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अध्याय तेईसवाँ: ब्राह्मणों की पत्नियों का आशीर्वाद
10.23श्रीगोप ऊचुःराम राम महाबाहो कृष्ण दुष्टनिबर्हण ।
एषा वै बाधतेक्षुत्नस्तच्छान्ति कर्तुमहथः ॥
१॥
श्री-गोपा: ऊचु:--ग्वालबालों ने कहा; राम राम--हे राम, हे राम; महा-बाहो--हे बलशाली भुजाओं वाले; कृष्ण--हे कृष्ण;दुष्ट--दुष्ट का; निबहण--दलन करने वाले; एघा--यह; वै--निस्सन्देह; बाधते--कष्ट दे रही है; क्षुत्-- भूख; नः--हमें; तत्ू-शान्तिमू--उसकी शान्ति के लिए; कर्तुम् अर्हथ:--तुम्हें करना चाहिए
ग्वालबालों ने कहा : हे महाबाहु राम, हे दुष्टदलन कृष्ण, हम सब भूख से त्रस्त हैं।
इसकेलिए आपको कुछ करना चाहिए।
श्रीशुक उबाचइति विज्ञापितो गोपैर्भगवान्देवकीसुत: ।
भक्ताया विप्रभार्याया: प्रसीदन्निदमब्रवीत् ॥
२॥
श्री-शुकः उवाच-- श्रीशुकदेव गोस्वामी ने कहा; इति--इस प्रकार; विज्ञापित:--सूचित; गोपै: --ग्वालबालों के द्वारा;भगवान्-- भगवान्; देवकी-सुत:ः--देवकी पुत्र; भक्ताया:-- अपने भक्तों को; विप्र-भार्याया:--ब्राह्मण-पत्नलियों को; प्रसीदन्--तुष्ट करने की इच्छा से; इदम्-यह; अब्रवीत्ू--कहा
शुकदेव गोस्वामी ने कहा : ग्वालबालों द्वारा इस प्रकार प्रार्थना किये जाने पर देवकीपूत्रभगवान् ने अपने कुछ भक्तों को जो कि ब्राह्मण पत्नियाँ थीं प्रसन्न करने की इच्छा से इस प्रकारउत्तर दिया।
प्रयात देवयजनं ब्राह्मणा ब्रह्मवादिन: ।
सत्रमाड्रिरसं नाम ह्यासते स्वर्गकाम्यया ॥
३॥
प्रयात--जाओ; देव-यजनम्--यज्ञशाला तक; ब्राह्मणा:--ब्राह्मणजण; ब्रह्म-वादिन:--वैदिक आदेशों के अनुयायी; सत्रम्--यज्ञ; आड्रिस्सम् नाम--आंगिरस नामक; हि--निस्सन्देह; आसते--इस समय कर रहे हैं; स्वर्ग-काम्यया--स्वर्ग जाने के उद्देश्यसे
भगवान् कृष्ण ने कहा : तुम लोग यज्ञशाला में जाओ जहाँ वैदिक आदेशों में निपुणब्राह्मणों का एक समूह स्वर्ग जाने की इच्छा से इस समय आंगिरस यज्ञ कर रहा है।
तत्र गत्वौदनं गोपा याचतास्मद्विसर्जिता: ।
कीर्तयन्तो भगवत आर्यस्य मम चाभिधाम् ॥
४॥
तत्र--वहाँ; गत्वा--जाकर; ओदनम्-- भोजन; गोपा:--हे ग्वालबालो; याचत--माँगो; अस्मत्--हमारे द्वारा; विसर्जिता:--भेजे गये; कीर्तयन्तः--घोषित करते हुए; भगवत:--भगवान् का; आर्यस्य--ज्येष्ठ; मम--मेरा; च-- भी; अभिधाम्--नाम |
है ग्वालबालो, तुम वहाँ जाकर कुछ भोजन माँग लाओ।
उनसे मेरे बड़े भाई भगवान्बलराम का तथा मेरा भी नाम बतलाना और बताना कि उन्होंने ही हम लोगों को भेजा है।
इत्यादिष्टा भगवता गत्वा याचन्त ते तथा ।
कृताझलिपुटा विप्रान्दण्डवत्पतिता भुवि ॥
५॥
इति--इन शब्दों द्वारा; आदिष्ट:--आज्ञा दिये जाकर; भगवता-- भगवान् द्वारा; गत्वा--जाकर; अयाचन्त--माँगा; ते--उन्होंने;तथा--उस तरह से; कृत-अज्जलि-पुटा:--विनप्रतावश दोनों हाथ जोड़कर; विप्रानू--ब्राह्मणों को; दण्ड-वत्--डण्डे केसमान; पतिता:--गिरकर; भुवि-- भूमि पर
भगवान् से यह आदेश पाकर ग्वालबालों ने वहाँ जाकर निवेदन किया।
वे ब्राह्मणों केसमक्ष विनयपूर्वक हाथ जोड़कर खड़े रहे और फिर भूमि पर लेटकर उन्हें नमस्कार किया।
हे भूमिदेवा: श्रुणुत कृष्णस्यादेशकारिण: ।
प्राप्ताज्ञानीत भद्गं वो गोपान्नो रामचोदितान् ॥
६॥
हे भूमि-देवा:--हे पृथ्वी के देवताओ; श्रुणुत--सुनिये; कृष्णस्य आदेश--कृष्ण का आदेश; कारिण:--कार्यरूप में परिणतकरने वाले; प्राप्तानू--आये हुए; जानीत--जानिये; भद्रमू--कल्याण हो; वः--तुम सबों का; गोपान्--ग्वालबालों को; न:ः--हम; राम-चोदितानू--राम द्वारा भेजे गये।
[ग्वालबालों ने कहा : हे पृथ्वी के देवताओ, कृपया हमारी बात सुनें।
हम ग्वालबालकृष्ण का आदेश लेकर आये हैं और हमें बलराम ने यहाँ भेजा है।
हम आपका कल्याण चाहतेहैं।
आप हमारा आगमन स्वीकार करें।
गाश्चारयन्तावविदूर ओदनंरामाच्युतौ वो लषतो बुभुक्षितौ ।
तयोद्विजा ओदनमर्थिनोर्यदिश्रद्धा च वो यच्छत धर्मवित्तमा: ॥
७॥
गा:--अपनी गौवें; चारयन्तौ--चराते हुए; अविदूरे--दूर नहीं; ओदनम्-- भोजन; राम-अच्युतौ--राम तथा अच्युत; व:--आपसे; लषत:--इच्छुक हैं; बुभुक्षितौ-- भूखे होने के कारण; तयोः--उनके लिए; द्विजा:--हे ब्राह्मणो; ओदनम्-- भोजन;अर्थिनो: --माँग रहे हैं; यदि--यदि; श्रद्धा--कोई श्रद्धा; च--तथा; वः--आपमें; यच्छत--कृपा करके दें; धर्म-वित्-तमा:--हे धर्म के जानने वालों में श्रेष्ठ |
भगवान् राम तथा भगवान् अच्युत यहाँ से निकट ही अपनी गौवें चरा रहे हैं।
वे भूखे हैं औरचाहते हैं कि आप उन्हें अपने पास से कुछ भोजन दें।
अतः हे ब्राह्मणो, हे धर्म के ज्ञाताओं मेंश्रेष्ठ, यदि आपकी श्रद्धा है, तो उनके लिए कुछ भोजन दे दें।
दीक्षाया: पशुसंस्थाया: सौत्रामण्याश्न सत्तमा: ।
अन्यत्र दीक्षितस्यापि नान्नमएनन्हि दुष्यति ॥
८॥
दीक्षाया:--यज्ञ के लिए दीक्षा से लेकर; पशु-संस्थाया:--पशु यज्ञ तक; सौत्रामण्या: --सौत्रामणि यज्ञ से बाहर; च--तथा;सतू-तमाः--हे विशुद्ध जनो; अन्यत्र--अन्य कहीं; दीक्षितस्थ--यज्ञ में दीक्षित व्यक्ति का; अपि-- भी; न--नहीं; अन्नम्--भोजन; अश्नन्ू--खाते हुए; हि--निस्सन्देह; दुष्यति-- अपराध होता है।
हे शुद्धतम ब्राह्मणो, यज्ञकर्ता की दीक्षा तथा वास्तविक पशु यज्ञ के मध्य की अवधि कोछोड़कर तथा सौत्रामणि के अतिरिक्त अन्य यज्ञों में दीक्षित व्यक्ति के लिए भी भोजन करना दूषित नहीं है।
इति ते भगवद्याच्ञां श्रृण्वन्तोडपि न शुश्रुव॒।
क्षुद्राशा भूरिकर्माणो बालिशा वृद्धमानिन: ॥
९॥
इति--इस प्रकार; ते--वे ब्राह्मण; भगवत्-- भगवान् का; याच्ञामू--निवेदन; श्रृण्वन्तः --सुनते हुए; अपि--यद्यपि; नशुश्रुवु:ः--नहीं सुना; क्षुद्र-आशा:--श्षुद्र आशा से पूरित; भूरि-कर्माण:--विस्तृत कर्मकाण्ड में फँसे; बालिशा:--बच्चों जैसेमूर्ख, बचकाना; वृद्ध-मानिन:--अपने को चतुर व्यक्ति मानते हुए।
ब्राह्मणों ने पूर्ण पुरुषोत्तम भगवान् की ओर से किये गये इस निवेदन को सुना।
फिर भीउन्होंने इसको अनसुना कर दिया।
दरअसल वे क्षुद्र भावनाओं से पूरित थे और विस्तृतकर्मकाण्ड में लगे थे।
यद्यपि वे वैदिक ज्ञान में अपने को बढ़ाचढ़ा मान रहे थे किन्तु वास्तव मेंवे अनुभवविहीन मूर्ख थे।
देश: काल: पृथगद्रव्यं मन्त्रतन्त्र्त्विजोउग्नय: ।
देवता यजमानश्च क्रतुर्धर्मश्ष यन््मय: ॥
१०॥
त॑ ब्रह्म परमं साक्षाद्धगवन्तमधोक्षजम् ।
मनुष्यदष्टदया दुष्प्रज्ञा मर्त्यात्मानो न मेनिरे ॥
११॥
देश:--स्थान; काल:--समय; पृथक् द्रव्यमू--साज-सामान की विशिष्ट वस्तुएँ; मन्त्र--वैदिक स्तोत्र; तन्त्र--निर्धारित अनुष्ठान;ऋत्विज: -- पुरोहित; अग्नयः--यज्ञ की अग्नियाँ; देवता:--अधिष्ठाता देवता; यजमान:--यज्ञ करने वाला; च--तथा; क्रतुः--हवि; धर्म:--सकाम फलों की अदृश्य शक्ति; च--तथा; यत्--जिसको; मयः--बनाने वाले; तम्--उसको; ब्रह्म परमम्--परब्रहा; साक्षात्-- प्रत्यक्ष; भगवन्तम्-- भगवान् को; अधोक्षजम्-- भौतिक इन्द्रियों से परे; मनुष्य-दृ्या--उन्हें सामान्य व्यक्तिके रूप में देखते हुए; दुष्प्रज्ञाः--विकृत बुद्धि वाले; मर्त्य-आत्मान:--मिथ्या ही भौतिक शरीर के रूप में अपनी पहचान करतेहुए; न मेनिरि--ठीक से आदर नहीं दिया।
यद्यपि यज्ञ करने की सारी सामग्री--स्थान, समय, विशेष सामग्री, मंत्र, अनुष्ठान, पुरोहित,अग्नि, देवता, यजमान, हवि तथा अभी तक के देखे गए लाभकारी परिणाम--ये सभी भगवान्के ऐश्वर्य के विविध पक्ष हैं किन्तु ब्राह्मणों ने अपनी विकृत बुद्धि के कारण भगवान् कृष्ण कोसामान्य व्यक्ति के रूप में देखा।
वे यह न समझ पाये कि वे परब्रह्म हैं, साक्षात् भगवान् हैं, जिन्हेंभौतिक इन्द्रियाँ सामान्य रूप से अनुभव नहीं कर पातीं।
अतः मर्त्य शरीर से अपनी झूठी पहचानकरने से मोहित उन सबों ने भगवान् के प्रति उचित सम्मान प्रदर्शित नहीं किया।
न ते यदोमिति प्रोचुर्न नेति च परन्तप ।
गोपा निराशा: प्रत्येत्य तथोचु: कृष्णरामयो: ॥
१२॥
न--नहीं; ते--वे; यत्ू--जब; ओम्--' ऐसा ही हो '; इति--इस प्रकार; प्रोचु; --बोले; न--नहीं; न--नहीं; इति--ऐसा;च--या तो; परन्तप--हे शत्रुओं को दण्ड देने वाले परीक्षित महाराज; गोपा:--ग्वालबाल; निराशा: --उत्साहरहित; प्रत्येत्य--लौटकर; तथा--इस प्रकार; ऊचु:--बतलाया; कृष्ण-रामयो:--कृष्ण तथा राम से |
जब वे ब्राह्मण हाँ या ना में भी उत्तर नहीं दे पाये तो हे परन्तप ( परीक्षित ), सारे ग्वालबालनिराश होकर कृष्ण तथा राम के पास लौट आये और उनको यह बात बतलाई।
तदुपाकर्ण्य भगवान्प्रहस्थ जगदी श्वरः ।
व्याजहार पुनर्गोपान्दर्शयन्लौकिकीं गतिम् ॥
१३॥
तत्--उसे; उपाकर्ण्य--सुनकर; भगवान्-- भगवान् ने; प्रहस्थ--हँसकर; जगत्-ई श्वरः-- सम्पूर्ण ब्रह्माण्ड के नियन्ता;व्याजहार--सम्बोधित किया; पुनः--फिर; गोपान्ू--ग्वालबालों को; दर्शयन्--दिखलाते हुए; लौकिकीम्--सामान्य जगतका; गतिम्--मार्ग |
जो कुछ हुआ था उसे सुनकर ब्रह्माण्ड के स्वामी भगवान् हँसने लगे।
तत्पश्चात् उन्होंने पुनःग्वालबालों को इस जगत में जिस तरह लोग कर्म करते हैं उस मार्ग को दिखलाते हुए सम्बोधितकिया।
मां ज्ञापयत पत्नीभ्य: ससड्डूर्षणमागतम् ।
दास्यन्ति काममन्नं वः स्निग्धा मय्युषिता धिया ॥
१४॥
माम्--मुझको; ज्ञापपत--कृपया घोषित कर दें; पत्नी भ्य:--स्त्रियों को; स-सड्डूर्षणम्--बलराम सहित; आगतम्--आये हुए;दास्यन्ति--वे देंगी; कामम्--इच्छानुसार; अन्नम्ू-- भोजन; वः--तुमको; स्निग्धा:--स्नेहमय; मयि--मुझमें ; उषिता:--निवासकरते हुए; धिया-- अपनी बुद्धि से
भगवान् कृष्ण ने कहा : ब्राह्मणपत्नियों से कहो कि मैं संकर्षण समेत यहाँ आया हूँ।
वेअवश्य ही तुम्हें जितना भोजन चाहोगे उतना देंगी क्योंकि वे मेरे प्रति अत्यन्त स्नेहमयी हैं और वेअपनी बुद्धि से मुझमें ही निवास करती हैं।
गत्वाथ पलीशालायां इृष्टासीना: स्वलड्डू ता: ।
नत्वा द्विजसतीर्गोपा: प्रश्निता इृदमब्रुवन् ॥
१५॥
गत्वा--जाकर; अथ--तब; पत्नी-शालायाम्--ब्राह्मणपत्नियों के घर में; दृष्टा --उन्हें देखकर; असीना:--बैठी हुईं; सु-अलड्डू ताः--आभूषणों से अच्छी तरह सजी हुईं; नत्वा--नमस्कार करने के लिए झुकते हुए; द्विज-सती:--ब्राह्मणों की सतीपत्नियों से; गोपा:--ग्वालबालों ने; प्रश्रिता:--विनयपूर्वक; इृदम्--यह; अन्लुवन्ू--कहा |
तब ग्वालबाल उस घर में गये जहाँ ब्राह्मण पत्नियाँ ठहरी हुई थीं।
वहाँ उन बालकों ने उनसती स्त्रियों को सुन्दर आभूषणों से अलंकृत होकर बैठे देखा।
बालकों ने ब्राह्मण-पत्नियों कोनमस्कार करते हुए विनीत भाव से उन्हें सम्बोधित किया।
नमो वो विप्रपत्नी भ्यो निबोधत वचांसि नः ।
इतोविदूरे चरता कृष्णेनेहेषिता वयम् ॥
१६॥
नमः--नमस्कार; व:--तुम; विप्र-पत्नी भ्य: --ब्राह्मणपत्तियों को; निबोधत--कृपया सुनें; वचांसि--शब्द; नः--हमारे; इतः--यहाँ से; अविदूरे--अधिक दूर नहीं; चरता--जा रहे हैं; कृष्णेन--कृष्ण द्वारा; इह--यहाँ; इषिता: -- भेजे गये; वयम्--हम( सब )
ग्वालबालों ने कहा : हे विद्वान ब्राह्मणों की पत्नियो, आपको हमारा नमस्कार।
कृपयाहमारी बात सुनें।
हमें भगवान् कृष्ण ने यहाँ भेजा है, जो यहाँ से कुछ ही दूरी से होकर जा रहे हैं।
गाश्चारयन्स गोपालै: सरामो दूरमागतः ।
बुभुक्षितस्य तस्यान्नं सानुगस्य प्रदीयताम् ॥
१७॥
गाः--गौवों को; चारयन्--चराते हुए; सः--वह; गोपालैः --ग्वालबालों के संग; स-राम:--बलराम के साथ; दूरम्--दूर से;आगतः--आये हैं; बुभुक्षितस्य-- भूखे; तस्य-- उनके; अन्नम्ू-- भोजन; स-अनुगस्य-- अपने साथियों समेत; प्रदीयताम्--देदें
वे ग्वालबालों तथा बलराम के साथ गौवें चराते हुए बहुत दूर निकल आये हैं।
अब वे भूखेहैं अतएव आप उन्हें तथा उनके साथियों के लिए कुछ भोजन दे दें।
श्र॒त्वाच्युतमुपायातं नित्यं तदर्शनोत्सुका: ।
तत्कथाक्षिप्तमनसो बभूवुर्जातसम्भ्रमा: ॥
१८॥
श्रुत्वा--सुनकर; अच्युतम्--कृष्ण को; उपायातम्--पास आया हुआ; नित्यम्--निरन्तर; तत्-दर्शन--उनका दर्शन करने केलिए; उत्सुका: --उत्सुक; तत्ू-कथा--उनकी कथा से; आछ्पत--मुग्ध; मनस:--उनके मन; बभूवु:--हो गईं; जात-सम्भ्रमा:--उत्तेजित, उतावली ।
ब्राह्मण पत्नियाँ कृष्ण का दर्शन करने के लिए सदैव उत्सुक रहती थीं क्योंकि उनके मनभगवान् की कथाओं से मुग्ध ही चले थे।
अतः ज्योंही उन्होंने सुना कि कृष्ण आये हैं, वे अत्यन्तउतावली हो उठीं।
चतुर्विधं बहुगुणमन्नमादाय भाजनै: ।
अभिसस्त्रु: प्रियं सर्वा: समुद्रमिव निम्नगा: ॥
१९॥
चतुः-विधम्--चार प्रकार के ( भक्ष्य, भोज्य, लेह्य तथा चोष्य ); बहु-गुणम्--अनेक स्वाद तथा सुगंध से युक्त; अन्नम्--भोजन; आदाय--लेकर; भाजनै:--बड़े बड़े बर्तनों में; अभिसस््रु:--गई; प्रियम्ू-- अपने प्रियतम की ओर; सर्वाः--वे सभी;समुद्रम्ू--समुद्र तक; इब--जिस तरह; निम्न-गाः--नदियाँ |
बड़े बड़े पात्रों में उत्तम स्वाद तथा सुगन्ध से पूर्ण चारों प्रकार का भोजन लेकर सारी स्त्रियाँअपने प्रियतम से मिलने उसी तरह आगे बढ़ चलीं जिस तरह नदियाँ समुद्र की ओर बहती हैं।
निषिध्यमाना: पतिभिभ्रातृभिर्बन्धुभि: सुतैः ।
भगवत्युत्तमएलोके दीर्घश्रुत धृताशया: ॥
२०॥
यमुनोपवनेडशोक नवपल्लवमण्डिते ।
विचरन्तं वृतं गोपै: साग्रजं दहशुः स्त्रियः ॥
२१॥
निषिध्यमाना:--मना की गई; पतिभि: --अपने पतियों द्वारा; भ्रातृभि:--अपने भाइयों द्वारा; बन्धुभि: --अन्य सम्बन्धियों द्वारा;सुतैः--तथा अपने पुत्रों द्वारा; भगवति--भगवान् के प्रति; उत्तम-श्लोके--दिव्य स्तुतियों से वंदित; दीर्घ--दीर्घकाल तक;श्रुत--सुनने के कारण; धृत--प्राप्त किया गया; आशया:--जिनकी आशाएँ; यमुना-उपवने--यमुना के तटीय बगीचे में;अशोक-नव-पलल्लव--अशोक वृक्ष की कलियों से; मण्डिते--अलंकृत; विचरन्तम्--घूमते हुए; वृतम्--घिरे हुए; गोपैः--ग्वालबालों से; स-अग्रजम्--अपने बड़े भाई सहित; ददशुः:--देखा; स्त्रियः --उन स्त्रियों ने
यद्यपि उनके पतियों, भाइयों, पुत्रों तथा अन्य सम्बन्धियों ने उन्हें जाने से रोका किन्तु कृष्णके दिव्य गुणों का दीर्घकाल से श्रवण करते रहने से कृष्ण को देखने की उनकी आशा विजयीहुईं।
उन्होंने यमुना नदी के किनारे अशोक वृक्षों की कोपलों से सुशोभित एक बगीचे मेंग्वालबालों तथा अपने बड़े भाई बलराम के साथ विचरण करते हुए कृष्ण को देख लिया।
श्याम हिरण्यपरिधि वनमाल्यबर्ह-धातुप्रवालनटवेषमनक्रतांसे ।
विन्यस्तहस्तमितरेण धुनानमब्जंकर्णोत्पलालककपोलमुखाब्जहासम् ॥
२२॥
श्यामम्--श्याम वर्ण; हिरण्य--सुनहला; परिधिम्--वस्त्र; बन-माल्य--वनमाला से; बई--मोरपंख; धातु--रंगीन खनिज;प्रवाल--तथा कलियों के गुच्छे; नट--मंच पर नर्तक के समान; वेषम्--वस्त्र धारण किये; अनुब्रत--मित्र के; अंसे--कंधे पर;विन्यस्त--रखे हुए; हस्तम्--अपना हाथ; इतरेण --अन्य हाथ से; धुनानम्--नचाते हुए; अब्जम्--कमल; कर्ण--अपने कानपर; उत्पल--कुमुदिनियाँ; अलक-कपोल--गालों पर बाल बिखराये; मुख-अब्ज--कमल जैसे मुख पर; हासम्--हँसी सेयुक्त
उनका रंग श्यामल था और वस्त्र सुनहले थे।
वे मोरपंख, रंगीन खनिज, फूल की कलियोंका गुच्छा तथा जंगल के फूलों और पत्तियों की बनमाला धारण किये हुए नाटक के नर्तक कीभाँति वेश बनाये थे।
वे अपना एक हाथ अपने मित्र के कंधे पर रखे थे और दूसरे से कमल का'फूल घुमा रहे थे।
उनके कानों में कुमुदिनियाँ सुशोभित थीं, उनके बाल गालों पर लटक रहे थेऔर उनका कमल सदूश मुख हँसी से युक्त था।
प्राय: श्रुतप्रियतमोदयकर्णपूरै-्यस्मिन्रिमग्नमनसस्तमथाक्षिरन्द्रै: ।
अन्तः प्रवेश्य सुचिरं परिरभ्य तापंप्राज्॑ यथाभिमतयो विजहुनरिन्द्र ॥
२३॥
प्रायः--बारम्बार; श्रुत--सुना गया; प्रिय-तम--अपने सबसे प्यारे का; उदय--कीर्ति; कर्ण-प्रैः--कानों के आभूषण रूप;अस्मिन्ू--जिसमें; निमग्न--लीन; मनसः--मन; तम्--उन्हें; अथ--तब; अक्षि-रन्ट्र:--अपनी आँख के छिठ्रों से; अन्त:--भीतर; प्रवेश्य--घुसाकर; सु-चिरम्--दीर्घकाल तक; परिरभ्य--आलिंगन करके; तापम्--अपना कष्ट; प्राज्ममू--अन्तःकरण;यथा--जिस तरह; अभिमतय:--मिथ्या अहंकार के कार्य; विजहु: --त्याग दिया; नर-इन्द्र--हे पुरुषों पर शासन करने वालेराजा
हे नरेन्द्र, उन ब्राह्मणपत्नियों ने दीर्घकाल से अपने प्रिय कृष्ण के विषय में सुन रखा था औरउनका यश उनके कानों का स्थायी आभूषण बन चुका था।
उनके मन सदैव उन्हीं में लीन रहतेथे।
अब उन्होंने अपने नेत्रों के छिद्मों से होकर उन्हें अपने हृदय में प्रविष्ट कर लिया और फिरदीर्घकाल तक अपने हृदय के भीतर उनका आलिंगन करती रहीं।
इस तरह अन्ततः उनकीवियोग-पीड़ा उसी प्रकार जाती रही जिस प्रकार कि मुनिगण अपने अन्तःकरण का आलिंगनकरने से मिथ्या अहंकार की चिन्ता त्याग देते हैं।
तास्तथा त्यक्तसर्वाशा: प्राप्ता आत्मदिदक्षया ।
विज्ञायाखिलद%ग्द्रष्टा प्राह प्रहसिताननः ॥
२४॥
ताः--वे स्त्रियाँ; तथा--ऐसी दशा में; त्यक्त-सर्व-आशा:--अपनी सारी भौतिक इच्छाएँ त्यागकर; प्राप्ता:--आई हुईं; आत्म-दिदक्षया--साक्षात् उन्हें देखने की इच्छा से; विज्ञाय--समझने के लिए; अखिल-हक्--समस्त प्राणियों की दृष्टि का; द्रष्टा--देखने वाले ने; प्राह--कहा; प्रहसित-आनन:--मुखमंडल पर हँसी लाते हुए
समस्त प्राणियों के विचारों के साक्षी भगवान् कृष्ण यह समझ गये कि किस तरह अपनीसारी सांसारिक आशाओं का परित्याग करके ये स्त्रियाँ केवल उन्हें ही देखने आई हैं।
अत: अपनेमुख पर हँसी लाते हुए उनसे उन्होंने इस प्रकार कहा।
स्वागतं वो महाभागा आस्यतां करवाम किम् ।
यन्नो दिदक्षया प्राप्ता उपपन्नमिदं हि व: ॥
२५॥
सु-आगतम्--स्वागत है; व:--आपका; महा-भागाः --हे भाग्यशालिनी महिलाओ; आस्यताम्-- आइये बैठिये; करवाम--करसकता हूँ; किम्--क्या; यत्-- क्योंकि; न:ः--हमको; दिदृक्षया--देखने की इच्छा से; प्राप्ता:--आई हैं; उपपन्नम्--उपयुक्त;इदम्--यह; हि--निश्चय ही; व:--आपको |
[भगवान् कृष्ण ने कहा : हे परम भाग्यशालिनी महिलाओ, स्वागत है।
कृपया आराम सेबैठें।
मैं आपके लिये क्या कर सकता हूँ? आप मुझे देखने के लिए यहाँ आईं यह बहुत हीउपयुक्त है।
नन्वद्धा मयि कुर्वन्ति कुशला: स्वार्थदर्शिन: ।
अहैतुक्यव्यवहितां भक्तिमात्मप्रिये यथा ॥
२६॥
ननु--निश्चय ही; अद्धा-प्रत्यक्ष; मयि--मुझमें; कुर्वन्ति--करते हैं; कुशला:--पटु जन; स्व-अर्थ--अपना लाभ; दर्शिन: --देखने वाले; अहैतुकी--बिना कारण के; अव्यवहिताम्--अविच्छिन्न; भक्तिमू-- भक्ति; आत्म--आत्मा को; प्रिये--जिसकाप्रिय हूँ; यथा--उचित रीति से
निश्चय ही कुशल लोग, जो अपने असली लाभ को देख सकते हैं, वे मेरी अहैतुकी तथाअविच्छिन्न भक्ति करते हैं क्योंकि मैं आत्मा को सर्वाधिक प्रिय हूँ।
प्राणबुद्धिमन:स्वात्म दारापत्यधनादय: ।
यत्सम्पर्कात्प्रिया आसंस्ततः को न्वपरः प्रिय: ॥
२७॥
'प्राण-- प्राण; बुद्धि-- बुद्धि; मन:ः--मन; स्व--स्वजन; आत्म--शरीर; दार--पत्ली; अपत्य--सन्तान; धन--सम्पत्ति;आदयः--इत्यादि; यत्ू--जिस ( आत्मा ) से; सम्पर्कात्ू--सम्पर्क से; प्रिया:--प्रिय; आसन्--बने हुए हैं; ततः--उसकीअपेक्षा; कः--क्या; नु--निस्सन्देह; अपर:--दूसरा; प्रिय: --प्रिय वस्तु
आत्मा के सम्पर्क से ही जीव का प्राण, बुद्धि, मन, मित्रगण, शरीर, पत्नी, सन्तान, सम्पत्तिइत्यादि उसे प्रिय लगते हैं।
अतएबव अपने आप से बढ़कर कौन सी वस्तु अधिक प्रिय हो सकतीहै?
तद्यात देवयजनं पतयो वो द्विजातयः ।
स्वसत्र॑ पारयिष्यन्ति युष्माभिर्गृहमेधिन: ॥
२८ ॥
ततू--अत:; यात--जाओ; देव-यजनमू--यज्ञस्थल को; पतय:--पतिगण; व: --तुम्हारे; द्वि-जातय:--ब्राह्मण; स्व-सत्रम्--अपने अपने यज्ञों को; पारयिष्यन्ति--समाप्त कर सकेंगे; युष्माभि: --तुम लोगों के साथ; गृह-मेधिन:--गृहस्थ जन |
अतएव तुम लोग यज्ञस्थल को लौट जाओ क्योंकि तुम्हारे पति, जो कि दिद्वान ब्राह्मण हैं,गृहस्थ हैं और उन्हें अपने अपने यज्ञ सम्पन्न करने के लिए तुम्हारे सहयोग की आवश्यकता है।
श्रीपल्य ऊचु:मैवं विभोहति भवान्गदितुं खशंसंसत्यं कुरुष्व निगम तव पदमूलम् ।
प्राप्ता वयं तुलसिदाम पदावसूष्टकेशैर्निवोढुमतिलड्घ्य समस्तबन्धून् ॥
२९॥
श्री-पत्यः ऊचु:--ब्राह्मणपत्नियों ने कहा; मा--नहीं; एवम्--इस तरह; विभो--हे सर्वशक्तिमान; अहति--चाहिए; भवानू--आप; गदितुम्--बोलना; नृ-शंसम्--निष्ठुरतापूर्वक; सत्यम्--सत्य; कुरुष्व--कर दीजिये; निगमम्--शास्त्रों में दिये गये वचन;तव--आपके; पाद-मूलम्--चरणकमलों के नीचे ; प्राप्ता:--प्राप्त करके; वयम्--हम; तुलसि-दाम--तुलसीदल की माला;पदा--आपके पाँव से; अवसूष्टमू--ठुकराई जाकर; केशै:--हमारे बालों पर; निवोढुम्-ले जाने के लिए; अतिलड्घ्य--ठुकराकर; समस्त--सभी; बन्धून्--सम्बन्धियों को |
ब्राह्मणपत्लियों ने उत्तर दिया: हे विभो, आप ऐसे कटु वचन न कहें।
आपको चाहिए किआप अपने उस वचन को पूरा करें कि आप अपने भक्तों को सदैव प्रतिदान करते हैं।
चूँकि अबहम आपके चरणों को प्राप्त हैं, अतः हम इतना ही चाहती हैं कि हम वन में ही रहती जाएँ जिससेहम तुलसी-दल की उन मालाओं को अपने सिरों पर धारण कर सकें जिन्हें आप उपेक्षापूर्वकअपने चरणकमलों से ठुकरा देते हैं।
हम अपने सारे भौतिक सम्बन्ध त्यागने को तैयार हैं।
गृह्न्ति नो न पतय: पितरौ सुता वान भ्रातृबन्धुसुहदः कुत एव चान्ये ।
तस्माद्धवत्प्रपदयो: पतितात्मनां नोनान््या भवेद्गतिररिन्दम तद्विधेहि ॥
३०॥
गृह्न्ति--वे स्वीकार करेंगे; न:ः--हमको; न--नहीं; पतय:--हमारे पति; पितरौ--माता-पिता; सुता:--पुत्र; वा--अथवा;न--नहीं; भ्रातृ- भाई; बन्धु-- अन्य सम्बन्धी; सुहृदः--तथा मित्रगण; कुतः--तो कैसे; एव--निस्सन्देह; च--तथा; अन्ये--अन्य लोग; तस्मात्--अतएव; भवत्-- आपके; प्रपदयो:--आपके चरणकमलों पर; पतित--गिरे हुए; आत्मनाम्--जिनके शरीर; न:ः--हमारे लिए; न--नहीं; अन्या-- अन्य कोई; भवेत्--हो सकता है; गति:ः--गन्तव्य; अरिम्ू-दम--हे शत्रुओं केदमनकर्ता; तत्ू--वह; विधेहि--हमें प्रदान करें
अब हमारे पति, माता-पिता, पुत्र, भाई, अन्य सम्बन्धी तथा मित्र हमें वापस नहीं लेंगे औरअन्य कोई हमें किस तरह शरण देने को तैयार हो सकेगा? क्योंकि अब हमने अपने आपकोआपके चरणकमलों पर पटक दिया है और हमारे कोई अन्य गन्तव्य नहीं है अतएव हे अरिन्दम,हमारी इच्छापूरी कीजिये।
श्रीभगवानुवाचपतयो नाभ्यसूयेरन्पितृभ्रातृसुतादय:ः ।
लोकाश्च वो मयोपेता देवा अप्यनुमन्वते ॥
३१॥
श्री-भगवान् उवाच-- भगवान् ने कहा; पतय:--तुम्हारे पति; न अभ्यसूयेरन्--शत्रुता का अनुभव नहीं करेंगे; पितृ-भ्रातृ-सुत-आदयः-तुम्हारे पिता, भाई, पुत्र इत्यादि; लोका:--सामान्य लोग; च-- भी; व: --तुम्हारी ओर; मया--मेरे द्वारा; उपेता: --उपदेश दिये गये; देवा:--देवतागण; अपि-- भी; अनुमन्वते--सही ढंग से मानते हैं।
पूर्ण पुरुषोत्तम भगवान् ने उत्तर दिया: तुम यह विश्वास करो कि न तो तुम्हारे पतिगण तुमलोगों के प्रति शत्रुभाव रखेंगे न ही तुम्हारे पिता, भाई, पुत्र, अन्य सम्बन्धीजन या आम जनता।
मैं स्वयं उन्हें सारी स्थिति समझा दूँगा।
यहाँ तक कि देवतागण भी अपना अनुमोदन व्यक्त करेंगे।
न प्रीतयेडनुरागाय हाड्रसड़ो नृणामिह ।
तन्मनो मयि युज्जाना अचिरान्मामवाप्स्यथ ॥
३२॥
न--नहीं; प्रीतये--संतोष के लिए; अनुरागाय--अनुराग के लिए; हि--निश्चय ही; अड्भ-सड्भ:--शारीरिक मिलन; नृणाम्--लोगों के लिए; इह--इस जगत में; तत्--इसलिए; मनः--तुम्हारे मन; मयि--मुझपर; युज्ञाना:--स्थिर करके; अचिरात्ू --शीघ्र ही; मामू--मुझको; अवाप्स्यथ--प्राप्त करोगी |
तुम सबों का मेरे शारीरिक सान्निध्य में रहना निश्चय ही इस जगत के लोगों को अच्छा नहींलगेगा, न ही इस प्रकार से तुम मेरे प्रति अपने प्रेम को ही बढ़ा सकोगी।
तुम्हें चाहिए कि तुमअपने मन को मुझपर स्थिर करो और इस तरह शीघ्र ही तुम मुझे पा सकोगी।
श्रवणाइर्शनाद््ध्ञानान््मयि भावो<नुकीर्तनात् ।
न तथा सन्निकर्षेण प्रतियात ततो गृहान् ॥
३३॥
श्रवणात्--सुनने से; दर्शनात्--अर्चा विग्रह के स्वरूप का दर्शन करने से; ध्यानात्ू-- ध्यान करने से; मयि--मेरे लिए; भाव: --प्रेम; अनुकीर्तनातू--मेरे नाम तथा गुणों का कीर्तन करने से; न--नहीं; तथा--उसी तरह से; सन्निकर्षण--निकट रहने से;प्रतियात--लौट जाओ; तत:-- अतएव; गृहान्--अपने घरों को |
मेरे विषय में सुनने, मेरे अर्चाविग्रह स्वरूप का दर्शन करने, मेरा ध्यान धरने तथा मेरे नामोंएवं महिमाओं का कीर्तन करने से ही मेरे प्रति प्रेम बढ़ता है, भौतिक सात्निध्य से नहीं।
अतएवतुम लोग अपने घरों को लौट जाओ।
श्रीशुक उबाचइत्युक्ता द्विजपल्यस्ता यज्ञवार्टं पुनर्गता: ।
ते चानसूयवस्ताभिः स्त्रीभि: सत्रमपारयन् ॥
३४॥
श्री-शुक: उवाच-- श्रीशुकदेव गोस्वामी ने कहा; इति--इन बचनों से; उक्ता:--कहे गये; द्विज-पत्य:--ब्राह्मणपत्लियों से;ताः--वे; यज्ञ-वाटम्--यज्ञस्थल को; पुनः--फिर; गता:--चली गईं; ते--वे, उनके पतिगण; च--तथा; अनसूयव: --शत्रुभाव रहित; ताभि:--उन; स्त्रीभि: --स्त्रियों के साथ; सत्रम्--यज्ञ का सम्पन्न होना; अपारयन्--पूरा किया।
श्रील शुकदेव गोस्वामी ने कहा : इस तरह आज्ञा पाकर ब्राह्मणपत्नियाँ यज्ञस्थल पर लौटगईं।
ब्राह्मणों ने अपनी पत्नियों में कोई दोष नहीं निकाला और उन्होंने उनके साथ साथ यज्ञ पूराकिया।
तत्रैका विधृता भर्रां भगवन्तं यथा श्रुतम् ।
हडोपगुहा विजहौ देहं कर्मानुबन्धनम् ॥
३५॥
तत्र--वहाँ; एका--उनमें से एक ने; विधृता--बलपूर्वक रोकी गई; भर्त्रा--पति द्वारा; भगवन्तम्-- भगवान् को; यथा- श्रुतम्--जैसा उसने अन्यों से सुन रखा था; हृदा--अपने हृदय में; उपगुहा--आलिंगन करके; विजहौ--त्याग दिया; देहम्--अपना शरीर;कर्म-अनुबन्धनम्--जो भवबन्धन का कारण है।
उनमें से एक महिला को उसके पति ने जबरदस्ती रोक रखा था।
जब उसने अन्यों के मुख सेभगवान् कृष्ण का वर्णन सुना तो उसने अपने हृदय के भीतर उनका आलिंगन किया और अपनावह भौतिक शरीर त्याग दिया जो भवबन्धन का कारण है।
भगवानपि गोविन्दस्तेनैवान्नेन गोपकान् ।
चतुर्विधेनाशयित्वा स्वयं च बुभुजे प्रभु: ॥
३६॥
भगवान्-- भगवान्; अपि-- भी; गोविन्द: --गोविन्द; तेन--उस; एव--उसी; अन्नेन-- भोजन से; गोपकान्-ग्वालबालों को;चतु:-विधेन--चार प्रकार का; अशयित्वा--खिलाकर; स्वयम्--स्वयं, खुद; च--तथा; बुभुजे--खाया; प्रभु;--सर्वशक्तिमानने
भगवान् गोविन्द ने ग्वालबालों को वह चार प्रकार का भोजन कराया।
तत्पश्चात्सर्वशक्तिमान भगवान् ने भी उन व्यंजनों को खाया।
एवं लीलानरवपुखलॉकमनुशीलयन् ।
रैमे गोगोपगोपीनां रमयत्रूपवाक्ृतै: ॥
३७॥
एवम्--इस प्रकार से; लीला--लीलाओं के लिए; नर--मनुष्य रूप में; वपु:--दिव्य शरीरधारी; नू-लोकम्--मानव समाजका; अनुशीलयन्-- अनुकरण करते; रेमे-- आनन्द लिया; गो--गौवें; गोप--ग्वालबाल; गोपीनाम्--गोपियों को; रमयन्--प्रसन्न करते हुए; रूप--अपने सौन्दर्य; वाक्--वाणी; कृतैः--तथा कर्मों से |
इस तरह अपनी लीलाएँ सम्पन्न करने के लिए मनुष्य रूप में प्रकट होकर भगवान् ने मानवसमाज की रीतियों का अनुकरण किया।
उन्होंने अपनी गौवों, ग्वालमित्रों तथा गोपियों को अपनेसौन्दर्य, वाणी तथा कर्मों से प्रमुदित करते हुए आनन्द भोग किया।
अशथानुस्मृत्य विप्रास्ते अन्बतप्यन्कृतागस: ।
यद्विश्वेश्वरयोर्याच्ञामहन्म नृविडम्बयो: ॥
३८ ॥
अथ--त्पश्चात्; अनुस्मृत्य--होश में आने पर; विप्रा:--ब्राह्मणणण; ते--वे; अन्वतप्यन्ू--पछताने लगे; कृत-अगसः--अपराध किये जाने पर; यत्--क्योंकि; विश्व-ई श्ररयो: -- ब्रह्माण्ड के दो स्वामियों, कृष्ण तथा बलराम की; याच्ञाम्--याचनाका; अहन्म--हमने उल्लंघन किया; त्रू-विडम्बयो:--मनुष्य के छद्यवेश में प्रकट होने वालों का।
तब ब्राह्मणों को चेत हुआ और वे बहुत अत्यधिक पछताने लगे।
उन्होंने सोचा, 'हमसे बहुतपाप हुआ है क्योंकि हमने सामान्य मनुष्य के वेश में प्रकट हुए ब्रह्माण्ड के दो स्वामियों कीयाचना अस्वीकार कर दी है।
' इष्ठा स्रीणां भगवति कृष्णे भक्तिमलौकिकीम् ।
आत्मानं च तया हीनमनुतप्ता व्यगहयन् ॥
३९॥
इृष्टा--देखकर; स्त्रीणामू--अपनी पत्नियों की; भगवति-- भगवान्; कृष्णे--कृष्ण में; भक्तिम्ू--शुद्ध भक्ति को;अलौकिकीम्--अलौकिक; आत्मानम्--अपने आपको; च--तथा; तया--उससे; हीनम्--विहीन; अनुतप्ता: --पछतावा करतेहुए; व्यगहयन्--अपने आपको धिक्कारा।
अपनी पत्नियों की पूर्ण पुरुषोत्तम भगवान् कृष्ण के प्रति दिव्य भक्ति और अपने को उसभक्ति से विहीन देखकर उन ब्राह्मणों को अतीव खेद हुआ और वे अपने आपको धिक्कारने लगे।
धिग्जन्म नस्त्रिवृद्यत्तद्द्विग्ब्रतं धिग्बहुज्ञताम् ।
धिक्कुलं धिक्क्रियादाक्ष्यं विमुखा ये त्वधोक्षजे ॥
४०॥
धिक्--धिक्कार है; जन्म--जन्म; न:ः--हमारा; त्रि-वृतू-तिबारा ( पहला माता-पिता से, फिर ब्राह्मण दीक्षा द्वारा तथा तीसरावैदिक यज्ञ करते समय दीक्षा द्वारा ); यत् तत्--जो भी; धिक्--धिक्कार है; ब्रतम्--हमारे ( ब्रह्मचर्य ) ब्रत को; धिक्ू--धिक्कारहै; बहु-ज्ञतामू--अपार विद्वत्ता को; धिक्ू--धिक्कार है; कुलमू--हमारे उच्च वंश को ( कुलीनता ); धिक्-थधिक्कार है; क्रिया-दाक्ष्यमू--कर्मकाण्ड में हमारी दक्षता को; विमुख:--वैरी; ये--जो; तु--फिर भी; अधोक्षजे-- भगवान् में |
[ब्राह्मणों ने कहा : 'धिक्कार है हमारे तिबारा जन्म को, हमारे ब्रह्मचर्य तथा हमारी विपुलविद्वत्ता को, धिक्कार है हमारे उच्च कुल तथा यज्ञ-अनुष्ठान में हमारी निपुणता को! इन सबकोधिक्कार है क्योंकि हम भगवान् से विमुख हैं।
'नूनं भगवतो माया योगिनामपि मोहिनी ।
यद्वयं गुरवो नृणां स्वार्थे मुह्यामहे द्विजा: ॥
४१॥
नूनम्--निस्सन्देह; भगवत:-- भगवान् की; माया--मोहिनीशक्ति; योगिनाम्ू--बड़े बड़े योगियों को; अपि-- भी; मोहिनी --मोहित कर लेती है; यत्--चूँकि; वयम्--हम; गुरव:--गुरु; नृणाम्ू--समाज के; स्व-अर्थे--अपने सच्चे हित के लिए;मुह्यामहे--मोहित हो गये हैं; द्विजा:--ब्राह्मणणण |
भगवान् की मायाशक्ति बड़े बड़े योगियों को मोह लेती है, तो हमारी क्या बिसात! ब्राह्मणहोने के नाते हम सभी जाति के लोगों के आध्यात्मिक गुरु माने जाते हैं फिर भी हम अपने सच्चेस्वार्थ के बारे में मोहित हो गये हैं।
अहो पश्यत नारीणामपि कृष्णे जगदगुरो ।
दुरन्तभावं यो<विध्यन्मृत्युपाशान्गृहाभिधान् ॥
४२॥
अहो पश्यत--देखो तो सही; नारीणाम्--इन स्त्रियों की; अपि-- भी; कृष्णे-- भगवान् कृष्ण में; जगत्-गुरौ--सकल ब्रह्माण्डके गुरु; दुरत--असीम; भावम्-- भक्ति; यः--जिसने; अविध्यत्--तोड़ डाला है; मृत्यु--मृत्यु के; पाशान्ू--बन्धनों को; गृह-अभिधान्--गृहस्थ जीवन के नाम से विख्यात् |
जरा इन स्त्रियों के असीम प्रेम को तो देखो जो इन्होंने अखिल विश्व के आध्यात्मिक गुरुभगवान् के प्रति उत्पन्न कर रखा है।
इस प्रेम ने गृहस्थ जीवन के प्रति उनकी आसक्ति-मृत्यु केबन्धन-को छिन्न कर दिया है।
नासां द्विजातिसंस्कारो न निवासो गुरावषि ।
न तपो नात्ममीमांसा न शौचं न क्रिया: शुभा: ॥
४३॥
तथापि झ्युत्तम:श्लोके कृष्णे योगेश्वरेश्वरे ।
भक्तिर्टढा न चास्माकं संस्कारादिमतामपि ॥
४४॥
न--न तो; आसामू--इनका; द्विजाति-संस्कार: --समाज के द्विज कहलाने वाले वर्ग के संस्कार; न--न; निवास:--निवास;गुरौ--गुरु के आश्रम में ( अर्थात् ब्रह्मचारी रूप में प्रशिक्षण )) अपि--भी; न--न तो; तप:--तपस्या; न--न; आत्म-मीमांसा--आत्मा की वास्तविकता के विषय में दार्शनिक जिज्ञासा; न--नहीं; शौचम्--स्वच्छता का अनुष्ठान; न--नहीं;क्रिया:--कर्मकाण्ड; शुभा: --शुभ; तथा अपि--फिर भी; हि--निस्सन्देह; उत्तम:-शलोके--जिनका यशगान उच्च कोटि केवैदिक मंत्रों द्वारा किया जाता है; कृष्णे--कृष्ण के लिए; योग-ईश्वर-ई श्रे--योग के समस्त स्वामियों का परम स्वामी;भक्ति:--शुद्ध भक्ति; हढा--हढ़; न--नहीं; च--दूसरी ओर; अस्माकम्--हम सब की; संस्कार-आदि-मताम्--ऐसे संस्कारोंइत्यादि वाले; अपि--यद्यपि।
इन स्त्रियों ने न तो द्विजों के शुद्धीकरण संस्कार कराये हैं, न ही किसी आध्यात्मिक गुरु केआश्रम में ब्रह्मचारियों का जीवन बिताया है, न इन्होंने कोई तपस्या की है या आत्मा के विषय मेंमनन किया है या स्वच्छता की औपचारिकताओं का निर्वाह अथवा पावन अनुष्ठानों में अपने कोलगाया है।
तो भी इनकी हढ़ भक्ति उन भगवान् कृष्ण के प्रति है जिनका यशोगान वैदिक मंत्रोंद्वारा किया जाता है और जो योगेश्वरों के भी ईश्वर हैं।
और दूसरी ओर हम हैं जिन्होंने भगवान् कीकोई भक्ति नहीं की यद्यपि हमने इन सारी विधियों को सम्पन्न किया है।
ननु स्वार्थविमूढानां प्रमत्तानां गृहेहया ।
अहो नः स्मारयामास गोपवाक्यै: सतां गति: ॥
४५॥
ननु--निस्सन्देह; स्व-अर्थ--अपने लाभ के विषय में; विमूढानाम्--मोहग्रस्त; प्रमत्तानामू--प्रमत्तों का; गृह-ईहया-- अपनेघरेलू प्रयासों से; अहो-- ओह; नः--हमको; स्मारयाम् आस--स्मरण दिलाया; गोप-वाक्यै:--ग्वालबालों के शब्दों से;सताम्--दिव्य जीवों का; गति:--चरम लक्ष्य
निस्सन्देह हम लोग गृहकार्यों में व्यस्त रहने के कारण अपने जीवन के असली लक्ष्य से पूरीतरह विपथ हो गये हैं।
किन्तु अब जरा देखो तो कि भगवान् ने किस तरह इन सीधे-सादेग्वालबालों के शब्दों से हमें समस्त सच्चे ब्रह्मवादियों के चरम गन्तव्य का स्मरण दिलाया है।
अन्यथा पूर्णकामस्य कैवल्याद्यशिषां पते: ।
ईशितव्यै: किमस्माभिरीशस्यैतद्विडम्बनम् ॥
४६॥
अन्यथा--अन्यथा; पूर्ण-कामस्य-- प्रत्येक इच्छा पूरी होने वाले का; कैवल्य--मोक्ष का; आदि--इत्यादि; आशिषाम्--आशीर्वाद; पतेः--स्वामी के; ईशितव्यै:--नियंत्रित किये जाने वालों के साथ; किम्ू--क्या; अस्माभि:--हमारे साथ; ईशस्य--ईश्वर का; एतत्--यह; विडम्बनम्--बहाना |
अन्यथा पूर्ण काम, मोक्ष तथा दिव्य आशीर्वादों के स्वामी परम नियन्ता हमारे साथ यहविडम्बना क्यों करते ? हम तो सदैव उन्हीं के नियंत्रण में रहने के लिए ही हैं।
हित्वान्यान्भजते यं श्री: पादस्पर्शाशयासकृत् ।
स्वात्मदोषापवर्गेण तद्याच्ञा जनमोहिनी ॥
४७॥
हित्वा--त्यागकर; अन्यान्--अन्यों को; भजते--पूजती है; यमू--जिस भगवान् को; श्री:--लक्ष्मीजी; पाद-स्पर्श--जिनकेचरणकमलों के स्पर्श हेतु; आशया--आशा के साथ; असकृत्--निरन्तर; स्व-आत्म--अपने से; दोष--त्रुटि; अपवर्गुण--एकओर करके; तत्--उनकी; याच्ञा--याचना; जन--सामान्य लोग; मोहिनी--मोहित करके |
लक्ष्मीजी उनके चरणकमलों का स्पर्श पाने की आशा से सबकुछ एक ओर रखकर तथाअपना गर्व और चंचलता त्यागकर एकमात्र उन्हीं की पूजा करती हैं।
ऐसे भगवान् यदि याचनाकरते हैं, तो यह अवश्य ही सबों को चकित करने वाली बात है।
देश: काल: पृथगद्रव्यं मन्त्रतन्त्र्त्विजोउग्नय: ।
देवता यजमाननश्च क्रतुर्धर्म श्ष यन््मय: ॥
४८ ॥
स एव भगवास्साक्षाद्विष्णुयेंगेश्रेश्वर: ।
जातो यदुष्वित्याश्रुण्म हापि मूढा न विद्यह ॥
४९॥
देश:--स्थान; काल:--समय; पृथक् द्रव्यम्ू--साज-सामग्री की विशिष्ट वस्तुएँ; मन्त्र--वैदिक स्तोत्र; तन्त्र--निर्धारित अनुष्ठान;ऋत्विज: -- पुरोहित; अग्नयः--तथा यज्ञ की अग्नियाँ; देवता--अधिष्ठाता देवता; यजमान:--यज्ञ करने वाला; च--तथा;क्रतु:--हवि; धर्म:--शुभ फल; च--तथा; यत्--जिसको; मय: --बनाने वाला; सः--वह; एव--निस्सन्देह; भगवान् --भगवान्; साक्षात्- प्रत्यक्ष; विष्णु: --विष्णु; योग-ई श्वर-ई श्वरः -- यो गे श्वरों के स्वामी ने; जातः--जन्म लिया है; यदुषु--यादववंश के; इति--इस प्रकार; आश्रृण्म--हमने सुना है; हि--निश्चय ही; अपि--फिर भी; मूढा:--मूर्ख; न विद्यहे--हम नहीं जानपाये।
यज्ञ के सारे पक्ष-शुभ स्थान तथा समय, साज-सामग्री की विविध वस्तुएँ, वैदिक मंत्र,अनुष्ठान, पुरोहित तथा यज्ञ की अग्नियाँ, देवता, यज्ञ-अधिष्ठाता, यज्ञ-हवि तथा प्राप्त होने वालेशुभ फल-ये सभी उन्हीं के ऐश्वर्य की अभिव्यक्तियाँ हैं।
यद्यपि हमने योगेश्वरों के ईश्वर, पूर्णपुरुषोत्तम भगवान् विष्णु के विषय में यह सुन रखा था कि उन्होंने यदु वंश में जन्म ले लिया हैकिन्तु हम इतने मूर्ख थे कि श्रीकृष्ण को साक्षात् भगवान् नहीं समझ पाये।
तस्मै नमो भगवते कृष्णायाकुण्ठमेधसे ।
यन्मायामोहितधियो भ्रमाम: कर्मवर्त्मसु ॥
५०॥
तस्मै--उन; नमः--नमस्कार; भगवते-- भगवान्; कृष्णाय-- श्रीकृष्ण को; अकुण्ठ-मेधसे--जिनकी बुद्धि सीमित नहीं होती;यत्-माया--जिनकी मायाशक्ति से; मोहित--मोहग्रस्त; धिय:ः--मन; भ्रमाम:-- भटक रहे हैं; कर्म-वर्त्मससु--सकाम कर्म केमार्ग पर।
हम उन भगवान् श्रीकृष्ण को नमस्कार करते हैं, जिनकी बुद्धि कभी भी मोहग्रस्त नहीं होतीऔर हम हैं कि मायाशक्ति द्वारा मोहित होकर सकाम कर्म के मार्गों पर भटक रहे हैं।
सवबैन आद्यः पुरुष: स्वमायामोहितात्मनाम् ।
अविज्ञतानुभावानां क्षन्तुम्ईत्यतिक्रमम् ॥
५१॥
सः--वह; वै--निस्सन्देह; न:ः--हमारा; आद्य:--आदि भगवान्; पुरुष:--परम पुरुष; स्व-मया-मोहित-आत्मनाम्--उनकीमाया से मोहग्रस्त मन वालों का; अविज्ञात--न जानने वाले; अनुभावानाम्--उनके प्रभाव का; क्षन्तुम्--क्षमा कर देना;अहति--चाहिए; अतिक्रमम्--अपराध को |
हम भगवान् कृष्ण की मायाशक्ति से मोहग्रस्त थे अतएवं हम आदि भगवान् के रूप मेंउनके प्रभाव को नहीं समझ सके ।
अब हमें आशा है कि वे कृपापूर्वक हमारे अपराध को क्षमाकर देंगे।
इति स्वाघमनुस्मृत्य कृष्णे ते कृतहेलना: ।
दिद्दक्षवो ब्रजमथ कंसाद्धीता न चाचलन् ॥
५२॥
इति--इस प्रकार; स्व-अघम्--अपने अपराध को; अनुस्मृत्य--फिर से स्मरण करके; कृष्णे--कृष्ण के विरुद्ध; ते--वे; कृत-हेलना:--तिरस्कार प्रदर्शित करने पर; दिदृक्षव:ः--देखने की इच्छा से; ब्रजम्--नन्द महाराज के गाँव; अथ--तब; कंसात्--कंस से; भीता:--डरे हुए; न--नहीं; च--तथा; अचलन्-गये
इस प्रकार कृष्ण की उपेक्षा करने से उनके द्वारा जो अपराध हुआ था उसका स्मरण करतेहुए उनका दर्शन करने के लिए वे अति उत्सुक हो उठे।
किन्तु कंस से भयभीत होने के कारणउन्हें ब्रज जाने का साहस नहीं हुआ।
