← श्रीमद्भागवतम् स्कन्ध 10 की सूची
अध्याय सोलह: कृष्ण ने कालिया नाग को दंडित किया
10.16श्रीशुक उबाचविलोक्य दूषितां कृष्णां कृष्ण: कृष्णाहिना विभु: ।
तस्या विशुद्धिमन्विच्छन्सर्प तमुदबासयत् ॥
१॥
श्री-शुकः उबाच-- श्री शुकदेव गोस्वामी ने कहा; विलोक्य--देखकर; दूषिताम्--प्रदूषित; कृष्णाम्ू--यमुना नदी को;कृष्ण:--भगवान् श्रीकृष्ण ने; कृष्ण-अहिना--काले सर्प ( कालिय ) द्वारा; विभुः--सर्वशक्तिमान; तस्या:--नदी की;विशुद्धिम्--शुर्द्धि की; अन्विच्छन्--इच्छा करते हुए; सर्पम्--सर्प को; तम्--उस; उदवासयत्-- भगा दिया।
शुकदेव गोस्वामी ने कहा : भगवान् श्रीकृष्ण ने यह देखकर कि काले सर्प कालिय नेयमुना नदी को दूषित कर रखा है, उसे शुद्ध करने की इच्छा की और इस तरह उन्होंने कालियको उसमें से निकाल भगाया।
श्रीराजोबाच'कथमन्तर्जलेगाधे न्यगृह्नाद्धभवानहिम् ।
स बै बहुयुगावासं यथासीद्विप्र कथ्यताम् ॥
२॥
श्री-राजा उवाच--राजा परीक्षित ने कहा; कथम्--कैसे; अन्तः-जले--जल के भीतर; अगाधे--अथाह; न्यगृह्मात्--दमनकिया; भगवान्-- भगवान् ने; अहिम्--सर्प को; सः--वह, कालिय; बै--निस्सन्देह; बहु-युग--अनेक युगों से; आवासम्--निवास स्थान बनाये हुए; यथा--किस तरह; आसीतू--हो गया; विप्र--हे विद्वान ब्राह्मण; कथ्यताम्--कृपा करके बतलायें |
राजा परीक्षित ने पूछा: हे विद्वान मुनि, कृपा करके यह बतलायें कि किस तरह भगवान् नेयमुना के अगाध जल में कालिय नाग को प्रताड़ित किया और वह कालिय किस तरह अनेकयुगों से वहाँ पर रह रहा था ?
ब्रह्मन्भगवतस्तस्य भूम्न: स्वच्छन्दवर्तिन: ॥
गोपालोदारचरितं कस्तृप्येतामृतं जुषन् ॥
३॥
ब्रह्मनू-हे ब्राह्मण; भगवतः--भगवान् का; तस्य--उस; भूम्न: -- अनन्त; स्व-छन्द-वर्तिन: --अपनी इच्छा से कर्म करनेवाले;गोपाल--ग्वालबाल के रूप में; उदार--उदार; चरितमू--लीलाएँ; कः--कौन; तृप्पेत--तृप्त की जा सकती है; अमृतम्--ऐसीअमृतमय; जुषन्-- भाग लेते हुए, सेवन करने से |
हे ब्राह्मण, अनन्त भगवान् अपनी इच्छानुसार स्वतंत्र रूप से कर्म करते हैं।
उन्होंने वृन्दावनमें ग्वालबाल के रूप में जो अमृत तुल्य उदार लीलाएँ सम्पन्न कीं भला उन्हें सुनकर कौन तृप्त होसकता है?
श्रीशुक उबाचकालिन्द्यां कालियस्यासीद् हृदः कश्चिद्विषाग्निना ।
अश्रप्पमाणपया यस्मिन्पतन्त्युपरिगा: खगा;: ॥
४॥
श्री-शुकः उबाच-- श्री शुकदेव गोस्वामी ने कहा; कालिन्द्यामू--यमुना नदी के भीतर; कालियस्थ--कालिय नाग का;आसीतू--था; हृदः--झील, सरोवर, कुंड; कश्चित्--कोई; विष--उसके विष की; अग्निना--अग्नि से; श्रप्पमाण --गर्मी सेउबलकर; पया: --इसका जल; यस्मिन्--जिसमें; पतन्ति--गिर पड़ते थे; उपरि-गा:--ऊपर से जाते हुए; खगा:--पशक्षीगण |
श्री शुकदेव गोस्वामी ने कहा : कालिन्दी ( यमुना ) नदी के भीतर एक सरोवर ( कुंड ) थाजिसमें कालिय नाग रह रहा था जिसके अग्नि-तुल्य विष से उसका जल निरन्तर उबलता रहताथा।
इस तरह से उत्पन्न भाप इतनी विषैली होती थी कि दूषित सरोवर के ऊपर से उड़नेवाले पक्षीउसमें गिर पड़ते थे।
विप्रुष्मता विषदोर्मिमारुतेनाभिमर्शिता: ।
प्रियन्ते तीरगा यस्य प्राणिन: स्थिरजड्रमा: ॥
५॥
विप्रुट-मता--जल की बूँदों से युक्त; विष-द--विषैली; ऊर्मि-- लहरें; मारुतेन--वायु के द्वारा; अभिमर्शिता:--स्पर्श करते;प्रियन्ते--मर जाते; तीर-गा:--तट पर स्थित; यस्य--जिसके; प्राणिन:--सारे जीव; स्थिर-जड्रमा:--चर तथा अचर।
उस घातक सरोवर के ऊपर से बहने वाली हवा जल की बूँदों को तट तक ले जाती थी।
उसविषैली वायु के सम्पर्क में आने से ही तट की सारी वनस्पति तथा जीवजन्तु मर जाते थे।
तं चण्डवेगविषदवीर्यमवेक्ष्य तेनदुष्टां नदीं च खलसंयमनावतारः ।
कृष्ण: कदम्बमधिरुहाय ततोतितुड़-मास्फोट्य गाढरशनो न्यपतद्विषोदे ॥
६॥
तम्--उस कालिय को; चण्ड-वेग--डरावनी शक्ति का; विष--विष; वीर्यम्--प्रबल; अवेक्ष्य--देखकर; तेन--उसके द्वारा;दुष्टामू-- प्रदूषित; नदीम्ू--नदी को; च--तथा; खल--ईर्ष्यालु असुर; संयमन--दमन करने के लिए; अवतार:--आध्यात्मिकजगत से अवतरण हुआ है, जिसका; कृष्ण: --कृष्ण; कदम्बम्--कदम्ब वृक्ष में; अधिरुह्य--चढ़कर; ततः--उसमें से; अति-तुड्ठम--अत्यन्त ऊँचा; आस्फोट्य--अपनी भुजाएँ ठोंकते हुए; गाढ-रशन:--हढ़ता से फेंटा बाँधते हुए; न्यपतत्--कूद पड़े;विष-उदे--विषैले जल में |
भगवान् कृष्ण ने देखा कि कालिय नाग ने किस तरह अपने अत्यन्त प्रबल विष से यमुनानदी को दूषित कर रखा था।
चूँकि कृष्ण आध्यात्मिक जगत से ईर्ष्यालु असुरों का दमन करनेके लिए ही विशेष रूप से अवतरित हुए थे इसलिए वे तुरन्त एक बहुत ऊँचे कदम्ब वृक्ष कीचोटी पर चढ़ गये और उन्होंने युद्ध के लिए अपने को तैयार कर लिया।
उन्होंने अपना फेंटाबाँधा, बाहुओं में ताल दी और फिर विषैले जल में कूद पड़े।
सर्पह्ृदः पुरुषसारनिपातवेग-सद्क्षोभितोरगविषोच्छुसिताम्बुराशि: ।
पर्यक्प्लुतो विषकषायबिभीषणोर्मि-धधावन्धनुःशतमनन्तबलस्य कि तत् ॥
७॥
सर्प-हृदः--सर्प का सरोवर; पुरुष-सार--परम आदरणीय भगवान् के; निपात-वेग--बलपूर्वक गिरने से; सड्क्षोभित--पूरीतरह से विचलित; उरग--सर्पों का; विष-उच्छुसित--विष में ही श्वास लेते हुए; अम्बु-राशि:--जिसका सारा जल; पर्यक्--चारों ओर; प्लुतः--बढ़ा हुआ; विष-कषाय--विष से दूषित होने से; बिभीषण-- भयावनी; ऊर्मि: --लहरें; धावन्--उठती हुईं;धनुः-शतम्--एक सौ धनुष की दूरी; अनन्त-बलस्य--असीम बल वाले के लिए; किम्--क्या; तत्ू--वह |
भगवान् जब सर्प के सरोवर में कूदे तो सारे सर्प उत्तेजित हो उठे और तेजी से साँस लेने लगेजिसके कारण विष की मात्रा से जल और भी दूषित हो उठा।
भगवान् के प्रविष्ट होने के वेग सेसरोवर चारों ओर उमड़ने लगा और भयंकर विषैली लहरों ने एक सौ धनुष-दूरी तक की सारी भूमि को आप्लावित कर दिया।
किन्तु अनन्त शक्ति रखने वाले भगवान् के लिए यह तनिक भीविस्मयजनक नहीं है।
तस्य ह॒दे विहरतो भुजदण्डघूर्ण-वार्घोषमड़ वरवारणविक्रमस्य ।
आश्रुत्य तत्स्वसदनाभिभवं निरीक्ष्यचक्षु: श्रवा: समसरत्तदमृष्यमाण: ॥
८ ॥
तस्य--उनके; हृदे--सरोवर में; विहरत:ः--क्रीड़ा करते हुए; भुज-दण्ड--अपनी बलशाली भुजाओं को; घूर्ण--घुमाया;वा:--जल की; घोषम्--ध्वनि; अड्ड--हे राजा; वर-वारण--विशाल हाथी की तरह; विक्रमस्थय--शौर्यका; आश्रुत्य--सुनकर;तत्--वह; स्व-सदन--अपने निवास का; अभिभवम्--अतिक्रमण; निरीक्ष्य--देखकर; चक्षु:-श्रवा:--कालिय; समसरत् --आगे आया; तत्--उसे; अमृष्यमाण:--सहन न कर सकने से |
कालिय-सरोवर में कृष्ण अपनी विशाल बाहें घुमाते और तरह तरह से जल में गूँज पैदाकरते हुए, शाही हाथी की तरह क्रीड़ा करने लगे।
जब कालिय ने ये शब्द सुने तो वह जान गयाकि कोई उसके सरोवर में घुस आया है।
वह इसे सहन नहीं कर पाया अतः वह तुरन्त ही बाहरनिकला।
त॑ प्रेक्षणीयसुकुमारघनावदातंश्रीवत्सपीतवसन स्मितसुन्दरास्यम् ।
क्रीडन्तमप्रतिभयं कमलोदराडिंय्रसन्दश्य मर्मसु रुषा भुजया चछाद ॥
९॥
तम्--उनको; प्रेक्षणीय--देखने में आकर्षक; सु-कुमार--अत्यन्त सुकोमल; घन--बादल की तरह; अवदातम्--सफेदचमकता; श्रीवत्स-- श्रीवत्स चिह्न धारण किये; पीत--तथा पीला; वसनम्--वस्त्र; स्मित--हँसते हुए; सुन्दर--सुन्दर;आस्यम्--मुख वाले; क्रीडन्तम्-क्रीड़ा करते हुए; अप्रति-भयम्--अन्यों के भय के बिना; कमल--कमल के; उदर-- भीतरीभाग जैसा; अद्धप्रिमू--चरण; सन्दश्य--काटते हुए; मर्मसु--वक्षस्थल पर; रुषा--क्रोध से; भुजया--कुण्डली से; चछाद--लपेट लिया
कालिय ने देखा कि पीले रेशमी वस्त्र धारण किये श्रीकृष्ण अत्यन्त सुकोमल लग रहे थे,उनका आकर्षक शरीर सफेद बादलों की तरह चमक रहा था, उनके वक्षस्थल पर श्रीवत्स काचिन्ह था, उनका मुखमंडल सुमधुर हँसी से युक्त था और उनके चरण कमल के फूल के गुच्छों के सहृश थे।
भगवान् निडर होकर जल में क्रीड़ा कर रहे थे।
उनके अद्भुत रूप के बावजूदईर्ष्यालु कालिय ने क्रुद्ध होकर उनके वक्षस्थल पर डस लिया और फिर उन्हें अपनी कुंडली मेंपूरी तरह से लपेट लिया।
त॑ नागभोगपरिवीतमदृष्टचेष्ट -मालोक्य तत्प्रियसखा: पशुपा भृशार्ता: ।
कृष्णेउर्पितात्मसुहृदर्थकलत्रकामादुःखानुशोकभयमूढधियो निपेतु: ॥
१०॥
तम्--उनको; नाग--सर्प की; भोग--कुंडली के भीतर; परिवीतम्--घिरा हुआ; अद्ृष्ट-चेष्टम्--किसी प्रकार की गति नदिखलाते हुए; आलोक्य--देखकर; तत्-प्रिय-सखा: --उनके प्रिय सखा; पशु-पा:--ग्वाले; भूश-आर्ता:--अत्यधिकविचलित; कृष्णे--कृष्ण को; अर्पित--अर्पित किया; आत्म--स्वयं को; सु-हत्--अपने सम्बन्धी; अर्थ--सम्पत्ति; कलत्र--पत्नियाँ; कामाः--तथा सारी भोग्य वस्तुएँ; दुःख--पीड़ा से; अनुशोक--पश्चात्ताप; भय--तथा डर; मूढ--मोहित; धिय:--बुद्धि; निपेतु:-- भूमि पर गिर पड़े |
जब ग्वाल समुदाय के सदस्यों ने, जिन्होंने कृष्ण को अपना सर्वप्रिय मित्र मान रखा था,उन्हें नाग की कुण्डली में लिपटा हुआ और गतिहीन देखा तो वे अत्यधिक विचलित हो उठे।
उन्होंने कृष्ण को अपना सर्वस्व--अपने आप को, अपने परिवार, अपनी सम्पत्ति, अपनी पत्लियाँतथा सारे आनन्द--अर्पित कर रखा था।
भगवान् को कालिय सर्प के चंगुल में देखकर उनकीबुद्धि शोक, पश्चात्ताप तथा भय से भ्रष्ट हो गई और वे पृथ्वी पर गिर पड़े।
गावो वृषा वत्सतर्य: क्रन्दमाना: सुदुःखिता: ।
कृष्णे न्यस्तेक्षणा भीता रुदन्त्य इव तस्थिरे ॥
११॥
गाव:--गौवें; वृषा:--बैल; वत्सतर्य: --बछिया; क्रन्दमाना:--जोर से चिल्लाते हुए; सु-दुःखिता: --अत्यधिक दुखित;कृष्णे--कृष्ण पर; न्यस्त--गड़ा दिया; ईक्षणा: --अपनी नजर; भीता:-- भयभीत; रुदन्त्य: --रोते हुए; इब--मानो; तस्थिरे--बिना हिले-डुले खड़े रहे |
गौवें, बैल तथा बछड़ियाँ सभी अत्यधिक दुखारी होकर करुणापूर्वक कृष्ण को पुकारनेलगीं।
वे पशु उन पर अपनी दृष्टि गड़ाये हुए भयवश बिना हिले-डुले खड़े रहे मानो चिल्लानाचाह रहे हों परन्तु आघात के कारण अश्रु न बहा सकते हों।
अथ ब्रजे महोत्पातास्त्रिविधा ह्तिदारुणा: ।
उत्पेतुर्भुवि दिव्यात्मन्यासन्नभयशंसिन: ॥
१२॥
अथ--तब; ब्रजे--वृन्दावन में; महा-उत्पाता:--बड़े बड़े उपद्रव; त्रि-विधा:--तीन प्रकार के; हि--निस्सन्देह; अति-दारुणा:--अत्यन्त भयावने; उत्पेतु:--प्रकट हुए; भुवि--पृथ्वी पर; दिवि--आकाश में; आत्मनि--जीवों के शरीरों में;आसन्न--निकट; भय--खतरा; संशिन:--घोषणा करते हुए, सूचना देते हुए।
तब वृन्दावन क्षेत्र में सभी तीन प्रकार के--पृथ्वी पर होनेवाले, आकाश में होनेवाले तथाजीवों के शरीर में होनेवाले--भयावने अपशकुन प्रकट होने लगे जो तुरन्त आने वाले खतरे कीचेतावनी कर रहे थे।
तानालक्ष्य भयोद्विग्ना गोपा नन्दपुरोगमा: ।
विना रामेण गा: कृष्णं ज्ञात्वा चारयितुं गतम् ॥
१३॥
तैर्दुर्निमित्तैर्निधनं मत्वा प्राप्तमतद्विदः ।
तत्प्राणास्तन्मनस्कास्ते दुःखशोकभयातुरा: ॥
१४॥
आबालवृद्धवनिता: सर्वेडड़ पशुवृत्तय: ।
निर्जग्मुर्गोकुलाद्दीना: कृष्णदर्शनललालसा: ॥
१५॥
तान्ू--उन संकेतों को; आलक्ष्य--देखकर; भय-उद्विग्ना:--भय से विचलित; गोपा: --ग्वाले; नन्द-पुर:-गमा: --नन्द महाराजइत्यादि; विना--रहित; रामेण--बलराम के; गा: --गौवें; कृष्णम्--कृष्ण को; ज्ञात्वा--जानकर; चारयितुम्--चराने के लिए;गतम्--गया हुआ; तैः--उनसे; दुर्निमित्त:--अपशकुनों से; निधनम्--विनाश; मत्वा--मानकर; प्राप्तम्--प्राप्त किया; अतत्ू-विदः--उनके ऐश्वर्य को न जानने से; तत्-प्राणा: --उन्हें अपना प्राण मानकर; तत्-मनस्का:--उन्हीं में लीन मन; ते--वे;दुःख--दुख; शोक--शोक; भय--तथा भय से; आतुरा:--विह्ल; आ-बाल--बच्चों समेत; वृद्ध--बूढ़े लोग; वनिता:--तथास्त्रियाँ; सर्वे--सभी; अड्ग--हे राजा परीक्षित; पशु-वृत्तय:--जिस तरह वत्सल गाय अपने बछड़े के साथ करती है; निर्जग्मु:--बाहर चले गये; गोकुलात्--गोकुल से; दीना:--दीन समझकर; कृष्ण-दर्शन--कृष्ण को देखने के लिए; लालसा: --उत्सुक,लालायित।
इन अपशकुनों को देखकर नन्द महाराज तथा अन्य ग्वाले भयभीत थे क्योंकि उन्हें ज्ञात थाकि उस दिन कृष्ण अपने बड़े भाई बलराम के बिना गाय चराने गये थे।
चूँकि उन्होंने कृष्ण कोअपना प्राण मानते हुए अपने मन उन्हीं पर वार दिये थे क्योंकि वे उनकी महान् शक्ति तथा ऐ श्वर्यसे अनजान थे।
इस तरह उन्होंने इन अपशकुनों से यह अर्थ निकाला कि कृष्ण की मृत्यु हो गई है और वे दुःख, पश्चात्ताप तथा भय से अभिभूत हो गये थे।
बालक, स्त्रियाँ तथा वृद्ध पुरुषों समेतवृन्दावन के सारे निवासी कृष्ण को उसी तरह मानते थे जिस तरह गाय अपने निरीह नवजातबछड़े को मानती है।
इस तरह ये दीन-दुखी लोग उन्हें ढूँढ़ने के इरादे से गाँव से बाहर दौड़ पड़े।
तांस्तथा कातरान्वीक्ष्य भगवान्माधवो बल: ।
प्रहस्य किझ्ञिन्नोवाच प्रभावज्ञोडनुजस्य सः ॥
१६॥
तानू्--उन्हें; तथा--इस तरह; कातरान्ू--व्याकुल; वीक्ष्य--देखकर; भगवान्-- भगवान्; माधव:--समस्त योग विद्या केस्वामी; बल:--बलराम; प्रहस्य--मुसकाते हुए; किश्ञित्ू-- थोड़ा-सा; न--नहीं; उबाच--कहा; प्रभाव-ज्ञ:--बल को जाननेवाले; अनुजस्य--छोटे भाई के; सः--उन्होंने |
समस्त दिव्य ज्ञान के स्वामी भगवान् बलराम हँसने लगे और वृन्दावन-वासियों को इस तरहव्याकुल देखकर कुछ भी नहीं बोले क्योंकि उन्हें अपने छोटे भाई के असाधारण बल का पताथा।
तेन्वेषमाणा दयितं कृष्णं सूचितया पद: ।
भगवललक्षणैर्जग्मु; पदव्या यमुनातटम् ॥
१७॥
ते--वे; अन्वेषमाणा: --ढूँढ़ते हुए; दयितम्--अपने प्रियतम; कृष्णम्--कृष्ण को; सूचितया--चिन्हित ( पथ ); पदैः --पैर केनिशानों से; भगवत्-लक्षणै: -- भगवान् के चिह्नों से; जग्मु:--गये; पदव्या--रास्ते से होकर; यमुना-तटम्ू--यमुना के किनारेतक।
वृन्दावन के निवासी कृष्ण के पदचिन्हों का अनुसरण करते हुए अपने सर्वप्रिय कृष्ण कीखोज में यमुना के किनारे की ओर दौड़े चले गये क्योंकि उन पदचिन्हों में भगवान् के अनूठेचिन्ह थे।
ते तत्र तत्राब्जयवाड्लु शाशनि-ध्वजोपपन्नानि पदानि विएपते: ।
मार्गे गवामन्यपदान्तरान्तरेनिरीक्षमाणा ययुरड् सत्वरा: ॥
१८॥
ते--वे; तत्र तत्र--यहाँ वहाँ; अब्ज--कमल के फूल; यव--जौ; अद्डू श--हाथी हाँकने का अंकुश; अशनि--वज्; ध्वज--तथा पताका से; उपपन्नानि--विभूषित; पदानि--पदचिह्नों को; विट््-पतेः--ग्वाल जाति के स्वामी, भगवान् कृष्ण के; मार्गे--रास्ते में; गवाम्--गौवों के; अन्य-पद--तथा अन्य पदचिह्न; अन्तर-अन्तरे--बीच बीच में; निरीक्षमाणा: -- देखकर; युयु:--गये; अड़--हे राजन; स-त्वरा:ः--तेजी से।
समस्त ग्वाल समुदाय के स्वामी भगवान् कृष्ण के पदचिन्ह कमल के फूल, जौ, हाथी केअंकुश, वज्ज तथा पताका से युक्त थे।
हे राजा परीक्षित, मार्ग में गौवों के पदचिन्हों के बीच बीचमें उनके पदचिन्हों को देखते हुए वृन्दावन के निवासी तेजी से दौड़े चले गये।
अन्तर्ईदे भुजगभोगपरीतमारात्कृष्णं निरीहमुपलभ्य जलाशयान्ते ।
गोपांश्व मूढधिषणान्परितः पशूश् सड़क्रन्दतः 'परमकश्मलमापुरार्ता: ॥
१९॥
अन्त:--भीतर; हृदे--सरोवर के; भुजग--सर्प के; भोग--शरीर के भीतर; परीतम्--लिपटे; आरात्--दूर से ही; कृष्णम्--कृष्ण को; निरीहम्--निश्चेष्ट; उपलभ्य--देखकर; जल-आशय--जलाशय के; अन्ते-- भीतर; गोपान्--ग्वालबालों को; च--तथा; मूढ-धिषणान्--अचेत; परित:--घेरकर; पशून्--पशुओं को; च--तथा; सड्क्रन्दत:ः--चिल्लाते हुए; परम-कश्मलम्--महानतम मोह; आपु:--अनुभव किया; आर्ता:--पीड़ित होने से ।
ज्योंही वे यमुना नदी के किनारे की ओर भागे जा रहे थे त्योंही उन्होंने दूर से देखा कि कृष्णसरोवर में काले साँप की कुण्डली में निश्चेष्ट पड़े हैं।
उन्होंने यह भी देखा कि सारे ग्वालबालमूछित होकर पड़े हैं और सारे पशु उनके चारों ओर खड़े होकर कृष्ण के लिए रम्भा रहे हैं।
यहहृए्य देखकर वृन्दावनवासी बेदना तथा भ्रम के कारण विहल हो उठे।
गोप्योनुरक्तमनसो भगवत्यनन्तेतत्सौहदस्मितविलोकगिरः स्मरन्त्य: ।
ग्रस्तेडहिना प्रियतमे भूशदुःखतप्ता:शूज्यं प्रियव्यतिहतं दहशुस्त्रिलोकम् ॥
२०॥
गोप्य:--गोपियाँ; अनुरक्त-मनस:ः--उनसे अनुरक्त मनवाली; भगवति-- भगवान् में; अनन्ते-- अनन्त; तत्--उनका; सौहद--प्रेमपूर्ण; स्मित--मुसकान; विलोक--चितवन; गिर: --तथा वचन; स्मरन्त्य:--स्मरण कर करके; ग्रस्ते--पकड़े जाकर;अहिना--सर्प द्वारा; प्रिय-तमे--सबसे प्यारे; भूश--अत्यन्त; दुःख--पीड़ा से; तप्ता:--पीड़ित; शून्यम्--रिक्त; प्रिय-व्यतिहतम्--अपने प्रिय से विलग होकर; दहशुः--उन्होंने देखा; त्रि-लोकम्--तीनों लोकों ( सम्पूर्ण ब्रह्माण्ड ) को |
जब युवती गोपियों ने, जिनके मन निरंतर अनन्त भगवान् कृष्ण में अनुरक्त रहते थे, देखाकि वे कालिय के चंगुल में हैं, तो उन्हें उनकी मित्रता, उनकी मुसकान-भरी चितवन तथा उनकेबचनों का स्मरण हो आया।
अत्यन्त शोक से संतप्त होने के कारण उन्हें सारा ब्रह्माण्ड शून्य(रिक्त ) दिखाई पड़ने लगा।
ताः कृष्णमातरमपत्यमनुप्रविष्टांतुल्यव्यथा: समनुगृहा शुचः स्त्रवन्त्य: ।
तास्ता ब्रजप्रियक था: कथयन्त्य आसन्कृष्णाननेर्पितहशो मृतकप्रतीका: ॥
२१॥
ताः--वे; कृष्ण-मातरम्--कृष्ण की माता ( यशोदा ); अपत्यम्--अपने पुत्र पर; अनुप्रविष्टाम्--अपनी दृष्टि टिकाये; तुल्य--समान रूप से; व्यथा:--व्यधित; समनुगृह्म --हृढ़तापूर्वक पकड़कर; शुचच:ः--शोक की बाढ़; स्त्रवन्त्य:--उमड़ते हुए; ता: ता:--उनमें से हर शब्द को; ब्रज-प्रिय--त्रज के परम प्रिय की; कथा:--कथाएँ; कथयन्त्य:--कहते हुए; आसनू--वे खड़ी रहीं;कृष्ण-आनने--कृष्ण के मुख पर; अर्पित--चढ़ायी, अर्पित की हुई; हशः--अपनी आँखें; मृतक--शव; प्रतीका:--तुल्य |
यद्यपि प्रौढ़ गोपियों को उन्हीं के बराबर पीड़ा थी और उनमें शोकपूर्ण अश्रुओं की झड़ीलगी हुई थी किन्तु उन्होंने बलपूर्वक कृष्ण की माता को पकड़े रखा, जिनकी चेतना पूर्णतयाअपने पुत्र में समा गयी थी।
ये गोपियाँ शवों की तरह खड़ी रहकर, अपनी आँखें कृष्ण के मुखपर टिकाये, बारी बारी से ब्रज के परम लाड़ले की लीलाएँ कहे जा रही थीं।
कृष्णप्राणान्निर्विशतो नन्दादीन्वी क्ष्य तं हृदम् ।
प्रत्यषेधत्स भगवात्राम: कृष्णानुभाववित् ॥
२२॥
कृष्ण-प्राणान्--जिनके प्राण कृष्ण थे; निर्विशत:--प्रवेश करते; नन्द-आदीन्--नन्द महाराज इत्यादि को; वीक्ष्य--देखकर;तम्--उस; हृदम्--सरोवर में; प्रत्यषेधत्ू--मना किया; सः--वे; भगवान्-- भगवान्; राम: -- बलराम ने; कृष्ण--कृष्ण की;अनुभाव--शक्ति; वित्ू-- भलीभाँति जानते हुए
तत्पश्चात् भगवान् बलराम ने देखा कि नन्द महाराज तथा कृष्ण को अपना जीवन अर्पितकरनेवाले अन्य ग्वाले सर्प-सरोवर में प्रवेश करने जा रहे हैं।
भगवान् होने के नाते बलराम कोकृष्ण की वास्तविक शक्ति का पूरा पूरा ज्ञान था अतएव उन्होंने उन सबों को रोका।
इत्थम्स्वगोकुलमनन्यगतिं निरीक्ष्यसस्त्रीकुमारमतिदु:खितमात्महेतो: ।
आज्ञाय मर्त्यपदवीमनुवर्तमान: थित्वा मुहूर्तमुदतिष्ठदुरड्रबन्धात् ॥
२३॥
इत्थम्--इस तरह से; स्व-गोकुलम्ू--गोकुल के अपने कुल में; अनन्य-गतिम्ू--( उनके अतिरिक्त ) कोई अन्य गन्तव्य याआश्रय न होने से; निरीक्ष्य--देखकर; स-स्त्री--स्त्रियों समेत; कुमारम्--तथा बच्चे; अति-दुःखितम्-- अत्यन्त दुखी; आत्म-हेतो:--अपने कारण; आज्ञाय-- जानकर; मर्त्य-पदवीम्--मरने वालों की तरह; अनुवर्तमान: --अनुकरण करते हुए; स्थित्वा--रहे आकर; मुहूर्तम्--कुछ काल तक; उदतिष्ठत्--उठ खड़े हुए; उरड़--सर्प के; बन्धात्ू--बन्धन से |
भगवान् कुछ काल तक सामान्य मर्त्यप्राणी के व्यवहार का अनुकरण करते हुए सर्प कीकुंडली के भीतर पड़े रहे।
किन्तु जब उन्हें इसका भान हुआ कि उनके गोकुल ग्राम की स्त्रियाँ,बच्चे तथा अन्य निवासी अपने जीवन के एकमात्र आधार उनके प्रेम के कारण विकट दुखी हैं,तो वे कालिय सर्प के बन्धन से तुरन्त उठ खड़े हुए।
तत्प्रथ्यमानवपुषा व्यथितात्म भोग-स्त्यक्त्वोन्नमय्य कुपितः स्वफणान्भुजड़: ।
तस्थौ श्वसज्छूसनरन्श्रविषाम्बरीष-स्तब्धेक्षणोल्मुकमुखो हरिमीक्षमाण: ॥
२४॥
तत्--उनके ( कृष्ण के ); प्रथ्यमान--बढ़ते हुए; वपुषा--दिव्य शरीर के द्वारा; व्यधित--पीड़ित; आत्म--अपना; भोग: --शरीर; त्यक्त्वा--उन्हें त्यागकर; उन्नमय्य--ऊँचे उठते हुए; कुपित:--क्रुद्ध; स्व-फणान्ू--अपने फनों को; भुजड़--सर्प;तस्थौ--चुपचाप खड़ा रहा; ध्वसन्--तेजी से साँस लेता हुआ, फुफकारता; श्वसन-रन्ध्र--उसके नथुने; विष-अम्बरीष--विषउबालने के दो पात्रों की तरह; स्तब्ध--स्थिर; ईक्षण--उसकी आँखें; उल्मुक--लपटों की तरह; मुख:--उसका मुँह; हरिम्--भगवान् को; ईक्षमाण: --देखता हुआ।
जब भगवान् के शरीर का विस्तार होने से कालिय की कुंडली दुखने लगी तो उसने उन्हेंछोड़ दिया।
तब वह सर्प बहुत ही क्रुद्ध होकर अपने फनों को ऊँचे उठाकर स्थिर खड़ा हो गयाऔर जोर जोर से फुफकारने लगा।
उसके नथुने विष पकाने के पात्रों जैसे लग रहे थे और उसकेमुखपर स्थित घूरती आँखें आग की लपटों की तरह लग रही थीं।
इस तरह उस सर्प ने भगवान्पर नजर डाली।
तं जिहया द्विशिखया परिलेलिहानंद्वे सृक्वणी हातिकरालविषाग्निदृष्टिम् ।
क्रीडन्नमुं परिससार यथा खगेन्द्रोबश्राम सोप्यवसरं प्रसमीक्षमाण: ॥
२५॥
तम्--उसको, कालिय को; जिहया--अपनी जीभ से; द्वि-शिखया--दोमुही; परिलेलिहानम्--बारबार चाटता हुआ; द्वे--दो;सृक्वणी--होंठ; हि--निस्सन्देह; अति-कराल--अत्यन्त भयावने; विष-अग्नि--विषैली अग्नि से पूर्ण; दृष्टिमू--जिसकी दृष्टि;क्रीडन्--खेलती हुई; अमुम्--उसको; परिससार--चारों ओर घूम गई; यथा--जिस तरह; खग-दइन्द्र:--पक्षिराज गरुड़;बक्राम--चारों ओर घूमा; सः--कालिय; अपि-- भी; अवसरम्--( प्रहार करने का ) अवसर; प्रसमीक्षमाण: --धध्यानपूर्वकदेखते हुए, की ताक में
कालिय बारम्बार अपनी दोमुही जीभ से अपने होंठों को चाटता और विषैली विकरालअग्नि से पूर्ण अपनी दृष्टि से कृष्ण को घूरता जा रहा था।
किन्तु कृष्ण ने मानो खेल-खेल में हीउसका उसी तरह चक्कर लगाया जिस तरह गरुड़ सर्प से खिलवाड़ करता है।
प्रतिक्रिया के रूपमें, कालिय भी उनके साथ साथ घूमता जाता था और भगवान् को काटने का अवसर ढूँढ़ रहाथा।
एवं परिभ्रमहतौजसमुन्नतांस-मानम्य तत्पृथुशिर:स्वधिरूढ आद्य: ।
तन्मूर्धरत्ननिकरस्पर्शातिताम्र-पादाम्बुजोडखिलकलादिगुरुर्ननर्त ॥
२६॥
एवम्--इस तरह; परिभ्रम-- भगवान् द्वारा उसके चारों ओर चक्कर लगाने के कारण; हत--विनष्ट; ओजसम्--जिसका बल;उन्नत--ऊपर उठा; अंसम्ू--जिसके कंधे; आनम्य--झुकने के लिए बाध्य करके; तत्--उसके; पृथु-शिरःसु--चौड़े सिर पर;अधिरूढ:--चढ़कर; आद्य: --हर वस्तु के मूल; तत्--उसके ; मूर्थ--सिरों पर; रल-निकर--अनेकानेक रल; स्पर्श--छूने से;अति-ताम्र--अत्यधिक लाल हुए; पाद-अम्बुज:--चरणकमल; अखिल-कला--समस्त कलाओं के; आदि-गुरु:--मूल गुरु;ननर्त--नाचने लगे
लगातार चक्कर लगाते लगाते सर्प के बल को बुरी तरह क्षीण करके, समस्त वस्तुओं के मूलश्रीकृष्ण ने कालिय के उभरे हुए कन्धों को नीचे दबा दिया और उसके चौड़े फनों पर चढ़ गये।
इस तरह समस्त कलाओं के आदि गुरू भगवान् श्रीकृष्ण नृत्य करने लगे और सर्प के फनों परस्थित असंख्य मणियों के स्पर्श से उनके चरण गहरे लाल रंग के हो गये।
त॑ नर्तुमुद्यतमवेक्ष्य तदा तदीय-गन्धर्वसिद्धमुनिचारणदेववध्व: ।
प्रीत्या मृदृड़पणवानकवाद्यगीत-पुष्पोपहारनुतिभि: सहसोपसेदु: ॥
२७॥
तम्--उनको; नर्तुमू--नाचने में; उद्यतम्--लगा हुआ; अवेक्ष्य--देखकर; तदा--तब; तदीय--उनके सेवक; गन्धर्व-सिद्ध--गन्धर्व तथा सिद्धगण; मुनि-चारण--ऋषि तथा चारण; देव-वध्व: --देवपत्लियाँ; प्रीत्या--हर्षपूर्वक; मृदड़-पणव-आनक--विभिन्न प्रकार के ढोल; वाद्य--बाजों समेत; गीत--गीत; पुष्प--फूल; उपहार--अन्य भेंटें; नुतिभिः --तथा स्तुतियों द्वारा;सहसा--तुरन्त; उपसेदु:--आ गये।
भगवान् उनको नाचते देखकर स्वर्गलोक के उनके सेवक--गन्धर्व, सिद्ध, मुनि, चारणतथा देवपत्नियाँ--वहाँ तुरन्त आ गये।
वे मृदंग, पणव तथा आनक जैसे ढोल बजा-बजाकरकृष्ण के नृत्य का साथ देने लगे।
उन्होंने गीत, फूल तथा स्तुतियों की भेंटें भी दीं।
यद्यच्छिरो न नमतेड़् शतैकशीर्ष्णस्तत्तन्ममर्द खरदण्डधरोड्प्रिपातैः ।
क्षीणायुषो भ्रमत उल्बणमास्यतोसूड्ःनस्तो वमनन््परमकश्मलमाप नाग: ॥
२८॥
यत् यत्--जो जो; शिर:--सिर; न नमते--नहीं झुकते थे; अड्र--हे राजा परीक्षित; शत-एक-शीष््:-- १०१ सिरों बाला; तत्तत्--उन उन को; ममर्द--कुचल डाला; खर--दुष्टों को; दण्ड--सजा; धरः--देने वाले भगवान्; अद्धघ्रि-पातैः-- अपने पैरोंके प्रहार से; क्षीण-आयुष: --आयु क्षीण हो रहे कालिय का; भ्रमत:--जो अब भी घूम रहा था; उल्बणम्-- भयावह;आस्यतः--मुखों से; असृक् --रक्त; नस्तः--नथुनों से; वमन्ू--कै; परम--अत्यन्त; कश्मलमू--कष्ट; आप--अनुभव किया;नाग: --सर्प ने
हे राजनू, कालिय के १०१ सिर थे और यदि इनमें से कोई एक नहीं झुकता था, तो क्रूरकृत्य करनेवालों को दंड देनेवाले भगवान् श्रीकृष्ण अपने पाद-प्रहार से उस उद्ण्ड सिर कोकुचल देते थे।
जब कालिय मृत्यु के निकट पहुँच गया तो वह अपने सिरों को चारों ओर घुमानेलगा और अपने मुखों तथा नथुनों से बुरी तरह से रक्त वमन करने लगा।
इस तरह सर्प कोअत्यन्त पीड़ा तथा कष्ट का अनुभव होने लगा।
तस्याक्षिभिर्गरलमुद्ठमतः शिरःसुयद्यत्समुन्नमति नि: श्रसतो रुषोच्चै: ।
नृत्यन्पदानुनमयन्दमयां बभूवपुष्पै: प्रपृूजित इवेह पुमान्पुराण: ॥
२९॥
तस्य--उसकी; अक्षिभि: --आँखों से; गरलम्ू--विषैला कूड़ा; उद्यमतः--वमन करता हुआ; शिरः:सु--सिरों में से; यत् यत्--जो जो; समुन्नमति--ऊपर उठता; नि: ध्वसत:ः -- धवास लेता हुआ; रुषा--क्रोध से; उच्चै:--काफी अधिक; नृत्यन्ू--नाचते हुए;पदा--अपने पाँव से; अनुनमयन्--झुकाते हुए; दमयाम् बभूव--दमन कर दिया; पुष्पैः--फूलों से; प्रपूजित:--पूजा जाकर;इब--सहश; इह--इस अवसर पर; पुमान्--पुरुष; पुराण: --आदि।
कालिय अपनी आँखों से विषैला कीचड़ निकालते हुए रह रहकर अपने किसी एक सिर कोऊपर उठाने का दुस्साहस करके क्रोध से फुफकारता था।
तब भगवान् उसपर नाचने लगते औरअपने पाँव से नीचे झुकाकर उसका दमन कर देते।
देवताओं ने इन सभी प्रदर्शनों को उचितअवसर जानकर आदि पुरुष की पूजा पुष्पवर्षा द्वारा की।
तच्चित्रताण्डवविरुग्गफणासहस्त्रो रक्त मुखैरुरुू वमन्नूप भग्नगात्र: ।
स्मृत्वा चराचरगुरुं पुरुष पुराणंनारायणं तमरणं मनसा जगाम ॥
३०॥
तत्--उनके; चित्र--विस्मयकारी; ताण्डब--शक्तिशाली नृत्य से; विरुग्ग-- भग्न; फणा-सहस्त्र: --अपने एक हजार फन;रक्तमू--रक्त; मुखै:--मुख से; उरू--अत्यधिक; वमन्--उगलते हुए; नृप--हे राजा परीक्षित; भग्न-गात्र:--कुचले अंगों वाला;स्मृत्वा--स्मरण करके; चर-अचर--सारे जड़ तथा जंगम प्राणियों के; गुरुम्-गुरु ; पुरुषम्--पुरुष; पुराणम्--प्राचीन;नारायणम्--नारायण को; तम्--उन; अरणम्--शरण के लिए; मनसा--मन में
हे राजा परीक्षित, भगवान् कृष्ण के द्वारा विस्स्मयजनक शक्तिशाली नृत्य करने से कालियके सभी एक हजार फण कुचलकर टूट गये।
तब अपने मुखों से बुरी तरह रक्त वमन करते हुएसर्प ने श्रीकृष्ण को समस्त चराचर के शाश्रत स्वामी आदि भगवान् श्रीनारायण के रूप में'पहचाना।
इस तरह कालिय ने मन ही मन भगवान् की शरण ग्रहण कर ली।
कृष्णस्य गर्भजगतोतिभरावसच्नंपार्णिणप्रहारपरिरुग्गफणातपत्रम् ।
इृष्ठाहिमाद्यमुपसेदुरमुष्य पत्यआर्ता: एलथद्वसनभूषणकेशबन्धा: ॥
३१॥
कृष्णस्य--कृष्ण के; गर्भ--उदर में; जगत: --सारा ब्रह्माण्ड पाया जाता है; अति-भर--अत्यधिक भार से; अवसन्नम्-- थकाहुआ; पार्ण्िणि--एड़ियों के; प्रहार--चोट से; परिरुग्न--क्षत-विक्षत; फणा--फन; आतपत्रम्--छातों की तरह; हृध्ला--देखकर;अहिम्--सर्प को; आद्यम्ू--आदि भगवान् के; उपसेदु:--निकट आयी; अमुष्य--कालिय की; पत्य:--पत्नयाँ; आर्ता:--पीड़ित; श्लथत्--बिखरे हुए; वसन--वस्त्र; भूषण-- आभूषण; केश-बन्धा: --तथा केशपाश |
जब कालिय की पत्नियों ने देखा कि अखिल ब्रह्माण्ड को अपने उदर में धारण करनेवालेभगवान् कृष्ण के अत्यधिक भार से सर्प कितना थक गया है और किस तरह कृष्ण की एडियोंके प्रहार से कालिय के छाते जैसे फन छिन्न-भिन्न हो गये हैं, तो उन्हें अतीव पीड़ा हुईं।
तब अपनेवस्त्र, आभूषण तथा केश बिखराये हुए वे आदि भगवान् के निकट आईं।
तास्तं सुविग्नमनसोथ पुरस्कृतार्भा:काय॑ निधाय भुवि भूतपतिं प्रणेमु: ।
साध्व्य: कृताझ्लिपुटा: शमलपस्य भर्तुर्मोक्षेप्सव: शरणदं शरणं प्रपन्ना: ॥
३२॥
ताः--वे, कालिय की पत्याँ; तम्--उसको; सु-विग्न--अत्यन्त उद्विग्न; मनस:--मन; अथ--तब; पुरः-कृत--सामने करके;अर्भा:--अपने बच्चे; कायम्ू--अपने शरीर को; निधाय--रखकर; भुवि-- भूमि पर; भूत-पतिम्--समस्त प्राणियों के स्वामीको; प्रणेमु:ः--प्रणाम किया; साध्व्य: --साध्वी स्त्रियाँ; कृत-अज्जञलि-पुटा:--हाथ जोड़कर; शमलस्य--पापी; भर्तुः--पति की;मोक्ष--मुक्ति; ईप्सव:--इच्छा करती हुईं; शरण-दम्--शरण देनेवाले; शरणम्--शरण के लिए; प्रपन्ना:--निकट आईंअत्यन्त उद्दिग्नमना
उन साध्वी स्त्रियों ने अपने बच्चों को अपने आगे कर लिया और तबसमस्त प्राणियों के स्वामी के समक्ष भूमि पर गिरकर साष्टांग प्रणाम किया।
वे अपने पापी पतिका मोक्ष एवं परम शरणदाता भगवान् की शरण चाहती थीं अतः नम्नता से हाथ जोड़े हुए वेउनके निकट आईं।
नागपलय ऊचुःन्याय्यो हि दण्ड: कृतकिल्बिषेस्मि-स्तवावतार: खलनिग्रहाय ।
रिपो: सुतानामपि तुल्यदृष्टि-ध॑त्से दमं फलमेवानुशंसन् ॥
३३॥
नाग-पल्य: ऊचु:--नाग की पत्नियों ने कहा; न्याय्य:--सही न्यायपूर्ण; हि--निस्सन्देह; दण्ड:--दण्ड, सजा; कृत-किल्बिषे--अपराध करनेवाले के लिए; अस्मिनू--इस व्यक्ति ने; तब--आपका; अवतार:--अवतार; खल--दुष्टों के;निग्रहाय--दमन के लिए; रिपो:--शत्रु पर; सुतानामू--अपने ही पुत्रों पर; अपि--भी; तुल्य-दृष्टि:--समान दृष्टि रखनेवाला;धत्से--आप देते हैं; दमम्--दंड; फलम्ू--फल; एव--निस्सन्देह; अनुशंसम्--विचार करते हुए।
कालिय सर्प की पत्नियों ने कहा : इस अपराधी को जो दण्ड मिला है, वह निस्संदेह उचितही है।
आपने इस जगत में ईर्ष्यालु तथा क्रूर पुरुषों का दमन करने के लिए ही अवतार लिया है।
आप इतने निष्पक्ष हैं कि आप शत्रुओं तथा अपने पुत्रों को समान भाव से देखते हैं क्योंकि जबआप किसी जीव को दण्ड देते हैं, तो आप यह जानते होते हैं कि अन्ततः यह उसके हित के लिएहै।
अनुग्रहोयं भवतः कृतो हि नोदण्डोसतां ते खलु कल्मषापह: ।
यहन्दशूकत्वममुष्य देहिनःक्रोधोपि तेउनुग्रह एवं सम्मतः ॥
३४॥
अनुग्रह:--कृपा; अयम्ू--यह; भवतः--आपके द्वारा; कृत:--की गई; हि--निस्सन्देह; न:--हम पर; दण्ड:--दण्ड, सजा;असतामू--दुष्टों का; ते--आपके द्वारा; खलु--निस्सन्देह; कल्मष-अपह: --उनके कल्मष को दूर करते हुए; यत्--क्योंकि;दन्दशूकत्वम््--सर्प के रूप में प्रकट होने की अवस्था; अमुष्य--इस कालिय की; देहिन:--बद्धजीव; क्रोध: --क्रोध; अपि--भी; ते--आपकी; अनुग्रह:--कृपा; एव--वास्तव में; सम्मतः--स्वीकार है |
आपने जो कुछ यहाँ किया है, वह वास्तव में हम पर अनुग्रह है क्योंकि आप दुष्टों को जोदण्ड देते हैं वह निश्चित रूप से उनके कल्मष को दूर कर देता है।
चूँकि यह बद्धजीव हमारा पतिइतना पापी है कि इसने सर्प का शरीर धारण किया है अतएवं उसके प्रति आपका यह क्रोधउसके प्रति आपकी कृपा ही समझी जानी चाहिए।
तपः सुतप्तं किमनेन पूर्वनिरस्तमानेन च मानदेन ।
धर्मोथ वा सर्वजनानुकम्पयायतो भवांस्तुष्यति सर्वजीवः ॥
३५॥
तपः--तपस्या; सु-तप्तम्--ठीक से की गई; किम्--क्या; अनेन--इस कालिय द्वारा; पूर्वम्--पूर्वजन्मों में; निरस्त-मानेन--मिथ्या अहंकार से रहित होने से; च--तथा; मान-देन--अन्यों का सम्मान करते हुए; धर्म:--धार्मिक कर्तव्य; अथ वा--याअन्य कुछ; सर्व-जन--सभी लोगों के लिए; अनुकम्पया--अनुक म्पापूर्वक; यतः--जिससे; भवान्-- आप; तुष्यति--प्रसन्न होतेहैं; सर्व-जीव:--समस्त जीवों के प्राणाधार।
क्या हमारे पति ने पूर्वजन्म में गर्वरहित होकर तथा अन्यों के प्रति आदरभाव से पूरित होकरसावधानी से तपस्या की थी? क्या इसीलिए आप उससे प्रसन्न हैं? अथवा क्या उसने किसीपूर्वजन्म में समस्त जीवों के प्रति दयापूर्वक धार्मिक कर्तव्य पूरा किया था और क्या इसीलिएसमस्त जीवों के प्राणाधार आप अब उससे सन्तुष्ट हैं ?कस्यानुभावोस्य न देव विद्दाहे तवाडूप्रिरेणुस्परशाधिकारः ।
यद्वाज्छया श्रीर्ललनाचरत्तपोविहाय कामान्सुचिरं धृतब्रता ॥
३६॥
कस्य--किसका; अनुभाव: --फल; अस्य--इस सर्प का; न--नहीं; देव--हे प्रभु; विद्यह--हम जानती हैं; तब--आपके;अड्प्रि--चरणकमलों की; रेणु--धूलि का; स्परश--स्पर्श करने के लिए; अधिकार:--पात्रता, योग्यता; यत्ू--जिसके लिए;वाब्छया--इच्छा से; श्री:--लक्ष्मीजी ने; ललना--( सर्वश्रेष्ठ ) स्त्री; आचरत्--सम्पन्न की; तप:ः--तपस्या; विहाय--छोड़कर;कामान्--सारी इच्छाओं को; सु-चिरम्--दीर्घकाल तक; धृत--धारण किया; ब्रता--अपना ब्रत, प्रतिज्ञा
हे प्रभु, हम नहीं जानतीं कि इस कालिय नाग ने किस तरह आपके चरणकमलों की धूलको स्पर्श करने का सुअवसर प्राप्त किया।
इसके लिए तो लक्ष्मीजी ने अन्य सारी इच्छाएँत्यागकर कठोर ब्रत धारण करके सैकड़ों वर्षों तक तपस्या की थी।
न नाकपृष्ठं न च सार्वभौम॑न पारमेष्ठयं न रसाधिपत्यम् ।
न योगसिद्धीरपुनर्भव॑ वावाउछन्ति यत्पादरज:प्रपन्ना: ॥
३७॥
न--नहीं; नाक-पृष्ठम्--स्वर्ग; न च--न तो; सार्व-भौमम्--सर्वोपरि सत्ता; न--नहीं; पारमेष्ठयम्--ब्रह्मा का सर्वोच्च पद; न--नहीं; रस-अधिपत्यम्ू--पृथ्वी के ऊपर शासन; न--नहीं; योग-सिद्धी:--योग की सिद्धियाँ; अपुन:-भवम्--पुनर्जन्म सेछुटकारा; वा--अथवा; वाउ्छन्ति--इच्छा करते हैं; यत्--जिसके; पाद--चरणकमलों की; रज:-- धूल; प्रपन्ना:--जिन््होंनेप्राप्त कर ली है।
जिन्होंने आपके चरणकमलों की धूल प्राप्त कर ली है वे न तो स्वर्ग का राज्य, न असीमवर्चस्व, न ब्रह्मा का पद, न ही पृथ्वी का साम्राज्य चाहते हैं।
उन्हें योग की सिद्ध्रियों अथवा मोक्षतक में कोई रुचि नहीं रहती।
तदेष नाथाप दुरापमन्यै-स्तमोजनिः क्रोधवशोप्यहीशः ।
संसारचक्रे भ्रमतः शरीरिणोयदिच्छत: स्याद्विभवः समक्ष: ॥
३८ ॥
तत्--वह; एषः--यह कालिय; नाथ--हे प्रभु; आप--प्राप्त कर चुका है; दुरापमू--दुष्प्राप्प; अन्यैः --अन्यों के द्वारा; तमः-जनि:--तमोगुण में उत्पन्न; क्रोध-वश: --क्रोध के वशीभूत; अपि-- भी; अहि-ईशः --सर्पराज; संसार-चक्रे --संसार के चक्करमें; भ्रमत:--घूमता हुआ; शरीरिण: --जीवधारियों के लिए; यत्--जिससे ( चरणों की धूल से ); इच्छत:--भौतिक इच्छाओंवाला; स्थातू--प्रकट करता है; विभव:--सारे ऐश्वर्य; समक्ष:ः--अपने सामने |
हे प्रभु, यद्यपि इस सर्पराज कालिय का जन्म तमोगुण में हुआ है और यह क्रोध के वशीभूत है किन्तु इसने अन्यों के लिए जो दुष्प्राप्य है उसे भी प्राप्त कर लिया है।
इच्छाओं से पूर्ण होकरजन्म-मृत्यु के चक्कर में भ्रमण करनेवाले देहधारी जीव आपके चरणकमलों की धूल प्राप्त करनेसे ही अपने समक्ष सारे आशीर्वादों को प्रकट होते देख सकते हैं।
नमस्तुभ्यं भगवते पुरुषाय महात्मने ।
भूतावासाय भूताय पराय परमात्मने ॥
३९॥
नमः--नमस्कार; तुभ्यम्ू--आपको; भगवते-- भगवान्; पुरुषाय--परमात्मा रूप में भीतर उपस्थित; महा-आत्मने--सर्वव्यापी;भूत-आवासाय--भौतिक तत्त्वों ( क्षिति, जल, पावक इत्यादि ) के आश्रय रूप; भूताय--सृष्टि के भी पूर्व से विद्यमान;'पराय--परम कारण को; परम-आत्मने-- भौतिक कारणों से परे।
हे भगवन्, हम आपको सादर नमस्कार करती हैं।
यद्यपि आप सभी जीवों के हृदयों मेंपरमात्मा रूप में स्थित हैं, तो भी आप सर्वव्यापक हैं।
यद्यपि आप सभी उत्पन्न भौतिक तत्त्वों केआदि आश्रय हैं किन्तु आप उनके सृजन के पूर्व से विद्यमान हैं।
यद्यपि आप हर वस्तु के कारणहैं किन्तु परमात्मा होने से आप भौतिक कार्य-कारण से परे हैं।
ज्ञानविज्ञाननीधये ब्रह्मणेउनन्तशक्तये ।
अगुणायाविकाराय नमस्ते प्राकृताय च ॥
४०॥
ज्ञान--चेतना; विज्ञान--तथा आध्यात्मिक शक्ति के; निधये--सागर का; ब्रह्मणे -- परब्रह्म को; अनन्त-शक्तये -- असीमशक्तिमान को; अगुणाय--द्रव्य के गुणों से न प्रभावित होनेवाले को; अविकाराय-- भौतिक विकार न होनेवाले को; नम:--नमस्कार; ते--आपको; प्राकृताय--प्रकृति के आदि संचालक; च--तथा।
हे परम सत्य, हम आपको नमस्कार करती हैं।
आप समस्त दिव्य चेतना एवं शक्ति केआगार हैं और अनन्त शक्तियों के स्वामी हैं।
यद्यपि आप भौतिक गुणों एवं विकारों से पूर्णतयामुक्त हैं किन्तु आप भौतिक प्रकृति के आदि संचालक हैं।
कालाय कालनाभाय 'कालावयवसाक्षिणे ॥
विश्वाय तदुपद्रष्टे तत्कत्रें विश्वेवतवे ॥
४१॥
कालाय--काल को; काल-नाभाय--काल के आश्रय को; काल-अवयव--काल की विभिन्न अवस्थाओं के; साक्षिणे--गवाह को; विश्वाय--विश्व रूप को; तदू-उपद्रष्ट--इसके प्रेक्षक को; तत्-कर्त्रे--इसके स्त्रष्टा को; विश्व--विश्व के; हेतवे--सम्पूर्ण कारण को |
हम आपको नमस्कार करती हैं।
आप साक्षात् काल, काल के आश्रय तथा काल कीविभिन्न अवस्थाओं के साक्षी हैं।
आप ब्रह्माण्ड हैं और इसके पृथक् द्रष्टा भी हैं।
आप इसकेस्त्रष्टा हैं और इसके समस्त कारणों के कारण हैं।
भूतमात्रेन्द्रियप्राणमनोबुद्धयाशयात्मने ।
त्रिगुणेनाभिमानेन गूढस्वात्मानुभूतये ॥
४२॥
नमोनन्ताय सूक्ष्माय कूटस्थाय विपश्चिते ।
नानावादानुरोधाय वाच्यवाचकशक्तये ॥
४३॥
भूत--भौतिक तत्त्वों के; मात्र--अनुभूति के सूक्ष्म आधार; इन्द्रिय--इन्द्रियों; प्राण--प्राणवायु; मन: --मन; बुद्धि--बुद्धि;आशय--तथा भौतिक चेतना के; आत्मने--परमात्मा में; त्रि-गुणेन--तीन गुणों से; अभिमानेन--झूठी पहचान से; गूढ--आच्छन्न; स्व--निज; आत्म--अपनी; अनुभूतये-- अनुभूति को; नम:--नमस्कार; अनन्ताय--अनन्त भगवान् को; सूक्ष्माय--अत्यन्त सूक्ष्म को; कूट-स्थाय--केन्द्र में स्थिर; विपश्चिते--सर्वज्ञ को; नाना--विविध; वाद--दर्शन के; अनुरोधाय--स्वीकृतिप्रदाता को; वाच्य--व्यक्त विचारों के; वाचक--तथा व्यक्त शब्द; शक्तये--शक्तिमान को |
आप भौतिक तत्त्वों के, अनुभूति के सूक्ष्म आधार के, इन्द्रियों के, प्राणवायु के तथा मन,बुद्धि एवं चेतना के परमात्मा हैं।
हम आपको नमस्कार करती हैं।
आपकी ही व्यवस्था के'फलस्वरूप सूक्ष्मतम चिन्मय आत्माएँ प्रकृति के तीनों गुणों के रूप में अपनी झूठी पहचानबनाती हैं फलस्वरूप उनकी स्व की अनुभूति प्रच्छन्न हो जाती है।
हे अनन्त भगवान्, हे परमसूक्ष्म एवं सर्वज्ञ भगवान्, हम आपको प्रणाम करती हैं, जो सदैव स्थायी दिव्यता में विद्यमानरहते हैं, विभिन्न वादों के विरोधी विचारों को स्वीकृति देते हैं और व्यक्त विचारों तथा उनकोव्यक्त करनेवाले शब्दों को प्रोत्साहन देने वाली शक्ति हैं।
नमः प्रमाणमूलाय कवसये शास्त्रयोनये ।
प्रवृत्ताय निवृत्ताय निगमाय नमो नम: ॥
४४॥
नमः--नमस्कार; प्रमाण--आधिकारिक साक्ष्य के; मूलाय--आधार को; कवये--लेखक को; शास्त्र--शास्त्र के; योनये--स्रोत को; प्रवृत्ताय--इन्द्रिय तृप्ति के लिए प्रोत्साहित करनेवाले को; निवृत्ताय--त्याग के प्रति प्रोत्साहित करनेवाले को;निगमाय--दोनों प्रकार के शास्त्रों के उदूगम को; नमः नम:--बारम्बार नमस्कार।
समस्त प्रमाणों के आधार, शास्त्रों के प्रणेता तथा परम स्त्रोत, इन्द्रिय तृप्ति को प्रोत्साहितकरनेवाले ( प्रवृत्ति मार्ग ) तथा भौतिक जगत से विराग उत्पन्न करनेवाले वैदिक साहित्य में अपनेको प्रकट करनेवाले आपको हम बारम्बार नमस्कार करती हैं।
नमः कृष्णाय रामाय वसुदेवसुताय च।
प्रद्युम्नायानिरुद्धाय सात्वतां पतये नम: ॥
४५॥
नमः--नमस्कार; कृष्णाय-- भगवान् कृष्ण को; रामाय-- भगवान् राम को; वसुदेव-सुताय--वसुदेव के पुत्र; च--तथा;प्रद्युम्गाय-- भगवान् प्रद्युम्म को; अनिरुद्धाय--अनिरुद्ध को; सात्वताम्--भक्तों के; पतये--स्वामी को; नमः--नमस्कार |
हम वसुदेव के पुत्र, भगवान् कृष्ण तथा भगवान् राम को और भगवान् प्रद्युम्न तथा भगवान्अनिरुद्ध को सादर नमस्कार करती हैं।
हम विष्णु के समस्त सन्त सदृश भक्तों के स्वामी कोसादर नमस्कार करती हैं।
नमो गुणप्रदीपाय गुणात्मच्छादनाय च ।
गुणवृच्त्युपलक्ष्याय गुणद्रष्ट स्वसंविदे ॥
४६॥
नमः--नमस्कार; गुण-प्रदीपाय--विभिन्न गुणों को प्रकट करनेवाले को; गुण--भौतिक गुणों से; आत्म--स्वयं; छादनाय--वेश बदलनेवाले को; च--तथा; गुण--गुणों के; वृत्ति--कार्य करने से; उपलक्ष्याय--सुनिश्चित किये जा सकने वाले को;गुण-द्रष्ट--गुणों के पृथक् साक्षी को; स्व--अपने भक्तों को; संविदे--ज्ञात नाना प्रकार के भौतिक तथा आध्यात्मिक गुणों को प्रकट करनेवाले
हे भगवन्, आपकोहमारा नमस्कार।
आप अपने को भौतिक गुणों से छिपा लेते हैं किन्तु अन्ततः उन्हीं भौतिक गुणोंके अन्तर्गत हो रहे कार्य आपके अस्तित्व को प्रकट कर देते हैं।
आप साक्षी रूप में भौतिक गुणोंसे पृथक् रहते हैं और एकमात्र अपने भक्तों द्वारा भलीभाँति ज्ेय हैं।
जव्लाशशनन, पशण पा ऑिशरिणणा हह्ट्ण के फशनारीत पिन नरित हशणशण हिशाणों राय पट पशशणोशिशरण फषशालाएए पहेटीशर अव्याकृतविहाराय सर्वव्याकृतसिद्धये ।
हृषीकेश नमस्तेस्तु मुनये मौनशीलिने ॥
४७॥
अव्याकृत-विहाराय-- अगाध महिमा वाले; सर्व-व्याकृत--सभी वस्तुओं के सृजन तथा प्राकट्य; सिद्धये--अस्तित्व वाले को;हृषीक-ईश--हे इन्द्रियों के प्रेरक; नमः--नमस्कार; ते--आपको; अस्तु--होए; मुनये--मौन रहनेवाले को; मौन-शीलिने--मौन अवस्था में ही कर्म करनेवाले को।
हे इन्द्रियों के स्वामी, हषीकेश, हम आपको नमस्कार करती हैं क्योंकि आपकी लीलाएँअच्न्त्य रूप से महिमामयी हैं।
आपके अस्तित्व को समस्त दृश्य जगत के लिए स्त्रष्टा तथाप्रकाशक की आवश्यकता से समझा जा सकता है।
यद्यपि आपके भक्त आपको इस रूप मेंसमझ सकते हैं किन्तु अभक्तों के लिए आप आत्मलीन रह कर मौन बने रहते हैं।
परावरगतिज्ञाय सर्वाध्यक्षाय ते नमः ।
अविश्वाय च विश्वाय तद्द्रष्टेडस्यथ च हेतवे ॥
४८॥
'पर-अवर--उत्तम तथा निष्कृष्ट दोनों ही तरह की वस्तुओं के; गति--गन्तव्य; ज्ञाय--जाननेवाले को; सर्व--सभी वस्तुओं के;अध्यक्षाय--नियन्ता को; ते--आपको; नमः--हमारा नमस्कार; अविश्वाय--ब्रह्माण्ड से पृथक् रहनेवाले को; च--तथा;विश्वाय--भौतिक जगत की माया प्रकट करनेवाले को; ततू-द्रष्टे--ऐसी माया के साक्षी को; अस्य--इस जगत के; च--तथा;हेतवे--मूल कारण को |
उत्तम तथा अधम समस्त वस्तुओं के गन्तव्य को जाननेवाले तथा समस्त जगत के अध्यक्षनियन्ता आपको हमारा नमस्कार।
आप इस ब्रह्माण्ड की सृष्टि से पृथक् हैं फिर भी आप वहमूलाधार हैं जिस पर भौतिक सृष्टि की माया का विकास होता है।
आप इस माया के साक्षी भीहैं।
निस्सन्देह आप अखिल जगत के मूल कारण हैं।
त्वं हास्य जन्मस्थितिसंयमान्विभोगुणैरनीहोकृतकालशक्तिधृक् ।
तत्तत्स्वभावान्प्रतिबोधयन्सतःसमीक्षयामोघविहार ईहसे ॥
४९॥
त्वमू--आप; हि--निस्सन्देह; अस्य--इस ब्रह्माण्ड के; जन्म-स्थिति-संयमान्--सृजन, पालन तथा संहार; विभो--हेसर्वशक्तिमान; गुणैः--प्रकृति के गुणों द्वारा; अनीह:--किसी भी भौतिक प्रयास में निहित न होते हुए भी; अकृत--अनादि;काल-शक्ति--काल की शक्ति के; धृक् --धारण करनेवाले; तत्-तत्-प्रत्येक गुण के; स्व-भावानू--लक्षणों को;प्रतिबोधयन्--जाग्रत करते हुए; सतः--सुप्त अवस्था में रह रहे; समीक्षया--अपनी चितवन से; अमोघ-विहार:--अमोघक्रीड़ाओं वाले; ईहसे--आप कर्म करते हैं।
हे सर्वशक्तिमान प्रभु, यद्यपि आपके भौतिक कर्म में फँसने का कोई कारण नहीं है, फिरभी आप इस ब्रह्माण्ड के सृजन, पालन तथा संहार की व्यवस्था करने के लिए अपनी शाश्वतकालशक्ति के माध्यम से कर्म करते हैं।
इसे आप सृजन के पूर्व सुप्त पड़े प्रकृति के प्रत्येक गुणके विशिष्ट कार्य को जाग्रत करते हुए सम्पन्न करते हैं।
ब्रह्माण्ड-नियंत्रण के इन सारे कार्यों कोआप खेल खेल में केवल अपनी चितवन से पूर्णतया सम्पन्न कर देते हैं।
तस्यैव तेमूस्तनवस्त्रिलोक्यांशान्ता अशान्ता उत मूढयोनय: ।
शान्ताः प्रियास्ते ह्ाधुनावितुं सतांस्थातुश् ते धर्मपरीप्सयेहत: ॥
५०॥
तस्थ--उनका; एब--निस्सन्देह; ते--आपका; अमू: --ये; तनवः -- भौतिक शरीर; त्रि-लोक्याम्--तीनों लोकों में; शान्ता: --शान्त ( सतोगुण में ); अशान्ता:--अशान्त ( रजोगुण में ); उत--और भी; मूढ-योनय: --अज्ञानी योनियों में उत्पन्न; शान्ता: --सतोगुणी शान्त व्यक्ति; प्रिया: --प्रिय; ते--आपको; हि--निश्चय ही; अधुना--अब; अवितुम्ू--रक्षा करने के लिए; सताम्--साधु भक्तों की; स्थातु:--उपस्थित; च--तथा; ते-- आपके ; धर्म--धर्म के सिद्धान्त; परीप्सया--पालन करने की इच्छा से;ईंहतः--कार्य करनेवाला।
इसलिए तीनों लोकों भर में सारे भौतिक शरीर--जो सतोगुणी होने के कारण शान्त हैं, जोरजोगुणी होने से विश्लुब्ध हैं तथा जो तमोगुणी होने से मूर्ख हैं--आपकी ही सृष्टियाँ हैं।
तो भीजिनके शरीर सतोगुणी हैं, वे आपको विशेष रूप से प्रिय हैं और उन्हीं के पालन हेतु तथा उन्हींके धर्म की रक्षा करने के लिए ही अब आप इस पृथ्वी पर विद्यमान हैं।
अपराध: सकृद्धतत्रा सोढव्य: स्वप्रजाकृतः ।
क्षन्तुमहसि शान्तात्मन्मूढस्य त्वामजानत: ॥
५१॥
अपराध: --अपराध; सकृत्--एक बार; भर्त्रा--स्वामी द्वारा; सोढव्य:--सहन किया जाना चाहिए; स्व-प्रजा--आपकी प्रजाद्वारा; कृतः:--किया गया; क्षन्तुमू-सहने के लिए; अहंसि--आपको शोभा देता है; शान्त-आत्मन्--हे शान्त रहनेवाले;मूढस्य--मूर्ख के; त्वामू-- आपको; अजानत:--न समझने वाला।
स्वामी को चाहिए कि अपनी सनन््तान या प्रजा द्वारा किये गये अपराध को कम से कम एकबार तो सह ले।
इसलिए हे परम शान्त आत्मन्ू, आप हमारे इस मूर्ख पति को क्षमा कर दें जो यहनहीं समझ पाया कि आप कौन हैं।
अनुगृह्लीष्व भगवन्प्राणांस्त्यजति पन्नग: ।
स्त्रीणां न: साधुशोच्यानां पति: प्राण: प्रदीयताम् ॥
५२॥
अनुगृह्लीष्व--कृपा करें; भगवन्--हे भगवान्; प्राणान्ू-- प्राणों को; त्यजति--त्याग रहा है; पन्नग:--सर्प; स्त्रीणाम्--स्त्रियों केलिए; न:--हम; साधु-शोच्यानाम्--साथु पुरुषों द्वारा क्षम्य; पति:--पति; प्राण:--जीवन स्वरूप; प्रदीयताम्--वापस दे दियाजाय।
हे भगवन्, आप हम पर कृपालु हों।
साधु पुरुष को हम-जैसी स्त्रियों पर दया करना उचितहै।
यह सर्प अपना प्राण त्यागने ही वाला है।
कृपया हमारे जीवन तथा आत्मा रूप हमारे पति कोहमें वापस कर दें।
विधेहि ते किड्डूरीणामनुष्ठेयं तवाज्ञया ।
यच्छुद्धयानुतिष्ठ न्वै मुच्यते सर्वती भयात् ॥
५३॥
विधेहि--आज्ञा दें; ते--आपकी; किड्जरीणाम्--दासियों द्वारा; अनुष्टेयम्ू--जो किया जाना हो; तब--आपकी; आज्ञया--आज्ञा से; यत्ू--जो; श्रद्धया-- श्रद्धापूर्वक; अनुतिष्ठन्-- सम्पन्न करते हुए; बै--निश्चय ही; मुच्यते--मुक्त हुआ जा सके;सर्वतः--सभी; भयात्-- भय से |
अब कृपा करके अपनी दासियों को बतलायें कि हम क्या करें।
यह निश्चित है कि जो भीआपकी आज्ञा को श्रद्धापूर्वक पूरा करता है, वह स्वतः सारे भय से मुक्त हो जाता है।
श्रीशुक उबाचइत्थं स नागपत्नीभिर्भगवान्समभिष्ठृत: ।
मूर्च्छितं भग्नशिरसं विससर्जाड्प्रिकुड्डने: ॥
५४॥
श्री-शुकः उबाच-- श्री शुकदेव गोस्वामी ने कहा; इत्थम्--इस तरह; सः--उन भगवान् कृष्ण ने; नाग-पलीभि:--कालिय कीपत्नियों द्वारा; भगवान्-- भगवान् ने; समभिष्ठुत:--पूरी तरह से प्रशंसित; मूर्च्छितम्--मूर्च्छित, बेहोश; भग्न-शिरसम्--कुचलेहुए सिरवाले; विससर्ज--जाने दिया; अड्प्रि-कुट्टनेः--पाँवों के प्रहार से
शुकदेव गोस्वामी ने कहा : इस तरह नागपत्ियों द्वारा प्रशंसित भगवान् ने उस कालिय सर्पको छोड़ दिया, जो मूछित होकर गिर चुका था और जिसके सिर भगवान् के चरणकमलों केप्रहार से क्षत-विक्षत हो चुके थे।
प्रतिलब्धेन्द्रियप्राण: कालिय: शनकै्रिम् ।
कृच्छात्समुच्छुसन्दीनः कृष्णं प्राह कृताझ्ललि: ॥
५५॥
प्रतिलब्ध--पुन: प्राप्त करके ; इन्द्रिय--इन्द्रियों का कार्य; प्राण:--तथा अपनी जीवनी शक्ति; कालिय:--कालिय; शनकै: --धीरे धीरे; हरिमू-- भगवान्; कृच्छात्--कठिनाई से; समुच्छुसन्--तेजी से साँस लेता; दीन:--दुखी; कृष्णम्--कृष्ण से;प्राह--बोला; कृत-अद्धलि: --विनीत होकर ।
धीरे धीरे कालिय को अपनी जीवनी शक्ति तथा इन्द्रियों की क्रियाशीलता प्राप्त हो गई ।
तबकष्टपूर्वक जोर-जोर से साँस लेते हुए बेचारे सर्प ने विनीत भाव से भगवान् श्रीकृष्ण कोसम्बोधित किया।
'कालिय उवाचवयं खलाः सहोत्पत्त्या तमसा दीर्घमन्यव: ।
स्वभावो दुस्त्यजो नाथ लोकानां यदसदूग्रह: ॥
५६॥
'कालिय: उवाच--कालिय ने कहा; वयम्--हम; खला: --दुष्ट; सह उत्पत्त्या--अपने जन्म से ही; तामसा: --तामसी प्रकृति के;दीर्घ-मन्यव:ः--निरन्तर क्रुद्ध; स्वभाव:ः--स्वभाव; दुस्त्यज:--जिसे छोड़ पाना अत्यन्त कठिन है; नाथ--हे स्वामी;लोकानाम्--सामान्य जनों के लिए; यत्--जिससे; असत्--असत्य तथा अशुद्ध की; ग्रहः--स्वीकृति |
कालिय नाग ने कहा : सर्प के रूप में जन्म से ही हम ईर्ष्यालु, अज्ञानी तथा निरन्तर क्रुद्धबने हुए हैं।
हे नाथ, मनुष्यों के लिए अपना बद्ध स्वभाव, जिससे वे असत्य से अपनी पहचानकरते हैं, छोड़ पाना अत्यन्त कठिन है।
त्वया सृष्टमिदं विश्व धातर्गुणविसर्जनम् ।
नानास्वभाववीयौंजोयोनिबीजाशयाकृति ॥
५७॥
त्ववा--आपके द्वारा; सृष्टम्--उत्पन्न; इदम्--यह; विश्वम्--ब्रह्माण्ड; धातः--हे विधाता; गुण-- भौतिक गुणों की;विसर्जनम्ू--विविध सृष्टि; नाना--विविध; स्व-भाव--स्वभाव; वीर्य--नाना प्रकार की शक्ति; ओज:--तथा शारीरिक शक्ति;योनि--गर्भ; बीज--बीज; आशय--मनोवृत्ति; आकृति--तथा रूप |
हे परम विधाता, आप ही भौतिक गुणों की विविध व्यवस्था से निर्मित इस ब्रह्माण्ड केबनाने वाले हैं।
इस प्रक्रिया में आप नाना प्रकार के व्यक्तित्व तथा योनियाँ, नाना प्रकार कीऐन्द्रिय तथा शारीरिक शक्तियाँ तथा भाँति भाँति की मनोवृत्तियों एवं आकृतियों वाले माता-पिताओं को प्रकट करते हैं।
बयं च तत्र भगवस्सर्पा जात्युरुमन्यवः ।
कथं त्यजामस्त्वन्मायां दुस््त्यजां मोहिता: स्वयम् ॥
५८ ॥
वयम्--हम; च--तथा; तत्र--उस भौतिक सृष्टि के भीतर; भगवन्--हे भगवन्; सर्पा:--सर्पगण; जाति--जाति, योनि; उरु-मन्यवः--अत्यन्त क्रोधी; कथम्--कैसे; त्यजाम: --हम त्याग सकते हैं; त्वत्-मायामू--आपकी मायाशक्ति को; दुस्त्यजाम्--जिसे त्याग पाना असम्भव है; मोहिताः--मोहित; स्वयम्--अपने आप।
हे भगवन्, आपकी भौतिक सृष्टि में जितनी भी योनियाँ हैं उनमें से हम सर्पगण स्वभाव सेसदैव क्रोधी हैं।
इस तरह आपकी दुस्त्यज मायाशक्ति से मुग्ध होकर भला हम उस स्वभाव कोअपने आप कैसे त्याग सकते हैं ?
भवानिह कारण तत्र सर्वज्ञो जगदीश्वर: ।
अनुग्रहं निग्रह वा मन्यसे तद्ठविधेहि नः ॥
५९॥
भवान्ू--आप; हि--निश्चय ही; कारणम्--कारण; तत्र--उस मामले में ( मोह हटाने में ); सर्व-ज्ञ:--सबकुछ जाननेवाले;जगतू-ईश्वर:--ब्रह्माण्ड के परम नियन्ता; अनुग्रहमू--कृपा; निग्रहम्--दंड; वा--अथवा; मन्यसे--जो आप उचित समझें;तत्--वह; विधेहि-- व्यवस्था करें; नः--हमारे लिए
हे ईश्वर, ब्रह्माण्ड के सर्वज्ञ भगवान् होने के कारण आप मोह से छूटने के वास्तविक कारणहैं।
कृपा करके आप जो भी उचित समझें, हमारे लिए व्यवस्था करें, चाहे हम पर कृपा करें यादण्ड दें।
श्रीशुक उबाचइत्याकर्ण्य बच: प्राह भगवान्कार्यमानुष: ।
नात्र स्थेयं त्वया सर्प समुद्रं याहि मा चिरम् ।
स्वज्ञात्यपत्यदाराढ्यो गोनृभिर्भुज्यते नदी ॥
६०॥
श्री-शुकः उबाच-- श्री शुकदेव गोस्वामी ने कहा; इति--इस प्रकार; आकर्ण्य--सुनकर; वच:--ये शब्द; प्राह--तब बोले;भगवानू्-- भगवान्; कार्य-मानुष:--मनुष्य जैसे कार्य करनेवाले; न--नहीं; अत्र--यहाँ; स्थेयम्--ठहरना चाहिए; त्ववा--तुमको; सर्प--हे सर्प; समुद्रमू--समुद्र में; याहि-- जाओ; मा चिरम्--बिना देरी किये; स्व--अपने; ज्ञाति--साथियों के द्वारा;अपत्य--बच्चे; दार--तथा पत्नी को; आढ्य:--साथ लेकर; गो--गौवों के द्वारा; नृभि:--तथा मनुष्यों द्वारा; भुज्यते-- भोगीजाने दो; नदी--यमुना नदी
शुकदेव गोस्वामी ने कहा : कालिय के शब्द सुनकर मनुष्य की भूमिका सम्पन्न कर रहेभगवान् ने उत्तर दिया: हे सर्प, अब तुम और अधिक यहाँ मत रूको।
तुरन्त ही अपने बच्चों,पत्नियों, अन्य मित्रों तथा सम्बन्धियों समेत समुद्र में लौट जाओ।
अब इस नदी को गौवों तथामनुष्यों द्वारा भोगी जाने दो।
य एतत्संस्मरेन्मर्त्यस्तुभ्यं मदनुशासनम् ।
कीर्तयन्नुभयो: सन्ध्योर्न युष्मद्भयमाष्नुयात् ॥
६१॥
यः--जो कोई; एतत्--इसे; संस्मरेत्--स्मरण करता है; मर्त्य:--प्राणी; तुभ्यम्ू--तुमको; मत्--मेरा; अनुशासनम्ू-- आदेश;कीर्तयन्--कीर्तन करते हुए; उभयो:--दोनों ; सन्ध्यो;:--दिन के सन्धिकालों पर; न--नहीं; युष्मत्--तुमसे; भयम्-- भय;आज्ुयात्--प्राप्त करता है।
यदि कोई व्यक्ति तुम्हें दिये गये मेरे इस आदेश का ( वृन्दावन छोड़कर समुद्र में जाने का )स्मरण करता है और प्रातः तथा संध्या समय इस कथा को बाँचता है, तो वह तुमसे कभीभयभीत नहीं होगा।
योउस्मिन्सनात्वा मदाक्रीडे देवादींस्तर्पयेजलै: ।
उपोष्य मां स्मरत्नर्चेत्सर्वपापैः प्रमुच्यते ॥
६२॥
यः--जो; अस्मिन्ू--इस में ( यमुना नदी के कालिय सरोवर में ); स्नात्वा--स्नान करके; मत्-आक्रीडे--मेरी लीला के स्थानपर; देव-आदीनू--देवतागण तथा अन्य पूज्य व्यक्ति को; तर्पयेत्--तृप्त करता है; जलैः--( सरोवर के ) जल से; उपोष्य--उपवास रखकर; माम्--मुझको; स्मरन्--स्मरण करते हुए; अर्चेत्ू--पूजा करता है; सर्व-पापै: --सारे पापों से; प्रमुच्यते--छूटजाता है।
यदि कोई व्यक्ति मेरी क्रीड़ा के इस स्थल पर स्नान करता है और इस सरोवर का जलदेवताओं तथा अन्य पूज्य पुरुषों को अर्पित करता है अथवा यदि कोई उपवास करता है, मेरीपूजा करता है और मेरा स्मरण करता है, तो वह समस्त पापों से अवश्य छूट जाएगा।
द्वीपं रमणकं हित्वा हृदमेतमुपाअ्रितः ।
यद्भयात्स सुपर्णस्त्वां नाद्यान्मत्पादलाज्छितम् ॥
६३॥
द्वीपम्ू--द्वीप को; रमणकम्--रमणक नामक; हित्वा--त्यागकर; हृदम्--छोटे सरोवर को; एतम्--इस; उपाध्रित:--शरणलिए हुए; यत्--जिसके; भयात्-- भय से; सः--वह; सुपर्ण:--गरुड़; त्वाम्-तुम्हें; न अद्यात्--नहीं खायेगा; मत्-पाद--मेरेचरणों से; लाउ्छितम्--अंकित |
तुम गरुड़ के भय से रमणक द्वीप छोड़कर इस सरोवर में शरण लेने आये थे।
किन्तु अबतुम्हारे ऊपर मेरे चरणचिन्ह अंकित होने से, गरुड़ तुम्हें खाने का प्रयास कभी नहीं करेगा।
श्रीऋषिरुवाचमुक्तो भगवता राजन्कृष्णेनाद्भधुतकर्मणा ।
तं पूजयामास मुदा नागपत्यश्व सादरम् ॥
६४॥
श्री-ऋषि: उवाच--ऋषि ( शुकदेव ) ने कहा; मुक्त:--मुक्त; भगवता-- भगवान् द्वारा; राजन्--हे राजा परीक्षित; कृष्णेन--कृष्ण के द्वारा; अद्भुत-कर्मणा--अद्भुत कार्यकलाप वाले; तम्--उनकी; पूजयाम् आस--पूजा की; मुदा--हर्षपूर्वक; नाग--सर्प की; पत्य:--पत्नियों ने; च--तथा; स-आदरम्--आदरपूर्वक ।
शुकदेव गोस्वामी ने आगे कहा : हे राजन, अद्भुत कार्यकलाप वाले भगवान् कृष्ण के द्वारा छोड़े जाने पर कालिय नाग ने अपनी पत्नियों का बड़े ही हर्ष तथा आदर के साथ उनकीपूजा करने में साथ दिया।
दिव्याम्बरसत्रड्मणिभि: परारध्यैरपि भूषणै: ।
दिव्यगन्धानुलेपैश्व महत्योत्पलमालया ।
'पूजयित्वा जगन्नाथं प्रसाद्य गरूडध्वजम् ॥
६५॥
ततः प्रीतोभ्यनुज्ञात: परिक्रम्याभिवन्द्य तम् ।
सकलत्सुहत्पुत्रो द्वीपमब्धेजगाम ह ॥
६६॥
तदेव सामृतजला यमुना निर्विषाभवत् ।
अनुग्रहाद्धगवत: क्रीडामानुषरूपिण: ॥
६७॥
दिव्य--दैवी; अम्बर--वस्त्र; स्रक्ू--माला; मणिभि:--तथा मणियों से; पर-अर्ध्यैं:--अत्यन्त मूल्यवान; अपि-- भी;भूषणै:--आभूषणों से; दिव्य--दैवी; गन्ध--सुगन्धि; अनुलेपै:--तथा लेप से; च--तथा; महत्या--सुन्दर; उत्पल--कमलकी; मालया--माला से; पूजयित्वा--पूजकर; जगत्-नाथम्--जगत के स्वामी को; प्रसाद्य--तुष्ट करके; गरुड-ध्वजम्--जिसकी ध्वजा में गरुड़ चिह्न अंकित है, उसे; तत:--तब; प्रीत:--सुख का अनुभव करते हुए; अभ्यनुज्ञात:--जाने की अनुमतिदिया जाकर; परिक्रम्य--परिक्रमा करके; अभिवन्द्य--नमस्कार करके; तम्--उन्हें; स--सहित; कलत्र--अपनी पत्नी;सुहत्--मित्रगण; पुत्र:--तथा बच्चे; द्वीपम्--द्वीप को; अब्धे:--समुद्र में; जगाम--चला गया; ह--निस्सन्देह; तदा एबव--उसीक्षण; स-अमृत--अमृत तुल्य; जला--जल वाली; यमुना--यमुना नदी; निर्विषा--विष से रहित; अभवत्--हो गई;अनुग्रहात्ू--कृपा से; भगवत:--भगवान् की; क्रीडा--क्रीड़ाओं के लिए; मानुष--मनुष्य जैसा; रूपिण:--रूप धारण करके |
कालिय ने सुन्दर वस्त्र, मालाएँ, मणियाँ तथा अन्य मूल्यवान आभूषण, दिव्य सुगन्धियाँतथा लेप और कमलफूलों की बड़ी माला भेंट करते हुए जगत के स्वामी की पूजा की।
इस तरहगरुड़-ध्वज भगवान् को प्रसन्न करके कालिय को सनन््तोष हुआ।
जाने की अनुमति पाकरकालिय ने उनकी परिक्रमा की और उन्हें नमस्कार किया।
तब अपनी पत्रियों, मित्रों तथा बच्चोंको साथ लेकर वह समुद्र में स्थित अपने द्वीप चला गया।
कालिय के जाते ही यमुना नदी अपने मूल रूप में, विष से विहीन तथा अमृतोपम जल से पूर्ण हो गईं।
यह सब उन भगवान् की कृपासे सम्पन्न हुआ जो अपनी लीलाओं का आनन्द मनाने के लिए मनुष्य के रूप में प्रकट हुए थे।
