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अध्याय बाईसवाँ: कृष्ण ने अविवाहित गोपियों के वस्त्र चुराये
10.22श्रीशुक उबाचहेमन्ते प्रथमे मासि नन्दव्रजकमारिकाः ।
चेरुईविष्यं भुज्जाना: कात्यायन्यर्चनब्रतम् ॥
१॥
श्री-शुकः उवाच-- श्री शुकदेव गोस्वामी ने कहा; हेमन्ते--हेमन्त ( जाड़े की ) ऋतु में; प्रथमे--प्रथम; मासि--महीने में; नन््द-ब्रज--नन्द महाराज के ग्वालों का गाँव; कुमारिका:--अविवाहित लड़कियों ने; चेरु:--सम्पन्न किया; हविष्यम्ू--बिना मसालेकी खिचड़ी; भुझ्ञाना:--खाकर; कात्यायनी --देवी कात्यायनी का; अर्चन-ब्रतम्-पूजा का ब्रत |
शुकदेव गोस्वामी ने कहा : हेमन्त ऋतु के पहले मास में गोकुल की अविवाहिता लड़कियोंने कात्यायनी देवी का पूजा-ब्रत रखा।
पूरे मास उन्होंने बिना मसाले की खिचड़ी खाई।
आप्लुत्याम्भसि कालिन्द्या जलान्ते चोदितेडरुणे कृत्वा प्रतिकृतिं देवीमानर्चुनंप सैकतीम् ।
गन्धैर्माल्यै: सुरभिभिरबलिभिर्धूपदी पकै:उच्चावचैश्लोपहारैः प्रवालफलतण्डुलै: ॥
३॥
आप्लुत्य--स्नान करके; अम्भसि--जल में; कालिन्द्या:--यमुना के; जल-अन्ते--नदी के तट पर; च--तथा; उदिते--उदयहोने वाले; अरुणे--तड़के; कृत्व--करके; प्रति-कृतिम्--अर्चाविग्रह; देवीम्ू--देवी; आनर्चु:--पूजा की; नृप--हे राजापरीक्षित; सैकतीम्--मिट्टी की; गन्धैः--चन्दन तथा अन्य सुगन्धित द्रव्यों से; माल्यै:ः--मालाओं से; सुरभिभि:--सुगन्धित;बलिभि:--भेंटों से; धूप-दीपकै:--धूप तथा दीपकों से; उच्च-अवचै:--ऐ श्वर्यवान तथा सीधीसादी भी; च--तथा; उपहारैः --भेंटों से; प्रवाल--कोंपल; फल--फल; तण्डुलै:--तथा सुपारी से।
हे राजन, सूर्योदय होते ही यमुना के जल में स्नान करके वे गोपियाँ नदी के तट पर देवीदुर्गा का मिट्टी का अर्चाविग्रह बनातीं।
तत्पश्चात् वे चन्दन लेप जैसी सुगन्धित सामग्री और महँगीऔर साधारण वस्तुओं यथा दीपक, फल, सुपारी, कॉंपलों तथा सुगन्धित मालाओं और अगुरुके द्वारा उनकी पूजा करतीं।
कात्यायनि महामाये महायोगिन्यधीश्वरि ।
नन्दगोपसुतं देवि पतिं मे कुरु ते नमः ।
इति मन्त्र जपन्त्यस्ता: पूजां चक्करु: कमारिका: ॥
४॥
कात्यायनी--हे देवी कात्यायनी; महा-माये--हे महामाया; महा-योगिनि--हे महायोगिनी; अधी श्रवरि--हे शक्तिमान नियंत्रक;नन्द-गोप-सुतम्--महाराज नंद के पुत्र को; देवि--हे देवी; पतिम्--पति; मे--मेरा; कुरू--बना दें; ते--आपको; नम:--नमस्कार; इति--इन शब्दों से; मन्त्रमू--मंत्र; जपन्त्य:--जपती हुई; ताः--उन; पूजाम्--पूजा; चक्रु:--सम्पन्न किया;कुमारिका:--अविवाहिता लड़कियों ने
प्रत्येक अविवाहिता लड़की ने निम्नलिखित मंत्र का उच्चारण करते हुए उनकी पूजा की:'हे देवी कात्यायनी, हे महामाया, हे महायोगिनी, हे अधीश्वरी, आप महाराज नन्द के पुत्र कोमेरा पति बना दें।
मैं आपको नमस्कार करती हूँ।
एवं मासं ब्रतं चेरु: कुमार्य: कृष्णचेतस: ।
भद्गकालीं समानर्चु्भूयात्रन्दसुत:ः पति: ॥
५॥
एवम्--इस प्रकार; मासम्ू--पूंरे मास भर; ब्रतम्ू--ब्रत; चेरु:--रखा; कुमार्य:--लड़कियों ने; कृष्ण-चेतस:--कृष्ण में लीनमनोंवाली; भद्र-कालीम्--देवी कात्यायनी को; समानर्चु:--ठीक से पूजा; भूयात्-- भगवान् करे ऐसा हो; नन्द-सुत:ः--राजानन्द का पुत्र; पति:--मेरा पति
इस प्रकार उन लड़कियों ने पूरे मास अपना व्रत रखा और अपने मन को कृष्ण में पूर्णतयालीन करते हुए इस विचार पर ध्यान लगाये रखा कि 'राजा नन्द का पुत्र मेरा पति बने ' इसप्रकार से देवी भद्रकाली की पूजा की।
ऊषस्युत्थाय गोत्रै: स्वैरन्योन्याबद्धबाहव: ।
कृष्णमुच्चैर्जगुर्यान्त्यः कालिन्द्ां स््नातुमन्वहम् ॥
६॥
ऊषसि--तड़के; उत्थाय--उठकर; गोत्रै:--नामों से; स्वै:ः--अपने अपने; अन्योन्य--एक-दूसरे का; आबद्ध--पकड़कर;बाहवः--हाथ; कृष्णम्--कृष्ण की महिमा हेतु; उच्चैः--उच्चा स्वर से; जगुः--गाने लगतीं; यान्त्य:--जाते हुए; कालिन्द्यामू--यमुना नदी को; स्नातुमू--स्नान करने के लिए; अनु-अहम्--प्रतिदिन |
प्रतिदिन वे बड़े तड़के उठतीं।
एक-दूसरे का नाम ले लेकर वे सब हाथ पकड़कर स्नान केलिए कालिन्दी जाते हुए कृष्ण की महिमा का जोर जोर से गायन करतीं।
नद्या: कदाचिदागत्य तीरे निश्षिप्य पूर्ववत् ।
वासांसि कृष्णं गायन्त्यो विजह्ढः सलिले मुदा ॥
७॥
नद्या:--नदी के; कदाचित्--एक बार; आगत्य--आकर; तीरे--तट पर; निश्षिप्प--उतारकर; पूर्व-वत्--पहिले जैसा;वासांसि--अपने वस्त्र; कृष्णम्--कृष्ण के विषय में; गायन्त्य:--गाती हुई; विजहु:--खेलने लगतीं; सलिले--जल में; मुदा--प्रसन्नतापूर्वक
एक दिन वे नदी के तट पर आईं और पहले की भाँति अपने वस्त्र उतारकर जल में क्रीड़ाकरने लगीं और कृष्ण के यश का गान करने लगीं।
भगवांस्तदभिप्रेत्य कृष्नो योगेश्वरेश्वर: ।
वयस्यैरावृतस्तत्र गतस्तत्कर्मसिद्धये ॥
८॥
भगवानू्-- भगवान्; तत्ू--वह; अभिप्रेत्य--देखकर; कृष्ण: -- श्रीकृष्ण; योग-ई श्वर-ई श्वरः -- यो गे श्वरों के भी ईश्वर; वयस्यैः --तरुण संगियों द्वारा; आवृतः--घिरे; तत्र--वहाँ; गत:--गये; तत्ू--उन कन्याओं के; कर्म--अनुष्ठान; सिद्धये--फल के लिएविश्वास दिलाने।
योगेश्वरों के भी ईश्वर भगवान् कृष्ण इस बात से अवगत थे कि गोपियाँ क्या कर रही हैंअतएव वे अपने समवयस्क संगियों के साथ गोपियों को उनकी साधना का फल देने गये।
तासां वासांस्युपादाय नीपमारुहय सत्वर: ।
हसद्धिः प्रहसन्बालै: परिहासमुवाच ह ॥
९॥
तासाम्--उन कन्याओं के; वासांसि--वस्त्रों को; उपादाय--लेकर; नीपम्ू--कदम्ब वृक्ष में; आरुह्म--चढ़कर; सत्वर:--फुर्तीसे; हसद्धिः--हँसते हुए; प्रहसन्--स्वयं जोर से हँसते; बालैः:--बालकों के साथ; परिहासम्--मजाक में; उवाच ह--कहा |
लड़कियों के वस्त्र उठाकर वे तेजी से कदम्ब वृक्ष की चोटी पर चढ़ गये।
तत्पश्चात् जब वेजोर से हँसे तो उनके साथी भी हँस पड़े और उन्होंने उन लड़कियों से ठिठोली करते हुए कहा।
अत्रागत्याबला: काम स्वं स्व वास: प्रगृह्मयताम् ।
सत्यं ब्रवाणि नो नर्म यद्यूयं ब्रतकर्शिता: ॥
१०॥
अत्र--यहाँ; आगत्य--आकर; अबला:--हे लड़कियो; कामम्--यदि चाहती हो; स्वम् स्वमू--अपने अपने; वास:--वस्त्र;प्रगृह्मतामू--ले जाओ; सत्यम्--सच; ब्रुवाणि--मैं सच कह रहा हूँ; न--नहीं; उ--प्रत्युत; नर्म--मजाक; यत्-- क्योंकि;यूयम्-तुम; ब्रत--तपस्या के व्रत से; क्शिता:-- थकी हुईं |
[भगवान् कृष्ण ने कहा : हे लड़कियो, तुम चाहो तो एक एक करके यहाँ आओ औरअपने वस्त्र वापस ले जाओ।
मैं तुम लोगों से सच कह रहा हूँ।
मैं मजाक नहीं कर रहा हूँ क्योंकिमैं देख रहा हूँ कि तुम लोग तपस्यापूर्ण व्रत करने से थक गई हो।
न मयोदितपूर्व वा अनृतं तदिमे विदुः ।
एकैकशः प्रतीच्छध्व॑ं सहैवेति सुमध्यमा: ॥
११॥
न--कभी नहीं; मया--मेरे द्वारा; उदित--कहा गया; पूर्वमू--इसके पहले; वै--निश्चयपूर्वक; अनृतम्--झूठ; तत्--वह;इमे--ये बालक; विदु:--जानते हैं; एक-एकशः--एक-एक करके; प्रतीच्छध्वम्--( तुम अपने वस्त्र ) उठा लो; सह--या सभीमिलकर; एव--निस्सन्देह; इति--इस प्रकार; सु-मध्यमा:--हे क्षीण कटिवाली बालाओ।
मैंने पहले कभी झूठ नहीं बोला और ये बालक इसे जानते हैं।
अतएव हे क्षीण कटिवालीबालाओ, या तो एक एक करके या फिर सभी मिलकर इधर आओ और अपने वस्त्र उठा लेजाओ।
तस्य तद्क््वेलितं इृष्ठा गोप्य: प्रेमपरिप्लुता: ।
ब्रीडिताः प्रेक्ष्य चान्योन्यं जातहासा न निर्ययु; ॥
१२॥
तस्य--उसका; तत्--वह; क्ष्वेलितम्--मजाकिया व्यवहार; हृष्ठा--देखकर; गोप्य:--गोपियाँ; प्रेम-परिप्लुता:-- भगवत्प्रेम मेंपूरी तरह निमग्न; ब्रीडिता:--सकुचाई ; प्रेक््य--देखकर; च--तथा; अन्योन्यम्--एक-दूसरे को; जात-हासाः:--हँसी आने केकारण; न निर्ययु:--नहीं निकलीं
यह देखकर कि कृष्ण उनसे किस तरह ठिठोली कर रहे हैं, गोपियाँ उनके प्रेम में पूरी तरहनिमग्न हो गईं और उलझन में होते हुए भी एक दूसरे की ओर देख-देखकर हँसने तथा परस्पर'परिहास करने लगीं।
लेकिन तो भी वे जल से बाहर नहीं आईं।
एवं ब्रुवति गोविन्दे नर्मणाक्षिप्तचेतस: ।
आकण्ठमग्ना: शीतोदे वेषमानास्तमब्रुवन् ॥
१३॥
एवम्--इस तरह; ब्रुवति--बोलते हुए; गोविन्दे--गोविन्द; नर्मणा--उनके मजाकिये शब्दों से, दिल्लगी से; आशक्षिप्त--श्षुब्ध;चेतस:--मनवाले; आ-कण्ठ--गले तक; मग्ना:--लीन; शीत--ठंडे; उदे--जल में; वेपमाना: --काँपती; तम्--उनसे;अब्रुवन्ू--बोलीं |
जब श्रीगोविन्द इस तरह बोले तो गोपियों के मन उनकी मजाकिया वाणी ( परिहास ) सेपूरी तरह मुग्ध हो गये।
वे ठंडे जल में गले तक धँसी रहकर काँपने लगीं।
अतः वे उनसे इस तरहबोलीं।
मानयं भो: कृथास्त्वां तु नन्दगोपसुतं प्रियम् ।
जानीमोडडु ब्रजएलाघ्यं देहि वासांसि वेषिता: ॥
१४॥
मा--मत; अनयमू्-- अनीति, अन्याय; भो: --हे कृष्ण; कृथा:--करो; त्वामू--तुमको; तु--दूसरी ओर; नन््द-गोप--महाराजनन्द के; सुतम्--पुत्र को; प्रियम्ू--प्रिय; जानीम:--जानती हैं; अड्ग--हे प्रिय; ब्रज-एलाघ्यम्--ब्रज-भर में विख्यात; देहि--कृपा करके दे दीजिये; वासांसि--हमारे वस्त्र; वेपिता:--कँपकँपा रही हम सबों को
गोपियों ने कहा : हे कृष्ण, अन्यायी मत बनो, हम जानती हैं कि तुम नन््द के माननीयपुत्र हो और ब्रज का हर व्यक्ति तुम्हारा सम्मान करता है।
हमें भी तुम अत्यन्त प्रिय हो।
कृपाकरके हमारे वस्त्र लौटा दो।
हम ठंडे जल में काँप रही हैं।
श्यामसुन्दर ते दास्यः करवाम तवोदितम् ।
देहि वासांसि धर्मज्ञ नो चेद्राज्ञे ब्रुवाम हे ॥
१५॥
श्यामसुन्दर--हे श्यामसुन्दर; ते--तुम्हारी; दास्य:--दासियाँ; करवाम--हम करेंगी; तब--तुम्हारे द्वारा; उदितम्ू--जो भी कहाजायेगा; देहि--दे दो; वासांसि--हमारे वस्त्र; धर्म-ज्ञ-हे धर्म के ज्ञाता; न--नहीं तो; उ--निस्सन्देह; चेत्--यदि; राज्ञे--राजासे; ब्रुवाम:--हम कहेंगी; हे--हे कृष्ण |
हे श्यामसुन्दर, हम तुम्हारी दासियाँ हैं और तुम जो भी कहोगे करेंगी।
किन्तु हमारे वस्त्र हमेंलौटा दो।
तुम धार्मिक नियमों के ज्ञाता हो और तुम यदि हमें हमारे वस्त्र नहीं दोगे, तो हम राजासे कह देंगी।
मान जाओ।
श्रीभगवानुवाचभवत्यो यदि मे दास््यो मयोक्त वा करिष्यथ ।
अत्रागत्य स्ववासांसि प्रतीच्छत शुचिस्मिता: ।
नो चेन्नाहं प्रदास्ये कि क्रुद्धो राजा करिष्यति ॥
१६॥
श्री-भगवान् उवाच-- भगवान् ने कहा; भवत्य:--तुम सब; यदि--यदि; मे--मेरी; दास्य:--दासियाँ; मया--मेरे द्वारा;उतक्तमू--कहा गया; वा--अथवा; करिष्यथ--तुम करोगी; अत्र--यहाँ; आगत्य--आकर; स्व-वासांसि--अपने अपने वस्त्र;प्रतीच्छत--चुन लो; शुचि--ताजी; स्मिता:--हँसी; न उ--नहीं तो; चेत्ू--यदि; न--नहीं; अहम्--मैं; प्रदास्ये--दे दूँगा;किम्--क्या; क्रुद्ध:--नाराज; राजा--राजा; करिष्यति--कर लेगा
भगवान् ने कहा : यदि तुम सचमुच मेरी दासियाँ हो और मैं जो कहता हूँ उसे वास्तव मेंकरोगी तो फिर अपनी अबोध भाव से मुस्कान भरकर यहाँ आओ और अपने अपने वस्त्र चुनलो।
यदि तुम मेरे कहने के अनुसार नहीं करोगी तो मैं तुम्हारे वस्त्र वापस नहीं दूँगा।
और यदिराजा नाराज भी हो जाये तो वह मेरा क्या बिगाड़ सकता है ?
ततो जलाशयात्सर्वा दारिकाः शीतवेपिता: ।
पाणिभ्यां योनिमाच्छाद्य प्रोत्तेर: शीतकर्शिता: ॥
१७॥
ततः--तत्पश्चात्; जल-आशयात्--नदी में से बाहर; सर्वा:--सभी; दारिका:--युवतियाँ; शीत-वेपिता:--जाड़े से काँपती;पाणिभ्याम्--अपने हाथों से; योनिम्ू--अपने गुप्त अंग को; आच्छाद्य--ढककर; प्रोत्तेस:--बाहर आगईं; शीत-कर्शिता: --जाड़े से पीड़ित।
तत्पश्चात् कड़ाके की शीत से काँपती सारी युवतियाँ अपने अपने हाथों से अपने गुप्तांग ढकेहुए जल के बाहर निकलीं।
भगवानाहता वीक्ष्य शुद्ध भावप्रसादित: ।
स्कन्धे निधाय वासांसि प्रीतः प्रोवाच सस्मितम् ॥
१८॥
भगवानू्-- भगवान् द्वारा; आहता:--विहल; वीक्ष्य--देखकर; शुद्ध--शुद्ध; भाव--स्नेह से; प्रसादित:--संतुष्ट; स्कन्धे--अपने कंधे पर; निधाय--रखकर; वासांसि--उनके वस्त्र; प्रीतः--प्यार से; प्रोवाच--बोले; स-स्मितम्--हँसते हुए |
जब भगवान् ने देखा कि गोपियाँ किस तरह विह्लल हैं, तो वे उनके शुद्ध प्रेम-भाव से संतुष्टहो गये।
उन्होंने अपने कन्धे पर उनके वस्त्र उठा लिए और हँसते हुए उनसे बड़े ही स्नेहपूर्वकबोले।
यूयं विवस्त्रा यदपो धृतब्रताव्यगाहतैतत्तदु देवहेलनम् ।
बद्ध्वाञजलिं मूर्ध्न्यपनुत्तये $हसःकृत्वा नमोधोवसन प्रगृह्मताम् ॥
१९॥
यूयम्--तुम लोगों ने; विवस्त्रा:--नंगी; यत्--क्योंकि; अप: --जल में; धृत-ब्रता:--वैदिक अनुष्ठान करते हुए; व्यगाहत--स्नान किया; एतत् तत्ू--यह; उ--निस्सन्देह; देव-हेलनमू--वरुण तथा अन्य देवताओं के प्रतिअपराध; बद्ध्वा अज्ञलिम्--हाथ जोड़कर; मूर्ध्चि--अपने अपने सिरों पर; अपनुत्तये--निराकरण के लिए; अंहस:--अपने अपने पाप कर्म के; कृत्वानमः--नमस्कार करके; अधः-वसनमू्--अपने अपने अधोवस्त्र; प्रगृह्मातामू--वापस लेलो।
[भगवान् कृष्ण ने कहा : तुम सबों ने अपना ब्रत रखते हुए नग्न होकर स्नान किया है, जोकि देवताओं के प्रति अपराध है।
अतः अपने पाप के निराकरण के लिए तुम सबों को अपनेअपने सिर के ऊपर हाथ जोड़कर नमस्कार करना चाहिए।
तभी तुम अपने अधोवस्त्र वापस लेसकती हो।
इत्यच्युतेनाभिहितं ब्रजाबलामत्वा विवस्त्राप्लवनं ब्रतच्युतिम् ।
तत्पूर्तिकामास्तदशेषकर्मणांसाक्षात्कृतं नेमुरवद्यमृग्यत: ॥
२०॥
इति--इन शब्दों द्वारा; अच्युतेन--अच्युत भगवान् द्वारा; अभिहितम्ू--इंगित की गई; ब्रज-अबला:--ब्रज की युवतियाँ;मत्वा--मानकर; विवस्त्र--नग्न; आप्लवनम्--स्नान; ब्रज-च्युतिमू--अपने व्रत से नीचे गिरकर; तत्-पूर्ति--उसकी पूर्ति;कामा:--इच्छुक; तत्--उस; अशेष-कर्मर्णामू--तथा अन्य अनन्त पुण्य कर्मो को; साक्षात्-कृतम्- प्रत्यक्ष फल के प्रति;नेमु;--नमस्कार किया; अवद्य-मृक्ू--सभी पापों को दूर करनेवाला; यतः--क्योंकि
इस तरह वृन्दावन की उन युवतियों ने कृष्ण द्वारा कहे गये वचनों पर विचार करके यह मानलिया कि नदी में नग्न स्नान करने से वे अपने व्रत से पतित हुई हैं।
किन्तु तो भी वे अपना ब्रतपूरा करना चाहती थीं और चूँकि भगवान् कृष्ण समस्त पुण्य कर्मों के प्रत्यक्ष चरमफल हैं अतःअपने पापों को धो डालने के उद्देश्य से उन्होंने कृष्ण को नमस्कार किया।
तास्तथावनता हृष्ठा भगवान्देवकीसुतः ।
वासांसि ताभ्य: प्रायच्छत्करूणस्तेन तोषित: ॥
२१॥
ताः--तब; तथा--इस तरह; अवनता:--सिर झुकाते; दृष्ठा--देखकर; भगवान्-- भगवान्; देवकी-सुतः --देवकी पुत्र, कृष्णने; वासांसि--वस्त्र; ताभ्य:--उनको; प्रायच्छत्--लौटा दिया; करुण:--दयालु; तेन--उस कार्य से; तोषित:--सम्तुष्ट |
उन्हें इस प्रकार नमस्कार करते देखकर देवकीपुत्र भगवान् ने उनपर करुणा करके तथाउनके कार्य से संतुष्ट होकर उनके वस्त्र लौटा दिये।
ह॒ढं प्रलब्धास्त्रपया च हापिताःप्रस्तोभिता: क्रीडनवच्च कारिता: ।
वस्त्राणि चैवापहतान्यथाप्यमुंता नाभ्यसूयन्प्रियसड्निर्वृता: ॥
२२॥
हृढम्--बुरी तरह से; प्रलब्धा: --ठगी हुई; त्रपया--अपनी लज्जा से; च--तथा; हापिता: --वंचित; प्रस्तोभिता:--मजाक उड़ाईगई; क्रीडन-वत्--गुड़ियों की तरह; च--तथा; कारिता:--करने के लिए बाध्य की गई; वस्त्राणि--उनके वस्त्र; च--तथा;एव--निस्सन्देह; अपहतानि--चुराये हुए; अथ अपि--तो भी; अमुम्--उनके प्रति; ता:--वे; न अभ्यसूयन्--शत्रुभाव नहींलाईं; प्रिय--अपने प्रियतम का; सड्गभ--साथ करने से; निर्वृता:--हर्षित |
यद्यपि गोपियाँ बुरी तरह ठगी जा चुकी थीं, उनके शील-संकोच से उन्हें वंचित किया जाचुका था, उन्हें कठपुतलियों की तरह नचाया गया था और उनका उपहास किया गया था औरयद्यपि उनके वस्त्र चुराये गये थे किन्तु उनके मन में श्रीकृष्ण के प्रति रंच-भर भी प्रतिकूल भावनहीं आया।
उल्टे वे अपने प्रियतम के सान्निध्य का यह अवसर पाकर सहज रूप से पुलकित थीं।
परिधाय स्ववासांसि प्रेष्ठमड्रमसज्जिता: ।
गृहीतचित्ता नो चेलुस्तस्मिन्लज्जायितेक्षणा: ॥
२३॥
परिधाय--पहनकर; स्व-वासांसि--अपने अपने वस्त्र; प्रेष्ट--अपने प्रिय के; सड्रम--इस मिलन से; सज्जिता:--उनके प्रति पूरीतरह अनुरक्त हुईं; गृहीत--चुराये गये; चित्ता:--मनवाली; न--नहीं; उ--निस्सन्देह; चेलु;--हिलडुल सकीं; तस्मिनू--उनपर;लज्जायित--लज्ा से पूर्ण; ईक्षणा:--चितवनें |
गोपियाँ अपने प्रिय कृष्ण से मिलने के लिए आतुर थीं अतएव वे उनके द्वारा मोह ली गईं।
इस तरह अपने अपने वस्त्र पहन लेने के बाद भी वे हिलीही नहीं।
वे लजाती हुई उन्हीं परटकटकी लगाये जहाँ की तहाँ खड़ी रहीं।
तासां विज्ञाय भगवान्स्वपादस्पर्शकाम्यया ।
धृतब्रतानां सड्डल्पमाह दामोदरोबला: ॥
२४॥
तासाम्--उन; विज्ञाय--जानकर; भगवान्-- भगवान् के; स्व-पाद-- अपने पाँवों का; स्पर्श--स्पर्श पाने; काम्यया--इच्छा से;धृत-ब्रतानाम्--ब्रत धारण करने वाली; सड्डूल्पम्--संकल्प; आह--बोले; दामोदर: -- भगवान् दामोदर; अबला: --लड़कियोंसे।
भगवान् उन गोपियों के द्वारा किये जा रहे कठोर ब्रत के संकल्प को समझ गये।
वे यह भीजान गये कि ये बालाएँ उनके चरणकमलों का स्पर्श करना चाहती हैं अतः भगवान् दामोदरकृष्ण उनसे इस प्रकार बोले।
सड्डल्पो विदितः साध्व्यो भवतीनां मरदर्चनम् ।
मयानुमोदितः सोसौ सत्यो भवितुमहति ॥
२५॥
सह्जडूल्प:--संकल्प; विदित:--समझ गया; साध्व्य:--हे सती साध्वी लड़कियो; भवतीनाम्--तुम्हारे; मत्-अर्चनमू--मेरी पूजा;मया--मेरे द्वारा; अनुमोदित: --समर्थित; सः असौ--वह; सत्य:--सच; भवितुम््--होए; अरहति--अवश्य |
'हे साध्वी लड़कियो, मैं समझ गया कि इस तपस्या के पीछे तुम्हारा असली संकल्प मेरीपूजा करना था।
तुम्हारी इस अभिलाषा का मैं अनुमोदन करता हूँ और यह अवश्य ही खराउतरेगा।
न मय्यावेशितधियां काम: कामाय कल्पते ।
भर्जिता क्वथिता धाना: प्रायो बीजाय नेशते ॥
२६॥
न--नहीं; मयि--मुझमें; आवेशित--लीन; धियाम्ू--चेतना वाली; काम:--इच्छा; कामाय-- भौतिक विषय वासना की ओर;कल्पते--ले जाती है; भर्जिता:--जलाया गया; क्वधिता: --पकाया गया; धाना:--अन्न; प्राय:--अधिकांशत:; बीजाय--नवीन वृद्धि; न इष्यते--उत्पन्न नहीं कर सकते |
जो लोग अपना मन मुझ पर टिका देते हैं उनकी इच्छा उन्हें इन्द्रियतृप्ति की ओर नहीं लेजाती जिस तरह कि धूप से झुलसे और फिर अग्नि में पकाये गये जौ के बीज नये अंकुर बनकर नहीं उग सकते।
याताबला ब्रजं सिद्धा मयेमा रंस्यथा क्षपा: ।
यदुद्धिश्य ब्रतमिदं चेरुरार्यार्चन॑ सती: ॥
२७॥
यात--अब जाओ; अबला: --हे बालिकाओ; ब्रजम्--व्रज; सिद्धा:--इच्छा पूर्ति करके; मया--मेरे साथ; इमा:--ये;रंस्थथ--तुम बिता सकोगी; क्षपा:--रातें; यत्--जो; उद्दिश्य--मन में रखकर; ब्रतम्--ब्रत; इृदम्--यह; चेरु:--तुमने कियाहै; आर्या--कात्यायनी देवी की; अर्चनम्--पूजा; सती:--शुद्ध होने से |
हे बालाओ, जाओ, अब ब्रज लौट जाओ।
तुम्हारी इच्छा पूरी हो गई है क्योंकि तुम आनेवाली रातें मेरे साथ बिता सकोगी।
हे शुद्ध हृदय वाली गोपियो, देवी कात्यायनी की पूजा करनेके पीछे तुम्हारे त्रत का यही तो उद्देश्य था! श्रीशुक उबाचइत्यादिष्टा भगवता लब्धकामाः कुमारिकाः ॥
ध्यायन्त्यस्तत्पदाम्भोजम्कृच्छान्निर्विविशुर्त्रजम् ॥
२८ ॥
श्री-शुकः उवाच-- श्री शुकदेव गोस्वामी ने कहा; इति--इस प्रकार; आदिष्टा:--आदेश पाकर; भगवता-- भगवान् द्वारा;लब्ध--प्राप्त; कामा:ः--इच्छाएँ; कुमारिका: --कुमारियाँ; ध्यायन्त्य:--ध्यान करती हुई; तत्--उनके ; पद-अम्भोजम्--चरणकमलों को; कृच्छात्--मुश्किल से; निर्विविशु:--लौट आईं; ब्रजम्-ब्रज ग्राम |
शुकदेव गोस्वामी ने कहा : भगवान् द्वारा आदेश दिये जाकर अपनी मनोवांछा पूरी करके वेबालाएँ उनके चरणकमलों का ध्यान करती हुईं बड़ी ही मुश्किल से ब्रज ग्राम वापस आईं।
अथ गोपै: परिवृतो भगवान्देवकीसुतः ।
वृन्दावनादगतो दूर चारयन्गा: सहाग्रज: ॥
२९॥
अथ--कुछ समय बाद; गोपै:--ग्वालबालों से; परिवृत:--घिरे हुए; भगवान्--भगवान्; देवकी-सुत:--देवकीपुत्र;बृन्दावनात्--वृन्दावन से; गत:--गये; दूरम्--दूर; चारयन्--चराते हुए; गा:--गौवें; सह-अग्रज: --अपने भाईं बलराम केसाथ
कुछ काल बाद देवकीपुत्र कृष्ण अपने ग्वालबाल मित्रों से घिरकर तथा अपने बड़े भाईबलराम के संग गौवें चराते हुए वृन्दावन से काफी दूर निकल गये।
निदधघार्कातपे तिग्मे छायाभि: स्वाभिरात्मन: ।
आततपत्रायितान्वीक्ष्य द्रमानाह ब्रजौकसः ॥
३०॥
निदाघ--गीष्म ऋतु के; अर्क--सूर्य की; आतपे--तपन में; तिग्मे-- प्रखर; छयभि:--छाया के साथ; स्वाभि: --अपनी;आत्मन:--अपने लिए; आतपत्रायितानू--छाता के रूप में; वीक्ष्य--देखकर; द्रुमान्--वृक्षों को; अह--कहा; ब्रज-ओकस: --ब्रज के बालकों से |
जब सूर्य की तपन प्रखर हो गई तो कृष्ण ने देखा कि सारे वृक्ष मानो उन पर छाया करकेछाते का काम कर रहे हैं।
तब वे अपने ग्वालमित्रों से इस प्रकार बोले।
हे स्तोककृष्ण हे अंशो श्रीदामन्सुबलार्जुन ।
विशाल वृषभौजस्विन्देवप्रस्थ वरूथप ॥
३१॥
पश्यतैतान्महाभागान्परार्थेकानतजीवितान् ।
वातवर्षातपहिमान्सहन्तो वारयन्ति न: ॥
३२॥
हे स्तोक-कृष्ण--हे स्तोक कृष्ण; हे अंशो--हे अंशु; श्रीदामन् सुबल अर्जुन--हे श्रीदामा, सुबल तथा अर्जुन; विशाल वृषभओजस्विन्--हे विशाल, वृषभ तथा ओजस्वी; देवप्रस्थ वरूथप--हे देवप्रस्थ तथा वरूथप; पश्यत--जरा देखो तो; एतानू--इन; महा-भागान्--परम भाग्यशाली; पर-अर्थ--अन्यों के लाभ हेतु; एकान्त--एकान्त भाव से; जीवितान्ू--जिनका जीवन;वात--वायु; वर्ष--वर्षा; आतप--सूर्य की तपन; हिमान्ू--तथा बर्फ ( पाला ); सहन्तः--सहते हुए; वारयन्ति--दूर रखते हैं;नः--हमारे लिए।
भगवान् कृष्ण ने कहा 'हे स्तोककृष्ण तथा अंशु, हे श्रीदामा, सुबल तथा अर्जुन, हे वृषभ,ओजस्वी, देवप्रस्थ तथा वरूथप, जरा इन भाग्यशाली वृक्षों को तो देखो जिनके जीवन ही अन्योंके लाभ हेतु समर्पित हैं।
वे हवा, वर्षा, धूप तथा पाले को सहते हुए भी इन तत्त्वों से हमारी रक्षाकरते हैं।
अहो एषां वरं जन्म सर्व प्राण्युपजीवनम् ।
सुजनस्येव येषां वै विमुखा यान्ति नार्थिन: ॥
३३॥
अहो--ओह, जरा देखो तो; एषाम्--इन वृक्षों का; वरम्-- श्रेष्ठ; जन्म--जन्म; सर्व--समस्त; प्राणि--जीवों के लिए;उपजीविनम्--पालन करने वाले; सु-जनस्य इब--महापुरुषों की भाँति; येषाम्--जिनसे; बै--निश्चय ही; विमुखा: --निराश;यान्ति--चले जाते हैं; न--कभी नहीं; अर्थिन:--कुछ चाहने वाले
जरा देखो, कि ये वृक्ष किस तरह प्रत्येक प्राणी का भरण कर रहे हैं।
इनका जन्म सफल है।
इनका आचरण महापुरुषों के तुल्य है क्योंकि वृक्ष से कुछ माँगने वाला कोई भी व्यक्ति कभीनिराश नहीं लौटता।
पत्रपुष्पफलच्छायामूलवल्कलदारुभि: ॥
गन्धनिर्यासभस्मास्थितोक्मै: कामान्वितन्वते ॥
३४॥
पत्र--पत्तियाँ; पुष्प--फूल; फल--फल; छाया--छाया; मूल-- जड़; वल्कल--छाल; दारुभि:--तथा लकड़ी द्वारा; गन्ध--अपनी सुगन्ध से; निर्यास--रस से; भस्म--राख से; अस्थि--लुगदी से; तोक्मै:--तथा नये नये कल्लों से; कामान्--इच्छितवस्तुएँ; वितन्वते--प्रदान करते हैं
ये वृक्ष अपनी पत्तियों, फूलों तथा फलों से, अपनी छाया, जड़ों, छाल तथा लकड़ी से तथाअपनी सुगंध, रस, राख, लुगदी और नये नये कल्लों से मनुष्यों की इच्छापूर्ति करते हैं।
एतावज्जन्मसाफल्यं देहिनामिह देहिषु ।
प्राणैरथेंधिया वाचा श्रेयआचरणं सदा ॥
३५॥
एतावत्--इस तक; जन्म--जन्म की; साफल्यम्--सफलता, सिद्धि; देहिनामू--हर प्राणी की; इह--इस जगत में; देहिषु--देहधारियों के प्रति; प्राणै:--प्राण से; अर्थै:--धन से; धिया--बुद्धि से; वाचा--वाणी से; श्रेयः--शा श्वत सौभाग्य;आचरणम्--आचरण करते हुए; सदा--सदैव
हर प्राणी का कर्तव्य है कि वह अपने प्राण, धन, बुद्धि तथा वाणी से दूसरों के लाभ हेतुकल्याणकारी कर्म करे।
इति प्रवालस्तबकफलपुष्पदलोत्करै: ।
तरूणां नप्रशाखानां मध्यतो यमुनां गत: ॥
३६॥
इति--इस प्रकार कहते हुए; प्रवाल--नई शाखाओं का; स्तबक-गुच्छे से; फल--फल; पुष्प--फूल; दल--तथा पत्तियोंकी; उत्करैः--अधिकता से; तरूणाम्--वृक्षों की; नप्न--झुकी हुई; शाखानाम्ू--डालियों के; मध्यतः--बीच में से;यमुनाम्--यमुना नदी तक; गतः--आये।
इस तरह वृक्षों के बीच विचरण करते हुए, जिनकी शाखाएँ कोपलों, फलों, फूलों तथापत्तियों की बहुलता से झुकी हुई थीं, भगवान् कृष्ण यमुना नदी के तट पर आ गये।
तत्र गा: पाययित्वापः सुमृष्टाः शीतला: शिवा: ।
ततो नृप स्वयं गोपा: काम स्वादु पपुर्जलम् ॥
३७॥
तत्र--वहाँ; गाः--गौवों को; पाययित्वा--पानी पिलाकर; अप:--जल; सु-मृष्टा:--अत्यन्त स्वच्छ; शीतला:--शीतल;शिवा:--स्वास्थ्यप्रद; ततः--तत्पश्चात्; नृप--हे राजा परीक्षित; स्वयम्--अपने से; गोपा: --ग्वालबाल; कामम्--स्वच्छन्दतापूर्वक; स्वादु--स्वादिष्ट; पपु:--पिया; जलम्ू--जल।
ग्वालों ने गौवों को यमुना नदी का स्वच्छ, शीतल तथा स्वास्थ्यप्रद जल पीने दिया।
हे राजापरीक्षित, ग्वालों ने भी जी भरकर उस मधुर जल का पान किया।
तस्या उपवने काम॑ चारयन्तः पशूत्रुप ।
कृष्णरामाबुपागम्य क्षुधार्ता इदमब्रवन् ॥
३८ ॥
तस्या:--यमुना के किनारे; उपवने--छोटे जंगल में; कामम्--इच्छानुसार इधर उधर; चारयन्तः--चराते हुए; पशूनू--पशुओंको; नृप--हे राजा; कृष्ण-रामौ--कृष्ण तथा राम; उपागम्य--निकट जाकर; श्षुत्-आर्ता:--भूख से पीड़ित; इृदम्ू--यह;अब्लुवनू--कहा |
तत्पश्चात् हे राजनू, सारे ग्वालबाल यमुना के तट पर एक छोटे से जंगल में पशुओं कोउन्मुक्त ढंग से चराने लगे।
किन्तु शीघ्र ही भूख से त्रस्त होकर वे कृष्ण तथा बलराम के निकटजाकर इस प्रकार बोले।
