← श्रीमद्भागवतम् स्कन्ध 10 की सूची

अध्याय पंद्रह: धेनुका, गधा दानव की हत्या

10.15श्रीशुक उबाचततश्न पौगण्डवय: श्रीतौ ब्रजेबभूवतुस्तौ पशुपालसम्मतौ ।

गाश्चारयन्तौ सखिभिः सम॑ पदै-वृन्दावन पुण्यमतीव चक्रतु: ॥

१॥

श्री-शुकः उवाच-- श्री शुकदेव गोस्वामी ने कहा; ततः--तब; च--तथा; पौगण्ड बय:--पौगण्ड अवस्था (६ से १० वर्षतक ); थ्रितौ--प्राप्त करके; ब्रजे--वृन्दावन में; बभूबतु:--बन गये; तौ--दोनों ( राम तथा कृष्ण ); पशु-पाल--्वालों केरूप में; सम्मतौ--नियुक्त; गा: --गौवें; चारयन्तौ--चराते हुए; सखिभि: समम्‌--अपने मित्रों के साथ साथ; पदैः--पाँवों केचिह्नों से; वृन्दावनम्‌-- श्री वृन्दावन को; पुण्यम्‌ू--पावन; अतीव--अत्यन्त; चक्रतु:--उन्होंने बना दिया।

शुकदेव गोस्वामी ने कहा : वृन्दावन में रहते हुए जब राम तथा कृष्ण ने पौगण्ड अवस्था( ६-१० वर्ष ) प्राप्त कर ली तो ग्वालों ने उन्हें गौवें चराने के कार्य की अनुमति प्रदान कर दी।

इस तरह अपने मित्रों के साथ इन दोनों बालकों ने वृन्दावन को अपने चरणकमलों के चिन्हों से अत्यन्त पावन बना दिया।

तन्माधवो वेणुमुदीरयन्वृतोगोपैर्गणद्धि: स्ववशो बलान्वित: ।

पशून्पुरस्कृत्य पशव्यमाविशद्‌विहर्तुकाम: कुसुमाकरं वनम्‌ ॥

२॥

तत्‌--इस प्रकार; माधव: -- श्री माधव; वेणुमू-- अपनी वंशी; उदीरयन्‌--बजाते हुए; वृत:ः--घिरे हुए; गोपैः--ग्वालबालों से;गृणद्द्धिः--कीर्तन करते हुए; स्व-यशः:--अपना यश; बल-अन्वित:--बलराम सहित; पशून्‌--पशुओं को; पुरस्कृत्य--आगेकरके; पशव्यम्‌--गौवों के लिए पोषण से पूर्ण; आविशत्‌--प्रवेश किया; विहर्तु-काम:--विहार करने की इच्छा से; कुसुम-आकरम्‌- फूलों से परिपूर्ण; बनम्‌--वन में |

इस तरह अपनी लीलाओं का आनंद उठाने की इच्छा से अपनी वंशी बजाते हुए और अपनेगुणगान कर रहे ग्वालबालों से घिरे हुए तथा बलदेव के साथ जाते हुए माधव ने गौवों को अपने आगे कर लिया और वृन्दावन के जंगल में प्रवेश किया जो फूलों से लदा था और पशुओं केस्वास्थ्य-प्रद चारे से भरा पड़ा था।

तन्मझुघोषालिमृगद्विजाकुलंमहन्मनः प्रख्यपय:ःसरस्वता ।

बातेन जुष्टे शतपत्रगन्धिनानिरीक्ष्य रन्तुं भगवान्मनो दधे ॥

३॥

तत्‌--उस ( वन ); मझ्जु--सुहावनी; घोष-- ध्वनि; अलि-- भौरे; मृग-- पशु ; द्विज--तथा पक्षी; आकुलम्‌-पूर्ण; महत्‌--महात्माओं के; मन:--मन; प्रख्य--सहृशता रखने वाले; पयः--जिसका जल; सरस्वता--सरोवर समेत; वातेन--हवा से;जुष्टमू--सेवित; शत-पत्र--सौ पंखड़ियों वाले कमल की; गन्धिना--सुगन्धि से; निरीक्ष्य--देखकर; रन्तुमू--आनन्द लूटने केलिए; भगवानू-- भगवान्‌ ने; मनः--अपना मन; दधे--फेरा

भगवान्‌ ने उस जंगल पर दृष्टि दौड़ाई जो भौंरों, पशुओं तथा पक्षियों की मनोहर गुंजार सेगूँजायमान हो रहा था।

इसकी शोभा महात्माओं के मन के समान स्वच्छ जल वाले सरोवर सेतथा सौ पंखड़ियों वाले कमलों की सुगन्धि ले जाने वाली मन्द वायु से भी बढ़कर थी।

यह सबदेखकर भगवान्‌ कृष्ण ने इस पवित्र वातावरण का आनन्द लेने का निश्चय किया।

स तत्र तत्रारुणपललवश्रिया'फलप्रसूनोरुभरेण पादयो: ।

स्पृशच्छिखान्वीक्ष्य वनस्पतीन्मुदास्मयन्निवाहाग्रजमादिपूरुष: ॥

४॥

सः--वह; तत्र तत्र--चारों ओर; अरुण--लाल-लाल; पल्‍लव--कलियों के; श्रीया--सौन्दर्य से; फल--उनके फलों;प्रसून--तथा फूलों के; उरू-भरेण-- भारी बोझ से; पादयो: --उनके दोनों चरणों को; स्पृशत्‌--छूते हुए; शिखान्‌--उनकीडालों के सिरे; वीक्ष्य--देखकर; वनस्पतीन्‌--शानदार वृक्षों को; मुदा--हर्ष से; स्मयन्‌ू--हँसते हुए; इब--प्राय:; आह--बोले;अग्र-जम्‌--अपने बड़े भाई बलराम से; आदि-पूरुष:--आदि परमेश्वर।

आदि परमेश्वर ने देखा कि शानदार वृक्ष अपनी सुन्दर लाल-लाल कलियों तथा फलों औरफूलों के भार से लदकर अपनी शाखाओं के सिरों से उनके चरणों को स्पर्श करने के लिए झुकरहे हैं।

तब मन्द हास करते हुए वे अपने बड़े भाई से बोले।

श्रीभगवानुवाचअहो अमी देववरामरार्चितंपादाम्बुजं ते सुमनःफलाईणम्‌ ।

नमन्त्युपादाय शिखाभिरात्मन-स्तमोपहत्यै तरुजन्म यत्कृतम्‌ ॥

५॥

श्री-भगवान्‌ उबाच-- भगवान्‌ श्रीकृष्ण ने कहा; अहो--ओह; अमी--ये; देव-वर--देवताओं में श्रेष्ठ ( श्री बलराम ); अमर--अमर देवताओं द्वारा; अर्चितम्‌--पूजित; पाद-अम्बुजम्‌ू--चरणकमलों पर; ते--आपके; सुमन: --फूल; फल--तथा फल की;अर्हणम्‌-- भेंट; नमन्ति--वे नमन कर रहे हैं; उपादाय-- प्रस्तुत करते हुए; शिखाभि:--अपने शिरों से; आत्मन:--उनकाअपना; तमः--अज्ञान का अंधकार; अपहत्यै--दूर करने के लिए; तरू-जन्म--वृक्षों के रूप में उनका जन्म; यत्‌--जिससेअज्ञान; कृतम्‌ू--उत्पन्न हुआ।

भगवान्‌ ने कहा : हे देवश्रेष्ठ, देखें न, ये वृक्ष जो अमर देवताओं द्वारा पूज्य हैं आपके चरणकमलों पर किस तरह अपना सिर झुका रहे हैं।

ये वृक्ष उस गहन अज्ञान को दूर करने केलिए आपको अपने फल तथा फूल अर्पित कर रहे हैं जिसके कारण उन्हें वृक्षों का जन्म धारणकरना पड़ा है।

एतेडलिनस्तव यशोखिललोकतीर्थगायन्त आदिपुरुषानुपथं भजन्ते ।

प्रायो अमी मुनिगणा भवदीयमुख्यागूढं वनेपि न जहत्यनघात्मदैवम्‌ ॥

६॥

एते--ये; अलिन:--भौरे; तव--आपका; यश: -- कीर्ति; अखिल-लोक--समस्त जगतों के लिए; तीर्थम्‌--ती ्थस्थान;गायन्त:--गुणगान कर रहे हैं; आदि-पुरुष--हे आदि भगवान्‌; अनुपथम्‌--मार्ग में आपका अनुसरण करते हुए; भजन्ते--पूजाकर रहे हैं; प्रायः --अधिकांशत:; अमी--ये; मुनि-गणा:--मुनि जन; भवदीय--आपके भक्तों में; मुख्या:--अतीव घनिष्ठ;गूढम्‌--छिपाया हुआ; वने--जंगल में; अपि--यद्यपि; न जहति--नहीं छोड़ते; अनध--हे निष्पाप; आत्म-दैवम्‌-- अपनेआराध्य देव को |

हे आदिपुरुष, ये भौरे अवश्य ही महान्‌ मुनि तथा आपके परम सिद्ध भक्त होंगे क्योंकि येमार्ग में आपका अनुसरण करते हुए आपकी पूजा कर रहे हैं और आपके यश का कीर्तन कर रहेहैं, जो सम्पूर्ण जगत के लिए स्वयं तीर्थस्थल हैं।

यद्यपि आपने इस जंगल में अपना वेश बदलरखा है किन्तु हे अनघ, वे अपने आराध्यदेव, आपको छोड़ने के लिए तैयार नहीं हैं।

नृत्यन्त्यमी शिखिन ईड् मुदा हरिण्यःकुर्वन्ति गोप्य इव ते प्रियमीक्षणेन ।

सूक्तेश्न कोकिलगणा गृहमागतायधन्या वनौकस इयान्हि सतां निसर्ग: ॥

७॥

नृत्यन्ति--नाच रहे हैं; अमी--ये; शिखिन: --मयूर; ईड्य--हे आराध्य देव; मुदा--हर्ष से; हरिण्य:--हिरणियाँ; कुर्वन्ति--कररही हैं; गोप्य:--गोपियाँ; इब--मानो; ते--आपके लिए; प्रियम्‌--प्रिय; ईक्षणेन-- अपनी चितवन से; सूक्तैः--वैदिक स्तुतियोंसे; च--तथा; कोकिल-गणा: --कोयलें; गृहम्‌-- अपने घर में; आगताय--आकर; धन्या:-- भाग्यशाली; वन-ओकसः --जंगल के निवासी; इयान्‌--ऐसा; हि--निस्सन्देह; सताम्‌--सन्त पुरुषों की; निसर्ग:--प्रकृति |

हे आर्य ईश्वर, ये मोर प्रसन्नता के मारे आपके समक्ष नाच रहे हैं, हिरणियाँ अपनी स्नेहिलचितवनों से आपको गोपियों की भाँति प्रसन्न कर रही हैं।

ये कोयलें आपका सम्मान वैदिकस्तुतियों द्वारा कर रही हैं।

जंगल के ये सारे निवासी परम भाग्यशाली हैं और आपके प्रति इनकाबर्ताव किसी महात्मा द्वारा अपने घर में आये अन्य महात्मा के स्वागत के अनुरूप है।

धन्येयमद्य धरणी तृणवीरुधस्त्वत्‌-पादस्पृशो द्रमलता: करजाभिमृष्ठा: ।

नद्योद्रयः खगमृगा: सदयावलोकै -गेप्योउन्तरेण भुजयोरपि यत्स्पूहा श्री: ॥

८॥

धन्या-- भाग्यशाली; इयम्‌ू--यह; अद्य--अब; धरणी--पृथ्वी; तृण--घास; वीरुध:--तथा झाड़ियाँ; त्वत्‌--आपके ; पाद--पैरों का; स्पृशः--स्पर्श पाकर; द्रुम--वृक्ष; लताः:--तथा लताएँ; कर-ज--अपने हाथ के नाखूनों से; अभिमृष्ठा: --स्पर्श कीजाकर; नद्यः--नदियाँ; अद्रयः--तथा पर्वत; खग--पक्षी; मृगा:--तथा पशु; सदय--कृपापूर्ण; अवलोकैः-- आपकी चितवनोंसे; गोप्य:--गोपियाँ; अन्तरेण--बीच में; भुजयो:--आपकी दो भुजाओं के; अपि--निस्सन्देह; यत्‌--जिसके लिए; स्पृहा--इच्छा रखती है; श्री:--लक्ष्मी जी |

अब यह धरती परम धन्य हो गई है क्योंकि आपने अपने पैरों से इसकी घास तथा झाड़ियोंका, अपने नाखूनों से इसके वृक्षों तथा लताओं का स्पर्श किया है और आपने इसकी नदियों,पर्वतों, पक्षियों तथा पशुओं पर अपनी कृपा-दृष्टि डाली है।

इनसे भी बढ़ कर, आपने अपनीतरूुणी गोपियों को अपनी दोनों भुजाओं में भर कर उनका आलिंगन किया है, जिसके लिएस्वयं लक्ष्मी जी लालायित रहती हैं।

श्रीशुक उबाचएवं वृन्दावन श्रीमत्कृष्ण: प्रीतमना: पशून्‌ ।

रेमे सन्लारयन्नद्रेः सरिद्रोध:सु सानुगः ॥

९॥

श्री-शुकः उबाच-- श्रीशुकदेव गोस्वामी ने कहा; एवम्‌--इस तरह; वृन्दावनम्‌--वृन्दावन के जंगल तथा उसके निवासियों केप्रति; श्रीमत्‌--सुन्दर; कृष्ण: -- भगवान्‌ कृष्ण ने; प्रीत-मना:--मन में संतुष्ट हुए; पशून्‌ू--पशुओं को; रेमे--हर्ष का अनुभवकिया; सशझ्नारयन्‌--चराने में; अद्वेः--पर्वत के निकट; सरित्‌--नदी के; रोध:सु--किनारों पर; स-अनुग: -- अपने साथियोंसमेत।

श्रीशुकदेव गोस्वामी ने कहा : इस प्रकार वृन्दावन के रम्य जंगल तथा वृन्दावन केनिवासियों के प्रति संतोष व्यक्त करते हुए भगवान्‌ कृष्ण ने गोवर्धन पर्वत की तलहटी में यमुनानदी के तट पर अपने मित्रों सहित गौवों तथा अन्य पशुओं को चराने का आनन्द लिया।

क्वचिद्गायति गायत्सु मदान्धालिष्वनुव्रतेः ।

उपगीयमानचरितः पथ्िि सह्डूर्षणान्वित: ॥

१०॥

अनुजल्पति जल्पन्तं कलवाक्यै: शुकं क्वचित्‌ ।

क्वचित्सवल्गु कूजन्तमनुकूजति कोकिलम्‌क्वचिच्च कालहंसानामनुकूजति कूजितम्‌ ।

अभिनृत्यति नृत्यन्तं बहहिणं हासयन्क्वचित्‌ ॥

११॥

मेघगम्भीरया वाचा नामभिर्दूरगान्पशून्‌ ।

क्वचिदाह्नययति प्रीत्या गोगोपालमनोज्ञया ॥

१२॥

क्वचित्‌--कभी; गायति--गाते हैं; गायत्सु--उनके गाने पर; मद-अन्ध--मद से अंधे होकर; अलिषु-- भौरे; अनुव्रतिः: -- अपनेमित्रों के साथ; उपगीयमान--संगीत अलापते हुए; चरित:ः--लीलाएँ; पथि--रास्ते में; सड्डर्षण-अन्वित: --बलराम के साथ;अनुजल्पति--नकल करते हैं; जल्पन्तम्‌--चहचहाने की; कल-वाक्यै:--तोतली वाणी में; शुकम्‌--तोतों की; क्वचित्‌--कभी; क्वचित्‌ू--कभी; स--सहित; वल्गु--मोहक; कूजन्तम्‌--कोयल की कूक; अनुकूजति--कू कू की नकल करते हैं;कोकिलम्‌--कोयल की; क्वचित्‌--कभी कभी; च-- भी; कल-हंसानाम्‌--हंसों के; अनुकूजति कूजितम्‌--कोयल की कूकका अनुकरण करते हैं; अभिनृत्यति--नाचते हैं; नृत्यन्तम्‌--नाचते हुए; बर्हिणम्‌--मोर के समक्ष; हासयन्‌--हँसते हुए;क्वचित्‌--कभी; मेघ--बादल के समान; गम्भिरया --गम्भीर; वाचा-- अपनी वाणी से; नामभि:--नाम लेकर; दूर-गान्‌--भटक कर दूर गए हुए; पशून्‌--पशुओं को; क्वचित्‌--क भी; आह्ृयति--टेरते हैं; प्रीत्या--स्नेहपूर्वक; गो--गौवों; गोपाल--तथा ग्वालबालों को; मनः-ज्ञया--मन को मोहने वाली ( वाणी ) से |

कभी कभी वृन्दावन में भौरे आनन्द में इतने मग्न हो जाते थे कि वे अपनी आँखें बन्द करके गाने लगते थे।

श्रीकृष्ण अपने ग्वालमित्रों तथा बलदेव के साथ जंगल में विचरण करते हुएअपने राग में उनके गुनगुनाने की नकल उतारते थे और उनके मित्र उनकी लीलाओं का गायनकरते थे।

भगवान्‌ कृष्ण कभी कोयल की बोली की नकल उतारते तो कभी हंसों के कलरवकी नकल उतारते।

कभी वे मोर के नृत्य की नकल उतारते जिस पर उनके ग्वालमित्र खिलखिलापड़ते।

कभी कभी वे बादलों जैसे गम्भीर गर्जन के स्वर में झुंड से दूर गये हुए पशुओं का नामलेकर बड़े प्यार से पुकारते जिससे गौवें तथा ग्वालबाल मुग्ध हो जाते।

चकोरक्रौद्नचक्राह्नभारद्वाजां श्र बर्हिण: ।

अनुरौति सम सत्त्वानां भीतवद्व्याप्रसिंहयो: ॥

१३॥

चकोर-क्रौद्ध-चक्राह्न- भारद्वाजानू च--चकोर, कौंच, चक्राह्न तथा भारद्वाज नामक पक्षी; ब्हिण: --मोर; अनुरौति स्म--उनकीनकल उतारते; सत्त्वानामू--अन्य प्राणियों सहित; भीत-वत्‌--डरे हुए की तरह; व्याप्र-सिंहयो: --बाघों तथा सिंहों से

कभी कभी वे चकोर, क्रौंच, चक्राह्न, भारद्वाज जैसी पक्षियों की नकल करके चिल्लातेऔर कभी छोटे पशुओं के साथ बाघों तथा शेरों के बनावटी भय से भागने लगते।

क्वचित्क्रीडापरिश्रान्तं गोपोत्सझेपबर्हणम्‌ ।

स्वयं विश्रमयत्यार्य पादसंवाहनादिभि: ॥

१४॥

क्वचित्‌--कभी कभी; क्रीडा--खेलने से; परिश्रान्तम्‌-- थके हुए; गोप--ग्वालबाल की; उत्सड़--गोद; उपबहणम्‌--तकियाबना कर; स्वयम्‌--स्वयं भी; विश्रमयति-- थकान मिटाते; आर्यमू--अपने बड़े भाई की; पाद-संवाहन-आदिभि: --उनके पाँवदबाकर तथा अन्य सेवाएँ करके |

जब उनके बड़े भाई खेलते खेलते थक कर अपना सिर किसी ग्वालबाल की गोद मेंरखकर लेट जाते तो भगवान्‌ कृष्ण स्वयं बलराम के पाँव दबाकर तथा अन्य सेवाएँ करकेउनकी थकान दूर करते।

नृत्यतो गायतः क्वापि वल्गतो युध्यतो मिथ: ।

गृहीतहस्तौ गोपालान्हसन्तौ प्रशशंसतु: ॥

१५॥

नृत्यतः--नाचते हुए; गायतः--गाते हुए; कब अपि--कभी कभी; वल्गत:--घूम-घूम कर; युध्यत:--झगड़ते हुए; मिथ: --परस्पर; गृहीत-हस्तौ--एक दूसरे के हाथ पकड़ कर; गोपालानू--ग्वालबालों को; हसन्तौ--हँसते हुए; प्रशशंसतु:--वे दोनोंप्रशंसा करते थे।

कभी कभी, जब ग्वालबाल नाचते, गाते, इधर उधर घूमते और खेल खेल में एक दूसरे सेझगड़ते तो पास ही हाथ में हाथ डाले खड़े होकर कृष्ण तथा बलराम अपने मित्रों केकार्यकलापों की प्रशंसा करते और हँसते।

क्वचित्पल्लवतल्पेषु नियुद्धभ्रमकर्शितः ।

वृक्षमूला श्रयः शेते गोपोत्सड्रीपब्हण: ॥

१६॥

क्वचित्‌--कभी; पल्‍लव--नई कोपलों से बनी; तल्पेषु--शय्याओं पर; नियुद्ध--झगड़ने से हुई; श्रम--थकावट से;कशितः--थके हुए; वृक्ष--वृक्ष की; मूल--जड़ के पास; आश्रय:--शरण लेकर; शेते-- लेट जाते; गोप-उत्सड्र--किसीग्वालबाल की गोद को; उपब्हण:--तकिया बनाकर।

कभी कभी भगवान्‌ कृष्ण झगड़ने से थक जाते और वृक्ष की जड़ के पास कोमल टहनियोंतथा कलियों से बने हुए बिस्तर पर अपने किसी ग्वालबाल सखा की गोद को तकिया बना करलेट जाते।

पादसंवाहनं चक्रु: केचित्तस्य महात्मन: ।

अपरे हतपाप्मानो व्यजनै: समवीजयन्‌ ॥

१७॥

पाद-संवाहनम्‌--पैर दबाने का कार्य; चक्रः--किया; केचित्‌--किसी ने; तस्थ--उनके; महा-आत्मन: --महान्‌ आत्माओं ने;अपरे--अन्य; हत-पाप्मान:--समस्त पापों से मुक्त; व्यजनै:--पंखों से; समवीजयन्‌-- भलीभाँति पंखा झला।

तब कुछ ग्वालबाल जो सब के सब महान्‌ आत्माएँ थे, उनके चरणकमल मलते और अन्यग्वालबाल निष्पाप होने के कारण बड़ी ही कुशलतापूर्वक भगवान्‌ पर पंखा झलते।

अन्ये तदनुरूपाणि मनोज्ञानि महात्मन: ।

गायन्ति सम महाराज स्नेहक्लिन्नधिय: शने: ॥

१८ ॥

अन्ये--अन्य; तत्‌-अनुरूपाणि---समयोचित; मन: -ज्ञानि--मन को आकृष्ट करने वाले; महा-आत्मन:--महापुरुष ( कृष्ण ) के;गायन्ति स्म--गाते थे; महा-राज--हे राजा परीक्षित; स्नेह--स्नेह से; क्लिन्न--द्रवित; धिय:--उनके हृदय; शनै:--धीरे धीरे ।

हे राजन्‌, अन्य बालक समयोचित मनोहर गीत गाते और उनके हृदय भगवान्‌ के प्रति प्रेम सेद्रवित हो उठते।

एवं निगूढात्मगतिः स्वमाययागोपात्मजत्वं चरितेर्विडम्बयन्‌ ।

रेमे रमालालितपादपललवोग्राम्यै: सम॑ ग्राम्यवदीशचेष्टित: ॥

१९॥

एवम्‌--इस प्रकार; निगूढड--छिपाया हुआ; आत्म-गति:--निजी एऐश्वर्य; स्व-मायया--अपनी ही योग शक्ति से; गोप-आत्मजत्वमू--ग्वाले का पुत्रत्व; चरितैः--अपने कार्यकलापों से; विडम्बयन्‌--बहाना करते हुए; रेमे-- आनन्द लिया; रमा--लक्ष्मीजी द्वारा; लालित--सेवित; पाद-पल्‍ललव:--कोमल नवीन कली जैसे पाँव; ग्राम्यै: समम्‌-ग्रामीण लोगों के साथ; ग्राम्य-बत्‌-ग्रामीण पुरुष की भाँति; ईश-चेष्टित:--भगवान्‌ के अद्वितीय कार्य भी प्रदर्शित करते हुए।

इस तरह भगवान्‌ जिनके कोमल चरणकमलों की सेवा लक्ष्मीजी स्वयं करती हैं, अपनीअन्तरंगा शक्ति के द्वारा अपने दिव्य ऐश्वर्य को छिपा कर ग्वालपुत्र की तरह कार्य करते।

अन्यग्रामवासियों के साथ ग्रामीण बालक की भाँति विचरण करते हुए वे कभी कभी ऐसे करतबदिखलाते जो केवल ईश्वर ही कर सकता है।

श्रीदामा नाम गोपालो रामकेशवयो: सखा ।

सुबलस्तोककृष्णाद्या गोपा: प्रेम्णेदमब्रुवनू ॥

२०॥

श्रीदामा नाम-- श्रीदामा नामक; गोपाल:--ग्वालबाल; राम-केशवयो: --राम तथा कृष्ण दोनों का; सखा--मित्र; सुबल-स्तोककृष्ण-आद्या: --सुबल, स्तोककृष्ण तथा अन्य; गोपा:--ग्वालबाल; प्रेम्णा--प्रेमपूर्वक; इृदम्‌--यह; अन्लुवन्‌ू--बोले।

एकबार राम तथा कृष्ण के अत्यन्त घनिष्ट मित्र श्रीदामा, सुबल, स्तोककृष्ण तथा अन्यग्वालबाल बड़े ही प्रेमपूर्वक इस प्रकार बोले।

राम राम महाबाहो कृष्ण दुष्टनिबहण ।

इतोविदूरे सुमहद्वनं तालालिसड्डु लम्‌ ॥

२१॥

राम राम--हे राम; महा-बाहो--हे शक्तिशाली भुजाओं वाले; कृष्ण--हे कृष्ण; दुष्ट-निबहण--दुष्टों का अन्त करने वाले;इतः--यहाँ से; अविदूरे--दूर नहीं; सु-महत्‌-- अत्यन्त विस्तृत; वनमू--जंगल; ताल-आलि--ताड़ वृक्षों की पंक्तियों से;सबट्डु लम्‌-परिपूर्ण ।

[ग्वालबालों ने कहा : हे राम, हे महाबाहु, हे कृष्ण, हे दुष्टों के संहर्ता, यहाँ से कुछ हीदूरी पर एक बहुत ही विशाल जंगल है, जो ताड़ वृक्षों की पाँतों से परिपूर्ण है।

'फलानि तत्र भूरीणि पतन्ति पतितानि च ।

सन्ति किन्त्ववरुद्धानि धेनुकेन दुरात्मना ॥

२२॥

'फलानि--फलों; तत्र--वहाँ; भूरीणि-- अनेकानेक; पतन्ति--गिरते रहते हैं; पतितानि--पहले ही गिर चुके हैं; च--तथा;सन्ति-हैं; किन्तु--फिर भी; अवरुद्धानि--नियंत्रण में रखे हुए; धेनुकेन--थधेनुक द्वारा; दुरात्मना--दुष्ट |

उस तालवन में वृक्षों से अनेकानेक फल गिरते रहते हैं और बहुत से फल पहले से ही जमीनपर पड़े हुए हैं।

किन्तु इन सारे फलों की रखवाली दुष्ट धेनुक द्वारा की जा रही है।

सोतिवीर्यो उसुरो राम हे कृष्ण खररूपधृक्‌ ।

आत्मतुल्यबलैरन्यैज्ञातिभिब॑हुभिवृत: ॥

२३॥

सः--वह; अति-वीर्य: --अत्यन्त शक्तिशाली; असुरः--असुर; राम--हे राम; है कृष्ण--हे कृष्ण; खर-रूप--गधे का रूप;धृक्‌ू-- धारण करके; आत्म-तुल्य-- अपने समान; बलै:--जिनकी शक्ति; अन्यै:--अन्य; ज्ञातिभिः--साथियों के साथ;बहुभि: --अनेक; वृत:--घिरा हुआ।

हे राम, हे कृष्ण, धेनुक अत्यन्त बलशाली असुर है और उसने गधे का वेश बना रखा है।

उसके आसपास अनेक मित्र हैं जिन्होंने उसी जैसा ही रूप धारण कर रखा है और वे उसी केसमान बलशाली हैं।

तस्मात्कृतनराहाराद्धीतैर्नृभिरमित्रहन्‌ ।

न सेव्यते पशुगणै: पक्षिसड्डैर्विवर्जितम्‌ ॥

२४॥

तस्मात्‌--उससे; कृत-नर-आहारात्‌--मनुष्यों को खा जाने वाले से; भीतै:--डरे हुए; नृभि: --मनुष्यों के द्वारा; अमित्र-हन्‌--हेशत्रुओं का वध करने वाले; न सेव्यते--सेवन नहीं किया जाता; पशु-गणै:--विभिन्न पशुओं के द्वारा; पक्षि-सच्बैः--पक्षियों केझुंड द्वारा; विवर्जितम्‌ू--परित्यक्त |

धेनुकासुर ने जीवित मनुष्यों को खा लिया है इसलिए सारे लोग तथा पशु तालवन जाने सेडरते हैं।

हे शत्रुहन्ता, पक्षी तक उड़ने से डरते हैं।

विद्यन्तेभुक्तपूर्वाणि फलानि सुरभीणि च ।

एष वै सुरभिर्गन्धो विषूच्ीनोउवगृह्मते ॥

२५॥

विद्यन्ते--उपस्थित हैं; अभुक्त-पूर्वाणि--इसके पूर्व कभी भी जिनका स्वाद नहीं लिया गया; फलानि--फल; सुरभीणि--सुगन्धित; च--तथा; एष:--यह; वै--निस्सन्देह; सुरभि: --सुगन्धित; गन्ध:--सुगन्धि; विषुच्चीन:--सर्वत्र फैली हुई;अवगृह्मयते-- अनुभव की जाती है।

तालवन में ऐसे मधुर गन्ध वाले फल हैं, जिन्हें किसी ने कभी नहीं चखा।

तालफलों कीचारों ओर फैली खुशबू को हम अब भी सूँघ सकते हैं।

प्रयच्छ तानि न: कृष्ण गन्धलोभितचेतसाम्‌ ।

वाज्छास्ति महती राम गम्यतां यदि रोचते ॥

२६॥

प्रयच्छ--कृपया दीजिये; तानि--उनको; नः--हमको; कृष्ण--हे कृष्ण; गन्ध--सुगन्धि से; लोभित--लुब्ध; चेतसाम्‌--जिनके मन; वाउ्छा--इच्छा; अस्ति-- है; महती--विशाल; राम--हे राम; गम्यताम्‌--हमें जाने दें; यदि--यदि; रोचते-- अच्छाविचार जैसा लगता है।

हे कृष्ण! आप हमारे लिए वे फल ला दें।

हमारे मन उनकी सुगन्ध से अत्यधिक आदुृष्ट हैं।

है बलराम, उन फलों को पाने की हमारी इच्छा अत्यन्त प्रबल है।

यदि आप सोचते हैं कि यहविचार अच्छा है, तो चलिये उस तालवन में चलें।

एवं सुहद्बच: श्रुत्वा सुहृत्प्रियचिकीर्षया ।

प्रहस्य जग्मतुर्गोपिर्वृती तालवनं प्रभू ॥

२७॥

एवम्‌--इस प्रकार; सुहत्‌--अपने मित्रों के; बच:--शब्द; श्रुत्वा--सुनकर; सुहृत्‌-मित्रों को; प्रिय--हर्ष; चिकीर्षया--प्रदानकरने की इच्छा से; प्रहस्य--हँस कर; जम्मतु:--दोनों गये; गोपै:--ग्वालबालों के द्वारा; वृतौ--घिरे हुए; ताल-वनम्‌--तालवन तक; प्रभू--दोनों स्वामी |

अपने प्रिय सखाओं के वचन सुनकर कृष्ण तथा बलराम हँस पड़े और उन्हें खुश करने के लिए वे अपने ग्वालमित्रों के साथ तालवन के लिए रवाना हो गये।

बल: प्रविश्य बाहुभ्यां तालान्सम्परिकम्पयन्‌ ।

'फलानि पातयामास मतड़ज इवौजसा ॥

२८ ॥

बल:--बलराम ने; प्रविश्य--घुस कर; बाहुभ्याम्‌--अपनी दोनों भुजाओं से; तालानू--ताड़ वृक्षों को; सम्परिकम्पयन्‌ --झकझोरते हुए; फलानि--फलों को; पातयाम्‌ आस--गिरा दिया; मतम्‌-गज:--मतवाला हाथी; इब--सहृश; ओजसा--अपनेबल से

भगवान्‌ बलराम सबसे पहले तालवन में प्रविष्ट हुए।

तब अपने दोनों हाथों से मतवाले हाथीका बल लगाकर वृक्षों को हिलाने लगे जिससे ताड़ के फल भूमि पर आ गिरें।

'फलानां पततां शब्दं निशम्यासुररासभः ।

अभ्यधावत्तक्षितितलं सनग॑ परिकम्पयन्‌ ॥

२९॥

'फलानाम्‌--फलों के; पतताम्‌--गिरते हुए; शब्दम्‌--शब्द को; निशम्य--सुनकर; असुर-रासभः --गर्दभ वेशधारी असुर;अभ्यधावत्‌--आगे दौड़ा; क्षिति-तलम्‌--पृथ्वी की सतह को; स-नगमू्‌--वृक्षों समेत; परिकम्पयन्‌--हिलाता हुआ।

गिरते हुए फलों की ध्वनि सुनकर गर्दभ असुर धेनुक पृथ्वी तथा वृक्षों को थरथराता हुआआक्रमण करने के लिए उनकी ओर दौड़ा।

समेत्य तरसा प्रत्यग्द्वा भ्यां पद्भ्यां बल बली ।

निहत्योरसि काशब्दं मुझ्नन्पर्यसरत्खल: ॥

३०॥

समेत्य--उनसे मिल कर; तरसा--तेजी से; प्रत्यक्‌ --पिछला; द्वाभ्यामू-दोनों; पद्भ्याम्‌ू-पैरों से; बलम्‌ू--बलदेव को;बली--बलशाली असुर ने; निहत्य--वार करके; उरसि--छाती पर; का-शब्दम्‌--भद्दी रेंकने की आवाज; मुझ्नन्‌--करते हुए;पर्यसरत्‌--चारों ओर दौड़ने लगा; खलः--दुष्ट गधा |

वह बलशाली असुर बलराम की ओर झपटा और उनकी छाती पर अपने पिछले पैरों केखुरों से कठोर वार किया।

तत्पश्चात्‌ धेनुक जोर जोर से रेंकता हुआ इधर-उधर दौड़ने लगा।

पुनरासाद्य संरब्ध उपक्रोष्टा पराक्स्थित: ।

चरणावपरौ राजन्बलाय प्राक्षिपद्रुषा ॥

३१॥

पुन:ः--फिर से; आसाद्य--उनके निकट आकर; संरब्ध:--प्रचण्ड, उग्र; उपक्रोष्टा --गधे ने; पराकु--उनकी ओर अपनी पीठकरके; स्थित:--खड़े होकर; चरणौ--दोनों पैर; अपरौ--पिछले; राजन्‌--हे राजा परीक्षित; बलाय--बलराम पर; प्राक्षिपत्‌--चलाया; रुषा--क्रोध से |

हे राजन, वह क्रुद्ध गधा फिर से बलराम की ओर बढ़ा और अपनी पीठ उनकी ओर करकेखड़ा हो गया।

तत्पश्चात्‌ क्रोध से रेंकते हुए उस असुर ने उन पर दुलत्ती चलाई।

सतं गृहीत्वा प्रपदोर्भ्रामयित्वैकपाणिना ।

चिक्षेप तृणराजाग्रे भ्रामणत्यक्तजीवितम्‌ ॥

३२॥

सः--उन्होंने; तमू--उसको; गृहीत्वा--पकड़ कर; प्रपदो:--खुर से; भ्रामयित्वा--घुमा कर; एक-पाणिना--एक हाथ से;चिक्षेप--फेंक दिया; तृण-राज-अग्रे--तालवृक्ष की चोटी पर; भ्रामण--घुमाने से; त्यक्त--त्याग कर; जीवितम्‌ू--अपनेप्राण

बलराम ने धेनुक के खुर पकड़े, उसे एक हाथ से घुमाया और ताड़वृक्ष की चोटी पर फेंकदिया।

इस तरह तेजी से घुमाने के कारण वह असुर मर गया।

तेनाहतो महातालो वेषमानो बृहच्छिरा: ।

पार्श्वस्थं कम्पयन्भग्न: स चान्यं सोपि चापरम्‌ ॥

३३॥

तेन--उस ( धेनुकासुर के मृत शरीर ) से; आहत:--चोट खाकर; महा-ताल:--ताड़ का विशाल वृक्ष; वेपमान:--हिलता हुआ;बृहत्‌-शिरा:--विशाल चोटी वाला; पार्श्व-स्थम्‌--पास ही स्थित अन्य वृक्षों को; कम्पयन्‌--हिलाता हुआ; भग्न:--दूटा हुआ;सः--वह; च--तथा; अन्यम्‌--दूसरे को; सः--वह; अपि-- भी; च--तथा; अपरम्‌--अगले, अन्य को |

बलराम ने धेनुकासुर के मृत शरीर को जंगल के सबसे ऊँचे ताड़ वृक्ष के ऊपर फेंक दियाऔर जब यह मृत शरीर उस वृक्ष की चोटी पर जा गिरा तो वह वृक्ष हिलने लगा।

इस विशालवृक्ष से पास का एक अन्य वृक्ष भी चरमराया और असुर के भार के कारण टूट गया।

इसके निकट का वृक्ष भी इसी तरह हिल कर टूट गया।

इस तरह एक एक करके जंगल के अनेक वृक्षहिले और टूट गये।

बलस्य लीलयोत्सृष्टखरदेहहताहता: ।

तालाश्चकम्पिरे सर्वे महावातेरिता इव ॥

३४॥

बलस्य--बलराम की; लीलया--लीला से; उत्सृष्ट--ऊपर फेंका हुआ; खर-देह--गधे के शरीर से; हत-आहता: --एक दूसरेसे भिड़ कर; ताला:--ताल के वृक्ष; चकम्पिरि--चरमराये; सर्वे--सभी; महा-वात--प्रबल वायु द्वारा; ईरिता: --उड़ाये हुए;इब--मानो।

बलराम द्वारा इस गर्दभ असुर के शरीर को सबसे ऊँचे ताड़वृक्ष के ऊपर फेंकने की लीलासे सारे वृक्ष चरमराने लगे और एक दूसरे से भिड़ने लगे मानो प्रबल झंझा के द्वारा झकझोरे गयेहों।

नैतच्चित्रं भगवति हानन्ते जगदी श्वरे ।

ओतप्रोतमिदं यस्मिस्तन्तुष्वड़ यथा पट: ॥

३५॥

न--नहीं; एतत्‌--यह; चित्रम्‌--आश्चर्यजनक; भगवति-- भगवान्‌ के लिए; हि--निस्सन्देह; अनन्ते--अनन्त; जगत्‌ू-ई श्रे--ब्रह्माण्ड के स्वामी; ओत-प्रोतम्‌ू--ऊपर नीचे फैला हुआ ( ताना बाना ); इृदम्‌--यह ब्रह्माण्ड; यस्मिन्‌ू--जिसमें; तन्तुषु--इसकेधागों पर; अड्ड--हे परीक्षित; यथा--जिस तरह

हे परीक्षित, बलराम को अनन्त भगवान्‌ एवं सम्पूर्ण ब्रह्माण्ड का नियन्ता जान लेने परबलराम द्वारा धेनुकासुर का मारा जाना उतना आश्चर्यजनक नहीं है।

निस्सन्देह, सम्पूर्ण ब्रह्माण्डउन पर उसी प्रकार टिका है, जिस तरह बुना हुआ वस्त्र तानों-बानों पर टिका रहता है।

ततः कृष्णं च राम॑ च ज्ञातयो धेनुकस्य ये ।

क्रोष्टारो भ्यद्रवन्सर्वे संरब्धा हतबान्धवा: ॥

३६॥

ततः-तत्पश्चात्‌; कृष्णम्‌--- कृष्ण पर; च--तथा; रामम्‌-- बलराम पर; च--तथा; ज्ञातय: --घनिष्ट मित्र गण; धेनुकस्थ--धेनुक के; ये--जो; क्रोष्टार:ः--गधों ने; अभ्यद्रवन्‌-- आक्रमण किया; सर्वे--सभी; संरब्धा:--क्रुद्ध; हत-बान्धवा:--अपनेमित्र के मारे जाने से |

धेनुकासुर के घनिष्ठ मित्र, अन्य गर्दभ असुर, उसकी मृत्यु देखकर अत्यन्त क्रुद्ध हो उठे औरवे तुरन्त कृष्ण तथा बलराम पर आक्रमण करने के लिए दौड़े।

तांस्तानापतत: कृष्णो रामश्च नृप लीलया ।

गृहीतपश्चाच्चरणान्प्राहिणोत्तणराजसु ॥

३७॥

तान्‌ तानू--एक एक करके, वे सभी; आपतत:--आक्रमण करते हुए; कृष्ण: --कृष्ण ने; राम:--बलराम ने; च--तथा;नृप--हे राजन्‌; लीलया--सरलता से; गृहीत--पकड़ कर; पश्चात्‌-चरणान्‌--पिछली टाँगों को; प्राहिणोत्‌-- फेंक दिया; तृण-राजसु--ताड़ के वृक्षों के ऊपर।

हे राजन, जब असुरों ने आक्रमण किया कृष्ण तथा बलराम ने उनकी पिछली टाँगों सेपकड़-पकड़ कर उन सब को ताड़ वृक्षों के ऊपर फेंक दिया।

फलप्रकरसड्डीर्ण दैत्यदेहैर्गतासुभि: ।

रराज भू: सतालाग्रैर्घधनैरिव नभस्तलम्‌ ॥

३८ ॥

'फल-प्रकर--फलों के ढेर से; सड्डीर्णम्‌--ढकी; दैत्य-देहैः--असुरों के शरीरों से; गत-असुभि:--प्राणविहीन; रराज--सुशोभित; भू:--पृथ्वी; स-ताल-अग्रै:ः--ताड़ वृक्षों की चोटियों समेत; घनैः--बादलों से; इब--जिस तरह; नभः-तलम्‌--आकाश

इस तरह फलों के ढेरों से तथा ताड़ वृक्ष की टूटी चोटियों में फँसे असुरों के मृत शरीरों सेढकी हुई पृथ्वी अत्यन्त सुन्दर लग रही थी मानो बादलों से आकाश अलंकृत हो।

तयोस्तत्सुमहत्कर्म निशम्य विबुधादय: ।

मुमुचु: पुष्पवर्षाणि चक्रुर्वाद्यानि तुष्ठवु: ॥

३९॥

तयो:--दोनों भाइयों के; ततू--उस; सु-महत्‌-- अत्यन्त महान; कर्म--कार्य को; निशम्य-- सुनकर; विबुध-आदय: --देवतागण तथा अन्य उच्च जीवों ने; मुमुचु:--छोड़ा; पुष्प-वर्षाणि--फूलों की वर्षा; चक्र: --सम्पन्न किया; वाद्यानि--संगीत;तुष्ठवु:ः--स्तुति की |

दोनों भाइयों का यह सुन्दर करतब ( लीला ) सुनकर देवताओं तथा अन्य उच्चस्थ प्राणियोंने फूलों की वर्षा की और उनकी प्रशंसा में गीत गाये तथा स्तुतियाँ कीं।

अथ तालफलान्यादन्मनुष्या गतसाध्वसा: ।

तृणं च पशवश्चेरुहतधेनुककानने ॥

४०॥

अथ--त्पश्चात्‌; ताल--ताड़ वृक्षों के; फलानि--फलों को; आदन्‌--खाया; मनुष्या: --मनुष्यगण; गत-साध्वसा: --निडरहोकर; तृणम्‌--घास; च--तथा; पशव: --पशुगण; चेरु:--चरने लगे; हत--मारा गया; धेनुक--धेनुकासुर का; कानने--जंगल में |

जिस बन में धेनुकासुर मारा गया था, उसमें लोग मुक्त भाव से फिर से जाने लगे और निडरहोकर ताड़ वृक्षों के फल खाने लगे।

अब गौवें भी वहाँ पर स्वतंत्रतापूर्वक घास चरने लगीं।

कृष्ण: कमलपत्राक्ष: पुण्यश्रवणकीर्तन: ।

स्तूयमानो नुगैगगोपै: साग्रजो ब्रजमात्रजत्‌ ॥

४१॥

कृष्ण:-- भगवान्‌ कृष्ण; कमल-पत्र-अक्ष:--कमल की पंखड़ियों के समान नेत्रों वाले; पुण्य-अ्रवण-कीर्तन:--जिनका श्रवणतथा कीर्तन अत्यन्त पुण्य कार्य माना जाता है; स्तूयमान:--स्तुति किया गया; अनुगैः--अपने अनुयायी; गोपै:--ग्वालबालों केद्वारा; स-अग्र-ज:--अपने बड़े भाई बलराम के साथ साथ; ब्रजमू--ब्रज; आब्रजत्‌--लौट आये |

तत्पश्चात्‌ कमलनेत्र भगवान्‌ श्रीकृष्ण, जिनके यश को सुनना और जिनका कीर्तन करनाअत्यन्त पवित्र है, अपने बड़े भाई बलराम के साथ अपने घर ब्रज लौट आये।

रास्ते भर उनकेश्रद्धावान अनुयायी ग्वालबालों ने उनके यश का गान किया।

त॑ गोरजएछुरितकुन्तलबद्धबर्ह -वन्यप्रसूनरुचिरेक्षणचारुहासम्‌ ।

वेणुम्क्वणन्तमनुगैरुपगीतकीर्तिगोप्यो दिदृक्षितद॒शो भ्यगमन्समेता: ॥

४२॥

तम्‌--उसको; गो-रज:--गायों के चलने से उठी हुई धूल से; छुरित--सने; कुन्तल--बालों के भीतर; बद्ध--बँधा हुआ;बह--मोरपंख; वन्य-प्रसून--जंगली फूल; रुचिर-ईक्षण--मोहने वाली आँखें; चारु-हासम्‌--तथा सुन्दर मुसकान; वेणुम्‌--बाँसुरी; क्वणन्तम्‌--बजाते हुए; अनुगै: --अपने साथियों के द्वारा; उपगीत--गायी जाकर; कीर्तिमू--उनकी कीर्ति; गोप्य:--गोपियाँ; दिदृक्षित--देखने के लिए उत्सुक; दहृशः--उनकी आँखें; अभ्यगमन्‌--आगे बढ़ीं; समेता:--एकसाथ |

गौवों के द्वारा उड़ाई गई धूल से सने श्रीकृष्ण के बाल मोर पंख तथा जंगली फूलों सेसज्जित किये गये थे।

भगवान्‌ कृष्ण अपनी वंशी बजाते हुए मोहक दृष्टि से देख रहे थे औरसुन्दर ढंग से हँस रहे थे तथा उनके संगी उनके यश का गान कर रहे थे।

सारी गोपियाँ एकसाथउनसे मिलने चली आईं क्योंकि उनके नेत्र दर्शन करने के लिए अत्यन्त व्यग्र थे।

पीत्वा मुकुन्दमुखसारघमक्षि भूड़ै-स्तापं जहुर्विरहजं ब्रजयोषितोह्नि ।

तत्सत्कृतिं समधिगम्य विवेश गोष्ठंसब्रीडहासविनयं यदपाड्मोक्षम्‌ ॥

४३ ॥

पीत्वा--पीकर; मुकुन्द-मुख-- भगवान्‌ मुकुन्द के मुख का; सारधम्‌--मधु; अक्षि-भूड़ैः --- भौरे जैसे नेत्रों से; तापम्‌--पीड़ा;जहु:--त्याग दिया; विरह-जम्‌--विरह से उत्पन्न; ब्रज-योषित: --वृन्दावन की स्त्रियों ने; अह्वि--दिन में; तत्‌--उस; सतू-कृतिमू--आदर करते हुए; समधिगम्य--पूरी तरह स्वीकार करके ; विवेश--उन्होंने प्रवेश किया; गोष्ठम्‌--ग्वालों के गाँव में;स-ब्रीड--लज्जा सहित; हास--हँसी; विनयम्‌--तथा विनयशीलता; यत्‌--जो; अपाड़ु--तिरछी चितवनों का; मोक्षम्‌--डालाजाना।

वृन्दावन की स्त्रियों ने अपने भ्रमर रूपी नेत्रों से मुकुन्द के सुन्दर मुख का मधुपान कियाऔर इस तरह दिन में वियोग के समय उन्हें जो पीड़ा हुई थी उसे उन्होंने त्याग दिया।

वृन्दावन कीतरुण स्त्रियों ने भगवान्‌ पर तिरछी चितवन डाली जो लाज, हँसी तथा विनय से पूर्ण थी तथाकृष्ण ने इस चितवन को समुचित सम्मान मानते हुए गोप- ग्राम में प्रवेश किया।

तयोर्यशोदारोहिण्यौ पुत्रयो: पुत्रवत्सले ।

यथाकामं यथाकाल व्यधत्तां परमाशिष: ॥

४४॥

तयो:--दोनों; यशोदा-रोहिण्यौ--यशोदा तथा रोहिणी ( कृष्ण तथा बलराम की माताओं ) ने; पुत्रयो:--पुत्रों को; पुत्र-बत्सले--अपने पुत्रों के स्नेहसिक्त; यथा-कामम्‌--अपनी अपनी इच्छाओं के अनुरूप; यथा-कालमू--परिस्थितियों के अनुरूप;व्यधत्ताम्‌-प्रस्तुत किया; परम-आशिष:--उत्तम भेंटें

माता यशोदा तथा रोहिणी ने अपने दोनों पुत्रों के प्रति अत्यधिक स्नेह दर्शाते हुए उन्हें उनकीइच्छा के अनुसार तथा समयानुकूल उत्तमोत्तम वस्तुएँ प्रदान कीं।

गताध्वानश्रमौ तत्र मज्जनोन्मर्दनादिभिः ।

नीवीं वसित्वा रुचिरां दिव्यस्त्रग्गन्धमण्डितौ ॥

४५॥

गत--दूर हो गयी; अध्वान-श्रमौ--चलते रहने से उत्पन्न थकान; तत्र--वहाँ ( घर में ); मजन--स्नान; उन्मर्दन--मालिश;आदिभि: --त्यादि के द्वारा; नीवीम्‌--अधोवस्त्रों को; वसित्वा--पहन कर; रुचिराम्‌--मनोहर; दिव्य--दिव्य; सत्रकू--माला;गन्ध--तथा सुगन्धि से; मण्डितौ--अलंकृत

स्नान करने तथा मालिश से उन दोनों की ग्रामीण रास्तों में चलने से उत्पन्न थकान दूर होगई।

इसके बाद उन्हें सुन्दर बस्त्रों से सजाया गया और दिव्य मालाओं तथा सुगगन्धित पदार्थों सेअलंकृत किया गया।

जनन्युपहतं प्राश्य स्वाद्यन्नमुपलालितौ ।

संविश्य वरशय्यायां सुखं सुषुपतुर्त्रजे ॥

४६॥

जननी--अपनी माताओं के द्वारा; उपहतम्‌--प्रदत्त; प्राशय--अच्छी तरह खाकर; स्वादु--स्वादिष्ट; अन्नम्‌ू-- भोजन;उपलालितौ--लाड़ प्यार किये जाकर; संविश्य--प्रवेश करके ; वर-- श्रेष्ठ; शय्यायाम्‌--बिस्तर पर; सुखम्‌--सुखपूर्वक;सुषुपतु:--दोनों सो गये; ब्रजे--ब्रज में |

अपनी माताओं द्वारा प्रदत्त स्वादिष्ट भोजन को पेट-भर खाने तथा विविध प्रकार से दुलारेजाने के बाद वे दोनों भाई ब्रज में अपने अपने उत्तम बिछौनों पर लेट गये और सुखपूर्वक सोगये।

एवं स भगवान्कृष्णो वृन्दावनचर: क्वचित्‌ ।

ययौ राममृते राजन्कालिन्दीं सखिभिर्वृत: ॥

४७॥

एवम्‌--इस प्रकार; सः--वह; भगवान्‌-- भगवान्‌; कृष्ण: --कृष्ण; वृन्दावन-चर: --वृन्दावन में विचरण करते हुए;क्वचित्‌--एक बार; ययौ--गये; रामम्‌ ऋते--बलराम के बिना; राजन्‌--हे राजा परीक्षित; कालिन्दीम्‌--यमुना नदी के तटपर; सखिभि:--अपने मित्रों के द्वारा; वृत:--घिरे

हे राजन, इस प्रकार भगवान्‌ कृष्ण अपनी लीलाएँ करते हुए वृन्दावन क्षेत्र में विचरण करतेथे।

एक बार वे अपने मित्रों समेत यमुना नदी के तट पर गये।

तब बलराम उनके साथ नहीं थे।

अथ गावश्च गोपाश्चव निदाघातपपीडिता: ।

दुष्टे जल॑ पपुस्तस्यास्तृष्णार्ता विषदूषितम्‌ ॥

४८ ॥

अथ--तत्पश्चात्‌; गाव:--गौवें; च--तथा; गोपा:--ग्वालबाल; च--तथा; निदाघ--ग्रीष्म कीौ; आतप--कड़ी धूप से;पीडिता:--संतप्त; दुष्टमू-- प्रदूषित; जलम्‌--जल को; पपु:--पी लिया; तस्या:--उस नदी का; तृष-आर्ता:--प्यास से पीड़ित;विष--विष से; दूषितम्‌-दूषित

उस समय गौवें तथा ग्वालबाल ग्रीष्म की कड़ी धूप से अत्यन्त संतप्त हो उठे।

प्यास सेव्याकुल होने के कारण उन्होंने यमुना नदी का जल पिया।

किन्तु यह जल विष से दूषित था।

विषाम्भस्तदुपस्पृश्य दैवोपहतचेतस: ।

निपेतुर्व्यसव: सर्वे सलिलान्ते कुरूद्वह ॥

४९॥

वीक्ष्य तान्वे तथाभूतान्कृष्णो योगे श्वरेश्वर: ।

ईक्षयामृतवर्षिण्या स्वनाथान्समजीवयतू ॥

५०॥

विष-अम्भ:--विषाक्त जल; तत्‌--उस; उपस्पृश्य--स्पर्श मात्र से; दैव-- भगवान्‌ की योग शक्ति से; उपहत--खो दी;चेतस:--अपनी चेतना; निपेतु:--गिर पड़े; व्यसवः--निर्जीव; सर्वे--सभी; सलिल-अन्ते--जल के किनारे; कुरु-उद्दद-हेकुरुवंशी वीर; वीक्ष्य--देखकर; तान्‌--उनको; बै--निस्सन्देह; तथा-भूतान्‌ू--ऐसी अवस्था में; कृष्ण: -- भगवान्‌ कृष्ण ने;योग-ईश्वर-ई श्वर:--योगे श्वरों के ईश्वर; ईक्षया--अपनी चितवन से; अमृत-वर्षिण्या--अमृत रूपी वर्षा से; स्व-नाथान्‌---उन्हें हीअपना स्वामी मानने वाले; समजीवयत्‌--पुन:जिला दिया।

विषैले जल का स्पर्श करते ही सारी गौवें तथा ग्वालबाल भगवान्‌ की देवी शक्ति से अचेतहो गये और निर्जीव होकर नदी के तट पर गिर पड़े।

हे कुरू-वीर, उन्हें इस अवस्था में देखकर,समस्त योगेश्वरों के ईश्वर भगवान्‌ कृष्ण को अपने उन भक्तों पर दया आ गई जिनका उनकेअतिरिक्त अन्य कोई स्वामी नहीं था।

इस तरह उन्होंने अपनी अमृत-चितवन की दृष्टि द्वारा उन्हेंतुरन्त पुनः जीवित कर दिया।

ते सम्प्रतीतस्मृतयः समुत्थाय जलान्तिकात्‌ ।

आसन्सुविस्मिता: सर्वे वीक्षमाणा: परस्परम्‌ ॥

५१॥

ते--वे; सम्प्रतीत--पुनः प्राप्त करने पर; स्मृतय:ः-- अपनी स्मृति; समुत्थाय--उठकर; जल-अन्तिकात्‌--जल के बाहर से;आसनू--हो गये; सु-विस्मिता:-- अत्यधिक चकित; सर्वे--सभी; वीक्षमाणा: --देखते हुए; परस्परम्‌--एक दूसरे को |

अपनी पूर्ण चेतना वापस पाकर सारी गौवें तथा बालक जल के बाहर आकर उठ खड़े हुयेऔर बड़े ही आश्चर्य से एक दूसरे को देखने लगे।

अन्वमंसत तद्राजन्गोविन्दानुग्रहेक्षितम्‌ ।

पीत्वा विषं परेतस्य पुनरुत्थानमात्मन: ॥

५२॥

अन्वमंसत--अतः उन्होंने सोचा; तत्‌ू--वह; राजनू--हे राजा परीक्षित; गोविन्द--गोविन्द की; अनुग्रह-ईक्षितम्‌--कृपा-दृष्टि केकारण; पीत्वा--पीकर; विषम्‌--विष; परेतस्य--जीवन से हाथ धो बैठने वालों का; पुनः--फिर से; उत्थानम्‌--उत्थान, उठखड़े होना; आत्मन:-- अपने से

हे राजन, तब उन ग्वालबालों ने सोचा कि यद्यपि वे विषला जल पीकर सचमुच ही मर चुकेथे किन्तु गोविन्द की कृपादृष्टि से ही उनको पुनः: जीवनदान मिला है और अपने बल पर उठ खड़ेहुए हैं।

TO

← पिछला अध्याय · अगला अध्याय →

← श्रीमद्भागवतम् स्कन्ध 10 की सूची