू--तब; अमितम्ू--असंख्य; ब्रह्म--परम सत्य; अद्दबम्--अद्वितीय; शिष्यते--अब आप शेष हैं
क्या आपने आज मुझे यह नहीं दिखलाया कि आप स्वयं तथा इस सृष्टि की प्रत्येक वस्तुआपकी अचिन्त्य शक्ति के ही प्राकट्य हैं? सर्वप्रथम आप अकेले प्रकट हुए, तत्पश्चात् आपवृन्दावन के बछड़ों तथा अपने मित्र ग्वालबालों के रूप में प्रकट हुए।
इसके बाद आप उतने हीचतुर्भुजी विष्णु रूपों में प्रकट हुए जो मुझ समेत समस्त जीवों द्वारा पूजे जा रहे थे।
तत्पश्चात्आप उतने ही संपूर्ण ब्रह्माण्डों के रूप में प्रकट हुए।
तदनन्तर आप अद्वितीय परम ब्रह्म के अपनेअनन्त रूप में वापस आ गये हैं।
अजानतां त्वत्पदवीमनात्म-न्यात्मात्मना भासि वितत्य मायाम् ।
सृष्टाविवाहं जगतो विधानइव त्वमेषो३न्त इव त्रिनेत्र: ॥
१९॥
अजानताम्--अज्ञान में रहनेवाले मनुष्यों के लिए; त्वत्-पदवीम्--आपके दिव्य पद का; अनात्मनि-- भौतिक शक्ति में;आत्मा--स्वयं; आत्मना--स्वयं से; भासि--प्रकट होते हो; वितत्य--विस्तार करके; मायाम्--अपनी अचिन्त्य शक्ति को;सृष्टी--सृष्टि के बारे में; इब--मानो; अहम्--मैं, ब्रह्मा; जगत:--ब्रह्माण्ड के; विधाने--पालन पोषण में; इब--मानो; त्वम्एषः--आप ही; अन्ते--संहार में; इव--मानो; त्रि-नेत्र:--शिवजी
आपकी वास्तविक दिव्य स्थिति से अपरिचित व्यक्तियों के लिए आप इस जगत के अंशरूप में अपने को अपनी अचिन्त्य शक्ति के अंश द्वारा प्रकट करते हुए अवतरित होते हैं।
इस तरहब्रह्माण्ड के सृजन के लिए आप मेरे ( ब्रह्मा ) रूप में, इसके पालन के लिए अपने ही ( विष्णु )रूप में तथा इसके संहार के लिए आप त्रिनेत्र ( शिव ) के रूप में प्रकट होते हैं।
सुरेष्वृषिष्वीश तथेव नृष्वषितिर्यक्षु याद:स्वपि तेडजनस्य ।
जन्मासतां दुर्मदनिग्रहायप्रभो विधात: सदनुग्रहाय च ॥
२०॥
सुरेषु--देवताओं में से; ऋषिषु--ऋषियों में; ईश--हे प्रभु; तथा--और; एव--निस्सन्देह; नृषु--मनुष्यों में; अपि--तथा;तिर्यक्षु--पशुओं में; याद:सु--जलचरों में; अपि-- भी; ते--आपका; अजनस्य--अजन्मा; जन्म--जन्म; असताम्--अभक्तोंका; दुर्मद--मिथ्या अहंकार; निग्रहाय--दमन करने के लिए; प्रभो--हे स्त्रष्टा; विधात: --हे स्त्रष्टा; सत्ू--आज्ञाकारी भक्तों पर;अनुग्रहाय--अनुग्रह दिखाने के लिए; च--तथा।
हे प्रभु, हे परम स्त्रष्टा एवं स्वामी, यद्यपि आप अजन्मा हैं किन्तु श्रद्धाविहीन असुरों के मिथ्यागर्व को चूर करने तथा अपने सन्त-सदृश भक्तों पर दया दिखाने के लिए आप देवताओं,ऋषियों, मनुष्यों, पशुओं तथा जलचरों तक के बीच में जन्म लेते हैं।
को वेत्ति भूमन्भगवन्परात्मन्योगेश्वरोतीर्भवतस्त्रिलोक्याम् ।
क्व वा कथं वा कति वा कदेतिविस्तारयन्क्रीडसि योगमायाम् ॥
२१॥
कः--कौन; वेत्ति--जानता है; भूमन्--हे विराट; भगवन्-- भगवान्; पर-आत्मनू--हे परमात्मा; योग-ई श्वर--हे योग केस्वामी; ऊती:--लीलाएँ; भवत:--आपकी; त्रि-लोक्याम्--तीनों लोकों में; क्व--कहाँ; वा--अथवा; कथम्--कैसे; वा--अथवा; कति--कितने; वा--अथवा; कदा--कब; इति--इस प्रकार; विस्तारयन्--विस्तार करते हुए; क्रीडसि--खेलते हो;योग-मायाम्--अपनी आध्यात्मिक शक्ति से |
हे भूमन, हे भगवन्, हे परमात्मा, हे योगेश्वर, आपकी लीलाएँ इन तीनों लोकों में निरन्तरचलती रहती हैं किन्तु इसका अनुमान कौन लगा सकता है कि आप कहाँ, कैसे और कब अपनीआध्यात्मिक शक्ति का प्रयोग कर रहे हैं और इन असंख्य लीलाओं को सम्पन्न कर रहे हैं? इसरहस्य को कोई नहीं समझ सकता कि आपकी आध्यात्मिक शक्ति किस प्रकार से कार्य करतीहै।
तस्मादिदं जगदशेषमसत्स्वरूपंस्वप्नाभमस्तधिषणं पुरुदु:खदुःखम् ।
त्वय्येव नित्यसुखबोधतनावनन्तेमायात उद्यदषि यत्सदिवावभाति ॥
२२॥
तस्मात्ू--अतः; इृदम्--यह; जगत्--संसार; अशेषम्--सम्पूर्ण; असत्-स्वरूपम्-- क्षणिक होने के अर्थ में जिसकी स्थितिअसत् है; स्वप्न-आभम्--स्वप्न की तरह; अस्त-धिषणम्--जिसमें चेतनता आच्छादित हो जाती है; पुरु-दुःख-दुःखम्--बारम्बार कष्टों से पूर्ण; त्वयि--तुम में; एब--निस्सन्देह; नित्य--शाश्रवत; सुख--सुखी; बोध-- चेतना; तनौ--निजी स्वरूप में;अनन्ते--अनन्त; मायात:--माया के द्वारा; उद्यतू--से निकल कर; अपि--यद्यपि; यत्--जो; सत्-- असली; इब--मानो;अवभाति--प्रकट होता है।
अतः यह सम्पूर्ण ब्रह्माण्ड जो कि स्वप्न के तुल्य है प्रकृति से असत् है फिर भी असली(सत् ) प्रतीत होता है और इस तरह यह मनुष्य की चेतना को प्रच्छन्न कर लेता है और बारम्बारदुख का कारण बनता है।
यह ब्रह्माण्ड सत्य इसलिए लगता है क्योंकि यह आप से उदभूत मायाकी शक्ति द्वारा प्रकट किया जाता है जिनके असंख्य दिव्य रूप शाश्वत सुख तथा ज्ञान से पूर्ण हैं।
एकस्त्वमात्मा पुरुष: पुराण:सत्यः स्वयंज्योतिरनन्त आद्यः ।
नित्योक्षरोजस्त्रसुखो निरज्ञनःपूर्णाह्यो मुक्त उपाधितोमृत: ॥
२३॥
एक:ः--एक; त्वम्--तुम; आत्मा--परमात्मा; पुरुष: --परम पुरुष; पुराण: --सबसे पुराना; सत्य:--परम सत्य; स्वयम्-ज्योति:--स्वतः प्रकट; अनन्तः--अन्तहीन; आद्य:--अनादि; नित्य:--शा श्वत; अक्षर: --अनश्वर; अजस्त्र-सुख: --जिसके सुखमें व्यवधान नहीं डाला जा सकता; निरज्नन:--कल्मषरहित; पूर्ण--पूर्ण; अद्दब:ः--अद्वितीय ; मुक्त:--स्वतंत्र, मुक्त; उपाधित:--सारी भौतिक उपाधियों से; अमृत: --मृत्युरहित, अमर।
आप ही परमात्मा, आदि पूर्ण पुरुषोत्तम भगवान्, परम सत्य, स्वयंप्रकट, अनन्त तथाअनादि हैं।
आप शाश्वत तथा अच्युत, पूर्ण, अद्वितीय तथा समस्त भौतिक उपाधियों से मुक्त हैं।
नतो आपके सुख को रोका जा सकता है, न ही आपका भौतिक कल्मष से कोई नाता है।
आपविनाशरहित और अमृत हैं।
एवंविधं त्वां सकलात्मनामपिस्वात्मानमात्मात्मतया विचश्षते ।
गुर्वर्कलब्धोपनिषत्सुचक्षुषाये ते तरन्तीव भवानृताम्बुधिम् ॥
२४॥
एवमू-विधम्--इस प्रकार वर्णित; त्वामू--तुमको; सकल--सभी; आत्मनामू--आत्माओं के; अपि--निस्सन्देह; स्व-आत्मानम्ू--आत्मा; आत्म-आत्मतया--परमात्मा के रूप में; विचक्षते--देखते हैं; गुरु--गुरु से; अर्क--जो सूर्य के समान है;लब्ध--प्राप्त; उपनिषत्--गुह्य ज्ञान का; सु-चक्षुषा--पूर्ण आँख से; ये--जो; ते--वे; तरन्ति--पार करते हैं; इब--सरलता से;भव--संसार; अनृत--जो सच नहीं है; अम्बुधिम्--सागर को |
जिन्होंने सूर्य जैसे आध्यात्मिक गुरु से ज्ञान की स्पष्ट दृष्टि प्राप्त कर ली है वे आपको समस्तआत्माओं की आत्मा तथा हर एक के परमात्मा के रूप में देख सकते हैं।
इस तरह आपको आदिपुरुषस्वरूप समझकर वे मायारूपी भव-सागर को पार कर सकते हैं।
आत्मानमेवात्मतयाविजानतांतेनैव जात॑ निखिल प्रपश्चितम् ।
ज्ञानेन भूयोपि च तत्प्रलीयतेरज्वामहे भोगभवाभवौ यथा ॥
२५॥
आत्मानम्--अपने को; एव--निस्सन्देह; आत्मतया--परमात्मा के रूप में; अविजानताम्ू--न जाननेवालों के लिए; तेन--उससे; एब--अकेले; जातम्--उत्पन्न होता है; निखिलम्--सम्पूर्ण; प्रपश्चितम्ू-- भौतिक जगत; ज्ञानेन--ज्ञान से; भूयः अपि--एक बार पुनः; च--तथा; तत्--वह भौतिक जगत; प्रलीयते--लुप्त हो जाता है; रज्वाम्--रस्सी के भीतर; अहेः--सर्प का;भोग--शरीर का; भव-अभवौ--प्राकट्यू तथा विलोप; यथा--जिस तरह।
जिस व्यक्ति को रस्सी से सर्प का भ्रम हो जाता है, वह भयभीत हो उठता है किन्तु यहअनुभव करने पर कि तथाकथित सर्प तो था ही नहीं, वह अपना भय त्याग देता है।
इसी प्रकारजो लोग आपको समस्त आत्माओं ( जीवों ) के परमात्मा के रूप में नहीं पहचान पाते उनके लिएविस्तृत मायामय संसार उत्पन्न होता है किन्तु आपका ज्ञान होने पर वह तुरन्त दूर हो जाता है।
अज्ञानसंज्ञौं भवबन्धमोक्षौद्वौ नाम नान्यौ सत ऋतज्ञभावात् ।
अजस्त्रचित्यात्मनि केवले परेविचार्यमाणे तरणाविवाहनी ॥
२६॥
अज्ञान--अज्ञान से प्रकट होनेवाली; संज्ौ--उपाधियाँ; भव-बन्ध--संसार का बन्धन; मोक्षौ--तथा मुक्ति; द्वौ--दो; नाम--निस्सन्देह; न--नहीं; अन्यौ--पृथक्; स्तः--हैं; ऋत--सत्य; ज्ञ-भावात्--ज्ञान से; अजस्त्र-चिति--अबाध चेतना वाला;आत्मनि--आत्मा; केवले--पदार्थ से भिन्न; परे--शुद्ध; विचार्यमाणे --उचित ढंग से पहचानने पर; तरणौ--सूर्य के भीतर;इब--जिस तरह; अहनी--दिन-रात |
भव-बन्धन तथा मोक्ष दोनों ही अज्ञान की अभिव्यक्तियाँ हैं।
सच्चे ज्ञान की सीमा के बाहरहोने के कारण, इन दोनों का अस्तित्व मिट जाता है जब मनुष्य ठीक से यह समझ लेता है किशुद्ध आत्मा, पदार्थ से भिन्न है और सदैव पूर्णतया चेतन है।
उस समय बन्धन तथा मोक्ष का कोईमहत्व नहीं रहता जिस तरह सूर्य के परिप्रेक्ष्य में दिन तथा रात का कोई महत्व नहीं होता।
त्वामात्मानं परं मत्वा परमात्मानमेव च ।
आत्मा पुनर्बहिर्मुग्य अहो ज्ञजनताज्ञता ॥
२७॥
त्वामू--तुमको; आत्मानम्--असली आत्मा; परमू--अन्य कुछ; मत्वा--मानकर; परमू-- अन्य कुछ; आत्मानमू--आपको;एव--निस्सन्देह; च-- भी; आत्मा--परमात्मा; पुन:--फिर; बहि:--बाहर; मृग्य:--खोजा जाना चाहिए; अहो--ओह; अज्ञ--अज्ञानी; जनता--लोगों की; अज्ञता--अज्ञानता।
जरा उन अज्ञानी पुरुषों की मूर्खता तो देखिये जो आपको मोह की भिन्न अभिव्यक्ति मानतेहैं और अपने ( आत्मा ) को, जो कि वास्तव में आप हैं, अन्य कुछ--भौतिक शरीर-मानते हैं।
ऐसे मूर्खजन इस निष्कर्ष पर पहुँचते हैं कि परमात्मा की खोज परम पुरुष आप से बाहर अन्यत्रकी जानी चाहिए।
अन्तर्भवेडनन्त भवन्तमेवझतत्त्यजन्तो मृगयन्ति सन््तः ।
असन्तमप्यन्त्यहिमन्तरेणसन््तं गुणं तं किमु यन्ति सन््तः ॥
२८॥
अन्तः-भवे--शरीर के भीतर; अनन्त--हे अनन्त प्रभु; भवन्तम्--आप; एव--निस्सन्देह; हि--निश्चय ही; अतत्--आपसेपृथक् हर वस्तु; त्यजन्त:--त्याग करते हुए; मृगयन्ति--खोज करते हैं; सन््त:--सन्त भक्तगण; असन्तम्--अवास्तविक असत्;अपि--भी; अन्ति--पास ही उपस्थित; अहिम्--( भ्रम के ) सर्प को; अन्तरेण--के बिना; सन्तम्--असली; गुणम्--रस्सी को;तम्--उस; किम् उ--क्या; यन्ति--जानते हैं; सन््त:ः-- आध्यात्मिक पद को प्राप्त व्यक्ति
हे अनन्त भगवान्, सन््तजन आपसे भिन्न हर वस्तु का तिरस्कार करते हुए अपने ही शरीर केभीतर आपको खोज निकालते हैं।
निस्सन्देह, विभेद करनेवाले व्यक्ति भला किस तरह अपनेसमक्ष पड़ी हुईं रस्सी की असली प्रकृति को जान सकते हैं जब तक वे इस भ्रम का निराकरणनहीं कर लेते कि यह सर्प है ?
अथ पपि ते देव पदाम्बुजद्गय-प्रसादलेशानुगृहीत एव हि ।
जानाति तत्त्वं भगवन्महिम्नोन चान्य एकोपि चिरं विचिन्वन् ॥
२९॥
अथ--अतः; अपि--निस्सन्देह; ते--आपका; देव-हे प्रभु; पद-अम्बुज-द्य--दो चरणकमलों को; प्रसाद--दया का;लेश--रंचमात्र; अनुगृहीत:--दया दिखाया गया; एव--निश्चय ही; हि--निस्सन्देह; जानाति--जानता है; तत्त्वमू--सत्य;भगवत्ू-- भगवान् की; महिम्न:--महानता का; न--कभी नहीं; च--तथा; अन्य:--दूसरा; एक:--एक; अपि--यद्यपि;चिरमू--दीर्घकाल तक; विचिन्वन्ू--विचार करते हुए
हे प्रभु, यदि किसी पर आपके चरणकमलों की लेशमात्र भी कृपा हो जाती है, तो वहआपकी महानता को समझ सकता है।
किन्तु जो लोग भगवान् को समझने के लिए चिन्तनकरते हैं, वे अनेक वर्षों तक वेदों का अध्ययन करते रहने पर भी आपको जान नहीं पाते।
तदस्तु मे नाथ स भूरिभागोभवेउत्र वान्यत्र तु वा तिरश्चाम् ।
येनाहमेकोपि भवज्ननानांभूत्वा निषेवे तव पादपललवम् ॥
३०॥
तत्--अतएव; अस्तु--ऐसा ही हो; मे--मेरे; नाथ--हे स्वामी; सः--वह; भूरि-भाग:--अहोभाग्य; भवे--जन्म में; अब्र--यह;वा--अथवा; अन्यत्र--किसी अन्य जन्म में; तु--निस्सन्देह; वा--अथवा; तिरश्वामू--पशुओं में; येन--जिससे; अहम्--मैं;एकः--एक; अपि-- भी; भवत्--अथवा आपके; जनानाम्-भक्तों में से; भूत्वा--बनकर; निषेबवे--आपकी सेवा में लगसकूँ; तब--तुम्हारे; पाद-पललवम्--चरणकमलों में |
अतः हे प्रभु, मेरी प्रार्थना है कि मैं इतना भाग्यशाली बन सकूँ कि इसी जीवन में ब्रह्मा केरूप में या दूसरे जीवन में जहाँ कहीं भी जन्म लूँ, मेरी गणना आपके भक्तों में हो।
मैं प्रार्थनाकरता हूँ कि चाहे पशु योनि में ही सही, मैं जहाँ कहीं भी होऊँ, आपके चरणकमलों की भक्तिमें लग सकूँ।
अहोउतिथधन्या ब्रजगोरमण्यःस्तन्यामृतं पीतमतीव ते मुदा ।
यासां विभो वत्सतरात्मजात्मनायत्तृप्तयेडद्यापि न चालमध्वरा: ॥
३१॥
अहो--ओह; अति-धन्या:--परम भाग्यशाली; ब्रज--वृन्दावन की; गो--गौवें; रमण्य: --तथा गोपियाँ; स्तन्य--स्तन का दूध;अमृतम्-- अमृत के तुल्य; पीतम्--पिया गया; अतीव--पूर्णतया; ते--आपके द्वारा; मुदा--सन्तोष के साथ; यासाम्--जिसका; विभो--हे सर्वशक्तिमान; वत्सतर-आत्मज-आत्मना--बछड़ों तथा ग्वालिनों के पुत्रों के रूप में; यत्--जिसके;तृप्तवे--सन्तोष के लिए; अद्य अपि--आज तक; न--नहीं; च--तथा; अलमू--पर्याप्त; अध्वरा:--वैदिक यज्ञ
हे सर्वशक्तिमान भगवान्, वृन्दावन की गौवें तथा स्त्रियाँ कितनी भाग्यशालिनी हैं जिनकेबछड़े तथा पुत्र बनकर आपने परम प्रसन्नतापूर्वक एवं संतोषपूर्वक उनके स्तनपान का अमृतपिया है! अनन्तकाल से अब तक सम्पन्न किये गये सारे वैदिक यज्ञों से भी आपको उतना सन्तोषनहीं हुआ होगा।
अहो भाग्यमहो भाग्यं नन्दगोपब्रजौकसाम् ।
यम्सित्रं परमानन्दं पूर्ण ब्रह्म सनातनम् ॥
३२॥
अहो--कितना बड़ा; भाग्यमू-- भाग्य; अहो-- कितना महान; भाग्यम्-- भाग्य ; नन्द--महाराज नन्द का; गोप--अन्य ग्वालोंका; ब्रज-ओकसामू्--ब्रजभूमि के निवासियों का; यत्--जिनके; मित्रम्--मित्र; परम-आनन्दम्--परम आनन्द; पूर्णम्-पूर्ण;ब्रह्म--परम सत्य; सनातनम्--सनातन, नित्य |
नन्द महाराज, सारे ग्वाले तथा ब्रजभूमि के अन्य सारे निवासी कितने भाग्यशाली हैं! उनकेसौभाग्य की कोई सीमा नहीं है क्योंकि दिव्य आनन्द के स्त्रोत परम सत्य अर्थात् सनातन परब्रह्मउनके मित्र बन चुके हैं।
एषां तु भाग्यमहिमाच्युत तावदास्ता-मेकादशैव हि वय॑ं बत भूरिभागा: ।
एतद्धृूषीकचषकैरसकृत्पिबाम:शर्वादयोड्ठयुदजमध्वमृतासवं ते ॥
३३॥
एषाम्--इनके ( वृन्दावन वासियों का ); तु--तो; भाग्य--सौभाग्य की; महिमा--महानता; अच्युत--हे अच्युत; तावतू--इतनी; आस्ताम्ू-- हो; एकादश--ग्यारह; एवं हि--निस्सन्देह; वयम्--हम; बत-- ओह; भूरि-भागा: --परम भाग्यशाली हैं;एतत्--इन भक्तों की; हषीक--इन्द्रियों से; चषकै:--( जो ) प्यालों ( की तरह हैं )।
असकृत्--बारम्बार; पिबराम:--हम पी रहेहैं; शर्ब-आदय:--शिवजी तथा अन्य प्रमुख देवगण; अड्घ्रि-उदज--चरणकमल; मधु --शहद; अमृत-आसवम्--जो अमृततुल्य मादक पेय है; ते-- आपका |
वृन्दावन के इन वासियों की सौभाग्य सीमा का अनुमान नहीं लगाया जा सकता; फिर भीविविध इन्द्रियों के ग्यारह अधिष्ठाता देवता हम, जिनमें शिवजी प्रमुख हैं, परम भाग्यशाली हैंक्योंकि वृन्दावन के इन भक्तों की इन्द्रियाँ वे प्याले हैं जिनसे हम आपके चरणकमलों का अमृततुल्य मादक मधुपेय बारम्बार पीते हैं।
तद्धूरिभाग्यमिह जन्म किमप्यटव्यांयद्गोकुलेपि कतमाडूप्रिरजोभिषेकम् ।
यज्जीवितं तु निखिलं भगवान्मुकुन्द-स्त्वद्यापि यत्पदरज: श्रुतिमृग्यमेव ॥
३४॥
तत्--वह; भूरि-भाग्यमू--महानतम सौभाग्य; इह--यहाँ; जन्म--जन्म; किम् अपि--कोई भी; अटवब्याम्--( वृन्दावन के )जंगल में; यत्--जो; गोकुले--गोकुल में; अपि-- भी; कतम--किसी ( भक्त ) के; अद्धप्रि--चरणों की; रज:--धूल से;अभिषेकम्--स्नान; यत्--जिसका; जीवितम्--जीवन; तु--निस्सन्देह; निखिलम्--पूरा; भगवानू-- भगवान्; मुकुन्दः --मुकुन्द; तु--लेकिन; अद्य अपि--अब भी; यत्--जिसके ; पाद-रज: --चरणों की धूल; श्रुति--वेदों द्वारा; मृग्यम्ू--खोजीजानेवाली; एव--निश्चय ही
मेरा संभावित परम सौभाग्य यह होगा कि मैं गोकुल के इस वन में जन्म ले सकूँ और इसकेनिवासियों में से किसी के भी चरणकमलों से गिरी हुई धूल से अपने सिर का अभिषेक करूँ।
उनका सारा जीवनसार पूर्ण पुरुषोत्तम भगवान् मुकुन्द हैं जिनके चरणकमलों की धूल की खोजआज भी वैदिक मंत्रों में की जा रही है।
एषां घोषनिवासिनामुत भवान्कि देव रातेति नश्चेतो विश्वफलात्फलं त्वदपरं कुत्राप्ययन्मुह्यति ।
सद्देषादिव पूतनापि सकुला त्वामेव देवापितायद्धामार्थसुहृत्प्रियात्मतनयप्राणाशयास्त्वत्कृते ॥
३५॥
एषाम्--इन; घोष-निवासिनाम्-ग्वाल जाति के निवासियों में; उत--निस्सन्देह; भवान्ू--आप; किम्--क्या; देव--हेभगवन्; राता--प्रदान करेंगे; इति--ऐसा सोचते हुए; नः--हमारा; चेत:--मन; विश्व-फलात्--समस्त वरों के परम स्त्रोत कीअपेक्षा; फलमू्--पुरस्कार; त्वत्--आपकी अपेक्षा; अपरम्--दूसरा; कुत्र अपि--कहीं भी; अयत्--विचार करने पर;मुहाति--मोहित हो जाता है; सत्-वेषात्--भक्त के वेश में; इब--निस्सन्देह; पूतना--पूतना राक्षसी; अपि-- भी; स-कुला--अपने परिवारवालों बकासुर तथा अघासुर के साथ; त्वामू--आपको; एब--निश्चय ही; देव--हे प्रभु; आपिता--प्राप्त कराईगई; यत्--जिसके; धाम--घर; अर्थ--धन; सुहृत्--मित्रगण; प्रिय--प्रिय सम्बन्धीजन; आत्म--शरीर; तनय--सन्तानें;प्राण--प्राण वायु; आशया:--तथा मन; त्वत्-कृते--आपको समर्पित |
मेरा मन मोहग्रस्त हो जाता है जब मैं यह सोचने का प्रयास करता हूँ कि कहीं भी आपकेअतिरिक्त अन्य कोई पुरस्कार ( फल ) क्या हो सकता है? आप समस्त वरदानों के साकार रूपहैं, जिन्हें आप वृन्दावन के ग्वाल जाति के निवासियों को प्रदान करते हैं।
आपने पहले ही उसपूतना द्वारा भक्त का वेश बनाने के बदले में उसे तथा उसके परिवारवालों को अपने आप को देडाला है।
अतएव वृन्दावन के इन भक्तों को देने के लिए आपके पास बचा ही क्या है जिनकेघर, धन, मित्रगण, प्रिय परिजन, शरीर, सन््तानें तथा प्राण और हृदय--सभी केवल आपकोसमर्पित हो चुके हैं?
तावद्रागादयः स्तेनास्तावत्कारागृहं गृहम् ।
तावन्मोहोड्प्रिनिगडो यावत्कृष्ण न ते जना: ॥
३६॥
तावत्--तब तक; राग-आदय: -- भौतिक आसक्ति इत्यादि; स्तेना:--चोर; तावत्--तब तक; कारा-गृहम्-- जेल, बन्दीगृह;गृहमू--किसी का घर; तावत्--तब तक; मोह:--पारिवारिक स्नेह का मोह; अड्ध्रि--उनके चरणों में; निगड:--जंजीरें,बेड़ियाँ; यावत्--जब तक; कृष्ण--हे कृष्ण; न--नहीं हो जाते; ते--आपके ( भक्त ); जनाः--लोग |
है भगवान् कृष्ण, जब तक लोग आपके भक्त नहीं बन जाते तब तक उनकी भौतिकआसक्तियाँ तथा इच्छाएँ चोर बनी रहती हैं; उनके घर बन्दीगृह बने रहते हैं और अपने परिजनों केप्रति उनकी स्नेहपूर्ण भावनाएँ पाँवों की बेड़ियाँ बनी रहती हैं।
प्रपञ्ज॑ निष्प्रपज्ञोईपि विडम्बयसि भूतले ।
प्रपन्नजनतानन्दसन्दोहं प्रथितुं प्रभो ॥
३७॥
प्रपक्ञम्-- भौतिक; निष्प्रपञ्न:--पूर्णतया आध्यात्मिक; अपि--यद्यपि; विडम्बबसि--आप अनुकरण करते हैं; भू-तले--पृथ्वीपर; प्रपन्न--शरणागत; जनता--लोगों का; आनन्द-सन्दोहम्--नाना प्रकार के आनन्द; प्रथितुम्ू--विस्तार करने के लिए;प्रभो--हे स्वामी
हे स्वामी, यद्यपि भौतिक जगत से आपको कुछ भी लेना-देना नहीं रहता किन्तु आप इसधरा पर आकर अपने शरणागत भक्तों के लिए आनन्द-भाव की विविधताओं को विस्तृत करनेके लिए भौतिक जीवन का अनुकरण करते हैं।
जानन्त एव जानन्तु कि बहूक्त्या न मे प्रभो ।
मनसो वपुषो वाचो वैभव तव गोचर: ॥
३८॥
जानन्तः--ऐसे व्यक्ति जो सोचते हैं कि वे आपकी असीम शक्ति से अवगत हैं; एब--निश्चय ही; जानन्तु--ऐसा सोचा करें;किम्--क्या लाभ; बहु-उक्त्या--अनेक वचनों से; न--नहीं; मे--मेरे; प्रभो--हे स्वामी; मनसः--मन का; वपुष:--शरीर का;वाच:--वाणी का; वैभवम्--ऐश्वर्य; तब--आपकी; गो-चर: --परिधि में |
ऐसे लोग भी हैं, जो यह कहते हैं कि वे कृष्ण के विषय में सब कुछ जानते हैं--वे ऐसासोचा करें।
किन्तु जहाँ तक मेरा सम्बन्ध है, मैं इस विषय में कुछ अधिक नहीं कहना चाहता।
हे प्रभु, मैं तो इतना ही कहूँगा कि जहाँ तक आपके ऐश्वर्यों की बात है वे मेरे मन, शरीर तथा शब्दोंकी पहुँच से बाहर हैं।
अनुजानीहि मां कृष्ण सर्व त्वं वेत्सि सर्वहक् ।
त्वमेव जगतां नाथो जगदेतत्तवार्पितम् ॥
३९॥
अनुजानीहि--कृपया जाने दें; माम्--मुझको; कृष्ण--हे भगवान् कृष्ण; सर्वम्--हर वस्तु; त्वम्--तुम ( आप ); वेत्सि--जानते हो; सर्व-हक्--सर्वदर्शी ; त्वमू--तुम; एब--अकेले; जगताम्--सारे ब्रह्माण्डों के; नाथ:--स्वामी; जगत्--ब्रह्माण्ड;एतत्--यह; तब--आपको; अर्पितम्--अर्पित है
हे कृष्ण, अब मैं आपसे विदा लेने की अनुमति के लिए विनीत भाव से अनुरोध करता हूँ।
वास्तव में आप सारी वस्तुओं के ज्ञाता तथा द्रष्टा हैं।
आप समस्त ब्रह्माण्डों के स्वामी हैं फिर भीमैं आपको यह एक ब्रह्माण्ड अर्पित करता हूँ।
श्रीकृष्ण वृष्णिकुलपुष्करजोषदायिन्क्ष्मानिर्जरद्विजपशूदधिवृद्द्धिकारिन् ।
उद्धर्मशार्वरहर क्षितिराक्षसश्रु -गाकल्पमार्कर्महन्भगवन्नमस्ते ॥
४०॥
श्री-कृष्ण--हे कृष्ण; वृष्णि-कुल--यदु वंश के; पुष्कर--कमल; जोष--आनन्द; दायिन्ू--देनेवाले; क्ष्म--पृथ्वी के;निर्जर--देवतागण; द्विज--ब्राह्मण; पशु--तथा जानवर; उदधि--सागर की; वृद्धि--वृद्धि; कारिन्ू--कारणस्वरूप; उद्धर्म--नास्तिक सिद्धान्तों के; शार्वर--अंधकार को; हर--भगाने वाले; क्षिति--पृथ्वी पर; राक्षस--असुरों का; ध्रुकु--विरोधी; आ-कल्पम्--ब्रह्माण्ड के अन्त तक; आ-अर्कम्--जब तक सूर्य चमकता है; अहन्--हे परम पूज्य विग्रह; भगवन्--हे भगवन्;नमः--मैं सादर नमस्कार करता हूँ; ते--आपको |
हे कृष्ण, आप कमल तुल्य वृष्णि कुल को सुख प्रदान करनेवाले हैं और पृथ्वी, देवता,ब्राह्मण तथा गौवों से युक्त महासागर को बढ़ाने वाले हैं।
आप अधर्म के गहन अंधकार को दूरकरते हैं और इस पृथ्वी में प्रकट हुए असुरों का विरोध करते हैं।
हे भगवन्, जब तक यहब्रह्माण्ड बना रहेगा और जब तक सूर्य चमकेगा मैं आपको सादर नमस्कार करता रहूँगा।
श्रीशुक उबाचइत्यभिष्टूय भूमानं त्रि: परिक्रम्य पादयो: ।
नत्वाभीष्ट जगद्धाता स्वधाम प्रत्यपद्यत ॥
४१॥
श्री-शुकः उबाच-- श्री शुकदेव गोस्वामी ने कहा; इति--इस प्रकार; अभिष्टयय-- प्रशंसा करते हुए; भूमानम्-- अनन्त भगवान्के प्रति; त्रिः--तीन बार; परिक्रम्य--प्रदक्षिणा करके; पादयो:--उनके चरणों पर; नत्वा--झुककर; अभीष्टम्--वांछित;जगतू--ब्रह्माण्ड का; धाता--स्त्रष्टा; स्व-धाम--अपने घर को; प्रत्यपद्यत--लौट गया।
शुकदेव गोस्वामी ने कहा : इस प्रकार स्तुति करने के बाद ब्रह्माजी ने अपने आराध्य अनन्तभगवान् की तीन बार प्रदक्षिणा की और फिर उनके चरणों पर नतमस्तक हुए।
तत्पश्चात् ब्रह्माण्डके नियुक्त स्त्रष्टा अपने लोक में लौट आये।
ततोःनुज्ञाप्प भगवान्स्वभुव॑ं प्रागवस्थितान् ।
वत्सान्पुलिनमानिन्ये यथापूर्वसखं स्वकम् ॥
४२॥
ततः--तब; अनुज्ञाप्प--अनुमति देकर; भगवान्-- भगवान्; स्व-भुवम्-- अपने पुत्र ( ब्रह्मा ) को; प्राकू--पहले से;अवस्थितान्--स्थित; वत्सान्ू--बछड़े; पुलिनम्ू--नदी के तट पर; आनिन्ये--ले आये; यथा-पूर्व--पहले की तरह; सखम्--जहाँ पर मित्रगण उपस्थित थे; स्वकम्--अपने।
अपने पुत्र ब्रह्मा को प्रस्थान की अनुमति देकर भगवान् ने बछड़ों को साथ ले लिया, जोअब भी वहीं थे जहाँ वे एक वर्ष पूर्व थे और उन्हें नदी के तट पर ले आये जहाँ पर भगवान् स्वयंपहले भोजन कर रहे थे और जहाँ पर उनके ग्वालबाल मित्र पूर्ववत् थे।
एकस्मिन्नपि याते<ब्दे प्राणेशं चान्तरात्मन: ।
कृष्णमायाहता राजन्क्षणार्ध मेनिरेरभका: ॥
४३॥
एकस्मिनू--एक; अपि--यद्यपि; याते--बीत जाने पर; अब्दे--वर्ष; प्राण-ईशम्--उनके प्राणों के स्वामी; च--तथा;अन्तरा--रहित; आत्मन: --उनसे; कृष्ण--कृष्ण की; माया--मायाशक्ति से; आहता:--प्रच्छन्न; राजन्--हे राजन्; क्षण-अर्धमू--आधा क्षण; मेनिरे--सोचा; अर्भका:--बालकों ने।
हे राजन, यद्यपि बालकों ने अपने प्राणेश से विलग रहकर पूरा एक वर्ष बिता दिया थाकिन्तु वे कृष्ण की मायाशक्ति से आवृत कर दिये गये थे अतः उन्होंने उस वर्ष को केवल आधाक्षण ही समझा।
कि कि न विस्मरन्तीह मायामोहितचेतस: ।
यन्मोहितं जगत्सर्वमभीक्ष्णं विस्मृतात्मकम् ॥
४४॥
किम् किमू--क्या क्या; न विस्मरन्ति--लोग भूल नहीं जाते हैं; इह--इस संसार में; माया-मोहित--माया द्वारा मोहित कियेगये; चेतस:--मन वाले; यत्--जिससे; मोहितम्--मोहित हुए; जगत्--संसार; सर्वम्--सम्पूर्ण; अभीक्षणम्--निरन्तर; विस्मृत-आत्मकम्--अपने तक को भूलकर ।
जिनके मन भगवान् की मायाशक्ति द्वारा मोहित हों, भला उन्हें क्या नहीं भूल जाता ? मायाकी शक्ति से यह निखिल ब्रह्माण्ड निरन्तर मोहग्रस्त रहता है और इस विस्मृति के वातावरण में कोई अपनी पहचान नहीं समझ सकता।
ऊचुश्व सुहृदः कृष्णं स्वागतं तेडतिरृंहसा ।
नैकोप्यभोजि कवल एहीतः साधु भुज्यताम् ॥
४५॥
ऊचु:--बोले; च--तथा; सुहृदः --मित्रगण; कृष्णम्-- भगवान् कृष्ण से; सु-आगतम्--वापस आ गये हो; ते--तुम; अति-रहसा--बहुत जल्दी; न--नहीं; एक:--एक; अपि-- भी; अभोजि-- खाया गया है; कवलः--कौर; एहि--आओ; इतः--यहाँ; साधु--ठीक से; भुज्यतामू--अपना भोजन करोग्वाल मित्रों ने
भगवान् कृष्ण से कहा ‘तुम इतनी जल्दी आ गये! तुम्हारी अनुपस्थिति मेंहमने एक कौर भी नहीं खाया।
आओ और अच्छी तरह से अपना भोजन करो।
'ततो हसन्हषीकेशो भ्यवहत्य सहार्भकै: ।
दर्शयंश्चर्माजगरं न्यवर्तत वनाद्व्रजम् ॥
४६॥
ततः:--तब; हसन्--मुसकाते हुए; हषीकेश:--सबों की इन्द्रियों के स्वामी भगवान् कृष्ण ने; अभ्यवहत्य-- भोजन करते हुए;सह--साथ; अर्भकै:--ग्वालबालों के; दर्शयन्ू--दिखलाते हुए; चर्म--चमड़ा; आजगरम्--अघासुर अजगर का; न्यवर्तत--लौट आये; बनातू्--जंगल से; ब्रजम््--ब्रज के ग्राम को |
तत्पश्चात् भगवान् हृषीकेश ने हँसते हुए अपने गोपमित्रों के साथ अपना भोजन समाप्तकिया।
जब वे जंगल से ब्रज में स्थित अपने घरों को लौट रहे थे तो भगवान् कृष्ण ने ग्वालबालों को अघासुर अजगर की खाल दिखलाई।
बहईप्रसूनवनधातुविचित्रिताडु:प्रोद्दमवेणुदल श्रुड्भरवोत्सवाढ्य: ।
वत्सान्गूणन्ननुगगीतपवित्रकीर्ति -गेपीहगुत्सवदशि: प्रविवेश गोष्ठम् ॥
४७॥
बह--मोरपंख; प्रसून--फूलों; वन-धातु--जंगल के खनिजों से; विचित्रित--अलंकृत; अड्गभ:--दिव्य शरीर; प्रोद्याम--विशाल;वेणु-दल--बाँस की टहनी से बना; श्रुड़--वंशी की; रब--प्रतिध्वनि से; उत्सव--उत्सव समेत; आढ्य:--दीप्त; वत्सान्ू--बछड़ों को; गृणन्--पुकारते हुए; अनुग--अपने संगियों द्वारा; गीत--गाया गया; पवित्र--शुद्ध करने वाला; कीर्ति:--उनकीमहिमा; गोपी--गोपियों की; हक्--आँखों के लिए; उत्सव--त्यौहार; दृशि:--उनकी दृष्टि; प्रविवेश--प्रविष्ट हुए; गोष्ठम्--चरागाह में
भगवान् कृष्ण का दिव्य शरीर मोरपंखों तथा फूलों से सजा था और जंगल के खनिजों सेरँगा हुआ था और बाँस की उनकी वंशी उच्च एवं उल्लासपूर्ण स्वर में गूँज रही थी।
जब वे बछड़ोंका नाम लेकर पुकारते तो उनके ग्वालमित्र उनकी महिमा का गान करते और सारे संसार कोपवित्र बना देते।
इस तरह कृष्ण भगवान् अपने पिता नन््द महाराज की चरागाह में प्रविष्ट हुए।
उनके सौन्दर्य पर दृष्टि पड़ते ही समस्त गोपियों की आँखों के लिए एक महोत्सव सा उत्पन्न होगया।
अद्यानेन महाव्यालो यशोदानन्दसूनुना ।
हतोविता बयं चास्मादिति बाला ब्रजे जगु: ॥
४८ ॥
अद्य--आज; अनेन--उनके द्वारा; महा-व्याल:--विशाल सर्प; यशोदा--यशोदा; नन्द--तथा महाराज नन्द के; सूनुना--पुत्रद्वारा; हतः--मारा गया है; अविता:--बचाये गये हैं; वयम्--हम सभी; च--तथा; अस्मात्--उस असुर से; इति--इस प्रकार;बाला:--बालकों ने; ब्रजे--वृन्दावन में ; जगुः--गाया |
ब्रज ग्राम पहुँचते ही बालकों ने गुणगान किया, ‘आज कृष्ण ने एक विशाल सर्प मारकरहम सबों को बचाया है।
कुछ बालकों ने कृष्ण को यशोदानन्दन के रूप में तो कुछ ने नन्द महाराज के पुत्र के रूप में बखान किया।
श्रीराजोबाचब्रह्मन्परोद्धवे कृष्णे इयान्प्रेमा कथं भवेत् ।
योभूतपूर्वस्तोकेषु स्वोद्धवेष्वपि कथ्यताम् ॥
४९॥
श्री-राजा उबाच--राजा ने कहा; ब्रह्मनू--हे ब्राह्मण, शुकदेव; पर-उद्धवे--दूसरे की सनन््तान; कृष्णे--कृष्ण के लिए; इयान्--इतना अधिक; प्रेमा--प्रेम; कथम्--क््यों; भवेत्--हो सकता है; यः--जो; अभूत-पूर्व:--अभूतपूर्व; तोकेषु--बालकों केलिए; स्व-उद्धवेषु-- अपने ही जन्मे; अपि--भी; कथ्यताम्--कृपया बतलाइये |
राजा परीक्षित ने कहा, ‘हे ब्राह्मण, ग्वालों की पत्नियों में एक पराये पुत्र कृष्ण के लिएऐसा अभूतपूर्व शुद्ध प्रेम किस प्रकार उत्पन्न हुआ--ऐसा प्रेम जिसका अनुभव उन्हें अपने पुत्रों केप्रति भी नहीं उत्पन्न हुआ ? कृपया इसे बतलाइये।
'श्रीशुक उबाचसर्वेषामपि भूतानां नृप स्वात्मैव बल्लभ: ।
इतरेपत्यवित्ताद्यास्तद्ल्लभतयैव हि ॥
५०॥
श्री-शुकः उबाच-- श्री शुकदेव गोस्वामी ने कहा; सर्वेषाम्ू--समस्त; अपि--निस्सन्देह; भूतानामू--जीवों में; नृप--हे राजन;स्व-आत्मा--अपनी ही आत्मा, स्व; एव--निश्चय ही; वललभः --प्रियतम; इतरे-- अन्य; अपत्य--सन्तानें; वित्त-- धन;आद्या:--इत्यादि; तत्--उस आत्मा के; बल्लभतया--प्रियत्व पर आश्रित; एव हि--निस्सन्देह |
श्री शुकदेव गोस्वामी ने कहा : हे राजन्, प्रत्येक प्राणी के लिए स्वयं ही सर्वाधिक प्रियहोता है।
सनन््तान, धन इत्यादि अन्य समस्त वस्तुओं की प्रियता केवल आत्म-प्रियता के कारणहै।
तद्ाजेन्द्र यथा स्नेह: स्वस्वकात्मनि देहिनाम् ।
न तथा ममतालम्बिपुत्रवित्तगृहादिषु ॥
५१॥
तत्--अतएव; राज-इन्द्र--हे राजाओं में श्रेष्ठ; यथा--जिस तरह; स्नेह:--स्नेह; स्व-स्वक-- प्रत्येक व्यक्ति की; आत्मनि--आत्मा के लिए; देहिनाम्--देहधारी प्राणियों के; न--नहीं; तथा--उसी तरह; ममता-आलम्बि--उसके लिए जो अपने कोअपनी वस्तुओं के रूप में मानता है; पुत्र--पुत्र; वित्त-- धन; गृह--घर; आदिषु-- त्यादि में |
अतएव इसीलिए हे राजाओं में श्रेष्ठ, देहधधारी जीव आत्मकेन्द्रित होता है।
वह सन््तान, धनतथा घर इत्यादि वस्तुओं की अपेक्षा अपने शरीर तथा अपनी ओर अधिक आसक्त होता है।
देहात्मवादिनां पुंसामपि राजन्यसत्तम ।
यथा देह: प्रियतमस्तथा न हानु ये च तम् ॥
५२॥
देह-आत्म-वादिनामू--शरीर को ही आत्मा मानने वाले; पुंसाम्-मनुष्यों के लिए; अपि--निस्सन्देह; राजन्य-सत्-तम-हेराजाओं में श्रेष्ठ; यथा--जिस तरह; देह: --शरीर; प्रिय-तम:--सर्वाधिक प्रिय; तथा--उसी प्रकार; न--नहीं; हि--निश्चय ही;अनु--की तुलना में; ये--जो वस्तुएँ; च--तथा; तम्--उसको |
हे राजाओं में श्रेष्ठ जो लोग शरीर को ही अपना सर्वस्व मानते हैं उनके लिए वे वस्तुएँजिनका महत्व शरीर के लिए होता है कभी भी शरीर जितनी प्रिय नहीं होतीं।
देहोपि ममताभाक्रेत्त्ंसौ नात्मवत्प्रिय: ।
यज्जीर्य॑त्यपि देहेस्मिन्जीविताशा बलीयसी ॥
५३॥
देह:--शरीर; अपि--भी; ममता--स्वामित्व का; भाक्ु--केन्बिन्दु; चेतू--यदि; तहिं--तब; असौ--वह शरीर; न--नहीं;आत्म-वत्--आत्मा के समान; प्रियः--प्रिय; यत्--क्योंकि; जीर्यति--वृद्ध होते हुए; अपि-- भी; देहे--शरीर में; अस्मिनू--इस; जीवित-आशा--जीवित रहने की आकांक्षा; बलीयसी--अत्यन्त प्रबल ।
यदि मनुष्य शरीर को ‘'मैं' न मानकर ‘'मेरा' मानने की अवस्था तक पहुँच जाता है, तोवह निश्चित रूप से शरीर को अपने आप जितना प्रिय नहीं मानेगा।
यही कारण है कि शरीर केजीर्णशीर्ण हो जाने पर भी जीवित रहते जाने की आशा प्रबल रहती है।
तस्मात्प्रियतमः स्वात्मा सर्वेषामपि देहिनाम् ।
तदर्थमेव सकल॑ जगदेतच्चराचरम् ॥
५४॥
तस्मात्--इसलिए; प्रिय-तमः--अत्यन्त प्रिय; स्व-आत्मा--अपनी आत्मा; सर्वेषाम्--समस्त; अपि--निस्सन्देह; देहिनाम्ू--देहधारी जीवों के लिए; तत्-अर्थम्--उसी के हेतु; एब--निश्चय ही; सकलम्--सम्पूर्ण; जगत्--संसार; एतत्--यह; चर-अचरम्--चर तथा अचर जीवों समेत |
इसलिए हर देहधारी जीव को अपना आप (स्वात्म ) ही सर्वाधिक प्रिय है और इसी की तुष्टिके लिए यह समस्त चराचर जगत विद्यमान है।
कृष्णमेनमवेहि त्वमात्मानमखिलात्मनाम् ।
जगद्धिताय सोप्यत्र देहीवाभाति मायया ॥
५५॥
कृष्णम्-- भगवान् कृष्ण को; एनम्ू--इन; अवेहि--समझने का प्रयत्न करो; त्वम्-तुम; आत्मानम्--आत्मा को; अखिल-आत्मनामू--समस्त जीवों के; जगत्-हिताय--सारे ब्रह्माण्ड के लाभ हेतु; सः--वह; अपि--निश्चय ही; अत्र--यहाँ; देही--मानव; इब--सहश; आभाति--प्रकट होता है; मायया--अपनी अन्तरंगा शक्ति के द्वारा।
तुम कृष्ण को समस्त जीवों की आदि आत्मा करके जानो।
वे अपनी अहैतुकी कृपावश,समस्त जगत के लाभ हेतु, सामान्य मानव के रूप में प्रकट हुए हैं।
ऐसा उन्होंने अपनी अन्तरंगाशक्ति के बल पर किया है।
वस्तुतो जानतामत्र कृष्णं स्थास्नु चरिष्णु च ।
भगवद्गूपमखिल नान्यद्वस्त्विह किज्लन ॥
५६॥
वस्तुत:--वास्तव में; जानताम्--जानने वालों के लिए; अत्र--इस संसार में; कृष्णम्-- भगवान् कृष्ण को; स्थास्नु--अचल;चरिष्णु--चल; च--तथा; भगवत्ू-रूपम्-- भगवान् का प्रकट रूप; अखिलम्--सर्वस्व; न--कुछ भी नहीं; अन्यत्--अन्य;वस्तु--वस्तु; इह--यहाँ; किज्लनन--तनिक भी
इस जगत में जो लोग भगवान् कृष्ण को यथारूप में समझते हैं, वे समस्त चर या अचरवस्तुओं को भगवान् के व्यक्त रूप में देखते हैं।
किसी यथार्थ ( वास्तविकता ) को नहीं मानते।
सर्वेषामपि वस्तूनां भावार्थों भवति स्थित: ।
तस्यापि भगवान्कृष्ण: किमतद्वस्तु रूप्पताम् ॥
५७॥
सर्वेषामू--सभी; अपि--निस्सन्देह; वस्तूनाम्--वस्तुओं का; भाव-अर्थ:--प्रकृति की आदि अव्यक्त कारण-अवस्था;भवति--होती है; स्थित:--स्थापित; तस्यथ--अव्यक्त प्रकृति का; अपि-- भी; भगवान्-- भगवान्; कृष्ण: --कृष्ण; किम्--क्या; अतत्--उनसे पृथक; वस्तु--वस्तु; रूप्यताम्--निर्धारित की जा सकती है।
प्रकृति का आदि अव्यक्त रूप समस्त भौतिक वस्तुओं का स्त्रोत है और यहाँ तक कि इससूक्ष्म प्रकृति के स्रोत तो भगवान् कृष्ण हैं।
तो भला उनसे पृथक् किसको कहा जा सकता है ?
समाशञ्रिता ये पदपल्लवप्लवंमहत्पदं पुण्ययशो मुरारे: ।
भवाम्बुधिर्वत्सपदं परं पदपदं पदं यद्विपदां न तेषाम् ॥
५८ ॥
समाश्रिता:--शरणागत; ये--जो लोग; पद--पैरों का; पल्लव--फूल की कलियों के समान; प्लवम्--नौका रूप; महत्--सम्पूर्ण जगत के अथवा महात्माओं के; पदम्--शरण; पुण्य--अत्यन्त पुनीत; यश:--जिनका यश; मुर-अरेः:--मुर नामकअसुर के शत्रु का; भव--संसार का; अम्बुधि:--सागर; वत्स-पदम्--बछड़े का खुर; परम् पदम्--परम धाम, वैकुण्ठ; पदम्'पदम्--पग पग पर; यत्--जहाँ; विपदाम्--विपदाएँ; न--एक भी नहीं; तेषामू--उनके लिए।
हृश्यजगत के आश्रय एवं मुर राक्षस के शत्रु मुरारी के नाम से प्रसिद्ध भगवान् केचरणकमल रूपी नाव को जिन्होंने स्वीकार किया है उनके लिए यह भव-सागर बछड़े के खुरचिन्ह में भरे जल के समान है।
उनका लक्ष्य परं पदम् अर्थात् वैकुण्ठ होता है जहाँ भौतिकविपदाओं का नामोनिशान नहीं होता, न ही पग पग पर कोई संकट होता है।
एतत्ते सर्वमाख्यातं यत्पृष्टोहमिह त्वया ।
तत्कौमारे हरिकृतं पौगण्डे परिकीर्तितम् ॥
५९॥
एतत्--यह; ते--आपसे; सर्वम्--सभी; आख्यातमू--वर्णन किया; यत्--जो; पृष्ट:--पूछा गया; अहम्--मैंने; हह--इससम्बन्ध में; त्ववा--तुम्हारे द्वारा; तत्ू--वह; कौमारे--बाल्यकाल में ( पाँच वर्ष की अवस्था में ); हरि-कृतम्ू-- भगवान् हरिद्वारा सम्पन्न; पौगण्डे--बाल्यकाल के बाद ( छठे वर्ष से लेकर आगे ); परिकीर्तितम्--गुणानुवाद किया हुआ।
चूँकि आपने मुझसे पूछा था इसलिए मैंने भगवान् हरि की उन लीलाओं का संपूर्ण वर्णनकिया जो उन्होंने अपनी आयु के पाँचवें वर्ष में सम्पन्न की थीं किन्तु छठा वर्ष लगने तक प्रशस्तनहीं हुई थीं।
एतत्सुहद्धिश्चरितं मुरारे-रघार्दनं शाद्लजेमनं च ।
व्यक्तेतरद्रूपमजोर्वभिष्टवंश्रृण्वन्गृणन्नेति नरोडखिलार्थान् ॥
६० ॥
एतत्--ये; सुहद्धिः--अपने ग्वाल मित्रों के साथ; चरितम्--लीलाएँ; मुरारे:--भगवान् मुरारी की; अघ-अर्दनम्--अघासुर कादमन; शाद्वल--जंगल की घास पर; जेमनम्--भोजन करते हुए; च--तथा; व्यक्त-इतरत्-- अलौकिक; रूपम्-- भगवान् कादिव्य रूप; अज--ब्रह्म द्वारा; उरू--विस्तृत; अभिष्टवम्--स्तुति; श्रुण्वनू-- श्रवण; गृणनू--कीर्तन; एति-- प्राप्त करता है;नरः--कोई मनुष्य; अखिल-अर्थान्--सारी मनवांछित वस्तुएँ॥
मुरारी द्वारा ग्वालबालों के साथ सम्पन्न इन लीलाओं को--यथा अघासुर वध, जंगल कीघास पर बैठकर भोजन करना, भगवान् द्वारा दिव्य रूपों का प्राकट्य तथा ब्रह्मा द्वारा की गईअद्भुत स्तुति को जो भी व्यक्ति सुनता है या उनका कीर्तन करता है उसकी सारी आध्यात्मिकमनोकामनाएँ अवश्य पूरी होती हैं।
एवं विहारैः कौमारै: कौमारं जहतुर्ब्रजे ।
निलायनै: सेतुबन्धेर्मकटोत्प्लतवनादिभि: ॥
६१॥
एवम्--इस प्रकार; विहारैः:--लीलाओं से; कौमारैः--बाल्यकाल की; कौमारम्--पाँच वर्ष तक की बाल्यावस्था; जहतु:--उन्होंने बिता दी; ब्रजे--ब्रज भूमि में; निलायनै:--आँखमिचौनी खेल में; सेतु-बन्धैः --पुल बनाने में; मर्कट-उत्पलवन--बन्दरकूद; आदिभिः--३त्यादि में
इस प्रकार ब्रज भूमि में आँखमिचौनी का खेल खेलते, खेल में ही पुल बनाते, बन्दरों कीतरह कूदफाँद करते तथा अन्य ऐसे ही खेलों में लगे रहकर बालकों ने अपना बाल्यकालबिताया।
