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अध्याय सत्रह: कालिया का इतिहास

10.17श्रीराजोबवाचनागालयं रमणकं कथं तत्याज कालियः ।

कृतं कि वा सुपर्णस्यतेनेकेनासमझ्जसम्‌ ॥

१॥

श्री-राजा उवाच--राजा ने कहा; नाग--सर्पों का; आलयम्‌--वासस्थान; रमणकम्‌--रमणक नामक द्वीप; कथम्‌-्यों;तत्याज--त्याग दिया; कालिय: --कालिय ने; कृतम्‌ू--वाध्य किया गया; किम्‌ वा--तथा क्‍यों; सुपर्णस्य--गरुड़ की; तेन--उससे, कालिय से; एकेन--अकेले; असमझसमू--शत्रुता |

[इस प्रकार कृष्ण ने कालिय की प्रताड़ना की उसे सुनकर राजा परीक्षित ने पूछा:कालिय ने सर्पों के निवास रमणक द्वीप को क्‍यों छोड़ा और गरुड़ उसीका से इतना विरोधी क्‍योंबन गया ?

श्रीशुक उबाचउपहार्ये: सर्पजनैर्मासि मासीह यो बलि:वानस्पत्यो महाबाहो नागानां प्राइनिरूपित: ।

स्वं स्वं भागं प्रयच्छन्ति नागा: पर्वणि पर्वणिगोपीथायात्मन: सर्वे सुपर्णाय महात्मने ॥

२-३॥

श्री-शुकः उवाच-- श्री शुकदेव गोस्वामी ने कहा; उपहार्यैं:--भेंट पाने के पात्र; सर्प-जनैः --सर्प जाति के द्वारा; मासि मासि--हर महीने; इह--यहाँ ( नागालय में ); यः--जो; बलि:--भेंट; वानस्पत्य:--वृक्ष के नीचे; महा-बाहो--हे बलिष्ट भुजाओं वालेपरीक्षित; नागानाम्‌--सर्पों के लिए; प्राकु--पहले से; निरूपितः --निश्चित; स्वम्‌ स्वमू--अपना अपना; भागम्‌--अंश;प्रयच्छन्ति-- भेंट करते; नागा: --सर्पगण; पर्वणि पर्वणि--मास में एक बार; गोपीथाय--रक्षा हेतु; आत्मन:--अपनी अपनी;सर्वे--सभी; सुपर्णाय--गरुड़ को; महा-आत्मने--बलशाली |

शुकदेव गोस्वामी ने कहा : गरुड़ द्वारा खाये जाने से बचने के लिए सर्पों ने पहले से उससेयह समझौता कर रखा था कि उनमें से हर सर्प मास में एक बार अपनी भेंट लाकर वृक्ष के नीचेरख जाया करेगा।

इस तरह हे महाबाहु परीक्षित, प्रत्येक मास हर सर्प अपनी रक्षा के मूल्य केरूप में विष्णु के शक्तिशाली वाहन को अपनी भेंट चड़ाया जाया करता था।

विषवीर्यमदाविष्ट: काद्रवेयस्तु कालिय: ।

कदर्थीकृत्य गरुडं स्वयं तं बुभुजे बलिम्‌ ॥

४॥

विष--विष; वीर्य--तथा शक्ति के कारण; मद--नशे में; आविष्ट:--लीन; काद्रवेय:--कद्गु का पुत्र; तु--दूसरी ओर;कालिय:--कालिय; कदर्थी-कृत्य--अवहेलना करके; गरुडम्‌--गरुड़ की; स्वयम्‌--खुद; तम्‌--उस; बुभुजे--खाता था;बलिमू--भेंट को |

यद्यपि अन्य सभी सर्पगण ईमानदारी से गरुड़ को भेंट दे जाया करते थे किन्तु एक सर्प,कद्रु-पुत्र अभिमानी कालिय, इन सभी भेंटों को गरुड़ के पाने से पहले ही खा जाया करता था।

इस तरह कालिय भगवान्‌ विष्णु के वाहन का प्रत्यक्ष अनादर करता था।

तच्छुत्वा कुपितो राजन्भगवान्भगवत्प्रियः ।

विजिघांसुर्महावेग: कालियं समपाद्रवत्‌ ॥

५॥

तत्‌--वह; श्रुत्वा--सुनकर; कुपित:--क्रुद्ध; राजनू--हे राजा; भगवान्‌--अत्यन्त शक्तिशाली गरुड़; भगवत्‌-प्रिय:-- भगवान्‌का प्रिय भक्त; विजिघांसु:--मारने की इच्छा से; महा-वेग: --फुर्ताी से; कालियमू--कालिय की ओर; समुपाद्रवत्‌-दौड़ा |

हे राजन्‌ जब भगवान्‌ के अत्यन्त प्रिय, परम शक्तिशाली गरुड़ ने यह सुना तो वह क्रुद्ध होउठा।

वह कालिय को मार डालने के लिए उसकी ओर तेजी से झपटा।

तमापतन्तं तरसा विषायुधःप्रत्यभ्ययादुत्थितनैकमस्तक: ।

दद्धिः सुपर्ण व्यदशदृदायुध:करालजिह्लोच्छुसितोग्रलोचन: ॥

६॥

तमू--उसपर; आपतन्तमू--आक्रमण करता हुआ गरुड़; तरसा--तेजी से; विष--विषैले; आयुध:--हथियार लिये हुए; प्रति--की ओर; अभ्ययात्‌--दौड़ा; उत्थित--उठाया; न एक-- अनेक; मस्तक:-- अपने सिर; दर्द्िः--विषैले दाँतों से; सुपर्णम्‌--गरुड़ को; व्यदशत्‌--काट लिया; दत्‌-आयुध: --दाँतरूपी हथियारों से; कराल-- भयावनी; जिह्ला--जीभ; उच्छुसित--फैलादिया; उग्र--तथा भीषण; लोचन:--आँखें |

ज्योंही गरुड़ तेजी से कालिय पर झपटा त्योंही विष के हथियार से लैस उसने वार करने केलिए अपने अनेक सिर उठा लिये।

अपनी भयावनी जीभें दिखलाते और अपनी उग्र आँखें फैलातेहुए उसने अपने विष-दत्त हथियारों से गरुड़ को काट लिया।

त॑ तार्च्यपुत्र: स निरस्य मन्युमान्‌प्रचण्डवेगो मधुसूदनासन: ।

पक्षेण सव्येन हिरण्यरोचिषाजघान कद्गुसुतमुग्रविक्रम: ॥

७॥

तम्‌--उस कालिय को; तार्क्ष्य-पुत्रः--कश्यप का पुत्र; सः--वह गरुड़; निरस्थ--झटककर; मन्यु-मान्‌--क्रोध से भरा;प्रचण्ड-वेग:--अत्यन्त तेजी से, गति करते हुए; मधुसूदन-आसन:--मधुसूदन कृष्ण का वाहन; पक्षेण--अपने पंख से;सव्येन--बाएँ; हिरण्य--स्वर्ण जैसे; रोचिषा--तेज वाले; जधान--वार किया; कब्रु-सुतम्‌--कद्गु-पुत्र ( कालिय ) पर; उग्र--प्रचणड; विक्रम:--पराक्रम |

ताक्ष्य का क्रुद्ध पुत्र कालिय के वार को पीछे धकेलने के लिए प्रचंड वेग से आगे बढ़ा।

उसअत्यन्त शक्तिशाली भगवान्‌ मधुसूदन के वाहन ने कद्गु के पुत्र पर अपने स्वर्ण जैसे चमकीलेबाएँ पंख से प्रहार किया।

सुपर्णपक्षाभिहतः कालियोतीव विहल: ।

हृदं विवेश कालिन्द्यास्तदगम्यं दुरासदम्‌ ॥

८॥

सुपर्ण--सुपर्ण के; पक्ष--पंख से; अभिहतः--चोट खाकर; कालिय:--कालिय; अतीव--अत्यधिक; विह्॒ल:--बेचैन;हृदम्‌--सरोवर में; विवेश--घुस गया; कालिन्द्या:--यमुना नदी के; तत्‌-अगम्यम्‌-गरुड़ द्वारा थाह पा सकने में अक्षम;दुरासदम्‌-घुसने में कठिन ।

गरुड़ के पंख की चोट खाने से कालिय अत्यधिक बेचैन हो उठा अतः उसने यमुना नदी केनिकटस्थ सरोवर में शरण ले ली।

गरुड़ इस सरोवर में नहीं घुस सका।

निस्सन्देह, वह वहाँ तकपहुँच भी नहीं सका।

तत्रैकदा जलचरं गरुडो भक्ष्यमीप्सितम्‌ ।

निवारितः सौभरिणा प्रसह्म क्षुधितोहरत्‌ ॥

९॥

तत्र--वहाँ ( उस सरोवर में ); एकदा--एक बार; जल-चरम्‌--जल के प्राणी को; गरुड:--गरुड़ ने; भक्ष्यमू-- अपना खाद्य;ईप्सितम्‌--इच्छा की; निवारित:--मना किया गया; सौभरिणा--सौभर मुनि द्वारा; प्रसहा --साहस करके; श्षुधित:ः-- भूखा;अहरत्‌--खा लिया।

उसी सरोवर में गरुड़ ने एक बार एक मछली को, जो कि उसका सामान्य भक्ष्य है, खानाचाहा।

जल के भीतर ध्यानमग्न सौभरि मुनि के मना करने पर भी गरुड़ ने साहस किया औरभूखा होने के कारण उस मछली को पकड़ लिया।

मीनान्सुदु:खितान्दृष्टा दीनान्‍्मीनपतौ हते ।

कृपया सौभरि:ः प्राह तत्रत्यक्षेममाचरन्‌ ॥

१०॥

मीनान्‌--मछलियों को; सु-दुःखितान्‌-- अत्यन्त दुखी; इृष्ठा--देखकर; दीनानू--दीन; मीन-पतौ--मछलियों का राजा; हते--मारे जाने से; कृपया--कृपावश; सौभरि: --सौभरि; प्राह--बोला; तत्रत्य--वहाँ पर रह रहे; क्षेमम्‌ू--कुशलता; आचरनू--आचरण करते हुए।

उस सरोवर की अभागिनी मछलियों को अपने स्वामी की मृत्यु के कारण अत्यन्त दुखीदेखकर सौभरि मुनि ने इस आशय से शाप दे दिया कि वे उस सरोवर के रहनेवालों के कल्याणहेतु कृपापूर्ण कर्म कर रहे हैं।

अत्र प्रविश्य गरुडो यदि मत्स्यान्स खादति ।

सद्यः प्राणैर्वियुज्येत सत्यमेतद्रवीम्यहम्‌ ॥

११॥

अत्र--इस सरोवर में; प्रविश्य--घुसकर; गरुड:--गरुड़; यदि--यदि; मत्स्यान्‌ू--मछलियों को; सः--वह; खादति--खाता है;सद्यः--तुरन्त; प्राणैः--प्राणों से; वियुज्येत--हाथ धोना पड़ता; सत्यम्‌--सही सही; एतत्‌--यह; ब्रवीमि--कह रहा हूँ;अहमू-मैं |

’यदि गरुड़ ने फिर कभी इस सरोवर में घुसकर मछलियाँ खाईं तो वह तुरन्त अपने प्राणोंसे हाथ धो बैठेगा।

मैं जो कह रहा हूँ वह सत्य है।

'तत्कालिय: परं वेद नान्य: कश्चन लेलिह: ।

अवात्सीदगरुडाद्धीत: कृष्णेन च विवासित: ॥

१२॥

तम्‌--वह; कालिय:--कालिय; परम्‌--एकमात्र; वेद--जानता था; न--नहीं; अन्य: --दूसरा; कश्चन--कोई; लेलिहः --सर्प;अवात्सीत्‌ू--रहता था; गरुडातू-गरुड़ से; भीत:--भयभीत; कृष्णेन--कृष्ण द्वारा; च--तथा; विवासित:--निकाला गया।

सारे सर्पो में केवल कालिय ही इस बात को जानता था और गरुड़ के भय से उसने यमुनाके सरोवर में अपना निवास बना रखा था।

बाद में कृष्ण ने उसे निकाल भगाया।

कृष्णं हृदाद्विनिष्क्रान्तं दिव्यस््रग्गन्धवाससम्‌ ।

महामणिगणाकीर्ण जाम्बूनदपरिष्कृतम्‌ ॥

१३॥

उपलभ्योत्थिता: सर्वे लब्धप्राणा इवासव: ।

प्रमोदनिभृतात्मानो गोपा: प्रीत्याभिरेभिरि ॥

१४॥

कृष्णम्‌-कृष्ण को; हृदात्‌ू--सरोवर से बाहर; विनिष्क्रान्तमू--निकलकर; दिव्य--दिव्य; सत्रकू--मालाएँ पहने; गन्ध--सुगन्धि; वाससमू--तथा वस्त्र; महा-मणि-गण--अनेक सुन्दर मणियों से; आकीर्णम्‌--ढका हुआ; जाम्बूनद--सोने से;परिष्कृतमू--अलंकृत; उपलभ्य--देखकर; उत्थिता:--ऊपर उठते; सर्वे--सभी लोग; लब्ध-प्राणा:--जिन्‍्हें प्राण मिल गये हों;इब--सहृश; असवः--इन्द्रियाँ; प्रमोद--हर्षपूर्वक; निभृत-आत्मान: -- पूरित होकर; गोपा: --ग्वालों ने; प्रीत्या--स्नेहपूर्वक;अभिरेभिरे--उनका आलिंगन किया।

[कृष्ण द्वारा कालिय की प्रताड़ना का वर्णन फिर से प्रारम्भ करते हुए शुकदेव गोस्वामी नेकहा : कृष्ण दिव्य मालाएँ, सुगन्धियाँ तथा वस्त्र धारण किये, अनेक उत्तम मणियों सेआच्छादित एवं स्वर्ण से अलंकृत होकर उस सरोवर से ऊपर उठे।

जब ग्वालों ने उन्हें देखा तो वेसब तुरन्त उठ खड़े हो गये मानों किसी मूर्छित व्यक्ति की इन्द्रियाँ पुन: जीवित हो उठी हों।

उन्होंनेअतीव हर्ष से सराबोर होकर स्नेहपूर्वक उनको गले लगा लिया।

यशोदा रोहिणी नन्दो गोप्यो गोपाश्व कौरव ।

कृष्णं समेत्य लब्धेहा आसन्शुष्का नगा अपि ॥

१५॥

यशोदा रोहिणी नन्दः--यशोदा, रोहिणी तथा नन्द महाराज; गोप्य:--गोपियाँ; गोपा:--ग्वाले; च--तथा; कौरव--हे कुरुवंशीपरीक्षित; कृष्णम्‌--कृष्ण से; समेत्य--मिलकर; लब्ध--फिर से प्राप्त करके; ईहा:--चेतना; आसनू--हो गये; शुष्का:--सूखेहुए; नगा:--वृक्ष; अपि--भीअपनी जीवनदायी चेतनाएँ वापस पाकर

यशोदा, रोहिणी, नन्द तथा अन्य सारी गोपियाँ एवंग्वाले कृष्ण के समीप पहुँच गये।

हे कुरुवंशी, ऐसे में सूखे वृक्ष भी सजीव हो उठे।

रामश्वाच्युतमालिड्ग्य जहासास्यानुभाववित्‌ ।

प्रेम्णा तमड्डमारोप्य पुनः पुनरुदैक्षत ।

गावो वृषा वत्सतर्यो लेभिरे परमां मुदम्‌ ॥

१६॥

राम:--बलराम; च--तथा; अच्युतम्‌--अच्युत, भगवान्‌ कृष्ण को; आलिड्ग्य--आलिंगन करके; जहास--हँसे; अस्य--उनका; अनुभाव-वित्‌--सर्वशक्ति को जानते हुए; प्रेम्णा--प्रेमवश; तम्‌--उनको; अड्जडम्‌--अपनी गोद में; आरोप्य--उठाकर;पुनः पुन:--फिर फिर; उदैक्षत--देखा-भाला; गाव:--गौवों; वृषा: --साँडों; वत्सतर्य:--बछियों ने; लेभिरे--प्राप्त किया;'परमाम्‌--परम; मुदम्‌-- आनन्द |

भगवान्‌ बलराम ने अपने अच्युत भाई का आलिंगन किया और कृष्ण की शक्ति को अच्छीतरह जानते हुए हँसने लगे।

अत्यधिक प्रेमभाव के कारण बलराम ने कृष्ण को अपनी गोद मेंउठा लिया और बारम्बार उनकी ओर देखा।

गौवों, साँडों तथा बछियों को भी परम आनन्द प्राप्तहुआ।

नन्दं विप्रा: समागत्य गुरव: सकलत्रका: ।

ऊचुस्ते कालियग्रस्तो दिष्टदा मुक्तस्तवात्मज: ॥

१७॥

नन्दम्‌--नन्द महाराज को; विप्रा:--सारे ब्राह्मण; समागत्य-- आकर; गुरवः--गरुजन; स-कलत्रका: -- अपनी अपनी पत्नियोंसमेत; ऊचु:--कहा; ते--वे; कालिय- ग्रस्त:--कालिय द्वारा पकड़ा हुआ; दिछ्यया--दैव से; मुक्त:--छोड़ा गया; तब--तुम्हारा;आत्म-जः--पुत्र |

सारे गुरुजन ब्राह्मण अपनी पत्नियों सहित नन्‍्द महाराज को बधाई देने आये।

उन्होंने उनसेकहा, तुम्हारा पुत्र कालिय के चंगुल में था किन्तु दैवकृपा से अब वह छूट आया है।

'देहि दान द्विजातीनां कृष्णनिर्मुक्तिहेतवे ।

नन्दः प्रीतमना राजन्गा: सुवर्ण तदादिशत्‌ ॥

१८॥

देहि--दीजिये; दानमू--दान; द्वि-जातीनामू--ब्राह्मणों को; कृष्ण-निर्मुक्ति--कृष्ण की रक्षा; हेतवे--हेतु; नन्दः--नन्द महाराजने; प्रीत-मना:--प्रसन्न मन से; राजन्‌--हे राजा परीक्षित; गा:--गौवें; सुवर्णम्‌ू--सोना; तदा--तब; आदिशत्‌--दिया।

तब, ब्राह्मणों ने नन्द महाराज को सलाह दी, ‘तुम्हारा पुत्र कृष्ण सदैव संकट से मुक्त रहे,इससे आश्वस्त रहने के लिए तुम्हें चाहिए कि ब्राह्मणों को दान दो।

' हे राजन, तब प्रसन्नचित्तनन्द महाराज ने हर्षपूर्वक उन्हें गौवों तथा स्वर्ण की भेंटें दीं।

यशोदापि महाभागा नष्टलब्धप्रजा सती ।

परिष्वज्याड्डमारोप्य मुमोचा श्रुकलां मुहु; ॥

१९॥

यशोदा--माता यशोदा; अपि--तथा; महा-भागा--परम भाग्यशालिनी; नष्ट--खोकर; लब्ध--पुनः पाकर; प्रजा--अपना पुत्र;सती--साध्वी स्त्री; परिष्वज्य--आलिंगन करके; अड्डम्‌-गोद में; आरोप्य--उठाकर; मुमोच--टपकाया; अश्रु--आसुँओं की;कलाम्‌--झड़ी; मुहुः--बारम्बार।

परम भाग्यशालिनी माता यशोदा ने अपने खोये हुए पुत्र को फिर से पाकर उसे अपनी गोदमें ले लिया।

उनको बारम्बार गले लगाते हुए उस साध्वी ने आँसुओं की झड़ी लगा दी।

तां रात्रि तत्र राजेन्द्र क्षुत्तड्भ्यां श्रमकर्षिता: ।

ऊषुर्ब्रयौकसो गाव: कालिन्द्या उपकूलतः ॥

२०॥

तामू--उस; रात्रिमू--रात्रि में; तत्र--वहाँ; राज-इन्द्र--हे राजाओं में श्रेष्ठ; क्षुतू-तृड्भ्याम्‌-- भूख तथा प्यास से; श्रम-- थकानसे; कर्षिता:--निर्बल हुए; ऊषु:--रहे आये; ब्रज-ओकसः --वृन्दावन के लोग; गाव:--तथा गौवें; कालिन्द्या:--यमुना नदीके; उपकूलतः--तट के निकट |

हे नृपश्रेष्ठ ( परीक्षित ), चूँकि वृन्दावन के निवासी भूख, प्यास तथा थकान के कारणअत्यन्त निर्बल हो रहे थे अतः उन्होंने तथा गौवों ने कालिन्दी के तट के निकट ही लेटकर वहींरात बिताई।

तदा शुचिवनोद्धूतो दावाग्नि: सर्वतो ब्रजम्‌ ।

सुप्तं निशीथ आवृत्य प्रदग्धुमुपचक्रमे ॥

२१॥

तदा--तभी; शुच्चि--ग्रीष्मकालीन; वन--जंगल में; उद्धूत: --उत्पन्न; दाव-अग्नि: -- ज्वाला; सर्वतः--सारी दिशाओं में;ब्रजम्‌--वृन्दावन के लोगों को; सुप्तम्‌--सोये हुए; निशीथे--अर्धरात्रि में; आवृत्य--घेरकर; प्रदग्धुम्‌--जलाने; उपचक्रमे--लगी।

रात्रि में जब वृन्दावन के सभी लोग सोये हुए थे तो सूखे ग्रीष्मकालीन जंगल में भीषण आगभड़क उठी।

इस आग ने चारों ओर से ब्रजवासियों को घेर लिया और उन्हें झुलसाने लगी।

तत उत्थाय सम्भ्रान्ता दह्ममाना ब्रजौकसः ।

कृष्णं ययुस्ते शरणं मायामनुजमी श्वरम्‌ ॥

२२॥

ततः--तत्पश्चात्‌; उत्थाय--जगकर; सम्ध्रान्ता: --विक्षुब्ध; दह्ममाना:--जलने जा रहे; ब्रज-ओकस:--ब्रज के लोग; कृष्णम्‌--कृष्ण के पास; ययु:--गये; ते--वे; शरणम्‌--शरण के लिए; माया--अपनी शक्ति से; मनुजम्‌-मनुष्य की भाँति प्रकटहोनेवाले; ईश्वरमू--ईश्वर को

तब उन्हें जलाने जा रही विशाल अग्नि से अत्यधिक विचलित होकर वृन्दावनवासी जगपड़े।

उन्होंने दौड़कर भगवान्‌ कृष्ण की शरण ली जो आध्यात्मिक शक्ति से सामान्य मनुष्य केरूप में प्रकट हुए थे।

कृष्ण कृष्ण महाभग हे रामामितविक्रम ।

एष घोरतमो वहिस्तावकान्ग्रसते हि नः ॥

२३॥

कृष्ण--हे कृष्ण; कृष्ण--हे कृष्ण; महा-भाग--समस्त वैभव के स्वामी; हे राम--हे बलराम, हे समस्त आनन्द के स्रोत;अमित-विक्रम--असीम शक्तिवाले; एब: --यह; घोर-तम: --अत्यन्त भयानक; वह्लिः-- अग्नि; तावकान्‌--आपके लोगों को;ग्रसते--निगले जा रही है; हि--निस्सन्देह; नः--हमको |

[वृन्दावन वासियों ने कहा हे कृष्ण, हे कृष्ण, हे समस्त वैभव के स्वामी, हे असीम शक्तिके स्वामी राम, यह अत्यन्त भयानक अग्नि आपके भक्तों को निगल ही जाएगी।

सुदुस्तरान्न: स्वान्पाहि कालाग्ने: सुहृदः प्रभो ।

न शबकनुमस्त्वच्चरणं सन्त्यक्तुमकुतो भयम्‌ ॥

२४॥

सु-दुस्तरात्‌ू--दुर्लध्य; न:ः--हम; स्वानू--अपने भक्तों की; पाहि--रक्षा कीजिये; काल-अग्ने: --कालरूपी अग्नि से; सुहृदः--आपके असली मित्रगण; प्रभो--हे परम स्वामी; न शकक्‍्नुम:--हम अक्षम हैं; त्वत्‌-चरणम्‌--आपके पाँवों को; सन्त्यक्तुमू--छोड़ सकने में; अकुतः-भयम्‌--सारे भय को भगानेवाले।

हे प्रभु, हम आपके सच्चे मित्र तथा भक्त हैं।

कृपा करके आप इस दुर्लघ्य कालरूपी अग्निसे हमारी रक्षा कीजिये, समस्त भय को भगाने वाले आपके चरणकमलों को हम कभी नहींत्याग सकते।

इत्थं स्वजनवैक्लव्यं निरीक्ष्य जगदी श्वर: ।

तमग्निमपिबत्तीव्रमनन्तो उनन्तशक्तिध्रकू ॥

२५॥

इत्थमू--इस प्रकार से; स्व-जन--अपने ही भक्तों की; बैक्लव्यमू--विकलता; निरीक्ष्य--देखकर; जगत्ू-ई श्वरः--जगत केस्वामी; तम्‌--उस; अग्निमू--अग्नि को; अपिबत्‌--पी लिया; तीब्रमू-- भयानक; अनन्त:--अनन्त भगवान्‌ ने; अनन्त-शक्ति-धृक्‌ू--असीम शक्ति को धारण करनेवाले।

अपने भक्तों को इतना व्याकुल देखकर जगत के अनन्त स्वामी तथा अनन्त शक्ति को धारणकरनेवाले श्रीकृष्ण ने उस भयंकर दावाग्नि को निगल लिया।

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